यात्रा कथा Archives - Inditales https://inditales.com/hindi/category/यात्रा-कथा/ श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Wed, 07 Sep 2022 05:03:49 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.0.2 ११ विशेष मंदिर प्रसाद जो खाए बिना आप नहीं रह सकते https://inditales.com/hindi/vishesh-mandir-prasad/ https://inditales.com/hindi/vishesh-mandir-prasad/#respond Wed, 04 Jan 2023 02:30:09 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2899

सम्पूर्ण भारत के सभी मंदिरों में मिलने वाला प्रसाद एक दिव्य खाद्य है। सर्वप्रथम हम उस खाद्य पदार्थ को भगवान को अर्पित करते हैं। भगवान उस खाने को आशीष देते हैं, अभिमंत्रित करते हैं। जब हम किसी खाद्य पदार्थ को भगवान को समर्पित करते हैं, उसे नैवेद्यम कहते हैं। भगवान द्वारा अभिमंत्रित होने के पश्चात […]

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सम्पूर्ण भारत के सभी मंदिरों में मिलने वाला प्रसाद एक दिव्य खाद्य है। सर्वप्रथम हम उस खाद्य पदार्थ को भगवान को अर्पित करते हैं। भगवान उस खाने को आशीष देते हैं, अभिमंत्रित करते हैं। जब हम किसी खाद्य पदार्थ को भगवान को समर्पित करते हैं, उसे नैवेद्यम कहते हैं। भगवान द्वारा अभिमंत्रित होने के पश्चात वह दिव्य प्रसाद बन जाता है।

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित मंदिरों में भिन्न भिन्न नैवेद्य चढ़ाया जाता है जो प्रसाद के रूप में हमें प्राप्त होता है। भगवान को अर्पित किया गया खाद्य पदार्थ भगवान की रूचि के अनुरूप होता है। साथ ही उस पर उस क्षेत्र की संस्कृति एवं परंपराओं का भी प्रभाव होता है जिस क्षेत्र में वह मंदिर स्थित है। तो हम ऐसा कह सकते हैं कि भगवान को स्थानीय खाद्य पदार्थ अत्यंत प्रिय होते हैं।

भारत के मंदिरों के प्रसाद

भारत के विभिन्न मंदिरों में प्राप्त प्रसादों की दिव्यता का अनुभव लेने के लिए मेरे साथ आईये।

जगन्नाथ पुरी का महाप्रसाद

पुरी भगवान जगन्नाथ का अन्न क्षेत्र है। पुरी ऐसा स्थान है जहाँ भगवान स्वयं अन्न ग्रहण करने के लिए आते हैं। इसलिए इसमें आश्चर्य कदापि नहीं है कि जगन्नाथ पुरी का रसोईघर विश्व का सर्वाधिक विशाल रसोईघर है। यहाँ भोजन भी पारंपरिक रीति से पकाया जाता है। भोजन प्रतिदिन मिट्टी के शुभ्र पात्रों में बनाया जाता है तथा भोजन बनाने के लिए मंदिर परिसर में ही स्थित दो जलकूपों के जल का प्रयोग किया जाता है।

जगन्नाथ पुरी का प्रसिद्द खाजा
जगन्नाथ पुरी का प्रसिद्द खाजा

यहाँ बनाया जाने वाला भोजन एक सम्पूर्ण आहार होता है जिसे मंदिर के ब्राह्मण या सेवायत बनाते हैं। भक्तों की ऐसी मान्यता है कि भोजन बनाने के कार्य का निरीक्षण स्वयं महालक्ष्मी करती हैं जो जगन्नाथ की अर्धांगिनी हैं। भोजन सर्वप्रथम भगवान को अर्पित किया जाता है जिससे वह प्रसाद में रूपांतरित होता है। तत्पश्चात महालक्ष्मी को उसका अर्पण किया जाता है जिसके पश्चात वह महाप्रसाद बन जाता है।

यदि आपको प्रसाद बनाने की प्रक्रिया को देखने में रूचि हो तो आप प्रातः रसोईघर में जाकर देख सकते हैं। दोपहर में आप आनंद बाजार जाकर वहाँ से प्रसाद ले सकते हैं। इस प्रसाद में दाल, भात, भाजियां तथा अनेक प्रकार के मिष्ठान होते हैं। मुझे बताया गया कि पुरी एवं आसपास के क्षेत्रों के लोग अपने घर के कई उत्सवों के लिए मंदिर का प्रसाद भोजन स्वरूप ले जाते हैं।

यदि आप पुरी के आसपास नहीं रहते तो आप खाजा जैसे सूखे प्रसाद भी ले जा सकते हैं जिन्हें ताड़ के पत्तों से बनी सुन्दर मंजूषाओं में भर कर रखे जाते हैं।

तिरुपति बालाजी मंदिर का प्रसाद – लड्डू

जिसने एक बार भी तिरुपति बालाजी मंदिर के स्वादिष्ट व सुगन्धित लड्डुओं के प्रसाद का आस्वाद लिया है, वे यह अवश्य कहेंगे कि यहाँ के बूंदी के लड्डुओं का कोई सानी नहीं। ये विशेष प्रकार के लाडू हैं जिन्हें अपने स्वाद के लिए अपने क्षेत्र का भौगोलिक संकेत भी प्राप्त है। बालाजी के भक्तों में यह अत्यंत लोकप्रिय एवं अभीष्ट माना जाता है। इन लड्डुओं को बनाने के लिए उसी सामग्री का प्रयोग किया जाता है जो अन्य बूंदी लड्डुओं में होता है। बेसन, घी, शक्कर, इलायची एवं सूखे मेवे। किन्तु इनका स्वाद एवं गंध अन्य लड्डुओं की तुलना में उत्कृष्ट होता है। कदाचित इसका कारण है, इसमें समाई हुई बालाजी की भक्ति। क्यों ना हो? इन्हें तिरुमाला पर्वतों के स्वामी, वेंकटेश्वर भगवान को अर्पण करने के लिए विशेष रूप से बनाया जाता है।

तिरुपति का प्रसिद्द लड्डू
तिरुपति का प्रसिद्द लड्डू

मंदिर परिसर में ही बनाए गए इन लड्डुओं की संख्या लाखों में होती है। प्रत्येक लड्डू का भार लगभग २०० ग्राम होता है। मंदिर में भगवान के दर्शनोपरांत भक्तगण यह प्रसाद पाते हैं। इसका स्वाद अतुलनीय व दिव्य होता है। भक्तगण ना केवल स्वयं प्रसाद ग्रहण करते हैं, अपितु अपने सगे-संबंधियों के लिए भी ले जाते हैं।

कृष्ण मंदिर का माखन मिश्री

भगवान कृष्ण को माखन अत्यंत प्रिय है, यह आप सब जानते हैं। आपने कृष्ण भगवान के बालपन की अनेक लीलाएं सुनी होंगी। हमारे शास्त्रों में अनेक कथाएं एवं गीत हैं जिनमें उनके माखन प्रेम का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। जैसे गोपियाँ यशोदा माँ को उलाहना देती हैं कि उनके लाडले कृष्ण ने किस प्रकार उनके घर आकर उनका माखन खा लिया, कृष्ण अपनी माता को मनाते हैं कि, “मैं नहीं माखन खायो” आदि। तो स्वाभाविक ही है कि कृष्ण मंदिर में मिश्री के साथ माखन अर्पित किया जाता है जो भक्तों को प्रसाद के रूप में मिलता है।

ब्रज का मिश्री प्रसाद
ब्रज का मिश्री प्रसाद

यह प्रसाद बहुधा प्रातःकाल भगवान कृष्ण को अर्पित किया जाता है क्योंकि उन्हें प्रातःकाल में माखन खाना भाता है। यद्यपि अनेक कृष्ण मदिरों में माखन मिश्री का भोग चढ़ाया जाता है, तथापि मैं दो मंदिरों का विशेष उल्लेख करना चाहूंगी जहाँ मैंने भाव-विभोर होकर यह प्रसाद ग्रहण किया था। पहला है, वृन्दावन का लोकप्रिय बाँके बिहारी मंदिर। वृन्दावन की पावन भूमि में भगवान कृष्ण ने अपने किशोरावस्था काल व्यतीत किया था। दूसरा मंदिर है, द्वारका का द्वारकाधीश मंदिर। भगवान कृष्ण ने भारत के पश्चिमी तट पर स्वयं द्वारका की स्वर्णिम नगरी बसाई थी।

मुझे स्मरण है, मुझे ताजे माखन के साथ मिश्री का स्वाद इतना भा गया था कि मैंने उनसे पुनः पुनः प्रसाद देने का आग्रह किया था। मैं आज भी उन दयालु माताजी का स्मरण करती हूँ जो उस दिन भक्तों में प्रसाद बाँट रहीं थी।

वैष्णव देवी मंदिर का प्रसिद्ध प्रसाद – सूखे सेब

वैष्णव देवी जम्मू के निकट स्थित त्रिकूट पर्वत पर विराजमान हैं। वैष्णव देवी मंदिर को उत्तर भारत का अत्यंत लोकप्रिय मंदिर माना जाता है जहाँ सर्वाधिक संख्या में भक्तगण जाते हैं। इस मंदिर के विषय में ऐसी मान्यता है कि जब तक स्वयं देवी का बुलावा ना आये, आप उनके दर्शन नहीं कर सकते। मैंने उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में अपने जीवन के महत्वपूर्ण काल व्यतीत किये हैं किन्तु मुझे उनके दर्शन का सौभाग्य अब तक प्राप्त नहीं हुआ है। मुझे उनके बुलावे की प्रतीक्षा है। किन्तु मुझे उनके मंदिर के प्रसाद ग्रहण करने का सौभाग्य अवश्य प्राप्त हुआ है।

वैष्णो देवी के सूखे सेब
वैष्णो देवी के सूखे सेब

उनको अर्पित किये गए नैवेद्य में मुरमुरा, इलायचीदाना या मीठी चिरौंजी, कुछ सूखे मेवे और धूप में सुखाये गए सेब के टुकड़े होते हैं। कदाचित माँ वैष्णव देवी का मंदिर ही एक ऐसा मंदिर है जहाँ सूखे सेब के टुकड़ों का प्रसाद होता है। ये लम्बे समय तक टिकते हैं। इसलिए आप इन्हें अपने सगे-संबंधियों के लिए आसानी से ले जा सकते हैं। मंदिर के आसपास सेबों की खेती की जाती है। यह प्रसाद उस समृद्धि का प्रतीक है। मेरे लिए, इस प्रसाद से मेरे बालपन की अनेक स्मृतियाँ जुड़ी हुई हैं।

काशी के संकट मोचन मंदिर का प्रसाद – लाल पेडा

काशी के प्रसिद्ध संकट मोचन मंदिर का निर्माण गोस्वामी तुलसीदास जी ने किया था। गोस्वामी तुलसीदासजी हिंदी साहित्य के महान संत कवि थे जिन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना की है। उनमें रामचरितमानस एवं हनुमान चालीसा भी सम्मिलित हैं। हनुमान चालीसा पवन पुत्र हनुमान की स्तुति में गाया जाने वाला सर्वाधिक लोकप्रिय स्तोत्र है। ऐसी मान्यता है कि गोस्वामी तुलसीदास जी ने यहाँ साक्षात् हनुमान जी के दर्शन किये थे। कालांतर में उन्होंने यहाँ हनुमान मंदिर का निर्माण किया। इस मंदिर में वानरों का वर्चस्व स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।

काशी के संकट मोचन मंदिर के लाल पेडे
काशी के संकट मोचन मंदिर के लाल पेडे

इस मंदिर में दो प्रकार के प्रसाद अत्यंत लोकप्रिय हैं, एक है बेसन के लड्डू और दूसरा है, लाल पेडा। मंदिर की ओर जाते मार्ग के दोनों ओर दुकानों की पंक्तियाँ हैं जहाँ से आप इन्हें क्रय कर सकते हैं। व्यक्तिगत रूप से मेरा सर्वाधिक प्रिय प्रसाद लाल पेडा है। इसमें भुने हुए खोए की सोंधी सोंधी सुगंध होती है। यही इसकी विशेषता भी है। वैसे भी पेडे मुझे अत्यंत प्रिय हैं। लाल पेडे के अतिरिक्त मुझे ब्रज के मथुरा पेडे तथा कर्णाटक के धारवाड़ पेडे भी अत्यंत प्रिय हैं।

गुरुद्वारों का कड़ा प्रसाद

मैं चंडीगढ़ एवं उसके आसपास के क्षेत्रों में पली-बड़ी हूँ। गुरुद्वारा जाना हमारी नियमित दिनचर्या का एक भाग था। बालपन में हमारे गुरुद्वारे जाने का एक अन्य कारण भी था, वहाँ का कड़ा प्रसाद। हम उस प्रसाद की प्रतीक्षा किया करते थे। शुद्ध देशी घी में भून भून कर बना आटे का हलवा खाना हमारे लिए किसी स्वर्ग के आनंद से कम नहीं होता था। हम पहले एक हाथ बढ़ाकर प्रसाद ग्रहण करते थे। उसी समय दूसरा हाथ भी आगे बढ़ा देते थे ताकि कुछ अधिक हलवा पा सकें।

गुरुद्वारों का स्वादिष्ट कढा प्रसाद
गुरुद्वारों का स्वादिष्ट कढा प्रसाद

यद्यपि अमृतसर के हरमंदिर साहिब के लंगर में मिलने वाला प्रसाद सर्वाधिक लोकप्रिय है तथापि अधिकतर गुरुद्वारों में मिलने वाला कड़ा प्रसाद आपको वही तृप्ति प्रदान करता है। देखा जाए तो आटे का हलवा बनाने में सिमित सामग्री का प्रयोग किया जाता है तथा बनाने की विधि भी आसान ही है। किन्तु हम घर पर जितने भी परिश्रम से आटे का हलवा बनाना चाहें, उसका स्वाद वैसा नहीं हो पाता जैसा कि गुरुद्वारों में मिलता है। कदाचित उसमें दिव्याषीश का स्वाद होता है।

हनुमान मंदिरों में मंगलवार का प्रसाद – मीठी बूंदी

उत्तर भारत में मंगलवार के दिन हनुमान मंदिर के दर्शन की प्रथा अनेक परिवारों में प्रचलित है। हमारे बालपन में हम भी जाते थे। हनुमान मंदिर के बाहर नारंगी चमचमाती मीठी बूंदी के ढेरों का दर्शन मंगलवार के दिन एक सामान्य दृश्य होता है, विशेषतः संध्या के समय। यह एक साप्ताहिक आयोजन होता है। सप्ताह के अन्य छः दिवसों में आपको यही ढेर ढूंढे नहीं मिलेंगे। इनका स्वाद कुछ कुछ जलेबियों के समान होता है। दिखने में ये चाशनी से भरी छोटी छोटी बूंदों के आकार की गोलियां होती हैं जो जिव्हा में घुल जाती हैं। इनके कुछ प्रकार नर्म मुलायम होते हैं तो कुछ प्रकार कुरकुरे होते हैं। कई लोगों को नर्म बूंदी प्रिय होती है। मुझे कुरकुरी बूंदी अत्यंत भाती है।

हनुमान मंदिरों की रसीली बूंदी
हनुमान मंदिरों की रसीली बूंदी

बालपन में हम जब हनुमान मंदिर जाते थे तब बाहर स्थित दुकान से बूंदी का पुड़ा क्रय करते थे। मंदिर में वह पूड़ा पुजारीजी को देते थे। पुजारीजी उसमें से कुछ बूंदी निकालकर प्रसाद पात्र में रख लेते थे तथा शेष पूड़ा हमें वापिस कर देते थे। तत्पश्चात वे प्रसाद पात्र से हमें बूंदी का प्रसाद देते थे। हम अपने दोनों हाथों से अधिक से अधिक प्रसाद पाने की चेष्टा करते थे।

अब दक्षिण भारत में स्थायी होने के पश्चात मुझे इस सुख की कमी खटकती है। आज भी यदि मैं मंगलवार के दिन उत्तर भारत के किसी क्षेत्र में रहूँ तो मैं हनुमान मंदिर जाने का प्रयास अवश्य करती हूँ। उस समय मेरे भीतर का बालपन पुनः जागृत हो जाता है। मैं पुनः वही बूंदी के प्रसाद की आतुरता से प्रतीक्षा करने लगती हूँ।

गणपतिपुले में मोदक का प्रसाद

गणपति पूजन का एक अभिन्न अंग हैं मोदक। गणपति उत्सव के अवसर पर मैंने अपने अनेक मराठी मित्रों के घरों में मोदक का प्रसाद खाया है। महाराष्ट्र के कोंकण तट पर स्थित गणपतिपुले के गणपति मंदिर में भी मैंने मोदक का प्रसाद देखा था। मंदिर अत्यंत लोकप्रिय होने के पश्चात भी भीतर भक्तों की अत्यधिक भीड़ नहीं होती है।

गणपति का मोदक
गणपति का मोदक

अतः आपको यहाँ का मोदक प्रसाद अवश्य प्राप्त होगा। मंदिर के आसपास स्थित घरेलु भोजनालयों में भी मोदक परोसा जाता है। गुड़ एवं नारियल के रसीले भरावन से भरे चावल के आटे के भपाये हुए ये मोदक अत्यंत स्वादिष्ट होते हैं।

कांचीपुरम के वरदराज पेरूमल मंदिर में कांचीपुरम इडली

कांचीपुरम एक दिव्य नगरी है जिसके केंद्र में कांची कामाक्षी मंदिर है। इस नगरी ने अपनी गोद में शिव कांची एवं विष्णु कांची को सहेज कर रखा हुआ है। यह नगरी कांचीपुरम रेशमी साड़ियों की दुकानों एवं मंदिरों से भरा हुआ है। इसकी एक अन्य विशेषता बहु-अनाज इडलियाँ भी हैं।

कांचीपुरम इडली
कांचीपुरम इडली

यद्यपि ये इडलियाँ यहाँ के लगभग सभी जलपान गृहों में उपलब्ध हैं तथापि ये इडलियाँ प्रसाद के रूप में विष्णु कांची के हृदय स्थल में स्थित वरदराज पेरूमल मंदिर में भी दी जाती हैं। मैंने इस मंदिर में लगभग एक दिवस व्यतीत किया था किन्तु मैं इसका आस्वाद नहीं ले पायी। किन्तु मैंने विभिन्न जलपान गृहों में इन्हें अवश्य चखा है।

नाथद्वारा के श्रीनाथजी मंदिर में ठोर का प्रसाद

भारत के अधिकतर विष्णु मंदिरों में विस्तृत रसोईघर होते हैं जहाँ भगवान के लिए विभिन्न व्यंजन बनाए जाते हैं। नाथद्वारा के ठाकुर हवेली के विशाल पाकशाला में नन्हे श्रीनाथजी के लिए सम्पूर्ण दिवस विभिन्न आहार बनाए जाते हैं। उनमें स्थानीय भाजियों एवं फलों का प्रयोग किया जाता है। जैसे हम अपने घरों में मौसम के अनुसार आहार में परिवर्तन करते हैं, इस मंदिर में भी मौसम के अनुसार आहार में परिवर्तन लाया जाता है। ये विभिन्न आहार श्रीनाथजी को अर्पित किये जाते हैं।

श्रीनाथजी के दिनभर के प्रसाद
श्रीनाथजी के दिनभर के प्रसाद

इनमें अन्य व्यंजनों के साथ एक विशेष मिष्टान्न होता है जिसे ठोर कहते हैं। यह मीठी चाशनी में भीगी सूजी से बनी एक मिठाई होती है। ठोर नाथद्वारा का एक अतिविशेष मिष्टान्न है। आप इन्हें कुछ e-portals से भी मंगवा सकते हैं।

चूड़ियों का प्रसाद

लाल चूड़ियाँ - देवी मंदिर का प्रसाद
लाल चूड़ियाँ – देवी मंदिर का प्रसाद

देवी मंदिर में देवी के शृंगार की वस्तुएं भेंट में चढ़ाना सामान्य है। उनमें उनके लिए चुनरी, साड़ी जैसे वस्त्र, बिंदी, चूड़ियाँ, हल्दी, कुमकुम तथा आभूषण होते हैं। कुछ मंदिरों में इन शृंगार वस्तुओं में से कुछ वस्तुएं प्रसाद के रूप में स्त्रियों को दिया जाता है। मुझे स्मरण है कि मुझे वृन्दावन के निधि वन में तथा जगन्नाथ पुरी मंदिर के परिसर में स्थित महालक्ष्मी मंदिर में लाल चूड़ियाँ प्रसाद के रूप में मिली थीं। ये चूड़ियाँ मेरे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। मैं विशेष अवसरों में उन्हें अवश्य धारण करती हूँ।

विभिन्न मंदिरों के सर्वव्यापी प्रसाद

पाषण पात्रों में चरणामृत -ओडिशा के मंदिरों में
पाषण पात्रों में चरणामृत -ओडिशा के मंदिरों में

मैंने उपरोक्त वर्णन में कुछ विशेष मंदिरों में मिलने वाले विशेष प्रसाद का उल्लेख किया है। इनके अतिरिक्त कुछ सर्वव्यापी प्रसाद हैं जो लगभग सभी मंदिरों में मिलते हैं। उनमें एक है, पंचामृत या चरणामृत। उसे तीर्थ भी कहते हैं। यह सभी मंदिरों में दिया जाता है। आप किसी भी समय मंदिर में जाएँ, आपको चरणामृत या तीर्थ दिया जाता है। उत्तर भारत के अधिकाँश मंदिरों में लड्डू या पेढा सर्वसामान्य प्रसाद होता है। मंदिर के बाहर आप मिठाई की दुकानों की अनेक पंक्तियाँ देख सकते हैं जहाँ ये प्रसाद उपलब्ध होते हैं। वहीं दक्षिण भारत के मंदिरों में महाप्रसाद के रूप में भोजन तथा पायसम की सभी को प्रतीक्षा रहती है। मुरमुरा एवं मीठी चिरौंजी का सूखा प्रसाद भी सभी मंदिरों के बाहर दुकानों में उपलब्ध होता है। यह सूखा प्रसाद होने के कारण आप इसे भगवान को अर्पण करने के पश्चात घर ले जा सकते हैं।

मंदिरों में मिलने वाला प्रसाद इतना विशेष क्यों होता है? इसका कारण है वह भक्ति जिसमें सराबोर होकर इसे बनाया जाता है, भगवान को अर्पित किया जाता है तथा भक्तों में वितरित किया जाता है। भक्तगण भी इसे श्रद्धा से स्वीकार करते हैं तथा उसी श्रद्धा से इसे ग्रहण करते हैं। भगवान को अर्पित करने के पश्चात इसमें दिव्या उर्जा का भी समावेश हो जाता है।

क्या मैंने इसमें किसी विशेष मंदिर के किसी विशेष प्रसाद का उल्लेख नहीं किया है? यदि ऐसा है तो मुझे अवश्य बताईये।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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भारत की रेशमी साड़ियाँ – कला एवं धरोहर का अद्भुत संगम https://inditales.com/hindi/reshami-sadiyan-aur-dharohar/ https://inditales.com/hindi/reshami-sadiyan-aur-dharohar/#comments Wed, 16 Mar 2022 02:30:23 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2618

कला का दूसरा नाम है प्रेरणा। कला के विभिन्न रूप एक दूसरे से प्रेरित होते हैं तथा एक दूसरे को प्रोत्साहित करते हैं। वे नवीन विचारों के प्रेरणास्त्रोत हैं। कला के विभिन्न रूपों का संगम सृजनशीलता को जन्म देता है जो आनंद व उमंग का स्त्रोत है। मंदिर, वस्त्र, वास्तुकला, संगीत तथा इनको जोड़ने वाले […]

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कला का दूसरा नाम है प्रेरणा। कला के विभिन्न रूप एक दूसरे से प्रेरित होते हैं तथा एक दूसरे को प्रोत्साहित करते हैं। वे नवीन विचारों के प्रेरणास्त्रोत हैं। कला के विभिन्न रूपों का संगम सृजनशीलता को जन्म देता है जो आनंद व उमंग का स्त्रोत है। मंदिर, वस्त्र, वास्तुकला, संगीत तथा इनको जोड़ने वाले महान कलाकार भारतीय संस्कृति का अभिन्न भाग हैं। विद्वानों ने इन विद्याओं का पृथक पृथक अध्ययन तो भरपूर किया है किन्तु उनमें निहित कथाओं, आकृतियों एवं उनकी सराहना व संरक्षण करते कला प्रेमियों का अद्भुत संगम क्वचिद ही दृष्टिगोचर होता है।

भारत की रेशमी साड़ियाँ – भारतीय कलाशैली, वास्तुशिल्प एवं ऐतिहासिक व सांस्कृतिक धरोहर के अग्रदूत

आईये देखते हैं, भारतीय वस्त्रों में हमारी ऐतिहासिक व सांस्कृतिक धरोहर तथा अप्रतिम वास्तुकला का अद्वितीय संगम।

रेशमी साड़ियों की किनार पर मंदिरों की आकृतियाँ

जिन्हें कांचीपुरम अर्थात् कांजीवरम साड़ियाँ भाती हैं, उनसे इन साड़ियों के विषय में पूछें तो वे अत्यंत उत्साह से आप से मंदिर की आकृतियों से युक्त किनारियों के विषय में निश्चित ही चर्चा करेंगे। कांचीपुरम में बुनी ये सौंदर्य से परिपूर्ण व भव्य कांजीवरम साड़ियों की किनारियों में मंदिर की आकृतियाँ बुनी जाती हैं। कांचीपुरम साड़ियों की किनारियों में मंदिर की आकृतियाँ बुनना अब सर्वविदित है। किन्तु क्या आप जानते है कि इन साड़ियों में बुनी गयी मंदिर की किनारियों में भी अनेक प्रकार होते हैं?

गोपुरम काठ की रेशमी साडी
गोपुरम काठ की रेशमी साडी

गोपुरम काठ – दक्षिण भारत के मंदिरों के प्रवेश द्वारों के ऊपर ऊंची अट्टालिकाएं होती हैं जिन्हें गोपुरम कहते हैं। इन पर भव्य शिल्पकारी की जाती है। वे दूर से ही मंदिर के वास्तु की घोषणा करते प्रतीत होते हैं। प्रवेश द्वार के इस बहु-तलीय संरचना की प्रतिकृति को साड़ी की किनारी एवं आँचल पर ऐसे बुना जाता है कि उनके शीर्ष साड़ी के मुख्य भाग को भेदते प्रतीत होते हैं। ठीक उसी प्रकार जैसे नीचे से देखने पर गोपुरम के शीर्ष स्वच्छ आकाश को भेदते प्रतीत होते हैं। गोपुरम के विभिन्न तलों को तीखे ज्यामितीय आकृतियों से दर्शाया जाता है जो ऊपर जाते जाते संकरे होते जाते हैं। सामान्यतः साड़ियों की किनारियों को मुख्य रंग से विपरीत रंग में बुना जाता है। इसके कारण  मंदिर की किनारी अत्यंत भव्य प्रतीत होती है।

लघु मंदिर की किनारी –  इस प्रकार की किनारी में गर्भगृह के शिखर की प्रतिकृति बुनी जाती है। रंगीन अथवा सुनहरी किनारी पर छोटे छोटे त्रिकोणीय संरचनाओं की पंक्तियाँ होती हैं। उन्हें तमिल भाषा में “मोग्गु” कहा जाता है, जिसका अर्थ है, कली। ये आकृतियाँ कलियाँ सदृश ही प्रतीत होती हैं।

रुद्राक्ष किनारी – रुद्राक्ष का सम्बन्ध भगवान शिव से है। ऐसा माना जाता है कि रुद्राक्ष उनके चक्षुओं से निकली आंसू की बूँद है। भगवान शिव के अलंकरण में रुद्राक्ष के आभूषण भी सम्मिलित होते हैं। अनेक शिव भक्त भी अपने शरीर पर रुद्राक्ष धारण करते हैं। इसी परंपरा का पालन करते हुए बुनकर कांचीपुरम साड़ियों की किनारियों पर गोपुरम के साथ रुद्राक्ष की आकृतियाँ भी बुनते हैं। वे यह दर्शाना चाहते हैं कि उन्होंने शिव मंदिर की आकृति को यहाँ प्रदर्शित किया है। जब आप साड़ी को खोलकर हाथों में पकड़ते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है मानो आपने रुद्राक्ष की माला पकड़ी है।

साड़ियों पर मिथिला की कथाएं

जब भागलपुर की तसर रेशम का मिथिला की ज्यामितीय आकृतियों से एक वस्त्र के रूप में विलय होता है तब वे अनगिनत कथाएं कहती हैं। मधुबनी कला का इस क्षेत्र के पारंपरिक अनुष्ठानिक चित्रों से सम्बंध है। प्राचीनकाल से विवाह, नामकरण जैसे आयोजनों में भित्तियों पर शुभ चिन्ह चित्रित किये जाते हैं। आज के समय में भित्तियों को रंगने की अपेक्षा उन चित्रों को कागज पर चित्रित कर लटकाया जाता है। उन्ही चित्रों व आकृतियों की छपाई साड़ियों पर भी की जाती है। इससे इस कला को नवीन ऊँचाई प्राप्त हो रही है। साथ ही साड़ियों की भव्यता एवं मूल्य में भी वृद्धि होती है। कलाकार, विशेषतः स्त्रियाँ, अत्यंत सावधानी से तथा परिश्रम पूर्वक अपने हाथों से इन सूक्ष्म आकृतियों को वस्त्रों पर चित्रित करती हैं। उनकी सम्पूर्ण रचनात्मकता किसी चित्रफलक के समान उन साड़ियों पर अंकित हो जाती हैं। प्रत्येक आकृति एक कथा कहती है।

मधुबनी साडी पर राम जानकी विवाह
मधुबनी साडी पर राम जानकी विवाह

इन स्त्रियों द्वारा चित्रित की गयी सर्वाधिक लोकप्रिय कथा है, राम-जानकी विवाह। यह विवाह मिथिला में संपन्न हुआ था। यह कथा इस क्षेत्र के कण कण में समाई हुई है। इसके पश्चात, लाल रेशमी वस्त्र पर दुर्गा एवं काली के चित्र भी अत्यंत लोकप्रिय हैं जो बहुधा नवरात्रि के अवसर पर उपलब्ध कराये जाते हैं। तसर रेशम के मूल रंग, मटमैले पीले रंग पर पुष्प तथा अन्य प्राकृतिक आकृतियाँ भी अत्यंत लुभावने प्रतीत होते हैं। ये आकृतियाँ साड़ियों के साथ दुपट्टों पर भी उपलब्ध हैं। इन्हें धारण करने वालों को प्रकृति की सन्निधि का अनुभव होता है।

और पढ़ें: गंगा देवी की मिथिला चित्रकारी

रेशमी साड़ियाँ तथा टेराकोटा मंदिर

पश्चिम बंगाल के बिष्णुपुर एवं बांकुरा क्षेत्र सुन्दर बालूचरी एवं स्वर्णचरी साड़ियाँ के लिए अत्यंत लोकप्रिय हैं। इनमें बालूचरी साड़ियों पर रेशमी धागे से तथा स्वर्णचरी साड़ियों पर सुनहरे धागे से कढ़ाई की जाती है।  जब आप बिष्णुपुर एवं बांकुरा क्षेत्र में भ्रमण करेंगे, तब आप यहाँ के चटक लाल रंग के टेराकोटा मंदिरों से प्रभावित हुए बिना नहीं रह पायेंगे। उनके फलकों पर उकेरे देवी-देवताओं, राजाओं, व्यापारियों एवं सामान्य जनता  की कथाएं आपका मन मोह लेंगी। ऐसी ही कथाएं स्थानिक कारीगरों ने इन साड़ियों पर रेशमी एवं सुनहरे धागों से बुनी है। इन साड़ियों पर रामायण एवं महाभारत के दृश्यों के अतिरिक्त अनेक अन्य दृश्य भी कढ़ाई के माध्यम से उकेरे जाते हैं।

बंगाल की बालुचेरी साडी पर गीतोपदेश
बंगाल की बालुचेरी साडी पर गीतोपदेश

मेरे पास जो बालूचरी साड़ी है, उस पर गीतोपदेश का दृश्य है। यह महाभारत का दृश्य है जहां श्रीकृष्ण अर्जुन को गीता का उपदेश दे रहे हैं। यह दृश्य सम्पूर्ण आँचल एवं किनारी पर उकेरा गया है। मेरी जानकारी के अनुसार टेराकोटा मंदिर मध्ययुगीन काल के हैं, वहीं यह रेशम की बुनाई उससे भी प्राचीन है। प्रश्न यह उठता है कि रेशम की बुनाई ने टेराकोटा मंदिर की संरचनाओं को प्रभावित किया अथवा विपरीत? यद्यपि इस प्रश्न का सरल उत्तर नहीं है, तथापि पौराणिक कथाओं की अमिट छाप किसी क्षेत्र के प्रत्येक संभव कला के माध्यम पर उकेरने की परंपरा सदियों प्राचीन है जिनका उद्देश्य हमारी संस्कृति को हमारी भावी पीढी के लिए संरक्षित करना है।

यहाँ के अधिकतर मंदिर कृष्ण भगवान को समर्पित हैं। इसलिए अधिकांशतः उनसे सम्बंधित कथाएं ही आप यहाँ निर्मित साड़ियों, शंख, डोकरा आभूषणों, टेराकोटा मंदिरों के मिट्टी के फलकों इत्यादि पर देखेंगे।

महेश्वरी साड़ियों पर बहती नर्मदा नदी

गंगा से भी प्राचीन नर्मदा नदी को प्राचीनतम नदी माना जाता है। इस नदी के तट पर बसे एवं नर्मदा नदी द्वारा पोषित स्थानिकों के लिए यह माँ के समान है। इसी नर्मदा नदी के तट पर बसी रानी अहिल्या बाई होलकर की राजधानी महेश्वर को अप्रतिम महेश्वरी साड़ियों के बुनकरों का गढ़ माना जाता है। इस नगरी में भ्रमण करते समय आप हथकरघे की लयबद्ध गति की ध्वनि सुन सकते हैं।

महेश्वरी साडी पर नर्मदा की लहरें
महेश्वरी साडी पर नर्मदा की लहरें

प्रातः सूर्योदय के समय अथवा संध्या सूर्यास्त के समय यदि आप नर्मदा के तट पर बैठें तो सूर्य की किरणों के कारण सुनहरे रंग में दमकते नदी के जल को देख आप मंत्रमुग्ध हो जायेंगे। कुछ इन्ही क्षणों को बुनकरों ने इन महेश्वरी साड़ियों पर उकेरा है। सुनहरी नर्मदा के अप्रतिम दृश्य को महेश्वरी साड़ियों की किनारी पर बुनकर उसे अमर कर दिया है। इन किनारियों पर नर्मदा नदी की लहरों को चिन्हित किया है। इनके अतिरिक्त महेश्वर के किले, महल, मंदिर आदि की नक्काशी को भी बुनकरों ने साड़ियों पर सुन्दरता से बुना है। इनमें प्रमुख आकृतियाँ हैं, ईंट, हीरा, चटाई तथा चमेली।

पुरी जगन्नाथ की गीतगोविन्द खंडुआ

१२वीं शताब्दी के कवि जयदेव की प्रसिद्ध कविता गीतगोविन्द ओडिशा की परंपरा का प्रमुख अंग है। गीतगोविन्द खंडुआ अथवा मनिआबंदी या कटकी रेशमी वस्त्र है जिस पर इस कविता के पद लिखे होते हैं। इन पदों को या तो बंधेज तकनीक से या इस क्षेत्र की लोकप्रिय इकत पद्धति से बुना जाता है। किवदंतियों के अनुसार, कवि जयदेव अपनी कविता को जगन्नाथ को समर्पित करना चाहते थे। इसके लिए सम्पूर्ण कविता को वस्त्र पर बुनने से उत्तम उपाय उन्हें नहीं सूझा क्योंकि वस्त्र ही भगवान के अलंकरण में समीपस्थ तत्व होते हैं। आरम्भ में उन्होंने इसे अपने मूल गाँव केंदुली में बनवाया था। किन्तु कालांतर में पुरी के राजाओं ने इस कला को नुआपाटणा में स्थानांतरित कर दिया था। यदि आप जगन्नाथ पुरी के मंदिर में प्रातःकाल की मंगल आरती देखें तो आप जगन्नाथ को इसी खंडुआ में सजे हुए देखेंगे। खंडुआ के बुनकर भी अनुष्ठानिक पावित्र्य का पालन करते हुए शुद्ध शाकाहारी भोजन करते हैं तथा शौच अनुष्ठान का पालन करते हैं।

गीतगोबिंद खंडुआ ओडिशा से
गीतगोबिंद खंडुआ ओडिशा से

इनके अतिरिक्त, बारालागी पाटा भी एक प्रकार का रेशमी वस्त्र है जिसे जगन्नाथ मंदिर के देव धारण करते हैं। सप्ताह के सात दिवस उन्हें सात भिन्न रंग के वस्त्र पहनाये जाते हैं। जैसे, रविवार के दिन लाल, सोमवार के दिन श्वेत-श्याम, मंगलवार के दिन बहुरंगी, बुधवार के दिन हरा, ब्रहस्पतिवार को पीला, शुक्रवार के दिन श्वेत तथा शनिवार को श्याम रंग का वस्त्र पहनाया जाता है।

मंदिर की यह परंपरा यह सुनिश्चित करती है कि इसके अनुयायी इस क्षेत्र की बुनकर परंपरा को संरक्षित एवं समृद्ध करें।

बनारसी रेशमी साड़ियाँ

बनारसी जरी वस्त्र एवं जामावार प्रत्येक रेशमी वस्त्र के प्रेमी का स्वप्न होता है। काशी के बुनकर कब से रेशम पर इस जादुई कला की बुनाई कर रहे हैं, कोई नहीं जानता। साहित्यों एवं अभिलेखों से यह स्पष्ट है कि वे भगवान बुद्ध के काल में भी थे। इसका अर्थ है कि कम से कम २६०० वर्षों से रेशम पर यह अप्रतिम बुनाई अनवरत की जा रही है। प्रसिद्ध संत-कवि कबीर ने अपनी अनेक रचनाओं में स्वयं को काशी के बुनकर द्वारा संबोधित किया है। उन्होंने बुनाई की कला के द्वारा जीनव के गहन दर्शन को समझाया है। वे जीवन को ताना-बाना ही कहते थे। विरले ही सही, किन्तु कुछ बनारसी रेशमी वस्त्रों में बुनाई द्वारा कबीर के दोहे भी उकेरे गए हैं।

पारंपरिक बनारसी साडी
पारंपरिक बनारसी साडी

बनारसी साड़ियाँ अपने भव्य किनारी एवं पल्लू के लिए प्रसिद्ध हैं। रेशमी साड़ियों पर जरी की किनारी तथा मध्य में जरी की बूटियाँ होती हैं। ये बूटियाँ प्राकृतिक तत्वों से प्रेरित होती हैं, जैसे आम, पान के पत्ते, पुष्प, बेलें इत्यादि। किसी समय इन पर शुद्ध स्वर्ण के तारों से बूटियाँ बनाई जाती थीं। उनका स्थान अब नकली चमकदार तारों ने ले लिया है। बनारसी साड़ियों में बुनी जाती कुछ परम्परागत आकृतियाँ हैं, बूटी, बूटा, कोनिया, बेल, जाल, जंगला एवं झालर। अनेक बुनकर अपनी रचनात्मकता दर्शाते हुए उन पर गंगा के घाटों के दृश्य भी बुनने लगे हैं। बनारस की जगप्रसिद्ध रेशमी साड़ियों पर वहां के जगप्रसिद्ध घाटों के दृश्य स्वयं में अद्वितीय संगम है। बनारस की प्रसिद्ध स्मारिका के रूप में इस साड़ी को अपने पास रखने का अर्थ है, विश्व के प्राचीनतम जीवंत नगर की धरोहर को संजो कर रखना। इन्हें देख ऐसा प्रतीत होता है मानो काशी की धरोहर को अक्षरशः साड़ी पर उकेर दिया हो।

बुनाई द्वारा वर्षा को आमंत्रण

राजस्थान के थार मरुभूमि में, जयपुर एवं उदयपुर के बाजारों की गलियों में लहरिया एवं बांधनी, ये दो प्रकार के वस्त्र अत्यंत लोकप्रिय हैं। लहरिया साड़ियों में दो या अधिक चटक रंगों में लहरों की आकृतियाँ होती हैं। इन्हें देख ऐसा प्रतीत होता है जैसे मरुस्थल की लहरिया सतह को हूबहू वस्त्रों पर चित्रित किया हो।

जयपुर की लहरिया साडी
जयपुर की लहरिया साडी

एक अन्य मान्यता के अनुसार ये लहरिया आकृतियाँ जल की लहरों का प्रतिनिधित्व करती हैं। एक प्रकार से ये आकृतियाँ वर्षा को आमंत्रण दे रही हैं। हम सब जानते हैं कि थार मरुस्थल विश्व का सर्वाधिक जनसँख्या का मरुस्थल है। इसका श्रेय यहाँ की उत्तम जल प्रबंधन प्रणाली को जाता है। इस साड़ियों एवं वस्त्रों पर लहरिया आकृतियाँ जल की प्रचुरता की ओर संकेत करती प्रतीत होती हैं। कदाचित आकर्षण का नियम लागू करते हुए वे वर्षा को आमंत्रित करते हों।

राजस्थान से बांधनी का काम
राजस्थान से बांधनी का काम

ऐसा माना जाता है कि बांधनी शब्द संस्कृत शब्द पुलकबंद से आया है। अत्यधिक आनंद एवं उल्हास की स्थिति में हमारे रोमकूप पुलकित हो जाते हैं। बांधनी में उन्ही रोमकूपों को आधार बनाया गया है। यहाँ तक कि पोल्का शब्द का मूल भी यही है। इस तकनीक में, आकृतियों के अनुसार, वस्त्रों पर मोमयुक्त धागों से अनेक प्रकार की गांठें कसकर बांधी जाती हैं। तत्पश्चात उन्हें रंगों में डुबाया जाता है। रंगने एवं सूखने के पश्चात इन धागों को खोला जाता है। बंधे भागों पर मूल रंग रह जाता है तथा अन्य भागों पर नवीन रंग चढ़ जाता है जिससे आकृतियाँ उभर कर आती हैं। ये तकनीक राजस्थान एवं गुजरात में प्रमुखता से अपनाई जाती है। अजंता की गुफाओं में चित्रित वस्त्रों में भी यह शैली देखी गयी है।

अजंता के चित्रों में इक्कत

महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में स्थित अजंता की प्राचीन गुफाओं में चित्रित जातक कथाएं २-५वीं सदी की हैं। उनमें चित्रित चरित्रों को जो वस्त्र धारण किये दर्शाया गया है, उनमें आड़ी-तिरछी रेखाओं की इक्कत बुनाई है। इसका अर्थ है कि यह कला लगभग दो सहस्त्राब्दियों से एक जीवंत कला है।

अजंता के भित्तिचित्रों में इक्कत की बुनाई
अजंता के भित्तिचित्रों में इक्कत की बुनाई

इक्कत बुनाई अब अनेक क्षेत्रों में प्रचलन में है, जैसे गुजरात के पाटन से तेलंगाना की पोचमपल्ली तथा ओडिशा के संबलपुर तक। यह शैली आप रेशम तथा सूती, दोनों प्रकार की साड़ियों में देख सकते हैं। बुनाई की इस शैली को आप पुरी के जगन्नाथ मंदिर के पुजारी की शाल पर भी देखेंगे। इस शैली के दुपट्टे भी अत्यंत लोकप्रिय हैं। इक्कत दो रूपों में उपलब्ध हैं, इकहरी इक्कत एवं दुहरी इक्कत। इक्कत, विशेषतः दुहरी इक्कत एक अत्यंत जटिल बुनाई शैली है जिसके लिए उच्च-स्तरीय कौशल की आवश्यकता होती है। गुजरात के पाटन की पटोला साड़ियाँ इसी प्रकार की कोमल एवं जटिल दुहरी इक्कत बुनाई के लिए प्रसिद्ध है।

प्राचीन चित्रों में इक्कत के अतिरिक्त बनारसी जरी वस्त्र एवं जरदोजी भी दृष्टिगोचर होते हैं।

रेशमी साड़ियों पर पावन चिन्ह

रेशमी साड़ियाँ और उन पर कढ़े मंगल चिन्ह
रेशमी साड़ियाँ और उन पर कढ़े मंगल चिन्ह

भारतीय परम्पराओं में स्त्रियों द्वारा साड़ी धारण करना साक्षात लक्ष्मी का रूप धरने के समान माना जाता है जो समृद्धि एवं शुभता की देवी हैं। इसी कारण इन साड़ियों में बहुधा पावन चिन्हों की आकृतियाँ बुनी जाती हैं, जैसे कुम्भ, स्वस्तिक, गज, पक्षी, मोर, रुद्राक्ष इत्यादि। बुनकर अपनी रचनात्मकता प्रदर्शित  करते हुए इन आकृतियों को कुशलता से किनारी, पल्लू अथवा मुख्य भाग में बुनते हैं।

यह हमारे दृश्य कला रूपों के मध्य अप्रतिम जुगलबंदी नहीं है तो क्या है?

सन्दर्भ – ओडिशा पत्रिका

यह संस्करण Silk Mark Organisation of India, Central Silk Board के सहयोग से लिखा गया है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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नृत्यसम्राट नटराज की कथा कहती चोल काल की कांस्य प्रतिमाएं https://inditales.com/hindi/natraj-shiv-kansya-murti-vyakhya/ https://inditales.com/hindi/natraj-shiv-kansya-murti-vyakhya/#respond Wed, 09 Mar 2022 02:30:18 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2613

नृत्य सम्राट भगवान शिव के नटराज रूप का उद्भव तमिलनाडु के चिदंबरम में हुआ था। भारतीय कलाकृति की कदाचित यह सर्वाधिक लोकप्रिय एवं जानी-पहचानी कलाकृति है। लोकप्रियता में इस कलाकृति की निकटतम प्रतिस्पर्धी केवल गणेश की विभिन्न मुद्राओं की प्रतिमाएं हैं। काल, स्थान एवं कला क्षेत्र में आये परिवर्तनों के पश्चात भी नटराज की नृत्य […]

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नृत्य सम्राट भगवान शिव के नटराज रूप का उद्भव तमिलनाडु के चिदंबरम में हुआ था। भारतीय कलाकृति की कदाचित यह सर्वाधिक लोकप्रिय एवं जानी-पहचानी कलाकृति है। लोकप्रियता में इस कलाकृति की निकटतम प्रतिस्पर्धी केवल गणेश की विभिन्न मुद्राओं की प्रतिमाएं हैं। काल, स्थान एवं कला क्षेत्र में आये परिवर्तनों के पश्चात भी नटराज की नृत्य मुद्रा में अधिक अंतर नहीं आया है। यद्यपि, बिरला संग्रहालय में मैंने नटराज की एक मुद्रा देखी जिसमें वे शीर्षासन अवस्थिति में थे।

नृत्यसम्राट नटराज

नटराज की भव्य कांस्य प्रतिमा दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में
नटराज की भव्य कांस्य प्रतिमा दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में

आईये हम भगवान शिव के नटराज रूप के पृष्ठभाग में निहित मूर्ति शास्त्र के विषय में कुछ चर्चा करें। भगवान शिव संहार के द्योतक हैं। इसके पश्चात सृष्टि की रचना होती है। यदि आप भगवान शिव के नटराज रूप का अवलोकन करें तो आप देखेंगे कि यह मुद्रा शिव की इस परिभाषा पर खरी उतरती है। उनकी इस छवि में जीवन चक्र दर्शाया गया है जिसके प्रत्येक भाग का शिव एक अभिन्न अंग हैं। नटराज का अर्थ है, नृत्यसम्राट, जो इस मुद्रा में दिव्य तांडव नृत्य कर रहे हैं।

नटराज की प्रतिमा

ऊपरी दाहिने हाथ में डमरू – चार भुजाधारी शिव के एक दाहिने हाथ में डमरू है जिस पर एक छोटी व मोटी रस्सी बंधी होती है। इस डमरू को जब वे कलाई से गोल घुमा कर बजाते हैं, तब रस्सी के सिरे पर बनी गाँठ डमरू के चमड़े पर टकराती है जिससे डमरू से नाद उत्पन्न होते हैं। डमरू से उत्पन्न नाद उस प्रणव स्वर का द्योतक है जिससे ब्रह्माण्ड की रचना हुई है। भगवान शिव का डमरू जगत की सृष्टि अर्थात जगत की रचना का प्रतीक है।

ऊपरी बाएं हाथ में अग्नि – उनके ऊपरी बाएँ हाथ में अग्नि है जो संहार अथवा विनाश या प्रलय का प्रतीक है। उनके दोनों ओर के दोनों हाथों में स्थित रचना एवं संहार के विपरीत चिन्ह, उनके मध्य संतुलन या स्थिति को दर्शाते हैं। यह कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि रचना एवं संहार एक दूसरी के अनुगामी है।

निचले दाहिने हाथ में अभय मुद्रा – उनका निचला दाहिना हाथ अभय मुद्रा में अवस्थित है। इसका अर्थ है कि वे धर्म के पथ पर अग्रसर शिव भक्तों का संरक्षण करते हैं। अभय एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है, भय विहीन।

निचले बाएं हाथ में वरद मुद्रा –नटराज का निचला बायाँ हाथ वरद मुद्रा में नीचे की ओर झुका हुआ है। यह समस्त जीवों की आत्मा का शरण स्थान अथवा मुक्ति का द्योतक है। उनका यह हाथ ब्रह्माण्ड के सुरक्षात्मक, पोषक व संरक्षक तत्वों का प्रतीक है। यह  एवं संहार के मध्यकाल से सम्बन्ध रखता है।

दाहिना पैर – उन्होंने अपने दाहिने चरण के नीचे अज्ञान के प्रतीक, एक बौने दानव को दबा रखा है। अतः, सृष्टि की रचना, पोषण, संहार तथा पुनर्रचना के अतिरिक्त भगवान शिव अज्ञानता के दानव पर भी अंकुश रख रहे हैं। एक तत्व पर अपना ध्यान अवश्य केन्द्रित करें, दानव आनंदित भाव से भगवान शिव को निहार रहा है।

बायाँ पैर – उनका बायाँ पैर नृत्य मुद्रा में उठा हुआ है जो नृत्य के आनंद को दर्शा रहा है।

कटि पर बंधा सर्प –  उनके कटिप्रदेश पर बंधा सर्प कुण्डलिनी रूपी शक्ति है जो नाभि में निवास करती है। अर्धचन्द्र ज्ञान का प्रतीक है। उनके बाएं कान में पुरुषी कुंडल हैं तथा दायें कान में स्त्री कुंडल हैं, जो यह दर्शाते हैं कि जहां शिव हैं, वहां उनकी शक्ति भी विराजमान हैं। उन्होंने एक नर्तक के समान अपने गले में हार, हाथों में बाजूबंद व कंगन, पैरों में पायल, पैरों की उँगलियों में अंगूठियाँ, कटि में रत्नजड़ित कमरपट्टा आदि आभूषण धारण किये हैं। उनके मुख पर समभाव हैं। पूर्णरुपेन संतुलित। न रचयिता का आनंद, नाही विनाशकर्ता का विषाद। वे जब नृत्य करते हैं तब उनकी जटाएं खुल जाती हैं। उनकी जटाओं के दाहिनी ओर आप गंगा को देख सकते हैं। उनके चारों ओर अग्नि चक्र है जो ब्रह्माण्ड को दर्शाता है।

रचना व संहार का लय

नृत्य सम्राट नटराज
नृत्य सम्राट नटराज

जाने माने भौतिक शास्त्री Fritjof Capra ने अपनी पुस्तक में कहा है, “आधुनिक भौतिक शास्त्र ने यह दिखाया है कि रचना एवं विनाश की लय केवल काल की गति तथा सभी जीवित प्राणियों के जन्म – मृत्यु का  द्योतक मात्र नहीं है, अपितु यह समस्त अजीव पदार्थों का भी सार है।” उस पुस्तक में यह भी कहा गया है कि “उस काल के आधुनिक विज्ञान शास्त्रियों के लिए भगवान शिव का नृत्य उपपरमाण्विक या सूक्ष्माणुओं का नृत्य है।”

उस पुस्तक में लेखक ने यह निष्कर्ष निकाला है कि “सहस्त्रों वर्षों पूर्व भारतीय कलाकारों ने नृत्य में तल्लीन भगवान शिव की छवियों को अनेक कांस्य प्रतिमाओं में साकार रूप प्रदान किया है। उनके काल में भौतिक विदों ने सर्वाधिक उन्नत तकनीक का प्रयोग कर इस दिव्य ब्रह्मांडीय नृत्य की विभिन्न मुद्राओं की श्रंखला को प्रदर्शित किया है। ब्रह्मांडीय नृत्य का यह रूप प्राचीन पौराणिक कथाओं, धार्मिक कलाओं एवं आधुनिक भौतिक शास्त्र का एकीकरण करता है।“

मेरी उनसे एक प्रश्न करने की अभिलाषा है कि क्या आधुनिक कण-भौतिकविद शिव एवं शक्ति को ही कण एवं प्रतिकण कहते हैं, जिनके मिलन से अनंत उर्जा उत्पन्न होती है?

भगवान की स्पष्टतम छवि

कला इतिहासकार आनंद केंटिश कुमारस्वामी कहते हैं कि नटराज भगवान् के कार्यकलापों की स्पष्टतम प्रतिकृति है। नटराज भगवान शिव के नृत्यमग्न छवि की सर्वाधिक उर्जावान प्रतिकृति है। कलामर्मज्ञ भारत-चिन्तक आनंद केंटिश कुमारस्वामी के अनुसार भगवान शिव का नृत्य उनके पाँच क्रियाकलापों का प्रतिनिधित्व करता है जिन्हें पंचक्रिया कहते हैं। वे हैं:

सृष्टि : निरिक्षण, सृजन, विकास

स्थिति : संरक्षण, समर्थन

संहार : विनाश, संसरण

तिरोभाव : अवगुंठन, मूर्त रूप, भ्रम,

अनुग्रह : मुक्ति, मोक्ष, कृपा

शिव के नटराज रूप में इन क्रियाओं की हाथों द्वारा अभिव्यक्ति की गयी है। डमरू द्वारा सृजन, अभय मुद्रा द्वारा संरक्षण, अग्नि द्वारा संहार अथवा विनाश तथा वरद मुद्रा द्वारा मोक्ष की अभिव्यक्ति की गयी है।

वर्णन

आनंद कुमारस्वामी ने नटराज का इन शब्दों में वर्णन किया है। चार भुजा धारी, नृत्य मग्न शिव, गुंथे हुए मणिजड़ित केश जिनकी जटाएं उनके साथ नृत्य कर रही हैं। उनके केश सर्प द्वारा बंधे हुए हैं जिन पर अर्धचन्द्र शोभायमान हैं। उस पर अमलतास की पत्तियों का हार है। अपने दाहिने कर्ण में उन्होंने पुरुषी कुंडल धारण किया है तथा बाएं कान में स्त्री कुंडल। गले में हार, हाथों में कंगन व बाजूबंद, पैरों में पैंजन, हाथों एवं पैरों की उँगलियों में अंगूठियाँ हैं। परिधान के नाम पर उन्होंने मुख्यतः एक लघु धोती, अंगवस्त्र तथा जनेऊ धारण किया है। एक दाहिने हाथ में डमरू तथा दूसरा दाहिना हाथ अभय मुद्रा में उठा हुआ है। एक बाएं हाथ में अग्नि अग्नि धारण की है तो दूसरा बायाँ हाथ बौने दैत्य मुयलका की ओर संकेत कर रहा है। मुयलका ने एक सर्प उठाया हुआ है। बायाँ पैर धरती से नृत्य मुद्रा में उठा हुआ है। शिव कमल के आसन पर खड़े होकर नृत्य कर रहे हैं। उनके चारों ओर गौरव चक्र तिरुवासी है जिससे अग्नि की लपटें निकल रही हैं। चक्र के भीतर से शिव के डमरू एवं अग्नि उठाये हुए हस्त उस चक्र को भीतर से स्पर्श कर रहे हैं।

८१ मुद्राएँ दर्शाते शिव

एक मूर्ति ८१ मुद्राएँ - बादामी कर्णाटक
एक मूर्ति ८१ मुद्राएँ – बादामी कर्णाटक

कर्णाटक के बादामी गुफाओं में स्थित भगवान शिव की एक छवि जिसमें कुल ८१ नृत्य मुद्राएँ प्रदर्शित की गयी हैं।

भारतीय कला के विषय में लिखा गया यह संस्करण इस क्षेत्र में मेरा प्रथम प्रयास है। इस विषय में मैं स्वयं को केवल एक विद्यार्थी मानती हूँ। यदि मेरे प्रयासों में कहीं कोई त्रुटि रह गयी हो तो कृपया मुझे क्षमा करते हुए मेरा मार्गदर्शन करें।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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नमस्ते! जानिये अभिवादन के २० से अधिक प्रकार चौंक गये? https://inditales.com/hindi/namaste-bharat-ke-abhivaadan/ https://inditales.com/hindi/namaste-bharat-ke-abhivaadan/#comments Wed, 08 Apr 2020 02:30:40 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1901

नमस्ते! इस संस्करण के आरम्भ का इससे उत्तम साधन और क्या हो सकता है! किसी भी स्थान में सर्वप्रथम जो आप सीखते हैं, वह है उस स्थान के अभिवादन की शैली। किसी भी स्थान में पहुँचने से पूर्व ही आप वहाँ का प्रचलित अभिवादन सुनते हैं, विमान में, विमानतल में, टैक्सी में तथा आपके गंतव्य […]

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नमस्ते!

इस संस्करण के आरम्भ का इससे उत्तम साधन और क्या हो सकता है!

किसी भी स्थान में सर्वप्रथम जो आप सीखते हैं, वह है उस स्थान के अभिवादन की शैली। किसी भी स्थान में पहुँचने से पूर्व ही आप वहाँ का प्रचलित अभिवादन सुनते हैं, विमान में, विमानतल में, टैक्सी में तथा आपके गंतव्य स्थान पर। साथ ही आप अपने साथ ले जाते हैं अपनी मातृभूमि के अभिवादन की शैली।

नमस्तेनमस्ते सम्पूर्ण भारत का सर्वाधिक प्रयुक्त तथा लोकप्रिय अभिवादन है। अधिकतर समय, जैसे ही लोगों को आपके भारतीय होने की जानकारी प्राप्त होती है, वे अपने हाथ जोड़कर, नमस्ते द्वारा आपका अभिवादन करते हैं।

भारत वर्ष में जहां पग पग पर विभिन्नता हो वहाँ अभिवादन की प्रक्रिया कैसे समान हो सकती हैं! इस संस्मरण में मैं प्रस्तुत करना चाहती हूँ भारत के कुछ प्रमुख क्षेत्रों में प्रयोग में आने वाली अभिवादन की विभिन्न शैलियाँ।

मैं ट्विटर एवं फेसबुक को भी धन्यवाद देना चाहती हूँ जिन्होंने इस सूची में योगदान दिया है। यद्यपि इनमें से अधिकतर  अभिवादनों के विषय में मुझे जानकारी थी, तथापि हिमाचल के ढाल कारु जैसे कुछ अभिवादन मेरे लिए भी नवीन थे।

इस संस्मरण के लिए शोध करना मेरे लिए अत्यंत ही रोचक तथा मनोरंजक था।

नमस्ते तथा इसके विभिन्न स्वरूप

नमस्ते का अक्षरशः अर्थ है, ‘आपके भीतर के दिव्य स्वरूप के समक्ष मैं शीश झुकाता अथवा झुकाती हूँ’। आप किसी भी हिप्पी से पूछिए, वे एक चरण आगे जाकर इसका अर्थ यह बताते हैं, ‘मेरे भीतर का दिव्य स्वरूप आपके भीतर के दिव्य स्वरूप को प्रणाम करता है’।

नमस्ते, इस शब्द के कई रूपांतर हैं।

नमस्कार – इसका प्रयोग तब किया जाता है जब आप एक से अधिक व्यक्तियों का अभिवादन करते हैं।

यही नमस्ते केरल में यह नमस्कारम बन जाता है तो कर्नाटक में यह नमस्कारा तथा आंध्र में नमस्कारमु बन जाता है।

नेपाल के निवासी भी इसी अभिवादन, नमस्कार का प्रयोग करते हैं।

इन सब अभिवादनों का एक ही अर्थ है – किसी भी वार्तालाप अथवा चर्चा से पूर्व मैं आपके भीतर के दिव्य स्वरूप का अभिनंदन करता हूँ।

राम राम तथा इसके विभिन्न प्रकार

राम राम, यह भारत के हिन्दी भाषी क्षेत्रों में नमस्ते के पश्चात सर्वाधिक प्रचलित अभिवादन है। अवध एवं मिथिला में सीता -राम तथा बिहार एवं झारखंड में जय सिया-राम कहा जाता है। हरियाणा में राम राम द्वारा ही अभिवादन किया जाता है।

इन सभी अभिवादनों का पृष्ठभागीय ध्येय है विष्णु के ७ वें अवतार, श्री राम का नाम स्मरण करना। श्री राम को मर्यादा पुरुषोत्तम भी कहा जाता है। कदाचित इस अभिवादन द्वारा हम स्वयं को एवं एक दूसरे को राम के आचरण को आत्मसात करने के लिए प्रेरित करते हैं।

गुजरात का जय श्री कृष्ण

यदि आपने गुजरात का भ्रमण किया है, तो आपने गुजराती परिवारों से वार्तालाप किया होगा अथवा दूरदर्शन पर गुजराती कार्यक्रम देखे होंगे। आपने यह अवश्य ध्यान दिया होगा कि वे एक दूसरे का अभिनंदन ‘जय श्री कृष्ण’ द्वारा करते हैं।

कृष्ण ने द्वारका को अपनी स्वर्ण नगरी बनायी थी। उन्होंने वहाँ से विश्व का संचालन किया था। गुजरात के निवासियों के हृदय पर वे अब भी राज करते हैं। इसीलिए द्वारका में यह अभिवादन और भी विशिष्ठ होकर जय द्वारकाधीश बन जाता है।

ब्रज भूमि में राधे राधे

ब्रज में राधाजी राज करती हैं। वे यहाँ की रानी भी हैं तथागोपिका भी। कृष्ण तक पहुँचने के लिए भी आपको राधा का ही सहारा लेना पड़ता है। आपको उनके विषय में कुछ अधिक पढ़ने अथवा जानने की आवश्यकता नहीं है। ब्रज में जहां भी जाएंगे राधे राधे की गूंज सर्वत्र सुनायी देगी। ब्रज में राधे राधे का प्रयोग कई प्रकार से किया जाता है, जैसे अभिवादन, क्षमा करें, रास्ता दीजिए, विस्मय, होकार, नकार इत्यादि।

ब्रज के मंदिरों में कभी कभी आप जय श्री राधे भी सुनेंगे।

पंजाब में सत् श्री अकाल

पंजाबी भाषी एवं सिख समुदाय के लोगों में अधिकांशतः सत् श्री अकाल द्वारा अभिवादन किया जाता है। सत् का अर्थ है सत्य, श्री एक आदरणीय सम्बोधन है तथा अकाल का अर्थ है अनंत अथवा शाश्वत। अतः इस अभिवादन द्वारा आप शाश्वत सत्य का स्मरण कर रहे हैं। आप यह स्वीकार कर रहे हैं कि सत्य शाश्वत है तथा हम सब के भीतर निवास करता है।

सत् श्री अकाल गुरु गोबिन्द सिंह द्वारा दिया गया आव्हान है- जो बोले सो निहाल, सत् श्री अकाल।

एक अन्य अभिवादन है, ‘वाहे गुरु जी का खालसा, वाहे गुरु जी की फतह’ – यह स्मरण कराता है कि हम सब एक परम आत्मा से उत्पन्न हुए हैं जो अत्यन्त पवित्र तथा नश्वर है।

वणक्कम – तमिल नाडु

तमिल भाषी लोग विश्व में जहां भी रहें, वे आपस में एक दूसरे को वणक्कम द्वारा ही प्रणाम करते हैं। अनिवार्य रूप से इसका अर्थ नमस्ते ही है। आपके भीतर वास करते दिव्य स्वरूप के समक्ष नतमस्तक होना तथा उसका आदर करना। इस शब्द कि व्युत्पत्ति हुई है एक अन्य तमिल शब्द, वणगु से जिसका अर्थ है नतमस्तक होना अथवा झुकना। कुछ शास्त्रों के अनुसार वणक्कम विशेषतः आपके भौंहों के मध्य स्थित तीसरी आँख को संबोधित करता है।

खम्मा घणी – राजस्थान

खम्मा घणी, यह अभिवादन मैंने सर्वप्रथम राजस्थानी परिवेश में चित्रित कुछ हिन्दी चलचित्रों में सुना था। अपनी उदयपुर यात्रा के समय मैंने इसका प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त किया। मेरे मस्तिष्क में यह शब्द अनायास ही राजस्थान से जुड़ गया। किन्तु वहाँ किसी ने मुझे इसका अर्थ नहीं समझाया। इसके संबंध में मेरे मस्तिष्क में दो अनुमान कौंध रहे हैं:

प्रथम अनुमान सहज है – खम्मा संस्कृत के शब्द क्षमा से उत्पन्न प्रतीत होता है। घणी का अर्थ है बहुत। अतः खम्मा घणी, इस अभिवादन का अर्थ है, आपके आतिथ्य सत्कार में मेरे द्वारा किसी भी प्रकार की चूक अथवा अनादर हुआ हो तो उसके लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूँ।

दूसरा अनुमान मैंने ऐतिहासिक तथ्यों से कुछ ऐसा लगाया – ८ वीं. शताब्दी में ३ उत्तरोत्तर मेवाड़ी सम्राटों के नामों में खम्मन, इस शब्द का समन्वय था। ये तीनों सम्राट अरबी सेना के कई आक्रमणों को सफलता पूर्वक टालने में सफल हुए थे। इन सम्राटों के राज में उनकी प्रजा ने आगामी १००० वर्षों तक सुरक्षित एवं सुखपूर्वत जीवन व्यतीत किया था। इसीलिए लोगों ने एक दूसरे का अभिवादन खम्मा घणी द्वारा करना आरंभ किया जिसका अर्थ है – हमें इसी प्रकार के कई खम्मनों का वरदान प्राप्त हो।

इन अनुमानों से आप किससे सहमत हैं इसका निर्णय आप स्वयं लें। किन्तु जब लोग आदर से अपने हाथ जोड़कर इसका उच्चारण करते हैं तब यह कानों में शहद घोल देता है।

बड़ों को अभिवादन करते समय आदर प्रदान करने के लिए ‘सा’ शब्द जोड़ा जाता है, जैसे खम्मा घणी सा।

लद्दाख का जूले

जब आप हिमाचल में लाहौल स्पीति घाटी का भ्रमण कर रहे हैं अथवा लद्दाख में सड़क यात्रा पर निकले हैं तो आपको कोई ना कोई जूले शब्द से नमस्ते अवश्य करेगा। इस अभिवादन का प्रयोग अधिकतर हिमालय की घाटियों के बौद्ध बहुल क्षेत्रों में किया जाता है। इसका अर्थ कदाचित आदर होता है। मुझे विश्वसनीय रूप से ना तो इसका अर्थ ज्ञात है, ना ही इस शब्द की जड़ों के विषय में जानकारी है। यदि आप जानते हैं तो अपनी जानकारी हमसे अवश्य साझा करें।

राधे राधे के समान जूले का अर्थ भी लद्दाख में कई हो सकते हैं, जैसे अभिवादन, धन्यवाद, कृपया, क्षमा करें इत्यादि।

लद्दाख के कुछ क्षेत्रों में ताशी देलेक का भी प्रयोग किया जाता है।

सम्पूर्ण भारत के जैनियों का जय जिनेन्द्र

जय जिनेन्द्र, इस अभिवादन का प्रयोग जैन धर्म के सभी अनुयायी एक दूसरे को संबोधित करने के लिए करते हैं। दैनिक जीवन में हमारा सामना इस शब्द से अधिक नहीं होता क्योंकि भारत में तथा भारत के बाहर भी जैन समुदाय के लोग अल्प संख्या में हैं। वे अधिकतर आपस में ही इस अभिवादन का प्रयोग करते हैं।

जय जिनेन्द्र का अर्थ है जिनेन्द्र अथवा तीर्थंकर की जीत। तीर्थंकर का अर्थ है ऐसी दिव्य आत्मा जिसने अपनी सभी इंद्रियों पर विजय पा ली हो तथा परम ज्ञान प्राप्त कर लिया हो।

यह अभिवादन वास्तविक ज्ञान प्राप्त लोगों के समक्ष नतमस्तक होने के समान है।

आयप्पा के अनुयायियों का स्वामी शरणं

स्वामी शरणं अथवा स्वामी शरणं आयप्पा वास्तव में एक मंत्रोच्चारण है जिसका प्रयोग आयप्पा के अनुयायी एक दूसरे से मिलने पर अभिवादन के रूप में करते हैं। वे किसी भी वार्तालाप का आरंभ तथा अंत इस मंत्र के उच्चारण द्वारा करते हैं। केरल तथा अन्य दक्षिण भारतीय राज्यों में आयप्पा के कई अनुयायी हैं।

आदाब – मुस्लिम समुदाय का अभिवादन

मुस्लिम समुदाय के लोग तथा उन क्षेत्रों के लोग जहां उर्दू भाषा का चलन हो, आदाब द्वारा एक दूसरे का अभिवादन करते हैं। मुझे कहीं भी इस शब्द का अर्थ अथवा उद्देश्य ज्ञात नहीं हो पाया। यदि आप जानते हैं तो कृपया साझा करें।

हिमाचल का ढाल करू

यह भी हिमाचली क्षेत्रों के लोगों के अभिवादन का एक प्रकार है। यद्यपि सत्य कहूँ तो मैंने अभी तक यह शब्द सुना नहीं है। तथापि मेरे हिमाचली मित्रों ने सत्यापित किया है कि हिमाचल के कुल्लू मनाली क्षेत्र में अभिवादन के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। संभवतः इसका अर्थ भी नमस्ते के समान है।

नर्मदा के तट पर नर्मदे हर

नर्मदा नदी के तीर जब आप चलेंगे, तब सबके मुख से आप केवल एक ही अभिवादन सुनेंगे, नर्मदे हर। इसका अर्थ है, नर्मदा देवी हमारे सभी दुख एवं कष्ट हर ले।

हर हर गंगे भी ऐसा ही अभिवादन है जो आप ऋषिकेश, प्रयागराज तथा वाराणसी जैसे स्थानों में अवश्य सुनेंगे। किन्तु वहाँ इसका प्रयोग इतना आम नहीं है जितना कि नर्मदा के निकट नर्मदे हर का है।

बीकानेर में जय जय बोलिए

बीकानेर की यात्रा के समय जब मैं अपने अतिथि गृह पहुंची, उन्होंने मेरा स्वागत ‘जय जय’ द्वारा किया। जब मैंने उनसे इसके विषय में पूछा, तब उन्होंने मुझे बताया कि बीकानेर के लोग इसी प्रकार एक दूसरे का अभिवादन करते हैं। बीकानेर में अन्यत्र मुझे यह सुनाई नहीं दिया, किन्तु सुनने में मुझे यह अत्यन्त मधुर, राजसी तथा वीर रस से ओतप्रोत प्रतीत हुआ।

बड़ों को प्रणाम

यह सम्पूर्ण भारत में छोटों द्वारा बड़ों के अभिवादन स्वरूप प्रयोग में लाया जाता है। अधिकांशतः इसके साथ चरण स्पर्श भी किए जाते हैं।

विभिन्न क्षेत्रों में इसके स्वरूप में भिन्नता आ जाती है किन्तु इसका अर्थ परिवर्तित नहीं होता। जैसे पंजाब में पैरी पौना अथवा मत्था टेकदा, हिन्दी भाषी क्षेत्रों में पाय लागूँ इत्यादि। इन सबका अर्थ एक ही है, मैं आपके चरण स्पर्श करती अथवा करता हूँ, आप मुझे आशीर्वाद देने की कृपया करें।

क्षेत्र अथवा समुदाय संबंधी अभिवादन

नमस्ते

  • जय भोले नाथ – वाराणसी में। वाराणसी एक शिव नगरी है। अतः अभिवादन में उनका नाम लिया जाना स्वाभाविक है।
  • जय जगन्नाथ – पुरी तथा उड़ीसा के आसपास के क्षेत्रों में।
  • हरी ॐ – चिन्मय मिशन के सदस्य तथा अनुयायी इस प्रकार एक दूसरे का अभिवादन करते हैं। वे इसका प्रयोग वार्तालाप के आरंभ तथा अंत में, किसी को पुकारने में तथा जहां कहीं भी संभव हो, करते हैं।
  • जय श्री महँकाल – उज्जैन में।
  • जय स्वामीनारायण – स्वामीनारायण के अनुयायी इस प्रकार नमस्कार कहते हैं।

हैलो

हैलो भारतीय अभिवादन नहीं है। दुर्भाग्य से भारत में अभिवादन के रूप में इसका प्रयोग सर्वाधिक रूप से होता है। विशेषतः शहरी क्षेत्रों में तथा दूरभाष का प्रयोग करते समय। यह संस्करण लिखते समय मुझे हैलो शब्द की उत्पत्ति के विषय में ज्ञात नहीं था। यद्यपि हम सब इस शब्द का प्रयोग एक दिवस में अनेक बार करते हैं। वस्तुतः यह शब्द अभिवादन कदापि नहीं है, अपितु किसी का ध्यान खींचने के लिए इसका प्रयोग किया जाता था। इसका एक अन्य रूप अहोय है।

हैलो के विषय में चौंकाने वाला सत्य जाने : हैलो का संक्षिप्त इतिहास

हैलो को संक्षिप्त कर हाय भी कहा जाता है।

गुड मॉर्निंग अर्थात सुप्रभात

गुड मॉर्निंग, गुड आफटरनून, गुड इवनिंग तथा गुड नाइट एक दूसरे का अभिवादन करने का निष्पक्ष तथा धर्मनिरपेक्ष साधन है। मैंने भी इन्हे विद्यालय में सीखा था तथा इनका प्रयोग अपने कॉर्पोरेट जीवन के अंत तक करती आई हूँ। गुड मॉर्निंग अब मॉर्निंग में ही सिमट गया है।

जय झूलेलाल

जय झूलेलाल का प्रयोग सिन्धी समाज के लोग करते हैं। झूलेलाल को समुद्र देवता वरुण का अवतार माना जाता है।

जय माता दी

देवी माँ के भक्तगण नमस्कार स्वरूप इसका प्रयोग करते हैं। यहाँ माता का अर्थ जगदंबा है। अर्थात माता जो जन्मदायिनी है, पालनकर्ता है तथा ब्रम्हांड में स्थित प्रत्येक चल-अचल तथा जीव-निर्जीव की नाशक भी है।

नमस्ते अभिवादन

श्री लंका में आयुबोवन

श्री लंका का आयुबोवन संस्कृत भाषा से उत्पन्न हुआ है। यह आयुष्मान भव, इस शब्द से संबंधित है।  इसका अर्थ है, आप दीर्घायु हों या आपके आयु लंबी हो।

थायलैंड का सवत्दी

सवत्दी थायलैंड का देशव्यापी अभिवादन है। वहाँ भी इसे हाथ जोड़कर कहा जाता है। स्वस्ति से उत्पन्न इस शब्द का अर्थ शुभेच्छा है।

वे सब अभिवादन, जिनकी उत्पत्ति भारत में हुई है अथवा संस्कृत भाषा से संबंधित है, उन्हे औपचारिक रूप से हाथ जोड़कर कहा जाता है। तथापि अनौपचारिक रूप से कभी कभी ऐसे भी कह दिया जाता है।

यदि मुझसे किसी भारतीय अभिनंदन का उल्लेख छूट गया हो तो कृपया टिप्पणी खंड में उनके विषय में अवश्य लिखें।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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५० भारतीय नगरों के नाम – देवी के नामों पर आधारित https://inditales.com/hindi/indian-cities-named-after-devi-hindi/ https://inditales.com/hindi/indian-cities-named-after-devi-hindi/#comments Wed, 03 Oct 2018 02:30:14 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1016

कुछ समय पूर्व हमने अपने पाठकों से एक प्रश्न पूछा था इंडीटेलस के फेसबुक पृष्ठ तथा ट्विट्टर हत्थे पर। विषय था देवियों के नाम पर आधारित भारतीय नगर-नगरियों की सूची। प्रेषित करने से पूर्व मैंने स्वयं देवी के नाम पर आधारित नगरों की सूची बनानी चाही थी। केवल पांच नगरों के नाम ही मेरे मानसपटल […]

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कुछ समय पूर्व हमने अपने पाठकों से एक प्रश्न पूछा था इंडीटेलस के फेसबुक पृष्ठ तथा ट्विट्टर हत्थे पर। विषय था देवियों के नाम पर आधारित भारतीय नगर-नगरियों की सूची। प्रेषित करने से पूर्व मैंने स्वयं देवी के नाम पर आधारित नगरों की सूची बनानी चाही थी। केवल पांच नगरों के नाम ही मेरे मानसपटल पर उभर कर आये। इनमें से ३ मुख्य नगरों के नामों से सूची का आरम्भ करते हुए मैंने प्रेषकों से सूची में वृद्धि करने का आवाहन किया था।

देवी के नाम पर पड़े इन भारतीय  नगरों के नाम
देवी के नाम पर पड़े इन भारतीय नगरों के नाम

इस प्रश्न मञ्जूषा को प्रेषकों ने भरपूर प्रतिक्रिया से अलंकृत किया। प्रेषकों का योगदान मेरी कल्पना से परे था। इनमें कुछ के नामों से मैं परिचित थी, किन्तु देवी-देवताओं से उनके सम्बन्ध से किंचित अनभिज्ञ थी। उदाहरणतः अम्बाला। कुछ ऐसे प्रश्न मानसपटल पर उभरे जिनके अत्यंत रोचक उत्तर प्रकट हुए। जैसे मीरजापुर को अब तक मिर्ज़ापुर समझ कर भ्रमित हो रही थी।

जैसे ही मैंने फेसबुक तथा ट्विट्टर से प्राप्त नामों को सूचीबद्ध करना आरम्भ किया, मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे सम्पूर्ण भारत देवी के चिन्हों से अलंकृत है। सम्पूर्ण भारतवंश देवी को समर्पित धार्मिक स्थलों से परिपूर्ण है। और हां, भारतवर्ष में फैले  देवी के ५१ शक्तिपीठों इस सूची में नहीं हैं। यूं भी शक्तिपीठयुक्त सर्व ५१ स्थलों के नाम देवी को समर्पित नहीं हैं। अतः यदि इन शक्तिपीठों को भी भारत के नक़्शे पर अंकित किये जाएँ, तो आपको देवी के वर्चस्व का सही आभास होगा।

देवी के नामों पर आधारित कई नगर भारत के सीमापार भी हैं। आप सब जानते हैं कि बांग्लादेश की राजधानी ढाका है। किन्तु क्या आप जानते हैं कि ढाका शब्द की व्युत्पत्ति कहाँ से हुई है? आईये आपकी जिज्ञासा शांत करती हूँ। ढाका शब्द देवी के एक नाम दक्षिणेश्वरी देवी से उत्पन्न है।

देवी के नामों से अलंकृत इन भारतीय नगरों के नामों की जानकारी मेरे लिए किसी आविष्कार से कम नहीं थी। इनमें से प्रत्येक नगर में देवी का मंदिर निर्मित है जहाँ देवी के उस रूप की प्रतिमा स्थापित है जिस पर आधारित नाम नगर को प्रदान किया गया है। मेरी अभिलाषा है कि मैं इन सर्व मंदिरों के छायाचित्र ले कर आपके साथ साझा करूं। किन्तु इस कार्य के पूर्ण होने में समय लगेगा। अतः अभी के लिए मैं केवल इन नगरों के नाम आप के साथ साझा कर रही हूँ।

आप सब से अपेक्षा करती हूँ कि यदि आप के पास इन मंदिरों के चित्र हों तो आप अवश्य उन्हें मुझसे साझा कर इस संस्करण को धनी बनाने में मेरी सहायता करेंगे।

देवी के नाम धारित नगरों की सूची

1. मुंबई (महाराष्ट्र) – मुम्बा देवी अथवा महा-अम्बा देवी – कोली समुदाय की अधिष्ठात्री देवी
2. चंडीगड़ (चंडीगड़) – चंडी देवी
3. मंगलुरु (कर्नाटका) – मंगला देवी
4. शिमला (हिमाचल प्रदेश) – श्यामला देवी
5. कोलकाता (पश्चिम बंगाल) –काली देवी
6. कन्याकुमारी (तमिल नाडू) – कन्याकुमारी
7. तुलजापुर (महाराष्ट्र) – तुलजा भवानी
8. त्रिपुरा (त्रिपुरा) – त्रिपुर सुन्दरी
9. हासन (कर्नाटका) – हासनम्बे या हासन अम्बे
10. अम्बेजोगई (महाराष्ट्र) – अम्बा जोगेश्वरी
11. मैसूरू (कर्नाटका) – महिषासुरमर्दिनी
12. अम्बाला (हरियाणा) – भवानी अम्बा देवी
13. दुर्गापुर (पश्चिम बंगाल) – माँ दुर्गा
14. नैनीताल (उत्तराखंड) – नैनी देवी
15. पटना (बिहार) – पाटन देवी
16. किरीटेश्वर (पश्चिम बंगाल) – किरीटेश्वरी देवी
17. भौचार्जी (गुजरात) – बहुचर माता
18. श्री नगर (जम्मू काश्मीर) – श्री देवी अथवा लक्ष्मी देवी। यह श्री चक्र की अभिव्यक्ति है जो हरी पर्वत के ऊपर स्थित शारिका देवी पीठ के रूप में स्थापित है।
19. जींद (हरियाणा) – जयंती देवी – जैन्तापुरी – तथाकथित रूप से पांडवों द्वारा स्थापित।
20. अम्बाजी (गुजरात) – अम्बा देवी
21. विजयवाड़ा (आन्ध्र प्रदेश) – विजय दुर्गा अथवा कनक दुर्गा
22. संबलपुर (उड़ीसा) – समलाई देवी/समलेश्वरी
23. दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़) – दंतेश्वरी देवी
24. कालका (हरियाणा) – कालिका देवी
25. सोलन (हिमाचल प्रदेश) – शूलिनी देवी
26. अम्बिकापुर (छत्तीसगढ़) – अम्बिका देवी
27. आरा (बिहार) – अरण्य देवी
28. मीरजापुर (उत्तर प्रदेश) – लक्ष्मी मीरजा अर्थात् सागर द्वारा उत्पन्न। ये लक्ष्मीजी का अवतार हैं।
29. कटक (उड़ीसा) –  कटक चंडी देवी
30. भद्रक (उड़ीसा) – माँ भद्रकाली
31. साम्भर (राजस्थान) – शाकम्बरी देवी – जहां साम्भर झील स्थित है जो अपने नमक के लिए प्रसिद्द है ।
32. तारापीठ (पश्चिम बंगाल) – माँ तारा
33. कोलार (कर्नाटका) – कोलारम्मा देवी
34. माउंट आबू (राजस्थान) – अर्बुदा देवी मंदिर, अर्बुदरन्य
35. चोटीला (गुजरात) – चामुंडा देवी
36. देवास (मध्य प्रदेश) – देवास का अर्थ है देवी का वास। देवास में वैशिनी टेकड़ी पर ३ देवी के मंदिर हैं। तुलजा भवानी, चंडिका तथा कालिका देवी।
37. चांदीपुर (उड़ीसा) – भुदारा चंडी देवी
38. सीतामढ़ी (बिहार) – जानकी देवी – देवी सीता का जन्मस्थल
39. विशाखापट्टनम (आंध्र प्रदेश) – वैशाखा – ऐसा माना जाता है कि यह मंदिर वर्तमान में जलमग्न है।
40. वल्लिकवु (कोल्लम, केरल) – श्री वल्ली देवी
41. ढाका (बांग्लादेश) दकिनेश्वरी देवी अथवा दक्षिणेश्वरी देवी – इन्टरनेट बताता है यह बांग्लादेश का राष्ट्रीय मंदिर है।
42. चिट्टागोंग (बांग्लादेश) – छातेश्वरी देवी। चिट्टागोंग को छाताग्राम भी कहा जाता था।

इनके अतिरिक्त कुछ और नगरों के भी नाम मुझे प्राप्त हुए हैं किन्तु देवी के नामों से इनके संबंधों के पुष्टीकरण नहीं हो पाई है।
1. तारापुर – कदाचित माँ तारा के नाम पर आधारित । लेकिन मुझे इस सम्बन्ध में कहीं भी उल्लेख प्राप्त नहीं हुआ है।
2. अम्दावाद (गुजरात) – अहमदाबाद को आशावल, कर्णावती, राजनगर, श्रीनगर, श्रीपुर आदि नामों से भी जाना जाता है। कदाचित अंतिम नाम देवी से सम्बन्ध रखता हो। कदाचित किसी काल में देवी के इस रूप को समर्पित मंदिर यहाँ उपस्थित हो।
3. कांगरा (हिमाचल प्रदेश) – कांगरा देवी को व्रजेश्वरी देवी के नाम से भी जाना जाता है।
4. कोलाबा (मुम्बई) – कालबादेवी
5. सीताभेन्ग्रा (छत्तीसगढ़) – यह एक गुफा है। ज्ञात नहीं कि इस नाम से यहाँ कभी कोई नगरी भी थी।
6. दिल्ली – दिल्ली को किसी काल में योगिनिपुरी भी कहा जाता था। योगमाया, यह एकमेव जीवित योगिनी मंदिर है।
7. कोल्हापुर (महाराष्ट्र) – कोल्लम्मा देवी
8. अम्बात्तुर (तमिल नाडू) – यह देवी के इक्यान्नावे शक्तिपीठ पर आधारित नाम है। यहाँ देवी वैष्णवी की आराधना की जाती है।

कई देवियों के नामों से कदाचित आप अनभिज्ञ हो। याद रखिये वे स्थानीय आराध्य अथवा ग्राम देवियों के नाम भी हो सकते हैं।

देवी के नाम  एवं भारतीय नगर
देवी के नाम एवं भारतीय नगर

यदि आप इनके अतिरिक्त अन्य स्थानों के नामों से परिचित हों जो देवी अथवा उनके किसी भी रूप पर आधारित हों, निम्न दर्शाए टिप्पणी खंड में उनका उल्लेख करना ना भूलें। यह इस संस्करण को अधिक संपन्न करने में अत्यंत सहायक होगा।

अंत में मैं उन सभी पाठकों का आभार मानना चाहती हूँ जिन्होंने ट्विट्टर के द्वारा मेरे प्रश्नोत्तरी को गंभीरता से लेकर नामों की सूची बनाने में योगदान दिया। इसके पूर्व भी पाठकों के सहयोग से मैंने एक संस्करण का संकलन किया था, भारतीय नगर जहां दो अथवा अधिक नदियाँ बहती हैं।

यह एक अद्भुत सहयोगी परियोजना है जो पाठकों के सहयोग से जन्म लेती है। यह मेरे अत्यंत आनंदमय सुयोग होगा यदि आपका सहयोग इसी प्रकार से प्राप्त होता रहे। यदि आपके समक्ष इस प्रकार के संस्करण हेतु सुझाव हों तो निम्न टिप्पणी खंड में अवश्य साझा करें।

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अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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