काशी यात्रा Archives - Inditales श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Mon, 12 Jun 2023 04:43:05 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.7.5 वाराणसी में क्या खरीदें – उपहार या स्मृति चिन्ह https://inditales.com/hindi/best-varanasi-souvenirs-pick/ https://inditales.com/hindi/best-varanasi-souvenirs-pick/#comments Wed, 23 Aug 2017 02:30:08 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=394

जैसा कि आप जानते हैं, हर वर्ष लोग भारी मात्रा में वाराणसी की यात्रा करतें हैं। उनकी यात्रा का हेतु चाहे धार्मिक हो, या सार्वजनिक, या कुछ और, वे वाराणसी व यहाँ की विशेषताओं से अछूते नहीं रह सकते। कशी यात्रा से हर कोई कुछ ना कुछ यादगार भेंट वस्तु अवश्य अपने साथ लाना चाहता […]

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वाराणसी के उपहार जैसा कि आप जानते हैं, हर वर्ष लोग भारी मात्रा में वाराणसी की यात्रा करतें हैं। उनकी यात्रा का हेतु चाहे धार्मिक हो, या सार्वजनिक, या कुछ और, वे वाराणसी व यहाँ की विशेषताओं से अछूते नहीं रह सकते। कशी यात्रा से हर कोई कुछ ना कुछ यादगार भेंट वस्तु अवश्य अपने साथ लाना चाहता है। मैं इस संस्मरण में वाराणसी की उन विशेष कलाओं व उनसे बनी वस्तुओं का उल्लेख करना चाहूंगी जो वाराणसी को सम्पूर्ण विश्व में प्रसिद्धि दिलाते हैं। मेरा विशवास है कि इसे पढ़ने के उपरांत आप वाराणसी यात्रा से इनमें से कुछ भेंट वस्तुएं अवश्य अपने साथ लायेंगे।

वाराणसी के प्रसिद्द उपहार

वाराणसी की पसंदीदा बनारसी रेशमी साड़ियाँ

बनारसी साडी
बनारसी साडी – कौन न मोहित हो जाये इन पे

आप वाराणसी जाएँ और प्रतिष्ठित बनारसी सिल्क साड़ी ना खरीदें, यह वाराणसी के साथ और आपके आस पास की महिलाओं के साथ नाइंसाफी होगी। बनारसी सिल्क या रेशमी साड़ी हर स्त्री का सपना होती है। मेरे जैसी भी, जो क्वचित ही साड़ी पहनती हो, अपने पास कम से कम एक बनारसी साड़ी अवश्य रखती है। इसलिए आप जब भी वाराणसी जाएँ, यह रेशमी साड़ियाँ अपने या अपने प्रियजनों हेतु उपहार स्वरुप अवश्य खरीदें।

आप इन रेशमी साड़ियों की खरीददारी वाराणसी में कहीं भी कर सकतें हैं। गंगा घाट पर तो बिचोलियों का तांतां लगा रहता है जो आपको विश्वसनीय साड़ी की दुकानों पर ले जाने का दावा करतें हैं। परन्तु मेरा सुझाव है कि आप स्वयं बुनकरों द्वारा इन साड़ियों को बुनते देखें और प्रत्यक्ष उन बुनकरों से यह साड़ियाँ खरीदें। इसके लिए आपको वाराणसी के पीली कोठी इलाके में जाना पड़ेगा। यहाँ भले ही सडकों पर चलना थोड़ा असुविधाजनक हो परन्तु आप बुनकरों की कुशल कारीगरी व कड़ी मेहनत देख गदगद हो उठेंगे।

आप बढ़िया बनारसी साड़ियाँ वाराणसी के घासी टोला में ठठेरी बाज़ार से भी खरीद सकतें हैं। थोक बाज़ार होने के कारण यहाँ बनारसी साड़ियों का उत्तम संग्रह बेहतर दामों पर उपलब्ध हैं। यहाँ भी आप को संकरी गलियों की थोड़ी तकलीफ उठानी पड़ सकती है। गलियाँ रिक्शा के हिसाब से भी बेहद संकरीं हैं। कई दुकानें पुरानी कोठियों में होने के कारण आपको साड़ियों के विभिन्न प्रकार देखने हेतु सीड़ियाँ चढ़नी उतरनी पड़ेंगी। फिर भी ज्यादा साड़ियों की खरीददारी हेतु यह एक उत्तम स्थान है।

बनारसी साड़ियों को ‘बनारसी जरी व साड़ियाँ‘ पंजीकरण के तहत जी.आई. अर्थात् भौगोलिक संकेत अधिकार प्राप्त है। इसके तहत बनारसी साड़ियाँ केवल वाराणसी में ही बुनी जा सकतीं हैं।

गंगाजल

गंगाजल
गंगाजल

यह अविश्वसनीय किन्तु सत्य है, कि गंगाजल वाराणसी से सर्वाधिक निर्यातित वस्तु है। आपके लिए भी यह एक उत्तम निशानी हो सकती है। घाट की तरफ जाते मार्ग पर दुकानदार हर आकार के प्लास्टिक डिब्बों व लोटों का अम्बार लगा कर बैठतें हैं। श्रद्धालु इन्ही डिब्बों में गंगाजल भर कर अपने साथ ले जातें हैं। आप तांबे के लोटों में सीलबंद किये गंगाजल भी ले सकतें हैं। छोटे छोटे यह तांबे के लोटे धर्मभीरु प्रियजनों के लिए एक उत्तम निशानी हो सकतीं हैं।

गंगा के घाट पर पानी की स्वच्छता देख शंका जरूर उत्पन्न होती है। इसी शंका के तहत मैंने भी डब्बा खोल कर पानी की स्वच्छता का अनुमान लगाने की कोशिश की। परन्तु दुकानदार ने मुझे विशवास दिलाया कि गंगाजल, नदी के घाट से दूर, मध्य बहाव में बेहद स्वच्छ है और वे वहीं से इन डब्बों को गंगाजल से भरतें हैं। अंततः यह अपनी अपनी श्रद्धा पर निर्भर है।

गुलाब मीनाकारी

गुलाबी मीनाकारी
गुलाबी मीनाकारी

आपने मीनाकारी कला के बारे में अवश्य सुना होगा। यह राजस्थान व गुजरात की बहुप्रचलित कला है, जहां सोने व ज्यादातर चाँदी पर रंगीन मीनाकारी की जाती है। परन्तु बहुत कम लोग इस तथ्य से अवगत होंगे कि वाराणसी में भी मीनाकारी की कला फल फूल रही है। अंतर सिर्फ इतना है कि वाराणसी में गुलाबी मीनाकारी अर्थात् गुलाबी रंग में मीनाकारी की जाती है। वाराणसी के कारीगरों का यह कौशल आप प्रत्यक्ष देख सकतें हैं गऊ घाट की संकरी गलियों में।

इससे पहले कि आप मीनाकारी की गईं वस्तुओं पर मोहित हों, मैं आपको इनकी कीमतों का अंदाज़ देना चाहूंगी। गुलाबी मीनाकारी से सज्जित एक गले के हार की कीमत १० लाख रुपयों से शुरू होती है। यदि आप पैसे खर्च करने के लिए तैयार हैं तो मीनाकारी किये गए जेवरों की खरीदी का गौरव प्राप्त कर सकतें हैं। और यदि आप मेरी तरह हलके खरीददार हैं तो आप मीनाकारी की गयी छोटी छोटी डिबिया यादगार स्वरुप खरीद सकतें हैं। छोटे छोटे पशुओ व पक्षियों के भी शिल्प उपलब्ध है जिन पर सुन्दर मीनाकारी की गयी है। खासतौर पर मीनाकारी व महीन नक्काशी से बने मोर व हाथी बेहद खूबसूरत हैं।

वाराणसी के ख़ास लकड़ी के खिलौने

खोजवा के लकड़ी के खिलोने
खोजवा के लकड़ी के खिलोने

वाराणसी की एक और खासियत है लकड़ी के खिलौने। वाराणसी में कई ऐसी गलियाँ हैं जहां लकड़ी के खिलौने बनाए जाते हैं। खोजवा भी ऐसी ही जगह है जहां आप ऐसे खिलौने बनाने वाले कारीगरों से मिल सकते हैं। वे ज्यादातर चटक रंगों में पशु पक्षियों के समूह बनाते हैं। आपको यहाँ लकड़ी के गुड्डे गुड़िया भी मिल जायेंगे। छोटे उपहार हेतु लकड़ी की कुंजी, पेंसिल इत्यादि भी उपलब्ध हैं।

मैंने जो खिलौना खरीदा उसकी संकल्पना कुछ हद तक रूसी गुड़िया अथवा मातृशका गुड़िया से साम्य रखती है। परन्तु यह भगवान् शिव व उनके परिवार से सम्बंधित है। इसमें पहले एक लकड़ी की अंडाकार डिबिया है जिस पर चटक रंगों में शिव का चित्र बना हुआ है। इस डिबिया को खोलने पर इसके अन्दर उसी आकार की परन्तु छोटी डिबिया है जिस पर पार्वती का चित्र बना हुआ है. इसी तरह तीसरी डिबिया पर कार्तिक व चौथी डिबिया पर गणेश के चित्र बने हैं।

वाराणसी के यह लकड़ी खिलौने सम्पूर्ण वाराणसी में हर जगह पर उपलब्ध हैं। मुझे वाराणसी विमानतल में भी कुछ सुन्दर लकड़ी के खिलौने मिले।

वाराणसी की रोगन लगी लकड़ी की कलाकारी के बारे में और जानिये ‘यहाँ’।

रोगन लगे लकड़ी के खिलौने व फर्नीचर भारत में और भी कई जगह उपलब्ध है, जैसे कर्नाटक में चन्नापट्टना, आन्ध्र प्रदेश में एतिकोप्पका और गुजरात में सानखेडा।

लाल पेडा

संकट मोचन मंदिर के पास लाल पेडा
संकट मोचन मंदिर के पास लाल पेडा

आप ने अब तक दो प्रकार के पेड़ों के बारे में जरूर सुना होगा और स्वाद भी चखा होगा। एक उत्तर भारत का मथुरा पेडा व दूसरा दक्षिण भारत का धारवाड़ पेडा। परन्तु बनारस के हर क्षेत्र में अपना अलग ही अंदाज होता है। इसलिए यहाँ का पेडा भी अपना अलग अंदाज व स्वाद लिए हुए है। इन पेड़ों को लाल पेडा कहा जाता है। यह इन दोनों पेड़ों का और ज्यादा भुना रूप होता है। इसलिए इसका रंग लाल व प्रकृति कुरकुरी होती है। घी से भरे पेड़ों में कई बार सूखे मेवे भी डाले जाते हैं।

इन पेड़ों  को आप प्रसिद्ध संकट मोचन हनुमान मंदिर के आसपास की दुकानों से खरीद सकतें हैं। यह गेदौलिया की कचौरी गली में स्थित मिठाई की दुकानों में भी उपलब्ध हैं।

मीठा खाने के शौकीन परिजनों व मित्रों के लिए यह एक उपयुक्त उपहार हो सकता है।

स्फटिक व पत्थर के शिवलिंग

स्फटिक एवं पत्थर में शिवलिंग
स्फटिक एवं पत्थर में शिवलिंग

मैं जब भी वाराणसी की यात्रा पर आती हूँ मेरे परिवारजन व मित्र मुझसे स्फटिक के शिवलिंग की फरमाइश करतें हैं। स्फटिक के शिवलिंग पूर्णतः पारदर्शी होते हैं। इन्हें घरों में पूजा जाता है। कई लोग इसे सौभाग्य के प्रतीक रूप मान हमेशा अपने पास रखते हैं।

यदि आप इन स्फटिक के शिवलिंगों को खरीदना चाहें तो आप प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर की ओर जाती विश्वनाथ गली में स्थित दुकानों से खरीद सकतें हैं। इन शिवलिंगों की ऊंचाई कुछ मिलीमीटर से कुछ इंचों तक हो सकती है। इनकी कीमत इनकी ऊंचाई पर निर्भर होती है। सबसे छोटा शिवलिंग करीब १०० रुपये में उपलब्ध है।

यहाँ पत्थरों के शिवलिंग भी बनाए व बेचे जातें हैं।

चूंकि काशी अर्थात् वाराणसी भगवान् शिव की नगरी है, स्फटिक या पत्थर के शिवलिंग वाराणसी की सर्वोत्कृष्ट निशानी या यादगार होतें हैं।

रुद्राक्ष माला

रुद्राक्ष माला
रुद्राक्ष माला

रुद्राक्ष एक फल का खुरदुरी सतह वाला बीज होता है। रुद्राक्ष यानी रूद्र के आंसू। रुद्राक्ष की उत्पत्ति रूद्र अर्थात् भगवान् शिव के आँखों के जलबिंदु से हुई है। रुद्राक्ष की माला सबसे प्राकृतिक व जैविक गहना है। हमारे साधु संत इसे सकारात्मक ऊर्जा हेतु अनंतकाल से धारण करते आ रहें हैं। सांसारिक जीवन में रह रहे हिन्दू भी इस पवित्र बीज को बड़ी श्रद्धा से धारण करतें हैं। किसी भी अस्वच्छ या अपवित्र स्थान पर इन्हें ले जाना वर्ज्य माना जाता है।

हालांकि वाराणसी के आसपास रुद्राक्ष के वृक्ष नहीं पाए जाते, परन्तु रुद्राक्ष की खरीदी हेतु वाराणसी सर्वोत्तम शहर है। इन रुद्राक्ष के बीजों को धागे में पिरो कर माला बनायी जाती है। वाराणसी में रुद्राक्ष की मालायें विभिन्न प्रकार व अनेक लम्बाईयों में उपलब्ध हैं। परन्तु १०८ पंचमुखी रुद्राक्ष की माला सर्वप्रसिद्ध है।

रुद्राक्ष कई प्रकार के होते है और इनका महत्त्व भी अलग अलग होता है। यह १ मुखी से १४ मुखी तक पाए जातें हैं। उदाहरणार्थ एक मुखी रुद्राक्ष भगवान् शिव का रूप, द्विमुखी रुद्राक्ष श्री गौरी-शंकर, पंचमुखी रुद्राक्ष सुख प्रदान करने वाला, इत्यादि माने जाते हैं। इनमें से कुछ प्रकार अत्यंत दुर्लभ हैं। यह रुद्राक्ष की माला वाराणसी की सर्वोपयोगी यादगार वस्तु हो सकती है। ले जाने में आसान, पहनने में आसान!

अटपटे आकार के रुद्राक्ष और विश्वनाथ मुद्राएँ
अटपटे आकार के रुद्राक्ष और विश्वनाथ मुद्राएँ

कुछ ऐसी भी मालाये होतीं हैं जिनका इस्तेमाल तांत्रिक कालाजादू में करतें हैं, जैसे मुंडमाला। गंगा घाट पर बिकने वाले मुंडमालाएं नकली हैं। असली मुंडमाला मुझे अपनी भूटान यात्रा के दौरान देखने मिली।

यहाँ धातु के सिक्के भी उपलब्ध है जिनके एक तरफ काशी विश्वनाथ मंदिर व दूसरी तरफ माता अन्नपूर्णा मंदिर के नक्काशीदार चित्र बने हुए हैं। यह विश्वनाथ के शहर की बेहतरीन यादगार साबित हो सकतें हैं।

कांच के मोती

कांच के मोती
कांच के मोती

क्या आप जानते हैं कि कांच के मोती बनाने का विश्व का विशालतम कारखाना वाराणसी में ही है! मैंने अपनी पिछली वाराणसी यात्रा के दौरान ऐसे ही एक कारखाने के दर्शन किये थे। कारखाने के विभिन्न तलों में फैले रंग बिरंगे कांच के मोतियों को देख मैं दंग रह गयी थी। खासकर हाथ से बनाए मोती तो बेहद खूबसूरत थे। प्रधानमन्त्री की ‘भारत में बनाओ’ योजना का एक बेहतरीन उदाहरण है यह कांच के मोतियों के कारखाने। हालांकि भट्टी के पास, जहां यह मोती बनाए जाते हैं, पर्यटकों का प्रवेश निषेध है परन्तु आप यहाँ से ये मोतियाँ खरीद जरूर सकतें हैं।

इन कांच की मोतियों से बने गहने भी बेहद खूबसूरत दिखाते हैं। उपहार स्वरुप इन्हें आप किसी भी स्मारिका की दुकान से खरीद सकतें हैं।

बांसुरी

बांसुरी विक्रेता - गंगा घाट पे
बांसुरी विक्रेता – गंगा घाट पे

संगीत बनारस के रग रग में बसता है। बनारस ने पंडित रवि शंकर, उस्ताद बिस्मिल्ला खान और गिरिजा देवी जैसे बहुमूल्य हीरे शास्त्रीय संगीत की दुनिया को प्रदान किये। भारतीय शास्त्रीय संगीत में बनारस घराने का विशिष्ठ स्थान है। आज भी वाराणसी की गली गली में शास्त्रीय संगीत के पंडित गाते, बजाते व बैठक सजाते दिखाई पड़ते हैं। यही वजह है कि वाराणसी में आपको कई संगीत वाद्यों की दुकानें नजर आएँगी। दूर दूर से लोग इन वाद्यों की खरीददारी हेतु वाराणसी आते हैं। वाराणसी की निशानी के रूप में आप भी कोई वाद्य यहाँ से खरीद सकते हैं। हालांकि वीणा, सितार जैसे बड़े वाद्य ले जाना असुविधाजनक हो सकते हैं परन्तु हर आकार में उपलब्ध बांसुरियां आसानी से खरीदी व ले जाई जा सकतीं हैं। संगीत की प्रेरणा देती यह निशानी आपको हमेशा वाराणसी की याद दिलाती रहेगी।

रामनामी कपड़े

रामनामी वस्त्र
रामनामी वस्त्र

वाराणसी में गंगा घाट की सैर के दौरान आपको कई साधु व श्रद्धालु ऐसे दिखेंगे जिन्होंने राम का नाम लिखे सफ़ेद या पीले वस्त्र धारण किये हुए हों। इनमें कुछ पर श्लोक, मन्त्र तथा देवी देवताओं के चित्र बने होते हैं। इन्हें रामनामी कपड़े कहते हैं। ऐसे रामनामी कुरते, अंगवस्त्र तथा दुपट्टे यहाँ दुकानों में बिकते नजर आतें हैं। मैंने भी यहाँ से एक रामनामी कपड़े की खरीददारी की थी। बनारस की आध्यात्मिकता से ओतप्रोत होते हुए भी यह आज के आधुनिक पहनावे में आसानी से घुलमिल जातें हैं।

पत्थरों पर खुदी कलाकृतियाँ

पत्थर की कलाकृतियाँ
पत्थर की कलाकृतियाँ

वाराणसी के शिल्पकारों का एक बड़ा समूह ऐसा भी है जिसने वाराणसी की पत्थरों को तराशने की कला को जीवित रखा है। वे पत्थरों पर बारीकी से खुदाई कर पशु, पक्षी व अन्य आकारों की सुन्दर कलाकृति तैयार करतें हैं। अक्सर यह कलाकृतियाँ बिना जोड़ के, दो परतों में की जाती है। बनारस में पत्थर पर खुदाई का इतिहास रहा है। अशोक स्तंभों में लगे नक्काशीदार पत्थर वाराणसी के निकट चुनार से लाये गए थे।

आप भी यहाँ से इन पशु पक्षियों की सुन्दर कलाकृतियाँ खरीद सकते हैं। पत्थर की जालीदार डिबिया सुगन्धित धूप इत्यादि रखने हेतु उत्तम व खूबसूरत उपहार हो सकती है।

इन कलाकृतियों की दुकानें मुझे वाराणसी शहर से ज्यादा सारनाथ में नजर आयीं।

भारतीय साहित्य

पुस्तक भंडार
पुस्तक भंडार

सदियों से वाराणसी कई भारतीय पुस्तकों के प्रकाशन के लिए प्रसिद्ध रहा है। भारतीय संस्कृति पर आधारित पुस्तकें जैसे वेद, पूरण, उपनिषद इत्यादि आसानी से उपलब्ध हैं। हालाँकि हिंदी की पुस्तकें यहाँ की विशेषता है, पर आप इन्हें अन्य भाषाओँ जैसे अंग्रेजी में भी खरीद सकते हैं।

मैंने अपनी हर वाराणसी यात्रा के दौरान इन परम्परागत दुकानों में पुस्तकों के साथ भरपूर समय बिताया। यहाँ से कई पुस्तकों की खरीददारी भी की। अपने पसंदीदा पुस्तकों की खरीदी कर आप भी अपने पुस्तकों के संग्रह में चार चाँद लगा सकतें हैं।

तो आप अपनी वाराणसी यात्रा से कौन सी यादगार अपने साथ लाना चाहेंगे?

यदि आपके पास वाराणसी की विशेष वस्तुओं से सम्बंधित कुछ और जानकारी है, या आप इन वस्तुओं की सूची में कुछ और जोड़ना चाहते हैं तो आपका स्वागत है।

काशी सम्बंधित अन्य यात्रा वृतांत

तुलसी अखाडा – तुलसी घाट वाराणसी

प्राचीन पंचक्रोशी यात्रा

जंगमवाडी मठ – सहस्त्र शिवलिंगों का संग्रह

हिंदी अनुवाद : मधुमिता ताम्हणे

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वाराणसी के तुलसी अखाड़े के पहलवानों की दिनचर्या https://inditales.com/hindi/kushti-tulsi-akhara-varanasi/ https://inditales.com/hindi/kushti-tulsi-akhara-varanasi/#respond Wed, 01 Mar 2017 02:30:37 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=160

अखाड़ों के बारे में जानने की उत्सुकता मुझे हमेशा रही और कभी कोई अखाड़ा देख पाऊं यह इच्छा भी बहुत दिनों से थी। मेरी यह इच्छा पूर्ण हुई जब हाल ही की मेरी वाराणसी यात्रा के दौरान प्रख्यात तुलसी अखाड़े में कुछ समय बिताने का अवसर मिला। वाराणसी के प्रसिद्ध अस्सी घाट से कुछ ही […]

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जोड़ी यन्त्र से वर्जिश करता हुआ पहलवान - तुलसी अखाड़े में
जोड़ी यन्त्र से वर्जिश करता हुआ पहलवान – तुलसी अखाड़े में

अखाड़ों के बारे में जानने की उत्सुकता मुझे हमेशा रही और कभी कोई अखाड़ा देख पाऊं यह इच्छा भी बहुत दिनों से थी। मेरी यह इच्छा पूर्ण हुई जब हाल ही की मेरी वाराणसी यात्रा के दौरान प्रख्यात तुलसी अखाड़े में कुछ समय बिताने का अवसर मिला। वाराणसी के प्रसिद्ध अस्सी घाट से कुछ ही दूरी पर स्थित तुलसी घाट पर यह तुलसी अखाड़ा है। उस दिन मैं सुबह साढ़े बजे ही अखाड़े पहुँच गयी। चूंकि पहलवान अभी अखाड़े पहुंचे नहीं थे, मैं आसपास का नज़ारा देखने चल पड़ी।

चलते चलते मैं तुलसी रामायण के रचयिता गोस्वामी तुलसीदासजी के आवास गृह पहुँच गयी। मंदिर सदृश यह आवास गृह दर्शनार्थ सदैव खुला रहता है। मुझे भी प्रवेश की अनुमति मिली परन्तु छायाचित्र लेने की मनाही के साथ। गोस्वामी तुलसीदासजी के आवास गृह में घूमते समय रोमांच से मेरे रोंगटे खड़े हो रहे थे। हिन्दू साहित्य के प्रमुख ग्रंथों में से एक ग्रन्थ की रचना हुई थी यहाँ! सादा सा घर, जिसकी तीन खिड़कियाँ गंगा की तरफ खुलतीं हैं। वहां से तैरती हुई नौकाओं में श्रद्धालु प्रार्थना करते दिखाई पड़ रहे थे। अत्यंत रचनात्मक वातावरण मेरे चारों ओर उपस्थित था। इसी वातावरण में तुलसीदासजी ने रामायण की रचना की होगी!

गृह के एक कोने में हनुमानजी का एक छोटा सा मंदिर है। छोटे से आले पर कई किताबें रखी हुई हैं। पर वहां मुझे तुलसी रामायण कहीं दिखाई नहीं दी। वहां कुछ लोगों से चर्चा कर मुझे ज्ञात हुआ कि तुलसी अखाड़े की स्थापना तुलसीदासजी ने ही की थी। अर्थात् ५०० वर्ष पुराने इस अखाड़े में स्वयं तुलसीदासजी ने भी पहलवानी का अभ्यास किया था!

अखाड़ा

कुश्ती से पहले व्यायाम
कुश्ती से पहले व्यायाम

भारत देश की मूल व्यायामशाला है यह अखाड़ा! दैनिक व्यायाम और हृष्ट पुष्ट शरीर के लिए पुरुष इस व्यायामशाला में आते हैं। आधुनिक व्यायामशाला से भिन्न, अखाड़े में अलग तरह के साज-सामानों का उपयोग होता है।

तुलसी अखाड़े की छत छप्पर की व फ़र्श मिट्टी का है। दीवार पर भगवान् राम का छोटा सा मंदिर है और इसके हर खम्बे पर ‘जय श्रीराम’ लिखा हुआ है। बाहर खुली छत में व्यायाम करने के लिए भी अलग से एक मिट्टी का फ़र्श बनाया हुआ है। अखाड़े के दो तरफ बैठने के लिए तख्त की व्यवस्था भी है।

तुलसी अखाड़े की दिनचर्या

कुश्ती से पहले अखाड़े की मिट्टी की खुदाई
कुश्ती से पहले अखाड़े की मिट्टी की खुदाई

आधुनिक व्यायामशालाओं के विपरीत, यहाँ आते से ही व्यायाम के अभ्यास की शुरुआत नहीं की जाती। अखाड़ों को श्रद्धा व सम्मान की दृष्टी से देखा जाता है। इसलिए व्यायाम आरम्भ करने से पहले कई और अनुष्ठान किया जाते है।

  • जिस तरह एक किसान बीज बुआई से पहले मिट्टी की जुताई कर उसे ढीला व हवादार बनाता है, उसी तरह अखाड़े में भी कुदाल व फावड़े से पहले मिट्टी को खोदा जाता है। फिर हाथों से रगड़ रगड़ कर उसे बारीक व मुलायम बनाया जाता है। मेरे सामने ही दो पहलवानों ने मिट्टी को कुश्ती के लिए इसी तरह तैयार किया।
  • उस तैयार मिट्टी पर पानी का छिडकाव किया।
  • फिर उस मिट्टी पर पुष्प अर्पण किये।
  • अखाड़े की दीवार पर स्थित राम मंदिर में पूजा अर्चना की। उसके उपरांत भगवान राम व अखाड़े की मिट्टी, दोनों को धूप अर्पित किया। सभी पहलवान कतार में खड़े होकर हाथ जोड़े प्रार्थना करने लगे।
  • प्रार्थना के उपरांत ही पहलवानों ने कसरत व कुश्ती करने के लिए अखाड़े में प्रवेश किया।

तुलसी अखाड़े के पहलवान

कुश्ती से पहले पूजा
कुश्ती से पहले पूजा

प्रातः करीब ७ बजे तक सारे पहलवान अखाड़े में कुश्ती के लिए उपस्थित हो गए। सबसे वरिष्ठ कुश्तीबाज श्री मेवाराम ने अपनी कसरत आरम्भ की। साथ ही साथ वे अन्य पहलवानों की कसरत का भी ध्यानपूर्वक निरिक्षण कर रहे थे। पहलवानों के शरीर पर सिर्फ एक लंगोट होती है और कुश्ती से पहले वे सब तख्त पर बैठ कर अपने शरीर पर अच्छी तरह से तेल  की मालिश करते हैं। मालिश के उपरांत उनकी कसरत आरम्भ होती है।

वरिष्ठ पहलवान श्री मेवा राम जी - वर्जिश करते हुए
वरिष्ठ पहलवान श्री मेवा राम जी – वर्जिश करते हुए

पहलवानों की कसरत को समझने के लिए मैंने एक पहलवान के कार्यकलापों को ध्यानपूर्वक देखा। वह अखाड़े की पूरी लम्बाई दौड़ने लगा और कई चक्कर लगाए। हर लम्बाई भिन्न तरीके से पूर्ण की। आखिरकार वह एक भारी चक्के को गले में पहनकर दौड़ने लगा। भारी वजन गले में पहन कर भिन्न भिन्न तरीकों की दौड़ देखकर मैं आश्चर्य चकित हो गयी। उसकी तैयारी प्रशंसनीय थी। साथ ही उसकी लयदार चाल देखकर मैं अचंभित रह गयी। एसा प्रतीत हो रहा था जैसे यह सब उसके लिए अत्यंत आसान है। उसे देख मुझे एक सीख मिली की शोभा व लावण्य जो दृडता, हठ व अभ्यास से प्राप्त होती है, उसका कोई पर्याय नहीं।

सारे युवा पहलवान अपनी कसरत, व्यायाम या वर्जिश के लिए सारे अखाड़े में बिखर गए। मैं श्री मेवाराम के अभ्यास को ध्यानपूर्वक देखने लगी। इस उम्र में भी उनके शरीर की लोच और फुर्ती प्रशंसनीय है। वे अपने शरीर को किसी भी कोण में मोड़ रहे थे। अचानक ही वे उल्टा लटक कर झूले की तरह झूलने लगे।  अखाड़े में कई वर्षों के अभ्यास उपरांत ही ऐसी सफलता मिलती है। मेरा ह्रदय उनके लिए श्रद्धा व आदर से भर गया।

अखाड़े के उपकरण

तुलसी अखाड़े के उपकरण - जोड़ी एवम् संतुलन
तुलसी अखाड़े के उपकरण – जोड़ी एवम् संतुलन

अखाड़े में पहलवानों के उपयोग के प्रायः सभी उपकरण भारी लकड़ी के बने होते हैं। तुलसी अखाड़े के सभी उपकरणों को लाल रंग से रंगा हुआ था। सुबह के वक्त यह सारे उपकरण एक पेड़ के इर्दगिर्द रखे हुए थे। उन में से कुछ उपकरणों के नाम निम्नलिखित हैं और उनके उपयोग की विधि एक विडियो में इस संस्मरण के अंत में युक्त है।

  • गदा
  • नाल
  • जोड़ी
  • संतुलन
नाल एवम् गदा
नाल एवम् गदा

करीब साढ़े ७ बजे पहलवानों ने कुश्ती का अभ्यास आरम्भ किया। चेहरा शांत और शरीर स्फूर्ति से भरा हुआ। मेवारामजी लगातार उन पर नजर रखते हुए उन्हें अनुदेश दे रहे थे। साथ ही साथ उनकी अपनी कसरत भी उन्होंने जारी रखी हुई थी। उनके बहुतांश अनुदेश पहलवानी से जुड़े छोटे छोटे शब्दों के रूप में आ रहे थे। कई बार वे सिर्फ पहलवानों के नाम ही लेते थे। उनके नाम पुकारने के अंदाज़ से ही पहलवानों को समझ आ जाता था कि गुरूजी क्या कहना चाहते हैं।  दिमाग ठंडा, बदन गरम  जैसे शब्दों से वे उनका हौसला बढ़ा रहे थे।

कुश्ती

कुश्ती अभ्यास
कुश्ती अभ्यास

कुश्ती के अभ्यास के लिए पहलवानों ने जोड़ियाँ बनायी और कुश्ती आरम्भ की। वे कुश्ती इतनी शांति, गरिमा और भव्यता से कर रहे थे कि उन्हें देख मन आनंदित हो उठा। कुश्ती के बीच बीच में वे मिट्टी को अपने शरीर के ऊपर मलते रहते थे। उन्हें बीच में रोक कर इसका कारण पूछने की तो हिम्मत नहीं हुई पर मेरे अंदाज से वे ऐसा अपने तेल लगे शरीर पर पर्याप्त पकड़ प्रदान करने के लिए कर रहे थे।

तुलसी अखाड़े की कुश्ती
तुलसी अखाड़े की कुश्ती

मैंने कुछ घंटे कुश्ती का आनंद उठाने व इन क्षणों को अपने कैमरे में कैद करने में बिता दिए। मेरे लिए यह एक ठेठ भारतीय अद्भुत अनुभव था। जिस तरह पहलवान अखाड़े को मंदिर की तरह पूजते हैं उसने हमारे व हमारे चुने व्यवसाय के बीच रिश्ते पर कई सवाल खड़े कर दिए। क्या हम अपने व्यवसाय को अध्यात्म और हमारे अंतर्मन से जोड़ पाते हैं? क्या हम भी अपने व्यवसाय को इतना सम्मान दे पाते हैं? इसी तरह यदि हम भी अपना व्यवसाय ईमानदारी और भक्ति से करते तो क्या वह और बेहतर नहीं हो जाता? क्या हम इस बात को समझ पाते हैं कि हम जो भी करते हैं वह एक बड़े चक्र का छोटा परन्तु अहम् हिस्सा है?

तुलसी अखाड़े का विडियो

मैंने कुश्ती व अखाड़े की कुछ अविस्मरणीय स्मृतियाँ इस विडियो में कैद कीं हैं। विडियो की बारीकियों पर गौर फरमाईये।

मेवारामजी व अन्य पहलवानों के बीच के संवादों को सुन प्राचीन भारत के गुरु शिष्य परंपरा का अनुभव हुआ। इन अखाड़ों ने इस परंपरा को अभी भी जीवित रखा हुआ है। इन अखाड़ों में गुरु द्वारा शिष्यों को सिर्फ कला नहीं, बल्कि संपूर्ण संस्कार प्रदान किये जाते हैं।

तुलसी अखाड़े के इस अनुभव ने मुझे विनम्रता का आभास कराया। मुझे धरती से जुड़े रहने की प्रेरणा मिली और गर्व महसूस हुआ कि मैं भी इस गरिमामयी संस्कृति का एक हिस्सा हूँ।

वाराणसी के अन्य दर्शनीय स्थलों के संस्मरण – कुछ अंग्रेजी में जब तक हम अनुवाद करते हैं.

  1. काशी पंचक्रोशी यात्रा- तीर्थयात्रियों का एक प्राचीन मार्ग
  2. वाराणसी के घाटों की चहल पहल
  3. वाराणसी के स्वादिष्ट व्यंजन
  4. वाराणसी के घाटों पर संध्या आरती
  5. गंगा के दूसरे तीर पर स्थित रामनगर
  6. काशी के कवि और संत कबीर की खोज

हिंदी अनुवाद : मधुमिता ताम्हणे

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