चित्रकला Archives - Inditales श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Thu, 06 Jul 2023 05:23:43 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.0.4 मिथिला बिहार की मधुबनी चित्रकला शैली – एक संदर्शिका https://inditales.com/hindi/mithila-madhubani-chitrakala-bihar/ https://inditales.com/hindi/mithila-madhubani-chitrakala-bihar/#comments Wed, 01 Nov 2023 02:30:58 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3313

मधुबनी चित्रकला बिहार के मिथिला क्षेत्र की सर्वाधिक महत्वपूर्ण कला शैली है। मधुबनी वास्तव में मिथिला क्षेत्र में स्थित एक ऐसी नगरी है जिसने वहाँ की एक स्थानीय चित्रकला शैली को वैश्विक स्तर तक लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसी के फलस्वरूप आज यह चित्रकला सम्पूर्ण विश्व में मधुबनी चित्रकला के नाम से जानी […]

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मधुबनी चित्रकला बिहार के मिथिला क्षेत्र की सर्वाधिक महत्वपूर्ण कला शैली है। मधुबनी वास्तव में मिथिला क्षेत्र में स्थित एक ऐसी नगरी है जिसने वहाँ की एक स्थानीय चित्रकला शैली को वैश्विक स्तर तक लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसी के फलस्वरूप आज यह चित्रकला सम्पूर्ण विश्व में मधुबनी चित्रकला के नाम से जानी जाती है।

मिथिला का संक्षिप्त इतिहास

बिहार का मिथिला क्षेत्र मुख्यतः गंगा के उत्तरी घाटों एवं नेपाल स्थित हिमालय की तलहटी क्षेत्रों के मध्य स्थित है।

मिथिला का सर्वाधिक महत्वपूर्ण परिचय माता सीता के पीहर के रूप में दिया जाता है। मिथिला क्षेत्र को माता सीता का जन्म स्थान माना जाता है। इसी कारण उन्हें मैथिली के नाम से भी संबोधित किया जाता है। उनके पिता राजा जनक के राज्य का नाम जनकपुरी था जो वर्तमान में नेपाल का भाग है। जनकपुरी भारत-नेपाल सीमा से केवल कुछ ही किलोमीटर भीतर स्थित है।

सीता जन्म, राम सीता मिलन, राम जानकी विवाह - मधुबनी चित्रकला के विषय
सीता जन्म, राम सीता मिलन, राम जानकी विवाह – मधुबनी चित्रकला के विषय

सीता माता जिस स्थान पर शिशु रूप में प्रकट हुई थीं, वह स्थान सीतामढ़ी में है, परन्तु जिस क्षेत्र में भगवान राम से उनकी सर्वप्रथम भेंट हुई, तत्पश्चात उनसे विवाह संपन्न हुआ, वह क्षेत्र जनकपुरी में है। मिथिला चित्रों में राम-जानकी विवाह का दृश्य एक लोकप्रिय विषयवस्तु है।

मिथिला क्षेत्र की अन्य विशेषताएं हैं, यहाँ स्थित असंख्य जलाशय, उनमें तैरती विविध प्रकार की मछलियाँ जिन्हें यहाँ रूचिपूर्वक ग्रहण किया जाता है, मखाने जिनकी यहाँ प्रचुर मात्रा में खेती की जाती है, यहाँ की मधुर भाषा तथा यहाँ के आनंदमय निवासी। यह मुख्यतः एक कृषि प्रधान क्षेत्र है।

मिथिला एवं मधुबनी चित्रकला की अनमोल  धरोहर

मिथिला चित्रकला पारंपरिक रूप से एक भित्तिचित्र कलाशैली थी जो स्त्रियाँ अपने घरों की भित्तियों पर चित्रित करती थीं। वे अनुष्ठानिक चित्र हुआ करते थे जिन्हें बहुधा विवाहोत्सवों, प्रसवोत्सवों तथा अन्य पावन उत्सवों पर चित्रित किया जाता था।

मिथिला के सामान्य जन जीवन का चित्रण
मिथिला के सामान्य जन जीवन का चित्रण

मिथिला चित्रों को स्थायी रूप से चित्रित करने का उद्देश्य नहीं होता था। जब भी घर में कोई नवीन उत्सव अथवा अनुष्ठान होता था तब उन्हें पुनः नवीन रूप से चित्रित किया जाता था।

किसी भी अन्य लोककला के अनुसार मिथिला चित्रों में भी विविध कथानकों एवं प्रस्तुतीकरण शैलियों का समावेश किया जाता था। इस परंपरा से संयुक्त प्रत्येक समुदाय के स्वयं के विशेष रूपांकन आकृतियाँ एवं चिन्ह होते थे जिन्हें वे अपने चित्रों में चित्रित करते थे।

वर्तमान में मिथिला चित्रकला शैली का इस स्तर तक व्यवसायीकरण हो गया है कि अब सामुदायिक वैशिष्ठ्य लुप्त होने लगा है। अब स्थिति यह है कि कलाकारों की स्वयं की व्यक्तिगत चित्रण शैलियाँ अवश्य हैं किन्तु चित्रों के विषय, उपभोक्ता माँग द्वारा ही निर्धारित होते हैं।

मधुबनी चित्रों का आधुनिक रूप

मधुबनी चित्रों ने सर्वप्रथम मिथिला के बाहर के प्रेक्षकों का ध्यान अपनी ओर तब आकर्षित किया जब सन् १९३० में आये भूकंप के पश्चात भूकंप में हुए विनाश का सर्वेक्षण करने के लिए कुछ अंग्रेज सर्वेक्षकों ने इस क्षेत्र की यात्रा की थी। किन्तु मिथिला के इन मधुबनी चित्रों को मिथिला का प्रतीक बनने के लिए एक अन्य भूकंप के आने तक की प्रतीक्षा करनी पड़ी।

मधुबनी चित्रकला में आधुनिक विषय
मधुबनी चित्रकला में आधुनिक विषय

सन् १९६० में आये एक अन्य भूकंप के पश्चात सामाजिक कार्यकर्ता एवं लेखक पुपुल जयकर ने छायाचित्रकार भास्कर कुलकर्णी को मधुबनी क्षेत्र में हुए विनाश का सर्वेक्षण करने के लिए वहाँ भेजा। उन्होंने विचार किया कि एक नवीन व्यवसाय के रूप में यदि इन भित्ति चित्रों को अन्य माध्यमों पर भी चित्रित किया जाए तो ये भूकंप से पीड़ित किसानों के लिए उनके दुष्काल में आजीविका का एक उत्तम स्त्रोत उत्पन्न कर सकते हैं।

तब से कलाकारों ने इन चित्रों को कागज जैसे अन्य माध्यमों पर चित्रित करना आरम्भ किया जिनकी वे आसानी से विक्री कर सकते थे। विश्व स्तर पर कई प्रदर्शनियों का आयोजन किया गया ताकि इस अप्रतिम कला शैली को विश्व भर में पहुँच प्राप्त हो सके। तात्कालिक विदेश मंत्री ललित नारायण मिश्र, जो इसी क्षेत्र के निवासी थे, उनके अथक प्रयास से इस कलाशैली को अंतर्राष्ट्रीय मंच उपलब्ध हुआ। Ethnic Arts Foundation जैसी संस्थाओं ने भी इस कार्य में अपना योगदान दिया।

अर्धनारीश्वर मिथिला चित्रण में
अर्धनारीश्वर मिथिला चित्रण में

शनैः शनैः मधुबनी चित्रों ने वैश्विक कला जगत में अपने लिए एक सुदृढ़ स्थान निर्मित कर लिया। अब सम्पूर्ण विश्व में भित्ति चित्रों पर मधुबनी चित्र का भी समावेश दृष्टिगोचर होता है। चूँकि अधिकाँश देशी-विदेशी कला प्रेमियों ने मधुबनी के माध्यम से ही इन चित्रों को जाना है, इसलिए इन्हें मधुबनी चित्रकला कहा जाता है। अन्यथा पारंपरिक रूप से देखें तो ये अनुष्ठानिक कला शैली थी जिसका प्रचलन सम्पूर्ण मिथिलांचल में था।

कदाचित उन्होंने स्वप्न में भी नहीं सोचा होगा कि एक दिवस सम्पूर्ण विश्व में मधुबनी चित्रकला उनकी सांकेतिक परिचय के रूप में प्रसिद्धी प्राप्त करेगी।

मधुबनी चित्रों के विविध प्रकार

मधुबनी चित्रों को दो आधारों पर विभाजित किया जा सकता है।

प्रथम आधार है, जाति अथवा समुदाय। प्रत्येक चित्रकार अपने समुदाय के ऐतिहासिक धरोहरों एवं सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने पर आधारित विषयवस्तुओं को अपने भित्तिचित्रों के माध्यम से साकार करता है। किन्तु उन सभी समुदायों अथवा जातियों की कलाशैली में एक तत्व सार्व है। वे चाहे ब्राह्मण हो, क्षत्रिय हों, कायस्थ हों अथवा पासवान हों, वे सभी एक ही कलाशैली में भित्ति चित्रण करते हैं। वह है, मधुबनी चित्रकला शैली।

कछनी और भरनी से अर्धनारीश्वर
कछनी और भरनी से अर्धनारीश्वर

चित्रों के विभाजन का दूसरा आधार है, चित्रकला शैली। इस आधार के तीन अवयव हैं।

कछनी शैली – इस शैली में कलाकार मुक्त हाथों से रेखाचित्र बनाते हैं।

भरनी – भरनी का अर्थ है भरना। रेखाचित्र के भीतर विविध रंगों को भरा जाता है।

मधुबनी चित्रों की रचना कछनी एवं भरनी इन दोनों के संगम से ही होती है। मधुबनी चित्रकला शैली में अधिकाँश दृश्य इन दो तकनीकों द्वारा ही साकार किये जाते हैं।

गोदना –  गोदना एक पारंपरिक कला है जो सम्पूर्ण भारत में लगभग सभी समुदायों में प्रचलित थी। इस कला में शरीर के विभिन्न अंगों पर पारंपरिक आकृतियाँ गुदवायी जाती थीं। चूँकि ये आकृतियाँ शरीर के उन भागों पर गुदवायी जाती थीं जो बहुधा ढंके हुए नहीं होते थे, जैसे हाथ, गला, मुख आदि, ये आकृतियाँ आकार में लघु होती हैं।

गोदना मधुबनी चित्रण
गोदना मधुबनी चित्रण

जब इन गुदना आकृतियों को कागज पर चित्रित करने का क्रम आरम्भ हुआ तब अनेक आकृतियों को संयुक्त कर एक चित्र बनाने की परंपरा आरम्भ हुई। गुदना आकृतियों से निर्मित चित्र अधिक ज्यामितीय होते हैं तथा अधिक भरे हुए प्रतीत होते हैं।

तांत्रिक चित्र – ये चित्र वे कलाकार चित्रित करते हैं जो उपासना के अंतर्गत तंत्र पथ के अनुयायी हैं। ये अधिकांशतः शक्ति के उपासक होते हैं। उनके चित्रों में सामान्यतः दश महाविद्या जैसे देव एवं उनके यंत्र होते हैं। कभी कभी वे केवल यंत्रों को ही चित्रित करते हैं।

साधना एवं उपासना में इन चित्रों का प्रयोग किया जाता है।

कोहबर – विवाहोत्सवों के लिए अनुष्ठानिक चित्र

ये विवाहोत्सव अनुष्ठानिक चित्र वर-वधु के कक्ष की भित्तियों पर चित्रित किये जाते हैं। यह परंपरा मिथिला के सभी समुदायों में प्रचलित है। इन चित्रों में विभिन्न प्रजनन एवं समृद्धि चिन्ह होते हैं। इन्हें सामान्यतः कक्ष की पूर्वी भित्ति पर चित्रित किया जाता है।

पद्मश्री गोदावरी दत्त जी का रचा कोहबर
पद्मश्री गोदावरी दत्त जी का रचा कोहबर

इन चित्रों के प्रमुख अवयव हैं:-

  • चित्र के मध्य में कमल का पुष्प होता है जिसकी पंखुड़ियां बाहर की ओर खुलती हैं।
  • वनस्पतियों एवं प्राणियों के चित्र जैसे बांस, मोर आदि।
  • शिव एवं पार्वती
  • विवाह सम्बन्धी अनुष्ठान जैसे वर-वधु द्वारा पूजा आदि।
  • विवाह उत्सव का दर्शन करते तथा वर-वधु को आशीष देते सूर्य, चन्द्र तथा अन्य ग्रह।

भिन्न भिन्न समुदायों एवं परिवारों में प्रचलित चित्रों की सूक्ष्मताओं में भिन्नता हो सकती है किन्तु व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो इन चित्रों का मुख्य उद्देश्य होता है, नव वर-वधु के लिए संरक्षण, सौभाग्य एवं आशीष की मांग करना।

पूर्व में कोहबर चित्रों को विवाह उत्सवों के उपलक्ष्य में भित्तियों पर नवीन रंगा जाता था। किन्तु अब अधिकतर लोग कागज में पूर्व में ही चित्रित चित्रों को क्रय कर लाते हैं तथा अपनी भित्तियों पर चिपकाते हैं। यहाँ तक कि दिग्गज चित्रकारों के घरों में भी हमने कागज पर चित्रित चित्र ही देखे।

व्यक्तिगत शैलियाँ

प्रत्येक कलाकार अथवा चित्रकार की एक व्यक्तिगत शैली होती है जिसमें आकृतियों एवं रंगों का उसका व्यक्तिगत चयन होता है। यद्यपि गंगा देवी जैसे ख्यातिप्राप्त कलाकारों की शैलियों का रीतिसर अभ्यास हुआ है एवं प्रलेखन हुआ है, तथापि प्रत्येक चित्रकार की अपनी विशिष्ट शैली होती है जिनका रीतिसर अभ्यास एवं प्रलेखन अभी शेष है।

मधुबनी चित्रों में प्रयुक्त रंग

आप सबने कभी ना कभी कहीं ना कहीं मधुबनी चित्र अवश्य देखे होंगे। यदि मैं आपसे आग्रह करूँ कि आप अपने नेत्र बंद कर लें ,  तथा यह बताएं कि उन चित्रों में कौन से रंगों का प्रयोग किया गया था, तो आप अवश्य यह कहेंगे कि आपने मुख्यतः काले रंगों की रेखाएं देखी हैं जिनके मध्य कुछ रंग भरे गए हैं। आपको गहरे पीले अथवा मटमैले श्वेत रंग की पृष्ठभूमि पर श्याम एवं लाल रंग में कलाकृतियाँ दृश्यमान होंगी।

चटकीले होली के रंगों में मधुबनी चित्र
चटकीले होली के रंगों में मधुबनी चित्र

कागज पर गाय के गोबर का लेप लगाकर धूप में सुखाया जाता है जिससे गहरे पीले रंग की पृष्ठभूमि तैयार होती है।

अधिकाँश भारतीय चित्रण परम्पराओं के अनुरूप मिथिला चित्रों में भी प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया जाता है जो प्राकृतिक स्त्रोतों द्वारा प्राप्त होते हैं, जैसे वनस्पति, पुष्प, पत्तियाँ, फल तथा कालिख जैसी अन्य गृह वस्तुएं। यद्यपि कुछ चित्रकार अब भी गेरु का प्रयोग करते हैं, तथापि अधिकाँश चित्रकारों का रुझान आसान, सुलभ एवं चिरस्थायी कृत्रिम रंगों के प्रयोग की ओर होने लगा है।

भारत एक ऐसा देश है जहाँ लोगों को विविध रंग अत्यंत प्रिय हैं, वह भी चटक उजले रंग। इसलिए पारंपरिक चित्रों में चटक उजले रंगों का प्रयोग किया जाता था, जैसे बैंगनी, उजला पीला, चटक हरा आदि।

श्वेत-श्याम मधुबनी चित्र

जैसे जैसे यह कला व्यावसायीकरण के चंगुल में फंसने लगी है, रंगों के चयन पर ग्राहकों का अधिपत्य बढ़ने लगा है। अब उपभोक्ताओं की मांग के अनुसार रंगों का चयन किया जा रहा है। सन् १९६० के पश्चात के दशकों से हमें इन चित्रों में श्वेत एवं श्याम रंगों की प्राधान्यता दृष्टिगोचर होने लगी है। इनके साथ कुछ सौम्य रंगों का प्रयोग किया जाता है। उन्हें देख यह अनुमान लगा सकते हैं कि इन रंगों का चयन पाश्चात्य देशों की मांग पर किया गया होगा क्योंकि वहाँ इन रंगों का प्रचलन अधिक है।

काली - बिहार संग्रहालय पटना में
काली – बिहार संग्रहालय पटना में

इन कलाकारों एवं वैश्विक बाजार के मध्य मध्यस्थता करने वाले बिचौलिये भी इन रंगों के चयन को प्रभावित करने लगे। यहाँ तक कि ये बिचौलिये विभिन्न समुदायों के कलाकारों से विशेष रंगों एवं आकृतियों का ही प्रयोग करने का आग्रह करने लगे हैं ताकि वे विभिन्न शैलियों को स्पष्ट रूप से परिभाषित कर सकें।

जहाँ तक लोक कला शैलियों का प्रश्न है, वे कभी किसी सीमा में नहीं बंधे हैं। वे किसी सीमा के भीतर विकसित नहीं हुए हैं। ना ही उन्हें कभी किसी सीमा में बांधकर रखा जा सका है। किन्तु कला क्षेत्र से सम्बंधित बाजार में इन कलाकृतियों की मांग को उत्पन्न करने के लिए उनकी शैलियों को सीमाबद्ध करना आवश्यक हो जाता है। गत कुछ दशकों से मिथिला चित्रकला का विकास इसी सीमाबद्ध शैली के अंतर्गत हो रहा है।

मिथिला में मधुबनी चित्रकारों के गाँवों का भ्रमण

हमारी मिथिला यात्रा के समय हमारी तीव्र अभिलाषा थी कि हमें कुछ ऐसे गाँवों के भ्रमण का अवसर प्राप्त हो जहाँ से ऐसी महिला कलाकारों का उदय हुआ हो जिन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

मिथिला के मधुबनी कलाकार
मिथिला के मधुबनी कलाकार

मैं ऐसे एक गाँव की कल्पना करने लगी जहाँ प्रत्येक गृह की भित्तियों पर मधुबनी चित्रकारी की गयी है। उस समय हम दरभंगा में ठहरे हुए थे। दरभंगा में तो मुझे कहीं भी ये चित्र दृष्टिगोचर नहीं हुए, अपवाद स्वरूप कुछ सरकारी संरचनाओं को छोड़कर। इन संरचनाओं पर पारंपरिक एवं आधुनिक दोनों दृश्यों को चित्रित किया गया था। मुझे कोई गाँव मेरी कल्पना के अनुरूप दिखाई नहीं दिया।

हमने मधुबनी नगरी का भ्रमण करने का निश्चय किया। मुझे यह जानकारी थी कि कम से कम मधुबनी रेल स्थानक की भित्तियों पर अत्यंत सूक्ष्मता एवं दक्षता से मधुबनी चित्रों का चित्रण किया गया है। मुझे अब भी महाराष्ट्र के रत्नागिरी रेल स्थानक का स्मरण है जहाँ की भित्तियों पर वारली चित्रों का प्रदर्शन किया गया है।

अंततः हमारे भाग्य ने हमारा साथ दिया जब हमारी भेंट इतिहासकार डॉ. नरेन्द्र नारायण सिंग ‘निराला’ जी से हुई जो मधुबनी चित्रकला शैली के विशेषज्ञ हैं। उन्होंने मिथिला चित्रों के आधुनिक स्वरूप का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने हमें बताया कि किस प्रकार Ethnic Arts Foundation जैसी संस्थाएं इसके विकास में अपना योगदान दे रही हैं।

निराला जी ने हमें ऐसी कई संस्थाओं के विषय में बताया जिनकी स्थापना विशेष रूप से इस कला शैली का प्रशिक्षण देने के लिए ही की गयी है। उन्होंने बताया कि यूँ तो मिथिला चित्र मिथिला में सर्वत्र दृष्टिगोचर होते हैं किन्तु बाह्य विश्व में जिन चित्रों की विक्री होती है वे मधुबनी चित्र के नाम से जाने जाते हैं।

निराला जी हमें विभिन्न ग्रामों में ले गए जहाँ हमारी भेंट भिन्न भिन्न चित्रकारों से हुई। हमने प्रत्येक गाँव की विशेष शैलियों को भी देखा व समझा। इसके पश्चात उन्होंने हमें कुछ पुरातन मिथिला चित्र भी दिखाए जो उनके व्यक्तिगत संग्रह थे।

जितवारपुर ग्राम

जितवारपुर ग्राम मुख्यतः मधुबनी चित्रों के लिए जाना जाता है।

हमने सर्वप्रथम कृष्ण कान्त झा जी से उनके निवासस्थान पर ही भेंट की। वे एक महापात्रा ब्राह्मण हैं। वे मुख्यतः रामायण एवं महाभारत जैसे महाकाव्यों के भव्य दृश्यों का चित्रण करते हैं। हम जब वहाँ गए थे तब वे हनुमान के चित्रों पर कार्य कर रहे थे। उन्होंने हमें उनको इन चित्रों को रंगते हुए देखने की अनुमति भी दे दी थी।

उन्होंने सर्वप्रथम अनेक सीधी रेखाओं द्वारा चित्र के सीमावर्ती भागों को रेखांकित किया। तत्पश्चात उन्होंने उन सीधी रेखाओं के मध्य भागों को त्रिकोणीय आकृतियों से भर कर चित्र की किनारी तैयार की। उन्हें देख कर यह बोध हुआ कि सभी मिथिला चित्रों की यही किनारी होती है।

इसके पश्चात उन्होंने रेखांकन करते हुए पर्वत धारी हनुमान जी की छवि को चित्रपटल पर उतारा। मुक्त हाथों से रेखांकन करते उनके हाथ स्वच्छंदता से चित्रपटल पर हनुमान जी की छवि को साकार कर रहे थे। काली स्याही में डूबी कूची के अतिरिक्त वे किसी भी अन्य चित्रकारी सामग्री का प्रयोग नहीं कर रहे थे।

श्याम रंग द्वारा रेखांकन समाप्त होते ही वे अथवा उनके परिवार के सदस्य उन में रंगों को भरने का कार्य करते हैं जिसके पश्चात वह चित्र पूर्ण होगा। अधिकाँश चित्र सम्पूर्ण परिवार के संयुक्त प्रयासों का फल होते हैं। मुख्य चित्रकार दृश्य अथवा छवि को रेखांकित करता है। इसके पश्चात परिवार के अन्य सदस्य उनमें रंग भरते हैं।

कृष्ण कान्त झा जी हमें अत्यंत निर्मल व निश्छल व्यक्ति प्रतीत हुए। यदि आप उनके निवास के सामने से जायेंगे तो आपको यह अनुभव ही नहीं होगा कि यह एक सफल व्यावसायिक कलाकार का घर है। वे अपने घर से ही अपने चित्रों की विक्री करते हैं। इसके अतिरिक्त वे विद्यार्थियों को इस कला शैली का प्रशिक्षण देने के लिए भिन्न भिन्न स्थलों का भ्रमण भी करते हैं। अनेक सार्वजनिक अथवा व्यक्तिगत स्थानों की भित्तियों पर मधुबनी चित्र बनाने के लिए उन्हें आमंत्रित भी किया जाता है।

शानू पासवान का गृह

कृष्ण कान्त झा जी से भेंट करने के पश्चात हमने एक गाँव के भीतर प्रवेश किया। हम पासवान समुदाय की चित्रकला शैली से अवगत होना चाहते थे। यहाँ अवश्य हमें कुछ घर ऐसे दिखे जिनकी भित्तियों पर मधुबनी चित्रकारी की हुई थी। शानू पासवान जी के निवास में हमने गोदना शैली में चित्रित अनेक चित्र देखे। शीला देवी जी से भी हमारी भेंट हुई जिनका बाह्य कक्ष चित्रों से भरा हुआ था। उनमें कुछ पर अब भी कार्य शेष था।

पासवान समुदाय की राहू पूजा
पासवान समुदाय की राहू पूजा

हमने पासवान समुदाय के स्थानीय अनुष्ठान सम्बन्धी चित्र भी देखे, जैसे राहु पूजा आदि। पासवान समुदाय के लोक देवता राजा सलहेस अथवा सल्हेश से संबंधित कथाओं पर आधारित चित्र भी देखे। इस समुदाय के मधुबनी चित्रों में बाघों की छवि का प्रयोग बहुलता से किया जाता है।

उन चित्रों को देख मुझे तेलंगाना के चेरियल चित्रों का स्मरण हो आया।

कृष्णानंद झा के तांत्रिक चित्र

चित्रकार कृष्णानंद झा के निवास तक पहुँचने के लिए हमें खेतों के मध्य से होकर जाना पड़ा। इन खेतों के अंतिम छोर पर उनका निवासस्थान था। वहाँ स्व. कृष्णानंद झा की पत्नी ने हमारा अतिथी सत्कार किया। उन्होंने हमें अपने पति द्वारा चित्रित सभी चित्रों के छायाचित्र दिखाए।

यंत्रों के साथ बनाये हाय तांत्रिक चित्र
यंत्रों के साथ बनाये हाय तांत्रिक चित्र

इसके पश्चात उन्होंने हमारे समक्ष चित्रों की एक गड्डी खोली। उनमें दश महाविद्या एवं भगवान विष्णु के दशावतारों पर चित्रित अनेक चित्र थे। ये सभी चित्र भिन्न भिन्न अनुष्ठानों से संबंधित थे जो ग्राहकों की विशेष मांग पर बनाए गए थे।

पद्मश्री गोदावरी दत्त

अंत में हम पद्मश्री गोदावरी दत्त जी से भेंट करने रांटी गाँव पहुँचे। उनके आगंतुक कक्ष की भित्ति पर जो कोहबर चित्र चित्रित था, वो मेरे देखे अब तक के सर्वाधिक सुन्दर कोहबर चित्रों में से एक था। ९० वर्ष को पार कर चुकी गोदावरी जी की सक्रियता अब ढलान पर थी। फिर भी उन्होंने प्रसन्नता से हमारा स्वागत किया एवं माता सुलभ प्रेम से हमारा अतिथि सत्कार किया।

उनकी पुत्रवधु अंजनी देवी जी ने हमें उनके निवासस्थान में प्रदर्शित सभी कोहबर चित्र दिखाए तथा उस शैली के विषय में जानकारी दी। वे कायस्थ समुदाय से संबंध रखती हैं। उनके चित्रों में श्वेत, श्याम एवं लाल रंगों की प्राधान्यता थी।

गोदावरी दत्त जी द्वारा चित्रित अनेक चित्रों को जापान के टोकामाची नगर में स्थित मिथिला संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया है। इस संग्रहालय के संग्रह को विकसित करने के लिए उन्होंने जापान की अनेक यात्राएं की हैं।

दरभंगा में मधुबनी साड़ी कलाकेन्द्र

दरभंगा में हमने राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त मधुबनी कलाकार आशा झा जी के कला केंद्र का अवलोकन किया। चित्रों के साथ साथ उन्हें साड़ियों एवं दुपट्टों पर मधुबनी चित्रण का भी वैशिष्ठ्य प्राप्त है।

उनकी पुत्री ने मुझे एक पाग एवं एक दुपट्टा भेंट स्वरूप प्रदान किया। अतिथियों को मधुबनी चित्रों द्वारा सज्जित ये उपहार वस्तुएं प्रदान करने की उनकी विशेष परंपरा है। मैथिलि ब्राह्मण ये पाग तथा दुपट्टे औपचारिक अवसरों व उत्सवों पर धारण करते हैं। आप यदि इन्हें अपने सर पर धारण कर लें तो आप अपना सर अधिक हिला-डुला नहीं सकते।

आशा झा के कला केंद्र में निर्मित विशेष साड़ियों की अत्यधिक मांग है। उन साड़ियों पर उनके द्वारा चित्रित मधुबनी चित्र भी विशेष रूप से आग्रहीत होते हैं। इनके विषय में अधिक जानकारी के लिए आशा झा की मधुबनी पेंट्स इस वेबस्थल पर जाएँ अथवा उनके IG हैंडल से संपर्क करें।

मधुबनी यात्रा के लिए कुछ आवश्यक सुझाव

मधुबनी देश के अन्य भागों से रेल मार्ग तथा सड़क मार्ग द्वारा सुगमता से जुड़ा हुआ है। निकटतम नगर तथा हवाई अड्डा दरभंगा है।

जितवारपुर का मुख्य परिचय है, मधुबनी कलाकारों का ग्राम।

स्वयं अपने बलबूते पर इन गाँवों तक पहुँचना आसान नहीं है। इन गाँवों तक आपको पहुँचाने के लिए किसी भी प्रकार के यात्रा नियोजक उपलब्ध नहीं है। इसके लिए सर्वोत्तम साधन है कि आप किसी स्थानीय व्यक्ति से संपर्क करें जो आपको इन कलाकारों से भेंट करवा सके।

यदि किसी चित्रकार से भेंट करने में आपकी रूचि नहीं है, आप केवल मधुबनी चित्रों को क्रय करना चाहते हैं तो दिल्ली का ‘दिल्ली हाट’ आपके लिए सर्वोत्तम गंतव्य होगा। मिथिला के अधिकाँश चित्रकार अपनी रचनाएँ नियमित रूप से उस हाट में प्रदर्शित करते हैं।

इन में से कई चित्रकार अपने चित्र ऑनलाइन भी विक्री करते हैं। इसके लिए अमेज़न सर्वोत्तम साधन है।

उपेन्द्र महारथी शिल्प अनुसन्धान केंद्र पटना
उपेन्द्र महारथी शिल्प अनुसन्धान केंद्र पटना

मधुबनी चित्रकला शैली में प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए पटना के उपेन्द्र महारथी शिल्प अनुसंधान संस्थान से संपर्क करें जो मधुबनी चित्रकला में निशुल्क पाठ्यक्रम संचालित करते हैं।

मधुबनी चित्रकला अवलोकन एवं मिथिला के गाँवों का भ्रमण करने के लिए आप दरभंगा में ठहर सकते हैं जहाँ सुलभ विश्रामगृह उपलब्ध हैं।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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कावड़ राजस्थान की गाथायें कहता रंगीन पिटारा https://inditales.com/hindi/kavad-katha-vaachan-rajasthan/ https://inditales.com/hindi/kavad-katha-vaachan-rajasthan/#comments Wed, 10 Apr 2019 02:30:02 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1268

कावड़ लोक कला से मेरा प्रथम सामना नई दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में आयोजित दस्तकार मेले में हुआ था। चटक पीले, लाल व हरे रंग में रंगे इन रंगबिरंगे लकड़ी के बक्सों ने सहसा मेरा सम्पूर्ण ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया था। कावड़ लोक कला का यह जीता जागता उदाहरण देख […]

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कावड़ लोक कला से मेरा प्रथम सामना नई दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में आयोजित दस्तकार मेले में हुआ था। चटक पीले, लाल व हरे रंग में रंगे इन रंगबिरंगे लकड़ी के बक्सों ने सहसा मेरा सम्पूर्ण ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया था। कावड़ लोक कला का यह जीता जागता उदाहरण देख मेरा रोम रोम प्रफुल्लित हो उठा था। मेरे इस आनंद को स्थायी बनाने, हाथों में कैमरा उठाये मैं मेले की उस कुटीर की ओर दौड़ पड़ी।

कावड़ कथा वाचन - राजस्थान
कावड़ कथा वाचन – राजस्थान

वहां उपस्थित कलाकार ने मुझे बताया कि यह पौराणिक कथा प्रस्तुति की एक अनोखी शैली है। कावड़ उस जादुई पिटारे के समान है जो अपनी परतों में अनेक रहस्यों को संजोये रखता है। यहाँ यह पिटारा एक छोटा सा सघन बक्सा है जिसमें अनेक परतों में किवाड़ खुलते हैं तथा मनोरंजक ढंग के कहानियां दर्शकों के सम्मुख प्रस्तुत होते हैं। ये सभी किवाड़ क्रमवार विशेष युक्ति से ही खुलते हैं। जब मैंने एक बक्से के किवाड़ खोलने का प्रयत्न किया, मैं बीच में ही उलझ कर रह गयी। मेरी उलझन देख कारीगर का मुख मंदहास से खिल उठा। मेरे उत्साह को जीवित रखते हुए उसने मुझे बताया कि किंचित अभ्यास के पश्चात इसे क्रमवार खोलना अत्यंत आसान हो जाता है।

ये कावड़ क्या है?

कावड़, अर्थात् लकड़ी का वह रंगीन बक्सा रुपी खिलौना जो स्वतः में अनेक कथाएं समेटे हुए है, वास्तव में एक तीर्थ है। अधिकतर कथाएं महाकाव्य रामायण तथा महाभारत से सम्बन्ध रखती हैं। तथापि कुछ अवसरों पर इनमें स्थानीय लोक कथाओं, जैसे संतों तथा महापुरुषों के जीवन का भी चित्रण आप देख सकते हैं। इन्हें आप चलता फिरता देवस्थान भी कह सकते हैं। जहां तक कावड़ की जन्मस्थली मेवाड़ की चर्चा करें, वहां इसका मुख्यतः उपयोग वंशावलियों समेत पारिवारिक गाथाओं को दर्शाने में किया जाता है।

आईये, देखते हैं कावड़ की बनावट कैसी है। अगर इसे ध्यान से देखें तो आपको लकड़ी के कई कब्जेदार किवाड़ दिखाई देंगे जिन पर विभिन्न कथाएं कहते चित्र दृष्टिगोचर होंगे। प्रथम फलक पर अधिकतर, कथानक के संरक्षक चित्रित किये जाते हैं। उदाहरणतः मैंने जिस कथा का ध्यानपूर्वक निरिक्षण किया, उस के मुख्य फलक पर जय तथा विजय चित्रित किये गए थे। कथाकार क्रमशः प्रत्येक किवाड़ खोलते हुए वहां चित्रित कथा का वाचन करता है। एक एक कर जब सब किवाड़ खुल जाएँ तब इस देवस्थान रुपी कावड़ का गर्भगृह प्रकट होता है जहां इस देवस्थान के पीठासीन देव चित्रित होते हैं। यह बाह्य जगत से भीतरी जगत की ओर दृश्य-श्रव्य यात्रा के सामान है। ठीक उसी प्रकार जैसे आप एक वास्तविक मंदिर के भीतर प्रवेश करते हुए उसके गर्भगृह तक पहुंचते हैं। तो हुआ ना कावड़ भी एक देवस्थान!

कावड़ कलाकारों का समुदाय

कावड़ परंपरा से तीन मुख्य समुदाय जुड़े हुए हैं। सुतार समुदाय लकड़ी के रंगबिरंगे मञ्जूषा रुपी कावड़ निर्मित करते हैं तो कावड़िया भट समुदाय इसका उपयोग पौराणिक कथाएं बाँचने में करते हैं। तीसरा समुदाय, यजमान अर्थात ग्राहक हैं जो इन कथाओं का श्रवण करता है।

मुझे बताया गया कि कथा बाँचने की यह प्रथा लगभग ४०० वर्ष प्राचीन है। हालांकि मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि यह प्रथा इससे भी प्राचीन हो सकती है। हाँ, इसका प्रलेखन ४०० वर्षों पूर्व किया गया होगा।

सुतार समुदाय

मेरे अनुमान से केवल सुतार समुदाय ही एकमात्र ऐसा समुदाय है जो कावड़ निर्माण में लिप्त है। बढ़ई समाज के ये कारीगर अधिकतर राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में, चित्तौड़-कोटा मार्ग पर स्थित बस्सी गाँव के निवासी हैं। ऐसा माना जाता है कि १६वीं. सदी में देवगड़ के राजकुमार जयमल इन कारीगरों को राजस्थान के शेखावती क्षेत्र के नागौर शहर से लाये थे। सुतार समुदाय के कारीगरों को बसयती भी कहा जाता है। कदाचित बस्सी ग्राम के निवासी होने के कारण उन्हें ऐसा कहा जाता होगा। यद्यपि वे स्वयं को देवलोक के वास्तुशिल्पकार विश्वकर्मा के वंशज मानते हैं। वही विश्वकर्मा जिन्होंने ना केवल ब्रम्हांड की रचना की, अपितु श्री कृष्ण की स्वर्ण नगरी द्वारका का भी निर्माण किया था।

आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि सुतार कावड़ बनाने में नीम वृक्ष की लकड़ी का उपयोग करते हैं। इसे बनाने में मूलतः लाल रंग का उपयोग किया जाता था। ग्राहकों के आग्रह पर अब अन्य रंगों का भी प्रयोग किया जा रहा है।

कावड़िया भट

जहां एक ओर सुतार पौराणिक कथाओं को इन कावड़ों पर सजीव करते हैं, वहीं दूसरी ओर कावड़िया भट इन कावड़ रुपी देवस्थान को यजमानों अथवा ग्राहकों के घर ले जाते हैं। यजमानों को कथाएं सुनाकर दक्षिणा ग्रहण करते हैं। इसे कावड़ बाँचना कहते हैं। यही उनकी जीविका का इकलौता साधन भी है। वैसे तो श्रद्धालु स्वयं मंदिर जाकर भगवान् के दर्शन करते हैं, किन्तु यहाँ विपरीत प्रथा है। यहाँ देव कावड़ रुपी मंदिर में समाकर भक्तों के घर जाकर उन्हें दर्शन देते हैं। है ना अनोखी प्रथा!

कावड़ कलाकार दिल्ली में
कावड़ कलाकार दिल्ली में

कावड़ का एक और महत्वपूर्ण उपयोग है पारिवारिक इतिहास संरक्षण। कावड़िया भट वास्तव में पारंपरिक वंशावली विशेषज्ञ होते हैं जो कथा बाँचने के साथ साथ वंशावली अध्ययन का भी कार्य करते हैं। कावड़ के रंगबिरंगे किवाड़ों पर यजमान के पारिवारिक इतिहास को विस्तारपूर्वक दर्शाया जाता है। उनके पूर्वजों की गाथाएँ बांच बांच कर कावड़िया भट अपनी जीविका चलाते हैं। आपको यह जानकर अचरज होगा कि यह परिवार, कावड़िया भट को पीढी दर पीढी विरासत में प्राप्त होते हैं।

अतः कावड़ एक अप्रतिम प्रथा है, जो वैयक्तिक इतिहास को संजोकर रखने के साथ साथ किसी की जीविका का साधन भी बनती है। मैं जब इन कावड़ों के सम्बन्ध में जानकारी इकठ्ठा कर रही थी, तब मैंने जाना कि हमारे पूर्वजों के पास ग्रामीण स्तर पर इतनी त्रुटिहीन अभिलेखन प्रणाली थी। गाँव के एक एक परिवार की वंशावली संजोकर रखी जाती थी। कालान्तर में ना जाने कब, कहाँ और कैसे हमने इस महत्वपूर्ण प्रथा को खो दिया।

कावड़िया भट समुदाय ने इस कथा वाचन प्रथा को विस्तृत प्रसिद्धी दिलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। वे गाँव गाँव भ्रमण करते हैं तथा दर्शकों को कावड़ रुपी देवस्थान के दर्शन कराते हुए उन्हें सम्बंधित पौराणिक कथाएं सुनाते हैं। इसका लाभ उन्हें भी प्राप्त होता है। जब जब वे किवाड़ खोलते हैं, उस किवाड़ पर भक्तों से दान दक्षिणा की आशा रखते हैं। कुछ बुद्धिमान कथा वाचक भक्तों को कथा में पूर्णतः लिप्त कर ऐसे क्षण पर अल्पविराम लेते हैं जहां भक्तों की जिज्ञासा चरम सीमा पर आ जाती है। भावनावश भक्त भरपूर उदारता से दान दक्षिणा करते हैं।

मेरे अनुमान से इस मञ्जूषा का नाम कावड़ उन किवाड़ों के कारण पड़ा जिन्हें क्रमशः खोलते हुए कावड़िया भट कथा बांचते हैं। किवाड़ अर्थात् द्वार। अंततः कावड़ उन किवाड़ों का समूह है जो अपने में सम्पूर्ण कथा समेटे हुए है। कुछ लोग इस का अर्थ काँधे पर उठाने को भी मानते हैं। स्मरण कीजिये उन कांवड़ियों को जो गंगाजल को काँधे पर उठाकर गाँव के मंदिर तक पहुंचाते हैं। आशा है हमारी युवा पीढ़ी इन कलाओ के नए नए उपयोग ढूंढती रहेगी।

वर्तमान में कावड़ का महत्त्व

जब कावड़िया भट मुझे एक कावड़ कथा सुना रहे थे, मैंने उनका एक लघु चलचित्र निर्मित किया था। वही विडियो उपरोक्त आपके लिए भी प्रस्तुत है। कथा पूर्ण करने के पश्चात भटजी ने मुझे बताया कि वर्तमान में इन कावड़ों को शिक्षा सम्बन्धी प्रयोजनों हेतु भी निर्मित किया जाता है। उदाहरणतः बालवर्ग के शिशुओं को अक्षर ज्ञान प्रदान करने के लिए वे कावड़ बनाते हैं जिन पर रंगबिरंगे अक्षर तथा उनसे सम्बंधित वस्तुएं चित्रित किये जाते हैं। प्राचीन कलाओं को नवीन रूप में प्रस्तुत करने ही यह कलाएँ जीवित और उपयोगी रह सकती हैं।

कुछ सूक्ष्म आकार के कावड़ आप ऑनलाइन भी मंगवा सकते हैं।

बैंगलोर मिरर में प्रकाशित एक लेख द्वारा मुझे ज्ञात हुआ कि नवीन युग के कुछ कथा लेखक अपनी कथा प्रस्तुति के लिए स्वयं के कावड़ों की अभिकल्पना रच रहे हैं। संत कबीर के दोहे प्रस्तुत करने हेतु निर्मित कावड़ एक अद्भुत रचना थी।

मैं ह्रदय से उन सबका धन्यवाद करना चाहती हूँ जिनके कारण राजस्थान में यह कावड़ निर्मिती व बाँचने की प्रथा अब भी जीवित है। समयानुसार नवीन तथा ज्वलंत विषयों पर भी कावड़ निर्मिती की जा रही है जो आधुनिक समाज के दर्शकों हेतु अति उपयुक्त सिद्ध हो रही हैं।

सन्दर्भ – भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई (IITB) द्वारा प्रकाशित लेख

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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नयी दिल्ली का राष्ट्रीय संग्रहालय- १० मुख्य आकर्षण https://inditales.com/hindi/must-see-national-museum-new-delhi/ https://inditales.com/hindi/must-see-national-museum-new-delhi/#comments Wed, 06 Sep 2017 02:30:23 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=431

नयी दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय का मेरी जिंदगी में एक महत्वपूर्ण स्थान है। यही वह स्थान है जहां से मुझे कला इतिहास व प्राचीन भारतीय कलात्मक क्रियाकलापों के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त हुई थी। वास्तव में यह कला को जानने व सराहने वालों के लिए एक विशाल कलाकृति भण्डार है। इस संग्रहालय के गलियारों से […]

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राष्ट्रीय संग्रहालय - नई दिल्ली नयी दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय का मेरी जिंदगी में एक महत्वपूर्ण स्थान है। यही वह स्थान है जहां से मुझे कला इतिहास व प्राचीन भारतीय कलात्मक क्रियाकलापों के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त हुई थी। वास्तव में यह कला को जानने व सराहने वालों के लिए एक विशाल कलाकृति भण्डार है। इस संग्रहालय के गलियारों से गुजरते, इन संग्रहों को निहारते ऐसा प्रतीत होता है मानो कोई बहुमूल्य खजाना हाथ लग गया हो। अपने गुड़गाव निवास के दौरान मैं अक्सर इस संग्रहालय में आती थी। यहाँ स्थित पुस्तकालय के पुस्तकों का अध्ययन करने में मेरी बेहद रूचि हुआ करती थी। इन्ही यादों को इतने वर्षों के बाद फिर ताज़ा करने हेतु मैंने एक पूरा दिन इस संग्रहालय में बिताया। समय के अभाव के रहते कुछ और दिन इस संग्रहालय का आनंद उठाने की अपनी इच्छा को बड़ी कठिनाई से दबाया।

दिल्ली राष्ट्रीय संग्रहालय के १० बेहतरीन आकर्षण

अपने इस संस्मरण में मैं आपको दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में १० बेहद ख़ास आकर्षण के बारे में बताना चाहूंगी जिन्हें आप अपने संग्रहालय भ्रमण के दौरान अवश्य देखें। आशा करती हूँ कि मेरे इस संस्मरण को पढ़ने के उपरांत आप जरूर इस संग्रहालय के अवलोकन का निश्चय करंगे।

राष्ट्रीय संग्रहालय की इमारत नयी दिल्ली के मास्टर प्लान का एक हिस्सा थी जिसका निर्माण ख़ास तौर पर संग्रहालय की स्थापना हेतु ही किया गया था।

१) हड़प्पा की नृत्यांगना

सिन्धु घटी की नृत्यांगना एवं मुद्राएँ
सिन्धु घटी की नृत्यांगना एवं मुद्राएँ

आप सब ने सिन्धु घाटी सभ्यता के बारे में विद्यालय के पुस्तकों में अवश्य पढ़ा होगा। हड़प्पा की इस प्रसिद्ध नृत्यांगना के बारे में भी आप सब जानते होंगे। इस नृत्यांगना की मूर्ति को आप दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में प्रत्यक्ष निहार सकते हैं। छोटे से आसन पर खड़ी यह मूर्ति अपेक्षा से विपरीत, बेहद छोटी है। सिर्फ ४ इंच की इस छोटी सी मूर्ति के नैन-नक्श व हाव-भाव निहारने हेतु थोड़ा झुकने की आवश्यकता है। तभी आप देख सकतें हैं कि कैसे इस नृत्यांगना ने अपना चूड़ियों से भरा हाथ अपनी कमर पर रखा हुआ है और बालों को जूड़े के आकार में बांध कर कैसे आत्मसम्मान से अपना सर उठाया हुआ है।

हड़प्पा की इस नृत्यांगना की मूर्ति को मोम ढलाई पद्धति द्वारा पीतल धातु में बनाया गया है। मोहनजोदाड़ो में खुदाई के दौरान पाई गयी इस प्रकार की दो मूर्तियों में दूसरी मूर्ति पाकिस्तान के करांची संग्रहालय में रखी गयी है।

सिन्धु घाटी सभ्यता को समर्पित इस गलियारे में आप कई हड़प्पा मुद्राएँ देखेंगे। यह मुद्राएँ भी अपेक्षा से विपरीत, बेहद छोटी हैं। इन पर जानवर व लिपियां खुदी हुई हैं। इस गलियारे में आप मिट्टी के खिलौने, समाधि पत्थर, मिट्टी के बर्तन इत्यादि भी देख सकते हैं। हरियाणा के राखीगड़ी में स्थित सिंधुघाटी सभ्यता की खुदाई के दौरान प्राप्त एक महिला का कंकाल भी यहाँ रखा हुआ है।

२) चोल कांस्य में निर्मित नटराज की मूर्ति

चोल कांस्य में नटराज प्रतिमा
चोल कांस्य में नटराज प्रतिमा

चोलवंशी तमिलनाडु के तंजावुर के निवासी थे जिन्होंने ९ वीं. से १३ वीं. शताब्दी तक दक्षिण भारत, श्री लंका, मालदीव व जावा के कुछ हिस्सों पर राज किया था। काव्य, नाटक, संगीत, नृत्य व शिलाशिल्प के अतिरिक्त कांसे की बनी मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध थे। चोल कांस्य में बनी कुछ बेहतरीन वस्तुएं चेन्नई के एग्मोर संग्रहालय व तंजावुर के मराठा महल में देखीं जा सकतीं हैं। दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में भी चोल कांसे में बनी कलाकृतियों का अद्भुत संग्रह है। इनमें मुख्य है प्रसिद्ध नटराज की मूर्ति। यदि समय का अभाव हो तो कांस्य गलियारे में स्थित इस नटराज की मूर्ति के दर्शन पर्याप्त आनंद प्रदान करने में सक्षम है।

हालांकि कांस्य गलियारे में देश के कोने कोने से हर काल की मूर्तियाँ रखीं हुईं हैं। जैसे हिमाचल से पंचमुखी शिवलिंग और स्वच्छंद भैरवी, दक्षिण भारत से कृष्ण द्वारा कालिया नाग मर्दन और कई देवियों की मूर्तियाँ, उत्तर भारत से गरुड़ पर विराजमान विष्णु-लक्ष्मी और सूर्य की मूर्तियाँ।

और पढ़ें – चोल कांस्य

३) बुद्ध के अस्थि अवशेष

बुद्ध के अस्थि अवशेष - राष्ट्रीय संग्रहालय - नई दिल्ली
बुद्ध के अस्थि अवशेष – राष्ट्रीय संग्रहालय – नई दिल्ली

जब भगवान् बुद्ध का शरीर अग्नि द्वारा भस्म में परिणित किया गया था, तब उनकी अस्थियों को ८ बराबर हिस्सों में बांटा गया था। इन्हें ८ स्तूपों का निर्माण कर उन में रखा गया था। कहा जाता है कि सम्राट अशोक ने इनमें से ७ स्तूपों के अस्थियों को ८४००० स्तूपों में बांट दिया था। इकलौता अछूता स्तूप नेपाल के लुम्बिनी के समीप रामनगर में स्थित है। बाद में इनमें से कुछ स्तूपों की खुदाई के पश्चात इन अस्थि अवशेषों का और विभाजन हुआ। दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में भी थाई स्वर्ण संदूक में भगवान् बुद्ध के अस्थि अवशेष रखे हुए हैं।

आप इस अस्थि स्मृति-चिन्ह को श्रद्धा नमन अर्पित कर सकतें हैं परन्तु पुष्प इत्यादि का अर्पण वर्जित है। इस बुद्ध कक्ष में पत्थर व धातु में बनी बुद्ध की कई प्रतिमाएं प्रदर्शित की गयी हैं।

४) दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय के लघुचित्र

कशी के मंदिरों का लघु चित्र
कशी के मंदिरों का लघु चित्र

दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में सम्पूर्ण भारत के लघुचित्रों का सर्वाधिक और कह सकते हैं की सर्वश्रेठ संग्रह है। एक विशाल गलियारे में असंख्य चित्रकारियाँ रखीं हुईं हैं हालांकि यह चित्रकारियाँ किसी शैली या बनावट के अंतर्गत संगठित व सुव्यवस्थित नहीं रखी गयी हैं, फिर भी एक एक लघुचित्र अपने आप में अति उत्कृष्ट रचना है।

एक मसौदे के रूप में लिपटा रखा वाराणसी शहर का नक्शा, कुछ सूक्ष्म चित्रकारों द्वारा बनाए गए आत्मचित्र, सूक्ष्म चित्रीकरण में उपयोगी उपकरण व विधियां, जटिल गणितीय समीकरण की तरह दिखतीं जैन मंडल इत्यादि प्रमुख आकर्षण हैं।

रामायण का दृश्य - लघु चित्र दीर्घा - राष्ट्रीय संग्रहालय - नई दिल्ली
रामायण का दृश्य – लघु चित्र दीर्घा – राष्ट्रीय संग्रहालय – नई दिल्ली

सूक्ष्म चित्रों की कला का आनंद उठाने व उसे सराहने हेतु, दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय का यह लघुचित्र गलियारा सर्वोत्तम स्थान है। यहाँ अलग अलग घराने व पद्धत की शैलियाँ प्रदर्शित हैं। मुग़ल, राजस्थानी, पहाड़ी और दख्खनी लघु चित्र मुख्य आकर्षण है। हालांकि यह लघुचित्र मुख्यतः धार्मिक कथाओं और राजसी दृश्यों पर आधारित है, कहीं कहीं आम आदमी के जीवन पर बने लघुचित्र भी दिखाई पड़ते हैं। एक छोटे से स्थान पर इतना कुछ दर्शाना यह इस कला की ख़ास विशेषता है। उदाहरणतः यहाँ प्रदर्शित एक लघुचित्र में कमल की पंखुड़ियों पर बनाए सिक्खों के १० गुरु।

सलाह: संग्रहालय में एक विक्रय केंद्र है जहां से आप बारामासा या रामायण जैसे विषयों पर बनाए गए लघुचित्र श्रंखला की प्रतिकृतियाँ खरीद सकतें हैं।

५) बहुमूल्य भारतीय जवाहरातों का अलंकार संग्रह

अलंकार - राष्ट्रीय संग्रहालय का आभूषण संग्रह
अलंकार – राष्ट्रीय संग्रहालय का आभूषण संग्रह

इस संग्रहालय के अलंकार जवाहरात संग्रह में रखे करीब २५० बेहद खूबसूरत जेवर आपको मंत्रमुग्ध करने में सक्षम हैं। इस अतिसुरक्षित कक्ष के बीचोंबीच, इस खजाने की सुरक्षा में रत, यक्ष की प्रतिमा रखी है। स्वर्ण व बहुमूल्य रत्नों में गढ़ी सूक्ष्म कलाकारी युक्त जवाहरातों का बेहतरीन प्रदर्शन यहाँ देखने को मिलता है।

यहाँ मेरा पसंदीदा जेवर है एक हार जिस पर कई लघुचित्र बनाए गए हैं। स्वर्ण व उत्कृष्ट कला का अद्वितीय नमूना है यह हार।

बहुमूल्य जेवर - राष्ट्रीय संग्रहालय - नई दिल्ली
बहुमूल्य जेवर – राष्ट्रीय संग्रहालय – नई दिल्ली

इस संग्रह में मंदिर के देवी देवताओं हेतु बनाए गए जेवरों का भी समावेश है। साथ ही राज परिवारों द्वारा पहने गए जवाहरात भी यहाँ रखे हुए हैं। इन जवाहरातों का दर्शन ह्रदय में कई मीठी इच्छाएं जागृत कर देतीं हैं, खासकर महिलाओं के लिए।

संग्रहालय के वेबसाइट पर भी इन्हें देखा जा सकता है।

६) गंजीफा ताश के पत्ते

गंजीफा
गंजीफा

गंजीफा के पत्ते वर्तमान में प्रचलित ताश के पत्तों का मूल रूप हैं। प्राचीन काल में इन्हें हाथों से बना कर रंगा जाता था। इन पर धार्मिक कथाओं से सम्बंधित चित्रकारी की जाती थी। भगवान् विष्णु के दशावतार इनमें प्रमुख है।

दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में इन गंजीफा ताश के पत्तों को सजावटी कला गलियारा व लघुचित्र गलियारा, दोनों में देख सकतें हैं। इनके अलावा यहाँ अन्य पटियों के खेल, जैसे शतरंज, सांप-सीड़ी इत्यादि, के भी प्राचीन रूप प्रदर्शित किये हुए हैं।

मेरी दिली इच्छा है कि इन खेलों को हमारे आने वाली पीढ़ियों के लिए पुनर्जीवित किया जाय।

आप इस चलचित्र में बिश्नुपुर के श्री फौजदार को गंजीफा ताश खेलने की विधि बताते देख सकतें हैं।

७) हाथीदांत की कलाकृतियाँ

हाथीदांत की कलाकृतियाँ
हाथीदांत की कलाकृतियाँ

दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में हाथीदांत से बने भिन्न भिन्न ख़ूबसूरत कलाकृतियाँ रखीं हुईं हैं। भगवान् की दया से इन कलाकृतियों का अपार संग्रह इस संग्रहालय में उपलब्ध है। इन्हें देखकर ही संतुष्ट होने व इन्हें सहेजकर रखने की आवश्यकता है, क्योंकि हाथीदांत का व्यापार अब प्रतिबंधित है। इस कारण अब यह कला लुप्त हो चुकी है। संग्रहालय के सजावटी कला गलियारे में हाथीदांत से बने सूक्ष्म से लेकर विशाल आकार की कलाकृतियाँ रखीं हुईं हैं। यूँ तो हर एक कलाकृति बेहद खूबसूरती से बनी हुई है, इनमें मेरी पसंदीदा कलाकृतियाँ है-

• हाथीदांत में बनी भगवान् विष्णु के दशावतारों की गढ़ी व रंगी सुन्दर प्रतिकृतियाँ
• हाथीदांत की नक्काशीदार डिबिया
• नक्काशीदार हाथीदांत द्वारा बनाया गया मंदिर

एक एक कलाकृति बेहद नाजुक व महीन प्रतीत होती है मानो हाथ लगाने पर टूट जायेगी। परन्तु इतने वर्षों से इसे सहेज कर रखा गया है। इनमें से आपको कौन सी कलाकृति पसंद आई मैं जरूर जानना चाहूंगी।

८) तंजावुर की चित्रकारी

शिव-पारवती एवं राम-सीता विवाह - तंजावुर कला शैली
शिव-पारवती एवं राम-सीता विवाह – तंजावुर कला शैली

यह अपेक्षाकृत छोटा व बेहद खूबसूरत गलियारा है। दक्षिण भारत के तंजावुर व मैसूर की भव्य रंगीन चित्रकारियाँ हर तरफ रंग बिखेरतीं प्रतीत होतीं हैं। इन चित्रों में भगवान् शिव का नटराज रूप व कृष्ण भगवान् का माखनचोर बाल रूप मुख्य विषय हैं। इनमें मेरी पसंदीदा चित्रकारी प्राचीन भारतीय साहित्य में प्रसिद्ध व भव्य दो विवाह दृश्य हैं, शिव-पार्वती विवाह और राम-सीता विवाह। इन दोनों विवाह दृश्यों पर चित्रित चित्रकारी मैंने अब तक कहीं और नहीं देखी।

नटराज रूप में शिवलीला का चित्र भी मेरा पसंदीदा चित्र है। मुझे यहाँ विठोबा, पंचमुखी हनुमान जैसे अनोखे चित्रों को भी देखने का सुअवसर प्राप्त हुआ।

९) भारतीय लिपियों की कथा

भारतीय लिपि कथा
भारतीय लिपि कथा

हमने कई बार पढ़ा व अपने बड़ों से सुना कि वर्तमान काल में प्रचलित लिपियों का मूल प्राचीन स्वरुप एक ही है। दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में लिपि की इसी यात्रा को दर्शाती एक विशाल तालिका रखी हुई है जिस पर प्राचीन लिपि को कई काल व कई पीढ़ियों में रूप को बदलते देख व समझ सकतें हैं। यह अनोखा परिवर्तन आपको अचंभित कर देगा।

१०) लकड़ी का नक्काशीदार द्वार

लकड़ी का नक्काशीदार द्वार
लकड़ी का नक्काशीदार द्वार

संग्राहलय के मूर्तिकक्ष में रखे गए पाषाणी मूर्तियों के बीच आप की नजर एक अनोखे लकड़ी के दरवाजे पर अवश्य पड़ेगी। नक्काशीदार लकड़ी के खणों से बना यह द्वार कई कहानियां कहता है। इस दरवाजे का निचला हिस्सा अतिउपयोग और इतने ऋतुओं को सहने के कारण घिस गया है। जैसा कि यहाँ बताया गया है, यह दरवाजा १४ वीं. शताब्दी में उत्तरप्रदेश के कटारमल में बनाया गया है।

दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में देश के कोने कोने से, हर युग में बनीं वस्तुओं का अपार संग्रह है। इसके मुख्य प्रवेशद्वार से अन्दर जाते से ही आपको इनके दर्शन प्रारम्भ हो जायेंगे। आशा है कि मेरा यह संस्मरण आपके दर्शन आनंद पर खरा उतरेगा। यदि आप चाहें तो मैं एक पूरा संस्मरण यहाँ प्रदर्शित पाषाणी मूर्तिकला पर लिख सकती हूँ।

दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय के दर्शन हेतु सलाह

शिव-लीला
शिव-लीला

• सोमवार व सभी सार्वजनिक अवकाशों को छोड़कर दिल्ली का राष्ट्रीय संग्रहालय हर दिन प्रातः १० बजे से सांझ ५ बजे तक खुला रहता है।
• पर्यटकों की सुविधा के लिए श्रव्य परिदार्शिका उपलब्ध है।
• कुछ नियत समयों पर इस संग्रहालय का निर्धारित व निर्देशित दौरा भी उपलब्ध है। आप सही समय की जानकारी टिकट खिड़की से प्राप्त कर सकतें हैं।
• इस संग्रहालय में फोटो खींचना वर्जित नहीं है और कैमरे के अलग से शुल्क भी नहीं है। हालांकि कुछ स्थानों पर इन कलाकृतियों को नष्ट होने से बचाने हेतु अतिरिक्त रोशनाई या फ़्लैश वर्जित है।
• दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में दो कलाकृतियाँ विक्रयकेंद्र हैं, एक टिकट खिड़की के पिछवाड़े में व दूसरी इमारत की पहली मंजिल पर। यहाँ आपको कई अनोखे उपहार व यादगार वस्तुएं मिल जायेंगीं।
• इमारत के तहखाने में स्थित जलपानगृह में सादा भोजन उपलब्ध है। मुख्य इमारत में भी एक नवीन उपाहार गृह बनाया गया है। इन दोनों स्थानों पर आप जलपान ग्रहण कर सकतें हैं। गलियारों में भ्रमण के दौरान आप थक जाएँ तो यहाँ बैठ थोड़ा सुस्ता सकतें हैं।

हिंदी अनुवाद : मधुमिता ताम्हणे

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अजंता गुफा क्रमांक 1 की चित्रकारी – यूनेस्को की विश्व धरोहर https://inditales.com/hindi/ajanta-paintings-cave-no-1/ https://inditales.com/hindi/ajanta-paintings-cave-no-1/#comments Mon, 16 Jan 2017 07:54:45 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=90

अजंता की ऐतिहासिक रकारी बहुत से पर्यटकों को महाराष्ट्र की अजंता गुफाओं की ओर आकर्षित करती है। जो भी अजंता गुफाओं में गया हो और वहां के भित्ति चित्र देखे हो, इन गुफाओं को देखकर विस्मित हुए बिना नहीं रहा होगा। ये गुफ़ाएं उत्कर्ष अभियांत्रिकी का भी एक नमूना हैं, क्योंकि ये सारी गुफ़ाएं हाथ […]

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अजंता की ऐतिहासिक रकारी बहुत से पर्यटकों को महाराष्ट्र की अजंता गुफाओं की ओर आकर्षित करती है। जो भी अजंता गुफाओं में गया हो और वहां के भित्ति चित्र देखे हो, इन गुफाओं को देखकर विस्मित हुए बिना नहीं रहा होगा। ये गुफ़ाएं उत्कर्ष अभियांत्रिकी का भी एक नमूना हैं, क्योंकि ये सारी गुफ़ाएं हाथ से खुदाई कर बनाई गई हैं और ये नैसर्गिक नहीं है। चित्रकारी पिछले 2000 वर्षों से अस्तित्व में है। लेकिन आज भी इन चित्रों में व्यक्त कथाएं जीवंत सी लगती हैं, जो आपको मंत्रमुग्ध कर देती हैं। मैं बहुत बार अजंता और एलोरा की गुफाओं में जा चुकी हूँ, क्योंकि, कुछ काल तक मेरे पिताजी का पद स्थापन औरंगाबाद में था।

अजंता के भित्ति चित्र

तत पशचात, मैंने दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय संस्थान से कला के इतिहास का पाठ्यक्रम पढ़ते समय सही मायने में अजंता के भित्ति चित्रों को समझा। उसके बाद जब मैं डेक्कन ओडिसी ट्रेन द्वारा महाराष्ट्र और गोवा का दौरा कर रही थी, तब मुझे एक बार और अजंता और एलोरा की गुफाओं को देखने का अवसर मिला। इसी दौरान मैंने पहली बार चित्रकारी को कला के प्रशंसक की नजरों से देखा, जाना और समझा।

अजंता की गुफाएँ

इस पोस्ट के लिए मैंने अपने आपको अजंता की गुफा क्रमांक 1 की चित्रकारी तक ही सीमित रखा है। छोटी सी पहाड़ी की चढ़ाई करने के बाद आपको घोड़े की नाल जैसी दिखने वाली गुफाएं नज़र आएँगी जो वाघोरा नदी के मोड़ पर खुदी गयी हैं। इन गुफाओं को अनुक्रम से क्रमांकित किया गया है, पर यह अनुक्रम खुदाई के अनुसार नहीं है। गुफाओं के इस समूह को कुछ 500-600 इ पूर्व खोदा गया था। पर अभी के लिए इन गुफाओं के पुरातात्विक विवरणों, जैसे कौनसी गुफा किस काल में बनाई गयी थी, जैसी बातों पर ज्यादा ध्यान न देते हुए (इस पर अपने आप में एक पूरा पोस्ट लिखा जा सकता है) इस पोस्ट के द्वारा मैं आपको अजंता की गुफा 1 की चित्रकारी से परिचित करवाना चाहती हूँ।

गुफा क्रमांक 1 में अजंता की चित्रकारी

यह गुफा बहुत सारे चित्रों से भरी हुई है जिन्हें अपेक्षाकृत बहुत अच्छी तरह से संरक्षित किया गया है। अगर आज भी आप इन चित्रों को देखे तो आप आसानी से समझ पाएंगे। इन गुफाओं में बहुत गहन अँधेरा रहता  है। ऐसे में गुफा के प्रवेश द्वार पर लगाए गए प्रतिक्षेपकों (रिफ़्लेक्टर्स) के आधार के बिना यहां की चित्रकारी देखना नामुमकिन है। यहां के गाइड भी अपने साथ मान्यता प्राप्त प्रकाश की सामग्री रखते हैं, जिसका उपयोग चित्रकारी की बारीकियों को दिखाने के लिए किया जाता है। जैसे-जैसे भीतर प्रवेश करते हुए आप अंधेरे के साथ अपनी आँखों का समंजन करने का प्रयास करते हैं। आप स्वभाकिक रूप से इस विचार से जूझते हैं की इतने अंधेरे में इन चित्रकारों ने इतनी उत्तम और इतनी बारीकी से ये भित्ति चित्र कैसे बनाए होंगे।

कला के इतिहासकारों के लिए यह अभी भी एक अनुसंधान का विषय बना हुआ है। इस विषय में अभी तक विशेषज्ञो में कोई आम सहमति नहीं है। खासकर की अब जब इस खुदाई और चित्रकारी को लगभग 30-50 साल के भीतर किया गया माना गया है। प्रतिक्षेपक गुफाओं के भीतर तक प्रकाश प्रदान करते हैं, लेकिन दिन के सिर्फ कुछ ही घंटों के लिए। प्रकाश की कोई और तकनीक शायद इन दीवारों को और उज्जवलित कर सकती थी, लेकिन इसकी ओर आज तक किसी ने भी ध्यान नहीं दिया।

अजंता की चित्रकारी क्या है?

अजंता की दीवारों पे जातक कथाएं
दीवारों पे जातक कथाएं

टेम्पेरा तकनीक

अजंता की चित्रकारी को अक्सर फ्रेस्कोस या भित्ति चित्र कहा जाता है। तकनीकी रूप से देखा जाए तो ये फ्रेस्कोस नहीं है, क्योंकि फ्रेस्कोस उन चित्रों को कहा जाता है जो गीली सतह पर बनाए जाते हैं। अजंता के चित्र सूखी सतह पर बनाए गए थे और इसके लिए एक खास प्रकार की तकनीक, जिसे टेम्पेरा कहा जाता है, का उपयोग किया गया था। निचली सतह यही की पत्थर की सतह के अनुसार आधार के रूप में कीचड़ या भूसे की नींव डाली जाती थी, जिस पर चूने की परत चढ़ाई जाती थी। इस चूने की परत के सूखने के बाद इन पर बाद में चित्र बनाए जाते थे।

जातक कथाएँ

विषय-वस्तु की दृष्टि से देखे तो इन गुफाओं की दीवारों पर जातक कथाओं को चित्रित किया गया है। ये चित्र बोधिसत्त्व की कथाओं का बखान करते हैं। बोधिसत्त्व वे प्रारंभिक बौद्ध हैं जो बुद्ध बनने के मार्ग पर हैं, पर अभी तक बुद्ध नहीं बने हैं, लेकिन बुद्ध के कुछ लक्षण उनमें नज़र आते हैं। साहित्य में  550 से भी अधिक जातक कथाएँ हैं। इनमें से कुछ बौद्ध स्थलों पर चित्रों और मूर्तियों के रूप में देखी जा सकती हैं। जातक कथाओं के अलावा इन दीवारों पे बोधिसत्त्वों और बुद्ध के भी चित्र अंकित हैं। बोधिसत्त्व किसी भी प्रजाति के हो सकते हैं – हाथी, बंदर, साँप, हंस या फिर मनुष्य लेकिन इनमें नारी का रूप कभी नहीं होता।

गुफाओं की छत पे चित्रकारी
गुफाओं की छत पे चित्रकारी

गुफाओं की छतों पर कोई भी धार्मिक कथाएँ या आकृतियाँ नहीं हैं। इन छतों पर समान्यतः जानवरों की आकृतियों से बनाए गए सजावटी रूपांकन होते हैं। अजंता की छतों पर आपको बहुत सारी ज्यामितीय रचनाएँ भी दिखेंगी। इन कथाओं को दीवारों पर चित्रित करने के पीछे यही तर्क है कि इन गुफाओं में घूमते हुए आप दीवारों पे इन कथाओं को देखकर उन्हें समझ सकते हैं, नाकी छत को देखते हुए। इन गुफाओं के कोने आम तौर पर धुंधले प्रकार के गहरे सुस्त रंगों वाले राक्षसों से चित्रित किए जाते हैं। जो इस बात की ओर संकेत करता है कि राक्षसों का कोई एक आकार नहीं होता। वे चाहे तो कोई भी आकार ले सकते हैं और ये अच्छे प्राणी नहीं माने जाते।

अजंता की गुफा क्रमांक 1 में बोधिसत्त्व पद्मपानी का चित्र

बोधिसत्व पद्मपनी – अजंता गुफा १
बोधिसत्व पद्मपनी

गुफा क्रमांक 1 का द्वार खुलते ही भीतर दो बोधिसत्त्व के बड़े चित्र हैं – बोधिसत्त्व पद्मपानी और बोधिसत्त्व वज्रपानी। यहां पर मैं आपको बाई तरफ की मूर्ति के बारे में बताते हुए उसकी बारीकियों पर भी प्रकाश डालने का प्रयास करूंगी, जो अजंता की गुफाओं में सबसे अधिक प्रसिद्ध है। इस जानकारी से आपको अजंता की बाकी की चित्रकारी समझने में सहायता होगी।

यह बोधिसत्त्व पद्मपानी है, अर्थात वह जिसके हाथों में पद्म या कमल का पुष्प है। इस चित्र को कुछ समय के लिए ध्यान से देखने पर आपको यह नज़र आयेगा।

बोधिसत्त्व पद्मपानी के चित्र की बारीकियों पर नज़र डालिए

  • उत्तम रूप से चित्रित बाहरी आकार।
  • अंडाकार चेहरे पर उत्तम अनुपात में पहनाया गया त्रिकोणीय किरीट जिससे माथे पर सिर्फ बालों की पतली सी रेखा दिखाई दे रही है।
  • कमल के आकार की उदास आँखें जो आधी बंद हैं।
  • कामुकता से भरे अधर।
  • धनुष के आकार की भौहें।
  • तराशा हुआ नाक, जिसे सफ़ेद रंग से उभारा गया है।
  • चौड़ी छाती और पतली कमर।
  • उनकी भुजाएँ थोड़ी विचित्र सी हैं और दो हाथ थोड़े भिन्न से। भारतीय शिल्पशास्त्र के अनुसार ऐसा माना जाता है कि, महापुरुषों के हाथ हाथी की सूंड की तरह लंबे होते हैं, जो घुटनों तक पहुँचते हैं। चित्रकार ने संभवतः यही दर्शाने का प्रयास किया है।
  • हाथ में कमल का फूल पकड़े हुए उनकी लंबी और पतली उँगलियाँ नाज़ुक सी लगती हैं।
  • गले में एकावली मोतियों की माला है, जिसके बीच में नीलमणि है। नीलमणि से पीछे गर्दन की ओर जाते हुए मोतियों का आकार छोटा होता जाता है। इस तरह की मालाएँ आप आज भी देख सकते हैं।

कामुक और दिव्य, भौतिकवादी और आध्यात्मिक

बोद्धिसत्व वज्रपाणी – अजंता गुफा १
बोद्धिसत्व वज्रपाणी

अब इस चित्र को पूर्ण रूप से देखिये। इसमें आपको भौतिकवादी जीवन के सारे लक्षण दिखेंगे, जैसे किरीट, बहुमूल्य गहने और रेशमी कपडे। इसी के साथ क्या आप करुणा से भरी उन अधखुली आँखों को देख सकते हैं? साथ ही साथ क्या वे साधना में लीन नहीं जान पड़ती? यही विरोधाभास अजंता के प्रसिद्ध चित्र पद्मपानी को और सुंदर बनाता है। वह एक साथ कामुक और दिव्य भी है और एक ही समय पर भौतिकवादी और आध्यात्मिक भी है।

वज्रपानी के चित्र में आप उसके किरीट की जटिल रचनावली को देख सकते हैं। तथा उसमें चांदी की महीन कारीगरी को उत्तम तरीके से दिखाया गया है।

अजंता की गुफा क्रमांक 1 में जातक कथाओं के चित्र

गुफा क्रमांक 1 की बाईं तरफ आप महाजनक जातक चित्रित रूप में देख सकते हैं, ये दृश्य बोधिसत्व महाजनक की कथा को दर्शाते हैं। मिथिला के राजा महाजनक का जन्म निर्वासन काल के दौरान हुआ था। वे एक सामान्य मनुष्य के रूप में पले-बड़े और बड़ा होने के बाद उन्हें अपने राजसी गौरवों का पता चला। उन्होंने स्वर्णभूमि या श्रीलंका की यात्रा के दौरान राजकुमारी शिवाली से विवाह किया। एक दिन वे सारे सांसरिक सुखों का त्याग कर देते है। शिवाली और बाकी लोगों के समझाने के बावजूद भी वे नहीं मानते।

गुफा की दाहिने ओर की दीवारों पे नन्द जातक चित्रित है, जो बुद्ध के सौतेले भाई की कथा को बताते हैं। इस कथा में बुद्ध अपने भाई नन्द को स्वर्ग में लेकर जाते हैं, जिसके बाद वे संसार का त्याग कर बुद्ध की शिक्षा का पालन करने लगे।

चित्रकारी विभिन्न स्तरों पर अभिव्यक्ति

गुफा १ की छत पे गोलाकार चित्रकारी
छत पे गोलाकार चित्रकारी

चित्र हमसे कई स्तर पर बात करते हैं. वे उस समय का एक जीत जागता लेखा जोखा हैं, जब यह चित्र बनाये गए थे।

  • आप इन चित्रों में व्यक्तियों द्वारा पहने गए कपडे की छपाई साफ-साफ देख सकते हैं। इसमें आपको धारियों वाला इक्कत का प्रिंट और पोल्का डोट्स जिसे पुल्काबंध भी कहा जाता है की छपाई दिखाई देती है। यहां पर जरदोज़ी या जरी का कपड़ा भी दिखाया गया है। उड़ते हुए कलहंसों की छपाई का प्रयोग शुभ अवसरों पर पहने जाने वाले कपड़ों पर किया जाता है।
  • इन चित्रों में परिदृश्य नहीं दिखाये जाते। प्रकृति का अपना कार्यात्मक उद्देश्य होता है, जिसे जानवरों, जैसे हिरण या फिर टीलों और चट्टानों के द्वारा दिखाया जाता है।
  • अनेक प्रकार के वाद्ययंत्र संगीत की उत्पत्ति को दर्शाते हुए बताते हैं कि, संगीत राजाओं के राज दरबारी जीवन का एक अविभाज्य भाग है।
  • फारसी व्यापारी – अजंता गुफा १
    फारसी व्यापारी

    इन कथाओं को क्रमिक रूप से नहीं बल्कि स्थानिक रूप से चित्रित किया गया है, यानि जो घटनाएँ किसी एक स्थान पर घटित हुई हैं, उन्हें एक साथ चित्रित किया गया है। कथाओं को समझने के लिए यह जरूरी है कि आप इन कथाओं को पहले से ही जानते हो, नहीं तो इन घटनाओं के क्रम को समझना बहुत मुश्किल है। लेकिन अब इन कथाओं को अच्छी तरह से प्रलेखित किया गया है।

  • आप इस गुफा में एक फ़ारसी राजदूत भी देख सकते हैं और गुफा के इस भाग की सारी चित्रकारी फ़ारसी परिवेश को प्रदर्शित करती है। इस व्यक्ति को गोरी त्वचा में दर्शाया गया है, जबकि ज़्यादातर मूल निवासियों की त्वचा सांवली है। पर्दे, लम्बे बरसाती जैसे कपड़े, टोपी और उन्होंने अपने हाथ में पकड़ा हुआ कप सबकुछ फ़ारसी ढंग का है, जो न सिर्फ फ़ारसी व्यापार के बारे में बताते हैं बल्कि यह भी बताता है की चित्रकार को उनकी संस्कृति का अच्छा खासा ज्ञान था।

चित्रकारी का प्रभाव

कहा जाता है कि अजंता की चित्रकारी का प्रभाव सभी प्रसिद्द बौद्ध स्थलों की चित्रकारी में भी देखा जा सकता है, जैसे श्रीलंका में सिगीरीय, पश्चिम चीन की दुन्हुयांग गुफाएँ और जापान की नारा गुफाएँ।

अगली बार आप जब अजंता जाएँ, तो इन छोटी छोटी बातों पर ध्यान दीजियेगा। आपकी अजंता यात्रा और भी रुचिकर हो जाएगी।

वास्तुकला एवं भित्ति चित्रों को समझने के लिए आप भारतीय पुरातत्व विभाग की पुस्तिका का उपयोग कर सकते हैं, जो की आपको टिकट खिड़की पर मिल जाएगी। भारतीय पुरातत्व विभाग अजंता एवं अन्य विश्व धरोहर स्थलों का संरक्षक है और उनके रख रखाव के लिए उत्तरदायी है।

भारत के अन्य विश्व धरिहार स्थल

एलिफेंटा गुफाएं – शिव के अवतार – एक विश्व धरोहर

नालंदा – विद्या का प्राचीनतम केंद्र, बिहार स्थित विश्व धरोहर

रानी की वाव – पाटन गुजरात का विश्व धरोहर का स्थल (यूनेस्को)

बोधगया – जहाँ बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई

दार्जिलिंग हिमालय रेलवे – एक जीता जागता स्वप्न

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