काव्य यात्रा Archives - Inditales श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Mon, 12 Jun 2023 04:46:01 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.7.4 एकला चलो रे – रवींद्रनाथ ठाकुर का सुप्रसिद्ध बंगला गीत https://inditales.com/hindi/ekla-chalo-re-hindi-rabindranath-thakur/ https://inditales.com/hindi/ekla-chalo-re-hindi-rabindranath-thakur/#comments Wed, 05 May 2021 02:30:23 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2244

हम शांतिनिकेतन में थे। सम्पूर्ण वातावरण में ‘एकला चलो रे’ का स्वर गूंज रहा था। मैं कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा स्थापित शांतिनिकेतन के प्रत्येक तत्व को देख रही थी एवं अनुभव कर रही थी। एक ठेठ बंगाली गाँव के ग्रामीण परिवेश की छाप लिए इस शांतिनिकेतन में चारों ओर रवीन्द्रनाथ ठाकुर के पदचिन्ह एवं उनकी […]

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हम शांतिनिकेतन में थे। सम्पूर्ण वातावरण में ‘एकला चलो रे’ का स्वर गूंज रहा था। मैं कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा स्थापित शांतिनिकेतन के प्रत्येक तत्व को देख रही थी एवं अनुभव कर रही थी। एक ठेठ बंगाली गाँव के ग्रामीण परिवेश की छाप लिए इस शांतिनिकेतन में चारों ओर रवीन्द्रनाथ ठाकुर के पदचिन्ह एवं उनकी धरोहर की झलक स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है।

बाउल गायक के स्वरों में ‘एकला चलो रे’ का विडिओ

शांतिनिकेतन के कलात्मक वातावरण में मेरे सम्पूर्ण अनुभव की चरमसीमा थी, बाउल गायक श्री प्रदीप दास बाउल द्वारा गाया हुआ ‘एकला चलो रे’ गीत का श्रवण। इससे पूर्व मैंने अनेक प्रसिद्ध गायकों को यह गीत गाते सुना था। उनमें बंगाली मूल के गायक भी सम्मिलित हैं। किन्तु प्रत्यक्ष एक बाउल गायक के समक्ष बैठकर उन्हे यह गीत गाते सुनना एक अविस्मरणीय अनुभव था। चारों ओर कण कण में विराजमान रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कलात्मक परिकल्पना के मध्य उन्ही द्वारा रचित गीत को सुनना इस अनुभव को अतुलनीय बना रही थी।

‘एकला चलो रे’ के बोल

Ekla Chalo Re Hindi Lyricsजब वापिस घर पहुंची, श्री प्रदीप दास बाउल के स्वर मेरे कानों में गूंज रहे थे। सम्पूर्ण अनुभव की स्मृतियाँ मेरे मानसपटल पर छायी हुई थीं। अब समय था उस गीत के बोल को समझने का। इसमें गूगल एवं विकिपिडिया ने मेरी पूर्ण सहायता की। वहाँ से मुझे गीत के बोल के साथ उसका अर्थ भी ज्ञात हुआ। कुछ दिनों तक किशोर कुमार जैसे प्रसिद्ध गायकों द्वारा गाए हुए इस गीत के सुर में सुर मिलाते हुए मैंने भी अनेक बार इस गीत को गाया। गीत गाते हुए शनैः शनैः उन शब्दों में छुपे अर्थ मेरे समक्ष स्पष्ट होने लगे।

किशोर कुमार के स्वर में ‘एकला चलो रे’ का विडिओ

‘एकला चलो रे’ इस गीत की रचना रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने सन् १९०५ में एक पत्रिका ‘भंडार’ के लिए की थी। इसके पश्चात ‘बाउल’ नामक एक संकलन में इसका प्रकाशन हुआ था। यद्यपि मुझे इस संकलन के विषय में अधिक जानकारी नहीं है, तथापि मैं इस संकलन के विषय में जानने हेतु आतुर हूँ। कालांतर में एक अन्य संकलन ‘गीताबितान’ के स्वदेशी खंड में भी इसका प्रकाशन किया गया था। इस गीत को रवीन्द्रनाथ ठाकुर की भांजी इंदिरा देवी ने स्वरबद्ध किया था।

गीत का भावार्थ

इस गीत को स्वयं रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने रिकार्ड किया था किन्तु दुर्भाग्यवश वह रिकार्ड अब खो गया है। किन्तु यह गीत अब बंगाली संस्कृति का एक अभिन्न अंग हो गया है। स्वयं रवीन्द्रनाथ ठाकुर के स्वरों को छोड़कर अन्य अनेक गायकों के स्वर में यह गीत उपलब्ध है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर की आवाज में इस गीत को ढूंढते समय मेरे हाथों में एक बाउल गायक द्वारा गाया गया यही गीत हाथ लगा। इस संस्करण में आप दो-तारे की ध्वनि को स्पष्ट सुन सकते हैं। दो-तारा एक संगीत वाद्य है जिसमें दो तार होते हैं। यह वाद्य बंगाल के बाउल गायकों का प्रिय वाद्य है।

दो-तारा संगीत वाद्य की संगत के साथ शास्त्रीय गायन शैली में प्रस्तुत इसी गीत का एक विडिओ

व्यक्तिगत रूप से मैं स्वयं को इस गीत से जुड़ा हुआ अनुभव करती हूँ। अपने अधिकतम जीवन की यात्रा मैंने अकेले ही पार की है।

मन्ना डे को एकला चलो रे के हिन्दी संस्करण को गाते हुए सुनिए।

जब रवीन्द्रनाथ ठाकुर कहते हैं, ’जब कोई आपकी पुकार ना सुने, तो अकेले ही चलते रहिए’। इसे सुनकर मुझे अपने जीवन के अनेक मोड़ों का स्मरण होता है जब मैं यथार्थतः उसी स्थिति में थी। मैं जब भी कहीं जाना चाहती थी, मैं अनेक लोगों से साथ आने के लिए आग्रह करती थी। किन्तु जब कोई मेरी पुकार नहीं सुनता था तो मैं अकेले ही चल पड़ती थी। जब वापिस आती थी तब वे सब मेरे साथ उस पथ पर चलने की इच्छा व्यक्त करते थे।

अकेले चलने के लिए प्रेरित करता यह गीत आपको उन सब का साथ प्रदान करता है जो उस पथ पर अकेले चलते हुए अपनी छाप छोड़ गए हैं।

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जब आप दुखी होते हैं तब आप ऐसे किसी सहारे को ढूंढते हैं जो आपको सांत्वना दे सके। सामान्यतः आवश्यकता के समय ऐसी कोई सांत्वना हमें नहीं मिलती। उस स्थिति में अकेले ही अपनी समस्या से जूझते हुए आगे बढ़ना उचित है। यदि आप विश्व के दृष्टिकोण को परिवर्तित करना चाहते हैं तो सर्वप्रथम अपने भीतर ऐसा दीप प्रज्ज्वलित करें जो विश्व को एक नवीन पथ से अवगत कराए। नवीन पथ की रचना में स्वयं को झोंक देना पड़ता है, वह भी अकेले ही।

श्रेया घोषाल के स्वर में ‘एकला  चलो रे’ का विडिओ

यह गीत अस्तित्व के प्रत्येक स्तर पर प्रतिध्वनित होता है। व्यावहारिक स्तर पर इस गीत का संकेत है कि हमें प्रत्येक क्षण किसी ना किसी का सहारा प्राप्त हो ऐसा संभव नहीं है। भावनात्मक स्तर पर हम सब कभी ना कभी एकाकी अनुभव करते हैं, भले ही हम लोगों से घिरे हुए ही क्यों ना हों। आध्यात्मिक स्तर पर यह गीत संदेश देता है कि हम सब को अकेले ही चलता पड़ता है। एक साधक कभी भी समूह में नहीं चलता, जैसा कि एक भक्तिगीत में भी कहा गया है, ‘साधु ना चले जमात’।

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यह एक प्रेरणादायक गीत है। यह एक ऐसा गीत है जो आपको उस समय सहारा दे सकता है जब आपको उसकी अत्यधिक आवश्यकता है। यह आपको समक्ष स्थित संकट से विचलित ना होने का संदेश देता है। यह आपको आंतरिक शक्ति प्रदान करता है तथा सांत्वना देता है कि आप जिस विपरीत परिस्थिति में है, दूसरे भी इस प्रकार की स्थिति में अनेक बार आते हैं।

अमिताभ बच्चन के स्वर में ‘एकला  चलो रे’ का विडिओ

कुछ समय पूर्ण यह गीत पुनः चर्चा में आया था तथा प्रसिद्धि की सीमाएं लांघ गया था जब प्रसिद्ध अभिनेता अमिताभ बच्चन ने अपने प्रतिष्ठित स्वर में ‘कहानी’ नामक चित्रपट में यह गीत गाया था।

एकला चलो रे - रबिन्द्रनाथ ठाकुर यूं तो इस गीत को अनेक प्रसिद्ध लोगों ने अपनी अपनी शैली में गाकर इसे उतनी ही गरिमा प्रदान की है। उनमें से कुछ मैंने आपके लिए इस संस्करण में प्रस्तुत किया है। आशा है आपको इन्हे सुनकर अत्यंत आनंद आया होगा। रवीन्द्रनाथ ठाकुर के इस गीत का कौन सा संस्करण आपको सर्वाधिक प्रिय प्रतीत हुआ? क्या आप इस गीत का कोई अन्य संस्करण भी जानते हैं? यदि हाँ, तो हमें अवश्य सूचित करें।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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संत कबीर का काव्य, भक्ति, दर्शन और जीवन परिचय https://inditales.com/hindi/sant-kabir-ek-parichay/ https://inditales.com/hindi/sant-kabir-ek-parichay/#comments Wed, 19 Aug 2020 02:30:46 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1972

संत कबीर १५ वीं. शताब्दी के अंत से १६ वीं. शताब्दी के आरंभ तक की समयावधि में एक जुलाहा होने के साथ साथ एक प्रसिद्ध संत कवि थे। यह भारत में भक्ति आंदोलन का काल था। राजनैतिक दृष्टि से इस काल अवधि में इस्लामी शासक सम्पूर्ण भारत में अपना आधिपत्य स्थापित करने का प्रयत्न कर […]

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संत कबीर १५ वीं. शताब्दी के अंत से १६ वीं. शताब्दी के आरंभ तक की समयावधि में एक जुलाहा होने के साथ साथ एक प्रसिद्ध संत कवि थे। यह भारत में भक्ति आंदोलन का काल था। राजनैतिक दृष्टि से इस काल अवधि में इस्लामी शासक सम्पूर्ण भारत में अपना आधिपत्य स्थापित करने का प्रयत्न कर रहे थे। वे हिंदुओं को नाना प्रकार से प्रताड़ित कर रहे थे। उस समय सभी हिन्दूओं ने भक्ति मार्ग का आसरा लिया । उन्होंने देवी-देवताओं की शरण ली, उनकी स्तुति गाने लगे तथा उनमें आसरा ढूंढने लगे।

संत कबीरकबीर हिन्दू थे अथवा मुसलमान, इस विवाद का समाधान कदाचित हमें कभी प्राप्त नहीं हो पाएगा। नीरू व नीमा, इस मुसलमान जोड़े ने कबीर का पालन-पोषण किया तथा स्वामी रामानन्द उनके गुरु थे। नीरू एवं नीमा की समाधियाँ बनारस के कबीर मठ में स्थित हैं। कबीर की रचनाएं विभिन्न भारतीय शास्त्रों में उनके ज्ञान एवं पकड़ का प्रमाण हैं। उनकी रचनाओं में वैदिक साहित्य, शरीर-रचना, प्राणी व वनस्पति शास्त्र, दर्शन-शास्त्र तथा बुनाई सम्मिलित है।

कबीर की रचनाओं के अनेक रूप मिलते हैं, जैसे साखी, शबद, रमैनी, उलटभाषी तथा वसंत। साखी का मूल शब्द है, साक्षी अर्थात देखा हुआ। कबीर की रचनाओं में कई दोहे हैं जिनके विषय में कहा जाता है कि उनकी रचना उन्होंने तब की जब उन्होंने ऐसा कुछ देखा जिसने उनके मन-मस्तिष्क में अनेक विचार उत्पन्न किये। उनके अधिकतर साखी हमारे समक्ष एक सम्पूर्ण दृश्य एक विचार लिए हुए ज्ञान के मोती का बोध कराते हैं।

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कबीर की अधिकतर रचनाएं मौखिक रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित हुई हैं। यही कारण है कि इनके विभिन्न संस्करणों में हम शब्दों का हेर-फेर पाते हैं। उदाहर के लिए उनकी एक रचना है, ‘पानी में मीन प्यासी’। इसकी दूसरी पंक्ति कुछ लोग ‘मोहे सुन सुन आवे हासी’ गाते हैं तो कुछ इसे ‘मोहे देखत आवे हासी’ गाते हैं। यद्यपि दो संस्करणों का अर्थ तथा ध्येय एक ही होता है, किन्तु शब्द कभी कभी परिवर्तित हो जाते हैं। कबीर अपनी रचनाओं में स्वयं को दास कबीर के नाम से संबोधित करते हैं। किन्तु वर्तमान में उनकी रचनाओं को गाते समय उन्हे कभी कभी दास कबीर के स्थान पर संत कबीर कहकर भी संबोधित किया जाता है।

यदि आप मालवा अथवा राजस्थानी गायकों के मुख से कबीर के दोहे सुनेंगे तब आप पाएंगे कि वे कई आम शब्दों को स्थानीय भाषा में परिवर्तित कर देते हैं। उसी प्रकार आधुनिक गायक शब्दों को संस्कृत युक्त हिन्दी में परिवर्तित कर देते हैं।

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कबीर एक व्यक्तिमत्व ना होते हुए बहती नदी की धारा थे। उन्होंने एक विचारधारा आरंभ की थी। तत्पश्चात अनेक विचारधाराएं आकर उनसे जुड़ने लगीं। आज हम निश्चित रूप से यह नहीं बता सकते कि उन्होंने क्या रचा तथा कालांतर में उनकी रचना में क्या जुड़ा। यद्यपि उनकी रचनाएं गहन हैं तथापि वे पारंपरिक ना होते हुए लोकशैली में है।

बूंद जो पड़ी समुद्र में, सो जाने सब कोई, समुद्र समाना बूंद में, बूझै बिरला कोई।।

कबीर- एक फकीर

मेरे लिए कबीर सर्वप्रथम एक फकीर थे। बोलचाल की भाषा में फकीर का अर्थ भिखारी हो जाता है। किन्तु फकीर का सही अर्थ है, वह व्यक्ति जो सभी सांसारिक मोह व बंधनों से मुक्त है। फकीर वह है जो सभी सुख-संपत्ति प्राप्त करने में सक्षम है किन्तु स्वेच्छा से न्यूनतम सुविधाओं में जीवन यापन करता है। वह किसी भी प्रकार के सामाजिक दबाव से प्रभावित नहीं होता तथा इसी कारण वह विचारों से स्वच्छंद होता है।

चाह गई चिंता मिटी, मानुवा बे-परवाह,

जिनको कुछ ना चाहिए, वो शाहन के शाह।।  

मन लाग्यो मेरो यार फकीरी में

कबीर निर्गुण भक्ति में विश्वास करते थे। उनकी यही विशेषता उन्हे अन्य समकालीन कवियों से भिन्न बनाती है। अन्य समकालीन कवि सगुण भक्ति में विश्वास रखते थे। सगुण भक्ति का अर्थ है भगवान को किसी ना किसी रूप में देखना। मीरा बाई तथा सूरदास भगवान को कृष्ण के रूप में कल्पना करते थे वहीं तुलसीदास के लिए भगवान का अर्थ श्री रामचन्द्र था। संभवतः कबीर इकलौते कवि थे जिनके लिए भगवान का कोई रूप नहीं था। उनकी पुकार उस भगवान के लिए थी जिनका कोई रूप नहीं है, अपितु जो प्रत्येक मनुष्य में सर्वविद्यमान है।

कबीर सदैव लोगों से स्वयं के भीतर झाँकने के लिए कहते थे। वे कहते थे कि ईश्वर को कहीं बाहर ना ढूँढे, अपितु वे नित्य लोगों का उनके भीतर विद्यमान ईश्वरीय तत्व  से परिचय कराते थे। यह कुछ अन्य नहीं, अपितु अद्वैत दर्शन ही है जिसके अनुसार ब्रह्म आपके भीतर है तथा आप स्वयं ही ब्रह्म हैं। वे सदा लोगों को आगाह कराते थे कि परम सत्य की खोज में बाहर ना भटकें। उसे अपने भीतर ही खोजें।

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अपनी सम्पूर्ण रचनाओं में कबीर लोगों को सीधे संबोधित करते थे। वे अन्य कवियों के समान नहीं थे जो लोगों से भगवान के माध्यम से संबोधित होते थे। कबीर मनुष्यों से प्रत्यक्ष एवं अपरोक्ष रूप से संवाद करते थे। अपनी कविताओं में वे स्वयं को साधो अर्थात सद्पुरुष कहते थे। वहीं मानवी संबंधों के विषय में कहते समय वे उन्हे बंदे अर्थात मनुष्य, एक मित्र तथा भाई, इन शब्दों से संबोधित करते थे। उन्होंने लोगों को ना तो अपने से निम्न समझा ना ही उच्च। उन्होंने केवल अपने गुरु को ही उच्च स्थान दिया था। इसका अर्थ है कि वे सब को समान मानते थे। उनकी रचनाओं में सदैव समानता का संदेश निहित होता था।

वे गौण वस्तुओं पर भी पूर्ण ध्यान केंद्रित करते थे। उनसे भी समानता का संबंध स्थापित करते थे। उदाहरणतः अपनी कविता, ‘माटी कहे कुम्हार से’ के द्वारा वे कहते हैं कि जीवन एक चक्र है। आज आप माटी को रौंदेंगे, कल माटी आपको रौंदेगी तथा जीवन चक्र यूं ही चलता रहेगा। कदाचित आज आप स्वयं को शक्तिशाली समझ रहे होंगे। सब समय का फेर है। कल हमारी स्थिति पूर्णतः विपरीत हो सकती है। वस्तुस्थिति परिवर्तित होने में समय नहीं लगता। ब्रह्मांड के सर्व जीवों एवं वस्तुओं में समतुल्यता कबीर की रचनाओं के अभिन्न अंग होते हैं। वे संबंधों के चक्रीय प्रवृत्ति पर विश्वास करते थे। जो कल था, वह आज ना हो तथा जो आज है वो कदाचित कल ना रहे। मानव सदैव इस चक्र से अनभिज्ञ रहता है तथा जीवन चक्र में उलझ कर रह जाता है।

माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोहे;

इक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूँगी तोहे।।

कबीर गर्व ना कीजिए, ऊंचा देख निवास;

काल परों भुईं लेटना, ऊपर जमेगी घास।।

तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय;

 कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय। ।

देव हमारे भीतर ही विराजमान हैं

उनकी रचनाओं द्वारा जो परम ज्ञान हमें प्राप्त होता है वह यह है कि देव हम सब के भीतर ही विद्यमान हैं तथा प्रत्येक समस्या का समाधान भी हमारे भीतर ही उपस्थित रहता है। वे सतत हमें हमारे भीतर झाँकने के लिए प्रेरित करते रहते हैं। भगवान तक पहुँचने के लिए आपके द्वारा किये गए सर्व प्रयत्नों का वे खंडन करते हैं। वे कहते हैं कि यदि आपको परमात्मा में विश्वास है तो वह आपके भीतर ही विद्यमान है।

जैसे तिल में तेल है, ज्यों चकमक में आग;

तेरा साईं तुझ में है, तू जाग सके तो जाग।

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय;

जो मन खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

कस्तुरी कुंडल बसै, मृग ढूढ़ै वन माहि;

ऐसे घट घट राम हैं, दुनिया देखे नाहि।

मोको कहाँ ढूंढें रे बन्दे, मैं तो तेरे पास में।

पानी में मीन प्यासी…।

वे सदा कहते थे कि जिस प्रकार गंगा स्वयं को निर्मल करती है, उसी प्रकार हम मानवों को भी स्वयं को स्वच्छ करना चाहिए।

कबीरा मन निर्मल भया, जैसे गंगा नीर;

पाछे पाछे हर फिरे, कहत कबीर कबीर।

कबीर की रचनाएं उनके स्वयं के अनुभवों पर आधारित थीं। यद्यपि वे वेद एवं पुराण, इनका प्रयोग करते थे, तथापि वे अपने अनुभवों पर आधारित दृष्टांत ही देते थे। वे अपने समय के दैनंदिनी जीवन से ही दृष्टांत प्रस्तुत करते थे। उन्होंने सदैव एक सांसारिक पुरुष के रूप में जीवन व्यतीत किया, कर्म किया तथा परिवार के लिए जीविका उत्पन्न की। इन सब के साथ साथ वे एक साधक भी थे। उन्होंने कभी दूसरों द्वारा दी गई भिक्षा पर जीवन यापन नहीं किया। अतः उन्हे अपनी जीविका स्वयं अर्जित करने के आनंद एवं कष्टों का पूर्ण आभास था। यही उन्हे अपने मन के विचार स्वच्छंदता से व्यक्त करने की स्वतंत्रता भी प्रदान करती थी। वे सदा समाज में रहे ताकि वे उस समाज को भीतर से देख सकें तथा समझ सकें। साथ ही वे समाज से विरक्त भी थे ताकि वे एक प्रेक्षक बन सकें।

मैं कहता हूँ आखिन देखी,

तू कहता कागद की लेखी।

कबीरा खड़ा बजार  में, मांगे सबकी खैर;

ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।

साई इतना दीजिए, जा में कुटुंब समाय;

मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु ना भूखा जाय।

चलती चाकी देख कर, दिया कबीरा रोय;

दो पाटन के बीच में, साबुत बचा ना कोय।

कबीरा तेरी झोंपड़ी, गलकटियन के पास;

जो करेगा सो भरेगा, तू क्यों भया उदास।

कबीरा खड़ा बजार में, लिए लकुटिया हाथ;

जे घर फूँकिया आपनों, चले हमारे साथ।

गुरु पर आधारित कबीर की रचनाएं

अपनी अनेक साखियों एवं शब्दों द्वारा कबीर हमसे कहते हैं कि अपने स्वयं के अनुभवों के आधार पर अपनी राय निर्मित करें, दूसरों की कथनी को सजगता से जाँचें तथा सुने हुए तथ्यों पर आँख बंद कर विश्वास ना करें, भले ही गुरु ने कहा हो। यद्यपि वे कहते हैं कि गुरु ज्ञान प्राप्ति का एक आवश्यक साधन हैं।

गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूँ  पाय;

बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो दिखाए।

सतगुरु मिला तो सब मिले, ना तो मिला न कोय;

मात पिता सूत बान्धवा, यह तो घर घर होय।

कबीरा ते नर अन्ध है, गुरु को कहते और;

हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर।

भेस देख ना पूजिये, पूछ लीजिए ज्ञान;

बिना कसौटी होत नाही, कंचन की पहचान।

जात ना पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान;

मोल करो तलवार का, पड़ी रहन दो म्यान।

स्वयं की सहज खोज

वे हमें सहजता से जीने की प्रेरणा देते हैं। चूंकि वे इस तथ्य पर विश्वास करते हैं कि सब हमारे भीतर ही है, प्रत्येक बल व प्रत्येक संभव ऊर्जा स्त्रोत को बाहर खोजने का कष्ट उठाने की आवश्यकता नहीं है। उनकी रचनाओं में सहजता, यह विषय बारंबार प्रकट होता है। इससे यह विदित होता है कि उनके काल में भी लोग इस प्रकार का अनावश्यक कष्ट उठाते थे। यह सिद्धांत आज भी उतना ही प्रासंगिक है। हम कष्ट उठाने में सदा मग्न रहते हैं किन्तु यह नहीं समझते कि वह कष्ट हम क्यों उठा रहे हैं। एक ही स्थान पर खड़े होने के लिए भी दौड़ते रहते हैं। हमें अपनी प्रवृत्ति में सहजता की आवश्यकता है। यह हमारे मन को स्वच्छ तथा जीवन को आसान बनाती है।

पोथी पढ़ी पढ़ी जग मुवा, पंडित भया ना कोय;

ढाई आखर प्रेम के, पढ़े सो पंडित होय।

माला कहे काठ की, तू क्यों फेरे मोहे;

मन का मनका फेर दे, तुरत मिला दूँ तोहे।

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं तो मैं नाहिं;

प्रेम गली अति साँकरी, तामें दो न समाहिं।

संयोजित धर्म को चुनौती

कबीर ने सदैव किसी भी प्रकार के संयोजित धर्म का त्याग किया था। वे इतने साहसी थे कि उन्होंने इस्लाम शासित क्षेत्रों में इस्लाम के विरुद्ध तथा हिंदुओं के अपने गढ़ वाराणसी में हिन्दू कुरीतियों के विरुद्ध अपने विचार व्यक्त किये तथा उनसे प्रश्न किये। कभी वे एक स्नेहमय पिता के समान आसान दृष्टांत द्वारा लोगों को समझाते थे तो कभी अपने प्रश्नों की मार द्वारा अंध-भक्तों को सही मार्ग पर लाने का प्रयत्न करते थे। उन्होंने सदैव पंडितों, मौलवियों तथा स्वघोषित ज्ञानियों की आलोचना की थी। उनकी रचनाओं में उनके स्वर सदा अक्खड़ होते थे मानो वे प्रेक्षकों को चुनौती दे रहे हों कि वे आयें एवं उनके विचारों को अनुचित सिद्ध करें।

काशी काबा एक हैं, एक हैं राम रहीम;

मैदा इक पकवान बहुत बैठ कबीरा जीम।

साधू भूखा भाव का, धन का भूखा नाहिं;

धन का जो भूखा फिरै, सो तो साधू नाहिं।

पनि पियावे क्या फिरो, घर घर में है व्यारी;

तृष्णावंत तो होयेगा, आएगा झक मारी।

पत्थर पूजे हरी मिले, तो मैं पूजूं पहाड़;

इससे तो चाकी भली, पीस खाये संसार।

कंकर पत्थर जोड़ि के, मस्जिद लयी बनाय;

ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय।

कबीर बारंबार मानवी देह को घट अर्थात घड़ा कहकर संबोधित करते थे। इसकी हम अनेक स्तरों पर विवेचना कर सकते हैं। भौतिक रूप से यह माटी से निर्मित है तथा अंततः माटी में ही जाकर विलीन हो जाती है। लाक्षणिक रूप से यह एक रिक्त घट है तथा यह मनुष्य पर निर्भर है कि वह इस घट में क्या भरता है। मनुष्य क्या है यह इस तथ्य पर आधारित है कि हम इस घट रूपी देह में किसे समाते हैं। वे कहते हैं कि मानवी देह में ही सब कुछ समाया हुआ है, अच्छा, बुरा, कुरूप, यहाँ तक कि ईश्वर भी।

जोगी गोरख गोरख करें,

हिन्दू नाम उचारें;

मुसलमान कहें एक खुदाई,

कबीर को स्वामी घट घट बसई।

कबीर सोई पीर है, जो जाने पर पीड़;

जो पर पीड़ ना जाने, सो काफिर बेपीर।

चन्दा झलके यही घट माही..

कबीर एवं माया

कबीर सांसारिक माया को सभी बुराइयों की जड़ मानते हैं। उनके अनुसार माया वह डाकिनी है जो ऐसा मायाजाल बुनती है जिसमें मानव तो क्या, भगवान भी खो सकते हैं। वे कहते हैं कि यह संसार माया द्वारा निर्मित एक मायाजाल है तथा सत्य का अनुभव पाने के लिए हमें इसी मायाजाल की शिकंजे से मुक्त होना पड़ेगा। माया के साथ साथ वे यह भी कहते हैं, हमें यह भली-भांति समझना होगा कि हम में से प्रत्येक मनुष्य पूर्णतः अकेला है।

अवधू, माया तजी ना जाये..

उड़ जाएगा हंस अकेला.. 

मृत्यु और कबीर

अंत में, मृत्यु भी उनकी रचनाओं का एक अभिन्न अंग है। वे मृत्यु को अंत नहीं, अपितु मानव जीवन का एकमात्र सत्य मानते हैं। वस्तुतः, वाराणसी तो मृत्यु की नगरी मानी जाती है जहां मृत्यु का उत्सव मनाया जाता है। यही भाव कबीर की रचनाओं में भी प्रकट होता है। वे बारंबार मानवजीवन की क्षण-भंगुरता के विषय में कहते हैं जैसे उलटी मटकी पर जल। अतः मानव को अपने जीवन से मोह नहीं करना चाहिए। मृत्यु के परिप्रेक्ष्य में वे मानव प्रकृति के विषय में चर्चा करते हैं कि मनुष्य अनेक बार ऐसे निरर्थक कार्य करता है मानो वह अनंत काल तक जीवित रहने वाला हो। वे चाहते हैं कि हम यह स्मरण रखें, अंततः वह मृत्यु ही है जिसका हमें आलिंगन करना है, हमारी इच्छा हो या ना हो। मृत्यु को ध्यान में रखकर ही हमें जीवन यापन करना चाहिए।

माली आवत देख कर, कलियाँ कहे पुकार;

फुले फुले चुन लिए, काल हमारी बार।

साधो ये मुर्दों का गाँव..।    

आईए मेरे साथ, कबीर को ढूंढें – यह विचार एक ओर जितना आसान है, दूसरी ओर यह उतना ही गहन भी है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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सुप्रसिद्ध राम भजन जो राम नाम में ओत-प्रोत कर दें https://inditales.com/hindi/most-popular-ram-bhajans/ https://inditales.com/hindi/most-popular-ram-bhajans/#comments Wed, 21 Mar 2018 02:30:39 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=752

भारत के सर्वाधिक महत्वपूर्ण पर्वों में एक पर्व है दीपावली। दीपावली अर्थात् घरों का रंग रोगन व सजावट, नवीन वस्त्रों की खरीदी, व्यापारियों का नवीन वित्तीय वर्षारंभ, भिन्न भिन्न मिष्टान्न व पक्वान्न, पटाखे, गुलाबी ठंड की शुरुआत तथा आनंद व उत्साह की पराकाष्ठा। दीपावली का उत्सव मनाने के पीछे हेतु क्या है? जी हाँ! हम […]

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सुप्रसिद्ध राम भजनभारत के सर्वाधिक महत्वपूर्ण पर्वों में एक पर्व है दीपावली। दीपावली अर्थात् घरों का रंग रोगन व सजावट, नवीन वस्त्रों की खरीदी, व्यापारियों का नवीन वित्तीय वर्षारंभ, भिन्न भिन्न मिष्टान्न व पक्वान्न, पटाखे, गुलाबी ठंड की शुरुआत तथा आनंद व उत्साह की पराकाष्ठा। दीपावली का उत्सव मनाने के पीछे हेतु क्या है? जी हाँ! हम यह त्यौहार मनाते हैं भगवान् राम द्वारा श्रीलंका में रावण का वध कर, सीता सहित अयोध्या वापिस लौटने की प्रसन्नता व्यक्त करने हेतु। अतः दीपावली में हम भगवान् राम का उत्सव मनाते हैं।

इसी तरह राम नवमी पर भी हम श्री राम का जन्मोत्सव मानते हैं।

तो भगवान् राम का उत्सव मनाने की सर्वोत्तम रीति क्या है? ऐसा माना जाता है कि हिन्दु पञ्चांग के चौथे युग, कलयुग में केवल राम का नाम लेने भर से ही हमारी सर्व समस्याओं का समाधान हो जाता है। तो चलिए सबसे पहले सुनते हैं अयोध्या के मंदिरों की राम धुन:

राम नाम तथा राम धुन हिन्दू संस्कृति का अभिन्न अंग है। यूं तो राम नाम के जप हेतु आपको किसी सहायता की आवश्यकता नहीं है अपितु राम धुन हेतु राम के १० सर्वाधिक लोकप्रिय भजनों का संकलन आपको आनंदित करने के लिए  प्रस्तुत है।

राम भजन

दीपावली के अवसर पर प्रस्तुत है १० सर्वोत्तम राम भजन:-

रघुपति राघव राजा राम – राम भजनों में सर्वाधिक गया जाने वाला भजन

रघुपति राघव राजा राम – यह राम धुन नम नारायण नामक ग्रन्थ से आंशिक रूप से व्युत्पन्न है। आप कदाचित नम नारायण ग्रन्थ से अवगत ना हों तथापि वाल्मीकि रामायण के विषय में जानकारी सर्व विदित है। २४००० छंदों में रचित वाल्मीकि रामायण प्रतिदिन जपना कठिन है। अतः २४००० छंदों के वाल्मीकि रामायण का सार १०८ छंदों द्वारा संक्षिप्त में गठित किया गया है। इसे ही नम नारायण कहा जाता है। प्रतिदिन जप करने हेतु यह नम नारायण अतिउपयुक्त है।

रघुपति राघव राजा राम, भक्तों के बीच इस भजन की प्रसिद्धि तब चरम सीमा पर पहुँची जब गांधीजी ने स्वतंत्रता संघर्ष हेतु इस राम भजन को अपनाया था। यद्यपि मूल भजन तथा गांधीजी के संस्करण में भिन्नता है क्योंकि उन्होंने मूल भजन में स्वतंत्रता संघर्ष के सन्दर्भ में परिवर्तन किये थे। मूल भजन तथा गांधीजी के संस्करण के बोल इस प्रकार हैं-

रघुपति राघव राजा राम भजन के बोल
रघुपति राघव राजा राम भजन के बोल

यूँ तो इस भजन को कई गायकों ने गाया व वादकों ने बजाया है तथापि मेरी व्यक्तिगत प्रिय प्रस्तुति है उस्ताद बिस्मिल्लाह खान द्वारा शहनाई पर बजाई गयी रघुपति राघव राजा राम की धुन। वही सुमधुर धुन आपके लिए यहाँ प्रस्तुत है-

इनके अतिरिक्त पंडित डी. वी. पलुस्कर, हरी ओम शरण तथा स्व. एम्. एस. सुब्बलक्ष्मी ने भी इस भजन को उत्कृष्ट रूप में प्रस्तुत किया है।

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित- श्री राम चन्द्र कृपालु भज मन

श्री राम चन्द्र कृपालु भज मन , यह गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा संस्कृत में रचित राम भजन है। संगीत की दुनिया के लगभग सभी प्रसिद्ध गायकों द्वारा इस भजन की प्रस्तुतीकरण उपलब्ध है। मैंने आप सब के लिए एक मनमोहक प्रस्तुतीकरण का चुनाव किया है जिसमें एक नन्ही बालिका, सूर्यगायत्री ने अपने मधुर स्वरों द्वारा इस भजन को चार चाँद लगा दिए हैं।

यदि आप अधिक परिपक्व स्वर में प्रसिद्ध प्रस्तुतीकरण सुनना चाहें तो इन दो गायकी की चर्चा अवश्य की जायेगी। एक है दिव्यात्मा एम्.एस. सुब्बलक्ष्मी जिन्होंने राग सिन्धु भैरवी में अत्यंत सहजता से यह भजन प्रस्तुत किया है। दूसरा है राग यमन कल्याण में प्रसिद्ध गायक बंधुओं, राजन मिश्रा व साजन मिश्रा द्वारा गाया गया यह भजन।

श्री राम चन्द्र कृपालु भज मन बोल
श्री राम चन्द्र कृपालु भज मन बोल

यदि आप स्वयं भी यह भजन इन गायकों के स्वरों के साथ दुहराना चाहें तो आपकी सहायता हेतु इसके बोल प्रस्तुत हैं। श्री राम चन्द्र कृपालु भज मन, इस भजन में भगवान् श्री राम के महात्मय का वर्णन किया गया है।

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित- ठुमक चलत राम चन्द्र

ठुमक चलत राम चन्द्र, इस भजन के रचयिता गोस्वामी तुलसीदासजी ने भगवान् राम की बाल लीलाओं का वर्णन किया है। तुलसीदासजी कहते हैं कि रामचन्द्रजी अपनी बाल्यावस्था में चलने का प्रयत्न करते हुए बार बार गिर रहे हैं। महाराज दशरथ की तीनों रानियाँ अत्यंत प्रेम से उनका ध्यान बंटाती हुई उन्हें फिर खड़े होकर चलने हेतु प्रोत्साहित कर रही हैं। तुलसीदासजी ने बाल राम की मनमोहक सूरत एवं उनके हावभाव का इतनी सुन्दरता से वर्णन किया है कि उनकी मनोहारी छवि आँखों के समक्ष साकार होने लगती है। तुलसीदासजी यह भी कहते हैं कि भगवान् राम की मनोरम छवि एवं इस सम्पूर्ण दृश्य को देख वे आत्मविभोर हो रहे हैं तथा स्वयं को उनके रंग में रंगता अनुभव कर रहे हैं।

ठुमक चलत राम चन्द्र भी एक प्रसिद्ध भजन है जिसे कई जाने माने गायकों ने अपने सुरों से सजाया है। मेरी प्रिय प्रस्तुति, पंडित पुरुषोत्तम दास जलोटाजी द्वारा गाया यह भजन आपके हेतु प्रस्तुत है।

इस भजन को पंडित पुरुषोत्तम दास जलोटाजी के सुपुत्र अनूप जलोटा जी ने भी गया है। यहाँ वे गायकी के साथ साथ सम्पूर्ण दृश्य की व्याख्या भी कर रहे हैं।

पंडित रोनू मजूमदार जी ने इसी भजन को अपनी बांसुरी द्वारा बजाकर उसकी मधुरता को चरम सीमा तक पहुंचा दिया है।
आप सब भी इस भजन के निम्नलिखित बोल पढ़ कर सम्पूर्ण दृश्य को अपने सम्मुख सजीव कर सकते हैं।

ठुमक चालत राम चन्द्र बोल
ठुमक चालत राम चन्द्र बोल

इसके अलावा, स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर जी ने इस भजन को वात्सल्य रस में गा कर एक माता एवं उसके रामलल्ला के मध्य प्रेम को सुन्दरता से प्रस्तुत किया है। पंडित डी. वी. पलुस्करजी ने इसे शास्त्रीय संगीत में बांधकर इसे नयी ऊंचाईयां प्रदान की हैं।

मीरा बाई द्वारा रचित – पायो जी मैंने राम रतन धन पायो

मीराबाई को आप सब परम कृष्ण भक्त के रूप में जानते हैं। भगवान् कृष्ण हेतु उन्होंने अनगिनत भजन रचे एवं गाये हैं। उपरोक्त भजन उन्होंने भगवान् राम हेतु रचा था। वे कहती हैं कि राम को पाकर उन्होंने बहुमूल्य खजाना प्राप्त कर लिया है। यह ऐसा खजाना है जिसकी प्रत्येक दिवस वृद्धि होती जाती है तथा इसे कोई छीन भी नहीं सकता।

पंडित डी. वी. पलुस्कर द्वारा गाये गए इस भावपूर्ण भजन को सुन आपका रोम रोम आनंदित हो उठेगा।

प्रस्तुत है इस भजन की दो और प्रस्तुतियाँ। पहली, स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर द्वारा गायी गयी तथा दूसरी, पंडित रोनू मजूमदार द्वारा बांसुरी पर बजायी गयी मनमोहक प्रस्तुति।

आप साथ गुनगुनाना चाहें तो आपके हेतु इस भजन के बोल भी प्रस्तुत हैं।

पायो जी मैंने राम रतन धन पायो बोल
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो बोल

राम सिमर राम – गुरु नानकजी का शबद

गुरु नानकजी ने भी भगवान् राम की स्तुति में शबद गाये हैं। प्रस्तुत है गजल सम्राट जगजीत सिंग द्वारा गाई गयी यह भावपूर्ण शबद।

आप यह जानकर अचम्भित रह जायेंगे कि इस शबद को दक्षिण भारतीय संगीत साम्राज्ञी एम्.एस. सुब्बलक्ष्मीजी ने भी गाया है।

जब जानकी नाथ सहाय करे – गोस्वामी तुलसीदासजी

जब जानकी नाथ सहाय करे, यह गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित एक और भजन है जो भगवान् पर विश्वास का पाठ पढ़ाता है। इस भजन में गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं कि जब जानकी नाथ भगवान् राम आपका रक्षण कर रहे हैं तो कौन आपको हानि पहुंचा सकता है। आपके समक्ष चाहे जितनी बुरी शक्तियां आकर खड़ी हो जाएँ, चाहे वह राहू या केतु हो या दुष्ट दुश्शासन का चरित्र धारण किये मनुष्य, भगवान् राम आपकी सदैव रक्षा करेंगे।
यही भजन आपके लिए प्रस्तुत है पंडित छानुलाल मिश्राजी के मधुर स्वरों में-

साथ गुनगुनाने हेतु इस भजन के बोल इस प्रकार हैं-

जब जानकी नाथ सहाय करें भजन बोल
जब जानकी नाथ सहाय करें भजन बोल

इस भजन को कई अन्य प्रसिद्ध गायकों ने भी स्वरबद्ध किया है जैसे संगीत सम्राट पंडित डी. वी. पलुस्कर, पंडित अजय चक्रवर्ती तथा रुचिरा केदारपंडित रोनू मजूमदार द्वारा बांसुरी में बजाया गया यह भजन भी अत्यंत मधुर है।

राम रंग रंगले मन – एक मराठी भजन

यह भजन मैंने अपने पतिदेव के पंडित भीमसेन जोशीजी के गाये भजनों के संग्रह में से ढूंड निकाला था। यह एक छोटा सा भजन है जो हमें राम रंग, आत्म रंग एवं विश्व रंग में सराबोर होने के लिए कहता है। राम रंग रंगले मन इस भजन का मेरा विवेचन है कि कवि हमें अस्तित्व के प्रत्येक स्तर पर राम रस में डूब जाने हेतु प्रेरित कर रहा है, फिर चाहे वह सांसारिक स्तर पर हो या भावनात्मक स्तर पर।

प्रस्तुत है पंडित भीमसेन जोशीजी द्वारा राग मिश्र पहाड़ी में गाया गया यह भजन-

श्री राम कहे समझाई

श्री राम कहे समझाई, इस रचना में उस समय का दृश्य दर्शाया गया है जब महारानी कैकेयी ने अपने दो वरदानों के आधार पर महाराज दशरथ को विवश कर दिया था कि वे पुत्र राम को १४ वर्षों के वनवास पर जाने का आदेश दें। महाराज दशरथ के शब्दों ने राम के अनुज लक्ष्मण को अत्यंत आहत एवं क्रोधित कर दिया है। तब भगवान् राम उन्हें समझते हैं कि उन्होंने स्वयं पिताश्री के आदेश को पूर्ण श्रद्धा से स्वीकार कर लिया है। वे इस सजा हेतु माता कैकेयी को भी दोष नहीं दे रहे हैं। वे समझा रहे हैं कि यह हमारे भाग्य की देन है, ना कि किसी मनुष्य की करनी। भगवान् राम लक्ष्मण को यह भी कहते हैं कि वे स्वयं वस्तुस्थिति से आहत नहीं हैं। वे उन्हें भी दुखी ना होने का आग्रह कर रहे हैं। इसी दृश्य को समक्ष प्रस्तुत करते हुए, इस भजन द्वारा रचयिता हमसे कहने का प्रयत्न कर रहे हैं कि हम भाग्य का लिखा स्वीकार करें एवं स्वयं को किसी भी स्थिति में आहत ना होने दें।

राग जौनपुरी में पंडित भीमसेन जोशी द्वारा गाया यह राम भजन आपके समक्ष प्रस्तुत है-

श्री राम चरणं समस्त जगतं – राम स्तुति

यह राम भजन एक राम स्तुति है जो हमें यह बताती है कि भगवान् के चरणों में ही समस्त विश्व समाहित है। भक्ति रस में ओतप्रोत इस राम भजन को यहाँ पंडित जसराज जी ने उतनी ही श्रद्धा एवं मधुरता से प्रस्तुत किया है-

रणजीति राम राऊ आये

रणजीति राम राऊ आये, यह उन भजनों में से एक है जो खरे अर्थ में दीपावली के पर्व से सम्बन्ध रखता है। लंका युद्ध पर विजय प्राप्त कर भगवान् राम जब सीता सहित अयोध्या पधारते हैं, सम्पूर्ण अयोध्या हर्ष एवं उल्हास से उनका स्वागत करती है। इसी आनंद को प्रदर्शित करता यह राम भजन प्रस्तुत है जिसे ध्रुपद गायकी में गुंदेचा बंधुओं ने मधुर स्वरों में बाँधा है-

रामचरित मानस -पंडित छन्नूलाल मिश्र

अंत में सुनिए यह राम चरितमानस गायन जिसमे राम कथा का निचोड़ है अलग अलग गायन शैलियों में

आदित्य सेनगुप्ता जी, इंडीटेल्स के लिए अप्रतिम राम भजनों की सूची के संकलन हेतु आपका अनेक धन्यवाद! इंडीटेल्स के इस संस्करण में इन भजनों को एक कड़ी में पिरोने का मेरा प्रयास अत्यंत आनंददायी तथा आत्मसंतुष्टी प्रदान करने वाला था। अनेक रूपों में राम के विभिन्न चरित्रों को सजीव करते इन भजनों को आत्मसात करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

भगवान् राम एवं उनकी भक्ति ने मेरे रोम रोम को भक्तिरस में सराबोर कर दिया। पहली बार ऐसा अनुभव हुआ जैसे राम भक्ति से ओतप्रोत संगीतमय दीपावली का पर्व मना लिया हो।

पाठकों के निवेदन है कि यदि आपका प्रिय राम भजन इस सूची में सम्मिलित नहीं है तो उसका उल्लेख निम्न दर्शित टिप्पणी खंड में अवश्य करें।

भगवान् राम से प्रार्थना है कि वह आपके जीवन में सुख, ऐश्वर्य एवं हर्षोल्हास की रोशनी भर दे!

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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बादामी, ऐहोले, पत्तदकल – एक कविता, एक प्रेरणा https://inditales.com/hindi/badami-aihole-pattadakal-hindi-poem/ https://inditales.com/hindi/badami-aihole-pattadakal-hindi-poem/#respond Sun, 28 May 2017 02:30:21 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=88

जब आप पत्थरों पे कवि की कविता लिखी देखते हैं तो कभी कभी उस कविता का कथन इतना प्रभावशाली होता है की आप के अन्दर भी एक कविता फूट पड़ती है। कुछ ऐसा ही मेरे साथ हुआ जब मैंने कर्णाटक स्थित बादामी, ऐहोले और पत्तदकल के मंदिरों के शिल्प को देखा. कितना समझा यह तो […]

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पत्तदकल के मंदिर
पत्तदकल के मंदिर

जब आप पत्थरों पे कवि की कविता लिखी देखते हैं तो कभी कभी उस कविता का कथन इतना प्रभावशाली होता है की आप के अन्दर भी एक कविता फूट पड़ती है। कुछ ऐसा ही मेरे साथ हुआ जब मैंने कर्णाटक स्थित बादामी, ऐहोले और पत्तदकल के मंदिरों के शिल्प को देखा. कितना समझा यह तो कहना मुश्किल है, पर दिल को कितना छुआ इसका अनुमान आप यह कविता पढ़ कर लगा सकते हैं।

यह कविट्स यूँ समझिये की वो पत्थर कह रहे हैं या फिर उनको तराशने वाले वो महान शिल्पकार – जिनका उत्कृष्ट काम आज के शिल्पकारों के लिए एक चुनौती के सामान है। जीवन का कौन सा रस है जो इन पत्थरों में घड़ा नहीं मिलता है।

इस भ्रमांड के इतिहास में
कुछ पन्ने मेरे भी हैं

सदियों पहले, मैंने जन्म लिया
इस धरती पर अपनी छाप छोड़ी

आने वाली पीड़ियों के लिए
पथ्हरों को चीर कर लिखी
मेरे युग की कहानियां

सैंकडों शिल्पकारों को सिखाया
शिल्पी बन कहानियां लिखने का गुर

फिर उनके हाथों के जादू ने
पिरोया इतिहास कुछ यूँ की

पत्थर बोल उठे, नाच उठे
कभी कहानी सुनते तो कभी
पूछते तुमसे पहेलियाँ, कभी
एक निर्मल छवि बस देते हुए

देखोगे तो पाओगे छोडी हैं मैंने
न केवल शिल्प्कारियों की कला
पर उन पलों का लेखा जोखा
जिनको था मैंने देखा और जिया

वो उन्माद और वो उल्हास
जो देता आया है आनंद और जीवन
वो देवी देवता, जिनसे ले पाठ
आज भी तुम देते लेते हो दिशा

वो नौ रस और कलाएं वो जीव जंतु और क्रीडाएं
जो मिली धरोहर में और
जिनको संभाला, पाला तुम्हारे लिए
छोडे हैं अपने समय के निशान
झीलों के किनारे, पहाडों के ऊपर
स्तंभों पे, दीवारों पे, छत पे
सीडियों पे, कलाकृतियों में

यह धरोहर है मेरे जीवनकाल की
छोड़ आई जिसे तुम्हारे लिए
इसे संभल रखना उनके लिए जो
अभी आये नहीं मुझसे मिलने

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मोढेरा का सूर्य मंदिर https://inditales.com/hindi/surya-mandir-modhera-gujarat/ https://inditales.com/hindi/surya-mandir-modhera-gujarat/#respond Thu, 05 Jan 2017 12:32:48 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=74

मोढेरा का सूर्य मंदिर कर्क रेखा पे अपने ईष्ट देव की और मुहँ बाये कमल पट्ट पे खड़ा मोढेरा का सूर्य मंदिर पुष्कारणी में माला से गूँथे हैं छोटे बड़े मंदिर जिनकी छवि से हैं खेलते जल जन्तु कच्छ और मच्छ सभा मंडप है समेटे कथाएँ राम और कृष्ण की जन्म से मृत्यु की यात्रा […]

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मोढेरा का सूर्य मंदिर

मोधेरा सूर्य मंदिर

कर्क रेखा पे
अपने ईष्ट देव की और
मुहँ बाये कमल पट्ट पे खड़ा
मोढेरा का सूर्य मंदिर
पुष्कारणी में माला से
गूँथे हैं छोटे बड़े मंदिर
जिनकी छवि से हैं खेलते
जल जन्तु कच्छ और मच्छ
सभा मंडप है समेटे
कथाएँ राम और कृष्ण की
जन्म से मृत्यु की यात्रा
मधी है बाहिरी वर्ग पे
कोख रहित गर्भ गृह
कथा कहता प्रहारों की
जो खंडित तो कर गये, पर
क्षीण ना कर पाए तेज को
आठों दिशाओं में
दिशा देवो का वास है
शिलाओं में समाया
संगीत नृत्य उल्हास है
पुष्पावती है जिसे सहलाती
अपनी जल धार से
सूर्य जैसे हो प्रहरी
अपने इस प्रतिबिंब का

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आजकल – दिल्ली पे लिखी एक कविता https://inditales.com/hindi/dilli-aajkal-hindi-poem-anuradha-goyal/ https://inditales.com/hindi/dilli-aajkal-hindi-poem-anuradha-goyal/#respond Wed, 04 Jan 2017 08:29:58 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=63

आजकल तुम पाओगे मुझे दिल्ली की गलिओं में खाक छानते हुए इधर उधर कूचों में झाँकते हुए सदियों पुराने चबूतरों पे बैठे हुए इस दरगाह से उस मज़ार जाते हुए यहाँ वहाँ बिखरे मक़बरों को ताकते हुए देखते, कल और कल को एक साथ गुज़रते हुए और कुछ नये इतिहासों को बनते हुए कभी किसी […]

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स्वामी श्रध्हानंद मूर्ति - पुरानी दिल्ली

आजकल तुम पाओगे मुझे

दिल्ली की गलिओं में खाक छानते हुए
इधर उधर कूचों में झाँकते हुए
सदियों पुराने चबूतरों पे बैठे हुए

इस दरगाह से उस मज़ार जाते हुए
यहाँ वहाँ बिखरे मक़बरों को ताकते हुए
देखते, कल और कल को एक साथ गुज़रते हुए
और कुछ नये इतिहासों को बनते हुए

कभी किसी कोने में बैठे देखा
बच्चों को बेफ़िक्र खेलते हुए
सुबह सवेरे बाज़ारों को जागते हुए
क़िलो पे सूरज को चढ़ते और ढलते हुए

फूलवलों को खुश्बू हार में पिरोते हुए
हलवाई को केसरी जलेबी तल्ते हुए
और फिर फिरनी से मक्खी उड़ाते हुए
फ़ुर्सत में चाय की चुस्कियाँ लेते हुए

देखा पुजारी को कैमरे की तरफ मुस्काते हुए
एक डॉक्टर को अनगिनत पक्षियों को पालते हुए
क़व्वाल की नज़र को अगली ज़ेब तलाशते हुए
आम आदमी को जीवन से मृत्यु की और जाते हुए

देखा कुछ लोगों को रुक रुक कर भागते हुए
तो कुछ को भागते भागते थककर रुकते हुए
कभी एक दूसरे से टकराते हुए
कभी एक दूरसे को संभालते हुए

गिरते लुढ़कते दुनिया को चलते हुए
बोझ ढोते फिर भी हंसते हुए
थॅंक कर बैठते और फिर उठते हुए
शोर गुल के बीच खुद से बतियाते हुए

मैने खुद को देखा इतिहास पढ़ते हुए
खंडरों में धरोहर ढूँढते हुए
कल की कड़ी से आज का छोर जोड़ते हुए
इस शहर को समझने की कोशिश करते हुए

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