भारत यात्रा Archives - Inditales https://inditales.com/hindi/category/भारत-यात्रा/ श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Wed, 28 Aug 2024 04:50:48 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.7.5 भारत – एक शाश्वत कविता https://inditales.com/hindi/bharat-ek-shashwat-kavita/ https://inditales.com/hindi/bharat-ek-shashwat-kavita/#comments Wed, 19 Feb 2025 02:30:13 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3769

भारत एक शाश्वत कविता है। एक जीवंत कविता, जो अपनी उच्छ्रंखल विविधता में श्वास लेती है, विभिन्न संस्कृतियों की ओढ़नियों में खिलती है, सदियों पूर्व सुनिश्चित भौगोलिक सीमाओं में स्फुरित होती है। इसकी राजनैतिक सीमाओं में अनेकों परिवर्तन आयें एवं भविष्य में आते रहेंगे। किन्तु इस देश की सीमाएं एवं इसकी चेतना को अनेकों शास्त्रों […]

The post भारत – एक शाश्वत कविता appeared first on Inditales.

]]>

भारत एक शाश्वत कविता है। एक जीवंत कविता, जो अपनी उच्छ्रंखल विविधता में श्वास लेती है, विभिन्न संस्कृतियों की ओढ़नियों में खिलती है, सदियों पूर्व सुनिश्चित भौगोलिक सीमाओं में स्फुरित होती है। इसकी राजनैतिक सीमाओं में अनेकों परिवर्तन आयें एवं भविष्य में आते रहेंगे। किन्तु इस देश की सीमाएं एवं इसकी चेतना को अनेकों शास्त्रों में इस प्रकार परिभाषित किया है, उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में हिन्द महासागर तक। वह ना इन सीमाओं को लांघती है, ना ही इनसे सिकुड़ती हैं।

महेश्वर में नर्मदा घाट
महेश्वर में नर्मदा घाट

यह अपनी सीमाओं के भीतर सहस्त्रों ऋषि-मुनियों के अनंत वर्षों की साधना तथा ध्यान की ऊर्जा को समेटे हुए है जिन्होंने इसके पर्वतों, वनों एवं नदियों के तटों पर तपस्या की है।

भारत का नभस्थ दृष्टिकोण

एक पंछी बनकर भारत को निहारें। कवि कालिदास की उत्कृष्ट पद्मकविता मेघदूत के मेघ के दृष्टिकोण से भारत को सराहें। महाकाव्य मेघदूत में, मध्य भारत के रामटेक पर्वतों से एक प्रेमी यक्ष, वर्षा के आरम्भ में उमड़ते-घुमड़ते मेघों के द्वारा, दूर-सुदूर हिमालय की गोद में स्थित अलकापुरी में अपनी प्रियतमा पत्नी को सन्देश दे रहा है। प्रेम में विह्वल, वह मेघों से कह रहा है कि वे अपने प्रवास में प्रेम से ओतप्रोत प्रकृति के विभिन्न आयामों को निहारें। वह उन परिदृश्यों की कल्पना कर रहा है जिन्हें मेघ देखेंगे, पर्वत, नदियाँ, पुष्प, वनस्पति, जीव-जंतु इत्यादि। वह मेघों से उज्जैन जैसे नगरों की सुन्दरता का उल्लेख कर रहा है जिसकी परिभाषा ही समृद्धि है। वह उनसे उज्जैन के मार्ग में, वनों में निवास करते लोगों का उल्लेख कर रहा है। ऐसा प्रतीत होता है मानो यक्ष स्वयं ही अप्रतिम प्रकृति का दर्शन करते प्रवास कर रहा हो, अपनी कल्पना में ही सही।

प्रथम दर्शन

नभ से प्रथम दर्शन में भारत का स्वर्ग सदृश भूखंड बालू, हिम तथा हरियाली से आच्छादित दृष्टिगोचर होता है जहां पर्वतों के मध्य स्थित वनों में सिंह, बाघ, गज, गेंडे इत्यादि जैसे वनीय प्राणियों से आंखमिचौली खेलते व उछलते हिरणों के झुण्ड स्वच्छंद विचरण करते हैं। तीन ओर समुद्र से सीमित भारत प्रायद्वीप को बालू की संकरी किनारी घेरती है जिसका कुल समुद्र तट किसी भी अन्य देश के समुद्र तट से सर्वाधिक लंबा है। उत्तर-पश्चिम भाग में स्थित थार मरुस्थल एवं उसके बालू के टीलों का रहस्यमयी परिदृश्य अत्यंत लुभावना प्रतीत होता  है। मध्य भाग में स्थित जीवाश्म उद्यान में उस काल की स्मृतियाँ संजोई हुई हैं जब यह स्थान गोंडवाना का भाग था तथा यहाँ के वनों की हरियाली अपने नीचे बालू को संजोये हुए है।

हिमालय

बर्फ से आच्छादित हिमालय भारत के शीश पर विराजमान एक मुकुट के समान है। यहाँ से निकलती हिमनदियाँ मैदानी भागों से होकर बहती हुई, गंगा, यमुना व सिन्धु जैसी अनेक पवित्र व प्रसिद्ध नदियों में परिवर्तित हो जाती हैं। यही अवस्था भारत की अन्य पर्वत श्रंखलाओं की है, जैसे मध्य भाग में विन्ध्य, दक्षिण में कोडगु अथवा पश्चिम में सह्याद्री इत्यादि।

लद्दाख की हिमालय श्रंखला
लद्दाख की हिमालय श्रंखला

जिस स्थान से नदियों का उद्गम होता है उस स्थान को तीर्थ का मान दिया जाता है। वहीं जिस स्थान पर दो अथवा अधिक नदियों का मिलन होता है वह संगम भी परम पावन तीर्थ स्थान माना जाता है। उसी प्रकार जिस स्थान पर एक नदी समुद्र में जाकर उससे एकाकार हो जाती है वह स्थान भी एक तीर्थ बन जाता है।

नदियाँ

भारत की नदियाँ उसकी शिराओं एवं धमनियों के समान हैं। हमारी देह की शिराओं से बहते जीवन द्रव्य के समान इन नदियों में बहते जल ने सदियों से अपने तट पर बसी सभ्यता का पोषण किया है। भारत की भूमि पर बिछी इन शिराओं से केवल एक ही वस्तु प्रतिस्पर्धा कर सकती हैं, वह है भारत की भूमी पर किसी जाल के समान बिछी रेल की पटरियाँ जो नदियों को लांघती, पर्वतों को चीरती, सुरंगों के भीतर लुप्त सी हो जाती तथा लम्बे लम्बे मैदानी क्षेत्रों को पार करती भारत के एक छोर से दूसरी छोर तक जाती हैं।

भारत-नेपाल सीमा पर स्थित गण्डकी नदी के तीर एकल सींग के गेंडे स्वच्छंद विचरण करते हैं जिनका नाम भी नदी की ही देन है। आसाम के काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के ऊंचे ऊंचे घास के मैदानों में स्वतन्त्र विचरण करते ये गेंडे किसी पालतू पशु के समान प्रतीत होते हैं। वहीं यह उद्यान चाय के विस्तृत बागानों से घिरा हुआ है जहां की चाय की सुगंध हमें प्रत्येक प्रातः नींद से जगाती है।

गंगा एवं चम्बल नदियों में गोते लगाते सूंस अथवा डॉलफिन, घड़ियाल इत्यादि भारत के राष्ट्रीय जलचर हैं। नर्मदा के तीर अनेक तीर्थयात्री नर्मदा परिक्रमा करते दृष्टिगोचर होते हैं जो नर्मदा नदी को अपने दाहिनी ओर रखते हुए नदी की २८०० किलोमीटर लम्बे पथ पर पदयात्रा करते हुए परिक्रमा करते हैं।

देश के मध्य भाग में स्थित वनों से बहती देनवा तथा पेण नदी के तट बाघों के दर्शन के सर्वोत्तम स्थान हैं जहां वे अपनी तृष्णा संतुष्ट करने आते हैं। पेंच के वनों में मोगली एवं शेरा की रोचक कथाएँ जीवंत होने लग जाती हैं। ऋषिकेश के समीप गंगा का तट हाथियों के समूहों का प्रिय स्थान है, उसी प्रकार पूर्वी हिमालय पर्वत श्रंखलाओं की तलहटी पर बहती तीस्ता नदी भी उनका पोषण करती है।

कुम्भ मेला

सौरमंडल में नक्षत्रों की एक विशेष अवस्थिति के अनुसार प्रत्येक १२ वर्षों में कुम्भ मेला भरता है। प्रयागराज में गंगा एवं यमुना के संगम स्थल पर आयोजित यह कुम्भ मेला वास्तव में किसी एक स्थान पर मानव जाति का वैश्विक रूप से एक विशालतम संगम है। यह हरिद्वार में भी उस स्थान पर आयोजित किया जाता है जहां गंगा मैदानी क्षेत्रों में प्रवेश करती है। उज्जैन की क्षिप्रा नदी के तट पर भी इस मेले का आयोजन किया जाता है, जहाँ से कर्क रेखा जाती  है। अन्य स्थल है, नासिक के गोदावरी नदी का तट। यूँ तो भारत के पवित्र स्थलों से बहती नदियों के तटों पर वर्ष भर ही भक्तों का तांता लगा रहता है जो यहाँ आकर विभिन्न पूजा-अर्चना तथा अनुष्ठान करते हैं। उनमें मुख्य हैं, हरिद्वार व वाराणसी में गंगा नदी के तट, मथुरा में यमुना नदी का तट, ओम्कारेश्वर एवं महेश्वर में नर्मदा नदी के तट, नासिक में गोदावरी नदी का तट इत्यादि।

दीपावली से १५ दिवसों के पश्चात आने वाली कार्तिक पूर्णिमा की तिथि पर देश भर के आस्थावान पावन नदियों में पवित्र स्नान करते हैं। विश्व का सर्वाधिक विशाल ऊँट मेला ब्रह्मा की नगरी पुष्कर में पुष्कर झील के समीप आयोजित किया जाता है।

नभ से भूमि के किंचित समीप आकर देखें तो उत्तराखंड एवं हिमाचल प्रदेश में हिमालय व शिवालिक पर्वत श्रंखलाओं की तलहटी पर छोटे छोटे अनेक काठकुणी मंदिर दृष्टिगोचर होंगे जो लकड़ी व शिलाओं के वैकल्पित फलकों एवं स्लेट प्रस्तर की छत द्वारा निर्मित होते हैं। उन मंदिरों में विराजमान देव पर्वतों के ऊपर से अपने क्षेत्रों की निगरानी करते हैं। लाखों छोटी छोटी जलधाराएं मिलकर सतलज एवं व्यास जैसी नदियों को जन्म देती हैं। ऊंचाई पर स्थित लाहौल का चंद्रताल तथा स्पिति का नाको ताल ऐसे प्रतीत होते हैं मानो साक्षात् स्वर्ग से धरती पर उतरे हों। इनमें, इन तालों के किनारे तपस्या में लीन, इश्वर के साक्षात् दर्शन के अभिलाषी संतों की असंख्य कथाएं सन्निहित हैं। ये ताल उन सभी चरवाहों की गाथाएँ कहते हैं जो प्रत्येक ग्रीष्म ऋतु में अपने पशुओं को लेकर यहाँ आते हैं।

भारत का थार मरुस्थल

राजस्थान के थार मरुस्थल का सुनहरा रंग, उसमें विचरण करते सुनहरे ऊँट एक अद्भुत सुनहरी आभा बिखेरते हैं। यहाँ प्राकृतिक रूप से प्राप्त श्वेत संगमरमर तथा पीला जैसलमेर आधुनिक वास्तुकारों एवं स्थापत्य विदों की अत्यधिक प्रिय शिलाएं हैं जो वर्त्तमान के गृहनिर्माण उद्योग में लोकप्रिय तत्व हैं। राजस्थान के मरुभूमि के मध्य से उभरते अनेक अप्रतिम व मनमोहक दुर्ग इस राज्य की शान हैं।

जैसलमेर का गद्सिसार सरोवर
जैसलमेर का गद्सिसार सरोवर

चीन की दीर्घतम भित्ति के पश्चात, विश्व की दूसरी एवं तीसरी सर्वाधिक विस्तीर्ण भित्तियाँ राजस्थान के कुम्भलगढ़ एवं आमेर दुर्ग के प्राचीर हैं। दुर्ग के भीतर रंगबिरंगे भित्तिचित्र रंगों की होली खेलते प्रतीत होते हैं। दुर्ग के भीतर प्रवेश करते ही एक राजसी भावना मन में हिलोरे मारने लगती है। राजस्थान के ऐसे ही अनेक दुर्गों को अब पंच तारांकित विरासती अतिथि संस्थानों में परिवर्तित कर दिया गया है जहां कुछ दिवस ठहर कर इस राजस्थानी राजपरिवारों के जीवन का प्रत्यक्ष अनुभव लिया जा सकता है।

बावड़ियां

ये बावड़ियां राजस्थान एवं गुजरात की सतह पर, जल से भरे अलंकृत पात्र के सामान हैं। सममित एवं ज्यामितीय सीढ़ियों से निर्मित बावडियों पर किये गए भव्य उत्कीर्णन इन्हें अत्यंत देदीप्यमान रूप प्रदान करते हैं। इनकी भित्तियों पर पुराणों एवं महाकाव्यों की लोकप्रिय कथाएं उत्कीर्णित हैं। ये बावड़ियां अधिकांशतः उन स्थानों पर निर्मित की गयी हैं जो प्राकृतिक जल स्त्रोतों से दूर हैं तथा जहां वर्षा भी अत्यंत सीमित होती हैं। एक समय ये बावड़ियां वहां के नागरिकों की जीवनरेखा होती थीं। इन बावडियों में पाटन में रानी की वाव अत्यंत उल्लेखनीय बावडी है जो भूमि से नीचे जाते हुए कुल सात तलों में निर्मित है। इन सीढ़ियों को ऊपर से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है मानो ये हमें भूमि के नीचे के विश्व अथवा भूमि के गर्भ में ले जा रही हैं। किसी काल में यहाँ यात्रीगण बैठकर कुछ क्षण विश्राम करते रहे होंगे। रंगबिरंगी ओढ़नियाँ ओढ़ी स्त्रियाँ दिवस भर के कार्य पूर्ण कर जल लेने यहाँ आती रही होंगी एवं आपस में बतियाने कुछ क्षण यहाँ बैठती रही होंगी।

चाँद बावड़ी - आभानेरी - राजस्थान
चाँद बावड़ी – आभानेरी – राजस्थान

यहाँ से कुछ दक्षिण की ओर आकर हम अजंता की अद्भुत गुफाओं में पहुंचते हैं जहां २००० वर्षों पूर्व चित्रित भित्तिचित्र बुद्ध एवं बोधिसत्त्व की कथाएं कहती हैं। एलोरा की गुफाओं ने अपने भीतर भारत का सर्वाधिक अभूतपूर्व एवं विस्मयकारी अभियांत्रिक अचम्भा संजोया हुआ है। यहाँ एक अखंड चट्टान को ऊपर से नीचे की ओर काटकर एक सम्पूर्ण मंदिर उत्कीर्णित किया गया है, अर्थात चट्टान के सर्व अवांछित भागों को कुशलता से खुरचकर निकला गया है। इन्हें देख कर आश्चर्य होता है कि हमने कब, कहाँ एवं कैसे अपने पूर्वजों के उत्कृष्ट बुद्धिमत्ता एवं कौशल्या को यूँ ही खो दिया है।

खजुराहो

उत्तरी भारत के अधिकाँश मंदिर आक्रमणकारियों के हाथों उध्वस्त हो चुके हैं। किन्तु खजुराहो के मंदिर अब भी यथावत १००० वर्षों पूर्व के अपने गौरवपूर्ण इतिहास की गाथा सुना रहे हैं। उत्तर भारतीय नागर शैली में निर्मित मंदिरों में सोपानी अवसर्पण का प्रयोग कर कैलाश पर्वत का आभास देने का प्रयास किया गया है। यद्यपि मंदिरों में नागर शैली का प्रयोग सम्पूर्ण उत्तर भारत में दृष्टिगोचर होता है तथापि इस शैली की पराकाष्ठा ओडिशा के मंदिरों में दिखाई देती है। अनेक हिन्दू व जैन मंदिरों से भरा हुआ, शिलाओं का यह नगर खजुराहो, अनेक गाथाएँ सुनाता है। मंदिरों की बाह्य भित्तियों पर की गयी अप्रतिम शिल्पकारी ऐसी प्रतीत होती है मानो शिलाओं को उत्कीर्णित कर कवितायें रची गयी हों जिनकी परतों में उनका संगीत छुपा हो। यह विडम्बना है कि यह मंदिर अपनी कुछ कामुक शिल्पकारी के लिए अधिक जाना जाता है या यूँ कहें कुख्यात है।

किंचित पूर्व दिशा की ओर जाएँ तो दंडकारण्य के सघन वनों में पहुँच जाते हैं जिनका उल्लेख रामायण में भी किया गया मिलता है। आज भी आदिवासी जनजाति के लोग यहाँ के वनों के भीतर वृक्षों की आराधना करते दृष्टिगोचर होते हैं।

सीता एवं बुद्ध

बोध गया में बोधी वृक्ष के नीचे बुद्ध को प्राप्त परम ज्ञान की अनेक लोकप्रिय कथाएं जुडी हैं बिहार राज्य से जो देवी सीता एवं भगवान बुद्ध की जन्म भूमी है। बिहार के समीप, अपने सुनहरे काल की कथा कहते विश्व प्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय के चटक लाल रंग के अवशेष हैं। इस विश्वविद्यालय में विश्व भर से विद्यार्थी विद्या अर्जन करने आते थे। उन विद्यार्थियों में एक प्रसिद्ध विद्यार्थी ह्वेन त्सांग भी था जिसकी स्मृति में समीप ही एक स्मारिका भी स्थापित है। मधुबनी के निराले एवं अनूठे गाँव, घरों की भित्तियों पर किये गए अप्रतिम चित्रीकरण के कारण दूर से ही पहचाने जा सकते हैं। मधुबनी की विलक्षण चित्रकला ने निर्मल व शांत गाँवों की गलियों से विश्व भर के संग्रहालयों तक की यात्रा सफलता पूर्वक पूर्ण की है।

भारत का मानसून

भारत में मानसून इसके दक्षिणी छोर पर स्थित केरल से आरम्भ होता है। जून मास में, जब भारत के अधिकाँश प्रदेशों में ग्रीष्म ऋतु अपनी चरम सीमा पर रहती है, तब मानसून केरल की ओर से देश में प्रवेश करता है तथा शनैः शनैः उत्तर की ओर बढ़ते हुए वर्षा की बाट जोहती तपती धरती पर शीतलता का मलहम लगाता है। अपने मार्ग में सभी को शीतलता में सराबोर करता हुआ तृष्णा भरी धरती को पोषित करता जाता है। मानसून कृषि प्रधान भारत की आन, मान एवं शान है।

भारत का समुद्र तट
भारत का समुद्र तट

केरल में हरियाली के विभिन्न रंग हमारे नैनों को चुनौती देते प्रतीत होते हैं। केले के ताजे वृक्ष के हलके हरे रंग से नारियल के वृक्ष के तने पर लिपटी काली मिर्च की लताओं के सघन हरे रंग तक, रंगों के इतने प्रकार विस्मृत कर देते हैं। केरल मसालों की भूमि है। यहाँ की काली मिर्च एवं अन्य मसालों के लिए प्राचीन काल से अनेक देशों के व्यापारी जहाज यहाँ लंगर डालते आये हैं। मसालों में इलायची, दालचीनी, जायफल, लौंग इत्यादि प्रमुख हैं। केरल के हरियाली से ओतप्रोत वन हाथियों से भरे हुए हैं। केरल के मंदिरों के उत्सवों में भी हाथियों की महत्वपूर्ण भागीदारी होती है। अरब महासागर से आती अप्रवाही जल की अनेक नदियाँ केरल की धरती पर सघन जाल बुनती हैं।

सर्प नौकाएं

मानसून के मध्य में केरल में एक अद्भुत उत्सव का समय आता है जब केरल के स्त्री पुरुष अपनी लम्बी लम्बी सर्प नौकाओं को जल में उतारते हैं। यहाँ के अनेक मंदिरों में जलोत्सव मनाया जाता है जब इन नौकाओं की दौड़ प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं। यह मानसून का उत्सव मनाने की एक अप्रतिम रीत है। केरल में लकड़ी के मंदिरों की नारियल तेल में भीगी भित्तियाँ भी अनेक कथाएं कहती हैं।

शिलाओं की कथाएं

केरल से पूर्व दिशा में तमिल देशम है जहां की शिलाएं विशालतम एवं प्राचीनतम कथाएं कहती हैं। उन्हें शिलाओं द्वारा प्रस्तुत कविता कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। आप उहापोह के भंवर में फंस जायेंगे कि कहाँ-कहाँ जाएँ, कहाँ-कहाँ देखें अथवा महाबलीपुरम, कांचीपुरम, श्रीरंगम, चिदंबरम जैसे सुन्दर स्थलों में किस का चुनाव करें। तमिलनाडु के महाबलीपुरम का शोर मंदिर भारत के लगभग पूर्वोत्तर भाग में स्थित है। कोरोमंडल तट पर स्थित यह मंदिर बंगाल की खाड़ी का अवलोकन करता प्रतीत होता है। यह अखंड मंदिर है जिसकी रूपरेखा पांच रथों की भाँति है। मंदिर का कुछ भाग समुद्र में जलमग्न हो गया है। पाँच होने के कारण इन मंदिरों को पांच पांडवों के नाम से जाना जाता है, जैसा कि सम्पूर्ण भारत में प्रथा सी बन चुकी है।

प्राचीनतम हिन्दू मंदिर

महाबलीपुरम में अर्जुन तपस्या तथा कृष्ण का माखन गोला जैसी अद्भुत शिल्पकारी पर से दृष्टी हटाये नहीं हटती। किन्तु इनके अतिरिक्त श्रीरंगम के शिव एवं शक्ति मंदिरों के गगनभेदी गोपुरमों पर की गयी शिल्पकारी का भी अवलोकन अवश्य किया जाना चाहिए। यह विश्व का विशालतम जीवंत मंदिर परिसर है। किसी जीवंत नगरी के समान इस मंदिर परिसर में सात भित्तियों को घेरते २१ गोपुरम हैं। प्रत्येक मंदिर की भित्तियों पर विस्तृत व उत्कृष्ट उत्कीर्णन हैं जिनमें पुराणों एवं महाकाव्यों की कथाएं प्रदर्शित की गयी हैं। जो इन कथाओं को जानते हैं तथा शिल्पों को समझते हैं उनके लिए इन शिल्पों की सूक्ष्मताओं अध्ययन करना अत्यंत आनंददायी होता है। इन दृश्यों में दैवी एवं मानवी आकृतियों को अत्यंत उत्कृष्टता से उकेरा गया है। ऐसा प्रतीत होता है मानो इनके बोलते नैन अभी झपकने लगेंगे तथा उनके कंपकंपाते होंठ अभी बोलने लगेंगे। इन सब पर विश्वास करने के लिए यहाँ आकर प्रत्यक्ष इनके दर्शन करना आवश्यक है। यहाँ आकर ही आप इन मूर्तियों को बोलते एवं पुराणों की कथाएं कहते देख सकते हैं।

रामेश्वरम का पम्बन सेतु
रामेश्वरम का पम्बन सेतु

इन मूर्तियों पर उत्कीर्णित आकर्षक आभूषण, उत्तम वस्त्र, विभिन्न अद्भुत केश-सज्जा, पाँव में आधुनिक प्रतीत होते चप्पल इत्यादि देख आप दांतों तले उंगली दबा लेंगे। देवों को उनके वाहनों पर बैठे तथा अपने अस्त्र-शस्त्र व अन्य चिन्ह लिए दर्शाया गया है। ये प्रतिमाएं ऐसी प्रतीत होती हैं मानो उनके उठे हस्त तथा खुले अधरों से वरदान के शब्द निकलने लगेंगे। रामायण एवं महाभारत जैसे महाकाव्यों के दृश्य भित्तियों पर उकेरे गए हैं, चाहे मंदिर उत्तर भारत के हों अथवा दक्षिण भारत के। दक्षिण भारतीय छोर पर रामसेतु है जो गर्भनाल के रूप में श्रीलंका द्वीप को भारत से जोड़ती है।

कॉफी के प्रदेश

कॉफी के प्रदेश कुर्ग में कावेरी नदी का उद्गम है। बंगाल की खाड़ी तक जाते जाते कावेरी नदी मार्ग में भारत के दक्षिणी भागों का पोषण करती जाती है। एक समय इस नदी के तट पर फलते-फूलते मैसूर राज्य की सम्पन्नता अपनी चरम सीमा पर थी।  यह राज्य अब भी अपने विशेष दशहरा उत्सव के लिए जगप्रसिद्ध है। उत्तर कर्णाटक के चालुक्य भूमि पर ऐहोल में ऐसी कार्यशालाएं हैं जहां मंदिर के उत्कीर्णन का प्रशिक्षण दिया जाता था। समीप ही बादामी के बदामी रंग की गुफाएं एवं पट्टडकल के विशेष वास्तुशिल्प युक्त मंदिर हैं। निकट ही विजयनगर साम्राज्य के भव्य एवं राजसी नगरी हम्पी के अवशेष भी हैं। विश्व के सर्वाधिक संपन्न राज्यों में से एक राज्य, हम्पी के अवशेष विश्व का सर्वाधिक सुन्दर अवशेष हैं।

गोदावरी

किंचित उत्तर दिशा में जाएँ तो गोदावरी नदी घुमते इठलाते आँध्रप्रदेश के खेतों में पहुँचती है। कृष्णा नदी गुंटूर की तीखी लाल मिर्चों को अपना स्वाद प्रदान करती है। गुंटूर वह नवीनतम नगरी है जो प्राचीन अमरावती नगरी के नवीन स्वरूप में प्रकट हुई है। किंचित उत्तर में, ओडिशा में भगवान विष्णु एक उत्कृष्ट रूप से उत्कीर्णित मंदिर के भीतर जगन्नाथ के रूप में निवास करते हैं। इसके चारों ओर उत्कृष्टता से परिपूर्ण अनेक मंदिर एवं गुफाएं हैं जिनके मध्य अनेक ऐसे कलाकार रहते हैं जो अप्रतिम चित्रकारी द्वारा पौराणिक कथाओं को जीवंत करते हैं। कोणार्क का सूर्य मंदिर अपने खंडित रूप में भी अपनी उत्कृष्टता बनाए हुए है। रथ के आकार की उसकी भव्य संरचना तथा चारों ओर खड़े सुडौल चक्के आज भी कारीगरों की उत्कृष्टता का प्रमाण देते हैं।

टेराकोटा के मंदिर

बंगाल की ओर जाएँ तो शिलाओं की अनुपस्थिति में, कारीगरों ने टेराकोटा अथवा लाल-भूरी पकी मिट्टी की पट्टिकाओं पर पौराणिक कथाओं को गढ़ कर मंदिरों की भित्तियों पर लगाया है ताकि भविष्य में आने वाली पीढ़ियों के लिए ये कथाएं सुरक्षित हो जायें। इन्ही कथाओं को बुनकरों ने प्रसिद्ध बालुचेरी साड़ियों पर अप्रतिम रूप से जीवंत किया है। बंगाल का कभी ना भुला पाने वाला ठेठ देहाती एवं कर्णप्रिय बाउल संगीत बंगाल के छोटे छोटे नगरों एवं गाँवों की गलियों में गुंजायमान होता है। इसके अतिरिक्त विश्वप्रसिद्ध विश्वविद्यालय शान्ति निकेतन है जिसकी स्थापना रविन्द्र नाथ ठाकुर ने की थी।

ब्रह्मपुत्र

भारत का उत्तर-पूर्वी छोर अर्थात पवित्र ईशान कोण अनेकों जनजातियों का निवास स्थान है जो ब्रह्मपुत्र नदी के दोनों ओर रहते हैं। उन स्थानों में ब्रह्मपुत्र नदी पर स्थित मजूली द्वीप भी सम्मिलित है जो विश्व का विशालतम नदद्वीप  है। इस स्थान पर वैष्णव सत्र भी है जिन्होंने शंकर देव की विरासत को जीवंत रखा हुआ है। इस स्थान पर प्रकृति की दया अपनी चरम सीमा पर रहती है। पर्वतों पर सघन हरियाली, उपजाऊ भूमि, पर्वतों के मध्य बिखरे सरोवर एवं वनीय प्रदेश, ऊंचे व गहरे जलप्रपात इत्यादि इस स्थान को स्वर्ग सदृश बनाते हैं। इनके मध्य अनेक गुप्त गुफाएं, वनीय पुष्प, फल, जीव-जंतु इत्यादि प्रकृति को सम्पूर्ण बनाते प्रतीत होते हैं।

पश्चिम का मोढेरा सूर्य मंदिर, पूर्व का कोणार्क सूर्य मंदिर तथा उत्तरी पर्वतों के कुछ अन्य सूर्य मंदिर आपके कानों में सूर्य आराधना के गौरवपूर्ण इतिहास की कथा सुनाते हैं। उसी सूर्य की आराधना जो हमारे जीवन में दिवस- रात्र के चक्र का संगीत भरते हैं। भारत देश के हृदयस्थली नैमीषारन्य है, जो ऐसा वन है जिसके विषय में प्रत्येक ग्रंथ व पुराण में साधुओं के निवास के रूप में उल्लेख किया गया है। इसी स्थान पर अनेक ग्रंथों की रचना हुई, उनका आदान-प्रदान हुआ तथा उन पर अनवरत चर्चाएँ हुई हैं। उस काल की कथा सुनाते वृक्ष यहाँ गर्व से खड़े हैं जिन्होंने कदाचित उन चर्चाओं का श्रवण किया होगा। धर्म के मार्ग पर चलने वाले भक्तों का यह तीर्थस्थल है।

अंत में मैं यही कहना चाहूंगी कि भारत की चेतना अब भी उसके ग्रामीण क्षेत्रों में स्फुरित होती है जो सम्पूर्ण भारत में बिखरे हुए हैं। कमलों से भरे तालाब, गाय के गोठे, विशाल वृक्षों की छाँव में बने चबूतरे, यही भारत के गाँवों की शान है तथा भारत का मान है, जहाँ प्रकृति के सानिध्य में जीवन अत्यंत सादा, सरल एवं पावन होता है।

मार्टिन लूथर किंग ने कहा था – मैं दूसरे देशों में भले ही एक पर्यटक की भाँती जाऊं, किन्तु भारत में मैं एक तीर्थयात्री बनकर गया था। भारत एक ऐसा देश है जहां प्रत्येक पर्वत, चट्टान, नदी तथा सरोवर दैवी हैं तथा प्रत्येक यात्री एक तीर्थयात्री है।

सर्वप्रथम Hinduism Today Magazine में प्रकाशित किया था।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post भारत – एक शाश्वत कविता appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/bharat-ek-shashwat-kavita/feed/ 1 3769
रेलगाड़ी पर फिल्माए लोकप्रिय बॉलीवुड गीतों की यात्रा – एक झलक https://inditales.com/hindi/rail-gadi-par-filmaaye-geet/ https://inditales.com/hindi/rail-gadi-par-filmaaye-geet/#respond Wed, 18 Dec 2024 02:30:10 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3735

बॉलीवुड के चित्रपट सामान्यतः अपने निर्मिती कालखंड व उस समय की परिस्थिति के प्रतिबिम्ब होते हैं। उनमें कुछ काल्पनिक तथा कुछ वास्तविक कथानकों द्वारा समय के साथ परिवर्तित होते समाज एवं व्यवस्थाओं का सुन्दर चित्रण किया जाता रहा है। यात्रायें समाज का अभिन्न अंग हैं। तो स्वाभाविक ही है कि हमारे बॉलीवुड चित्रपटों के पटकथाओं […]

The post रेलगाड़ी पर फिल्माए लोकप्रिय बॉलीवुड गीतों की यात्रा – एक झलक appeared first on Inditales.

]]>

बॉलीवुड के चित्रपट सामान्यतः अपने निर्मिती कालखंड व उस समय की परिस्थिति के प्रतिबिम्ब होते हैं। उनमें कुछ काल्पनिक तथा कुछ वास्तविक कथानकों द्वारा समय के साथ परिवर्तित होते समाज एवं व्यवस्थाओं का सुन्दर चित्रण किया जाता रहा है। यात्रायें समाज का अभिन्न अंग हैं। तो स्वाभाविक ही है कि हमारे बॉलीवुड चित्रपटों के पटकथाओं में भी यात्राओं एवं उससे जुडी यंत्रणाओं का कभी उद्देश्यपूर्ण रीति से तो कभी सौन्दर्यवृद्धि की दृष्टी से उल्लेख किया जाता रहा है।

इसी कारण आप बॉलीवुड चित्रपटों में अनेक गीत देखेंगे जिनका परोक्ष या अपरोक्ष रूप से यात्राओं से सम्बन्ध रहा है। यात्रा चाहे तांगे से हो या, रिक्शा से, साइकिल से हो या बस से, विमान से हो या रेलगाड़ी से। समय से साथ टाँगे, रिक्शा आदि का स्थान दुपहिये वाहनों ने ले लिया है। बस स्थानकों के दृश्यों के स्थान पर अब विमानतल के दृश्य अधिक दिखाई देते हैं। किन्तु एक दृश्य ऐसा है जो अब तक वैसा कि वैसा ही है, तटस्थ। वह है रेलगाड़ी या ट्रेन का दृश्य।

रेलयात्रा में जो लुभावनापन है, आकर्षण है, प्रेमी-प्रेमिकाओं का प्रेम व्यक्त करना है, यहाँ तक कि अपरोक्ष रूप से कोई सन्देश देना है, उसे यात्रा का अन्य कोई भी माध्यम मात नहीं दे सकता। स्वाभाविक है कि अनेक दशकों से बॉलीवुड के कुछ अत्यंत लोकप्रिय, भावुक तथा कल्पनाशील गीत ट्रेन पर ही चित्रित हैं। भारतीय रेल पर। आप यदि ध्यान से सोचें तो बॉलीवुड के अनेक भावनाशील तथा दार्शनिक गीतों की पार्श्वभूमी में भी आप ट्रेन का सम्बन्ध अवश्य देखेंगे, विशेषतः आरंभिक दशकों के गीतों में।

रेल पर चित्रित बॉलीवुड के २० सर्वोत्तम गीत

दशकों से बॉलीवुड के चित्रपटों में जो गीत रेलगाड़ी पर फिल्माए जा रहे हैं, उनसे हमें भारतीय रेल की अब तक की यात्रा के विषय में भी जानकारी मिलती है। अंग्रेजों के लिए बने अतिविलासी डब्बों से दूसरे दर्जे के आम डब्बों तक, धरोहर रेलों से स्थानिक रेलों तक, यहाँ तक कि मालवाहक रेलों की भी यात्रा समझ में आती है। तो आईये मेरे साथ भारतीय रेलों पर फिल्माए बॉलीवुड संगीत की संगीतमय यात्रा पर जो आपको कल्पना के जग में ले जायेगी।

तूफान मेल – जवाब (१९४२)

१९४२, वह वर्ष जब भारत में “भारत छोडो” आन्दोलन चल रहा था। यह वही वर्ष था जब कमल दासगुप्ता के संगीत पर पंडित मधुर द्वारा लिखे इस अमर गीत को कानन देवी सिंह ने गया था।

तूफान मेल – उस काल में रेलों के नाम भी अनोखे होते थे। आजकल रेलों के कितने नीरस नाम होते हैं। कल्पना कीजिये कि आप तूफान मेल नाम के ट्रेन में यात्रा करने वाले हैं।

आओ बच्चों तुम्हे दिखाएँ – जागृति (१९५४)

इस अमर गीत में ट्रेन की यात्रा दिखाई गयी है जो वास्तव में आपको भारत के विभिन्न क्षेत्रों एवं विविधताओं की सैर कराती है। भारत में हम गर्व से कहते हैं कि भारतीय रेल भारत के कोने कोने में जाती है। देश के एक छोर को दूसरे छोर से जोड़ती है। यह गीत ठीक उसी भावना का प्रदर्शन करता है। इस गीत से मुझे अपने शालेय दिवसों का स्मरण हो आता है। किसी ना किसी रूप में इस गीत ने मुझे यात्राएं करने के लिए प्रेरित किया है। आज मैं जितनी यात्राएं करती हूँ, यहाँ तक कि उसे मैंने अपना व्यवसाय ही बना लिया है, मेरे अनुमान से उसमें इस गीत की बड़ी भूमिका है। कवि प्रदीप द्वारा गाये गए इस गीत को हेमंत कुमार ने संगीतबद्ध किया है।

देख तेरे संसार की हालत – नास्तिक (१९५४)

भारत विभाजन के समय भी रेलों ने बड़ी भूमिका निभाई थी। एक ओर से दूसरी ओर लोगों को ले जाना। रेलें लोगों से खचाखच भरी होती थीं। खिडकियों, दरवाजों से लटकते लोग। छत पर बैठे लोगों की भीड़। ऐसा प्रतीत होता है कि इस गीत ने इस दृश्य व भावना को आत्मसात करने का प्रयास किया है। प्रदीप द्वारा गाया गया यह गीत आपको आपके आज की सुख-सुविधाओं भरे जीवन के विषय में अवश्य कृतज्ञ कर देगा।

बस्ती बस्ती पर्बत पर्बत – रेलवे प्लेटफोर्म (१९५५)

इस दृश्य में पटरी को पीछे छोड़कर रेलगाड़ी आगे बढ़ रही है, सा

थ ही चित्रपट के कलाकारों एवं सहायकों के नाम पटल पर आते जा रहे हैं। यह एक यात्री की गाथा प्रतीत होती है।

इस गीत को साहिर लुधियानवी ने लिखा, मदन मोहन ने संगीतबद्ध किया तथा मोहम्मद रफ़ी ने अपने मधुर आवाज में गाया है।

है अपना दिल तो आवारा – सोलवां सावन (१९५८)

यह मेरा सदा-प्रिय, एक अल्हड़ गीत है जिसे देव आनंद एवं वहीदा रहमान की सुन्दर जोड़ी पर फिल्माया गया है। यह गीत रेलगाड़ी के भीतर फिल्माया गया है, इसे समझने में मुझे कुछ समय लगा था। क्योंकि मैंने तब तक ऐसी रेलगाड़ी नहीं देखी थी। मजरूह सुल्तानपुरी के शब्दों को एस. डी. बर्मन ने संगीतबद्ध किया है। इस मस्ती भरे गीत को हेमंत कुमार ने अपनी गायकी से अमर कर दिया है।

 मेरे अनुमान से यह गीत कोलकाता के स्थानीय इलेक्ट्रिकल मल्टीपल यूनिट (EMU) में फिल्माया गया है।

औरतों के डब्बे में – मुड़ मुड़ के ना देख (१९६०)

यह एक मस्ती भरा गीत है जिसमें स्त्री-पुरुष के मध्य सदाबहार नोकझोंक को प्रदर्शित किया है। इस दृश्य में एक पुरुष महिलाओं के डिब्बे में प्रवेश कर जाता है।

इस दृश्य में भारत भूषण, जो बहुधा गंभीर भूमिका निभाते थे, चंचलता भरी भूमिका कर रहे हैं। इस गीत को मोहम्मद रफ़ी एवं सुमन कल्याणपुर ने गाया है, हंसराज बहल ने संगीतबद्ध किया है तथा इसके बोल प्रेम धवन ने लिखे हैं।

मैं हूँ झुम झुम झुमरू – झुमरू (१९६१)

दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे पर फिल्माया यह अमर गीत झुमरू चित्रपट का शीर्षक गीत भी है। इस गीत को गायक व नायक किशोर कुमार ने अत्यंत अल्हड़ शैली में गाया है। इस चित्रपट में मुख्य भूमिका में स्वयं किशोर कुमार तथा मधुबाला हैं। रेलगाड़ी से सम्बंधित मस्तीभरे गीत चुने जाएँ तो सूची में ये गीत सर्वोच्च स्थान पर हो सकता है। इस गीत को संगीतबद्ध भी किशोर कुमार ने ही किया है। इसके शब्द मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखे हैं।

मुझे अपना यार बना लो – बॉय फ्रेंड (१९६१)

इस गीत में नायक शम्मी कपूर हिमालय की शिवालिक पर्वत श्रंखला से जाती हुई शिमला-कालका रेलगाड़ी की छत पर कूदते-फांदते दिख रहे हैं। यह उनकी सर्वधिक लोकप्रिय शैली है। श्वेत-श्याम चित्रपट होते हुए भी हिमाच्छादित पर्वत शिखर अत्यंत सुन्दर दिख रहे हैं।

गायक – मोहम्मद रफ़ी, संगीत – शंकर जयकिशन, गीत – हसरत जयपुरी

मैं चली मैं चली – प्रोफेसर (१९६२)

यह गीत भी दार्जीलिंग हिमालयन रेल पर फिल्माया गया है जिसमें शम्मी कपूर व कल्पना आपस में प्रेम व्यक्त कर रहे हैं।

गायक – मोहम्मद रफ़ी व लता मंगेशकर, संगीत – शंकर जयकिशन, गीत – हसरत जयपुरी

रुख से जरा नकाब हटा दो – मेरे हजूर (१९६८)

रेलगाड़ी में बैठी नायिका पर फिल्माया गया एक सुन्दर गीत जिसे मोहम्मद रफ़ी ने अपना मधुर स्वर प्रदान किया है। इस मधुर गीत को संगीतबद्ध किया शंकर जयकिशन ने।

मेरे सपनों की रानी – आराधना (१९६९)

इस गीत में दार्जीलिंग हिमालयन रेल का सुन्दर दृश्य दिखाया गया है। यह ऐसा गीत है जिसे छोटे बड़े सभी ने मस्ती में गया होगा।

इस गीत के इतने लोकप्रिय होने के पीछे किशोर कुमार की मदमस्त आवाज, आनंद बक्शी के बोल, सुप्रसिद्ध संगीतकार आर. डी. बर्मन का मस्ती भरा संगीत व लोकप्रिय नायक राजेश खन्ना, इस सब का मधुर संगम है।

हम दोनों दो प्रेमी – अजनबी (१९७४)

चित्रपट के नायक व नायिका, राजेश खन्ना व जीनत अमान एक मालगाड़ी के डिब्बे पर सवार दिखाए गए हैं। पहले दृश्य में ही रेल क्रमांक १९२२८ भी दिखाई देता है। उस काल में रेलगाड़ी में भाप का इंजिन लगता था। एक मालगाड़ी का इतना सुन्दर रूप किसी ने कभी नहीं देखा होगा। किशोर कुमार व लता मंगेशकर ने आर. डी. बर्मन के संगीत पर आनंद बक्शी के इस गीत को पूर्ण न्याय किया है।

गाड़ी बुला रही है – दोस्त (१९७४)

इस गीत में ट्रेन या रेलगाड़ी को एक रूपक के रूप में प्रयोग किया गया है। इस गीत में केवल दो ही तत्व दर्शाए गए हैं, नायक धर्मेन्द्र एवं रेलगाड़ी। गाड़ी के माध्यम से जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी गयी है। इस गीत में कालका-शिमला पर्वतीय रेल दिखाया गया है। इस स्फूर्तिदायक गीत को किशोर कुमार ने गया है, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने संगीत दिया है तथा गीतकार हैं आनंद बक्शी।

होगा तुमसे प्यारा कौन – जमाने को दिखाना है (१९७७)

एक बार फिर दार्जीलिंग हिमालयन रेल। केवल नायक व नायिका भिन्न हैं। यहाँ ऋषि कपूर पद्मिनी कोल्हापुरे के समक्ष अपना प्रेम व्यक्त कर रहे हैं। रेलगाड़ी का ऊपर से अप्रतिम दृश्य लिया गया है। संगीत की तान से मेल खाती रेलगाड़ी की आवाज एवं भाप इंजिन से निकलते धुंए का सुन्दर ढंग से प्रयोग किया गया है। आर. डी. बर्मन द्वारा संगीतबद्ध इस गीत को शैलेन्द्र सिंग ने अपने स्वर प्रदान किये हैं जो ऋषि कपूर पर अच्छे लगते हैं।

पर दो पल का साथ हमारा – द बर्निंग ट्रेन (१९८०)

पल दो पल का साथ हमारा, पल दो पल का याराना है। ये शब्द रेल यात्रा को सुन्दर शैली में व्यक्त करते हैं। रेलयात्रा का यही सत्य है। रेलगाड़ी के भीतर फिल्माए गए इस गीत को मोहम्मद रफी एवं आशा भोंसले ने गाया है। आर.डी. बर्मन द्वारा संगीतबद्ध इस गीत के बोल साहिर लुधियानवी ने लिखे हैं।

हाथों की चंद लकीरों का – विधाता (१९८२)

यह एक दार्शनिक गीत है जिसमें दो वयस्क नायकों, दिलीप कुमार व शम्मी कपूर को दिखाया गया है। इस गीत के माध्यम से वे नियति एवं कर्म पर आपस में तर्क कर रहे हैं। इस गीत में दोनों रेल के डब्बे के भीतर नहीं, इंजिन के भीतर हैं तथा रेलगाड़ी चला रहे हैं। सुरेश वाडकर एवं अनवर हुसैन द्वारा गाये गए इस गीत को कल्याणजी आनंदजी ने संगीतबद्ध किया तथा इसके बोल लिखे हैं, आनंद बक्शी ने।

सारी दुनिया का बोझ हम उठाते हैं – कुली (१९८३)

इस चित्रपट के नाम से ही यह समझ में आ जाता है कि यह एक कुली की कथा है। यह गीत बंगलुरु सिटी स्टेशन पर फिल्माया गया है जो इस गीत का वास्तविक नायक है।

गायक – शब्बीर कुमार, संगीतकार – लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, गीतकार – आनंद बक्शी

साजन मेरे उस पार – गंगा जमुना सरस्वती  (१९८८)

इस गीत में भारतीय रेल की विभिन्न श्रेणियां दिखाई गयी हैं जिनके माध्यम से उनके मध्य सामाजिक व आर्थिक विभाजन दर्शाया गया है।

गायिका – लता मंगेशकर, संगीतकार – अनु मालिक, गीतकार – इन्दीवर

कब से करे है तेरा इंतजार – कभी हाँ कभी ना (१९९४)

यह मधुर गीत कोंकण रेलवे का उत्सव मनाता है। भारत के सर्वाधिक हरियाली भरे क्षेत्रों से जाते हुए कोंकण क्षेत्र का अप्रतिम परिदृश्य दिखाया गया है। इसमें वास्को द गामा रेल स्टेशन भी दिखाया गया है।

अमित कुमार की मस्ती भरी गायकी को शाहरुख खान ने उतनी ही रोमांचक प्रस्तुति से अलंकृत किया है। जतिन-ललित के उत्कृष्ट संगीत व मजरूह सुल्तानपुरी के बोल, दोनों ने इस गीत को अत्यधिक लोकप्रिय बना दिया है।

और पढ़ें: मानसून में कोंकण रेलवे की यात्रा

छैंया छैंया – दिल से ( १९९८)

शाहरुख खान एवं मलाइका अरोरा ने नीलगिरी धरोहर रेलगाड़ी की छत पर फिल्माए इस रोमांचक गीत से चित्रपट प्रेमियों में धूम मचा दी थी। मेरे लिए इस गीत की विशेषता है, सुखविंदर सिंग एवं सपना अवस्थी के सशक्त स्वर जिसे लोक शैली में संगीतबद्ध किया ए. आर. रहमान ने। गीत लिखा गुलजार ने। ट्रेन पर फिल्माये बॉलीवुड गीतों में सर्वाधिक लोकप्रिय गीत।

कस्तो मज्जा है रेलैमा – परिणीता (२००५)

नायिका विद्या बालन का स्मरण करते नायक सैफ अली खान एक बार फिर दार्जीलिंग हिमालयन रेल में सवार हो गए हैं। यह गीत आपको अतीत काल में ले जाता है तथा रेलों का स्वर्णिम युग आपके समक्ष प्रस्तुत करता है। यह एक सुन्दर गीत है जिसे उतनी ही सुन्दर शैली में चित्रित किया है। इस मधुर गीत को मधुर स्वर प्रदान किये हैं गायक सोनू निगम ने। शांतनु मोइत्रा ने स्वानंद किरकिरे द्वारा लिखित इस गीत को सुन्दर संगीत प्रदान किया है।

मनु भैय्या क्या करेंगे – तनु वेड्स मनु (२०११)

दूसरे दर्जे के रेल डिब्बे में यात्रा कर रहा एक भरा पूरा परिवार इस लोकगीत के द्वारा अचानक उर्जा से भर जाता है तथा आनंद मनाने लगता है। रेलगाड़ी जैसे जैसे आगे बढ़ रही है, परिवार के सदस्य नाचते गाते हैं तथा डिब्बे में ही विवाह उत्सव की विभिन्न विधियां एवं संस्कार करते हैं। मोहित चौहान के संगीत पर सुनिधी चौहान, उज्जैनी मुखर्जी एवं निलाद्री देबनाथ ने इस लोकगीत की सुन्दर प्रस्तुति की है।

फूलिश्क – की एंड का (२०१६)

यह गीत रेवाड़ी धरोहर रेल पर फिल्माया गया है। यह धरोहर रेलगाड़ी दिल्ली व रेवाड़ी के मध्य चलती है। इन दिनों यह चित्रपटों में अधिक दिखाई देती है। इस गीत का कोई औचित्य नहीं है। मेरे लिए यह गीत रेल संग्रहालय का भ्रमण है।

इनमें से आपके प्रिय गीत कौन से हैं? यदि मुझसे रेल पर फिल्माया कोई बॉलीवुड गीत छूट गया हो, जो आपको प्रिय हो, टिप्पणी खंड द्वारा मुझे अवश्य सूचित करें।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post रेलगाड़ी पर फिल्माए लोकप्रिय बॉलीवुड गीतों की यात्रा – एक झलक appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/rail-gadi-par-filmaaye-geet/feed/ 0 3735
भारत के दो से अधिक नदियों के तट एवं संगम वाले अद्भुत नगर https://inditales.com/hindi/do-nadiyon-ke-tat-par-bhartiya-nagar/ https://inditales.com/hindi/do-nadiyon-ke-tat-par-bhartiya-nagar/#comments Wed, 19 Jul 2023 02:30:19 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3117

इंडीटेल यात्रा प्रश्नावली – नदियाँ एवं नगर कुछ समय पूर्व हमने आपसे एक प्रश्न किया था, भारत में ऐसे कौन कौन से नगर हैं जिनमें एक से अधिक नदियाँ हैं। हमें इस प्रश्न के उत्तर में उत्तम प्रतिसाद मिला है। हमने आप सभी के उत्तरों को संकलित किया है तथा इस संस्करण की रचना की […]

The post भारत के दो से अधिक नदियों के तट एवं संगम वाले अद्भुत नगर appeared first on Inditales.

]]>

इंडीटेल यात्रा प्रश्नावली – नदियाँ एवं नगर

कुछ समय पूर्व हमने आपसे एक प्रश्न किया था, भारत में ऐसे कौन कौन से नगर हैं जिनमें एक से अधिक नदियाँ हैं। हमें इस प्रश्न के उत्तर में उत्तम प्रतिसाद मिला है। हमने आप सभी के उत्तरों को संकलित किया है तथा इस संस्करण की रचना की है। यह संस्करण उन भारतीय तटीय नगरों के विषय में है जो एक से अधिक नदियों द्वारा पोषित होते हैं।

अन्य प्रश्नावलियों के लिए हमारा फेसबुक, ट्विटर एवं इन्स्टाग्राम देखें।

भारत के  नगर जन्हें एक से अधिक नदियों का वरदान प्राप्त है:

सदियों पूर्व अपनी बस्ती बसाने के लिए लोग नदी के तट का चयन करते थे क्योंकि जल हमारी मूलभूत आवश्यकता है। प्राचीन काल में जल के प्राकृतिक स्त्रोत ही उपलब्ध होते थे। इसी कारण भारत की लगभग सभी नदियों के तट पर बस्तियां बसी थीं जो अब फलफूल कर बड़े नगर बन गए हैं।

उन्ही के विषय में हमने आप से एक प्रश्न पूछा था कि भारत में ऐसे कौन कौन से नगर हैं जिनमें एक से अधिक नदियाँ हैं। आपके उत्तर के आधार पर हमने यह सूची बनाई है। इन्हें पढ़ने के पश्चात यदि आपको ऐसा लगे कि इसमें कुछ अन्य नगर भी सम्मिलित किये जाने चाहिए तो हमें अवश्य बताएं।

११. वाराणसी – वरुणा, असी एवं गंगा नदियाँ

वाराणसी में गंगा
वाराणसी में गंगा

भारत का ऐतिहासिक नगर, वाराणसी वास्तव में तीन-तटीय नगर है। अर्थात् यह तीन नदियों के तटों को छूता है। यूँ तो लोग वाराणसी को गंगा नदी के तट पर बसे नगर के रूप में ही अधिक जानते हैं। किन्तु हम में से अनेक इस ओर ध्यान नहीं देते कि वाराणसी नाम ही दो अन्य नदियों के नामों के संगम से बना है। वाराणसी के उत्तर की ओर स्थित वरुणा नदी जो आदिकेशव घाट पर गंगा नदी से मिलती है। वहीं दक्षिणी ओर असी नदी है जिसके नाम पर ही प्रसिद्ध असी घाट का नाम पड़ा है।

ये तीन नदियाँ एवं उनके घाट वाराणसी को वह अद्भुत नगर बनाते हैं जो तीन नदियों से घिरा हुआ है।

१०. पटना – गंगा, सोन एवं पुनपुन नदियाँ

पटना में गंगा
पटना में गंगा

मुझे केवल इतना ही ज्ञात था कि पटना नगरी गंगा के तट पर बसी है। प्रश्नावली के उत्तर में कुछ ने सोन नदी भी कहा। इस संस्करण को लिखते समय मैंने कुछ शोध किये तथा यह जानकारी प्राप्त की कि पटना की सीमा से लग कर दो नहीं, अपितु तीन नदियाँ बहती हैं। तीसरी नदी है, पुनपुन। ये तीन नदियाँ पटना को भी तीन नदियों से घिरा नगर बनाते हैं।

सोन नदी एवं पुनपुन नदी पटना आकर गंगा से मिल जाती हैं।

इस तथ्य को सम्मुख लाने के लिए आदिवर्हा का अनेक धन्यवाद।

९. हैदराबाद – मुसी एवं एसी नदियाँ

मैं हैदराबाद में रह चुकी हूँ। हैदराबाद में घूम चुकी हूँ। मुसी नदी को तो मैंने सैकड़ों बार पार किया होगा। किन्तु मुझे यह ज्ञात नहीं था कि मुसी नदी की एक सहायक नदी भी है जिसका नाम एसी नदी है तथा जो हैदराबाद नगरी में ही मुसी नदी से मिलती है।

हैदराबाद में मूसी और ऐसी
हैदराबाद में मूसी और ऐसी

वृजिलेश का मैं धन्यवाद करती हूँ जिसने हमें हैदराबाद के विषय में यह जानकारी दी। उन्होंने यह भी बताया कि एसी नदी हिमायत सागर से आती है तथा मुसी नदी गंडिपेट से। लंगर हाउस के समीप बाबूघाट संगम पर मुसी नदी एवं एसी नदी एक दूसरे से मिलती हैं।

मेरी अगली हैदराबाद यात्रा में मैं इस घाट के दर्शन अवश्य करूँगी।

मुसी के विषय में मुझे एक अन्य तथ्य भी ज्ञात हुआ कि यह नदी अनंतगिरी पहाड़ों से निकलती है तथा इसका प्राचीन नाम मुचिकुंडा था। किवदंतियों के अनुसार मुचुकुंडा इक्ष्वाकु वंश का वंशज था अथवा यह कहा जाए कि सूर्यवंशी भगवान राम के ही वंश का था। ऐसा माना जाता है कि वह अनंतगिरी पहाड़ों में निद्रामग्न है। उसी के नाम पर नदी का नाम मुचिकुंडा पड़ा।

८. पुणे – मुला, मुठा एवं पवना नदियाँ

पुणे में दो नदियाँ हैं, मुला एवं मुठा। जो भी पुणे गया है उसे यह ज्ञात ही होगा। इसीलिए मैंने पुणे को दो नदियों वाले नगरों की सूची में डाला था।

पुणे में मुला-मूठा
पुणे में मुला-मूठा

किन्तु जब मैं इस संस्करण को लिखने के लिए शोध कर रही थी तथा विभिन्न साहित्य पढ़ रही थी तब मुझे ज्ञात हुआ कि पुणे में तीसरी नदी भी है जिसका नाम है, पवना। मुला नदी पवना नदी से उसके बाएं तट पर मिलती है तथा मुठा नदी उसके दाहिने तट पर, जो आगे जाकर मुला-मुठा नदी बन जाती है। तीनों नदियाँ पश्चिमी घाटों से निकलती हैं।

मुला-मुठा नदी सहायक नदियों की उस श्रंखला का एक भाग हैं जो आगे जाकर कृष्णा नदी में समा जाती हैं। तत्पश्चात सभी बंगाल की खाड़ी से जा मिलती हैं।

७. प्रयागराज – गंगा, यमुना एवं सरस्वती नदियाँ

मेरी प्रश्नावली के प्रत्युत्तर में अधिकाँश लोगों ने प्रयाग का नाम सुझाया था। सभी जानते हैं कि प्रयाग में गंगा एवं यमुना का संगम है। कुम्भ मेले ने भी इस तथ्य को अधिकतम लोगों तक पहुँचाने में बड़ी भूमिका निभाई है। यहाँ संगम का भी अपना स्वयं का नाम है, त्रिवेणी संगम। इसका अर्थ है तीन नदियों का संगम।

प्रयाग में गंगा, यमुना, सरस्वती
प्रयाग में गंगा, यमुना, सरस्वती

गंगा एवं यमुना दोनों दृश्य नदियाँ हैं तथा तीसरी नदी, सरस्वती नदी अदृश्य है। सरस्वती नदी के अस्तित्व पर अनेक वैज्ञानिकों ने प्रश्न उठाये हैं किन्तु आस्था रखने वालों के भीतर ये सदा जीवित रहेगी।

६. कटक – महानदी एवं उसकी अनेक वितरिकाएं

कटक की स्थिति अनोखी है। एक ओर जहां अन्य नगरों में नदियों का संगम होता है, कटक ऐसा नगर है जहां महानदी अनेक भागों में विभक्त होकर शाखा नदियाँ या वितरिकाएं बनाती है। उन वितरिकाओं में अधिकतर नदियाँ कटक नगर से होकर जाती हैं। इन वितरिकाओं के नाम हैं, महानदी, काठजोड़ी, कुआखाई तथा बिरुपा। काठजोड़ी आगे जाकर देवी एवं बिलुआखाई नदियों में विभक्त होती है।

कट्टक में महानदी
कट्टक में महानदी

काठजोड़ी का अर्थ है, काठ के फलक से जोड़ा हुआ। हो सकता है कि किसी काल में इस नदी के ऊपर लकड़ी का सेतु रहा होगा या इस नदी को एक लकड़ी के फलक की सहायता से पार किया जाता होगा।

५. देवप्रयाग – भागीरथी, अलकनंदा एवं गंगा नदियाँ

देवप्रयाग के विषय में हम सब ने सुना है किन्तु हम में से अनेक की इस हिमालयी नगर में पहुँचने की अभिलाषा कदाचित अब तक पूर्ण ना हुई हो।

देवप्रयाग में अलकनंदा एवं भागीरथी
देवप्रयाग में अलकनंदा एवं भागीरथी

गंगोत्री में गंगा को भागीरथी कहते हैं। देवप्रयाग में अलकनंदा नदी एवं भागीरथी नदी का संगम होता है जो गंगा नदी बनकर आगे जाती है।

इससे पूर्व ४ अन्य नदियाँ गंगा में समाहित होती हैं, धौलीगंगा, नंदाकिनी, पिंडार एवं मन्दाकिनी। इन्हें मिलाकर कुल पांच नदियों का संगम अलकनंदा में होता है जिसे पंच प्रयाग कहते हैं।

४. चेन्नई – अड्यार एवं कूउम नदियाँ

मुझे केवल अड्यार नदी के विषय में ही जानकारी थी। कूउम नदी के विषय में मुझे इस प्रश्नावली पर संस्करण बनाते समय ही प्राप्त हुई थी। ये दोनों छोटी नदियाँ हैं जिनका उद्गम चेन्नई से लगभग १०० किलोमीटर की दूरी पर है।

चेन्नई में अड़यार नदी
चेन्नई में अड़यार नदी

कूउम नदी को ट्रिप्लिकेन नदी भी कहते हैं। कूउम शब्द का सम्बन्ध कूपं शब्द से है जिसका अर्थ कुआं होता है।

चेन्नई की नदियों के विषय में यहाँ पढ़ें।

चेन्नई की नदियों के विषय में यह जानकारी अनंत रुपनगुडी से प्राप्त हुई है। चित्र – श्रीनिधि हंडे।

३. नासिक – गोदावरी एवं दाराणा नदियाँ

हम सब यह जानते हैं कि कुम्भ मेले का एक आयोजन स्थल नासिक भी है जहां इसे गोदावरी नदी के तट पर आयोजित किया जाता है। पर क्या आप जानते हैं कि वहां दाराणा नाम की भी एक नदी है जो नासिक नगर को छूती हुई जाती है?

नासिक में गोदावरी
नासिक में गोदावरी

विकिपीडिया के अनुसार नासिक में इनके अतिरिक्त भी अनेक नदियाँ हैं जो नासिक से होकर बहती हैं, जैसे वैतरणा, भीमा, गिरणा एवं काश्यपी नदियाँ। किन्तु मैं इनकी पुष्टि नहीं कर पायी हूँ। आशा है आप में से नासिक में रहने वाले किसी पाठक से मुझे इस विषय में अधिक जानकारी मिले।

नासिक की नदियों के विषय में जानकारी देने के लिए सचिन पाटिल का धन्यवाद।

२. पणजी – मांडवी एवं जुआरी नदियाँ

पणजी में मांडवी
पणजी में मांडवी

गोवा की राजधानी पणजी दो नदियों के मध्य बसी हुई है, मांडवी नदी एवं जुआरी नदी। पणजी के दोनों ओर से आते हुए, ये दोनों नदियाँ आगे जाकर अरब महासागर में मिल जाती हैं। मांडवी नदी पर्यटकों की नौकाओं एवं कैसिनो नौकाओं से भरी एक उल्लासपूर्ण नदी है। वहीं जुआरी नदी कोलाहल से दूर, अत्यंत शांत नदी है तथा अपेक्षाकृत अधिक चौड़ी है।

भारत में नदियों के तट पर एवं संगम पर अनेक प्राचीन नगर बसे हैं। इसमें तनिक भी आश्चर्य नहीं है कि इसी कारण हम संगम को अत्यंत पवित्र मानते हैं तथा उसकी आराधना करते हैं। उन्होंने ही सदियों से हमारा पालन-पोषण किया है।

. भारत के अन्य नगर जहां एक से अधिक नदियों के तट हैं

ये सूची भारत के उन छोटे नगरों की है जहां एक से अधिक नदियों के तट हैं।

  • तमिल नाडू में श्रीरंगम – कावेरी एवं कोल्लिदम नदियों के मध्य स्थित है।
  • तमिल नाडू में करुर – कावेरी एवं अमरावती नदियों के तटों पर बसा हुआ है।
  • आन्ध्र प्रदेश में कुरनूल – तुंगभद्र, नीव एवं हुन्द्री नदियों के तट
  • महाराष्ट्र में कराड – कृष्णा एवं कोयना नदियाँ
  • कर्नाटक में मंगलुरु – नेत्रवती एवं गुरुपुरा की अप्रवाही नदियाँ

यदि आप ऐसे भारतीय नगरों के विषय में जानते हैं जो एक से अधिक नदियों के तट पर या संगम पर बसे हैं तथा जिन्हें इन सूची में सम्मिलित नहीं किया गया है तो उनके विषय में टिप्पणी खंड में अवश्य लिखें। मैं संस्करण में उनका भी उल्लेख करना चाहूंगी।

लद्धाख में सिन्धु जांसकर का संगम
लद्धाख में सिन्धु जांसकर का संगम

इस संस्करण की रचना करते समय मेरे लिए सबसे बड़ी सीख यह थी कि गूगल मानचित्र केवल बड़ी नदियाँ दर्शाता है। उसमें छोटी नदियों का उल्लेख बहुधा नहीं मिलता है। अब मुझे A History of World in 12 Maps इस पुस्तक में लिखे जेरी ब्रोट्टन के कथन का अर्थ समझ में आता है।

आप सब ने इस प्रश्नावली में जिस उत्साह से भाग लिया, उसके लिए मैं आप सब का धन्यवाद करना चाहती हूँ। संस्करण के अंत में पुनः इस तथ्य को दुहराना चाहती हूँ कि सभी बड़ी नदियाँ अनेक सहायक नदियों के संगम से ही बनती हैं।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post भारत के दो से अधिक नदियों के तट एवं संगम वाले अद्भुत नगर appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/do-nadiyon-ke-tat-par-bhartiya-nagar/feed/ 1 3117
भारत के राष्ट्रीय चिन्ह – भारत के खोज की यात्रा https://inditales.com/hindi/bharat-ke-rashtriya-chinh/ https://inditales.com/hindi/bharat-ke-rashtriya-chinh/#respond Wed, 25 Jan 2023 02:30:39 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2935

१५ अगस्त, १९४७ को भारत स्वतन्त्र हुआ तथा २६ जनवरी, १९५० को वह एक गणतंत्र राष्ट्र घोषित हुआ। इस काल में भारत को एक नवीन परिचय प्राप्त हुआ। इस नवीन परिचय को एक नवीन चिन्ह की आवश्यकता थी जो भारत का चिन्ह बने,  भारत का प्रतिनिधित्व करे तथा भारत के विभिन्न आयामों को सामूहिक रूप […]

The post भारत के राष्ट्रीय चिन्ह – भारत के खोज की यात्रा appeared first on Inditales.

]]>

१५ अगस्त, १९४७ को भारत स्वतन्त्र हुआ तथा २६ जनवरी, १९५० को वह एक गणतंत्र राष्ट्र घोषित हुआ। इस काल में भारत को एक नवीन परिचय प्राप्त हुआ। इस नवीन परिचय को एक नवीन चिन्ह की आवश्यकता थी जो भारत का चिन्ह बने,  भारत का प्रतिनिधित्व करे तथा भारत के विभिन्न आयामों को सामूहिक रूप से प्रदर्शित करे।

भारत के राष्ट्रीय चिन्ह
भारत के राष्ट्रीय चिन्ह

इस २६ जनवरी, गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में मैं आपको एक विशेष उद्देश्य से भारत भ्रमण पर ले जाना चाहती हूँ। मैं आज आपको भारत के राष्ट्रीय चिन्ह की यात्रा पर ले चलती हूँ।

सम्राट अशोक का सिंहचतुर्भुज स्तम्भशीर्ष – राष्ट्रीय राजचिन्ह के लिए सारनाथ भ्रमण

वाराणसी के निकट, सारनाथ से खोजे गए सम्राट अशोक के स्तम्भ पर स्थित सिंहचतुर्भुज स्तम्भशीर्ष को अब सारनाथ के भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण संग्रहालय में देखा जा सकता है। आप जैसे ही संग्रहालय में प्रवेश करते हैं, चार एशियाई सिंहों की एक विशाल मूर्ति आपका स्वागत करती है। ये चारों सिंह चार दिशाओं में मुख किये हुए हैं। चारों सिंह एक वृत्ताकार मंच पर विराजमान हैं। इसी वृत्त की खड़ी बेलनाकार सतह पर सुन्दर उभरे हुए चार चक्र, एक अश्व, एक सिंह, एक बैल एवं एक हाथी उत्कीर्णित हैं। यह मंच एक उलटे कमल के पुष्प पर स्थित है।

भारत के राष्ट्रीय चिन्ह - अशोक स्तम्भ एवं चक्र
अशोक स्तम्भ एवं चक्र हमारी मुद्राओं पर

मैंने इस प्रकार के सिंहचतुर्भुज स्तम्भशीर्ष बिहार के वैशाली जैसे अनेक स्थानों पर देखे हैं किन्तु सारनाथ का यह स्तम्भशीर्ष आपके समक्ष व समीप होने के कारण आप इसके विशाल आकार का अनुभव ले सकते हैं। लोग कहते हैं कि इस सिंहचतुर्भुज स्तम्भशीर्ष के ऊपर २४ तीलियों का एक विशाल चक्र भी था। आपको स्मरण होगा कि सारनाथ वह स्थान है जिसका सम्बन्ध धर्म चक्र प्रवर्तन से है। यहीं पर भगवान बुद्ध ने अपने प्रथम पांच अनुयायियों को अपना प्रथम उपदेश दिया था।

स्तम्भ के निचले भाग में भारतीय परंपरा का आदर्श वाक्य ‘सत्यमेव जयते’ लिखा है जिसका अर्थ है सत्य की ही सदा विजय। यह सुभाषित मुण्डक उपनिषद से लिया गया है। सिंहचतुर्भुज स्तम्भशीर्ष एवं वाक्य ‘सत्यमेव जयते’ साथ मिलकर राजचिन्ह सम्पूर्ण करते हैं। चूँकि यह राजचिन्ह एक-आयामी आकृति है, इस प्रतीक में केवल तीन सिंह दृश्यमान हैं। चार चक्रों में से केवल तीन तथा चार पशुओं में से भी केवल दो ही दृश्यमान हैं। मध्य-चक्र के दायीं ओर बैल एवं बायीं ओर अश्व है। इस राजचिन्ह का प्रयोग सभी सरकारी संस्थाओं द्वारा किया जाता है। यह राजचिन्ह आप सभी सरकारी पत्रों पर एवं सरकारी अधिकारियों के परिचय पत्रों पर छपे देख सकते हैं।

यह राजचिन्ह सभी वाणिज्य मुद्राओं – सिक्के व कागज के नोटों पर भी गर्व से विद्यमान हैं।

राष्ट्रीय पुष्प कमल – नगरों, गाँवों, कस्बों के जलाशयों का भ्रमण

भारत के कोने कोने में कमल का पुष्प पाया जाता है। सम्पूर्ण भारत भ्रमण के पश्चात यदि कोई आप से जानना चाहे कि आपके मत से राष्ट्रीय पुष्प कौन सा होना चाहिए, आप भी सहज सहमत होंगे कि कमल का पुष्प निश्चित ही भारत राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करने में समर्थ है।

कमल - भारत के राष्ट्रीय पुष्प
कमल – भारत के राष्ट्रीय पुष्प

कमल पुष्प को देखने के लिए मेरे प्रिय स्थान हैं, सम्पूर्ण भारत में पसरे छोटे छोटे जलाशय। हम जब आसाम गए थे तब मैंने सिबसागर के जलाशय में नीले कमल देखे थे। वहीं गोवा के ग्रामीण भागों में हमें कमल के बड़े एवं छोटे दोनों आकार के पुष्प दिखाई देते हैं। जब कमल के पुष्प एवं पर्ण पर जल की बूँदें गिरती हैं, वे यहाँ से वहां लुड़कती रहती हैं किन्तु पंखुड़ियों एवं पर्ण को भिगोती नहीं हैं। ना ही उन पर किसी भी प्रकार का प्रभाव डालती हैं। आप समझ सकते हैं कि क्यों हम कमल को इतना पवित्र पुष्प मानते हैं।

कमल का पुष्प सम्पूर्ण भारत की सभी प्राचीन कलाशैलियों में एक आवश्यक अंग होता है। इन्हें हिन्दू एवं बौद्ध दोनों प्रकार के मूर्ति शास्त्र में देखा जा सकता है। यह पवित्रता एवं शुभता का प्रतीत है।

भारत की ग्रामीण पर्यटन कंपनियों की सूची यहाँ देखें।

रॉयल बंगाल टाइगर या बाघ – राष्ट्रीय पशु के दर्शन हेतु विभिन्न अभयारण्यों का भ्रमण

बाघ की आठ प्रजातियों में से भारत में पायी जाने वाली बाघ की प्रजाति को रॉयल बंगाल टाइगर कहते हैं। इस प्रजाति के बाघ केवल भारतीय उपमहाद्वीप में ही पाए जाते हैं। बाघ को १९७३ में भारत का राष्ट्रीय पशु घोषित किया गया था। शालीनता, दृढ़ता, चपलता एवं अपार शक्ति के कारण उसे राष्ट्रीय पशु के रूप में चुना गया था। एक काल था जब ये भारत के अधिकाँश क्षेत्रों में पाए जाते थे। यदि विश्वास ना हो तो आप किसी भी क्षेत्र के ग्राम देवता मंदिर में देखें। वहां आपको किसी ना किसी रूप में बाघ की छवि अवश्य दिखाई देगी।

पेंच राष्ट्रीय उद्यान में बाघिन
पेंच राष्ट्रीय उद्यान में बाघिन

दुर्भाग्य से, अमर्यादित शिकार व उनके नैसर्गिक निवास पर मानव अतिक्रमण के चलते आज बाघों की संख्या इतनी कम हो गयी है कि उन्हें देखने के लिए आपको विशेष रूप से यात्रा करनी पड़ती है। सौभाग्य से पर्यावरण एवं पशु प्रेमियों के कड़े परिश्रम के पश्चात अब उनकी संख्या में वृद्धि होने लगी है।

मुझे कान्हा राष्ट्रीय उद्यान के मुन्ना बाघ एवं पेंच राष्ट्रीय उद्यान की कॉलरवाली बाघिन को समीप से देखने का सौभाग्य मिला था।

बाघों के दर्शन के अन्य स्थल हैं, बंगाल का सुंदरबन, राजस्थान का रणथम्बोर, मध्यप्रदेश का बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान आदि। यूँ तो सम्पूर्ण भारत में अनेक बाघ संरक्षण अभयारण्य हैं, किन्तु उनमें से अनेक अभयारण्यों में बाघों की संख्या पर्याप्त नहीं है जिसके कारण उन्हें देख पाने की संभावना कम हो जाती है।

मीठे जल की सूंस (डॉलफिन) – राष्ट्रीय जलीय प्राणी के दर्शन के लिए चम्बल जाएँ

नदी की डॉलफिन अथवा सूंस मीठे जल में पायी जाने वाली सूंस है जो गंगा नदी में बड़ी संख्या में पायी जाती थी। गंगा नदी में पायी जाने वाली डॉलफिन की इस प्रजाति को २००९ में भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया गया था। ब्रह्मपुत्र एवं सिन्धु नदियों में भी मीठे जल की सूंस बड़ी संख्या में पाई जाती थी।

सूंस
सूंस पर निकला डाक टिकट

वर्तमान में मीठे जल की डॉलफिन को उनके प्राकृतिक परिवेश में देखना हो तो सर्वोत्तम नदी है, चम्बल नदी। इस नदी में अब भी नदी पारिस्थितिकी तंत्र शेष है। अन्यथा गंगा एवं अन्य नदियों में प्रदूषण, बाँध एवं शिकार के कारण उनकी संख्या निरंतर घट रही थी। चम्बल नदी में भी घटता जल स्तर उनके अस्तित्व के लिए संकट बनता जा रहा है।

क्या आप जानते हैं कि बिहार के भागलपुर में एक विक्रमशिला गंगा डॉलफिन अभयारण्य है?

बरगद का वृक्ष (वटवृक्ष) – राष्ट्रीय वृक्ष के दर्शन के लिए बोध गया जाएँ

बरगद का वृक्ष भारत का राष्ट्रीय वृक्ष है जो एक शुद्ध देशी भारतीय वृक्ष है। लगभग सभी प्राचीन भारतीय साहित्यों व ग्रंथों में इस वृक्ष का उल्लेख किया गया है। यह भारत के इतिहास एवं लोककथाओं का अभिन्न अंग होता है। इसकी जटाओं से नवीन तना एवं शाखाएं बन सकती हैं। इसकी इस विशेषता एवं लंबे जीवन के कारण इसे अनश्वर माना जाता है।

बेंगलुरु के पास स्तिथ विशाल बरगद का पेड़
बेंगलुरु के पास स्तिथ विशाल बरगद का पेड़

नाशिक के निकट पंचवटी को पंचवटी बनाने वाले पांच वटवृक्षों को जब मैंने देखा, मेरे आनंद की सीमा नहीं थी। बोधगया में एक वटवृक्ष के नीचे ही गौतम बुद्ध को निर्वाण प्राप्ति हुई थी। आप बोधगया में महाबोधि मंदिर जाएँ तो आप वहां इसी वटवृक्ष का वंशज देख सकते हैं। बौद्ध धर्म के अनुयायी वृक्ष से झड़कर नीचे गिरे पत्तों को घर ले जाते हैं तथा उनकी पूजा करते हैं।

क्या आपको विक्रम व वेताल की कथा स्मरण है? उस कथा के मूल में भी तो एक वटवृक्ष है।

चक्रीय प्रकृति एवं स्वयं को चिरस्थाई बनाए रखने के गुणों के कारण बरगद के वृक्ष को पवित्र माना जाता है। कैसे भारत के कुछ प्रतीक चिन्ह भारत माता की धरती के दर्शन का प्रदर्शन करते हैं, यह अत्यंत रोचक है।

भारत में अनेक ऐसे स्थान हैं जो विशालतम वटवृक्ष होने का दावा करते हैं। किन्तु यह जानना कठिन हो जाता है कि मूल वृक्ष कौन सा है। वटवृक्ष की शाखाओं से लटकती जटाएं नवीन वृक्षों को जन्म देने का सामर्थ्य रखती हैं। एक वृक्ष की लटकती जटाओं द्वारा दूसरे स्थान पर नवीन वृक्ष को पुनर्जीवित करने का चक्र इस प्रकार अनवरत जारी है कि यह कहना कठिन हो जाता है कि कौन सा वृक्ष मूल वृक्ष है। बालक वृक्ष भी पालक वृक्षों जैसे विशाल बन गए हैं। मैंने जो अब तक का विशालतम वटवृक्ष देखा है वह बंगलुरु के निकर, मैसूरू मार्ग पर है। वटवृक्ष के पास भ्रमण करना एक अनूठा अनुभव होता है मानो वह एक महल हो। इसकी शाखाएं एवं जटाएं किसी भूलभुलैया से कम नहीं होती हैं।

भारतीय मोर – राष्ट्रीय पक्षी के दर्शन के लिए राजस्थान जाएँ

भारत का राष्ट्रीय पक्षी मोर है। मोर एक अत्यंत रंगबिरंगा व मनमोहक पक्षी होता है। जब मोर आनंदित हो कर नृत्य करने लगता है तो उसकी छटा आकाश छूने लगती है। वह एक अत्यंत आकर्षक दृश्य होता है। वह दृश्य सभी का मन मोह लेता है। वास्तव में वह यह नृत्य अपनी मोरनी को आकर्षित करने के लिए करता है।

मोर
मोर – भारत का राष्ट्रीय पक्षी

मोर को राष्ट्रीय पक्षी का सम्मान १९६३ में प्राप्त हुआ था। यह सम्मान उसे उसके आकर्षक रूप तथा उसके ऐतिहासिक व धार्मिक मूल्यों के कारण प्राप्त हुआ था। इसका एक कारण यह भी है कि यह सम्पूर्ण प्रायद्वीप में पाया जाता है तथा अपने अनूठे रूप के कारण इसे पहचानना भी अत्यंत आसान है।

यूँ तो मोर भारत में सभी स्थानों पर पाए जाते हैं किन्तु मैंने अधिकतर मोर राजस्थान में देखे हैं। मैंने उन्हें पेंच में भी देखा था जहां वह अपने पंखों के सभी रंग प्रदर्शित करते हुए गर्व से एक वृक्ष की शाखा पर विराजमान था।

गंगा – राष्ट्रीय नदी के दर्शन के लिए वाराणसी जाएँ

गंगा के विषय में कौन नहीं जनता?

उत्तराखंड के हिमालयों में स्थित गंगोत्री हिमनद से इसका उद्गम होता है। तत्पश्चात वह उत्तर प्रदेश, बिहार एवं बंगाल से बहते हुए अंततः बंगाल की खाड़ी तक जाती है जहां वह हिन्द महासागर में समा जाती है। २५०० किलोमीटर से भी अधिक लंबी गंगा से आप कहीं भी भेंट कर सकते हैं।

भारत की राष्ट्रीय नदी - गंगा
गंगा – हमारी संस्कृति का प्रतीक चिन्ह

गंगा से भेंट करने एवं उसकी आराधना करने के लिए मेरा सर्वप्रिय स्थान है, वाराणसी। पूर्व में यहाँ की स्वच्छता पर प्रश्न चिन्ह लगते थे। किन्तु स्वच्छता के प्रति राष्ट्रीय जनजागृति के पश्चात अब एक सर्वेक्षण के अनुसार गंगा तट पर बसे नगरों में वाराणसी को सर्वाधिक स्वच्छ गंगा नगरी की श्रेणी में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। वाराणसी के गंगा घाटों को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। उन भावनाओं का अनुभव आप स्वयं लीजिये।

मुझे ऋषिकेश में भी गंगा दर्शन अत्यंत भाता है। विशेषतः नवनिर्मित आस्था पथ, जो नदी के किनारे शान्ति से चलने में अत्यंत सहायक है। प्रयागराज में भी गंगा दर्शन की अनुभूति अप्रतिम है। यहाँ तीन नदियों का संगम जो है।

गंगा भारत के सर्वाधिक प्रतिष्ठित प्रतीक चिन्हों में से एक है। २००९ में इसे राष्ट्रीय नदी घोषित किया गया था।

तिरंगा – भारत के राष्ट्रीय ध्वज के लिए दिल्ली

तिरंगा झंडा
तिरंगा झंडा

भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को आप किसी भी सरकारी इमारत के ऊपर देख सकते हैं। भारत के स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस के उत्सवों पर तो तिरंगा देशव्यापी हो जाता है। देश में सभी भारतीय इसे गर्व से फहराते हैं। १५ अगस्त के दिन हमारा तिरंगा ऐतिहासिक लालकिले का सम्मान बढाता है। आप अपनी दिल्ली की यात्रा में भारतीय संसद भवन के ऊपर इसे अवश्य देखिये।

और पढ़ें: भारतीय संसद भवन के दर्शन कैसे करें?

आम – भारत के राष्ट्रीय फल के लिए अपने पास के फल उद्यान अवश्य जाएँ

मुझे नहीं लगता कि कोई भी भारतीय ऐसा होगा जो यह नहीं मानता होगा कि आम फलों का राजा है। भारत का राष्ट्रीय फल आम देश की समृद्धि को व्यक्त करता है। पहाड़ी क्षेत्रों को छोड़कर सम्पूर्ण भारत में आम की खेती की जाती है। पौराणिक कथाओं एवं इतिहास में भी आमों की अनेक कथाएं प्रचलित हैं। १९५० में आम को भारत के राष्ट्रीय फल के रूप में अपनाया गया था।

आम - भारत का राष्ट्रोय फल
फलों का रजा आम

आम के अनेक प्रकार होते हैं। आपको कौन सा आम प्रिय है, बहुधा यह इस तथ्य पर निर्भर करता है कि आप किस आम को खाते हुए बड़े हुए हैं। मुझे खट्टा-मीठा बनारसी लंगडा या चौसा आम सर्वाधिक प्रिय है। भारत के पश्चिमी भागों में लोग अल्फांसो अथवा हापूस को सर्वोत्तम आम मानते हैं। किन्तु मैं उसके स्वाद से आदी नहीं हो पायी। हैदराबाद में बैगनपल्ली प्रसिद्ध है जिसका एक बड़ा टुकडा लगभग भोजन के समान हो जाता है।

हम चाहे जिस भी प्रकार का आम खाना चाहते हों, हम सब को एक आनंद अवश्य उठाना चाहिए। जीवन में कम से कम एक बार हमें आम के वृक्ष से सीधे आम तोड़कर खाना चाहिए।

आशा है भारत के प्रतीक चिन्हों की इस यात्रा का आप भरपूर आनंद उठाएंगे।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post भारत के राष्ट्रीय चिन्ह – भारत के खोज की यात्रा appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/bharat-ke-rashtriya-chinh/feed/ 0 2935
११ विशेष मंदिर प्रसाद जो खाए बिना आप नहीं रह सकते https://inditales.com/hindi/vishesh-mandir-prasad/ https://inditales.com/hindi/vishesh-mandir-prasad/#respond Wed, 04 Jan 2023 02:30:09 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2899

सम्पूर्ण भारत के सभी मंदिरों में मिलने वाला प्रसाद एक दिव्य खाद्य है। सर्वप्रथम हम उस खाद्य पदार्थ को भगवान को अर्पित करते हैं। भगवान उस खाने को आशीष देते हैं, अभिमंत्रित करते हैं। जब हम किसी खाद्य पदार्थ को भगवान को समर्पित करते हैं, उसे नैवेद्यम कहते हैं। भगवान द्वारा अभिमंत्रित होने के पश्चात […]

The post ११ विशेष मंदिर प्रसाद जो खाए बिना आप नहीं रह सकते appeared first on Inditales.

]]>

सम्पूर्ण भारत के सभी मंदिरों में मिलने वाला प्रसाद एक दिव्य खाद्य है। सर्वप्रथम हम उस खाद्य पदार्थ को भगवान को अर्पित करते हैं। भगवान उस खाने को आशीष देते हैं, अभिमंत्रित करते हैं। जब हम किसी खाद्य पदार्थ को भगवान को समर्पित करते हैं, उसे नैवेद्यम कहते हैं। भगवान द्वारा अभिमंत्रित होने के पश्चात वह दिव्य प्रसाद बन जाता है।

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित मंदिरों में भिन्न भिन्न नैवेद्य चढ़ाया जाता है जो प्रसाद के रूप में हमें प्राप्त होता है। भगवान को अर्पित किया गया खाद्य पदार्थ भगवान की रूचि के अनुरूप होता है। साथ ही उस पर उस क्षेत्र की संस्कृति एवं परंपराओं का भी प्रभाव होता है जिस क्षेत्र में वह मंदिर स्थित है। तो हम ऐसा कह सकते हैं कि भगवान को स्थानीय खाद्य पदार्थ अत्यंत प्रिय होते हैं।

भारत के मंदिरों के प्रसाद

भारत के विभिन्न मंदिरों में प्राप्त प्रसादों की दिव्यता का अनुभव लेने के लिए मेरे साथ आईये।

जगन्नाथ पुरी का महाप्रसाद

पुरी भगवान जगन्नाथ का अन्न क्षेत्र है। पुरी ऐसा स्थान है जहाँ भगवान स्वयं अन्न ग्रहण करने के लिए आते हैं। इसलिए इसमें आश्चर्य कदापि नहीं है कि जगन्नाथ पुरी का रसोईघर विश्व का सर्वाधिक विशाल रसोईघर है। यहाँ भोजन भी पारंपरिक रीति से पकाया जाता है। भोजन प्रतिदिन मिट्टी के शुभ्र पात्रों में बनाया जाता है तथा भोजन बनाने के लिए मंदिर परिसर में ही स्थित दो जलकूपों के जल का प्रयोग किया जाता है।

जगन्नाथ पुरी का प्रसिद्द खाजा
जगन्नाथ पुरी का प्रसिद्द खाजा

यहाँ बनाया जाने वाला भोजन एक सम्पूर्ण आहार होता है जिसे मंदिर के ब्राह्मण या सेवायत बनाते हैं। भक्तों की ऐसी मान्यता है कि भोजन बनाने के कार्य का निरीक्षण स्वयं महालक्ष्मी करती हैं जो जगन्नाथ की अर्धांगिनी हैं। भोजन सर्वप्रथम भगवान को अर्पित किया जाता है जिससे वह प्रसाद में रूपांतरित होता है। तत्पश्चात महालक्ष्मी को उसका अर्पण किया जाता है जिसके पश्चात वह महाप्रसाद बन जाता है।

यदि आपको प्रसाद बनाने की प्रक्रिया को देखने में रूचि हो तो आप प्रातः रसोईघर में जाकर देख सकते हैं। दोपहर में आप आनंद बाजार जाकर वहाँ से प्रसाद ले सकते हैं। इस प्रसाद में दाल, भात, भाजियां तथा अनेक प्रकार के मिष्ठान होते हैं। मुझे बताया गया कि पुरी एवं आसपास के क्षेत्रों के लोग अपने घर के कई उत्सवों के लिए मंदिर का प्रसाद भोजन स्वरूप ले जाते हैं।

यदि आप पुरी के आसपास नहीं रहते तो आप खाजा जैसे सूखे प्रसाद भी ले जा सकते हैं जिन्हें ताड़ के पत्तों से बनी सुन्दर मंजूषाओं में भर कर रखे जाते हैं।

तिरुपति बालाजी मंदिर का प्रसाद – लड्डू

जिसने एक बार भी तिरुपति बालाजी मंदिर के स्वादिष्ट व सुगन्धित लड्डुओं के प्रसाद का आस्वाद लिया है, वे यह अवश्य कहेंगे कि यहाँ के बूंदी के लड्डुओं का कोई सानी नहीं। ये विशेष प्रकार के लाडू हैं जिन्हें अपने स्वाद के लिए अपने क्षेत्र का भौगोलिक संकेत भी प्राप्त है। बालाजी के भक्तों में यह अत्यंत लोकप्रिय एवं अभीष्ट माना जाता है। इन लड्डुओं को बनाने के लिए उसी सामग्री का प्रयोग किया जाता है जो अन्य बूंदी लड्डुओं में होता है। बेसन, घी, शक्कर, इलायची एवं सूखे मेवे। किन्तु इनका स्वाद एवं गंध अन्य लड्डुओं की तुलना में उत्कृष्ट होता है। कदाचित इसका कारण है, इसमें समाई हुई बालाजी की भक्ति। क्यों ना हो? इन्हें तिरुमाला पर्वतों के स्वामी, वेंकटेश्वर भगवान को अर्पण करने के लिए विशेष रूप से बनाया जाता है।

तिरुपति का प्रसिद्द लड्डू
तिरुपति का प्रसिद्द लड्डू

मंदिर परिसर में ही बनाए गए इन लड्डुओं की संख्या लाखों में होती है। प्रत्येक लड्डू का भार लगभग २०० ग्राम होता है। मंदिर में भगवान के दर्शनोपरांत भक्तगण यह प्रसाद पाते हैं। इसका स्वाद अतुलनीय व दिव्य होता है। भक्तगण ना केवल स्वयं प्रसाद ग्रहण करते हैं, अपितु अपने सगे-संबंधियों के लिए भी ले जाते हैं।

कृष्ण मंदिर का माखन मिश्री

भगवान कृष्ण को माखन अत्यंत प्रिय है, यह आप सब जानते हैं। आपने कृष्ण भगवान के बालपन की अनेक लीलाएं सुनी होंगी। हमारे शास्त्रों में अनेक कथाएं एवं गीत हैं जिनमें उनके माखन प्रेम का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। जैसे गोपियाँ यशोदा माँ को उलाहना देती हैं कि उनके लाडले कृष्ण ने किस प्रकार उनके घर आकर उनका माखन खा लिया, कृष्ण अपनी माता को मनाते हैं कि, “मैं नहीं माखन खायो” आदि। तो स्वाभाविक ही है कि कृष्ण मंदिर में मिश्री के साथ माखन अर्पित किया जाता है जो भक्तों को प्रसाद के रूप में मिलता है।

ब्रज का मिश्री प्रसाद
ब्रज का मिश्री प्रसाद

यह प्रसाद बहुधा प्रातःकाल भगवान कृष्ण को अर्पित किया जाता है क्योंकि उन्हें प्रातःकाल में माखन खाना भाता है। यद्यपि अनेक कृष्ण मदिरों में माखन मिश्री का भोग चढ़ाया जाता है, तथापि मैं दो मंदिरों का विशेष उल्लेख करना चाहूंगी जहाँ मैंने भाव-विभोर होकर यह प्रसाद ग्रहण किया था। पहला है, वृन्दावन का लोकप्रिय बाँके बिहारी मंदिर। वृन्दावन की पावन भूमि में भगवान कृष्ण ने अपने किशोरावस्था काल व्यतीत किया था। दूसरा मंदिर है, द्वारका का द्वारकाधीश मंदिर। भगवान कृष्ण ने भारत के पश्चिमी तट पर स्वयं द्वारका की स्वर्णिम नगरी बसाई थी।

मुझे स्मरण है, मुझे ताजे माखन के साथ मिश्री का स्वाद इतना भा गया था कि मैंने उनसे पुनः पुनः प्रसाद देने का आग्रह किया था। मैं आज भी उन दयालु माताजी का स्मरण करती हूँ जो उस दिन भक्तों में प्रसाद बाँट रहीं थी।

वैष्णव देवी मंदिर का प्रसिद्ध प्रसाद – सूखे सेब

वैष्णव देवी जम्मू के निकट स्थित त्रिकूट पर्वत पर विराजमान हैं। वैष्णव देवी मंदिर को उत्तर भारत का अत्यंत लोकप्रिय मंदिर माना जाता है जहाँ सर्वाधिक संख्या में भक्तगण जाते हैं। इस मंदिर के विषय में ऐसी मान्यता है कि जब तक स्वयं देवी का बुलावा ना आये, आप उनके दर्शन नहीं कर सकते। मैंने उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में अपने जीवन के महत्वपूर्ण काल व्यतीत किये हैं किन्तु मुझे उनके दर्शन का सौभाग्य अब तक प्राप्त नहीं हुआ है। मुझे उनके बुलावे की प्रतीक्षा है। किन्तु मुझे उनके मंदिर के प्रसाद ग्रहण करने का सौभाग्य अवश्य प्राप्त हुआ है।

वैष्णो देवी के सूखे सेब
वैष्णो देवी के सूखे सेब

उनको अर्पित किये गए नैवेद्य में मुरमुरा, इलायचीदाना या मीठी चिरौंजी, कुछ सूखे मेवे और धूप में सुखाये गए सेब के टुकड़े होते हैं। कदाचित माँ वैष्णव देवी का मंदिर ही एक ऐसा मंदिर है जहाँ सूखे सेब के टुकड़ों का प्रसाद होता है। ये लम्बे समय तक टिकते हैं। इसलिए आप इन्हें अपने सगे-संबंधियों के लिए आसानी से ले जा सकते हैं। मंदिर के आसपास सेबों की खेती की जाती है। यह प्रसाद उस समृद्धि का प्रतीक है। मेरे लिए, इस प्रसाद से मेरे बालपन की अनेक स्मृतियाँ जुड़ी हुई हैं।

काशी के संकट मोचन मंदिर का प्रसाद – लाल पेडा

काशी के प्रसिद्ध संकट मोचन मंदिर का निर्माण गोस्वामी तुलसीदास जी ने किया था। गोस्वामी तुलसीदासजी हिंदी साहित्य के महान संत कवि थे जिन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना की है। उनमें रामचरितमानस एवं हनुमान चालीसा भी सम्मिलित हैं। हनुमान चालीसा पवन पुत्र हनुमान की स्तुति में गाया जाने वाला सर्वाधिक लोकप्रिय स्तोत्र है। ऐसी मान्यता है कि गोस्वामी तुलसीदास जी ने यहाँ साक्षात् हनुमान जी के दर्शन किये थे। कालांतर में उन्होंने यहाँ हनुमान मंदिर का निर्माण किया। इस मंदिर में वानरों का वर्चस्व स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।

काशी के संकट मोचन मंदिर के लाल पेडे
काशी के संकट मोचन मंदिर के लाल पेडे

इस मंदिर में दो प्रकार के प्रसाद अत्यंत लोकप्रिय हैं, एक है बेसन के लड्डू और दूसरा है, लाल पेडा। मंदिर की ओर जाते मार्ग के दोनों ओर दुकानों की पंक्तियाँ हैं जहाँ से आप इन्हें क्रय कर सकते हैं। व्यक्तिगत रूप से मेरा सर्वाधिक प्रिय प्रसाद लाल पेडा है। इसमें भुने हुए खोए की सोंधी सोंधी सुगंध होती है। यही इसकी विशेषता भी है। वैसे भी पेडे मुझे अत्यंत प्रिय हैं। लाल पेडे के अतिरिक्त मुझे ब्रज के मथुरा पेडे तथा कर्णाटक के धारवाड़ पेडे भी अत्यंत प्रिय हैं।

गुरुद्वारों का कड़ा प्रसाद

मैं चंडीगढ़ एवं उसके आसपास के क्षेत्रों में पली-बड़ी हूँ। गुरुद्वारा जाना हमारी नियमित दिनचर्या का एक भाग था। बालपन में हमारे गुरुद्वारे जाने का एक अन्य कारण भी था, वहाँ का कड़ा प्रसाद। हम उस प्रसाद की प्रतीक्षा किया करते थे। शुद्ध देशी घी में भून भून कर बना आटे का हलवा खाना हमारे लिए किसी स्वर्ग के आनंद से कम नहीं होता था। हम पहले एक हाथ बढ़ाकर प्रसाद ग्रहण करते थे। उसी समय दूसरा हाथ भी आगे बढ़ा देते थे ताकि कुछ अधिक हलवा पा सकें।

गुरुद्वारों का स्वादिष्ट कढा प्रसाद
गुरुद्वारों का स्वादिष्ट कढा प्रसाद

यद्यपि अमृतसर के हरमंदिर साहिब के लंगर में मिलने वाला प्रसाद सर्वाधिक लोकप्रिय है तथापि अधिकतर गुरुद्वारों में मिलने वाला कड़ा प्रसाद आपको वही तृप्ति प्रदान करता है। देखा जाए तो आटे का हलवा बनाने में सिमित सामग्री का प्रयोग किया जाता है तथा बनाने की विधि भी आसान ही है। किन्तु हम घर पर जितने भी परिश्रम से आटे का हलवा बनाना चाहें, उसका स्वाद वैसा नहीं हो पाता जैसा कि गुरुद्वारों में मिलता है। कदाचित उसमें दिव्याषीश का स्वाद होता है।

हनुमान मंदिरों में मंगलवार का प्रसाद – मीठी बूंदी

उत्तर भारत में मंगलवार के दिन हनुमान मंदिर के दर्शन की प्रथा अनेक परिवारों में प्रचलित है। हमारे बालपन में हम भी जाते थे। हनुमान मंदिर के बाहर नारंगी चमचमाती मीठी बूंदी के ढेरों का दर्शन मंगलवार के दिन एक सामान्य दृश्य होता है, विशेषतः संध्या के समय। यह एक साप्ताहिक आयोजन होता है। सप्ताह के अन्य छः दिवसों में आपको यही ढेर ढूंढे नहीं मिलेंगे। इनका स्वाद कुछ कुछ जलेबियों के समान होता है। दिखने में ये चाशनी से भरी छोटी छोटी बूंदों के आकार की गोलियां होती हैं जो जिव्हा में घुल जाती हैं। इनके कुछ प्रकार नर्म मुलायम होते हैं तो कुछ प्रकार कुरकुरे होते हैं। कई लोगों को नर्म बूंदी प्रिय होती है। मुझे कुरकुरी बूंदी अत्यंत भाती है।

हनुमान मंदिरों की रसीली बूंदी
हनुमान मंदिरों की रसीली बूंदी

बालपन में हम जब हनुमान मंदिर जाते थे तब बाहर स्थित दुकान से बूंदी का पुड़ा क्रय करते थे। मंदिर में वह पूड़ा पुजारीजी को देते थे। पुजारीजी उसमें से कुछ बूंदी निकालकर प्रसाद पात्र में रख लेते थे तथा शेष पूड़ा हमें वापिस कर देते थे। तत्पश्चात वे प्रसाद पात्र से हमें बूंदी का प्रसाद देते थे। हम अपने दोनों हाथों से अधिक से अधिक प्रसाद पाने की चेष्टा करते थे।

अब दक्षिण भारत में स्थायी होने के पश्चात मुझे इस सुख की कमी खटकती है। आज भी यदि मैं मंगलवार के दिन उत्तर भारत के किसी क्षेत्र में रहूँ तो मैं हनुमान मंदिर जाने का प्रयास अवश्य करती हूँ। उस समय मेरे भीतर का बालपन पुनः जागृत हो जाता है। मैं पुनः वही बूंदी के प्रसाद की आतुरता से प्रतीक्षा करने लगती हूँ।

गणपतिपुले में मोदक का प्रसाद

गणपति पूजन का एक अभिन्न अंग हैं मोदक। गणपति उत्सव के अवसर पर मैंने अपने अनेक मराठी मित्रों के घरों में मोदक का प्रसाद खाया है। महाराष्ट्र के कोंकण तट पर स्थित गणपतिपुले के गणपति मंदिर में भी मैंने मोदक का प्रसाद देखा था। मंदिर अत्यंत लोकप्रिय होने के पश्चात भी भीतर भक्तों की अत्यधिक भीड़ नहीं होती है।

गणपति का मोदक
गणपति का मोदक

अतः आपको यहाँ का मोदक प्रसाद अवश्य प्राप्त होगा। मंदिर के आसपास स्थित घरेलु भोजनालयों में भी मोदक परोसा जाता है। गुड़ एवं नारियल के रसीले भरावन से भरे चावल के आटे के भपाये हुए ये मोदक अत्यंत स्वादिष्ट होते हैं।

कांचीपुरम के वरदराज पेरूमल मंदिर में कांचीपुरम इडली

कांचीपुरम एक दिव्य नगरी है जिसके केंद्र में कांची कामाक्षी मंदिर है। इस नगरी ने अपनी गोद में शिव कांची एवं विष्णु कांची को सहेज कर रखा हुआ है। यह नगरी कांचीपुरम रेशमी साड़ियों की दुकानों एवं मंदिरों से भरा हुआ है। इसकी एक अन्य विशेषता बहु-अनाज इडलियाँ भी हैं।

कांचीपुरम इडली
कांचीपुरम इडली

यद्यपि ये इडलियाँ यहाँ के लगभग सभी जलपान गृहों में उपलब्ध हैं तथापि ये इडलियाँ प्रसाद के रूप में विष्णु कांची के हृदय स्थल में स्थित वरदराज पेरूमल मंदिर में भी दी जाती हैं। मैंने इस मंदिर में लगभग एक दिवस व्यतीत किया था किन्तु मैं इसका आस्वाद नहीं ले पायी। किन्तु मैंने विभिन्न जलपान गृहों में इन्हें अवश्य चखा है।

नाथद्वारा के श्रीनाथजी मंदिर में ठोर का प्रसाद

भारत के अधिकतर विष्णु मंदिरों में विस्तृत रसोईघर होते हैं जहाँ भगवान के लिए विभिन्न व्यंजन बनाए जाते हैं। नाथद्वारा के ठाकुर हवेली के विशाल पाकशाला में नन्हे श्रीनाथजी के लिए सम्पूर्ण दिवस विभिन्न आहार बनाए जाते हैं। उनमें स्थानीय भाजियों एवं फलों का प्रयोग किया जाता है। जैसे हम अपने घरों में मौसम के अनुसार आहार में परिवर्तन करते हैं, इस मंदिर में भी मौसम के अनुसार आहार में परिवर्तन लाया जाता है। ये विभिन्न आहार श्रीनाथजी को अर्पित किये जाते हैं।

श्रीनाथजी के दिनभर के प्रसाद
श्रीनाथजी के दिनभर के प्रसाद

इनमें अन्य व्यंजनों के साथ एक विशेष मिष्टान्न होता है जिसे ठोर कहते हैं। यह मीठी चाशनी में भीगी सूजी से बनी एक मिठाई होती है। ठोर नाथद्वारा का एक अतिविशेष मिष्टान्न है। आप इन्हें कुछ e-portals से भी मंगवा सकते हैं।

चूड़ियों का प्रसाद

लाल चूड़ियाँ - देवी मंदिर का प्रसाद
लाल चूड़ियाँ – देवी मंदिर का प्रसाद

देवी मंदिर में देवी के शृंगार की वस्तुएं भेंट में चढ़ाना सामान्य है। उनमें उनके लिए चुनरी, साड़ी जैसे वस्त्र, बिंदी, चूड़ियाँ, हल्दी, कुमकुम तथा आभूषण होते हैं। कुछ मंदिरों में इन शृंगार वस्तुओं में से कुछ वस्तुएं प्रसाद के रूप में स्त्रियों को दिया जाता है। मुझे स्मरण है कि मुझे वृन्दावन के निधि वन में तथा जगन्नाथ पुरी मंदिर के परिसर में स्थित महालक्ष्मी मंदिर में लाल चूड़ियाँ प्रसाद के रूप में मिली थीं। ये चूड़ियाँ मेरे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। मैं विशेष अवसरों में उन्हें अवश्य धारण करती हूँ।

विभिन्न मंदिरों के सर्वव्यापी प्रसाद

पाषण पात्रों में चरणामृत -ओडिशा के मंदिरों में
पाषण पात्रों में चरणामृत -ओडिशा के मंदिरों में

मैंने उपरोक्त वर्णन में कुछ विशेष मंदिरों में मिलने वाले विशेष प्रसाद का उल्लेख किया है। इनके अतिरिक्त कुछ सर्वव्यापी प्रसाद हैं जो लगभग सभी मंदिरों में मिलते हैं। उनमें एक है, पंचामृत या चरणामृत। उसे तीर्थ भी कहते हैं। यह सभी मंदिरों में दिया जाता है। आप किसी भी समय मंदिर में जाएँ, आपको चरणामृत या तीर्थ दिया जाता है। उत्तर भारत के अधिकाँश मंदिरों में लड्डू या पेढा सर्वसामान्य प्रसाद होता है। मंदिर के बाहर आप मिठाई की दुकानों की अनेक पंक्तियाँ देख सकते हैं जहाँ ये प्रसाद उपलब्ध होते हैं। वहीं दक्षिण भारत के मंदिरों में महाप्रसाद के रूप में भोजन तथा पायसम की सभी को प्रतीक्षा रहती है। मुरमुरा एवं मीठी चिरौंजी का सूखा प्रसाद भी सभी मंदिरों के बाहर दुकानों में उपलब्ध होता है। यह सूखा प्रसाद होने के कारण आप इसे भगवान को अर्पण करने के पश्चात घर ले जा सकते हैं।

मंदिरों में मिलने वाला प्रसाद इतना विशेष क्यों होता है? इसका कारण है वह भक्ति जिसमें सराबोर होकर इसे बनाया जाता है, भगवान को अर्पित किया जाता है तथा भक्तों में वितरित किया जाता है। भक्तगण भी इसे श्रद्धा से स्वीकार करते हैं तथा उसी श्रद्धा से इसे ग्रहण करते हैं। भगवान को अर्पित करने के पश्चात इसमें दिव्या उर्जा का भी समावेश हो जाता है।

क्या मैंने इसमें किसी विशेष मंदिर के किसी विशेष प्रसाद का उल्लेख नहीं किया है? यदि ऐसा है तो मुझे अवश्य बताईये।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post ११ विशेष मंदिर प्रसाद जो खाए बिना आप नहीं रह सकते appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/vishesh-mandir-prasad/feed/ 0 2899
गुवाहाटी, असम – उत्तर पूर्वीय भारत का प्रवेश द्वार https://inditales.com/hindi/guwahati-assam-kamakhya-temple/ https://inditales.com/hindi/guwahati-assam-kamakhya-temple/#respond Wed, 07 Dec 2022 02:30:58 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=633

गुवाहाटी या गोहाटी वैसे तो कोई खास पर्यटक स्थल नहीं है। मुझे नहीं लगता कि ज्यादातर लोग यहां पर घूमने आते होंगे, सिवाय उन तीर्थयात्रियों के जो कामाख्या मंदिर के दर्शन करने आते हैं। गुवाहाटी वास्तव में उत्तर पूर्वीय भारत के पर्यटन स्थलों का प्रवेश द्वार है। गुवाहाटी इस क्षेत्र का व्यापार केंद्र है, जिसके […]

The post गुवाहाटी, असम – उत्तर पूर्वीय भारत का प्रवेश द्वार appeared first on Inditales.

]]>
गुवाहाटी - ब्रम्हपुत्र नदी पर सूर्यास्त
गुवाहाटी – ब्रम्हपुत्र नदी पर सूर्यास्त

गुवाहाटी या गोहाटी वैसे तो कोई खास पर्यटक स्थल नहीं है। मुझे नहीं लगता कि ज्यादातर लोग यहां पर घूमने आते होंगे, सिवाय उन तीर्थयात्रियों के जो कामाख्या मंदिर के दर्शन करने आते हैं। गुवाहाटी वास्तव में उत्तर पूर्वीय भारत के पर्यटन स्थलों का प्रवेश द्वार है। गुवाहाटी इस क्षेत्र का व्यापार केंद्र है, जिसके चलते लोग जानबूझकर या फिर अनजाने में यहां पर पहुँच ही जाते हैं।

गुवाहाटी में घूमने की जगहें               

ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे पर बसा हुआ शहर  

महानदी ब्रह्मपुत्र के किनारे पर बसा हुआ गुवाहाटी भारत का एकमात्र ऐसा बड़ा शहर है जिससे होकर एक ओजस्वी और शक्तिपूर्ण नदी गुजरती है। मेरा मानना है कि यह नदी ही यहां पर आनेवाले पर्यटकों का प्रमुख आकर्षण है। आप या तो इस नदी के साथ साथ चलती सड़क पर टहलते हुए या फिर किनारे पर आराम से बैठकर वहां के जीवन का अवलोकन कर सकते हैं। वहां का पूरा माहौल हर समय सक्रिय होता है।

ब्रह्मपुत्र पर स्वर्णिम सूर्यास्त
ब्रह्मपुत्र पर स्वर्णिम सूर्यास्त

लोग अस्थायी फिल्टरों से नदी का पानी इकट्ठा करते हुए नज़र आते हैं। नदी के बीचोबीच मछुआरों की नावें तैरती हुई दिखाई देती हैं। यहां पर अनेक मंदिर हैं जिनमें भक्तों का आना-जाना लगा रहता है। इसके अलावा यहां पर जल पर्यटन की नावें भी हैं जो हर शाम आपको एक उमंग भरी सैर पर ले जाती हैं। यहां से कुछ दूर नदी पर एक पुल बंधा हुआ है जो आपको नदी में स्थित एक छोटे से द्वीप पर ले जाता है, जहां पर एक सुंदर सा मंदिर है। इसके अलावा जब नदी का star कम होता है तो यहां-वहां आपको रेत के छोटे-छोटे द्वीप जैसे दिखाई देते हैं। इस सब के अलावा आप चाहें तो किनारे पर बैठकर बस नदी के शांत प्रवाह को महसूस कर सकते हैं।

एक ऐसे व्यक्ति के लिए, जो कभी भी नदी किनारे न रहा हो, नदी के किनारे पर बैठकर उसकी शांतता को सुनना बहुत ही सुखदायक लगता है। भले ही यह नदी ऊपर से शांत नज़र आती हो, लेकिन स्थानीय लोगों के अनुसार उसकी गहराई में बहुत उथल-पुथल होती रहती है। क्या यह आपको किसी ऐसे व्यक्ति के समान नहीं लगता जो बाहर से तो बहुत शांत सा लगता है लेकिन जिसके भीतर भीषण तूफान चल रहा होता है।

कामाख्या मंदिर, गुवाहाटी  
कामाख्या मंदिर से जुड़े उपाख्यान  

कामाख्या मंदिर गुवाहाटी का सबसे प्रसिद्ध अध्याम्तिक स्थल है, जो हर किसी को अवश्य देखना चाहिए। यह मंदिर ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। यह भारत में स्थित 52 शक्तिपीठों में से एक है। जब भगवान शिव देवी सती के पार्थिव शरीर को लेकर जा रहे तब उनके क्रोध को शांत करने हेतु भगवान विष्णु ने अपने चक्र से देवी सती के शरीर के टुकड़े कर दिए थे उस समय देवी सती की योनि इसी स्थान पर गिरि थी।

कामख्या देवी मंदिर - कामरूप
कामख्या देवी मंदिर – कामरूप

इसी कारण यह जगह प्रजनन पंथ और तांत्रिकों द्वारा सबसे पवित्र मानी जाती है। कामाख्या का शाब्दिक अर्थ है काम की देवी। यह जगह कामरूप की भूमि के रूप में भी प्रचलित है, जिनके नाम से यह जिला आज भी जाना जाता है। माना जाता है कि यह मंदिर मूलतः ख़ासी जनजाति से संबंधित हुआ करता था, जो कामेखा नामक देवी को पूजते थे। यही नाम समय के साथ कामाख्या में परिवर्तित हुआ।

कामाख्या मंदिर के दर्शन  

कामाख्या मंदिर के दर्शन करने के पीछे मेरे बहुत से कारण थे, लेकिन फिर भी मैं वहां जाने के लिए उद्यत नहीं थी। वहां पर होनेवाली भीषण पशु हत्या का सामना करने के लिए मैं बिलकुल भी तैयार नहीं थी। इन पशुओं को बलि के रूप में देवी को चढ़ाया जाता है और यह कार्यक्रम लगभग हर रोज होता है। यह एकमात्र ऐसी जगह है जहां पर जाने का निर्णय लेने से पहले मैंने बहुत सोचा होगा।

शायद देवी माँ की अद्भुत शक्ति ही थी जो मुझे उनकी ओर खींच रही थी, जो उस अमानवीय बलि प्रथा के विकर्षण से भी अधिक प्रभावशाली थी। मुझे बताया गया था कि बलिदान की जगह मुख्य मंदिर से थोड़ी दूर है और इस प्रकार जब मैं मंदिर जाऊँगी तो मुझे उस ओर देखने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। लेकिन जो बात मुझे नहीं बताई गयी थी वो यह थी कि बलि चढ़ाने के लिए लाये गए सभी पशु मंदिर के परिसर में घूमते हुए अपनी बारी का इंतजार करते हुए नज़र आएंगे।

कहा जाता है कि जब यह मंदिर बनवाया गया था, तब देवी के चरणों में बहुत सारे मनुष्यों की बलि चढ़ाई गयी थी। वहां पर एक खास समुदाय ही था जो इस बलि प्रथा के लिए ही बना था। इन मनुष्यों की बलि चढ़ाने ने पहले उन्हें अच्छी तरह से खिलाया-पिलाया जाता था और जो भी उन्हें चाहिए होता था वह सबकुछ उन्हें दिया जाता था।

कामाख्या मंदिर – नीलाचल पहाड़ी, असम   
लज्जा गौरी - कामख्या देवी मंदिर - गुवाहाटी के निकट
लज्जा गौरी – कामख्या देवी मंदिर – गुवाहाटी के निकट

नीलाचल पहाड़ी पर स्थित यह नया मंदिर 16वी शताब्दी में कोच राजाओं द्वारा बनवाया गया था जो उस समय इस क्षेत्र पर शासन कर रहे थे। कामाख्या देवी का पुराना मंदिर यानी उनका मूल मंदिर काला पहाड़ द्वारा नष्ट किया गया था और उसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मिलती। इस पहाड़ी पर और भी कई मंदिर हैं जो सभी दस महाविद्याओं अर्थात तांत्रिक परंपरा में पूजे जाने वाले देवी माँ के दस रूपों को समर्पित किए गए हैं।

इस मंदिर की शिखर अपने आप में अद्वितीय है जिसका आकार थोड़ा गोलाकार है, जिसमें खांचे बने हुए हैं जो शायद तांत्रिक परंपरा का ही एक भाग है। इस मंदिर की दीवारों पर विविध हिन्दू देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ हैं जो शिलाओं पर उत्कीर्णित हैं। जो शायद 16वी शताब्दी में किए गए मंदिर के नवीनीकरण से भी पहले की हैं।

इन सभी प्रतिमाओं में से मुझे लज्जा गौरी, जिन्हें प्रजनन की देवी माना जाता है, की प्रतिमा विशेष रूप से पसंद आयी जो कि मेरे लिए इस स्थान की प्रतिनिधि मूर्ति थी। अगर आप थोड़ा ध्यान से देखे तो आपको इस मंदिर की दीवारों पर माँ-शिशु के अनेक उत्कीर्णित चित्र दिखाई देंगे। इस पहाड़ी पर एक छोटा सा सुंदर तालाब है, जिसे सौभाग्य कुंड के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि यह तालाब इन्द्र देव ने कामाख्या देवी के लिए बनवाया था।

कामाख्या मंदिर का संग्रहालय  

कामाख्या मंदिर के पीछे ही एक संग्रहालय बनवाया जा रहा है, जहां पर सभी पुरानी वस्तुओं को रखा जाएगा जो देवी की पूजा के लिए इस्तेमाल की जाती थीं। यहां पर मंदिर के कुछ पुराने दरवाजे रखे गए हैं जो काफी प्रदर्शनीय है। एक प्रकार से ये प्रदर्शित दरवाजे आपको दरवाजों की उत्क्रांति से भी परिचित करवाते हैं।

यहां पर कुछ और भी वस्तुएं हैं, जैसे कि बर्तन और संगीत वाद्य जो विविध समारोहों में इस्तेमाल की जाती हैं। इसके अलावा यहां पर कुछ भेट वस्तुएं भी हैं जो भक्तों द्वारा दी गयी थीं। इस संग्रहालय के चारों ओर एक छोटा सा बगीचा है जिसमें बहुत सारी पत्थर की मूर्तियाँ हैं, जो मुझे लगता है कि कभी इस मंदिर का या फिर उसके परिसर का भाग रही होंगी। एक बार इस संग्रहालय का निर्माण कार्य पूर्ण होने पर वह मंदिर के पूजा-पाठ की पद्धतियों को पर्दर्शित करने का बहुत ही अच्छा माध्यम सिद्ध हो सकता है।

इस संग्रहालय के अभीक्षक के साथ मेरी बातचीत बहुत अच्छी रही। शुरू-शुरू में उनका कहना था कि सब कुछ देवी माँ के आशीर्वाद से ही होता है लेकिन बातचीत के दौरान उनके विचार कुछ अलग ही बताने लगे। वे कहने लगे कि देवी तो वैसी ही होती है जैसा हम उन्हें मानते हैं। अगर हम देवी माँ की इतनी अच्छी सेवा न करते तो क्या इतने सारे लोग उनकी पूजा करते? वह देवी इसलिए बनी है क्योंकि हम उस सम्मान और भक्ति भाव के साथ उनकी आराधना करते हैं। मेरे खयाल से यह एक चिरकालिक प्रश्न है कि, भगवान और भक्त के बीच किसने किसका निर्माण किया, जिसका उत्तर हमेशा एक दुविधा स्वरूप ही रहेगा।

उमानंदा मंदिर, ब्रह्मपुत्र नदी द्वीप     

उमानंदा मंदिर ब्रह्मपुत्र नदी के बीचोबीच स्थित विश्व के सबसे छोटे नदी द्वीप पर बसा हुआ एक सुंदर मंदिर है। इस द्वीप को पीकॉक आइलेंड यानी मयूर द्वीप भी कहा जाता है और यह नाम इस द्वीप को अंग्रेजों द्वारा दिया गया था। यद्यपि इस द्वीप का प्राचीन नाम भस्माचल था जो कि मिथकीय उपाख्यानों से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि यहीं वह स्थान है जहां पर भगवान शिव ने कामरूप को भस्म किया था।

नदी के बीचोबीच बसे इस द्वीप टापू पर इस मंदिर के अलावा और कुछ नहीं है। उमानंदा का मूल मंदिर अहोम राजाओं द्वारा बनवाया गया था, जो यहां पर आए हुए भूकंप के समय धरती में विलीन हो गया था। बाद में एक स्थानीय महाजन ने इस नए मंदिर का निर्माण किया था। यहां तक पहुँचने के लिए आपको मुख्य शहर में स्थित उमानंदा घाट से एक फेरी लेनी पड़ती है, जो लगभग 5 मिनटों में आपको इस द्वीप पर पहुँचा देती है। इस द्वीप पर जाने का यह एक मात्र रास्ता है। यहां पर आपको सिर्फ द्वीप पर जाने का शुल्क देना पड़ता है। लौटते समय आप बिना कोई शुल्क दिए किसी भी नाव से वापस आ सकते हैं, क्योंकि, जो भी व्यक्ति उस द्वीप पर जाता है उसे वापस लाना ही पड़ता है।

यहां का मुख्य मंदिर साधारण सा है, जिसके चारों ओर कामाख्या शैली के छोटे-छोटे मंदिर खड़े हैं। इस द्वीप पर एक पगडंडी बनी हुई है जो आपको पूरे द्वीप की सैर कराती है जिससे कि आप हर तरफ से इस द्वीप की सुंदरता का आनंद उठा सके। इस मंदिर के परिसर में सिर्फ दो ही दुकानें हैं, एक दुकान पर चाय, ठंड पेय और कुछ खाने की वस्तुएं बेची जाती हैं, तो दूसरी दुकान पर प्रसाद बेचा जाता है। अगर आप सुबह की पहली फेरी से, जो लगभग 10 बजे उमानंदा घाट से निकलती है, इस द्वीप पर जाए तो वहां पर मिलने वाली अधिकतर वस्तुएं आपके साथ इसी फेरी से द्वीप पर जाती हुई दिखेंगी।

यह बहुत ही सुंदर द्वीप है जिसके चारों ओर ब्रह्मपुत्र नदी बहती है और यह द्वीप टापू शांति से उसके बीच खड़ा है। यहां पर आपको हर प्रकार की नावें पानी में तैरती हुई नज़र आएँगी। वहां पर हमे पानी में तैरता हुआ एक नावघर दिखा जो अत्यंत रोचक था। वह बांस का बना एक छोटा सा मचान था जिसके ऊपर एक छोटी सी झोपड़ी खड़ी थी। यह नावघर का सबसे मूल स्वरूप हुआ करता था। यह नाव मछुआरों द्वारा मछली पकड़े के लिए इस्तेमाल की जाती थी।

गुवाहाटी के संग्रहालय  

हमने गुवाहाटी में दो मुख्य संग्रहालय देखे, जिन में से एक पारंपरिक राज्य संग्रहालय है, जहां पर प्रदर्शनीय वस्तुओं का प्रचुर संग्रहण देखने को मिलता है। तो दूसरा संग्रहालय इस शहर का नया संग्रहालय है, जहां पर लोगों द्वारा अपने दैनिक जीवन में तथा उत्सवों के दौरान प्रयुक्त विभिन्न कलाकृतियों के माध्यम से भारत के उत्तरपूर्वीय राज्यों की संस्कृति को दर्शाया गया है।

राज्य संग्रहालय, गुवाहाटी   
एक उत्कृष्ट शिल्प - गुवाहाटी संग्रहालय से
एक उत्कृष्ट शिल्प – गुवाहाटी संग्रहालय से

गुवाहाटी के राज्य संग्रहालय में असम के ग्रामीण जीवन पर आधारित एक सुंदर प्रदर्शन कक्ष है। इस कक्ष में प्रदर्शित वस्तुओं का अवलोकन करते हुए ऐसा प्रतीत होता है जैसे आप वास्तव में किसी गाँव में घूम रहे हो। इस संग्रहालय में उत्कीर्णित लेखों से संबंधित एक खास प्रदर्शन कक्ष है, जो यहां का सबसे उल्लेखनीय कक्ष है। इस कक्ष में उत्कीर्णित शिला स्तंभ, जमीन से जुड़े अभिलेखों से युक्त ताम्र पत्र और सामान्य पांडुलिपियाँ रखी गयी हैं। यहां के मुद्रा संबंधी प्रदर्शन कक्ष में छोटे-छोटे बाण रूपी सिक्के रखे गए हैं जो नाग पंथियों द्वारा मुद्रा के रूप में इस्तेमाल किए जाते थे। यहां पर प्रदर्शित धातु और पक्की मिट्टी से बनी वस्तुओं का संग्रहण काफी अच्छा और आकर्षक है।

श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र
शंकरदेव कला क्षेत्र में शिल्पकला का उदहारण - गुवाहाटी
शंकरदेव कला क्षेत्र में शिल्पकला का उदहारण – गुवाहाटी

गुवाहाटी का नया संग्रहालय यानी शंकरदेव कालक्षेत्र यहां के सम्मेलन केंद्र में स्थित है। इस बड़ी सी जगह के बगीचे में अनेक प्रदर्शनीय वस्तुएं रखी गयी हैं। तथा यहां का प्रवेश द्वार शिवसागर में स्थित रंग घर की प्रतिकृति है। इसके अलावा यहां पर एक बहु-मंज़िला संग्रहालय है जिसके प्रदर्शन कक्षों में बड़ी-बड़ी प्रदर्शनीय वस्तुएँ सुशोभित हैं। इस क्षेत्र और उसकी संस्कृति को समझने के लिए यह सबसे उचित जगह है। इसके अतिरिक्त गुवाहाटी के आस-पास और भी सांस्कृतिक केंद्र हैं, जैसे कि हाजो और सौलकुची जो मैं नहीं देख पायी।

ब्रह्मपुत्र नदी में समुद्री पर्यटन का आनंद     

गुवाहाटी की धार्मिक और सांस्कृतिक यात्रा के बाद अगर आपने ब्रह्मपुत्र नदी पर आयोजित समुद्री पर्यटन का आनंद नहीं लिया तो आपकी यह यात्रा अधूरी ही रहेगी। यहां पर खुले डेक वाली बड़ी-बड़ी नावें हैं, जिस में एक नृत्य मंच और डी.जे. भी होता है, जैसा की गोवा में पाया जाता है। यह नाव आपको ब्रह्मपुत्र नदी में घंटे भर की लंबी सैर के लिए ले जाती है। इस सैर के दौरान आप दूर नज़र आनेवाली गुवाहाटी की क्षितिज रेखा देख सकते हैं और अगर बादलों की अनुमति हो तो सूर्यास्त का खूबसूरत नज़ारा भी देख सकते हैं। इस पुरातन शहर में आराम करने का यह सबसे उत्तम तरीका है और आराम करते हुए आप अपने दिन भर के कार्यक्रमों का पुनर्विचार भी कर सकते हैं।

गुवाहाटी के आस पास के अन्य पर्यटन स्थल

मेघालय के शिलांग शहर में क्या क्या पर्यटक स्थल देखें

असम चाय के बागान – असम में घूमने की जगहें

शिवसागर या सिबसागर – असम में मंदिरों की नगरी

एक सींग वाले भारतीय गैंडे का घर – काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान, असम

अरुणाचल प्रदेश की मंत्रमुग्ध करने वाली टेंगा घाटी की यात्रा

The post गुवाहाटी, असम – उत्तर पूर्वीय भारत का प्रवेश द्वार appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/guwahati-assam-kamakhya-temple/feed/ 0 633
गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस पठन के ५ मुख्य उद्देश्य https://inditales.com/hindi/tulsidas-ramcharitmanas-kyun-padhen/ https://inditales.com/hindi/tulsidas-ramcharitmanas-kyun-padhen/#comments Wed, 02 Nov 2022 02:30:08 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2850

मेरा ध्येय है कि मैं सदा मूल भारतीय ग्रंथों का ही पठन करूँ। इसी कड़ी में मैंने गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के पठन का निश्चय किया। हम सब जानते हैं कि भारत के दो प्रमुख महाकाव्य, रामायण एवं महाभारत पर असंख्य व्याख्याएं, टिप्पणियाँ तथा व्युत्पन्न रचनाएँ प्रकाशित की गयी हैं। इसी कारण मैंने सर्वप्रथम […]

The post गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस पठन के ५ मुख्य उद्देश्य appeared first on Inditales.

]]>

मेरा ध्येय है कि मैं सदा मूल भारतीय ग्रंथों का ही पठन करूँ। इसी कड़ी में मैंने गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के पठन का निश्चय किया। हम सब जानते हैं कि भारत के दो प्रमुख महाकाव्य, रामायण एवं महाभारत पर असंख्य व्याख्याएं, टिप्पणियाँ तथा व्युत्पन्न रचनाएँ प्रकाशित की गयी हैं। इसी कारण मैंने सर्वप्रथम कालिदास की रघुवंशम् से मेरा पठन आरम्भ किया। इसके पश्चात मैंने गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के पठन का निश्चय किया। इसका मुख्य कारण था कि भले ही यह अत्यंत विस्तृत ग्रन्थ है, मैंने अनुमान लगाया कि इसका पठन अपेक्षाकृत सरल होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रामचरितमानस पठन के ५ मुख्य उद्देश्य
गोस्वामी तुलसीदास रामचरितमानस पठन के ५ मुख्य उद्देश्य

रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने अवधी भाषा का प्रयोग किया है। अवधी भाषा से स्वयं को अभ्यस्त करने में मुझे कुछ समय लगा। ११०० पृष्ठों के रामचरितमानस के पठन के आरंभिक चरण में मेरी पठन की गति अत्यंत धीमी थी। जैसे आरम्भ में मैं एक दिवस में केवल एक अथवा दो पृष्ठ ही पठन कर पाती थी। किन्तु मैंने रामचरितमानस पठन में विराम लगने नहीं दिया। शनैः शनैः मैं अवधी भाषा से अभ्यस्त होने लगी तथा मेरी पठन गति में भी वृद्धि होने लगी। कुछ दिवसों पश्चात् मैं औसतन १० पृष्ठ प्रतिदिन पठन करने लगी थी। एक यात्रा संस्करण लेखिका होने के कारण यात्राओं एवं संस्करण लेखन के लिए भी मुझे समय निर्दिष्ट करना पड़ता है। अन्य सामाजिक गतिविधियों में भी योगदान देने का मेरा सतत प्रयास रहता है। अतः, प्रायः अपनी सभी गतिविधियों को यथावत रखते हुए मुझे ११०० पृष्ठों के रामचरितमानस के पठन में लगभग ६ मास का समय लगा।

मूल रामचरितमानस ग्रन्थ के पठन के पश्चात मैंने जो अनुभव प्राप्त किया, वह आपसे साझा कर रही हूँ।

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित मूल रामचरितमानस पठन

यदि मेरे लिए संभव है तो आपके लिए भी संभव है।

मेरे पास गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित रामचरितमानस ग्रन्थ है जिसमें ११०० पृष्ठ हैं। इसमें अवधी भाषा का प्रयोग किया गया है। साथ ही कुछ स्थानों पर संस्कृत भाषा में श्लोक इत्यादि हैं। उन सभी का क्रमशः हिन्दी में अनुवाद किया गया है। आरम्भ में मुझे यह एक कठिन कार्य प्रतीत हुआ।

ग्रन्थ आरम्भ करने से पूर्व मैंने इसे पूर्ण करने के लिए ३ वर्षों से अधिक समय का अनुमान लगाया था। किन्तु जैसे ही अवधी भाषा में मेरी प्रवीणता में वृद्धि होने लगी, उसका पठन शनैः शनैः सरल प्रतीत होने लगा। पठन गति में वृद्धि होने लगी। मैं प्रतिदिन प्रातः शीघ्र उठती, स्नानादि के पश्चात पृष्ठों की नियत संख्या का पठन करती, उसके पश्चात ही अपने दैनिक व्यवसायिक कार्यों का आरम्भ करती थी।

जो पाठक हिन्दी भाषा में धाराप्रवाह पठन करते हैं, उन्हें अवधी कदापि कठिन प्रतीत नहीं होगी। अवधी भाषा में कुछ शब्दों के अर्थ समझ में आ जाएँ तथा उनके समान्तर शब्दों का प्रयोग भी जान जाएँ तो आपको पुनः पुनः शब्दकोष के पृष्ठ पलटने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

अपने अनेक व्यवसायिक क्रियाकलापों के साथ यदि मैं इसका पठन कर सकती हूँ तो आप भी कर सकते हैं। यदि आपकी इच्छाशक्ति दृढ़ है तो आप इसके लिए समय अवश्य निकाल सकते हैं।

और पढ़ें: मीनाक्षी जैन द्वारा लिखित राम एवं अयोध्या

यह केवल श्रीराम की एक कथा नहीं है

यद्यपि रामचरितमानस में श्री राम की कथा का प्रमुखता से उल्लेख किया गया है, तथापि यह ग्रन्थ कथा के विभिन्न आयामों को विस्तार से दर्शाता है। भगवान राम के जन्म से पूर्व भगवान शिव एवं माता पार्वती के विवाह का विस्तृत वर्णन किया गया है। ऐसी अनेक घटनाओं  का उल्लेख है जिनका श्रीराम की कथा से सीधा सम्बन्ध नहीं है। जैसे भगवान विष्णु द्वारा अयोध्या में भगवान राम के रूप में जन्म लेने की पृष्ठभूमि में स्थित विभिन्न कारण।

राम-जानकी विवाह की कथा में राम एवं लक्ष्मण के संबंधों पर प्रमुखता से ध्यान केन्द्रित किया गया है। राम-भरत मिलाप की कथा भरत के चरित्र को उजागर करती है तथा उसी पर ध्यान केन्द्रित करती है। सुन्दर काण्ड में गोस्वामीजी ने हनुमान जी एवं भगवान राम के प्रति उनके प्रेम से हमें अवगत कराया है। लंका नरेश रावण की स्वर्ण नगरी की भव्यता का विस्तृत रूप से उल्लेख किया है।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के विभिन्न पात्रों के चरित्र को इतनी विलक्षणता से चित्रित किया है कि हम सहज रूप से उनके संबंध हमारे आसपास के व्यक्तिमत्वों से जोड़ने लगते हैं।

जब भगवान राम लंका पर विजय प्राप्त कर सीता माता के साथ अयोध्या वापिस आते हैं तथा राम राज्य की स्थापना करते हैं, वहीं रामचरितमानस की कथा समाप्त होती है। मेरे लिए सम्पूर्ण रामचरितमानस का सर्वाधिक मनमोहक भाग है, राम राज्य का उल्लेख। यह उस आदर्श राज्य की कल्पना है जब सृष्टि के प्रत्येक तत्व का अन्य तत्वों से पूर्ण सामंजस्य होता है। अपने सुन्दर दोहों व छंदों द्वारा उन्होंने राम राज्य की अप्रतिम संकल्पना दी जिसके अनुसार – यदि प्रत्येक मनुष्य अपने धर्म एवं वर्ण के अनुसार कृति करे तब यह सम्पूर्ण विश्व भय, रोगों एवं दुखों से मुक्त हो जाएगा। मेरे अनुमान से राम राज्य की संकल्पना पर एक स्वतन्त्र एवं विस्तृत संस्करण लिखा जाना चाहिए।

और पढ़ें: अयोध्या की तस्वीरें – शारदा दुबे

रामचरितमानस में मिथकों का खंडन

हमने अनेक सूत्रों द्वारा रामायण की कथाओं को सुना तथा देखा है। जिसे रामायण के पात्रों का जैसा चरित्र उचित जान पडा, उसने उसका वैसा वर्णन किया है। इसके कारण पाठकों एवं दर्शकों के मन-मस्तिष्क में अनेक मिथकों ने जन्म लिया है। मैं भी उनसे अछूती नहीं थी। किन्तु जब मैंने रामचरितमानस का मूल ग्रन्थ पढ़ा, मेरे मस्तिष्क में घर कर बैठे अनेक मिथकों का खंडन हो गया। जैसे रामचरितमानस के अरण्य काण्ड में, जहां से सीता माता का अपहरण किया गया था, वहाँ लक्ष्मण रेखा का कोई उल्लेख नहीं किया गया है। लक्ष्मण केवल आसपास के वृक्षों से निवेदन करते हैं कि वे उनकी अनुपस्थिति में सीता माता का ध्यान रखें।

लक्षमण रेखा के विषय में लंका काण्ड में मंदोदरी ने केवल सरसरी रूप से उल्लेख किया है जब वे रावण को उलाहना देते हुए कहती हैं कि आपने लक्षमण द्वारा खींची गयी रेखा का उल्लंघन किया है तो अब राम का सामना कैसे करोगे? लक्ष्मण रेखा शत्रुओं अथवा अवांछित तत्वों द्वारा ना लांघने के लिए खींची गयी थी, ना कि सीता के लिए।

रामचरित मानस के इस संस्करण में सीता माता के अयोध्या से निष्कासन की कोई कथा नहीं है। यहाँ तक कि लव व कुश के जन्म का उल्लेख भी एक-चौथाई दोहे में कर दिया गया है। राम द्वारा सरयू नदी में समाधि लेने का भी कहीं उल्लेख नहीं है।

जब राजा दशरथ की तीनों रानियाँ राम से भेंट करने वन में जाती हैं तब उन्हें देखकर राम को यह कदापि ज्ञात नहीं होता है कि पिता राजा दशरथ का निधन हो गया है। विधवा, इस शब्द का कहीं उल्लेख नहीं है। उन्हें सदा रानी अथवा माता से संबोधित किया गया है।

और पढ़ें: बिठूर – गंगा किनारे ब्रह्मा एवं वाल्मीकि की भूमि

संवादों द्वारा कथाकथन

भारतीय ग्रंथों को संवादों तथा वार्तालाप के रूप में लिखा गया है। रामचरितमानस में भी श्री राम की कथा शिव एवं पार्वती के मध्य तथा काक भुशुण्डी एवं गरुड़ के मध्य संवादों के रूप में रचित है। गोस्वामी तुलसीदास स्वयं भी यदा-कदा अपनी उपस्थिति दर्शा देते हैं। इनके अतिरिक्त विभिन्न आश्रमों में ऋषियों एवं उनके शिष्यों के मध्य हुए संवाद भी हैं।

राम, लक्ष्मण एवं सीता के पंचवटी आश्रय काल में राम एवं लक्षमण के मध्य दार्शनिक विषयों पर भी संवाद होते थे। जैसे, माया क्या है? जब राम एवं लक्षमण किष्किन्धा में वर्षाऋतू के समाप्त होने की प्रतीक्षा कर रहे थे तब राम को स्वयं से संवाद साधते हुए, ऋतुओं की तुलना शासनकला से करते दर्शाया गया है।

रामचरितमानस के अंतिम चरण में काक भुशुण्डी का एक दीर्घ प्रवचन है जिसमें वे कथा को समाप्त करते हुए पाठकों को शिक्षाप्रद सन्देश देते हैं।

और पढ़ें: Actors, Pilgrims, Kings and Gods – The Ramlila of Ramnagar by Anuradha Kapur

भारतीय संस्कृति की सूक्ष्मताएँ

रामचरितमानस की भाषा में भारतीय संस्कृति का सत्व समाया हुआ है। उसमें भारतीय संस्कृति की सूक्ष्मताएँ सन्निहित हैं। जैसे, जब नाविक केवट भगवान राम, सीता माता एवं लक्षमण को अपनी नौका में बिठाकर गंगा पार कराते हैं, तब सीता माता केवट को अपनी अंगूठी देकर उसके श्रम का भुगतान करने का प्रयास करती हैं। केवट यह कहकर अंगूठी लेने से मना कर देते हैं, “मैं भी केवट, तुम भी केवट, कैसे लूं तेरी उतराई”।

केवट कहते हैं कि हे राम जिस प्रकार मैं गंगा पार कराता हूँ, आप भवसागर पार कराते हैं। एक केवट दूसरे केवट से भुगतान कैसे ले सकता है? वैसे भी शुल्क गंतव्य पर पहुंचाने का होता है। हमसे सामान्यतः नौका पर चढ़ने से पूर्व ही शुल्क लिया जाया है, भले ही हम वहाँ पहुंचे अथवा नहीं।

और पढ़ें: In search of Sita by Malashri Lal & Namita Gokhale

सदैव मूल रामचरितमानस का ही पठन क्यों करें?

विश्व में रामायण के अनेक संस्करण हैं तथा असंख्य पुनःकथन किये गए हैं। वस्तुतः, गोस्वामी तुलसीदास का रामचरितमानस भी प्राचीन वाल्मीकि रामायण का १७वी शताब्दी का पुनःकथन है। आशा है कि प्राचीन वाल्मीकि रामायण के पठन का मुहूर्त भी मुझे शीघ्र प्राप्त होगा।

रामायण की कथा की अनेक परतें हैं। राम अवतार की कथा एक मुखावरण है जिसके द्वारा मानव चरित्र के गहन समझ को पाठक तक पहुँचाया गया है। प्रत्येक पाठक इसे अपने दृष्टिकोण से पठन करता है। यही भारतीय ग्रंथों का वैशिष्ठ्य है। आप उन्हें अनेक दृष्टिकोणों से पठन कर सकते हैं तथा समझ सकते हैं। एक दृष्टिकोण ऐसा है जो उस पर कदापि लागू नहीं होता है, वह है ओछापन।

रामायण को जिस प्रकार लिखा गया है अथवा कहा गया है, उसे वैसे ही पठन करना तथा अपने स्वयं के निष्कर्ष निकालना महत्वपूर्ण है। इसीलिए मूल ग्रन्थ का पठन अत्यावश्यक होता है जो बिना किसी पक्षपात एवं निर्णय के घटनाओं को अपने मूल रूप में आपके समक्ष प्रस्तुत करता है.

आईये गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस का पठन करें।

गोस्वामी तुलसीदास का रामचरितमानस आप Amazon.In से ले सकते हैं अथवा Kindle Book में पढ़ सकते हैं।

यह स्थल Amazon का सहायक है। उपरोक्त संकेत द्वारा आप जो भी पुस्तकें क्रय करेंगे, उसका कुछ प्रतिशत धनार्जन इस स्थल को प्राप्त होने की संभावना है। किन्तु इससे आपके क्रय मूल्य में कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस पठन के ५ मुख्य उद्देश्य appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/tulsidas-ramcharitmanas-kyun-padhen/feed/ 1 2850
बॉलीवुड से २० सर्वोत्तम वर्षा गीत https://inditales.com/hindi/varsha-geet-bollywood/ https://inditales.com/hindi/varsha-geet-bollywood/#respond Wed, 31 Aug 2022 02:30:04 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2778

गोवा में मानसून के मौसम में जब वर्षा होती है, तब वर्षा के गीत सहज ही अधरों पर आ जाते हैं। गोवा में वर्षा ऋतू में रिमझिम वर्षा नहीं, अपितु झमाझम वर्षा होती है, वह भी चार मास से अधिक समयावधि के लिए। तात्पर्य यह है कि मानसून के मौसम में गोवा में देश के […]

The post बॉलीवुड से २० सर्वोत्तम वर्षा गीत appeared first on Inditales.

]]>

गोवा में मानसून के मौसम में जब वर्षा होती है, तब वर्षा के गीत सहज ही अधरों पर आ जाते हैं। गोवा में वर्षा ऋतू में रिमझिम वर्षा नहीं, अपितु झमाझम वर्षा होती है, वह भी चार मास से अधिक समयावधि के लिए। तात्पर्य यह है कि मानसून के मौसम में गोवा में देश के अधिकतर राज्यों से अपेक्षाकृत अधिक वर्षा होती है। गोवा के चौमासी वर्षा को देख मुझे अनायास ही संतों का चातुर्मास स्मरण हो आता है, जब भ्रमण करते साधु-संत वर्षा ऋतु में चार मास की अवधि के लिए किसी एक स्थान पर ठहर जाते थे तथा सत्संग करते थे। अनेक अवसरों पर कदाचित उन्हें गुफाओं में भी विश्राम करना पड़ा होगा, जैसे अजंता तथा बराबर गुफाएं। गोवा में कभी कभी वर्षा का उन्माद इतना अधिक होता है कि उसके अतिरिक्त अन्य कुछ सुनाई नहीं पड़ता है। हम बाहरी विश्व से लगभग पृथक से होने लगते हैं। उस समय केवल हम होते हैं तथा हमारे हृदय से उमड़कर अधरों पर आते वर्षा के गीत होते हैं। हृदय उल्साह से भर जाता है तथा हम अनायास ही वर्षा के गीत गुनगुनाने लगते हैं।

वर्षा गीत ऐसे ही वर्षा के मनभावन गीतों एवं उसके उल्हास व उन्माद को कुछ हिन्दी चित्रपटों ने सुन्दर शैली में प्रदर्शित किया है। उनमें प्रदर्शित भावनाएं हमारे हृदय को छूने में सफल हो जाती हैं। बालपन में वर्षा के जल में छप-छप कूदने से लेकर प्रेम से ओतप्रोत प्रेमी-प्रेमिकाओं की एक दूसरे से मिलने की तड़प तक, अथवा वर्षा की प्रतीक्षा करते किसानों की व्यथा का वर्षा की बूंदे देखते ही उल्हास में परिवर्तित होना, इन सभी भावनाओं का बॉलीवुड के गीतों में सुदर चित्रण किया गया है।

बॉलीवुड के विश्व से चुने हुए कुछ वर्षा गीत

वर्षों से जिन वर्षा गीतों का मैंने आनंद लिया, उन्हें आपके साथ बाँटना चाहती हूँ। आशा है आपको भी ये गीत आनंद विभोर कर देंगे।

इक लड़की भीगी भागी – चलती का नाम गाडी (१९५८)

किशोर कुमार द्वारा गाये गए इस गीत में उच्छृंखलता भरी हुई है। यद्यपि इस गीत में वर्षा का दृश्य नहीं है, तथापि मधुबाला, जो इस गीत की प्रेरणा है, वो वर्षा के जल में भीगी हुई है तथा सुनसान रात में अकेली अपनी गाड़ी की मरम्मत कराने वहां पहुँचती है। इस गीत में नायक, नायिका मधुबाला की परिस्थिति का अत्यंत मस्ती भरी शैली में उल्लेख कर रहा है। अप्रतिम सौंदर्य से युक्त मधुबाला के भीगे मुखड़े की झलकों के मध्य किशोर कुमार के चंचल हाव-भाव इस गीत को अधिक मनोहर बना देते हैं। किशोर कुमार, जो एक गाड़ी मरम्मत करने वाले मिस्त्री हैं, वे औजारों द्वारा संगीत उत्पन्न करते हैं। इस गीत को दिग्गज पार्श्वगायक किशोर कुमार ने गाया है तथा इसे उन्ही पर फिल्माया भी गया है। आप आधुनिक पार्श्वसंगीत के महान संगीतकार आर. डी. बर्मन के संगीत को सराहे बिना नहीं रह पायेंगे।

डम डम डिगा डिगा – छलिया (१९६०)

वर्षा ऋतु के आनंद का उत्सव मनाते इस गीत को कल्याणजी आनंदजी से सुरों में पिरोया है तथा इसे स्वर प्रदान किया है मुकेश ने। वर्षा के आते ही स्त्रियाँ सूखे वस्त्रों को रस्सी पर से उतार रही है, लोग वर्षा से बचने के लिए यहाँ-वहां भाग रहे हैं तथा छतरियां खोल रहे हैं, वहीं चित्रपट के नायक राज कपूर अपनी लोकप्रिय शैली में कूदते-फांदते गीत गा रहे हैं। इस श्वेत-श्याम चित्रपट में वर्षा की प्रथम फुहार का उल्हास दर्शाया गया है।

ओ सजना बरखा बहार आयी – परख (१९६०)

यह गीत आपको वास्तव में वर्षा ऋतु के दिवसों का स्मरण करा देगा। इस गीत में नायिका साधना छज्जे पर खड़े होकर वर्षा की फुहारों को निहार रही है एवं अपने प्रियतम की स्मृतियों में खो गयी है। वो उससे कह रही है कि वर्षा ऋतु आ गयी है तथा उसके हृदय में प्रेम का संचार कर रही है। गीत के इस चित्रीकरण में पत्तों, धरती, छत आदि पर बरसती फुहारों द्वारा वर्षा का अद्भुत दृश्य प्रस्तुत किया है।

सलिल चौधरी के संगीत पर लता मंगेशकर ने इस गीत को अपने अद्भुत स्वर से सजाया है।

जिंदगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात – (१९६०)

इस चित्रीकरण में केवल दो दृश्य हैं तथा वर्षा का एक भी दृश्य नहीं है। इसके पश्चात भी इस काव्य के प्रत्येक शब्द को इतनी सुन्दरता से रचा गया है कि नेत्रों के समक्ष सम्पूर्ण दृश्य सजीव हो उठता है। वर्षा की एक रात्रि के समय नायक का नायिका से भेंट होना, वर्षा की बूंदों का नायिका के मुखड़े पर सरकना, बिजली गिरते ही नायिका का नायक से टकराना तथा लजाना, ऐसे अनेक सुंदर क्षणों का इस गीत में उल्लेख है। नायक एवं नायिका के मध्य केवल रेडियो के माध्यम से भावनाओं का प्रवाह हो रहा है। मोहम्मद रफ़ी द्वारा गाये गए गीत को भारत भूषण पर फिल्माया गया है। इस गीत को पूर्ण न्याय किया है नायिका मधुबाला की अप्रतिम भाव भंगिमाओं एवं अभिव्यक्तियों ने, जो वर्षा की उस रात्रि का दृश्य हमारे समक्ष अक्षरशः सजीव कर देते हैं।

लाखों का सावन जाए  – रोटी, कपड़ा और मकान (१९७४)

इस गीत में युगल जोड़ों का मर्म प्रस्तुत किया है जिन्हें वर्षा ऋतु के आनंदित वातावरण में विरह की स्थिति का सामना करना पड़ता है। इस गीत में विरह का मर्म दर्शाया गया है। यूँ तो लता मंगेशकर द्वारा सुमधुर स्वर में गाये गए इस गीत को नायिका जीनत अमान ने ठेठ देहाती शैली में प्रस्तुत किया है, किन्तु मुझे इसका ‘अम्बर पे रचा स्वयंवर’, यह भाग अत्यंत प्रिय है।

रिम झिम गिरे सावन – मंजिल (१९७९)

इस गीत में अमिताभ बच्चन एवं मौसमी चटर्जी मुंबई की सडकों एवं समुद्र तटों पर वर्षा का आनंद लेते दिख रहे हैं। इसमें मुंबई के लगभग ४० वर्षों पूर्व का दृश्य दर्शाया गया है जब मुंबई के लोग वर्षा का आनंद उठा सकते थे। चित्रपट में इस गीत के दो संस्करण हैं। एक संस्करण केवल किशोर कुमार के स्वर में है जिसे घर के भीतर फिल्माया गया है जबकि दूसरा संस्करण लता मंगेशकर के स्वर में है जिसमें मुंबई, वहां की वर्षा एवं वर्षा की फुहारों में भीगते प्रेमी जोड़े को दिखाया गया है।

रिम झिम गिरे सावन, यह गीत मुझे ऐसा आभास करता है मानों वर्षा की फुहारों में मेरा तन-मन भीग गया है। मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व वर्षा से एकाकार हो गया है। आर. डी. बर्मन का संगीत इस उल्हास को अनेक गुना बढ़ा देता है।

मेघा रे मेघा रे – प्यासा सावन (१९८१)

इस गीत में मेघों से कहा जा रहा है कि वे परदेश ना जाएँ, अपितु वहीं बरसें तथा उन्हें प्रेम की फुहारों में भिगो दे। उनके अनुनय को स्वीकारते हुए मेघ वहीं बरस जाते हैं। याचना की भावना उल्हास में परिवर्तित हो जाती है। वर्षा होते ही हृदय मोर के समान नाचने लगता है। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के संगीत पर लता मंगेशकर एवं सुरेश वाडकर के सुमधुर स्वरों ने इस गीत को नई ऊँचाइयों तक पहुंचा दिया है।

आज रपट जाएँ तो – नमक हलाल (१९८२)

यह सम्पूर्ण गीत अमिताभ बच्चन एवं स्मिता पाटिल पर फिल्माया गया है जो झमझम वर्षा में भीगते हुए नाच रहे हैं। यद्यपि गीत के मुखड़े में वर्षा उल्लेख नहीं है, तथापि इसके अंतरे में वर्षा का वर्णन किया है।

लगी आज सावन की फिर वो झड़ी – चांदनी (१९८९)

यह एक ऐसा वर्षा गीत है जो उदासी से भरा हुआ है। इसमें वर्षा से सम्बंधित कुछ भावुक स्मृतियों को झकझोरा गया है। ऐसी मधुर स्मृतियाँ जिन्हें चाह कर भी पुनः जिया नहीं जा सकता। इस गीत में नायक के जीवन के अतीत एवं वर्तमान की तुलना की गयी है। यह गीत नायक का अतीत से वर्तमान की ओर यात्रा का संकेत देता है। मैं जब भी यह गीत सुनती हूँ, किंचित उदास हो जाती हूँ। किन्तु मैं यह नहीं जान पाती कि इस गीत का कौन सा तत्व मुझे उदास करता है।

इस गीत को संगीतबद्ध किया है शिव-हरी ने तथा इसे स्वर प्रदान किया है, सुरेश वाडकर ने।

सुन सुन सुन बरसात की धुन – सर (१९९३)

इस गीत में नायक नसीरुद्दीन शाह एक शिक्षक हैं जो अपने विद्यार्थियों से वर्षा के संगीत को सुनने के लिए कह रहे हैं। मुझे यह गीत अत्यंत भाता है तथा प्रासंगिक प्रतीत होता है क्योंकि हम सब ने आज के व्यस्त दिनचर्या में वर्षा एवं उसके संगीत को सुनना तथा उसका आनंद लेना लगभग समाप्त कर दिया है।

रिम झिम रुन झुम –  १९४२ अ लव स्टोरी (१९९४)

१९४२ के काल को प्रदर्शित करते, ‘१९४२ अ लव स्टोरी’ चित्रपट का यह गीत एक सादा तथा अत्यंत मधुर गीत है जो पावन प्रेम को दर्शाता है। ऐसा प्रेम जो अब के चित्रपटों में क्वचित ही दृष्टिगोचर होता है। इसे अत्यंत मधुर बनाने का पूर्ण श्रेय कुमार सानु एवं कविता कृष्णमूर्ति को जाता है जिन्होंने बर्मन दा के संगीत को पूर्ण न्याय किया है।

टिप टिप बरसा पानी – मोहरा (१९९४)

यद्यपि मुझे स्वयं यह गीत अधिक प्रिय नहीं है तथापि वर्षा गीत का उल्लेख करते ही अधिकाँश लोगों को इसी गीत का स्मरण होता है। अतः उन सभी के लिए अलका याग्निक एवं उदित नारायण द्वारा गाया गया यह गीत प्रस्तुत है।

कोई लड़की है – दिल तो पागल है (१९९७)

इस गीत को सुनते ही हम सब के भीतर की बालसुलभ चंचलता हिलोरे मारने लगती है जो वर्षा के जल में क्रीड़ा करने को लालायित है। हम सब में एक नन्हा बालक रहता है जो वर्षा में भीगने को सदा उत्सुक रहता है। जल से भरे पोखरों में नाचना, कूदना तथा खेलना चाहता है। इससे मुझे गोवा में वर्षा ऋतु में मनाये जाने वाले उत्सव, चिखल कालो का स्मरण होता है। इस गीत के बोलों में बालपन के उसी उल्हास का उल्लेख मिलता है। इसका चित्रण भी एक बालगीत के समान उतना ही सादगी एवं चंचलता से भरा हुआ है। यहाँ तक कि इस नृत्य में पार्श्व नर्तक भी बच्चें ही हैं। उत्तम सिंग के संगीत पर इस गीत को लता मंगेशकर एवं उदित नारायण ने गाया है।

अब के सावन – शुभा मुद्गल (१९९९)

यह गीत किसी चित्रपट का नहीं है। किन्तु इस गीत में वर्षा का उत्सव मनाया गया है। इस उत्सव की भव्यता को चार चाँद लगाने का सम्पूर्ण श्रेय शुभा मुद्गल के सशक्त स्वर एवं अप्रतिम गायन शैली को जाता है।

घनन घनन – लगान (२००१)

वर्षा की प्रतीक्षा करते जनसमुदाय, विशेषतः किसान के मन के भाव को यदि किसी गीत ने पूर्ण न्याय किया है तो वह चित्रपट लगान का यही गीत है। कदाचित यह इकलौता गीत है जो वर्षा से हमारे जीवन के सांस्कृतिक एवं सामाजिक-आर्थिक संबंधों को पूर्ण सत्यता से परदे पर उतरता है। विशेष रूप से ग्रामीण भागों के किसानों, एवं अन्य गांववासियों के जीवन में वर्षा के महत्त्व को दर्शाता है। यदि आप गीत के बोल पर ध्यान केन्द्रित करें तो आप अपने समक्ष वे सभी खुशियों की कल्पना कर सकते हैं जिन्हें वर्षा अपने संग ले कर आती है। गीत के अंत में उदासी है जो मेघों के बिना बरसे ही चले जाने के कारण उत्पन्न हुई है। मुझे लोकगीतों से लगाव होने के कारण लगान का यह गीत अत्यंत भाता है।

बरसों रे मेघा – गुरु (२००७)

बरसो रे मेघा, इस गीत में दक्षिण भारतीय परिवेश में वर्षा के आनंद को सुन्दरता से चित्रित किया है। वर्षा के जल में धुले-भीगे शैल मंदिर, जल से लबालब भरे झरने तथा हरियाली से परिपूर्ण परिदृश्य मन को मोह लेते हैं। गुजरात के परिवेश में बने चित्रपट गुरु के लिए यह गीत किंचित अनुपयुक्त प्रतीत होता है। इसके पश्चात भी यह गीत मन मोह लेता है। भावनात्मक स्तर पर देखा जाए तो इस गीत में वर्षा के आते ही प्रथम प्रेम के उन्माद में सराबोर नायिका के पैर थिरकने लगते हैं। वह बेसुध नृत्य कर रही है। वह प्रेम के लिए कुछ भी करने के लिए तत्पर है।

ए. आर. रहमान के जादुई संगीत के आनंद को श्रेया घोषाल के मधुर स्वर द्विगुण कर रहे हैं।

गिव मी सम सनशाइन – ३ इडियट्स (२००९)

मुझे इस गीत के भाव अत्यंत प्रिय हैं। हमारे जीवन में सर्वाधिक आवश्यक तत्व हैं, सूर्य की किरणें एवं वर्षा। अन्य सब महत्वहीन हैं। यह गीत इस सूची के लिए भले ही उपयुक्त ना हो, किन्तु यह गीत इन सभी से कम प्रेरणादायक भी नहीं है।

अन्य लोकप्रिय वर्षा गीत कुछ इस प्रकार हैं:

रिम झिम के गीत सावन गाये – अंजाना १९६९

भीगी भीगी रातों में – अजनबी  १९७४

देखो जरा देखो बरखा की लड़ी – ये दिल्लगी १९९४

सावन बरसे तरसे दिल – दहक १९९९

मैंने इन वर्षा गीतों का चयन किस आधार पर किया?

यूँ तो बॉलीवुड के चित्रपटों में वर्षा पर आधारित ढेरों गीत हैं। उनमें अनेक ऐसे गीत हैं जिनमें वर्षा का उल्लेख है तथा दूसरी ओर कई ऐसे हैं जिन्हें वर्षा के परिवेश में तो फिल्माया गया है, किन्तु उनमें वर्षा का कहीं उल्लेख नहीं है। मैंने विशेष रूप से उन गीतों का चयन किया है जिनमें वर्षा का भावनात्मक उल्लेख किया गया है, भले ही वह एक प्रेमी की प्रेम से सराबोर भावनाएं हों अथवा वर्षा की प्रतीक्षा करते एक किसान की तरसती आँखों की भावनाएं। मैंने उन गीतों को अधिक महत्त्व दिया है जहां गीत के बोलों द्वारा दर्शाए गए भाव में वर्षा की महत्वपूर्ण भूमिका है। इनमें मेरी निजी रूचि भी सम्मिलित है।

और पढ़ें: बॉलीवुड के प्रसिद्ध हिन्दी गीतों में भारतीय स्मारकों का उल्लेख

बॉलीवुड में अनेक लोकप्रिय गीत ऐसे हैं जो वर्षा के परिवेश में चित्रित हैं तथा बॉलीवुड के इतिहास में अमर हो गए हैं। जैसे श्री ४२० का ‘प्यार हुआ इकरार हुआ’, तथा चालबाज का ‘ना जाने कहाँ से आई है’ इत्यादि। किन्तु उनमें वर्षा का उल्लेख नहीं है। अतः मैंने उन्हें इस सूची में सम्मिलित नहीं किया है।

इंडीटेल के पाठकों द्वारा प्रस्तावित

लपक झपक तु आ रे बदरवा – बूट पॉलिश (१९५३)

इनके अतिरिक्त यदि आपका कोई प्रिय बॉलीवुड गीत है, जिसमें वर्षा का सुन्दर उल्लेख किया गया है, तो टिप्पणी खंड में लिखकर हमें अवश्य सूचित करें।

अमेज़न के सहयोगी होने के कारण इंडीटेल उनके चयनित क्रय से अर्जित मूल्य में भागीदार है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post बॉलीवुड से २० सर्वोत्तम वर्षा गीत appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/varsha-geet-bollywood/feed/ 0 2778
भारतीय रेल का इतिहास – भारतीय रेल के अनंत रुपनगुडी से एक चर्चा https://inditales.com/hindi/bhartiya-rail-ka-itihasa/ https://inditales.com/hindi/bhartiya-rail-ka-itihasa/#respond Wed, 06 Apr 2022 02:30:30 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2637

अनुराधा गोयल: आज हम भारतीय रेल की यात्रा पर निकल रहे हैं। यह वास्तव में भारतीय रेलों की यात्रा है जिनके द्वारा मेरे जैसे असंख्य यात्रियों की अनेक यात्राएं पूर्ण हुई हैं। भारतीय रेलों की स्थापना से आज तक की यात्रा पर हमें ले चलने के लिए आज हमारे साथ हैं श्री अनंत जी, जो […]

The post भारतीय रेल का इतिहास – भारतीय रेल के अनंत रुपनगुडी से एक चर्चा appeared first on Inditales.

]]>

अनुराधा गोयल: आज हम भारतीय रेल की यात्रा पर निकल रहे हैं। यह वास्तव में भारतीय रेलों की यात्रा है जिनके द्वारा मेरे जैसे असंख्य यात्रियों की अनेक यात्राएं पूर्ण हुई हैं। भारतीय रेलों की स्थापना से आज तक की यात्रा पर हमें ले चलने के लिए आज हमारे साथ हैं श्री अनंत जी, जो भारतीय रेलवे में वरिष्ठ मंडल वित्त प्रबंधक हैं। उनसे मेरा परिचय ट्विट्टर के माध्यम से हुआ था जहाँ वे भारतीय रेलों की मनमोहन चित्र साझा करते हैं। साथ ही वे भारतीय रेलों के इतिहास एवं धरोहर से सम्बंधित रोचक जानकारियाँ भी साझा करते हैं। इसी से प्रभावित होकर मैंने उन्हें डीटूर्स में आमंत्रित किया है ताकि भारतीय रेलों के विषय में उनके रोचक एवं महत्वपूर्ण ज्ञान के भण्डार का आनंद आप भी उठा सकें।

श्री आर अनंत: डीटूर्स में मुझे आमंत्रित करने के लिए धन्यवाद।

प्राचीनतम भारतीय रेल मार्ग

अनुराधा: अनंत जी, डीटूर्स में आज की इस चर्चा का आरम्भ भारतीय रेलवे के इतिहास से करते हैं। आज भारतीय रेलों का संजाल अत्यंत सुदृढ़ एवं विशाल है किन्तु भारत में प्रारंभिक रेल सेवायें छोटे छोटे टुकड़ों में अस्तित्व में आयी थीं जिनका श्रेय उस काल के राजाओं एवं देशभक्तों को जाता है। मुझे भारत के प्राचीनतम रेल मार्गों के विषय में जानने की उत्सुकता है। कृपया इस विषय में हमें कुछ जानकारी दें।

अनंत: भारत में सर्वाधिक प्राचीन रेल मार्ग ‘ग्रेट इंडियन पेनिन्सुलर रेलवे’ द्वारा निर्मित है जो भारत में रेल मार्गों का निर्माण करने वाली प्रथम संस्था थी। इसने सर्वप्रथम बोरी बन्दर (जो आज छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस कहलाता है) से ठाणे तक, लगभग ३२ किलोमीटर लम्बे रेल मार्ग का निर्माण किया था। इस रेल मार्ग पर प्रथम सेवा १६ अप्रैल, १८५३ के दिन आरम्भ हुई थी। दूसरा रेल मार्ग ईस्ट इंडिया हावड़ा तथा हुगली के मध्य बनाया गया था जिस पर १५ अगस्त, १८५४ के दिन प्रथम सेवा आरम्भ हुई थी। पूर्वी भारतीय रेलवे के द्रुतगामी प्रसार का एक प्रमुख कारण यह भी था कि भारत के ये भाग विस्तृत मैदानी क्षेत्र थे जिन पर वे आसानी से रेल पटरियां बिछाते गए। वे हर संभव नदियों के एक ओर पर ही पटरियां बिछाते थे ताकि नदियों को पार करने के लिए सेतु ना बनाना पड़े तथा पटरियां शीध्र ही बिछ जाएँ। किन्तु भारत के पश्चिमी भागों में घाटों एवं पर्वत श्रृंखलाओं को पार करना आवश्यक था। इसी कारण इंडियन पेनिन्सुलर रेलवे मार्ग लगभग १८६० में पुणे पहुँच सकी।

पूर्वी भारतीय रेलवे का आरम्भ इससे पूर्व ही हो सकता था किन्तु दो घटनाएँ ऐसी घटीं जिनसे इसकी स्थापना में बाधाएं आयीं। एक घटना थी, रेलगाड़ी के इंजनों को लाने वाला जहाज पथभ्रष्ट होकर ऑस्ट्रेलिया चला गया था। दूसरी घटना यह थी कि रेलगाड़ी के डब्बों को लाने वाला एक अन्य जहाज कलकत्ता बंदरगाह के निकट स्थित सैंडहेड्स के समीप डूब गया था। इंजनों को ऑस्ट्रेलिया से वापिस भारत लाने में कई मास लग गए। वहीं रेल के डब्बों को भारत में ही बनाया गया। इसी कारण हावड़ा से रेल का आरम्भ करने में एक वर्ष का विलम्ब हो गया था।

अनुराधा: जी हाँ, यदि ये दुर्घटनाएं ना हुई होतीं तो प्रथम रेल मार्ग कदाचित कलकत्ता में होता।

अनंत: संभव है। प्रारंभ में इन दोनों रेल मार्गों की स्थापना के मध्य अधिक समयावधि नहीं थी। कुछ दिवसों का ही अंतर था। कदाचित दोनों सेवायें एक साथ ही आरम्भ हो सकती थीं। वास्तव में, दोनों रेल मार्गों के निर्माता भिन्न थे तथा उनके मध्य प्रतिस्पर्धा की भावना थी कि कौन सर्वप्रथम भारत में रेल मार्ग की स्थापना करेगा।

भारतीय रेल सेवा का प्रथम निर्मित स्थानक

छोटी पटरी की भारतीय रेल
छोटी पटरी की भारतीय रेल

अनुराधा: इन दोनों के पश्चात अन्य मुख्य रेल मार्ग कहाँ निर्मित किये गए थे?

अनंत: इनके पश्चात, मद्रास में सन् १८५६ में, रोयापुरम से वलाजह मार्ग के मध्य रेल मार्ग बिछाया गया था जो ७०-८० किलोमीटर की दूरी तय करता था। इस मार्ग की एक विशेषता यह थी कि रोयापुरम से रेल सेवा आरम्भ होने से पूर्व ही रेल स्थानक की सम्पूर्ण इमारत का निर्माण कर दिया गया था। अतः रोयापुरम भारतीय प्रायद्वीप का प्रथम रेल स्थानक बना। यहाँ तक कि, यह सम्पूर्ण एशिया महाद्वीप में स्थित प्राचीनतम रेल स्थानकों में से एक है।

और पढ़ें: मुंबई का छत्रपति शिवाजी टर्मिनस – एक विश्व धरोहर

भारत का प्रथम स्थाई रेलवे स्थानक रोयापुरम में बनाया गया था जबकि बोरीबंदर एवं हावड़ा में शेड के रूप में अस्थाई स्थानक थे। रोयापुरम के प्राचीन स्थानक की इमारत अब भी खड़ी है। संरक्षण के कुछ सफल प्रयासों के पश्चात यह इमारत अब अपेक्षाकृत उत्तम स्थिति में है। मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनस का निर्माण सन् १८८८ में किया गया जबकि हावड़ा स्थानक १९वीं शताब्दी के अंत में बना था। हावड़ा स्थानक छत्रपति शिवाजी टर्मिनस से अपेक्षाकृत अधिक विशाल है। छत्रपति शिवाजी टर्मिनस का निर्माण एक प्रशासनिक कार्यालय के रूप में किया था जिसके भीतर ग्रेट इंडियन पेनिन्सुलर रेलवे का मुख्यालय था। रेल स्थानक इस इमारत का केवल एक अतिरिक्त भाग था।

भारत में रेलवे का विस्तार

अनुराधा: कलकत्ता, मद्रास एवं मुंबई तीन ऐसे नगर थे जिन पर अंग्रेजों का विशेष रूप से ध्यान केन्द्रित था। अतः, वहां रेल मार्ग तथा स्थानकों का निर्माण स्वाभाविक था। किन्तु भारत के अन्य क्षेत्रों में रेल सेवायें कैसे आरम्भ हुईं?

अनंत: इन तीन नगरों के पश्चात भारत के लगभग सभी क्षेत्रों में निर्माण कार्य आरम्भ हो गया था। पूर्वी भारतीय रेलवे का विस्तार अत्यंत शीघ्रता से होने लगा। १८५० के दशक में लाहोर के आसपास पंजाब-सिंध रेलवे का आगमन हुआ। सन् १८६६ में कलकत्ता से आने वाले रेल मार्ग को दिल्ली तक लाया गया। यहाँ तीन प्राचीनतम रेलवे सेतु हैं जिनके द्वारा रेलगाड़ियां नदियों को पार करती हैं। पहली आर्रा के निकट है जो सोन नदी के ऊपर निर्मित है। अन्य दो सेतु प्रयागराज एवं दिल्ली में यमुना नदी के ऊपर स्थित हैं। कलकत्ता एवं दिल्ली के मध्य स्थित तीनों प्रमुख सेतु हैं क्योंकि इनमें से प्रत्येक लगभग आधा किलोमीटर लंबा है।

अनुराधा: इस जानकारी से मेरे मस्तिष्क में एक प्रश्न उभर रहा है। रेलवे के विस्तार के लिए अनेक रियासतें भी निधि का योगदान कर रही थीं। क्या आप उनके विषय में कुछ बताएँगे?

रेलवे प्रकल्प हेतु निधि का योगदान करती रियासतें

अनंत: प्रथम रियासत जिसने इस प्रकल्प में रूचि दर्शाई थी, वह है वड़ोदरा के गायकवाड़। उन्होंने रेल मार्ग का निर्माण इसलिए करवाया था क्योंकि सन् १८६१ में अमेरिकी गृह युद्ध छिड़ गया था जिसके कारण अमेरिका से ब्रिटेन के लिए कपास की आपूर्ति बाधित हो रही थी। बड़ोदा क्षेत्र में कपास की भरपूर खेती होती थी। इस स्थिति का लाभ उठाते हुए वहां के किसान बड़ोदा से इंग्लॅण्ड तक कपास का निर्यात कर धनार्जन करना चाहते थे। किन्तु बड़ोदा से सूरत बंदरगाह तक कपास पहुँचाने के लिए उनके पास त्वरित परिवहन सेवा का अभाव था। इसी कारण उन्होंने रेल सेवा आरम्भ करने का निश्चय किया। सर्वप्रथम उन्होंने छोटे गेज की रेल पटरियां बिछवाईं क्योंकि चौड़े गेज की सेवा लागत अधिक थी। वैसे भी कपास भार में अत्यंत हल्का होने के कारण छोटे गेज की रेल पटरियों द्वारा आसानी से ढोया जा सकता था।

मुंबई के चर्चगेट स्टेशन में पश्चिमी रेलवे धरोहर संग्रहालय है। यहाँ एक रोचक चित्र है जिसमें बैल कपास से भरे रेल के दो डिब्बों को रेल की पटरी पर खींच रहे हैं। इस चित्र से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि गायकवाड़ वंश इस रेल सेवा को शीघ्र से शीघ्र आरम्भ करने के लिए आतुर थे क्योंकि वे सन् १८६३ में प्रवेश कर चुके थे। इंग्लॅण्ड से मंगाया इंजिन तब तक पहुंचा नहीं था। पटरियों की चौड़ाई एवं इंजिन के मापदंडों में भिन्नता थी जिसके चलते उनके निर्माण में विलम्ब हो रहा था। रेल के डिब्बों का निर्माण गायकवाड़ों ने स्वयं ही कर लिया। उन डिब्बों को हांकने के लिये इंजन के स्थान पर उन्होंने बैलों का प्रयोग किया. वे उसे बैल रेल गाड़ी कहते थे.

परिवहन – व्यापार का महत्वपूर्ण अंग

अनुराधा: जुगाड़ आविष्कार का यह एक रोचक उदहारण है। गुजरात के दाभोई में मैंने रेलवे संग्रहालय देखा था जहां इस रेल सेवा पर विशेष आलेख उपलब्ध हैं।

अनंत: गुजरातियों की व्यावसायिक समझ अत्यंत गूढ़ है। गायकवाड़ों के पश्चात, १८७० के दशक में निजाम ने तथा १८८० के दशक में मैसूर के महाराजा ने भी उनकी रेल सेवायें आरम्भ कीं।

अनुराधा: मुझे स्मरण है, हैदराबाद से अजमेर तक का रेल मार्ग दीर्घ काल तक सबसे लम्बा रेल यात्रा मार्ग था।

अनंत: जी हाँ। हैदराबाद के निजाम ने मीटर गेज की रेल पटरियां बिछवाई थीं। यह रेल मार्ग हैदराबाद से आरम्भ होकर मध्यप्रदेश के खंडवा तक था। वहां से यह होलकरों के रेल मार्ग से जुड़ जाता था जो इंदौर के मऊ से होकर जाता था। वहां से उत्तर प्रदेश के महोबा होते हुए राजस्थान में अजमेर के मीटर गेज मार्ग से जुड़ जाता था।

रेलवे गेज

अनुराधा: विभिन्न समूहों ने अपने निजी आवश्यकताओं के अनुसार भिन्न भिन्न रेल सेवायें आरम्भ की थीं। उनके मापदंड भी उन्होंने स्वयं निर्धारित किये थे, जैसे छोटे गेज व मीटर गेज आदि। इन्ही विसंगतियों को दूर कर उन्हें एक मापदंड पर लाने का विशाल कार्य अब भारतीय रेलवे कर रहा है ताकि भारतीय रेलों का सम्पूर्ण संजाल एकसार हो सके।

अनंत: जी हाँ। हम जैसे जैसे प्रगति करते हैं, हमारे दूरसंचार, परिवहन, मनोरंजन, पर्यटन इत्यादि आवश्यकताओं में भी तेजी से वृद्धि होने लगती है। भिन्न भिन्न गेजों की पटरियों का संजाल जन व माल दोनों के सुगम परिवहन में बाधा उत्पन्न कर रहा था। भारतीय रेल सेवा मुख्यतः मालवाहक भाड़े पर ही निर्वाह करती है। भारतीय रेलों का लगभग ६३-६४% राजस्व मालभाड़े से तथा लगभग ३०% राजस्व जनमानस परिवहन से प्राप्त होता है। विभिन्न गेजों की एक रेलगाड़ी से दूसरी रेलगाड़ी में माल उतारने व चढ़ाने में परिवहन लागत व समय दोनों की हानि होती है।

मधुर स्मृतियाँ

भारतीय रेल का आनंद लेते हुए
भारतीय रेल का आनंद लेते हुए

अनुराधा: मैं जब विद्यार्थी थी, तब मैंने चंडीगढ़ से औरंगाबाद तक अनेक यात्राएं की थीं। उस समय इस गेज भिन्नता के कारण मुझे मनमाड़ में ट्रेन बदलनी पड़ती थी। मनमाड़ में मुझे कई घंटे प्रतीक्षा करनी पड़ती थी।

अनंत: जी। मुझे भी स्मरण है, जब मेरे पिता आसाम में दीमापुर के निकट कार्यरत थे, तब दक्षिण भारत में आने के लिए हमें इसी कारणवश बुगनेगाँव में ट्रेन बदलनी पड़ती थी। उस काल में भारत में चौड़े, मीटर तथा छोटे, तीनों प्रकार के गेज चलन में थे।

दाभोई, वड़ोदरा में स्थित गायकवाड़ों के छोटे गेज संग्रहालय के समान नागपुर में भी छोटे गेज का संग्रहालय है क्योंकि नागपुर-छत्तीसगढ़ रेलवे भी १८७० के दशक में निर्मित एक छोटी गेज की रेलवे थी। १८६० तथा १८७० के दशकों में मध्य भारत में अकाल की स्थिति थी जिसके कारण जीवन व आजीविका के साधनों को भीषण क्षति पहुंची थी। इसके पश्चात ब्रिटिश सरकार के मध्य प्रांत ने एक रेलवे संस्था की स्थापना की ताकि अकाल पीड़ित क्षेत्रों में तत्काल अनाज पहुँचाया जा सके। कठोर वित्तीय प्रतिबंधों के चलते उन्होंने भी छोटे गेज की रेल सेवा का चुनाव किया था।

रेलवे गेज का मूल्य

अनुराधा: क्या छोटी गेज की पटरियों का मूल्य कम होता है?

अनंत: जी। उसका मूल्य बड़ी गेज की पटरियों से लगभग एक तिहाई होता है। लागत, भूमि तथा कई अन्य घटक होते हैं जिन पर यह निर्भर करता है। इसके निर्माण में समय भी कम लगता है। यदि माल-परिवहन का भार कम हो तो यह अधिक लाभकारी होता था।

नागपुर से जबलपुर तक छोटी गेज का लम्बा रेल मार्ग था जो छिंदवाड़ा तथा सिवनी होकर जाता था। आज सड़कें इतनी सुगम हो गयी हैं कि गाड़ी चलाकर चार घंटों में ही नागपुर से जबलपुर तक पहुँच जाते हैं, जबकि उन दिनों छोटी गेज की रेलगाड़ी से सम्पूर्ण रात्रि यात्रा करनी पड़ती थी।

पर्वतीय रेल सेवा का आरम्भ

अनुराधा: भारत के पर्वतीय क्षेत्रों, जैसे दार्जिलिंग, कालका-शिमला तथा नीलगिरी में अप्रतिम हिमालयीन एवं पर्वतीय रेलवे सेवायें भी हैं। वे यूनेस्को द्वारा घोषित विश्व धरोहर भी हैं। क्या आप उनके विषय में कुछ बताएँगे?

अनंत: पर्वतीय रेलवे सेवाओं में सर्वप्रथम रेल सेवा दार्जिलिंग में १८८० के दशक में आरम्भ की गयी थी। दार्जिलिंग के पर्वतीय क्षेत्रों में तीव्र ढलान पर चढ़ने के लिए गोलाकार मार्ग के स्थान पर अत्यंत वक्रीय मार्ग का प्रयोग किया गया है। ढलान पर चढ़ने के लिए यह एक अद्वितीय उपाय सिद्ध हुआ था।

अनुराधा: घूम गोलमार्ग भी एक प्रमुख आविष्कार है।

घूम/ बतासिया लूप का आविष्कार

घूम संग्रहालय में पुराना इंजन
घूम संग्रहालय में पुराना इंजन

अनंत:  घूम गोलमार्ग अथवा बतासिया लूप/गोलमार्ग एक आविष्कार ही है क्योंकि उस स्थान पर रेल को वापिस मुड़ना था। कुछ समय पूर्व तक वहां पर बाजार भरता था। अब उसे एक सुन्दर पर्यटन स्थल में परिवर्तित कर दिया गया है।

अनुराधा: मैं कुछ ३-४ वर्षों पूर्व दार्जिलिंग गयी थी। मैंने तब भी देखा था कि रेलगाड़ी के जाने के पश्चात लोग रेल की पटरियों पर ही अपनी दुकानें सजा लेते थे तथा रेलगाड़ी के आने का समय होते ही वहां से हट जाते थे । वह दृश्य मेरे लिए अत्यंत रोचक था।

अनंत: मैं गत वर्ष ही वहां गया था। घूम गोलमार्ग पर अब एक युद्ध स्मारक स्थापित किया गया है जिसके चारों ओर सुन्दर बाग बनाये गए हैं। वहां अब पटरियों पर कोई बाजार नहीं भरता है। उनके लिए व्यवस्थित दुकानें उपलब्ध कराई गयी हैं। घूम में एक सुन्दर रेल संग्रहालय भी है। उसमें दार्जिलिंग पर्वतीय रेलवे के अवशेषों को संरक्षित कर प्रदर्शित किया गया है, जैसे संकेत कंदील तथा अन्य यंत्र, जिनका प्रयोग उनमें किया जाता था। घूम संग्रहालय केवल कक्ष के भीतर ही नहीं है, अपितु बाहर भी छोटे गेज की रेलगाड़ी के कुछ पूर्वकालीन डिब्बे हैं जो अब उपयोगी नहीं हैं। कुछ पुराने इंजन भी हैं जिन्हें कक्ष के बाहर, शेड के नीचे रखा गया है।

रेलगाड़ी की पूर्वकालीन स्मृतियाँ

अनुराधा: दार्जिलिंग हिमालयन रेल में यात्रा करते हुए मैं प्राचीन काल में पहुँच गयी थी तथा कल्पना के विश्व में खो गयी थी। मैं अनुमान लगा सकती कि प्राचीन काल में रेल सेवा कैसी रही होगी। मैं प्राचीनकाल का सम्पूर्ण दृश्य अपने नैनों के समक्ष चित्रित कर रही थी। यह सत्य मुझे आज भी अचरज में डाल देता है कि १५० वर्षों पूर्व हमारे देश में रेलों का तंत्र विकसित हो गया था।

अनंत: सत्य कहा आपने। घूम रेलवे संग्रहालय में मार्क ट्वेन का एक रोचक आलेख है, “A journey of Darjeeling” जिनमें दार्जिलिंग हिमालयन रेल के सन्दर्भ में उनके द्वारा व्यक्त किये विचार हैं।

दार्जिलिंग हिमालयन रेल के पश्चात शिमला एवं ऊटी में क्रमशः सन् १९०३ तथा १९०८ में रेलवे सेवा आरम्भ हुई। शिमला को रेलवे सेवा द्वारा मुख्य धारा से जोड़ने का प्रमुख कारण था, प्रशासनिक तंत्र को शिमला तक सुगमता से पहुँचाना। इस ट्रेन का नाम रखा, कालका मेल। उस समय कलकत्ता देश की राजधानी थी। यह रेल सेवा हावड़ा को कालका से जोड़ती थी। यह पूर्वी भारतीय रेलवे के अंतर्गत प्राचीनतम रेल सेवाओं में से एक थी। वाईसराय अपने विशेष डिब्बे में बैठकर इस ट्रेन के द्वारा हावड़ा से कालका पहुँचते थे। वहां से अपने विशेष कक्ष में बैठकर शिमला तक जाते थे।

रैक एवं पिनियन का आविष्कार

रैक एवं पिनियन का प्रयोग वृत्तीय गति को रैखिक गति में या रैखिक गति को वृत्तीय गति में बदलने के लिए किया जाता है। ऊटी में रैक एवं पिनियन का आविष्कार अत्यंत कारगर सिद्ध हुआ। इस तकनीक से पर्वतीय क्षेत्र में चढ़ते समय, ट्रेन को उल्टी ढलान पर पीछे की ओर सरकने के रोकने में महत्वपूर्ण सफलता मिली थी। इसके प्रयोग से मेट्टूपलायम से निलगिरी तक की मनोरम यात्रा अत्यंत सुगम हो पायी। चौथी पर्वतीय रेल सेवा मुंबई के निकट माथेरान में स्थापित की गयी। सन् १९०७ में स्थापित यह छोटी दूरी की रेल सेवा लगभग १६-१८ किलोमीटर लम्बी थी जो नेरल एवं माथेरान के मध्य आरम्भ की गयी थी। यह एक पारसी व्यापारी द्वारा आरम्भ की गयी एक निजी रेल सेवा थी। अब यह ट्रेन अमन लॉज से माथेरान के मध्य चलती है।

इस सूची की अंतिम पर्वतीय रेल सेवा स्वतंत्रता के पश्चात अस्तित्व में आयी, जो है कांगड़ा घाटी रेलवे। इसकी आधार शिला लाल बहादुर शास्त्रीजी तथा उस समय के रेल मंत्री ने रखी थी। १९५० के दशक में यह सेवा आरम्भ हुई। यह पठानकोट से पालमपुर होते हुए जोगिंदरनगर जाती है। यह सर्वाधिक मनोरम दृश्यों से युक्त रेलवे में से एक है क्योंकि यह कांगड़ा घाटी से होकर जाती है।

इस प्रकार आरंभिक काल में भारत में स्थापित रेलवे सेवा को हम इन खण्डों में बाँट सकते हैं, निजी कंपनियों द्वारा स्थापित रेल सेवा, सरकारी तंत्रों द्वारा संचालित रेल सेवा, रियासतों द्वारा  हयोंकियुक्त रेलवे में से एक है स्थापित रेल सेवा तथा पर्वतीय रेल सेवा। प्रत्येक खण्डों के अंतर्गत आती रेल सेवाओं की अपनी विशेषताएं थीं। ये सभी रेल सेवायें भारत की धरोहर हैं।

भारत की अखंडता का प्रतीक, भारतीय रेल

अनुराधा: सम्पूर्ण भारत में भिन्न भिन्न अंकुरों के समान स्फुरित विभिन्न रेल सेवाएँ अब सम्पूर्ण देश को एक व अखंड बनाती एकल, विशाल व सशक्त रेल सेवा में परिवर्तित हो गयी हैं। इसे देख आनंद मिश्रित अचरज होता है।

अनंत: सही कहा। इस महत्वपूर्ण धरोहर का आरम्भ मूलतः सैन्य प्रयोजनों में प्रयुक्त वस्त्रों के परिवहन तथा विदेशों में निर्यात होते कच्चे माल को बंदरगाह तक पहुँचाने के लिए किया गया था।

अनुराधा: अंततः व्यापार ही इस सेवा के आरम्भ का मूल संचालक था।

अनंत: सत्य तो यह है कि ब्रिटिश सरकार द्वारा इसका आरम्भ मूलतः भारत की संपत्ति को ब्रिटेन ले जाने के लिए किया गया था। डॉक्टर शशी थरूर ने भी अपनी पुस्तक में इसका उल्लेख किया है। यह एक भिन्न सत्य है कि इसका लाभ भारतीयों को भी प्राप्त हुआ है।

अनुराधा: जी हाँ। यह एक ऐसा विवाद है जो जारी रहेगा। किन्तु आज यह सत्य है कि भारतीय रेल हम भारतीयों के जीवन का एक अभिन्न अंग है। यह हम भारतीयों की जीवन रेखा है। ८०-९० के दशकों में पले -बढ़े हम भारतीयों के लिए यह किसी स्वप्निल यात्रा से कम नहीं है। लम्बी दूरी की यात्रा की कुछ अप्रतिम स्मृतियाँ हम सब के पास होंगी। भारतीय रेलवे के बिना भारत एवं हम भारतीयों के जीवन की कल्पना असंभव है।

रेल पर्यटन एवं रेलवे संजाल की स्थापना

अनंत: सत्य है। रेल की पटरियां कैसे बिछाई जाती हैं, उनका संजाल कैसे रेखांकित किया जाता है, उन्हें कैसे संचालित किया जाता है, ये सब भी एक अत्यंत रोचक है। इसके अतिरिक्त भारतीय रेलवे का इतिहास दर्शाते अनेक रेलवे संग्रहालय हैं जिनकी अपनी अपनी विशेषताएं हैं। एक अन्य महत्वपूर्ण विषय है, भारत में पर्यटन के अंतर्गत रेलवे पर्यटन का विशेष अस्तित्व एवं महत्त्व। एक स्वतन्त्र अस्तित्व के रूप में रेलवे पर्यटन को कैसे विकसित किया जा सकता है, यह भी एक आवश्यक व महत्वपूर्ण विषय है।

अनुराधा: मेरे पास भी इनसे सम्बंधित अनेक प्रश्न अब भी शेष है। मुझे अनुमति दीजिये कि उन प्रश्नों को आपके समक्ष रखने के लिए मैं आपको पुनः आमंत्रित कर सकूं ताकि आप हमें पुनः भारतीय रेलवे के इतिहास एवं धरोहरों के अद्भुत विश्व का भ्रमण कराएँ। भारतीय रेलवे एवं इसकी धरोहर के विषय में अवगत कराते हुए इतिहास की इतनी अप्रतिम यात्रा के लिए आपका हृदयपूर्वक आभार तथा धन्यवाद।

श्री अनंत जी से सफल संवाद के पश्चात मैं अपने पाठकों से कहना चाहती हूँ कि यदि वे अनंत जी से कुछ जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं अथवा प्रश्न करना चाहते हैं या रेलवे से सम्बंधित कुछ सुझाव देना चाहते हैं तो टिप्पणी खंड के द्वारा हमें सूचित करें। वे रेलवे प्रशासन में ऐसे पद पर कार्यरत है जो सम्बंधित व्यक्तियों के समक्ष आपकी आवश्यकताएं रख सकते हैं।

लिखित प्रतिलिपि: IndiTales Internship Program के अंतर्गत निकिता चंदोला ने तैयार की है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post भारतीय रेल का इतिहास – भारतीय रेल के अनंत रुपनगुडी से एक चर्चा appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/bhartiya-rail-ka-itihasa/feed/ 0 2637
प्राचीन भारत में यात्राएं कैसे करते थे लोग? -सुमेधा वर्मा ओझा https://inditales.com/hindi/prachin-bharat-mein-yatrayen-varta/ https://inditales.com/hindi/prachin-bharat-mein-yatrayen-varta/#comments Wed, 14 Jul 2021 02:30:50 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2348

अनुराधा: नमस्ते। आज हमसे चर्चा करने के लिए हमारे साथ है, सुश्री सुमेधा वर्मा ओझा जी । सुमेधा जी एक भूतपूर्व भारतीय राजस्व सेवा अधिकारी हैं। अतः उन्हें अर्थव्यवस्था, कर इत्यादि में तो निपुणता प्राप्त है ही, साथ ही भारतीय साहित्य में भी उनकी विशेष रूचि है। उन्होंने वाल्मीकि रामायण का अनुवाद किया है। ‘उर्नभी’ […]

The post प्राचीन भारत में यात्राएं कैसे करते थे लोग? -सुमेधा वर्मा ओझा appeared first on Inditales.

]]>

अनुराधा: नमस्ते। आज हमसे चर्चा करने के लिए हमारे साथ है, सुश्री सुमेधा वर्मा ओझा जी । सुमेधा जी एक भूतपूर्व भारतीय राजस्व सेवा अधिकारी हैं। अतः उन्हें अर्थव्यवस्था, कर इत्यादि में तो निपुणता प्राप्त है ही, साथ ही भारतीय साहित्य में भी उनकी विशेष रूचि है। उन्होंने वाल्मीकि रामायण का अनुवाद किया है। ‘उर्नभी’ नामक एक रोमांचकारी जासूसी उपस्यास भी लिखा है जो मौर्य काल पर आधारित है। यह उपन्यास हमें उस काल का स्मरण करता है जब आचार्य चाणक्य मौर्य साम्राज्य की स्थापना कर रहे थे। मुझे यह उपन्यास इतना भाया है कि मैं इसके आगामी संस्करण की आतुरता से प्रतीक्षा कर रही हूँ। हमारी आज की चर्चा भी कुछ इसी विषय से जुड़ी हुई है। हमारी चर्चा का विषय है- प्राचीन भारत में यात्राएं। आज हम यह जानने का प्रयास करेंगे कि प्राचीन काल में भारत में यात्राएं किस प्रकार से की जाती थीं।

प्राचीन भारत में यात्राएं

अनुराधा: सुमेधाजी, प्राचीन इतिहास में आपकी विशेष रूचि है, वहीं मेरी रूचि भ्रमण करने में है। स्पष्ट है कि हमारे मार्गों का संगम वहां होता है जहां इन दोनों विषयों का संगम होता है। अर्थात् जब हम प्राचीन भारत में भ्रमण के विषय में चर्चा करते हैं। प्राचीन भारत में लोग किस प्रकार यात्राएं करते थे? वर्तमान में हमारे पास एक सम्पूर्ण पर्यटन एवं आतिथ्य उद्योग है जो अवकाश एवं आनंद यात्राओं पर आधारित है। अनेक यात्री अपने व्यवसाय एवं व्यापार संबंधी कारणों से भी यात्राएं करते हैं। कुछ अन्य कारणों से यात्राएं करते हैं। किन्तु सम्पूर्ण पर्यटन एवं आतिथ्य उद्योग अंततः अवकाश एवं आनंद यात्राओं पर ही फलता-फूलता है।

मैं यह जानना चाहती हूँ कि प्राचीन भारत में लोग किन प्रमुख कारणों से यात्राएं करते थे?

सुमेधा: अनुराधाजी, मुझे चर्चा के इस सत्र में आमंत्रित करने के लिए आपको ह्रदय पूर्वक धन्यवाद। मैं विश्वास दिलाती हूँ कि यह चर्चा अत्यंत रोचक रहेगी। आपने पूछा है कि प्राचीन भारत में लोग किन प्रमुख कारणों से यात्राएं करते थे?  मानवों ने यात्राएं आरम्भ की क्योंकि अस्तित्व के लिए यात्रा को सहचरी बनाना आवश्यक था। स्थानान्तर्गमन प्राचीन काल में यात्रा करने का प्रथम कारण था। लोग भिन्न भिन्न स्थानों में स्थानांतरण करते थे ताकि उन्हें वास करने के लिए श्रेष्ठतर स्थान प्राप्त हो सके अथवा श्रेष्ठतर संसाधनों की प्राप्ति हो सके। प्रश्न यह उठता है कि जब मानवजाति ने स्वयं को स्थापित कर लिया, तब उन्हें यात्रा करने की क्या आवश्यकता प्रतीत हुई? इसका प्रथम कारण था, व्यापार। आरम्भ में व्यापार केवल आसपास के लोगों से किया जाता था। कालान्तर में वही व्यापार दूर-सुदूर स्थित लोगों के साथ भी किया जाने लगा। समय के साथ परिवहन के साधनों, सड़क तंत्र तथा आश्रय स्थलों इत्यादि के आगमन से सम्पूर्ण प्रणाली अत्यंत जटिल होती गयी।

यात्रा करने का एक अन्य कारण था, अतिक्रमण, युद्ध, प्रभुता स्थापित करने जैसी मूल मानवी प्रकृति। प्राचीन काल में यह भावना अधिक प्रबल होती थी। अतः नवीन मार्गों के तंत्र स्थापित किया जाते थे ताकि सेना के मार्ग में कोई रूकावट ना आये, अन्य प्रदेशों पर विजय प्राप्त करने जा रहे सैनिकों का मार्ग प्रशस्त हो अथवा नवीन संसाधनों को प्राप्त करने के मार्ग खुल सकें। कभी उनके प्रयोजन हितकारी होते थे तो कभी उसके विपरीत। किन्तु सत्य यही है कि इसी प्रकार विशाल देश एवं राष्ट्रीय प्रणालियाँ अस्तित्व में आयीं।

तीर्थ यात्राएं

प्राचीन काल में यात्राएं करने का एक अन्य कारण था, तीर्थ यात्राएं। लोग भिन्न भिन्न तीर्थ स्थलों के दर्शन करने हेतु यात्राएं करते थे। तीर्थ यात्राओं की पृष्ठभूमि में अत्यंत जटिल तथा बहुआयामी मान्यताएं होती हैं। एक ओर तीर्थस्थल धार्मिक मान्यताओं के धरातल पर अत्यंत महत्वपूर्ण होते थे। दूसरी ओर लोग ज्ञान अर्जित करने की आकांशा से भी इस स्थलों की यात्राएं करते थे। लोग एक आश्रम से दूसरे आश्रम तक, एक ऋषि से दूसरे ऋषि तक भ्रमण करते रहते थे ताकि ज्ञान अर्जित कर सकें, साथ ही अपने ज्ञान की पुष्टि कर सकें अथवा स्वयं द्वारा रचित ग्रंथों पर समकक्षों के विचार जान सकें। ये आश्रम अधिकांशतः अत्यंत दुर्गम स्थानों पर होते थे। नगरों की चहल-पहल से दूर, आश्रम बहुधा वनों में अथवा किसी नदी के तट पर स्थित होते थे।

मेरे उपरोक्त उल्लेख का यह तात्पर्य नहीं है कि प्राचीन भारत एक अत्यंत गंभीर स्थान था। प्राचीन भारत में आनंद एवं मनोरंजन का भी भरपूर समावेश था। अतः लोग इस उद्देश्य से भी यात्राएं करते थे, जैसे नाट्य मंडली इत्यादि। नाट्य मंडलियों पर अनेक रोचक कथाएं प्रचलित हैं, जैसे, किस प्रकार लोग उनके द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान तक सन्देश पहुँचाया करते थे  अथवा खोये हुए व्यक्तियों को ढूँढने का प्रयास करते थे। उस समय अवकाश एवं आनंद पर आधारित यात्राओं की संख्या नगण्य होती थी किन्तु अभिलेखों में ऐसी यात्राओं का भी उल्लेख प्राप्त होता है। यदि आप समुद्री यात्राओं को आनंद यात्राओं के अंतर्गत मानेंगे तो अर्थशास्त्र में उनका प्राधान्यता से उल्लेख किया गया है।

अनुराधा: एक आश्रम से दूसरे आश्रम तक, इस उक्ति से ऐसा प्रतीत होता है मानो वे सामान्य जीवन से मुक्ति पाने के लिए यात्राएं करते थे।

सुमेधा: मेरा अभिप्राय अध्ययन सम्मेलनों एवं परिसंवादों से है। उस काल में प्रभावशाली व गणमान्य व्यक्ति इन विद्वानों एवं सिद्धपुरुषों को संरक्षण देते थे। दृष्टांत के लिए, राजा जनक एक अत्यंत प्रभावशाली व विद्वान राजा थे। उनके द्वारा आयोजित शास्त्रार्थ अत्यंत प्रसिद्ध थे। प्राचीन काल में विद्यार्थी गुरुकुलों एवं विश्वविद्यालयों में जाने के लिए भी यात्राएं करते थे। अतः ज्ञान अर्जन हेतु अनेक यात्राएं की जाती थीं। किन्तु, व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो यात्राओं का सबसे प्रमुख कारण व्यापार ही था। प्राचीन काल में व्यापार एवं व्यापार मार्ग एक प्रकार से राज-निकाय के धमनी एवं शिराएँ थे।

नाट्य मंडलियाँ

अनुराधा: आपने अभी नाट्य मंडलियों द्वारा की जाने वाली यात्राओं का उल्लेख किया। इसे संयोग ही कहिये कि मैंने अपने संस्करण ‘१० सर्वोत्तम व्यवसाय जो देश विदेश घुमाएं’ में प्रदर्शन कला को भी एक यात्रा संबंधी व्यवसाय के रूप में सम्मिलित किया है। प्रदर्शन कलाकारों को विश्व के दूर-सुदूर भागों में यात्रा करने का संयोग प्राप्त होता है। वे विश्व भर में यात्राएं कर अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं तथा अपनी संस्कृति के संवाहक बनते हैं। इस कल्पना मात्र से रोमांच होता है कि हम २००० वर्षों प्राचीन विरासत को आगे ले जा रहे हैं।

सुमेधा: नाट्य कलाकार, कलाबाज एवं सभी प्रकार के प्रदर्शन कलाकार ना केवल शहरी क्षेत्रों में यात्राएं करते थे, अपितु लघु अथवा ग्रामीण क्षेत्रों में भी जाते थे।

अनुराधा: प्राचीन भारत में लोग कैसे यात्राएं करते थे, यह जानकारी आपको कहाँ से प्राप्त हुई? ऐसे कौन कौन से साहित्य हैं जिनमें ऐसी जानकारी उपलब्ध है?

सुमेधा: अच्छा प्रश्न है। इस जानकारी के प्रमुख स्त्रोतों में से एक है पुरातात्विक अवशेष। प्राचीन भारत के व्यापार मार्गों पर अनेक लोगों ने गहन शोधकार्य किया है। जिन वस्तुओं का व्यापार किया जाता था, उनके अवशेषों का उन्होंने अध्ययन किया है। जिन मार्गों को व्यापार मार्ग में परिवर्तित किया था, उनका विश्लेषण किया है। अपने शोधकार्यों के आधार पर उन्होंने प्राचीन व्यापार मार्गों के जाल की एक संकल्पना प्रस्तुत की है। उसमें उन्होंने उस काल के नगरों एवं बस्तियों को दर्शाया है तथा वस्तु-विनिमय अर्थात् आदान-प्रदान की गयी वस्तुओं का भी उल्लेख किया है।

जानकारी का एक प्रमुख स्त्रोत मुद्रा शास्त्र भी है। विभिन्न पुरातात्विक स्थलों से प्राप्त मुद्राओं का शोधकर्ताओं ने गहन अध्ययन किया है। उनसे भी प्राचीन काल में प्रचलित यात्राओं एवं व्यापारों से सम्बंधित महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त हुई हैं।

अभिलेख/शिलालेख

जानकारी का तीसरा महत्वपूर्ण स्त्रोत है, अभिलेख अथवा शिलालेख। इसका एक उदहारण देना चाहती हूँ। एक समय मकरध्वज योगी नामक एक प्रसिद्ध धार्मिक एवं अध्यात्मिक गुरु थे। उनका जीवन-काल प्रथम सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व में था। उनके साथ यात्रियों एवं अनुयायियों का एक विशाल समूह था जो यात्राओं में उनके साथ चलता था। वे जहां जहां जाते, अपने एवं अपनी यात्रा के विषय में अभिलेख अवश्य छोड़ जाते थे। आज वही अभिलेख हमें भारत के कोने कोने एवं सीमावर्ती देशों के संग्रहालयों में देखने मिलते हैं। उनके अनुयायियों में अनेक स्त्रियाँ भी थीं जो उनके साथ आध्यात्मिक यात्राओं में भाग लेती थीं।

रामगढ गुफाओं से प्राप्त एक शिलालेख अत्यंत रोचक है क्योंकि लोगों ने दो प्रकार से इसकी व्याख्या की है। कुछ लोगों का मानना है कि वह विश्व का सर्वप्रथम प्रेम शिलालेख है। वहीं अन्य कुछ शोधकर्ताओं ने उसका विवेचन स्त्री यात्रियों के लिए विश्रामगृह के रूप में किया है। छत्तीसगढ़ के जोगीमारा गुफाओं से प्राप्त शिलालेख भी ऐसे ही हैं। प्रारंभ में इनका विवेचन एक नाटकशाला के रूप में किया गया था किन्तु नवयुगीन विवेचनकर्ता इसे यात्रियों का विश्रामगृह मानते हैं। इन अभिलेखों से प्राप्त सूक्ष्मतम जानकारी भी हमें प्राचीन काल के जनजीवन में झांकने का अवसर प्रदान करती है। हमें ऐसा प्रतीत होता है मानो हम प्राचीन काल के जनमानस को जानते हैं। एक इतिहासकार के लिए यह एक अत्यंत आनंद की भावना है।

हमें इस विषय में जानकारियाँ मुख्यतः संस्कृत, प्राकृत, तमिल इत्यादि भाषाओं में रचित रचनाओं से प्राप्त होती हैं। हमारे तीन प्रमुख महाकाव्य एवं महारचनाएं रामायण, महाभारत एवं बड़कहा या बडकथा हैं। राजा सातवाहन के मंत्री ‘गुणाढ्य’ द्वारा रचित ‘बड़कहा’ को संस्कृत में बृहत्कथा कहा जाता है। ईसा पूर्व ४९५ में   रची गयी बड़कहा में उस काल के समाज पर आधारित कथाएं हैं। बड़कहा से ही अधिकतर जातक कथाएं भी ली गयी हैं। अनेक जातक कथाएं जैन मुनियों एवं बौद्ध भिक्षुओं ने भी लिखी हैं। अतः जातक कथाएं भी हमारे लिए जानकारियों का महत्वपूर्ण स्त्रोत हैं।

परिवहन के साधन

अनुराधा:  मेरी दूसरी जिज्ञासा परिवहन के साधनों के विषय में है। आधुनिक काल के द्रुतमार्गों एवं महामार्गों के समान क्या प्राचीन काल में भी परिवहन के लिए उत्तम मार्ग थे? वे किस प्रकार के वाहनों का प्रयोग करते थे? वे किस प्रकार यात्राएं करते थे? मुझे उस काल में उपलब्ध, यात्रा के मूलभूत ढाँचे के विषय में जानने की उत्सुकता है।

सुमेधा: परिवहन का आरम्भ सडकों से नहीं हुआ था। सड़कें कालांतर में अस्तित्व में आयीं। हमारे पास जल सदैव से था। अतः परिवहन के साधन के रूप में सर्वप्रथम जलमार्गों का आरम्भ हुआ क्योंकि मानव ने नौकाओं का आविष्कार अत्यंत आरम्भ में कर लिया था। सिन्धु घाटी सभ्यता के कुछ अभिलेखों में नौकाओं के प्रकार एवं उनके निर्माण कार्य के विषय में बताया गया है। जहाज़ों, नौका संचालकों, संचालन उपकरणों इत्यादि जैसे मूलभूत आवश्यक तत्वों से लैस जल परिवहन प्रणाली के विषय में ना केवल ऋग्वेद में लिखा है, अपितु जातक कथाओं में भी इनका उल्लेख प्राप्त होता है। ऋग्वेद में ना केवल १०० पतवारों से युक्त पोतों के विषय में लिखा गया है, अपितु इसके विभिन्न तत्वों के सटीक तकनीकी नामों का भी उल्लेख है। जैसे, पतवार को अर्त, नाविक को अरित्री तथा छोटे जहाज़ों के बेड़े को अद्युम्न कहा गया है। अतः जल मार्गों पर नौचालन से सम्बंधित अनेक तकनीकी शब्दों का उल्लेख प्राप्त होता है। यहाँ तक कि अंग्रेजी के ‘navigation’ शब्द की व्यत्पत्ति संस्कृत शब्द, नाविक से ही हुई है।

जल मार्ग  

अनुराधा: मैं सदैव यह जानने के लिए उत्सुक रहती थी कि आदि शंकराचार्य ने २४ वर्षों में सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किस प्रकार किया था। मेरे अनुमान से केरल के कलदी से लेकर मध्य प्रदेश के ओंकारेश्वर तक, भारत के कोने कोने में उन्होंने जल मार्गों द्वारा ही यात्रा की होगी।

सुमेधा: जी हाँ। मैं आपको थोलकपियार के विषय में बताना चाहती हूँ जो आज से २३०० वर्ष पूर्व कांचीपुरम में रहते थे। महान संतों से शिक्षा प्राप्त करने के लिए उन्होंने सालाटुरा तक की यात्रा की थी जो महान संस्कृत व्याकरण-विद् पाणिनि की जन्मस्थली भी है। सर्वप्रथम उन्होंने जलमार्गों का प्रयोग किया। तत्पश्चात उन्होंने सड़क मार्गों से यात्रा की। उन्होंने सर्वप्रथम दक्षिण पथ का अनुगमन किया, तत्पश्चात उत्तर पथ का पालन करते हुए उत्तरागमन किया।

इस मानचित्र में अनेक नदियाँ देख सकते हैं। ये सभी नदियाँ नौगम्य हैं, अर्थात इन सभी नदियों पर जल परिवहन किया जा सकता है। सभी सड़क मार्गों पर जोड़-मार्ग हैं जो इन सड़क मार्गों को पूर्वी व पश्चिमी तट पर स्थित बंदरगाहों से जोड़ती हैं।

प्राचीन काल में वे उत्तम विहार नौकाओं का भी निर्माण करते थे। अर्थशास्त्र में भी उनके नौका विहारों के आनंद के विषय में उल्लेख है। बहुधा यह राजाओं द्वारा उपहार स्वरूप उन्हें दिया जाता था जो सौंपे गए कार्य उत्तम रीति से पूर्ण करते थे।

प्राचीन भारत में यात्रायें
प्राचीन भारत में यात्रायें

यात्रा के साधन

अनुराधा: वे सड़क मार्गों पर किस प्रकार के वाहनों का प्रयोग करते थे?

सुमेधा: निसंदेह, अपने दो पैर। इनके अतिरिक्त वे अश्वों, बैलों, ऊंटों जैसे पशुओं का भी प्रयोग करते थे। आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि अत्यधिक कठिन एवं पथरीले मार्गों पर हलके बोझे ढोने के लिए वे बकरियों का भी प्रयोग करते थे। यद्यपि उनका प्रयोग मार्गों के छोटे भागों पर ही किया जाता था। सिन्धु घाटी सभ्यता में बैलगाड़ियां का प्रयोग सामान्य रूप से किया जाता था। इनके अतिरिक्त, राजसी सवारियों के लिए तथा युद्ध इत्यादि में रथों का प्रयोग किया जाता था। किन्तु व्यापारिक गतिविधियों के लिए पशुओं एवं बैलगाड़ियों का प्रयोग ही प्रचलित था।

हमें भव्य पालकियों एवं डोलियों को नहीं भूलना चाहिए। रेशमी वस्त्रों एवं अन्य अलंकरणों से सज्ज पालकियों को कहार अपने कन्धों पर उठाकर चलते थे। इनका प्रयोग संपन्न घराने के पुरुष एवं स्त्रियाँ ही करती थीं। वह एक प्रकार से सम्पन्नता का प्रदर्शन करने का एक मार्ग था। किन्तु लम्बी दूरी के लिए वे भी बैलगाड़ियों का ही प्रयोग करते थे तथा बड़े काफिलों के रूप में सहयात्रा करते थे।

विश्राम गृह

अनुराधा: आज हम जहां भी यात्रा करते हैं, वहां विविध सुविधाओं से लैस विश्राम गृहों, होटलों, रिसॉर्ट्स इत्यादि की भरमार है। प्राचीन काल में एक यात्रा संपन्न करने में अनेक दिवस व्यतीत हो जाते थे। वे मार्ग में तथा अपने गंतव्य में कहाँ विश्राम करते थे?

सुमेधा: प्राचीन काल में भूतल पर सड़क मार्गों द्वारा यात्राएं की जाती थीं। सिन्धु घाटी सभ्यता, वैदिक सभ्यता तथा अन्य ऐतिहासिक समयावधियाँ अपने विशेष सड़क मार्गों के लिए प्रसिद्ध थीं। ऋग्वेद के विभिन्न सन्दर्भों से यह ज्ञात होता है कि बैलगाड़ियों के लिए विशेष रूप से उठे हुए मार्ग बनाए जाते थे। उनके दोनों ओर वृक्ष लगाए जाते थे। महान व्याकरण विद् पाणिनि ने भी लोगों के सामाजिक जीवन पर अनेक टिप्पणियाँ की हैं।  जैसे, विशेष प्रयोग के लिए निर्मित मार्गों के विशेष नाम भी रखे जाते थे। बकरियों के मार्ग को अजपथिका कहा जाता था। उसी प्रकार उन्होंने देवपथिका, हंसपथिका, करिपथ, राजपथ, संखपथ इत्यादि के विषय में भी उल्लेख किया है। अतः, उस काल में सड़क मार्गों का निर्माण एवं मरम्मत का कार्य उत्तम रीति से तथा सजगता से किया जाता था। मार्गों के निर्माण एवं दुरुस्ती के लिए विशेष रूप से अधिकारियों एवं कामगारों के संगठनों की तैनाती की जाती थी।

रामायण – एक उदहारण

मैं रामायण के एक प्रसंग की ओर आपका ध्यान खींचना चाहती हूँ। श्री राम के १४ वर्षों के लिए वनवास प्रस्थान के पश्चात भरत ननिहाल से अयोध्या वापिस लौटे। राम के वनवास की सूचना प्राप्त होते ही वे अत्यंत विचलित हो गए तथा उन्हें वापिस अयोध्या लेकर आने के लिए सम्पूर्ण सेना साथ वन की ओर चले पड़े। अयोध्या से वन तक सम्पूर्ण सेना को लेकर जाने के लिए उन्होंने उत्तम सड़कों का निर्माण करवाया। उन्होंने कामगारों के विशाल समूह को इस कार्य में नियुक्त किया था। वाल्मीकि रामायण में इन सडकों एवं उनके निर्माण का विस्तृत वर्णन किया गया है।

इन सडकों के निर्माण में उनकी सहायता करने के लिए विशेषज्ञों की टोली भी थी, जैसे स्थल निरीक्षक, सर्वेक्षक, वास्तुविद, अभियंता, मिस्त्री, बढ़ई, पौधे लगाने के लिए माली इत्यादि।

प्राचीन भारत में यात्रा सहायक – पथप्रदर्शक

उनके साथ एक पथप्रदर्शक अथवा मार्गदर्शक भी सदैव रहता था। उसे सम्पूर्ण क्षेत्र की पूर्व जानकारी होती थी तथा वह अज्ञात क्षेत्रों में यात्रियों का मार्गदर्शन करता था। अन्यथा सघन वनीय प्रदेशों में अज्ञात परिस्थितियाँ संकट में डाल सकती थीं। मार्गदर्शक का कार्य बहुधा यात्रा समूह का मुखिया करता था जिसे सात्वाहक कहा जाता था। सात्वाहक अपने कार्य में अत्यंत निपुण होता था। आप जब भी वाल्मीकि रामायण पढ़ें तो इस प्रसंग को ध्यानपूर्वक पढ़ें। प्राचीन काल में कैसे सडकों का निर्माण किया जाता था तथा कैसे विशाल सेनायें इन मार्गों पर चलती थीं, इनके विषय में आपको विस्तृत जानकारी प्राप्त होगी।

अतिथिगृह

मार्गों के किनारे सराय एवं अतिथिगृह होते थे। इन अतिथिगृहों के विषय में ऋग्वेद, अर्थशास्त्र एवं जातक कथाओं में भी उल्लेख प्राप्त होता है। पाणिनि ने भी इनके विषय में उल्लेख किया है। वेदों में भी इन अतिथिगृहों के विषय में लिखा गया है। अथर्व वेद में अतिथिगृहों को अवसत कहा गया है तो ऋग्वेद में उन्हें प्रपत अथवा प्रथमा कहा गया है। इतिहास में मौर्यवंशियों का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है जिन्होंने प्रवासियों की यात्राओं को सुखकर बनाने के लिए बड़ी संख्या में अतिथिगृहों का निर्माण करवाया था। अतिथिगृहों में खाद्य एवं पेय पदार्थों की उत्तम सुविधाएं होती थीं। इन सब के रखरखाव का उत्तरदायित्व राज्य पर ही होता था।

इनके अतिरिक्त आश्रम होते थे जो यात्रियों का स्वागत सत्कार करने के लिए तत्पर रहते थे। पौराणिक कथाओं में हमने ऋषि-मुनियों के विषय में पढ़ा है जो यात्राएं करते थे तथा मार्ग में अन्य ऋषियों के आश्रम में विश्राम करते थे। आप सब को शकुंतला की कथा तो स्मरण ही होगी। यात्रा करते दुर्वासा ऋषि विश्राम की इच्छा से ऋषि कणव के आश्रम में पहुंचे तथा शकुंतला द्वारा उपेक्षित होने पर उसे श्राप दे दिया था।

अतिथि देवो भवः, इस मूलमंत्र का पालन करने वाले प्राचीन भारत के प्रत्येक व्यक्ति का निवासस्थान किसी भी यात्री के लिए अतिथिगृह ही होता था। किसी विश्रामगृह की अनुपस्थिति में गांववासी ही परिवार के सदस्य की भांति यात्रियों की सेवा करते थे। अतिथि सत्कार के चलते किसी भी यात्री को रात्रि में आसरा पाने में कठिनाई नहीं होती थी।

सहप्रवास

प्राचीन काल में लोग अनेक बैलगाड़ियों के समूह में एक साथ सहप्रवास करते थे। अतिथिगृह के अभाव में खुले में डेरा डाल देते थे। वे अपने बैलगाड़ियों में अथवा वृक्षों के नीचे ही सो जाते थे। किन्तु यह सुरक्षित व्यवस्था नहीं थी। चोर-डाकुओं अथवा जंगली पशुओं का संकट सदैव बना रहता था।

अनुराधा: मेरा अगला प्रश्न है कि क्या प्राचीन काल में स्त्रियाँ भी यात्राएं करती थीं?

सुमेधा: जी हाँ। प्राचीन काल में स्त्रियाँ विभिन्न परिस्थितियों में यात्राएं करती थीं। अनेक व्यापारी अपने सम्पूर्ण परिवार के साथ व्यापार-यात्रायें करते थे क्योंकि उनकी यात्राएं एक अथवा दो दिवसों की नहीं होती थीं। एक व्यापार संबंधी यात्रा सम्पूर्ण करने में अनेक दिवस व्यतीत हो जाते थे। इनके अतिरिक्त, प्राचीन काल में भी अनेक विदुषी स्त्रियाँ होती थीं जो ज्ञान अर्जन हेतु यात्राएं करती थीं। नाट्य मंडलियों में भी स्त्रियों का समावेश होता था जो नाट्य प्रदर्शन के लिए अपनी मंडलियों के साथ यात्राएं करती थीं।

प्राचीन भारत में एकल स्त्री यात्री

प्राचीन काल में स्त्रियों का एक ऐसा भी समूह था जो ज्ञान अर्जन के लिए एकल यात्राएं करता था। वे पूर्णतः स्वतन्त्र यात्रिक होती थीं। ऐसी ही एक यात्री थी, सुलभा। महाभारत में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को प्राचीन काल की एक सन्यासिनी सुलभा के विषय में जानकारी दी थी जो योगधर्म के अनुष्ठान द्वारा सिद्धि प्राप्त कर अकेली ही पृथ्वी पर विचरण करती थी। मोक्षतत्व के जानकार, मिथिलापुरी के राजा जनक एवं सिद्धि प्राप्त सन्यासिनी सुलभा के मध्य हुए संवादों के रूप में भीष्म इस प्रसंग का सुन्दर वर्णन करते हैं। एक अन्य उदहारण है, ययाति पुत्री माधवी का, जिसने लम्बे समय के शोषित जीवनकाल के पश्चात स्वतन्त्र यात्री के रूप में तपोवन का मार्ग ग्रहण किया था। अतः प्राचीन काल में ऐसे अनेक उदहारण हैं जहां स्त्रियों ने आत्मबोध एवं ज्ञान अर्जन के लिए अकेले ही भूलोक की यात्राएं की थीं। तपोवन को आत्मसात किया था।

एकल स्त्री यात्रियों का एक वर्ग ऐसा भी था जो मोक्ष प्राप्ति के लिए अत्यंत गंभीर था। वे किसी स्थान विशेष से सम्बन्ध नहीं जोड़ती थीं तथा किसी स्थान पर एक रात्रि से अधिक ठहरती भी नहीं थीं। सर्व सामाजिक बंधनों से सम्बन्ध विच्छेद कर केवल ज्ञान एवं मोक्ष प्राप्ति के लिए अग्रसर रहती थीं।

प्राचीन भारत की यात्रा पुस्तकें

अनुराधा: हमारे शास्त्रों में भी तीर्थ यात्राओं एवं तीर्थस्थलों के विषय में विस्तृत जानकारी दी गयी है। तीर्थ यात्राएं किस प्रकार की जानी चाहिए, इस विषय में भी लिखा गया है। इसी लिए यह देखा गया है कि हमारे अधिकतर तीर्थस्थल दूर-सुदूर के दुर्गम स्थानों  में होते हैं जहां तक पहुँचने के लिए साधक को विशेष जतन करने पड़ते हैं।

मैं आपसे एक प्रश्न पूछना चाहती हूँ कि प्राचीन भारत में की जाने वाले यात्राओं के विषय में जानने के लिए कौन कौन सी पुस्तकें पढ़नी चाहिए?

सुमेधा: मेरा सुझाव है कि आप Moti Chandras’s Trade and Trade Routes पढ़ें। इस पुस्तक में सटीक तिथियों सहित आर्य प्रवास सिद्धांत पर विस्तृत रूप से विश्लेषण एवं प्रमाण प्रस्तुत किये गए हैं। यद्यपि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह किंचित नकारात्मक प्रतीत हो सकता है तथापि इसमें प्राचीन भारत में यात्राएं अवन उनसे सम्बंधित  सर्व आयामों पर उत्तम जानकारी दी गयी है।

Upinder Singh की भी पुस्तक पढ़ें। प्राचीन भारत पर लिखित उनके इस पुस्तक में उन्होंने यात्राओं का भी उल्लेख किया है। Nayanjot Lahiri द्वारा व्यापार मार्गों पर लिखित पुस्तक मेरे अनुमान से भारत की सर्वोत्तम पुस्तक है।

अनुराधा:  सुमेधा जी, आज की चर्चा में भाग लेने एवं हमें ज्ञानवर्धक जानकारी प्रदान करने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद।

सुमेधा: मुझे इस चर्चा में आमंत्रित करने के लिए आपका भी धन्यवाद। हमारी चर्चा अत्यंत रोचक रही।

प्राचीन भारत में यात्राएं पर सुमेधाजी से हुई चर्चा की लिखित प्रतिलिपि IndiTales Internship Program के अंतर्गत हर्षिल गुप्ता ने तैयार की।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post प्राचीन भारत में यात्राएं कैसे करते थे लोग? -सुमेधा वर्मा ओझा appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/prachin-bharat-mein-yatrayen-varta/feed/ 2 2348