यात्रा काव्य Archives - Inditales https://inditales.com/hindi/category/यात्रा-काव्य/ श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Mon, 12 Jun 2023 04:46:01 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.7.5 “चैती” एक ऋतु की लोक गायन शैली से परिचय https://inditales.com/hindi/chaiti-lok-gayan-shaili/ https://inditales.com/hindi/chaiti-lok-gayan-shaili/#respond Wed, 03 Mar 2021 02:30:09 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2222

हिन्दुस्तानी संगीत के तीन मुख्य स्वरूप है –लोक संगीत, शास्त्रीय संगीत और उपशास्त्रीय संगीत। ‘लोक’ शब्द संस्कृत के ‘लोकदर्शने’ धातु में ‘घञ् प्रत्यय लगाकर बना है, जिसका अर्थ है – देखने वाला। साधारण जनता के अर्थ में इस शब्द का प्रयोग ऋग्वेद में अनेक स्थानों पर हुआ है। डॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल के शब्दों में, “लोक […]

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हिन्दुस्तानी संगीत के तीन मुख्य स्वरूप है –लोक संगीत, शास्त्रीय संगीत और उपशास्त्रीय संगीत।

‘लोक’ शब्द संस्कृत के ‘लोकदर्शने’ धातु में ‘घञ् प्रत्यय लगाकर बना है, जिसका अर्थ है – देखने वाला। साधारण जनता के अर्थ में इस शब्द का प्रयोग ऋग्वेद में अनेक स्थानों पर हुआ है।

डॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल के शब्दों में, “लोक हमारे जीवन का महासमुद्र हैं, जिसमें भूत, भविष्य और वर्तमान संचित हैं। अर्वाचीन मानव के लिये लोक सर्वोच्च प्रजापति है।

डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ‘लोक’ शब्द का अर्थ जनपद या ग्राम से न लेकर नगरों व गाँवों में फैली उस समूची जनता से लिया है जो परिष्कृत, रुचिसंपन्न तथा सुसंस्कृत समझे जाने वाले लोगों की अपेक्षा अधिक सरल और अकृत्रिम जीवन की अभ्यस्त होती है।

डॉ० कुंजबिहारी दास ने लोकगीतों की परिभाषा देते हुए कहा है, “लोकसंगीत उन लोगों के जीवन की अनायास प्रवाहात्मक अभिव्यक्ति है, जो सुसंस्कृत तथा सुसभ्य प्रभावों से बाहर कम या अधिक आदिम अवस्था में निवास करते हैं। यह साहित्य प्रायः मौखिक होता है और परम्परागत रूप से चला आ रहा है।”

यह मान्यता है की प्रकृतिजनित, नैसर्गिक रूप से लोक कलाएँ पहले उपजीं, परम्परागत रूप में उनका क्रमिक विकास हुआ और अपनी उच्चतम गुणबत्ता के कारण शास्त्रीय रूप में ढल गईं।

लोकगीत काव्य रस से ओत-प्रोत, स्वर-सने, लय-लसे, हृदय तल से उभरे, सर्वथा मनोहारी। विविधता में एकता के साक्षात् प्रतीक। भाषाएँ भिन्न, बोलियाँ विभिन्न, किन्तु विषयवस्तु, स्वर-संयोजन तथा लय-प्रवाह में लगभग समानता। इनकी लघुकाय धुनों को सुनकर ‘बिहारी सतसई विषयक यह उक्ति सहज ही मानस में गूंज उठती है

सतसैया के दोहरे, ज्यों नावक के तीर, देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर।”

सच पूछा जाय तो ये लोकगीत हमारे साहित्य की अमूल्य निधि हैं। उनके भीतर से हमारा इतिहास झाँकता है। वे सही अर्थों में हमारे सामाजिक जीवन के दर्पण हैं। इतिहास शोधक, यदि इन लोकगीतों में निहित सामग्री की छान-बीनकर, समुचित विश्लेषण चयन कर उनका अपेक्षित उपयोग करें तो हमारा इतिहास कहीं अधिक सजीव, संतुलित और सर्वांगीण बन जाएगा।

पंडित छन्नूलाल मिश्र जी
पंडित छन्नूलाल मिश्र जी – विकिपीडिया

भारतीय संस्कृति की अनूठी धरोहर-लोकगीत। काव्य रस वसंत का अवसान काल चैत की रातों के साथ होता है, इसलिए शृंगार का सम्मोहन बढ़ जाता है। यही कारण है कि चैत मास को ‘मधुमास’ की सार्थक संज्ञा दी गई है। संयोगियों के लिए चैत मास जितना सुखद है उतना ही दुखद है विरह-व्याकुल प्राणियों के लिए।

चैत की सुहानी संध्या, शुभ्र चाँदनी और कोकिला के मादक स्वर का वर्णन करते हुए महाकवि कालिदास ‘ऋतुसंहार’ में कहते हैं, ‘चैत्र मास की वासंतिक सुषमा से परिपूर्ण लुभावनी शामें, छिटकी चाँदनी, कोयल की कूक, सुगंधित पवन, मतवाले भौरों का गुंजार और रात में आसवपान- ये शृंगार भाव को जगाए रखनेवाले रसायन ही हैं।’

चैत माह का महत्व देखते हुए ही इस माह के लिए भारतीय लोक में एक विशेष संगीत रचना हुई है जिसे चैती कहते हैं। चैती में शृंगारिक रचनाओं को गाया जाता है। चैती के गीतों में संयोग एवं विप्रलंभ दोनों भावों की सुंदर योजना मिलती हैं।

यह तो स्पष्ट है कि वसंत में शृंगार भाव का प्राबल्य होने के कारण चैत का महीना विरहिणियों के लिए बड़ा कठिन होता है। ऐसे में अगर प्रिय की पाती भी आ जाए तो उसे थोड़ा चैन मिले, क्योंकि चैत ऐसा उत्पाती महीना है जो प्रिय-वियोग की पीड़ा को और भी बढ़ा देता है-” आयल चैत उतपतिया हो रामा, ना भेजे पतिया।”

कोई किशोरी वधू देखते-देखते युवावस्था में प्रवेश कर जाती है, किंतु चैत के महीने में उसका प्रिय नहीं लौटता, यह उसे बड़ा क्लेश देता है-” चइत मास जोवना फुलायल हो रामा, कि सैंयाँ नहिं आयल।” प्रेमी जनों के लिए उपद्रवी चैत के मादक महीने में प्रियतम नहीं आए तो बाद में आना किस काम का? वस्तुतः यह मधुमास ही तो मिलन का महीना है- “चैत बीति जयतइ हो रामा, तब पिया की करे अयतई।” विरहिणी अपने प्रियतम को संदेश भेजती है- चैत मास में वन में टेसू फूल गए हैं। भौंरें उसका रस ले रहे हैं। तुम मुझे यह दुःख क्यों दे रहे हो. क्योंकि तुम्हारी प्रतीक्षा करते-करते वियोगजनित दुःख से रोते हुए मैंने अपनी आँखें गँवा दी हैं।

भारतीय शास्त्रीय गायिका-गिरिजा देवी चैती गाते हुए
भारतीय शास्त्रीय गायिका-गिरिजा देवी

चैती गीतों में प्रेम के विविध रूपों की व्यंजना हुई है। इनमें संयोग शृंगार की कहानी भी रागों में लिखी हुई है। कहीं सिर पर मटका रखकर दही बेचने वाली ग्वालिनों से कृष्ण के द्वारा गोरस माँगने का वर्णन है। कहीं कृष्ण-राधा के प्रेम-प्रसंग हैं तो कहीं राम-सीता का आदर्श दांपत्य प्रेम है। कहीं दशरथनंदन के जन्म का आनंदोत्सव है तो कही इन गीतों में दैनिक जीवन के शाश्वत क्रियाकलापों का चित्रण है। साथ ही इनमें चित्र-विचित्र कथा-प्रसंगों एवं भावों के अतिरिक्त सामाजिक जीवन की कुरीतियाँ भी चित्रित हुई हैं। एक चैती गीत में बाल-विवाह की विडंबना चित्रित है-

राम छोटका बलमुआ बड़ा नीक लागे हो रामा

अँचरा ओढ़ाई सुलाइबि भरि कोरवा हो रामा

अँचरा ओढ़ाई।

रामा करवा फेरत पछुअवा गड़ि गइले हो रामा

सुसुकि-सुसुकि रोवे सिरहनवा हो रामा।”

तो कही चैत की चाँदनी का जो उल्लेख अनेक कवियों ने किया है। चैती गीत भी इसके अपवाद नहीं हैं-

चाँदनी चितवा चुरावे हो रामा, चैत के रतिया

मधु ऋतु मधुर-मधुर रस घोलै, मधुर पवन अलसावे हो रामा, चैत के रतिया।”

एक चैती गीत में भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप चित्रित हुआ है- कान्हा चरावे धेनु गइया हो रामा, जमुना किनरवा

तात्पर्य यह कि चैती गीतों में विभिन्न कथानकों का समावेश पाया जाता है। इन गीतों में वसंत की मस्ती एवं इंद्रधनुषी भावनाओं का अनोखा सौंदर्य है। इनके भावों से छलकती रसमयता लोगों को मंत्रमुग्ध कर देती है।

चैती : लोक संगीत की एक ऐसी विधा जो लोक और शास्त्रीय दोनों शैलियों में अत्यन्त लोकप्रिय है।

लोक के अपने अलग रंग हैं और इन्हें पसन्द करने वालों के भी अपने अलग वर्ग हैं लोक संगीत, वह चाहे किसी भी क्षेत्र का हो, उनमें ऋतु के अनुकूल गीतों का समृद्ध खज़ाना होता है यह बात तो आंख मूंद के मान लेने वाली है। लोक संगीत की एक ऐसी ही विधा है ये ‘चैती’ जिसे उत्तर भारत के पूरे अवधी-भोजपुरी क्षेत्र तथा बिहार के भोजपुरी-मिथिला क्षेत्र की सर्वाधिक लोकप्रियता प्राप्त है। भारतीय या हिन्दू कैलेण्डर के चैत्र मास से गाँव के चौपाल में महफिल सजती है और एक विशेष परम्परागत धुन में श्रृंगार और भक्ति रस में पगे ‘चैती’ गीतों का देर रात तक गायन जारी रहता है ।

जब महिला या पुरुष इसे एकल रूप में गाते हैं तो इसे ‘चैती‘ कहा जाता है परन्तु जब समूह या दल बना कर गाया जाता है तो इसे ‘चैता‘ कहा जाता है । इस गायकी का एक और प्रकार है जिसे ‘घाटो‘ कहते हैं । ‘घाटो’ की धुन ‘चैती’ से थोड़ी बदल जाती है । इसकी उठान बहुत ऊँची होती है और केवल पुरुष वर्ग ही समूह में गाते हैं । कभी-कभी इसे दो दलों में बँट कर सवाल-जवाब कर या प्रतियोगिता के रूप में भी प्रस्तुत किया जाता है । इसे ‘चैता दंगल‘ कहा जाता है।

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ग्रीष्म ऋतु में गाये जाने वाले ‘चैती’ गीतों का विषय मुख्यतः भक्ति और श्रृंगार प्रधान होता है ।

भारतीय पञ्चांग के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नया वर्ष शुरू होता है। नई फसल के घर आने का भी यही समय होता है जिसका उल्लास ‘चैती’ में प्रकट होता है। चैत्र नवरात्र प्रतिपदा के दिन से शुरू होता है और नौमी के दिन राम-जन्मोत्सव का पर्व मनाया जाता है । ‘चैती’ में राम-जन्म का प्रसंग लौकिक रूप में होता है ।

इसके आलावा जिस नायिका का पति इस मधुमास में परदेस में है, उस नायिका की विरह व्यथा का चित्रण भी इन गीतों में स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।

कुछ चैती गीतों का साहित्य पक्ष इतना सबल होता है कि श्रोता संगीत और साहित्य के सम्मोहन में बँध कर रह जाता है ।

लोक संगीत विदुषी विंध्यवासिनी देवी की एक चैती में अलंकारों का प्रयोग देखें – ‘चाँदनी चितवा चुरावे हो रामा, चईत के रतिया ….‘ इस गीत की अगली पंक्ति का श्रृंगार पक्ष तो अनूठा है, – ‘मधु ऋतु मधुर-मधुर रस घोले, मधुर पवन अलसावे हो रामा……‘। चैती गीतों की रसमयता ने संत कवियों को भी लुभाया है। इसीलिए कबीरदास जैसे संतों ने भी चैती शैली में निर्गुण पदों की रचना की- “पिया से मिलन हम जाएब हो रामा, अतलस लहंगा कुसुम रंग सारी पहिर-पहिर गुन गाएब हो रामा।”

कबीर की एक और ऐसी ही निर्गुण चैती कुछ इस प्रकार है -‘कैसे सजन घर जैबे हो रामा….‘ (कबीर)

प्रदर्शनकारी कलाओं पर भरतमुनि का ग्रन्थ- ‘नाट्यशास्त्र’ पंचम वेद माना जाता है । नाट्यशास्त्र प्रथम भाग, पंचम अध्याय के श्लोक 57 में ग्रन्थकार ने स्वीकार किया है कि लोक जीवन में उपस्थित तत्वों को नियमों में बाँध कर ही शास्त्र प्रवर्तित होता है । श्लोक का अर्थ है- ‘इस चर-अचर और दृश्य-अदृश्य जगत की जो विधाएँ, शिल्प, गतियाँ और चेष्टाएँ हैं, वह सब शास्त्र रचना के मूल तत्त्व हैं ।’

चैती गीत के लोक स्वरुप में ताल पक्ष के चुम्बकीय गुण के कारण ही उप शास्त्रीय संगीत में यह स्थान पा सका । लोक परम्परा में चैती 14 मात्र के चाँचर ताल में गायी जाती है, जिसके बीच-बीच में कहरवा का प्रयोग होता है। पूरब अंग की बोल बनाव की ठुमरी भी 14 मात्रा के दीपचन्दी ताल में निबद्ध होती है और गीत के अन्तिम हिस्से में कहरवा की लग्गी का प्रयोग होता है । सम्भवतः चैती के इस गुण ने ही उपशास्त्रीय गायकों को आकर्षित किया होगा ।

अब रही इन लोकगीतों के संगीत पक्ष की बात। वह भी कम रोचक नहीं। लोकगीतों की धुनों की, उनकी स्वर संरचना की तथा उनके लयप्रवाह की अपनी विशिष्टताएँ हैं। प्रथम, इनकी बंदिश प्रायः मध्यसप्तक में ही सीमित होती है, वह भी पूर्वार्ध में ही, उत्तरार्ध का स्पर्श यदा-कदा ही होता है। तार एवं मन्द्रसप्तक इनकी परिधि से बाहर ही रहते हैं, कुछ अपवादों को छोड़कर। इसलिये इनका गायन श्रमसाध्य भी नहीं होता। यों तो इन बंदिशों से सभी बारह स्वरों का प्रयोग होता है, किन्तु बहुलता शुद्ध स्वरों की ही होती है।

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लोक जब शास्त्रीय स्वरुप ग्रहण करता है तो उसमें गुणात्मक वृद्धि होती है | चैती गीत इसका एक ग्राह्य उदाहरण है | चैती के लोक और उपशास्त्रीय स्वरुप का समग्र अनुभव करने के लिए आप उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के शहनाई वादन का को रिकार्ड मेरी सलाह मान कर अवश्य सुनें |

ऐसा अनुमान है कि राग रचना की प्रेरणा भी इन्हीं रंजक लोकगीतों के स्वरगुच्छों से मिली होगी। मतंग मुनि ने राग की जो व्याख्या की है, उससे इस अनुमान की पुष्टि होती है

योऽयं ध्वनिविशेषस्तु स्वरवर्ण विभूषितः रंजको जनचित्तानां स रागः कथितो बुधैः

इसका अभिप्राय है कि लोकगीतों की विशिष्ट धुनों ने कलाकार की कल्पना को कुरेदा होगा और उसने ‘स्वर’ (आरोह-अवरोह), तथा वर्ण (रोचक गायन प्रक्रिया) से विभूषित कर उन्हें जनचित्तरंजक बनाकर ‘राग’ का जामा पहना दिया होगा। कुछ रागों के नाम जैसे भूपाली, जौनपुरी, पहाड़ी आदि इस तथ्य के स्पष्ट परिचायक हैं कि ये राग उन स्थानों की लोकप्रिय लोकधुनों से ही निर्मित और विकसित हुए होंगे।

चैती की एक और विशेषता भी उल्लेखनीय है | यदि चैती गीत में प्रयोग किये गए स्वरों और राग ‘यमनी बिलावल’ के स्वरों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो आपको अद्भुत समानता मिलेगी | अनेक प्राचीन चैती में ‘बिलावल’ के स्वर मिलते हैं किन्तु आजकल अधिकतर चैती में ‘तीव्र मध्यम’ का प्रयोग होने से राग ‘यमनी बिलावल’ का अनुभव होता है | यह उदाहरण भरतमुनि के इस कथन की पुष्टि करता है कि लोक कलाओं कि बुनियाद पर शास्त्रीय कलाओं का भव्य महल खड़ा है | सुप्रसिद्ध गायिका निर्मला देवी के स्वरों में कभी आप खोते हैं तो उनकी गायकी में इस चैती ( ‘एही ठैयां मोतिया हेराय….’ : निर्मला देवी) से

परिचित होंगे यहां ठुमरी अंग में एक श्रृंगार प्रधान चैती है | इसमें चैती का लोक स्वरुप, राग ‘यमनी बिलावल’ के मादक स्वर, दीपचन्दी और कहरवा ताल का जादू तथा निर्मला देवी की भावपूर्ण आवाज़ आपको परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ होंगे |

अब अन्त में चर्चा- ‘फिल्म संगीत में चैती’ की | कुछ फिल्मों में चैती का प्रयोग किया गया है | 1964 में बनी फिल्म ‘गोदान’ में पण्डित रविशंकर के संगीत निर्देशन में मुकेश ने चैती- ‘हिया जरत रहत दिन रैन हो रामा….’ गाया है | यह लोक शैली में गाया गीत है |

ठुमरी अंग में आशा भोसले ने फिल्म ‘नमकीन’ में चैती गाया है जिसके बोल हैं- ‘बड़ी देर से मेघा…’ | इस गीत में आपको राग तिलक कामोद का आनन्द भी मिलेगा |’हीया जरत रहत दिन रैन…’ फिल्म : गोदान – गायक : मुकेश ‘बड़ी देर से मेघा बरसे हो रामा…’ फिल्म : नमकीन – गायिका : आशा जी

श्री देवेन्द्र सत्यार्थी का कहना है कि लोकगीत का मूल जातीय संगीत में है। लोकगीत हमारे जीवन विकास की गाथा हैं। उनमें जीवन के सुख-दुःख मिलन-विरह, उतार-चढ़ाव की भावनाएँ व्यक्त हुई हैं। सामाजिक रीति एवं कुरीतियों के भाव इन लोकगीतों में निहित हैं। इनमें जीवन की सरल अनुभूतियों एवं भावों की गहराई है इनका विस्तार कहाँ तक है, इसे कोई नहीं बता सकता। किन्तु इनमें सदियों से चले आ रहे धार्मिक विश्वास एवं परम्पराएँ जीवित हैं। ये हृदय की गहराइयों से जन्मे हैं और श्रुति परम्परा से ये अपने विकास का मार्ग बनाते रहे हैं। अतः इनमें तर्क कम, भावना अधिक है। न इनमें छन्दशास्त्र की लौहश्रृंखला है, न अलंकारों की बोझिलता। इनमें तो लोकमानस का स्वच्छ और पावन गंगा-यमुना जैसा प्रवाह है। लोकगीतों का सबसे बड़ा गुण यह है कि इनमें सहज स्वाभाविकता एवं सरलता है।

शेरिल शर्मा लेखिका -शैरिल शर्मा भारतीय लोक इतिहास एवं साहित्य की छात्रा।  ब्रज भाषा साहित्य की ओर विषेश रूप से प्रयासरत।

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संत कबीर का काव्य, भक्ति, दर्शन और जीवन परिचय https://inditales.com/hindi/sant-kabir-ek-parichay/ https://inditales.com/hindi/sant-kabir-ek-parichay/#comments Wed, 19 Aug 2020 02:30:46 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1972

संत कबीर १५ वीं. शताब्दी के अंत से १६ वीं. शताब्दी के आरंभ तक की समयावधि में एक जुलाहा होने के साथ साथ एक प्रसिद्ध संत कवि थे। यह भारत में भक्ति आंदोलन का काल था। राजनैतिक दृष्टि से इस काल अवधि में इस्लामी शासक सम्पूर्ण भारत में अपना आधिपत्य स्थापित करने का प्रयत्न कर […]

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संत कबीर १५ वीं. शताब्दी के अंत से १६ वीं. शताब्दी के आरंभ तक की समयावधि में एक जुलाहा होने के साथ साथ एक प्रसिद्ध संत कवि थे। यह भारत में भक्ति आंदोलन का काल था। राजनैतिक दृष्टि से इस काल अवधि में इस्लामी शासक सम्पूर्ण भारत में अपना आधिपत्य स्थापित करने का प्रयत्न कर रहे थे। वे हिंदुओं को नाना प्रकार से प्रताड़ित कर रहे थे। उस समय सभी हिन्दूओं ने भक्ति मार्ग का आसरा लिया । उन्होंने देवी-देवताओं की शरण ली, उनकी स्तुति गाने लगे तथा उनमें आसरा ढूंढने लगे।

संत कबीरकबीर हिन्दू थे अथवा मुसलमान, इस विवाद का समाधान कदाचित हमें कभी प्राप्त नहीं हो पाएगा। नीरू व नीमा, इस मुसलमान जोड़े ने कबीर का पालन-पोषण किया तथा स्वामी रामानन्द उनके गुरु थे। नीरू एवं नीमा की समाधियाँ बनारस के कबीर मठ में स्थित हैं। कबीर की रचनाएं विभिन्न भारतीय शास्त्रों में उनके ज्ञान एवं पकड़ का प्रमाण हैं। उनकी रचनाओं में वैदिक साहित्य, शरीर-रचना, प्राणी व वनस्पति शास्त्र, दर्शन-शास्त्र तथा बुनाई सम्मिलित है।

कबीर की रचनाओं के अनेक रूप मिलते हैं, जैसे साखी, शबद, रमैनी, उलटभाषी तथा वसंत। साखी का मूल शब्द है, साक्षी अर्थात देखा हुआ। कबीर की रचनाओं में कई दोहे हैं जिनके विषय में कहा जाता है कि उनकी रचना उन्होंने तब की जब उन्होंने ऐसा कुछ देखा जिसने उनके मन-मस्तिष्क में अनेक विचार उत्पन्न किये। उनके अधिकतर साखी हमारे समक्ष एक सम्पूर्ण दृश्य एक विचार लिए हुए ज्ञान के मोती का बोध कराते हैं।

और पढ़ें – देख कबीर रोया, भगवतीशरण मिश्र

कबीर की अधिकतर रचनाएं मौखिक रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित हुई हैं। यही कारण है कि इनके विभिन्न संस्करणों में हम शब्दों का हेर-फेर पाते हैं। उदाहर के लिए उनकी एक रचना है, ‘पानी में मीन प्यासी’। इसकी दूसरी पंक्ति कुछ लोग ‘मोहे सुन सुन आवे हासी’ गाते हैं तो कुछ इसे ‘मोहे देखत आवे हासी’ गाते हैं। यद्यपि दो संस्करणों का अर्थ तथा ध्येय एक ही होता है, किन्तु शब्द कभी कभी परिवर्तित हो जाते हैं। कबीर अपनी रचनाओं में स्वयं को दास कबीर के नाम से संबोधित करते हैं। किन्तु वर्तमान में उनकी रचनाओं को गाते समय उन्हे कभी कभी दास कबीर के स्थान पर संत कबीर कहकर भी संबोधित किया जाता है।

यदि आप मालवा अथवा राजस्थानी गायकों के मुख से कबीर के दोहे सुनेंगे तब आप पाएंगे कि वे कई आम शब्दों को स्थानीय भाषा में परिवर्तित कर देते हैं। उसी प्रकार आधुनिक गायक शब्दों को संस्कृत युक्त हिन्दी में परिवर्तित कर देते हैं।

और पढ़ें – कबीर बीजक 

कबीर एक व्यक्तिमत्व ना होते हुए बहती नदी की धारा थे। उन्होंने एक विचारधारा आरंभ की थी। तत्पश्चात अनेक विचारधाराएं आकर उनसे जुड़ने लगीं। आज हम निश्चित रूप से यह नहीं बता सकते कि उन्होंने क्या रचा तथा कालांतर में उनकी रचना में क्या जुड़ा। यद्यपि उनकी रचनाएं गहन हैं तथापि वे पारंपरिक ना होते हुए लोकशैली में है।

बूंद जो पड़ी समुद्र में, सो जाने सब कोई, समुद्र समाना बूंद में, बूझै बिरला कोई।।

कबीर- एक फकीर

मेरे लिए कबीर सर्वप्रथम एक फकीर थे। बोलचाल की भाषा में फकीर का अर्थ भिखारी हो जाता है। किन्तु फकीर का सही अर्थ है, वह व्यक्ति जो सभी सांसारिक मोह व बंधनों से मुक्त है। फकीर वह है जो सभी सुख-संपत्ति प्राप्त करने में सक्षम है किन्तु स्वेच्छा से न्यूनतम सुविधाओं में जीवन यापन करता है। वह किसी भी प्रकार के सामाजिक दबाव से प्रभावित नहीं होता तथा इसी कारण वह विचारों से स्वच्छंद होता है।

चाह गई चिंता मिटी, मानुवा बे-परवाह,

जिनको कुछ ना चाहिए, वो शाहन के शाह।।  

मन लाग्यो मेरो यार फकीरी में

कबीर निर्गुण भक्ति में विश्वास करते थे। उनकी यही विशेषता उन्हे अन्य समकालीन कवियों से भिन्न बनाती है। अन्य समकालीन कवि सगुण भक्ति में विश्वास रखते थे। सगुण भक्ति का अर्थ है भगवान को किसी ना किसी रूप में देखना। मीरा बाई तथा सूरदास भगवान को कृष्ण के रूप में कल्पना करते थे वहीं तुलसीदास के लिए भगवान का अर्थ श्री रामचन्द्र था। संभवतः कबीर इकलौते कवि थे जिनके लिए भगवान का कोई रूप नहीं था। उनकी पुकार उस भगवान के लिए थी जिनका कोई रूप नहीं है, अपितु जो प्रत्येक मनुष्य में सर्वविद्यमान है।

कबीर सदैव लोगों से स्वयं के भीतर झाँकने के लिए कहते थे। वे कहते थे कि ईश्वर को कहीं बाहर ना ढूँढे, अपितु वे नित्य लोगों का उनके भीतर विद्यमान ईश्वरीय तत्व  से परिचय कराते थे। यह कुछ अन्य नहीं, अपितु अद्वैत दर्शन ही है जिसके अनुसार ब्रह्म आपके भीतर है तथा आप स्वयं ही ब्रह्म हैं। वे सदा लोगों को आगाह कराते थे कि परम सत्य की खोज में बाहर ना भटकें। उसे अपने भीतर ही खोजें।

और पढ़ें  – हज़ारी प्रसाद द्विवेदी रचित कबीर

अपनी सम्पूर्ण रचनाओं में कबीर लोगों को सीधे संबोधित करते थे। वे अन्य कवियों के समान नहीं थे जो लोगों से भगवान के माध्यम से संबोधित होते थे। कबीर मनुष्यों से प्रत्यक्ष एवं अपरोक्ष रूप से संवाद करते थे। अपनी कविताओं में वे स्वयं को साधो अर्थात सद्पुरुष कहते थे। वहीं मानवी संबंधों के विषय में कहते समय वे उन्हे बंदे अर्थात मनुष्य, एक मित्र तथा भाई, इन शब्दों से संबोधित करते थे। उन्होंने लोगों को ना तो अपने से निम्न समझा ना ही उच्च। उन्होंने केवल अपने गुरु को ही उच्च स्थान दिया था। इसका अर्थ है कि वे सब को समान मानते थे। उनकी रचनाओं में सदैव समानता का संदेश निहित होता था।

वे गौण वस्तुओं पर भी पूर्ण ध्यान केंद्रित करते थे। उनसे भी समानता का संबंध स्थापित करते थे। उदाहरणतः अपनी कविता, ‘माटी कहे कुम्हार से’ के द्वारा वे कहते हैं कि जीवन एक चक्र है। आज आप माटी को रौंदेंगे, कल माटी आपको रौंदेगी तथा जीवन चक्र यूं ही चलता रहेगा। कदाचित आज आप स्वयं को शक्तिशाली समझ रहे होंगे। सब समय का फेर है। कल हमारी स्थिति पूर्णतः विपरीत हो सकती है। वस्तुस्थिति परिवर्तित होने में समय नहीं लगता। ब्रह्मांड के सर्व जीवों एवं वस्तुओं में समतुल्यता कबीर की रचनाओं के अभिन्न अंग होते हैं। वे संबंधों के चक्रीय प्रवृत्ति पर विश्वास करते थे। जो कल था, वह आज ना हो तथा जो आज है वो कदाचित कल ना रहे। मानव सदैव इस चक्र से अनभिज्ञ रहता है तथा जीवन चक्र में उलझ कर रह जाता है।

माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोहे;

इक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूँगी तोहे।।

कबीर गर्व ना कीजिए, ऊंचा देख निवास;

काल परों भुईं लेटना, ऊपर जमेगी घास।।

तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय;

 कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय। ।

देव हमारे भीतर ही विराजमान हैं

उनकी रचनाओं द्वारा जो परम ज्ञान हमें प्राप्त होता है वह यह है कि देव हम सब के भीतर ही विद्यमान हैं तथा प्रत्येक समस्या का समाधान भी हमारे भीतर ही उपस्थित रहता है। वे सतत हमें हमारे भीतर झाँकने के लिए प्रेरित करते रहते हैं। भगवान तक पहुँचने के लिए आपके द्वारा किये गए सर्व प्रयत्नों का वे खंडन करते हैं। वे कहते हैं कि यदि आपको परमात्मा में विश्वास है तो वह आपके भीतर ही विद्यमान है।

जैसे तिल में तेल है, ज्यों चकमक में आग;

तेरा साईं तुझ में है, तू जाग सके तो जाग।

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय;

जो मन खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

कस्तुरी कुंडल बसै, मृग ढूढ़ै वन माहि;

ऐसे घट घट राम हैं, दुनिया देखे नाहि।

मोको कहाँ ढूंढें रे बन्दे, मैं तो तेरे पास में।

पानी में मीन प्यासी…।

वे सदा कहते थे कि जिस प्रकार गंगा स्वयं को निर्मल करती है, उसी प्रकार हम मानवों को भी स्वयं को स्वच्छ करना चाहिए।

कबीरा मन निर्मल भया, जैसे गंगा नीर;

पाछे पाछे हर फिरे, कहत कबीर कबीर।

कबीर की रचनाएं उनके स्वयं के अनुभवों पर आधारित थीं। यद्यपि वे वेद एवं पुराण, इनका प्रयोग करते थे, तथापि वे अपने अनुभवों पर आधारित दृष्टांत ही देते थे। वे अपने समय के दैनंदिनी जीवन से ही दृष्टांत प्रस्तुत करते थे। उन्होंने सदैव एक सांसारिक पुरुष के रूप में जीवन व्यतीत किया, कर्म किया तथा परिवार के लिए जीविका उत्पन्न की। इन सब के साथ साथ वे एक साधक भी थे। उन्होंने कभी दूसरों द्वारा दी गई भिक्षा पर जीवन यापन नहीं किया। अतः उन्हे अपनी जीविका स्वयं अर्जित करने के आनंद एवं कष्टों का पूर्ण आभास था। यही उन्हे अपने मन के विचार स्वच्छंदता से व्यक्त करने की स्वतंत्रता भी प्रदान करती थी। वे सदा समाज में रहे ताकि वे उस समाज को भीतर से देख सकें तथा समझ सकें। साथ ही वे समाज से विरक्त भी थे ताकि वे एक प्रेक्षक बन सकें।

मैं कहता हूँ आखिन देखी,

तू कहता कागद की लेखी।

कबीरा खड़ा बजार  में, मांगे सबकी खैर;

ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।

साई इतना दीजिए, जा में कुटुंब समाय;

मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु ना भूखा जाय।

चलती चाकी देख कर, दिया कबीरा रोय;

दो पाटन के बीच में, साबुत बचा ना कोय।

कबीरा तेरी झोंपड़ी, गलकटियन के पास;

जो करेगा सो भरेगा, तू क्यों भया उदास।

कबीरा खड़ा बजार में, लिए लकुटिया हाथ;

जे घर फूँकिया आपनों, चले हमारे साथ।

गुरु पर आधारित कबीर की रचनाएं

अपनी अनेक साखियों एवं शब्दों द्वारा कबीर हमसे कहते हैं कि अपने स्वयं के अनुभवों के आधार पर अपनी राय निर्मित करें, दूसरों की कथनी को सजगता से जाँचें तथा सुने हुए तथ्यों पर आँख बंद कर विश्वास ना करें, भले ही गुरु ने कहा हो। यद्यपि वे कहते हैं कि गुरु ज्ञान प्राप्ति का एक आवश्यक साधन हैं।

गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूँ  पाय;

बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो दिखाए।

सतगुरु मिला तो सब मिले, ना तो मिला न कोय;

मात पिता सूत बान्धवा, यह तो घर घर होय।

कबीरा ते नर अन्ध है, गुरु को कहते और;

हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर।

भेस देख ना पूजिये, पूछ लीजिए ज्ञान;

बिना कसौटी होत नाही, कंचन की पहचान।

जात ना पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान;

मोल करो तलवार का, पड़ी रहन दो म्यान।

स्वयं की सहज खोज

वे हमें सहजता से जीने की प्रेरणा देते हैं। चूंकि वे इस तथ्य पर विश्वास करते हैं कि सब हमारे भीतर ही है, प्रत्येक बल व प्रत्येक संभव ऊर्जा स्त्रोत को बाहर खोजने का कष्ट उठाने की आवश्यकता नहीं है। उनकी रचनाओं में सहजता, यह विषय बारंबार प्रकट होता है। इससे यह विदित होता है कि उनके काल में भी लोग इस प्रकार का अनावश्यक कष्ट उठाते थे। यह सिद्धांत आज भी उतना ही प्रासंगिक है। हम कष्ट उठाने में सदा मग्न रहते हैं किन्तु यह नहीं समझते कि वह कष्ट हम क्यों उठा रहे हैं। एक ही स्थान पर खड़े होने के लिए भी दौड़ते रहते हैं। हमें अपनी प्रवृत्ति में सहजता की आवश्यकता है। यह हमारे मन को स्वच्छ तथा जीवन को आसान बनाती है।

पोथी पढ़ी पढ़ी जग मुवा, पंडित भया ना कोय;

ढाई आखर प्रेम के, पढ़े सो पंडित होय।

माला कहे काठ की, तू क्यों फेरे मोहे;

मन का मनका फेर दे, तुरत मिला दूँ तोहे।

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं तो मैं नाहिं;

प्रेम गली अति साँकरी, तामें दो न समाहिं।

संयोजित धर्म को चुनौती

कबीर ने सदैव किसी भी प्रकार के संयोजित धर्म का त्याग किया था। वे इतने साहसी थे कि उन्होंने इस्लाम शासित क्षेत्रों में इस्लाम के विरुद्ध तथा हिंदुओं के अपने गढ़ वाराणसी में हिन्दू कुरीतियों के विरुद्ध अपने विचार व्यक्त किये तथा उनसे प्रश्न किये। कभी वे एक स्नेहमय पिता के समान आसान दृष्टांत द्वारा लोगों को समझाते थे तो कभी अपने प्रश्नों की मार द्वारा अंध-भक्तों को सही मार्ग पर लाने का प्रयत्न करते थे। उन्होंने सदैव पंडितों, मौलवियों तथा स्वघोषित ज्ञानियों की आलोचना की थी। उनकी रचनाओं में उनके स्वर सदा अक्खड़ होते थे मानो वे प्रेक्षकों को चुनौती दे रहे हों कि वे आयें एवं उनके विचारों को अनुचित सिद्ध करें।

काशी काबा एक हैं, एक हैं राम रहीम;

मैदा इक पकवान बहुत बैठ कबीरा जीम।

साधू भूखा भाव का, धन का भूखा नाहिं;

धन का जो भूखा फिरै, सो तो साधू नाहिं।

पनि पियावे क्या फिरो, घर घर में है व्यारी;

तृष्णावंत तो होयेगा, आएगा झक मारी।

पत्थर पूजे हरी मिले, तो मैं पूजूं पहाड़;

इससे तो चाकी भली, पीस खाये संसार।

कंकर पत्थर जोड़ि के, मस्जिद लयी बनाय;

ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय।

कबीर बारंबार मानवी देह को घट अर्थात घड़ा कहकर संबोधित करते थे। इसकी हम अनेक स्तरों पर विवेचना कर सकते हैं। भौतिक रूप से यह माटी से निर्मित है तथा अंततः माटी में ही जाकर विलीन हो जाती है। लाक्षणिक रूप से यह एक रिक्त घट है तथा यह मनुष्य पर निर्भर है कि वह इस घट में क्या भरता है। मनुष्य क्या है यह इस तथ्य पर आधारित है कि हम इस घट रूपी देह में किसे समाते हैं। वे कहते हैं कि मानवी देह में ही सब कुछ समाया हुआ है, अच्छा, बुरा, कुरूप, यहाँ तक कि ईश्वर भी।

जोगी गोरख गोरख करें,

हिन्दू नाम उचारें;

मुसलमान कहें एक खुदाई,

कबीर को स्वामी घट घट बसई।

कबीर सोई पीर है, जो जाने पर पीड़;

जो पर पीड़ ना जाने, सो काफिर बेपीर।

चन्दा झलके यही घट माही..

कबीर एवं माया

कबीर सांसारिक माया को सभी बुराइयों की जड़ मानते हैं। उनके अनुसार माया वह डाकिनी है जो ऐसा मायाजाल बुनती है जिसमें मानव तो क्या, भगवान भी खो सकते हैं। वे कहते हैं कि यह संसार माया द्वारा निर्मित एक मायाजाल है तथा सत्य का अनुभव पाने के लिए हमें इसी मायाजाल की शिकंजे से मुक्त होना पड़ेगा। माया के साथ साथ वे यह भी कहते हैं, हमें यह भली-भांति समझना होगा कि हम में से प्रत्येक मनुष्य पूर्णतः अकेला है।

अवधू, माया तजी ना जाये..

उड़ जाएगा हंस अकेला.. 

मृत्यु और कबीर

अंत में, मृत्यु भी उनकी रचनाओं का एक अभिन्न अंग है। वे मृत्यु को अंत नहीं, अपितु मानव जीवन का एकमात्र सत्य मानते हैं। वस्तुतः, वाराणसी तो मृत्यु की नगरी मानी जाती है जहां मृत्यु का उत्सव मनाया जाता है। यही भाव कबीर की रचनाओं में भी प्रकट होता है। वे बारंबार मानवजीवन की क्षण-भंगुरता के विषय में कहते हैं जैसे उलटी मटकी पर जल। अतः मानव को अपने जीवन से मोह नहीं करना चाहिए। मृत्यु के परिप्रेक्ष्य में वे मानव प्रकृति के विषय में चर्चा करते हैं कि मनुष्य अनेक बार ऐसे निरर्थक कार्य करता है मानो वह अनंत काल तक जीवित रहने वाला हो। वे चाहते हैं कि हम यह स्मरण रखें, अंततः वह मृत्यु ही है जिसका हमें आलिंगन करना है, हमारी इच्छा हो या ना हो। मृत्यु को ध्यान में रखकर ही हमें जीवन यापन करना चाहिए।

माली आवत देख कर, कलियाँ कहे पुकार;

फुले फुले चुन लिए, काल हमारी बार।

साधो ये मुर्दों का गाँव..।    

आईए मेरे साथ, कबीर को ढूंढें – यह विचार एक ओर जितना आसान है, दूसरी ओर यह उतना ही गहन भी है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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रसिकप्रिया- कवि केशवदास कृत बुंदेली गीत गोविन्द https://inditales.com/hindi/rasikpriya-keshavdas-bundelkhand/ https://inditales.com/hindi/rasikpriya-keshavdas-bundelkhand/#comments Wed, 25 Mar 2020 02:30:07 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1867

गीत गोविन्द के नाम से परिचित न हो ऐसा कोई मनुष्य विरले ही होगा। बारहवीं शती में जयदेव कवि द्वारा रचित यह ग्रन्थ श्रृंगार रस स्वरुप का परिचायक है। एक एक अष्टपदी में जिस प्रकार जयदेव ने नायक नायिका स्वरुप में श्री राधा-कृष्ण का काव्य चित्रण किया है वैसा आपको उस काल में या उसके आगे आने […]

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गीत गोविन्द के नाम से परिचित न हो ऐसा कोई मनुष्य विरले ही होगा। बारहवीं शती में जयदेव कवि द्वारा रचित यह ग्रन्थ श्रृंगार रस स्वरुप का परिचायक है। एक एक अष्टपदी में जिस प्रकार जयदेव ने नायक नायिका स्वरुप में श्री राधा-कृष्ण का काव्य चित्रण किया है वैसा आपको उस काल में या उसके आगे आने वाली कई  शताब्दियों में सहज देखने को नहीं मिलता। परन्तु ऐसा ही एक काव्य ग्रन्थ सोलहवीं शती में एक कवि द्वारा बुंदेलखंड की धरती पर लिखा गया। बुंदेली साहित्य एवं संस्कृति ने भारतीय सांस्कृतिक निर्माण में अभूतपूर्व योगदान दिया है। बुंदेली कला के साथ साथ यहां की काव्य  परम्परा भी उतनी ही अद्भुत रही है। बिहारी, मतिराम, पद्माकर आदि जैसे कवियों ने बुंदेली धरा को अपने काव्य धारा से ओतप्रोत रखा। उसी में से एक हुए थे कवि केशवदास ।

Kavi Keshavdas Bundelkhand
कवि केशवदास (स्रोत – अज्ञात )

केशवदास का जन्म ओरछा के एक सनाढ्य ब्राम्हण श्री काशीनाथ मिश्रा जी के घर सम्वत 1618 (ई 1555) में हुआ था। इनके पितामह, पिताजी और बड़े भाई स्वयं साहित्य सेवा में रत थे तथा समकालीन राजपरिवार द्वारा उनके परिवारी जनों का सम्मान होता रहा। इसी श्रेणी में केशवदास को ओरछा नरेश रामसिंह के दरबार में नवरत्न की उपाधि मिली। रामसिंह के छोटे भाई ने तो केशव को अपना गुरु मान 22 गाँव भेट स्वरुप प्रदान कर दिए थे।

गीत गोविन्द में राधा और कृष्ण को नायक नायिका रूप देकर जहां जयदेव अभिनव कवि कहलाये वही मैथिलि में लिखते हुए विद्यापति ने सौंदर्य चित्रण एवं रसनिरूपण द्वारा इस रस को आगे बढ़ाया। सूरदास ने बाल रूप का चित्रण किया है उसके पार तो अभी तक कोई कवि पहुँच ही नहीं पाया है। परन्तु श्री राधा एवं कृष्ण आंतरिक सूक्ष्म मनोभावों को जिस तरह से केशवदास ने अपने ग्रन्थ रसिकप्रिया में परिणित किया है वैसा और कही देखने को नहीं मिलता।

पहाड़ी शैली में राधा कृष्ण
पहाड़ी शैली में राधा कृष्ण (स्रोत्र – काँगड़ा आर्ट्स)

रसिकप्रिया ग्रन्थ का प्रणयन राजा इंद्रजीत से सम्वत 1648  शुक्ल सप्तमी, सोमवार के दिन हुआ था। इस ग्रन्थ में सोलह प्रभाव/ अध्याय है। रसिकप्रिया में  कवि केशव ने राधा कृष्ण द्वारा  श्रृंगार रस का अत्यंत सूक्ष्मता से शब्द चित्र प्रस्तुत किया है। प्रथम अध्याय में राजधानी ओरछा, राजवंश तथा इस ग्रन्थ को लिखने का कारण दिया गया है। दूसरे में नायक का सविस्तार वर्णन, तीसरे में नायिका का सविस्तार वर्णन, चौथे में विभिन्न रूप से नायक-नायिका के मिलन का वर्णन, पांचवे में नायिका किस-किस प्रकार से नायक से मिलने का प्रयास करती है उसका वर्णन, छठे में विभिन्न श्रृंगार भाव निरूपण,सातवें में नायिकाओं के विभिन्न प्रकार का वर्णन, आठवें में दस विरह अवस्थाओं का वर्णन, नौंवे में नायक की मानलीला का वर्णन, दसवे में नायक द्वारा नायिका को मानाने के लिए किये गए उपायों का वर्णन, ग्यारवे में वियोग का वर्णन, बारवे में विभिन्न प्रकार की सखियों का वर्णन, तेरहवें में सखियों द्वारा नायक-नायिका का मिलन कराने के उपाय का वर्णन, चौदहवें और पन्द्रहवें में विविध रसो में नायक-नायिका का निरूपण हुआ है तथा अंतिम अध्याय में अनरस का वर्णन किया गया है।

रसिकप्रिया में उल्लेखित कुछ भाव इस प्रकार है :-

प्रथम मिलन

राधा-कृष्ण कुञ्ज में, कांगड़ा शैली
राधा-कृष्ण कुञ्ज में, कांगड़ा शैली, ई 1780 (स्रोत – वी एन्ड अ म्यूजियम, लन्दन )

हसत खेलत खेल मंद भई चंददुति,
कहत कहानी और बुझत पहेली जाल।
केसोदास नींदबस अपने अपने घर,
हरें हरें उठि गए बालिका सकल बाल।
घोरि उठे गगन सघन घन चंहु दिसि,
उठि चले कान्ह धाईं बोलि उठी तिन्ही काल।
आधी रात अधिक अँध्यारे माँझ जै हो कहाँ,
राधिका की आधी सेज सोई रहौ प्यारे लाल।

केशवदास कहते है कि ‘हँसते हँसते तथा कहानी पहेली बुझाते बुझाते अँधेरा हो गया है। मेघो के उमड़ने से चन्द्रमा की कांति फीकी पड़ गई है। नींद के कारण ग्वाल और गोपी भी अपने-अपने घर चले गए है। उधर आकाश में घनघोर घटा गरजते ही कृष्ण उठकर चलने लगे। उसी समय कृष्ण की सखी ने कहा कि अर्धरात्रि में इस अंधकार में आप कहां जा पाओगे? अतः आज आप राधिका जी के संग उनकी आधी शैय्या पर ही शयन कर लो।”

राधा कृष्ण का रमण

राधा कृष्ण रमण करते हुए , कांगड़ा शैली, ई 1820
राधा कृष्ण रमण करते हुए , कांगड़ा शैली, ई 1820 (स्रोत – वी एन्ड अ म्यूजियम, लन्दन )

घननि की घोर सुनि, मोरनि को सोर सुनि,
सुनि सुनि केसव अलाप अलीजन को।
दामिनी दमक देखि देह की दिपति देखि,
देखि सुभ सेज देखि सदन सुबन को।
कुंकुम की बास घनसार की सुबास भयो,
फुलनि की बास मन फूलिकै मिलन को।
हँसि हँसि बोले दोउ अनहि मनाएँ मान,
छूटी गयो एकै बार राधिका रमन को।

केशवदास कहते है कि ” घनघोर घटा और बिजली की गड़गड़ाहट के साथ मंद-मंद हल्के झोकें, मयूर की कूक तथा सखियों के गान ने राधा को इतना आनन्दोन्मत्त कर दिया है कि वह बिन मनाये ही केसर कपूर से सुगन्धित शैय्या पर श्री कृष्ण से रमण हेतु जा पहुंची है।

श्रावण मास वर्णन

राधा-कृष्ण वर्षा ऋतु का आनंद लेते हुए, कांगड़ा शैली,
राधा-कृष्ण वर्षा ऋतु का आनंद लेते हुए, कांगड़ा शैली, (स्रोत – वी एन्ड अ म्यूजियम, लन्दन )

केसव सरिता सकल मिलत सागर मन मोहै।
ललिता लता लपटाति तरुन तन तरुबर सोहै।।
रूचि चपला मिलि मेघ चपल चमकत चंहु औरन।
मन भावन कँह भेंट भूमि कूजत मिसि मोरन।।
इहि गमन की को कहै गमन न सुनियत सावनै।।

केशव कवि कहते है कि श्रावण मास में वर्षा से नदियों में बाढ़ आने से समुद्र में मिलते दृश्य को देख कितना सुखद आनंद होता है। छोटे छोटे जीव जंतु वर्षा से प्रसन्न हो वृक्षों पर विहार कर रहे है। बिजली कड़क कर बादलो से झांकती प्रतीत होती है। मयूर वर्षा से प्रसन्न हो धरती और आकाश के मिलान की मधुर स्वर से पुकार कर रहे है। इसी प्रकार प्रेमी-प्रेमिका के मिलन का यह मास कब किसे घर से बाहर जाने को कहेगा?

रसिकप्रिया के अतिरिक्त कवि केशवदास जी ने अन्य अनेक रचनाएँ और भी की है। कविप्रिया, रामचंद्रिका, रतन बावनी, जहांगीर जस चन्द्रिका, वीरसिंह देव चरित, विज्ञान गीता, नख शिख वर्णन इत्यादि उनकी प्रमुख रचनाओं में सम्मिलित है। उनके बढ़ते वैभव को देख स्वयं मुग़ल शासक अकबर ने उनको आगरा में अपने दरबार में बुलाया था। दरबार में उनके काव्य कौशल को देख वह आश्चर्य चकित हो गए थे।उसके बाद मुग़ल दरबार में बढ़ी लोकप्रियता के कारण रसिकप्रिया पर चित्र निर्माण करने के लिए विभिन्न हिन्दू राजाओं ने अपने चित्रकारों को प्रेरित किया। साथ ही ईस्वी 1634 तक रसिकप्रिया मालवा के चित्रकारों के लिए एक महत्वपूर्ण विषय बन गया। मेवाड़ राज्य में राणा जगतसिंह प्रथम (ई 1628-1652) में उनके राज्य में आश्रित चित्रकार साहिबिददीन ने रसिकप्रिया का चित्रण किया। साथ ही बीकानेर राज्य में महाराजा अनूपसिंह ई (1669-1698) के राज्य में आश्रितस चित्रकारों ने रसिकप्रिया का बड़ा ही सुन्दर चित्रण किया।

रसिकप्रिया का आधार वात्सायन का कामसूत्र तथा रूद्रभट्ट का श्रृंगार तिलक है। केशवदास ने नवरस के माध्यम से कृष्ण को केंद्र कर रसिको को मुग्ध कर दिया है। वो लिखते है की रसिको के लिए रसिकप्रिया बनी है। अतः आशा है रसिकजन इस छोटे से लेख को पढ़ने के बाद रसिकप्रिया का आनंद स्वयं ले।

आप रसिकप्रिया की प्रति यहाँ से निशुल्क प्राप्त कर सकते हैं – Keshav Granthavali 

यह है हमारी यात्रा काव्य श्रंखला में एक अतिथि लेख है जिसे श्री सुशांत भारती जी ने भेजा है।


सुशांत भारती योजना तथा वास्तुकला विद्यालय, नई दिल्ली से स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त संरक्षण स्थापति है। उन्होंने अपनी स्नातक उपाधि वास्तुकला अकादमी कॉलेज ऑफ़ आर्किटेक्टर, नयी दिल्ली से की है। भारतीय परिपेक्ष्य में कला एवं संस्कृति को समझने एवं अध्ययन हेतु उनकी विशेष रूचि रही है। ब्रजस्थ परम्परा के अंतर्गत मूर्त एवं अमूर्त संस्कृति तथा मंदिर स्थापत्य उनके शोध के मुख्य विषय है। वर्तमान में वह राष्ट्रिय संग्रहालय संस्थान, नई दिल्ली में शोध सहायक के रूप में कार्यरत है।


 

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सुप्रसिद्ध राम भजन जो राम नाम में ओत-प्रोत कर दें https://inditales.com/hindi/most-popular-ram-bhajans/ https://inditales.com/hindi/most-popular-ram-bhajans/#comments Wed, 21 Mar 2018 02:30:39 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=752

भारत के सर्वाधिक महत्वपूर्ण पर्वों में एक पर्व है दीपावली। दीपावली अर्थात् घरों का रंग रोगन व सजावट, नवीन वस्त्रों की खरीदी, व्यापारियों का नवीन वित्तीय वर्षारंभ, भिन्न भिन्न मिष्टान्न व पक्वान्न, पटाखे, गुलाबी ठंड की शुरुआत तथा आनंद व उत्साह की पराकाष्ठा। दीपावली का उत्सव मनाने के पीछे हेतु क्या है? जी हाँ! हम […]

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सुप्रसिद्ध राम भजनभारत के सर्वाधिक महत्वपूर्ण पर्वों में एक पर्व है दीपावली। दीपावली अर्थात् घरों का रंग रोगन व सजावट, नवीन वस्त्रों की खरीदी, व्यापारियों का नवीन वित्तीय वर्षारंभ, भिन्न भिन्न मिष्टान्न व पक्वान्न, पटाखे, गुलाबी ठंड की शुरुआत तथा आनंद व उत्साह की पराकाष्ठा। दीपावली का उत्सव मनाने के पीछे हेतु क्या है? जी हाँ! हम यह त्यौहार मनाते हैं भगवान् राम द्वारा श्रीलंका में रावण का वध कर, सीता सहित अयोध्या वापिस लौटने की प्रसन्नता व्यक्त करने हेतु। अतः दीपावली में हम भगवान् राम का उत्सव मनाते हैं।

इसी तरह राम नवमी पर भी हम श्री राम का जन्मोत्सव मानते हैं।

तो भगवान् राम का उत्सव मनाने की सर्वोत्तम रीति क्या है? ऐसा माना जाता है कि हिन्दु पञ्चांग के चौथे युग, कलयुग में केवल राम का नाम लेने भर से ही हमारी सर्व समस्याओं का समाधान हो जाता है। तो चलिए सबसे पहले सुनते हैं अयोध्या के मंदिरों की राम धुन:

राम नाम तथा राम धुन हिन्दू संस्कृति का अभिन्न अंग है। यूं तो राम नाम के जप हेतु आपको किसी सहायता की आवश्यकता नहीं है अपितु राम धुन हेतु राम के १० सर्वाधिक लोकप्रिय भजनों का संकलन आपको आनंदित करने के लिए  प्रस्तुत है।

राम भजन

दीपावली के अवसर पर प्रस्तुत है १० सर्वोत्तम राम भजन:-

रघुपति राघव राजा राम – राम भजनों में सर्वाधिक गया जाने वाला भजन

रघुपति राघव राजा राम – यह राम धुन नम नारायण नामक ग्रन्थ से आंशिक रूप से व्युत्पन्न है। आप कदाचित नम नारायण ग्रन्थ से अवगत ना हों तथापि वाल्मीकि रामायण के विषय में जानकारी सर्व विदित है। २४००० छंदों में रचित वाल्मीकि रामायण प्रतिदिन जपना कठिन है। अतः २४००० छंदों के वाल्मीकि रामायण का सार १०८ छंदों द्वारा संक्षिप्त में गठित किया गया है। इसे ही नम नारायण कहा जाता है। प्रतिदिन जप करने हेतु यह नम नारायण अतिउपयुक्त है।

रघुपति राघव राजा राम, भक्तों के बीच इस भजन की प्रसिद्धि तब चरम सीमा पर पहुँची जब गांधीजी ने स्वतंत्रता संघर्ष हेतु इस राम भजन को अपनाया था। यद्यपि मूल भजन तथा गांधीजी के संस्करण में भिन्नता है क्योंकि उन्होंने मूल भजन में स्वतंत्रता संघर्ष के सन्दर्भ में परिवर्तन किये थे। मूल भजन तथा गांधीजी के संस्करण के बोल इस प्रकार हैं-

रघुपति राघव राजा राम भजन के बोल
रघुपति राघव राजा राम भजन के बोल

यूँ तो इस भजन को कई गायकों ने गाया व वादकों ने बजाया है तथापि मेरी व्यक्तिगत प्रिय प्रस्तुति है उस्ताद बिस्मिल्लाह खान द्वारा शहनाई पर बजाई गयी रघुपति राघव राजा राम की धुन। वही सुमधुर धुन आपके लिए यहाँ प्रस्तुत है-

इनके अतिरिक्त पंडित डी. वी. पलुस्कर, हरी ओम शरण तथा स्व. एम्. एस. सुब्बलक्ष्मी ने भी इस भजन को उत्कृष्ट रूप में प्रस्तुत किया है।

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित- श्री राम चन्द्र कृपालु भज मन

श्री राम चन्द्र कृपालु भज मन , यह गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा संस्कृत में रचित राम भजन है। संगीत की दुनिया के लगभग सभी प्रसिद्ध गायकों द्वारा इस भजन की प्रस्तुतीकरण उपलब्ध है। मैंने आप सब के लिए एक मनमोहक प्रस्तुतीकरण का चुनाव किया है जिसमें एक नन्ही बालिका, सूर्यगायत्री ने अपने मधुर स्वरों द्वारा इस भजन को चार चाँद लगा दिए हैं।

यदि आप अधिक परिपक्व स्वर में प्रसिद्ध प्रस्तुतीकरण सुनना चाहें तो इन दो गायकी की चर्चा अवश्य की जायेगी। एक है दिव्यात्मा एम्.एस. सुब्बलक्ष्मी जिन्होंने राग सिन्धु भैरवी में अत्यंत सहजता से यह भजन प्रस्तुत किया है। दूसरा है राग यमन कल्याण में प्रसिद्ध गायक बंधुओं, राजन मिश्रा व साजन मिश्रा द्वारा गाया गया यह भजन।

श्री राम चन्द्र कृपालु भज मन बोल
श्री राम चन्द्र कृपालु भज मन बोल

यदि आप स्वयं भी यह भजन इन गायकों के स्वरों के साथ दुहराना चाहें तो आपकी सहायता हेतु इसके बोल प्रस्तुत हैं। श्री राम चन्द्र कृपालु भज मन, इस भजन में भगवान् श्री राम के महात्मय का वर्णन किया गया है।

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित- ठुमक चलत राम चन्द्र

ठुमक चलत राम चन्द्र, इस भजन के रचयिता गोस्वामी तुलसीदासजी ने भगवान् राम की बाल लीलाओं का वर्णन किया है। तुलसीदासजी कहते हैं कि रामचन्द्रजी अपनी बाल्यावस्था में चलने का प्रयत्न करते हुए बार बार गिर रहे हैं। महाराज दशरथ की तीनों रानियाँ अत्यंत प्रेम से उनका ध्यान बंटाती हुई उन्हें फिर खड़े होकर चलने हेतु प्रोत्साहित कर रही हैं। तुलसीदासजी ने बाल राम की मनमोहक सूरत एवं उनके हावभाव का इतनी सुन्दरता से वर्णन किया है कि उनकी मनोहारी छवि आँखों के समक्ष साकार होने लगती है। तुलसीदासजी यह भी कहते हैं कि भगवान् राम की मनोरम छवि एवं इस सम्पूर्ण दृश्य को देख वे आत्मविभोर हो रहे हैं तथा स्वयं को उनके रंग में रंगता अनुभव कर रहे हैं।

ठुमक चलत राम चन्द्र भी एक प्रसिद्ध भजन है जिसे कई जाने माने गायकों ने अपने सुरों से सजाया है। मेरी प्रिय प्रस्तुति, पंडित पुरुषोत्तम दास जलोटाजी द्वारा गाया यह भजन आपके हेतु प्रस्तुत है।

इस भजन को पंडित पुरुषोत्तम दास जलोटाजी के सुपुत्र अनूप जलोटा जी ने भी गया है। यहाँ वे गायकी के साथ साथ सम्पूर्ण दृश्य की व्याख्या भी कर रहे हैं।

पंडित रोनू मजूमदार जी ने इसी भजन को अपनी बांसुरी द्वारा बजाकर उसकी मधुरता को चरम सीमा तक पहुंचा दिया है।
आप सब भी इस भजन के निम्नलिखित बोल पढ़ कर सम्पूर्ण दृश्य को अपने सम्मुख सजीव कर सकते हैं।

ठुमक चालत राम चन्द्र बोल
ठुमक चालत राम चन्द्र बोल

इसके अलावा, स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर जी ने इस भजन को वात्सल्य रस में गा कर एक माता एवं उसके रामलल्ला के मध्य प्रेम को सुन्दरता से प्रस्तुत किया है। पंडित डी. वी. पलुस्करजी ने इसे शास्त्रीय संगीत में बांधकर इसे नयी ऊंचाईयां प्रदान की हैं।

मीरा बाई द्वारा रचित – पायो जी मैंने राम रतन धन पायो

मीराबाई को आप सब परम कृष्ण भक्त के रूप में जानते हैं। भगवान् कृष्ण हेतु उन्होंने अनगिनत भजन रचे एवं गाये हैं। उपरोक्त भजन उन्होंने भगवान् राम हेतु रचा था। वे कहती हैं कि राम को पाकर उन्होंने बहुमूल्य खजाना प्राप्त कर लिया है। यह ऐसा खजाना है जिसकी प्रत्येक दिवस वृद्धि होती जाती है तथा इसे कोई छीन भी नहीं सकता।

पंडित डी. वी. पलुस्कर द्वारा गाये गए इस भावपूर्ण भजन को सुन आपका रोम रोम आनंदित हो उठेगा।

प्रस्तुत है इस भजन की दो और प्रस्तुतियाँ। पहली, स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर द्वारा गायी गयी तथा दूसरी, पंडित रोनू मजूमदार द्वारा बांसुरी पर बजायी गयी मनमोहक प्रस्तुति।

आप साथ गुनगुनाना चाहें तो आपके हेतु इस भजन के बोल भी प्रस्तुत हैं।

पायो जी मैंने राम रतन धन पायो बोल
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो बोल

राम सिमर राम – गुरु नानकजी का शबद

गुरु नानकजी ने भी भगवान् राम की स्तुति में शबद गाये हैं। प्रस्तुत है गजल सम्राट जगजीत सिंग द्वारा गाई गयी यह भावपूर्ण शबद।

आप यह जानकर अचम्भित रह जायेंगे कि इस शबद को दक्षिण भारतीय संगीत साम्राज्ञी एम्.एस. सुब्बलक्ष्मीजी ने भी गाया है।

जब जानकी नाथ सहाय करे – गोस्वामी तुलसीदासजी

जब जानकी नाथ सहाय करे, यह गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित एक और भजन है जो भगवान् पर विश्वास का पाठ पढ़ाता है। इस भजन में गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं कि जब जानकी नाथ भगवान् राम आपका रक्षण कर रहे हैं तो कौन आपको हानि पहुंचा सकता है। आपके समक्ष चाहे जितनी बुरी शक्तियां आकर खड़ी हो जाएँ, चाहे वह राहू या केतु हो या दुष्ट दुश्शासन का चरित्र धारण किये मनुष्य, भगवान् राम आपकी सदैव रक्षा करेंगे।
यही भजन आपके लिए प्रस्तुत है पंडित छानुलाल मिश्राजी के मधुर स्वरों में-

साथ गुनगुनाने हेतु इस भजन के बोल इस प्रकार हैं-

जब जानकी नाथ सहाय करें भजन बोल
जब जानकी नाथ सहाय करें भजन बोल

इस भजन को कई अन्य प्रसिद्ध गायकों ने भी स्वरबद्ध किया है जैसे संगीत सम्राट पंडित डी. वी. पलुस्कर, पंडित अजय चक्रवर्ती तथा रुचिरा केदारपंडित रोनू मजूमदार द्वारा बांसुरी में बजाया गया यह भजन भी अत्यंत मधुर है।

राम रंग रंगले मन – एक मराठी भजन

यह भजन मैंने अपने पतिदेव के पंडित भीमसेन जोशीजी के गाये भजनों के संग्रह में से ढूंड निकाला था। यह एक छोटा सा भजन है जो हमें राम रंग, आत्म रंग एवं विश्व रंग में सराबोर होने के लिए कहता है। राम रंग रंगले मन इस भजन का मेरा विवेचन है कि कवि हमें अस्तित्व के प्रत्येक स्तर पर राम रस में डूब जाने हेतु प्रेरित कर रहा है, फिर चाहे वह सांसारिक स्तर पर हो या भावनात्मक स्तर पर।

प्रस्तुत है पंडित भीमसेन जोशीजी द्वारा राग मिश्र पहाड़ी में गाया गया यह भजन-

श्री राम कहे समझाई

श्री राम कहे समझाई, इस रचना में उस समय का दृश्य दर्शाया गया है जब महारानी कैकेयी ने अपने दो वरदानों के आधार पर महाराज दशरथ को विवश कर दिया था कि वे पुत्र राम को १४ वर्षों के वनवास पर जाने का आदेश दें। महाराज दशरथ के शब्दों ने राम के अनुज लक्ष्मण को अत्यंत आहत एवं क्रोधित कर दिया है। तब भगवान् राम उन्हें समझते हैं कि उन्होंने स्वयं पिताश्री के आदेश को पूर्ण श्रद्धा से स्वीकार कर लिया है। वे इस सजा हेतु माता कैकेयी को भी दोष नहीं दे रहे हैं। वे समझा रहे हैं कि यह हमारे भाग्य की देन है, ना कि किसी मनुष्य की करनी। भगवान् राम लक्ष्मण को यह भी कहते हैं कि वे स्वयं वस्तुस्थिति से आहत नहीं हैं। वे उन्हें भी दुखी ना होने का आग्रह कर रहे हैं। इसी दृश्य को समक्ष प्रस्तुत करते हुए, इस भजन द्वारा रचयिता हमसे कहने का प्रयत्न कर रहे हैं कि हम भाग्य का लिखा स्वीकार करें एवं स्वयं को किसी भी स्थिति में आहत ना होने दें।

राग जौनपुरी में पंडित भीमसेन जोशी द्वारा गाया यह राम भजन आपके समक्ष प्रस्तुत है-

श्री राम चरणं समस्त जगतं – राम स्तुति

यह राम भजन एक राम स्तुति है जो हमें यह बताती है कि भगवान् के चरणों में ही समस्त विश्व समाहित है। भक्ति रस में ओतप्रोत इस राम भजन को यहाँ पंडित जसराज जी ने उतनी ही श्रद्धा एवं मधुरता से प्रस्तुत किया है-

रणजीति राम राऊ आये

रणजीति राम राऊ आये, यह उन भजनों में से एक है जो खरे अर्थ में दीपावली के पर्व से सम्बन्ध रखता है। लंका युद्ध पर विजय प्राप्त कर भगवान् राम जब सीता सहित अयोध्या पधारते हैं, सम्पूर्ण अयोध्या हर्ष एवं उल्हास से उनका स्वागत करती है। इसी आनंद को प्रदर्शित करता यह राम भजन प्रस्तुत है जिसे ध्रुपद गायकी में गुंदेचा बंधुओं ने मधुर स्वरों में बाँधा है-

रामचरित मानस -पंडित छन्नूलाल मिश्र

अंत में सुनिए यह राम चरितमानस गायन जिसमे राम कथा का निचोड़ है अलग अलग गायन शैलियों में

आदित्य सेनगुप्ता जी, इंडीटेल्स के लिए अप्रतिम राम भजनों की सूची के संकलन हेतु आपका अनेक धन्यवाद! इंडीटेल्स के इस संस्करण में इन भजनों को एक कड़ी में पिरोने का मेरा प्रयास अत्यंत आनंददायी तथा आत्मसंतुष्टी प्रदान करने वाला था। अनेक रूपों में राम के विभिन्न चरित्रों को सजीव करते इन भजनों को आत्मसात करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

भगवान् राम एवं उनकी भक्ति ने मेरे रोम रोम को भक्तिरस में सराबोर कर दिया। पहली बार ऐसा अनुभव हुआ जैसे राम भक्ति से ओतप्रोत संगीतमय दीपावली का पर्व मना लिया हो।

पाठकों के निवेदन है कि यदि आपका प्रिय राम भजन इस सूची में सम्मिलित नहीं है तो उसका उल्लेख निम्न दर्शित टिप्पणी खंड में अवश्य करें।

भगवान् राम से प्रार्थना है कि वह आपके जीवन में सुख, ऐश्वर्य एवं हर्षोल्हास की रोशनी भर दे!

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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बादामी, ऐहोले, पत्तदकल – एक कविता, एक प्रेरणा https://inditales.com/hindi/badami-aihole-pattadakal-hindi-poem/ https://inditales.com/hindi/badami-aihole-pattadakal-hindi-poem/#respond Sun, 28 May 2017 02:30:21 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=88

जब आप पत्थरों पे कवि की कविता लिखी देखते हैं तो कभी कभी उस कविता का कथन इतना प्रभावशाली होता है की आप के अन्दर भी एक कविता फूट पड़ती है। कुछ ऐसा ही मेरे साथ हुआ जब मैंने कर्णाटक स्थित बादामी, ऐहोले और पत्तदकल के मंदिरों के शिल्प को देखा. कितना समझा यह तो […]

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पत्तदकल के मंदिर
पत्तदकल के मंदिर

जब आप पत्थरों पे कवि की कविता लिखी देखते हैं तो कभी कभी उस कविता का कथन इतना प्रभावशाली होता है की आप के अन्दर भी एक कविता फूट पड़ती है। कुछ ऐसा ही मेरे साथ हुआ जब मैंने कर्णाटक स्थित बादामी, ऐहोले और पत्तदकल के मंदिरों के शिल्प को देखा. कितना समझा यह तो कहना मुश्किल है, पर दिल को कितना छुआ इसका अनुमान आप यह कविता पढ़ कर लगा सकते हैं।

यह कविट्स यूँ समझिये की वो पत्थर कह रहे हैं या फिर उनको तराशने वाले वो महान शिल्पकार – जिनका उत्कृष्ट काम आज के शिल्पकारों के लिए एक चुनौती के सामान है। जीवन का कौन सा रस है जो इन पत्थरों में घड़ा नहीं मिलता है।

इस भ्रमांड के इतिहास में
कुछ पन्ने मेरे भी हैं

सदियों पहले, मैंने जन्म लिया
इस धरती पर अपनी छाप छोड़ी

आने वाली पीड़ियों के लिए
पथ्हरों को चीर कर लिखी
मेरे युग की कहानियां

सैंकडों शिल्पकारों को सिखाया
शिल्पी बन कहानियां लिखने का गुर

फिर उनके हाथों के जादू ने
पिरोया इतिहास कुछ यूँ की

पत्थर बोल उठे, नाच उठे
कभी कहानी सुनते तो कभी
पूछते तुमसे पहेलियाँ, कभी
एक निर्मल छवि बस देते हुए

देखोगे तो पाओगे छोडी हैं मैंने
न केवल शिल्प्कारियों की कला
पर उन पलों का लेखा जोखा
जिनको था मैंने देखा और जिया

वो उन्माद और वो उल्हास
जो देता आया है आनंद और जीवन
वो देवी देवता, जिनसे ले पाठ
आज भी तुम देते लेते हो दिशा

वो नौ रस और कलाएं वो जीव जंतु और क्रीडाएं
जो मिली धरोहर में और
जिनको संभाला, पाला तुम्हारे लिए
छोडे हैं अपने समय के निशान
झीलों के किनारे, पहाडों के ऊपर
स्तंभों पे, दीवारों पे, छत पे
सीडियों पे, कलाकृतियों में

यह धरोहर है मेरे जीवनकाल की
छोड़ आई जिसे तुम्हारे लिए
इसे संभल रखना उनके लिए जो
अभी आये नहीं मुझसे मिलने

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मोढेरा का सूर्य मंदिर https://inditales.com/hindi/surya-mandir-modhera-gujarat/ https://inditales.com/hindi/surya-mandir-modhera-gujarat/#respond Thu, 05 Jan 2017 12:32:48 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=74

मोढेरा का सूर्य मंदिर कर्क रेखा पे अपने ईष्ट देव की और मुहँ बाये कमल पट्ट पे खड़ा मोढेरा का सूर्य मंदिर पुष्कारणी में माला से गूँथे हैं छोटे बड़े मंदिर जिनकी छवि से हैं खेलते जल जन्तु कच्छ और मच्छ सभा मंडप है समेटे कथाएँ राम और कृष्ण की जन्म से मृत्यु की यात्रा […]

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मोढेरा का सूर्य मंदिर

मोधेरा सूर्य मंदिर

कर्क रेखा पे
अपने ईष्ट देव की और
मुहँ बाये कमल पट्ट पे खड़ा
मोढेरा का सूर्य मंदिर
पुष्कारणी में माला से
गूँथे हैं छोटे बड़े मंदिर
जिनकी छवि से हैं खेलते
जल जन्तु कच्छ और मच्छ
सभा मंडप है समेटे
कथाएँ राम और कृष्ण की
जन्म से मृत्यु की यात्रा
मधी है बाहिरी वर्ग पे
कोख रहित गर्भ गृह
कथा कहता प्रहारों की
जो खंडित तो कर गये, पर
क्षीण ना कर पाए तेज को
आठों दिशाओं में
दिशा देवो का वास है
शिलाओं में समाया
संगीत नृत्य उल्हास है
पुष्पावती है जिसे सहलाती
अपनी जल धार से
सूर्य जैसे हो प्रहरी
अपने इस प्रतिबिंब का

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आजकल – दिल्ली पे लिखी एक कविता https://inditales.com/hindi/dilli-aajkal-hindi-poem-anuradha-goyal/ https://inditales.com/hindi/dilli-aajkal-hindi-poem-anuradha-goyal/#respond Wed, 04 Jan 2017 08:29:58 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=63

आजकल तुम पाओगे मुझे दिल्ली की गलिओं में खाक छानते हुए इधर उधर कूचों में झाँकते हुए सदियों पुराने चबूतरों पे बैठे हुए इस दरगाह से उस मज़ार जाते हुए यहाँ वहाँ बिखरे मक़बरों को ताकते हुए देखते, कल और कल को एक साथ गुज़रते हुए और कुछ नये इतिहासों को बनते हुए कभी किसी […]

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स्वामी श्रध्हानंद मूर्ति - पुरानी दिल्ली

आजकल तुम पाओगे मुझे

दिल्ली की गलिओं में खाक छानते हुए
इधर उधर कूचों में झाँकते हुए
सदियों पुराने चबूतरों पे बैठे हुए

इस दरगाह से उस मज़ार जाते हुए
यहाँ वहाँ बिखरे मक़बरों को ताकते हुए
देखते, कल और कल को एक साथ गुज़रते हुए
और कुछ नये इतिहासों को बनते हुए

कभी किसी कोने में बैठे देखा
बच्चों को बेफ़िक्र खेलते हुए
सुबह सवेरे बाज़ारों को जागते हुए
क़िलो पे सूरज को चढ़ते और ढलते हुए

फूलवलों को खुश्बू हार में पिरोते हुए
हलवाई को केसरी जलेबी तल्ते हुए
और फिर फिरनी से मक्खी उड़ाते हुए
फ़ुर्सत में चाय की चुस्कियाँ लेते हुए

देखा पुजारी को कैमरे की तरफ मुस्काते हुए
एक डॉक्टर को अनगिनत पक्षियों को पालते हुए
क़व्वाल की नज़र को अगली ज़ेब तलाशते हुए
आम आदमी को जीवन से मृत्यु की और जाते हुए

देखा कुछ लोगों को रुक रुक कर भागते हुए
तो कुछ को भागते भागते थककर रुकते हुए
कभी एक दूसरे से टकराते हुए
कभी एक दूरसे को संभालते हुए

गिरते लुढ़कते दुनिया को चलते हुए
बोझ ढोते फिर भी हंसते हुए
थॅंक कर बैठते और फिर उठते हुए
शोर गुल के बीच खुद से बतियाते हुए

मैने खुद को देखा इतिहास पढ़ते हुए
खंडरों में धरोहर ढूँढते हुए
कल की कड़ी से आज का छोर जोड़ते हुए
इस शहर को समझने की कोशिश करते हुए

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