विश्व यात्रा Archives - Inditales https://inditales.com/hindi/category/विश्व-यात्रा/ श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Fri, 02 Aug 2024 05:44:30 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.7.4 नेपाल के चितवन राष्ट्रीय उद्यान में पदभ्रमण https://inditales.com/hindi/chitwan-rashtriya-udyan-nepal-pad-bhraman/ https://inditales.com/hindi/chitwan-rashtriya-udyan-nepal-pad-bhraman/#respond Wed, 08 Jan 2025 02:30:21 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3745

हम प्रातः मुँहअँधेरे ही उठ गए थे। अथवा यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि चितवन राष्ट्रीय उद्यान में गूँजते कोलाहल ने हमें प्रातः शीघ्र जागने के लिए बाध्य कर दिया था। हमें चितवन राष्ट्रीय उद्यान में पदभ्रमण या पैदल सफारी करने के लिए जाना था। हम जिस ‘बरही वन अतिथिगृह’ (जंगल लॉज) में ठहरे थे, […]

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हम प्रातः मुँहअँधेरे ही उठ गए थे। अथवा यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि चितवन राष्ट्रीय उद्यान में गूँजते कोलाहल ने हमें प्रातः शीघ्र जागने के लिए बाध्य कर दिया था। हमें चितवन राष्ट्रीय उद्यान में पदभ्रमण या पैदल सफारी करने के लिए जाना था। हम जिस ‘बरही वन अतिथिगृह’ (जंगल लॉज) में ठहरे थे, उसके एक ओर से राप्ती नदी बहती है। उस राप्ती नदी के दूसरी ओर चितवन राष्ट्रीय उद्यान स्थित है। राप्ती नदी पार करने के लिए हम एक नौका में बैठ गए। नदी पर कोहरे की एक मोटी चादर बिछी थी जो शनैः शनैः ऊपर उठ रही थी। इस कोहरे से भरे वातावरण में चारों ओर का परिदृश्य ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो अपनी परतों में अनेक रहस्य छुपाये हुए है। हमारी नौका धीरे धीरे दूसरे तट की ओर बढ़ रही थी। कुछ अन्य पर्यटक नौकाएं भी हमारे साथ हो लिये। अकस्मात सभी नौकाओं के नाविकों ने सावधान होकर नौकाओं की गति धीमी कर दी। हमने देखा कि वे एक गेंडे को नदी पार करने में प्राथमिकता दे रहे थे। नदी पार कर वह गेंडा वन में प्रवेश कर गया।

चितवन राष्ट्रीय उद्यान नेपाल
चितवन राष्ट्रीय उद्यान नेपाल

जिस स्थान से गेंडे ने वन में प्रवेश किया था, हमारे नाविक ने नौका को उस बिन्दु के समीप ही अँकोड़े से बांध दी। गेंडे का स्मरण कर हम नौका से उतरने के लिए भय से हिचकिचाने लगे। किन्तु हमारे सफारी परिदर्शक ने हमें धीर बंधाया, तब जाकर हमने नौका से उतरकर वन में प्रवेश किया।

चितवन राष्ट्रीय उद्यान में पदभ्रमण

हम जंगल सफारी कर रहे थे किन्तु पदभ्रमण करते हुए। इससे पूर्व हमने जीप तथा नौका में बैठकर वन का सुरक्षित अवलोकन किया था। अब हम वन के भीतर पैदल भ्रमण करने जा रहे थे।

चितवन राष्ट्रीय उद्यान की भोर
चितवन राष्ट्रीय उद्यान की भोर

हमें अब भी स्मरण था कि वह गेंडा यहीं से वन के भीतर गया था। यह तथ्य हमें उत्सुकता के साथ भयभीत भी कर रहा था। हमारा परिदर्शक हमें अनवरत स्मरण कर रहा था कि चितवन राष्ट्रीय उद्यान में एक नहीं, अपितु ६०० से अधिक गेंडे हैं। वे हमारे चारों ओर उपस्थित हैं, चाहे हम उन्हे देख पायें अथवा नहीं। उन्होंने हमें आश्वस्त कराया कि गेंडों को मानवों में रुचि नहीं होती। वे तब तक आक्रमण नहीं करते जब तक कि उन्हे हमारी ओर से संकट का आभास ना हो। मैं विचार करने लगी कि गेंडों को यह कैसे ज्ञात होगा कि यहाँ हमें उनसे भय प्रतीत हो रहा है तथा उन्हे हमसे भयभीत होने की कोई आवश्यकता नहीं है, जबकि उन्हे यह स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा है कि मैं उसी प्रजाति का भाग हूँ जो उनका अप्राकृतिक व उनकी प्रजाति के उन्मूलन की सीमा तक वध करने के लिए जाना जाता है।

चितवन का प्राकृतिक सौन्दर्य

जैसे ही हमने पदभ्रमण आरंभ किया। हमारा भय शनैः शनैः लुप्त होने लगा। प्रकृति की सुंदरता नयनों में बसने लगी थी। प्राकृतिक सौन्दर्य का आनंद हृदय में भय का स्थान ग्रहण करने लगा था। वन में छाया कोहरा अब विरल होने लगा था। वन में अनेक छोटे-बड़े सरोवर दृष्टिगोचर होने लगे थे जिनके जल पर ऊँचे ऊँचे वृक्षों का प्रतिबिंब पड़ रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो कोहरे की परत हटाकर सरोवर शनैः शनैः स्वयं को प्रकट करने का प्रयास कर रहा है।

भूमि पर बिखरे सूखे पत्तों पर चलने के कारण सरसराहट हो रही थी। हमारे मस्तिष्क में शंका उठ रही थी, यदि आसपास स्थित गेंडों अथवा उनके अन्य वन्य प्राणी मित्रों ने यह ध्वनि सुनकर कोई अवांछित प्रतिक्रिया व्यक्त कर दी तो क्या होगा!

चारों ओर अनुपम परिदृश्य था। ऊँचे ऊँचे वृक्ष थे जिनके नीचे सूखी पत्तियों की भूरी चादर बिछी हुई थी। अनेक स्थानों पर ऊँचे वृक्षों की शाखाएं आपस में मिलकर मंडप बना रही थीं, मानो हमारा स्वागत कर रही हों।

वन भ्रमण में हमारा नेतृत्व करने वाला साथी, साकेत लघु वन प्राणियों की ओर हमारा लक्ष्य केंद्रित कर रहा था। मुझे किंचित क्षोभ हुआ कि ये लघु प्राणी बिना किसी संकेत के उसे इतनी सुगमता से कैसे दृष्टिगोचर हो रहे थे! मुझे तो उसके द्वारा संकेतिक दिशा में गहनता से देखने के पश्चात भी प्राणियों को ढूँढने में समय लग रहा था। किन्तु जब हमने वृक्षों की शाखाओं पर बैठे हमारे पंख वाले मित्रों को देखना आरंभ किया तब मैं भी साकेत को चुनौती देने में सक्षम हो गयी थी। हमने अनेक प्रकार के रंगबिरंगे वन्य पक्षियों को देखा।

चितवन राष्ट्रीय उद्यान में हमारे द्वारा देखे वन्य पक्षियों पर मैंने एक विस्तृत संस्करण प्रकाशित किया है। आप इसे अवश्य पढ़ें: चितवन राष्ट्रीय उद्यान के वन्य पक्षी

वृक्षों की शाखाओं पर विराजमान पक्षी पत्तियों के पीछे छुप कर बैठे थे। हम उन्हे ढूंढ तो पा रहे थे किन्तु उनका स्पष्ट छायाचित्र ले पाना असंभव हो रहा था। मैंने छायाचित्र लेने का प्रयत्न करना ही छोड़ दिया। उसके स्थान पर मैंने पक्षियों के विविध रंगों एवं उनके हाव-भाव का आनंद उठाना आरंभ किया। पक्षियों को चहचहाते तथा एक शाखा से दूसरी शाखा पर उड़ते देखने में मैं रम गयी थी। एक क्षण ऐसा आया जब मुझे चटक लाल रंग का एक पक्षी दृष्टिगोचर हुआ। उसे देख मेरे हाथों ने सहज ही कैमरा उठा लिया। हमने कुछ क्षण लुका-छिपी का खेल खेला। अंततः मैं उसका चित्र लेने में सफल हो पायी तथा अपने दल में पुनः सम्मिलित हो गयी।

चितवन राष्ट्रीय उद्यान में वन्यजीवन के विविध चिन्ह

साकेत ने हमें भूमि पर चींटियों के घर, सांप की बाँबी आदि दिखाई। उन्होंने हमें अनेक वन्य प्राणियों के पदचिन्ह दिखाए। वे ना केवल यह जानते थे कि वो किस प्राणी के पदचिन्ह हैं, अपितु वे यह भी जानते थे कि वो प्राणी किस आयुवर्ग का हो सकता है। अद्भुत!

हमने अनेक प्रकार व आकार की मकड़ियाँ अपने जालों में लटकती देखीं। उनके जाले ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो वे शाखाओं को जोड़ने की चेष्टा कर रही हों। कई कई स्थानों पर वे वृक्षों को जोड़ने का प्रयास करती प्रतीत हुईं।

प्रातः लगभग ८ बजे हम जलपान के लिए रुके। हमारा वन मार्गदर्शक हमें एक खुले स्थान पर ले गया जहाँ एक वृक्ष आड़ा पड़ा हुआ था। उस पर बैठकर हमने साथ लिया हुआ जलपान किया। सम्पूर्ण परिस्थिति हमें गदगद कर रही थी। ऊँचे ऊँचे वृक्षों से परिपूर्ण सघन वन के मध्य एक मुक्ताकाश स्थल, बैठक के रूप में गिरा हुआ विशाल वृक्ष, वन का प्राकृतिक वातावरण तथा प्रातःकालीन शीतल वातावरण में बैठकर जलपान करना, सब कुछ अत्यंत अद्भुत था।

जलपान कर हम जैसे ही उठे, एक मादा गेंडा अपने शावक के साथ हमारे समक्ष उपस्थित हो गयी, केवल  लगभग १०० मीटर दूर!

हम सब एक वृक्ष के पीछे छुप गए तथा मन ही मन प्रार्थना करने लगे कि हम उसकी दृष्टि में ना आयें, ना ही उसके मार्ग में। एक ही धरातल पर, इतने समीप से इस विशाल प्राणी को देखना अत्यंत रोमांचकारी था, भले ही हम छुपकर देख रहे थे। इससे पूर्व मैंने जीप अथवा हाथी की पीठ पर बैठ कर ही गेंडों के दर्शन किये थे।

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कांचीरूवा के दर्शन

चितवन के वन में पदभ्रमण का सर्वाधिक रोमांचकारी वह क्षण था जब हमने अकस्मात ही कांचीरूवा नामक एक गेंडे का कंकाल देखा। एक कान कटा होने के कारण उसे इस नाम से बुलाया जाता था।

कंकाल के विभिन्न भाग यहाँ-वहाँ बिखरे हुए थे। जब हम उसके शीष के निकट गए तब हमें आभास हुआ कि गेंडा वास्तव में कितना विशालकाय प्राणी है। उसकी लंबी लंबी पसलियाँ शाखाओं सी प्रतीत हो रही थीं। उसके दाँत का आकार मानवी चरण का लगभग चौथाई भाग जितना था।

यदि यहाँ जन्तु विज्ञान का कोई विद्यार्थी आ जाता तो इस कंकाल का अध्ययन करते घंटों व्यतीत कर सकता था। चमड़ी व माँसपेशियाँ विहीन होने के पश्चात भी उस कंकाल का विशालकाय आकार मुझे स्तंभित कर रहा था।

वापिस आकार जब मैं उस कंकाल के छायाचित्र देख रही थी तब मुझे वन के अनकहित नियम का साक्षात्कार हुआ। जब तक वह गेंडा जीवित था, उसने कदाचित इस वन में राज किया होगा। मृत्यु के पश्चात वही गेंडा अपने साथी पशुओं का भोजन बना होगा तथा हम जैसे पर्यटकों के लिए प्रदर्शनीय वस्तु। हमें बताया गया कि वन में प्राणियों की मृत्यु होती रहती है किन्तु हमें अन्य कोई कंकाल नहीं दिखा।

ध्यान से देखें

पदभ्रमण करते हुए हम आगे बढ़े। हमने अनेक बहुरंगी तितलियाँ एवं कीट देखे। किन्तु उन्हे देखने के लिए सम्पूर्ण ध्यान की आवश्यकता होती है। गहरे हरे रंग के पत्ते पर बैठे हरे रंग के टिड्डे को देखना, सूखी पत्तियों के बीच छोटे छोटे सुंदर कीटों को देखना, पत्तों के झुरमुट में बैठी तितली को ढूँढना, सब अत्यंत मनोरंजक था। मार्ग में एक सरोवर के पास भ्रमण करते हुए हमने जल के ऊपर लटकती शाखा पर बैठे एक नीलकंठ को देखा।

हमने मोटी बेलें देखी जिन पर बड़े बड़े त्रिकोणाकार कांटे थे। उनका आकार लगभग हमारे हाथों जितना था। कदाचित प्रकृति ने ही उन्हे इन काँटों के द्वारा सक्षम बनाया है कि वे स्वयं का संरक्षण कर सकें।

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यहाँ-वहाँ पड़े मृत वृक्ष के तनों पर भिन्न भिन्न प्रकार के कुकुरमुत्ते उगे हुए थे। क्या वे सभी प्रजातियाँ मानवी उपभोग के लिए सुरक्षित हैं? क्या गेंडे जैसे वन के शाकाहारी प्राणी भी उन्हे खाते होंगे? ऐसे अनेक विचार मस्तिष्क में उभरने लगे। अपने चारों ओर के वनीय प्रदेश के जटिल पारिस्थितिकी तंत्र को जानने व समझने के प्रयास में मस्तिष्क में उभरते प्रश्न श्रंखला में से ये भी कुछ प्रश्न थे।

सेमल के लाल पुष्प

भूमि पर गिरे सेमल के लाल पुष्प बेरंग बालुई भूमि पर रंग भर रहे थे। किन्तु आज का सर्वोत्तम शोध था, छोटे छोटे नारंगी रंग के गोले। उन्हे स्पर्श करते ही हमारे हाथ नारंगी हो रहे थे। गोले हाथों में नारंगी रंग का चूर्ण छोड़ रहे थे। हमें यह स्पष्ट आभास हो रहा था कि ये साधारण गोले नहीं हैं। इसका कुछ ना कुछ महत्वपूर्ण उपयोग अवश्य ही होगा। किन्तु क्या? तभी हमारे वन परिदर्शक ने हमें जानकारी दी कि स्थानीय भाषा में इसे सिंधुरे कहा जाता है। हमारे मस्तिष्क में बिजली कौंधी। इसे नेपाली, हिन्दी एवं संस्कृत भाषा में भी तो यही कहा जाता है!

वन में पर्याप्त पदभ्रमण करने के पश्चात हम अपने बरही जंगल लॉज में पहुँचे। हमने उनके पुस्तकालय में इस नारंगी रंग के फल के विषय में जानकारी ढूँढी। हमें एक रोचक जानकारी प्राप्त हुई कि प्राचीन काल में इस फल से प्राप्त प्राकृतिक रंग से रेशम को रंगा जाता था।

चितवन वन में लगभग ४-५ घंटे पदभ्रमण कर तथा वन के विविध रंगों व गंधों में सराबोर होने के पश्चात हम वापिस राप्ती नदी के तट पर पहुँचे। वहाँ वृक्ष के एकल तने से निर्मित एक संकरी नौका हमारी प्रतीक्षा कर रही थी। नौका पर चढ़ने से पूर्व मैंने पीछे मुड़कर इस वन को पुनः निहारा। तत्पश्चात नदी के तट को देखा। मैंने देखा कि नदी के भीतर भी उसका एक स्वयं का वन है। इसके जल के ऊपर तथा भीतर अनेक प्रकार के जलीय पौधे तैर रहे थे मानो एक भिन्न वन बना रहे हों।

मुझे चितवन वन के भीतर किया इस पदभ्रमण का दीर्घ काल तक स्मरण रहेगा। एक ओर शांत व शीतल प्राकृतिक वातावरण था, तो दूसरी ओर अधीरता थी। मन में अनेक प्रकार के भाव उठ रहे थे। कभी विस्मय तो कभी शांति, कभी आनंद तो कभी भय। साथ ही भरपूर्ण शारीरिक व्यायाम।

नेपाल की यात्रा नियोजित करने से पूर्ण मेरे इन यात्रा संस्करणों को अवश्य पढ़ें जो आपको नेपाल, विशेषतः काठमांडू के आसपास के रोचक व अछूते दर्शनीय स्थलों के विषय में विस्तृत जानकारी प्रदान करेगा।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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अनभीष्ट की पिटाई- हांगकांग की विचित्र परंपरा https://inditales.com/hindi/hong-kong-mein-pitaai-ka-sanskar/ https://inditales.com/hindi/hong-kong-mein-pitaai-ka-sanskar/#respond Wed, 13 Nov 2024 02:30:42 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3716

अनभीष्ट व्यक्ति की पिटाई, यह हांगकांग की उन परम्पराओं में से एक है जिसे मैं अपनी हांगकांग यात्रा की लघु अवधि में देखना चाहती थी। हांगकांग में मैंने अनेक मंदिर एवं संग्रहालय देखे। हांगकांग के ऐतिहासिक संग्रहालय में मुझे वहाँ के अनेक रोचक उत्सवों के विषय में जानकारी प्राप्त हुई। एक उत्सव में वे गोल […]

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अनभीष्ट व्यक्ति की पिटाई, यह हांगकांग की उन परम्पराओं में से एक है जिसे मैं अपनी हांगकांग यात्रा की लघु अवधि में देखना चाहती थी। हांगकांग में मैंने अनेक मंदिर एवं संग्रहालय देखे। हांगकांग के ऐतिहासिक संग्रहालय में मुझे वहाँ के अनेक रोचक उत्सवों के विषय में जानकारी प्राप्त हुई। एक उत्सव में वे गोल डबल रोटियों से ऊँचा बुर्ज बनाते हैं। उनका चीनी नव-वर्ष भी एक अनोखा उत्सव होता है। उसका भी अनुभव आपको अवश्य लेना चाहिए। ये सभी उत्सव वर्ष में भिन्न भिन्न समय पर आयोजित किये जाते हैं। उनका अनुभव प्राप्त करने के लिए आपको अपनी यात्रा उसी अनुसार नियोजित करनी पड़ेगी।

अनभीष्ट की पिटाई
अनभीष्ट की पिटाई

मेरी रूचि के केंद्र में दैनन्दिनी अनुष्ठान एवं परम्पराएं थीं। मैं उन्ही की खोज में थी। मेरी खोज मुझे एक उड्डान पुल के नीचे ले गयी जो Causeway Bay में स्थित है। हांगकांग में मैं यहीं ठहरी हुई थी। उड्डान पुल के आधार स्तंभों के चारों ओर महिलायें बैठी हुई थीं। प्रत्येक महिला के पास छोटे से मंदिर जैसी व्यवस्था थी। वे अपने एक हाथ में जूता लेकर ईंटों के ढेर पर मारती हुई आपका ध्यान आकर्षित करने की चेष्टा करती हैं। अपने दूसरे हाथ से वे आपको वहाँ आमंत्रित करती हैं।

ये महिलायें अवांछित शक्तियों एवं आत्माओं को भगाने के अनुष्ठान में निपुण मानी जाती हैं।

अनभीष्ट की पिटाई

अनभीष्ट की पिटाई हांगकांग की एक परंपरा है। एक ऐसा लोक अनुष्ठान जो हांगकांग एवं चीन में लोकप्रिय है। यह अनुष्ठान विशेषतः चीनी भाषी लोगों में प्रचलित है। यह अनुष्ठान उन लोगों को सुख पहुँचाता है जो किसी व्यक्ति विशेष के व्यवहार अथवा कृत्य से आहत हैं। इस अनुष्ठान में इन महिलाओं द्वारा उस अनभीष्ट व्यक्ति विशेष की प्रतीक रूप में पिटाई करवाई जाती है। वह अनभीष्ट व्यक्ति विशेष कोई अवांछित संबंधी हो सकता है अथवा झगड़ालू व ईर्ष्यालू पड़ोसी हो सकता है। कार्यालय या कार्यक्षेत्र का कोई कनिष्ठ अथवा वरिष्ठ सहकर्मी हो सकता है अथवा परिवार का कोई कष्टदायक सदस्य। आप अपनी समस्या लेकर इन महिलाओं के पास जा सकते हैं।

छोटे मंदिर
छोटे मंदिर

वे उन व्यक्तियों के प्रतीकात्मक पुतले बनाकर अथवा उनके चित्र लेकर जूते से उनकी कुटाई करती हैं। साथ ही छोटा अनुष्ठान करते हुए आपके लिए मंगल प्रार्थना करती हैं। इन सब के अंत में आपको अत्यंत आनंद की अनुभूति होना अपेक्षित ही है। आतंरिक पीड़ा से मुक्ति मिलती है। अंतःकरण आश्वस्त हो जाता है कि कोई हमारे शत्रुओं से हमारी रक्षा कर रहा है। ये महिलायें पीड़ित को सभी प्रकार के कष्टों से बचे रहने का आशीष भी देती हैं।

इन महिलाओं में कुछ ज्योतिषी भी होती हैं जो हाथों की रेखाओं को देखकर विपदाओं एवं कष्टों का आकलन करती हैं तथा उनके निवारण के लिए सुझाव भी देती हैं।

इस अनुष्ठान को खलनायक मार(Villain Hitting ) भी कहते हैं। यह हांगकांग के अमूर्त धरोहर(Intangible Heritage of  Hong Kong) की सूची में भी सम्मिलित है। हांगकांग के इस विचित्र अनुष्ठान के दर्शन का यह भी एक उत्तम तर्क हो सकता है।

खलनायक कौन?

वह खलनायक अथवा वह अनभीष्ट कौन है जिसका नाम शमन के लिए दिया जाता है? जिससे भी पीड़ित व्यक्ति त्रस्त हो, वह अनभीष्ट हो सकता है। वह चाहे एक व्यक्ति हो अथवा व्यक्तियों का समूह हो, वह परिवार का कोई सदस्य हो अथवा परिवार के बाहर का कोई हो, वह कार्यक्षेत्र से सम्बंधित हो अथवा सामाजिक क्षेत्र से सम्बंधित हो।

अनभीष्ट की पिटाई का सर्वोत्तम समय

हांगकांग के Causeway सेतु में वर्षभर में कभी भी इन महिलाओं से भेंट की जा सकती है। वे साधारणतः प्रातः ११ बजे से देर रात्रि तक बैठती हैं। अधिकतर भेंटकर्ता वे होते हैं जो अपने कार्यालय के कार्य समाप्त कर संध्या के समय यहाँ आते हैं।

पारंपरिक रूप से JINGZHE की अवधि शत्रु पर विजय प्राप्त करने के अनुष्ठान के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। ये JINGZHE क्या है?

चीनी पंचांग सौर पंचांग को २४ भागों में बाँटता है। अर्थात् सूर्य के एक परिभ्रमण के ३६० अंश को १५ अंशों के २४ भागों में बाँटा जाता है। इन २४ भागों में से तीसरे भाग को JINGZHE कहते हैं जब सूर्य ३४५- ३६० अक्षांश के मध्य रहता है। यह एक सामान्य पंचांग के मार्च मास के आसपास स्थित होता है। उसमें भी सटीक रूप से यह ३४५ अक्षांश की ओर संकेत करता है जो सामान्यतः ५-६ मार्च के आसपास पड़ता है। चीन में कृषि पंचांग के अनुसार इसे ‘Awakening of the Insects’ भी कहते हैं जिसका अर्थ है, सुषुप्तावस्था में स्थित कीटों का जागरण। इसका अर्थ है, वसंत ऋतु का वह काल जब निष्क्रिय अथवा सुषुप्तावस्था में स्थित कीट व प्राणी अपनी दीर्घ निद्रा त्याग कर जागृत होते हैं।

अनभीष्ट की पिटाई का शुल्क

जब मैं इनके दर्शन करने गयी थी तब उनका शुल्क ५० हांगकांग डॉलर था। मुझे बताया गया कि ग्राहकों की संख्या के आधार पर वे मोलभाव करने में संकोच नहीं करती हैं। यदि वे ग्राहकों की प्रतीक्षा कर रही हों तो अपना शुल्क घटाने के लिए भी तत्पर रहती हैं।

इन महिलाओं में से अधिकतर केवल चीनी भाषा Cantonese ही बोलती हैं। अन्य लोगों की सुविधा के लिए वे छपा हुआ एक छोटा पर्चा रखती हैं जिस पर शुल्क लिखा होता है।

अनभीष्ट की पिटाई के अनुष्ठान का विडियो

भद्र महिला को उनका इच्छित शुल्क प्रदान करने के पश्चात वे अगरबत्ती जलाकर अनुष्ठान आरम्भ करती हैं।

शमन पीड़ित को पर्चियों का गट्ठा पकड़ा देती हैं। पीड़ित व्यक्ति उस पर्ची पर कष्टकारक व्यक्ति का नाम लिख कर देता है जिसकी पिटाई करवानी है। कष्टदायी कारक के विषय में जितनी अधिक जानकारी प्रदान की जाए, उतना ही वह कष्ट निवारण में सहायक होता है। कष्टकारक व्यक्ति से सम्बंधित कुछ वस्तु भी साथ में दे सकते हैं, जैसे उसके वस्त्र आदि।

वह भद्र महिला उस पर्चे को ईंटों पर रखती हैं तथा जूते से उस पर वार करती हैं। वह उस कागज के पर्चे पर इतना वार करती हैं कि वह फटने लग जाता है। कई बार वार करते हुए वो उसको शापित भी करती हैं।

तदनंतर उस कागज के टुकड़े को जलाया जाता है। उस जले हुए टुकड़े तो सांकेतिक रूप से कागज के बाघ के मुंह में डाला जाता है। तत्पश्चात दोनों को मंदिर में रखे धातु के एक डिब्बे में डाल दिया जाता है।

इस अनुष्ठान के पश्चात वो पीले रंग के एक कागज के द्वारा पीड़ित व्यक्ति को आशीष देती हैं। सर्वप्रथम उस कागज के टुकड़े के द्वारा, तत्पश्चात उसे जलाकर उसके द्वारा वो पीड़ित को आशीर्वाद प्रदान करती हैं।

इसके पश्चात उनसे आवश्यक प्रश्न किये जा सकते हैं। वे आपके हाथों की रेखाएं भी देखती हैं तथा प्रश्नों का उत्तर देती हैं। यदा-कदा पत्थर के दो टुकड़ों को पासे के समान फेंककर उनसे दिव्य समाधान प्राप्त करती हैं।

मेरा अनुभव

हांगकांग की अनेक परम्पराओं के विषय में जानकार मेरी भी इच्छा थी कि यहाँ की कम से कम एक परंपरा का अनुभव लूं। मैंने इसी अनूठे अनुष्ठान को देखने एवं उसका अनुभव लेने का निश्चय किया। किन्तु चीनी भाषा से अनभिज्ञता मेरे लिए एक समस्या थी। हमने अनुष्ठान का आरम्भ तो किया किन्तु मुझे तब यह ज्ञात नहीं था कि मुझे पर्चे पर किसी का नाम लिखकर उन्हें देना है। इसलिए मेरा अनुष्ठान पूर्ण नहीं हो पाया।  मैं थोड़ा समय वहाँ बैठकर कुछ लोगों के अनुष्ठान देखती रही। कुछ समय पश्चात उन्होंने मुझे उनके अनुष्ठान का विडियो लेने की अनुमति दे दी।

जब मैंने उस भद्र महिला को उनका विडियो दिखाया, वो अत्यंत प्रसन्न हो गयीं। उन्होंने मुझे आलिंगन किया तथा मेरे पैसे लौटा दिये क्योंकि मेरा अनुष्ठान पूर्ण नहीं हुआ था। उनकी शुचिता ने मेरा मन मोह लिया।

एक छोटे से स्थान पर कई महिलायें यह अनुष्ठान करने के लिए विराजमान थीं। वे सभी ईंटों पर जूता बजा बजा कर ग्राहकों का ध्यान आकर्षित करने की चेष्टा कर रही थीं।

हांगकांग की जीवंत संस्कृति एवं परम्पराएं

यह अनुभव मेरे लिए हांगकांग की जीवंत संस्कृति एवं परम्पराओं को समीप से जानने का एक अद्भुत अवसर था। लोगों का यह विश्वास है कि अवांछित तत्वों एवं शक्तियों को प्रताड़ित करने व उनको पीटने से जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं तथा सभी बाधाओं से मुक्ति मिल जाती है। पीड़ित व्यक्ति किसी के प्रति अपने क्रोध को यहाँ व्यक्त करता है तथा ये महिलायें अपने अनुष्ठान के द्वारा उस व्यक्ति तक सन्देश पहुँचाती हैं कि वो इस पीड़ित को कष्ट ना दे। मैं उन महिलाओं से वार्तालाप करना चाहती थी तथा इस विषय में उनका अनुभव जानना चाहती थी। मैं उनसे चर्चा तो नहीं कर सकी किन्तु SCMP Article इस आलेख के द्वारा आप उनके कुछ अनुभव अवश्य जान सकते हैं।

मेरे मन में एक रोचक विचार उत्पन्न हुआ! एक दूसरे से रुष्ट दो व्यक्ति एक ही समय में दो भिन्न भिन्न महिलाओं के पास जाकर एक दूसरे के विरुद्ध अनुष्ठान कराएं तथा एक दूसरे को पिटवायें! कदाचित हो सकता है। किसी परिवार के अथवा किसी कार्यालय के दो सदस्यों के बीच मतभेद की स्थिति में यह हो सकता है।

मैं जानती हूँ कि यह अनुष्ठान वास्तव में किसी दूसरे व्यक्ति को पिटवाने के लिए अथवा उसे कष्ट पहुँचाने के लिए नहीं होता है, अपितु यह अपने भीतर स्थित उस व्यक्ति के विरुद्ध क्रोध अथवा द्वेष की भावना को नष्ट करने का एक साधन है।

क्या आपको ऐसे ही किसी अन्य रोचक व विचित्र परंपरा या अनुष्ठान की जानकारी है?

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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नेपाल के मनभावन पक्षी- चितवन राष्ट्रीय उद्यान https://inditales.com/hindi/chitwan-rashtriya-udyan-nepal-ke-pakshi/ https://inditales.com/hindi/chitwan-rashtriya-udyan-nepal-ke-pakshi/#respond Wed, 23 Oct 2024 02:30:24 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3705

मुझे पक्षियों को देखना, उनकी चहचहाहट सुनना सदा से प्रिय था। मेरे जीवन में एक काल ऐसा था जब मैं पक्षियों की विविध प्रजातियों से अनभिज्ञ थी। अपने आसपास के पक्षियों को देखकर प्रसन्न हो जाती थी। जैसे जैसे मैंने विविध नभचरों को जानना एवं पहचानना आरंभ किया, मेरे आनंद में कई गुना वृद्धि हो […]

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मुझे पक्षियों को देखना, उनकी चहचहाहट सुनना सदा से प्रिय था। मेरे जीवन में एक काल ऐसा था जब मैं पक्षियों की विविध प्रजातियों से अनभिज्ञ थी। अपने आसपास के पक्षियों को देखकर प्रसन्न हो जाती थी। जैसे जैसे मैंने विविध नभचरों को जानना एवं पहचानना आरंभ किया, मेरे आनंद में कई गुना वृद्धि हो गयी। वनीय प्रदेशों में जाकर उन्हे ढूँढना, उनकी विविध चंचल चालों का आनंद उठाना, उनकी छवियों को अपने कैमरा में उतारना, मुझे लुभाने लगा है। वनीय क्षेत्रों की मेरी गत कुछ यात्राओं में मैंने अपने खग मित्रों के विषय में बहुत कुछ सीखा। वनों में पदभ्रमण करते हुए मैंने इन लुभावने प्राणियों के दुर्लभ दर्शन किये, कुछ दुर्लभ छायाचित्र लिए।

चितवन राष्ट्रीय उद्यान के पक्षी
चितवन राष्ट्रीय उद्यान के पक्षी

नेपाल के चितवन राष्ट्रीय उद्यान में भी मैंने इन पक्षियों के दर्शन करने के उद्देश्य से पदभ्रमण किया था। वहाँ मैंने विविध मनमोहक पक्षियों के दर्शन किए। अनेक पक्षियों ने मुझे उनके चित्र लेने के अवसर भी प्रदान किए जो सहसा दुर्लभ होते हैं। आईये, उन्ही चित्रों के माध्यम से, नेपाल के चितवन राष्ट्रीय उद्यान के इन चंचल प्राणियों से आपकी भेंट कराती हूँ।

चितवन राष्ट्रीय उद्यान के लुभावने पक्षी

नेपाल के तराई क्षेत्र में स्थित चितवन राष्ट्रीय उद्यान के भ्रमण के लिए मैं वहाँ के बरही वन विश्राम गृह (Barahi Jungle Lodge) में ठहरी थी। मेरा पक्षी दर्शन वहीं से आरंभ हो गया था। हमने विश्राम गृह में हमारे कक्ष के बाहर अनेक सुंदर पक्षियों को विचरण करते देखा जिन्होंने हमारी यात्रा की सम्पूर्ण थकान मिटा दी थी। राप्ती नदी के तट पर सुस्ताते मगरमच्छों एवं घड़ियालों के मध्य विविध पक्षी यत्र-तत्र फुदक रहे थे। अपनी नौका सफारी में भी हमने अनेक पक्षी देखे। उनमें से अनेक पक्षी गेंडों की पीठ पर बैठे भ्रमण का आनंद ले रहे थे। हाथी की सवारी के लिए जाते हुए भी हमने कई पक्षियों के दर्शन किए। वन में पदभ्रमण करते हुए हमें उनके सर्वोत्तम दर्शन उपलब्ध हुए।

चहचहाते पक्षी

जब हम चितवन पहुँचे, संध्या हो चुकी थी। अतः हमारे इन नभचर मित्रों से हमारी प्रथम भेंट प्रातः ही हो सकी। वो हमारे लिए अद्वितीय क्षण थे जब पक्षियों की चहचहाहट से हमारी प्रातःकाल आरंभ हुई। पक्षियों के कलरव ने हमें प्रातः शीघ्र ही उठा दिया था। बरही विश्राम गृह के निकट स्थित नदी सघन कोहरे से ढँकी हुई थी। जब हम हाथी की पीठ पर चढ़कर भ्रमण करने निकले, कोहरा शनैः शनैः छँटने लगा था। नदी के तट पर विचरण करते राजबक अथवा सारस जैसे बड़े पक्षी दृष्टिगोचर होने लगे थे। किन्तु हमारे कान अनेक पक्षियों की चहचहाहट से गूंज रहे थे जो अब भी हमारी आँखों से ओझल थे।

बुलबुल
बुलबुल

जिस पक्षी के हमने सर्वप्रथम स्पष्ट दर्शन किए, वह था, सेमल के वृक्ष के ऊपर बैठा घोंघिल अथवा Asian openbill Stork जिसे एशियाई चोंचखुला भी कहते हैं। सेमल का यह वृक्ष नारंगी पुष्पों से भरा हुआ था। उस पर एक भी पत्ती नहीं थी। वृक्ष की एक सूखी शाखा पर बैठे इस पक्षी ने मेरे कॅमेरे को प्रसन्न कर दिया था। बिना किसी अवधान के उसने इस पक्षी के अनेक चित्र लिए।

हमने कुछ सारसों को राप्ती नदी के तट पर भी कलोल करते देखा।

प्रातः जलपान के पश्चात हमने राप्ती नदी पार की। जीप पर सवार होकर चितवन राष्ट्रीय उद्यान में जीप सफारी के लिए चल दिए। मार्ग में हमने सर्वप्रथम जंगल मैना तथा बुलबुल जैसे कुछ सामान्य पक्षी देखे।

रिऊ नदी के तट

मार्ग में हम रिऊ नदी के तट पर पहुँचे। यह एक संकरी नदी है। इसके चट्टानी तल पर एक छोटा सा पक्षी टहल रहा था। हमने उससे भी भेंट की।

सेमल के पेड़ पर पक्षी
https://www.inditales.com/wp-content/uploads/2017/05/chitwan-bird-asian-openbill-stork.jpg

कुछ काल पश्चात हमें एनहिंगा अथवा Darter पक्षी दृष्टिगोचर हुआ। ये मछलियाँ खाते हैं। लंबी ग्रीवा के कारण इसे Snake Bird भी कहते हैं।

संध्या होते होते सभी लजीले पक्षियों ने वृक्ष की सूखी शाखाओं पर प्रकट होना आरंभ कर दिया। हमें अनेक पक्षियों के दर्शन हुए, जैसे:

मधुया (Grey-headed Fish Eagle)

पुंडरीकाक्ष अथवा White-eyed Buzzard

शिकरा पक्षी

हमने लाल छाती का एक टुइयाँ तोता (Red-breasted Parakeet) देखा जो सेमल के नारंगी पुष्प के साथ खेल रहा था।

जंगली मैना
जंगली मैना

सम्पूर्ण मार्ग में हमने अनेक मोर देखे। कुछ ठाठ से वृक्षों की शाखाओं पर विराजमान थे तो कुछ धरती पर विचरण कर रहे थे। वहीं कुछ मोर अपने मनमोहक नृत्य से मोरनियों को मोह रहे थे।

ऊँचे हाथी घास पर स्वयं को संभालता श्वेत पूंछ का एक गोजा देखा जिसे White-tailed Stonechat भी कहते हैं।

पदभ्रमण सफारी

दूसरे दिवस हम पदभ्रमण करते हुए वन की सफारी करने निकले। हमने एक नीलकंठ को देखा जो नदी के जल के ऊपर लटकती एक शाखा पर बैठकर, नीचे जल के भीतर तैरती मछलियों को पकड़ने की तैयारी कर रहा था।

लाल बुलबुल
लाल बुलबुल

वन में यूँ तो अनेक पक्षी दृष्टिगोचर होते हैं लेकिन कॅमेरे में उनके चित्र ले पाना लगभग असंभव होता है। पक्षियों के छायाचित्र लेने के लिए मार्ग के दोनों ओर के वृक्ष सर्वोत्तम स्थल होते हैं। इसके अतिरिक्त, मैदानी क्षेत्रों में स्थित वृक्षों की सूखी शाखाएं भी चित्रीकरण के लिए उत्तम स्थल होते हैं।

हमें एक वृक्ष के तने पर बैठा धूसर नीले रंग का एक सुंदर पक्षी दिखा जिसकी चोंच नारंगी रंग की थी। मैं अपने कॅमेरे से उसका एक छायाचित्र ही ले पायी थी कि वह वन में कहीं लुप्त हो गया। वही चित्र अब मेरे लिए अमूल्य हो गया है।

अकस्मात ही, ना जाने कहाँ से, एक स्वर्गपक्षी हमारे समक्ष प्रकट हो गया तथा हम उसकी ओर अपने कॅमेरे घुमाएं, उससे पूर्व ही वह अकस्मात कहीं लुप्त भी हो गया।

संध्याकालीन नौका सफारी

संध्याकालीन नौका सफारी में अंततः हमें बतखों (Rhodesian Ducks) को देखने का सुअवसर प्राप्त हो ही गया। जब से हम चितवन राष्ट्रीय उद्यान आए थे, इनका किटकिटाना अनवरत सुन रहे थे किन्तु उन्हे अब तक देख नहीं पाये थे। ये प्रवासी नभचर हैं जो प्रत्येक वर्ष हिमालयीन क्षेत्रों से यहाँ आते हैं।

तोता
तोता

अन्य प्रजातियों की बतखें भी ऊँचे स्वर में किटकिटाते हुए यहाँ-वहाँ विचरण कर रही थीं। उन्हे देख मुझे एक कहावत का स्मरण हुआ, मछली बाजार। मुझे साधित हुआ कि नदी ही तो उनका मछली बाजार है। कुछ क्षणों पश्चात मैंने कुछ स्थानीय नेपालियों को देखा जो छोटे छोटे जालों में मछलियों को पकड़ने का प्रयास कर रहे थे।

चितवन राष्ट्रीय उद्यान के बहुरंगी पक्षी

मैंने बरही वन विश्राम गृह के समीप ही अनेक बहुरंगी पक्षियों को देखा। जैसे:

मोरनी
मोरनी

पीले रंग की एक छोटी सी पक्षी, जिसकी पीठ पर धारियाँ थीं। वह सोबिगा पक्षी था जिसे अंग्रेजी में Common Lora कहते हैं। एक वृक्ष पर कुछ क्षण शांत बैठकर उसने मुझे उसका सुंदर छायाचित्र लेने का पूर्ण अवसर प्रदान किया।

हरे हरे पत्तों के मध्य बैठा एक हरे रंग का पक्षी मुझे इतना भ्रमित कर गया कि मैं उसका छायाचित्र लगभग मिटाने ही वाली थी, यह सोचकर कि यहाँ कोई पक्षी नहीं है। समय रहते मुझे आभास हो गया कि यह तो वृक्ष की एक शाखा में आनंद से बैठा बसंत (Lineated Barbet) है।

हमें एक छोटा सा गोलाकार पक्षी दिखाई दिया जिसे गवैया अथवा फुदकी (warbler) कहते हैं। उसकी क्रीड़ाओं को देख आपको यह आभास हो जाएगा कि ‘फुदकना’, यह शब्द कहाँ से आया होगा!

चितवन राष्ट्रीय उद्यान अवलोकन के अंतिम चरण में हम अपना भ्रमण समाप्त करने ही वाले थे कि हमारे समक्ष कुछ गिद्ध प्रकट हो गए। मानो हमें यह आभास करा रहे हों कि यहाँ हम भी हैं! सही भी था! इन ३-४ दिवसों में हमने उन्हे देखा ही नहीं था!

इस भ्रमण में अंतिम दर्शन हुए, राप्ती नदी के ऊपर उड़ते बगुलों के।

वनाग्नि एवं चितवन राष्ट्रीय उद्यान के पक्षी

हमने जब जब भी वन्य जीवन दर्शन के लिए यात्राएँ  की हैं, इन नभचरों से भेंट अवश्य हुई है। किन्तु यह यात्रा विशेष है क्योंकि हमें इन खगों के विचित्र हावभावों को देखने का सौभाग्य मिला। वन के एक भाग में ऊँचे हाथी घास को जलाया जा रहा था ताकि उनके स्थान पर नवीन कोंपलें जन्म लें जो गेंडों का प्रिय भोजन है।

सारस पक्षी
सारस पक्षी

उस अग्नि के चारों ओर बुलबुल एवं ड्रोन्गो जैसे अनेक छोटे पक्षी एकत्र हो रहे थे. वहाँ उनके लिए भोजन स्थल जो बन गया था। अग्नि की उष्णता से बचने के लिए सभी कीड़े-मकोड़े भूमि से बाहर आ रहे थे तथा इन पक्षियों का भोजन बन रहे थे।

विशेष दृश्य था। जिन्होंने वनाग्नि देखी है, उनके लिए भले ही यह एक सामान्य घटना होगी किन्तु मेरे लिए वह एक विशेष घटना थी। इससे पूर्व मैंने ऐसा अद्वितीय दृश्य नहीं देखा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे भूल से पक्षी अग्नि के भीतर आकर्षित हो रहे हों। किन्तु सभी पक्षी एक साथ एक ही भूल कैसे कर सकते हैं? हमारे लिए यह एक अनोखा क्षण था जब हमें इतने सारे पक्षियों को एक साथ देखने का सुअवसर प्राप्त हुआ।

चितवन में पक्षी दर्शन

चितवन में हम जहाँ भी गए, हमें विविध पक्षियों के दर्शन हुए। यहाँ तक कि बरही वन विश्राम गृह, जहाँ हम ठहरे थे, वहाँ के परिसर में भी हमें अनेक सुंदर पक्षियों के दर्शन हुए। एक के पश्चात एक पक्षी हमें ऐसे दर्शन दे रहा था मानो हमें स्मरण कर रहा था कि मुझे विस्मृत नहीं करना!

मैं उन्हे कभी नहीं भूल सकती!

मैंने अपने जीवन में अनेक पक्षी दर्शन यात्राएँ की हैं। उनमें से कुछ के संस्करण आपके लिए प्रस्तुत कर रही हूँ। वे इस प्रकार हैं:

नवाबगंज पक्षी अभयारण्य- लखनऊ कानपुर महामार्ग पर

ओडिशा की मंगलाजोड़ी आद्रभूमि: जलपक्षियों के स्वर्ग में नौकाविहार

Birds of Pench National Park, Madhya Pradesh

Bird Photography at Satpura National Park

Bharatpur Bird Sanctuary

Wooly-necked Stork

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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देश-विदेश की कुछ सर्वोत्तम नौका यात्राएं https://inditales.com/hindi/desh-videsh-nauka-yatrayen/ https://inditales.com/hindi/desh-videsh-nauka-yatrayen/#respond Wed, 09 Oct 2024 02:30:17 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3696

नौकाओं द्वारा यात्राएं करना नवीन संकल्पना कदापि नहीं है। जल मार्ग द्वारा यात्राएं करना प्राचीन काल से ही सम्पूर्ण विश्व का एक पारंपरिक परिवहन का साधन रहा है। आप सब को विष्णु के ‘मत्स्य अवतार’ की कथा ज्ञात ही होगी। इस कथा में नौका द्वारा यात्रा का उल्लेख किया गया है। आप में से कुछ […]

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नौकाओं द्वारा यात्राएं करना नवीन संकल्पना कदापि नहीं है। जल मार्ग द्वारा यात्राएं करना प्राचीन काल से ही सम्पूर्ण विश्व का एक पारंपरिक परिवहन का साधन रहा है। आप सब को विष्णु के ‘मत्स्य अवतार’ की कथा ज्ञात ही होगी। इस कथा में नौका द्वारा यात्रा का उल्लेख किया गया है। आप में से कुछ को ‘नोआ की नाव’, इस कथा के विषय में भी जानकारी होगी। इन सभी कथाओं में नौकाओं द्वारा की गयी यात्राओं का विशेष महत्त्व है। जैसे जैसे रेल मार्ग, सड़क मार्ग तथा वायु मार्ग जैसे परिवहन के अन्य साधनों का विकास होने लगा, जलमार्गों की महत्ता शनैः शनैः न्यून होने लगी।

किन्तु विश्व भर में अनेक ऐसे गंतव्य हैं, अनेक ऐसे मार्ग हैं, जहाँ के लिए जल मार्ग से भ्रमण करना सर्वोत्तम यात्रा साधन सिद्ध होता है।

देश-विदेश में अनेक ऐसी फेरी अथवा जलमार्ग हैं जो पर्यटकों में अत्यंत लोकप्रिय हैं, विशेषतः ऐसी नौका यात्राएं जो पर्यटकों को दूरस्थ द्वीपों अथवा भूभागों तक ले जाती हैं, जो मुख्य महाद्वीप से पृथक हो। मुझे देश-विदेश की ऐसी अनेक नौका भ्रमणों का सौभाग्य प्राप्त हुआ है जो हमें अत्यंत मनमोहक परिदृश्यों के मध्य ले जाते हैं। अनेक ऐसी नौका यात्राएं हैं जो अब भी मेरी इच्छा सूची में उच्च स्थानों पर हैं।

आईये मैं आपको ऐसी ही कुछ अप्रतिम व मनमोहक नौका भ्रमणों पर ले जाती हूँ। इन्हें देशी-विदेशी भाषाओं में फेरी राइड भी कहते हैं।

देश-विदेश की कुछ सर्वोत्तम नौका यात्राएं

स्टैचू ऑफ लिबर्टी एवं एलिस द्वीप फेरी भ्रमण – न्यू यॉर्क/ न्यू जर्सी     

मैं न्यू यॉर्क केवल एक दिवस के भ्रमण पर आयी थी किन्तु मैंने यह सुनिश्चित किया था कि मैं विश्व प्रसिद्ध स्टैचू ऑफ लिबर्टी का अवलोकन करने के लिए एलिस द्वीप तक की नौका सवारी अवश्य करुँगी। मैंने एलिस द्वीप पर स्थित संग्रहालय का भी अवलोकन किया।

न्यू यॉर्क के स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी की नौका यात्रा
न्यू यॉर्क के स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी की नौका यात्रा

जैसे जैसे नौका स्टैचू ऑफ लिबर्टी के समीप पहुँचती है, हमें उसकी विशालता का आभास होने लगता है। दूसरी ओर न्यू यॉर्क का क्षितिज भी शनैः शनैः प्रकट होने लगता है। यह जल भ्रमण एक प्रकार से दृश्य-उल्हास के समान है जब चारों ओर के सर्व प्रतिष्ठित दृश्य आपको मंत्र मुग्ध कर देते हैं।

एलिस द्वीप का संग्रहालय उन प्रवासियों को समर्पित है जो कभी इस द्वीप पर उतरे थे तथा यहाँ अपना स्थाई निवास बना लिया था।

स्टार फेरी राइड – विक्टोरिया बंदरगाह, हांगकांग

हांगकांग से काउलून के मध्य तैरती स्टार फेरी एक ऐसी नौका यात्रा है जिसे आप हांगकांग में रहते हुए अनदेखा नहीं कर सकते हैं। यह यात्रियों को हांगकांग से काउलून ले जाती व वापिस लाती है। यह नौका हांगकांग के दैनन्दिनी जीवन का एक अभिन्न भाग है। इसका प्रयोग पर्यटक एवं कामकाजी यात्री भी उतनी ही बड़ी मात्रा में करते हैं जितना कि यहाँ के स्थानिक।

होन्ग कोंग की स्टार फेरी
होन्ग कोंग की स्टार फेरी

यदि आप हांगकांग की दिशा में ठहरे हैं तो आप सूर्यास्त के आसपास काउलून की ओर नौका भ्रमण करें। इस भ्रमण के माध्यम से आप रंगबिरंगे प्रकाश का अद्भुत प्रदर्शन देख सकेंगे। यह एक प्रकाश प्रदर्शन है जिसका आयोजन प्रत्येक संध्या के समय लगभग ८ बजे किया जाता है। इस प्रदर्शन की अवधि लगभग १० मिनट है।

यदि आप काउलून की दिशा में ठहरे हैं तो आप दिवस में किसी भी समय यह फेरी लेकर मुख्य द्वीप पर आ सकते हैं तथा हांगकांग की सड़कों पर भरते भिन्न भिन्न हाटों का आनंद ले सकते हैं।

वैनकूवर से विक्टोरिया तक नौका भ्रमण

ब्रिटिश कोलंबिया की राजधानी वैनकूवर वास्तव में एक द्वीप है। वहाँ तक केवल जल मार्ग अथवा वायु मार्ग द्वारा ही पहुँचा जा सकता है। वायु मार्ग से जाना चाहें तो समुद्री वायुयान का आनंद अवश्य उठायें। यह वायुयान जल की सतह से उड़ान भरता है तथा द्वीपों के ऊपर अत्यंत कम ऊँचाई पर उड़ता है। यह स्वयं में एक अद्वितीय अनुभव है जिसका आनंद आप अवश्य उठायें।

कनाडा में वैंकोवर से विक्टोरिया की फेरी
कनाडा में वैंकोवर से विक्टोरिया की फेरी

वैनकूवर पहुँचने का अधिक प्रचलित साधन है, जल मार्ग। आकर्षक विक्टोरिया नगरी में दिवस भर भ्रमण करने के पश्चात लगभग सूर्यास्त के समय मैंने विक्टोरिया से वैनकूवर तक की नौका यात्रा की। दिवस भर की थकान के पश्चात यह एक अत्यंत ही सुखद अनुभव था। यह एक बहुतलीय अतिविशाल पोत है जिसमें अनेक जलपानगृह, काफी शॉप, ललित वस्तुओं की दुकानें तथा मनोरंजन के विविध साधनों के साथ अनेक खुले छत हैं जिन्हें डेक कहते हैं। यदि पोत में उपलब्ध अन्य सुविधाओं में लिप्त होने की चाह ना हो तो आप डेक पर जाकर खुले समुद्र का आनंद उठा सकते हैं।

वैनकूवर से विक्टोरिया जाने अथवा आने के लिए इस नौका यात्रा के अतिरिक्त दोनों छोरों पर संलग्न बस सुविधाएं भी ग्रहण करनी पड़ती है। कुल यात्रा अवधि ३-४ घंटों की हो जाती है जिसमें लगभग ९० मिनट का नौका भ्रमण सम्मिलित है।

राजा अम्पाट में नौकायन

राजा अम्पाट इंडोनेशिया का द्वीप समूह है। राजा अम्पाट द्वीप समूह पूर्वी इंडोनेशिया के सर्वाधिक सुन्दर एवं दूरस्थ द्वीप समूहों में से एक हैं। वहाँ पहुँचने के लिए निकटतम विमानतल सोरोंग में स्थित है। वहाँ से इस द्वीप समूह के विभिन्न द्वीपों तक विविध प्रकार के अतिगतिवान नौकाओं द्वारा पहुँचा जा सकता है।

राजा अम्प्ताट की नौका सवारी
राजा अम्प्ताट की नौका सवारी

सोरोंग से नौका द्वारा हम वइसइ द्वीप पहुँचे जहाँ हमने एक पाठशाला में कुछ समय व्यतीत किया। पक्षियों के दर्शन के लिए सविंग्ग्रइ एक उत्तम स्थल है। हमने पियानेमो द्वीप पर स्थित स्टार लगून में कुछ समय भ्रमण किया। इसके पश्चात हम पसीर तिम्बुल गए जो यहाँ का लघुतम तथा सर्वाधिक आकर्षक द्वीप है। अर्बोरेक द्वीप पर हमें आदिवासी संगीत श्रवण का भी आनंद प्राप्त हुआ। कुछ द्वीपों पर स्थित गुफाओं के ऊपर हमने प्रचीन हस्तचित्र भी देखे।

राजा अम्पाट के सभी द्वीपों का भ्रमण केवल जलमार्ग द्वारा ही किया जा सकता है। अतः आप यहाँ नौकायन का भरपूर आनंद उठा सकते हैं।

डुब्रोवनिक से हवार तक नौका यात्रा

हवार क्रोएशिया एवं इटली के मध्य, एड्रियाटिक सागर पर स्थित एक क्रोशियाई द्वीप है। हवार द्वीप खिली खिली धूप युक्त सुखद वातावरण के लिए लोकप्रिय है। अनेक पर्यटक यह सुखद धूप सेंकने ही यहाँ आते हैं। इसके समुद्र तट अत्यंत सुन्दर हैं। समुद्र का गहरा नीला जल मन को मंत्रमुग्ध कर देता है। हवार एक चहल-पहल भरा नगर है। छोटे पत्थरों को सुसज्जित रूप से बिछा कर सुन्दर मार्ग बनाए गए हैं। ये मार्ग इतने सुन्दर प्रतीत होते है कि इन पर पदभ्रमण करते रहने की इच्छा होती है। हवार एक सुन्दर पुरातन नगर का आभास देता है जो मुझे अत्यंत लुभावना प्रतीत हुआ।

डुब्रोवनिक से हवार तक नौका यात्रा
डुब्रोवनिक से हवार तक नौका यात्रा

इस द्वीप पर पहुँचने के लिए डुब्रोवनिक से हवार तक नौका यात्रा आवश्यक है। इस जल यात्रा की अवधि ३-४ घंटों की है। फेरी द्वारा इस द्वीप पर पहुँचने के पश्चात आप द्वीप का भ्रमण तो करेंगे ही। साथ ही आप इस द्वीप की सुन्दर गुफाओं का अवलोकन करने के लिए नौका सफारी कर सकते हैं, जल में लघु नौका पर कयाकिंग क्रीड़ा कर सकते हैं अथवा सूर्यास्त के अप्रतिम दृश्यों का आनंद लेने के लिए ठेठ सूर्यास्त नौका विहार कर सकते हैं।

डुब्रोवनिक से हवार तक की नौका यात्रा मुझे सर्वाधिक प्रिय है।

मिकोनोस एवं सेंटोरिनी द्वीपों का नौकाभ्रमण

ग्रीस अथवा यूनान एक प्राचीन सभ्यता है। एक यात्री के रूप में मुझे प्राचीन सभ्यताओं एवं उनके अवशेषों के दर्शन करना तथा उनके इतिहास को समझना अत्यंत भाता है। अतः ग्रीस की राजधानी एथेंस मुझे अत्यंत आकर्षित करती है। किन्तु एक पर्यटक के रूप में ग्रीस में भ्रमण का आनंद उठाने के लिए मिकोनोस एवं सेंटोरिनी जैसे यूनानी द्वीप भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

मिकोनोस एवं सेंटोरिनी द्वीपों का नौकाभ्रमण
मिकोनोस एवं सेंटोरिनी द्वीपों का नौकाभ्रमण

मिकोनोस एवं सेंटोरिनी ग्रीस के सर्वाधिक सुन्दर द्वीपों में से हैं जो अपने उत्तम सौंदर्य एवं अप्रतिम समुद्रतटों के लिए जाने जाते हैं। गहरे नीले रंग के शांत एजियन समुद्र की सुन्दरता मन को बींध जाती है। इनका आनंद उठाने के लिए जल मार्ग से यात्रा सर्वोत्तम उपाय है। एथेंस, मिकोनोस एवं सेंटोरिनी के मध्य अनेक प्रकार की नौका सेवायें उपलब्ध हैं। यद्यपि इन द्वीपों तक वायु मार्ग द्वारा भी पहुंचा जा सकता है, किन्तु इस अप्रतिम सुन्दरता को मन भर के निहारने के लिए जल मार्ग द्वारा यात्रा करना ही सर्वोत्तम है।

यदि आप ग्रीस एवं इस्तानबुल की यात्रा कर रहे हैं तो आप इस्तानबुल से भी फेरी ले सकते हैं।

इस्तानबुल फेरी यात्रा

बोस्पोरूस एक जलसन्धि है जो यूरोप को एशिया से पृथक करती है। यह एक सांस्कृतिक अचम्भे के साथ साथ अप्रतिम प्राकृतिक रचना भी है। मुझे बताया गया कि इस्तानबुल के प्रमुख आकर्षणों के अवलोकन के लिए जल भ्रमण सर्वोत्तम है। आशा है कि मुझे भी यह अवसर शीघ्र प्राप्त हो ताकि मैं भी अपनी गति से जल मार्ग द्वारा हॉप ऑन हॉप ऑफ बोस्पोरूस टूर के माध्यम से इस्तानबुल की सुन्दरता का आनंद उठा सकूं।

इस्तानबुल फेरी यात्रा मेरी इच्छा सूची में सम्मिलित है जिसे मैं शीघ्र साकार करना चाहती हूँ।

विदेशों की जल यात्राओं की मेरी इच्छा सूची में कुछ आकर्षण अब भी शेष हैं। उनमें हैं, टेम्स क्लिपर्स लंदन एवं सिडनी फेरी।

भारत की कुछ लोकप्रिय नौका यात्राएं

भारत में नौकाओं द्वारा यात्राएं करना विदेशों की तुलना में अधिक लोकप्रिय नहीं है। फिर भी सम्पूर्ण भारत में अनेक ऐसे नौका भ्रमण आयोजित किये जाते हैं जो आपको मुख्य भूमि से भौगोलिक रूप से पृथक अनेक भारतीय द्वीपों में ले जाते हैं। कुछ द्वीप तो ऐसे हैं जो मुख्य भूमि से सांस्कृतिक रूप से भी अत्यंत भिन्न हैं। मुझे ऐसे ही अनेक नौका भ्रमणों का आनंद प्राप्त हुआ है। ये नौका भ्रमण सागर, नदियों, अप्रवाही जल स्त्रोतों के साथ साथ कुछ राष्ट्रीय उद्यानों में भी संचालित किये जाते हैं।

आईये मैं आपको भारत के कुछ लोकप्रिय नौका भ्रमणों पर ले जाती हूँ।

गोवा में दीवार द्वीप तक की निशुल्क फेरी

गोवा में दो अप्रवाही नदियाँ हैं, मंडोवी एवं जुआरी। इन नदियों पर अनेक छोटे-बड़े द्वीप हैं। उनमें से एक है, दीवार द्वीप जो मंडोवी नदी पर है। यह गोवा का विशालतम द्वीप है तथा ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण भी है। इस द्वीप पर पहुँचाने के लिए मुख्य भूमि से राज्य जल परिवहन के अंतर्गत फेरी सेवायें उपलब्ध हैं। दीवार द्वीप पहुँचने के लिए आप रायबन्दर, प्राचीन गोवा अथवा बिचोली से यह सेवा प्राप्त कर सकते हैं।

गोवा के दिवार द्वीप की नौका यात्रा
गोवा के दिवार द्वीप की नौका यात्रा

यह नौका भ्रमण अत्यंत मनभावन है। इस भ्रमण द्वारा आप द्वीप के चारों ओर स्थित खारे जल में उगने वाले मैनग्रोव का सुन्दर वन देख सकते हैं। यह वन विविध प्रकार के पक्षियों का आवास भी है। कदाचित आपको मगरमच्छ के भी दर्शन हो जाएँ!

गोवा की मुख्य भूमि से मंडोवी नदी पर स्थित एक अन्य द्वीप पर भी फेरी द्वारा पहुंचा जा सकता है। चोराओ नामक यह द्वीप भी अत्यंत विस्तृत है।

ये दोनों भ्रमण सवारियों के लिए निशुल्क हैं। केवल वाहनों के लिए कुछ न्यूनतम शुल्क देना पड़ता है।

इनके अतिरिक्त भी गोवा में अनेक छोटे द्वीप हैं जहाँ नौका भ्रमण आयोजित किये जाते हैं। उनमें अधिकतर भ्रमण गैर-सरकारी प्रबंधकों द्वारा आयिजित किये जाते हैं। उनकी जानकारी आप अपने यात्रा नियोजक से प्राप्त कर सकते हैं।

मुंबई से एलिफेंटा गुफाओं तक नौका यात्रा

घारापुरी अथवा एलिफेंटा गुफाएं लोकप्रिय ऐतिहासिक गुफाएं हैं जो मुंबई समुद्र के भीतर एक द्वीप पर स्थित हैं। आप भारत का प्रवेश द्वार अर्थात् गेटवे ऑफ इंडिया से नौका द्वारा यहाँ पहुँच सकते हैं। मार्ग में लहरों के संग तैरती, जल से अठखेलियाँ करती समुद्री चिड़ियाओं (Seagulls) के दर्शन का भी आनंद उठायें।

मुंबई से एलिफेंटा द्वीप की यात्रा
मुंबई से एलिफेंटा द्वीप की यात्रा

एलिफेंटा द्वीप पर कुल सात प्राचीन गुफाएं हैं जिनके भीतर भगवान शिव की अनेक कथाओं का चित्रण किया गया है। गुफा की शिलाओं को उकेर कर अप्रतिम शिल्पकारी की गयी है जो भारतीय कला की एक उत्तम अभिव्यक्ति है। शैव पंथ से सम्बंधित ये शिल्प अत्यंत मनमोहक हैं।

ब्रह्मपुत्र नदी पर माजुली द्वीप तक नौका भ्रमण

माजुली द्वीप विश्व की किसी भी नदी पर स्थित द्वीपों की तुलना में सर्वाधिक विस्तृत द्वीप है। वर्तमान में यह द्वीप त्वरित गति से सिकुड़ रहा है। इस द्वीप पर शास्त्रों में प्रकांड पांडित्य अर्जित किये वैष्णव भक्तों का निवास है। वे शंकर देव के सिद्धांतों के अनुयायी हैं। इस द्वीप पर अनेक जनजातियों का वास है। यह द्वीप अपनी जैव-विविधता के लिए भी लोकप्रिय है।

ब्रह्मपुत्र नदी पर नौका यात्रा
ब्रह्मपुत्र नदी पर नौका यात्रा

मुख्य भूमि से फेरी द्वारा आप एक से डेढ़ घंटों में माजुली द्वीप पहुँच सकते हैं। आप चाहें तो इस द्वीप पर कुछ दिवस व्यतीत करते हुए, इसके आध्यात्मिक परिवेशों के साथ, यहाँ की अप्रतिम जैव-विविधता का आनंद उठा सकते हैं।

नौका द्वारा कन्याकुमारी से विवेकानंद द्वीप की यात्रा

विवेकानंद द्वीप भारतीय महाद्वीप के दक्षिणतम छोर पर स्थित है। यह द्वीप दो सागरों एवं एक महासागर द्वारा घिरा हुआ है। इसके बायीं ओर बंगाल की खाड़ी, दाहिनी ओर अरब सागर तथा समक्ष हिन्द महासागर है। मुख्य भूमि से सुन्दर परिदृश्यों का आनंद उठा ही सकते हैं। किन्तु विवेकानंद द्वीप से चारों ओर के अप्रतिम परिदृश्यों के दर्शन होते हैं, विशेषतः सूर्योदय एवं सूर्यास्त काल में।

कन्याकुमारी से विवेकानंदा द्वीप की यात्रा
कन्याकुमारी से विवेकानंदा द्वीप की यात्रा

लघु दूरी की नौका यात्रा द्वारा आप कन्याकुमारी से विवेकानंद द्वीप पर पहुँच सकते हैं। यूँ तो यह जल यात्रा कुछ मिनटों की ही है, किन्तु वास्तविक समयावधि वायु की दिशा पर निर्भर करती है। कभी कभी समुद्री वातावरण अत्यंत कठोर हो जाता है। विशेषतः वर्षा ऋतु में समुद्री तरंगे अत्यंत चंचल हो जाती हैं तथा वायु की गति भी वेगवान हो जाती है। मुझे स्मरण है, मैं वर्षा ऋतु में इस द्वीप के दर्शन के लिए आयी थी। उस दिन वर्षा अपनी चरम सीमा पर थी। हमें कन्याकुमारी में वर्षा के थमने की लम्बे काल तक प्रतीक्षा करनी पड़ी थी। तब जाकर हमें फेरी की सेवा उपलब्ध हुई थी।

भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान के भीतर नौका सफारी

भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान खारे जल के मगरमच्छों के लिए लोकप्रिय है। यह एक अनोखा राष्ट्रीय उद्यान है। इस उद्यान के भीतर भिन्न भिन्न दिशाओं में अनेक नदियाँ बहती हैं जिन पर नौका भ्रमण आयोजित किये जाते हैं। ये नौका भ्रमण वास्तव में जल सफारी का भाग हैं जिनके माध्यम से आप खारे जल के मगरमच्छों को उनके प्राकृतिक आवास में देखने का सौभाग्य प्राप्त कर सकते हैं।

भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान में नौका यात्रा
भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान में नौका यात्रा

ये नौकाएं भिन्न भिन्न जल स्त्रोतों पर तैरती हुई आपको उद्यान के सभी भागों के दर्शन कराती हैं। आपको नदी के जल में तैरते हुए तथा नदी के तटों पर सुस्ताते व धूप सेंकते अनेक मगरमच्छ दिखेंगे।

यह नौका भ्रमण अति विशेष है क्योंकि इसके द्वारा आप अनेक जलीय वन्य प्राणियों को उनके प्राकृतिक परिवेश में देख सकते हैं।

न्यूनतम शुल्क में नौका द्वारा फोर्ट कोच्चि तक की यात्रा

एर्नाकुलम से फोर्ट कोच्चि तक जो नौका यात्रा की सेवायें हैं, वे सर्वाधिक कम शुल्क पर उपलब्ध हैं। सम्पूर्ण जल यात्रा आपको अप्रतिम अप्रवाही जल के सौंदर्य से अवगत करायेगी। साथ ही वेलिंगटन द्वीप के चारों ओर भ्रमण कराते हुए लोकप्रिय यहूदी नगरी मट्टनचेरी के भी समीप ले जायेगी।

यह नौका यात्रा आपको व्यस्त व्यापारिक बंदरगाह के दर्शन करायेगी जहाँ आप जल परिवहन के विविध साधनों को देख सकते हैं। तट पर आपको मछली पकड़ने के अनेक विशाल जाल दिखेंगे जो चीनी पद्धति में निर्मित हैं। उन्हें Chinese Fishing Nets कहते हैं। जल पर होते अनेक व्यापारिक गतिविधियों को देख आप इस स्थान के पुरातनकालीन सक्रिय समुद्री इतिहास की कल्पना कर सकते हैं। प्राचीन काल में इस बंदरगाह ने अनेक नौकाओं, नाविकों एवं व्यापारियों को देखा है जो जल मार्ग द्वारा यात्राएं कर इस बंदरगाह पर उतरे थे।

मुंबई से अलीबाग के मांडवा घाट तक नौका यात्रा

मुंबई से अलीबाग के मांडवा घाट तक नौका सेवा उपलब्ध है जो यह दूरी लगभग एक घंटे में पूर्ण करती है। अन्यथा सड़क मार्ग द्वारा मुंबई से अलीबाग पहुँचने में ३ घंटों से भी अधिक समय लग जाता है। सड़कों पर वाहनों की भीड़ से भी जूझना पड़ता है। मुंबई से अलीबाग तक की नौका यात्रा में आप अपने वाहन, कार, दुपहिया वाहन, पालतू पशु तथा सामान आदि के साथ जा सकते हैं। यह भारत के आधुनिकतम नौका भ्रमणों में से एक है। यह पोत आपको अलीबाग से लगभग २० किलोमीटर दूर स्थित मांडवा घाट तक ले जाता है।

मैंने अब तक इस नौका भ्रमण का आनंद नहीं उठाया है। आशा है वह दिवस भी शीघ्र ही मेरे जीवन में आयेगा।

आप ने भी इन देशी-विदेशी नौका भ्रमणों में से कुछ भ्रमणों का आनंद अवश्य उठाया होगा तथा कुछ अब भी आपकी इच्छा सूची में विराजमान, सजीव होने की प्रतीक्षा कर रहे होंगे। आप चाहें तो अपना अनुभव हमसे साझा कर सकते हैं। यदि आपको इन नौका भ्रमणों के अतिरिक्त कुछ अन्य अप्रतिम जल भ्रमणों के विषय में ज्ञात हो तो हमसे अवश्य साझा करें। हम उन्हें इस संस्करण में सम्मिलित करने का प्रयास करेंगे।

यह संस्करण 12Go नामक ऑनलाइन यात्रा आयोजक की भागीदारी में लिखा गया है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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तराई की थारु जनजाति उत्तरी भारत एवं दक्षिणी नेपाल के मूल निवासी https://inditales.com/hindi/tharu-janjati-tarai-nepal/ https://inditales.com/hindi/tharu-janjati-tarai-nepal/#respond Wed, 26 Jun 2024 02:30:52 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3633

नेपाल की थारु जनजाति से मेरा प्रथम साक्षात्कार तब हुआ जब मैं नेपाल के चितवन राष्ट्रीय उद्यान में स्थित बरही जंगल लॉज में उनके द्वारा आयोजित नृत्य प्रदर्शन का आनंद ले रही थी। हम नेपाल यात्रा के इस पड़ाव में बरही जंगल लॉज में ठहरे थे। वहाँ पहुँचने के लिए हम वायुमार्ग द्वारा नेपाल के […]

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नेपाल की थारु जनजाति से मेरा प्रथम साक्षात्कार तब हुआ जब मैं नेपाल के चितवन राष्ट्रीय उद्यान में स्थित बरही जंगल लॉज में उनके द्वारा आयोजित नृत्य प्रदर्शन का आनंद ले रही थी। हम नेपाल यात्रा के इस पड़ाव में बरही जंगल लॉज में ठहरे थे। वहाँ पहुँचने के लिए हम वायुमार्ग द्वारा नेपाल के भरतपुर विमानतल पर पहुँचे थे। मेरे अनुभव में आया वह तब तक का सबसे लघु आकार का विमानतल था।

थारू जनजाति के घर
थारू जनजाति के घर

हम वहाँ से बरही जंगल लॉज पहुँचे। हमारे पहुँचने तक सूर्यास्त हो चुका था। लॉज में आगमन की औपचारिकताएं पूर्ण करने के पश्चात हम राप्ती नदी के तट पर बैठ गए। रात्रि के मंद प्रकाश में राप्ती नदी लगभग अदृश्य प्रतीत हो रही थी।

थारु जनजाति – नृत्य एवं संगीत

लॉज के कर्मचारी शिविराग्नि जलाने में व्यस्त हो गए थे। नृत्य एवं संगीत प्रदर्शन के लिए कलाकार प्रस्तुत होने लगे थे। सभी कलाकारों ने श्वेत-श्याम परिधान धारण किया हुआ था। मुझे उनके परिधान कुछ असामान्य प्रतीत हुए। मेरा यात्रा अनुभव यह कहता है कि हम किसी भी क्षेत्र के जितना भीतर जाते हैं, वहाँ के निवासियों के परिधान उतने ही विविध रंगों से परिपूर्ण होते जाते हैं। सम्पूर्ण प्रदर्शन दल के परिधानों में श्वेत-श्याम के अतिरिक्त कोई भी अन्य रंग उपस्थित नहीं था। केवल कमरपट्टे से रंगीन वस्त्र का एक छोटा टुकड़ा लटक रहा था तथा केश में लाल फीते थे। स्त्रियों ने सिक्कों का आभूषण धारण किया था। कहा जाता है कि सम्पूर्ण विश्व के सभी जनजाति क्षेत्रों की स्त्रियों में सिक्कों के आभूषण सामान्य हैं।

थारु जनजाति के पारंपरिक लोक नृत्य
थारु जनजाति के पारंपरिक लोक नृत्य

प्रदर्शन दल ने अग्नि के चारों ओर नृत्य करना आरंभ किया। पुरुष कलाकारों का एक दल संगीत वाद्य बजा रहा था। वयोवृद्ध स्त्रियों का एक समूह एक पंक्ति में खड़े होकर गीत गा रहा था। अन्य सभी कलाकार नृत्य करने लगे जिसमें वे डंडियों का भी प्रयोग कर रहे थे। मैंने वहाँ नेपाल का सर्वाधिक लोकप्रिय लोकगीत सीखा, रेशम फिरीरी। उन्होंने मुझे बताया कि यदि मैं इस गीत को भूल भी जाऊँ तो पुनः स्मरण करने के लिए यूट्यूब की सहायता लूँ। यह गीत यूट्यूब पर उपलब्ध है।

उन्होंने एक युद्ध नृत्य प्रस्तुत किया जिसे बजेति कहते हैं। आप इस नृत्य में वीर रस स्पष्ट देख सकते हैं। उन्होंने डम्फु नृत्य प्रस्तुत किया जो सामान्यतः होली के पर्व पर किया जाता है। इस नृत्य में होली का उल्हास स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा था। तत्पश्चात उन्होंने ठाकरा नृत्य किया जिसमें उन्होंने डांडिया सदृश डंडियों का प्रयोग किया। यह नृत्य भरपूर फसल का उत्सव मनाता है।

गोदना
गोदना

झमता नृत्य में केवल स्त्रियाँ ही भाग लेती हैं। मुझे वह लोकगीत एवं नृत्य कुछ चंचल प्रतीत हुआ। अतः मुझमें उस लोकगीत का अर्थ जानने की अभिलाषा उत्पन्न हुई। नृत्य प्रदर्शन के समाप्त होते ही मैंने एक वयस्क गायिका स्त्री से गीत का अर्थ पूछा। उन्होंने स्मित हास्य पर विषय को टाल दिया। मैंने देखा, उनके हाथों में सघनता से गोदना गुदा हुआ था। उन्होंने हमें बताया कि विवाह के समय उन्होंने वह गोदना गुदवाया था।

नृत्य करते लोग
नृत्य करते लोग

मुझे थारु जनजाति के कलाकारों द्वारा प्रदर्शित गीत एवं नृत्य अत्यंत लुभावने प्रतीत हुए। मुझमें उनके गाँव का अवलोकन करने एवं उनकी जीवनशैली को जानने की तीव्र अभिलाषा उत्पन्न हुई। मैंने चितवन राष्ट्रीय उद्यान के निकट स्थित थारु गाँवों के दर्शन करने का निश्चय किया।

नेपाल की थारु जनजाति

बरही जंगल लॉज में स्थित पुस्तकालय में मैंने नेपाल की थारु जनजाति पर प्रकाशित एक लघु पुस्तिका पढ़ी। उसके अनुसार थारु जनजाति की वंशावली आंशिक रूप से राजस्थान के थार मरुभूमि के राजपूत वंश की ओर संकेत करती है। कहा जाता है कि इस जनजाति के पुरुष नेपाली हैं तथा स्त्रियाँ राजस्थानी मूल की हैं। ऐसा भी माना जाता है कि चूंकि स्त्रियों ने अपने से निम्न जाति के पुरुषों से विवाह किया था, अतः परिवार में उनका वर्चस्व होता है। स्त्रियों को संपत्ति पर विशेषाधिकार भी होता है। कुछ ग्रंथों में इतना भी लिखा था कि स्त्रियाँ भोजन की थालियाँ पुरुषों की ओर अपने पैर से ढकेलती हैं। मैंने इस तथ्य की पुष्टि करने के उद्देश्य से कुछ स्त्रियों से इस विषय पर चर्चा की किन्तु किसी ने भी इस तथ्य की पुष्टि नहीं की।

इस पुस्तिका में इस जनजाति के विषय में आँकड़े प्रकाशित किये गए थे। भारत-नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्रों निवास करते थारु जनजाति की जीवनशैली के विषय में वर्णन किया गया था।

थारु जनजाति मलेरिया रोग से प्रतिरक्षित है – शोध के अनुसार उनके विशेष वंशाणु उन्हे मलेरिया रोग के प्रति रोधक क्षमता प्रदान करते हैं।

थारु जनजाति स्वयं को वनवासी मानती है। उनके गाँव सामान्यतः वन के भीतर स्थित होते हैं। अतः वे वनों के भीतर तथा वनों की संगति में निवास करते हैं। वे आंशिक रूप से कृषि तथा आंशिक रूप से वनोपज पर निर्भर रहते हैं।

थारु जनजाति की संस्कृति
थारु जनजाति की संस्कृति

प्रत्येक गाँव का एक मुखिया होता है जिसे प्रत्येक वर्ष माघ मास में लोकतांत्रिक रूप से चुना जाता है। इस चुनाव के लिए मतदान का अधिकार एक परिवार को समग्र रूप से प्राप्त होता है, ना कि परिवार के प्रत्येक सदस्य अथवा वयस्क को। मुखिया को बड़घर कहा जाता है। उसके ऊपर गाँव के समग्र जनहित का उत्तरदायित्व होता है। उसे दोषी व्यक्ति को दंडित करने का भी अधिकार प्राप्त होता है। गाँव के धार्मिक मुखिया का चुनाव भी इसी रीति से किया जाता है।

थारु जनजाति की बोलचाल भाषा थारु है जो कुछ सीमा तक हिन्दी, अवधि एवं मैथिली से साम्य रखती है।

अधिकांश थारु जनजाति हिन्दू धर्म का पालन करती है जबकि कुछ थारु मूलनिवासियों ने अब ईसाई धर्म अपना लिया है।

थारु सांस्कृतिक संग्रहालय, मेघौली

मेघौली गाँव में स्थित थारु सांस्कृतिक संग्रहालय वास्तव में एक कुटिया सदृश संरचना है। उसकी भित्तियों पर हल्के हरे रंग का रोगन किया हुआ था। उस पर हस्तछाप रंगे हुए थे। चितवन में भ्रमण करते हुए भी हमने मिट्टी के ऐसे अनेक कच्चे घर देखे जिनकी भित्तियों एवं द्वारों पर हाथों से विविध चिन्ह रंगे हुए थे।

मघौली का सांस्कृतिक संग्रहालय
मघौली का सांस्कृतिक संग्रहालय

यह एक एकल-कक्ष संग्रहालय है जहाँ थारु जीवनशैली को प्रदर्शित किया गया है। उनकी आजीविका के साधन, उनके नृत्य, उनकी परम्पराएं तथा उनके दैनंदिनी जीवन के दृश्य प्रदर्शित किये गए थे। वहाँ से मुझे इस तथ्य की पुष्टि हुई कि वे सदा श्वेत-श्याम परिधान धारण करते हैं, यहाँ तक कि अपने विवाह समारोह में भी। विविध चित्रों के माध्यम से थारु जनजाति के एक व्यक्ति के जन्म संस्कारों से लेकर मृत्यु संस्कारों तक की यात्रा का सुंदर चित्रण किया गया है जिनमें उसका विवाह संस्कार भी सम्मिलित है।

मेरी अभिलाषा है कि इस संग्रहालय में इस जनजाति का विस्तृत वर्णन करती अधिक पठन सामग्री उपलब्ध कराई जाए।

थारु जनजाति के निवासस्थान का भ्रमण

पारंपरिक थारु जनजाति के निवासस्थानों को एक अनूठे रूप से संयोजित किया जाता है। एक मुक्ताकाश प्रांगण के चारों ओर आवासों का एक समूह होता है। इस प्रकार सभी आवास स्वयं में स्वतंत्र होते हुए भी एक लघु समुदाय का भाग होते हैं। यह लघु समुदाय उनके परिवार से संबंधित अन्य परिवार भी हो सकते हैं।

चितवन के पक्षी घर
चितवन के पक्षी घर

मध्यस्थल में काष्ठ के ऊँचे पंछीघर होते हैं। प्रत्येक आवास के पार्श्वभाग में एक गौशाला होती है। उनकी इस संरचना से ऐसा आभास होता है मानो उनका आवास मानव, पंछियों एवं मवेशियों के मध्य बँटा होता है।

थारु घर में स्वागत
थारु घर में स्वागत

हमें थारु जनजाति के एक निवासस्थल का भीतर से अवलोकन करने का अवसर प्राप्त हुआ। परिवार की प्रमुख स्त्री ने द्वार पर खड़े होकर आरती की थाली से हमारा स्वागत किया। उसके चारों ओर द्वार पर तथा भित्तियों पर हाथों से सुंदर आकृतियाँ रंगी हुई थीं। एक क्षण के लिए मुझे यह सज्जा उसकी आभामंडल प्रतीत हुई। उन्होंने हमें अपना आवास दिखाया।

चाँदी के आभूषण
चाँदी के आभूषण

अपने पारंपरिक आभूषण दिखाए। आवास में रखे सभी संदूकों एवं भंडारण द्वारों पर भी वैसी ही हस्त निर्मित आकृतियाँ बनी हुई थीं।

थारु जनजातियों द्वारा हस्तछाप

मैंने यहाँ जिनसे भी भेंट की, उन सभी से इन हस्ताकृतियों का महत्व जानने का प्रयास किया। सभी ने यही कहा कि यह उनकी संस्कृति का अभिन्न अंग है। वे सदा से ऐसी आकृतियाँ अपनी संरचनाओं पर चित्रित करते आ रहे हैं। मैंने अनुमान लगाया कि कदाचित ये शुभ चिन्ह हैं। इन चिन्हों ने मुझे उन हस्ताकृतियों का स्मरण कर दिया था जिन्हे मैंने राजस्थान में देखा था, जैसे जैसलमेर का सोनार किला अथवा बीकानेर का जूनागढ़ दुर्ग। कदाचित यह एक ऐसा सांस्कृतिक सूत है जो उन्हे अब भी राजस्थान से बांधे हुए है।

नाग के यंत्र और चित्र
नाग के यंत्र और चित्र

आवास का अवलोकन करते हुए हम उसके पिछवाड़े में पहुँच गए। वहाँ बैठकर हमने परिवार के सदस्यों से कुछ क्षण वार्तालाप किया। उन्होंने हमारे समक्ष रोक्सी नामक पेय प्रस्तुत किया। यह एक स्थानीय पेय है जिसे किण्वित भात से बनाया जाता है। मुझे बताया गया कि यह एक प्रबल मदिरा है। मैंने उससे दूर रहना उत्तम जाना। उन्होंने कहा कि वे इस घरेलू पेय का नियमित सेवन करते हैं।

इस परिवार के सदस्यों ने मुझे अत्यंत आत्मीयता का अनुभव कराया। आवास से बाहर आते हुए मुझे ऐसा आभास हुआ मानो जिस संस्कृति को मैंने तीन दिवसों पूर्व ही जाना था, उस संस्कृति को अब कुछ कुछ समझने लगी हूँ।

उनके आत्मीयता से ओतप्रोत व्यवहार तथा हंसमुख मुखड़ों की स्मृतियाँ मेरी चितवन राष्ट्रीय उद्यान यात्रा की सर्वाधिक प्रिय स्मृति के रूप में सदा मेरे साथ रहेंगी।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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शेक्सपीयर – पारंपरिक इंग्लैंड के सर्वोत्कृष्ट साहित्य का दर्पण! उच्च कोटि की सृजनात्मक प्रतिभा के धनी! विश्वसाहित्य के इतिहास में शेक्सपीयर के समकक्ष माने जाने वाले कवि विरले ही हैं। उनके द्वारा लिखित नाटक अब भी नाटक प्रेमियों एवं साहित्यकारों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत हैं। उनके नाटकों का लगभग सभी भाषाओं में अनुवाद हुआ […]

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शेक्सपीयर – पारंपरिक इंग्लैंड के सर्वोत्कृष्ट साहित्य का दर्पण! उच्च कोटि की सृजनात्मक प्रतिभा के धनी! विश्वसाहित्य के इतिहास में शेक्सपीयर के समकक्ष माने जाने वाले कवि विरले ही हैं। उनके द्वारा लिखित नाटक अब भी नाटक प्रेमियों एवं साहित्यकारों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत हैं। उनके नाटकों का लगभग सभी भाषाओं में अनुवाद हुआ है।

स्ट्रैटफोर्ड-अपॉन-एवन  शेक्सपीयर की नगरी
स्ट्रैटफोर्ड-अपॉन-एवन शेक्सपीयर की नगरी

यद्यपि पाठशाला के पाठ्यक्रम के अंतर्गत शेक्सपीयर की जितनी रचनाएं हमने पढ़ी थीं, उनके अतिरिक्त मैंने उनकी अन्य रचनाएं पढ़ी नहीं हैं, तथापि उनकी रचनाओं से मेरा साक्षात्कार किसी न किसी रूप में होता रहता है, चाहे वह नाट्यशाला में हो, अथवा सिनेमा हॉल में हो या कोई लेख हो।

कुछ वर्षों पूर्व, जब मैं यूनाइटेड किंगडम की निवासी थी, प्रत्येक सप्ताहांत मैं किसी एक नगर का भ्रमण करती थी। उन्ही में से एक सप्ताहांत मैं स्ट्रैटफोर्ड-अपॉन-एवन पहुँची तथा इस नगरी में पदभ्रमण किया।

यह मेरा प्रथम अवसर था जब मैंने किसी नगरी का मार्गदर्शित पदभ्रमण किया था। हमारी परिदर्शिका अथवा गाइड के व्यक्तित्व ने हमें सम्मोहित कर दिया था। मुझे उनके नाम का स्मरण नहीं है किन्तु उनके द्वारा व्यक्त किये शब्द अब भी कानों में गूँजते हैं। उन्होंने हमें स्ट्रैटफोर्ड-अपॉन-एवन के अद्वितीय इतिहास का भ्रमण कराया जिसके अंतर्गत शेक्सपीयर एवं उनके परिवार से संबंधित अनेक भवनों का दर्शन कराया।

स्ट्रैटफोर्ड-अपॉन-एवन में ना केवल शेक्सपीयर का जन्म हुआ था, अपितु उन्होंने अपने जीवन के अंतिम कुछ वर्ष भी यहीं उनके गृहनगर में व्यतीत किया था। मध्यकालीन समय उन्होंने लंदन में व्यतीत किया जहाँ उन्होंने अपने कार्यक्षेत्र में अपार कीर्ती अर्जित की।

हॅनले मार्ग (Hanley  Street ) – शेक्सपीयर की जन्मभूमि

हमारे पदभ्रमण का आरंभ होता है एक ऐसे भवन से जिसे विलियम शेक्सपीयर का जन्मस्थान माना जाता है। उनके माता-पिता इस भवन में निवास करते थे। कालांतर में उन की बहिन के कुछ वंशजों ने भी कुछ काल के लिए इस भवन में निवास किया था। १५ वीं. शताब्दी में निर्मित इस घर का आधा भाग काष्ठ का है। १५ वीं. शताब्दी से अब तक इस घर का अनेक स्वामियों के मध्य हस्तांतरण हुआ है, उनमें कुछ कसाई भी थे।

शेक्स्पीयर का जन्म स्थान
शेक्स्पीयर का जन्म स्थान

१८ वीं. सदी में चार्ल्स डिकन्स जैसे अनेक प्रसिद्ध व्यक्तिमत्वों ने इस भवन के दर्शन किये जिसके पश्चात इस भवन की लोकप्रियता में अकस्मात वृद्धि होने लगी। इसी लोकप्रियता के चलते अमेरिका के एक प्रदर्शनकार ने इस भवन को क्रय कर अमेरिका में स्थानांतरित करने की अभिलाषा व्यक्त की। उसकी इस योजना से स्ट्रैटफोर्ड-अपॉन-एवन की इस अनमोल धरोहर का रक्षण करने के लिए शेक्सपीयर जन्मभूमि न्यास का गठन किया गया। किन्तु इस भवन का सार्थक जीर्णोद्धार १९ वीं. सदी के मध्य में ही हो पाया।

रखरखाव के नाम पर १५ वीं. सदी से १९ वीं. सदी तक इस भवन में जो भी परिवर्तन किये गए थे, उन सब को पूर्ववत लाते हुए इस भवन को इसका मूल स्वरूप प्रदान किया गया। इस प्रकल्प में कार्यरत वास्तुविदों एवं इतिहासकारों के लिए यह कितना चुनौतीपूर्ण व रोमांचकारी कार्य रहा होगा!

शेक्सपियर का काल्पनिक चित्र
शेक्सपियर का काल्पनिक चित्र

शेक्सपीयर के इस आवास के समक्ष खड़े होकर मैं कल्पना करने लगी कि बालक शेक्सपीयर ने यहीं खड़े होकर लोगों का पर्यवेक्षण किया होगा जो कालांतर में उनके नाटकों के अभिन्न अंग बने। उनके भवन का भ्रमण करते हुए मैं १९ वीं. सदी के उन वास्तुविदों एवं इतिहासकारों के समक्ष नतमस्तक हो गयी जिन्होंने काल को विपरीत दिशा में निर्देशित करते हुए इस भवन का इस प्रकार जीर्णोद्धार किया कि शेक्सपीयर की यह जन्मभूमि सदा के लिए अमर हो गयी। ठीक उसी प्रकार जैसी उनकी रचनाएं अमर हैं!

इस भवन में विलियम शेक्सपीयर के पिता जॉन शेक्सपीयर के पारिवारिक जीवन का चित्रण किया है। इसमें दस्ताने निर्माण करने का उनका कारखाना भी सम्मिलित है। बालक शेक्सपीयर के बाल्यकाल के वातावरण को दर्शाने करने के लिए भवन में समग्र परिश्रम किया गया है। वास्तुविदों एवं इतिहासकारों की कल्पना की उड़ान यहाँ तक गयी कि उन्होंने भवन में वही वनस्पतियों एवं पुष्पों के पौधे लगाए जो उस काल में शेक्सपीयर के घर में लगे थे। भवन के भीतर एक लघु संग्रहालय भी है।

शेक्सपीयर का जन्मस्थान अब एक राष्ट्रीय स्मारक है।

शेक्सपीयर के परिवार के अन्य निवास

ऐन हैथवे की कुटिया –  यह विलियम शेक्सपीयर की पत्नी ऐन हैथवे का पारिवारिक निवास स्थान है। यह अब एक सार्वजनिक संग्रहालय है।

शेक्सपियर की पत्नी का घर
शेक्सपियर की पत्नी का घर

क्या आप जानते हैं कि विलियम शेक्सपीयर ने २६ वर्षीय ऐन हैथवे से १८ वर्ष की आयु में विवाह किया था?

मेरी आर्डेन का निवास – यहाँ एक के पश्चात एक दो भवन हैं जिन्हे पालमर खेत (Palmer Farm) तथा ग्लीब खेत (Glebe Farm) कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि ये दोनों शेक्सपीयर की माता मेरी आर्डेन के बाल्यकाल के आवास हैं। ये दोनों भवन अब शेक्सपीयर ग्रामीण संग्रहालय के अंग हैं।

हॉल क्रॉफ्ट – यह शेक्सपीयर की पुत्री सुजैना एवं उनके पती जॉन हॉल का आवास है। इस आवास का एक रोचक तत्व है, अस्पष्ट चिकित्सा पद्धतियों की एक प्रदर्शनी।

नवीन स्थल (New  Place )- यह वही भवन है जहाँ सन् १६१६ में शेक्सपीयर ने अपना अंतिम श्वास लिया था। इस भवन का अब अधिक कुछ शेष नहीं है किन्तु अब भी इसे नवीन स्थल कहते हैं।

इसके एक ओर स्थित नैश भवन में एक संग्रहालय है जहाँ अवॉन घाटी के ऐतिहासिक तत्वों को प्रदर्शित किया है।

शेक्सपीयर के विस्तृत परिवार के इन सभी आवासों पर दृष्टि डालने पर आप अनुमान लगा सकते हैं कि वे सभी एक दूसरे से अत्यंत निकट स्थित हैं। पदभ्रमण करते हुए एक आवास से दूसरे आवास तक पहुँचा जा सकता है। उनकी माता का निवासस्थान तथा उनकी पत्नी की माता का निवासस्थान उनके स्वयं के आवास से अधिक दूर नहीं है। इससे हम १६ वीं. सदी के इंग्लैंड की सामाजिक अवस्थिति का भी अनुमान लगा सकते हैं।

मुझे मेरे परिदर्शक द्वारा दी गयी एक जानकारी का स्मरण हो रहा है कि शेक्सपीयर के मूल वंशजों में अब कोई भी जीवित नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि उनके लंदन आवास काल का कोई वंशज यदि जीवित हो तो उसकी कोई जानकारी नहीं है। उनके लंदन आवास काल के विषय में अनेक अस्पष्टताएं हैं।

प्रसिद्ध हॅनले मार्ग के अतिरिक्त आप भेड़ मार्ग (Sheep  Street) में भी पदभ्रमण कर सकते हैं। इस मार्ग में १५-१६ वीं. सदी के आवास हैं जहाँ ऊन उद्योग के लिए भेड़ों का व्यापार किया जाता था। इन आवासों को सामान्यतः अर्ध-काष्ठ आवास कहा जाता है।

होली ट्रिनिटी गिरिजाघर

शेक्सपियर की कब्र
शेक्सपियर की कब्र

स्ट्रैटफोर्ड-अपॉन-एवन नगर का मुख्य गिरिजाघर है, होली ट्रिनिटी गिरिजाघर। देखा जाए तो यह किसी भी अन्य गिरिजाघर के अनुरूप एक ठेठ गिरिजाघर है जो ईसाई धर्म के अनुयायियों को नियमित सुविधाएं उपलब्ध कराता है। किन्तु साहित्य प्रेमियों की दृष्टि में यह गिरिजाघर किसी तीर्थस्थल से कम नहीं है। उनके आदरणीय कवि शेक्सपीयर का बपतिस्मा इस गिरिजाघर में हुआ था। इसी गिरिजाघर के समाधिस्थल में उनकी भी समाधि है।

उनकी समाधि पर अंकित समाधि-लेख के अनुसार जो भी इनके अवशेषों को यहाँ से अन्यत्र ले जाएगा, वह श्राप का भागी होगा।

रॉयल शेक्सपीयर कंपनी

जहाँ शेक्सपीयर होंगे, वहाँ से रंगशाला दूर कैसे हो सकती है! रंगशाला अथवा थिएटर स्ट्रैटफोर्ड-अपॉन-एवन नगर के सांस्कृतिक ताने-बाने का एक अभिन्न अंग रहा है। समय समय पर अनेक रंगशालाओं का निर्माण होता रहा, उन्हे नष्ट किया जाता रहा, जलाया तथा विघटित किया जाता रहा। अंततः सन् १९३२ में औपचारिक रूप से रॉयल शेक्सपीयर रंगशाला की रचना की गयी। कालांतर में सन् १९६१ में रॉयल शेक्सपीयर कंपनी की स्थापना की गयी। वर्तमान में यह यूनाइटेड किंगडम की विशालतम थिएटर कंपनी है जिसके अंतर्गत प्रतिवर्ष लगभग २० विविध नाटक प्रकल्पों की रचना की जाती है।

रॉयल शेक्सपीयर कंपनी
रॉयल शेक्सपीयर कंपनी

रॉयल शेक्सपीयर रंगशाला में १००० दर्शकों के लिए सुविधाएं हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ अन्य रंगशालाएं भी हैं जिनकी अपनी यात्राएं तथा अपनी कथाएं हैं। जब आप स्ट्रैटफोर्ड-अपॉन-एवन नगर की यात्रा करेंगे तब उनका अवलोकन भी अवश्य करें।

रॉयल शेक्सपीयर रंगशाला में कम से कम एक नाटक प्रदर्शन का आनंद अवश्य उठायें। यह आपकी स्ट्रैटफोर्ड-अपॉन-एवन नगर के यात्रा अनुभव को परिपूर्णता प्रदान करेगा।

यदि आप अपनी यात्रा अनुभव में कुछ रोमांच सम्मिलित करना चाहते हैं तो कुछ स्थानीय पब में जाएँ। वहाँ उपस्थित नाटककारों व अभिनेताओं से संवाद साधने का प्रयास करें। उनके जीवन के अनुभवों को जानने का प्रयास करें। उनके आदरणीय कवि तथा उनके द्वारा आरंभ की गयी ४०० वर्ष पुरातन परंपरा के साथ उनके संबंधों को अंतरंग रूप से जानना व समझना स्वयं में एक अनूठा अनुभव सिद्ध होगा। शेक्सपीयर के नाटक ना केवल उनके प्रेरणा है, अपितु उनकी आय का साधन भी हैं।

अवॉन नदी

स्ट्रैटफोर्ड-अपॉन-एवन नगर से बहती अवॉन नदी आज भी इस नगर की जीवन रेखा है। आप इस नदी में नौकाविहार का आनंद लीजिये तथा इस प्राचीन व्यापार नगरी की भव्यता का आनंद उठाइये।

अवॉन नदी
अवॉन नदी

१५ वीं. शताब्दी में स्ट्रैटफोर्ड में अवॉन नदी पर क्लैप्टन सेतु का निर्माण किया गया जिसने यह नगर को विस्तृत स्तर पर व्यापार के अवसर प्रदान किये। व्यापारियों के लिए नगर की यात्रा सुगम हो गयी। क्लैप्टन सेतु के निर्माण से पूर्व नदी पर एक अस्थिर काष्ठ सेतु था जो अवॉन नदी के सतत परिवर्तित होते जल स्तर के कारण विश्वास योग्य नहीं था।

क्लैप्टन सेतु के माध्यम से विश्व भर के व्यापारी स्ट्रैटफोर्ड आते थे। उनके साथ आती थीं उनकी जीवन शैलियाँ, उनकी कथाएं तथा उनके अनुभव। कुछ सदियों पश्चात कदाचित यही जीवन शैलियाँ, यही कथाएं तथा यही अनुभव शेक्सपीयर की रचनाओं की प्रेरणा सिद्ध हुए।

स्ट्रैटफोर्ड-अपॉन-एवन विश्व के उन क्वचित नगरों में से एक है जहाँ नगर के नाम में वहाँ से बहती नदी का नाम भी सन्निहित है।

स्ट्रैटफोर्ड-अपॉन-एवन नगर के भ्रमण का एक अटूट अंग है, अवॉन नदी पर नौकायन।

नदी के तट पर पदभ्रमण करना भी एक आनंददायी अनुभव है। नगर का पदभ्रमण करने के पश्चात मैं भी नदी के तट पर विश्राम करने बैठ गयी। प्रसन्न वातावरण का आनंद उठाते हुए मैंने स्ट्रैटफोर्ड-अपॉन-एवन नगर,  शेक्सपीयर तथा उनके परिवार से संबंधित सभी कथाओं एवं तथ्यों का मनन व चिंतन किया।

शेक्सपीयर के परे स्ट्रैटफोर्ड-अपॉन-एवन नगर का अस्तित्व

स्ट्रैटफोर्ड-अपॉन-एवन नगर में अनेक ऐसे तत्व हैं जो इस सुप्रसिद्ध नाटककार से संबंधित ना होते हुए भी एक पर्यटक के लिए आकर्षण का केंद्र हैं:

  • हावर्ड हाउस – यह प्रसिद्ध हावर्ड विश्वविद्यालय से संबंधित है।
  • यांत्रिक कला एवं अभिकल्पना संग्रहालय (MADMechanical  Art  & Design  Museum) – रचनात्मक अभिकल्पना की प्रेरणा का अप्रतिम स्त्रोत
  • तितली उद्यान – बहुरंगी तितलियों के विश्व का आनंद उठायें।
  • प्रशिक्षित प्रदर्शकों के मार्गदर्शन में रात्रिकालीन भुतहा भ्रमण
  • अवॉन नदी पर भुतहा नौकायन

क्या आप जानते हैं कि हावर्ड विश्वविद्यालय के संस्थापक जॉन हावर्ड के दादाजी का आवास भी स्ट्रैटफोर्ड-अपॉन-एवन नगर में है।

स्ट्रैटफोर्ड-अपॉन-एवन – एक पर्यटन स्थल

स्ट्रैटफोर्ड में प्रति वर्ष २५ से ३० लाख पर्यटक आते हैं। इस नगर की अर्थव्यवस्था में पर्यटन उद्योग का बड़ा योगदान है। इसका प्रमुख कारण है, शेक्सपीयर। सम्पूर्ण नगर में जहाँ भी दृष्टि दौड़ाएं, वहाँ पर्यटक सूचना केंद्र दृष्टिगोचर होता है। शेक्सपीयर, उनकी रचनाएं तथा विश्व साहित्य में उनका स्थान, ये सब अब भी उनके जन्मस्थल के निवासियों की आय का प्रमुख स्त्रोत हैं। क्या यह स्ट्रैटफोर्ड-अपॉन-एवन नगर के निवासियों की दृष्टि में उन्हे अधिक महान नहीं बनाती!

स्ट्रैटफोर्ड-अपॉन-एवन नगर की स्मृतियाँ

जिस नगर में शेक्सपीयर जैसे महान व्यक्तिमत्व ने जन्म लिया, जहाँ उन्होंने अपना अंतिम श्वास लिया, उनके स्ट्रैटफोर्ड-अपॉन-एवन नगर से आपको कौन सी स्मारिकाएं लानी चाहिए, क्या यह अब भी बताना शेष है? शेक्सपीयर से संबंधित अनेक प्रकार की स्मारिकाएं उपलब्ध हैं। आप उनकी पुस्तकें भी क्रय  कर सकते हैं। शेक्सपीयर की जन्मस्थली से संबंधित रोचक स्मारिकाओं के विषय में जानने के लिए शेक्सपीयर जन्मस्थल न्यास के इस वेबस्थल पर संपर्क करें।

स्ट्रैटफोर्ड-अपॉन-एवन नगर की यात्रा के लिए कुछ सुझाव

  • स्ट्रैटफोर्ड-अपॉन-एवन नगर पहुँचने के लिए निकटतम विमानतल बर्मिंघम में है।
  • स्ट्रैटफोर्ड-अपॉन-एवन नगर सड़क मार्ग द्वारा लंदन से २ घंटे, बर्मिंघम से ३० मिनट तथा वरविक से १०-१५ मिनट दूर है। नियमित बस सेवाएं भी उपलब्ध हैं।
  • बर्मिंघम, वरविक अथवा लंदन मरीलेबोन से रेल मार्ग द्वारा भी स्ट्रैटफोर्ड-अपॉन-एवन पहुँचा जा सकता है।
  • स्ट्रैटफोर्ड-अपॉन-एवन नगर पहुँचने के पश्चात आप सम्पूर्ण नगर में पद भ्रमण कर सकते हैं अथवा दुपहिया सायकल किराये पर ले कर सायकल द्वारा भ्रमण कर सकते हैं। यह एक सुगठित नगर है जो रोचक धरोहरों से परिपूर्ण है। मेरा सुझाव है कि आप कम से कम एक नियोजित पद भ्रमण अवश्य करें। आप किसी परिदर्शक की अनुपस्थिति में भी अपनी गति से पद भ्रमण कर सकते हैं, संग्रहालयों का शांतिपूर्ण रीति से अवलोकन कर सकते हैं, स्वेच्छा से छायाचित्र ले सकते हैं तथा इस नगरी के पुरातन इतिहास में लिप्त हो सकते हैं।
  • अधिकतर नियोजित पदभ्रमण स्वान फाउन्टन से आरंभ होते हैं। पर्यटकों एवं प्रदर्शकों की उपस्थिति से यह स्थान विशेषतः ग्रीष्मकाल में अत्यंत जीवंत हो उठता है।
  • यदि आप पदभ्रमण नहीं करना चाहते हैं तो खुली छत की बसें भी उपलब्ध हैं जो आपको इस नगरी का भ्रमण कराएंगी।
  • स्ट्रैटफोर्ड-अपॉन-एवन में वर्ष भर विविध आयोजन होते रहते हैं। आपके यात्रा काल में कौन कौन सी प्रदर्शनियाँ आयोजित हैं, उनकी पूर्व जानकारी इस वेबस्थल से अवश्य प्राप्त कर लें।
  • स्ट्रैटफोर्ड-अपॉन-एवन साहित्य उत्सव एक महत्वपूर्ण उत्सव है। उत्सवकाल के विषय में इस वेबस्थल से पूर्व जानकारी प्राप्त कर लें।
  • २३ अप्रैल से निकटतम सप्ताहांत – शेक्सपीयर का जन्मोत्सव। यह भी स्ट्रैटफोर्ड यात्रा के लिए एक उत्तम काल है।
  • स्ट्रैटफोर्ड-अपॉन-एवन से संबंधित अधिक जानकारी के लिए ब्रिटेन भ्रमण वेबस्थल से भी जानकारी प्राप्त कर लें।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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जनकपुर धाम – राम-जानकी का विवाहस्थल https://inditales.com/hindi/janakpur-dham-janaki-mandir-nepal/ https://inditales.com/hindi/janakpur-dham-janaki-mandir-nepal/#respond Wed, 17 Jan 2024 02:30:34 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3364

जनकपुर धाम मिथिला की प्राचीन राजधानी थी। यद्यपि वर्तमान में यह नेपाल की राजनैतिक सीमाओं के भीतर आता है तथापि सांस्कृतिक रूप से यह मिथिलाञ्चल का ही एक भाग है। नेपाल के जिस जिले के अंतर्गत जनकपुर है, उस जिले को धनुष कहा जाता है। इस जिले का यह नाम उस घटना से सम्बद्ध है […]

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जनकपुर धाम मिथिला की प्राचीन राजधानी थी। यद्यपि वर्तमान में यह नेपाल की राजनैतिक सीमाओं के भीतर आता है तथापि सांस्कृतिक रूप से यह मिथिलाञ्चल का ही एक भाग है। नेपाल के जिस जिले के अंतर्गत जनकपुर है, उस जिले को धनुष कहा जाता है। इस जिले का यह नाम उस घटना से सम्बद्ध है जहाँ रामायण काल में भगवान राम ने शिव धनुष तोड़ा था।

रामायण एवं जनकपुर का संबंध

रामायण से संबंधित दो महत्वपूर्ण यात्राएं हैं जो उसके मूल तत्व हैं।। दूसरी यात्रा के विषय में सब जानते हैं। भगवान राम दक्षिण की ओर यात्रा कर श्रीलंका पहुँचे थे तथा लंका के राजा रावण के साथ युद्ध किया था। रामायण को देखने, सुनने अथवा पढ़ने वाले चाहे जिस आयु के हों, यह यात्रा उनमें अधिक लोकप्रिय है। किन्तु प्रथम यात्रा के संबंध में कितने सविस्तार से जानते हैं?

जनकपुर धाम
जनकपुर धाम

भगवान राम ने किशोर अवस्था में प्रथम यात्रा की थी, गुरु विश्वामित्र के साथ। इसके अंतर्गत अनेक राक्षसों का वध करते हुए उन्होंने साधु-संतों एवं जनमानस को सुरक्षित किया था। इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण भाग था, जनकपुर की यात्रा। वहाँ एक उद्यान में सीता जी से, जिन्हे जानकी भी कहा जाता है, उनकी प्रथम भेंट हुई थी। इसके पश्चात उन्होंने स्वयंवर में सीता से पाणिग्रहण आर्जित करने के लिए भगवान शिव का धनुष तोड़ा था। तत्पश्चात राम का सीता से विवाह हुआ था। साथ ही राम के तीन अनुज भ्राताओं का विवाह सीता की भगिनियों के साथ संपन्न हुआ था।

रामचरितमानस में उसके रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्री राम एवं जानकी के विवाहोत्सव का विस्तार पूर्वक उल्लेख किया है। उनका विवाह जिस दिवस संपन्न हुआ था, उसे विवाह पंचमी कहा जाता है। जनकपुर में, साथ ही अयोध्या में यह दिवस हर्षोल्हास से मनाया जाता है।

माँ सीता की कथा

सीता मिथिला के राजा जनक को उनके खेतों से तब प्राप्त हुई थी जब वे हलेश्वर महादेव की पूजा-अर्चना करने के पश्चात खेतों में हल चलाने लगे थे। उस स्थान को सीतामढ़ी के नाम से जाना जाता है। सीता का लालन-पालन राजा जनक के राजमहल में हुआ।

राम जानकी विवाह और मिथिला का जनजीवन
राम जानकी विवाह और मिथिला का जनजीवन

जब सीता विवाह योग्य हुई तब राजा जनक ने घोषणा की कि जो वीर भगवान शिव के धनुष को तोड़ेगा, वह सीता से विवाह करने का मान अर्जित करेगा। इस स्वयंवर से एक दिवस पूर्व एक उद्यान में अकस्मात ही श्री राम एवं सीताजी की भेंट हो गयी। उन्होंने एक दूसरे से एक शब्द भी नहीं कहा किन्तु उन्हे यह अंतर्ज्ञान हो गया था कि वे एक दूसरे के लिए बने हैं।

सीता ने मन ही मन देवी पार्वती से प्रार्थना की तथा राम के संग विवाह करने की इच्छा प्रकट ही। उनके सौभाग्य से श्री राम ने धनुष को तोड़ दिया तथा घोषणा के अनुसार सीता से उनका विवाह संपन्न हुआ। राम के तीन अनुज भ्राता, भरत, लक्ष्मण एवं शत्रुघ्न का विवाह भी सीता की भगिनियाँ क्रमशः मांडवी, उर्मिला एवं श्रुतिकीर्ति से संपन्न हुआ।

एक ओर मैथिली विवाहोत्सव का विस्तृत अनुष्ठान रामायण कथा का महत्वपूर्ण भाग है, वहीं राजा जनक के आतिथ्य-सत्कार का रामायण में कम महत्व नहीं है। मिथिला की स्त्रियों को अभिमान है कि भगवान राम उनके जामाता हैं तथा इस नाते उन्हे श्री राम से ठिठोली करने का अधिकार प्राप्त है। मिथिला के अनेक लोकगीतों में इस नाते का उत्सव मनाया जाता है।

जनकपुर धाम

मैंने जब से अयोध्या की यात्रा की थी तथा अयोध्या माहात्म्य का अनुवाद किया था, मुझ में जनकपुर धाम की यात्रा करने की तीव्र अभिलाषा उत्पन्न हो गयी थी। मैंने रामायण से संबंधित अधिकांश स्थलों की यात्रा की है। उनमें श्री लंका के भी अधिकांश रामायण संबंधी स्थल सम्मिलित हैं। किन्तु मिथिला यात्रा मुझसे एक लंबे काल तक टालमटोली करती रही।

जनकपुर धाम जानकी मंदिर
जनकपुर धाम जानकी मंदिर

मैंने जनकपुर के विशाल जानकी मंदिर की छवि देखी थी। जानकी के लिए ऐसा ही भव्य मंदिर अब अयोध्या में भी बन रहा है। हृदय में इच्छा उत्पन्न हुई कि अयोध्या के इस जानकी मंदिर के दर्शन से पूर्व, क्यों ना उनके मायके में स्थित उसके मंदिर का दर्शन किया जाए!

जनकपुर में स्थित जानकी मंदिर अत्यंत विशाल है। उसे देख मुझे नाथद्वारा में स्थित श्रीनाथ जी की हवेली का स्मरण हो आया। जनकपुर के जानकी मंदिर में राजस्थानी स्थापत्य शैली स्पष्ट झलकती है। इस मंदिर का राजस्थान से क्या संबंध हो सकता है? मैंने कई आयामों पर दोनों के बीच संबंध ढूँढने का प्रयास किया किन्तु असफल रही। किन्तु पुरोहित जी से चर्चा करने के पश्चात ही मुझे ज्ञात हो पाया कि इस मंदिर की संरचना जयपुर स्थित गलाता जी मंदिर के संतों ने करवाया था।

जानकी मंदिर में राम -जानकी, लक्ष्मण उर्मिला, भरत मांडोवी, शत्रुघन श्रुतिकीर्ति
जानकी मंदिर में राम -जानकी, लक्ष्मण उर्मिला, भरत मांडोवी, शत्रुघन श्रुतिकीर्ति

इस मंदिर को नौलखा मंदिर भी कहते हैं। टीकमगढ़ की रानी वृषभानु कुमारी ने सन् १९१० में इस मंदिर के निर्माण के लिए नौ लाख स्वर्ण मुद्राओं का योगदान दिया था। यह मंदिर उसी स्थान पर निर्मित है जहाँ १७ वीं. शताब्दी में माँ सीता की स्वर्ण प्रतिमा प्राप्त हुई थी। यूनेस्को के वेबस्थल के अनुसार इस मंदिर के प्राचीनतम अवयव ११ वी. से १२ वीं सदी के मध्यकाल के हैं।

मंदिर के मुख्य द्वार के समक्ष स्थित प्रांगण अत्यंत विस्तृत है जिसकी भूमि पर संगमरमर लगा हुआ है। जब मैं वहाँ पहुँची थी, सम्पूर्ण प्रांगण भक्तगणों एवं दर्शनार्थियों से भरा हुआ था। उनमें कई नवविवाहित युगल भी थे जो पूर्ण रूप से अलंकृत होकर माता के दर्शन करने आए थे।

जनकपुर धाम का अभ्यंतर

जनकपुर धाम के भीतर प्रवेश करते ही आप परिसर के मध्य में एक सुंदर मंदिर देखेंगे। इसके चारों ओर वैसा ही गलियारा है जैसे शेखावटी हवेली में देखा था।

यह मूलतः एक श्वेत रंग का मंदिर है जिस पर चटक उजले रंगों द्वारा अलंकरण किया गया है। मंदिर के कुछ सोपान चढ़ते ही राम दरबार अपनी पूर्ण वैभवता के साथ हमारे समक्ष प्रकट हो जाता है। आपको अयोध्या के चारों भ्राताओं एवं मिथिला की उनकी भार्याओं के भव्य दर्शन होंगे। मैं जिस दिन यहाँ उपस्थित थी, वह स्वर्ण अलंकरण का दिवस था। आप सोच सकते हैं कि भव्य स्वर्ण अलंकरण के साथ अपनी पत्नी सहित चारों भ्राताओं की आभा कितनी अविस्मरणीय होगी!

सांस्कृतिक संग्रहालय

मंदिर के प्रथम तल के गलियारे में एक संग्रहालय है जिसमें सीता की कथा प्रदर्शित की गयी है। सीता माँ की जीवनी को डिजिटल चित्रावलियों के माध्यम् से प्रदर्शित किया गया है। जैसे ही सीता माँ के जन्म का दृश्य प्रदर्शित होता है, बधाई गीत बजने लगता है। सब दर्शकों का सर्वाधिक लोकप्रिय दृश्य वह है जहाँ श्री राम धनुष तोड़ते हैं। मुझे यह चित्रावली देख अत्यंत आनंद आया।

जनकपुर डोला परिक्रमा
जनकपुर डोला परिक्रमा

संग्रहालय में सीता माँ के वस्त्र एवं उनके आभूषण भी प्रदर्शित किये गए हैं।

मंदिर के चारों ओर की भित्तियों पर मिथिला चित्रकारी की गयी है जो मधुबनी चित्रकला के नाम से अधिक लोकप्रिय है। इन चित्रों में मुख्यतः श्री राम-जानकी विवाह के विविध अनुष्ठानों के दृश्य चित्रित किये जाते हैं। मिथिला परिक्रमा डोला एक अत्यंत रोचक चित्र है जिसमें परिक्रमा पथ दर्शाया गया है जो सम्पूर्ण नगर का भ्रमण करता है। अन्य अनेक ऐसे चित्र हैं जिनमें सामान्य जनमानस की जीवनशैली दर्शाई गयी है, जैसे लोहार आदि।

धनुष महायज्ञ
धनुष महायज्ञ

संग्रहालय से बाहर आते हुए आप मंदिर की छत पर पहुँच जाते हैं। यहाँ से मंदिर का विहंगम दृश्य दिखाई पड़ता है। छायाचित्रीकरण के लिए यह सबका लोकप्रिय स्थान है।

शालिग्राम मंदिर

हम सब जानते हैं कि शालिग्राम पत्थर नेपाल स्थित गण्डकी नदी के तल पर पाये जाते हैं। वस्तुतः अयोध्या में निर्माणाधीन राम मंदिर में स्थापित होने वाली भगवान राम की प्रतिमा के लिए पावन शिला जनकपुर से भेजी गयी है। ऐसी ही एक विशाल शिला इस मंदिर के परिसर में भी रखी गयी है।

शालिग्राम मंदिर - जनकपुर धाम
शालिग्राम मंदिर – जनकपुर धाम

मंदिर में एक विशेष कक्ष है जहाँ लाखों की संख्या में शालिग्राम रखे हुए हैं। बहुतलीय पात्रों में रखे इन शालिग्राम को आप एक जाली के इस ओर से देख सकते हैं। घोर श्याम वर्ण के ये शालिग्राम भिन्न भिन्न आकृति एवं आकार के हैं।

उन शालीग्रामों पर नव-पल्लवित पुष्प चढ़ाए हुए थे जिसे देख आप अनुमान लगा सकते हैं कि उनकी दैनिक पूजा-अर्चना की जाती है। कुछ शालिग्राम शिलाओं पर आभूषण एवं वस्त्र भी चढ़ाए हुए थे।

राम सीता धुन

अयोध्या के मंदिरों के अनुरूप ही इस मंदिर में भी, शालिग्राम कक्ष के समीप खुले प्रांगण में अखंडित रूप से राम धुन गायी जाती है।

आप भी उनमें सम्मिलित होकर राम नाम गा सकते हैं। विशेषतः कलियुग में यह आराधना का सबसे सुलभ व सुगम मार्ग है।

राम जानकी विवाह मंडप

मंदिर परिसर के भीतर, मुख्य मंदिर की सीमा के बाह्य भाग में एक ओर विवाह मंडप है। इस संरचना की छत ठेठ नेपाली शैली की है। इसकी तिरछी छत के कारण यह संरचना एक खुला मंडप प्रतीत होता है। मंडप के भीतर राजसी विवाह के दृश्य प्रदर्शित किये गए हैं।

चबूतरे के चारों कोनों में चार लघु मंदिर हैं जो राजपरिवार के उन चार जोड़ों को समर्पित हैं जिनका विवाह यहाँ संपन्न हुआ था। उन पर दर्शाये गए नामों को अनदेखा करें तो आप यह नहीं जान सकते कि कौन सा मंदिर किस जोड़े का है।

जानकी मंडप एवं मंदिर के उद्यान में पदभ्रमण का आनंद उठायें। गौशाला में भी कुछ क्षण अवश्य व्यतीत करें। आप चाहें तो उन गौओं को चारा भी खिला सकते हैं।

एक चबूतरे पर आप कुछ चरण चिन्ह देखेंगे। यहाँ उत्सव मूर्तियाँ रखी जाती हैं जब उन्हे परिक्रमा के लिए बाहर लाया जाता है।

एक छोटा शिव मंदिर भी है जिसमें एकादश लिंग स्थापित है। एकादश लिंग का अर्थ है, ११ विभिन्न लिंगों का एक संयुक्त लिंग।

जनकपुर जानकी मंदिर के विविध उत्सव

जनकपुर के जानकी मंदिर का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उत्सव है विवाह पंचमी, जो मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी के दिन मनाया जाता है। इसमें कोई शंका नहीं है क्योंकि इसी स्थान पर श्री राम का जानकी से विवाह सम्पन्न हुआ था।

इस मंदिर में राम नवमी भी धूमधाम से मनाई जाती है। इस दिवस श्री राम का जन्म हुआ था। राम नवमी चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी के दिन आयोजित की जाती है। मैंने राम नवमी के कुछ दिवस पूर्व इस मंदिर के दर्शन किये थे। उस समय इस मंदिर को राम नवमी उत्सव के लिए सज्ज किया जा रहा था।

दसैं अथवा दशहरा नेपाल का प्रमुख पर्व है।

नेपाल के दशहरा उत्सव के विषय में हमारी इस पुस्तक में पढ़ें – Navaratri – When Devi Comes Home

जनकपुर के अन्य मंदिर

अयोध्या के अनुरूप जनकपुर में भी अनेक मंदिर एवं जलकुंड हैं। इस क्षेत्र में ७० से भी अधिक जलाशय अथवा जलकुंड हैं। यहाँ के कुछ अन्य दर्शनीय मंदिर इस प्रकार हैं-

राम मंदिर

काष्ठ का बना राम मंदिर
काष्ठ का बना राम मंदिर

जानकी मंदिर के समीप स्थित यह अपेक्षाकृत एक छोटा मंदिर है जिसके समक्ष धनुष सागर जलकुंड है। अमर सिंग थापा द्वारा निर्मित यह एक आकर्षक मंदिर है जिसका निर्माण ठेठ नेपाली वस्तुशैली में किया गया है। इसके काष्ठ फलकों पर अप्रतिम उत्कीर्णन किये गए हैं जिनसे मंत्रमुग्ध हुए बिना आप नहीं रह पाएंगे।

राम मंदिर का राम दरबार
राम मंदिर का राम दरबार

राम मंदिर के चारों ओर अनेक शिवलिंग हैं। इस मंदिर में देवी भी पिंडी के रूप में हैं।

जब मैं इस मंदिर में दर्शन के लिए आयी थी, कुछ स्त्रियाँ भगवान के समक्ष सुंदर भजन प्रस्तुत कर रही थीं।

राज देवी मंदिर

राम मंदिर के समीप स्थित यह मंदिर जनक राजा की कुलदेवी को समर्पित है। इसीलिए इसे राज देवी मंदिर कहते हैं। मंदिर के विस्तृत प्रांगण के एक कोने में यह मंदिर स्थित है। यहाँ एक त्रिकोणीय यज्ञ कुंड है। प्रवेश द्वार से भीतर जाते हुए मार्ग पर विराजमान सिंह दर्शाते हैं कि यह देवी दुर्गा माँ का स्वरूप है।

जनक मंदिर

जानकी मंदिर एवं राम मंदिर के मध्य, मार्ग के मधोमध उजले नारंगी रंग का एक मंदिर है। यह जनकपुर के राजा जनक का मंदिर है। उन्हे राजर्षी अथवा संत राजा कहा जाता था।

लक्ष्मण मंदिर

लक्ष्मण को समर्पित यह मंदिर जानकी मंदिर के प्रवेश द्वार के समीप स्थित है, मानो लक्ष्मण उनका संरक्षण कर रहे हों।

जनकपुर के अन्य मंदिरों में हनुमान को समर्पित संकट मोचन मंदिर, कपिलेश्वर मंदिर तथा भूतनाथ मंदिर भी सम्मिलित हैं।

जनकपुर के जलकुंड अथवा जलाशय

  • गंगासागर – विवाह मंडप के समीप स्थित यह जलकुंड मार्ग के उस पार है। ऐसी मान्यता है कि इस जलकुंड के जल को गंगा नदी से लाया गया है।
  • राम सागर
  • धनुष सागर – राम मंदिर के निकट स्थित है ।
  • रत्न सागर
  • दशरथ कुंड
  • कमल कुंड
  • सीता मैया तलैया
राम मंदिर
राम मंदिर

जलेश्वर महादेव मंदिर – यह एक महत्वपूर्ण शिव मंदिर है जो जनकपुर से लगभग १६ किलोमीटर दूर, सीतामढ़ी के मार्ग पर स्थित है।

धनुष धाम – यह स्थल भगवान शिव के धनुष को समर्पित है जिसे भगवान राम ने तोड़ा था। यह जनकपुर से उत्तर-पूर्वी दिशा में लगभग २४ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जनकपुर में ठहरकर वहाँ से एक दिवसीय यात्रा के रूप में इसके दर्शन किये जा सकते हैं।

परिक्रमा

भव्य शालिग्राम शिला
भव्य शालिग्राम शिला

जनकपुर धाम के चारों ओर पंच कोसी परिक्रमा की जाती है। यद्यपि यह परिक्रमा किसी भी दिवस की जा सकती है, तथापि नियमित भक्तगण इस परिक्रमा को होलिका दहन के दिन करते हैं।

जनकपुर यात्रा के समय आप गंगासागर सार्वजनिक पुस्तकालय तथा हस्तकला संग्रहालय का भी अवलोकन कर सकते हैं।  अल्प समय के चलते मैं इनके दर्शन नहीं कर पायी थी।

यात्रा सुझाव

जनकपुर दरभंगा से दो घंटे की दूरी पर स्थित है जो जनकपुर के लिए निकटतम विमानतल एवं रेल स्थानक है। नेपाल की ओर जनकपुर में भी विमानतल है जो वायुमार्ग द्वारा काठमांडू से जुड़ा हुआ है।

सड़क मार्ग द्वारा भारत-नेपाल सीमा को पार करने के लिए उपस्थित भीड़ के अनुसार २०-४० मिनटों का समय लग सकता है। आप अपने स्वयं के वाहन अथवा टैक्सी से भी जा सकते हैं।

जनकपुर में भारतीय मुद्रा की अनुमति है।

जनकपुर में भोजन विकल्प सीमित हैं। मिष्टान्न एवं फल पर्याप्त मात्र में उपलब्ध रहते हैं। जनकपुर धाम के भंडारे में प्रतिदिन दोपहर का भोजन भक्तों को प्रसाद के रूप में परोसा जाता है। वे मनःपूर्वक आपका स्वागत करते हैं।

मंदिर से संबंधित जो भी जानकारी इस संस्करण में मैंने दी है, उन सभी के दर्शन करने के लिए २-३ घंटों का समय आवश्यक है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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बैंकॉक के उल्लसित रंग बिरंगे तैरते बाज़ार https://inditales.com/hindi/thailand-bangkok-tairte-bazaar-paryatak-sthal/ https://inditales.com/hindi/thailand-bangkok-tairte-bazaar-paryatak-sthal/#respond Wed, 04 Oct 2023 02:30:50 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3190

बैंकॉक के निकट स्थित तैरता बाजार थाईलैंड का एक विशेष आकर्षण है। यह थाईलैंड का एक ऐसा चिन्हक है जो थाईलैंड को उसकी वास्तविक पहचान देता है। आप थाईलैंड भ्रमण पर जाएँ तथा आपको तैरते बाज़ार के दर्शन ना हों, ऐसा संभव ही नहीं है। ये बाजार थाईलैंड में सर्वव्यापी हैं। कुछ समय थाईलैंड में […]

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बैंकॉक के निकट स्थित तैरता बाजार थाईलैंड का एक विशेष आकर्षण है। यह थाईलैंड का एक ऐसा चिन्हक है जो थाईलैंड को उसकी वास्तविक पहचान देता है। आप थाईलैंड भ्रमण पर जाएँ तथा आपको तैरते बाज़ार के दर्शन ना हों, ऐसा संभव ही नहीं है। ये बाजार थाईलैंड में सर्वव्यापी हैं। कुछ समय थाईलैंड में व्यतीत करने के पश्चात हम इनकी उपस्थिति से इतने सहज हो जाते हैं कि कभी कभी उनकी उपस्थिति का आभास ही नहीं होता।

बैंकाक के तैरते बाज़ार
बैंकाक के तैरते बाज़ार

थाईलैंड के लगभग सभी प्रमुख नगरों में तथा उसके आसपास स्थित तैरते बाजार में आप जा सकते हैं। बैंकॉक में भ्रमण करते समय भी आपको कई तैरते बाजारों में जाने का अवसर प्राप्त होगा। थाईलैंड पर्यटन में इन तैरते बाजारों के भ्रमण का प्राधान्यता से प्रचार किया जाता है। विशेषतः बैंकॉक  के प्रथम भ्रमण पर आये पर्यटकों के लिए यह बैंकॉक के मुख्य आकर्षणों में से श्रेष्ठतम माना जाता है। मैं भी उनसे सहमति रखता हूँ।

इन तैरते बाजारों में से कुछ बाजार ऐसे हैं जिन्हें विशेष रूप से पर्यटकों के लिए बनाया गया है। ऐसे बाजार पर्यटकों से भरे रहते हैं। वहीं कुछ तैरते बाजार ऐसे हैं जहाँ सामान्य आवश्यकताओं की वस्तुएं उपलब्ध रहती हैं। उन बाजारों में अधिकांशतः स्थानीय लोगों की उपस्थिति रहती है। मेरा सुझाव है कि आप इन दोनों प्रकार के बाजारों का कम से कम एक भ्रमण अवश्य करें।

तैरते बाज़ार क्या है?

एक ठेठ तैरता बाजार एक ऐसा बाजार है जहाँ विक्रेता अपनी नौकाओं पर विभिन्न वस्तुएं रखकर उनकी विक्री करते हैं। विक्री की जाने वाली इन वस्तुओं में सब्जियाँ, फल, ताजे फूल व दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुएं होती हैं तो दूसरी ओर पर्यटकों के लिए जलपान, शरबत आदि से लेकर स्मारिकाओं तक की विक्री की जाती है।

अम्फवा के तैरते बाज़ार
अम्फवा के तैरते बाज़ार

इन विक्रेताओं के ग्राहक तट पर चलते लोगों से लेकर अन्य नौकाओं पर सवार लोगों तक हो सकते हैं। इस प्रकार के बाजार विशेषतः दक्षिणपूर्वी एशिया में अत्यंत सामान्य हैं तथा अत्यधिक लोकप्रिय हैं जहाँ की नदियाँ एवं नहरें वहाँ के बड़े समुदाय के व्यावसायिक गतिविधियों का केंद्र बिंदु हैं।

प्राचीन काल में एक रीत थी जो थाईलैंड के ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी प्रचलित है, वह यह कि तैरते बाज़ार बहुधा मंदिर के आसपास ही स्थित होते हैं। ये बाज़ार दैनिक प्रातःकालीन बाज़ार अथवा साप्ताहिक बाज़ार या रात्रिकालीन बाज़ार हो सकते हैं। यहाँ तक कि ये नदी के तट पर तैरते बाज़ार भी हो सकते हैं।

मंदिरों को नगर का केंद्र बिंदु माना जाता है। अधिकाँश मंदिरों में एक सार्वजनिक स्थल होता है जहाँ उत्सवों के समय लोग एकत्र होते हैं। मंदिरों के निकट नदी अथवा कोई अन्य जल स्त्रोत हो तो उन पर दुकानें लगाई जाती हैं। यदि यही बाज़ार पर्यटन के उद्देश्य से बनाया जा रहा हो तो मंदिर से निकटता की बाध्यता नहीं रहती, जैसा की आधुनिक काल में देखा जा रहा है।

व्यंगोक्ति – अनेक अवसरों पर floating market, इस शब्द का एक भिन्न अर्थ भी होता है। ऐसा बाजार जो एक स्थान पर स्थिर नहीं है, स्थानांतरित होता रहता है, जैसे साप्ताहिक बाजार। ऐसे साप्ताहिक बाजार बहुधा लोकप्रिय मंदिरों के परिसर के चारों ओर लगाए जाते हैं। विशेष उत्सवों से संबंधित कुछ विशेष बाजार मंदिर परिसर के भीतर भी लगाये जाते हैं। अर्थात् ऐसे बाजारों में नौकाएं नहीं होती।

आपको यहाँ स्वादिष्ट स्थानीय व्यंजनों का आस्वाद लेने का अवसर अवश्य प्राप्त होगा। वह भी पास से बहती नदी अथवा नहर के सुन्दर दृश्यों का आनंद उठाते हुए। जैसे सराबुरी का बैन टौन टैन नदीतट का बाजार

बैंकॉक के निकट लोकप्रिय तैरते बाज़ार

थाईलैंड के बैंकॉक के निकट स्थित कुछ तैरते बाजार इस प्रकार हैं, जहाँ आप अपने थाईलैंड भ्रमण के समय अवश्य जाएँ।

दामियाँन सदुआक – बैंकॉक के विशालतम तैरते बाज़ार

दामियाँन सदुआक बैंकॉक का, कदाचित सम्पूर्ण थाईलैंड का विशालतम तैरता बाजार है। अधिकांश पर्यटक बैंकॉक भ्रमण के अंतर्गत यहाँ अवश्य आते हैं। यह बाजार विशेषतः पर्यटन की दृष्टि से विकसित प्रतीत होता है। स्वाभाविक ही है कि यह बाजार पर्यटकों से भरा रहेगा। यह अच्छा भी है तथा कष्टकारक भी।

दामियाँन सदुआक बैंकॉक का तैरता बाज़ार
दामियाँन सदुआक बैंकॉक का तैरता बाज़ार

एक ओर यहाँ पर्यटकों की चहल-पहल रहती है तो दूसरी ओर भीड़ के चलते कुछ असुविधा भी हो सकती है। एक ओर यहाँ यह अच्छा है कि अधिकतर विक्रेता अंग्रेजी भाषा बोलते व समझते हैं। यहाँ तक पहुँचने के साधन भी सुलभ हैं। दूसरी ओर पर्यटकों को ठगने के लिए तत्पर कुछ असामाजिक तत्व भी यहाँ विचरण करते रहते हैं। पर्यटकों को देखकर विक्रेता अपनी वस्तुओं के दाम भी बढ़ा देते हैं। अतः सावधान रहें। आप उचित मूल्य के लिए उनसे मोलभाव कर सकते हैं।

नहर से लगा हुआ जो बाजार है, आप उसका आनंद अवश्य उठायें। यहाँ दोनों प्रकार की दुकानें हैं, धरती पर भी तथा नौकाओं पर भी। पर्यटकों के लिए यहाँ का एक आकर्षण यह भी है कि आप नौका सवारी करते हुए यहाँ के स्थानिकों को दैनन्दिनी जीवन व्यतीत करते हुए निकट से देख सकते हैं।

बैंकॉक से अनेक एक-दिवसीय निर्धारित भ्रमण कराये जाते हैं जिनके द्वारा आप दामियाँन सदुआक आ सकते हैं। अन्यथा आप स्वयं भी टैक्सी द्वारा यहाँ पहुँच सकते हैं। बैंकॉक की सीमा पर स्थित साई ताई माई वैन टर्मिनल से बस द्वारा भी आप दामियाँन सदुआक पहुँच सकते हैं।

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अम्फवा का तैरता बाजार

दामियाँन सदुआक के समीप ही एक अन्य तैरता बाजार भी लोकप्रिय है। आप अपना दिवस सुनियोजित कर एक-दिवसीय भ्रमण के रूप में दोनों तैरते बाजार एक ही दिन में देख सकते हैं। अम्फवा का तैरता बाजार वास्तव में एक मछुआरों का गाँव था जिसे अब एक व्यावसायिक संकुल के रूप में विकसित किया गया है। इसीलिए यहाँ का बाजार पर्यटन संबंधी कम प्रतीत होता है।

सांझ ढले अम्फवा का बाज़ार
सांझ ढले अम्फवा का बाज़ार

नहर के दोनों ओर सागवान लकड़ी के चबूतरों पर सस्ता बाजार है। यहाँ आप प्रमाणिक व सस्ते स्थानीय थाई व्यंजनों का आस्वाद ले सकते हैं। इस बाजार में अधिकांशतः स्थानिक ही आते हैं, अतः आप स्थानिकों की जीवन शैली को भी समीप से देख सकते हैं। यहाँ आप सस्ते दामों पर नहर के जल में नौका सवारी कर सकते हैं।

इस बाजार में भ्रमण का एक अन्य कारण यह भी है कि यहाँ से आप निकट ही स्थित ट्रेन बाजार भी जा सकते हैं। जी हाँ, इस बाजार के मध्य से रेलगाड़ी जाती है। रेलगाड़ी आने से पूर्व वे अपना समान एकत्र कर लेते हैं तथा गाड़ी जाते ही पुनः बाजार लगा लेते हैं। यदि आप दामियाँन सदुआक आये हुए हैं तो आप वहाँ से टैक्सी द्वारा अम्फवा तैरता बाजार पहुँच सकते हैं।

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डॉन वाई तैरता बाजार

अब हम उस तैरते बाज़ार की चर्चा करेंगे जिनकी पर्यटन दृष्टि से लोकप्रियता कम है। डॉन वाई ऐसा ही एक तैरता बाजार है जो स्थानीय लोगों में लोकप्रिय है। आपको यहाँ कदाचित एक भी विदेशी पर्यटक ना दिखाई दे। डॉन वाई तैरता बाजार बैंकॉक के पश्चिमी ओर, नखोन पथोम प्रान्त में स्थित है। इसकी अवस्थिति ग्रामीण क्षेत्र की होने के कारण आप यहाँ की प्रमाणिक स्थानिक जीवन शैली का अनुभव ले सकते हैं।

डॉन वाई तैरता बाजार
डॉन वाई तैरता बाजार

यह तैरता बाज़ार डॉन वाई मंदिर के ठीक पीछे स्थित है। जब आप मंदिर को पार कर रहे होंगे, तभी आपको यह ज्ञात होने लगेगा कि इस क्षेत्र के अधिकाँश लोग इस स्थानीय बाजार में रविवार का दिवस आनंद से व्यतीत करते हैं। यहाँ उपलब्ध वस्तुओं एवं दुकानों के विविध प्रकार आपको दंग कर देंगे। यहाँ वस्त्रों, परिधानों, पौधों, खिलौनों आदि के विविध प्रकारों से लेकर स्थानीय व्यंजनों एवं थाई नाश्तों के अनेक प्रकार उपलब्ध हैं।

यह बाज़ार एक नहर के तट पर स्थित है जहाँ कुछ विक्रेता नौकाओं पर भी दुकानें लगाते हैं। इस नहर में आपको कुछ विशाल नौकाएं भी दृष्टिगोचर होंगी जो समीप स्थित एक अन्य प्रमुख मंदिर तक जाती हैं। आप उन नौकाओं द्वारा वहाँ तक जा सकते हैं जहाँ से आगे आप अपने होटल जा सकते हैं। यदि यह नौका सवारी संध्याकाल में की जाए तो यह एक आनंदित नौका सवारी सिद्ध हो सकती है।

यदि आप सड़क मार्ग द्वारा यहाँ पहुँचना चाहें तो अंतिम MRT स्थानक (लाक सौंग) से लगभग ३० मिनट का समय लगता है। आप एक या दो बस लेकर यहाँ आ सकते हैं अथवा टैक्सी द्वारा सीधे इस बाजार तक पहुँच सकते हैं।

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बंग्नामफुएंग तैरता बाज़ार

बंग नाम फुएंग तैरता बाज़ार एक सुन्दर ग्रामीण बाजार है जो बंग कचाओ नामक द्वीप पर स्थित है। बंग कचाओ को बैंकॉक के फेफड़े भी कहते हैं। यह एक घोड़े की नाल के आकार का द्वीप है जो चाओ फ्राया नदी के वृत्ताकार मार्ग के कारण उत्पन्न हो गया है। इस द्वीप के मुख्य आकर्षण हैं, इसे आच्छादित करते सघन विशाल वृक्ष तथा ग्रामीण क्षेत्रों की निश्छल सुन्दरता। नदी पार कर इस क्षेत्र में प्रवेश करते ही ऐसा प्रतीत होता है मानो आप किसी दूसरे ही विश्व में प्रवेश कर रहे हों।

यह बाज़ार बंग कचाओ के मध्य में स्थित है। सप्ताहांत में यह तैरता बाजार ग्राहकों से भरा रहता है। जैसा कि मैंने पहले कहा, यह आवश्यक नहीं कि सभी तैरते बाज़ार नौकाओं पर ही स्थित हों। नदी पर लटकते चबूतरों पर भी बाजार स्थित हो सकते हैं। यह ऐसा ही एक बाज़ार है। यहाँ अनेक दुकानों में स्थानीय उत्पादों की विक्री की जाती है। इस बाजार में आप जहाँ भी जाएँ, यह नदी सदा आपकी सहचारिणी होती है। यहाँ ताजे थाई नाश्ते, सामिष व्यंजन, केक, शहद, मिष्टान्न आदि विविध व्यंजन उपलब्ध रहते हैं।

बाज़ार के साथ साथ यहाँ का एक प्रमुख आकर्षण है, स्वयं बंग कचाओ द्वीप। आप घने वृक्षों के मध्य स्थित इस शांत ग्रामीण द्वीप का भ्रमण कर सकते हैं। बैंकॉक की भीड़-भाड़ से दूर जाना चाहते हों तो यह एक उत्तम स्थल है।

तलिंग छान तैरता बाज़ार

तलिंग छान तैरते बाज़ार की लोकप्रियता का एक कारण बैंकॉक से इसकी निकटता है। यह ना तो बैंकॉक के भीतर है, ना ही बैंकॉक से अधिक दूरी पर स्थित है। आप इस तैरते बाज़ार तक किसी भी टैक्सी द्वारा शीघ्र ही पहुँच सकते है। अथवा आप लाल लाइन के SRT द्वारा तलिंग छान स्थानक तक पहुँचकर वहाँ से पैदल चलकर इस बाजार तक पहुँच सकते हैं।

तलिंग छान तैरता बाज़ार
तलिंग छान तैरता बाज़ार

यद्यपि भूमि पर स्थित अधिकाँश दुकानों में आपको नियमित थाई मसाले मिलेंगे तथापि जल पर तैरती नौकाओं में आपको अधिक आकर्षक वस्तुएं दृष्टिगोचर होंगी। उन नौकाओं में आपको कुछ नूडल विक्रेता मिलेंगे जहाँ से आप नूडल लेकर नहर में तैरते जलपान गृहों में खा सकते हैं।

किन्तु मेरे अनुमान से इस स्थान का सर्वोत्तम आकर्षण है, नौका सवारी। आप इस तैरते बाज़ार से लम्बी पूँछ की सार्वजनिक नौका अथवा निजी नौका की सेवा किराये पर ले सकते हैं जो आपको थौन बुरी के आसपास के अप्रतिम सौन्दर्य का दर्शन करा सकते हैं। यह १०० वर्ष पूर्व के बैंकॉक का दर्शन करने जैसा अनुभव होगा। सवारी करते हुए आप मछलियों को दाना खिला सकते हैं, समीप स्थित मंदिर जा सकते हैं तथा दर्शन कर वापिस आ सकते हैं। रोमांचक ना हो तब भी यह एक स्फूर्तिदायक अनुभव अवश्य होगा।

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बैंकॉक के निकट तैरते बाजारों के दर्शन के लिए कुछ यात्रा सुझाव

तैरते हुए खाने का आनंद
तैरते हुए खाने का आनंद
  • किसी भी तैरते बाज़ार के दर्शन से पूर्व इन्टरनेट पर उसके प्रवेश शुल्क संबंधी जानकारी अवश्य ग्रहण कर लें। अधिकाँश तैरते बाजारों में प्रवेश निशुल्क है। यदि प्रवेश शुल्क हो तो उसे अधिकृत टिकट खिड़की से ही प्राप्त करें। वहाँ आपकी भेंट कुछ घोटाले कर्ताओं से हो सकती है जो आपको अत्यधिक मूल्य पर ये प्रवेश उपलब्ध कराने का झांसा दे सकते हैं।
  • उसी प्रकार, ठगी वृत्ति के कुछ व्यक्ति आपको घेर सकते हैं जो आपको तुरंत नौका उपलब्ध कराने का प्रलोभन देकर आपसे अत्यधिक मूल्य वसूल कर सकते हैं। प्रत्येक तैरते बाज़ार में नौका सवारी खिड़की होती है जहाँ से आपको उनके सटीक मूल्य ज्ञात हो सकते हैं। साधारणतः इन नौकाओं में समूहों में अथवा निजी रूप में सवारी का प्रबंध किया जाता है। समूह में सवारी की जाए तो कम मूल्य में यह उपलब्ध हो जाती है। निजी सवारियों का मूल्य अधिक होता है।
  • साधारणतया खाद्य पदार्थों के मूल्य स्थिर होते हैं तथा सूचना पटलों पर अंकित होते हैं। किन्तु थाईलैंड भ्रमण की स्मृति में कुछ उपहार अथवा स्मारिकाएं क्रय करना चाहें तो उनके मूल्यों में उतार-चढ़ाव देखे जाते हैं। कुछ भी क्रय करने से पूर्व अन्य दुकानों से उनके मूल्यों की पूर्व जानकारी अवश्य लें। आप निस्संकोच मोलभाव कर सकते हैं।
  • बाज़ार में भ्रमण करते समय तथा नौका सवारी करते समय अपना फोन, व्यक्तिगत सामान एवं अपने पर्स संभलकर अपने पास रखिये। यद्यपि जेबकतरी सामान्य नहीं है तथापि भीड़भाड़ भरे क्षेत्रों में भ्रमण करते समय तथा जल के समीप विचरण करते समय यदि ये गिर जाएँ तो उन्हें वापिस प्राप्त करना कठिन हो सकता है। साथ ही नौका सवारी के समय अपने फोन को जलनिरोधक आवरण से ढँक लें।

यह एक अतिथि संस्करण है जिसे दि स्टुपिड बेयर नामक यात्रा संस्करण की लेखिका स्निग्धा जायसवाल ने लिखा है। उनका यात्रा संस्करण दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्वी एशिया के अनछुए व रोचक पर्यटन स्थलों के विषय में व्यवहारिक जानकारी उपलब्ध कराता है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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इंडोनेशिया के जावा द्वीप पर पवित्र मेरापी पर्वत का भ्रमण https://inditales.com/hindi/merapi-parvat-jwalamukhi-java-indonesia/ https://inditales.com/hindi/merapi-parvat-jwalamukhi-java-indonesia/#respond Wed, 24 May 2023 02:30:03 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3076

मेरे इंडोनेशिया भ्रमण के प्रथम दिवस ही मैंने मेरापी पर्वत का दर्शन किया था। हम जावा द्वीप के योग्यकर्ता नगर में थे। सर्वप्रथम धान के खेतों में पदभ्रमण करते हमने आनंद से भरा दिन का समय व्यतीत किया था।  इसके पश्चात हम इस ज्वालामुखी पर्वत के दर्शन के लिए चल दिए। मेरापी पर्वत एवं उसके […]

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मेरे इंडोनेशिया भ्रमण के प्रथम दिवस ही मैंने मेरापी पर्वत का दर्शन किया था। हम जावा द्वीप के योग्यकर्ता नगर में थे। सर्वप्रथम धान के खेतों में पदभ्रमण करते हमने आनंद से भरा दिन का समय व्यतीत किया था।  इसके पश्चात हम इस ज्वालामुखी पर्वत के दर्शन के लिए चल दिए।

मेरापी पर्वत एवं उसके ज्वालामुखी विस्फोट

मेरापी का शाब्दिक अर्थ है, अग्नि पर्वत। वास्तव में एक यह ज्वालामुखी है जो समय समय पर अग्नि के साथ लावा उगलता है तथा चारों ओर ज्वालामुखी की राख बिखेरता रहता है। यह देखने में एक भयंकर आपदा प्रतीत होता है किन्तु यह जीवनदायी भी होता है। ज्वालामुखी द्वारा जो लावा एवं राख धरती के गर्भ से बाहर आते हैं, वे अपने साथ विविध खनिज पदार्थों का भण्डार भी लाते हैं तथा पर्वत के चारों ओर की भूमि को सर्वाधिक उर्वरित भूमि में परिवर्तित कर देते हैं। इसीलिए इसमें आश्चर्य नहीं है कि यह क्षेत्र जावा द्वीप का सर्वाधिक सघन जनसंख्या वाला क्षेत्र है।

मेरापी पर्वत ज्वालामुखी
मेरापी पर्वत ज्वालामुखी

समुद्र सतह से २९११ मीटर ऊँचा मेरापी पर्वत इंडोनेशिया के १२९ सक्रिय ज्वालामुखियों में से एक है। यह ज्वालामुखी नियमित रूप से फटता रहता है। इसके गत कुछ उत्सर्जनों की चर्चा की जाए तो यह ज्वालामुखी १९९४, २००६, २०१० तथा २०१३ में फटा था जिसमें २०१० में हुआ उत्सर्जन अति विकराल व भयावह था। इस विस्फोट में अनेकों निरीह जीवों ने अपने प्राण गँवा दिए थे जिनमें वे भी सम्मिलित थे जो इस ज्वालामुखी से बचने के लिए तलघरों में निवास कर रहे थे। इस भीषण तांडव के चलते लगभग दो मास तक इस क्षेत्र में गंभीर चेतावनी का पालन किया गया था।

मेरापी पर्वत में ११वीं सदी के आरंभ में हुए ज्वालामुखी विस्फोट को ही जावा के प्राचीन माताराम साम्राज्य के आकस्मिक लोप का कारण माना जाता है। यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल बोरोबुदूर मंदिर एवं प्रमबनन मंदिर भी भिन्न भिन्न काल में ज्वालामुखी की राख के नीचे दब गए थे।

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ज्वालामुखी के विषय में लोगों की सामान्य धारणा के विरुद्ध, जावा के निवासियों का मानना है कि मेरापी पर्वत उनका संरक्षक व रक्षक देवता है। उनकी मान्यता है कि उसके आशीर्वाद से ही वे एक दूसरे के साथ सौहार्दपूर्वक जीवन व्यतीत करते हैं। वे यह भी मानते हैं कि ज्वालामुखी फटने से पूर्व मेरापी पर्वत उन्हें पूर्व सूचना प्रदान करेगा तथा उन्हें स्पष्ट संकेत देगा कि अब उन्हें वह स्थान छोड़कर अन्यत्र जाना होगा।

मेरापी पर्वत से संबंधित किवदंतियाँ

मेरापी शब्द की व्युत्पत्ति दो शब्दों के संयोग से हुई है, मेरु व अपि। ये दोनों संस्कृत भाषा के शब्द हैं। जैसा कि आप जानते हैं, मेरु शब्द का अर्थ है, पर्वत। वस्तुतः यह उस मेरु पर्वत की ओर संकेत करता है जिसका अनेक भारतीय ग्रंथों में उल्लेख किया गया है। अपि का अर्थ है, अग्नि। इस पर्वत का नाम अत्यंत योग्य प्रतीत होता है।

पावन मेरापी पर्वत - जावा द्वीप इंडोनेशिया
पावन मेरापी पर्वत – जावा द्वीप इंडोनेशिया

ऐसा कहा जाता है कि यह पर्वत उत्तर-दक्षिण अक्ष पर स्थित है जहाँ उत्तरी छोर पर मेरापी पर्वत है तथा दक्षिणी छोर पर हिन्द महासागर है। यह काल्पनिक रेखा मेरापी पर्वत से होते हुए जाती है जिसे देवताओं का निवासस्थान कहा जाता है। वहाँ से यह रेखा क्रोटोन जाती है जो राजा का महल है। तत्पश्चात वह टुगु योग्य(Jogja) से होकर जाती है जहाँ सामान्य जनता निवास करती है। अंततः वह समुद्र से जा मिलती है जो प्रकृति की ओर संकेत करती है। दार्शनिक रूप से विश्लेषण किया जाए तो यह देवताओं को राजा से जोड़ती है, राजा को प्रजा से तथा प्रजा को प्रकृति से जोड़ती है। यह एक पवित्र अनुगमन माना जाता है।

ऐसा कहा जाता है कि हॉलैंड वासियों(डच) ने इस पवित्र भौगोलिक मान्यता को खंडित करने के उद्देश्य से इस अनुगमन मार्ग को काटते हुए यहाँ एक रेल मार्ग का निर्माण किया था। किन्तु इन मान्यताओं की जड़ें अत्यंत गहन व सुदृढ़ हैं। इसीलिए ये अब भी बनी हुई हैं।

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जावा निवासियों की मान्यता है कि जब देवताओं ने पृथ्वी की रचना की थी तब जमुर्दिपो पर्वत (जंबुद्वीप?) का जावा द्वीप के पश्चिमी छोर पर स्थित होने के कारण द्वीप संतुलित नहीं था। उसका संतुलन बनाए रखने के लिए उन्होंने जमुर्दिपो पर्वत को जावा द्वीप के मध्य में खिसकने का आदेश दिया जहाँ दो पौराणिक पात्र, अस्त्रकार एम्पू राम व एम्पू पेर्मादी अपने राज्य के साथ पहले से ही निवास कर रहे थे। देवताओं द्वारा चेतावनी पाने के पश्चात भी दोनों ने उस स्थान का समर्पण नहीं किया। क्रोध में देवताओं ने उन के ऊपर ही जमुर्दिपो पर्वत को स्थापित कर दिया।

अतः लोगों की मान्यता है कि एम्पू राम व एम्पू पेर्मादी अपने राज्य के साथ इस ज्वालामुखी पर्वत के नीचे निवास करते हैं तथा अग्नि उगलते रहते हैं। एक अन्य किवदंती के अनुसार एम्पू राम व एम्पू पेर्मादी की स्मृति में जमुर्दिपो पर्वत का ही नाम परिवर्तित कर मेरापी पर्वत रख दिया गया है जिसका अर्थ होता है, राम एवं पेर्मादी की अग्नि।

जैसा कि मैंने पूर्व में बताया था कि जावा निवासी मेरापी पर्वत को उनका संरक्षक मानते हैं तथा राम एवं पेर्मादी को अपना संरक्षक देवता। इसी मान्यता के अंतर्गत वे मेरापी पर्वत पर चढ़ावा चढ़ाते हैं। योग्यकर्ता के राजा के राज्याभिषेक दिवस की वर्षगाँठ दिवस पर विशेष चढ़ावे चढ़ाए जाते हैं। इन चढ़ावों को राजा के महल से मेरापी पर्वत तक ले जाया जाता है। साथ ही समुद्र को भी चढ़ावा चढ़ाया जाता है। इस प्रकार वे अग्नि तत्व एवं जल तत्व दोनों को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं।

सीसा हर्तकु – स्मृतियों का संग्रहालय

सीसा हर्तकु का शाब्दित अर्थ है, ‘मेरी शेष संपत्ति’ संग्रहालय। यह एक निवासगृह है जो अब स्मृतियों का एक संग्रहालय है। वाहन द्वारा इस संग्रहालय तक पहुँचने के लिए हमने अनेक गाँवों को पार किया जिनका संबंध मुख्य मार्ग से कटा हुआ था। वहाँ जाती सड़कों पर लावा निर्मित शिलाखंड बिखरे हुए थे।

सीसा हर्तकु – स्मृतियों का संग्रहालय
सीसा हर्तकु – स्मृतियों का संग्रहालय

हमने सीसा हर्तकु निवासगृह के भीतर प्रवेश किया जो परित्यक्त सा प्रतीत होता है। इसके भीतर हमने पशुओं के कुछ कंकाल एवं कुछ जीवाश्म देखे। हम जैसे जैसे गृह के भीतर विचरण करने लगे, मुझे ऐसा आभास हो रहा था मानो यह निवासगृह किसी समय अग्नि की चपेट में रहा हो। गृह में रखी दातौन, लौह संदूक, बच्चों की सायकलें जैसे दैनन्दिनी प्रयोग की प्रत्येक वस्तु उस आघात व कटु अनुभव की गाथा कह रही थी जब मेरापी पर्वत अग्नि उगलने लगा था। प्रत्येक वस्तु अपने स्थान पर स्थित थी किन्तु वो अपने पूर्ववत मूल स्थिति में नहीं थी। प्रत्येक वस्तु का वही भाग शेष था जो अग्नि परीक्षा में सफल हुआ था। वहाँ कुछ चित्र थे जिनमें पुरातन स्मृतिओं को पुनर्रचित कर दर्शाया गया था।

ज्वालामुखी से रुकी घडी
ज्वालामुखी से रुकी घडी

वहाँ का सम्पूर्ण दृश्य ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वह स्थान ५ नवम्बर २०१०, ५ बज कर १५ मिनट से अपनी अवस्थिति में ज्यों का त्यों जम गया है। आप सोच रहे होंगे कि मैंने यह समय किस आधार पर लिखा है! वहाँ की एक भित्ति पर एक घड़ी है जो ज्वालामुखी की तीव्र ऊष्मा में उसी समय पर स्थिर हो गयी है।

हम सब अत्यंत क्लांत मनःस्थिति में उस आवासगृह से बाहर आये। हम सब की मानसिक स्थिति दुखद थी। साथ ही हम सब को प्रकृति की शक्ति का भी आभास हो रहा था जो एक क्षण में हमारा अस्तित्व समाप्त कर सकती है।

बंकर कालियाडेम

यह एक तलघर है जिसका प्रयोग ज्वालामुखी के प्रकोप से बचने के लिए किया जाता है। किन्तु यह भी सत्य है कि सन् २०१० में फूटे ज्वालामुखी में इस तलघर में छुपे दो नागरिकों की भी मृत्यु हो गयी थी।

बंकर कालियाडेम  
बंकर कालियाडेम  

यदि आकाश निर्मल हो तो शुण्डाकार मेरापी पर्वत को यहाँ से देखा जा सकता है। अन्यथा अधिकांशतः आप पर्वत से निकलते धुंए को अवश्य सकते हैं। पर्यटन परिदर्शक आपको सूर्योदय दिखाने के आमिष पर यहाँ आने के लिए कह सकता है। किन्तु सूर्य इस पर्वत के ऊपर से नहीं उगता है।

और पढ़ें: कुतगेदे धरोहर पदभ्रमण

मैं जिस दिन वहाँ पहुँची थी, वर्षा हो रही थी। मुझे वहाँ केवल धूसर रंग की भिन्न भिन्न गहनता भिन्न भिन्न हरे रंगों के साथ खेलती हुई दिखाई दीं। वहाँ सड़क के एक ओर स्थित चाय की दुकान पर हमने चाय पी थी जिसके लिए हमने ५,००० इंडोनेशिया रुपिया भुगतान किया था। आश्चर्य चकित हो गए? भारतीय मुद्रा में यह केवल २५ रुपये होते हैं।

मार्ग में आप एक विशाल चट्टान देखेंगे जिसे बाटू एलियन कहते हैं। इसका अर्थ है, परग्रह मानव चट्टान। चट्टान का यह टुकड़ा सन् २०१० में पर्वत से टूट कर यहाँ गिर गया था। यह विशाल मानव का मुख सा प्रतीत होता है।

काली कुनिंग नदी में रोमांचक जीप सवारी

काली कुनिंग नदी में जीप सवारी
काली कुनिंग नदी में जीप सवारी

जीप भ्रमण करते हुए हम इसके एक रोमांचक पड़ाव पर पहुँचे जहाँ जीप को काली कुनिंग नदी के बहते हुए जल में चलाया जाता है। यह पर्यटकों को रोमांच प्रदान करने के उद्देश्य से किया जाता है। चूँकि हमारा विशाल समूह था तथा हमारे पास अनेक जीपें थीं, हमें इस रोमांच में अत्यधिक आनंद आया। सभी नदी के उबड़-खाबड़ तल पर जल को काटते हुए हिचकोले खाते हुए जा रहे थे। हम व हमारी मित्र मंडली रोमांचित हो आनंद से कोलाहल करने लगे थे।

पर्वतारोहण

समय समय पर फूटता तथा धुंआ, लावा व राख उगलता मेरापी पर्वत सदा रोमांच प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित करता रहा है। यहाँ अनेक पर्यटन आयोजक हैं जो पर्वत शिखर तक पर्वतारोहण का आयोजन करते हैं। यह पर्वतारोहण दिवस तथा रात्रि दोनों समय आयोजित किया जाता है। रात्रि पर्वतारोहण सूर्योदय पर समाप्त होता है। मेरा अनुमान है कि उस समय परिदृश्य अत्यंत मनोरम होता होगा। आप आधार शिविर तक भी पदभ्रमण के लिए जा सकते हैं।

हमने एक लावा भ्रमण किया था जिसके अंतर्गत हमने संग्रहालय दर्शन, बंकर दर्शन तथा नदी में रोमांचक जीप सवारी की थी। इन सब के लिए आधा दिवस पर्याप्त है। दोपहर के भोजन के उपरांत हम वहाँ से योग्यकर्ता के लिए निकले तथा रात्रि भोजन से पूर्व वहाँ पहुँच गए।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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पेट्रा जॉर्डन – विश्व का अनोखा अचम्भा यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल https://inditales.com/hindi/petra-prachin-nagari-jordan/ https://inditales.com/hindi/petra-prachin-nagari-jordan/#comments Wed, 24 Aug 2022 02:30:39 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2771

पेट्रा जॉर्डन अथवा पेत्रा जॉर्डन – जब जॉर्डन देश के पर्यटन विभाग ने मुझे अपने देश में भ्रमण करने का आमंत्रण दिया था तब मैं इस धरोहर स्थल के विषय में जो जानती थी, वह था केवल उसका नाम। किन्तु एक विश्व धरोहर स्थल होने के कारण मेरी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं था। कुछ छायाचित्र […]

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पेट्रा जॉर्डन अथवा पेत्रा जॉर्डन – जब जॉर्डन देश के पर्यटन विभाग ने मुझे अपने देश में भ्रमण करने का आमंत्रण दिया था तब मैं इस धरोहर स्थल के विषय में जो जानती थी, वह था केवल उसका नाम। किन्तु एक विश्व धरोहर स्थल होने के कारण मेरी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं था। कुछ छायाचित्र देखने के पश्चात गुलाबी रंग के स्तंभों की मनमोहक छवि ने मन-मस्तिष्क में कौतूहल उत्पन्न कर दिया था. मैं जान गयी थी कि क्यों पर्यटक पेट्रा जॉर्डन की यात्रा के लिए लालायित रहते हैं।

पेट्रा - जॉर्डन का प्राचीन नगर
पेट्रा – जॉर्डन का प्राचीन नगर

हम इस स्थान का अवलोकन करने के लिए इतने उत्सुक थे कि हमने हमारे गाइड से प्रातः अति शीघ्र प्रस्थान करने का प्रस्ताव दिया, ताकि हमें उस गुलाबी बलुआ पाषणों की नगरी को निहारने के लिए कुछ अतिरिक्त घंटे मिलें, जो दीर्घ काल तक एक लुप्त नगरी थी।

पेट्रा जॉर्डन का भ्रमण

हमारा गाइड कदाचित हमारे जैसे अति उत्साही पर्यटकों से अभ्यस्त था। उसने हमें बातों व कथाओं में उलझाकर यह सुनिश्चित कर लिया कि हम उसके द्वारा नियोजित समय पर ही अम्मान से निकलें। तकनीकी रूप से पेट्रा म’आन प्रांत के शोबक गाँव के अंतर्गत आता है। यह जॉर्डन के दक्षिणी भाग में स्थित है। राजधानी अम्मान से यहाँ तक पहुँचने के लिए लगभग ३-४ घंटों की सड़क यात्रा करनी पड़ती है।

पेट्रा की प्रथम झलक – नाबातियन की खोई नगरी

चौकोर कटे हुए मकबरे
चौकोर कटे हुए मकबरे

पेट्रा पहुँचते पहुँचते दोपहर होने को थी। हमने प्रवेश टिकट क्रय किया जिसका मूल्य ९० जॉर्डन दीनार प्रतिव्यक्ति था। उस समय १ जॉर्डन दीनार का भारतीय मूल्य १०० रुपये था। हम स्तब्ध थे क्योंकि यह मेरे द्वारा  अवलोकित यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों के प्रवेश शुल्कों में अब तक का सर्वाधिक शुल्क था। धरोहर स्थल के प्रवेश द्वार पर पहुँचने का रोमांच अपनी चरम सीमा पर था। प्रवेश द्वार से भीतर जाते हुए हमें आशा थी कि हमें कुछ अद्भुत स्मारकों के दर्शन होंगे। यद्यपि, पूर्व में यहाँ का भ्रमण किये हुए मेरे कुछ मित्रों ने मुझे सावधान कर दिया था कि मुझे लम्बी दूरी तक पैदल चलने के लिए मानसिक व शारीरिक रूप से सज्ज रहना पड़ेगा। किन्तु मेरे समक्ष तो एक विशाल विस्तृत नगर था। हम उबड़-खाबड़ मार्ग पर चलते हुए आगे बढ़े। हमारे दोनों ओर उत्कीर्णित पहाड़ थे। वास्तव में वे चौकोर मकबरे थे जिन्हें पहाड़ियों को काटकर बनाया गया था। उन पर शुभ शकुन एवं चिन्ह उत्कीर्णित व चित्रित थे। उत्कीर्णन अब भी शेष हैं किन्तु चित्र अब धुंधले पड़ चुके हैं।

पेट्रा के चट्टानी पहाड़
पेट्रा के चट्टानी पहाड़

यहाँ-वहाँ जाते रंगबिरंगे तांगे उस नीरस परिवेश को रंगों से सजा रहे थे। वे उन लोगों को ले जा रहे थे जो पैदल चलना टालना चाहते थे। हम लगभग १ किलोमीटर तक संकीर्ण घाटी के मध्य से चलकर सिक नामक स्थान पर पहुंचे। यह गुलाबी-लाल रंग की नगरी है। हमारे गाइड ने इस विश्व धरोहर स्थल के इतिहास की जानकारी देना आरम्भ किया। उसने यह भी बताया कि इसका बाइबल में भी उल्लेख किया गया है, जिसका अर्थ है कि यह उस काल में एक जीवंत नगर था। पेट्रा एक यूनानी शब्द पेट्रोस से लिया गया है जिसका अर्थ है चट्टानें। इस नगरी के दर्शनोपरांत आप भी यह मानेंगे कि इस नगरी का पेट्रा से अधिक उपयुक्त नाम नहीं हो सकता।

पेट्रा मुख्य रूप से नाबातियन नामक प्राचीन लोगों द्वारा बसाई गयी थी जिस पर कालान्तर में रोमन साम्राज्य ने आधिपत्य स्थापित कर लिया था। ७वीं शताब्दी में रोमन साम्राज्य द्वारा त्याग देने के पश्चात यह एक लुप्त नगर बन गया था। सन् १८१२ में एक स्विस खोजकर्ता जोहान्न लुडविग ने इसकी पुनः खोज की थी। गुलाबी रंग की चट्टानों के कारण इसे “रोज़ सिटी” अर्थात् गुलाबी नगरी कहा जाता है। इसे “लॉस्ट सिटी” अर्थात् खोई नगरी भी कहा जाता है क्योंकि अनेक सदियों तक यह नगरी विश्व की दृष्टी से लुप्त थी।

नाबातियन सभ्यता की राजधानी

पेट्रा नाबातियन सभ्यता की राजधानी थी। उस समय इसकी शोभा अपनी चरम सीमा पर थी। इतिहासकारों का मानना है कि इस धरोहर नगरी का इतिहास लगभग ३१२ ईसा पूर्व में आरम्भ हुआ था। यहाँ नाबातियन की व्यापारिक जनजाति निवास करती थी। दक्षिण के अरब, मृत सागर के किनारे स्थित मिस्त्र के अरब एवं प्राचीन रोमवासियों से उनके व्यापारिक सम्बन्ध थे। ऐतिहासिक साहित्यों में यहाँ से भारत तक के व्यापारिक मार्गों का भी उल्लेख में किया गया है। नाबातियन जनजाति मूलतः अरबी मूल के निवासी हैं। वे दुशरा नामक भगवान की आराधना करते थे जो ग्रीको-रोमन पौराणिकी के जूस अथवा जुपिटर के समकक्ष है। वे ग्रीस की प्रेम की देवी एफ्रोडाईट की समकक्ष एक देवी की भी आराधना करते थे। जूस के समान दुशरा भी समीप स्थित पर्वत पर निवास करते थे। मुझे अनायास ही स्मरण हो आया कि हमारे देवी-देवताओं को भी पर्वतों पर निवास करना भाता है, जैसे भगवान शिव कैलाश पर्वत पर निवास करते हैं।

चट्टानों को काट कर बनाये मकबरे
चट्टानों को काट कर बनाये मकबरे

नाबातियन जनजाति के लोग यहाँ १०६ ईसवी तक निवास करते रहे। तदनंतर रोमन साम्राज्य ने यहाँ अधिपत्य स्थापित कर लिया। यहाँ किये गए उत्खननों में नाबातियन चिन्हों के साथ साथ रोमन वसाहत के अंश भी प्राप्त हुए हैं। इस संकुल में गिरिजाघरों की उपस्थिति यह दर्शाती है कि नाबातियन जनजाति के निवासियों ने ईसाई धर्म अपनाया था जो संभवतः प्रथम ईसवी के आरम्भ में हुआ था।

सिक

पेट्रा का सिक
पेट्रा का सिक

कच्चे मार्ग पर पैदल चलते हुए लगभग एक किलोमीटर की दूरी पार करने के पश्चात आप पहाड़ी का ग्रैंड कैनयन सदृश द्विभाजन देखेंगे। ऐसा प्रतीत होता है मानो हमारा मार्ग प्रशस्त करने के लिए पहाड़ी दो भागों में विभक्त हो गयी हो। वास्तव में एक भयंकर भूकंप के फलस्वरूप यह पहाड़ी प्राकृतिक रूप से विभाजित हो गयी है। इसे ध्यानपूर्वक देखने पर आपको आभास होगा कि यदि आप पहाड़ी के दोनों भागों को जोड़ने का प्रयास करें तो ये दोनों मिलकर एक पूर्ण पहाड़ी का रूप ले लेंगे, मानो वे किसी पहेली के दो टुकडें हों।

सिक - चट्टानों के बीच से जाता मार्ग
सिक – चट्टानों के बीच से जाता मार्ग

पहाड़ी के दोनों भागों के मध्य स्थित गली लगभग ८०० मीटर लम्बी है। इस गली की एक अनूठी विशेषता है। पहाड़ी के दोनों भागों के मध्य गली अत्यंत संकरी है तथा पहाड़ी ऊंची है। अतः सूर्य का प्रकाश ऊपर से इस गली में एक संकरी पट्टी के रूप में प्रवेश करता है तथा चट्टानों को प्रकाशित करता है। इसके कारण, भूमि पर खड़े होकर हमें सूर्य तो दृष्टिगोचर होता है किन्तु उसकी उष्मा का आभास नहीं होता। अतः यह प्राकृतिक गलियारा इस धरोहर नगरी का सर्वाधिक शीतल भाग है।

मत्सयाकर में चट्टान
मत्सयाकर में चट्टान

इस क्षेत्र में अनेक प्राकृतिक संरचनाएं हैं जो आश्चर्यचकित कर देती हैं। जैसे एक स्थान पर चट्टान का प्राकृतिक आकार मछली के मुख के समान प्रतीत होता है। यहाँ अनेक मानव-निर्मित शिल्प हैं जिन्हें देखने के पश्चात आप उन्हें अवश्य सराहेंगे। जैसे यहाँ एक वेदिका है जिसकी भित्तियों पर आकृतियाँ उत्कीर्णित हैं। मेरे अनुमान से वे आकृतियाँ उन देवी-देवताओं की हैं जिनकी यहाँ वंदना की जाती थी। यदि मैं उन सभी आकृतियों की पृष्ठभागीय कथाएँ व जानकारियाँ जान पाती तो मुझे संतुष्टि होती। किन्तु सीमित समयावधि के कारण प्रत्येक शिल्प से सम्बंधित जानकारी एकत्र करना संभव नहीं था। मुझे आश्चर्य हुआ कि इतना लोकप्रिय पर्यटन स्थल होते हुए भी इसके विषय में इन्टरनेट में अत्यंत सीमित प्रलेखन उपलब्ध है।

ऐसी मान्यता है कि नाबातियन निवासी इस संकरी प्राकृतिक गली का प्रयोग अपनी सुरक्षा हेतु करते थे। यह संकरी गली नगरी में प्रवेश हेतु एकमात्र मार्ग होने के कारण वे अपनी सुरक्षा की ओर आश्वस्त रहते थे। आक्रमणकारियों के लिए संकरी लम्बी गली के द्वारा नगरी में प्रवेश करना एवं आक्रमण करना आसान नहीं होता था।

पेट्रा जॉर्डन का जल प्रबंधन

जल प्रवाह के साधन
जल प्रवाह के साधन

सिक में विचरण करते समय वहां के एक तत्व पर अवश्य ध्यान दीजिये। आप उन्हें देख आश्चर्यचकित रह जायेंगे। भित्तियों के दोनों ओर जलवाहिकाएं बनी हुई हैं। एक लाल पकी मिट्टी अर्थात् टेराकोटा में निर्मित है जो पेयजल प्राप्त करने के लिए छलनी का कार्य करती है। दूसरी चूना मिट्टी द्वारा निर्मित है। एक मरुस्थल का भाग होते हुए भी यहाँ दीर्घकाल तक मानवी वसाहत की उपस्थिति का श्रेय इस जल प्रबंधन प्रणाली को ही जाता है। इस स्थान के जल प्रबंधन प्रणाली का एक विस्तृत अवलोकन किसी वैज्ञानिक खोज से कम नहीं है। ऐसा कहा जाता है कि वर्ष भर में यहाँ केवल ६ इंच वर्षा होती थी जिसके जल का प्रबंधन इतनी कुशलता से किया था कि यहाँ के निवासियों को वर्ष भर जल की आपूर्ति हो जाती थी। इससे मुझे प्राचीन भारत के जल प्रबंधन प्रणालियों का स्मरण हो आया, जैसे रानी की वाव तथा सहस्त्रलिंग तलाव

पेट्रा राजकोष

पेट्रा का विश्व प्रसिद्द राजकोष
पेट्रा का विश्व प्रसिद्द राजकोष

राजकोष स्मारक इस भव्य पेट्रा की वास्तविक पहचान है। सिक के दूसरी ओर यह प्रथम स्मारक है। संकरी गली से जाते समय ही आपके समक्ष गुलाबी रंग के कुछ स्तम्भ प्रकट होने लगते हैं। जैसे आप उसके निकट जायेंगे, आप स्वयं को एक भव्य अग्रभाग आपके समक्ष पायेंगे। मेरे लिए यह एक स्वप्न के पूर्ण होने का आभास था। गुलाबी रंग के बलुआ पत्थर में उत्कीर्णित वह संरचना ग्रीक-रोमन शैली के मंदिर सदृश प्रतीत हो रही थी। किन्तु वह केवल अग्रभाग था। स्थानीय बदू अथवा बदूईन अरब जनजाति ने अनुमान लगाया कि उस भव्य अग्रभाग के पीछे अवश्य ही अपार संपत्ति संचित कर रखी गयी होगी। अतः उन्होंने उसे राजकोष कहना आरम्भ कर दिया। वास्तव में वह राजकोष ना होते हुए किसी प्रमुख नाबातियन राजा का मकबरा है। उसी प्रकार अन्य उत्कीर्णित अग्रभाग भी किसी महत्वपूर्ण व्यक्तियों के मकबरे हैं। राजकोष के निकट जाकर आप नीचे अनेक मकबरे देख सकते हैं।

अधिकांश प्राचीन सभ्यताएं मृत्यु पश्चात पुनर्जन्म में विश्वास रखती हैं तथा आत्माओं को आगामी जीवन में स्थानांतरित करने के अनेक अनुष्ठान करती हैं। इस के विपरीत, नाबातियन जनजाति मृत्यु पश्चात स्वर्ग अथवा नर्क की प्राप्ति में आस्था रखती है। प्रत्येक मकबरे के ऊपर काक पंजो के चिन्ह उत्कीर्णित हैं जो नाबातियन आस्थाओं के अनुसार स्वर्ग अथवा नरक ले जाने का साधन हैं। राजकोष समेत अन्य प्राकृतिक संरचनाओं के अग्रभागों को एलोरा की कैलाश गुफा के समान ऊपर से नीचे की ओर उकेरा गया है। जिस प्रकार हमें अजंता की गुफाओं की निर्माण पद्धति के विषय में आवश्यक जानकारी अपूर्ण गुफाओं से प्राप्त हुई थी, पुरातत्वविदों ने खोज की कि इन अग्रभागों का उत्कीर्णन भी ऊपर से नीचे की ओर किया गया था। इसी कारण उन सभी की दूसरी कथाएं लोकप्रिय हैं, ना कि प्रथम।

वास्तुशिल्पिय विवरण

राजकोष स्मारक के अग्रभाग पर जो उभरे हुए शिल्प हैं उन पर यहाँ निवास किये ५ विभिन्न सभ्यताओं का प्रभाव है।

राजकोष के प्रथम तल के समक्ष ६ ऊंचे स्तम्भ हैं। अग्रभाग के दोनों छोरों में से प्रत्येक छोर पर, दो स्तंभों के मध्य घोड़े की सवारी करते वीर योद्धा का शिल्प है। वे रोम पौराणिकी की देन है। उन दोनों योद्धाओं को कास्त्रो तथा पोलिक्स कहा जाता है जो रोम पौराणिकी पात्र जूस एवं मानवी कन्या के पुत्र हैं। स्तंभों के शीर्ष कोरिंथियन हैं जो इस अग्रभाग पर यूनानी प्रभाव है। दूसरे तल पर मिस्र की देवी एजेस की छवि है।

कोरिंथियन शीर्ष के ऊपर आप ६ पात्र देख सकते हैं जिनके ऊपर ३० गुलाब पुष्प हैं। प्रत्येक तल में ६ स्तम्भ हैं। जिसका अर्थ है कि अग्रभाग में कुल १२ स्तम्भ हैं। दांतों के समान चिन्ह उत्कीर्णित हैं जिनकी कुल संख्या ३६५ है। इन संखाओं को देख क्या ऐसा प्रतीत नहीं होता कि पूर्ण अंग्रेजी वार्षिक पञ्चांग उकेर दिया हो?

१० वर्ष पूर्व तक पर्यटकों को इस संरचना के भीतर जाने की अनुमति थी। किन्तु जब से इस अग्रभाग के नीचे समाधियाँ मिली हैं पर्यटकों का भीतर जाना निषिद्ध कर दिया गया है।

राजकोष की एक अनूठी विशेषता है कि इस सम्पूर्ण धरोहर स्थल के विभिन्न स्मारकों के अग्रभागों में राजकोष का अग्रभाग सर्वोत्तम रूप से संरक्षित है। इसके पृष्ठभाग में एक साधारण वैज्ञानिक कारण है। सिक से आती हुई तेज गति की वायु राजकोष के आसपास की भित्तियों पर आघात करती है किन्तु अग्रभाग पर नहीं। इसके कारण वातावरण की तीव्र परिस्थितियों से अग्रभाग का प्राकृतिक रूप से संरक्षण होता रहता है।

गुफाएं

पेट्रा की गुफाएं
पेट्रा की गुफाएं

यह विडम्बना है कि अप्रतिम रूप से अलंकृत सभी अग्रभाग वास्तव में मृत व्यक्तियों की समाधियों के अग्रभाग हैं। वहीं पहाड़ियों के अग्रभाग पर दृष्टिगोचर छोटे छोटे छिद्र वास्तव में गुफाएं है जहां किसी काल में लोग रहते थे। यह किसी व्यंग से कम नहीं कि विशाल अलंकृत व सज्जित स्थल मृत व्यक्तियों के लिए है जबकि पहाड़ियों पर स्थित केवल छिद्र-मात्र उन्ही लोगों के निवासस्थान थे जब वे जीवित थे।

मकबरे और रहने के लिए गुफाएं
मकबरे और रहने के लिए गुफाएं

१९८५ तक यहाँ बदू अथवा बदूईन जैसे स्थानीय जनजातियों की वसाहत थी। इसके पश्चात यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल की श्रेणी में स्थान प्राप्त करने के लिए उन्हें यहाँ से बाहर निकाल दिया गया था। आज भी आपको यहाँ ऐसे लोग मिल जायेंगे जो प्रतिपादित करते हैं कि वे किसी समय इन गुफाओं में रहते थे। कुछ पर्यटन गाइड आपको इन गुफाओं में रहने का अवसर प्रदान कर सकते हैं किन्तु अधिकारिक स्तर पर इसकी अनुमति नहीं है।

बदू अथवा बदूईन

बेदूइन लोगों के तम्बू
बेदूइन लोगों के तम्बू

यहाँ निवास करती बदूईन जनजाति को जब यहाँ से अन्यत्र स्थानांतरित किया गया था तब उन्होंने एक चतुराई दिखाई। तब उन्होंने अधिकारियों से समझौता करवा लिया कि इस धरोहर स्थल के भीतर पर्यटकों को केवल वे ही पर्यटन गाइड सेवा मुहैया करवाएंगे। इसी कारण आपको इस जनजाति के लोग सर्वत्र दृष्टिगोचर होंगे, कुछ ताँगा हाँकते हुए तो कुछ ऊँट अथवा खच्चर पर सवारी उपलब्ध कराते हुए। वहीं इस जनजाति के कुछ सदस्य तम्बू गाड़कर, उनके भीतर जॉर्डन की स्मारिकायें बिक्री करते हैं। दक्षिणी भाग में एक अच्छा जलपानगृह भी है। इसके अतिरिक्त भी कुछ छोटी छोटी दुकानें यहाँ-वहाँ बिखरी हुई हैं किन्तु पर्यटकों की सुविधाओं के नाम पर उनमें अधिक कुछ उपलब्ध नहीं है। यहाँ तक कि हमारे गाइड ने हमें सावधान किया कि चूंकि यहाँ पर्यटन सुविधाएं उपलब्ध कराने में बदू जनजाति के सदस्यों का एकाधिकार है, अतः उनके द्वारा मुहैया कराई गयी सेवा का स्तर अत्यंत साधारण तथा महँगा है।

आप ही कल्पना कीजिए, प्रवेश शुल्क के नाम पर एक भारी मूल्य चुकाने के पश्चात इस भुतहा नगरी में विभिन्न साधनों पर सवारी की सुविधा प्राप्त करने के लिए भी उतना ही भारी मूल्य देना पड़ता है। मुझे वे अत्यंत अशिष्ट भी प्रतीत हुए। एक खच्चर का मालिक मुझसे इसलिए कुपित हो गया क्योंकि मैंने पैदल चलने का निश्चय किया, ना कि उसके खच्चर को भाड़े पर लेकर उसकी सवारी करना। उसने अपने सहयोगियों को एकत्र कर मुझे धमकाने का भी प्रयत्न किया। यह सब लगभग संध्या के समय हुआ जब वहां अधिक पर्यटक उपस्थित नहीं थे।

नाट्यगृह

रोमन नाट्यगृह
रोमन नाट्यगृह

यहाँ एक नाट्यगृह के अवशेष हैं। लोकप्रिय रोमन नाट्यगृहों से समानता के कारण सामान्यतः इसे भी रोमन नाट्यगृह कहा जाता है। यह एक मिथ्या है। यह नाट्यगृह भी नाबातियक काल से सम्बन्ध रखता है। इस नाट्यगृह का सर्वाधिक विशेष तत्व यह है कि इसे भी चट्टान को काटकर निर्मित किया गया है। क्या आप ऐसे ही किसी अन्य नाट्यगृह के विषय में जानते हैं?

दुर्भाग्य से यह नाट्यगृह अत्यंत भंगित अवस्था में है। उसे देख यह कल्पना करना कठिन है कि किसी काल में यह ६०० दर्शकों की क्षमता का एक उत्कृष्ट नाट्यगृह था।

दुशरा का मंदिर

दुशारा का मंदिर
दुशारा का मंदिर

यह यदि भंगित अवस्था में नहीं होता तो इस धरोहर स्थल का विशालतम अग्रभाग अथवा संरचना होता। दुर्भाग्यवश अब जो हम देखते हैं वह पूर्णतः भग्नावशेष हैं। पुरातत्ववेत्ता इसकी तुलना जेराश के आर्टेमिस मंदिर अथवा अम्मान गढ़ के हरक्युलिस मंदिर से करते हैं। यहाँ तक कि वे इसे उनसे भी विशाल आंकते हैं।

राजाओं की समाधि/छत्री

पेट्रा के राजसी मकबरे
पेट्रा के राजसी मकबरे

इस धरोहर नगरी में, अल खजानेह अर्थात राजकोष से आगे जाते हुए दाहिनी ओर देखें तो पहाड़ी की चोटी पर अनेक राजसी समाधियाँ हैं जिनके अग्रभाग भी राजकोष के अग्रभाग के समान हैं। इस पहाड़ी के आधार तक पहुँचने के लिए सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। मुझे आगे इसी प्रकार की सीढ़ियाँ मठ पहुँचने के लिए भी चढ़नी थीं। मुझमें एक स्थान पर ही इस अभियान की पूर्ति करने की क्षमता एवं इच्छा शेष थी। अतः मैंने यहाँ की सीढ़ियाँ ना चढ़ते हुए मठ की सीढ़ियाँ चढ़ने का निश्चय किया। दूर से यह संरचना भव्य प्रतीत हो रही थी। इस समाधि संरचना के भीतर स्थित अभिलेख इन समाधियों की कालावधि दर्शाते हैं। साथ ही उन राजाओं का उल्लेख है जिन्हें यहाँ समाधिस्त किया गया था। उनमें से अधिकाँश नाबातियन राजा थे।

यहाँ स्थित अनेक संरचनाओं ने अपने आकार अथवा रंग पर आधारित नामों को प्राप्त किया है। उदहारण के लिए, रेशम के रंग की इमारत को रेशम समाधी अथवा छत्री कहते हैं। कोरिंथियन स्तंभों से युक्त संरचना को कोरिंथियन कहते हैं। महल के समान प्रतीत होती संरचना को महल कहा जाता है। किन्तु इन नामों का इन संरचनाओं के मूल नाम अथवा इनके उद्देश्य से नाममात्र भी सम्बन्ध नहीं है।

पेट्रा मठ की सैर

पेट्रा का प्रसिद्द मठ
पेट्रा का प्रसिद्द मठ

मठ भी एक उत्कीर्णित अग्रभाग है। किसी काल में यह एक श्रद्धा स्थल रहा होगा। किन्तु वह वर्तमान में जिस स्थिति में विद्यमान है, इसका भीतरी भाग अत्यंत साधारण है तथा अग्रभाग सुन्दरता से उत्कीर्णित है। इस मठ तक पहुँचने के लिए पहाड़ी की तलहटी से लगभग ८०० सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती है। मार्ग में आपकी भेंट कुछ तम्बुओं के भीतर बैठे बदूईन जनजाति के स्थानिकों से होगी। उनमें से कुछ संगीत वाद्य बजाते दृष्टिगोचर होंगे तो कुछ चाय परोसते, किन्तु उनमें से अधिकतर लोग आभूषण एवं लाल व काले वस्त्र बिक्री करते दिखेंगे। मैंने देखा, अधिकतर तम्बुओं में स्त्रियाँ ही सभी कार्यकलापों का प्रबंधन कर रही थीं जबकि पुरुष पर्यटकों को खच्चर की सवारी करा रहे थे।

शैल आकृतियों की जटिलता के अतिरिक्त उनके रंग भी आपको आकर्षित करेंगे। चट्टानों के चटक पीले एवं गुलाबी रंग आपको स्तब्ध कर देंगे। इन्हें देख मेरी प्रथम प्रतिक्रिया थी कि ये रंग शिल्पकारों ने प्रदान किये हैं। किन्तु मैंने जाना कि यहाँ की बलुआ चट्टानों के विभिन्न परतों के भिन्न भिन्न रंग हैं। मैंने अनेकों गुफाओं के भीतर झांककर देखा। सभी के भीतर इन परतों के भिन्न भिन्न रंगों ने सुन्दर आकृतियाँ बनाई हुई थीं। इसके विषय में सही वैज्ञानिक जानकारी प्राप्त करने की मेरी तीव्र अभिलाषा थी। एक प्रशिक्षित भूवैज्ञानिक की कमी मुझे अत्यंत खल रही थी।

मठ के शीर्ष पर कलश
मठ के शीर्ष पर कलश

मठ के ठीक समक्ष एक बदूईन द्वारा चालित जलपान गृह है। पैदल चलने की थकान मिटाने के लिए यहाँ छोटा सा विश्राम एवं थोड़ी चाय अथवा कॉफी आपको पुनः उर्जा से भर देगी। यहाँ से आप मठ की सममितीय संरचना एवं सुन्दरता का आनंद भी उठा सकते हैं। यहां मून नामक एक बदूईन युवक मठ के एक भाग से दूसरे भाग तक छलांग लगा रहा था। उसे देख हम सब अचम्भे में पड़ गए थे। उसके साहस को सराह रहे थे। वह हमारी स्मृति में एक साहसी नायक के रूप में अमर हो सकता था किन्तु हमारी वापिसी के समय उसके खच्चर को भाड़े पर ना लेने के लिए उसने हमें बहुत उत्पीड़ित किया। हमारे मस्तिष्क पर पड़ी उसकी साहसी छाप पर उसकी अशिष्टता भारी पड़ गयी।

लघु पेट्रा

लघु पेट्रा
लघु पेट्रा

लघु पेट्रा इस पेट्रा की उत्तरी दिशा में, लगभग ८ किलोमीटर दूर स्थित है। यह एक लघु उपनगर प्रतीत होता है। जैसा कि इसका नाम है, संरचना की दृष्टी से लघु पेट्रा मूल पेट्रा के ही समान है किन्तु आकार में अपेक्षाकृत अधिक लघु है। मेरे लिए इस लघु पेट्रा के मायने अधिक सिद्ध हुए। कदाचित पेट्रा के विषय में इतना कुछ लिखा व कहा गया है कि कुछ पर्यटकों के लिए यह “नाम बड़े पर दर्शन छोटे” की कहावत सिद्ध करे। किन्तु मैं इसे देख प्रसन्नता से उछल पड़ी। इसका अग्रभाग भी उसी प्रकार उकेरा गया है जैसा कि समाधि अथवा छत्री। यहाँ भी अजंता की गुफाओं के समान गुफाएं हैं। शिलाओं के शीर्ष को पीठिका के रूप में उकेरा गया है। इसे देख ऐसा आभास होता है कि किसी काल में यहाँ प्राचीन सभ्यता जीवित थी। पुरातत्ववेत्ताओं का अनुमान है कि यहाँ व्यापारी गण ठहरते थे क्योंकि यह सिल्क रूट व्यापारिक मार्ग पर स्थित है। हम जानते ही हैं कि नाबातियन व्यवसाय से व्यापारी थे।

लघु पेट्रा की सिक
लघु पेट्रा की सिक

लघु पेट्रा को सिक अल- बरीद भी कहा जाता है। यहाँ भी घाटी के समान शिलाओं के मध्य विभाजन है। किन्तु यह उतना ऊंचा तथा संकरा नहीं हैं जितना पेट्रा का सिक था। दोनों ओर की चट्टानों को उकेरा गया है। जहाँ-तहाँ आपके समक्ष उत्कीर्णित अग्रभाग प्रकट हो जायेंगे। कालांतर में मुझे ज्ञात हुआ कि यहाँ कुछ गुफाओं में भित्तिचित्र भी हैं, किन्तु उस समय कदाचित हमारे गाइड को, इस विषय में हमें जानकारी देना स्मरण नहीं रहा। इस प्रकार मैंने नाबातियन काल के कुछ अप्रतिम भित्तिचित्रों के अवलोकन का सुअवसर खो दिया। लघु पेट्रा भी एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है।

बैठने के लिए बनी गुफाएं
बैठने के लिए बनी गुफाएं

लघु पेट्रा दर्शन के लिए प्रवेश शुल्क नहीं है। यह पर्यटकों के लिए दिन के समय खुला रहता है। यहाँ तक आप पहाड़ी पर पर्वतारोहण करते हुए भी पहुँच सकते हैं किन्तु गाइड की अनुपस्थिति में ऐसा करना उचित नहीं है।

यदि मुझे जॉर्डन भ्रमण का अवसर पुनः प्राप्त हो तो पेट्रा में कुछ अधिक समय व्यतीत करने में अत्यंत आनंद होगा। आप जब भी पेट्रा भ्रमण पर आयें तो लघु पेट्रा अवश्य देखें।

पेट्रा जॉर्डन के भ्रमण हेतु कुछ व्यवहारिक सुझाव

  • अपने साथ पेयजल अवश्य रखें।
  • पैदल चलने के लिए उपयुक्त जूते पहनें
  • आप अपनी शौचालय सम्बन्धी आवश्यकताओं के लिए टिकट खिड़की के समीप स्थित शौचालय का प्रयोग अवश्य करें क्योंकि दूसरा शौचालय अत्यंत दूरी पर प्राप्त होगा।
  • प्रातः शीघ्रतिशीघ्र यहाँ आने का प्रयास करें। वातावरण की उष्णता कम रहती है तथा छायाचित्र लेने के लिए भी पर्याप्त प्रकाश उपलब्ध रहता है।
  • दोपहर के पश्चात यहाँ पर्यटकों की संख्या कम होती है। उस समय यहाँ के स्थानीय लोग आपसे अशिष्ट व्यवहार कर सकते हैं।
  • संभव हो तो यहाँ समूह में आने का प्रयास करें।
  • यहाँ आने से पूर्व, विश्व धरोहर स्थल के भीतर अधिक महत्वपूर्ण स्थानों की जानकारी प्राप्त कर अपनी प्राथमिकता पूर्वनियोजित कर लें, जैसे किन स्थलों का अवलोकन अति आवश्यक है, किन स्थलों को देखने की आवश्यकता नहीं है तथा कौन से स्थल, उर्जा शेष रहने पर देखे जा सकते हैं।
  • अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार पैदल, खच्चर की सवारी तथा घोड़ागाड़ी की सवारी का चुनाव करें। सम्पूर्ण मार्ग में आप इनका सम्मिश्रण भी कर सकते हैं।
  • स्थानिक बदूईन आपको वस्तुएं क्रय करने के लिए अथवा खच्चर व घोड़ागाड़ी सवारी करने के लिए बाध्य करते हुए असभ्य व्यवहार कर सकते हैं। आप उन्हें नम्रता से नकार दें।
  • मैं यहाँ आने से पूर्व इस धरोहर स्थल के विषय में विश्वसनीय सूत्रों से विस्तृत जानकारी प्राप्त नहीं कर पायी थी। उस स्थिति में आप गाइड की सेवायें लें जो आपको इन संरचनाओं की वास्तु के विषय में सूक्ष्मता से जानकारी प्रदान करेंगे। साथ ही वे इसके विभिन्न युगों से सम्बंधित कथाएं भी सुनायेंगे।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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