पर्वतीय भारत Archives - Inditales श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Sat, 27 Jan 2024 06:41:35 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.7.4 प्राथमिक पर्वतारोहण प्रशिक्षण – पर्वत पर चढ़ना सीखें https://inditales.com/hindi/parvatarohan-prashikshan-ki-sampooran-jankari/ https://inditales.com/hindi/parvatarohan-prashikshan-ki-sampooran-jankari/#respond Wed, 29 May 2024 02:30:07 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3616

प्राथमिक पर्वतारोहण प्रशिक्षण पाठ्यक्रम के अंतर्गत क्या क्या सिखाया जाता है? पर्वतारोहण सीखने के इच्छुक मेरे पाठक साथी मेरे अनुभव से कुछ लाभ ले सकते हैं। “जीवन या तो साहसपूर्ण रोमांचक कृत्यों से परिपूर्ण हो अथवा कुछ ना हो।” – हेलेन केलर पर्वतों की भव्य सुन्दरता प्रत्येक प्रकृति प्रेमी के लिए आनंद का स्त्रोत होती […]

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प्राथमिक पर्वतारोहण प्रशिक्षण पाठ्यक्रम के अंतर्गत क्या क्या सिखाया जाता है? पर्वतारोहण सीखने के इच्छुक मेरे पाठक साथी मेरे अनुभव से कुछ लाभ ले सकते हैं।

“जीवन या तो साहसपूर्ण रोमांचक कृत्यों से परिपूर्ण हो अथवा कुछ ना हो।” – हेलेन केलर

पर्वतों की भव्य सुन्दरता प्रत्येक प्रकृति प्रेमी के लिए आनंद का स्त्रोत होती है। आधुनिक जनजीवन के प्रदूषणों से विरहित प्रकृति की रम्यता जो पर्वतीय क्षेत्रों में पायी जाती है वो हमारे जीवन में नवीन आशाओं एवं नवीन आयामों को जन्म देती हैं। गत कुछ वर्षों में हमने देखा है कि कई पर्वतारोहण प्रशिक्षण संस्थानों एवं पर्वतारोहण अभियानों के उद्भव से अब अनेक पर्वतारोहण प्रेमी ऊँचे पर्वतों की चढ़ाई कर रहे हैं।

कई पर्वतारोहण मार्ग ऐसे होते हैं जो पूर्णतः अथवा अंशतः यथोचित पर्वतारोहण तकनीक की जानकारी एवं प्रशिक्षण की अपेक्षा रखते हैं। ऐसे मार्गों पर पर्वतारोहण के लिए यह आवश्यक है कि पर्वतारोही को सभी आवश्यक पर्वतारोहण उपकरणों एवं दुर्गम ऊँचे क्षेत्रों में उत्तरजीविता कौशल व संघर्ष क्षमता का पूर्ण ज्ञान हो। कठिन पर्वत शिखरों पर चढ़ने के लिए आरंभिक मूलभूत प्रशिक्षण प्राप्त करना न्यूनतम आवश्यकता है। इसे प्राप्त करने के लिए प्राथमिक पर्वतारोहण पाठ्यक्रम (BMC- Basic Mounteineering Course) निश्चित ही प्रथम सोपान है।

प्राथमिक पर्वतारोहण प्रशिक्षण
प्राथमिक पर्वतारोहण प्रशिक्षण

मुझे पर्वत सदा से ही प्रिय रहे हैं तथा उन पर चढ़ना मुझे अत्यंत रोमांचित करता रहा है। महाराष्ट्र में सह्याद्री पर्वतश्रंखलाओं पर अनेक छोटे-बड़े  पर्वतारोहण अभियानों तथा विशाल हिमालय पर्वतश्रंखला पर कुछ ऊँचाई वाले रोहण अभियानों को सफलता पूर्वक पूर्ण करने के पश्चात मेरे मन में यह विचार कौंधा कि क्यों ना पर्वतारोहण की अपनी इस रूचि को एक स्तर अधिक उंचा किया जाए!

हिमाचल प्रदेश के मनाली नगर में स्थित अटल बिहारी बाजपेयी पर्वतारोहण संस्थान एवं सम्बद्ध खेल (ABVIMAS) में २६ दिवसीय प्राथमिक पर्वतारोहण पाठ्यक्रम के लिए अक्टूबर २०२२ में मैंने अपना नामांकन पंजीकृत किया।

प्राथमिक पर्वतारोहण प्रशिक्षण पाठ्यक्रम

ऊँचे पर्वतों पर चढ़ने की अभिलाषा हो तो यह प्राथमिक पर्वतारोहण प्रशिक्षण एक दक्ष पर्वतारोहक बनने का प्रथम चरण है। यह आपको चट्टानों पर चढ़ने, चट्टानी एवं बर्फीली सतहों पर रोहण कौशल्य प्राप्त करने तथा  उत्तरजीविता कौशल व संघर्ष क्षमता प्राप्त करने में सहायता करता है। यह पाठ्यक्रम हिमनदों, ऊँची पर्वत श्रंखलाओं एवं प्रथमोपचार के विषय में मूलभूत जानकारी प्रदान करता है।

प्राथमिक पर्वतारोहण प्रशिक्षण पाठ्यक्रम के अंतर्गत आपको वो सभी मूलभूत प्रशिक्षण दिए जायेंगे जिनकी जानकारी किसी भी पर्वतारोहण अभियान से पूर्व आपको होनी चाहिए। मौसम एवं जलवायु को समझना, मानचित्रों को पढ़ना, पर्वतारोहण से संबंधित सभी पारिभाषिक शब्द एवं चिन्ह, पर्वतारोहण उपकरणों एवं उनकी कार्यप्रणालियाँ, पर्वतों पर चढ़ना एवं पर्वतीय क्षेत्रों में चलना, पर्वतारोहण के लिए व्यक्तिगत आवश्यक सामान बांधना, ऐसे अनेक विषयों पर यहाँ प्रशिक्षण व जानकारी दी जाती है।

यदि किसी पर्वतारोहक को इस प्रकार के बाह्य क्रियाकलापों में अपना व्यवसाय करना हो अथवा ऊँचे पर्वतों पर पर्वतारोहण दल का नेतृत्व आदि करना हो तो उसे पर्वतारोहण में उच्च प्रशिक्षण प्राप्त करना होगा। यदि कोई यह सोचे कि प्राथमिक पर्वतारोहण प्रशिक्षण केवल मनोरंजन के लिए है, केवल रोमांच के लिए है अथवा पर्वतों की चढ़ाई आसान है तो वे अपने निर्णय पर पुनः विचार करें। यह एक अत्यंत गंभीर प्रशिक्षण है जिसमें आपकी पूर्ण श्रद्धा होनी चाहिए।

भारत में प्राथमिक पर्वतारोहण प्रशिक्षण कहाँ दिया जाता है?

भारत में कुछ सरकारी मान्यता प्राप्त पर्वतारोहण प्रशिक्षण संस्थान हैं जहाँ से आप प्राथमिक प्रशिक्षण प्राप्त कर सकते हैं। वे हैं:

  • नेहरु पर्वतारोहण संस्थान (Nehru Institute of Mountaineering, NIM), उत्तरकाशी, उत्तराखंड।
  • हिमालय पर्वतारोहण संस्थान (Himalayan Mountaineering Institute, HMI), दार्जीलिंग, पश्चिम बंगाल।
  • अटल बिहारी वाजपेयी पर्वतारोहण एवं सम्बद्ध खेल संस्थान (Atal Bihari Vajpeyi Institute of Mountaineering and Allied Sports, ABVIMAS), मनाली हिमाचल प्रदेश।
  • राष्ट्रीय पर्वतारोहण एवं रोमांचक खेल संस्थान (National Institute of Mountaineering and Adventure Sports, NIMAS), दिरांग, अरुणांचल प्रदेश।
  • जवाहर पर्वतारोहण एवं शीतकालीन खेल संस्थान (Jawahar Institute of Mountaineering and Winter Sports), पहलगाम, जम्मू-कश्मीर।

नेहरु पर्वतारोहण संस्थान एवं हिमालय पर्वतारोहण संस्थान, भारत के प्रतिष्ठित व ख्यातिप्राप्त पर्वतारोहण प्रशिक्षण संस्थान हैं। मुझे बताया गया कि यहाँ प्रवेश प्राप्त करने के लिए प्रशिक्षणार्थियों की सूची इतनी लम्बी होती है कि प्रवेश प्राप्त करने के लिए २ वर्षों तक की प्रतीक्षा करनी पड़ जाती है। अन्य संस्थानों में प्रतीक्षा काल अपेक्षकृत कम है।

प्रशिक्षण शुल्क कितना है?

प्रत्येक पर्वतारोहण प्रशिक्षण संस्थान में प्रशिक्षण शुल्क भिन्न है। यह शुल्क १८,००० रुपयों से लेकर २३,००० रुपयों तक हो सकता है। यही शुल्क विदेशी प्रशिषणार्थियों के लिए भिन्न हैं। यदि आप को राष्ट्रीय कैडेट कोर NCC अथवा भारतीय सशस्त्र बालों से प्रायोजित किया गया है तो आपको वित्तीय छूट प्रदान की जायेगी अथवा प्रशिक्षण निशुल्क भी हो सकता है।

यह प्रशिक्षण कौन कौन प्राप्त कर सकते हैं?

जो भी व्यक्ति शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ है तथा उसकी आयु १६ से ४५ वर्ष के मध्य है, वह इस प्रशिक्षण के लिए आवेदन कर सकता है। कुछ संस्थानों में ऊपरी आयु सीमा ४० वर्ष भी होती है।

आवेदन कैसे करें?

उपरिक्त सभी संस्थानें ऑनलाइन विधि द्वारा आवेदन स्वीकार करते हैं। आप संस्थान में भेंट देकर भी वहीं इस पाठ्यक्रम के लिए अपना आवेदन भर सकते हैं। आवेदन पत्र के साथ आपका स्वास्थ्य प्रमाणपत्र आवश्यक है जो यह सिद्ध करता है कि आप इस पाठ्यक्रम के लिए योग्य हैं।

इस प्रशिक्षण के लिए कैसे तैयारी करें?

यह प्राथमिक पर्वतारोहण प्रशिक्षण भले ही एक मूलभूत पाठ्यक्रम है किन्तु शारीरिक स्वास्थ्य के सन्दर्भ में इस पाठ्यक्रम की आपसे अपेक्षाएं अत्यंत कठोर हैं। यह पाठ्यक्रम प्रत्येक दिवस आपकी शारीरिक शक्ति की नित नवीन परीक्षा लेगा तथा मानसिक स्तर पर विविध प्रकार के तनाव सहने की क्षमता को परखेगा।

पर्वतारोहण प्रशिक्षण संस्थान में प्रवेश से पूर्व ३ से ६ मास की पूर्व तैयारी करनी चाहिए। आप जितनी अधिक पूर्व तैयारी करेंगे, इस पाठ्यक्रम में उतना ही उत्तम आपका प्रशिक्षण होगा। दार्जिलिंग स्थित हिमालय पर्वतारोहण संस्थान यह पाठ्यक्रम आरम्भ करने से पूर्व १२ सप्ताह के कसरत की विस्तृत समयसारिणी प्रस्तावित करती है जो उनके वेबस्थल पर उपलब्ध है।

कृत्रिम दीवार पर पर्वतारोहण का प्रशिक्षण
कृत्रिम दीवार पर पर्वतारोहण का प्रशिक्षण

सम्पूर्ण पाठ्यक्रम की अवधि में प्रशिक्षकों की सूक्ष्म दृष्टि आप पर होती है जो आपके स्वास्थ्य एवं शक्ति का लेखा-जोखा रखते हैं। इस प्रशिक्षण में शारीरिक स्वास्थ्य का सतत मूल्यांकन किया जाता है। अतः इस पाठ्यक्रम में प्रवेश से पूर्व अपने शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य की गुणवत्ता भलीभांति जांच लें।

शारीरिक सहनशक्ति का स्तर उत्तम रखने के लिए ३० मिनटों में ५ किलोमीटर तक दौड़ने की क्षमता प्राप्त करना आवश्यक है। शारीरिक सहनशक्ति के साथ मांसपेशियों की आतंरिक शक्ति भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। पाठ्यक्रम काल में आपसे अपेक्षा की जायेगी कि आप अपना थैला, जो कि १५-२० किलो भारी होगा, आप स्वयं उठायें तथा सीधी ढलान पर घंटों चढ़ाई करें। शारीरिक सहनशक्ति का स्तर बढ़ाने के लिए आपको भारी सामान उठाकर चलना होगा।

प्राथमिक पर्वतारोहण प्रशिक्षण एवं पर्वतारोहण के लिए आवश्यक मानसिक सहनशक्ति

अंत में मैं आपको स्मरण करा दूं कि पर्वतारोहण प्रशिक्षण एवं पर्वतारोहण के लिए शारीरिक सहनशक्ति की माँग केवल ३०% होती है। मानसिक सहनशक्ति की आवश्यकता ७०% होती है। आप जितना भी अधिक प्रशिक्षण ले लें, इस पाठ्यक्रम में आपके धैर्य की परीक्षा अनवरत होती रहेगी। अनेक अवसरों पर आपके मस्तिष्क में इस पाठ्यक्रम को छोड़ देने के विचार उत्पन्न होंगे किन्तु सभी प्रकार की परिस्थितियों में अपना मानसिक संतुलन बनाएं रखें।

अपने अनुभव के विषय में कहूँ तो कितने ही दिवस ऐसे होते थे जब मुझे प्रातः उठने के लिए स्वयं की मनःस्थिति से संघर्ष करना पड़ता था। कई क्षण ऐसे होते थे जब मेरा सम्पूर्ण शरीर पीड़ाग्रस्त हो जाता था। अगली एक चट्टान चढ़ पाने की शक्ति शेष नहीं रहती थी अथवा अगला किलोमीटर चलने के लिए पैर धरती पर से उठते नहीं थे। अनेक अवसरों पर मैं स्वयं से प्रश्न करने लगता कि क्या मैंने इस पाठ्यक्रम में प्रवेश लेकर बड़ी चुक तो नहीं कर दी?

सौभाग्य से मेरे प्रशिक्षक को मेरी व्यथा का पूर्ण आभास था। उन्होंने मेरा उत्साहवर्धन किया। मुझे प्रेरित किया कि मैं अपनी सहनशक्ति की सीमाओं को अधिक विस्तृत करूँ। यदि मैंने यह प्राथमिक पर्वतारोहण प्रशिक्षण नहीं लिया होता तो मुझे यह कभी ज्ञात नहीं हो पाता कि मेरी शारीरिक एवं मानसिक सहनशक्ति की सीमा कितनी विस्तृत है। मैंने सीखा कि “हम अपनी सीमाएं स्वयं विकसित करते हैं तथा हम स्वयं के विषय में जितना आँकते हैं, हममें उससे कहीं अधिक सहनशक्ति होती है”।

प्राथमिक पर्वतारोहण प्रशिक्षण पाठ्यक्रम के लिए क्या साथ ले जाएँ?

सभी प्रशिक्षण संस्थान पर्वतारोहण सम्बन्धी विविध उपकरण स्वयं उपलब्ध कराते करते हैं, जैसे पर्वतारोहण थैला, बर्फ को काटने वाली कुल्हाड़ी, बर्फ में उपयोगी बूट, जैकेट जैसे ऊनी वस्त्र, पात्र, रस्सी, सुरक्षा जाली, गोफन, हेलमेट, धातु कि कड़ियाँ, रिंग अथवा लूप, तेज वायु से सुरक्षा प्रदान करते वस्त्र, पीठ का थैला, शयन बस्ता, अस्तर, चटाई, टखने के लिए चमड़े का सुरक्षा कवच, काँटा आदि।

सभी पर्वतारोहण प्रशिक्षण संस्थान आपको उन वस्तुओं की सूची प्रदान करते हैं जिन्हें आपको अपने साथ ले जाना चाहिए। यह सूची आप उनके वेबस्थल पर देख सकते हैं। अपने अनुभव से मैं यहाँ कुछ वस्तुओं की ओर आपका ध्यान केन्द्रित करना चाहता हूँ:

  • वस्त्र – पर्वतारोहण प्रशिक्षण संस्थान के परिसर में अपने वस्त्र धोने के लिए आपके पास पर्याप्त समय रहेगा किन्तु पर्वतारोहण का प्रशिक्षण करते समय पर्वतों की ऊँचाई पर आपके पास वस्त्र धोने का समय कदापि नहीं होगा। अतः मेरा सुझाव है कि पर्वतारोहण करते समय अपने परिधान का एक अतिरिक्त जोड़ा अपने साथ रखें। पहने हुए वस्त्रों को भी पुनः धारण करना पड़ सकता है। अपने साथ टेलकम पाउडर तथा इत्र आदि रखें।
  • जुते – पर्वतारोहण के लिए भारी टिकाऊ पर्वतारोहण जूते आवश्यक हैं। जुते जलरोधी हों तो अतिउत्तम। प्रातः एवं संध्या कालीन शारीरिक प्रशिक्षण के लिए दौड़ाने वाले जूते रखें क्योंकि भारी पर्वतारोहण जूतों में दौड़ना कठिन होता है। संस्थान के भीतर धारण करने के लिए सुखद चप्पलें रखें। ठोस चट्टानों पर चढ़ाई के प्रशिक्षण के लिए चढ़ाई वाले जूते रखें। कुछ संस्थान ये जूते स्वयं उपलब्ध कराते हैं।
  • भोजन – संस्थान के भीतर भोजन की चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। किन्तु पर्वतों की ऊँचाई पर आप अपने साथ सूखे नाश्ते, सूखे मेवे आदि रखें।
  • औषधि – सभी संस्थानों के भीतर एक चिकित्सक तथा औषधियों की दुकान अवश्य होते हैं। किन्तु आप अपने स्वास्थ्य की आवश्यकताओं के अनुसार अपनी औषधियाँ साथ रखें।
  • इन सब के अतिरिक्त अन्य कुछ वस्तुएं भी हैं जिन्हें आपको अपने साथ रखना चाहिए – बैटरी चलित टॉर्च, मोबाइल फोन आदि चार्ज करने के लिए पॉवर बैंक (20000MAH), ओढ़नी अथवा पगड़ी का कपड़ा, साबुन, प्रसाधन सामग्री आदि।

अपना सामान बांधते समय यह ध्यान रखें कि आपको अपना सामान स्वयं उठाना है। पर्वतारोहण के समय भी अपना थैला स्वयं की पीठ पर ही लादना है। अतः सामान एकत्र करते समय किंचित कंजूसी बरतें। यद्यपि आपका सामान उठाने के लिए आपको कुली की सेवा उपलब्ध कराई जा सकती है तथापि ऐसा करने से आपके अंक काट लिए जाते हैं। पर्वतारोहण करते समय आप अतिरिक्त सामान अपने कक्ष में ही छोड़ दें।

प्राथमिक पर्वतारोहण प्रशिक्षण पाठ्यक्रम की समयसारिणी

यद्यपि प्राथमिक पर्वतारोहण प्रशिक्षण पाठ्यक्रम की वास्तविक अवधि विविध संस्थानों पर निर्भर है तथापि पाठ्यक्रम की औसतन अवधि २४-२८ दिवसों की होती है। इस अवधि को तीन भागों में बाँटा जाता है, चट्टान कौशल्य (rock craft), कोमल-हिम कौशल्य (snow craft) तथा ठोस हिमखंड कौशल्य (ice craft)।

हमारे दल में १४५ प्रशिक्षणणार्थी थे। सामान्यतः एक दल में ७०-८० सहभागी होते हैं किन्तु हमारा दल एक अपवाद था। हमारे दल में हमारे साथ राष्ट्रीय कैडेट कोर (NCC), सीमा सुरक्षा बल (BSF) तथा हिमाचल पोलिस के सदस्य भी सम्मिलित थे।

पर्वतारोहण प्रशिक्षण संस्थान में ठीक वैसे ही अनुशासन का पालन किया जाता है जैसा सशस्त्र बलों के संस्थानों में किया जाता है। किसी भी क्रियाकलाप के लिए निर्धारित समय पर पहुँचना अतिआवश्यक होता है। यदि एक मिनट की भी चूक हो जाए तो उसे अनुशासनहीनता माना जाता है तथा उसके लिए निर्धारित दंड दिया जाता है, जैसे दंड-बैठक लगाना पड़ता है।

पर्वतारोहण प्रशिक्षण पाठ्यक्रम – चट्टान कौशल्य (८-१० दिवस)

पाठ्यक्रम के प्रथम ८-१० दिवस संकुल के भीतर ही प्रशिक्षण दिया जाता है। इसमें भी प्रथम १-२ दिवस हमें पाठ्यक्रम का परिचय दिया जाता है तथा प्रशिक्षकों से हमारा परिचय कराया जाता है। प्रशिक्षणार्थियों को उनके उपकरण दिए जाते हैं जिनका प्रयोग वे पाठ्यक्रम की पूर्ण अवधि में करते हैं। उद्घाटन संभाषण होता है, संग्रहालय का भ्रमण कराया जाता है तथा पर्वतारोहण पर कई ज्ञानवर्धक चलचित्र दिखाए जाते हैं।

चट्टानों की चढ़ाई
चट्टानों की चढ़ाई

दल के सभी सहभागियों को छोटे छोटे गुटों में बाँटा जाता है जिन्हें रोप (Rope) कहा जाता है। प्रत्येक रोप का एक रोप प्रमुख (Rope Leader) होता है। सहभागियों के उपकरण वितरण का संचालन करना तथा प्रशिक्षक से संयोजन करना, ये रोप प्रमुख के उत्तरदायित्व हैं। सम्पूर्ण दल का भी एक प्रमुख अथवा वरिष्ठ होता है जो दैनिक क्रियाकलापों के लिए सभी प्रशिक्षणार्थियों का संयोजन करता है तथा पाठ्यक्रम के दैनन्दिनी आवश्यकताओं का नियोजन करता है।

चट्टान कौशल्य के अंतर्गत ऊँची चट्टानों पर चढ़ना, रस्सी द्वारा सीधी सपाट चट्टान पर चढ़ना, रस्सी पर लटक कर नदी पार करना, जुमर का प्रयोग कर चट्टान पर चढ़ना (jumaring) आदि का प्रशिक्षण दिया जाता है। प्रत्येक संस्थान के समीप प्राकृतिक चट्टानें हैं जहाँ पर चट्टान कौशल्य के लिए प्रशिक्षणार्थियों को ले जाया जाता है।

दैनिक दिनचर्या

अटल बिहारी वाजपेयी पर्वतारोहण एवं सम्बद्ध खेल संस्थान (ABVIMAS) में मेरा प्रत्येक दिवस प्रातः ६ बजे मेरे प्रथम क्रियाकलाप के साथ आरम्भ होता था। मेरा प्रथम क्रियाकलाप था, शारीरिक प्रशिक्षण व्यायाम। इसके अंतर्गत ५ किलोमीटर की दौड़ तथा शारीरिक व्यायाम होते हैं जिनके लिए डेढ़ घंटे का समय लगता था। इसके पश्चात हम प्रातःकालीन जलपान करते थे।

नदी पार करना
नदी पार करना

जलपान के पश्चात लगभग ८:३० बजे हम हमारे दैनिक बाह्य प्रशिक्षण के लिए संस्थान से बाहर चले जाते थे। चट्टान चढ़ाई का क्षेत्र हमारे संस्थान से लगभग ३० मिनट की दूरी पर था। प्रत्येक रोप के साथ उस रोप का एक समर्पित प्रशिक्षक रहता है जो उस रोप के सदस्यों को प्रशिक्षण देता है। दोपहर १-१:३० के मध्य हमारा प्रशिक्षण समाप्त होता था तथा २ बजे तक हम संस्थान वापिस पहुँच जाते थे।

दोपहर के भोजन के पश्चात कुछ क्षण विश्राम करते थे। प्रत्येक दिवस दोपहर ३:०० से ५:०० बजे तक विविध विषयों पर व्याख्यान होते थे। व्याख्यान के विषयों में मौसम एवं जलवायु की समझ, पर्वतारोहण शब्दावली, मूलभूत प्रथमोपचार, पर्वतीय क्षेत्रों के शिष्टाचार, हिम-स्खलन तथा विशालकाय हिमालय की विस्तृत समझ आदि सम्मिलित किये जाते हैं।

संध्या के समय पुनः शारीरिक व्यायाम कराये जाते हैं। बाधा दौड़ होती है जिसमें हमें अनेक बाधाओं को पार कर दौड़ना पड़ता है। इन बाधाओं में ऊँची भित्ति पर चढ़ना, कीचड़ में चलना आदि सम्मिलित हैं। सभी प्रशिक्षणार्थियों को इस प्रशिक्षण के कम से कम तीन चरणों में उत्तीर्ण होना अनिवार्य है।

बर्फ में चलने का प्रशिक्षण
बर्फ में चलने का प्रशिक्षण

बाधा दौड़ के पश्चात संध्या लगभग ७ बजे रस्सी सम्बंधित प्रशिक्षण सत्र होता था। इसमें हमें रस्सी के विभिन्न प्रयोग एवं भिन्न भिन्न प्रकार की गांठें बांधना सिखाया जाता था। रस्सी पर्वतारोहण का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंग है। पर्वतारोहण में इसका प्रयोग सतत किया जाता है, चाहे रोहण हो अथवा अवरोहण। गाँठ बांधने की तकनीक पर हमारी दो परीक्षाएं भी ली गयीं।

रात्रि ८ से ९ बजे के मध्य हम रात्रि का भोजन करते थे। रात्रि १० बजे हमारे कक्षों की बिजली बंद कर दी जाती थी।

शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण

हमें हमारे लिए क्षण भर का भी समय नहीं मिल पाता था। हमारा सम्पूर्ण दिवस शारीरिक रूप से अत्यंत चुनौतीपूर्ण होता था। प्रत्येक गतिविधि के लिए सदा चौकस रहना पड़ता था। हमारे एक एक क्रियाकलापों पर प्रशिक्षकों की अखंड दृष्टि रहती थी। कोई भी गतिविधि छूट गयी अथवा हम ध्यान केन्द्रित रखने में चूक गए तो इसका प्रभाव हमारे मूल्यांकन पर पड़ सकता था।

एडम्स दिवस – प्रत्येक संस्थान चट्टान कौशल्य सत्र के मध्य सभी प्रशिक्षणार्थियों को एक दिवस छुट्टी प्रदान करती है। इसे एडम्स दिवस कहते हैं। इस दिन कोई भी पर्वतारोहण गतिविधि नहीं की जाती है। हम संस्थान के भीतर अथवा बाहर भ्रमण सकते हैं।

चट्टान कौशल्य सत्र के अंत में हमारी प्रायोगिक परिक्षा ली गयी जिसमें हमें एक प्राकृतिक चट्टान पर चढ़ना था। इस परीक्षा में ना केवल हमारा चट्टान कौशल्य जाँचा गया, अपितु प्रशिक्षक यह भी देख रहे थे कि हम चढ़ने, उतरने अथवा गिरने में सही तकनीक का प्रयोग कर रहे हैं अथवा नहीं।

कोमल-हिम कौशल्य तथा ठोस हिमखंड कौशल्य (१२-१४ दिवस)

जब हम चट्टान कौशल्य का प्रशिक्षण ले रहे थे तब हमें लगा कि यह सम्पूर्ण सत्र का कठिनतम प्रशिक्षण होगा। हमने कदाचित कठिनतम शब्द को कम आँका था। हम नहीं जानते थे कि उससे भी कठिन प्रशिक्षण हमारी प्रतीक्षा कर रहा है जिसके समक्ष चट्टान कौशल्य प्रशिक्षण वास्तव में एक आनंद था।

कोमल-हिम कौशल्य तथा ठोस हिमखंड कौशल्य का प्रशिक्षण अधिक ऊँचाई के क्षेत्रों में, समुद्र सतह से लगभग १०,०००-११,००० फीट की ऊँचाई पर किया जाता है। प्रत्येक पर्वतारोहण संस्थान प्रशिक्षणार्थियों को अंतिम आधार शिविर (Basecamp) में पहुँचाने से पूर्व १-२ आधार शिविरों में स्थानांतरित करता है।

हम मनाली स्थित अपने पर्वतारोहण संस्थान से ८,५०० फीट की ऊँचाई पर स्थित सोलंग घाटी में लगे हमारे आधार शिविर में पहुंचे। सामान एवं उपकरणों से भरा १५-२० किलो का भारी थैला अपनी पीठ पर लादे हम अनवरत ४ घंटों तक चलते रहे। सोलंग घाटी पहुँचने के पश्चात हमें तम्बू खड़ा करने का प्रशिक्षण दिया गया। ऊँचाई की जलवायु से अभ्यस्त होने के लिए हमें आसपास पदभ्रमण पर ले जाया गया।

सोलंग घाटी से हम बकर्थाच पहुँचे जहाँ हमारा अंतिम आधार शिविर था। १०,५०० फीट की ऊँचाई पर स्थित इस शिविर तक पहुँचने में हमें ५ घंटों का समय लगा। ये दो दिवस हमारे प्रशिक्षण काल के कठिनतम दो दिवस थे। भारी भरकम थैला पीठ पर लाद कर हमने घंटों तक पदयात्रा की।

आधार शिविर

अंतिम आधार शिविर बकर्थाच पहुँचते ही चारों ओर स्थित पर्वत श्रंखलाओं को देख हमारी आँखें थक्क रह गयीं। सम्पूर्ण परिदृश्य ने हमें चकाचौंध कर दिया था। हमने वहीं पर अपना तम्बू खड़ा किया। यह तम्बू अब आगामी १० दिनों के लिए हमारा घर था।

पर्वतों का वास
पर्वतों का वास

कोमल-बर्फ तथा ठोस बर्फ पर पर्वतारोहण कौशल्य अर्जित करने के लिए हमें इनका प्रशिक्षण लेना था,

  • कोमल-बर्फ तथा ठोस बर्फ पर कैसे चलें
  • हिमखंड की सीधी ढलान पर कैसे चढ़ें
  • नीचे गिरने की स्थिति में स्वयं को कैसे रोकें
  • हिमनदों की जानकारी
  • किसी दुर्घटना की स्थिति में अपने सहयोगियों का बचाव कैसे करें
  • ऊँचाई पर बर्फ की कुल्हाड़ी, बर्फ के जूते, क्रेम्पोन आदि पर्वतारोहण उपकरणों का प्रयोग कैसे करें

हमें आनंद था कि ऊँचाई पर शारीरिक व्यायाम नहीं कराये जा रहे थे। हमारा दिवस प्रातः ८ बजे जलपान द्वारा आरम्भ होता थी। हम जलपान कर प्रातः ८:३० तक आधार शिविर से निकल जाते थे तथा लगभग ११,५०० फीट की ऊँचाई पर स्थित हमारे प्रशिक्षण क्षेत्र पर पहुँचते थे। हमारा प्रशिक्षण दोपहर २ बजे समाप्त होता था जिसके पश्चात हम थके-हारे ४ बजे, कभी कभी ५ बजे अपने आधार शिविर पर पहुँचते थे। आधार शिविर पर वापिस पहुँचने के पश्चात हम दोपहर का भोजन करते थे।

प्रत्येक दिवस संध्या के समय मुक्त आकाश के नीचे हमें विविध विषयों पर व्याख्यान दिए जाते थे। पर्वतारोहण बूट एवं क्रेम्पोन कैसे पहनें, स्ट्रेचर कैसे बनाएं, भिन्न भिन्न परिस्थियों में बचाव कार्य कैसे करें, विकट परिस्थिति में स्वयं को कैसे बचाएं, इन विषयों के साथ साथ हिमनदियों की जानकारी, हिम सतहों की जानकारी आदि पर व्याख्यान होते थे।

पर्वत पर ऊँचाई तथा बिना उपकरण रात्रि का अनुभव

कोमल-बर्फ तथा ठोस बर्फ पर पर्वतारोहण प्रशिक्षण के पश्चात हमें अब तक का सर्वाधिक दुर्गम कार्य करना था, पर्वत की ऊँचाई लांघना। हिमाच्छादित पर्वतों पर उच्च ऊँचाई वाले क्षेत्रों का अनुभव प्राप्त करने के लिए हम १०,५०० फीट पर स्थित अपने आधार शिविर से चार घंटे पर्वतारोहण करते हुए १४,५०० फीट की ऊँचाई तक पहुँच गए।

हमें अंतिम पड़ाव तक पहुँचने के लिए समय सीमा प्रदान की गयी थी। समय सीमा का पालन ना करने पर हमारे अंक काट लिए जायेंगे। इसमें एक परीक्षा यह होती है कि कम से कम समय में अधिक से अधिक ऊँचाई लांघने का प्रयास करने पर स्वास्थ्य पर विपरीत परिणाम पड़ सकता है। इस प्रयास में हमारे कुछ सहयोगी अचेत हो गए थे तथा उन्हें तुरंत नीचे ले जाना पड़ा था।

यहाँ एक अन्य परीक्षा हमारी प्रतीक्षा कर रही थी। हमें बिना किसी सहायता के सम्पूर्ण रात्रि मुक्त आकाश के नीचे व्यतीत करना था। हमें भोजन नहीं दिया गया तथा तम्बू अथवा शयन थैली का भी प्रयोग वर्जित था। कोमल-बर्फ तथा ठोस बर्फ पर पर्वतारोहण पाठ्यक्रम का यह एक प्रमुख प्रशिक्षण होता है। किसी भी पर्वतारोहण अभियान में वास्तव में इस प्रकार की परिस्थिति हमारे समक्ष उपस्थित हो सकती है। अतः हमें उस स्थिति के लिए सज्ज रहना चाहिए।

मुक्ताकाश में निद्रा

हमें तम्बू के बाहर खुले आकाश के नीचे सोने के लिए कहा गया। प्लास्टिक की कुछ चादरें दी गयीं। हम आसपास स्थित चट्टान अथवा वृक्ष की सहायता से अपना आश्रय बना सकते थे। भोजन की व्यवस्था भी हमें आसपास की प्रकृति से ही करनी थी। सौभाग्य से उन्होंने हमें कुछ सूखे मेवे तथा सूखे नाश्ते दे दिए थे। अन्यथा हमें भी बेयर ग्रिल्स बनकर प्रकृति में अपना भोजन ढूँढना पड़ता। इस कार्यकलाप का मुख्य उद्देश्य है, पर्वतों पर किसी भी विपरीत परिस्थिति में न्यूनतम उपकरणों एवं मूलभूत सुविधाओं के साथ स्वयं के बचाव का प्रशिक्षण।

हमारे सम्पूर्ण पाठ्यक्रम में मुक्ताकाश में बिना किसी सहायता के रात्रि व्यतीत करने का अनुभव सर्वाधिक आनंददायी था। यह अनुभव अत्यंत सुन्दर तथा सर्वाधिक स्मरणीय था। हमने लकड़ियाँ एकत्र कर आग जलाई तथा गाते-बतियाते आनंदोत्सव मनाया। हमें प्रसन्नता थी कि हमारा कष्टकारी उच्च ऊँचाई पर्वतारोहण प्रशिक्षण अब अंतिम चरण पर पहुँच चुका है। प्रातः उठकर हमें अपने प्रशिक्षण संस्थान के लिए प्रस्थान करना है।

प्रशिक्षण के अंत में हमें एक प्रायोगिक परीक्षा देनी पड़ती है जिसमें हमारे अब तक के पर्वतारोहण ज्ञान का परिक्षण किया जाता है। हमें विभिन्न पर्वतारोहण उपकरणों एवं उनके प्रयोग के विषय में पूछा गया। हमें हिमखंड पर चढ़ाई करने के विभिन्न तकनीकों का प्रदर्शन करने के लिए भी कहा गया।

लिखित परीक्षा – दो दिवस

कोमल-हिम कौशल्य तथा ठोस हिमखंड कौशल्य के प्रशिक्षणों के पश्चात हम अपने आधार शिविर वापिस आये। हम अत्यंत प्रसन्न थे कि हमने अपना प्रशिक्षण सफलता पूर्वक संपन्न किया है। हमने अपने सभी उपकरण वापिस किये जो हमें पर्वतारोहण प्रशिक्षण संस्थान ने प्रदान किये थे। प्रत्येक प्रशिक्षण संस्थान में एक लिखित परीक्षा होती है जिसमें प्रत्येक प्रशिक्षणकर्ता के सैद्धांतिक ज्ञान की परीक्षा ली जाती है।

सभी प्रकार की परीक्षाओं के अंकों का संयोजन कर पाठ्यक्रम के अंत में अंतिम मूल्यांकन किया जाता है। हमारे अंक लिखित एवं प्रायोगिक परीक्षाओं के अतिरिक्त सम्पूर्ण पाठ्यक्रम की अवधि में हमारे व्यवहार एवं आचरण पर भी निर्भर करते हैं। साथ ही हमने किन किन गतिविधियों में भाग लिया, हम शारीरिक रूप से कितने सक्षम थे, आदि तथ्य भी हमारे अंकों को प्रभावित करते हैं।

ग्रेड ‘A’ का अर्थ है कि हमने अडवांस पर्वतारोहण प्रशिक्षण के लिए पात्रता प्राप्त कर ली है। ग्रेड ‘B’ का अर्थ है कि हमने प्राथमिक प्रशिक्षण पूर्ण कर लिया है लेकिन अडवांस पर्वतारोहण प्रशिक्षण के लिए योग्य नहीं है। ग्रेड ‘C’ का अर्थ है कि हम पर्वतारोहण प्रशिक्षण में असफल रहे हैं।

समापन समारोह

सम्पूर्ण पाठ्यक्रम के सर्वाधिक रोमांचकारी क्षण समापन समारोह तथा अंतिम दिवस का अंतिम संबोधन थे। सभी को प्रमाण पत्र एवं पर्वतारोहण बिल्ले प्रदान किये गए। दल के सर्वोत्तम प्रतिभागी के लिए विशेष पुरस्कार था। जिस प्रतिभागी ने प्रशिक्षण क्षेत्र को स्वच्छ रखने में सर्वाधिक योगदान दिया उसे स्वच्छ हिमालय का पुरस्कार प्रदान किया गया। इस समारोह के अंत में सभी प्रतिभागियों ने गीतों एवं नृत्यों द्वारा आनंद व्यक्त किया।

प्राथमिक पर्वतारोहण प्रशिक्षण चुनौतीपूर्ण क्रियाकलाप है जो प्रत्येक चरण में आपकी परीक्षा लेता है। अनेक अवसरों पर ऐसा प्रतीत होता है कि सब कुछ छोड़कर घर वापिस चले जाएँ। प्रत्येक चरण में अपनी सहनशक्ति की सीमारेखाओं को बढ़ाना पड़ता है। मानसिक रूप से भी अत्यंत शक्तिशाली होना पड़ता है।

पर्वतारोहण के प्राथमिक चरण में प्राप्त इस अद्वितीय अनुभव को आप जीवन भर संजो कर रखेंगे। आपका यह अनुभव अविस्मरणीय होगा। इस प्रशिक्षण के लिए मैं आपको अनेक शुभकामनाएं देता हूँ। सम्पूर्ण प्रशिक्षण अवधि के प्रत्येक क्षण का आनंद उठाईये। ऐसे अनुभव जीवन में पुनः प्राप्त नहीं होते हैं।

यह राहुल जाजू द्वारा प्रदत्त एक अतिथि संस्करण है। संस्करण में प्रयुक्त सभी छायाचित्र भी उन्होंने ही प्रदान किये हैं। राहुल जाजू व्यवसाय से चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं तथा कोलकाता के निवासी हैं। एक बहुराष्ट्रीय निगम में ७ वर्ष कार्य करने के पश्चात उन्होंने अपने व्यवसाय से अल्प निवृत्ति ली है। कॉर्पोरेट व्यवसाय को छोड़कर अब वे यात्राएं करते हैं तथा जीवन को अनुभव करते हैं। वे एक उत्साही यात्री हैं। उन्हें समुद्रतटों से अधिक पर्वतीय क्षेत्र भाते हैं।                   

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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काज़ा, लान्ग्जा एवं रंग्रिक – स्पीति घाटी के मनमोहक बौद्ध गाँव https://inditales.com/hindi/spiti-ghati-kaza-langza-rangrik-gaon/ https://inditales.com/hindi/spiti-ghati-kaza-langza-rangrik-gaon/#comments Wed, 29 Sep 2021 02:30:07 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2428

गत वर्ष, हमारे हिमाचल के स्पीति घाटी भ्रमण के समय हम नाको, ताबो एवं धनकर गाँवों की यात्रा के पश्चात काज़ा पहुँचे थे। घुमावदार एवं ऊबड़-खाबड़ मार्गों पर धीमी गति से गाड़ी चलाते हुए हम वहां पहुंचे। प्रायः हमारे एक ओर सुन्दर नदी कलकल बहती रही। मुझे स्मरण है, एक छोटे से लोह सेतु को […]

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गत वर्ष, हमारे हिमाचल के स्पीति घाटी भ्रमण के समय हम नाको, ताबो एवं धनकर गाँवों की यात्रा के पश्चात काज़ा पहुँचे थे। घुमावदार एवं ऊबड़-खाबड़ मार्गों पर धीमी गति से गाड़ी चलाते हुए हम वहां पहुंचे। प्रायः हमारे एक ओर सुन्दर नदी कलकल बहती रही। मुझे स्मरण है, एक छोटे से लोह सेतु को पार करते ही ऐसा प्रतीत हुआ मानो हम एक विश्व से किसी दूसरे ही विश्व में प्रवेश कर रहे हों। काज़ा पहुंचते पहुंचते हम इस शीत मरुस्थल के बीहड़ बंजर परिदृश्यों से अभ्यस्त हो गए थे।

हिमाचल की मनोरम स्पीति घाटी
हिमाचल की मनोरम स्पीति घाटी

पर्वत एवं उसकी घाटियाँ हरी-भरी भी होती हैं, यह तथ्य पूर्णतः विस्मृत हो चुका था। अपने चारों ओर की निस्तब्धता से पूर्णतः अभ्यस्त हो चुके थे, उससे एकाकार हो चुके थे। छोटे छोटे गाँव, वह भी दूरी पर स्थित होते है। मध्य में, शब्दशः, एक जीवात्मा के भी दर्शन नहीं होते थे। गांवों में भी घरों की संख्या कम थी, परन्तु एक विद्यालय एवं एक हेलिपैड प्रत्येक गाँव में अवश्य दृष्टिगोचर हुआ, मानो उनकी उपस्थिति किसी नियम के अंतर्गत आती हो।

काज़ा गाँव

हमें बताया गया कि काज़ा में हम कुछ हरियाली देख सकते हैं। जी हाँ। काज़ा इस क्षेत्र का अलपेक्षाकृत एक बड़ा नगर है। इसकी जनसँख्या लगभग २००० है। यही एक स्थान है जहां आसपास के लोग क्रय-विक्रय, व्यापार तथा मनाली जैसे अन्य बड़े नगरों तक पहुँचने के साधनों की खोज में आते हैं। काज़ा नगरी में हमारा प्रथम साक्षात्कार वहां स्थित एक पेट्रोल पम्प से हुआ क्योंकि हमारी गाड़ी में पेट्रोल की स्थिति चिंताजनक हो चुकी थी। यदि उस समय उस पेट्रोल पम्प में इंधन नहीं होता तो हमें तब तक वहीं विश्राम करता पड़ जाता, जब तक पम्प में इंधन की आपूर्ति नहीं हो जाती। भगवान की दया से उस पेट्रोल पम्प में पर्याप्त इंधन था तथा हम अपनी आगे की यात्रा नियोजित एवं निर्विघ्न रूप से पूर्ण कर पाए।

विश्व का सबसे ऊचा पेट्रोल पंप
विश्व का सबसे ऊचा पेट्रोल पंप

काज़ा का इंडियन आयल पेट्रोल पंप विश्व का सर्वाधिक ऊंचा खुदरा पेट्रोल पंप है जो समुद्र तल से ३७४०मीटर ऊंचाई पर स्थित है।

जुलाई मास था। स्पीति नदी शान्ति से बह रही थी। जहां जहां जा रही थी, मार्ग में चित्ताकर्षक आकृतियाँ बनाती जा रही थी। उन आकृतियों ने मुझे अभिभूत कर दिया था, मुझे स्वयं से एकाकार कर लिया था। जल स्तर बढ़ते ही आकृतियाँ लुप्त हो जाती थीं, तो जल स्तर गिरने पर पुनः नवीन रूप में प्रकट हो जाती थीं। नदी के प्रत्येक मोड़ पर एक नवीन स्वरूप दृष्टिगोचर हो रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो मैं जीवन के विलंबित रूप का दर्शन कर रही हूँ।

पर्वतों के बीच मंडराती स्पीति नदी
पर्वतों के बीच मंडराती स्पीति नदी

गाड़ी में इंधन भरने के पश्चात, हम काज़ा को पार करते हुए रंग्रिक गांव में स्थित हमारे विश्रामगृह की ओर चल पड़े। ९०० की जनसँख्या लिए रंग्रिक अपेक्षाकृत एक बड़ा गाँव है। रंग्रिक में हम ग्रैंड देवाचेन होटल में ठहरे थे। सौभाग्य से हमें ऐसा कक्ष प्राप्त हुआ था जहां से की गोम्पा या क्ये मठ का अबाधित दृश्य प्राप्त होता है।

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की गोम्पा अथवा क्ये मठ

की गोम्फा
की गोम्फा

की गोम्पा, क्ये मठ, के मठ, कि मठ अथवा की मठ। ये सभी नाम हैं की गोम्पा के, जो इस क्षेत्र के प्रमुख बौद्ध मठों में से एक है। ऊँचे पर्वत की ढलान पर स्थित यह मठ अत्यंत आकर्षक दिखाई देता है। श्वेत व श्याम रंगों में रंगा यह मठ अपने मटमैले पीले रंग की पार्श्वभूमी में उठकर दिखाई पड़ता है। ध्यान से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है मानो यह मठ पर्वत की सतह के भीतर से एक कुकुरमुत्ते के सामान अंकुरित हुआ हो। उस ओर खुलती मेरी खिड़की के बाहर भी पीले रंग के पुष्प उगे हुए थे। बलखाती स्पीति नदी के पृष्ठ भाग में विशाल पर्वत गर्व से खड़ा था जिस पर मुकुट के मणि के समान की गोम्पा चमक रहा था। यह मनमोहक दृश्य देखकर मैं सुध-बुध खो चुकी थी।

की मठ को की गोम्पा, क्ये मठ, के मठ अथवा कि मठ भी कहा जाता है।

की गोम्फा थोड़े पास से
की गोम्फा थोड़े पास से

प्रातःकाल ही हमने निश्चय किया कि हम प्रातः होने वाली आराधना के लिए मठ में जायेंगे। प्रातःकालीन प्रकाश में सर्व परिदृश्य अद्भुत दिखाई पड़ रहा था। चारों ओर निस्तब्ध शान्ति छाई हुई थी। यह निःशब्दता हमारे रोम रोम में प्रवेश करने लगी थी। हमारा अंतःकरण शांत एवं केन्द्रित हो गया था। मठ में कुछ छोटे-बड़े द्वारों को पार कर हम प्रमुख ध्यान कक्ष के भीतर पहुंचे। इस कक्ष में छोटे से बड़े आयवर्ग के अनेक बौद्ध भिक्षुक एक ताल में जप कर रहे थे। उन सभी के हाथों में रोटियाँ थी जिसके टुकड़े वे कुछ क्षणों के अंतराल में अपने मुँह में डाल रहे थे। उन्हें गर्म चाय अनवरत परोसी जा रही थी जो इतनी ऊंचाई पर व इतने शीत वातावरण में यहाँ बैठकर जप करने के लिए अत्यंत आवश्यक है। किन्तु स्वच्छता की भीषण कमतरता ने मेरे मुंह में कड़वाहट भर दी। जिस भूमि पर वे चल रहे थे, उसी भूमि पर वे रोटियाँ भी रख रहे थे। भूमि पूर्णतः अस्वच्छ थी। मेरे मन में तीव्र अभिलाषा उत्पन्न हुई कि स्वच्छता को भी इस मठ की संस्कृति का एक अभिन्न अंग माना जाता तो उत्तम होता।

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स्पीति घाटी का परिदृश्य

की गोम्फा पर बनी आकृतियाँ
की गोम्फा पर बनी आकृतियाँ

हम मठ की छत पर गए जो चारों ओर के परिदृश्यों को निहारने का सर्वोत्तम स्थल सिद्ध हुआ। वहां हमें कुछ अत्यंत विस्मयकारी दृश्य दृष्टिगोचर हुआ। छत पर, ऊंचे मंचों पर कुछ असुरी आकृतियाँ स्थित थीं। उनकी उपस्थिति की पृष्ठभूमि में पौराणिक कथाओं से सम्बंधित कारण अवश्य होंगे। कदाचित पैशाचिक कुदृष्टि से मठ का रक्षण करना उनका हेतु हो। मैंने इन प्रतिमाओं के विषय में उनसे जानकारी प्राप्त करने का प्रयास भी किया। किन्तु अधिकतर भिक्षुओं का यही उत्तर होता था कि वे जब से मठ को जानते हैं, तब से ये आकृतियाँ मठ का अभिन्न अंग हैं।

की गोम्पा का इतिहास

की गोम्पा अथवा की मठ ११वीं सदी में निर्मित है। इस पर समय समय पर अनेक सेनाओं तथा विपक्षी धार्मिक गुटों ने आक्रमण किया। १९४० में यह मठ भीषण अग्नि से क्षति ग्रस्थ हुआ था। १९७५ में इसे भूकंप के झटके भी सहन करने पड़े थे। लोगों का कहना है कि निरंतर होते रखरखाव के कारण इसका स्वरूप अत्यंत अव्यवस्थित हो चुका है। यूँ तो हिमालय की चोटियों व ढलानों पर स्थित मठों की संरचना बहुधा अत्यंत अव्यवस्थित होती है। तीव्र ढलानों पर संरचनाओं का संतुलन बनाए रखना तथा कालांतर में विभिन्न चरणों में संरचनाओं में वृद्धि किया जाना इसका प्रमुख कारण हो सकते हैं।

मुझे जानकारी दी गयी कि की मठ में अनेक प्राचीन भित्ति चित्र भी हैं, किन्तु सामान्य पर्यटकों के लिए उनके दर्शन करना सुलभ नहीं है। इस मठ में ३५० से भी अधिक भिक्षुक हैं। वर्ष २००० में इस मठ ने अपने १००० वर्ष पूर्ण किये हैं।

काज़ा

सायंकाल में हमने काज़ा नगर में पैदल सैर की। स्पीति घाटी में कुछ दिवस व्यतीत करने के पश्चात स्वाभाविक रूप से यह नगर अपेक्षाकृत भीड़ भरा प्रतीत हुआ। बाजार में चहल-पहल थी। हमने जिससे भी अपने आगामी स्पीति यात्रा का उल्लेख किया, उन्होंने हमें स्पीति पारिमंडल(इकोस्फीयर) कार्यालय एवं कैफे एवं दुकान में जाने की सलाह दी। अतः हमने वहाँ जाने का निश्चय किया। वहाँ हमने प्यारी इशिता खन्ना से भेंट की तथा उनके साथ चाय पी। उन्होंने हमें अपने पर्यावरणीय पर्यटन के विविध गतिविधियों के विषय में बताया। अपने द्वारा संचालित व निर्देशित पद-यात्राओं एवं होमस्टे की सुविधाओं द्वारा वे कैसे गांववासियों के लिए जीविका के साधन उत्पन्न कर रहे हैं, यह जानकार अत्यंत प्रसन्नता हुई।

स्पीति पारिमंडल(इकोस्फीयर) में एक छोटी सी दुकान है जहां कुछ रोचक स्थानीय वस्तुएं उपलब्ध हैं। यहाँ सी-बक्थोर्न अथवा समुद्री झरबेरी का रस, शरबत तथा सार सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। मैंने यहाँ की विशेषताओं से चित्रित कुछ चुम्बक भी खरीदे।

लान्ग्जा

स्पीति घाटी का लान्ग्ज़ा गाँव
स्पीति घाटी का लान्ग्ज़ा गाँव

काज़ा के उत्तर में लान्ग्जा, हिक्किम तथा कोमिक तीन गाँव हैं। ये तीनों गाँव विश्व के उच्चतम मोटर योग्य सडकों वाले गाँवों में से हैं। हम जिस दिन यहाँ पहुंचे, वर्षा हो रही थी जो इस क्षेत्र में विरल है। वर्षा के कारण मार्ग कीचड़ भरे हो गए थे। अतः हम हिक्किम एवं कोमिक नहीं जा पाए। वर्षा में कीचड़ व फिसलन भरे पहाड़ी संकरे मार्गों में गाड़ी चलाना अत्यंत जोखिम भरा कार्य होता है। हम इस संकट से दूर ही रहे। किन्तु हम लान्ग्जा पहुँचने में सफल रहे।

हिक्किम को विश्व का सर्वाधिक ऊँचाई पर स्थित डाक घर की अवस्थिति का गौरव प्राप्त है।

सालिग्राम

लान्गज़ा के सालिग्राम
लान्गज़ा के सालिग्राम

लान्ग्जा पहुँचने से कुछ क्षण पूर्व कुछ बालक हमारी गाड़ी के समीप आये तथा गाड़ी की खिड़की खटखटाने लगे। प्रत्येक बालक ने हाथ में एक बस्ता उठाया हुआ था जिसमें चक्र की छवि से उत्कीर्णित छोटे छोटे शिलाखंड थे। ये जीवाश्म युक्त शिलाखंड थे। हम सब जानते हैं कि करोड़ों वर्षों पूर्व हिमालय समुद्र की गहराइयों से उभर कर बाहर आया है। कुछ अंतर्जलीय जीव अब भी हिमालय के कुछ क्षेत्रों में पाए जाते हैं। चूंकि पत्थर पर स्थित चिन्ह चक्र के समान है, लोग इसका सम्बन्ध भगवान विष्णु से जोड़ देते हैं। ऐसे पत्थरों को सालिग्राम कहा जाता है। अनेक मंदिरों एवं घरों में इन्हें पूजा जाता है। ऋषिकेश एवं नेपाल जैसे स्थानों पर आप इन्हें विक्रेताओं के पास देख सकते हैं। ये सही था या नहीं, यह मैं नहीं जानती, किन्तु लान्ग्जा में प्रवेश करने से पूर्व मैंने भी एक सालिग्राम पत्थर क्रय किया था। लान्ग्जा में प्रवेश के पश्चात भी सालिग्राम बिक्री करती कुछ बालिकाओं के एक समूह से हमारी भेंट हुई।

उन बालिकाओं से वार्तालाप के पश्चात, उनसे सम्बंधित एक स्पष्ट स्मृति मेरे मस्तिष्क में अब भी है, वह है अल्प वय में उनके मोलभाव करने का कौशल।

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लान्ग्जा में पैदल सैर करते हुए हमने कुछ बालक-बालिकाओं से तथा कुछ महिलाओं से वार्तालाप करने का प्रयत्न किया। उनसे यह जानकारी प्राप्त हुई कि इस गाँव की जनसँख्या १०० से भी कम है। उन्हें कदाचित एक विशाल परिवार कह सकते हैं। संकरी गली में चलते हुए हम एक मठ पर पहुंचे। यहाँ प्रत्येक गाँव एक मठ के चारों ओर बसा हुआ है। गाँव के सभी घर एक समान हैं। श्वेत रंग में रंगी भित्तियाँ तथा उन पर स्थित द्वारों व झरोखों के चौखट काले रंग के हैं। प्रत्येक घर के अग्रभागीय द्वार पर नीले रंग की छाप उसे अन्य द्वारों से भिन्न बनाती हैं। यहाँ से हमें बुद्ध की एक विशाल प्रतिमा की ओर निर्देशित किया गया।

बुद्ध प्रतिमा

लान्ग्ज़ा की बुद्ध प्रतिमा
लान्ग्ज़ा की बुद्ध प्रतिमा

लान्ग्जा में बुद्ध की प्रतिमा इस परिदृश्य में एक नवीन अनुवृद्धि है। वस्तुतः, हिमालय के एक छोर से दूसरे छोर तक बुद्ध की अनेक विशाल प्रतिमाएं स्थापित की जा रही हैं। प्रतिमा के समीप पहुंचकर हमने समझा कि यह प्रतिमा सर्वोत्तम स्थान पर स्थापित की गयी है। यहाँ से चहुँ ओर का अप्रतिम व अबाधित दृश्य दृष्टिगोचर होता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो बुद्ध को यहाँ सोच-समझ कर बिठाया गया है ताकि वे इस ऊँचाई से इस सुंदर एवं अछूती घाटी पर दृष्टी रख सकें।

रंग्रिक

यूँ तो रंग्रिक एक छोटा सा गाँव है किन्तु स्पीति के परिप्रेक्ष्य में यह अपेक्षाकृत विशाल है। हमने यहाँ भी बुद्ध की एक विशाल प्रतिमा देखी। पर्वतों की ढलान पर लिखित प्रार्थनाएं भी देखीं।

चुम्बकीय शैल गुफा

चुम्बकीय शैल गुफ़ा
चुम्बकीय शैल गुफ़ा

नदी के समक्ष, खड़ी चट्टान के ऊपर स्थित गुफा तक पहुँचने के लिए हमें किंचित पदचाप करने पड़े। गुफा अत्यंत लघु है जिसके भीतर एक समय केवल एक ही व्यक्ति जा सकता है। किन्तु गुफा के भीतर किसी भी सामान्य व्यक्ति के उपयोग की सभी सुविधाएं हैं। एक बिछौना, एक सिगड़ी, रसोईघर की सभी सामान्य वस्तुएं, पढ़ने की मेज इत्यादि। अर्थात सभी आवश्यक वस्तुएं, किन्तु ऐसी कोई भी वस्तु नहीं जिसके बिना जीवन संभव है।

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इस गुफा के एक छोर पर एक शिला थी। उस पर कुछ सिक्के चिपके हुए थे, ठीक वैसे ही जैसे हम फ्रिज के ऊपर चुम्बकीय प्रदर्शन वस्तुएं चिपकाते हैं। इस खड़ी शिला की चुम्बकीय विशेषताएं हैं। शिला का परिक्षण करने के लिए हमने भी कुछ सिक्के निकाले तथा उस पर चिपकाने का प्रयत्न किया। सिक्के शिला पर इस प्रकार चिपक गए मानो वे शिला का ही भाग हों।

चुम्बकीय शिला को गुफा के भीतर रखने का कारण मेरी समझ के परे था। कदाचित इसका चुम्बकीय प्रभाव मानवों के लिए सकारात्मक ना हो, अथवा यह लोगों में उत्सुकता उत्पन्न करने के लिए किया गया हो।

विरली जनसंख्या की स्पीति घाटी में जो इकलौता ब्रांड का नाम हमने देखा, वह था भारतीय स्टेट बैंक। ना केवल इसकी शाखाएं सभी प्रमुख स्थानों पर हैं, अपितु प्रत्येक शाखा में अगली शाखा की दूरी एवं अवस्थिति की सूचना स्पष्ट रूप से दी गयी है।

स्पीति घाटी यात्रा सुझाव

स्पीति घाटी का परिदृश्य
स्पीति घाटी का परिदृश्य

एक शाकाहारी होने के कारण स्पीति घाटी में हमारा जीवन शाकाहारी थुपका पर निर्भर था। दाल-भात भी आसानी से उपलब्ध हो जाता है।

शिमला से मनाली की हमारी यात्रा के मध्य में हमने काज़ा में अल्प-विराम लिया तथा काज़ा व उसके आस-पास के पर्यटन स्थलों के अवलोकन का आनंद उठाया। यदि आप सीधे काज़ा जाना चाहते हैं तो आप मनाली की ओर से ग्राम्फु एवं कुंजुम दर्रा होते हुए वहां पहुँच सकते हैं। ग्रीष्म ऋतु में मनाली एवं काज़ा के मध्य राज्य परिवहन की एक बस भी चलती है। मार्ग दुर्गम एवं अप्रत्याशित हैं।

यह एक मनमोहक व सुन्दर घाटी है। नीला आकाश, सपाट व रिक्त पर्वत, कलकल बहती नदी तथा कहीं कहीं हरियाली।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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गुलमर्ग के पर्यटन स्थल और विश्व के सबसे ऊँचे उड़न खटोला की सवारी https://inditales.com/hindi/gulmarg-ke-paryatan-sthal/ https://inditales.com/hindi/gulmarg-ke-paryatan-sthal/#comments Wed, 06 Nov 2019 02:30:41 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1566

गुलमर्ग – यह नाम सुनते ही मानसपटल पर बर्फीले पर्वत एवं उनकी ढलान पर स्की करते खिलाड़ियों की छवि उभर कर आ जाती है। पैर पर बंधी लम्बी डंडी से मार्ग सुगम करते हुए फिसलते खिलाड़ियों के चहरों पर रोमांच एवं खुशी, यही है गुलमर्ग का जादू। गुलमर्ग की रोमांचक कथाएं मैंने अपने पिता के […]

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गुलमर्ग – यह नाम सुनते ही मानसपटल पर बर्फीले पर्वत एवं उनकी ढलान पर स्की करते खिलाड़ियों की छवि उभर कर आ जाती है। पैर पर बंधी लम्बी डंडी से मार्ग सुगम करते हुए फिसलते खिलाड़ियों के चहरों पर रोमांच एवं खुशी, यही है गुलमर्ग का जादू। गुलमर्ग की रोमांचक कथाएं मैंने अपने पिता के मुख से अनेक बार सुनी थीं। कुछ ४० वर्षों पूर्व मेरे पिता की नियुक्ति गुलमर्ग में हुई थी।

गुलमर्ग के पर्यटन स्थल उन्होंने मेरे मष्तिष्क में गुलमर्ग एवं कश्मीर घाटी की अत्यंत मनमोहक काल्पनिक छवि निर्मित कर दी थी। मुझे भय था कि कहीं यही काल्पनिक छवि मेरे स्वयं के अनुभव के आड़े तो नहीं आयेगा? फिर भी, गुलमर्ग की अपनी अविस्मरणीय यात्रा द्वारा प्राप्त अनुभव से मैं आपको वहां के सर्वाधिक रोमांचक कार्यकलापों के विषय में बताना चाहती हूँ। मुकुट में मणी के समान, इनमें सर्वाधिक रोमांचक एवं आनंददायी है गुलमर्ग गोंडोला सवारी।

गुलमर्ग के पर्यटन स्थल

श्रीनगर से गुलमर्ग की सवारी

श्रीनगर से गुलमर्ग का मार्ग
श्रीनगर से गुलमर्ग का मार्ग

गुलमर्ग पहुँचने का एकमात्र साधन है सड़क मार्ग। अतः इस छोटे से गाँव तक आप गाड़ी द्वारा ही पहुँच सकते हैं। मैं इतना अवश्य बल देना चाहूंगी कि आप मार्ग के उत्तरार्ध में कदापि ना सोयें। जब श्रीनगर से आपकी यात्रा आरम्भ होगी, वह किसी भी सामान्य मध्यम् वर्गीय नगरी से बाहर जाने के समान होगा।

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वास्तव में मैं श्रीनगर एवं गुलमर्ग के मध्य के सम्पूर्ण मार्ग आबादी से परिपूर्ण देख अत्यंत आश्चर्यचकित थी। जब मार्ग चढ़ाई करने लगती है, तब आप स्वयं को ऊंचे ऊंचे वृक्षों से घिरा पायेंगे। इनको चीर कर जाते घुमावदार संकरे मार्ग को देख आपका मन प्रफुल्लित हो उठेगा।

सूर्य दर्शन स्थल

सूर्यकिरणों से खेलती हिमालय की चोटियाँ
सूर्यकिरणों से खेलती हिमालय की चोटियाँ

गुलमर्ग में प्रवेश करने से ठीक पूर्व एक नुकीले मोड़ पर एक दर्शन स्थल है। वहां लगे फलक द्वारा हमें इसकी सूचना पाप्त होती है। यहाँ गाड़ी से उतर कर एक ओर घाटी का तथा दूसरी ओर बर्फ से ढँके पर्वत पर चमकते सूर्य की किरणों का विहंगम दृश्य देख सकते हैं। यह और बात है कि पर्वत की यही चोटी मैं कुछ समय पश्चात अपने अतिथिगृह, खायबर हिमालयन रेसॉर्ट में अपने कक्ष से भी देखने वाली थी।

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यह अद्भुत दृश्य सर्वप्रथम गुलमर्ग में आपका स्वागत करता है तथा इस नगर की सुन्दरता से आपका पूर्व परिचय करता है। यदि आप वहां दिन के समय पहुंचें, तब आप सूर्य की सुनहरी किरणों को चंदेरी बर्फीली पर्वतों से एकसार होकर जादू उत्पन्न करते देख सकते हैं।

गुलमर्ग गोंडोला की सवारी

गुलमर्ग गोंडोला अथवा उड़न खटोला
गुलमर्ग गोंडोला अथवा उड़न खटोला

यदि आपने गुलमर्ग गोंडोला की सवारी नहीं की तो यूँ मानिए की आपने गुलमर्ग की यात्रा ही नहीं की। आप सोच रहे होंगे, ये गोंडोला क्या है। यह लोहे की मोटी तार पर लटक कर चलने वाला एक ऐसा वाहन है जिसे केबल कार कहते हैं। यह आपको कुछ ही क्षणों में पर्वत के ऊपर पहुंचा देते हैं।

गुलमर्यग गोंडोला विश्व की सर्वाधिक ऊंचाई पर स्थित केबल कार है। अतः कोई कारण नहीं बनता कि आप इस पर बैठने का सौभाग्य छोड़ दें। इस चढ़ाई के दो तल हैं। इन दोनों तलों को मिलाकर यह यात्रा आपको समुद्र तल से ८७०० फीट से १४००० फीट तक ले जाती है। तो विरली वायु एवं लम्बी श्वास लेने के लिए सज्ज हो जाएँ।

अपरवाट पर्वत गुलमर्ग गोंडोला

हिम शिखिर गुलमर्ग गोंडोला से
हिम शिखिर गुलमर्ग गोंडोला से

इस सवारी का प्रथम तल आपको अपरवाट पर्वत के सम्पूर्ण ऊंचाई के मध्य भाग तक ले जाता है। यहाँ कई प्रकार के पर्यटन संबंधी क्रियाकलापों का आयोजन किया जाता है। सर्वाधिक आसान एवं आनंददायी खेल है बर्फ से खेलना। खेलने के लिए चारों ओर बर्फ ही बर्फ है।

इसके साथ आप स्लेज एवं खच्चर की सवारी भी कर सकते हैं अथवा स्की करने का रोमांच भी प्राप्त कर सकते हैं। यदि इस प्रकार की किसी भी क्रिया में रूचि ना हो तो फिर पैदल ही चलें। चारों ओर बर्फीली चोटियों एवं बर्फ से झांकते वृक्षों का आनंद उठायें। बर्फ से खेलते एवं आनंद उठाते सहयात्रियों को देखना भी अत्यंत सुखद अनुभव होगा।

अपरवाट पर्वत की चोटी

हिम खण्डों से घिरा सैनिक शिविर
हिम खण्डों से घिरा सैनिक शिविर

अगली केबल कार अपरवाट पर्वत की लगभग चोटी तक पहुंचाती है। यह यात्रा तीव्र ढलान युक्त है किन्तु चारों ओर का अद्भुत दृश्य आपको इसका आभास नहीं होने देता। जैसे जैसे आप ऊपर चढ़ते जाते हैं, परिदृश्यों में परिवर्तन आता रहता है। आरम्भ में आप पर्वत को नीचे से ऊपर देखते हैं। १० मिनटों के पश्चात, आप वही परिदृश्य ऊपर से नीचे की ओर देखते हैं। एक ओर का परिदृश्य ऊपर चढ़ते समय तथा दूसरी ओर का दृश्य नीचे उतरते समय देखिये। आप अनवरत आनंद प्राप्त कर सकते हैं। समान्तर केबल द्वारा स्की करते खिलाड़ियों को ऊपर ले जाती कई खुली सवारियां आपको भी दिखाई देंगी। देखने में वे अत्यंत भयावह, साथ ही रोमांचक भी प्रतीत होती हैं।

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दूसरी गोंडोला सवारी के पश्चात आप बर्फ से घिरी चोटी पर पहुँच जाते हैं। एक किनारे पर खड़े होकर यदि आप चारों ओर के पर्वतों को निहारेंगे तो आपको ऐसा प्रतीत होगा मानो आप बर्फ की किनार वाली प्याली की किनार पर खड़े हैं। पहाड़ियों पर कई सेना शिविर दिखे जो दूर से कबूतर खाने से प्रतीत हो रहे थे। बर्फीली पहाड़ियों पर इतनी विपरीत परिस्थितियों में रहकर हमारी सीमाओं की रक्षा करते सैनिकों की कठिनाओं का हम अनुमान भी नहीं लगा सकते।

गुलमर्ग का मनोरम दृश्य
गुलमर्ग का मनोरम दृश्य

यदि आप स्की खेल में निपुण नहीं हैं तब भी आप स्की का आनंद ले सकते हैं। यहाँ आपको गाइड सेवा उपलब्ध हो जायेगी जो आपको स्की सवारी का आनंद दे सकते हैं। जी हाँ, स्की सवारी! क्योंकि यहाँ आप स्वयं स्की नहीं करते हैं। बल्कि गाइड स्वयं स्की करता हुआ आपको अपने साथ थोड़ी दूर ले जाता है तथा आपको स्की का आनंद देता है। यहाँ मैंने कई गाइड को भारत एवं पाकिस्तान के मध्य स्थित लाइन ऑफ़ कंट्रोल अर्थात नियंत्रण रेखा दिखाने का प्रलोभन देते हुए देखा। किन्तु मुझे शंका है कि वहां पर्यटकों को जाने की अनुमति होगी!

गुलमर्ग गोंडोला का विडियो

मेरी गोंडोला सवारी का विडियो देखिये। उत्तम दर्शन के लिए HD mode में देखें।

गोंडोला अवतरण बिंदु, जो गोंडोला सवारी का अंतिम बिंदु है, इसके समक्ष हरमुख पर्वत है। स्थानीय निवासियों के अनुसार यहाँ भगवान् शिव का वास है। अतः यह एक पावन पर्वत है। किंचित बाईं ओर नंगा पर्वत है जो पकिस्तान के गिलगित-बल्तिस्तान क्षेत्र में स्थित है। नंगा पर्वत सिन्धु नदी के कारण भी प्रसिद्ध है। सिन्धु नदी यहाँ से बहती है।

हिमाच्छादित गड़रियों की झोंपड़ियाँ
हिमाच्छादित गड़रियों की झोंपड़ियाँ

वापिस उतरते समय, गोंडोला के आरंभिक स्थल के समीप आप गड़रियों की झोपड़ियां देखेंगे जो शीत ऋतू में बर्फ से आच्छादित हो जाती हैं। प्रत्येक वर्ष ग्रीष्म ऋतू में गड़रिये जानवरों को ले कर यहाँ वापिस आते हैं जब यहाँ पशुओं के लिए घास बहुतायत में उपलब्ध रहती है।

गोंडोला अड्डे पर कई गाइड आपको टिकट दिलाने में सहायता करने का प्रलोभन देंगे। इसका कारण यह भी है कि गोंडोला सवारी की टिकट खरीदने के लिए लम्बी कतार होती है। इन दोनों से बचने के लिए मेरा सुझाव है कि आप सुबह ही अपनी टिकट खरीद लें। इससे आपको पर्वत के शिखर पर अधिक समय बिताने का भी अवसर प्राप्त होगा।

कश्मीरी व्यंजनों का आस्वाद लें

कश्मीरी वाज़वान
कश्मीरी वाज़वान

वाजवान अर्थात् विस्तृत कश्मीरी भोजन जिसे एक सामूहिक थाली में परोसा जाता है तथा कई लोग एक साथ एक ही थाली में से खाते हैं। आजकल आतिथ्य उद्योग अतिथि की व्यक्तिगत वरीयता के विषय में अवगत है। इसलिए वे वाजवान के समान ही थाली परोसते हैं किन्तु सब अपनी अपनी थाली में से ही खाते हैं। वाजवान मुख्यतः मांसाहारी भोजन होता है। मुझे इसी वाजवान के शाकाहारी संस्करण का आनंद खैबर हिमालयन रेसॉर्ट के रसोइये ने दिया। उसके विषय में कुछ लिखना चाहती हूँ।

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शाकाहारी वाजवान का आरम्भ मैंने अखरोट की चटनी से किया। इतनी स्वादिष्ट थी ये चटनी, कि इसके नाम के अनुरूप ही हमने इसे चाट चाट कर चट कर दिया। अगला व्यंजन था नदरू यख़नी, कमल डंडी से निर्मित व्यंजन जो कश्मीर में अत्यंत प्रसिद्ध है। यह भी अत्यंत स्वादिष्ट था तथा गरिष्ठ भी नहीं था। मैंने बाद में शहद की चटनी के साथ नदरू चिप्स भी खाए। यह भी अत्यंत रुचिकर थे। पनीर से निर्मित एक व्यंजन भी था जिसे मैंने न चखना उचित समझा। जी हाँ शाकाहारी के नाम से इतना पनीर परोसा जाता है की मन ऊब जाता है। मेरा वाजवान गरिष्ठ नहीं था। अतः मुझे हल्का प्रतीत हो रहा था। किन्तु मेरे साथ जिन्होंने असली वाजवान का आस्वाद लिया था, वे खाकर पस्त हो गए थे।

यदि आपका पेट अत्यंत भरा प्रतीत हो तो कश्मीरी चाय, काह्वा का आग्रह करें। इससे चैन मिलेगा।

महारानी शिव जी मंदिर

महारानी शंकर मंदिर - गुलमर्ग
महारानी शंकर मंदिर – गुलमर्ग

श्री मोहिनीश्वर शिवालय इस छोटे से शिव मंदिर का आधिकारिक नाम है। गुलमर्ग की प्याली सदृश घाटी के मध्य, एक छोटी सी पहाड़ी के ऊपर यह मंदिर स्थित है। महाराणा मोहन देव की सुपुत्री एवं कश्मीर के महाराजा हरी सिंग की पत्नी, रानी मोहिनी बाई सिसोदिया ने १०० वर्षों पूर्व, सन् १९१५ में इस मंदिर का निर्माण कराया था। पिता की ‘महाराणा’ पदवी इस तथ्य की ओर संकेत करती है कि उनका सम्बन्ध मेवाड़ घराने से था। इस मंदिर को महारानी मंदिर तथा रानी जी मंदिर इत्यादि नामों से भी प्रसिद्धी प्राप्त है। मुझे सहसा तेलंगाना के रामप्पा मंदिर का स्मरण हो आया। यह मंदिर भी पीठासीन देव के बजाय इसके निर्माता के नाम से अधिक लोकप्रिय है।

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इस साधारण से दिखते मंदिर तक पहुँचने के लिए कुछ सीड़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। यूँ तो मंदिर बंद था, फिर भी इसके भीतर स्थापित शिवलिंग दिखाई पड़ रहा था। शिवलिंग के ऊपर लाल रंग की तिरछी छत थी जिस पर ॐ तथा स्वास्तिक का चिन्ह बना हुआ था। देवालय के चारो ओर का विहंगम दृश्य सम्मोहित कर देता है। मंदिर के पृष्ठभाग पर हिम आच्छादित पर्वत श्रंखलायें है । जैसे जैसे आप आगे बढ़ते हैं, गुलमर्ग की प्याली एवं उसके मध्य स्थित प्रसिद्ध गोल्फ मैदान दृष्टिगोचर होने लगता है। कई छोटी हरे रंग की इमारतें दिखती हैं जिनमें अधिकतर अतिथिगृह अथवा होटल्स हैं।

रानी द्वारा निर्मित होते हुए भी यह मंदिर सादगी से परिपूर्ण है। इससे आप अनुमान लगा सकते हैं कि उस समय कश्मीर के लोगों का जीवन भी सादगी भरा था। या कहीं ऐसा तो नहीं कि यहाँ के प्रतिकूल वातावरण के कारण इसकी भव्यता सीमित रखी गई है?

इस मंदिर को आपने एक बॉलीवुड चलचित्र के गाने ‘जय जय शिव शंकर’ में अवश्य देखा होगा।

सेंट मेरी गिरिजाघर

सेंट मेरी गिरिजाघर - गुलमर्ग
सेंट मेरी गिरिजाघर – गुलमर्ग

महारानी मंदिर से आगे बढ़ते हुए, गोल्फ मैदान की बाहरी सीमा पार कर हम सेंट मेरी गिरिजाघर के प्रवेश द्वार पर पहुंचते हैं। यह १५० वर्ष प्राचीन गिरिजाघर है। मैदानी क्षेत्रों की तपती गर्मी से बचने के लिए जब अंग्रेजों ने इस स्थान की खोज की होगी, तब कदाचित इस गिरिजाघर का निर्माण कराया होगा। जिस दिन मैं यहाँ आयी थी, यह गिरिजाघर बंद था। इसके चारों ओर एक चक्कर लगाकर मैं वापिस आ गयी। प्रातःकाल किये गए इस पैदल सैर ने मन प्रफुल्लित कर दिया था।

रानी मंदिर के समान यह भी सादगी भरा किन्तु अपेक्षाकृत बड़ा गिरिजाघर था। यहाँ से चारों ओर दृष्टी घुमाने पर आपको कई छोटे तालाब दिखाई पड़ेंगे। ये तालाब गोल्फ मैदान के ही भाग हैं। श्वेत चमकते बर्फ के बीच एक सूखे वृक्ष की छवि ने हम सब का मन मोह लिया था।

होटल हाइलैंड गुलमर्ग
होटल हाइलैंड गुलमर्ग

सेंट मेरी गिरिजाघर की ओर जाते समय आप एक प्रसिद्ध होटल – होटल हाईलैंड्स पार्क देखेंगे जहां बॉबी चलचित्र के इस लोकप्रिय गाने ‘हम तुम इक कमरे में बंद हों’ को फिल्माया गया था।

हरी सिंह का महल

लकड़ी द्वारा निर्मित यह छोटा सा महल, कश्मीर के अंतिम महाराजा हरी सिंह का महल है। पहाड़ी के ऊपर स्थित इस महल से पूरा गुलमर्ग दृष्टिगोचर होता है। मैं नवम्बर २०१५ में जब गुलमर्ग आयी थी, तब इस महल के पुनर्निर्माण का कार्य आरम्भ था। राजा का परिवार जब इस महल को छोड़कर चला गया, तब इस महल का शनैः शनैः क्षय होने लगा। इसका कारण यहां के वातावरण के साथ साथ यहाँ की राजनैतिक परिस्थितियाँ भी हैं।

राजा हरी सिंह का महल
राजा हरी सिंह का महल

इस षटकोणीय महल के नवीनीकरण का कार्य आरम्भ है। आशा है आगामी मौसम तक यह पर्यटकों के लिए उपलब्ध हो जाएगा। मेरे पिता ने मुझे इस महल के एक अद्भुत गलीचे के विषय में बताया था। यह गलीचा महल के भीतर ही बुना गया था ताकि यह महल के प्रत्येक कोने में ठीक प्रकार से बिछाया जा सके। वहां निर्माण कार्य करते कर्मचारियों ने बताया कि महल की बचीखुची कलाकृतियों को श्रीनगर के राज्य संग्रहालय में स्थानांतरित किया गया है।

गुलमर्ग नगर में पद भ्रमण करिये

इस पहाड़ी पर्यटन स्थल का प्रमुख आकर्षण है यहाँ के पर्वत, वृक्ष, परिदृश्य, खुला आकाश तथा इन सब का अद्भुत सम्मिश्रण। इसका आनंद उठाने का सर्वोत्तम उपाय है पैदल सैर करते हुए चारों ओर निहारना। प्रत्येक दिवस, प्रत्येक क्षण यह सम्मिश्रण एक भिन्न रूप प्रस्तुत करता है, मानो इन प्राकृतिक तत्वों का प्रयोग कर कोई अनवरत चित्रकारी कर रहा हो। इस सौंदर्य में स्वयं को भी एक भाग बना कर इसके अस्तित्व में लीन हो जाएँ।

किसी भी अन्य पहाड़ी पर्यटन स्थलों के समान गुलमर्ग भी विभिन्न ऋतु में भिन्न होता है। मैंने इसे नवम्बर मास में देखा था। गुलमर्ग के चित्र बताते हैं कि ग्रीष्म ऋतु में यह अत्यंत हराभरा रहता है तथा शीत ऋतु में इससे भी श्वेत। शीत ऋतु का आरम्भ दिसंबर के मध्य से आरम्भ होता है। आप जब भी गुलमर्ग यात्रा की योजना बनाएं, वहां के मौसम का पूर्वानुमान अवश्य लगा लें। मौसम के अनुसार ही सामान साथ ले जाएँ।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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द्रास युद्ध स्मारक – कारगिल – जहां भावनाएं हिलोरें मारती हैं https://inditales.com/hindi/kargil-drass-war-memorial-ladakh/ https://inditales.com/hindi/kargil-drass-war-memorial-ladakh/#comments Wed, 24 Jan 2018 02:30:40 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=615

कारगिल के समीप स्थित द्रास युद्ध स्मारक से हम सब अवगत हैं। हम उस युग से सम्बन्ध रखते हैं जो १९९९ में हुए कारगिल युद्ध का साक्षी है। इस युद्ध के हुतात्मा सैनिक हमारे आसपास ही उपस्थित वीर योद्धा थे। उस समय दूरदर्शन पर दिखाए जाने वाले कारगिल युद्ध के छायाचित्रों के हम सब ने […]

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द्रास युद्ध स्मारक - कारगिल
द्रास युद्ध स्मारक – कारगिल

कारगिल के समीप स्थित द्रास युद्ध स्मारक से हम सब अवगत हैं। हम उस युग से सम्बन्ध रखते हैं जो १९९९ में हुए कारगिल युद्ध का साक्षी है। इस युद्ध के हुतात्मा सैनिक हमारे आसपास ही उपस्थित वीर योद्धा थे। उस समय दूरदर्शन पर दिखाए जाने वाले कारगिल युद्ध के छायाचित्रों के हम सब ने दर्शन किये थे। उन्ही वीर सैनिकों की स्मृति में निर्मित इस युद्ध स्मारक के भी हमने दूरदर्शन पर अनेक बार दर्शन किये हैं। तथापि वहां प्रत्यक्ष उपस्थित होने पर जो भावनाएं मन में हिलोरें मारती हैं, वह कल्पना से परे है। उसका अनुभव कारगिल पहुँच कर ही प्राप्त होता है।

राष्ट्रीय राजमार्ग १ द्वारा जम्मू से लेह की यात्रा के समय जैसे ही हमने जोजिला दर्रा पार किया, हमने इस युद्ध स्मारक के दर्शन का निश्चय किया। सैनिक परिवार से सम्बंधित होने के कारण मेरा बाल्यकाल सैनिक छावनियों में बीता है। अतः कोई भी युद्ध स्मारक एवं सम्बंधित संग्रहालय मेरे हेतु नवीन आकर्षण नहीं थे। तथापि उस सांझबेला में द्रास हुतात्मा स्मारक पर बिताए कुछ क्षणों में जो भावुकता की चरम अनुभूति मुझे हुई, मैं उस अनुभूति के लिए तैयार नहीं थी।

गुलाबी दीवारों से घिरे इस स्मारक के प्रवेशद्वार से हम स्मारक के भीतर पहुंचे। इस स्मारक की एक भित्त पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था-
“Forever in operation.
All save some, some save all, gone but never forgotten.”
अर्थात्,
“सदैव कार्यरत।
सब कुछ को बचाते हैं, कुछ सभी को बचाते हैं। विलीन पर अमर हो जाते हैं।”

द्रास युद्ध स्मारक

द्रास युद्ध स्मारक - विजयपथ
द्रास युद्ध स्मारक – विजयपथ

प्रवेश द्वार पर अपना नाम पंजीकृत करवाकर हम स्मारक प्रांगण के भीतर पहुंचे। पथ के दोनों ओर भारत के तिरंगे झंडों की पंक्ति लगी हुई थी। इस पगडंडी के अंत में एक ऊंचे स्तम्भ पर विशाल तिरंगा फहरा रहा था। इसे देख हमारी जात-पात, लिंग, समृधि, सफलता इत्यादि मानो कहीं लुप्त हो गए थे। शेष थी तो केवल हमारी भारतीयता। तिरंगे को इस भान्ति पवन में फड़फड़ाते देख अपनी भारतीयता का उत्सव मनाने की इच्छा उत्पन्न हुई। हुतात्माओं की अमर जीवनी को दर्शाते इस स्मारक का स्पर्श होते ही गर्व का अनुभव होने लगा। हमने उस भव्य तिरंगे के सानिध्य में कई छायाचित्र खींचे।

इस द्रास युद्ध स्मारक को घेरे वे सर्व पर्वत शिखर उपस्थित हैं जिन्हें युद्ध पूर्व, शत्रुओं ने हथियाने का असफल प्रयास किया था। स्मारक की ओर जाते इस पथ को विजयपथ भी कहा जाता है। विजयपथ के मध्य एक विश्राम लेकर मैंने अपनी दृष्टी चारों ओर दौड़ाई। अपने चारों ओर गोलियां दागते बंदूकों के दृश्य को आँखों के समक्ष सजीव करने का प्रयास करने लगी। उस दृश्य को आँखों के समक्ष सजीव करने में सफल हो भी जाऊं, परन्तु शत्रुओं पर गोलियां बरसाते, स्वयं पर गोलियां झेलते वीर सैनिकों की मनःस्थिति मैं चाह कर भी अनुभव नहीं कर सकती थी। कल्पना एवं यथार्थ के बीच का यही अंतर मुझे सदा स्मरण कराता रहेगा कि हम अपने घरों में सुरक्षित जीवन व्यतीत करते हैं जबकि हमारी सुरक्षा में वीर सैनिक यहाँ निरंतर शत्रुओं का सामना करते रहते हैं। उन शहीद वीर सैनिकों को शत् शत् नमन करने की एवं उनके अंतिम क्षणों को इसी स्थल पर सजीव कल्पना करने की इच्छा मुझे इस स्मारक तक खींच लायी थी।

“कारगिल विजय दिवस हर वर्ष २६ जुलाई को मनाया जाता है।”

द्रास युद्ध स्मारक - प्रवेश द्वार
द्रास युद्ध स्मारक – प्रवेश द्वार

विजय पथ पर चलते हुए हम अमर ज्योति की ओर आगे बढ़े। यह अमर ज्योति उन वीर सैनिकों को समर्पित है जिन्होंने कारगिल युद्ध में देश की रक्षा करते अपने प्राणों की आहूति दे दी। समीप ही एक सैनिक कारगिल युद्ध के परिप्रेक्ष्य की जानकारी प्रदान कर रहा था। अमर वीर सैनिकों की गाथा सुनाते उसके स्वरों से उमड़ता गर्व छुपाये नहीं छुप रहा था। वह यह भलीभांति जानता था कि अगला शहीद वह स्वयं भी हो सकता है। उसने हमारा ध्यान बाएं स्थित वीरभूमि में रखे स्मृति शिलाओं की ओर खींचा, जो अमर वीर सैनिकों को श्रद्धांजलि स्वरुप स्थापित किये गए थे। उसने हमें दायें स्थित मनोज पांडे संग्रहालय भी देखने को कहा जहां युद्ध के अवशेष संग्रह कर रखे गए हैं।

वीरभूमि स्थित स्मृति शिलाएं

द्रास युद्ध स्मारक - वीर भूमि
द्रास युद्ध स्मारक – वीर भूमि

शौर्यसंगीत की ध्वनी के मध्य हम वीर भूमि को ओर बढ़े। वहां प्रत्येक शहीद सैनिक को समर्पित एक शिलाखंड स्थापित किया गया था। प्रत्येक शिलाखंड पर शहीद का नाम एवं सेना में उसके पद के साथ साथ, संक्षिप्त में उसकी शौर्य गाथा अंकित थी। उन्होंने किस तरह देश की रक्षा में अपने प्राण न्योछावर किये यह पढ़ते ही गला भर आया। मैंने पूरी श्रद्धा से सर्व शिलाखंडों पर अंकित नाम पढ़ते हुए, उन्हें नमन कर, मन ही मन श्रद्धांजलि अर्पित करना आरम्भ किया। परन्तु कुछ क्षण उपरांत, अश्रुपूरित चक्षुओं के कारण नामों को पढ़ने में असमर्थ हो गयी और वहां से आगे बढ़ गयी।

द्रास युद्ध स्मारक - कारगिल समारक
द्रास युद्ध स्मारक – कारगिल समारक

वहां मेरी दृष्टी सुन्दर प्रतिमा पर पड़ी जहां हाथ में तिरंगा लिए, जीत का उत्सव मनाते वीर सैनिकों को प्रदर्शित किया गया था।

अमर वीर सैनिक ज्योति

द्रास युद्ध स्मारक - अमर ज्योति
द्रास युद्ध स्मारक – अमर ज्योति

भारी हृदय से मैं अमर ज्योति पर वापिस आ गयी। इसके आधार पर पं. माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा वीर रस में रचित कविता “पुष्प की अभिलाषा” अंकित थी। प्राथमिक शाला में पढ़ी इस कविता का गूढ़ अर्थ मैं आज समझ पायी हूँ जब एक पुष्प अपनी अभिलाषा व्यक्त करता है कि वह ना तो किसी देवी देवता को अर्पण होना चाहता है, ना ही किसी कन्या अथवा प्रेमिका को रिझाना चाहता है। वह केवल देश की रक्षा में प्राणों की आहूति देने को तत्पर वीर सैनिकों के चरणों को स्पर्श करना चाहता है। अतः वह प्रार्थना करता है कि उसे देशभक्त वीर सैनिकों के पथ पर बिखेर दिया जाय।

अमर ज्योति के पृष्ठभूमि पर एक सुनहरी भित्त है जिस पर शहीद वीर सैनिकों के नाम अंकित हैं। आत्मविभोर हो हम सब वहां चुप्पी साधे खड़े थे। ये वे वीर सैनिक थे जिन्होंने हमारी रक्षा करते अपने प्राण गवाँए थे जबकि हम उस समय शान्तिपूर्वक निद्रा में लीन थे अथवा क्षुद्र समस्याओं में उलझे हुए थे।

मनोज पांडे दीर्घा

स्मृति कुटिया - मनोज पण्डे दीर्घा - द्रास युद्ध स्मारक
स्मृति कुटिया – मनोज पण्डे दीर्घा – द्रास युद्ध स्मारक

अमर वीर सैनिक ज्योति पर कुछ और समय बिताकर हम मनोज पाण्डे दीर्घा की ओर बढ़े। इसे ‘हट ऑफ़ रेमेंबरेंस’ अर्थात स्मृतियों की कुटिया भी कहा जाता है।

अस्थि कलश - मनोज पण्डे दीर्घा
अस्थि कलश – मनोज पण्डे दीर्घा

प्रवेश द्वार पर ही एक वीर सैनिक की आवक्ष मूर्ति थी जिसके चारों ओर अस्थिकलश रखे हुए थे। इसे देखते ही मेरे आत्मसंयम का बाँध टूट गया और मैं फूट फूट कर रो पड़ी। कुछ क्षण पश्चात अपने आप को संभालकर जब चारों ओर देखा तो पाया कि वहां उपस्थित हर व्यक्ति की आँखें नम थीं। यहाँ आकर आत्मविभोर ना होना असंभव है।

अग्निपथ - हरिवंश राय बच्चन
अग्निपथ – हरिवंश राय बच्चन

एक फलक पर हरिवंशराय बच्चन द्वारा रचित कविता ‘अग्निपथ’ अंकित थी। कविता के साथ साथ कवी बच्चन के सुपुत्र अमिताभ बच्चन का प्रेरणादायक सन्देश लिखा था। एक वीर सैनिक द्वारा अपने पुत्र को लिखा एक पत्र भी वहां प्रदर्शित था। इसे पढ़कर हृदय में उठती हूक एवं भावनाएं शब्दों द्वारा व्यक्त करना मेरे लिए संभव नहीं है।

महावीर योद्धा

वीर विजयी सैनिक - द्रास युद्ध स्मारक
वीर विजयी सैनिक – द्रास युद्ध स्मारक

दीर्घा के भीतर युद्ध एवं युद्ध में शहीद सैनिकों के छायाचित्र प्रदर्शित किये गए थे। उनके दर्शन एक भावनात्मक यात्रा के समान था। दीर्घा के अंत में अधिग्रहण किया गया पाकिस्तानी ध्वज का भी छायाचित्र था। उसे देख हृदय में विजयी भावनाएं उभरीं। प्रतीकात्मक चिन्हों में भी इतनी शक्ति होती है जिसके लिए हम जी या मर सकते हैं।

वीर सैनिक - मनोज पण्डे दीर्घा
वीर सैनिक – मनोज पण्डे दीर्घा

परिसर के अन्य भागों में युवा सैनिक अपने अपने कार्यों में व्यस्त थे। कुछ बागवानी कर रहे थे, कुछ घास की सफाई कर रहे थे एवं कुछ पौधों को पानी दे रहे थे। उन युवक सैनिकों को गले लगाकर उन्हें आशीर्वाद देने की इच्छा उत्पन्न हुई। अतः उनके समीप जाकर मैंने कुछ सैनिकों से चर्चा की व उन्हें धन्यवाद दिया। उन्होंने भी सदा की तरह विनम्रता से मेरे धन्यवाद का उत्तर धन्यवाद से ही दिया। आयु में इतने छोटे होने के बाद भी उनमें परिपक्वता कूट कूट कर भरी हुई थी। उनमें से एक ने मुझे कहा कि जिस तरह हम अपना उत्तरदायित्व निभाते हैं, उसी तरह वे भी उनका उत्तरदायित्व ही पूर्ण करते हैं। काश उनकी इस परिपक्वता का एक अंश भी शहरी युवाओं में होता, जिन्हें केवल अपना अधिकार मांगना आता है। उत्तरदायित्व कई शहरी युवाओं के लिए एक अर्थहीन शब्द है।

स्मारक परिसर में जलपान गृह एवं स्मारिका विक्रय केंद्र भी है। सैनिक संस्कृति एवं अनुशासन से परिपूर्ण ये केंद्र पर्यटकों की आवश्यकता पूर्ण करने में सक्षम हैं।

इस परिसर में प्रसिद्ध बोफोर्स तोपों सहित कई तोपें, बंदूकें एवं हेलीकाप्टर इत्यादि का भी प्रदर्शन किया गया था। परन्तु मैंने उन्हें देखने में समय नहीं गंवाया। इन वस्तुओं के बिना मानवता अधिक प्रगति कर सकती है।

देशवासियों हेतु वीर सैनिकों का संदेश

सैनिकों का देश को सन्देश - द्रास युद्ध स्मारक
सैनिकों का देश को सन्देश – द्रास युद्ध स्मारक

द्रास युद्ध स्मारक परिसर से बाहर निकलते समय आपकी दृष्टी इन शब्दों पर पड़ती है जो वीर सैनिकों की ओर से देशवासियों के लिए सन्देश है। यह सन्देश हमसे कहता है कि जब हम वापिस घर लौटें तब अपने परिजनों एवं मित्रों से कहें कि हमारे कल को सुरक्षित बनाने हेतु उन्होंने अपना आज न्योछावर कर दिया है।

मैंने शिंडलर संग्रहालय समेत इस तरह के कई स्मारकों के दर्शन किये हैं। परन्तु ऐसी यात्रा मैंने इससे पहले कभी नहीं की। गर्व, विनम्रता, कृतज्ञता, भावुकता इन सभी भावनाओं का मिश्रित सा अनुभव हो रहा था। कारगिल नगर की ओर जाते मन में बार बार एक ही विचार उमड़ रहा था। सैन्य सेवा देश के प्रत्येक नागरिक हेतु आवश्यक होना चाहिए। कदाचित यही हमें सही मायनों में भारतीयता का बोध करा सकती है। तुच्छ अहंकारों से ऊपर उठ कर कदाचित यही सही अर्थ में देशप्रेम जगा सकती है। मेरे पास इन प्रश्नों के उत्तर नहीं है। परन्तु द्रास शहीद स्मारक के दर्शनोपरांत ऐसे विचार आपके मानसपटल पर अवश्य उभर कर आयेंगे।

कारगिल के द्रास युद्ध स्मारक के दर्शन हेतु सुझाव

स्मृति चिन्ह - द्रास युद्ध स्मारक - लद्दाख
स्मृति चिन्ह – द्रास युद्ध स्मारक – लद्दाख

• श्रीनगर से लेह जाते राष्ट्रीय राजमार्ग १द पर जोजिला दर्रा एवं कारगिल नगर के मध्य द्रास युद्ध स्मारक स्थित है।
• मुख्य मार्ग पर स्थित स्मारक की गुलाबी दीवारें आपको दूर से ही देख जायेंगी।
• स्मारक के दर्शन हेतु प्रवेशशुल्क नहीं है। तथापि अपना पहचान पत्र दिखा कर रजिस्टर में नाम का पंजीकरण आवश्यक है।
• स्मारिका केंद्र से आप कपडे, चीनी मिटटी के प्याले एवं अन्य कई वस्तुएं ले सकते हैं।
• परिसर में जलपान गृह सुविधा उपलब्ध है। तथापि कदाचित शहीद स्मारक के दर्शनोपरांत उसमें जलपान करने की आपकी मनःस्थिति न रहे।
• सामान्य जन हेतु इस स्मारक के दर्शन जून से अक्टूबर मास तक उपलब्ध होते हैं जब राजमार्ग यातायात हेतु खुला रहता है।
• आप से आशा रहेगी कि इस स्मारक के भीतर आपका आचरण परिपक्वता एवं सम्मान से परिपूर्ण हो।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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मेघालय के शिलांग शहर में क्या क्या पर्यटक स्थल देखें https://inditales.com/hindi/things-to-do-shillong-meghalaya/ https://inditales.com/hindi/things-to-do-shillong-meghalaya/#respond Wed, 06 Dec 2017 02:30:50 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=544

मेघालय – अर्थात मेघों का आलय। यह क्षेत्र हमेशा बादलों से आवृत्त रहता है। यहां पर एक भी पल ऐसा नहीं था, जब हमने आसमान में एक भी बादल ना देखा हो। वैसे तो यह बारिश का मौसम नहीं था, लेकिन मेघालय में यह नज़ारा आपको हमेशा देखने को मिलता है। पर्यटन की बात करें […]

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शिलांग शहर का दृश्य
शिलांग शहर का दृश्य

मेघालय – अर्थात मेघों का आलय। यह क्षेत्र हमेशा बादलों से आवृत्त रहता है। यहां पर एक भी पल ऐसा नहीं था, जब हमने आसमान में एक भी बादल ना देखा हो। वैसे तो यह बारिश का मौसम नहीं था, लेकिन मेघालय में यह नज़ारा आपको हमेशा देखने को मिलता है। पर्यटन की बात करें तो मेघालय उत्तर पूर्वीय भारत का सबसे संगठित राज्य माना जाता है। मेघालय की पर्यटन संबंधी विवरणिकाएं लगभग सभी जगहों पर उपलब्ध हैं। यहां के टेक्सी चालकों और स्थानीय लोगों को इन आते-जाते पर्यटकों की आदत सी हो गयी है। शिलांग में अपना पहला दिन तो मैंने इस छोटे से पहाड़ी शहर में ऐसे ही घूमते हुए बिताया और वहां के कुछ प्रसिद्ध पर्यटन स्थल देखे।

शिलांग के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल – पर्यटकों के प्रमुख आकर्षण 

डॉन बोस्को संग्रहालय 

शिलांग के डॉन बोस्को संग्रहालय में एक पुतला
शिलांग के डॉन बोस्को संग्रहालय में एक पुतला

शिलांग का डॉन बोस्को संग्रहालय एक ऐसी जगह है, जो इस पहाड़ी शहर की यात्रा करने आए हर व्यक्ति को अवश्य देखनी चाहिए। यह संग्रहालय काफी नया है जिसका उद्घाटन 2010 में ही किया गया था। आज तक मैंने भारत में जितने भी संग्रहालय देखे हैं, उन में से यह संग्रहालय उत्तम रूप से संचालित किया जाता है। यहां पर प्रदर्शित वस्तुओं को अच्छी तरह से आयोजित किया गया है। यहां की प्रकाश योजना भी बहुत बढ़िया है, जो परिदर्शकों की हलचल के अनुकूल समंजन करती है। इससे एक तो बिजली की बचत होती है और प्रदर्शित वस्तुओं को भी लगातार कृत्रिम रौशनी का सामन नहीं करना पड़ता। इसके अलावा यहां के प्रत्येक प्रदर्शन कक्ष में टच स्क्रीन कियोस्क हैं, जो आपको प्रदर्शित वस्तुओं के बारे में काफी जानकारी प्रदान करते हैं।

उत्तर पूर्वीय भारत की जनजातियों को दर्शाता प्रदर्शन कक्ष  
उत्तर पूर्व भारतीय जीवन शैली को दर्शाती वस्तुएं – डॉन बोस्को संग्रहालय – शिलांग
उत्तर पूर्व भारतीय जीवन शैली को दर्शाती वस्तुएं – डॉन बोस्को संग्रहालय – शिलांग

इस संग्रहालय में लगभग 17 प्रदर्शन कक्ष हैं, जो उत्तर पूर्वीय भारत की विभिन्न जनजातियों को दर्शाते हैं। संग्रहालय में प्रवेश करते ही वहां पर मौजूद गाइड आपको मुख्य सभागृह से होते हुए अलग-अलग प्रदर्शन कक्षों की सैर करवाते हैं, जो इस भवन के विविध मजलों पर बिखरे हुए हैं और इनमें से आधे तो भूतल के नीचे स्थित हैं। पूरे संग्रहालय की सैर करने के बाद आखिर में आप संग्रहालय के विक्रय कक्ष से अपनी मनपसंद वस्तुएं खरीद सकते हैं। यद्यपि मैंने तो यहां से अपनी कुछ मनपसंद किताबें ही खरीदी हैं, लेकिन मुझे लगता है कि ये विक्रेता इससे भी बेहतर व्यापार कर सकते हैं। अगर इन वस्तुओं की सही-सही कीमत लगा दी जाए तो राज्य के लिए आय इकट्ठा करने का यह एक अच्छा तरीका हो सकता है।

संग्रहालय के प्रवेश द्वारा से रिसेप्शन की ओर जाते समय आपको एक लंबे गलियारे से गुजरना पड़ता है। इस गलियारे के दोनों तरफ अपनी पारंपरिक वेश-भूषा पहने उत्तर पूर्वीय भारत की विभिन्न जनजातियों की महिलाओं और पुरुषों की बड़ी-बड़ी मूर्तियाँ खड़ी हैं, जैसे कि वे आपका स्वागत कर रही हों। इस संग्रहालय में विविध विषयों से संबंधित खास प्रदर्शन कक्ष हैं, जैसे कि पूर्व-इतिहास, भूमि और लोग, मछली पकड़ना, शिकार करना, कृषि प्रथाएँ, पारंपरिक प्रोद्योगिकी, संगीत वाद्य, वस्त्र, पारंपरिक कलाकृतियाँ, शस्त्र, धर्म, संस्कृति, आभूषण, वेश-भूषा, कपड़े, और चित्रकला के प्रदर्शन कक्ष।

संगीत वाद्यों, चित्रकला और कलाकृतियों के प्रदर्शन कक्ष    

मुझे विशेष रूप से यहां के संगीत वाद्यों, चित्रकला और कलाकृतियों के प्रदर्शन कक्ष बहुत पसंद आए। यद्यपि वहां के सभी प्रदर्शन कक्ष काफी आकर्षक और दर्शनीय थे, जिनमें दैनिक जीवन की लगभग सभी वस्तुएं थीं, जैसे मछली पकड़ने और शिकार करने के विभिन्न उपकरण जो बांस और बेंत से बनाए गए थे। संगीत वाद्यों का कक्ष इस क्षेत्र के पारंपरिक वाद्यों से सुंदर रूप से सजाया गया था। तथा चित्रकला और कलाकृतियों के कक्ष सर्जनशीलता का उत्कृष्ट रूप थे। कहीं-कहीं पर कुछ चित्रों और कलाकृतियों को एक दूसरे में सम्मिलित किया गया था, ताकि परिदर्शकों पर इसका उत्तम प्रभाव पड़ सके। उदाहरण के लिए यहां की एक दीवार पर एक योद्धा का चित्र बनाया गया था और उसके हाथों में असली शस्त्र दिये गए थे। इसी प्रकार यहां पर अपनी जनजाति की युद्ध पोशाख पहने, मिट्टी की बनी एक मूर्ति थी जो अपने धनुष्य को तार बांधने में लीन थी। मेरे लिए यह सब कुछ बहुत ही रोचकपूर्ण था।

आभूषण  
नागा प्रजाति का हार – डॉन बोस्को संग्रहालय
नागा प्रजाति का हार – डॉन बोस्को संग्रहालय

इस संग्रहालय की और एक बात जो मुझे बहुत आकर्षक लगी वह थी, यहां पर प्रदर्शित चाँदी और पशुओं की हड्डियों से बने विविध प्रकार के आभूषण। इन आभूषणों की व्यापक विविधता और इन में झलकती प्रत्येक जनजाति की अपनी अलग पहचान सच में एक अप्रतिम बात थी। इन वस्तुओं को नजदीक से देखने तथा समझने का यह मौका सच में अमूल्य था। इसके अतिरिक्त गोदने, कपड़े बुनने और मिट्टी के बर्तनों के विविध रूपों और आकारों को चित्रों के माध्यम से समझाया गया था।

डॉन बोस्को संग्रहालय में स्काईवॉक, शिलांग    
डॉन बोस्को संग्रहालय की छत पर स्काई वाक – शिलांग
डॉन बोस्को संग्रहालय की छत पर स्काई वाक – शिलांग

डॉन बोस्को संग्रहालय की छत स्काईवॉक के रूप में बनाई गयी है। यहां से आप अपने चारों ओर बसे शहर, तथा उसे घेरती पहाड़ियों का सुंदर नज़ारा देख सकते हैं। चित्र रूपी इस दृश्य में समाहित प्रत्येक रंग जैसे एक दूसरे के परिपूरक थे। वह नीला आसमान, घने हरे-भरे पेड़-पौधे, यहां-वहां बिखरे रंगबिरंगी घर और इमारतों की पीली छत, सारे जैसे एक-दूसरे की शोभा बढ़ा रहे थे।

यहां पर एक सभागार है, जहां पर आगंतुकों के लिए उत्तर पूर्वीय भारत के राज्यों से जुड़े कुछ चित्तरंजक विडियो प्रस्तुत किए जाते हैं और इसी के साथ एक गीत भी बजाया जाता है जिसके द्वारा शिलांग की प्रसिद्ध और देखने योग्य जगहों के बारे में थोड़ी-बहुत जानकारी दी जाती है। मुझे ये विडियो बहुत पसंद आए और इनके पीछे का उद्धेश्य वास्तव में बहुत अच्छा था। इसके अलावा यहां पर भारत के आठों उत्तर पूर्वीय राज्यों के विविध नृत्य प्रकारों को दिखानेवाले कुछ विशेष विडियो भी दिखाये जा रहे थे।

वार्डस झील, शिलांग 

वार्ड झील - शिलांग, मेघालय
वार्ड झील – शिलांग, मेघालय

जब हमे पता चला कि हमारा होटल वार्डस झील के पास ही स्थित है, तो हमे बहुत प्रसन्नता हुई। शाम के समय यह झील बहुत ही खूबसूरत दिखती है और यहां का नज़ारा भी उतना ही मनमोहक होता है। दूसरे दिन सुबह-सुबह, हम झील के किनारे बनी पत्थरों की पगडंडी पर सैर करने और आस-पास के विविध प्रकार के कमल और लिली के फूल देखने के इरादे से झील की ओर चले गए। लेकिन वहां पर पहुँचते ही प्रवेशद्वार के पास ही हमे रोका गया और बताया गया कि आगंतुकों के लिए यह द्वार 9 बजे के बाद ही खुलता है। तब तक यह पूरा परिसर विशेष रूप से स्थानीय लोगों के लिए ही खुला होता है, जो सुबह की सैर के लिए नियमित रूप से यहां पर आते हैं। जिनमें से अधिकतर वरिष्ठ सरकारी और सैन्य अधिकारी होते हैं।

यह जानकर हम थोडा बहुत निराश हुए, लेकिन बाद में विचार करने पर मुझे लगा कि वास्तव में यह सही भी है कि, ऐसी जगहों पर सबसे पहले स्थानीय लोगों का अधिकार होना चाहिए और बाद उसके पर्यटकों का। अगले दिन हमे इस सुंदर सी झील को देखने का अच्छा मौका मिला। यह झील परिदृश्यात्मक बगीचों से घिरी हुई है, जहां की जमीन प्रत्येक पग पर थोड़ी उतार-चढ़ाव जैसी है। शहर के बीचोबीच बसी यह जगह आरामदायक सैर के लिए उत्तम है। यहां पर घूमते हुए आप झील के भीतर और आस-पास बिखरे फूलों के विविध और रंगबिरंगी प्रकार देख सकते हैं। इसके अलावा आप यहां नौका विहार का आनंद भी ले सकते हैं। यहां पर लकड़ी का एक पुल भी है जिस पर से चलते हुए आप झील का सुंदर दृश्य देख सकते हैं। यहां का वातावरण और नज़ारे ही कुछ ऐसे हैं जो अपनी प्रशंसा किए बिना आपको आगे बढ्ने नहीं देते और आप जैसे प्रकृति की अद्भुतता में खो से जाते हैं।

शिलांग पीक – शिलांग की सबसे ऊंची चोटी        

शिलांग पीक से शिलांग का दृश्य
शिलांग पीक से शिलांग का दृश्य

शिलांग पीक शिलांग की सबसे ऊंची चोटी है, जो मुख्य शहर से लगभग 10 कि.मी. की दूरी पर एक पहाड़ी पर स्थित है। यहां से आप बादलों की आड़ से नीचे फैले शिलांग शहर का मनोरम दृश्य देख सकते हैं। भारत के अधिकतर पहाड़ी इलाकों में ऐसी ही चोटियाँ हैं, जहां पर पहरे की एक मीनार होती है और वहां से आप अपनी मनचाही तस्वीरें खींच सकते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि, मेघालय जैसे कि बादलों की नागरी है, तो यहां पर हर समय बादलों की चादर बिछी रहती है, इसलिए आपको या तो उनके हटने का इंतजार करना पड़ता है, या फिर उनके द्वारा निर्मित नए-नए नज़रों को आप अपने कैमरे में कैद कर सकते हैं।

शिलांग का एलिफंट फॉल्स

एलीफैंट फाल – शिलांग
एलीफैंट फाल – शिलांग

एलिफंट फॉल्स तक पहुँचने के लिए आपको शिलांग पीक तक जानेवाले मार्ग से थोड़ा विमार्ग होते हुए जाना पड़ता है। इन बहुस्तरीय झरनों की खोज अंग्रेजों द्वारा की गयी थी। कहा जाता है कि जब उनकी खोज हुई थी, तब जिस चट्टान पर ये झरने गिर रहे थे वह हाथी की पीठ जैसी लग रही थी, जिसकी वजह से उन्हें एलिफंट फॉल्स कहा जाने लगा। एक भूकंप के दौरान यह चट्टान टूट गयी लेकिन वह नाम वैसे ही बना रहा। इन झरनों के पीछे की चट्टान काले रंग की है जिस पर झरने का सफ़ेद पानी बिल्कुल विपरीत सा लगता है। इन झरनों की आवाज आप काफी दूर तक सुन सकते हैं। लेकिन उनके ठीक सामने पहुंचे बिना आप उन्हें नहीं देख पाते। इन झरनों के पास बनी सीढ़ियाँ आपको उनके तल तक ले जाती हैं, जो लगभग 150-200 फीट नीचे तक हैं। नीचे उतरते समय आप झरने के प्रत्येक स्तर पर रुककर उसकी सुंदरता का आस्वाद ले सकते हैं। नीचे जाते समय वैसे तो ज्यादा कठिनाई नहीं होती लेकिन वापस ऊपर आते समय आपको थोड़ी मुश्किल जरूर होती है।

जिस दिन हम एलिफंट फॉल्स पर गए थे उस दिन वहां पर बहुत सारे लोग थे, इसलिए डरने की कोई बात नहीं थी। लेकिन अगर आप यहां पर अकेले हों, तो यह जगह कुछ सुनसान और डरावनी सी लगती है।

ख़ासी जनजाति और उनकी वेश-भूषा 

खासी वेशभूषा
खासी वेशभूषा

शिलांग पूर्वीय ख़ासी पहाड़ी जिले में पड़ता है, जो ख़ासी जनजाति की जन्मभूमि है। शिलांग पीक और एलिफंट फॉल्स इन दोनों जगहों पर आप स्वयं ख़ासी वेश-भूषा पहनकर अपनी तस्वीरें खिंचवा सकते हैं। उनके लाल और पीले कपड़े जिसके साथ एक लंबी सी गोलाकार टोपी होती है, जिसे प्लास्टिक के फूलों और चाँदी के सूक्ष्म आभूषणों से सजाया जाता है, बहुत ही सुंदर दिखते हैं। मैंने भी इस सुंदर सी वेश-भूषा में अपनी एक तस्वीर खिंचवायी थी।

शिलांग के अन्य पर्यटन स्थल    

हैदरी पार्क और ज़ू एक और ऐसी जगह है जो अधिकतर पहाड़ी इलाकों में पायी जाती है। यह एक पार्क है जिसमें एक छोटा सा ज़ू होता है। अगर आप कुछ समय के लिए यहां पर ठहरे हुए हों, तो यह स्थान आरामदायक सैर के लिए बहुत अच्छा है। इसके अलावा यहां पर देखने लायक और भी बहुत सी चीजें हैं, जैसे कि कीटविज्ञान संग्रहालय और राज्य संग्रहालय तथा पुस्तकालय जहां पर जाने की मेरी बहुत इच्छा थी। यहां के टेक्सी चालकों की स्थल अवलोकन सूची में ये स्थल मौजूद नहीं थे। उनकी सूची में तो शहर के कुछ ही गिने-चुने पर्यटन स्थल थे, जहां पर वे आपको ले जाते थे। अगर इन स्थलों के अलावा उन्हें और किसी भी स्थान पर ले जाने के लिए कहा जाए तो उनका सीधा जवाब होता था कि उन्होंने इन जगहों के बारे में पहले कभी नहीं सुना था और वैसे भी उन जगहों पर तो कोई भी नहीं जाता तो आप वहां पर क्यों जाना चाहते हैं। ऐसे में मैं अपने टेक्सी चालक तथा उसकी जाति के अन्य चालकों को ठीक से मनाने में नाकाम रही, जिसकी वजह से मैं यहां-वहां के कुछ स्थान नहीं देख पायी।

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मुक्तेश्वर धाम – कुमाऊँ पहाड़ों के न भूलने वाले दृश्य https://inditales.com/hindi/mukteshwar-kumaon-hills-uttarakhand/ https://inditales.com/hindi/mukteshwar-kumaon-hills-uttarakhand/#comments Wed, 11 Oct 2017 02:30:04 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=475

उत्तरांचल को देवभूमि कहा जाता है। सच मानिये इसमें किंचित भी आतिशयोक्ति नहीं। कुमाऊं व गढ़वाल मंडलों में बंटी, हिमालय पर्वत श्रन्खलाओं से घिरी, ये अप्रतिम घाटियों केवल देवों की भूमि, स्वर्ग ही हो सकती है| संभवतः इसीलिए सर्वत्र देवस्थानों से, मुख्यतः भगवान शिव के मंदिरों से सुशोभित है ये भूमि| प्रातः जब सूर्य की […]

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मुक्तेश्वर से हिमालय श्रंखला
मुक्तेश्वर से हिमालय श्रंखला

उत्तरांचल को देवभूमि कहा जाता है। सच मानिये इसमें किंचित भी आतिशयोक्ति नहीं। कुमाऊं व गढ़वाल मंडलों में बंटी, हिमालय पर्वत श्रन्खलाओं से घिरी, ये अप्रतिम घाटियों केवल देवों की भूमि, स्वर्ग ही हो सकती है| संभवतः इसीलिए सर्वत्र देवस्थानों से, मुख्यतः भगवान शिव के मंदिरों से सुशोभित है ये भूमि| प्रातः जब सूर्य की पहली किरण इन पर्वतों को सहला कर धीरे से अँधेरे की परत को सरकाती है, हिमालय का मनोहर मुख प्रकट होकर हमें मंत्रमुग्ध कर देता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो साक्षात स्वर्ग के दर्शन प्राप्त हो गए। इन्ही मनोरम दृश्यों को निहारते हमने उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में स्थित प्रसिद्ध झीलों के सानिध्य में कुछ दिन बिताये। तत्पश्चात हम मुक्तेश्वर के लिए रवाना हो गए।

मुक्तेश्वर में जंगल की सैर

मुक्तेश्वर से हिमालय की चोटियाँ
मुक्तेश्वर से हिमालय की चोटियाँ

अल्मोड़ा से मुक्तेश्वर जानेवाले मार्ग पर स्थित जंगल के दूसरी ओर, सुखताल गाँव में हमारे रहने की व्यवस्था की गयी थी। इस गाँव तक पहुँचने हेतु हमारे पास दो विकल्प थे। मुक्तेश्वर शहर के भीतर से अथवा जंगल होते हुवें । बिना सोच विचार किये हमने, रोमांच से भरपूर जंगल की सैर करते सुखताल पहुँचने का निश्चय किया। जंगल के सुरक्षा जांच चौकी के बही पर हमने अपना पंजीकरण करवाया। यहाँ हमें सुरक्षा संबंधी निर्देश दिए गए जिनके अनुसार १० की.मी. दूर स्थित इस वन के बहिर्गमन द्वार पर पहुँचने तक हमें वाहन से उतरने अथवा मार्ग पर टहलने की सख्त मनाही थी।

इस जंगल के अन्दर गाड़ी से सैर करना किसी स्वप्न से कम नहीं था। मार्च का महीना होने के कारण बुरुंश वृक्ष पुष्पों से आच्छादित थे व अपनी सुन्दरता की चरमसीमा पर थे। घने हरे देवदार वृक्षों के बीच से झांकते गहरे लाल रंग के बुरुंश के पुष्प एक अद्भुत छटा बिखेर रहे थे। जंगल के संकरे मार्ग पर वृक्षों की शाखाएं आच्छादित होकर हमें अपनी छाँव में समेट रही थीं। हर दिशा में जंगल रहस्यमयी प्रतीत हो रहा था, मानो हर झुण्ड एक नयी कहानी छुपाये हुए था।

मुक्तेश्वर के जंगलों से सूर्यास्त
मुक्तेश्वर के जंगलों से सूर्यास्त

घने जंगल से बाहर निकलने तक सूर्यास्त का समय हो चुका था। डूबते सूरज के धुंधले प्रकाश में जब जंगल की ओर मुड़ कर देखा तब वह और भी मायावी प्रतीत होने लगा। डूबते सूर्य के सांध्यप्रकाश में पहाड़ों की केवल छाया दिखाई पड़ रही थी जिन पर ऊंचे देवदार के वृक्षों के केवल रेखा कृति दिखाई पड़ रही थी।

जंगल से कुछ नियत स्थानों पर, झाड़ियों को साफ़ कर जंगल विभाग के कर्मचारियों व उनके परिवार जनों हेतु निवास का प्रबंध किया गया है। यहाँ लोग बिना किसी भय के बाहर घूम सकते है। बहिर्गमन द्वार के समीप पर्यटकों की सुविधा हेतु सराय व विश्राम गृह बनाए गए हैं।

जंगल से बाहर आते ही हम अल्मोड़ा मार्ग पर थे जहां “फ्रोजन वुड्स “ नामक हमारी सुन्दर कुटिया स्थित थी।

मुक्तेश्वर में प्रातःकालीन हिमालयी परिदृश्य का अवलोकन

नंदा देवी चोटी - मुक्तेश्वर
नंदा देवी चोटी – मुक्तेश्वर

भोर होते ही, गले में कैमरे लटकाए, हम हिमालय के दर्शन हेतु निकल पड़े। सड़क पर पैदल चलते चारों ओर के परिदृश्य में खो गए। उस क्षण में अपने आप को खो कर भी बहुत कुछ पा लिया था। सड़क के एक ओर ऊंचे पहाड़ियों पर घने देवदार वृक्ष आसमान छूने का प्रयत्न कर रहे थे। उन पर उछलते तरह तरह के पक्षियों मन मोह रहे थे अपने कलरव के साथ। कठफोड़वा पक्षी देवदार के एक शाखा से दूसरे शाखा पर छलांग लगा रहे थे। घने हरे देवदार वृक्षों पर बैठे नीले चटक रंग के कई नीलकंठ पक्षी सहसा ध्यान आकर्षित कर रहे थे। मार्ग के दूसरी ओर, घाटी में सीड़ीदार खेती देख पाठशाला का स्मरण हो आया। शाला में हम सब ने पढ़ा है कि पहाड़ों में खेती सीड़ीदार पद्धति द्वारा की जाती है। घाटी के उस पार के दृश्य से हमारी आँखे खुली की खुली रह गयीं। बर्फ से ढंकी नंदादेवी व हिमालय पर्वतमाला की अन्य चोटियाँ सूर्योदय के प्रकाश में चमचमा रही थीं।

देवदार के घने हरे जंगल व उसके पीछे श्वेत बर्फीली चोटियाँ अद्भुत दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे। हम इनमें इतने खो गए कि हमारा स्वयं का अस्तित्व पिघलने लगा था। उस क्षण ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो हमारे हृदय का हिमालय से जुड़ा सम्बन्ध सर्वोपरि है। शेष सब महत्वहीन है।

उस क्षण तीव्र इच्छा हो रही थी कि इन चोटियों को घंटों निहारते रहें। परन्तु सूर्योदय के पश्चात कोहरे ने इन्हें अपने आँचल में समेट लिया और हमें स्वप्नों की दुनिया से यथार्थ में लौट आना पड़ा।

मुक्तेश्वर धाम

मुक्तेश्वर धाम मंदिर
मुक्तेश्वर धाम मंदिर

मुक्तेश्वर धाम एक प्राचीन शिवमंदिर है, जिसके नाम पर ही इस शहर व आसपास के इलाके को मुक्तेश्वर कहा जाता है। अन्य कई प्राचीन मंदिरों की तरह यह मंदिर भी एक पहाड़ी के शिखर पर बनाया गया है। यहाँ से हिमालय और हरियाली भरी घाटियों का दृश्य बहुत खूबसूरत दिखाई पड़ता है। यह मंदिर अपने आप में एक छोटा सा मंदिर है। इसके चारों ओर कई और छोटे मंदिर स्थित हैं।

इनमें से एक मंदिर भगवान् शिव की अर्धांगिनी, देवी पार्वती को समर्पित है। एक मंदिर को राम दरबार की उपमा दी गयी है। यहाँ भगवान् राम, देवी सीता, भ्राता लक्ष्मण और सेवक हनुमान की प्रतिमाएं साथ साथ रखी हुई हैं। भगवान् विष्णु के भावी, १० वें अवतार कलकी की भी प्रतिमा स्थापित है। सारे मंदिर बहुत छोटे छोटे है व इनकी संरचना अपेक्षाकृत प्राचीन भी नहीं है। इन मंदिरों के चारों ओर भिन्न भिन्न आकारों की घंटियाँ बंधी हुई हैं। यह एक स्थानीय प्रथा है जिसमें भक्तगण अपनी इच्छा की पूर्ति हेतु यहाँ घंटियाँ बांधते हैं। यही प्रथा हमने जागेश्वर धाम के मार्ग पर स्थित गोलू देवता मंदिर में भी देखी।

मुक्तेश्वर धाम में एक साधु की सहायता से हमने मंदिर को बारीकी से जाना। वे हमसे इतनी धीमी आवाज में चर्चा कर रहे थे मानो बड़ी तपस्या से अर्जित शक्ति का ह्रास नहीं करना चाहते थे। उन्होंने हमारे हर प्रश्न व जिज्ञासा का मुस्कुराकर उत्तर दिया। परन्तु आवाज धीमी होने के कारण मुझे समझने में थोड़ी कठिनाई हो रही थी।

मुक्तेश्वर अर्थात् मुक्ति के देवता! ये हमें जन्म व मृत्यु के चक्र से मुक्ति दिला कर मोक्ष प्रदान करते हैं।

मुक्तेश्वर मंदिर परिसर में लगे फलक द्वारा यह जानकारी प्राप्त हुई कि सिख गुरु नानक देव जी ने इस स्थल की यात्रा की थी। तत्पश्चात यह स्थल सिख समुदाय के लोगों के लिए भी अतिमहत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। जिम कॉर्बेट ने भी अपने संस्मरणों में अपनी मुक्तेश्वर यात्रा का उल्लेख किया है। वे इसे मुक्तेसर कहते थे।

मुक्तेश्वर धाम पहाड़ी की सैर

मुक्तेश्वर धाम पैदल परिक्रमा पथ
मुक्तेश्वर धाम पैदल परिक्रमा पथ

मुक्तेश्वर धाम जिस पहाड़ी पर स्थित है, उसके चारों ओर एक संकरी पगडंडी बनायी हुई है। ऊंचे देवदार वृक्षों की छाँव से ढंकी इस पगडंडी पर हम भी पैदल चल पड़े। इस पहाड़ी के चारों ओर चलते हमें ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो हम मंदिर की परिक्रमा कर रहे हों। सही अर्थ में मंदिर केवल संकेत मात्र था। जिस भगवान् को हम पूजते हैं वे इस सम्पूर्ण पहाड़ी में समायें हुए हैं। इस पहाड़ी पर चलते, भगवान् की अनुभूति के साथ साथ उनके चमत्कारों के भी दर्शन हुए।

करीब १०० मीटर चलने के पश्चात हमें एक विशाल शिलाखण्ड हमारे ऊपर झुकती हुई दिखाई पड़ी। नाग के फन की तरह दिखती इस शिला को नागशिला कहते हैं। कुछ दूरी पर दो विशाल शिलाएं खायी की ओर बाहर झुकी हुई थीं। इनके मध्य धातु का तार बाँध कर जोखिम भरे खेल का आयोजन किया जा रहा था। भिन्न ऊंचाईयों पर स्थित इन दोनों शिलाओं के मध्य इस तार पर चरखियों द्वारा सहभागियों को लटकाया जाता है। गुरुत्वाकर्षण द्वारा ये खिलाड़ी वेगवान गति से निचली शिला तक पहुंचते हैं। दोनों शिलाओं के मध्य ये लोग खायी में लटकते रहते हैं। इस खायी में मेरी झांकने तक की हिम्मत नहीं थी। पतले तार पर लटकते इन लोगों के साहस अथवा दुस्साहस को देख मुझे बहुत अचरज हो रहा था।

चौली की जाली

चौली की जाली मुक्तेश्वर कुमाऊँ
चौली की जाली मुक्तेश्वर कुमाऊँ

कुछ दूर और चलने पर हमने कुछ ऊबड़ खाबड़ चट्टानें देखीं जो खायी की ओर लटकी हुई थीं। हमारा परिदर्शक हमें उन सारी देशी व विदेशी चलचित्रों के बारे में रस ले कर बताने में व्यस्त हो गया जिन्हें इस स्थान पर फिल्माया गया था।

शिलाओं का यह एक अद्भुत गठन था। खाई में लटकी इन शिलाओं पर खड़े होकर नीचे झांकना किसी दृढ़ ह्रदय धारक के ही बस की बात है। यहाँ से नीचे खाई में भिन्न भिन्न हरे रंगों की छटाएं बिखरी बहुत मनोहारी प्रतीत हो रही थीं। यहाँ से तीन भिन्न प्राकृतिक संरचनाएं स्पष्ट दिखाई पड़ रही थीं। ऊपर नीला आकाश, नीचे घने देवदार वृक्षों की बिछी हरियाली व मध्य में स्वच्छ श्वेत बर्फ से ढंकी हिमालय की चोटियाँ। यह वही हिमालय की चोटियाँ हैं जिन्हें हमने ‘फ्रोजन वुड्स’ से भी देखा था।

चौली की जाली से मुख्तेश्वर का विहंगम दृश्य
चौली की जाली से मुख्तेश्वर का विहंगम दृश्य

इन शिलाखंडों पर लिखे नामों को देख ज्ञात होता है कि यह स्थल पर्यटकों में बहुत प्रसिद्ध है। परन्तु इस तरह खूबसूरत स्थलों की स्वच्छता नष्ट करना अपराध भी है। हमने यहाँ एक छेद युक्त शिलाखंड भी देखा। हमारे परिदर्शक के अनुसार इसी छेद के कारण इसका नाम चौली की जाली पड़ गया। संतान की इच्छा रखती सौभाग्यवती स्त्रियाँ शिवरात्री के दिन इस छेद के पार जाती हैं। खाई में लटकते इस चिकने शिलाखंड के छेद से गुजरने की कल्पना मात्र से मैं सिहर उठी। किवदंतियों के अनुसार यहीं देवी ने दानव का वध किया था। शिला पर उपस्थित चिन्ह इसी युद्ध के प्रतीक हैं।

पहाड़ से लटकी हुई चट्टानें
पहाड़ से लटकी हुई चट्टानें

खाई से नीचे देखने पर सीड़ीदार खेत ऊपर से बहुत सुन्दर प्रतीत होते हैं। यहाँ की सुन्दरता को एक और आयाम प्रदान करते हैं। पत्थरों की चढ़ाई, लटकती रस्सी पर चढ़ना व उतरना इत्यादि रोमांचक खेलों हेतु यह अति उपयुक्त स्थान है।

पहाड़ों की सैर

देवदार के घने जंगल - मुक्तेश्वर
देवदार के घने जंगल – मुक्तेश्वर

चौली की जाली व यहाँ के विहंगम दृश्यों के अवलोकन के पश्चात हम पहाड़ी के दूसरी ओर चल पड़े। संकरी पगडंडियों से होते, वृक्षों का आलिंगन करते, हम इस जंगल में समाने लगे थे। धीरे धीरे ऊपर चढ़ते अंततः हम पहाड़ी के ऊपर स्थित मंदिर तक पहुँच गए।

सीढ़ीदार पहाड़ी खेत - मुक्तेश्वर
सीढ़ीदार पहाड़ी खेत – मुक्तेश्वर

हमने यहाँ गोली मारने के आखेट का भी अभ्यास किया। कुल मिलाकर यह भ्रमण प्रकृति, अचंभा, जोखिम, आखेट, मनोरंजन, भोजन और आध्यात्मिकता का अनोखा मिश्रण था।

मुक्तेश्वर १९ वीं. ई. में बनाई गयी भारतीय पशुचिकित्सा अनुसंधान केंद्र के लिए भी प्रसिद्ध है।

मुक्तेश्वर की यात्रा मनोरंजक बनाने हेतु सुझाव

नीला आकाश, हरी भरी घाटियाँ और श्वेत हिमालय पर्वतमाला - मुक्तेश्वर
नीला आकाश, हरी भरी घाटियाँ और श्वेत हिमालय पर्वतमाला – मुक्तेश्वर

• मुक्तेश्वर पहुँचने हेतु निकटतम रेल स्थानक, ६५ की.मी. दूर स्थित काठगोदाम में है। यहाँ से सड़क मार्ग द्वारा ही मुक्तेश्वर पहुंचा जा सकता है।
• मुक्तेश्वर, अल्मोड़ा से ३५ की.मी. दूर स्थित है। हमारे यात्रा के समय मार्गों की अवस्था भी उत्तम थी।
• हिमालय की सुन्दरता का अनुभव प्राप्त करने का सर्वोत्तम समय प्रातःकाल है। इस हेतु सूर्योदय पूर्व जागने की तैयारी आवश्यक है। आप रहने हेतु ऐसे स्थान का चयन कर सकते हैं जहां से परिदृश्य स्पष्ट दिखाई दे।
• परिदृश्य अवलोकन हेतु सर्वोत्तम स्थान पहाड़ी के ऊपर स्थित मुक्तेश्वर मंदिर है।
• मुक्तेश्वर भ्रमण के समय बाहर भोजन हेतु केवल नूडल्स के ठेले उपलब्ध हैं।
• पीने का पानी सदैव साथ रखें।
• वर्षा ऋतु को छोड़कर हर ऋतू मुक्तेश्वर व कुमाऊं भ्रमण हेतु उपयुक्त है।

हिंदी अनुवाद : मधुमिता ताम्हणे

अन्य यात्रा संस्मरण

हिमाचल के लाल सेबों की कहानी 

चित्कुल – भारत – तिब्बत सीमे पे बसा एक गाँव

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