उत्तर पूर्व भारत Archives - Inditales श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Mon, 12 Jun 2023 05:33:27 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.0.4 सिक्किम का गंगटोक नगर – सामान्य पर्यटन बिन्दुओं से परे https://inditales.com/hindi/gangtok-sikkim-nagar-bhraman/ https://inditales.com/hindi/gangtok-sikkim-nagar-bhraman/#comments Wed, 05 Jul 2023 02:30:27 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3100

भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में स्थित एक छोटे से राज्य सिक्किम की राजधानी है, गंगटोक। हिमालय पर्वत माला के अंतर्गत कंचनजंगा पर्वत श्रंखला की तलहटी पर बसा गंगटोक नगर एक सुन्दर पर्वतीय पर्यटन स्थल है जो पर्यटकों में अत्यंत लोकप्रिय है। सिक्किम के पूर्व में स्थित नाथुला दर्रा एवं उत्तर में स्थित युमथांग दर्रा, दोनों […]

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भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में स्थित एक छोटे से राज्य सिक्किम की राजधानी है, गंगटोक। हिमालय पर्वत माला के अंतर्गत कंचनजंगा पर्वत श्रंखला की तलहटी पर बसा गंगटोक नगर एक सुन्दर पर्वतीय पर्यटन स्थल है जो पर्यटकों में अत्यंत लोकप्रिय है। सिक्किम के पूर्व में स्थित नाथुला दर्रा एवं उत्तर में स्थित युमथांग दर्रा, दोनों के लिए गंगटोक एक प्रवेशद्वार है।

गंगटोक में गौतम बुद्ध
गंगटोक में गौतम बुद्ध

सन् १८९० में सिक्किम के चोग्याल राजाओं ने सर्वप्रथम गंगटोक को अपनी राजधानी नियुक्त की थी। तब से यह सिक्किम की राजधानी रही है। सिक्किम कोलकाता जैसे भारतीय नगरों एवं नेपाल व भूटान जैसे अन्य देशों के मध्य व्यापार मार्ग रहा है। जब आप पर्वत शिखर पर स्थित रूमटेक मठ जायेंगे तब आप वहाँ से पर्वत की ढलान पर बसे सम्पूर्ण नगर को देख सकते हैं। रात्रि के समय यहाँ से सम्पूर्ण नगर के टिमटिमाते प्रकाश के अप्रतिम दृश्य तो देखते ही बनते हैं।

गंगटोक को आरम्भ में गंग-टो कहा जाता था।

गंगटोक एक छोटा सा नगर है जो पहाड़ी भूभाग पर स्थित है। यहाँ भ्रमण करने के लिए पहाड़ी मार्गों पर चढ़ना-उतरना पड़ता है। किन्तु छोटा नगर होने के कारण शीघ्र ही आप इसके भूगोल से अवगत हो जाते हैं। गंगटोक भ्रमण करने के लिए हम जब भी टैक्सी की सेवायें लेते थे, वे हमें गंगटोक के १० प्रचलित पर्यटन बिन्दुओं पर ले जाने का आग्रह करते थे। हमने उनमें से कई पर्यटक बिन्दुओं का अवलोकन भी किया। किन्तु हमें इस पर्वतीय नगर में पदभ्रमण करने में सर्वाधिक आनंद आया।

गंगटोक नगर का पदभ्रमण

गंगटोक में अनेक ऐसे आयाम हैं जो इसे एक उत्तम निवसन नगर बनाते हैं। जो यहाँ निवास नहीं करते, उन्हें भी भ्रमण हेतु यहाँ आते रहने के लिए बाध्य कर देते हैं। गंगटोक के ऐसे ही विशिष्ट आयामों को आपके साथ साझा कर रही हूँ जिन्हें मैंने अनुभव किया है।

गंगटोक – एक पुष्प नगर

गंगटोक में आप जहाँ भी जायेंगे, स्वयं को रंगबिरंगे पुष्पों से घिरा हुआ पायेंगे। मैं उन वनीय पुष्पों के विषय में नहीं कह रही हूँ जो पहाड़ों की ढलान पर प्रस्फुटित हैं। ये ऐसे पुष्प हैं जिनके पौधों की यहाँ के निवासियों ने बड़े जतन से बागवानी की है। प्रत्येक निवास परिसर के भीतर रंगबिरंगे पुष्पों के पौधे हैं। कुछ भूमि पर तो कुछ गमलों में। कहीं लटकते हुए गमलों में पुष्पों से भरे पौधे घरों की सुन्दरता बढ़ा रहे हैं तो कहीं परिसर की भित्तियों पर चढ़ाई गयी बेलों पर खिले पुष्प पथिकों को आनंदित करते हैं। मार्गों पर पदभ्रमण करते हुए आप जहाँ भी देखें, रंगबिरंगे पुष्प आपका मन मोह लेंगे। यहाँ का वातावरण भी उनके लिए सुयोग्य है।

गुलाबी आर्किड
गुलाबी आर्किड

नगर के मध्य में एक पुष्प प्रदर्शनी है जिसमें इस क्षेत्र के भिन्न भिन्न पुष्पों एवं पौधों की प्रदर्शनी वर्ष भर लगी रहती है।

हरा आर्किड
हरा आर्किड

हमने भी इस पुष्प प्रदर्शनी का आनंद लिया। विशेष रूप से भिन्न भिन्न प्रकार के ऑर्किड पुष्पों ने हमारा मन मोह लिया था। विशेषतः हरे रंग के ऑर्किड ने हमें आश्चर्यचकित कर दिया था।

हर तरफ फूल - गंगटोक
हर तरफ फूल – गंगटोक

गंगटोक के पुष्पीय आयाम का चरम बिंदु है, नगर की भित्तियों की सतह पर लटकती थैलियाँ जिनमें मिट्टी भर कर पौधे उगाये गए हैं। इन पौधे से प्रस्फुटित पुष्प सम्पूर्ण भित्तियों को रंगबिरंगा बना देते हैं। एक नगर को सुन्दर बनाने का यह कितना साधारण, कम लागत का, आसान तथा प्राकृतिक साधन है। देश के अन्य नगरों में भी ऐसे उपक्रम होने चाहिए।

जहाँ जहाँ किंचित मात्रा में भी मिट्टी हो, उनमें से छोटे छोटे रंगबिरंगे पुष्प झांकने लगते हैं। यह उनकी उत्तरजीविता कौशल नहीं है तो क्या है!

और पढ़ें – नामची सिक्किम में सोलोफोक पहाड़ी पर चारधाम

गंगटोक नगर के पदभ्रमण मार्ग

गंगटोक के प्रत्येक वाहन मार्ग के साथ एक पदभ्रमण मार्ग संलग्न है जहाँ पादचारी सड़कों पर दौड़ते वाहनों से निर्लिप्त मुक्तता से चल सकते हैं। सर्वप्रथम घाटी की ओर स्थित पदभ्रमण मार्गों ने मेरा लक्ष भेदा। वे कभी मार्ग के ही स्तर पर होते हैं तो कभी घाटी की ओर लटकते चबूतरे सी संरचना पर होते हैं। किन्तु कुछ क्षणों पश्चात मैंने सड़कों के इस ओर भी पदभ्रमण मार्गों को देखा। पादचारियों के ये मार्ग कभी ऊपर कभी नीचे जाते हैं लेकिन उनके लिए अखंड मार्ग उपलब्ध कराते हैं।

गंगटोक के पद्भ्रमण पथ
गंगटोक के पद्भ्रमण पथ

नामग्याल तिब्बत अध्ययन संस्थान के दर्शन के पश्चात हम इन पदभ्रमण मार्गों द्वारा गंगटोक नगर में भ्रमण करने लगे। हमने एक सुन्दर हवाई मार्ग भी देखा जो व्यस्त वाहन मार्गों के ऊपर से जाता है।

सड़क किनारे पैदल पथ
सड़क किनारे पैदल पथ

मुझे पैदल चलना अत्यंत प्रिय है। मेरा मानना है कि हमारे सभी नगरों में पैदल चलने वालों के लिए समर्पित पदभ्रमण मार्ग उपलब्ध होने ही चाहिए। मुझे सिक्किम में यह देख अत्यंत प्रसन्नता हुई कि एक पहाड़ी नगर के सीमित भूभाग में कुशल आधारभूत संरचना का विकास कार्य इस प्रकार किया गया है कि पादचारी चाहें तो सम्पूर्ण नगर को पैदल चलते हुए पार कर सकते हैं।

इन पदभ्रमण मार्गों की एक अद्वितीय विशेषता यह है कि उन पर चलते हुए हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं का अप्रतिम परिदृश्य दृष्टिगोचर होता रहता है। यहाँ-वहाँ स्थित कुछ रंगबिरंगे भवन उन परिदृश्यों की सुन्दरता को दुगुना कर देते हैं।

और पढ़ें – गंगटोक सिक्किम की राजधानी के सर्वोत्तम दर्शनीय स्थल

वाहन मुक्त एम जी मार्ग

भारत के लगभग सभी नगरों में एक मार्ग अवश्य होता है जिसका नाम महात्मा गाँधी मार्ग रखा जाता है। गंगटोक में भी एक मार्ग का नाम महात्मा गाँधी मार्ग है। इस मार्ग पर महात्मा गाँधी की एक प्रतिमा स्थापित है जो गंगटोक में आपका स्वागत करती प्रतीत होती है। इस मार्ग की एक विशेषता है कि यह एक वाहन मुक्त मार्ग है।

एम् गी मार्ग गंगटोक
एम् गी मार्ग गंगटोक

इस मार्ग पर भिन्न भिन्न प्रकार की दुकानें, जलपान गृह, कैफे तथा विश्राम गृह हैं। पर्यटकों के साथ साथ स्थानीय लोग भी इस वाहन मुक्त मार्ग पर उन्मुक्त होकर पैदल चलने का आनंद उठाते हैं। बच्चे बिना किसी भय के यहाँ-वहाँ दौड़ते व क्रीड़ा करते हुए अपने बालपन का आनंद उठाते दिख जाते हैं। मार्ग के मध्य में बैठने की पर्याप्त सुविधाएं प्रदान की गयी हैं जहाँ बैठकर आप तनिक विश्राम कर सकते हैं, आसपास के प्रफुल्लित वातावरण का आनंद उठा सकते हैं अथवा आपस में बतिया सकते हैं।

उफात क्रय करने की दुकानें
उफात क्रय करने की दुकानें

गंगटोक नगर का मुख्य मार्ग हो तथा पुष्पों का उल्लेख ना हो, ऐसा कैसे हो सकता है? मार्ग के बीचों-बीच एक पंक्ति में बिजली के खम्बे हैं जिन पर सुन्दर आवरणों के भीतर बिजली के लट्टू लटके हुए हैं। इस पंक्ति के दोनों ओर बैठने की सुविधाएं दी गयी हैं। इन्ही खम्बों से पौधों के गमले भी लटके हुए हैं जिनमें सुन्दर पुष्प खिले रहते हैं।

इस मार्ग में उत्तम कैफे हैं, नारायण दास मिष्टान्न भण्डार जैसे स्वादिष्ट चाट की दुकानें हैं तथा रंगबिरंगे स्मृति चिन्हों की दुकानें हैं। इस मार्ग पर स्थित विविधताओं ने ही मुझे सिक्किम के स्मृति चिन्हों पर आधारित संस्मरण लिखने की प्रेरणा दी थी।

भित्ति-चित्रण कला अथवा ग्राफिती

गंगटोक नगर में अनेक भित्तियों पर ग्राफिटी अथवा आधुनिक भित्ति चित्र हैं। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसी आधुनिक भित्ति चित्रण कला सम्पूर्ण भारत में प्रचलित होती जा रही है। मेरा मानना है कि प्रत्येक नगर का स्वयं का एक वैशिष्ट्य होता है, एक इतिहास होता है, स्वयं का एक ताना-बाना होता है जो उसे एक पृथक परिचय देता है। इसलिए प्रत्येक नगर में भित्ति चित्रण कला का प्रदर्शन करते हुए उसके इसी ताने-बाने को प्रदर्शित करना चाहिए, ना कि एक दूसरे का अँधा अनुसरण करना चाहिए। इसके अतिरिक्त अखिल भारत का वैशिष्ट्य भी प्रदर्शित किया जा सकता है।

गंगटोक की सड़कों पे चित्रकारी
गंगटोक की सड़कों पे चित्रकारी

मुझे प्रसन्नता है कि गंगटोक में भित्तिचित्रों पर यहाँ की संस्कृति व परंपरा दृष्टिगोचर होती है। मैंने इन भित्तियों पर अधिकांशतः बुद्ध तथा कमल पुष्प जैसे बौद्ध चिन्हों का चित्रण देखा।

महात्मा गाँधी मार्ग के अंत में बुद्ध का एक विशाल भित्तिचित्र है।

और पढ़ें – पश्चिमी सिक्किम में पेलिङ्ग के पर्यटक स्थल – मठ, झरने, झील

यहाँ आकर मुझे यह ज्ञात हुआ है कि गंगटोक में दिसंबर मास में एक वार्षिक शीत उत्सव आयोजित किया जाता है जिसे विंटर कार्निवल कहते हैं। इस उत्सव के लिए भिन्न भिन्न कलाकार यहाँ आते हैं तथा भित्तियों पर रंगबिरंगे भित्ति चित्र रंगते हैं।

रचना पुस्तक कैफे

इसके विषय में मुझे पूर्व जानकारी नहीं थी। यह मेरे लिए एक रोचक खोज थी। मेरी इस खोज ने मुझे अत्यंत आनंदित भी किया। यद्यपि मेरी एक सखी ने मुझसे गंगटोक के किसी पुस्तक कैफे अथवा बुक कैफे के विषय में उल्लेख अवश्य किया था तथापि उसे उसका नाम व स्थान स्मरण नहीं था। मेरा भाग्य देखिये, गंगटोक में अचानक ही मेरी भेंट एक अन्य मित्र से हुई जिसे इस कैफे के विषय में जानकारी थी। उसने हमें इस रचना पुस्तक कैफे तक पहुँचाया।

रचना बुक कैफ़े - गंगटोक
रचना बुक कैफ़े – गंगटोक

यह एक छोटा सा कैफे है जिसके प्रथम तल पर पुस्तकों की एक सुन्दर दुकान है। इस दुकान में अनुपम भीतरी साज-सज्जा थी। एक हाथ में कॉफी तथा एक हाथ में पुस्तक लिए आप जीवन का आनंद उठा सकते हैं।

हमने इस दुकान में स्वामी श्री रमन से लम्बी चर्चा भी की। उन्होंने हमें बताया कि यह दुकान उनकी पैतृक संपत्ति है। वे इसे समय व काल के अनुसार ढालने का प्रयास कर रहे हैं। गंगटोक की सांस्कृतिक धरोहर एवं आधुनिक शैलियों के मध्य सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। इसके लिए वे भिन्न भिन्न शैलियों के रचनात्मक महानुभावों को रचना कैफे में आमंत्रित करते रहते हैं। वे एक ऐसा माध्यम बनाने का प्रयास कर रहे हैं जहाँ सिक्किम मूल के लेखकों एवं कलाकारों को विश्व के अन्य भागों के रचनात्मक मान्यवरों से कला विनिमय का अवसर प्राप्त हो सके। यहाँ प्रदर्शन कला शैलियों को भी एक मंच प्रदान किया जाता है।

रचना पुस्तक कैफे से लगा हुआ एक होमस्टे है जहाँ आप ठहर सकते हैं। यह पुस्तक प्रेमियों के लिए एक वरदान है। इसका अर्थ है कि वे इस पर्वतीय नगर में पुस्तक एवं कैफे का आनंद लेते हुए सम्पूर्ण अवकाश आनंद से व्यतीत कर सकते हैं। यदि आप मेरे जैसे पुस्तक प्रेमी हैं तो अपने आगामी गंगटोक यात्रा में रचना पुस्तक कैफे अवश्य जाएँ।

कंचनजंगा का विहंगम दृश्य

यदि आप कंचनजंगा का विहंगम दृश्य देखना चाहते हैं तो किसी निर्मल स्वच्छ वातावरण के दिन आप सिक्किम जाएँ। अन्यथा कंचनजंगा के दृश्यों से वंचित रहने के लिए तत्पर रहें।

कंचनजंगा का दृश्य
कंचनजंगा का दृश्य

यदि किसी कारणवश आपको कंचनजंगा पर्वत श्रंखला के दृश्य ना दिखें तो निराश ना होयें। आप अन्य शिखरों एवं घाटियों का अवलोकन कर सकते हैं। आप कुछ ऐसे अद्भुत दृश्य देखेंगे जो कंचनजंगा की विहंगम उपस्थिति में देखना असंभव हो जाता है। कंचनजंगा आपको ऐसे अभिभूत कर देती है कि आप आसपास के अन्य अद्भुत दृश्यों को देखना भूल जाते हैं।

किसी भी नगर को देखने एवं जानने का सर्वोत्तम साधन है, पदभ्रमण। शान्ति से पैदल चलते हुए आप नगर के सभी आयामों का आनंद ले सकते हैं।

क्या आप चाहते हैं कि मैं गंगटोक के १० लोकप्रिय पर्यटन बिन्दुओं के विषय में भी लिखूं?

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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गंगटोक भारत के उत्तर-पूर्वी हिमालायी राज्य सिक्किम की राजधानी है। सिक्किम एक छोटा किन्तु अत्यंत मनोरम राज्य है। इस सुंदर राज्य में अनेक नयनाभिराम दर्शनीय स्थल हैं। गंगटोक एक शहरी क्षेत्र है। यह सड़क मार्ग द्वारा बागडोगरा विमानतल से जुड़े होने के कारण पर्यटकों का मनपसंद पर्यटन स्थल है। यहाँ के दर्शनीय स्थल मनोरम तो […]

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गंगटोक भारत के उत्तर-पूर्वी हिमालायी राज्य सिक्किम की राजधानी है। सिक्किम एक छोटा किन्तु अत्यंत मनोरम राज्य है। इस सुंदर राज्य में अनेक नयनाभिराम दर्शनीय स्थल हैं। गंगटोक एक शहरी क्षेत्र है। यह सड़क मार्ग द्वारा बागडोगरा विमानतल से जुड़े होने के कारण पर्यटकों का मनपसंद पर्यटन स्थल है। यहाँ के दर्शनीय स्थल मनोरम तो हैं ही, साथ ही विविध प्रकार के हैं। पुष्प-प्रदर्शन, बौद्ध मठ, हिमालय प्राणी उद्यान, तिब्बत अध्ययन संस्था, जलप्रपात, चहल-पहल से भरा महात्मा गांधी मार्ग जैसे विभिन्न प्रकार के आकर्षण यहाँ आपको तृप्त कर देंगें।

गंगटोक नगर के दर्शनीय स्थल

हिमालय की कंचनजंगा चोटी
हिमालय की कंचनजंगा चोटी

मेरे इस संस्करण का उद्देश्य है सिक्किम की राजधानी गंगटोक की यात्रा में सम्मिलित किये जा सकते कुछ लोकप्रिय दर्शनीय स्थलों के विषय में आप सब को अवगत कराना। इनमें कुछ स्थल गंगटोक नगरी के भीतर हैं तथा कुछ नगर के आसपास हैं जहां आप एक दिवसीय यात्रा के रूप में गाड़ी से जा सकते हैं। वहीं दूर दूर के स्थल आप नगर के आयोजित पर्यटन के द्वारा कर सकते हैं।

गंगटोक नगरी की पुष्प प्रदर्शनी

आर्किड - गंगटोक की पुष्प पर्दर्शनी
आर्किड – गंगटोक की पुष्प पर्दर्शनी

गंगटोक की सम्पूर्ण नगरी, वहाँ के निवासस्थान तथा सड़कें सभी सुंदर पुष्पों के पौधों से भरे हुए हैं। कुछ को धरती पर उगाया हुआ था वहीं कुछ गमले में आश्रय लिए हुए थे। यहाँ का वातावरण बागवानी के लिए अति उत्तम प्रतीत होता है। गंगटोक नगरी के मध्य में ही पुष्प प्रदर्शनी का आयोजन किया जाता है। रंगबिरंगे एवं भिन्न भिन्न प्रकार के पुष्पों को देखने के अवसर का लाभ आप अवश्य उठायें। यहाँ आप पुष्पों के ऐसे ऐसे प्रकार देखेंगे जो आपने जीवन में कभी नहीं देखे होंगे। ओर्किड के ही प्रकार देखकर आप दंग रह जाएंगे। सबसे अच्छी बात यह है कि यहाँ चित्रिकरण एवं छायाचित्रिकरण पर कोई पाबंदी नहीं है। प्रवेश शुल्क भी केवल नाममात्र है।

महात्मा गांधी मार्ग

गंगटोक का महात्मा गाँधी मार्ग
गंगटोक का महात्मा गाँधी मार्ग

नगर के केंद्र में महात्मा गांधी मार्ग अथवा एम जी मार्ग है जहां चहल कदमी करते हुए आप नगर की चहल पहल का आनंद उठा सकते हैं। यदि आकाश स्वच्छ हो तो आप हिमालय की कंचनजंगा चोटी भी देख सकते हैं।

इस मार्ग पर गाड़ियां चलाना प्रतिबंधित है। आप बिना किसी परेशानी के यहाँ पैदल चल सकते हैं। मार्ग के दोनों ओर खाने-पीने की कई दुकानें, स्मारिकाओं की दुकानें तथा कई अन्य दुकानें हैं। साथ चलते लोग इस सैर को और भी उल्हासित बना देते हैं।

नामग्याल तिब्‍बतशास्‍त्र संस्‍थान

नामग्याल तिब्‍बत शास्‍त्र संस्‍थान
नामग्याल तिब्‍बत शास्‍त्र संस्‍थान

नामग्याल तिब्‍बतशास्‍त्र संस्‍थान तिब्बती संग्रहालय है जो तिब्‍बती सभ्‍यता,  धर्म, भाषा, कला व संस्कृति तथा इतिहास से संबंधित शोध कार्यों को बढ़ावा देता है एवं प्रायोजन करता है। संस्‍थान में थांग्का चित्रकारी, बौद्ध प्रार्थना की वस्तुएँ, बौद्ध धर्म से संबंधित वस्तुएँ, तिब्बती और संस्कृत में पांडुलिपियां इत्यादि के कई मौलिक व दुर्लभ संग्रह हैं।

दो द्रुल चोर्टेन स्तूप

गंगटोक के बौद्ध मठ के प्रार्थना चक्र
गंगटोक के बौद्ध मठ के प्रार्थना चक्र

दो द्रुल चोर्टेन स्तूप नामग्याल तिब्‍बतशास्‍त्र संस्‍थान के समीप स्थित है। मेरे अनुमान से यह स्तूप सिक्किम का विशालतम स्तूप है। इसके शिखर पर स्वर्ण पत्रों का आवरण है। चोर्टेन ल्हाखाँग एवं गुरु ल्हाखाँग दो द्रुल चोर्टेन को घेरे हुए हैं। दो द्रुल चोर्टेन के दर्शन कीजिए एवं प्रार्थना चक्रों को घूमाते हुए अपनी इष्ट इच्छा प्रकट कीजिए।

गंगटोक के आसपास दर्शनीय स्थल

गंगटोक नगर एक पर्वत की ढलान पर बसा हुआ है। इसके आसपास का क्षेत्र तथा पहाड़ियाँ अनेक आकर्षक दर्शनीय स्थलों से भरा हुआ है। इन पर्यटन स्थलों के अवलोकन के लिए आपको गाड़ी की आवश्यकता पड़ेगी। सार्वजनिक परिवहन सुविधाजनक नहीं है। गंगटोक नगर के आसपास के कुछ मनमोहक दर्शनीय स्थल आपको बताना चाहती हूँ।

बकथंग झरना

बकथंग झरना
बकथंग झरना

बनझाखरी  झरने की ओर जाते मार्ग में स्थित यह एक छोटा झरना है। गंगटोक से लगभग ३ से ४ किलोमीटर दूर स्थित यह झरना मुख्य मार्ग पर ही है। यहाँ पर कुछ रोमांचक क्रीड़ाओं का भी आयोजन किया जाता है, जैसे रस्सी पर चढ़ना, रैपलिंग इत्यादि। पर्यटक सिक्किम की पारंपरिक वेशभूषा में सज्ज होकर अपने छायाचित्र भी ले सकते हैं।

पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण यहाँ से चारों ओर का परिदृश्य अत्यंत मनोहारी होता है। आवश्यक है कि आकाश स्वच्छ हो। स्थानीय भाषा में ‘बक’ का अर्थ है वन अथवा जंगल तथा ‘थंग’ का अर्थ है मैदान। इस झरने के प्राकृतिक जल स्त्रोत का उद्गम इस स्थान के ऊपर स्थित घने जंगल में स्थित है। वन विभाग इस वनीय क्षेत्र को स्मृति बन के नाम से संरक्षित करता है। भंजकरी झरने की ओर जाते समय आप १५-२० मिनट यहाँ ठहर कर प्रकृति का आनंद ले सकते हैं।

बकथंग झरने का विडिओ  

बकथंग झरने पर बना यह विडिओ अवश्य देखिए। सर्वोत्तम दर्शन के लिए एच डी मोड का प्रयोग करें।

बनझाकड़ी झरना

इस झरने को बनझाकड़ी अथवा बन झकरी झरना भी कहते हैं। बनझाकड़ी झरना चिरस्थायी अर्थात बारहमासी झरना है। ऊंचाई पर स्थित जल स्त्रोत से निकली जलधारा विभिन्न चरणों में शिलाओं पर गिरती, उछलती तथा अठखेलियाँ करती हुई नीचे आती है। इस झरने की ऊंचाई लगभग १०० फीट है। झरने की प्रथम सीधी झड़न लगभग ४० से ५० फीट ऊंची है। यह झरना नगर से लगभग ७ किलोमीटर की दूरी पर स्थित लॅंडस्केप उद्यान में है।

बनझाकड़ी झरना
बनझाकड़ी झरना

झरने के आसपास उद्यान है जो अत्यंत सुंदरता एवं कलात्मकता से बनाया गया है। अनेक प्रकार की प्रतिमाएं एवं कलाकृतियाँ इस उद्यान की शोभा तो बढ़ा ही रहे हैं, साथ ही झाकरी संस्कृति की सुंदर परिकल्पना भी प्रस्तुत करते हैं। ये प्रतिमाएं सिक्किम के पारंपरिक अनुष्ठान, उपचारात्मक संस्कार तथा शमन अर्थात जीववादी धर्म में प्रवेश पद्धति की जानकारी भी प्रदान करते हैं।

बन का अर्थ है वन तथा झाकडी का शाब्दिक अर्थ है पारंपरिक चिकित्सक। बन झाकडी एक पौराणिक पात्र है जिसका अस्तित्व सिक्किम के नेपाली समुदाय की दंतकथाओं में ही देखा गया है।

बनझाकड़ी झरने का विडिओ

बनझाकड़ी झरने का यह विडिओ हमने हमारी यहाँ की यात्रा के समय बनाया था। झरने का प्रत्यक्ष आनंद लेने के लिए इसे अवश्य देखिए। सर्वोत्तम दर्शन के लिए एच डी मोड का प्रयोग कर यूट्यूब चैनल पर देखें।

हिमालयी वन्यजीव उद्यान

हिमालयी प्राणी उद्यान, गंगटोक नगर के समीप स्थित, हिमालयी पशु-पक्षियों से परिचित होने का उत्तम स्थान है। यहाँ आप हिमालयी क्षेत्रों में पाए जाने वाले वनस्पति, जीव तथा स्थानीय वनीय वृक्षों के विषय में जान सकते हैं।

लाल पांडा - गंगटोक
लाल पांडा – गंगटोक

इस प्राणी उद्यान में हिमालयी वन्यजीवों को बड़े बड़े बाड़ों में रखा गया है। इन बाड़ों को इस प्रकार निर्मित किया गया है कि वे इन प्राणियों को लगभग स्वाभाविक परिवेश उपलब्ध कराते हैं। अन्य दुर्लभ जीवों के साथ साथ हिम तेंदुआ तथा लाल पांडा यहाँ के प्रमुख आकर्षण हैं।

हिमालयी बिल्ली
हिमालयी बिल्ली

इस विशाल, हरियाली से परिपूर्ण तथा दुर्लभ हिमालयी प्रजातियों के संरक्षण केंद्र के दर्शन, वह भी शीतल स्फूर्तिदायक वातावरण में, आपको प्रफुल्लित कर देगी। इसके दर्शन करते आप अपनी इच्छानुसार १ से २ घंटे आसानी से बता सकते हैं। उद्यान में प्रवेश शुल्क भी नाममात्र है।

हमने इस हिमालयी प्राणी उद्यान के पहाड़ी क्षेत्र में सैर करने का भरपूर आनंद उठाया। किसी भी दिन जब आकाश स्वच्छ हो तो आप अनेक प्रकार के पक्षी भी देख सकते हैं। जिस दिन हम यहाँ आए थे उस दिन वर्षा  हो रही थी। अतः हम पक्षी नहीं देख पाए।

रुमटेक बौद्ध मठ

रूमटेक बौद्ध मठ
रूमटेक बौद्ध मठ

विशालतम एवं प्राचीनतम बौद्ध मठों में से एक, रुमटेक बौद्ध मठ गंगटोक से लगभग २० किलोमीटर की दूरी पर है। रुकटेक धर्म चक्र केंद्र के परिसर में अनेक पवित्र वस्तुएं रखी हुई हैं। इनमें सर्वाधिक विशेष एवं भव्य है १३ फीट ऊंचा स्वर्ण स्तूप। इस मठ के परिसर में विकसित बगीचा भी अत्यंत दर्शनीय है।

गंगटोक से एक दिवसीय यात्राएं

चारधाम, नामची

नामची का चार धाम
नामची का चार धाम

पहाड़ी के ऊपर स्थित नामची का चारधाम भारत के पूजनीय चार धामों का प्रतिरूप है। यहाँ के अप्रतिम मंदिरों एवं भगवान शिव की विशाल मूर्ति को निहारते आप २ से ३ घंटे आसानी से व्यतीत कर सकते हैं। यहाँ का वातावरण अत्यंत सुहाना होता है। मेघ एवं सूर्य की किरणें आपस में लुक-छुपी का खेल खेलते हमें मंत्रमुग्ध कर देते हैं।

चारधाम नामची पर हमारा विस्तृत यात्रा संस्मरण पढ़ें।

टेमी चाय के बागान

टेमी चाय के बागान
टेमी चाय के बागान

टेमी चाय के बागान सिक्किम का विशालतम चाय बागान है। यह बागान गंगटोक से नामची की ओर जाते मार्ग पर है। मेघों के मध्य से झाँकते चाय के हरे भरे विस्तृत बागानों का परिदृश्य आपको मंत्रमुग्ध कर देगी। इनके बीच से जाते घुमावदार रास्तों पर गाड़ी से जाना एक पृथक ही अनुभव है। यह आपकी स्मृति एवं आँखों को अपनी सुंदरता से सराबोर कर देगी।

संदरूपत्से पहाड़ी पर रवंगला बौद्ध उद्यान

संदरूपत्से पहाड़ी
संदरूपत्से पहाड़ी

संदरूपत्से पहाड़ी पर १२० फीट ऊंची बौद्ध पद्मसम्भव की प्रतिमा विश्व में उनकी विशालतम प्रतिमा है। बौद्ध तीर्थयात्रियों के लिए यह बौद्ध तीर्थयात्रा केंद्रों में से एक है। गुरु रिनपोचे के नाम से प्रसिद्ध पद्मसम्भव सिक्किम के संरक्षक गुरु हैं। समीप ही एक रॉक गार्डन अर्थात शैलोद्यान भी है।

गंगटोक के समीप दर्शनीय स्थल – रोमांचक यात्राएं

सिक्किम हिमालय की चोटियों से घिरा क्षेत्र है, तो यात्रा में रोमांच भी सम्मिलित होगा ही। वह भी गंगटोक नगरी से अधिक दूर नहीं! ये देखिए कुछ लोकप्रिय विकल्प:

नाथुला दर्रा तथा सोंगमो या चांगू झील

हिमाच्छादित पर्वत और याक
हिमाच्छादित पर्वत और याक

नाथुला दर्रा गंगटोक से लगभग ६० किलोमीटर पूर्व दिशा में है। यहाँ पहुँचने का मार्ग उच्चतम मोटर योग्य मार्गों में से एक है। नाथुला दर्रे के दर्शन के लिए अनुमति पत्र आवश्यक है। साथ ही गंगटोक से नियोजित यात्रा की सुविधा चुनना भी आवश्यक है। यह नियोजित यात्राएं मौसम की स्थिति पर ही निर्धारित होते हैं। यहाँ तक पहुँचने के मार्ग पर सोंगमो या चांगू झील है जो शीत ऋतु में जम जाती है। ठंड से जमी हुई झील, हिमपात तथा यहाँ का परिदृश्य पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण हैं।

सिक्किम के कुछ अन्य आकर्षक दर्शनीय स्थल हैं पूर्वी सिक्किम में गुरुडोंगमार झील, कंचनजंगा जलप्रपात तथा पश्चिमी सिक्किम के पेलिङ्ग में रबडेनत्से अवशेष।

आप जब भी सिक्किम की यात्रा पर आयें तो इनमें से अपनी रुचि के अनुसार दर्शनीय स्थल चुन सकते हैं।

सिक्किम एवं गंगटोक पर मेरे द्वारा प्रकाशित ये यात्रा संस्मरण भी अवश्य पढ़ें।

सिक्किम के १२ सर्वोत्तम स्मारिकाएं खरीदें

गंगटोक नगरी – इसके १० लोकप्रिय दर्शनीय स्थलों के पार

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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बोमडिला से वापसी की उत्साह पूर्ण यात्रा – अरुणाचल प्रदेश https://inditales.com/hindi/bomdila-arunachal-pradesh-things-to-do/ https://inditales.com/hindi/bomdila-arunachal-pradesh-things-to-do/#respond Wed, 20 Mar 2019 02:30:03 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=524

अरुणाचल प्रदेश की यात्रा के दौरान हम बोमडिला और टेंगा घाटी का दौरा कर चुके थे। मेरी पूरी उत्तर पूर्वीय यात्रा की सबसे अप्रतिम बात अगर कोई है तो वह है अरुणाचल प्रदेश की अद्वितीय खूबसूरती तथा वहां के लोगों की सादगी, जो अन्यत्र दुर्लभ है। बोमडिला की सड़क यात्रा – अरुणाचल प्रदेश  बोमडिला शहर   […]

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अरुणाचल प्रदेश का कला संग्रहालय
अरुणाचल प्रदेश का कला संग्रहालय

अरुणाचल प्रदेश की यात्रा के दौरान हम बोमडिला और टेंगा घाटी का दौरा कर चुके थे। मेरी पूरी उत्तर पूर्वीय यात्रा की सबसे अप्रतिम बात अगर कोई है तो वह है अरुणाचल प्रदेश की अद्वितीय खूबसूरती तथा वहां के लोगों की सादगी, जो अन्यत्र दुर्लभ है।

बोमडिला की सड़क यात्रा – अरुणाचल प्रदेश 

बोमडिला शहर     

बोमडिला एक छोटा सा पहाड़ी शहर है, जिसकी प्रसिद्धि का प्रमुख कारण यह है कि यह सुविख्यात तवांग विहार तक जानेवाले रास्ते में पड़ता है। तवांग जानेवाले अधिकतर पर्यटकों को रात के समय या तो बोमडिला में रुकना पड़ता है या फिर दिरांग में, जो बोमडिला से कुछ ही समय की दूरी पर बसा हुआ है। यही बात बोमडिला को एक उत्तम पर्यटन स्थल बनाती है। यहाँ के बाज़ार हमेशा भीड़ से भरे होते हैं और इसके साथ साथ  यहाँ पर देखने योग्य बहुत सी जगहें हैं। रहने के लिए अच्छे होटल भी आपको यहीं मिलेंगे।

बोमडिला के बाज़ार
बोमडिला के बाज़ार

काफी ऊंचाई पर स्थित होने के कारण यह शहर आपको आस-पास की विविध घाटियों के सुंदर नज़ारे प्रदान करता है जिनकी प्रशंसा करते आप नहीं थकते। एक सच्चे पर्यटक की तरह यहां की सड़कों पर चलते समय आपको दोनों तरफ फल और सब्जीवालों के साथ-साथ सूखी मछली बेचनेवाले भी दिखाई देते हैं। इसके अलावा यहां पर छोटी-छोटी दुकाने भी हैं जिनमें प्लास्टिक के रंगबिरंगी जूते बेचे जाते हैं जो बर्फ में चलने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। यहां की महिलाएं झाँसी की रानी की तरह कपड़े से अपने बच्चों को अपनी पीठ से बांधकर अपना दिन भर का काम करती रहती हैं। तथा बुजुर्ग महिलाएं अपनी पारंपरिक वेश-भूषा में एक-दूसरे से गपशप करती हुई नज़र आती हैं।

बोमडिला के विहार    

बोमडिला का बौद्ध विहार
बोमडिला का बौद्ध विहार

बोमडिला में दो विहार हैं, जिनमें से एक हाल ही में बनवाया गया है और दूसरा विहार काफी पुराना है, जो शायद 300 – 400 साल पुराना होगा। यह प्राचीन विहार बोमडिला के मुख्य मार्ग के अंतिम छोर पर बसा हुआ है, जिसे ढूंढ निकालना मुश्किल नहीं है। यह एक छोटा सा विहार है जिसमें आज भी पुरातन काल की सुगंध महकती है। यहां के स्थानीय लोग इस विहार में भगवान की पूजा करने और उनके आश्रय में कुछ शांतिमय समय गुजारने आते हैं। यहां की वास्तुकला किसी भी उत्तम बौद्ध विहार की वास्तुकला के समान है।

सरकारी हस्तकला केंद्र 

बोमडिला में एक सरकारी हस्तकला केंद्र है, जहां पर शिल्पकार परंपरागत तौर-तरीकों के आधार पर स्थानीय कलाकृतियों को आकार देते हुए नज़र आते हैं। इन कलाकृतियों का उत्पादन और बिक्री इसी केंद्र में होती है। यहां पर मुखौटे, घरेलू साज-सज्जा की वस्तुएं, धातु की कलाकृतियाँ जैसी अनेक वस्तुएं बनाई जाती हैं, तथा कपड़ों की बुनाई और कढ़ाई का काम भी किया जाता है। इन सभी वस्तुओं की उत्पादन प्रक्रिया आप स्वयं अपनी आँखों से देख सकते हैं और अगर इनमें से कोई भी कलाकृती आपको पसंद आए तो आप उसे वहीं पर खरीद भी सकते हैं।

सरकारी हस्त-कला केंद्र - बोमडिला, अरुणाचल प्रदेश
सरकारी हस्त-कला केंद्र – बोमडिला, अरुणाचल प्रदेश

यहाँ हमे बताया गया कि इन शिल्पकारों को कलाकृतियों के संबंध में राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान (NIFT) द्वारा काफी सहायता मिलती है। इस संस्थान ने इन शिल्पकारों की पारंपरिक कृतियों और बुनाई के लिए उन्हें बौद्धिक संपदा संरक्षण दिलाने में भी बहुत सहायता की है। इस केंद्र के प्रवेश द्वार पर कुछ पुराने थंगका चित्र हैं, जो आज भी काफी नए से लगते हैं।

बोमडिला का संग्रहालय 

आपको जान कर आश्चर्य होगा की बोमडिला में एक संग्रहालय भी है। यह इस शहर के एकमात्र विद्यालय के पास एक सरकारी पाठशाला में स्थित है। आश्चर्य की बात तो यह है कि इस शहर में किसी को भी इस संग्रहालय के बारे में पता नहीं है। यहां तक कि पास में स्थित विद्यालय के छात्रों को भी इसकी कोई खबर नहीं है। हम जैसे-तैसे कर के आखिर उस संग्रहालय तक पहुँच गए। वहां पर हमारी मुलाकात दो युवतियों से हुई जो इस संग्रहालय का प्रबंधन कार्य देख रही थीं।

ऊंचे पर्वतों से बहती केमांग नदी - अरुणाचल प्रदेश
ऊंचे पर्वतों से बहती केमांग नदी – अरुणाचल प्रदेश

हमे वहां देखकर उन दोनों ने कुछ अचम्बित से स्वर में पूछा कि हम वहां क्या देखना चाहते हैं? इस पर हमने जवाब दिया कि यहां पर जो भी प्रदर्शित है हम वह सब कुछ देखना चाहते हैं। वे शायद हमारी बात नहीं समझे और थोड़ी हिचकिचाहट के साथ उन्होंने हमे संग्रहालय के दर्शन करने की इजाज़त दे दी, लेकिन हमे वहां पर प्रदर्शित वस्तुओं की तस्वीरें खींचने से मना किया। हमने पूरे संग्रहालय की सैर तो कर ली लेकिन वहां के अधिकतर प्रदर्शन कक्ष बंद थे। जब हमने उन युवतियों से इन कक्षों के बारे में पूछा और उनसे इन कक्षों को खोलने का अनुरोध किया तो उन्होंने बताया कि जिस आदमी के पास इन कमरों की चाबियाँ हैं वे बाहर गए हुए है और अगर हमे उन कमरों के दर्शन करने हैं, तो हमे एक घंटे तक इंतज़ार करना पड़ेगा।

और पढ़िए – अरुणाचल की टेंगा घाटी की सैर

थोड़ी देर बाद हमे वहां पर एक पुस्तक विक्रयपटल दिखा जहां से हमने कुछ किताबें खरीदी। इससे शायद उन युवतियों को लगा होगा कि हमे सच में इस संग्रहालय के प्रती दिलचस्पी है और उन्होंने हमारे लिए संग्रहालय के सभी कक्ष खोल दिये। उनमें से एक युवती हमारे साथ आयी और उसने हमे बहुत सी वस्तुओं के विस्तृत विवरण दिये। पर वास्तव में वह समझ नहीं पा रही थी कि इन वस्तुओं में ऐसी क्या खास बात है कि कोई उन्हें देखने के लिए समय भी निकाल सकता है।

मैंने उसे समझाया कि ये सारी चीजें हमारे लिए नयी हैं, क्योंकि, हमारे यहां ऐसी वस्तुओं का प्रयोग नहीं किया जाता। इसीलिए हम स्थानीय संस्कृति को समझने के लिए इन वस्तुओं के बारे में जानना चाहते हैं। उसके हाव-भाव से लग रहा था जैसे उसे हमारी बातों पर विश्वास नहीं है। लेकिन बाद में उसने हमे बहुत सी वस्तुओं के बारे में विस्तार से समझाया और यह भी बताया कि ये वस्तुएं किस जनजाति की हैं और उनकी जाति में इन अनुष्ठानिक वस्तुओं का क्या महत्व है। इस छोटी सी बातचीत से मुझे बहुत मजा आया। इससे हम दोनों एक दूसरे को थोड़ा बहुत तो जान पाये थे।

नाग मंदिर 

बोमडिला से वापसी के समय हम रास्ते में मिलने वाले नाग मंदिर, जो बोमडिला और भालुकपोंग के बीच में बसा हुआ है, के दर्शन करने के लिए रुके। इस क्षेत्र में वैसे तो बहुत सारे नाग मंदिर हैं, जो यहां पर रहनेवाले नाग पंथियों की ओर संकेत करते हैं। लेकिन यह नाग मंदिर मुख्य सड़क पर बसा होने के कारण हमने इसी के दर्शन करना उचित समझा। इस मंदिर के पास से एक नदी भी बहती है। अरुणाचल की अन्य सभी बातों की तरह यह मंदिर भी बहुत ही साधारण सा है। इस मंदिर तक पहुँचने के लिए आपको सीढ़ियों से जाना पड़ता है। काफी ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर की खिड़कियों से आपको पहाड़ियों से घिरी इस घाटी का सुंदर नज़ारा देखने को मिलता है, जिसके बीच में से बहती हुई नदी इसे और भी आकर्षक बनाती है।

नाग मंदिर - बोमडिला के रास्ते पे - अरुंचल प्रदेश
नाग मंदिर – बोमडिला के रास्ते पे – अरुंचल प्रदेश

इस नाग मंदिर के ठीक सामनेवाली पहाड़ी पर मधुमक्खियों का शहर बसा हुआ है। वहां पर मधुमक्खियों के हजारों छत्ते बने हुए हैं। उस पहाड़ी पर जितनी भी खुली जगहें हैं, उन सभी भागों में सिर्फ इन मधुमक्खियों के छत्ते ही नज़र आते हैं। अगर किसी व्यक्ति ने हमे इसके बारे न बताया होता और यहां पर रुककर उस सुंदर से दृश्य को देखने के लिए नहीं कहा होता, तो शायद हम यह अप्रतिम नज़ारा कभी नहीं देख पाते। मैं अभी भी इसी सोच में हूँ कि न जाने ये लोग इतनी ऊंची और लगभग सीधी खड़ी पहाड़ी पर बसे उन छत्तों से सारा का सारा शहद कैसे इकट्ठा करते होंगे।

रास्ते पर छाया हुआ घना कोहरा और बादल    

नाग मंदिर और भालुकपोंग के बीच एक जगह है जो वहां पर छाए घने कोहरे के लिए काफी प्रसिद्ध है। ये पहाड़ हमेशा बादलों की फौज से घिरे रहते हैं जिसके कारण रास्ते भर आपकी मुलाकात इन बादलों से होती रहती है। कभी-कभी ये बादल इतने घने होते हैं कि आपके लिए आगे आनेवाले मोड या फिर गाडियाँ ठीक से देख पाना बहुत मुश्किल हो जाता है। इस घने कोहरे से गुजरते हुए जाना उत्तेजकपूर्ण तो था ही लेकिन साथ में बहुत डरावना भी था।

अरुणाचल की छोटी छोटी दुकानें
अरुणाचल की छोटी छोटी दुकानें

अरुणाचल की यात्राएं ऐसी ही हैं, जो असुविधाजनक तो होती हैं लेकिन साथ ही साथ बहुत खूबसूरत और रोमांचक भी होती हैं। यहां पर पूरे रास्ते में आपको छोटी-छोटी दुकाने मिलती हैं, जो लकड़ी की दीवारों में बने छोटे-छोटे छेदों की तरह लगती हैं। और इनमें चित्रात्मक ढंग से बैठे हुए दुकानदार इनकी शोभा और भी बढ़ाते हैं।

यह पूरी यात्रा हमारे लिए एक बहुत ही उत्साहपूर्ण अनुभव था। हमने प्यारी-प्यारी यादों और यहां पर वापस आकर बाकी बचे स्थानों की यात्रा करने की आशा के साथ अरुणाचल से विदा ली।

अरुणाचल प्रदेश के बारे में कोई भी जानकारी प्राप्त करने के लिए, उससे संबंधित आधिकारिक वेबपेज को जरूर पढिए।

मैं सांग की बहुत आभारी हूँ, जिन्होंने हमारी अरुणाचल की इस यात्रा को इतना यादगार बनाया।

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माजुली, असम – ब्रह्मपुत्र नदी में स्थित विश्व का सबसे बड़ा नदी द्वीप https://inditales.com/hindi/majuli-island-brahmaputra-assam/ https://inditales.com/hindi/majuli-island-brahmaputra-assam/#comments Wed, 04 Jul 2018 02:30:52 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=612

माजुली विश्व का सबसे बड़ा नदी द्वीप है, जो चारों तरफ से महानदी ब्रह्मपुत्र से घिरा हुआ है। नदी के मध्य में बसा हुआ यह द्वीप बहुत ही रोचक है। लेकिन चिंता की बात यह है कि, माजुली का यह नदी द्वीप बड़ी ही तेज़ गति से सिकुड़ता जा रहा है और हो सकता है […]

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माजुली विश्व का सबसे बड़ा नदी द्वीप है, जो चारों तरफ से महानदी ब्रह्मपुत्र से घिरा हुआ है। नदी के मध्य में बसा हुआ यह द्वीप बहुत ही रोचक है। लेकिन चिंता की बात यह है कि, माजुली का यह नदी द्वीप बड़ी ही तेज़ गति से सिकुड़ता जा रहा है और हो सकता है कि गुजरते समय के साथ वह पूरी तरह से लुप्त हो जाए।

माजुली – ब्रह्मपुत्र में स्थित विश्व का विशालतम नदी द्वीप 

ब्रह्मपुत्र नदी पे एक पारंपरिक नाव - माजुली
ब्रह्मपुत्र नदी पे एक पारंपरिक नाव – माजुली

यहां तक कि इस द्वीप पर किए गए कुछ सर्वेक्षणों द्वारा यह अनुमानित किया गया है कि, यह द्वीप कम से कम 15-20 सालों तक ही विद्यमान है। 150 साल पहले इस द्वीप का क्षेत्रफल 1250 वर्ग कि.मी. हुआ करता परंतु अब इसका क्षेत्रफल केवल 450 वर्ग कि.मी. ही रह गया है। लगातार होते भूकटाव और हर साल वर्षा ऋतु के दौरान बाढ़ में जलमग्न होने के कारण यह द्वीप निरंतर रूप से अपना आकार बदलता रहता है। इन प्रकृतिक बदलावों के अनुसार अपने आप को ढालने के लिए इस द्वीप के वासियों को अपने दैनिक जीवन में अनेक परिवर्तन लाने पड़ते हैं। जैसा कि हमे किसी ने बताया, आप कभी भी माजुली का पक्का नक्शा नहीं बना सकते, क्योंकि, जब तक वह तैयार होकर छपेगा तब तक यह द्वीप अपना आकार बदल चुका होगा।

माजुली तक जाने का एक मात्र रास्ता – फेरी

मोटर बोट या फेरी - माजुली जाने का एकमात्र साधन
मोटर बोट या फेरी – माजुली जाने का एकमात्र साधन

माजुली केवल पानी से घिरे होने के कारण एक द्वीप नहीं कहलता, बल्कि ऐसी बहुत सी बातें हैं जो वास्तव में उसे एक द्वीप बनाती हैं और इन्हीं में से एक है यातायात के साधन। माजुली तक पहुँचने का एकमात्र रास्ता है फेरी, जो पीढ़ियों से इस द्वीप को बाहरी दुनिया से जोड़े हुए है। लोगों का भी यही कहना है कि जहां तक उन्हें याद है वे इस फेरी के अलावा अन्य किसी भी मार्ग के बारे में नहीं जानते।

यहां पर जोरहाट, जो यहां का नजदीकी शहर है, के निमाती घाट से दिन में 5 बार एक फेरी आती है। यह फेरी मौसम के अनुसार 60-90 मिनट के बीच लोगों को माजुली ले जाती है और फिर उतनी ही बार वापस आती है। लेकिन लौटते समय नदी की धारा के विरुद्ध चलने के कारण उसे दुगना समय लगता है। नदी में पानी के उतार-चढ़ाव और उसके प्रवाह के अनुसार दोनों तरफ के फेरी सथानक अपने स्थान बदलते रहते हैं। आम तौर पर इन फेरी स्टेशनों का स्थान साल में 6-7 बार तो बदलता ही है। इस द्वीप पर सबकुछ इसी फेरी के माध्यम से आता है, चाहे वह वाहन का ईंधन हो या खान-पान की वस्तुएं।

ये फेरी लोगों के साथ-साथ वाहनों को भी एक ओर से दूसरी ओर ले जाती है, जिनमें से अधिकतर मोटरसाइकिले होती हैं, लेकिन इसके अलावा कभी-कभी कुछ गाडियाँ भी होती हैं जो यहां पर आनेवाले पर्यटक अपने साथ लाते हैं। इस द्वीप पर आवश्यक चिकित्सक सुविधाओं की अनुपलब्धि का प्रमुख कारण भी सीमित यातायात के साधन ही हैं। जिसके चलते लोगों को बहुत सी मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। कभी-कभी तो मरीजों को जोरहाट पहुँचने के लिए, जो माजुली से लगभग 3 घंटे की दूरी पर बसा हुआ है, अगली फेरी के आने तक का इंतजार करना पड़ता है। कई बार तो ये मरीज इतने लंबे इंतजार की परिस्थिति में भी नहीं होते।

मालूम होता है कि असम की सरकार इस द्वीप को मुख्य भूभाग से जोड़ने हेतु यहां पर एक पुल का निर्माण करना चाहते हैं, लेकिन द्विपवासी शायद इस प्रस्ताव से ज्यादा खुश नहीं हैं। एक पर्यटक की हैसियत से मुझे तो लगता है कि, सड़क के निर्माण से शायद इस द्वीप की शांतता भंग होने में ज्यादा देर नहीं लगेगी।

द्वीप का जीवन – बारिश और नदी    

मछली पकड़ने के जाल - माजुली
मछली पकड़ने के जाल – माजुली

इस द्वीप पर बसनेवाले लोगों का जीवन पूर्ण रूप से बारिश और चारों तरफ से बहनेवाली नदी के प्रवाह पर निर्भर है। हमे बताया गया कि बारिश के दौरान यह पूरा द्वीप बाढ़ से जलमग्न हो जाता है और यहां-वहां ऊंचाई पर स्थित कुछ ही क्षेत्र नज़र आते हैं।

इस द्वीप पर रहनेवाले प्रत्येक परिवार के पास एक या दो नावें हैं, जो बाढ़ के समय द्वीप पर यहां-वहां जाने के लिए इस्तेमाल की जाती हैं। ये नावें द्वीप पर हर जगह रखी हुई नज़र आती हैं। यहां पर हर व्यक्ति को तैरना आता है, क्योंकि यहां पर जीवित रहने के लिए यह कौशल बहुत ही आवश्यक है। यहां के अधिकतर लोग अपनी खुद की खेती करते हैं, जिनमें चावल और अन्य कोई भी सब्जियाँ उगाई जाती हैं, लेकिन इसके लिए भी लोगों को बारिश और नदी की अवस्था पर निर्भर रहना पड़ता है।

माजुली की मिसिंग जनजाति    
माजुली द्वीप की मिसिंग जनजाति
माजुली द्वीप की मिसिंग जनजाति

माजुली में अनेक जनजातियाँ रहती हैं, जिन में से एक है यहां का मिसिंग समुदाय। इस जाति के लोग मूलतः अरुणाचल प्रदेश के निवासी थे, जो सदियों पहले यहां पर आकर बस गए थे। इस जाति के लोगों से बातचीत करने के बाद हमे पता चला कि सालों पहले ये लोग यहां पर खेती का व्यवसाय किया करते थे, लेकिन बाढ़ के कारण अब उनके खेत नष्ट हो गए हैं। ऐसी स्थिति में अब उन्होंने हस्तशिल्प और हथकरघा उद्योग अपना लिए हैं।

इस जाति की महिलाएं मेखला की चादरें और गमछे बुनने में बहुत कुशल हैं। ये लोग बांस की अस्थायी झोपड़ियों में रहते हैं, जो बारिश के समय आसानी से विघटित किए जा सकते हैं और किसी अन्य स्थान पर पुनःनिर्मित किए जा सकते हैं। पर्यटक उनके पास खास तौर से उनकी बनाई गयी चावल की घरेलू शराब के लिए आते हैं।

माजुली के सत्र  

माजुली के वैष्णव सत्र
माजुली के वैष्णव सत्र

माजुली द्वीप की सबसे प्रसिद्ध जगहें हैं, यहां के सत्र, जिन्हें भारत के अन्य भागों में आश्रमों या मठों के रूप में जाना जाता है। ये सत्र 15वी शताब्दी के संत गुरु शंकरदेव द्वारा स्थापित किए गए थे। यद्यपि इनके द्वरा स्थापित मूल सत्र आज नदी में विलीन हो गए हैं, लेकिन आज भी यहां पर बहुत से ऐसे सत्र हैं, जो अब तक सक्रिय हैं और जिनका निर्माण संत गुरु शंकरदेव के कई अनुयायियों द्वारा किया गया था। वैसे तो इस प्रकार के सत्र पूरे असम में फैले हुए हैं, लेकिन फिर भी आपको माजुली द्वीप पर बसे हुए सत्रों के बारे में ही ज्यादा सुनने को मिलता है। ये सत्र प्रमुख रूप से वैष्णव ब्रह्मचारियों के निवास स्थान हैं, जिन्होंने अपने आपको पूर्ण रूप से इस भक्तिधारा को समर्पित कर दिया है।

ये ब्रह्मचारी इन सत्रों के शयनगृहों में रहते हैं। वे हस्तशिल्प बनाना, बुनाई करना या फिर नाट्य प्रदर्शन जैसे विविध कार्यों में भाग लेते हैं और इन में से कुछ ब्रह्मचारी नौकरी भी करते हैं। इन सत्रों की बड़ी-बड़ी ज़मीनें हैं, जिनसे प्राप्त होनेवाली आय इन्हीं सत्रों को जाती है। तथा स्थानीय लोग अपनी फसल का जो कुछ हिस्सा इन सत्रों को दान के रूप में देते हैं, वह भी उनके लिए बहुत ही सहायक होता है।

कृष्ण भगवान – माजुली के सत्रों के प्रमुख देवता 
माजुली सत्र में कार्यरत वैष्णव जन
माजुली सत्र में कार्यरत वैष्णव जन

माजुली में स्थापित सत्रों के प्रमुख देवता श्री कृष्ण भगवान है। उपाख्यानों के अनुसार कृष्ण भगवान माजुली में अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ आए थे। सत्यभामा को लगा कि शायद कृष्ण उन्हें द्वारका ले आए हैं, और उन्होंने कृष्ण से पूछा कि, “क्या यह आपकी द्वारका है?” तो इस कृष्ण ने हँसकर उत्तर दिया कि, “नहीं, लेकिन एक दिन यह नगरी भी द्वारका हो जाएगी”। और आज अगर आप यहां पर स्थित कृष्ण मंदिरों की संख्या देखे तो आप जरूर कहेंगे कि, कृष्ण का कथन सच हो गया है।

करीबन 600 वर्षों तक शिवसागर से असम पर शासन करनेवाले अनेक अहोम राजाओं द्वारा यहां पर विविध सत्र बनवाए गए थे। इन में से कुछ आज भी माजुली में मौजूद हैं, जो लगभग 400 साल पुराने हैं।

इन प्रत्येक सत्रों के एक मुख्य गुरु और कुछ उप-गुरु होते हैं, जो आगे जाकर मुख्य गुरु के उत्तराधिकारी बनते हैं। इन उप-गुरुओं का चुनाव इन्हीं सत्रों के वैष्णवों द्वारा किया जाता है।

इन वैष्णवों की दिनचर्या कुछ इस प्रकार की होती है, वे प्रातःकाल उठकर स्नान करके अपने कक्ष में सुबह की पुजा करते हैं और उसके बाद सत्र के मुख्य मंदिर में जाकर सब के साथ मिलकर भगवान का नाम कीर्तन और आरती करते हैं। आरती समाप्त होने के बाद सभी अपने-अपने काम पर लग जाते हैं। तथा शाम के समय फिर से एकत्रित होकर वे संध्या की आरती करते हैं। इस द्वीप पर बसे 22 सत्रों में से सिर्फ 5 सत्रों में ही ब्रह्मचारी निवास करते हैं और बाकी के सत्रों में वैष्णव लोग अपने परिवारों के साथ रहते हैं।

आउनीआटी सत्र, माजुली  

कच्चे लकड़ी के पुल - सत्र जाने का रास्ता - माजुली
कच्चे लकड़ी के पुल – सत्र जाने का रास्ता – माजुली

आउनीआटी सत्र माजुली का सबसे बड़ा सत्र है। यहां का सभागृह, मंदिर और निवास स्थान सब कुछ साधारण सा है और यहां की जमीन मिट्टी की है। इस सत्र में चप्पल पहनकर भीतर जाना मना है, जो कि अपेक्षित है, जिसके कारण आपको अपने चप्पल बाहर ही निकालने पड़ते हैं। इसके अलावा सत्र के भीतर छाता खोलने की मनाई है, क्योंकि, ऐसा करना सत्र का अपमान करने जैसा है। आउनीआटी सत्र में एक संग्रहालय और एक पुस्तकालय भी है। इस छोटे से संग्रहालय में बहुत ही सुंदर कलाकृतियों को प्रदर्शित किया गया है। ये वस्तुएं सालों पहले इस सत्र को यहां के और आस-पास की जगहों के विविध राजाओं, ब्रिटिश आगंतुकों और लोगों द्वारा भेट के रूप में मिली थीं।

आउनीआटी सत्र का संग्रहालय 

इस संग्रह की सबसे उल्लेखनीय वस्तु है, बुनी हुई आइवरी की चटाई जो लगभग 6×3 फीट की है। यहां पर पीतल और चाँदी के बड़े-बड़े बर्तन हैं, जो इस सत्र के विविध गुरुओं द्वारा इस्तेमाल किए जाते थे। इस संग्रहालय में लकड़ी के बने बड़े से चप्पलों की एक जोड़ी है। हमे बताया गया कि ये चप्पल इस सत्र के एक गुरु के हैं जो बहुत विशाल थे। इसके अलावा यहां हाथी दांत के बने कुछ और जूते भी हैं। इन दौलतमंद वस्तुओं को देखकर आप इन्हीं विचारों में खो जाते हैं कि, जब इन आश्रमों के गुरुओं के पास इतनी मूल्यवान वस्तुएं थीं, तो ना जाने उस समय यह जगह कितनी धनवान रही होगी।

आउनीआटी सत्र का पुस्तकालय   

आउनीआटी सत्र में एक पुस्तकालय भी है, जहां पर पीतल के बड़े-बड़े कटोरे हैं, जो उत्सवों के समय प्रसाद बांटने के लिए इस्तेमाल किए जाते थे। यहां पर रखी गयी किताबें मुख्य रूप से आसामी भाषा में हैं। इस पुस्तकालय में कुछ दुर्लभ पांडुलिपियाँ भी हैं। इनमें एक पांडुलिपि ऐसी है, जिस में सभी प्रकार के हथियों का गहराई से वर्णन किया गया है। हमे तो इन पांडुलिपियों को देखने की अनुमति नहीं मिली, पर मैं आशा करती हूँ कि राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन द्वारा इन पांडुलिपियों का अंकीकरण किया गया होगा और उन्हें सामान्य जनता के लिए उपलब्ध कराया गया होगा।

सत्रों में रास लीला का उत्सव  
माजुली में बने लकड़ी के मुखौटे
माजुली में बने लकड़ी के मुखौटे

दिवाली के बाद आनेवाले पूर्ण चंद्रमा के दिन, जिसे कार्तिक पुर्णिमा कहते हैं, इन सत्रों में रास लीला का आयोजन किया जाता है जो 3 दिनों तक चलता है। माजुली में जाने का यह सबसे उत्तम समय है। इसके अलावा पूरे साल के दौरान यहां पर और भी कई छोटे-छोटे उत्सव होते रहते हैं। इन उत्सवों के दौरान यहां पर आयोजित नृत्य प्रदर्शनों और नाटकों में सारे वैष्णव बड़ी उत्सुकता के साथ भाग लेते हैं। कुछ संगीत बजाते हैं, तो कुछ मुखौटे पहनकर विविध भूमिकाएँ करते हैं और बाकी सहायक कार्यों में जुट जाते हैं।

इन नाटकों में सभी भूमिकाएँ पुरुष ही निभाते हैं, यद्यपि कभी-कभी महिलाएं भी इन नाटकों में भाग लेती हैं। विविध मिथकीय चरित्रों का प्रतिनिधित्व करनेवाले ये मुखौटे इन नृत्य नाटकों का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। हम वहां के एक मुखौटे बनाने वाले केंद्र में गए, जहां पर एक युवा कलाकार तरह-तरह के मुखौटे पहनकर,  उनके अनुसार अलग-अलग प्रकार के अभिनय भी कर रहा था। और सच में वह बहुत ही प्रतिभाशाली कलाकार था। प्रत्येक मुखौटे के साथ उसके हाव-भाव भी पूर्ण रूप से बदलते थे, जैसे भयंकर से प्रलोभी का रूपांतरण।

आगंतुकों के लिए माजुली के आकर्षण तत्व  

माजुली में वैसे तो देखने योग्य ज्यादा कुछ नहीं है, लेकिन यहां की कुछ बातें ऐसी हैं जो आपको इस द्वीप पर कुछ समय बिताने के लिए मजबूर करती हैं। चारों तरफ नदी से घिरे होने के कारण यह दुनिया की अनेक प्रदूषण मुक्त जगहों में से एक है। इस द्वीप पर किसी भी प्रकार के प्रदूषण कारक तत्व नहीं हैं और इसी वजह से यह द्वीप अनेक जाति के पक्षियों का बसेरा है। अगर आप किसी सड़क के किनारे बैठे हो तो आपको अपने इर्द-गिर्द विविध प्रकार के पक्षी और तितलियाँ यहां के पर्यावरण का मजा लेती हुई नजर आती हैं।

माजुली के पक्षी
माजुली के पक्षी

इसके अतिरिक्त अगर आप सुबह-सुबह इस द्वीप पर यहां-वहां छितरे जलस्रोतों के दर्शन करने जाए, तो आपको वहां पर कुछ परिचित तो कुछ अपरिचित से बहुत सारे पक्षी और तितलियाँ देखने को मिलती हैं। पक्षियों और तितलियों का यह नज़ारा किसी मेले से कम नहीं है। और अगर आप सर्दियों के मौसम में इस द्वीप पर जाए तो आपको वहां पर बहुत सारे घुमंतू पक्षी भी देखन को मिलते हैं।

हमारे पूर्वजों की जीवन शैली  

भारतवासियों के लिए माजुली जाना यानी 100 साल पहले के भारत में कदम रखने जैसा है, जहां आधुनिक काल के कुछ ही यंत्र अपना पदार्पण कर पाए हैं, जैसे मोबाइल फोन और टीवी। हो सकता है कि इस प्रकार की जीवन शैली के बारे में आपने अपने दादा-दादी या नाना-नानी से ही सुना होगा।

विदेशी पर्यटकों के लिए तो यहां पर देखने योग्य बहुत सी अनोखी बातें हैं। जैसे, यहां के सत्र जो इन विदेशियों के लिए बहुत ही असामान्य हैं। फिर यहां के आदिवासी गाँव जिनमें बांस के घर बने हुए हैं तथा बुनाई का काम और बहुत सारे पक्षी। यहां की भीड़ रहित कच्ची सड़कों पर शांति से साइकल चलाने में एक अलग ही मजा है। और इससे अधिक पूरी दुनिया से दूर बसे इस द्वीप पर शांतिपूर्ण जीवन बिताना बहुत ही सुखदायक है। वास्तव में बहुत से विदेशी पर्यटक खास तौर से माजुली घूमने के लिए ही भारत आते हैं।

अगर आप कभी माजुली जाए तो एक पर्यटक की तरह मत जाइए क्योंकि, शायद आपके लिए वहां पर कुछ भी रमणीय न हो। पर अगर आप वहां पर एक यात्री के रूप में जाए और अगर आप पूर्ण रूप से अपने आपको इस जगह में डूबने दे तो आपको यहां पर बहुत सी अच्छी-अच्छी बातें दिखेंगी, जो सच में प्रशंसा के योग्य हैं।

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चेरापूंजी – धरती पर सबसे गीली जगह की यात्रा, मेघालय, उत्तर पूर्वीय भारत https://inditales.com/hindi/cherrapunji-meghalaya-wettest-place/ https://inditales.com/hindi/cherrapunji-meghalaya-wettest-place/#respond Wed, 09 May 2018 02:30:27 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=546

चेरापूंजी को धरती की सबसे गीली जगह के रूप में जाना जाता है। जैसा कि हमने अपनी भूगोल की कक्षा में भी पढ़ा था। इससे हमारे दिमाग में चेरापूंजी की जो छवि निर्मित हुई थी वह कुछ ऐसी थी कि, यह एक ऐसा क्षेत्र है जहां पर हर वक्त वर्षा होती रहती है। अगर आप […]

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चेरापूंजी मेघालय
चेरापूंजी मेघालय

चेरापूंजी को धरती की सबसे गीली जगह के रूप में जाना जाता है। जैसा कि हमने अपनी भूगोल की कक्षा में भी पढ़ा था। इससे हमारे दिमाग में चेरापूंजी की जो छवि निर्मित हुई थी वह कुछ ऐसी थी कि, यह एक ऐसा क्षेत्र है जहां पर हर वक्त वर्षा होती रहती है। अगर आप वहां पर जाए तो आपको सिर्फ बारिश ही बारिश देखने को मिलेगी। लेकिन हमारी यह धारणा जल्द ही गलत साबित हुई और हमे यह पता चला कि वास्तव में चेरापूंजी ऐसी जगह बिल्कुल नहीं है। देश के अन्य भागों की तरह यहां पर भी वर्षा ऋतु के समय ही बारिश होती है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस दौरान यहां पर धरती के अन्य किसी भी स्थान से अधिक बारिश होती है।

वास्तव में हमे यह जानकर बहुत आश्चर्य हुआ कि सर्दियों के मौसम में यहां पर पूरा सूखा पड़ जाता है, जिसकी वजह से इस क्षेत्र को पानी की गंभीर समस्या से गुजरना पड़ता है। इससे भी अधिक विडंबनात्मक शायद ही कभी हो सकती है – धरती की सबसे गीली जगह पर हर साल महीनों के लिए सूखा पड़ जाता है। यह सब जानने के बाद मेरे दिमाग में बार-बार एक ही सवाल उठ रहा था कि, क्या कभी भी इस क्षेत्र के लोगों ने जल संचयन के तरीके अपनाने की कोशिश की होगी या नहीं। और अगर कोशिश की होगी, तो क्या उन्हें किसी भी प्रकार की मुश्किलों का सामना करना पड़ा था, या उन्होंने इसे भी प्रकृति की भेट और अपना भाग्य समझकर अपनाया होगा। चाहे जो भी हो लेकिन इन लोगों के लिए जिंदगी दोनों तरफ से बहुत कठिन है – जब बारिश होती है तब भी और जब बारिश नहीं होती तब भी।

भारत का सबसे बेहतरीन झरना – नोहकालिकाई झरना, चेरापूंजी 

नोहकालिकाई झरना, चेरापूंजी
नोहकालिकाई झरना, चेरापूंजी

चेरापूंजी में घूमते समय आप हर वक्त बादलों को अपने आस-पास पाते हैं। यहां पर आप वास्तव में बादलों के बीच चल सकते हैं, उन्हें अपनी त्वचा पर महसूस कर सकते हैं और उन्हें सूंघ भी सकते हैं। ये बादल न सिर्फ आपके साथ मस्ती-मज़ाक ही करते हैं, बल्कि आपके लिए हर पल नए-नए नज़ारे भी पेश करते रहते हैं।

कभी कभी तो ये बादल झरने को ही छलावृत्त कर देते हैं जिसके कारण आपको बस उसकी आवाज सुनकर ही संतुष्ट होना पड़ता है। लेकिन बीच-बीच में वे, आपको झरने की छोटी सी झलक दिखाकर आपकी उत्सुकता को बढ़ाते हैं और फिर अचानक से आपकी दृष्टि से ओझल होकर आपको गहरी नीली झील में गिरते इस सुंदर से झरने की प्रशंसा करने हेतु कुछ समय के लिए एकांत में छोड़ देते हैं। नोहकालिकाई झरना लगभग 1100 फीट की ऊंचाई का है, जो उसे भारत का सबसे ऊंचा और बेहतरीन झरना बनाता है।

यहां की और एक विशेषता है, यहां के रंगबिरंगी फूल जो आपको हर जगह नज़र आते हैं। चाहे वह सड़क के किनारे हो, घाटी हो, या फिर यहां पर बसे प्रत्येक घरों के आँगन, हर कहीं आपको विभिन्न प्रकार के फूल दिखाई देते हैं। इन फूलों को देखकर ऐसा बिलकुल नहीं लगता जैसे उन्हें यहां पर जबरदस्ती लगाया गया होगा, बल्कि ये फूल भी इन पहाड़ियों, बादलों और मनुष्यों की तरह यहां की प्रकृति का एक अभिन्न अंग हैं। हमारी इस पूरी यात्रा के दौरान हमे यहां के विविध प्रकार के, रंगबिरंगी और खूबसूरत फूल देखने को मिले जो कि अन्यत्र दुर्लभ हैं।

पहाड़ी इलाका – प्रकृति की प्रचुरता 
चेरापूंजी की पहाड़ियां
चेरापूंजी की पहाड़ियां

यहां के खुले नीले आकाश में बिखरे सफ़ेद या सलेटी बादल, यहां की हरी-भरी पहाड़ियाँ और रंगबिरंगी फूल, सभी जैसे अपने उज्वलित रंगों से एक दूसरे की शोभा बढ़ाते हुए इन नज़ारों को और भी आकर्षक बना रहे थे। चेरापूंजी के इर्द-गिर्द बसी पहाड़ियों पर यहां-वहां अनेक झरने छितराये हुए हैं। आप चाहे किसी भी घाटी पर हो, आपको अपने आस-पास या तो किसी झरने की आवाज सुनाई देगी, या फिर कोई झरना ही जरूर दिखेगा। इन में से कुछ झरने यहां के मानक यात्रा कार्यक्रमों के भाग हैं, जिसके द्वारा आपको उनकी यात्रा कराई जाती है और उनसे संबंधित कुछ रोचकपूर्ण कहानियाँ भी सुनाई जाती हैं। ये सीधे खड़े झरने पहाड़ियों के बीच स्थित संकुचित मार्ग में गिरते हैं और फिर इसी मार्ग से बहते-बहते घाटी के गहन भागों में पहुँचकर नदी का रूप धारण करते हैं।

अगर पहाड़ियों के ऊपर से देखा जाए तो ये नदियां इन हरी ढलानों के बीच से बहती पानी की पतली सी रेखा के समान दिखाई देती हैं। कभी-कभी आपको इस छोटी सी नाजुक नदी की अपार शक्ति पर आश्चर्य होता है, जो इन चट्टानी पर्वतों को चीर कर स्वयं अपना रास्ता बनाते हुए आगे बढ़ती है। और आप अचानक से, कहीं पर भी जा सकने की उसकी स्वतंत्रता और सीमा पार जाने की उसकी क्षमता से ईर्ष्या करने लगते हैं। यहां की अधिकतर नदियां बहते-बहते पड़ोसी राष्ट्र बांग्लादेश में चली जाती हैं।

भारत के सबसे बेहतरीन झरने का मनमोहक विडियो – नोहकालिकाई झरना, चेरापूंजी   

नोहकालिकाई झरने से संबंधित उपाख्यान और मिथक 

उपाख्यान और मिथक मानव जीवन के अभिन्न अंग हैं। ऐसी ही एक कथा चेरापूंजी के नोहकालिकाई झरने से जुडी है, जिसके नाम के पीछे एक बहुत दुखद कहानी छिपी हुई है। माना जाता है कि, का लिकाई नामक एक महिला ने बरसों पहले गलती से अपनी खुद की बेटी को खा लिया था, जिसके बाद उसने यहां पर आकर आत्महत्या की थी। इसी घटना के बाद से इस झरने को नोहकालिकाई के नाम से जाना जाने लगा।

200 फीट की अखंड चट्टान से जुडे उपाख्यान 
उलटी टोकरी – खासी समुदाय मेघालय
उलटी टोकरी – खासी समुदाय मेघालय

यहां पर 200 फीट की अखंड चट्टान से बनी एक विशाल संरचना है, जो पलटी हुई ख़ासी टोकरी के जैसे लगती है। कहा जाता है कि यह टोकरी एक विराट राक्षस की थी जो हमेशा लोगों को परेशान करता था। एक बार सब लोगों ने मिलकर उसे कीलों का बनाया हुआ खाना खिलाया और मार डाला। इस उपाख्यान के अनुसार उस राक्षस का नाश तो हो गया लेकिन उसकी टोकरी यहीं पर औंधी पड़ी रह गयी, जो आज भी चट्टान के रूप में यहां पर खड़ी है। जिस प्रकार से यह चट्टान अपने चोटीदार शीर्ष के साथ इन पहाड़ियों और मैदानों के बीच खड़ी है, उसे देखकर आप इस उपाख्यान पर विश्वास किए बिना नहीं रह सकते।

मॉस्मई गुफाएँ 
मॉस्मई गुफाएँ – चेरापूंजी, मेघालय
मॉस्मई गुफाएँ – चेरापूंजी, मेघालय

मेघालय में लगभग 788 गुफाएँ हैं, जिन में से अधिकतर या तो नक्शे पर नहीं मिलती या फिर अब तक उनकी खोज नहीं हो पायी है। इन में से कुछ भारत में स्थित सबसे लंबी गुफाएँ हैं। इन सभी गुफाओं में से मॉस्मई गुफाएँ सबसे प्रसिद्ध गुफाएँ हैं। चेरापूंजी से कुछ ही समय की दूरी पर बसे होने के कारण बहुत से लोग इन गुफाओं को देखने आते हैं।

यहां पर बनवाई गयी पक्की सीढ़ियाँ आपको गुफा के प्रवेश द्वार तक ले जाती हैं। गुफा के द्वार पर पहुँचते ही सामने ही आपको एक विशाल कक्ष जैसी संरचना दिखेगी, जो आपको एक पतले से मार्ग की ओर ले जाती है। इस मार्ग से एक समय पर केवल एक ही व्यक्ति गुजर सकता है। इस मार्ग को पार करने के पश्चात फिर से आपको एक विशाल कक्ष जैसा मिलता है, जहां से बाहर निकलते ही आप गुफा के दूसरे छोर पर पहुँचते हैं।

इस प्रकार की कुदरती संरचनाएं आपको प्रकृति की अनेकरूपता के प्रति हमेशा मोहित कर देती हैं। लेकिन इस गुफा की अवस्था को देख आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि उसकी कितनी देखबाल होती होगी। इस गुफा के इर्द-गिर्द आपको घने जंगल नज़र आएंगे जिनमें सिर्फ जंगली पेड़-पौधे हैं। जब हम मॉस्मई गुफाओं तक पहुंचे तब तक शाम हो चुकी थी और उसी समय बारिश भी होने लगी थी। चेरापूंजी में आकर एक पूरा दिन सूखा-सूखा गुजारने के बाद अब जाकर हम उसकी असली पहचान, यानी उसके गीलेपन के अनुभव से रूबरू हो रहे थे। वर्षा की इस बौछार से लगा जैसे चेरापूंजी की हमारी यात्रा सही मायनों में अब पूरी हो गयी है।

सोहरा – चेरापूंजी का नामपरिवर्तन 
चेरापूंजी के फूल
चेरापूंजी के फूल

चेरापूंजी अब आधिकारिक तौर पर सोहरा के नाम से जाना जाता है, जो उसका मूल नाम हुआ करता था। जाहिर तौर पर चेरापूंजी नाम उसे अंग्रेजों द्वारा दिया गया था। यहां पर कुछ स्थान ऐसे हैं जहां से आप बांग्लादेश के कुछ भाग देख सकते हैं। अचरज की बात तो यह है कि सोहरा जैसे पहाड़ी क्षेत्र में जहां पर भी खेती की जाती है, वहां की पहाड़ियाँ अचानक से व्यापक मैदानों में परिवर्तित होती हैं।

सोहरा में रामकृष्ण मिशन से जुड़ा एक आश्रम है, जिसकी उत्तर पूर्वीय दिशा में एक मंदिर और एक संग्रहालय है। इस संग्रहालय में इस क्षेत्र के सभी झरनों की तस्वीरें प्रदर्शित की गयी हैं। उनके साथ उनसे जुडे इतिहास की थोड़ी-बहुत जानकारी भी प्रस्तुत की गयी है। इस आश्रम की मुख्य इमारत की दीवारों पर इस क्षेत्र से जुडे कुछ चित्र दर्शाये गए हैं। इस इमारत के ठीक पीछे ही मंदिर बसा हुआ है। यहां पर एक छोटा सा बुनाई का केंद्र भी है, जहां पर कुछ युवक और युवतियाँ अपनी पारंपरिक रीतिनुसार बुनाई कर रहे थे। यहां की महिलाएं भी पारंपरिक ख़ासी पहनावे में दालचीनी और चाय बेचती हुई नज़र आ रही थीं।

पर्यटकों के लिए सुविधाएं 
चेरापूंजी का नैसर्गिक सौंदर्य
चेरापूंजी का नैसर्गिक सौंदर्य

इतना प्रसिद्ध पर्यटक स्थल होने के बावजूद भी यहां पर पर्यटन पूर्वावश्यकता की कोई सुविधाएं नहीं मिलती। जब तक कि आप यहां के गिने-चुने और नामांकित होटलों में न रुके हों, आपको यहां पर एक वक्त का भी सही खाना नहीं मिल पाता। अधिकतर लोग अपनी शिलांग यात्रा के दौरान सिर्फ एक दिन की यात्रा के लिए ही यहां पर आते हैं, तो ऐसे में यहां पर कुछ अच्छे भोजनालयों का होना बहुत आवश्यक है, जहां पर अच्छा मौलिक खाना मिल सके। अभी के लिए तो आपको यहां पर सिर्फ छोटी-छोटी दुकानें ही मिलेंगी, जहां पर खाने की कुछ -कुछ चीजें बेची जाती हैं। लेकिन चाय की भूमि से कुछ ही दूर बसे इस क्षेत्र में एक अच्छी सी चाय मिल पाना भी कठिन सा लगता है।

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एक सींग वाले भारतीय गैंडे का घर – काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान, असम https://inditales.com/hindi/kaziranga-national-park-single-horned-rhino/ https://inditales.com/hindi/kaziranga-national-park-single-horned-rhino/#comments Wed, 14 Mar 2018 05:30:53 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=647

काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान भारत के विश्व धरोहर के स्थलों में से एक है। यह उद्यान एक सींग वाले गैंडों के लिए बहुत प्रसिद्ध है। इसका क्षेत्रफल 400 वर्ग कि.मी. से भी अधिक व्यापक है। माजुली द्वीप की तरह इस उद्यान का भी बहुत सारा भूभाग ब्रह्मपुत्र नदी के कारण हो रहे भूकटाव के चलते नष्ट […]

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काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान - एक सींघ वाला गैंडा
काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान – एक सींघ वाला गैंडा

काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान भारत के विश्व धरोहर के स्थलों में से एक है। यह उद्यान एक सींग वाले गैंडों के लिए बहुत प्रसिद्ध है। इसका क्षेत्रफल 400 वर्ग कि.मी. से भी अधिक व्यापक है। माजुली द्वीप की तरह इस उद्यान का भी बहुत सारा भूभाग ब्रह्मपुत्र नदी के कारण हो रहे भूकटाव के चलते नष्ट होता जा रहा है। काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान गुवाहाटी और जोरहाट इन दो प्रमुख शहरों को जोड़नेवाले मुख्य मार्ग पर बसा हुआ है और वहाँ तक पहुँचने के लिए आप या तो गुवाहाटी से जा सकते हैं, या फिर जोरहाट से। यह मार्ग इस उद्यान से होकर ही गुजरता है। यहाँ पर रास्ते में आपको कई ऐसे स्थान मिलेंगे जहाँ पर थोड़ी देर रुककर आप जंगल में टहल रहे जानवरों को देख सकते हैं, खास कर हिरण और जंगली भैंस।

यहाँ पर सड़क के किनारे कुछ धान के खेत हैं जो हमे बताया गया था कि कुछ समय पूर्व इसी उद्यान का भाग हुआ करते थे, लेकिन अब धीरे-धीरे यह सबकुछ इस जंगल में बढ़ते लोगों के अनधिकारिक प्रवेश का शिकार होता जा रहा है। इस जंगल के दूसरी तरफ ब्रह्मपुत्र नदी बहती है और वर्षा ऋतु के दौरान इस तरफ की अधिकतर घासभूमि बाढ़ में जलमग्न हो जाती है। इस दौरान इस भाग के सभी जानवर जंगल के आंतरिक क्षेत्रों में प्रवेश करने लगते हैं। और तो और इस मौसम में यहाँ के सड़कों की हालत भी बहुत ही बुरी हो जाती है, जिसके कारण गाडियाँ भी जंगल के भीतर नहीं जा सकती।

काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान का मानचित्र
काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान का मानचित्र

काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान अक्टूबर/नवम्बर से लेकर मार्च तक आगंतुकों के लिए खुला होता है। इसे खोलने की ठीक-ठीक तारीख उद्यान की भीतरी परिस्थितियों के आधार पर निश्चित की जाती है। वैसे तो यहाँ पर जाने का सबसे अच्छा समय है मध्य नवम्बर से लेकर फ़रवरी के अंत तक।

काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान – जैव विविधता का प्रसिद्ध स्थल   

काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में हिरण
काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में हिरण

लॉर्ड कर्ज़न की पत्नी श्रीमति कर्ज़न पहली ऐसी व्यक्ति थी जिन्होंने इस क्षेत्र के जंगली जानवरों की सुरक्षा की माँग की थी। उन्हीं के निवेदन से इस वन क्षेत्र को आरक्षित वन में परिवर्तित किया गया था। इसके बाद 1974 में इसे राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया और फिर 1985 में इसे जैव विविधता का प्रसिद्ध स्थल होने के नाते यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल की उपाधि भी प्राप्त हुई। आज इस राष्ट्रीय उद्यान को 3 प्रमुख भागों में विभाजित किया गया है। इनमें से पश्चिमी भाग को बागोरी, मध्य भाग को कोहोरा और पूर्वी भाग को बोकाखाट के नाम से जाना जाता है। हमने यहाँ के बागोरी क्षेत्र के दर्शन किए और इस दौरान हमारा निवास स्थान कोहोरा क्षेत्र था।

एक सींग वाला गैंडा या भारतीय गैंडा   

इस उद्यान में आप एक सींग वाले भारतीय गैंडे के अलावा जंगली हाथी, जंगली भैंस और हिरण भी देख सकते हैं और अगर आप भाग्यवान हैं तो आपको यहाँ पर बाघ भी दिखाई दे सकता है। इस उद्यान के भीतर लंबी-ऊंची जंगली घास है जिसे हाथी घास कहा जाता है। यहाँ के जानवर अक्सर इस घास के पीछे छिपकर बैठे हुए होते हैं। इन घने और दलदली घास के मैदानों में ये जानवर पल में आपके सामने आकर, पल में गायब भी हो सकते हैं। इस वजह से इस जंगल में अकेले घूमना थोड़ा खतरनाक हो सकता है, क्योंकि आप नहीं बता सकते कि कब और कहाँ से ये जानवर आप के सामने आकर खड़े हो जाए।

लगता है जैसे ये जानवर गले में कैमरा लटकाए हुए मनुष्यों को लेकर उद्यान में घूमनेवाली इन जैतुनी रंग की जीपों के आदी हो गए हैं। लेकिन अगर आपको कहीं पर गैंडा या हाथी जैसे क्रूर और भयानक जानवर दिखे तो अच्छा होगा कि आप अपने स्थान पर ही रहें और उन्हें अपना समय लेते हुए अपने रास्ते जाने दे।

हाथी और गैंडे अपने बच्चों के साथ  
हाथी - काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान
हाथी – काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान

हाथी आम तौर पर समूह में घूमते हुए नज़र आते हैं और अक्सर जल स्रोतों के आस-पास ही पाये जाते हैं। तो दूसरी तरफ गैंडे अकले ही घूमना पसंद करते हैं और कभी-कभी आप उन्हें उनके बच्चों के साथ भी देख सकते हैं।

हमारी सफारी के दौरान हमे यहाँ पर गैंडे का एक बच्चा दिखा जो हमारी जीप के ठीक सामने था। उसे देखते ही हमारे गाइड ने तुरंत जीप रोक दी और कहा कि अगर गैंडे का बच्चा यहाँ पर है तो उसकी माँ भी कहीं आस-पास ही होगी। इतना कहते ही हमारी नज़र माँ गैंडे पर पड़ी जो अपने बच्चे का पीछा करते हुए आ रही थी। गैंडे का बच्चा खुशी-खुशी वहाँ खेल रहा था और उसकी माँ आस-पास रहकर उसपर कड़ी नज़र रखे हुई थी। एक बार तो उसने पलटकर हमारी ओर देखा, लेकिन शायद हमारी तरफ से उसे किसी प्रकार की शंका का कारण नहीं लगा और वह अपनी गतिविधियों में मग्न हो गयी। कुछ देर बाद गैंडे का बच्चा उस लंबी सी घास में कहीं गायब हो गया और उसकी माँ भी उसके पीछे चली गयी। कुछ ही पलों में वहाँ पर उनकी कोई हलचल नहीं थी।

जंगली भैंसा - काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान
जंगली भैंसा – काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान

आगे जाकर हमे एक और गैंडा दिखा जो सो रहा था। उसके थोड़ा नजदीक पहुँचकर हमारे गाइड ने हल्की सी आवाज से उसे जगा दिया। वह गैंडा आलस भरते हुए जाग गया और अपने आस-पास देखकर वापस सो गया। इन गैंडों की खाल देखकर मुझे लगा जैसे उन्होंने कोई कसा हुआ चमड़े का जैकेट पहन रखा हो। उनके संधि स्थलों पर नज़र आनेवाली सिलवटों भरी खाल के कारण ही देखनेवाले को ऐसा प्रतीत होता है।

काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में शायद उस दिन माँ और बच्चों का दिन था। माँ गैंडा और उसके बच्चे के बाद हमारी मुलाक़ात सिर्फ 28 दिनों के हाथी के बच्चे से हुई जो अपनी माँ के साथ खेल रहा था।

काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में पहरे की मीनारें     

इस उद्यान में जल स्रोतों के आस-पास कुछ पहरे की मीनारें बनवाई गयी हैं, जहाँ से आप आस-पास के सुंदर नज़रों का आनंद उठा सकते है। इसी के साथ इस ऊंचाई से आप यहाँ की हाथी घास में छिपे बैठे जानवरों को भी देख सकते हैं, तथा उनकी अन्य गतिविधियों का भी अवलोकन कर सकते हैं। जैसे कि, आप उन्हें तालाब के उस पार स्नान करते हुए, यहाँ-वहाँ टहलते हुए, अपने साथियों के साथ खेलते हुए, या फिर ऐसे ही बेफिक्र घूमते हुए देख सकते हैं।

जिस मीनार पर हम खड़े थे उसके नीचे स्थित तालाब में हमने बड़ी-बड़ी मछलियाँ देखी, जो पल में ऊपर आकर फिर से पानी में लुप्त हो जाती थीं। उनकी इस चंचल गति के कारण हम ठीक से उनकी तस्वीरें भी नहीं ले पाये। इसके अतिरिक्त हमने वहाँ पर बहुत सारे रंगबिरंगी और सुंदर पक्षी देखे जो हमारे चारों ओर उड़ रहे थे। यहाँ पर बिताए हुए इन पलों ने जैसे हमारी इस उद्यान सफारी के अनुभव को पूर्ण कर दिया था।

काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान की पशुसंख्या   
काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान की पशु संख्या
काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान की पशु संख्या

इस उद्यान में वन विभाग द्वारा एक सूचना फ़लक लगवाया गया है, जिस पर यहाँ की पशुसंख्या संबंधी जानकारी दी गयी है। इस फ़लक पर साफ-साफ लिखा गया था कि इस उद्यान में एक सींग वाले गैंडों और अन्य जानवरों की आबादी काफी वृद्धि कर रही है। यद्यपि बाघों की संख्या के बारे में उनके आंकड़े कुछ अस्पष्ट से थे। हमारे गाइड ने हमे बताया कि, संचार माध्यमों में जैसे कि बाघों की संख्या 1411 बतायी जाती है, असल में वह उससे कई ज्यादा है।

अवैध शिकार आज भी यहाँ के वन विभाग का एक महत्वपूर्ण मुद्दा बना हुआ है। हमे बताया गया था कि हर समय इस उद्यान में कोई ना कोई, कहीं ना कहीं छिपा हुआ मिल ही जाता है, जो गैंडों के शिकार के इंतजार में होते हैं। असल में ये लोग इन गैंडों को उनके सींग के लिए मारना चाहते हैं। इन सींगों की सीमित उपलब्धि के कारण उन्हें बहुत ही विशेष माना जाता है और ऐसे किसी के पास यह विशेष वस्तु होना अपने-आप में बहुत बड़ी बात है। शायद यह सींग किसी प्रकार की तांत्रिक विद्या में भी इस्तेमाल किया जाता है। ये विशेषताएँ इस सींग को इतना कीमती बनाती हैं कि उसके लिए शिकारी अपनी जान पर भी खेलने के लिए तैयार होते हैं। इसी प्रकार हाथी के दांतों की भी यही कहानी है।

इत्तेफाक से हमे वहाँ पर दंतोंवाला एक भी हाथी नहीं दिखा। क्या हो सकता है कि इन सभी हाथियों के दांत काट दिये गए हों?

संजातीय गाँव   
लोहे सीमेंट से बना संजातीय गाँव
लोहे सीमेंट से बना संजातीय गाँव

काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के कोहोरा क्षेत्र में एक कृत्रिम संजातीय गाँव का निर्माण किया गया है, जहाँ पर पर्यटन विभाग द्वारा उत्तर पूर्वीय भारत की विविध जनजातियों के घरों के प्रतिरूप बनवाने की कोशिश की गयी है। दुर्भाग्यवश, स्थानीय लोगों ने जहाँ अपने घर बांस जैसे प्रकृतिक वस्तुओं से बनवाए हैं, वहीं यहाँ पर सबकुछ सीमेंट का बनवाया गया है। यहाँ तक कि बांस की प्रतिकृतियाँ भी सीमेंट की बनवाई गयी हैं। इसके अतिरिक्त, वहाँ पर आदिवासी जनजातियों के दैनिक जीवन को दर्शानेवाले बड़े-बड़े चित्र भी बनवाए गए हैं। इस प्रकार ग्रामीण जीवन को कृत्रिम रूप में प्रदर्शित करना आज एक प्रवृत्ति सी बन गयी है, जो देश में हर जगह देखा जा सकता है। प्रत्यक्ष गांवों को छोड़कर कृत्रिम गांवों का यह निर्माण मुझे कुछ खास पसंद नहीं हैं।

आदिवासी गाँव - असम
आदिवासी गाँव – असम

पता नहीं इसकी प्रभावशीलता पर कोई ध्यान देता भी हैं या ये सारे लोग बस इस तेजी से फैलती मानसिकता का भाग बनते जा रहे हैं। इस कृत्रिम गाँव में हमे कोई भी नहीं दिखा, हम बस ऐसे ही चीजों को देखते हुए वहाँ पर घूमते रहे और फिर वापस अपने होटल लौट गए। यहाँ पर घूमते हुए आप आस-पास बहुत सारे चाय बागान देख सकते हैं, जो आपके लिए सुंदर दृश्य प्रदान करते हैं।

जीप सफारी  

अगर आप कभी इस उद्यान के दर्शन करने गए तो वहाँ के जंगलों में घूमने के लिए जीप सफारी का चुनाव ही सबसे बढ़िया रहेगा। इस प्रकार आप वहाँ के जानवरों को नजदीक से देख सकते हैं। आप चाहे तो यहाँ पर हाथी की सवारी भी कर सकते हैं। इस राष्ट्रीय उद्यान के आस-पास फैले गार्हस्थ्य प्रबंध, जो सड़क के उस पार बसा हुआ है, को आप चाहने पर ही अनदेखा नहीं कर सकते। वहाँ पर बड़े-बड़े और महंगे आश्रय घर और बैकपैकर के मांद हैं।

इस उद्यान में उपलब्ध जीप सेवा सिर्फ पर्यटन के मौसम में ही कार्यरत होती हैं, जो पर्यटकों को इस उद्यान की पूरी सैर करवाते हैं। इसके अलावा यहाँ पर स्मारिका दुकानें भी हैं जो बांस की बनी विविध प्रकार की स्थानीय वस्तुएं बेचते हैं। यद्यपि एन मौके पर आयोजित यात्राओं की बढ़ती प्रवृत्ति ने अभी तक यहाँ दस्तक नहीं दी है, लेकिन यहाँ पर कुछ गाइड ऐसे हैं जिन्हें इस जंगल के रास्तों और वहाँ के जानवरों की थोड़ी बहुत जानकारी है जो आनेवाले आगंतुकों का भली-भांति मार्गदर्शन कर सकते हैं। और देखा जाए तो यहाँ का वन विभाग भी अपनी सेवाएँ प्रदान करने में काफी तत्पर है।

इस उद्यान की सैर करते हुए तथा वहाँ के जानवरों को देखते हुए आपको बहुत गर्व सा महसूस होता है कि ये जानवर इस उद्यान के आस-पास रहने वाले बहुत से लोगों की रोजी-रोटी का स्रोत हैं। काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान एक बहुत ही खूबसूरत और शांत सी जगह है। जब मैं यह ब्लॉग लिख रही थी तो मेरे मन में बार-बार वहाँ की लंबी-लंबी हाथी घास के चित्र घूम रहे थे।

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असम चाय के बागान – असम में घूमने की जगहें https://inditales.com/hindi/assam-tea-gardens/ https://inditales.com/hindi/assam-tea-gardens/#comments Wed, 31 Jan 2018 02:30:45 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=620

असम चाय के बागानों को लेकर मेरे मन में एक बहुत ही औपनिवेशिक छवि बसी हुई है। अंग्रेजों द्वारा संचालित चाय के उद्यान जिनमें बड़े-बड़े बंगलों में वे रहा करते थे। तथा वहीं पर स्थित चाय के उत्पादन और संकुलन के केंद्र और अपनी पीठ पर बांस की टोकरियाँ लादे इन बागानों से चाय की […]

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असम चाय की ताज़ा पत्तियां
असम चाय की ताज़ा पत्तियां

असम चाय के बागानों को लेकर मेरे मन में एक बहुत ही औपनिवेशिक छवि बसी हुई है। अंग्रेजों द्वारा संचालित चाय के उद्यान जिनमें बड़े-बड़े बंगलों में वे रहा करते थे। तथा वहीं पर स्थित चाय के उत्पादन और संकुलन के केंद्र और अपनी पीठ पर बांस की टोकरियाँ लादे इन बागानों से चाय की पत्तियाँ बीनते हुए श्रमिकों के समूह।

लोग हमेशा से चाय के उद्यान का स्वामी होने के आकांक्षी रहे हैं। मेरे अनुमान से यह आज भी चलता आ रहा है, यद्यपि अब अधिकतर उद्यान व्यक्तिगत स्वामित्व के बजाय निगमों द्वारा संचालित किए जा रहे हैं। भारत के उत्तर पूर्वीय भागों में, विशेष कर पूर्वीय असम और दार्जिलिंग के आस-पास के इलाके में विश्व की 20% से भी अधिक चाय पत्ती का उत्पादन होता है। ऐसे में इन इलाकों को विश्व के टिस्पून्स या विश्व का चाय का चम्मच कहना गलत नहीं होगा।

मैंने इससे पहले भी अपनी केरल और श्रीलंका की यात्राओं के दौरान चाय के बागान देखे हैं, लेकिन असम के चाय बागानों के प्रति मेरा आकर्षण बचपन से रहा है। जब से मैंने पाठशाला में उनके बारे में पढ़ा था, तब से मेरे मन में यह बात बैठ गयी थी कि उनके बारे में और जानने के लिए मुझे वहां जाना ही है। एक ओर जहां ये चाय बागान विश्व को स्वाद भरी चाय प्रदान करते हैं, वहीं दूसरी ओर ये अनेक लोगों के रोजगार और रोजी-रोटी का प्रमुख जरिया भी है।

असम चाय पत्तियों की बिनाई    
असम चाय की पत्तोयों की बिनाई
असम चाय की पत्तोयों की बिनाई

प्रत्येक चाय के बागान में तरो-ताज़ा अंकुरित चाय की पत्तियों की लगातार बिनाई की जाती है। निश्चित रूप से कहे तो, उत्तम चाय पत्ती के लिए प्रत्येक कटाई के दौरान दो पत्ते और एक अंकुर एक साथ तोड़े जाते हैं। एक सामान्य मजदूर प्रति दिन लगभग 60-80 किलो तक चाय पत्तियों की बिनाई कर सकता है और हर एक किलो के पीछे उसे लगभग 2-3 रूपये दिए जाते हैं। एक बांस की टोकरी लगभग 5 किलो तक चाय पत्तियाँ ढो सकती है और ये पत्तियाँ दिन में अनेक बार तौली जाती हैं।

आम तौर पर ये मजदूर अपना काम प्रातःकाल सूर्योदय के साथ ही आरंभ करते हैं और सूर्यास्त तक काम करते रहते हैं। इसके दौरान उन्हें दोपहर के खाने की एक छुट्टी और दो वक्त की चाय की छुट्टी दी जाती है। पत्तों के अंकुरण के आधार पर हर सुबह इन मजदूरों को उनके पर्यवेक्षक द्वारा एक क्षेत्र सौंपा जाता है और ये मजदूर कार्यरत न होने के बावजूद भी बड़े ही संगठित रूप से अपना काम करते रहते हैं। उसके बाद पूरे दिन के काम के अनुसार उन्हें मजदूरी दी जाती है।

असम चाय बागानों में श्रमिक
असम चाय बागानों में श्रमिक

यहां के अधिकतर मजदूर बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से हैं, जिन्होंने धीरे-धीरे करके इन चाय उद्यानों के इर्द-गिर्द अपने घर बसा लिए हैं। एक शाम जब हम वहां पर थे, उस समय इन थके-हारे मजदूरों को आशा भरे भाव से अपने साथियों के साथ घर जाते देख मुझे बहुत प्रसन्नता हुई।

असम चाय के बागान या एक हरा कालीन

मुझे इन हरे-भरे चाय के बागानों की सैर करना बहुत पसंद है। यद्यपि उनके आस-पास का वातावरण हमेशा उष्ण और नम रहता है, जिसके कारण लंबे समय तक वहां पर रहना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। इन बागानों में खड़े होकर अगर आप अपने चोरों ओर देखे तो दूर-दूर तक आपको सिर्फ चाय के हरे-भरे पौधे ही नज़र आते हैं, जैसे कि इस धरती पर घना हारा कालीन बिछाया गया हो।

हरा कालीन से दीखते असम चाय बगान
हरा कालीन से दीखते असम चाय बगान

असम चाय बागानों में, इन पौधों के बीच खड़े ऊंचे-ऊंचे पेड़ उनके साथ-साथ वहां पर काम कर रहे मजदूरों को भी अपनी छाया प्रदान करते हैं। कभी-कभी इन पेड़ों को मसालों के पौधों की लताओं से लपेटा जाता है, जो आपको एक ही बार में हरे रंगे के अनेक प्रकारों से रूबरू कराती हैं। यहां पर चाय पत्ती एकत्रित करनेवाले मजदूरों को आने-जाने के लिए बनवाई गयी संकरी गालियां किसी निराकार रूपरेखा के समान लगती हैं। जब ये बागान किसी ढलान पर स्थित होते हैं, तो वह पूरी पहाड़ी ही, भारी-भरकम हरी कढ़ाई के कपड़े पहने हुए किसी स्त्री की तरह लगती है।

असम चाय बागान    

हमने इस यात्रा के दौरान तेज़पुर, काजीरंगा और जोरहाट के चाय बागान देखे। वैसे तो तेज़पुर हमारे यात्रा कार्यक्रम में नहीं था, लेकिन अरुणाचल प्रदेश तक जानेवाला मार्ग बंद होने के कारण हमने वहां पर जाना ही ठीक समजा। क्योंकि, अगले दिन तक मार्ग खुलने के कोई भी आसार नज़र नहीं आ रहे थे। तेज़पुर में चाय के उद्यान के बीचोबीच बसी यह धरोहर की संपत्ति बहुत ही आकर्षक है। यहां पर बड़े-बड़े बंगले हैं, जो 100 सालों से ज्यादा पुराने हैं, लेकिन उनके रखरखाव को देखकर लगता है जैसे उनमें हमेशा से कोई रहता आया हो।

चाय अनुसंधान केंद्र, टोकलाई, जोरहाट    

चाय बागानों की हमारी यह यात्रा जोरहाट में स्थित टोकलाई के दर्शन किए बिना शायद अधूरी ही रह जाती। टोकलाई विश्व का विशालतम चाय अनुसंधान केंद्र है। यहाँ पर चाय के पौधे किस मिट्टी में उगाये जाते हैं से लेकर चाय पत्ती के संकुलन और बिक्री की प्रक्रिया तक, सभी पहलुओं पर विशेष संशोधन किया जाता है।

चाय अनुसन्धान केंद्र में कमल के फूल
चाय अनुसन्धान केंद्र में कमल के फूल

इसके अलावा यहां पर चाय के नए-नए प्रकार भी बनाए जाते है, तथा चाय पत्ती बनाने की नवीन प्रणालियों, पद्धतियों और प्रक्रियाओं पर भी ध्यान दिया जाता है। टोकलाई का परिसर बहुत ही सुंदर है, जहां पर कमल और कुमुद के फूलों से भरे कुछ तालाब हैं और विविध प्रकार के छोटे-बड़े पेड़ हैं जिन पर मौसमी पुष्प खिले हुए थे। छुट्टी का दिन होने के कारण हम वहां पर स्थित चाय का संग्रहालय तो नहीं देख पाये, लेकिन वहां का परिसर भी अपने आप में बहुत ही मनभावन था।

जोरहाट से गुवाहाटी जाते समय हमने ट्रेन की खिड़कियों से चाय के बागानों के आखरी दर्शन किए। मुझे लगता है कि इन सुंदर चाय बागानों की यात्रा के बाद तथा हम तक यह चाय पहुंचाने के पीछे छिपी कड़ी मेहनत देखने के बाद, अब से मैं अपने चाय के प्याले की और भी ज्यादा कद्र करूंगी।

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मेघालय के शिलांग शहर में क्या क्या पर्यटक स्थल देखें https://inditales.com/hindi/things-to-do-shillong-meghalaya/ https://inditales.com/hindi/things-to-do-shillong-meghalaya/#respond Wed, 06 Dec 2017 02:30:50 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=544

मेघालय – अर्थात मेघों का आलय। यह क्षेत्र हमेशा बादलों से आवृत्त रहता है। यहां पर एक भी पल ऐसा नहीं था, जब हमने आसमान में एक भी बादल ना देखा हो। वैसे तो यह बारिश का मौसम नहीं था, लेकिन मेघालय में यह नज़ारा आपको हमेशा देखने को मिलता है। पर्यटन की बात करें […]

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शिलांग शहर का दृश्य
शिलांग शहर का दृश्य

मेघालय – अर्थात मेघों का आलय। यह क्षेत्र हमेशा बादलों से आवृत्त रहता है। यहां पर एक भी पल ऐसा नहीं था, जब हमने आसमान में एक भी बादल ना देखा हो। वैसे तो यह बारिश का मौसम नहीं था, लेकिन मेघालय में यह नज़ारा आपको हमेशा देखने को मिलता है। पर्यटन की बात करें तो मेघालय उत्तर पूर्वीय भारत का सबसे संगठित राज्य माना जाता है। मेघालय की पर्यटन संबंधी विवरणिकाएं लगभग सभी जगहों पर उपलब्ध हैं। यहां के टेक्सी चालकों और स्थानीय लोगों को इन आते-जाते पर्यटकों की आदत सी हो गयी है। शिलांग में अपना पहला दिन तो मैंने इस छोटे से पहाड़ी शहर में ऐसे ही घूमते हुए बिताया और वहां के कुछ प्रसिद्ध पर्यटन स्थल देखे।

शिलांग के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल – पर्यटकों के प्रमुख आकर्षण 

डॉन बोस्को संग्रहालय 

शिलांग के डॉन बोस्को संग्रहालय में एक पुतला
शिलांग के डॉन बोस्को संग्रहालय में एक पुतला

शिलांग का डॉन बोस्को संग्रहालय एक ऐसी जगह है, जो इस पहाड़ी शहर की यात्रा करने आए हर व्यक्ति को अवश्य देखनी चाहिए। यह संग्रहालय काफी नया है जिसका उद्घाटन 2010 में ही किया गया था। आज तक मैंने भारत में जितने भी संग्रहालय देखे हैं, उन में से यह संग्रहालय उत्तम रूप से संचालित किया जाता है। यहां पर प्रदर्शित वस्तुओं को अच्छी तरह से आयोजित किया गया है। यहां की प्रकाश योजना भी बहुत बढ़िया है, जो परिदर्शकों की हलचल के अनुकूल समंजन करती है। इससे एक तो बिजली की बचत होती है और प्रदर्शित वस्तुओं को भी लगातार कृत्रिम रौशनी का सामन नहीं करना पड़ता। इसके अलावा यहां के प्रत्येक प्रदर्शन कक्ष में टच स्क्रीन कियोस्क हैं, जो आपको प्रदर्शित वस्तुओं के बारे में काफी जानकारी प्रदान करते हैं।

उत्तर पूर्वीय भारत की जनजातियों को दर्शाता प्रदर्शन कक्ष  
उत्तर पूर्व भारतीय जीवन शैली को दर्शाती वस्तुएं – डॉन बोस्को संग्रहालय – शिलांग
उत्तर पूर्व भारतीय जीवन शैली को दर्शाती वस्तुएं – डॉन बोस्को संग्रहालय – शिलांग

इस संग्रहालय में लगभग 17 प्रदर्शन कक्ष हैं, जो उत्तर पूर्वीय भारत की विभिन्न जनजातियों को दर्शाते हैं। संग्रहालय में प्रवेश करते ही वहां पर मौजूद गाइड आपको मुख्य सभागृह से होते हुए अलग-अलग प्रदर्शन कक्षों की सैर करवाते हैं, जो इस भवन के विविध मजलों पर बिखरे हुए हैं और इनमें से आधे तो भूतल के नीचे स्थित हैं। पूरे संग्रहालय की सैर करने के बाद आखिर में आप संग्रहालय के विक्रय कक्ष से अपनी मनपसंद वस्तुएं खरीद सकते हैं। यद्यपि मैंने तो यहां से अपनी कुछ मनपसंद किताबें ही खरीदी हैं, लेकिन मुझे लगता है कि ये विक्रेता इससे भी बेहतर व्यापार कर सकते हैं। अगर इन वस्तुओं की सही-सही कीमत लगा दी जाए तो राज्य के लिए आय इकट्ठा करने का यह एक अच्छा तरीका हो सकता है।

संग्रहालय के प्रवेश द्वारा से रिसेप्शन की ओर जाते समय आपको एक लंबे गलियारे से गुजरना पड़ता है। इस गलियारे के दोनों तरफ अपनी पारंपरिक वेश-भूषा पहने उत्तर पूर्वीय भारत की विभिन्न जनजातियों की महिलाओं और पुरुषों की बड़ी-बड़ी मूर्तियाँ खड़ी हैं, जैसे कि वे आपका स्वागत कर रही हों। इस संग्रहालय में विविध विषयों से संबंधित खास प्रदर्शन कक्ष हैं, जैसे कि पूर्व-इतिहास, भूमि और लोग, मछली पकड़ना, शिकार करना, कृषि प्रथाएँ, पारंपरिक प्रोद्योगिकी, संगीत वाद्य, वस्त्र, पारंपरिक कलाकृतियाँ, शस्त्र, धर्म, संस्कृति, आभूषण, वेश-भूषा, कपड़े, और चित्रकला के प्रदर्शन कक्ष।

संगीत वाद्यों, चित्रकला और कलाकृतियों के प्रदर्शन कक्ष    

मुझे विशेष रूप से यहां के संगीत वाद्यों, चित्रकला और कलाकृतियों के प्रदर्शन कक्ष बहुत पसंद आए। यद्यपि वहां के सभी प्रदर्शन कक्ष काफी आकर्षक और दर्शनीय थे, जिनमें दैनिक जीवन की लगभग सभी वस्तुएं थीं, जैसे मछली पकड़ने और शिकार करने के विभिन्न उपकरण जो बांस और बेंत से बनाए गए थे। संगीत वाद्यों का कक्ष इस क्षेत्र के पारंपरिक वाद्यों से सुंदर रूप से सजाया गया था। तथा चित्रकला और कलाकृतियों के कक्ष सर्जनशीलता का उत्कृष्ट रूप थे। कहीं-कहीं पर कुछ चित्रों और कलाकृतियों को एक दूसरे में सम्मिलित किया गया था, ताकि परिदर्शकों पर इसका उत्तम प्रभाव पड़ सके। उदाहरण के लिए यहां की एक दीवार पर एक योद्धा का चित्र बनाया गया था और उसके हाथों में असली शस्त्र दिये गए थे। इसी प्रकार यहां पर अपनी जनजाति की युद्ध पोशाख पहने, मिट्टी की बनी एक मूर्ति थी जो अपने धनुष्य को तार बांधने में लीन थी। मेरे लिए यह सब कुछ बहुत ही रोचकपूर्ण था।

आभूषण  
नागा प्रजाति का हार – डॉन बोस्को संग्रहालय
नागा प्रजाति का हार – डॉन बोस्को संग्रहालय

इस संग्रहालय की और एक बात जो मुझे बहुत आकर्षक लगी वह थी, यहां पर प्रदर्शित चाँदी और पशुओं की हड्डियों से बने विविध प्रकार के आभूषण। इन आभूषणों की व्यापक विविधता और इन में झलकती प्रत्येक जनजाति की अपनी अलग पहचान सच में एक अप्रतिम बात थी। इन वस्तुओं को नजदीक से देखने तथा समझने का यह मौका सच में अमूल्य था। इसके अतिरिक्त गोदने, कपड़े बुनने और मिट्टी के बर्तनों के विविध रूपों और आकारों को चित्रों के माध्यम से समझाया गया था।

डॉन बोस्को संग्रहालय में स्काईवॉक, शिलांग    
डॉन बोस्को संग्रहालय की छत पर स्काई वाक – शिलांग
डॉन बोस्को संग्रहालय की छत पर स्काई वाक – शिलांग

डॉन बोस्को संग्रहालय की छत स्काईवॉक के रूप में बनाई गयी है। यहां से आप अपने चारों ओर बसे शहर, तथा उसे घेरती पहाड़ियों का सुंदर नज़ारा देख सकते हैं। चित्र रूपी इस दृश्य में समाहित प्रत्येक रंग जैसे एक दूसरे के परिपूरक थे। वह नीला आसमान, घने हरे-भरे पेड़-पौधे, यहां-वहां बिखरे रंगबिरंगी घर और इमारतों की पीली छत, सारे जैसे एक-दूसरे की शोभा बढ़ा रहे थे।

यहां पर एक सभागार है, जहां पर आगंतुकों के लिए उत्तर पूर्वीय भारत के राज्यों से जुड़े कुछ चित्तरंजक विडियो प्रस्तुत किए जाते हैं और इसी के साथ एक गीत भी बजाया जाता है जिसके द्वारा शिलांग की प्रसिद्ध और देखने योग्य जगहों के बारे में थोड़ी-बहुत जानकारी दी जाती है। मुझे ये विडियो बहुत पसंद आए और इनके पीछे का उद्धेश्य वास्तव में बहुत अच्छा था। इसके अलावा यहां पर भारत के आठों उत्तर पूर्वीय राज्यों के विविध नृत्य प्रकारों को दिखानेवाले कुछ विशेष विडियो भी दिखाये जा रहे थे।

वार्डस झील, शिलांग 

वार्ड झील - शिलांग, मेघालय
वार्ड झील – शिलांग, मेघालय

जब हमे पता चला कि हमारा होटल वार्डस झील के पास ही स्थित है, तो हमे बहुत प्रसन्नता हुई। शाम के समय यह झील बहुत ही खूबसूरत दिखती है और यहां का नज़ारा भी उतना ही मनमोहक होता है। दूसरे दिन सुबह-सुबह, हम झील के किनारे बनी पत्थरों की पगडंडी पर सैर करने और आस-पास के विविध प्रकार के कमल और लिली के फूल देखने के इरादे से झील की ओर चले गए। लेकिन वहां पर पहुँचते ही प्रवेशद्वार के पास ही हमे रोका गया और बताया गया कि आगंतुकों के लिए यह द्वार 9 बजे के बाद ही खुलता है। तब तक यह पूरा परिसर विशेष रूप से स्थानीय लोगों के लिए ही खुला होता है, जो सुबह की सैर के लिए नियमित रूप से यहां पर आते हैं। जिनमें से अधिकतर वरिष्ठ सरकारी और सैन्य अधिकारी होते हैं।

यह जानकर हम थोडा बहुत निराश हुए, लेकिन बाद में विचार करने पर मुझे लगा कि वास्तव में यह सही भी है कि, ऐसी जगहों पर सबसे पहले स्थानीय लोगों का अधिकार होना चाहिए और बाद उसके पर्यटकों का। अगले दिन हमे इस सुंदर सी झील को देखने का अच्छा मौका मिला। यह झील परिदृश्यात्मक बगीचों से घिरी हुई है, जहां की जमीन प्रत्येक पग पर थोड़ी उतार-चढ़ाव जैसी है। शहर के बीचोबीच बसी यह जगह आरामदायक सैर के लिए उत्तम है। यहां पर घूमते हुए आप झील के भीतर और आस-पास बिखरे फूलों के विविध और रंगबिरंगी प्रकार देख सकते हैं। इसके अलावा आप यहां नौका विहार का आनंद भी ले सकते हैं। यहां पर लकड़ी का एक पुल भी है जिस पर से चलते हुए आप झील का सुंदर दृश्य देख सकते हैं। यहां का वातावरण और नज़ारे ही कुछ ऐसे हैं जो अपनी प्रशंसा किए बिना आपको आगे बढ्ने नहीं देते और आप जैसे प्रकृति की अद्भुतता में खो से जाते हैं।

शिलांग पीक – शिलांग की सबसे ऊंची चोटी        

शिलांग पीक से शिलांग का दृश्य
शिलांग पीक से शिलांग का दृश्य

शिलांग पीक शिलांग की सबसे ऊंची चोटी है, जो मुख्य शहर से लगभग 10 कि.मी. की दूरी पर एक पहाड़ी पर स्थित है। यहां से आप बादलों की आड़ से नीचे फैले शिलांग शहर का मनोरम दृश्य देख सकते हैं। भारत के अधिकतर पहाड़ी इलाकों में ऐसी ही चोटियाँ हैं, जहां पर पहरे की एक मीनार होती है और वहां से आप अपनी मनचाही तस्वीरें खींच सकते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि, मेघालय जैसे कि बादलों की नागरी है, तो यहां पर हर समय बादलों की चादर बिछी रहती है, इसलिए आपको या तो उनके हटने का इंतजार करना पड़ता है, या फिर उनके द्वारा निर्मित नए-नए नज़रों को आप अपने कैमरे में कैद कर सकते हैं।

शिलांग का एलिफंट फॉल्स

एलीफैंट फाल – शिलांग
एलीफैंट फाल – शिलांग

एलिफंट फॉल्स तक पहुँचने के लिए आपको शिलांग पीक तक जानेवाले मार्ग से थोड़ा विमार्ग होते हुए जाना पड़ता है। इन बहुस्तरीय झरनों की खोज अंग्रेजों द्वारा की गयी थी। कहा जाता है कि जब उनकी खोज हुई थी, तब जिस चट्टान पर ये झरने गिर रहे थे वह हाथी की पीठ जैसी लग रही थी, जिसकी वजह से उन्हें एलिफंट फॉल्स कहा जाने लगा। एक भूकंप के दौरान यह चट्टान टूट गयी लेकिन वह नाम वैसे ही बना रहा। इन झरनों के पीछे की चट्टान काले रंग की है जिस पर झरने का सफ़ेद पानी बिल्कुल विपरीत सा लगता है। इन झरनों की आवाज आप काफी दूर तक सुन सकते हैं। लेकिन उनके ठीक सामने पहुंचे बिना आप उन्हें नहीं देख पाते। इन झरनों के पास बनी सीढ़ियाँ आपको उनके तल तक ले जाती हैं, जो लगभग 150-200 फीट नीचे तक हैं। नीचे उतरते समय आप झरने के प्रत्येक स्तर पर रुककर उसकी सुंदरता का आस्वाद ले सकते हैं। नीचे जाते समय वैसे तो ज्यादा कठिनाई नहीं होती लेकिन वापस ऊपर आते समय आपको थोड़ी मुश्किल जरूर होती है।

जिस दिन हम एलिफंट फॉल्स पर गए थे उस दिन वहां पर बहुत सारे लोग थे, इसलिए डरने की कोई बात नहीं थी। लेकिन अगर आप यहां पर अकेले हों, तो यह जगह कुछ सुनसान और डरावनी सी लगती है।

ख़ासी जनजाति और उनकी वेश-भूषा 

खासी वेशभूषा
खासी वेशभूषा

शिलांग पूर्वीय ख़ासी पहाड़ी जिले में पड़ता है, जो ख़ासी जनजाति की जन्मभूमि है। शिलांग पीक और एलिफंट फॉल्स इन दोनों जगहों पर आप स्वयं ख़ासी वेश-भूषा पहनकर अपनी तस्वीरें खिंचवा सकते हैं। उनके लाल और पीले कपड़े जिसके साथ एक लंबी सी गोलाकार टोपी होती है, जिसे प्लास्टिक के फूलों और चाँदी के सूक्ष्म आभूषणों से सजाया जाता है, बहुत ही सुंदर दिखते हैं। मैंने भी इस सुंदर सी वेश-भूषा में अपनी एक तस्वीर खिंचवायी थी।

शिलांग के अन्य पर्यटन स्थल    

हैदरी पार्क और ज़ू एक और ऐसी जगह है जो अधिकतर पहाड़ी इलाकों में पायी जाती है। यह एक पार्क है जिसमें एक छोटा सा ज़ू होता है। अगर आप कुछ समय के लिए यहां पर ठहरे हुए हों, तो यह स्थान आरामदायक सैर के लिए बहुत अच्छा है। इसके अलावा यहां पर देखने लायक और भी बहुत सी चीजें हैं, जैसे कि कीटविज्ञान संग्रहालय और राज्य संग्रहालय तथा पुस्तकालय जहां पर जाने की मेरी बहुत इच्छा थी। यहां के टेक्सी चालकों की स्थल अवलोकन सूची में ये स्थल मौजूद नहीं थे। उनकी सूची में तो शहर के कुछ ही गिने-चुने पर्यटन स्थल थे, जहां पर वे आपको ले जाते थे। अगर इन स्थलों के अलावा उन्हें और किसी भी स्थान पर ले जाने के लिए कहा जाए तो उनका सीधा जवाब होता था कि उन्होंने इन जगहों के बारे में पहले कभी नहीं सुना था और वैसे भी उन जगहों पर तो कोई भी नहीं जाता तो आप वहां पर क्यों जाना चाहते हैं। ऐसे में मैं अपने टेक्सी चालक तथा उसकी जाति के अन्य चालकों को ठीक से मनाने में नाकाम रही, जिसकी वजह से मैं यहां-वहां के कुछ स्थान नहीं देख पायी।

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अरुणाचल प्रदेश की मंत्रमुग्ध करने वाली टेंगा घाटी की यात्रा https://inditales.com/hindi/arunachal-pradesh-tenga-valley/ https://inditales.com/hindi/arunachal-pradesh-tenga-valley/#comments Wed, 29 Mar 2017 02:30:32 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=191

टेंगा घाटी – परिदृश्य, झरने, ओर्किड फूल और कीवी फल पूर्वोत्तर क्षेत्रों में यात्रा करते समय एक बात जरूर ध्यान में रखनी चाहिए कि, आपकी यात्रा कभी भी योजनानुसार पूरी नहीं होती। आपको न चाहते हुए भी परिस्थिति के आगे झुककर अंतिम समय पर अपनी योजनाओं में बदलाव करने पड़ते हैं। यहां पर या तो […]

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टेंगा घाटी अरुणाचल प्रदेश
टेंगा घाटी अरुणाचल प्रदेश

टेंगा घाटी – परिदृश्य, झरने, ओर्किड फूल और कीवी फल

पूर्वोत्तर क्षेत्रों में यात्रा करते समय एक बात जरूर ध्यान में रखनी चाहिए कि, आपकी यात्रा कभी भी योजनानुसार पूरी नहीं होती। आपको न चाहते हुए भी परिस्थिति के आगे झुककर अंतिम समय पर अपनी योजनाओं में बदलाव करने पड़ते हैं। यहां पर या तो कोई बन्द होता है या फिर राहबंदी होती है जिसके कारण आपको मजबूरन अपनी पूर्व नियोजित यात्रा स्थितिनुसार बदलनी पड़ती है। ऐसी घटनाओं की ना ही कोई पूर्व सूचना दी जाती है और ना ही उनसे संबंधित कोई भी समाचार आपको आसानी से उपलब्ध होता है। इंटरनेट के जरिये तो, इन घटनाओं से जुड़ी खबरों की अपेक्षा करना व्यर्थ है। इसलिए आपको स्थानीय समाचारों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। ऐसी ही एक घटना हमारे साथ भी घटी। अरुणाचल प्रदेश की टेंगा घाटी पर जाते हुए रास्ते में अरुणाचल – असम की सीमा पर बन्द था और किसी भी वाहन को सीमा पार करने की अनुमति नहीं थी। इस वजह से हमे वहीं पर रुकना पड़ा और अंत में तेज़पुर के चाय बागान में रात गुजारनी पड़ी, जिसके बारे में मैं बाद में लिखूँगी।

अरुणाचल प्रदेश में घूमने के लिए अनुमति की आवश्यकता

आर्किड का खिला हुस फूल
आर्किड का खिला हुस फूल

अरुणाचल प्रदेश में जाने के लिए आपको पहले राज्य से अनुमति प्राप्त करनी पड़ती है। इसके लिए आपको अनुमति पत्र भरकर उसके साथ अपना फोटो और पहचान पत्र की प्रति देनी पड़ती है। इससे संबंधित सारी प्रक्रिया आप दिल्ली, गुवाहाटी और शिलांग में स्थित अरुणाचल प्रदेश के केंद्र से पूरी कर सकते हैं। मैं अपना अनुमति पत्र प्राप्त करने के लिए शिलांग में स्थित अरुणाचल केंद्र में गयी। मैंने जरूरत के सारे कागजात दे दिये और शुल्क भी भर दिया। लेकिन मुझे अनुमति पत्र लेने के लिए तीन दिन बाद आने के लिए कहा गया। मैंने उन्हें समझाया कि मुझे यह अनुमति पत्र आज ही चाहिए, क्योंकि, हम दूसरे दिन ही अरुणाचल प्रदेश जानेवाले थे। तब वहीं की एक औरत और आदमी ने सिर्फ आधे घंटे में ही मेरा अनुमति पत्र मुझे दे दिया। अब मुझे अनुमति पत्र तो मिल गया लेकिन उसके अनुसार आप राज्य में ऐसे ही कहीं पर भी नहीं घूम सकते। इसके लिए आपको पहले से ही स्पष्ट करना पड़ता है कि, उपलब्ध तीनों रस्तों में से आप कौन से प्रवेश मार्ग से जाना चाहेंगे तथा कौन-कौन सी जगहों पर घूमना चाहेंगे और किस दिन जाना पसंद करेंगे। मैंने भी वही किया। आम तौर पर यह अनुमति पत्र 15 दिनों के लिए जारी किया जाता है।

अनुमति पत्र की जाँच पद्धति की आवश्यकता

अरुणाचल के छलछलाते झरने
अरुणाचल के छलछलाते झरने

मैंने भालुकपोंग, बोमड़ीला और तवांग क्षेत्रों में जाने के लिए अनुमति पत्र लिया। अनुमति पत्र प्राप्त करने की अनिवार्यता को मद्दे नज़र रखते हुए मुझे लगा कि शायद हमे राज्य की सीमा पर पहुँचने के बाद अपने आपको सत्यापित करने के लिए इस अनुमति पत्र को पेश करना पड़ेगा। लेकिन जब हमने राज्य की सीमा में प्रवेश किया तो वहां पर मौजूद किसी भी व्यक्ति को ना ही हमसे कोई मतलब था और ना ही हमारी गाड़ी से। सीमा पर हमारे अनुमति पत्रों की जाँच करने लिए कोई भी व्यक्ति नहीं आया। यह देखकर हम थोड़े हैरान से हो गए, कि इतनी लापरवाही कोई कैसे का सकता है। ऐसा भी हो सकता था कि 2 व्यक्तियों के पास ही अनुमति पत्र हो और बाकी दोनों के पास शायद अनुमति पत्र ना हो। लेकिन इसपर कोई कार्यवाही नहीं होती। हमारे ड्राईवर ने अपना ड्राइविंग लाइसेंस और हमारे पास चेक पोस्ट पर ले जाकर दिखाये और अनिवार्यता के तौर पर कुछ पैसे देकर हम वहां से आगे बढ़े। कुछ ही पलों में हम अरुणाचल प्रदेश में पहुँच गए थे।

इन सारी बातों पर विचार करते हुए मुझे लगा कि, अनुमति पत्र प्राप्त करने की आवश्यकता ही क्या थी। पहले तो, इस देश की नागरिक होने के रूप में मुझे इसी देश के एक पूरे राज्य में घूमने के लिए किसी खास अनुमति की जरूरत ही क्या है? मैं समझ सकती हूँ कि अरुणाचल प्रदेश काफी बड़ा राज्य होने के नाते उसमें कुछ संवेदनशील इलाके भी हो सकते हैं। और अगर किसी कारणवश ऐसे क्षेत्रों में जाने के लिए अनुमति पत्र की आवश्यकता है, तो मुझे लगता है कि अनुमति पत्र जारी करने के पीछे का पूरा उद्देश्य ही कहीं ना कहीं कार्यान्वयन के स्तर पर असफल रह गया है।

टेंगा घाटी के मार्ग में उल्लसित झरने

इन झरनों का विडियो देखिये।

भालुकपोंग की सड़कें

भालुकपोंग से आने जाने वाली सड़कों को देखकर ऐसा लगता है, जैसे किसी समय में शायद ही यहां पर ठीक-ठाक मार्ग हुआ करते थे। इन सड़कों की हालत बहुत ही खराब है। लेकिन आस-पास का वातावरण देखकर लगता है जैसे उनके सुधारणीकर का काम जल्द ही शुरू होने वाला है। यहां की कटी हुई पहाड़ियाँ भी इसी बात की ओर संकेत करती हैं कि यहां पर बहुत जल्द पक्की सड़क बनने वाली है। लेकिन कभी-कभी आँखों देखा झूठ भी होता है। हमारे ड्राईवर और वहां के स्थानीय लोग ने हमे बताया कि वहां पर रखे हुए मलबे सालों से वहीं पर पड़े हुए हैं। और आज तक वहां पर सड़क का कोई काम नहीं हुआ है। लेकिन अगर किसी दिन इस सड़क का काम शुरू हो गया और नयी सड़क बन गयी तो उन्हें बहुत आश्चर्य होगा। इस पूरे क्षेत्र की सड़कें देखे तो, सिर्फ सेना बस्तियों के आस-पास की सड़कें ही सुव्यवस्थित हैं। वास्तव में भालुकपोंग की सड़कें देखकर आपको अपने गाँव-शहर की सड़कें याद आती हैं।

अरुणाचल प्रदेश का प्रकृतिक सौंदर्य

अरुणाचल के पर्वत और नदियाँ
अरुणाचल के पर्वत और नदियाँ

जैसा कि कहा जाता है, स्वर्ग का मार्ग नर्क से होकर गुजरता है। भालुकपोंग से जैसे ही आप 20 कि.मी. की दूरी, जो कि 200 कि.मी. जैसी लगती है, पार करते हैं, आप अरुणाचल प्रदेश की पहाड़ियों और घाटियों में पहुँचते हैं, जिनकी खाड़ियों से नदियां बहती हैं। स्वर्ग जैसा दिखनेवाला यह अद्भुत दृश्य आपको मंत्रमुग्ध कर देता है। मैंने इससे पहले देवदार के इतने हरे भरे घने जंगलों से आवृत्त पहाड़ियाँ कभी नहीं देखी थी। इन पहाड़ियों पर यहां-वहां से बहते हुए झरने नीचे बह रही नदियों से मिलने के लिए चंचलता से दौड़ते रहते हैं। यहां कदम कदम पर आपको जंगली फूल मिलते हैं, जो पत्थरों से, पेड़ों के तने से और झड़ियों से बाहर झाकते हुए नज़र आते हैं। ये फूल कहीं भी और कभी भी खिलते हैं।

ओर्किड के फूल और उनकी सरकारी फुलवाड़ी

ऑर्किड फूल
ऑर्किड फूल

अरुणाचल प्रदेश ओर्किड फूलों के विभिन्न प्रकारों का घर है। भालुकपोंग की सीमा से लगभग 5 कि.मी. की दूरी पर बसे हुए टिपि शहर में ओर्किड की सरकारी फुलवाड़ी है। यहां ओर्किड के फूलों पर अनुसंधान किया जाता है और उनके 750 से भी अधिक प्रकार उगाये और उत्पन्न किए जाते हैं। लेकिन जब हम वहां गए तो हमे वहां पर सिर्फ तीन प्रकार के ही ओर्किड देखने को मिले। शायद हमारे वहां जाने का समय ही ठीक नहीं था। हम इन फूलों को प्रत्यक्ष रूप से तो नहीं देख पाये लेकिन उनके विभिन्न प्रकारों को हमने जरूर देखा। वहां पर एक छोटा सा संग्रहालय है जहां पर ओर्किड के विभिन्न प्रकारों को तस्वीरों और चित्रों के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है।

ओर्किड के इन विविध प्रकारों को देखने के लिए हमे सेस्सा के ओर्किड अभयारण्य में जाने के लिए कहा गया। ये अभयारण्य भालुकपोंग और टेंगा घाटी के बीच रास्ते पर ही पड़ता है। टेंगा घाटी पर जाते समय हम वहां पर नहीं जा पाये लेकिन, घाटी से वापस आते समय हम या अभयारण्य देखने जरूर गए। जहां पर हमने तरह-तरह के ओर्किड देखे, जो एक से बढ़कर एक थे।

सेस्सा का ओर्किड अभयारण्य

इस जगह का प्रवेश द्वार देखते ही आप जान जाते हैं, कि आप ओर्किड के अभयारण्य में प्रवेश कर रहे हैं। इसके आगे आपको ओर्किड के जंगल ही जंगल दिखाई देते हैं। अगर आप इन जंगलों में घूमना चाहते हैं तो अपने बलबूते पे जा सकते हैं। हम लगभग 150 फीट कि दूरी तक इन जंगलों में घूमते रहे, जिसके दौरान हमने ओर्किड के काफी सारे प्रकार देखे। सेस्सा का यह ओर्किड अभयारण्य टीपी के सुव्यवस्थित ओर्किड फुलवाड़ी से ज्यादा अच्छा था।

आर्किड फूल
आर्किड फूल

वहां के एक स्थानीय व्यक्ति जो विनम्रतापूर्वक अरुणाचल की यात्रा के समय हमारे साथ आए थे, हमे एक किसान के पास ले गए जो ओर्किड की खेती करते हैं। वह किसान हमे अपने खेत में ले गए, जहां पर उन्होंने हमे ओर्किड के कुछ दिलचस्प प्रकार दिखाये तथा उनके बारे में थोड़ी-बहुत जानकारी भी दी और ओर्किड से जुड़ी अर्थव्यवस्था को भी समझाया। जैसे-जैसे आप पहाड़ी के ऊपर जाते हैं, वहां का वातावरण ओर्किड के फूलों के लिए और भी बढ़िया होता जाता है।

आर्किड अभ्यारण
आर्किड अभ्यारण

यहां पर रास्ते के किनारे आपको ओर्किड के बहुत सारे जंगली प्रकार भी देखने को मिलते हैं। जिन्हें देखने के लिए आपको बार-बार गाड़ी रोकनी पड़ती है, जो यहां के घुमावदार और संकीर्ण रास्तों के लिए बहुत ही खतरनाक और चुनौती भरा कार्य है। यह सब देखते हुए मुझे लगा कि, हम इस रास्ते से पैदल क्यों नहीं जा सकते? क्योंकि अगर ऐसा होता तो हम आराम से इन फूलों को देख पाते तथा उनकी तस्वीरें खिचने का इससे बढ़िया मौका आपको नहीं मिलता।

अरुणाचल से जुड़े उपाख्यान

अरुणाचल प्रदेश भारत का एक ऐसा भाग है, जहां तक अंग्रेजों की सत्ता कभी पहुँच नहीं पायी। जिसकी वजह से यह जगह अंग्रेजों के प्रभावों से मुक्त है और यहां पर आपको अंग्रेज़ कालीन कोई भी संरचना नहीं दिखाई देती। लेकिन, आज अगर इस बात पर विचार किया जाए तो यह बात बहुत असामान्य सी लगती है। अरुणाचल से जुड़े उपाख्यान के अनुसार माना जाता है कि, जब पहले पहल अंग्रेज अधिकारियों ने अरुणाचल में प्रवेश करने की कोशिश की थी तब, उस क्षेत्र की स्थानीय आदिवासी जमातीयों ने, जो वहां पर अपना शासन चला रही थीं, अंग्रेजों के सिर धड़ से अलग कर उन्हें वापस असम भेज दिया था। इस घटना से आस-पास के गांवों में यह मिथक फैल गया कि उस क्षेत्र के आदिवासी लोग मनुष्यों का भक्षण करते हैं। इसके बाद घने जंगलों से आवृत्त इस क्षेत्र में प्रवेश करने का साहस किसी ने नहीं किया। अंग्रेजों की सत्ता असम की परिधि पर बसे बालिपारा गाँव तक ही सीमित थी। इसके आगे के क्षेत्रों को अंग्रेजों द्वारा बालिपारा सीमा-प्रदेश कहा जाता था।

अरुणाचल प्रदेश पहले असम का ही एक भाग हुआ करता था, लेकिन बाद में 1971 में उसे केंद्र शासित प्रदेश घोषित किया गया। उसके बाद 1987 में अरुणाचल प्रदेश एक स्वतंत्र राज्य बन गया। क्षेत्रीय रूप से देखे तो आज यह उत्तर पूर्वीय भारत का सबसे बड़ा राज्य है जो 16 जिलों में विभाजित है।

अरुणाचल की भाषा

भाषा के संदर्भ में बात करें तो अरुणाचल प्रदेश की सबसे अनपेक्षित बात यह थी कि, हिन्दी भाषा के साथ अंग्रेजी भाषा भी यहां की राजभाषा है। यहां के लोग बहुत अच्छी हिन्दी बोलते हैं। लेकिन उनकी यही शिकायत रहती है कि, जब भी वे भारत के अन्य भागों में घूमने जाते हैं, तब उन्हें चीनी कहकर पुकारा जाता है। जबकि वे स्पष्ट हिन्दी बोलते हैं और इसके साथ दिल्ली की भाषा भी ठीक-ठाक बोल लेते हैं। मुझे बताया गया कि हिन्दी यहां की प्रमुख संपर्क भाषा है, क्योंकि, यहां पर प्रत्येक आदिवासी प्रजाति की अपनी बोली होती है। इन बोलियों की संख्या 50 से भी अधिक है। अरुणाचल की इन आदिवासी प्रजातियों के प्राचीन जड़ों की ज्यादा जानकारी तो नहीं मिलती, यद्यपि महाभारत में इस जगह का संदर्भ जरूर मिलता है।

अरुणाचल में कृष्ण – रुक्मिणी

अरुणाचल प्रदेश के पूर्वीय भाग में स्थित मालिनीथान में हाल ही में हुए उत्खनन के दौरान कुछ प्राचीन हिन्दू मंदिरों का उद्घाटन हुआ है, जो कृष्ण-रुक्मिणी के उपाख्यानों से जुड़े हैं। यहां के अधिकतर आदिवासी लोग डोनियो पोलो को अपने धर्म के रूप में अपनाते हैं, जिसमें वस्तुतः सूर्य और चंद्रमा को पूजा जाता है। या फिर सामान्य तौर पर प्रकृति के तत्वों को पूजा जाता है। दीर्घ काल तक उनके पास धर्म का कोई भी सुव्यवस्थित रूप नहीं था। लेकिन अब वे आधिकारिक धर्म की ओर बढ़ते जा रहे हैं, जिनमें से अधिकतर व्यक्ति हिन्दू धर्म या बौद्ध धर्म का चुनाव करते हैं। अरुणाचल प्रदेश के उत्तर पश्चिमी भाग में, जहां पर तवांग मठ स्थित है, मूलतः बौद्ध धर्म के लोग रहते है। यहां पर ईसाई धर्म के भी कुछ लोग मानते हैं।

अरुणाचल के व्यवसाय

कीवी के बाग़
कीवी के बाग़

अरुणाचल प्रदेश के लोग आज भी खेती का व्यवसाय करते हैं, जो यहां का मूल व्यवसाय है। ऐसा लगता है जैसे बड़े लंबे समय तक लकड़ी बेचना यहां का प्रमुख व्यवसाय रहा है। इसके चलते बहुत से पहाड़ अपने पेड़ों की कुर्बानी देते-देते नंगे होते जा रहे थे। लेकिन पिछले कुछ सालों में सरकार ने पेड़ों की कटाई पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा दिया है। जिसके कारण अब ये पहाड़ फिर से हरे-भरे होते जा रहे हैं। यहां का पहाड़ी वातावरण विभिन्न प्रकार के फूलों और फलों की खेती के लिए बहुत अच्छा है। टमाटर यहां की प्रमुख नकदी फ़सल है। हमने यहां पर कीवी और सेब के बड़े-बड़े बागान भी देखे। तथा टेंगा घाटी में गुलाब और ओर्किड के बाग भी देखे। टेंगा घाटी अरुणाचल प्रदेश की एक छोटी सी नगरी है। यहां पर सेना की विशाल बस्तियाँ हैं, जिनमें से ज़्यादातर घर इस घाटी से बहती हुई नदी के किनारे पर ही बसे हुए हैं। यहां के हमारे मेज़बान मित्र का घर भी बहुत सुंदर है जो इसी नदी के मोड पर बसा हुआ है। ईगलनेस्ट वन्यजीव अभयारण्य भी टेंगा घाटी के नजदीक ही स्थित है, लेकिन वहां पर घूमने के लिए आपको सही मौसम का इंतेजर करना पड़ता है।

श्रीमान और श्रीमती ग्लोव की मैं बहुत आभारी हूँ कि उन्होंने टेंगा घाटी में हमारे मेज़बान के रूप में हमारी बहुत अच्छी आव-भगत की।

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