गुफाएं Archives - Inditales श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Wed, 29 May 2024 07:40:06 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.0.7 विदिशा की उदयगिरी गुहा, हेलिओडोरस स्तंभ एवं बीजामंडल https://inditales.com/hindi/vidisha-udaygiri-beejamandal-madhya-oradesh/ https://inditales.com/hindi/vidisha-udaygiri-beejamandal-madhya-oradesh/#respond Wed, 18 Sep 2024 02:30:19 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3684

विदिशा प्राचीन भारत की एक महत्वपूर्ण नगरी रही है। विदिशा उत्तर भारत एवं  दक्षिण भारत को जोड़ते व्यापार मार्ग पर स्थित थी। अनेक प्राचीन कथाओं में विदिशा का उल्लेख प्राप्त होता है, विशेषतः व्यापारियों से संबंधित लोककथाओं में। विदिशा का नाम लेते ही हमारे मस्तिष्क में सांची स्तूप की छवि प्रकट हो जाती है लेकिन […]

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विदिशा प्राचीन भारत की एक महत्वपूर्ण नगरी रही है। विदिशा उत्तर भारत एवं  दक्षिण भारत को जोड़ते व्यापार मार्ग पर स्थित थी। अनेक प्राचीन कथाओं में विदिशा का उल्लेख प्राप्त होता है, विशेषतः व्यापारियों से संबंधित लोककथाओं में। विदिशा का नाम लेते ही हमारे मस्तिष्क में सांची स्तूप की छवि प्रकट हो जाती है लेकिन विदिशा में सांची स्तूप के अतिरिक्त भी अनेक महत्वपूर्ण एवं रोचक पर्यटन स्थल हैं जो ऐतिहासिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, जैसे उदयगिरी गुहाएं।

उदयगिरी गुहा

प्राचीन काल में जब मंदिर निर्माण की परंपरा आरंभ हुई, तब पर्वत खंडों को काटकर गुहा मंदिरों का निर्माण किया जाता था। इसके पश्चात भूमि पर तथा ऊँचे जगती पर मंदिर निर्माण की परंपरा आरंभ हुई। कालांतर में मंदिर स्थापत्यकला की अनेक शैलियों का उदय हुआ।

विदिशा की उदयगिरी गुफाएं
विदिशा की उदयगिरी गुफाएं

पर्वत पर स्थित उदयगिरी गुहाओं में लगभग २० हिन्दू देवालय तथा जैन अनुयायियों के लिए एक जिनालय है। गुहा क्रमांक ६ के शिलालेख के अनुसार इनका निर्माण ४थी शताब्दी के अंत तथा ५वीं शताब्दी के आरंभ में चन्द्रगुप्त द्वितीय ने आरंभिक गुप्त काल में करवाया था। इसका तात्पर्य है कि ये गुहा मंदिर प्राचीनतम ज्ञात व दिनांकित हिन्दू मंदिर हैं। इन्हे विष्णुपदगिरी भी कहा जाता है।

उदयगिरी का शाब्दिक अर्थ है, उगते सूर्य की पहाड़ी। ऐसी पहाड़ी हम बिहार के राजगीर एवं ओडिशा में भुवनेश्वर के निकट देख सकते हैं। क्या इसका यह अर्थ है कि किसी काल में यह सूर्य आराधना का केंद्र था? कदाचित हाँ। इसका एक रोचक तत्व यह भी है कि यह कर्क रेखा पर स्थित है। इसका अर्थ है कि यह सूर्य गमन की रेखा पर स्थित है।

उदयगिरी गुहाएं बेतवा नदी एवं बैस नदी के संगम के निकट स्थित है। किसी काल में कदाचित यह विदिशा राज्य का ही भाग रहा होगा जैसा कि कालिदास के मेघदूत में वर्णित है। एक पहाड़ी पर बड़ी संख्या में मंदिरों की उपस्थिति व नदियों के संगम ने इस स्थान को पावन तीर्थस्थल बनाया होगा। पुरातात्विक सूत्र इस ओर संकेत करते हैं कि ६ ई.पू. में यह स्वयं में एक नगरी थी।

दिल्ली के कुतुब मीनार के निकट लौह स्तंभ आप सबने देखा ही होगा। ऐसी मान्यता है कि वह लौह स्तंभ मूलतः उदयगिरी में स्थापित था।

गुहा मंदिरों से ज्ञात होता है कि गर्भगृह के समक्ष चौकोर मंडप थे। कुछ गुहाओं में स्तंभ अब भी देखे जा सकते हैं। द्वार चौखटों पर किए गए शिल्प भी देखे जा सकते हैं। शिलाओं को उकेर कर उन पर आले बनाए गए हैं जिनके भीतर मूर्तियाँ उत्कीर्णित हैं।

उदयगिरी कंदराएं – गुहा क्रमांक ५

गुहा क्रमांक ५ उदयगिरी गुहाओं में सर्वाधिक महत्वपूर्ण गुहा है। इसके भीतर एक भित्ति पर भगवान विष्णु के वराह अवतार की विशालकाय प्रतिमा उत्कीर्णित है। यह प्रतिमा इन गुहाओं का सांकेतिक शिल्प है।

भूमि देवी और वराह अवतार - उदयगिरी गुहा विदिशा
भूमि देवी और वराह अवतार – उदयगिरी गुहा विदिशा

विष्णु के वराह अवतार ने स्त्री रूपी धरती को अपनी नथूनी के ऊपर उठाया हुआ है। उनके चारों ओर अनेक अन्य देवी-देवताओं के शिल्प हैं। जैसे:

धरती माता के शिल्प के ऊपरी भाग पर कमल पुष्प पर विराजमान ब्रह्मा एवं नंदी पर आरूढ़ भगवान शिव की छवियाँ हैं।

वराह की छवि के दाहिनी ओर स्थित शैल फलक पर १२ आदित्य, ८ वसु, ११ रुद्र, अग्नि एवं वायु अर्थात ३३ कोटि देवता विराजमान हैं। साथ ही अनेक ऋषिगण भी दृश्य का आनंद ले रहे हैं।

चित्रवीथिका के निचले भाग पर समुद्र के निकट गुप्त राजाओं एवं उनके मंत्रियों को देखा जा सकता है।

वराह के बाएं चरण के समीप शेषनाग तथा दाहिने चरण के समीप लक्ष्मी के शिल्प हैं।

चित्रवीथिका के ऊपरी भाग पर बायीं ओर वीणा धारी नारद के नेतृत्व में अनेक मुनिगण विराजमान होकर दृश्य का अवलोकन कर रहे हैं।

उदयगिरी गुहाओं के अंतर्गत अन्य गुहाएं एवं मंदिर

पुरातत्वविद् कन्निघम ने गुहा क्रमांक छः का नामकरण वीणा गुहा किया क्योंकि इसके भीतर वीणा वादन करते हुए एक पुरुष की छवि उत्कीर्णित है। गुहा के भीतर ले जाते द्वार पर गंगा एवं यमुना की छवियाँ हैं। गुहा के भीतर एकमुखलिंग है अर्थात एक शिवलिंग है जिसके ऊपर एक मुख उत्कीर्णित है।

विदिशा में विष्णु प्रतिमा
विदिशा में विष्णु प्रतिमा

गुहा क्रमांक १३ के भीतर शेषशायी विष्णु की ३.६६ मीटर लंबी प्रतिमा है। आंध्रप्रदेश के उँदावल्ली गुहाओं में भी आप ऐसी ही प्रतिमा देखेंगे।

गुहा क्रमांक १९ के भीतर सागर मंथन का दृश्य उत्कीर्णित है।

इनके अतिरिक्त यहाँ अनेक मंदिर हैं जो हिन्दू देवी-देवताओं को समर्पित हैं। उनमें से अधिकांश खंडित अवस्था में हैं।

अन्य गुहायें साधारण हैं किन्तु कुछ के भीतर महिषासुरमर्दिनी, गणेश एवं मातृकाओं के उत्कीर्णित शिल्प अब भी देखे जा सकते हैं।

इन गुहाओं में उत्कीर्णित आकृतियों पर यूनानी वैशिष्ठ्य स्पष्ट परिलक्षित होता है। कदाचित भारत का वह काल यूनानी कला से प्रभावित रहा होगा अन्यथा कलाकृतियों के रचयिता यूनानी रहे होंगे। यह भी संभव है कि उस काल में साधारण मानवाकृतियाँ उसी प्रकार की रही होंगी जो कालांतर में वर्तमान रूप में विकसित हुई होंगी।

पहाड़ी के शीर्ष पर मंदिर के अवशेष है जो गुप्त काल के प्रतीत होते हैं। सांची के अशोक स्तंभ के अनुरूप यहाँ से भी एक विशाल स्तंभ प्राप्त हुआ था। पहाड़ी से नीचे अवतरण करते हुए आप एक विश्रामगृह देखेंगे जिसका निर्माण लगभग १०० वर्षों पूर्व ग्वालियर महाराजा ने करवाया था।

कर्क रेखा

कर्क रेखा एक काल्पनिक रेखा है जो उत्तरी गोलार्द्ध को दो भागों में विभाजित करती है। यह रेखा उत्तरी भोपाल से होकर जाती है। जब आप भोपाल से विदिशा की ओर जाते हैं तब आप इस रेखा को लाँघ कर जाते हैं। मेरी अभिलाषा है कि इसी प्रकार किसी दिवस मैं भूमध्य रेखा को भी लाँघ सकूँ।

हेलिओडोरस स्तंभ        

हेलिओडोरस स्तंभ विदिशा एवं उदयगिरी गुहाओं के मध्य स्थित है। यह दर्शनीय स्थल अधिक लोकप्रिय नहीं है। इसलिए इसके सटीक अवस्थिति के विषय में अधिकांश स्थानीय नागरिकों को जानकारी ना हो। यदि आप खांब बाबा के विषय में पूछेंगे तो वे आपको कदाचित इसकी जानकारी दे दें। हेलिओडोरस स्तंभ को स्थानीय रूप से खांब बाबा के नाम से पूजा जाता है।

हेलिओडोरस स्तंभ एक गरुड़ स्तंभ है जिसके शीर्ष पर विष्णु का वाहन गरुड़ का चिन्ह है। इस स्तंभ के विषय में मान्यताएं हैं कि इसकी स्थापना हेलिओडोरस नामक एक यूनानी विद्वान ने की थी जिसने अपने भारत निवासकाल में हिन्दू धर्म को अपना लिया था। वह विदिशा के राजा भागभद्र की राजसभा में यूनानी राजदूत था।

स्तंभ पर अंकित ब्राह्मी शिलालेख के अनुसार इसे १५० ई. पू. का माना जाता है। शिलालेख में वासुदेव को देवों के देव कहा गया है। कालांतर में शोधित स्तंभ शिलालेख में महाभारत के छंद भी लिखे हुए हैं।

एक परिगृहीत भूमि पर स्थित यह एक एकल संरचना है। जब हमने इस स्तंभ के विषय में इस क्षेत्र के निवासियों से चर्चा की तब उन्होंने हमें कुछ रोचक लोककथाएं सुनाई।

हेलिओडोरस स्तंभ के विषय में रोचक लोककथाएं

हमें हेलिओडोरस स्तंभ के विषय में अनेक लोककथाएं सुनने को मिलीं। यद्यपि उनकी प्रामाणिकता सिद्ध करना असंभव है, तथापि रोचक होने के कारण आपसे साझा करने से स्वयं को रोक ना सकी। एक व्यक्ति के अनुसार यह स्तंभ जितना भूमि के ऊपर है, उतना ही भूमि के भीतर भी है। उनके अनुसार यह छोटा सा भूखंड अनवरत रूप से धँसता जा रहा है। ऐसी मान्यता है कि इस स्तंभ के नीचे एक स्वर्ण मंदिर है। किन्तु इस भूखंड का उत्खनन नहीं हो सकता है। जब भी इस भूखंड के उत्खनन का प्रयास किया जाता है, यह स्थान सर्पों एवं बिच्छुओं से भर जाता है जिसके कारण उत्खनन संभव नहीं हो पाता है।

हेलिओदोरस स्तम्भ
हेलिओदोरस स्तम्भ

जब मैंने स्तम्भ के नीचे स्वर्ण मंदिर के विषय में सुना, मैं उस पर पूर्णतः अविश्वास नहीं कर पायी। साधारणतः विष्णु मंदिर के बाह्य भाग पर गरुड़ स्तम्भ अवश्य होता है जिसकी ऊंचाई मंदिर से कहीं अधिक होती है। जिस प्रकार स्तंभ के छोटे छोटे भाग भूमि से बाहर निकले हुए हैं, उन्हे देख ऐसा प्रतीत होता है मानो स्तंभ की स्थापना निकट स्थित मंदिर की ओर संकेत करने के लिए ही किया गया हो। काल एवं कुछ उत्खनन ही इस भेद को उजागर कर सकते हैं।

रहस्यमयी वृक्ष

स्तंभ के समीप एक रहस्यमयी वृक्ष है। जब आप इस वृक्ष को ध्यान से देखेंगे तो आप पाएंगे कि इसके तने पर कई नख गड़े हुए हैं। एक गाँववासी ने हमें बताया कि इस स्थान पर अनेक तांत्रिक अनुष्ठान भी किए जाते हैं। कई मन नख इस वृक्ष के तने के भीतर गड़े हुए हैं। काल के साथ तने पर नवीन वल्कल की रचना हो जाती है तथा लोग अधिक से अधिक नख उस पर गड़ाते रहते हैं।

सती विग्रह

यहाँ सती के कई शैल विग्रह हैं। वैवाहिक संबंध में अग्नि की महत्ता मुझे सर्वप्रथम यहीं दृष्टिगोचर हुई। शैल चित्र द्वारा यह चित्रित किया गया है कि विवाह बंधन में बंधने जा रहे युगल अग्नि में ही प्रतिज्ञा बद्ध होते हैं। एक साथ इस विश्व को त्यागकर उसी अग्नि में विलीन होने की प्रतिज्ञा करते हैं। आधुनिक समाज में इस पर अनेक प्रश्न उठ सकते हैं किन्तु यह एक रोचक आयाम अवश्य है।

बीजामंडल मंदिर संकुल

बीजामंडल मंदिरों का एक संकुल है जो विदिशा नगरी के मध्य स्थित है। इसके विषय में अधिक लोगों को जानकारी नहीं है। इस प्राचीन स्थल की ओर संकेत करता कोई सूचना पटल भी नहीं है।

महावारह - बीजामंडल
महावारह – बीजामंडल

इस मंदिर का निर्माण चर्चिका देवी मंदिर के रूप में किया गया था जिन्हे माँ दुर्गा का अवतार माना जाता है। कुछ उन्हे माँ सरस्वती का अवतार मानते हैं। इस मंदिर का निर्माण परमार राजा नववर्मन ने ११ वीं सदी में करवाया था। औरंगजेब ने इसे ध्वस्त कर इसे मस्जिद में परिवर्तित कर दिया था। स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने इसे अपने संरक्षण में ले लिया था। उस समय से यह केवल एक स्मारक है।

बीजामंडल
बीजामंडल

भोजपुर मंदिर के अनुरूप यह मंदिर भी एक ऊँचे जगती पर निर्मित है। यहाँ के भंगित शिल्प कृतियों पर हिन्दू देवी-देवताओं के विग्रह हैं। जगती पर पड़े हुए सहस्त्रों की संख्या में मंदिर के भग्नावशेष उस पर किए गए अत्याचारों की गाथा कहते हैं।

कुछ सूत्रों के अनुसार यह सूर्य मंदिर था तो कुछ सूत्र इसे विजय मंदिर कहते है जिसका निर्माण युद्ध में प्राप्त विजय का उल्हास व्यक्त करने के लिए किया जाता था।

बावड़ी

मंदिर के समीप एक बावड़ी अथवा वापी है जो ८ वीं सदी का माना जाता है। बावड़ी के समीप स्थित दो स्तंभों पर कृष्ण लीला उत्कीर्णित है। आगे जाकर एक गोलाकार बावड़ी है जो पाटन में स्थित रानी की वाव के अनुरूप है।

ऐसा माना जाता है कि यह बावड़ी भूमिगत जलस्रोत से पोषित होती है। इस बावड़ी का जलस्तर सदा एक समान रहता है।

इस स्मारक की भीतरी एवं बाह्य अवस्था अत्यंत दयनीय है जिसे गंभीर रखरखाव की आवश्यकता है।

विदिशा संग्रहालय

विदिशा संग्रहालय में विविध प्रकार की अनेक कलाकृतियाँ एवं शिल्प हैं। उनमें से अधिकांश कृतियाँ विदिशा एवं उसके आसपास के क्षेत्रों में किए गए उत्खनन के समय प्राप्त हुई थीं। उनमें कुबेर एवं यक्षी के विशाल विग्रह भी सम्मिलित हैं।

यक्ष एवं यक्षी - बीजामंडल
यक्ष एवं यक्षी – बीजामंडल

ये कलाकृतियाँ सम्पूर्ण संग्रहालय में बिखरी हुई हैं। संग्रहाल में एक स्मारिका विक्रय केंद्र है जहाँ से आप इन कलाकृतियों के पेरिस पलस्तर में निर्मित प्रतिलिपियाँ क्रय कर सकते हैं। इस स्थल से संबंधित कुछ पुस्तकें भी हैं।

ऐसे धरोहर स्थलों की यात्रा करना इतिहास में विचरण करने जैसा प्रतीत होता है। ऐसा इतिहास जो किसी काल में फलता-फूलता वर्तमान था तथा दूसरे काल में विलुप्त हो गया। अनमोल धरोहरों के शोध में जिसे इतिहासकारों ने पुनः ढूंढ निकाला।

विदिशा यात्रा के लिए कुछ सुझाव

उदयगिरी गुहायें सांची से लगभग १६ किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं।

विदिशा उदयगिरी से भी आगे लगभग ६-८ किलोमीटर दूर स्थित है।

विदिशा का भ्रमण करने के लिए आप भोपाल अथवा सांची में ठहर सकते हैं तथा एक दिवसीय यात्रा के रूप में विदिशा भ्रमण कर सकते हैं।

इसी यात्रा में आप भोजपुर शिव मंदिर तथा भीमबेटका गुहाओं का भी अवलोकन कर सकते हैं।

इन पर्यटन स्थलों पर गाइड आसानी ने उपलब्ध नहीं रहते हैं। अतः आप इनके विषय में भलीभांति अध्ययन करने के पश्चात यात्रा करें।

इनमें से अधिकांश स्थलों पर दर्शन शुल्क नाममात्र है अथवा दर्शन शुल्क नहीं है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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पाताल भुवनेश्वर : कुमाओं की भूमिगत गुहानगरी https://inditales.com/hindi/pataal-bhuvaneshwar-guha-uttarakhand/ https://inditales.com/hindi/pataal-bhuvaneshwar-guha-uttarakhand/#comments Wed, 28 Feb 2024 02:30:57 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3397

भूमिगत गुहानगरी पाताल भुवनेश्वर! हिमालय की गोद में विराजमान है एक ऐसी भूमिगत नगरी जिसे देख आप अचंभित हो जाएंगे। वह नगरी है, पाताल भुवनेश्वर जिसका प्रवेश द्वार देवभूमि उत्तराखंड राज्य के कुमाओं क्षेत्र में स्थित है। लोगों का मानना है कि यह एक व्यापक भूमिगत नगरी है जिसके आंतरिक पथ कैलाश मानसरोवर, चार धाम, […]

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भूमिगत गुहानगरी पाताल भुवनेश्वर! हिमालय की गोद में विराजमान है एक ऐसी भूमिगत नगरी जिसे देख आप अचंभित हो जाएंगे। वह नगरी है, पाताल भुवनेश्वर जिसका प्रवेश द्वार देवभूमि उत्तराखंड राज्य के कुमाओं क्षेत्र में स्थित है। लोगों का मानना है कि यह एक व्यापक भूमिगत नगरी है जिसके आंतरिक पथ कैलाश मानसरोवर, चार धाम, काशी, यहाँ तक कि रामेश्वरम तक जाते हैं।

भूमि से लगभग ९० फुट नीचे, लगभग १६० वर्ग मीटर विस्तृत क्षेत्र में फैला हुआ इस नगरी का प्रवेश स्थल आपको आमंत्रित कर रहा है।

पाताल भुवनेश्वर का इतिहास

इस गुहा की खोज राजा ऋतुपर्ण ने की थी जो सूर्यवंश के राजा थे तथा त्रेता युग में अयोध्या पर शासन करते थे।

पाताल भुवनेश्वर गुफा का प्रवेश द्वार
पाताल भुवनेश्वर गुफा का प्रवेश द्वार

राजा ऋतुपर्ण ने इस गुहा का भ्रमण किया था। ऐसी मान्यता है कि स्वयं शेषनाग ने उन्हे इस गुहा का भ्रमण कराया था। द्वापर युग में पांडवों ने इसकी पुनः खोज की थी जब वे द्रौपदी के साथ हिमालय भ्रमण के अंतिम चरण पर थे।

बारहवी सदी के अंत में, सन् ११९१ में आदि शंकराचार्य ने भी इस गुहा में ध्यान साधन की थी। भण्डारी परिवार के पुरोहित इस गुहा मंदिर में धार्मिक अनुष्ठान एवं पूजा-अर्चना करते हैं। हमें बताया गया कि आदि शंकराचार्य के काल से उन्ही के परिवार के पुरोहित इस मंदिर में सभी अनुष्ठान करते आ रहे हैं तथा इस गुहा मंदिर की देखरेख का दायित्व निभा रहे हैं। उनके परिवार के सदस्य यहाँ गाइड का भी कार्य करते हैं। इस गुहा मंदिर का उल्लेख स्कन्द पुराण के मानसखंड में भी प्राप्त होता है।

पाताल भुवनेश्वर गुहा

चौकोड़ी में रात्री विश्राम करने के पश्चात हम प्रातः शीघ्र ही पाताल भुवनेश्वर के लिए निकल गये। जहाँ दर्शनार्थियों के वाहन रखने की व्यवस्था है, वहाँ से मंदिर के प्रवेश द्वार तक पहुँचने के लिए लगभग ८०० मीटर तक पदयात्रा करती पड़ती है। मार्ग में स्थित सुरक्षा बाड़ की छड़ें भक्तगणों द्वारा बांधी घंटियों एवं मस्तक फीतों से भरे हुए हैं मानो इस पावन स्थल पर दर्शनार्थियों का स्वागत कर रहे हों।

सूचना पटल
सूचना पटल

मंदिर के प्रवेशद्वार पर पहुंचकर टिकट क्रय करना पड़ता है। अपने सभी व्यक्तिगत वस्तुओं को सुरक्षित भंडार कक्ष में जमा कराना पड़ता है। गुहा मंदिर के भीतर कैमरा, मोबाईल फोन आदि ले जाने की अनुमति नहीं है। यदि आप छायाचित्रीकरण करना चाहते हैं तो आपको पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग से छायाचित्रीकरण एवं चलचित्रीकरण आदि की पूर्व अनुमति प्राप्त करनी होगी। मंदिर परिसर में स्मारिका विक्रय केंद्र हैं जहाँ से आप भीतर के चित्र क्रय कर सकते हैं।

चप्पल-जूते उतारने के पश्चात लगभग २० दर्शनार्थियों का समूह बनाया जाता है। भण्डारी पुरोहित के सहायक उन्हे गुहा के सँकरे प्रवेश के भीतर ले जाते हैं।

लोहे की श्रंखला को पकड़े हुए, मंद ज्योति के प्रकाश में रेंगते हुए हम भीतर प्रवेश करते हैं। प्रवेश स्थल से ७५ अंश की तीव्र ढलान उतरते हुए, लगभग अंधकार में हम गुहा में प्रवेश करते हैं। सँकरी  गुहा के भीतर फिसलन भरी चिकनी पगडंडियों पर लगभग अंधेरे में रेंगते हुए एक सुरंग से दूसरे सुरंग में प्रवेश करना उसी के लिए संभव है जो शारीरिक एवं मानसिक रूप से सुदृढ़ हो।

प्राणवायु ऑक्सीजन का स्तर

गुहा के भीतर प्राणवायु ऑक्सीजन का स्तर अत्यंत निम्न रहता है। छोटा मुख होने के कारण ऑक्सीजन भरपाई की दर भी कम रहती है। इसीलिए दर्शनार्थियों को छोटे छोटे समूह में भीतर ले जाया जाता है। यदि आपको किसी भी प्रकार की असुविधा प्रतीत हो तो तुरंत पण्डितजी को इसकी सूचना दें। वे गुहा के भीतर ऑक्सीजन के कुछ सिलिन्डर रखते हैं ताकि भक्तों को गुहा के वातावरण में अविलंब सहज होने में सहायता हो सके।

नीचे उतरते हुए जैसे ही हम गुहा के तल पर पहुँचे, मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि चारों ओर यह गुहा अनंत है। भूमि अत्यंत शीतल थी। हमारे चरण आर्द्र मिट्टी में सन चुके थे। अब यहाँ से हमारा गुहा भ्रमण आरंभ होने वाला था।

शेषनाग

हिन्दू धार्मिक ग्रंथों के अनुसार शेषनाग एक विशालकाय दैवी सर्प है जो धरती माता को अपने फन के ऊपर धारण करता है। इस गुहा के विषय में यह कहा जाता है कि शेषनाग के मुख से ही पाताल लोक आरंभ होता है।

शेषनाग
शेषनाग

गुहा के तल पर पहुँचते ही भक्तों का अभिनंदन करती शेषनाग की एक आकृति दृष्टिगोचर होती है। गुहा के भीतर टपकते चुना मिश्रित जल के अवक्षेपण से निर्मित यह आकृति शेषनाग के अनुरूप प्रतीत होती है। गुहा के पार्श्व भाग में शेषनाग के लंबे नुकीले दांत देखे जा सकते हैं, वहीं हमारे चरणों के समीप की आकृति उसकी लंबी देह प्रतीत होती है।

वासुकि एवं यज्ञ कुंड

गुहा की सतह पर एक अन्य लंबे सँकरे सर्प की आकृति स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। वह वासुकि की आकृति है। यह सर्प भगवान शिव के काँधे पर विराजमान है। इसके ठीक नीचे एक यज्ञ कुंड है। पण्डितजी ने हमें बताया कि राजा जनमेजय ने अपने पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए इस यज्ञ कुंड में एक सर्प यज्ञ का अनुष्ठान किया था तथा यज्ञ की अग्नि में पृथ्वी लोक एवं पाताल लोक के सभी सर्पों की आहुति दी थी।

आदि गणेश -गणेश का मूल रूप

गुहा के भीतर आगे बढ़ते हुए आप एक ऐसे स्थान पर पहुँचते हैं जहाँ चूने द्वारा रचित आदि गणेश की रचना है। वह संरचना शीष रहित शिशु के देह की प्रतीत होती है। उसकी सतह पर तीन छिद्र हैं जो मेरुदंड, श्वास एवं भोजन के लिए हैं। इसके ठीक ऊपर एक बड़े ब्रह्मकमल की शैल रचना है जिससे अनवरत रिसता जल नीचे स्थित संरचना को पोषित करता है।

आदि गणेश एवं पारिजात वृक्ष
आदि गणेश एवं पारिजात वृक्ष

ऐसी मान्यता है कि यह भगवान गणेश का मूल रूप है जब उनके शीष का उनकी देह से विच्छेद किया गया था। ब्रह्मकमल से रिसते जल ने उनकी देह को तब तक जीवित रखा था जब तक उनकी देह पर एक गज का शीष ना लगाया गया था।

चारधाम एवं अमरनाथ

अमरनाथ, बद्रीनाथ, केदारनाथ
अमरनाथ, बद्रीनाथ, केदारनाथ

कुछ आगे जाते ही भित्तियों पर लघु गुहा सदृश संरचनाएं हैं। उसके समक्ष प्राकृतिक रूप से रचित शिव लिंग हैं। तीनों गुहायें भिन्न भिन्न ऊंचाइयों पर स्थित हैं। ये केदारनाथ, बद्रीनाथ, अमरनाथ एवं अमरनाथ गुहा की लघु प्रतिकृतियाँ हैं।

ऋषि मार्कन्डेय की गुहा

आप देखेंगे कि आपके एक ओर अनेक गुहायें हैं जो एक के पश्चात एक स्थित हैं। एक गुहा के भीतर आपको पद्मासन में आसनस्थ एक ऋषि के प्रतिबिंब का आभास होगा। पंडितजी के बताया कि ऋषि मार्कन्डेय ने इस गुहा के भीतर ध्यान किया था। उन्होंने अपने सूक्ष्म शरीर का दृश्य प्रतिबिंब यहाँ स्थापित किया है।

पाताल भुवनेश्वर के द्वार

एक चौमार्ग पर आप अपने समक्ष केवल एक प्रवेश द्वार देखेंगे जो खुला है। अन्य द्वार प्राकृतिक रूप से बंद हैं।

उनमें से पाप द्वार त्रेता युग में केवल एक अवसर पर खुला था। रावण के विनाश के पश्चात यह द्वार बंद कर दिया गया। द्वापर युग में कुरुक्षेत्र के महान युद्ध के पश्चात रण द्वार भी बंद कर दिया गया। कलियुग के कगार पर सतयुग के मोक्ष द्वार को पुनः खोला गया था।

धर्म द्वार के मुख से मोक्ष द्वार में प्रवेश किया जाता है तथा वहाँ से पाताल भुवनेश्वर की की यात्रा आगे बढ़ती है।

शिव जटा

पाताल भुवनेश्वर के गहनतम भागों की ओर बढ़ते हुए हम शिव जटा पहुँचते हैं। यह एक बर्फीली शीतल संरचना है जिसे शिव की जटा कहते हैं। यहाँ की भूमि चिकनी एवं अत्यंत शीतल है। इस संरचना का आधा भाग चूने का तथा आधा भाग जमे हुए हिम का है।

शिव जटा
शिव जटा

इस जटा के नीचे प्राकृतिक रूप से निर्मित एक शिवलिंग एवं ३३ कोटि (प्रकार के) हिन्दू देव हैं। एक लघु जलकुंड भी है। ऐसा कहा जाता है कि दैवी स्थापत्य शास्त्री विश्वकर्मा ने स्वयं इस कुंड की रचना की है। जलकुंड के निकट उनके हाथ जैसी एक शैल संरचना भी है।

शिव शक्ति लिंग

विश्वकर्मा कुंड जहाँ ३३ कोटि देवताओं का निवास है
विश्वकर्मा कुंड जहाँ ३३ कोटि देवताओं का निवास है

पाताल भुवनेश्वर के गहनतम भाग में शिव शक्ति लिंग है। स्फटिक मणि में निर्मित यह लिंग ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश त्रिदेवों का द्योतक है।

ऐरावत एवं पारिजात वृक्ष

ऐरावत हाथी के पैर
ऐरावत हाथी के पैर

गुहा की छत पर दैवी गज ऐरावत के पदचिन्ह हैं। आश्चर्यजनक रूप से गुहा के भीतर पारिजात का एक जीवित वृक्ष भी है। ऐसी मान्यता है कि भगवान कृष्ण एवं इन्द्र के मध्य युद्ध के समय यह वृक्ष धरती एवं पाताल लोक के मध्य फंस गया था। इस वृक्ष पर पत्ते नहीं थे लेकिन आश्चर्यजनक रूप से उस पर फल लगे हुए थे।

वृद्ध भुवनेश्वर मंदिर

पाताल भुवनेश्वर के दर्शन के पश्चात भक्तों को वृद्ध भुवनेश्वर मंदिर जाने के लिए कहा जाता है जो पहाड़ी के दूसरी ओर स्थित है। मंदिर के पार्श्व भाग में एक शिल्प संग्रहालय है जिसमें पाताल भुवनेश्वर के भीतर एवं उसके आसपास के भागों से उत्खनित शिल्पों का संग्रह प्रदर्शित किया गया है।

वृद्ध भुवनेश्वर
वृद्ध भुवनेश्वर

इनके पश्चात आप निकट स्थित अन्य तीर्थ स्थानों के दर्शन कर सकते हैं जैसे बेरीनाग एवं गंगोलीहाट। २५ किलोमीटर की दूरी पर स्थित बेरीनाग में नाग देवता का प्राचीन मंदिर है। आसपास चाय के सुंदर उद्यान हैं। पाताल भुवनेश्वर से लगभग १३ किलोमीटर की दूरी पर गंगोलीहाट में हाट कालिका मंदिर है। यह एक शक्तिपीठ है जिसकी स्थापना सहस्त्र वर्ष से भी पूर्व आदि शंकराचार्य जी ने की थी।

पाताल भुवनेश्वर गुहा के दर्शन-अवलोकन के लिए एक घंटे का समय लगता है लेकिन इसके लिए उच्चतम स्तर का शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य आवश्यक है। मेरे लिए यह एक अद्वितीय, अद्भुत व अवास्तविक अनुभव था। जो भी शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ है तथा जिसे कम ऑक्सीजन स्तर में गुहा के भीतर अस्वाभाविक अनुभव नहीं होता, उसने यह दैवी अनुभव अवश्य प्राप्त करना चाहिए।

यदि आप देवभूमि उत्तराखंड की यात्रा कर रहे हैं तो इस अनोखे प्राचीन शैल संरचना का अवलोकन अवश्य करें।

यात्रा सुझाव

आवासीय सुविधाएं – पाताल भुवनेश्वर परिसर में कुछ धर्मशालाएं एवं विश्राम गृहों की सुविधाएं उपलब्ध हैं। उच्च स्तर के विश्रामगृह एवं होटल-रिज़ॉर्ट ३७ किलोमीटर दूर स्थित चौकोड़ी में उपलब्ध हैं अथवा २५ किलोमीटर बेरीनाग में भी उपलब्ध हैं।

सर्वोत्तम यात्रा काल – मानसून अथवा वर्ष ऋतु में पाताल भुवनेश्वर की यात्रा कठिन होती है क्योंकि इस काल में ऑक्सीजन स्तर में अत्यधिक कमी आ जाती है। यात्रा का सर्वोत्तम काल फरवरी से जून मास है।

परिवहन सुविधाएं – पाताल भुवनेश्वर पहुँचने के लिए निकटतम रेल स्थानक १५४ किलोमीटर दूर स्थित टनकपुर है। निकटतम विमानतल पंतनगर है जो यहाँ से २४४ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इन दोनों स्थानों से नियमित टैक्सी एवं बस सुविधाएं उपलब्ध हैं जो आपको पाताल भुवनेश्वर तक पहुँचाएंगी।

IndiTales Internship Program के अंतर्गत यह यात्रा संस्करण अक्षया विजय ने लिखा है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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प्राचीन कान्हेरी गुफाएं मुंबई के संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान में https://inditales.com/hindi/prachin-kanheri-gufaayen-mumbai/ https://inditales.com/hindi/prachin-kanheri-gufaayen-mumbai/#comments Wed, 26 May 2021 02:30:43 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2304

मुझे जब कान्हेरी गुफाओं के विषय में जानकारी प्राप्त हुई थी, उसके पूर्व मुंबई के भीतर स्थित इन अद्भुत प्राचीन ऐतिहासिक गुफाओं के विषय में मैंने ना तो पढ़ा था, ना ही सुना था। सर्वप्रथम ब्रिटिश काल के समय इन कान्हेरी गुफाओं के अस्तित्व के विषय में जानकारी प्राप्त हुई थी। बोरिवली के संजय गांधी […]

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मुझे जब कान्हेरी गुफाओं के विषय में जानकारी प्राप्त हुई थी, उसके पूर्व मुंबई के भीतर स्थित इन अद्भुत प्राचीन ऐतिहासिक गुफाओं के विषय में मैंने ना तो पढ़ा था, ना ही सुना था। सर्वप्रथम ब्रिटिश काल के समय इन कान्हेरी गुफाओं के अस्तित्व के विषय में जानकारी प्राप्त हुई थी। बोरिवली के संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान के भीतर स्थित इन गुफाओं तक पहुँचने के लिए सुव्यवस्थित सड़क मार्ग उपलब्ध हैं। इन गुफाओं के आरंभिक बिन्दु तक गाड़ियां पहुँच सकती हैं। यहाँ से कुछ सीढ़ियाँ चढ़कर आप टिकट खिड़की तक पहुंचेंगे, तत्पश्चात गुफा में प्रवेश करेंगे।

पाषाण में उत्कीर्णित बुद्ध की विशाल मूर्ति
पाषाण में उत्कीर्णित बुद्ध की विशाल मूर्ति

कान्हेरी गुफाएं – मुंबई का लोकप्रिय पर्यटन स्थल

अजंता एवं एलोरा की प्रसिद्ध गुफाओं के समान ही, कान्हेरी गुफाओं का उत्खनन भी १ ई.पू. से ११ ई. तक किया गया था। ये गुफाएं महायान एवं हीनयान, बौद्ध धर्म के इन दोनों पथों से सम्बंधित हैं। इस तथ्य का साक्ष्य देती हैं वे गुफाएं, जहां कुछ गुफाओं में बुद्ध को स्तूप एवं चरण पादुका जैसे संकेतों से दर्शाया गया है तो कुछ गुफाओं में उनके मानवरूपी छवियाँ हैं।

कान्हेरी गुफाएं मुंबई
कान्हेरी गुफाएं मुंबई

कान्हेरी गुफाओं के नाम की व्युत्पत्ति उस पहाड़ के नाम से हुई है जिस पर ये स्थित हैं, कृष्णगिरी। यह एक ज्वालामुखी से उत्पन्न पर्वत है। इस पर्वत पर कुल ११० गुफाओं का समूह है जो इस समूह को सर्वाधिक विशाल गुफा समूह बनाता है। यद्यपि कुछ गुफाएं अपूर्ण प्रतीत होती हैं। प्राचीन काल में ये गुफाएं उस व्यापार मार्ग पर थीं जो सोपारा, नासिक, पैठन तथा उज्जैन को जोड़ती थी।

चट्टान पर सुव्यवस्थित प्रकार से उकेरी गई सीढ़ियाँ अत्यंत दर्शनीय हैं।

चैत्य गृह

इन गुफाओं में एक चैत्य गृह अथवा प्रार्थना कक्ष है। एक विशाल भोजन कक्ष भी है जिसके भीतर भोजन करने के लिए दोनों ओर कम ऊंचाई की लम्बे शिलापाट हैं। अनेक भूमिगत जलकुण्ड हैं। भिक्षुओं के निवास के रूप में अनेक विहार हैं जिसके बाह्य प्रांगण में बैठकें भी हैं। ऐसा कहा जाता है कि ३री सदी तक कान्हेरी गुफ़ाएं बौद्ध भिक्षुओं की स्थाई बस्ती बन चुकी थीं।

गुफा क्र. ३

गुफा क्र. ३ अथवा चैत्य गृह वर्तमान प्रवेश स्थल के समीप स्थित है। इसकी छत पर उत्कीर्णित आकृतियाँ लकड़ी पर की जानी वाली नक्काशी के समान है। ठीक वैसी ही जैसी, लोनावला के समीप स्थित कारले गुफाओं के भीतर हैं। इस विशाल कक्ष के मध्य में एक विशाल स्तूप है। इसके पार्श्व भाग में कुछ उत्कीर्णित स्तम्भ हैं जिन पर गजों की आकृतियाँ हैं। यह कक्ष कम से कम दो तलों का है किन्तु ऊपरी तलों तक पहुँचने का मार्ग ढूँढना अब कठिन है। गुफा के बाहर, ड्योढ़ी पर,बुद्ध की विशाल, उभरी हुई प्रतिमाएं हैं। अग्र भित्तियों पर उन दाताओं की छवियाँ हैं जिन्होंने इन गुफाओं को प्रायोजित किया था। गुफा के बाहर आप कुछ अन्य स्तूप भी देखेंगे। उनमें से एक स्तूप पूर्णतः ढका हुआ है किन्तु अन्य स्तूप अपेक्षाकृत कुछ खुले हैं जिनके चारों ओर आप चल सकते हैं।

यहाँ पर उन सभी ठेठ कठघरों जैसी मेढ हैं जो सामान्यतः प्रसिद्ध स्तूपों के चारों ओर बनी हुई हैं। जैसे अमरावती, सांची, सतना जिले के भरहुत तथा महाबोधि मंदिर में पाए जाने वाले स्तूपों में हैं। उन पर बनी आकृतियाँ ठेठ आड़ी-तिरछी रेखाएं हैं जिन पर कमल पुष्प का चिन्ह उत्कीर्णित है। १६ वीं से १७ वीं सदी के मध्य इन गुफाओं को ईसाई गिरिजाघरों में परिवर्तित कर दिया गया था। वर्तमान में इस परिवर्तन के किसी भी प्रकार के चिन्ह अस्तित्व में नहीं हैं।

विहार

विहार की रूपरेखा भी चैत्य गृह के ही समान है। इनके समक्ष स्थित प्रांगण में बैठने के लिए बैठकें हैं। इनके पश्चात भिक्षुओं के लिए कक्ष हैं। ऊपरी तल की भी यही रूपरेखा है। कक्षों के भीतर शिला के शयन हैं। सामान्यतः गुफाओं के दोनों ओर जलकुण्डों की व्यवस्था है। साहित्यों के अनुसार, दक्षिणपूर्वी देशों से अनेक साधक इस विहार में अध्ययन हेतु आते थे जिस के कारण यह अध्ययन का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया था।

गुफा क्र. ११ को महाराजा अथवा दरबार गुफा भी कहते हैं क्योंकि यह एक प्रकार से सभा कक्ष प्रतीत होता है।

गुफा संबंधी सुरक्षा निर्देश

गुफाओं के भीतर से ऊपर-नीचे जाती सीढ़ियों में से कुछ अत्यंत भंगित अवस्था में हैं। उनका प्रयोग करते समय अत्यंत सावधानी का पालन करें। अन्यथा दुर्घटना की संभावना हो सकती है। गुफाओं के बाहर स्थित एक सूचना पटल के अतिरिक्त अन्य कहीं भी, गुफाओं एवं उत्कीर्णित आकृतियों की जानकारी नहीं दी गई है। टिकट घर पर भी कोई सूचना पुस्तिका अथवा जानकारी प्रदान करते साहित्य उपलब्ध नहीं है। यदि आपने इससे पूर्व कहीं बौद्ध गुफाएं देखी हों तो वहाँ से प्राप्त जानकारी का स्मरण करें। इससे इन गुफाओं एवं उत्कीर्णित आकृतियों को समझने में आसानी हो सकती है।

कान्हेरी गुफाओं की जल प्रबंधन प्रणाली

इन गुफाओं का एक अत्यंत उत्कृष्ट एवं रोचक तत्व है यहाँ की जल प्रबंधन प्रणाली। अनेक नलिकाएं एवं धाराएं वर्षा के जल को एक विशाल भूमिगत कुण्ड तक ले जाती हैं। यह प्राचीन काल के आरंभिक वर्षा जल संचयन प्रणाली का उत्तम उदाहरण हो सकता है। जल का प्रबंधन किस प्रकार सावधानी से किया जाता था, यह इसका उत्कृष्ट दृष्टांत है।

गुफाओं में भ्रमण करते हुए आप देख सकते हैं कि कैसे गुफाओं की छतें वर्षा के जल को गुफा के बाहर स्थित नलिकाओं की ओर ले जाती हैं। तत्पश्चात, ये नलिकाएं विभिन्न तलों पर कुण्डों से इस प्रकार जुड़ती हैं ताकि जल का अपव्यय न हो तथा सम्पूर्ण गुफा प्रणाली में शुद्ध जल उपलब्ध हो सके। इन गुफाओं का वास योग्य होने का प्रमुख कारण यह एकीकृत जल प्रबंधन प्रणाली ही हो सकता है। वर्तमान में यह शोध का विषय है कि किस प्रकार इन उत्खनित प्राकृतिक गुफा प्रणाली में इस प्रकार की आत्मनिर्भर जल प्रबंधन प्रणाली अंतर्निहित की गई थी।

मैंने ऐसी ही जल प्रबंधन प्रणाली जोर्डन की प्राचीन नगरी पेट्रा में भी देखी थी। उन्हे भी प्राकृतिक चट्टानों में उत्खनित किया गया था।

शिलालेख

आप गुफा की भित्तियों पर अनेक शिलालेख देख सकते हैं किन्तु उन्हे समझने का कोई साधन नहीं है। कान्हेरी गुफाओं में ब्राह्मी, देवनागरी एवं पाहलवी लिपि में कुल ५१ अभिलेखों एवं २६ उद्धरणों की खोज हो चुकी है। अधिकतर अभिलेखों में उन राजा-महाराजाओं के नाम हैं जिन्होंने इन गुफाओं को संरक्षण प्रदान किया था। एक अभिलेख में राजगद्दी पर विराजमान सातवाहन राजा सतकर्णी वशिष्टिपुत्र के विवाह का उल्लेख है।

कान्हेरी गुफाओं में कुछ ताम्रपत्र भी प्राप्त हुए थे जो अब ब्रिटिश संग्रहालय में संरक्षित हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की सूचना पट्टिका के अनुसार एक गुफा में अजंता की गुफाओं के समान भित्तिचित्र हैं। किन्तु मैं उस गुफा को ढूंढ नहीं पायी। उसे खोजने का कोई साधन अथवा सूचना भी उपलब्ध नहीं थी।

चित्रपट चित्रीकरण

जब मैं इन गुफाओं में भ्रमण कर रही थी, उस समय यहाँ, एक गुफा के ऊपर यशराज फिल्म्स के किसी चित्रपट का चित्रीकरण हो रहा था। किसी चित्रपट के चित्रीकरण में कितने बड़े स्तर पर परिश्रम, ऊर्जा तथा साधनों की आवश्यकता होती है, इस तथ्य से वह मेरा प्रथम साक्षात्कार था। कदाचित यह चित्रपट देखते समय, वह परिदृश्य दर्शकों के ध्यान में भी न आए, किन्तु उसे साकार करने में कम से कम १०० व्यक्तियों का जनबल जुटा हुआ था। वहाँ बिजली उत्पादक वाहन, अभिनेताओं के लिए चलित प्रसाधन कक्ष, खाद्य पदार्थों के वाहन, साज-सज्जा का सामान तथा अनेक उपकरण भी थे।

कान्हेरी गुफाओं में फिल्मीकरण
कान्हेरी गुफाओं में फिल्मीकरण

अनेक सुरक्षा कर्मचारी तैनात थे जो साधारण जनमानस को को चित्रीकरण स्थल पर जाने से निषिद्ध कर रहे थे। उन्होंने चित्रीकरण के लिए एक विस्तृत क्षेत्र घेर कर रखा था। यह न्यायसंगत नहीं है। यह एक सार्वजनिक स्थल है। सभी पर्यटक प्रवेश-शुल्क देकर भीतर प्रवेश किए हैं। उन्हे सभी स्थानों पर जाने एवं अवलोकन करने की स्वतंत्रता है।

गांधी स्मारक

जब आप कान्हेरी गुफाएं देखने यहाँ आएं तब आप गांधी स्मारक भी देख सकते हैं। गांधी स्मारक एक पहाड़ी की चोटी पर बना एक मंडप है जिसे महात्मा गांधी की स्मृति में बनवाया गया था। वहाँ से आप सम्पूर्ण नगर का ३६० अंश का परिदृश्य देख सकते हैं।

संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान

आप इस राष्ट्रीय उद्यान में विचरण कर सकते हैं तथा यहाँ की शुद्ध वायु का आनंद उठा सकते हैं। यहाँ एक छोटी झील है जिसमें आप नौका विहार का आनंद ले सकते हैं। एक छोटी रेलगाड़ी आपको सम्पूर्ण पहाड़ी की सैर  कराती है। यहाँ बाघ सफारी का भी आनंद लिया जा सकता है। कुल मिलाकर आप एक सम्पूर्ण दिवस यहाँ व्यतीत कर सकते हैं। यह उद्यान अन्य घने राष्ट्रीय उद्यानों जैसा हरा-भरा नहीं है। फिर भी यह मुंबई जैसी भीड़भाड़ भरी महानगरी के फेफड़ों के समान है।

मंडपेश्वर गुफाएँ

यहाँ से कुछ किलोमीटर की दूरी पर मंडपेश्वर गुफाएँ हैं जो गुफाओं का लघु समूह है। इन गुफाओं की भिन्नता यह है कि ये हिन्दू गुफाएं हैं। एक भित्ति पर भगवान शिव की नृत्य मुद्रा में एक विशाल प्रतिमा है। ऐसा कहा जाता है कि यहाँ एक विशाल शिवलिंग था। किन्तु वह शिवलिंग अब कहाँ है, इसकी जानकारी नहीं है। उसके स्थान पर अब एक नवीन लिंग की आराधना की जाती है। एक लंबे समय तक इन गुफाओं का प्रयोग एक गिरिजाघर के रूप में भी किया जाता था। अब यह हिंदुओं का पूजनीय स्थल है। हमने यहाँ स्त्रियों के एक विशाल समूह को पूजा-अर्चना करते देखा। किन्तु विडंबना यह है कि ये गुफाएं अत्यंत ही मलिन परिवेश में स्थित है।

अवश्य पढ़ें: एलिफेंटा गुफाओं में शिव के विभिन्न रूप

अब मेरा आगामी लक्ष्य है, मुंबई नगरी के अन्य ब्रिटिश-पूर्व ऐतिहासिक तत्वों की खोज, जैसे बाणगंगा कुण्ड। उन ऐतिहासिक स्थलों में से कुछ का उल्लेख इस पॉडकास्ट में किया गया है जिसमें हम हमारे मित्र भरत गोठोस्कर जी से मुंबई के विषय में चर्चा कर रहे हैं।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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भीमबेटका शैलाश्रय एवं प्रागैतिहासिक गुफा चित्र https://inditales.com/hindi/bhimbetka-prachin-shail-chitra/ https://inditales.com/hindi/bhimbetka-prachin-shail-chitra/#comments Wed, 24 Mar 2021 02:30:08 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2235

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से ४५ किलोमीटर दक्षिण की ओर, भोपाल-होशंगाबाद राजमार्ग पर भीमबेटका नामक विश्व धरोहर स्थल है। जब आप भोपाल से होशंगाबाद की ओर जा रहे हों तब आप अपने दाहिनी ओर एक छोटी पहाड़ी पर विशेष शैल समूह देखेंगे। प्रथम दर्शन में ये शैल समूह अत्यंत अनोखे प्रतीत होते हैं। यही भीमबेटका […]

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मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से ४५ किलोमीटर दक्षिण की ओर, भोपाल-होशंगाबाद राजमार्ग पर भीमबेटका नामक विश्व धरोहर स्थल है। जब आप भोपाल से होशंगाबाद की ओर जा रहे हों तब आप अपने दाहिनी ओर एक छोटी पहाड़ी पर विशेष शैल समूह देखेंगे। प्रथम दर्शन में ये शैल समूह अत्यंत अनोखे प्रतीत होते हैं। यही भीमबेटका के सुप्रसिद्ध शैलचित्रों का स्थल है। जब आप मुख्य मार्ग से इन गुफाओं की ओर जाते मार्ग पर मुड़ेंगे, तब मार्ग में एक रेलगाड़ी का फाटक आएगा जो अधिकतर समय बंद ही रहता है। यहाँ कुछ क्षण प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है। जैसी ही पर्याप्त गाड़ियां एकत्र हो जाएँ तथा रेलगाड़ी के आने का समय ना हुआ हो तो यह फाटक कुछ क्षण के लिए खोला जाता है।

भीमबेटका के प्राचीन शैलचित्र
भीमबेटका के प्राचीन शैलचित्र

इस स्थान पर, फाटक के खुलने की प्रतीक्षा करते हुए आप कुछ समय मध्यप्रदेश पर्यटन के जलपान गृह में तरोताजा हो सकते हैं क्योंकि इसके पश्चात आपको कुछ भी खाने-पीने का सामान उपलब्ध नहीं होगा। पेयजल भी नहीं। छायाचित्रकारों के लिए यह स्थान दूर से भीमबेटका शैलाश्रय का चित्र लेने का उपयुक्त स्थल है।

भीमबेटका – सर्वाधिक पुरातन मानवी धरोहर

भीमबेटका गुफ़ाएं भारत की सर्वाधिक पुरातन मानवी धरोहर है जो लगभग १०,००० वर्ष प्राचीन हैं। ये शिलाएं अनुमानतः उस काल की हैं जब यह क्षेत्र कदाचित एक महासागर था। शिलाओं की चिकनी व गोलाकार आकृतियाँ सागर की लहरों के थपेड़ों द्वारा निर्मित मानी जाती हैं।

भीमबेटका के चित्रों में घुड़सवार
भीमबेटका के चित्रों में घुड़सवार

यहाँ के वनों में ७५० से भी अधिक शैलाश्रयों की खोज हो चुकी है। उनमें से ४०० से भी अधिक शैलाश्रयों में गुफाचित्र हैं जिनमें से केवल २० गुफाएं जनता द्वारा दर्शन के लिए उपलब्ध हैं। इन गुफाओं में जो चित्र हैं वे भिन्न भिन्न काल के हैं जब उनमें उस काल की प्रागैतिहासिक धरोहर रही होगी।

और पढ़ें: इंदौर के समीप बाघ गुफाचित्र

भीमबेटका के गुफाचित्रों में मूलतः लाल व श्वेत रंगों का प्रयोग किया गया है। कुछ स्थानों पर हरा व पीला रंग भी दृष्टिगोचर होता है। इन रंगों में लाल रंग सर्वोत्तम रूप से संरक्षित है। इसका कारण कदाचित लाल रंग की सघनता है। श्वेत रंगों में सर्वाधिक धुंधलापन प्रतीत होता है। हो सकता है, वे सर्वाधिक प्राचीन हों।

भीमबेटका गुफाचित्र – प्रागैतिहासिक शैलचित्र

अनेक स्थानों पर एक चित्र पर अनेक चित्र चित्रित किए गए हैं। यह इस ओर संकेत करता है कि विभिन्न काल के चित्रकारों ने उसी स्थान पर पुनः पुनः चित्रकारी की है। इसका अर्थ यह भी होता सकता है कि यह अनुष्ठानिक चित्रकारी हो जिसकी नियमित पुनरावृत्ति की जाती थी।

यहाँ की चित्रकारी की शैली वार्ली चित्रकारी एवं मधुबनी चित्रकारी से साम्य रखती प्रतीत होती हैं। मानवी आकृतियों को दर्शाने के लिए ज्यामितीय रेखाचित्रों का प्राधान्यता से प्रयोग किया गया है। केवल एक स्थान पर मानवी आकृति को प्रदर्शित करने के लिए ज्यामितीय रेखांकन की अनुपस्थिति दिखी। वह कदाचित शिव की अथवा कोई ध्यानमग्न ऋषि की छवि थी। कुछ चित्र इतने चटक थे मानो कुछ दिवस पूर्व ही चित्रित किए गए हों। यह विश्वास करना कठिन हो जाता है कि वे प्रागैतिहासिक चित्र हैं। ऐसी इच्छा होती है कि उन्हे छूकर शंका का निवारण कर लें। कुछ चित्र अपने आसपास पसरे धूल के कणों से भी अछूते प्रतीत होते हैं।

प्रागैतिहासिक कला की विषय-वस्तुएं

मानवी आकृतियाँ, पशु-पक्षी, पुष्प, वृक्ष इत्यादि

भीमबेटका की गुफाचित्रों में पशु-आकृतियों की प्राधान्यता है। इसके पश्चात क्रमशः मानवी आकृतियाँ तथा यदा-कदा वृक्षों व पुष्पों की आकृतियाँ दृष्टिगोचर हो जाती हैं। यहाँ की सर्वाधिक लोकप्रिय शिलाओं में से एक है, पशु वाटिका शिला। इस शिला पर मूलतः लाल एवं श्वेत रंगों का प्रयोग कर सभी प्रकार के पशुओं को चित्रित किया गया है। उन चित्रों में विभिन्न पशुओं को खोजना युवा पर्यटकों के लिए एक रोमांचक अभ्यास हो सकता है।

युद्ध के दृश्य

भीमबेटका के शैलचित्रों में युद्ध के अनेक दृश्य हैं जिनमें घोड़ों पर सवार राजाओं एवं सैनिकों को दर्शाया गया है। इन चित्रों में राजाओं को उनके अलंकृत अश्वों एवं यदा-कदा उनके ऊपर चित्रित छत्रों द्वारा पहचाना जा सकता है। इन चित्रों में आप तलवार एवं उस काल के अन्य शस्त्रों को भी पहचान सकते हैं। इन चित्रों में किसी युद्ध में अर्जित विजय का उल्हास व्यक्त किया गया था अथवा किसी युद्ध का चित्रित आलेखन किया गया था, यह कहना कठिन है।

और पढ़ें: छत्तीसगढ़ के प्रागैतिहासिक गुफाचित्र

सामुदायिक जीवनशैली

इन चित्रों में अनेक दृश्य ऐसे हैं जिनमें उस काल के मानवों की सामुदायिक जीवनशैली चित्रित है। इन चित्रों में आप लोगों के समूहों को साथ में खाते-पीते, नृत्य करते, संगीत वाद्य बजाते, विभिन्न अनुष्ठान करते एवं जीवन का आनंद उठाते देख सकते हैं। अनेक स्थानों पर युगल जोड़ों को भी दिखाया गया है। इनमें से अधिकतर चित्र गुफा की छत पर चित्रित हैं।

जीव जंतु शैलचित्र
जीव जंतु शैलचित्र

हमारे पर्यटन परिदर्शक ने हमें बताया कि इन चित्रों के चित्रिकरण के लिए, चित्रकारों ने विशेषतः, उन स्थानों का चयन किया था जहाँ वर्षा का जल नहीं पहुंचता था। मेरा अंतर्मन मुझसे यह कह रहा था कि किसी काल में, गुफाओं की सम्पूर्ण सतहों पर चित्रकारी की गई होगी, किन्तु वही चित्र सुरक्षित बचे हैं जहाँ वर्षा का जल नहीं पहुंचा है। आप देख सकते हैं कि गुफाओं के बाह्य भागों के चित्र भीतरी भागों के चित्रों से अपेक्षाकृत धुंधले हैं।

प्रांगण

भीमबेटका का प्रांगण
भीमबेटका का प्रांगण

शैलाश्रयों के अतिरिक्त, एक प्रांगण के समान संरचना है। हमारे परिदर्शक के अनुसार यह एक मुक्तांगन हो सकता है। यहाँ कदाचित सामुदायिक सभाएं आयोजित की गई होंगी। प्रांगण के मध्य स्थित शिलाखंड कदाचित समुदाय के प्रमुख अथवा राजा का आसन हो सकता है। किन्तु ये सब हमारे विवेचन हैं। इन्हे प्रमाणित करने के लिए कोई संदर्भ उपलब्ध नहीं हैं।

गुफा मंदिर

गुफा के मुख से लगभग १०० मीटर दूर एक गुफा मंदिर है जो अब भी एक जीवंत मंदिर है। हमें बताया गया कि इस मंदिर की स्थापना पांडवों ने उस समय की थी जब वे अपने अज्ञात वास में यहाँ आए थे। वस्तुतः, भीमबेटका नाम का संदर्भ भी भीम से है जिसका अर्थ है भीम की बैठक।

मध्यप्रदेश के भीमबेटका की खोज

यूँ तो भारत के अनेक महत्वपूर्ण गुफाओं एवं विस्मृत प्राचीन संरचनाओं की खोज घुमक्कड़ ब्रिटिश अफसरों ने की थी। किन्तु, इसके ठीक विपरीत, भीमबेटका गुफाओं की खोज एक भारतीय ने की थी। भीमबेटका गुफाओं की खोज सन् १९५८ में डॉ विष्णु श्रीधर वाकणकर ने की थी। उन्होंने उज्जैन के विक्रम विश्वविद्यालय के लिए इस स्थल का विस्तृत अध्ययन किया था।

और पढ़ें: बिहार के गया के निकट बराबर गुफाएं

उन्होंने भिन्न भिन्न प्रकार की शिलाओं एवं शैलाश्रयों को वर्गीकृत किया था। तत्पश्चात भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण विभाग ने इस स्थल का उत्खनन किया। इस स्थान पर प्रागैतिहासिक गुफाओं की खोज से पूर्व इस क्षेत्र को स्तूपों से भरा बौद्ध क्षेत्र माना जाता था। किन्तु ये गुफाएं प्रागैतिहासिक काल से मध्यकाल तक, अर्थात् युगों युगों से मानव जीवन की अनवरत उपस्थिति की ओर संकेत करती हैं।

भीमबेटका गुफाओं के दर्शन

यहाँ आने से पूर्व मैंने इस स्थान के विषय में अनेक समीक्षाएं पढ़ी थीं। पूर्व में यहाँ के दर्शन किए अनेक पर्यटकों ने भी वही समीक्षा दी थी कि आप यहाँ २ घंटों से अधिक समय व्यतीत नहीं कर सकते। अधिकतर पर्यटक यहाँ औसतन लगभग आधा घंटा व्यतीत करते हैं। किन्तु मुझे यहाँ आकर ऐसा प्रतीत हुआ कि मैं इस स्थान को अधिकाधिक सूक्ष्मता से अवलोकन करूं। अधिक से अधिक समय यहाँ व्यतीत करूं। इसके अतिरिक्त, मेरी इच्छा थी कि मुझे उन गुफाओं के दर्शन की भी अनुमति मिले जिन्हे पर्यटकों के लिए बंद कर रखा है। मुझे यहाँ केवल एक ही परिदर्शक अर्थात् गाइड दिखाई दिया जो सम्पूर्ण दर्शन को १० से १२ मिनटों में समेटने का प्रयत्न कर रहा था। यदि आप भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण विभाग द्वारा जारी गाइड पुस्तिका भी साथ लें तो उचित होगा। इससे आप क्रमवार गुफाओं के दर्शन कर सकते हैं तथा चित्रों के विषय में विस्तृत जानकारी भी प्राप्त कर सकते हैं।

पढ़ें: अजंता भित्तिचित्रों को कैसे समझें?

इन गुफाओं को देख मेरे मस्तिष्क में एक विचार उत्पन्न होता है कि क्या उस काल के चित्रकारों को लेश मात्र भी आशा रही होगी कि उनकी यह कला एक दिवस उनकी जीवनशैली एवं रहन-सहन को समझने का एक उत्तम मार्ग सिद्ध होगी? इन गुफाओं को देख एक विचार यह भी उत्पन्न होता है कि एक आनंदित जीवन व्यतीत करने के लिए एक छत एवं दो समय की रोटी के सिवाय क्या अन्य किसी वस्तु की आवश्यकता है?

भीमबेटका की गुफाओं के दर्शन के उपरांत मैं यही कहूँगी कि यह स्थान मानव इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए एक उत्तम एवं अनिवार्य पर्यटन स्थल है।

भोपाल के निकट स्थित भीमबेटका गुफाओं के दर्शन के लिए आप जब यहाँ आयें तब इसके समीप स्थित भोजपुर शिव मंदिर(भोजेश्वर मंदिर) के भी दर्शन करें। सांची के स्तूप भी यहाँ से अधिक दूरी पर नहीं हैं।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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बाघ गुफाएं और उनके अद्भुत भित्तिचित्र व ठप्पा छपाई https://inditales.com/hindi/bagh-gufayen-dhar-madhya-pradesh/ https://inditales.com/hindi/bagh-gufayen-dhar-madhya-pradesh/#comments Wed, 02 Sep 2020 02:30:18 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1860

जब से मैंने दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में भारतीय कला का अध्ययन किया था, तब से मध्य प्रदेश की बाघ गुफाओं के दर्शन करना मेरी यात्रा प्राथमिकता में उच्च स्थान पर था। मुझे अब भी स्मरण है, डॉ. अनुपा पांडे ने सर्वप्रथम हमें अजंता के भित्तिचित्रों को ‘पढ़ना’ सिखाया। उन्होंने हमें वहाँ के प्रमुख भित्तिचित्रों […]

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जब से मैंने दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में भारतीय कला का अध्ययन किया था, तब से मध्य प्रदेश की बाघ गुफाओं के दर्शन करना मेरी यात्रा प्राथमिकता में उच्च स्थान पर था। मुझे अब भी स्मरण है, डॉ. अनुपा पांडे ने सर्वप्रथम हमें अजंता के भित्तिचित्रों को ‘पढ़ना’ सिखाया। उन्होंने हमें वहाँ के प्रमुख भित्तिचित्रों एवं जातक कथाओं के विषय में जानकारी दी। दूसरे दिवस उन्होंने हमें इन बाघ गुफाओं के विषय में बताया था। उन्होंने हमें बताया कि अब उन गुफाओं में कोई भी भित्तिचित्र नहीं हैं। अपितु उन चित्रों को सावधानीपूर्वक निकालकर वहीं संग्रहालय क्षेत्र में संरक्षित किया गया है। मैंने अजंता गुफाओं के अनेक बार दर्शन किए हैं किन्तु बाघ गुफ़ाएं कई प्रयत्नों के बाद भी मेरी पहुँच से दूर रहीं।

ऊंची चट्टान पर स्थित बाघ गुफाएं
ऊंची चट्टान पर स्थित बाघ गुफाएं

कुछ समय पूर्व, जब मैं मध्य प्रदेश ‘रानियों के नगरों की’ यात्रा कर रही थी तब भी मैं इन गुफाओं के दर्शन करना चाहती थी किन्तु अपनी सीमित समयसारिणी के चलते एक बार फिर निराश ही हाथ लगी। इस समय जब मैं मांडू उत्सव में भाग लेने मध्य प्रदेश गई थी, तब मैंने स्वप्न में भी बाघ गुफाओं के दर्शन की योजना नहीं बनाई थी। किन्तु कदाचित मेरे इन गुफाओं के दर्शन का समय आ गया था। अतः जैसे ही मुझसे पूछा गया कि क्या मैं बाघ गुफाओं के दर्शन करना चाहती हूँ, बिना एक क्षण गँवाए मैंने तुरंत ‘हाँ’ कर दी। और तो और, १० मिनटों के भीतर मैं गाड़ी में बैठकर धार की ओर जा रही थी। बाघ गुफाओं से सर्वाधिक समीप नगरी धार ही है।

बाघ गुफाओं का इतिहास

इन गुफाओं के भित्तिचित्र अजंता गुफाओं के समकालीन हैं। वैसे तो इन दो गुफाओं में ३०० किलोमीटर का अंतर है, फिर भी दोनों की भौगोलिक अवस्थिति में विशेष अंतर नहीं है। बाघिनी नदी के तीर स्थित ये गुफ़ाएं भी मानव-निर्मित हैं। बिहार में स्थित बराबर गुफाओं से आरंभ हुई भारत की प्रसिद्ध शैलकर्तित स्थापत्य तकनीक, अर्थात शिलाओं को काटकर निर्मित की गई संरचना का एक और अप्रतिम उदाहरण है ये बाघ गुफ़ाएं।

बाघ गुफाएं
बाघ गुफाएं

इन गुफाओं को लगभग ५-६ वी. सदी में शिलाओं को काटकर निर्मित किया गया है। बौद्ध काल की यह अंतिम समयावधि इन गुफाओं को सर्वाधिक नवोदित गुफाओं में से एक बनाती है। उस समय इस क्षेत्र में सातवाहनों का राज था। माहिष्मती अर्थात महेश्वर के महाराज सुबंधु द्वारा अभिलेखित ४१६-१७ ई. के एक ताम्र पात्र में इस बौद्ध विहार को दिए गए अनुदान का उल्लेख किया गया है। उस अभिलेख में इस विहार को कल्याण विहार कहा गया है। ऐसा माना जाता है कि बौद्ध भिक्षु दातक ने बाघ गुफाओं की रचना की थी।

लगभग १० वी. सदी के आसपास हुए बौद्ध धर्म के पतन के पश्चात कदाचित इन गुफाओं का परित्याग कर दिया गया था। उसके पश्चात यह गुफ़ाएं बाघों के निवास में परिवर्तित हो गईं। तभी से इन गुफाओं को बाघ गुफाएँ भी कहा जाता है।

बाघ गुफाएं एक ऊंचे बलुआ पत्थर के ऊपर एक पंक्ति में उत्कीर्णित है। मुझे बताया गया कि यह शिला इस क्षेत्र की एकमात्र बलुआ पत्थर की शिला है। अन्यथा अधिकतर शिलाएं कड़क बसाल्ट शिला है। आज हम सीढ़ियाँ चढ़कर इस विशाल शिला तक पहुंच पाते हैं। कभी कभी सोच में पढ़ जाती हूँ, जब इस गुफा का कार्य आरंभ किया गया था, उस समय कारीगर यहाँ तक कैसे पहुंचते थे!

बाघ गुफा के दर्शन

गुफाओं के परिसर को अत्यंत संरक्षित एवं सुंदर बाग-बगीचों द्वारा अलंकृत रखा गया है। टिकट खिड़की से टिकट खरीदकर आप भीतर प्रवेश कर सकते हैं। एक पक्की पगडंडी आपको गुफाओं तक ले जाएगी। बाघिनी नदी के ऊपर स्थित एक छोटे सेतु से होते हुए आप गुफाओं के आधार तक पहुंचेंगे। नदी में जल अधिक नहीं था। वैसे भी मैं यहाँ जनवरी में आई थी जब नदियों में जल अधिक नहीं रहता। नदी को देख मैंने अनुमान लगाया कि इसकी उपस्थिति ही यहाँ गुफाओं की खुदाई करने का कारण रहा होगा। पीने का जल आसानी से उपलब्ध है।

बाघिनी नदी
बाघिनी नदी
बाघ गुफा में शिवलिंग
बाघ गुफा में शिवलिंग

गुफाओं तक जाती सीढ़ियाँ चढ़कर जब मैं वहाँ पहुंची, सर्वप्रथम मेरी दृष्टि दाहिनी ओर धरती पर उत्कीर्णित शिवलिंग पर पड़ी। उसके समीप दो पैरों के चिन्ह भी उत्कीर्णित थे। लिंग पर अर्पित पुष्प बताया रहे थे कि इसकी अब भी पूजा अर्चना की जाती है। उन्हे देख यह कहना कठिन था कि वे गुफाओं की निर्माण के समय से थे अथवा उन्हे कालांतर में बनाया गया है। अधिक महत्वपूर्ण यह है कि यह इस प्राचीन गुफा परिसर का जागृत भाग है।

गुफा २ अर्थात पांडव गुफा

मैंने अपने समक्ष स्थित गुफाओं पर अपनी जिज्ञासू दृष्टि डाली। मेरे समक्ष विशाल स्तंभ थे जो शिलाओं का भार उठाए हुए थे। इन स्तंभों के एक ओर स्थित गुफाओं में विशाल मूर्तियाँ थी। बाईं ओर स्थित मूर्ति को पहचानना कठिन था। दाहिनी ओर की मूर्ति गणेश की थी।

बाघ गुफाएं
बाघ गुफाएं

मैंने गुफा के भीतर प्रवेश किया। प्रवेश करते ही स्वयं को २४ विशाल स्तंभों से घिरा पाया जो गोलाकार थे तथा उन पर समांतर तिरछी रेखाएं खुदी हुई थीं। उनमें से कई स्तंभों के निचले भागों पर नवीनीकरण के चिन्ह स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहे थे। कुछ स्तंभों के छत को छूते ऊपरी भागों पर पुष्पाकृतियाँ उत्कीर्णित थीं। एक प्रकार से, सभी स्तंभ अपेक्षाकृत सादे तथा चौड़े थे। गुफा का अधिकतर भाग इन स्तंभों से ही भरा हुआ था।

बाघ गुफा में बौद्ध स्तूप
बाघ गुफा में बौद्ध स्तूप

गुफा के भीतरी भाग में चैत्य गृह है जिसके भीतर एक संकरा ऊंचा स्तूप है। स्तूप की ऊंचाई लगभग छत तक है। ऐसा प्रतीत होता है मानो छत नीचे आ गई हो अथवा स्तूप की ऊंचाई कालांतर में बढ़ाई गई हो। चैत्य की बाहरी भित्तियों पर बड़ी बड़ी प्रतिमाएं हैं किन्तु किस की प्रतिमाएं है, यह जान पाना कठिन था। एक प्रतिमा की बाहरी रेखाओं से वह बुद्ध के समान प्रतीत होते हैं किन्तु सूक्ष्म लक्षणों की अनुपस्थिति में यह बताना कठिन है कि वह बुद्ध है अथवा एक बोधिसत्व।

बुद्ध और बोधिसत्व - बाघ गुफाएं
बुद्ध और बोधिसत्व मूर्तियाँ

दाहिनी ओर दूर स्थित एक भित्ति पर कुछ धुंधले भित्तिचित्र थे। किसी समय ये उजले रंगीन चित्र रहे होंगे, किन्तु अब जो बचा है उससे उनके मूल स्वरूप की अंश मात्र झलक भी प्राप्त नहीं होती। ध्यानपूर्वक निहारने पर मुझे कुछ पुष्पाकृतियों की झलक अवश्य दिखी। आसपास के अधिकतर भागों पर मरम्मत की गई है।

बाईं ओर एक अन्य गुफा के अवशेष थे जिसके भीतर जाना कठिन था। किन्तु आप वहाँ भी वैसे ही स्तंभ देख सकते हैं जो मुख्य गुफा में हैं।

बाघ गुफाएं ३ एवं ४

ये गुफाएं थोड़ी अधिक संरक्षित हैं। बाहरी भित्तियों पर कुछ प्रतिमाएं हैं जो समय के साथ अत्यंत कट गई हैं। मुख्य द्वार की चौखट पर कुछ उत्कीर्णन हैं। गुफा के अग्रभाग को कुछ स्तंभों की पंक्ति ने ढँक दिया है। ये स्तंभ अपेक्षाकृत नवीन प्रतीत होते हैं। कदाचित प्राचीन स्तंभों के स्थान पर इन्हे प्रतिस्थापित किया गया है।

थपेड़े खाती हुई मूर्तियाँ
थपेड़े खाती हुई मूर्तियाँ

इतने वर्षों में इन शिलाओं ने कितने जल सतह देखे, यह इन शिलाओं की सतह की रचना स्पष्ट दर्शाते है। गुफा के भीतर भी सर्वत्र जल का रिसाव आप अब भी देख सकते हैं।

गुफा के भीतर, एक भित्ति तथा कुछ स्तंभों पर भित्तिचित्रों के कुछ अवशेष अब भी हैं। भित्ति पर चित्र रंगीन हैं किन्तु स्तंभों पर केवल ज्यामितीय आकृतियाँ हैं, वह भी श्वेत-श्याम। सत्य कहूँ तो मैंने अब तक किसी भी प्राचीन भारतीय गुफा के भीतर ज्यामितीय आकृतियाँ नहीं देखीं। ये आकृतियाँ मुझे नवीन कलाकृति प्रतीत हुईं। इसका सत्यापन करने के लिए वहाँ कोई भी अधिकारिक सूत्र उपस्थित नहीं था।

बाघ गुफाओं के भित्तिचित्र
बाघ गुफाओं के भित्तिचित्र

यहाँ भी चैत्य गृह जैसे एक कक्ष में एक स्तूप है जो एक बार फिर छत को छू रहा है। बाघ गुफाओं के स्तूप सँकरे एवं ऊंचे हैं जिनका ऊपरी भाग गोलाकार है तथा निचला भाग षट्कोण के आकार का है। जबकि अजंता तथा साँची के स्तूप उलटे अर्धगोलकार के हैं।

मुख्य कक्ष के चारों ओर अनेक छोटे कक्ष हैं जिनमें अधिकांश रिक्त हैं। या तो ये किसी समय ध्यान कक्ष थे अथवा इनके भीतर की प्रतिमाओं को वहाँ से निकाल दिया गया है।

चौथी गुफा को उसमें स्थित चटक रंगों के भित्ति-चित्रों के कारण कभी कभी रंग महल भी कहते हैं।

बाघ गुफाएं ५ एवं ६

बाघ गुफाओं के स्तम्भ
बाघ गुफाओं के स्तम्भ

यह एक लंबी संकरी गुफा है। इसके भीतर स्तंभों की दो पंक्तियाँ आमने-सामने खड़ी हैं। यहाँ भी गुफा का अधिकतम भाग इन स्तंभों ने घेर रखा है। इस गुफा में मैंने भूमिगत जल की धारा देखी। कहा नहीं जा सकता ये धारा कहाँ से आ रही है, कहाँ जा रही है, प्राचीन काल से है अथवा कालांतर में बनाई गई है?

यहाँ तीन और बाघ गुफाएं भी हैं जिन्हे ७ से ९ क्रमांक दिया गया है। किन्तु ढह जाने के कारण इनका अवलोकन संभव नहीं है।

गुफा क्षेत्र के संग्रहालय में बाघ चित्रकला

संग्रहालय में भित्तिचित्र
संग्रहालय में भित्तिचित्र

आप जैसे ही गुफा से नीचे आकर बाघिनी नदी पार करेंगे, एक सादी कान्क्रीट की इमारत देखेंगे जिसके भीतर एक छोटा संग्रहालय है। इस संग्रहालय में आप वो मौलिक चित्र देखेंगे जिन्हे गुफाओं की भित्तियों से निकालकर यहाँ संरक्षित किया गया है। इनके सिवाय कुछ अन्य चित्र ग्वालियर के पुरातात्विक संग्रहालय में भी रखे गए हैं।

यहाँ इन चित्रकलाओं के विषय में कुछ जानकारी उपलब्ध है।

बाघ चित्रकला में टेम्परा चित्रण तकनीक का प्रयोग किया जाता है। शिलाओ की सतह पर सर्वप्रथम मिट्टी एवं पौधों के रेशे मिलकर एक परत बनाई जाती है। तत्पश्चात उस पर चूना पोता जाता है। इस सतह पर रंगों से चित्रकारी की जाती है। ऐसी ही तकनीक एवं रंग अजंता की गुफाओं में भी प्रयोग किए गए हैं।

सूचना पट्टिकाओं पर अंग्रेजी एवं हिन्दी भाषा में प्रदर्शित चित्रों एवं प्रयोग किये गए तकनीक के विषय में जानकारी दी गई है।

मैंने यहाँ बोधिसत्व पद्मपाणि, ज्यामितीय आकृतियाँ, विदुर पंडित जातक जैसी जातक कथाएं, वनस्पति एवं जीवों की चित्रकारियाँ देखीं। यदि कोई गाइड मुझे इन प्राचीन एवं विलक्षण चित्रों के विषय में विस्तृत जानकारी देने हेतु उपलब्ध होता तो मुझे अत्यंत प्रसन्नता होती। यहाँ की बाघ चित्रकारी में गेरुए लाल रंगत की प्रधान्यता है।

जानकारी की कमी

मेरी तीव्र अभिलाषा है कि इन गुफाओं के विषय में विस्तृत जानकारी गुफाओं में अथवा संग्रहालय में उपलब्ध हो। हमारे साथ मांडू से जो गाइड आया था उसे मात्र इतनी ही जानकारी थी कि ये बौद्ध गुफ़ाएं हैं। स्थानीय गाइड उपलब्ध नहीं थे। टिकट खिड़की पर भी किसी प्रकार की सूचना पुस्तिका उपलब्ध नहीं थी। संग्रहालय में अवश्य इन चित्रों के विषय में कुछ जानकारी चिन्हित थी किन्तु साथ ले जाने के लिए संबंधित पुस्तिका उपलब्ध नहीं थी।

गुफाओं के भीतर प्रकाश की कोई व्यवस्था नहीं की गई है। अधिकतर पर्यटक अपने मोबाईल के प्रकाश का प्रयोग कर गुफाओं की असमतल सतह से बचते हुए मार्ग खोज रहे थे।

बाघेश्वरी देवी मंदिर

बाघेश्वरी देवी मंदिर
बाघेश्वरी देवी मंदिर

बाघ नगरी में एक छोटी पहाड़ी पर बागेश्वरी देवी का मंदिर है। ये बाघ नगरी की ग्राम देवी है।

मंदिर के समीप गणपत हलवाई की दुकान है जहां हमने दोपहर का भोजन किया। यह भोजन लगभग हमारे घर के भोजन जैसा था।

बाघ ठप्पा छपाई

बाघ जाते समय मार्ग में हमने अनेक कपास के खेतों को पार किया। ये खेत कपास से भरे तथा कटाई के लिए प्रस्तुत थे। चारों ओर किसान कपास के डोडे तोड़ रहे थे तथा उन्हे बिक्री करने के लिए मंडी में ले जा रहे थे। कपास के खेतों में जाना, किसानों से वार्तालाप करना तथा कुछ डोडे तोड़ना, इस सब में मुझे अत्यंत आनंद आया। इन डोडों के भीतर के बीज को अपने हाथों से अनुभव किया। इन बीजों को कताई से पूर्व अवश्य निकाल कर पृथक किया जाता है। तत्पश्चात इनसे वस्त्र बुना जाता है।

बाघ की प्रसिद्द ठप्पा छपाई
बाघ की प्रसिद्द ठप्पा छपाई

चूंकि मैंने गुफाओं एवं उनके भीतर स्थित भित्तिचित्रों के विषय में अध्ययन किया था, मुझे उनके अवलोकन की उत्सुकता थी। उसी प्रकार मेरे साथी पर्यटक बाघ के ठप्पा छपाई कारीगरों से भेंट करने के लिए उत्सुक थे। हम कुछ स्थानीय बुनकरों से भेंट करना चाहते थे किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि अब बुनकर अधिकांशतः उपलब्ध नहीं हैं। अब केवल बाघ छपाई प्रसिद्ध है जिन्हें मैं बहुत समय से धारण कर रही हूँ।

कार्यशाला

लंबी खोज के पश्चात हम खत्री ठप्पा छपाई के कार्यशाला में पहुंचे। अनेक रंगों की कोमल साड़ियाँ उनके प्रांगण में सूखने के लिए फैलाई हुई थीं। उन्होंने हमें पूर्ण श्रद्धा से छपाई का प्रत्येक चरण दिखाया। एक ओर छपाई ठप्पों का ढेर लगा हुआ था। प्रत्येक छोटा-बड़ा ठप्पा लकड़ी का था। ये लकड़ी के टुकड़े वास्तव में बाघ छपाई कारीगरों का खजाना हैं।

हाथ की छपाई
हाथ की छपाई

प्रत्येक कपड़े पर हाथों द्वारा कोमलता से तथा सावधानी से ठप्पों का प्रयोग कर छपाई की जाती है। आकृतियों को सावधानी से जोड़ते हुए ठप्पे को वस्त्र पर दबाया जाता है। इस प्रकार पूर्ण आकृति तैयार की जाती है। अब इस वस्त्र को उबलते जल में पकाया जाता है तथा तदनंतर सुखाया जाता है। इससे रंग पक्के हो जाते हैं। बाघ छपाई के इन वस्त्रों में तीन रंगों की प्रधान्यता होती है, लाल, काला व बिस्कुटी।

बाघ की पारंपरिक छपाई
बाघ की पारंपरिक छपाई

मेरे साथी पर्यटक साड़ियाँ, दुपट्टे तथा वस्त्र क्रय करने में व्यस्त हो गए जबकि मैं शांति से बैठकर छपाई की आकृतियों को निहारने का आनंद ले रही थी। स्थानीय वस्त्र एवं प्राचीन छपाई तकनीक के बीच का अदृश्य संबंध मेरे समक्ष जीवंत उपस्थित था। छपाई कारीगर इस तकनीक की वंशावली को राजस्थान के मरवाढ़ क्षेत्र से जोड़ते हैं।

बाघ के लिए यात्रा सुझाव

• इन गुफाओं का संरक्षण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा किया जाता है।
• प्रवेश शुल्क भारतीयों के लिए २५ रुपये तथा विदेशियों के लिए २५० रुपये है। १५ वर्ष से कम आयु के पर्यटक निशुल्क प्रवेश कर सकते हैं। टिकट में संग्रहालय प्रवेश शुल्क सम्मिलित है।
• इन गुफाओं के दर्शन के लिए एक घंटे का समय पर्याप्त है। ये गुफ़ाएं प्रातः ९ बजे से संध्या ५ बजे तक खुले रहते हैं।
• बाघ में तथा आसपास कोई भी अल्पाहार गृह अथवा भोजनालय उपलब्ध नहीं हैं। अतः अपने खाने-पीने की वस्तुएं साथ ले जाएँ।
• आप मांडू, धार अथवा इंदौर से बाघ गुफाओं के दर्शन दिवसीय यात्रा के रूप में कर सकते हैं।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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एलिफेंटा गुफाएं – शिव के अवतार – एक विश्व धरोहर https://inditales.com/hindi/shiva-elephanta-caves-mumbai/ https://inditales.com/hindi/shiva-elephanta-caves-mumbai/#comments Wed, 07 Mar 2018 02:30:30 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=671

ऐतिहासिक स्थलों से मेरा सदैव ही विशेष लगाव रहा है। ऐसे स्थल वैचारिक मंथन हेतु बाध्य कर देते हैं। हमारी सभ्यता की प्राचीनता, समय के साथ आगे बढ़ती हमारी प्रगति व आधुनिकता साथ ही भविष्य में और प्रगति करने की आवश्यकताओं के जाल में मष्तिष्क गुंथने लगता है। इसी कड़ी के अंतर्गत मैंने एलिफेंटा गुफाएं […]

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एलिफेंटा गुफाएं - त्रिमूर्ति
एलिफेंटा गुफाएं – त्रिमूर्ति

ऐतिहासिक स्थलों से मेरा सदैव ही विशेष लगाव रहा है। ऐसे स्थल वैचारिक मंथन हेतु बाध्य कर देते हैं। हमारी सभ्यता की प्राचीनता, समय के साथ आगे बढ़ती हमारी प्रगति व आधुनिकता साथ ही भविष्य में और प्रगति करने की आवश्यकताओं के जाल में मष्तिष्क गुंथने लगता है। इसी कड़ी के अंतर्गत मैंने एलिफेंटा गुफाएं या घारापुरी गुफाओं में शिव प्रतिमाओं के दर्शन किये थे। यात्रा के उपरांत उन पर संस्मरण लिखना मेरे लिए कदाचित सर्वाधिक कठिन कार्य था। यह इस कारण नहीं कि किसी ऐतिहासिक स्थल पर लिखा गया यह मेरा प्रथम संस्मरण था अपितु इसका प्रमुख कारण था कि आरम्भ से अंत तक यह यात्रा अभूतपूर्व अनुभवों से समृद्ध था। इन अनुभवों को लेखनी में उतारना सरल कार्य नहीं था।

एलिफेंटा गुफाएं - समुद्र पथ से
एलिफेंटा गुफाएं – समुद्र पथ से

घारापुरी अर्थात् एलिफेंटा गुफाएं – मेरी यात्रा का आरम्भ हुआ नौकायात्रा से जो मैंने मुंबई के प्रसिद्द ताज होटल के सम्मुख स्थित गेटवे ऑफ़ इंडिया से की थी। गेटवे ऑफ़ इंडिया वो भव्य स्मारक है जो मुंबई की अभिन्न पहचान है एवं अपनी समृद्ध धरोहर के लिए जाना जाता है। गेटवे ऑफ़ इंडिया से लगभग १२ की.मी. दूर अरबसागर में स्थित हैं एलिफेंटा गुफाएं। यहाँ तक की नौका यात्रा में मेरा साथ दिया मेरे पिताजी ने एवं कई सामुद्रिक चिड़ियों ने जिन्होंने गंतव्य पहुँचने तक हमारा भरपूर मनोरंजन किया था। द्वीप पहुंचकर, छोटी पटरी की रेल यात्रा के उपरांत हमें कुछ कदम पैदल चलाना पड़ा। और ये लो! हम यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल एलिफेंटा गुफाएं अर्थात् घारापुरी गुफाओं तक पहुंच गये।

एलिफेंटा गुफाएं - छोटी से रेल गाडी
एलिफेंटा गुफाएं – छोटी से रेल गाडी

यहाँ कुल सात कलात्मक गुफाएं हैं। जहां पहाड़ियों को काटकर, दक्षिण भारतीय मूर्तिकला से प्रेरित, भगवान् शिव की कई मूर्तियाँ उत्कीर्णित हैं। इसका ऐतिहासिक नाम घारापुरी, अर्थात् ‘गुफाओं का नगर’, इसके मूल नाम अग्रहारपुरी से व्युत्पन्न है। भगवान् शिव के विभिन्न अवतार शिव की विभिन्न कथाओं एवं घटनाओं का उल्लेख करतें हैं।

एलिफेंटा गुफाएं

एलिफेंटा अथवा घारापुरी गुफाएं
एलिफेंटा अथवा घारापुरी गुफाएं

एलिफेंटा गुफाएं अथवा घारापुरी गुफाओं के उत्खनन काल के सन्दर्भ में विवाद है। कुछ पुरातत्ववेत्ता इसे चौथी एवं कुछ छठी ईसवी में उत्खनित मानते हैं। तथापि एक तथ्य पर सर्व सम्मति है कि यह एक प्रेरणादायी अलौकिक उत्खनन है।हालांकि मैं कोई इतिहासकार नहीं हूँ, पर जब मैंने भी इन मंदिरों के प्रथम दर्शन किये, उन भव्य प्रतिमाओं, स्तंभों एवं मंदिरों को देख स्तब्ध रह गयी। इनकी अलौकिकता का अनुमान लगाने हेतु मेरे इतिहासकार होने की कदापि आवश्यकता नहीं!

चट्टान काट कर बनायीं गयी एलिफेंटा गुफाएं
चट्टान काट कर बनायीं गयी एलिफेंटा गुफाएं

एलिफेंटा की सात गुफाएं एक ही पहाड़ी काटकर बनायी गयी है। यहाँ हिन्दू धर्म के अनेक देवी देवताओं की मूर्तियाँ हैं जिनमें भगवान् शंकर की नौ बड़ी बड़ी मूर्तियाँ हैं जो शंकरजी के विभिन्न रूपों तथा क्रियाकलापों को दिखाती हैं। पहाड़ियों को काटकर उत्कीर्णित शिल्पकारी को देख रचनाकार की तकनीति उत्कृष्टता एवं हाथों की कला को नमन करने की अभिलाषा होती है। किसी काल में यह हिन्दुओं का सक्रिय आराधना स्थल था जहां निरंतर पूजा अर्चना एवं चढ़ावा किया जाता था। किन्तु वर्तमान में यह महज एक पर्यटन स्थल बन कर रह गया है। मात्र महाशिवरात्री के समय सरकार ने यहाँ पूजा अर्चना करने की अनुमति प्रदान की है।

एलिफेंटा गुफाएं और उनके विनाश की कथा

उत्कीर्णित स्तम्भ - एलिफेंटा गुफाएं
उत्कीर्णित स्तम्भ – एलिफेंटा गुफाएं

एलिफेंटा गुफाओं के विनाश के सन्दर्भ में कई मत हैं। कुछ इसका कारण जल का जमाव एवं वर्षा को मानते हैं। कुछ लोग पुर्तगालियों को इस विनाश का कारण मानते हैं जो अपने शासनकाल में हिन्दू संस्कृति को नष्ट करने का प्रयत्न कर रहे थे। उनके अनुसार पुर्तगाली सैनिक यहाँ निशानेबाजी का अभ्यास करते थे। उन्होंने त्रिमूर्ति को छोड़ अन्य सब प्रतिमाओं को भंगित किया। इन प्रतिमाओं से सम्बंधित सर्व अभिलेखों को नष्ट कर दिया था। त्रिमूर्ति इस विनाशलीला का शिकार नहीं हुई। लोगों का मानना है कि गंभीर मुखड़े की यह त्रिमूर्ति प्रतिमा प्रेक्षकों के मन को शांति प्रदान करती है। कदाचित इसकी विशालता एवं भव्यता के सम्मुख वे भयभीत हो गए थे। तथापि इन सब अनुमानों का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

वर्तमान में हम केवल प्रसन्न हो सकते हैं कि इस धरोहर को और अधिक हानि नहीं हुई है। हालांकि मन में यह कसक उठती है कि यदि यह विध्वंस नहीं हुआ होता तो इन प्रतिमाओं की सुन्दरता की पराकाष्ठा के दर्शनों का सौभाग्य हमें भी प्राप्त होता।

आइये अब मैं आपको यहाँ की प्रतिमाओं का उल्लेख करते हुए इनसे आपका परिचय कराऊं-

एलिफेंटा गुफाएं – नटराज के रूप में शिव

शिव - नटराज के रूप में - एलिफेंटा गुफाएं
शिव – नटराज के रूप में – एलिफेंटा गुफाएं

मैंने जैसे ही गुफा में प्रवेश किया, मेरी दृष्टी इस प्रतिमा पर पड़ी। मेरे पग अनायास ही इसकी ओर बढ़ गए। यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि यह भगवान् शिव के सर्वप्रसिद्ध रूप नटराज की प्रतिकृति है। संस्कृत में इसका अर्थ है ‘नटो के राजा’ अथवा ‘नर्तकों के देव’। भरतनाट्यम का अभ्यास प्राप्त करने के कारण मुझे भगवान् शिव के इस रूप का कला प्रदर्शन के क्षेत्र में महत्त्व की समझ है। नृत्य अभ्यास प्राप्त करने के पूर्व से ही मैंने शिव के इस रूप की आराधना की है।

भगवान् शिव द्वारा किये जाने वाले इस तांडव नृत्य को दो वर्गों में बांटा गया है। आनंद तांडव जिसमें आनंद प्राप्ति हेतु नृत्य किया जाता है। दूसरा है रूद्र तांडव जो अत्यंत उग्र एवं विनाशकारी नृत्य है। कहा जाता है कि शिव द्वारा किये गए आनंद तांडव से सृष्टि अस्तित्व में आती है तथा रूद्र तांडव सृष्टि का विनाश कर सकता है।

इस प्रतिमा पर पुर्तगाली विनाशलीला के संकेत स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं। इस मूर्ति का निचला भाग पूर्णतः भंगित है। चार हाथों में केवल एक ही हाथ सम्पूर्ण है। शिव के नृत्य का दर्शन करते देवी देवताओं की प्रतिमाओं पर भी बर्बरता के संकेत उपस्थित हैं। इन प्रतिमाओं में ब्रम्हा की प्रतिमा को आप उनके तीन शीषों से अवश्य पहचान लेंगे।

चार भुजाधारी नटराज की भुजाओं का महत्त्व-

• डमरूधारी ऊपरी दायाँ हाथ लय व ताल का प्रतीक है।
• अग्निधारी ऊपरी बायाँ हाथ प्रतीक है सृजन एवं विनाश का।
• नागदेवता से लिपटा निचला दायाँ हाथ अभय हस्त कहलाता है। बुराईयों से हमारी रक्षा करता है। नागदेवता निर्भयता का प्रतीक है।
• निचला बायाँ हाथ उनके उठे हुए पाँव की ओर संकेत करता है कि उनके चरणों में ही मोक्ष है। पाँव के नीचे स्थित बौना राक्षस अज्ञानता का प्रतीक है। अर्थात् शिव अज्ञानता का विनाश करते हैं।

और पढ़ें:- ‘नटराज- चोल कांसे की प्रतिमाओं को जानें।’

शिव द्वारा अंधकासुर वध

अंधकासुर वध - एलिफेंटा गुफाएं
अंधकासुर वध – एलिफेंटा गुफाएं

भगवान् शिव को यहाँ भैरव रूप में दर्शाया गया है। भैरव अर्थात् भयावह, इस अवतार में शिव को चन्द्र व नागदेवता शीष पर एवं एक हार गले में धारण कर क्रोध से भरे आक्रामक मुद्रा में आगे कूच करते दिखाया गया है। इस प्रतिमा के साथ भी विकृत तत्वों ने बर्बरता की है। इसके दो हस्त एवं निचले धड़ के अस्तित्व को समाप्त कर दिया गया है। तथापि शेष प्रतिमा अब भी शिव की आक्रामक मनोभावों को दर्शाने में सक्षम है। क्रोध में चढ़ी हुई भृकुटियाँ, अंगारों सी जलती आँखें एवं नुकीले दन्त, इनके द्वारा उनका आक्रोश हम तक पहुँचाने में माध्यम बने कलाकारों एवं कारीगरों की कला अत्यंत प्रशंसनीय है।

भगवान् शिव ने दायें हस्त में तलवार धारण की हुई है। बाएं हस्त में मृतक अन्धक राक्षस की देह लिए हुए है। अन्धक की प्रतिमा किंचित भंगित है। नागदेवता लिपटे, शिव के दूसरे बाएं हस्त में एक पात्र है जिसमें वे अन्धक का रक्त एकत्र करते दर्शाए गए हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी पार्वती पर कुदृष्टि रखते हुए उनका हरण करने का प्रयत्न करने के कारण भगवान् शिव ने उसका वध किया था।

कैलाश पर्वत पर विराजमान शिव पार्वती

कैलाश पर्वत पर शिव पार्वती
कैलाश पर्वत पर शिव पार्वती

इस प्रतिमा में भगवान् शिव एवं देवी पार्वती को कैलाश पर्वत पर बैठे चौपड़ खेलते दर्शाया गया है। शीष पर मुकुट व कंधे पर जनेऊ धारण किये भगवान् शिव ने घुटनों तक वस्त्र धारण किये हुए हैं। सुन्दर वस्त्र एवं आभूषण धारण किये देवी पार्वती के केश कंधे पर लटके हुए हैं। शिव द्वारा चौपड़ के खेल में पराजित किये जाने के उपरांत रुष्ट हो कर उन्होंने मुँह फेर लिया है। उनके अनुसार खेल में शिव ने उन्हें छल से पराजित किया था।

दोनों की प्रतिमाओं के मध्य, शिशु को हाथों में उठाये एक स्त्री की प्रतिमा है। ऐसा मानना है कि यह शिशु शिव-पार्वती पुत्र कार्तिकेय है। भगवान् शिव के चरणों में उनके परम भक्त ऋषि भृंगी का कंकाल है। केवल शिव भक्त होने के कारण, रुष्ट देवी पार्वती द्वारा श्राप प्राप्त कर वह मांसपेशियां व रक्त विहीन हो गया था। यह सम्पूर्ण शिल्प भी अत्यंत भंगित अवस्था में है। इसके मूल स्वरूप का अनुमान एलोरा की गुफा में स्थित ऐसी ही प्रतिमा से लगाया जाता है।

शिव पारवती विवाह - एलिफेंटा गुफाएं
शिव पारवती विवाह – एलिफेंटा गुफाएं

एक अन्य पटल पर शिव पार्वती के विवाह का दृश्य उत्कीर्णित है। भंगित अवस्था में होने के पश्चात भी देवी पार्वती के मुख पर लज्जा एवं संकोच स्पष्ट देखा जा सकता है।

कैलाश पर्वत उठाये रावण

कैलाश पर्वत उठाये रावण
कैलाश पर्वत उठाये रावण

इस प्रतिमा में कैलाश पर्वत पर विराजमान शिव पार्वती अन्य देवी देवताओं से घिरे हुए हैं। उनके चरणों के समीप संत भृंगी का अस्थिकंकाल है एवं दाहिने कोने में पुत्र गणेश का प्रतिरूप है। किन्तु निचले भाग में स्थित, कैलाश पर्वत उठाने का प्रयत्न करते रावण की प्रतिमा भंगित है।

मान्यता के अनुसार, किसी काल में रावण की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् शिव ने उसे वर माँगने का अवसर प्रदान किया था। जैसा की दृश्य में दर्शाया गया है, भगवान् शिव ने अन्य देवी देवताओं के द्वारा निषेध के पश्चात भी रावण को शक्तिशाली होने का वरदान दिया। अपनी नवीन शक्ति का परिक्षण करने हेतु रावण ने कैलाश पर्वत उठाने की चेष्टा की। इस प्रतिमा में गरुड़ पर विराजमान भगवान् विष्णु, भगवान् शिव का सम्पूर्ण कुटुंब एवं कई अन्य देवी देवता इस दृश्य का अवलोकन करते दर्शाए गए हैं।

रावण का गर्व चूर करने हेतु भगवान् शिव ने मात्र एक अंगूठे से पर्वत को दबा कर स्थिर कर दिया था। तब पर्वत के नीचे दबे रावण की श्वास बंद होने लगी। उसे ज्ञात हुआ कि उसकी शक्ति शिव के मात्र अंगूठे के समक्ष भी क्षीण है। अपने मंत्रियों के परामर्श पर रावण ने हजार वर्षों तक शिव की स्तुति की। भगवान् शिव ने वरदान स्वरुप उसे एक तलवार दी एवं दबकर चिल्लाने के कारण रावण नामकरण भी किया।

और पढ़ें:- श्रीलंका में रामायण सम्बन्धी स्थल

योगीश्वर शिव

योगी रूप में शिव - एलिफेंटा गुफाएं
योगी रूप में शिव – एलिफेंटा गुफाएं

इस दृश्य में भगवान् शिव को हिमालय में पद्मासन मुद्रा में विराजमान दर्शाया गया है। पत्नी सती की मृत्यु के पश्चात उनके वियोग में आँखें बंद कर अगाध ध्यान मुद्रा में बैठे हैं। ऊपर दिव्य आत्माओं एवं नीचे सेवकों से घिरे शिव का आसन, कमल पुष्प, को नागों ने पीठ पर धारण किया है।

जैसे की मान्यता है, पिता राजा दक्ष द्वारा पति भगवान् शिव का अपमान किये जाने पर देवी सती ने यज्ञकुंड की अग्नि में अपने प्राण त्याग दिए थे। पिता के कृत्य से रुष्ट होकर सती ने आदिशक्ति का आव्हान किया था। देह को भस्म कर ऐसे पिता की पुत्री के रूप में जन्म की प्रार्थना की थी जिसका वे सम्मान कर सकें। कालान्तर में देवी पार्वती के रूप में उनका पुनर्जनम हुआ तथा उन्होंने भगवान् शिव से पुनर्विवाह किया।

यज्ञकुंड में सती द्वारा स्वयं की आहूति देने के पश्चात, भगवान् शिव के क्रोध की सीमा नहीं रही। अत्यंत आक्रोश से भरे, देवी सती की झुलसी देह हाथों में उठाये, शिव ने रूद्र तांडव नृत्य आरम्भ किया। रूद्र तांडव द्वारा होते सृष्टि के विनाश को रोकने हेतु भगवान् विष्णु को हस्तक्षेप करना पड़ा। उन्होंने अपने चक्र द्वारा देवी सती की देह के ५२ टुकड़े कर दिए थे। जहां जहां ये टुकड़े गिरे, वहां वहां शक्तिपीठ की स्थापना हुई।

एलिफेंटा गुफा की इस प्रतिमा में शिव के हाथों एवं पाँवों को अत्यंत क्षति पहुंचाई गयी है।

इस दृश्य के अन्य भाग हैं, हंस पर विराजमान ब्रम्हा, वाहन ऐरावत विहीन इंद्र, केले के पत्ते पर गरुड़ की सवारी करते विष्णु, भंगित शीषों वाले सात घोड़ों के रथ की सवारी करते सूर्य देव। इनके अलावा माला जपते एक ऋषि, घुटनों तक वस्त्र धारण किये दो स्त्रियाँ, हाथों में जल का पात्र उठाये चन्द्र, जिनका चेहरा भंगित है, इत्यादि भी दृश्यमान हैं। दो स्त्रियों के बाजू में तीन एकरूप पुरुष एवं शिव को शांत करने आये एक ऋषि का अस्थिकंकाल भी देखा जा सकता है।

गंगाधर रूप में शिव

गंगाधर
गंगाधर

इस फलक में पवित्र गंगा नदी का शिव की जटाओं से पृथ्वी पर आगमन का दृश्य उत्कीर्णित है। यूँ तो इस तरह की प्रतिमाएं भारतवर्ष में कई स्थानों में आप देख सकते हैं, तथापि इस प्रतिमा की विशेषता यह है कि यहाँ गंगा, यमुना एवं सरस्वती नदियों को तीन शीषों वाली एक स्त्री के रूप में उत्कीर्णित किया गया है। किंचित भंगित होने के पश्चात भी इसकी सुन्दरता आपका मन मोह लेगी।

अर्धनारीश्वर

अर्धनारीश्वर शिव & पार्वती
अर्धनारीश्वर शिव & पार्वती

शिव के इस रूप की प्रतिमा सर्वाधिक सुन्दर एवं यथोचित मानी जाती है। अर्धनारीश्वर अर्थात आधी स्त्री एवं आधा पुरुष। शिव के इस रूप में स्त्री एवं पुरुष को एक सामान माना गया है। दोनों को एक दूसरे का पूरक माना जाता है।

एलिफेंटा गुफा की इस शिल्पकला में अर्धनारीश्वर प्रतिमा का निचला आधा भाग पूर्ण रूप से भंगित है। शेष प्रतिमा में भगवान् शिव अपने दाहिने ओर खड़े नंदी पर हाथ रखे हुए हैं इसका बांया भाग कमनीय पार्वती देवी का है। अपने अपने भागों में शिव और पार्वती की प्रतिमाओं में बारीकी से शिल्पकारी की गयी है। पुरानों की कथाओं द्वारा मुझे यह ज्ञात हुआ कि ब्रम्हा एवं विष्णु अपने अर्धांगिनियों से ज्ञान नहीं बाँटते थे। यद्यपि शिव पार्वती देवी को समान मानते थे एवं उन्हें समान अधिकार प्राप्त थे। यह प्रतिमा इसी तथ्य का प्रतीक है।

शिव के इस रूप से सम्बंधित एक ओर कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि ऋषि भृंगी केवल शिव परिक्रमा करना चाहते थे। इससे रुष्ट देवी पार्वती शिव के अत्यंत निकट आकर बैठ गयी। ऋषि भृंगी भंवरे का रूप धरकर दोनों के मध्य से निकल आये एवं शिव परिक्रमा करने लगे। तब देवी पार्वती ने भगवान् शिव से दोनों के तन को जोड़ने की प्रार्थना की थी। तत्पश्चात शिव ने अर्धनारीश्वर रूप की रचना की थी।

त्रिमूर्ति

त्रिमूर्ति - एलिफंटा की सबसे प्रमुख मूर्ति
त्रिमूर्ति – एलिफंटा की सबसे प्रमुख मूर्ति

भगवान् शंकर की नौ बड़ी बड़ी भव्य प्रतिमाओं में सर्वाधिक आकर्षक प्रतिमा है भगवान् शिव की त्रिमूर्ति प्रतिमा। लगभग २४ फीट लंबी एवं १७ फीट ऊंची इस प्रतिमा में भगवान् शंकर के तीन रूपों का चित्रण किया गया है। यह गुप्त-चालुक्य काल में प्रचलित शिल्पकला की सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं अतिउत्कृष्ट कृति है। इसकी विशालता हमें हमारे अस्तित्व की तुच्छता का आभास कराती है। इस प्रतिमा में भगवान् शिव के मुख के भाव मेरे मन मष्तिष्क में शान्ति एवं निस्तब्धता का वातावरण पैदा कर रहे थे। एलिफेंटा गुफा की यह एकमात्र शिल्प है जिसे किसी प्रकार की क्षति नहीं पहुंचाई गयी है।

त्रिमूर्ति में शिव के विभिन्न आयाम

हिन्दू धर्म की मान्यता अनुसार ब्रम्हांड के छः सिद्धांतों के अंतर्गत शिव के छः आयामों में से तीन आयाम इस त्रिमूर्ति में दर्शाए गए हैं। ये हैं:-
• बांया शीष (दर्शकों का दांया) भगवान् शिव का नारी सुलभ रूप है। हाथ में कमल पुष्प, मुख पर हलकी सी मुस्कान, यह शिव का प्रत्येक जीव के प्रति स्नेह एवं करुणा का भाव दर्शाता है। यह ब्रम्हा का प्रतिनिधित्व करता है।
• दांया शीष (दर्शकों का बांया) शिव का रूद्र रूप है। मुख पर मूंछें, हाथ में सर्प, यह शिव का आक्रोश दर्शाता है। ऐसी मान्यता है कि क्रोध से भरे शिव अपनी तीसरी आँख द्वारा विश्व को भस्म कर सकते हैं।
• मध्य शीष में उनका शांत ध्यानमग्न मुख असीम शांति प्रदान करता है। इस मुद्रा में शिव प्रबुद्ध योगी प्रतीत होते हैं जो ब्रम्हांड की उन्नति हेतु विचारमग्न हैं। इस योगेश्वर रूप को विष्णु स्वरुप तत्पुरुष भी कहा जाता है।

और पढ़ें:- ताला में रूद्र शिव

ऐसा माना जाता है कि शिव के छः आयामों में अन्य तीन आयाम त्रिमूर्ति के पार्श्व भाग में हैं। वे हैं:-
• ईशान – आतंरिक आयाम, प्रत्येक विद्यमान से सम्बंधित, जो आकाश का प्रतिनिधित्व करता है।
• अघोर- दक्षिणी आयाम, पुनर्जीवन की अभिव्यक्ति करता, रूद्र से सम्बंधित, अग्नि का प्रनिधित्व करता है।
• तिरुवधनम- षष्ठमुखी कार्तिकेय जिसका सृजन भगवान् शिव ने किया एवं उसे उपरोक्त सर्व आयाम प्रदान किये।

शिव के विभिन्न रूपों से अत्यंत प्रभावित होकर मंत्रमुग्ध सी मैं गुफा से बाहर निकली।

एलिफंटा का सूर्यास्त
एलिफंटा का सूर्यास्त

यदि आप उस हाथी के सम्बन्ध में जानना चाहते हैं जिसके कारण इस गुफा का नामकरण किया गया तो आप पढ़ें:- भाऊ दाजी लाड संग्रहालय स्थित एलिफेंटा का हाथी

यह रुचिका पारेख द्वारा लिखित अतिथि संस्मरण है। रुचिका अपने सम्बन्ध में लिखती हैं कि उनका जन्म सपनों की नगरी मुम्बई में हुआ था। हर प्रकार की ललित कला में उनकी अत्यंत रूचि है, चाहे वह प्रदर्शन कला हो या हस्तकला। ललितकला में स्नातक की उपाधि प्राप्त करते समय छायाचित्रिकरण उनका चुनिन्दा विषय था। अतः वे छायाचित्रिकरण के साथ साथ ग्राफिक डिजाईन में रूचि रखते हुए इन्ही विषयों पर कार्य करती आई हैं। छायाचित्रों द्वारा कहानी कहना उनकी वैशिष्ठ्यता है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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बराबर गुफाएँ – भारत की सबसे प्राचीन गुफाएँ – बिहार का ऐतिहासिक स्थल https://inditales.com/hindi/ancient-barabar-caves-gaya-bihar/ https://inditales.com/hindi/ancient-barabar-caves-gaya-bihar/#respond Wed, 15 Nov 2017 02:30:52 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=467

बिहार की मेरी प्रथम यात्रा के रूप में मुझे बराबर गुफाएँ देखने का मौका मिला। चट्टानों को काटकर बनाई गयी गुफाएँ भारत भर की कई पहाड़ियों पर फैली हुई हैं। इन गुफाओं का प्रयोग विविध संप्रदायों जैसे – जैन संप्रदाय, बौद्ध संप्रदाय और आजीविका संप्रदाय के संन्यासियों द्वारा होता था। ये संन्यासी वर्षा ऋतु के […]

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बराबर गुफाएँ - एक मानचित्र
बराबर गुफाएँ – एक मानचित्र

बिहार की मेरी प्रथम यात्रा के रूप में मुझे बराबर गुफाएँ देखने का मौका मिला। चट्टानों को काटकर बनाई गयी गुफाएँ भारत भर की कई पहाड़ियों पर फैली हुई हैं। इन गुफाओं का प्रयोग विविध संप्रदायों जैसे – जैन संप्रदाय, बौद्ध संप्रदाय और आजीविका संप्रदाय के संन्यासियों द्वारा होता था। ये संन्यासी वर्षा ऋतु के दौरान बारिश से अपना रक्षण करने हेतु इन्हीं गुफाओं में आश्रय लेते थे। गुजरते दौर के साथ इन गुफाओं की वास्तुकला अपने आप में चित्रकारी के अद्भुत नमूने के रूप में उभरी जिसका विकसित रूप आप अजंता और एलोरा की गुफाओं के रूप में देख सकते हैं।

गुफाओं के निर्माण का आरम्भ

बराबर गुफाओं को जाने का रास्ता
बराबर गुफाओं को जाने का रास्ता

भारत से जुड़ी अन्य कई बातों की तरह गुफाओं के निर्माण का आरंभ भी बिहार में ही हुआ था, जिसका जीता-जागता स्वरूप बराबर गुफाओं के रूप में खड़ा है। बिहार में स्थित ये गुफाएँ गया शहर से कुछ ही कि.मी. की दूरी पर बसी बराबर और नागार्जुनी पहाड़ियों में पायी जाती हैं। बराबर पहाड़ी में स्थित 3 गुफाएँ हैं तो नागार्जुनी पहाड़ी में स्थित 4 गुफाएँ हैं। इन सातों गुफाओं को समूह में सातघर के नाम से जाना जाता है। ये गुफाएँ भारत की सबसे प्राचीन गुफाएँ हैं, जिनका निर्माण सम्राट अशोक और उनके पोते दशरथ के शासनकल के दौरान किया गया था। ये बराबर गुफाएँ चैत्य गृहों और सभागृहों का प्रारंभिक स्वरूप मानी जाती हैं, जिन्हें समय के साथ कुछ जटिल विकास कार्यों से गुजरना पड़ा।

सुदामा, कर्ण और लोमांस ऋषि की गुफाएँ  – बराबर गुफाएँ

चट्टान जिसे काट बनायो गयी - बराबर गुफाएँ
चट्टान जिसे काट बनायो गयी – बराबर गुफाएँ

बराबर पहाड़ियों में बसी इन तीन गुफाओं को सुदामा, कर्ण और लोमांस ऋषि की गुफाओं से जाना जाता है। इन में से सुदामा और लोमांस ऋषि की गुफाएँ चैत्य के सभागृह हैं और कर्ण की गुफा एक आवास गृह है। इन गुफाओं की छत और दीवारों पर उच्च स्तरीय पॉलिश देखी जा सकती है। माना जाता है कि, यह पॉलिश अशोक स्तंभो पर पायी जानेवाली पॉलिश के समान है। लेकिन मुझे लगता है कि, अपनी यात्राओं के दौरान मैंने जीतने भी अशोक स्तंभ देखे हैं उनपर पायी गयी पॉलिश की तुलना में इन गुफाओं की आंतरिक सतहों पर पायी गयी पॉलिश क कहीं ज्यादा अच्छी है। इसके पीछे का एक कारण यह हो सकता है कि, ये गुफाएँ हमेशा इन पहाड़ियों के आवरण में संरक्षित थीं, जबकि उन स्तंभों को हर प्रकार की हानि से गुजरना पड़ता है, चाहे वह प्रकृतिक हो या मनुष्यों द्वारा पहुंचाई गयी हानि हो।

जब आप इन गुफाओं की दीवारों पर हाथ फेरते हैं, तो लगता है जैसे उन्हें कल ही पॉलिश किया गया हो। यह पॉलिश एकदम नयी सी लगती है। इसे देखकर आपके लिए यह मानना कि, ये गुफाएँ 2400 साल पुरानी हैं, थोड़ा मुश्किल सा हो जाता है। जब आप इन गुफाओं के गोलाकार चैत्य भाग को देखते हैं तो आप इसी सोच में पड़ जाते हैं, कि इन गुफाओं के कारीगरों ने इतनी बड़ी चट्टान को काटकर, उसे तराशकर इतना अच्छा और सुंदर गुबंद न जाने कैसे बनाया होगा।

लोमांस ऋषि की गुफा 

लोमांस ऋषि गुफा - बराबर पहाड़ी - बिहार
लोमांस ऋषि गुफा – बराबर पहाड़ी – बिहार

लोमांस ऋषि की गुफा एकमात्र ऐसी गुफा है जिसके प्रवेश द्वार पर उत्कीर्णन का काम देखा जा सकता है। इस  द्वार पर वास्तुकला के कुछ अलंकृत विवरण हैं, जो बाद में चट्टानों से खुदी गयी गुफाओं के लिए चलन बन गया। इस प्रवेश द्वार पर बने मेहराब पर एक के ऊपर एक ऐसे दो अर्धवृत्त हैं, जिन में से ऊपरी अर्धवृत्त पर जाली का काम किया गया तो निचले अर्धवृत्त पर बारीकी से उत्कीर्णित हाथियों की पंक्ति है जो स्तूपों को श्रद्धांजलि दे रहे हैं। पत्थर पर किया गया यह नक्काशी काम लकड़ी की कारीगरी से प्रेरित है। पत्थर की कारीगरी से पहले लकड़ी की कारीगरी ही चित्रकला का प्रसिद्ध माध्यम थी। जब इन गुफाओं का निर्माण हो रहा था तब पत्थर की कारीगरी चित्रकला की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाने के मार्ग पर अपने कदम बढ़ा रही थी। इसकी उच्च स्तरीय पॉलिश और बारीक उत्कीर्णन इसे चित्रकारी का एक अप्रतिम नमूना बनाती है।

पहाड़ी की यात्रा 

बराबर गुफाओं की दीवारें - आज भी चमकती हुई
बराबर गुफाओं की दीवारें – आज भी चमकती हुई

पटना-गया की प्रमुख सड़क से विमार्ग होकर जब आप चक्करदार रास्ते से जाते हैं, तो आपको वहां दूर-दूर तक कुछ नज़र नहीं आता, जैसे कि वह मार्ग किसी भी मंजिल की ओर नहीं जाता हो। लेकिन जैसे-जैसे आप आगे बढ़ते हैं, आपको खेतों के बीच खड़ा इकहरा पहाड़ दिखाई देने लगता है। उस पहाड़ी को देखकर आपके मन में यही सवाल उठता है कि यह पतला और नाजुक सा मार्ग आपको उस पहाड़ी तक कैसे ले जाएगा। ऐसे समय में हमारे साथ एक बहुत ही अच्छे गाइड थे जिन्होंने पूरी यात्रा के दौरान हमारा अच्छे से मार्गदर्शन किया था। इसके बावजूद भी मैं इसी चिंता में थी कि अगर किसी को अकेले ही इस सुनसान से रास्ते से उस सुनसान सी पहाड़ी पर जाना हो तो न जाने इसके लिए उसे कितनी हिम्मत चाहिए होगी। मुझे तो इस पहाड़ी की तरफ जाता एक भी सार्वजनिक परिवाहन नहीं दिखा। लेकिन पहाड़ी के पास पहुँचते ही आपको कुछ उचित आधारिक संरचनाएं नज़र आती हैं, जैसे अतिथिगृह, एक परित्यक्त संग्रहालय और चौड़े रास्ते जो पहाड़ी पर स्थित गुफाओं की ओर जाते हैं।

शिव मंदिर    

बराबर पहाड़ी का परिदृश्य
बराबर पहाड़ी का परिदृश्य

बराबर पहाड़ी के उस पार वाली पहाड़ी पर एक शिव मंदिर है। हमे बताया गया कि शिवरात्रि के दिन इस मंदिर में बहुत सारे शिव भक्त भगवान के दर्शन के लिए आते हैं। इसके अलावा यहां पर लगभग एक महीने के लिए मेले का भी आयोजन होता है, जिसमें भी भक्तों की बहुत भीड़ होती है। इस मंदिर तक जाने के लिए सीढ़ियाँ भी हैं।

हमे नागार्जुनी पहाड़ी के दर्शन करने का मौका नहीं मिला लेकिन मेरा मानना है कि, ये गुफाएँ भी बराबर गुफाओं की तरह ही बहुत आकर्षक होंगी।

अगर आप कभी पटना और बोधगया के बीच यात्रा कर रहें हो तो इन पहाड़ियों की यात्रा जरूर कीजिये, जहां पर आप वास्तुकला के सबसे आरंभिक उदाहरण प्रत्यक्ष रूप से देख सकते हैं।

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बोर्रा गुफाएँ – अरकू घाटी की छेद वाली गुफा – आन्ध्र प्रदेश का पर्यटन स्थल https://inditales.com/hindi/araku-valley-borra-caves-andhra/ https://inditales.com/hindi/araku-valley-borra-caves-andhra/#comments Wed, 22 Feb 2017 02:30:03 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=153

बोर्रा गुफाएँ भारत के पूर्वी घाटों में अरकू घाटी के अनंथगिरी पहाड़ियों में, विशाखापटनम के तटीय शहर से लगभग 90 की.मी. की दूरी पर बसी हुई हैं। बोर्रा गुफाएँ भारत का अद्वितीय प्रकृतिक अजूबा है। भारत में, प्रकृतिक स्टैलैग्माइट और स्टैलैक्टाइट की यह सबसे बड़ी गुफा है। इस प्रकार की गुफाएँ आप विश्व के अलग-अलग […]

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बोर्रा गुफाएं – अरकू घटी – आंध्र प्रदेश
बोर्रा गुफाएं – अरकू घटी – आंध्र प्रदेश

बोर्रा गुफाएँ भारत के पूर्वी घाटों में अरकू घाटी के अनंथगिरी पहाड़ियों में, विशाखापटनम के तटीय शहर से लगभग 90 की.मी. की दूरी पर बसी हुई हैं। बोर्रा गुफाएँ भारत का अद्वितीय प्रकृतिक अजूबा है। भारत में, प्रकृतिक स्टैलैग्माइट और स्टैलैक्टाइट की यह सबसे बड़ी गुफा है। इस प्रकार की गुफाएँ आप विश्व के अलग-अलग भागों में देख सकते हैं। जैसे कि, मैंने ऐसी ही गुफाएँ अमरीका में टेक्सास में, यूरोप में स्लोवाकिया में और हमारे अपने मेघालय में भी देखी हैं जो एक-दूसरे के काफी समान हैं। ये गुफाएँ सैकड़ों लाखों साल पुरानी मानी जाती हैं।

इन गुफाओं की छत और फर्श से प्रकृतिक निक्षेप उपजते हैं, जिन्हें स्टैलैग्माइट और स्टैलैक्टाइट कहा जाता है। इनकी बेतरतीब सी संरचनाएं आपकी कल्पनाओं को दिशाहीन बना देती हैं। लेकिन कभी-कभी जब ये निक्षेप आपस में घुल जाते हैं तो एक स्तंभ जैसी दिखने वाली संरचना निर्मित होती है।

ये गुफाएँ आम तौर पर किसी नदी के मार्ग पर बसी होती हैं, जिसके कारण नदी का पानी इन गुफाओं में से गुजरते हुए बहता है। गुफाओं के भीतर घूमते हुए आप इस बहती हुई नदी को देख सकते हैं। बोर्रा गुफाएँ गोस्थानी नदी का उद्गम स्थल है। यह नदी इन गुफाओं से बहते हुए विशाखापटनम तक जाती है।

भारत के प्रकृतिक अजूबे – बोर्रा गुफाएँ – अरकू घाटी

बोर्रा गुहालू
बोर्रा गुहालू

भारत संस्कृति में डूबा हुआ देश है। हमारी संस्कृति में प्रत्येक वस्तु में दिव्यता देखने की परंपरा रही है। इन गुफाओं में जमीन से उपजे हुए निक्षेपों को अक्सर शिवलिंगों के रूप में देखा जाता है। इस गुफा में आपको ऐसे बहुत सारे शिव लिंग देखने को मिलेंगे। इन्हीं में से एक शिवलिंग को छोटे से मंदिर में परिवर्तित किया गया है, जहां तक पहुँचने के लिए आपको पतली सी सीढ़ियों से होते हुए उपर तक जाना पड़ता है। इसी प्रकार इन निक्षेपों से बनी बाकी की संरचनाओं को अन्य देवताओं के अवतारों के रूप में या फिर उनके वाहन या शुभ प्रतिकों के रूप में देखा जाता है। कभी-कभी तो इन्हें ऐतिहासिक किताबों के उपाख्यानों से भी जोड़ा जाता है।

ऐसे विश्वासों के चलते, भारत में इन गुफाओं का अच्छी तरह से अनुरक्षण नहीं हो पाया है। मानवीय स्पर्श के कारण इन प्रकृतिक निक्षेपों की संख्या कम होती जा रही है। इसके बावजूद भी उन्हें स्पर्श करने पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाए गए हैं। यहां के लोगों का मानना है कि ये गुफाएँ किसी भी वैज्ञानिक या पुरातात्विक खोज का परिणाम न होकर यहां के सांस्कृतिक जीवन का एक अभिन्न अंग हैं।

गिरते जल से बनी संरचनाएं

मानव मस्तिष्क के आकर की शिला
मानव मस्तिष्क के आकर की शिला

बोर्रा गुफाओं में गिरते हुए जल से बनी इन संरचनाओं को स्थानीय भाषा में जलशीला कहा जाता है। यहां पर आपको साई बाबा तथा अन्य मंदिर भी देखने को मिलेंगे। यहां पर सीता का शयनकक्ष और स्नानकक्ष भी है, जहां से पीला जल बहता है। ऐसा माना जाता है की माता सीता हल्दी से स्नान कर रही हैं, और यह जल उनके स्नानकक्ष से आता है। लेकिन वैज्ञानिक रूप से देखे, तो यह सिर्फ सल्फर धातु है जिसके कारण यह जल पीला दिखाई देता है। यहां पर मनुष्य का दिमाग, भुट्टा, बंदर, बैठा हुआ हाथी, भागता हुआ घोड़ा, मनुष्य का पैर और उसकी गदा आदि आकारों की संरचनाएं देखने को मिलती हैं। इन में से मानव दिमाग वाली संरचना बहुत ही निराली है, क्योंकि वह बाकी के स्टैलैग्माइट और स्टैलैक्टाइट की संरचनाओं से बिलकुल अलग है।

यहां पर एक बड़ी सी चट्टान है जिसके दोनों सिरों को एक लंबी सी संधि से जोड़ा गया है। स्थानीय लोग, इस संधि द्वारा विभाजित इन दोनों भागों को लव और कुश यानि माता सीता के दोनों बेटों के नाम से पुकारते हैं। यह अप्रतिम दृश्य देखने लायक है।  इस गुफा की छत पर एक छेद है, जहां से भीतर आती हुई रोशनी गुफाओं को खूबसूरती से अनेक प्रकारों में प्रकाशित करती है। गुफा में अलग-अलग स्थानों पर खड़े होकर आप इस रोशनी के विभिन्न रंग-रूप देख सकते हैं।

कुछ जगहों पर गुफाओं की दीवारें मैग्नीशियम और सिलिका जैसे खनिज पदार्थों की उपस्थिती के कारण चमकती हुई नज़र आती हैं। गुफा के अंतिम छोर की तरफ, पानी में गुफा का प्रतिबिंब दिखाई देता है, जो गुफा की आकृति को अचानक से दुगुना बनाता हुआ उसे अद्भुत रूप से प्रकाशित करता है।

बोर्रा गुफाएँ – तीन पड़ाव

बोर्रा गुहालू से निकलती गोस्थनी नदी
बोर्रा गुहालू से निकलती गोस्थनी नदी

बोर्रा गुफाएँ तीन पड़ावों में विभाजित हैं, जिनमें से सिर्फ बीच वाला पड़ाव ही लोगों को घूमने के लिए खुला है। नीचे का पड़ाव और ऊपर का पड़ाव सामान्य यात्रियों के लिए सुरक्षित नहीं है, जिसके कारण वहां पर जाने की अनुमति नहीं है। निम्न पड़ाव नीचे बहती हुई नदी से जुड़ा होने के कारण खतरनाक हो सकता है। लेकिन ऊपर से देखने पर नदी का यह नज़ारा बहुत ही सुंदर दिखता है। इस क्षेत्र में आम तौर पर पाए जाने वाले सफ़ेद संगमरमर के पत्थरों के बीच से बहती हुई यह नदी किसी चंचल युवती सी लगती है।

बोर्रा गुफ़ा का भीतरी दृश्य
बोर्रा गुफ़ा का भीतरी दृश्य

हमारे गाइड ने हमे बताया कि शिवरात्रि के दिन इन गुफाओं में जाने के लिए कोई प्रवेश शुल्क नहीं लगता है। इस दिन आस-पास के सभी आदिवासी समुदाय यहां पर पुजा करने आते हैं। इस गुफा का प्रवेश द्वार बहुत बड़ा है। यहीं से आप गुफा के फैलाव को देख उसके विस्तार का अंदाज़ा लगा सकते हैं। यहां से गुफा के भीतर देखने पर आपको लोग भी बौने से नज़र आते हैं। इस प्रवेश द्वार पर नंदी की दो मूर्तियाँ स्थापित की गयी हैं, जो पूरी गुफा को शिव मंदिर का रूप प्रदान करती हैं। और क्यों न हो शिवजी स्वयं एक गुफा निवासी जो ठहरे।

बोर्रा का अर्थ

बोर्रा गुफाओं का मुख्य प्रवेश
बोर्रा गुफाओं का मुख्य प्रवेश

इस क्षेत्र की स्थानीय भाषा के अनुसार बोर्रा का अर्थ है छेद। बोर्रा गुफाओं के शीर्ष पर एक बड़ा सा छेद है जिसके कारण उसे यह नाम दिया गया है। उपाख्यान बताते हैं कि, एक बार एक गाय इस छेद में गिर गयी और इस प्रकार से स्थानीय आदिवासी लोगों को इस गुफा के बारे में पता चला। इसके साथ ही उन्हें नदी के उद्गम स्थान का भी पता चला। इसलिए इस घटना के आधार पर इस नदी को गोस्थानी ( गाय के थन ) नाम दिया गया। इस गुफा में आपको एक जगह पर गाय के थन जैसी संरचना दिखेगी जहां से जल टपकता रहता है, जो सीधे उसके नीचे स्थित शिवलिंग पर गिरता है।

आधुनिक इतिहास के अनुसार बोर्रा गुफाओं की खोज ब्रिटिश काल के दौरान बताई जाती है। कहा जाता है कि, राजा विलियम जॉर्ज ने लगभग 200 साल पहले भारतीय भूगर्भीय सर्वेक्षण के द्वरा इन गुफाओं की खोज की थी। तथा मानवविज्ञानियों का मानना है कि, इन गुफाओं से प्राप्त पत्थर से बने हथियारों की पुरातनता के हिसाब से लगभग 30,000 – 50,000 साल पहले इन गुफाओं में लोग रहा करते थे।

बोर्रा गुफाएँ और भारतीय रेल

बोर्रा गुफ़ा के भीतर
बोर्रा गुफ़ा के भीतर

अगर आप पूर्व तटीय रेल्वे की ट्रेन से बोर्रा गुहलू की यात्रा पर जा रहे हैं, तो वहां का गाइड आपको जरूर बताएगा कि स्टेशन तक पहुँचने से ठीक पहले यह ट्रेन वास्तव में बोर्रा गुफाओं के ऊपर से गुजरती हुई जाती है। और गुफाओं के भीतर भी आपको रेल्वे के सूचना पट्ट दिखेंगे जो आपको इस ट्रेन की पूरी जानकारी देते हैं। आंध्र प्रदेश पर्यटन ने इन गुफाओं में पक्के रास्ते बनाने का बहुत ही बढ़िया काम किया है। तथा गुफाओं के भीतर कुछ बत्तियाँ भी लगायी हैं, जिससे पर्यटकों को गुफाओं में घूमने की सुविधा मिलती है।

मेरे विचार से आपको बोर्रा गुफाएँ जरूर देखनी चाहिए। ये गुफाएँ सच में भारत का अद्वितीय प्रकृतिक अजूबा है। तथा इन गुफाओं तक जानेवाली ट्रेन, जो अनेकों सुरंगों से गुजरते हुए जाती है, की यात्रा का अनुभव भी अवश्य लेना चाहिए।

कार्तिकी झरना

कार्तिकी झरना – अरकू घाटी
कार्तिकी झरना – अरकू घाटी

बोर्रा गुफाओं के पास ही एक मौसमी झरना है, जिसे कातिकी झरना कहा जाता है। अगर आप तरुण और साहसी हैं तो यह झरना देखने जरूर जाइए। लेकिन ऐसे झरनों पर जाते समय समूह में जाइए और अपना तथा अपने आस-पास का ध्यान जरूर रखिए।

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