प्राचीन भारत Archives - Inditales श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Wed, 20 Dec 2023 04:06:05 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.7.5 कंदरिया महादेव मंदिर- खजुराहो का विश्व धरोहर स्थल https://inditales.com/hindi/kandariya-mahadev-mandir-khajuraho-vishwa-dharohar/ https://inditales.com/hindi/kandariya-mahadev-mandir-khajuraho-vishwa-dharohar/#respond Wed, 07 Feb 2024 02:30:01 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3380

खजुराहो स्थित कंदरिया महादेव मंदिर उत्तर भारतीय मंदिर स्थापत्य शैली का एक उत्कृष्ट प्रतीक है। १०-११वीं सदी में निर्मित यह मणि चंदेल वंश के राजाओं की देन है। चंदेल साम्राज्य को जेजाकभुक्ति कहा जाता था तथा खजुराहो अथवा खर्जुरवाहक उसकी राजधानी थी। १०- ११वीं सदी में सम्पूर्ण भारत ने उस काल में प्रचलित भारतीय मंदिर […]

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खजुराहो स्थित कंदरिया महादेव मंदिर उत्तर भारतीय मंदिर स्थापत्य शैली का एक उत्कृष्ट प्रतीक है। १०-११वीं सदी में निर्मित यह मणि चंदेल वंश के राजाओं की देन है। चंदेल साम्राज्य को जेजाकभुक्ति कहा जाता था तथा खजुराहो अथवा खर्जुरवाहक उसकी राजधानी थी।

कंदरिया महादेव और जगदम्बी मंदिर - खजुराहो
कंदरिया महादेव और जगदम्बी मंदिर – खजुराहो

१०- ११वीं सदी में सम्पूर्ण भारत ने उस काल में प्रचलित भारतीय मंदिर स्थापत्य की सभी शैलियों के कुछ सर्वोत्कृष्ट रचनाओं के दर्शन किये हैं। उनके कुछ सर्वोत्तम उदहारण हैं, तंजावुर का बृहदीश्वर मंदिर, कर्नाटक के होयसल मंदिर, मोढेरा का सूर्य मंदिर, भुवनेश्वर का लिंगराज मंदिर आदि।

कंदरिया महादेव मंदिर का इतिहास

मंदिर के मंडप पर लगे शिलालेखों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण राजा विद्याधर ने करवाया था। उन्होंने ११वीं सदी के उत्तरार्ध में इस क्षेत्र में अपना अधिपत्य स्थापित किया था। उनकी सर्वोत्तम उपलब्धियों में से एक है, महमूद गजनवी के प्रथम आक्रमण को सफलता पूर्वक कुचल देना। महमूद गजनवी कुछ वर्षों उपरांत पुनः लौटा था। उसका यह आक्रमण भी अनिर्णायक सिद्ध हुआ था। कुछ सूत्रों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण महमूद गजनवी की पराजय का उत्सव मनाने के लिए ही किया गया था।

इस मंदिर का निर्माण सन् १०२५-५०ई. के मध्य हुआ था।

कंदरिया महादेव के शिखर
कंदरिया महादेव के शिखर

संभव है कि इस मंदिर की संकल्पना विश्वनाथ द्वारा की गयी थी जो विद्याधर के पूर्वज थे। यह चंदेल वंश के कुलदेव भगवान शिव का मंदिर है। जिस कालावधि में इस मंदिर का निर्माण हुआ था, वह कालावधि निसंदेह भारतीय मंदिर स्थापत्य कला शैली का स्वर्णिम युग था।

सन् १९८६ से खजुराहो के इस कंदरिया महादेव मंदिर को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का मान प्राप्त हुआ है।

कंदरिया शब्द की व्युत्पत्ति

कंदरिया शब्द की व्युत्पत्ति कन्दरा शब्द से हुई है। कन्दरा का अर्थ है, पर्वत अथवा धरती पर स्थित मानव निर्मित अथवा प्राकृतिक गुफा। अतः कंदरिया महादेव का सरल अर्थ है, कन्दराओं के महादेव।

ऐसा कहा जाता है कि मातंगेश्वर मंदिर एवं विश्वनाथ मंदिर के संग कंदरिया महादेव मंदिर खजुराहो के तीन प्रमुख शिव मंदिरों के त्रयी की रचना करता है। इनके अतिरक्त तीन देवी मंदिर भी हैं जो चौसठ योगिनियाँ, छत्री देवी एवं जगदम्बी के लिए हैं। ये तीन मंदिर भी एक अन्य प्रतिच्छेदन त्रिभुज की रचना करते हैं। ये छः मंदिर एकत्र रूप में एक यंत्र की रचना करते हैं। यह यंत्र एक पावन आकृति है जिसका विस्तृत विवरण यहाँ इस शोध पत्र में किया गया है।

कंदरिया महादेव मंदिर का दर्शन

शीत ऋतु की वह शीतल प्रभात मुझे अब भी स्मरण है। मैं मंदिर के समक्ष खड़ी मंदिर को निहार रही थी। सूर्य की किरणें मंदिर की परिरेखा से अठखेलियाँ खेल रहीं थी। उनके प्रातःकालीन वार्तालापों को हम लगभग सुन व समझ पा रहे थे।

दमकता हुआ कंदरिया महादेव
दमकता हुआ कंदरिया महादेव

सूर्य की प्रथम किरणों के प्रकाश में मंदिर चमचमा रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो यह मंदिर उत्कीर्णित शिलाखंडों द्वारा नहीं, अपितु चन्दन के उत्कीर्णित काष्ठों द्वारा निर्मित हो। उनकी सौम्य गुलाबी रंग की विविध छटाएं सूर्य की किरणों के संग लुका-छिपी का खेल खेल रहीं थी।

मंदिर के गठन में मुझे एक लय का अनुभव हो रहा था। वह लय जगती, मंडप एवं शिखर के सही अनुपात में निहित था अथवा कदाचित स्थापत्य विदों ने महादेव के कैलाश पर्वत की यहाँ पुनरावृत्ति करने के लिए सर्वोत्तम सूत्रों का प्रयोग किया है, मुझे ज्ञात नहीं। मुझे केवल इतना स्मरण है कि मेरे नेत्र अश्रु जल से भर गए थे। मुझे अपने एवं मंदिर के मध्य एक अद्भुत संस्पंदन का अनुभव हो रहा था। इस अनुभव ने मेरे एवं मंदिर के मध्य सम्बन्ध को एक नवीन परिभाषा प्रदान कर दी थी।

कंदरिया महादेव मंदिर का स्थापत्य
कंदरिया महादेव मंदिर का स्थापत्य

मैंने इस अद्वितीय अद्भुत अनुभव का उल्लेख अपनी पुस्तक, ‘Lotus In The stone – Sacred Journeys in Eternal India’ में भी किया है।

गत संध्या के समय मैंने एक दृश्य एवं श्रव्य प्रदर्शन में इस मंदिर को जीवंत होते देखा था। मैंने इसकी बाह्य सुन्दरता को नेत्र भर कर निहारा था। किन्तु प्रातः काल मंदिर एवं मेरे मध्य जिस लय की रचना हुई, उसने मेरे अंतर्मन को भेध दिया था। उसने मुझे अंतर्बाह्य मोह लिया था।

मंदिर की स्थापत्य कला

खजुराहो के अन्य मंदिरों के अनुरूप इस मंदिर की संरचना भी बलुआ शिलाओं द्वारा की गयी है। गुलाबी एवं पीतवर्ण की भिन्न भिन्न छटाओं में रंगी बलुआ शिलाएं केन नदी के तट पर स्थित पन्ना की खदानों से लायी गयी हैं।

कंदरिया मंदिर खजुराहो मंदिर संकुल के पश्चिमी भाग पर स्थित मंदिरों में से एक है। यह मंदिर एक उच्च जगती पर स्वतन्त्र रूप से स्थापित है। इसके चारों ओर किसी भी प्रकार का प्राकार उपस्थित नहीं है। इसी कारण मंदिर की परिक्रमा करते हुए आप चारों ओर से इसकी सुन्दरता का अवलोकन कर सकते हैं। दो अन्य मंदिर भी इसी जगती पर स्थापित हैं। उनमें से एक लघु मंदिर भगवान शिव का है तथा एक मंदिर देवी जगदम्बी का है।

खजुराहो का विशालतम मंदिर

कंदरिया महादेव मंदिर इस संकुल का विशालतम मंदिर होते हुए भी एक सघन व सुगठित मंदिर है। पूर्व-पश्चिम अक्षांश पर स्थित इस मंदिर की लम्बाई ३०.५ मीटर व चौड़ाई २० मीटर है। ३१ मीटर ऊँचा मंदिर ४ मीटर ऊँचे जगती पर स्थापित है। इस मंदिर में एक ठेठ हिन्दू मंदिर के सभी तत्व उपस्थित हैं।

एक अर्ध मंडप के मध्य से आप मंदिर में प्रवेश करते हैं। यह प्रवेश द्वार आपको मंदिर के मुख्य मंडप तक ले जाता है। मंडप एवं गर्भगृह के मध्य सम्बन्ध स्थापित करता एक अंतराल है। गर्भगृह के चारों ओर परिक्रमा पथ है।

शिखर का लय

मंदिर का संग्रथित शिखर समूह एक ऐसा तत्व है जो इस मंदिर को एक लय प्रदान करता है। मंदिर का संयुक्त शिखर ८४ स्वतन्त्र शिखरों द्वारा संरचित है। प्रत्येक शिखर दूसरे की प्रतिकृति है। जैसे जैसे ऊपर जाते हैं, समरूप शिखरों के आकार में संवृद्धि होती जाती है। ऐसा प्रतीत होता है मानो शिखरों का उंचा ढेर हो। एक प्रकार से यह कैलाश पर्वत की प्रतिकृति प्रतीत होता है जो भगवान शिव का प्रिय निवास स्थान है। इस संरचना का चुनाव कदाचित इसीलिए किया गया हो ताकि भगवान शिव को यह स्वयं का भवन प्रतीत हो।

मंडप को महामंडप कहा जाता है क्योंकि इसमें अनेक गलियारे हैं जिनके झरोखे बाहर की ओर खुलते हैं। मंदिर के दोनों पार्श्वभागों पर एवं पृष्ठभाग पर प्रलंबन हैं जिन पर ये झरोखे निर्मित हैं। इन झरोखों के आतंरिक भागों पर बैठकों की सुविधाएं प्रदान की गयी हैं। ये बैठकें इतनी विशाल हैं कि हम असमंजस में पड़ जाते हैं कि ये ध्यान साधना के लिए हैं अथवा किसी अनुष्ठान के लिए हैं।

बाह्य भित्तियाँ

बाह्य भित्तियों पर अप्रतिम आकृतियाँ उत्कीर्णित हैं जिनमें प्रमुख हैं, गजाकृतियाँ, अश्वाकृतियाँ, संगीतज्ञ, नर्तक, वाद्य यंत्र, दैनन्दिनी जीवन के विभिन्न आयाम जिनमें प्रेमशास्त्र भी सम्मिलित है।

मैथुन - गर्भगृह और मंडप के मिलन बिंदु पर
मैथुन – गर्भगृह और मंडप के मिलन बिंदु पर

झरोखों के स्तर पर स्थित तीन पट्टिकाओं पर अधिक विस्तृत एवं सुस्पष्ट शिल्प हैं। इन पट्टिकाओं पर देवी-देवताओं के शिल्प हैं। एक शिव मंदिर होने के नाते उन शिल्पों में प्रमुख रूप से शिव की प्रतिमाएं हैं। कहीं कहीं वे अपनी शक्ति के संग भी विराजमान हैं। उन शिल्पों में सप्तमातृकाओं की भी प्रतिमाएं हैं। अन्य शिल्प हैं, सुर सुंदरियाँ, प्रेमशास्त्र संबंधी शिल्प जो विशेषतः गर्भगृह एवं मंडप के संगम पर प्रदर्शित हैं, नाग एवं व्याल आकृतियाँ आदि।

सुर सुंदरियाँ
सुर सुंदरियाँ

मंदिर की बाह्य भित्तियों पर रचित स्त्रियों के शिल्प सभी मापदंडों में सर्वोत्तम हैं। उनके शरीर के विभिन्न अंगों को सही अनुपात में उकेरा गया है। उनके शरीर के उभारों को विभिन्न मुद्राओं की सहायता से विशिष्टता प्रदान की गयी है। जैसे खड़े होने की त्रिभंगी मुद्रा जिसमें उनकी शारीरिक मुद्रा तीन स्थानों पर वक्र होती है। उनके आभूषणों एवं उनके उत्तम महीन वस्त्रों की परतों के शिल्प आपको मंत्रमुग्ध कर देंगे।

मंदिर के भीतर प्रवेश

मंदिर के प्रवेश द्वार पर एक आकर्षक मकर तोरण है जिसके छोरों पर मगर के मुख की आकृतियाँ हैं। यह तोरण एकल शिलाखंड को उत्कीर्णित कर निर्मित किया गया है। कंदरिया महादेव मंदिर खजुराहो का इकलौता मंदिर है जिसमें दो मकर तोरण हैं।

मंदिर की भीतरी छत
मंदिर की भीतरी छत

मंदिर की छत शिलाखंड द्वारा निर्मित है जिस पर संकेन्द्रीय वृत्त के आकार में प्रचुर मात्रा में उत्कीर्णन किया गया है। अद्भुत, असाधारण, विलक्षण, अद्वितीय, आश्चर्य चकित कर देने वाले, सूक्षमता एवं सौंदर्य का अद्भुत सम्मिश्रण! मैं इस स्तर तक सम्मोहित हो गयी थी कि उनके लिए जितने विशेषणों का प्रयोग करूँ, मेरे लिए वे कम ही होंगे।

स्तंभों पर पुष्प की बेलें उत्कीर्णित हैं।

प्रसिद्ध इतिहासकार एवं भारतीय मंदिर वास्तुकला के विशेषज्ञ जॉर्ज मिचेल के अनुसार मंदिर की बाह्य भित्तियों पर ६४६ प्रतिमाएं उत्कीर्णित हैं। वहीं आतंरिक भित्तियों पर २२६ प्रतिमाएं उत्कीर्णित हैं।

क्या कंदरिया महादेव मंदिर को अनुष्ठानिक मंदिर बनाया जा सकता है?

जैसा कि नाम से विदित होता है, कंदरिया मंदिर एक शिव मंदिर है। वर्तमान में यह अनुष्ठानिक मंदिर नहीं है, अर्थात् यहाँ किसी भी प्रकार की पूजा-अर्चना अथवा अनुष्ठान का आयोजन नहीं किया जाता है। मेरी हार्दिक अभिलाषा है कि इस मंदिर में भगवान की प्राण प्रतिष्ठा की जाए तथा यह मंदिर पुनः एक जीवंत अनुष्ठानिक शिव मंदिर बने।

यह मंदिर इतना मनमोहक व अप्रतिम है कि इसकी अविस्मरणीय सुन्दरता पर अनेक साहित्य लिखे जा सकते हैं। इसके चित्र एवं चलचित्र हमें मंत्रमुग्ध कर देते हैं। इसके विलक्षण सौंदर्य पर यदि दिव्य उर्जा का तिलक लग जाए तो इसे आध्यात्मिक रूप से भी जीवंत किया जा सकता है। इससे सभी प्रकार के दर्शनार्थियों को लाभ प्राप्त हो सकेगा।

जैसा कि स्थापति पोन्नी सेल्वनाथ ने बताया, हमारे शास्त्रों में भी परित्यक्त मंदिरों के जीर्णोद्धार के विषय में विस्तृत रूप से उल्लेख किया गया है।

यह मंदिर हमारे लिए ना केवल वास्तुकला के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, अपितु खजुराहो के पवित्र भौगोलिक महत्ता के संरक्षण के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह भारतीय मंदिर वास्तुशैली व स्थापत्यकला के स्वर्णिम युग से प्राप्त एक विलक्षण मणि है। इसे जीवंत रखना ना केवल हमारा उत्तरदायित्व है, अपितु हमारे लिए आवश्यक भी है।

यात्रा सुझाव

यह मंदिर दर्शनार्थियों के लिए सूर्योदय से सूर्यास्त तक सप्ताह के सातों दिवस खुला रहता है।

खजुराहो में स्वयं का विमानतल है। यह रेल मार्ग द्वारा भी देश के अन्य नगरों से सुगम रूप से सम्बद्ध है। झांसी से खजुराहो तक उत्तम सड़क मार्ग उपलब्ध है।

कंदरिया महादेव मंदिर खजुराहो के मंदिरों के पश्चिमी समूह का एक भाग है। खजुराहो पहुँचते ही, लगभग सभी मार्ग आपको इस मंदिर तक ले जायेंगे।

खजुराहो में सभी स्तर के अनेक विश्रामगृह उपलब्ध हैं। हम मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग द्वारा संचालित विश्रामगृह में ठहरे थे जो इन मंदिरों के अत्यंत निकट स्थित है। यहाँ से आप पदभ्रमण करते हुए सुगमता से मंदिर तक जा सकते हैं। प्रातः शीघ्र दर्शन करना उत्तम होगा।

यह एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है। यहाँ देशी पर्यटकों के साथ साथ बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक भी आते हैं। अतः खजुराहो की गलियों में विविध प्रकार के स्वादिष्ट देशी एवं विदेशी व्यंजन उपलब्ध होते हैं।

खजुराहो के मंदिर समूह का दर्शन करने के लिए १-२ दिवसों का समय पर्याप्त है। मेरा सुझाव है कि इस मंदिर के दर्शन के लिए कम से कम एक घंटे का समय अवश्य रखें।

यह यूनेस्को द्वारा घोषित एक विश्व धरोहर स्थल है। यहाँ पर्यटन परिदर्शक या गाइड तथा श्रव्य परिदर्शन की सुविधाएं आसानी से उपलब्ध हैं। मेरा सुझाव है कि आप भारतीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा अनुमोदित परिदर्शकों की ही सेवायें लें। आपको जिस गति से भ्रमण करना हो, उसकी सूचना देते हुए सुगमता से मंदिरों का अवलोकन करें।

अधिकाँश मंदिरों में छायाचित्रीकरण निषिद्ध नहीं है।

संध्या के समय दृश्य एवं श्रव्य प्रदर्शन किया जाता है जिसे देखना ना भूलें।

खजुराहो भ्रमण के साथ आप पन्ना राष्ट्रीय उद्यान, ओरछा एवं झांसी के दर्शनीय स्थलों का भ्रमण भी नियोजित कर सकते हैं।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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ताला का देवरानी-जेठानी का मंदिर, बिलासपुर, छत्तीसगढ़  https://inditales.com/hindi/tala-bilaspur-devrani-jethani-mandir/ https://inditales.com/hindi/tala-bilaspur-devrani-jethani-mandir/#respond Wed, 20 Dec 2023 02:30:04 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=839

ताला और मल्हार जैसे नाम सुनते ही सबसे पहले आपके दिमाग में एक ऐसी जगह आती है जो संगीत से जुड़ी हो, लेकिन वास्तव में यह जगह छत्तीसगढ़ की वास्तुकला संबंधी विरासत का प्रमुख केंद्र है। मनियारी और शिवनाथ नदी के संगम बिन्दु के आस-पास बसी इस जगह पर शायद शैव पंथियों का प्रभुत्व है, […]

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ताला और मल्हार जैसे नाम सुनते ही सबसे पहले आपके दिमाग में एक ऐसी जगह आती है जो संगीत से जुड़ी हो, लेकिन वास्तव में यह जगह छत्तीसगढ़ की वास्तुकला संबंधी विरासत का प्रमुख केंद्र है। मनियारी और शिवनाथ नदी के संगम बिन्दु के आस-पास बसी इस जगह पर शायद शैव पंथियों का प्रभुत्व है, हालांकि इस क्षेत्र में आपको कदम-कदम पर रामायण से जुड़े उपाख्यान सुनने को मिलते हैं।

ताला बिलासपुर का देवरानी जेठानी मंदिर परिसर
ताला बिलासपुर का देवरानी जेठानी मंदिर परिसर

हमे बताया गया कि ताला विशेष रूप से तांत्रिक विद्याओं और प्रथाओं के लिए प्रचलित है।

तो चलिये ताला में स्थित देवरानी – जेठानी के इन दो मंदिरों के बारे में जानते हैं।

बिलासपुर – छत्तीसगढ़ के पर्यटन स्थल

देवरानी – जेठानी का मंदिर

यहाँ पर दो प्राचीन मंदिरों के अवशेष पाए जाते हैं। दोनों मंदिर एक-दूसरे से कुछ ही मीटर की दूरी पर बसे हुए हैं।  सार्वजनिक रूप से यह देवरानी – जेठानी के मंदिरों के नाम से जाने जाते हैं। उपाख्यान बताते हैं, कि ये मंदिर यहाँ के राजसी परिवार के दो भाइयों की पत्नियों के लिए बनवाए गए थे।

जेठानी मंदिर

जेठानी का मंदिर अब पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका है। एक समय में जो पत्थर मंदिर के रूप में खड़े हुआ करते थे, वे आज एक-दूसरे के ऊपर ऐसे ही पड़े हुए हैं। इन पत्थरों पर उत्कीर्णित विविध आकृतियाँ छोटे-छोटे कोनों से बाहर झाँकती हुई नज़र आती हैं।

मंदिर के अवशेष
मंदिर के अवशेष

यहाँ पर आप उत्कीर्णित हाथी भी देख सकते हैं, जो शायद मंदिर के प्रवेश द्वार पर खड़े हुआ करते थे। यहाँ पर कुछ टूटे हुए उत्कीर्णित स्तंभ भी हैं जो कभी इस मंदिर की छत का भार संभालते थे। इसके अतिरिक्त आप मंदिर की पूरी की पूरी छत जमीन पर बिखरी पड़ी हुई देख सकते हैं।

देवरानी मंदिर

देवरानी के मंदिर का आधारभूत मंच आज भी ज्यों का त्यों हैं और इसी के साथ मुख्य मंदिर तक जाती सीढ़ियाँ भी वैसी की वैसी हैं। इस मंदिर के द्वार की चौखट पर भी गुजरते हुए काल से हुई क्षति के ज्यादा निशान नहीं मिलते। यह चौखट आज भी इस प्रकार खड़ी है, जैसे कि वह आपको इस मंदिर के गौरवपूर्ण अतीत की झलकियाँ प्रदान कर रही हो। यह पूरी चौखट जटिल और नाजुक नक्काशी काम से सजी हुई है।

मंदिर के उत्कीर्णित पाषाण द्वार
मंदिर के उत्कीर्णित पाषाण द्वार

उसकी मोटी-मोटी दीवारों पर विस्तृत रूप से सिंह की मुखाकृतियाँ और मनुष्यों की आकृतियाँ उत्कीर्णित की गयी हैं, जो शायद किसी कथा का बयान करती हैं या फिर किसी घटना को दर्शाती हैं। उसके कोने गुलाब की वेणियों के रूप में तराशे गए हैं, जो विभिन्न आकारों में बनी हुई हैं। इस चौखट की सीधी किनारी पर कमल की वेणियाँ तराशी गयी हैं।

यहाँ पर खड़े स्तंभों के ऊपर अमलका बने हुए हैं और उनके मूल में पूर्ण घटक हैं। इस चौखट के ऊपरी भाग पर दिव्य आकृतियाँ बनी हुई हैं और उसी के नीचे वाली पट्टिका पर शायद देवी-देवताओं की आकृतियाँ बनी हुई हैं, जिन्हें ठीक से पहचानना थोड़ा मुश्किल है। तो कुछ पट्टिकाओं पर नृत्य करते पुरुषों के चित्र हैं, जिनके पैर असंगत रूप से छोटे हैं; जैसे कि मंदिर के बाहर पड़ी गणेश जी की मूर्ति है।

यहाँ के अधिकतर पत्थरों को जोड़ने का प्रयास किया गया है। इन पत्थरों को देखते हुए यह बता पाना थोड़ा मुश्किल है कि ये सभी पत्थर उसी मंदिर के हैं या नहीं। इस मंदिर का निर्माण इस प्रकार किया गया है कि, मंदिर तक जाती सीढ़ियाँ चढ़कर जब आप ऊपर पहुँचते हैं तो उस उच्चतम स्थान बिन्दु पर आपको मंदिर का गर्भ-गृह नज़र आता है। मंदिर के अवशेषों से यह बता पाना थोड़ा कठिन है कि उसकी शिखर किस प्रकार की थी। लेकिन भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो उड़ीसा और खजुराहो के बीच बसे होने के कारण यह कहा जा सकता है कि शायद उसकी शिखर नागर शैली में बनाई गई होगी।

श्री सिद्धनाथ आश्रम

ताला के देवरानी – जेठानी के इन मंदिरों तक पहुँचने के लिए आपको अपेक्षाकृत कुछ नए मंदिरों से होकर गुजरना पड़ता है। इन मंदिरों तक जाने वाले मार्ग पर बने मेहराब पर नज़र आनेवाले बड़े-बड़े अक्षरों के अनुसार इस जगह को श्री सिद्धनाथ आश्रम के नाम से जाना जाता है। इस आश्रम का निर्माण 2008 में किया गया था।

संग्रहालय में ऋषि मूर्ति
संग्रहालय में ऋषि मूर्ति

इन प्राचीन मंदिरों के पास खड़े सफ़ेद त्रिकोणी शिखरोंवाले ये नए मंदिर काफी आकर्षक लग रहे थे। यहाँ पर एक छोटा सा अस्थायी संग्रहालय है जिसमें इस जगह से, खुदाई के दौरान प्राप्त कुछ मूर्तियाँ रखी गयी हैं। इन में से कुछ टूटी हुई मूर्तियों को सीमेंट के प्रयोग से फिर से संपूर्णता प्रदान करने की कोशिश की गयी है। मेरे विचार से अगर यह कार्य संरक्षण संस्थाओं को सौपा जाता तो शायद वे इससे भी बेहतर कार्य करतीं।

इन मूर्तियों के संबंध में भी यहाँ पर कोई दस्तावेजीकरण नहीं मिलता। यहाँ तक कि इन मंदिरों से संबंधित जानकारी प्रदान करने वाले सूचना फलकों को भी थोड़ी-बहुत मरम्मत की आवश्यकता है। और अगर इन सूचना फलकों को अंग्रेज़ी में भी प्रस्तुत किया गया तो राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों के लिए इन्हें समझना और भी आसान हो सकता है।

कहा जाता है कि ताला ये सभी मंदिर मनियारी नदी के किनारे बसे हुए हैं, लेकिन हो सकता है कि मैं इस वास्तुकलात्मक विरासत में इतनी खो गयी थी की नदी की तरफ मेरा ध्यान ही नहीं गया; या फिर शायद यह नदी उतनी नजदीक नहीं थी कि हम उसे देख पाते।

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राजा भोज का भोजेश्वर मंदिर – भोजपुर का प्रसिद्ध शिवलिंग https://inditales.com/hindi/bhojeshwar-mandir-bhojpur-madhya-pradesh/ https://inditales.com/hindi/bhojeshwar-mandir-bhojpur-madhya-pradesh/#comments Wed, 08 Nov 2023 02:30:52 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3318

मैंने जब सर्वप्रथम भोजपुर का नाम सुना था तब मुझे इस लोकप्रिय हिन्दी मुहावरे का स्मरण हो आया था, “कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली”। इस मुहावरे का प्रयोग साधारणतः दो विपरीत स्थितियों को दर्शाने के लिए किया जाता है। कदाचित यह मुहावरा राजा भोज की छवि एवं उनके राज्य की समृद्धि को दर्शाने के […]

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मैंने जब सर्वप्रथम भोजपुर का नाम सुना था तब मुझे इस लोकप्रिय हिन्दी मुहावरे का स्मरण हो आया था, “कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली”। इस मुहावरे का प्रयोग साधारणतः दो विपरीत स्थितियों को दर्शाने के लिए किया जाता है। कदाचित यह मुहावरा राजा भोज की छवि एवं उनके राज्य की समृद्धि को दर्शाने के लिए भी सर्वोपयुक्त है। राजा भोज के राज्य की भव्यता एवं सम्पन्नता निसंदेह असाधारण व अतुलनीय थी।

भोजपुर का यह भोजेश्वर मंदिर उसी समृद्ध एवं भव्य राज्य का एकमात्र जीवंत प्रमाण है।

राजा भोज कौन थे?

राजा भोज परमार वंश के राजा थे। वे उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के वंशज माने जाते हैं। उन्होंने सन् १०१० से १०५५ तक मालवा क्षेत्र में राज्य किया था। उनकी राजधानी धार नगरी थी जो अब धार नाम से जानी जाती है। ऐसा कहा जाता है कि यह क्षेत्र तलवारों की धार के कारण प्रसिद्ध थी। इसीलिए इसे धार नगरी कहा जाता था।

भोजेश्वर मंदिर के स्तम्भ, चौखटें और लिंग
भोजेश्वर मंदिर के स्तम्भ, चौखटें और लिंग

राजा भोज एक शक्तिशाली राजा थे। उन्होंने दूर दूर के क्षेत्रों तक अपने सैन्य अभियान क्रियान्वित थे। भोज राजा ने अनेक मंदिरों का निर्माण कराया था तथा अनेक भव्य मंदिरों के निर्माण का नियोजन भी किया था। भोपाल एवं उसके आसपास स्थित तालाबों के निर्माण का श्रेय भी उन्ही को जाता है। वास्तव में भोजेश्वर मंदिर भीमताल नामक एक विशाल सरोवर के निकट बनाया गया था। बेतवा नदी पर बाँध निर्मित कर इस विशाल सरोवर की रचना हुई थी।

राजा भोज की एक अन्य उपलब्धि भी है जिसके विषय में अधिक लोगों को जानकारी नहीं है। वे शिक्षा एवं साहित्य के अनन्य उपासक थे। उन्होंने स्थापत्य कला से लेकर दर्शन शास्त्र, औषधि शास्त्र तथा संगीत जैसे विषयों पर लगभग ८४ पुस्तकें लिखी थीं। वे बहुमुखी प्रतिभा से संपन्न एक विद्वान राजा थे जिनके विषय में यह प्रसिद्ध धारणा बन गयी थी कि वे साक्षात् ज्ञान की देवी सरस्वती को ही धरती पर ले आये थे। धार में उनके द्वारा स्थापित महाविद्यालय, कालान्तर में जिसे भोजशाला कहा गया, उनकी इसी बहुआयामी व्यक्तित्व का साक्ष्य है। उदयपुर प्रशस्ति शिलालेख से संकेत प्राप्त होता है कि उन्होंने धार में लगभग १०४ मंदिरों का निर्माण कराया था। दुर्भाग्य से वे सभी अब अस्तित्वहीन हो चुके हैं।

भोपाल नगर का यह नामकरण राजा भोज की ही देन है। आरम्भ में इसे भोजपाल कहा जाता था जो कालांतर में अपभ्रंशित होते हुए भोपाल कहलाया।

विजयनगर साम्राज्य के राजा कृष्णदेवराय ने भोज राजा से प्रभावित होकर स्वयं को अभिनव-भोज तथा सकल-काल-भोज की उपाधि से अलंकृत किया था।

भोजेश्वर मंदिर – भोजपुर का अभिनव शिव मंदिर

भोजपुर शिव मंदिर की विशाल योनि
भोजपुर शिव मंदिर की विशाल योनि

भोजेश्वर मंदिर, राजा भोज के भव्य भोजपुर नगर से सम्बंधित केवल यही रचना शेष है। काली शिला में निर्मित एक विशाल शिव मंदिर, जो अपूर्ण होते हुए भी जीवंत है। यहाँ भगवान शिव की नियमित पूजा-अर्चना की जाती है। ११वीं सदी के मध्यकाल में निर्मित इस मंदिर की संरचना कभी पूर्ण नहीं हुई। अपने इस अपूर्ण रूप में यह मंदिर अपनी निर्माण प्रक्रिया के विषय में विस्तृत जानकारी प्रदान करता है।

विशाल शिवलिंग

भोजपुर का भोजेश्वर मंदिर विशेषतः अपने विशाल शिवलिंग के लिए अत्यंत लोकप्रिय है। जैसा कि हम जानते हैं, शिवलिंग के दो भाग होते हैं, लिंग एवं योनि। शिवलिंग की निचली पीठिका भाग योनि कहलाता है। इस मंदिर के शिवलिंग की योनि अतिविशाल एवं सुन्दर है। कदाचित, इससे अधिक विशाल योनि आपने कहीं नहीं देखी होगी। जहाँ तक लिंग का प्रश्न है, वह भी विशाल है किन्तु मैं उसे विशालतम नहीं कहूंगी। खजुराहो के मतंगेश्वर मंदिर का लिंग इससे भी अधिक विशाल है।

भोजपुर शिव मंदिर की छत
भोजपुर शिव मंदिर की छत

यह शिवलिंग चूना पत्थर के अनेक आवरणों द्वारा निर्मित है। सम्पूर्ण शिवलिंग की ऊँचाई लगभग ४० फीट है।

मंदिर की भीतरी छत संकेंद्रित वृत्तों की आकृति से उत्कीर्णित है जिसे देख खजुराहो के मंदिरों का स्मरण हो आता है।

मंदिर में चार अष्टकोणीय स्तम्भ हैं। भित्तियों को देख ऐसा प्रतीत होता है मानो उन्हें कालांतर में निर्मित किया गया है। अथवा कालांतर में उनका नवीनीकरण किया गया होगा क्योंकि शेष मंदिर के अलंकरण की तुलना में भित्तियाँ साधारण प्रतीत होती हैं। स्तम्भों के ऊपरी कोष्ठकों पर शिव-पार्वती, ब्रह्म-ब्रह्मणी, लक्ष्मी-नारायण एवं राम-सीता की छवियाँ उत्कीर्णित हैं।

मेरे अनुमान से आरम्भ में यह मंदिर चार स्तम्भों पर आधारित एक खुला मंदिर रहा होगा, जैसे कि बहुधा शिव मंदिरों की संरचना होती है। किन्तु मेरे इस प्रस्थापित सिद्धांत का कोई प्रमाण नहीं है।

भोजेश्वर मंदिर की स्थापत्य शैली

यह मंदिर एक विशाल चबूतरे पर निर्मित है जिसे जगती कहते हैं। यह उस काल की प्रचलित शैली थी।

अपूर्ण भोजेश्वर महादेव मंदिर
अपूर्ण भोजेश्वर महादेव मंदिर

मंदिर में सभा मंडप नहीं है। जगती पर स्थापित यह एक स्वतन्त्र मंदिर है।

गर्भगृह का शिखर, मंदिर निर्माण की नागर शैली में प्रचलित वक्रीय आकार में ना होकर सरलरेखीय है। मंदिर के केवल अग्र भाग में अप्सराओं, गणों तथा अन्य देवी-देवताओं के शिल्प उत्कीर्णित हैं। मंदिर की अन्य भित्तियों पर शिल्पकारी नहीं है, मानो वे शिव की कथाओं पर आधारित शिल्पों के उत्कीर्णन की प्रतीक्षा कर रही हों।

मकरनाल
मकरनाल

शिखर के आकार के कारण कुछ विद्वानों का मानना है कि यह एक स्वर्गारोहण प्रासाद है। अर्थात् वह मंदिर जिसे स्वर्गवासी पूर्वजों की स्मृति में निर्मित किया जाता है।

शिला ढोने के लिए ढालू मार्ग

मंदिर के दाहिनी ओर एक विशाल ढालू मार्ग है। मेरा अनुमान है कि इसकी रचना मंदिर के निर्माण के लिए विशाल शिलाओं को जगती तक ले जाने के लिए की गयी होगी। यदि हम इस ढालू मार्ग का दर्शन नहीं करते तो हमारी यह मनन श्रंखला अखंड जारी रहती कि विशाल शिलाओं एवं शैलशिल्पों को इस विशालकाय जगती के ऊपर किस प्रकार ले जाया गया होगा! अथवा इस जगती के निर्माण के लिए भी विशालकाय शिलाओं को यहाँ तक कैसे लाया होगा!

आपको स्मरण होगा कि तंजावुर के बृहदीश्वर मंदिर के विशाल शिलाखंड को ले जाने के लिए भी ढालू मार्ग का प्रयोग किया गया था।

मंदिर की अवधारणा शिला पर
मंदिर की अवधारणा शिला पर

मंदिर के समीप एक खदान है जहाँ भिन्न भिन्न चरणों में अनेक उत्कीर्णित शैलशिल्प रखे हुए हैं। अब ये भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा अधिगृहीत हैं। मंदिर के चारों ओर चट्टानों पर मंदिर के वास्तु चित्र रेखांकित हैं। उन्हें देख यह अनुमान लगा सकते हैं कि प्रारंभ में एक विशाल मंदिर परिसर की संरचना नियोजित थी। इस प्रकल्प के चरणागत निर्माणकार्य के प्रबंधन के लिए किये गए चिन्ह भी इन चट्टानों पर दृष्टिगोचर होते हैं।

मुख्य मंदिर के बाह्य भाग में दो लघु मंदिर हैं। यहाँ भी नियमित पूजा-अर्चना होती है। दाहिनी ओर स्थित लघु मंदिर की बाह्य भित्तियों पर कुछ अपूर्ण कलाकृतियाँ दृष्टिगोचर होती हैं। इन कलाकृतियों से मंदिर निर्माण अवधि में निर्माण कार्य की प्रगति का प्रत्यक्षीकरण होता है।

उत्खनन

इस स्थान पर किये गए उत्खनन से यह जानकारी प्राप्त होती है कि यहाँ इससे अधिक मंदिरों के निर्माण की योजना बनाई गयी थी। कदाचित खजुराहो के पदचिन्हों पर विस्तृत मंदिर संकुल के निर्माण की योजना थी। किन्ही अप्रत्याशित कारणों से उस योजना को बीच में ही स्थगित कर देना पड़ा होगा।

भोजपुर में एक और शिवलिंग
भोजपुर में एक और शिवलिंग

भोजेश्वर मंदिर का पर्याप्त निर्माण कार्य पूर्ण किया गया ताकि शिवलिंग की स्थापना कर उसकी पूजा-अर्चना आरम्भ हो सके। आज भी पूजा-अर्चना की प्रथा अनवरत अखंडित है।

प्रत्येक वर्ष महाशिवरात्रि के दिवस यहाँ विशाल महाशिवरात्रि मेला लगता है।

भोजपुर के अन्य दर्शनीय स्थल

भोजेश्वर मंदिर के निकट एक भोजेश्वर मंदिर संग्रहालय है। यह संग्रहालय आपको मंदिर की दृष्टि से इस क्षेत्र के इतिहास का परिचय देता है।

यदि आप मंदिर के ऊँचे विशाल जगती पर खड़े होकर चारों ओर दृष्टि दौड़ायेंगे तो आपको इस क्षेत्र के अंधाधुंध आधुनिकरण के चिन्ह दृष्टिगोचर होंगे। हमारे समक्ष विशाल औद्योगिक इकाइयाँ थीं जो अपने भीमकाय चिमनियों से आकाश में काले घने धुंए की धार उत्सर्जित कर रही थीं। समीप स्थित मंडीदीप नामक औद्योगिक नगरी आकाश को प्रदूषित करने में अपना योगदान दे रही थी।

मंडीदीप के समीप एक अपूर्ण जैन मंदिर है जो शांतिनाथ जी को समर्पित है।

बेतवा की संकरी घाटी में पार्वती गुफा है जहाँ अनेक संतों ने साधना की है।

मंदिर के समीप राजा भोज के प्राचीन राजमहल के अवशेष देखे जा सकते हैं। राजा भोज ने भारतीय वास्तुशास्त्र पर एक पुस्तक लिखी थी, समरांगणसूत्रधार। इस पुस्तक में उन्होंने इस महल के विषय में विस्तृत जानकारी दी है। इन अवशेषों में आप उस महल की कल्पना कर सकते हैं जिसका उल्लेख इस पुस्तक में किया गया है।

यह सब देख मुझे तीव्र पीड़ा होती है कि मैंने भारत के उस स्वर्णिम काल में जन्म क्यों नहीं लिया! एक स्थान से दूसरे स्थान जाकर उस स्वर्णिम इतिहास के अवशेषों को ढूँढने के स्थान पर मैंने भारत की सम्पन्नता एवं सौंदर्य की चरमसीमा का अनुभव प्राप्त किया होता।

यात्रा सुझाव

भोजपुर भोपाल से लगभग ३२ किलोमीटर दूर स्थित है। आप भोपाल से एक दिवसीय यात्रा के रूप में भोजेश्वर मंदिर एवं आसपास के स्थलों का आसानी से दर्शन कर सकते हैं।

भोपाल देश के सभी भागों से वायु, रेल तथा सड़क मार्गों द्वारा सुगमता से संयुक्त है।

मंदिर दर्शन के लिए एक घंटे का समय पर्याप्त है।

भोजपुर भ्रमण को सांची भ्रमण एवं भीमबेटका भ्रमण के साथ भी किया जा सकता है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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भारत के जलगत पुरातत्व – अवसरों का सागर https://inditales.com/hindi/jalgat-puratattva-bharat-itihasa-bhavishya/ https://inditales.com/hindi/jalgat-puratattva-bharat-itihasa-bhavishya/#respond Wed, 06 Sep 2023 02:30:17 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3174

अनुराधा : नमस्ते। इंडीटेल्स के अन्तर्गत, डीटुअर्स में चर्चा करने के लिए आज हमारे साथ है, डॉ. अनुरुद्ध सिंह गौर, जो एक समुद्री पुरातत्त्वविद् (marine archeologist) हैं। जलगत पुरातत्व से मेरा सर्वप्रथम सामना तब हुआ था जब मैं द्वारका गयी थी। मैंने उससे संबंधित एक पुस्तक भी पढ़ी थी जिसके लेखक डॉ. एस आर राव […]

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अनुराधा : नमस्ते। इंडीटेल्स के अन्तर्गत, डीटुअर्स में चर्चा करने के लिए आज हमारे साथ है, डॉ. अनुरुद्ध सिंह गौर, जो एक समुद्री पुरातत्त्वविद् (marine archeologist) हैं। जलगत पुरातत्व से मेरा सर्वप्रथम सामना तब हुआ था जब मैं द्वारका गयी थी। मैंने उससे संबंधित एक पुस्तक भी पढ़ी थी जिसके लेखक डॉ. एस आर राव थे, जिन्होंने द्वारका के पुरातत्व पर शोध किया था। तब मुझे ज्ञात हुआ कि यह शोध कार्य राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान, गोवा (National Institute of Oceanography) द्वारा किया गया था जो मेरे घर के अत्यंत समीप स्थित है। तब मैंने डॉ. अनुरुद्ध सिंह गौर से अनुरोध किया कि वे हमें जलगत पुरातत्व के विषय में कुछ जानकारी दें। अनुरुद्ध जी, डीटुअर्स में आपका स्वागत है।

भारत का जलगत पुरातत्व

ए एस गौर : आपका बहुत बहुत धन्यवाद अनुराधा जी। मुझे यह जानकार प्रसन्नता हुई कि जलगत पुरातत्व में आपकी रूचि है। राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान में हमारा यह अधिदेश होता है, हमारा ध्येय होता है कि हम समुद्र विज्ञान के प्रत्येक आयाम के विषय में जानकारी प्राप्त करें। इसके अंतर्गत समुद्र संबंधी भौतिकी, रसायन विज्ञान एवं जीव विज्ञान तीनों आते हैं। हम में से वैज्ञानिकों का एक छोटा समूह जलगत पुरातात्विक धरोहरों पर भी कार्य कर रहा है।

जलगत पुरातत्व क्या है?

समुद्र की सतह कभी स्थिर नहीं रहती। वह ऊपर-नीचे होती रहती है।

ऐसा कहा जाता है कि १०,००० वर्ष पूर्व समुद्र की सतह आज से लगभग १०० मीटर नीचे थी। इसका अर्थ है कि आज जो क्षेत्र जलगत है, वह उस काल में जल से बाहर था। उस समय तटीय क्षेत्र की अधिकाँश जनसँख्या उन स्थानों में निवास करती थी।

जलगत वसाहत

जलगत पुरातत्व का एक आयाम है, जलगत खँडहर। प्राचीन काल से समय के साथ लम्बे समय के लिए अनुपलब्ध जैसे जैसे समुद्र का स्तर बढ़ने लगा, वैसे वैसे अनेक वसाहती क्षेत्र जलगत हो गए। इससे हम जैसे पुरातत्ववेत्ताओं के लिए शोध के अवसर उत्पन्न हो गए हैं।

जब समुद्र का स्तर १-२ मीटर बढ़ा तब उन क्षेत्रों में, जहाँ भूमि की ढलान अधिक नहीं थी, इसका अधिक प्रभाव पड़ा, जैसे गुजरात एवं तमिल नाडू। इससे वहाँ की वसाहत भी प्रभावित हुई। प्राचीन काल में गुजरात के तटीय क्षेत्र में १ मीटर जल स्तर बढ़ने पर ही एक बड़ा क्षेत्र वसाहत के लिए उपलब्ध नहीं रहा। लोग उस स्थान को त्याग कर स्थानांतरित हो गए। वह स्थान जलगत खँडहर बन गया। अब उसकी पुनः खोज करने का सुअवसर हमें प्राप्त हुआ।

जहाजों के अवशेष

जलगत पुरातत्व का दूसरा आयाम है, जहाजों के अवशेष। सिन्धु घाटी सभ्यता से भी पूर्व से जल परिवहन मनुष्य जाति का अभिन्न अंग रहा है। उसने समकालीन संस्कृति एवं सभ्यता के साथ व्यापार एवं वाणिज्य को जन्म दिया। अनेक सूत्रों से यह सर्वविदित है कि सिन्धु घाटी सभ्यता के लोगों ने मेसोपोटामिया एवं मिस्र सभ्यता के लोगों के साथ जल मार्ग द्वारा ही व्यापार किया था। ओमान एवं संयुक्त अरब अमीरात की पुरातनता के कारण व्यापार के लिए थल मार्ग उपलब्ध नहीं था। थल मार्ग होता भी तो अत्याधिक लंबा होता। वहीं जल मार्ग अपेक्षाकृत अत्यंत छोटा था।

भारत का जलगत पुरातत्व मानचित्र
भारत का जलगत पुरातत्व मानचित्र

यदि आप मेसोपोटामिया एवं मिस्र से तुलना करें तो सिन्धु घाटी सभ्यता का तटीय क्षेत्र सर्वाधिक लंबा था। इसी कारण अपने समकालीन सभ्यताओं की तुलना में सिन्धु घाटी सभ्यता की समुद्री गतिविधियाँ अपेक्षाकृत अत्यधिक उन्नत थी। जल मार्ग द्वारा परिवहन में मानवी त्रुटियों एवं अनपेक्षित प्रतिकूल हवामान की भी संभावना अत्यधित रहती है। इन सब का परिणाम होता है, बड़े बड़े पोतों का जलमग्न हो जाना। भारतीय तटीय क्षेत्रों के निकट हमें समुद्र तल पर अनेक पोतों के अवशेष मिले हैं।

व्यापार एवं वाणिज्य

तीसरा प्रमुख आयाम जिसे हम समझने का प्रयास करते हैं, वह है व्यापार एवं वाणिज्य। इनका अनेक अभिलेखों में उल्लेख किया गया है। जैसे एक विदेशी सूत्र, ‘पेरिप्लस ऑफ दि एरिथ्रीयन सी’ में कहा गया है कि मध्य भारत के उज्जैन से अनेक वस्तुओं का जल मार्ग द्वारा व्यापार किया जाता था जिसके लिए उन वस्तुओं को सर्वप्रथम वर्यकाजा अथवा भरुकच्च  के तट पर लाया जाता था। इस प्रकार समुद्री विज्ञान के अंतर्गत अनेक विषयों पर शोध किया जा सकता है।

मानवी सभ्यता के विकास में समुद्री क्रियाकलापों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। जल परिवहन द्वारा विचारों का आदान-प्रदान संभव हो पाया जो विकास का एक प्रमुख आयाम है। समुद्री क्रियाकलापों एवं व्यापार मार्गों ने एक दूसरे की आवश्यकताओं को समझने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अन्यथा यदि सभ्यताएँ संकुचित रह जातीं तो आज उनका इतना विकास नहीं हो पाता।

सिन्धु घाटी सभ्यता के समय सभ्यता की जो नींव रखी गयी थी, वह अनवरत चलती रही। न्यूटन के विज्ञान के पश्चात भी सभ्यता में परिवर्तन की कोई आवश्यकता नहीं थी। ना नगर नियोजन में किसी परिवर्तन की आवश्यकता रही, ना ही धातु विज्ञान, माप प्रणाली, कृषि प्रणाली आदि में।

गुजरात का समुद्री पुरातत्व

हमने अपने शोध का आरंभ गुजरात से किया था जहाँ हमें सभी कालखंडों के अवशेष प्राप्त हुए थे। उनमें सिन्धु घाटी सभ्यता, विभिन्न ऐतिहासिक कालखंड, मध्यकालीन कालखंड आदि सम्मिलित हैं। गुजरात तट की लंबाई लगभग २००० किलोमीटर है। वहाँ अनेक बंदरगाह हैं। हमने हमारा प्रथम अन्वेषण द्वारका एवं बेट द्वारका से आरंभ किया था। यह एक ऐसा इकलौता स्थान है जो शेष सौराष्ट्र से ओखा रण नामक रण द्वारा पृथक है। इस क्षेत्र को ओखा मंडल भी कहते हैं। प्राचीन काल में इसे उषा मंडल भी कहते थे क्योंकि इसका संबंध महाभारत के एक पात्र अनिरुद्ध एवं उनकी पत्नी उषा से है।

बेट द्वारका से प्राप्त लंगर
बेट द्वारका से प्राप्त लंगर

ओखामंडल में अनेक पुरातात्विक स्थल हैं, जैसे द्वारका, बेट द्वारका एवं नागेश्वर। वहाँ एक दर्जन से भी अधिक ऐसे स्थल हैं जो ऐतिहासिक कालखंड तथा मध्यकालीन कालखंड के हैं। ये सभी स्थल किसी ना किसी वर्त्तमान कालीन धार्मिक सिद्धांतों से जुड़े हुए हैं। उनमें से प्राचीनतम सिद्धांत है, नागेश्वर, जो एक सिन्धु घाटी सभ्यता का स्थल है। द्वारका अथवा बेट द्वारका तथा अन्य स्थल आरंभिक ऐतिहासिक कालखंड एवं मध्यकालीन सभ्यता से संबंधित हैं। समुद्र के भीतर शोध के द्वारा हमने यही जानकारी एकत्र की है तथा देखा है।

द्वारका

द्वारका में जल के भीतर, लगभग ३ से १० मीटर की गहराई में हमें अनेक संरचनाओं के अवशेष प्राप्त हुए। उन शैल संरचनाओं में कुछ भित्तियाँ, गोलाकार शैल संरचनाएं आदि प्रमुख हैं। वहाँ हमें बड़ी संख्या में शैल लंगर भी प्राप्त हुए। यह इस ओर संकेत करता है कि यहाँ बंदरगाह था। बंदरगाहों में लंगरों की आवश्यकता होती है। उन अवशेषों से यह संकेत प्राप्त होता है कि वह प्राचीनतम बंदरगाहों में से एक था। वहाँ डॉ. राव एवं डेक्कन कॉलेज द्वारा किये गए भूमि उत्खनन के कार्य से यह जानकारी प्राप्त हुई कि द्वारका का लगभग पाँच से छः गुना क्षेत्र जलमग्न हो गया तथा बालू के नीचे दब गया।

हमने देखा है कि सुनामी तथा चक्रवाती तूफानों जैसी प्राकृतिक आपदाओं के कारण पूर्वी तटों को भारी क्षति पहुँची है। जैसे सन् २००४ में आयी सुनामी का परिणाम हम सब ने देखा है। इस प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं का सामना द्वारका ने भी किया होगा। अनेक ज्ञात सूत्रों में इनका उल्लेख किया गया है। महाभारत में भी कहा गया है कि द्वारका समुद्र में समा गयी थी। यह सत्य है कि नगरी का अधिकाँश भाग समुद्र द्वारा नष्ट हो गया था।

बेट द्वारका

बेट द्वारका में जब हम घाट के निकट अन्वेषण कर रहे थे, हमें एक पोत के अवशेष प्राप्त हुए। यदि हमारा अनुमान सही है तो यह प्राचीनतम पोत अवशेष हैं जो भारत-रोम काल का है। ये अवशेष अनुमानतः १८००-२००० वर्ष प्राचीन हो सकते हैं। ये अवशेष उस स्थान पर अब तक के प्राचीनतम अवशेष हैं जिन्हें हमने खोज निकाला था।

द्वारका जलगत पुरातत्त्व
द्वारका जलगत पुरातत्त्व

बेट द्वारका में हमें मछली पकड़ने का एक सुन्दर काँटा मिला जो वहाँ के भूभाग क्षेत्र से प्राप्त हुआ। यह काँटा सिन्धु घाटी सभ्यता के अंतिम भाग का प्रतीत होता है। कदाचित ४००० वर्ष प्राचीन है। उस मछली पकड़ने के कांटे में जिस तकनीक का प्रयोग किया गया था, वही तकनीक अब भी प्रयोग में लाई जाती है।

इस कांटे की लम्बाई लगभग ७ सेंटीमीटर है। जब हमने वहाँ के स्थानिकों से चर्चा की, उन्होंने हमें बताया कि इस कांटे से लगभग १०-१५ किलो की बड़ी मछली को पकड़ा जा सकता है। ऐसी मछलियाँ गहरे पानी में होती हैं जिनको पकड़ने के लिए उन्हें किसी नौका की आवश्यकता पड़ी होगी। इस प्रकार हमें एक कलाकृति से ही कई जानकारियाँ प्राप्त हो जाती हैं।

पावन शंख

बेट द्वारका क्षेत्र का अन्वेषण इस ओर संकेत करता है कि इस क्षेत्र में शंखों की कार्यशालाएं थीं। हमें यहाँ अनेक पवित्र शंख प्राप्त हुए जो भगवान विष्णु का प्रतीक हैं। यहाँ अनेक प्रकार की मछलियाँ भी पायी जाती थीं। जब हम ओखामंडल क्षेत्र से दक्षिण की ओर आये तब हम मूल द्वारका एवं विश्वाड़ा पहुँचे। गुजरात में चार द्वारका हैं। यहाँ भी हमें उसी प्रकार की वस्तुएं प्राप्त हुईं। जल के भीतर हमें शैल लंगर मिले, वहीं जलमग्न भूभाग में आरंभिक ऐतिहासिक काल के अवशेष मिले। २० किलोमीटर उत्तर में हमें हड़प्पा काल के अवशेष प्राप्त हुए।

पोरबंदर में हमें अनेक साक्ष्य प्राप्त हुए जो मध्यकाल के साथ साथ ब्रिटिश काल की ओर संकेत करते हैं। पूर्व की ओर नवीबंदर है जहाँ तट पर एक दुर्ग है। यह दुर्ग डाकुओं से नाविकों का संरक्षण करता था। हमें अनेक ऐसे साक्ष्य प्राप्त हुए हैं जो यह संकेत करते हैं कि वहाँ के निवासी विदेशों से व्यापार व वाणिज्य संबंध बनाए हुए थे। अब हम सोमनाथ आते हैं, जिसे प्रभास क्षेत्र भी कहते हैं। मंदिर के दक्षिणी ओर भी हमें वही शैल लंगर इत्यादि प्राप्त हुए जो द्वारका में प्राप्त हुए थे। प्रभास स्वयं की एक हड़प्पा स्थल है जहाँ से हमें हड़प्पा पूर्व के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।

डेक्कन कॉलेज द्वारा किये गए उत्खनन से यह ज्ञात हुआ कि नदी के समीप एक गोदाम था। यह स्थान हिरण्य नदी के किनारे है जो आगे जाकर समुद्र में विलीन हो जाती है। वह स्थान उस काल में अवश्य एक बन्दरगाह रहा होगा। समुद्री क्रियाकलापों का एक प्रमाणिक साक्ष्य शैल लंगर को माना जा सकता है।

शैल लंगर

अनुराधा : इन शैल लंगरों की आयु कैसे अनुमानित की जाती है?

ए एस गौर : यह लंगरों की निर्मिती तकनीक पर निर्भर करता है। प्राचील काल के लंगर शिला द्वारा बनाए जाते थे जबकि अब लोहे का प्रयोग किया जाता है। प्राचीन लंगरों में स्थानीय शिलाओं का प्रयोग किया जाता था। इस प्रकार शिलाओं के प्रकार एवं तकनीक द्वारा हम उनकी आयु का अनुमान लगा सकते हैं।

सोमनाथ से कोडीनार आते हैं जो पुनः एक मूल द्वारका क्षेत्र है। वहाँ तट पर दो हड़प्पा स्थल हैं। उस क्षेत्र में लगभग आधा दर्जन प्रारंभिक ऐतिहासिक पुरातात्विक स्थल हैं। मूल द्वारका, जहाँ द्वारकाधीश मंदिर स्थित है, एक ४-५ मीटर ऊँची बेलनाकार संरचना है। स्थानिक इसे दिवा दांडी कहते हैं जिसका अर्थ है प्रकाश स्तंभ। सन् १९८० तक इसका उपयोग किया जाता था जिसके पश्चात एक चक्रवात ने इसके ऊपरी भाग को क्षतिग्रस्त कर दिया था। यदि हमारा अनुमान तथा स्थानिकों की मान्यता सही हैं तो मध्यकालीन, लगभग १२-१३वीं सदी का यह प्रकाश स्तंभ भारत का प्राचीनतम जीवित प्रकाश स्तंभ है।

हमें ऐसे प्रमाण मिले हैं जो यह संकेत करते हैं कि गुजराती व्यापारी सुकुत्रा द्वीप जाते थे जो यमन के दक्षिणी ओर स्थित है। वहाँ हक नामक एक गुफा है जहाँ से लगभग २०० अभिलेख प्राप्त हुए हैं। उनमें से लगभग १८० अभिलेख ब्राह्मी में लिखित हैं जो १-३री सदी से सम्बद्ध हैं। हक गुफा में कई मुहरें भी मिली हैं जिनकी रूपरेखा एवं उन पर किये गए चित्र अथवा अभिलेख भरूच में प्राप्त मुहरों जैसे हैं।

शिकोत्रा माता मंदिर

गुजरात में अनेक तटीय मंदिर हैं जो शिकोत्रा माता या सिकोतर माता को समर्पित हैं। डॉ. एस आर राव तथा मेरा भी मानना है कि शिकोत्रा माता नाम या सिकोतर माता नाम सुकुत्रा द्वीप से ही आया है क्योंकि लोग जब अपनी नौकाएं लेकर सुकुत्रा द्वीप तक जाकर वापिस आते थे तब अपनी सुरक्षित यात्रा के लिए माता का धन्यवाद करते थे। हमने भारत में देखा है, जो भी मानव का संरक्षण करता है, हम उसकी आराधना करते हैं।

अनुराधा : जैसे शक्ति माता यात्राओं में तथा अन्यथा भी हमारी सदैव रक्षा करती हैं।

ए एस गौर : सत्यनारायण की कथा में भी यही बताया गया है जहाँ व्यापारी व्यापार के लिए अपने बेड़े लेकर दूर-सुदूर देशों में जाते हैं तथा वापिस आकर भगवान की पूजा करते हैं। ये सभी कथाएं व्यापारी समाज से ही संबंधित होती हैं। इनके अतिरिक्त हड़प्पा स्थल लोथल एवं गोगा में भी अनेक प्रमाण मिले हैं। ये तटीय स्थल हैं। भारत सरकार अब इसे राष्ट्रीय समुद्री विरासत परिसर के रूप में विकसित कर रही है। इस प्रकार गुजरात प्राचीन समुद्री व्यापार एवं वाणिज्य के सर्वाधिक महत्वपूर्ण आयामों का साक्षी रहा है। सभ्यता के आरम्भ से व्यापार गुजरातियों के खून में बसा हुआ है। दक्षिण की ओर महाराष्ट्र में आयें तो सोपारा एक महत्वपूर्ण स्थल है जहाँ एलिफेंटा जैसे अनेक व्यापारिक केंद्र स्थल थे।

महाराष्ट्र का समुद्री पुरातत्व

अनुराधा : एलिफेंटा एक दुर्लभ गुफा प्रणाली है जो पूर्णतः भगवान शिव को समर्पित है। एक प्रकार से यह कहा जा सकता है कि इन गुफाओं में सम्पूर्ण शिव पुराण लिखा हुआ है। यह द्वीप एक व्यापारिक बन्दर के रूप में कैसा रहा होगा?

ए एस गौर : यह वास्तव में घारापुरी के नाम से जाना जाता था। यह भारत-रोम काल में एक बंदरगाह था जब समुद्र का स्तर अपेक्षाकृत नीचे था। कदाचित उस समय कल्याण या सोपारा जैसे बंदरगाह नहीं थे। रोम के सिक्के तथा उस काल से संबंधित अनेक वस्तुएं यहाँ प्राप्त हुए हैं।

दाभोल

दक्षिण की ओर जाते हुए हम दाभोल पहुँचते हैं। यहाँ तट पर एक अनोखा लोयलेश्वर मंदिर है। लंगर का अर्थ मराठी भाषा में लोयली होता है। इस मंदिर में वे एक लंगर को ही देवी के रूप में पूजते थे। दाभोल मुंबई से लगभग २०० किलोमीटर दक्षिण की ओर स्थित है। उससे दक्षिण की ओर आयें तो वहाँ विजयदुर्ग किला एवं पोतगाह है जो मराठा कालीन है। इसके दक्षिण की ओर सिंधुदुर्ग है। यह दुर्ग एक छोटे द्वीप पर स्थित है। वहाँ भी हमें शैल लंगर प्राप्त हुए हैं।

गोवा से प्राप्त लंगर
गोवा से प्राप्त लंगर

गोवा में भी हमें ४-५ पोतों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। पिलार क्षेत्र के निकट एक बन्दरगाह है जिसका नाम गोपकपट्टनम है। वहाँ हमें ऐसे प्रमाण मिले है जो यह संकेत करते हैं कि वह एक बंदरगाह था तथा यहाँ से व्यपारिक गतिविधियाँ की जाती थीं। केरल में हमने कोल्लम में भी गोताखोरी की है। वहाँ से हमें कई चीनी सिक्के प्राप्त हुए हैं। कदाचित वहाँ भी कोई पोत दुर्घटनाग्रस्त हुआ था क्योंकि खोज के समय वहाँ से बड़ी संख्या में सिक्के एवं कुम्हारी के अवशेष मिले हैं।

अनुराधा : केरल में अब भी मछली पकड़ने के लिए चीनी जाल का प्रयोग किया जाता है।

ए एस गौर : ऐसा लगता है कि चीन से लोग व्यापार के लिए कोल्लम तक आते थे। यहाँ से वे वस्तुएं अन्य पोतों द्वारा विभिन्न स्थानों तक पहुँचाते थे। कोल्लम में एक चाइना कॉलोनी भी है। गुजरात के हाथा में भी हमें एक लंगर मिला था जो चीनी लंगर के समान था।

लक्षद्वीप के दक्षिणतम द्वीप, मिनिकॉय में हमने तीन से चार दुर्घटनाग्रस्त पोतों का अन्वेषण किया था।

भारत के पूर्वी तट के पुरातत्व स्थल

भारत के पूर्वी तट पर एक प्रसिद्ध स्थल है, पूम्पुहार जहाँ पर हमने पुरातात्विक अन्वेषण किया था। हमें यह सुझाया गया था कि पश्चिमी तट पर बसे द्वारका के ही समान भारत के पूर्वी तट पर भी पूम्पुहार में संगम काल में एक नगरी बसी हुई थी। पाँच से छः मीटर गहरे अंतर्ज्वारीय क्षेत्र में हमें उस समय के कुम्हारी के अवशेष प्राप्त हुए थे। स्थानिक किवदंतियों के अनुसार वहाँ के राजा ने इंद्रदेव का उत्सव नहीं मनाया था जिसके कारण वह नगरी जलमग्न हो गयी थी। अब हम कह सकते हैं कि वह नगरी वास्तव में जलमग्न हो गयी थी।

द्वारका में मिले पाषाण लंगर
द्वारका में मिले पाषाण लंगर

कुछ उत्तर की ओर, महाबलीपुरम में कुछ रोचक परम्पराएं थीं। वहाँ ७ मंदिर अस्तित्व में थे जिनमें से छः जलमग्न हो गए। यद्यपि इसका भारतीय साहित्यों में कोई उल्लेख नहीं है। इसका प्रलेखन एक ब्रिटिश यात्री ने किया है। उसके आधार पर हमने यहाँ खोजबीन आरम्भ की। हमें ३-५ मीटर की गहराई में कुछ मानव निर्मित संरचनाएं अवश्य दिखीं किन्तु हम विश्वास के साथ यह नहीं कह सकते कि वे मंदिर ही हैं। कुछ अवशेष ९ मीटर की गहराई तक भी बिखरे हुए हैं। उन पर अधिक अन्वेषण शेष है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि उन कथाओं में कुछ सत्यता अवश्य होगी।

सुनामी

अनुराधा : लोग कहते हैं कि सन् २००४ में जब सुनामी आई थी तथा जब पानी पीछे हटा, तब ये संरचनाएं दृश्यमान होने लगीं थी। किसी ने उनका चित्र भी लिया था। इसमें कितनी सत्यता है?

ए एस गौर : उस स्थान का कोई भी मानचित्र अथवा उपग्रह चित्रण उपलब्ध नहीं है। यह सब अचानक ही हुआ था। उस समय किसी के पास आधुनिक कैमरे नहीं होते थे। इसी कारण उसका कोई प्रमाण नहीं है। अनेक लोगों ने हमें बताया कि जब ये मंदिर के अवशेष दृश्यमान हुए थे, तब उन लोगों ने उन्हें देखा था। पुरातत्व शास्त्र में एक वर्गीकरण है, वसाहती स्थल। जब हमें वहाँ कुम्हारी आदि के कोई अवशेष नहीं मिलते तो हम उस स्थल को वसाहती स्थल के वर्गीकरण में नहीं रखते। वहाँ से मिले अवशेषों के अनुसार हमने यह अनुमान लगाया है कि वे वसाहती स्थल थे। १९वीं सदी तक भी वहाँ स्तंभ आदि के कुछ अवशेष उपलब्ध थे। उनके चित्र भी लिए गए थे तथा प्रकाशित किये गए थे।

वैशाखेश्वर मंदिर

उत्तर की ओर जाते हुए हम वैशाखेश्वर मंदिर की चर्चा करते हैं जिस पर आंध्रा विश्विद्यालय ने कुछ अन्वेषण कार्य किया है। इस स्थान पर कुछ मध्यकालीन मंदिर जलगत अवस्था में उपस्थित हैं। किसी प्रकार की प्राकृतिक आपदा ने इन्हें नष्ट किया होगा।

अनुराधा : ऐसा कहा जाता है कि विशाखापटनम का नाम विशाखा देवी मंदिर के नाम पर रखा गया है। इससे यह अनुमान लगता है कि वहाँ विशाखेश्वर मंदिर भी रहा होगा। लोक कथाओं के अनुसार किसी कारण से यह मंदिर भी समुद्र के जल में समा गया था। क्या इस मंदिर के भी कोई अवशेष वहाँ मिले हैं?

ए एस गौर : हमने अभी तक उन स्थलों का अन्वेषण आरम्भ नहीं किया है। ओडिशा की ओर आयें तो वहाँ चिलिका सरोवर है जो जल परिवहन क्षेत्र में अत्यंत सक्रिय था। लोग वहाँ से दक्षिण-पूर्वी एशियाई राष्ट्रों की यात्रा करते थे। वहाँ पर भी अनेक पुरातात्विक स्थल हैं जहाँ पर उत्खनन का कार्य किया गया है। वहाँ से उत्तर की ओर ताम्रलिप्ति बन्दरगाह था जो आरंभिक ऐतिहासिक काल में अत्यंत प्रसिद्ध था। यह बंदरगाह गंगा के मुहाने पर स्थित था। यहाँ से वाराणसी एवं कानपुर जैसे गंगा के मैदानी क्षेत्रों तक व्यापार मार्ग उपलब्ध था तथा यह मार्ग व्यापार के लिए लोकप्रिय था।

जलगत पुरातत्व – समुद्र या नदियाँ या सरोवर?

अनुराधा : मैंने १५-१६वीं सदी की कुछ बंगाली काव्य रचनाओं में इनके विषय में पढ़ा था। एक प्रश्न है, क्या आप पुरातात्विक उत्खनन केवल समुद्र में करते हैं कि नदियों तथा सरोवरों में भी करते हैं?

ए एस गौर : जब हम जलगत अथवा जलगत पुरातत्व कहते हैं तब उसमें सभी सम्मिलित होते हैं। अब तक हमने मीठे जल के स्त्रोतों के भीतर कोई उत्खनन कार्य आरम्भ नहीं किया है। अब तक हमने पुरातत्व अन्वेषण कार्य को समुद्र तक ही सीमित किया हुआ था। अर्थशास्त्र में कहा गया है कि जल मार्ग थल मार्ग की तुलना में अधिक सुगम तथा सस्ता होता है। उस काल में ही उन्होंने इसका अनुमान लगा लिया था। वे जान गए थे कि मगध से गंगा नदी द्वारा परिवहन व्यापार के लिए अधिक लाभकारी होगा। किन्तु नदियों के तल इसकी ठोस जानकारी नहीं दे पाते क्योंकि नदियाँ बहुधा अपना मार्ग परिवर्तित करती रहती हैं। नदियों के घाटों पर भी नवीनीकरण का कार्य समय समय पर किया जाता रहा है।

व्यवसाय के रूप में जलगत पुरातत्व

अनुराधा : प्रिय पाठकों, मैं आपको अनुरुद्ध जी के विषय में बताना चाहूंगी कि भारत में आज केवल तीन ही  समुद्री पुरातत्वविद् हैं तथा अनुरुद्ध जी उनमें से एक हैं। सर, क्या आप हमें बता सकते हैं कि यदि किसी को जलगत पुरातत्व को व्यवसाय के रूप में अपनाना हो तो उसे क्या करना चाहिए? उनके लिए कैसे अवसर उपलब्ध हैं?

ए एस गौर : एक योग्य पुरातत्वविद् के पास पुरातत्व शास्त्र तथा प्राचीन इतिहास में स्नातकोत्तर की उपाधि होनी आवश्यक है। उसे गोताखोरी भी सीखनी पड़ती है। भारत में अब इसके अनेक अवसर उत्पन्न हो रहे हैं। यह एक अनछुआ क्षेत्र है। पुरातत्व स्थलों को पर्यटन स्थलों के रूप में भी विकसित किया जा सकता है। जैसे द्वारका, बेट द्वारका तथा महाबलीपुरम में यह किया जा सकता है क्योंकि वहाँ का जल पारदर्शी है। हम जलगत धरोहर स्थलों का विकास कर सकते हैं। सामान्य जनता को इनकी अधिक जानकारी नहीं है।

एक दक्ष पुरातत्वशास्त्री ही ऐसा कर सकता है तथा इस कार्य को आगे ले जा सकता है। जैसे पर्यटक ताज महल, कुतुब मीनार आदि देखने जाते हैं, उसी प्रकार उन्हें इस ओर भी आकर्षित किया जा सकता है। यह देशी एवं विदेशी दोनों पर्यटनों के लिए उत्तम अवसर प्रदान कर सकता है।

अवसर

अनुराधा : पुरातत्व शास्त्र में आवश्यक ज्ञान अर्जित करने के पश्चात हमारे लिए कैसे अवसर उपलब्ध हैं? हमें व्यवसाय के अवसर कौन प्रदान कर सकता है? भारत में समुद्री अथवा जलगत पुरातत्व का क्या भविष्य है?

ए एस गौर : वास्तव में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अंतर्गत जलगत पुरातत्व भी एक छोटा सा भाग है। किन्तु अभी सक्रिय नहीं है। राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान के अंतर्गत हम इस पर कार्य कर रहे हैं। भारत में इसके असीमित अवसर उपलब्ध हैं। भारत का लम्बा तटीय क्षेत्र है। उसके प्रत्येक भाग में जलगत उत्खनन अनुसंधान एवं व्यावसायीकरण के असीमित अवसर उपलब्ध हैं। लोग गोताखोरी सीख रहे हैं। लोग इस प्रकार के पर्यटन में भी रूचि दिखा रहे हैं।

पुरापाषण युगीन तटरेखा

वैज्ञानिक अनुसन्धान प्रयोजनों के लिए हम जलगत पुरातत्व को एक यंत्र के रूप में प्रयोग कर रहे हैं ताकि हम भारत के पुरापाषाणयुगीन तटरेखा को समझ सकें। समुद्री वैज्ञानिकों के समान हम भी वहाँ से नमूने एकत्र करते हैं तथा उन पर शोध कार्य करते हैं। उससे हमें यह जानकारी प्राप्त हो सकती है कि उस स्थान पर पुरातात्विक स्थल उपस्थित हैं अथवा नहीं हैं। समुद्र स्तर में परिवर्तन के साथ तटीय रेखाएं किस प्रकार परिवर्तित हुई हैं, यह जानकारी भी प्राप्त होती हैं। तटीय क्षेत्रों के विकास कार्यों में इन शोध परिणामों का उपयोग किया जा सकता है। इस प्रकार जलगत पुरातत्व का पर्यटन, औद्योगीकरण, तटीय विकास कार्य आदि में महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है।

अनुराधा : इसका अर्थ है कि जलगत पुरातत्व के अंतर्गत अनुसंधान कार्य, पर्यटन, सांस्कृतिक धरोहर तथा जलगत धरोहर आदि में अनेक अवसर उपलब्ध हैं। यदि लोगों को इनकी पर्याप्त जानकारी उपलब्ध हो जाए तथा उन्हें इनमें रूचि उत्पन्न हो जाए तो अवसरों की कमी नहीं है। यह एक सकारात्मक संकेत है।

सर, जलगत पुरातत्व में आपने हमें आज अत्यंत रोचक एवं महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की है। इसके लिए मैं आपका हृदय से धन्यवाद करना चाहती हूँ।

IndiTales Internship Program के अंतर्गत इस वार्तालाप का प्रलेखन पल्लवी ठाकुर ने किया है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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ओडिशा का जाजपुर इतिहास, धरोहर एवं किवदंतियां https://inditales.com/hindi/jajpur-odisha-prachin-rajdhani-itihasa/ https://inditales.com/hindi/jajpur-odisha-prachin-rajdhani-itihasa/#respond Wed, 07 Jun 2023 02:30:10 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3066

भारत एक प्राचीन भूमि है। भारत में अनेक ऐसे स्थान हैं जो प्रोटो-ऐतिहासिक काल अर्थात् प्रागैतिहासिक काल एवं इतिहास काल के मध्य से अब तक अनवरत अखंड रूप से बसे हुए हैं। हम सब अयोध्या एवं काशी जैसे प्राचीन, ऐतिहासिक एवं पवित्र स्थलों के विषय में जानते ही हैं जो सनातन काल से बसे हुए […]

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भारत एक प्राचीन भूमि है। भारत में अनेक ऐसे स्थान हैं जो प्रोटो-ऐतिहासिक काल अर्थात् प्रागैतिहासिक काल एवं इतिहास काल के मध्य से अब तक अनवरत अखंड रूप से बसे हुए हैं। हम सब अयोध्या एवं काशी जैसे प्राचीन, ऐतिहासिक एवं पवित्र स्थलों के विषय में जानते ही हैं जो सनातन काल से बसे हुए हैं। किन्तु इनके अतिरिक्त भी भारत देश में ऐसे अनेक स्थान हैं। उत्कृष्ट उदहारण है, ओडिशा की प्राचीन नगरी जाजपुर।

आज जाजपुर ओडिशा का एक जिला है। एक ओर जाजपुर आदि शक्ति बिरजा माता शक्तिपीठ की गद्दी के लिए प्रसिद्ध है, वहीं दूसरी ओर इस धरती में लोहखनिज का समृद्ध भण्डार होने के कारण यह एक महत्वपूर्ण इस्पात केंद्र है। यदि आप आरम्भ से इस क्षेत्र का इतिहास पढ़ेंगे तो आप पायेंगे कि भिन्न भिन्न कालखंडों में इस क्षेत्र को अनेक नामों द्वारा अलंकृत किया गया है। प्रत्येक नाम उस कालखंड में इस क्षेत्र के सार को दर्शाता है।

आप उन नामों एवं उनकी महत्ता के विषय में जानना चाहते हैं? तो आईये मेरे साथ, हम संक्षिप्त में जाजपुर के इतिहास, उसके विभिन्न नाम एवं उनकी सारगर्भिता के विषय में चर्चा करते हैं।

जाजपुर का संक्षिप्त इतिहास

बैतरणी अथवा वैतरणी नदी जाजपुर की प्राचीनतम जीवंत अस्तित्व है। यह वही पौराणिक वैतरणी नदी है जिसे सत्कर्म रूपी पुण्य द्वारा पार कर सत्धर्मी स्वर्ग पहुँचते हैं। जाजपुर में अनंतकाल से बहती हुई यह शांत नदी इस प्राचीन भूमि को पोषित कर रही है। इसके तट पर अनेक प्राचीन व पवित्र मंदिर स्थित हैं। उनके सभी महत्वपूर्ण उत्सवों में नदी के तट पर अनेक जत्रायें एवं मेले लगाए जाते हैं।

बैतरनी नदी पर स्तिथ जाजपुर
बैतरनी नदी पर स्तिथ जाजपुर

सभी प्रकार के तर्पण अनुष्ठान में इस नदी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसीलिए इसे बैतरणी तीर्थ भी कहा जाता है।

आधुनिक काल में इसे जाजपुर जिले की लम्बी सीमा के रूप में देखा जाता है।

ब्राह्मणी नदी भी एक अन्य महत्वपूर्ण नदी है जो जाजपुर के मध्य से बहते हुए इसे पोषित करती जाती है।

पौराणिक काल

यज्ञ क्षेत्र, सती पीठ, बिरजा क्षेत्र, ये सभी पौराणिक नाम हमें उस कथा का स्मरण कराते हैं जिसके अनुसार यहाँ एक प्रसिद्ध यज्ञ किया गया था।

जाजपुर स्थित बिरजा देवी शक्तिपीठ
जाजपुर स्थित बिरजा देवी शक्तिपीठ

पौराणिक कथा के अनुसार ब्रह्मा ने यहाँ स्थित ब्रह्म कुण्ड में एक यज्ञ किया था। उस यज्ञ वेदी से बिरजा देवी प्रकट हुई थी। ब्रह्मा ने स्वयं उनकी मूर्ति यहाँ प्रतिष्ठापित की थी। चूँकि इस स्थान पर देवी यज्ञ से प्रकट हुई थी, इस क्षेत्र को यज्ञपुरा नाम दिया गया था जो इसका प्राचीनतम नाम है।

नाभि गया कूप
नाभि गया कूप

ऐसी मान्यता है कि इस स्थान पर गयासुर की नाभि स्थित है, इसलिए इसे नाभि गया भी कहते हैं। इसी कारण इसे बिहार में स्थित गया का समकक्ष माना जाता है। अतः ये दोनों स्थान पिंड दान अथवा तर्पण के लिए प्रसिद्ध हैं।

इस क्षेत्र में श्वेत वराह का एक मंदिर है। हिन्दू पंचांग के अनुसार यह वर्तमान कल्प का नाम भी है। यहाँ सप्तमातृका के रूप में शक्ति की भी आराधना की जाती है। उनका मंदिर बैतरणी नदी के तट पर स्थित है।

महाभारत

महाभारत के वन पर्व के अनुसार पांडवों ने अपने वनवास काल में इस क्षेत्र में भी विचरण किया था। ज्येष्ठ पांडव भ्राता, युधिष्ठिर ने यहाँ एक धर्म यज्ञ का आयोजन भी किया था।

दुर्योधन की पत्नी भानुमती कलिंग की राजकुमारी थी जिसकी राजधानी राजपुर को अब जाजपुर के नाम से जाना जाता है। उनके पिता शत्रुयुध ने कौरवों की ओर से महाभारत युद्ध में भाग लिया था।

गदा क्षेत्र

ओडिशा में चार पवित्र क्षेत्र हैं जिन्हें विष्णु के चार प्रतीक चिन्हों के नाम से जाना जाता है। पुरी को शंख क्षेत्र, कोणार्क को पद्म क्षेत्र, भुवनेश्वर को चक्र क्षेत्र तथा बिरजा के क्षेत्र जाजपुर को गदा क्षेत्र कहा जाता है।

प्रागैतिहासिक काल

जाजपुर में अनेक पुरातात्विक स्थल हैं जो प्रागैतिहासिक काल के विभिन्न युगों से संबंधित हैं। उदहारण के लिए, दर्पणगढ़, सुनामुखी तन्गेर, रानीबंदी, धानमहल तथा महागिरी तन्गेर में छः मुक्ताकाश पुरापाषाण स्थल हैं।

सुभा स्तम्भ - जाजपुर
सुभा स्तम्भ – जाजपुर

इन प्रागैतिहासिक स्थलों से खुरचनी, छेनी, पत्रक, चाकू के फल जैसी अनेक कृतियाँ प्राप्त हुई हैं।

चंडीखोल में एक लौहयुग के पुरातात्विक स्थल की खोज हुई है। यहाँ लोहा गलाने के विविध यंत्रों के अतिरिक्त मिट्टी के अनेक प्रकार के पात्र भी प्राप्त हुए हैं।

ऐतिहासिक काल

जाजपुर के इतिहास में अनेक कालावधियों में यह इस क्षेत्र की राजधानी रह चुकी है। विभिन्न कालावधियों में उसकी सीमाओं एवं उसके नामों में परिवर्तन होता रहा है, जैसे कलिंग, उत्कल, ओड्र, तोशाली, ओडिशा आदि। जाजपुर इन सभी की राजधानी रही है। इस क्षेत्र में अनेक राजे-महाराजे आये व चले गए किन्तु जाजपुर ने दीर्घ काल तक उनकी राजधानी होने का मान बनाए रखा।

कहा जाता है कि महाभारत युद्ध के पश्चात विभिन्न राजाओं की ३२ पीढ़ियों ने कलिंग पर राज किया। उसके पश्चात, लगभग ४थी सदी के आसपास मगध के नंदवंश ने इस पर अधिपत्य जमाया। मौर्य साम्राज्य के आरम्भ होते ही यह पुनः एक शक्तिशाली स्वतन्त्र राज्य बन गया।

मौर्य सम्राट अशोक का कलिंग युद्ध अनेक कारणों से जाना जाता है। जाजपुर में उनके शासनकाल में बौद्ध धर्म का आगमन हुआ जो एक दीर्घ काल तक इस क्षेत्र में फलता-फूलता रहा।

मौर्य साम्राज्य के पश्चात इस क्षेत्र पर चेदि राजाओं ने अपना अधिपत्य स्थापित किया। उन्होंने वर्तमान भुवनेश्वर के निकट स्थित शिशुपालगढ़ नामक स्थान को अपनी राजधानी घोषित की। जाजपुर उनके साम्राज्य का भाग नहीं बचा था क्योंकि प्रथम एवं द्वितीय सदी में उत्तर कलिंग पर शासन करते खारवेल ने जाजपुर को अपने साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया था। इसके पश्चात, प्रथम सहस्त्राब्दी के आरंभिक सदियों में वह कुषाण साम्राज्य के अंतर्गत आ गया जिसने अपने जागीरदारों के माध्यम से इस क्षेत्र पर राज किया। ये जागीरदार इस क्षेत्र के १३ मुरुंड राजा थे।

रत्नागिरी बौद्ध मठ
रत्नागिरी बौद्ध मठ

गुप्त वंश ने भी इस क्षेत्र पर शासन किया था, इस विषय में ठोस जानकारी उपलब्ध नहीं है किन्तु उनकी संस्कृति का प्रभाव अवश्य दृष्टिगोचर होता है। जानकारों का ऐसा मानना है कि बिरजा माता की प्रतिमा का दिनांकन इसी कालखंड से संबंध रखता है। इस क्षेत्र से गुप्त वंश की स्वर्ण मुद्राएँ भी उत्खनित की गयी हैं। ऐसी मान्यता है कि गुप्त वंश ने रत्नागिरी एवं ललितगिरी में स्थित बौद्ध मठों की स्थापना के लिए वित्तीय भार भी वहन किया था।

छठी शताब्दी में पृथ्वी विग्रह ने इस क्षेत्र पर शासन किया, वहीं सातवीं शताब्दी के आरम्भ में इस क्षेत्र को हर्षवर्धन के शासन के अंतर्गत ले लिया गया। उस समय इस क्षेत्र को ओड्र विसया कहा जाता था जो कुछ अन्य नहीं, अपितु विरजा मंडल अथवा जाजपुर ही है।

७वीं सदी के प्रसिद्ध यात्री व्हेन त्सांग ने जाजपुर का भ्रमण किया था। उन्होंने अपने यात्रा संस्मरण में इसे जाजपुर ही कहा है। उनके यात्रा संस्मरण के अनुसार इस क्षेत्र के स्थानिक ऊँचे एवं श्यामवर्ण थे जिनकी अध्ययन में प्रगाढ़ रूचि थी। उन्होंने अपने संस्मरण में यहाँ १०० से अधिक बौद्ध मठों एवं ५० से अधिक हिन्दू मंदिरों की उपस्थिति का भी उल्लेख किया है।

८वीं सदी के मध्य में जाजपुर में भौमकार वंश अधिक शक्तिशाली राजवंश के रूप में उभरने लगा था। उन्होंने आधुनिक ओडिशा के अधिकांश भागों एवं उसके पार भी अनेक क्षेत्रों पर अपना अधिपत्य स्थापित किया था। इस राजवंश की विशेषता है कि २०० वर्षों से अधिक की कालावधि में इस क्षेत्र पर जिन १८ भौमकार शासकों का अधिपत्य रहा, उनमें ६ शासक स्त्रियाँ थी। उनमें से प्रथम महिला शासक का नाम त्रिभुवना महादेवी था। मुझे ज्ञात नहीं कि इसके अतिरिक्त किसी भी अन्य राजवंश में इतनी बड़ी संख्या में महिला शासक रही होंगी।

इस काल में जाजपुर को गुहादेव पताका अथवा गुहेश्वर पताका कहा जाता था तथा उस काल को भौम काल कहा जाता था। अनेक ताम्र अभिलेखों में इसके साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। उस कालखंड में जाजपुर ने संस्कृति के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगती की थी। विविध कलाक्षेत्र, वास्तु एवं स्थापत्य शैली, साहित्य, भाषा एवं सामाजिक रूपरेखा आदि में उनका सराहनीय योगदान रहा।

ऐसी मान्यता है कि इसी काल में ओडिशा की उड़िया भाषा का उद्भव हुआ था।

जजाति केशरी तथा जाजपुर का स्वर्णिम काल

१०वीं सदी के मध्यकाल में भौमकार साम्राज्य दक्षिण कोशल के जजाति प्रथम के हाथों पराजित हो गया। कुछ काल अराजकता में व्यतीत होने के पश्चात सोमवंशी राजवंश के चंडीहर राजा का साम्राज्य अधिक शक्तिशाली हो गया। चंडीहर स्वयं को जजाति द्वितीय मानता था। कालांतर में उन्हें जजाति केशरी कहा गया। इतिहास जजाति केशरी को अनेक मंदिरों के निर्माणकर्ता के रूप में स्मरण करता है। उन्होंने विरजा मंदिर, वराह मंदिर एवं शुभस्तंभ जैसे अनेक प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण करवाया था।

उन्होंने अपनी राजधानी का नाम परिवर्तित कर अभिनव जजातिनगर कर दिया था। कालांतर में उनके पुत्र उद्योत केशरी ने भुवनेश्वर में लिंगराज मंदिर का निर्माण करवाया।

राजा जजाति अपने साम्राज्य का प्रभाव स्थापित करने के लिए यहाँ दशाश्वमेध यज्ञ करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने उत्तर भारत के कन्नौज से १०,००० ब्राह्मणों को यहाँ आमंत्रित किया। उन्हें अपने राज्य में स्थाई रूप से बसाने के लिए भूमि अनुदान प्रदान किये जिसे संसना कहा जाता है। आज भी इस क्षेत्र के पुरोहित अपने मूल स्थान का संबंध इसी स्थानांतरगमन से जोड़ते हैं।

आज बैतरणी नदी के तट पर स्थित दशाश्वमेध घाट जजाति केशरी द्वारा किये गए इसी महान यज्ञ का स्मरण कराता है।

ब्रह्मकुंड - जाजपुर
ब्रह्मकुंड – जाजपुर

१२वीं सदी के आरंभ में पूर्वी गंग वंश ने जाजपुर को अपने अधिपत्य में ले लिया। किन्तु तब भी जाजपुर लगभग सम्पूर्ण सदी के लिए उनकी राजधानी बना रहा। तत्पश्चात उन्होंने कटक को अपनी राजधानी घोषित की तथा अफगान आक्रमणकारियों से निपटने के लिए सांस्कृतिक व राजनैतिक राजधानी जाजपुर को परिवर्तित कर सेना की छावनी बना दी।

१६वीं सदी में काला पहाड़ ने इस क्षेत्र पर आक्रमण कर इसका घोर विनाश किया। उसने इस क्षेत्र के लगभग सभी मंदिर नष्ट कर दिए। मूर्तियों को भंग कर उन्हें बैतरनी नदी में फेंक दिया।

आगामी कुछ वर्षों में राजस्थान के राजा मानसिंग एवं नागपुर के भोंसले मराठाओं ने कुछ मंदिरों का पुनर्निर्माण कराया। उनमें जगन्नाथ मंदिर, सप्तमातृका मंदिर, सिद्धेश्वर मंदिर आदि प्रमुख मंदिर सम्मिलित हैं। १९वीं सदी के आरम्भ से भारतीय स्वातंत्र्य तक यह क्षेत्र ब्रिटिश शासन के अधिपत्य में रहा।

जाजपुर के स्थानिकों ने भारत स्वतंत्रता संग्राम में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने गांधीजी द्वारा दिए गये सभी आवाहनों में भाग लिया था।

जाजपुर – एक सांस्कृतिक एवं राजनैतिक राजधानी

विभिन्न पुरातात्विक स्थलों पर किये गए उत्खननों में प्राप्त सिक्के इस ओर संकेत करते हैं कि जाजपुर विभिन्न कालखंडों में व्यापार मार्ग का एक भाग था।

हिन्दू धर्म, बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म, ये तीनों प्राचीन भारतीय धर्म जाजपुर में फले-फूले हैं। कुछ कालखंडों में ये तीनों धर्म एक साथ अस्तित्व में थे। जाजपुर जिले में स्थित कई विशाल बौद्ध मठ इसका जीवंत प्रमाण हैं, जैसे उदयगिरी, रत्नागिरी, ललितगिरी तथा लंगुड़ी पहाड़ अथवा पुष्पगिरी।

आधुनिक जाजपुर

जाजपुर जिले को सन् १९९३ में कटक जिले से विभक्त कर निर्मित किया गया था। वर्तमान में यह ओडिशा का सर्वाधिक सघन वसाहत का जिला है।

इस क्षेत्र में स्थित खनन उद्योग द्वारा हमें क्रोमाइट (एक प्रकार का कच्चा लोहा), लौह अयस्क एवं निकल धातु जैसे खनिज प्राप्त होते हैं। वस्तुतः, क्रोमाइट खनिज उत्पादन में जाजपुर सर्वाधिक अग्रणी खनन स्थल है। क्रोमाइट खनिज का प्रयोग इस्पात जैसे अनेक औद्योगिक उत्पादनों में किया जाता है।

कलिंग नगर एकीकृत औद्योगिक संकुल (Kaling Nagar Integrated Industrial Complex) एक इस्पात केंद्र है जहाँ अनेक अनेक छोटे-बड़े इस्पात कारखाने हैं। एक प्रकार से जाजपुर लौह अयस्क प्रगलन की अपनी प्राचीन धरोहर को अब भी संजोये हुए हैं।

जाजपुर में इस प्रकार के अनेक आधुनिक कालीन उद्योग तथा टसर रेशम बुनाई, काष्ट कारीगरी एवं शैल उत्कीर्णन जैसे अनेक पारंपरिक उद्योग सह-अस्तित्व में हैं। हम इनके विषय में आगामी संस्करणों में विस्तार में चर्चा करेंगे। कृषि उद्योग एवं खनन उद्योग इस जिले के विशालतम आर्थिक कारक हैं। भविष्य में यह देश के महत्वपूर्ण जलमार्गों के स्थल के रूप में भी प्रसिद्ध होगा।

कुल मिलाकर जाजपुर अपनी समृद्ध धरोहर एवं विविध इतिहास के अनेक परतों से सज्ज एक प्राचीन भूमि है जिसे प्रकृति ने संपन्न प्राकृतिक संसाधनों से पोषित किया है। यहाँ अनेक प्रकार के भारी उद्योगों एवं कुटीर उद्योगों का सर्वोत्तम मेल है। ओडिशा के इस अनछुए गहने में जिज्ञासु यात्रियों एवं पर्यटकों के लिए कई माणिक्य छुपे हुए हैं जिनकी खोज में वे जाजपुर की यात्रा कर सकते हैं। यह आपके लिए अवश्य एक रोचक अनुभव सिद्ध होगा।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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मथुरा के प्राचीन मंदिर, घाट, संग्रहालय एवं स्वादिष्ट व्यंजन https://inditales.com/hindi/mathura-ke-tirth-paryatak-sthal/ https://inditales.com/hindi/mathura-ke-tirth-paryatak-sthal/#respond Wed, 01 Sep 2021 02:30:22 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2405

मधुपुरी! जी हाँ, मथुरा किसी समय इसी नाम से जाना जाता था। यमुना नदी के तट पर बसा मथुरा, भारत के प्राचीनतम, सर्वाधिक महत्वपूर्ण व सर्वाधिक लोकप्रिय नगरों में से एक है। मथुरा नगर का प्राचीनतम उल्लेख पद्म पुराण में किया गया है जहां इसका सम्बन्ध अयोध्या के राजा श्री राम के अनुज, शत्रुघ्न से […]

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मधुपुरी! जी हाँ, मथुरा किसी समय इसी नाम से जाना जाता था। यमुना नदी के तट पर बसा मथुरा, भारत के प्राचीनतम, सर्वाधिक महत्वपूर्ण व सर्वाधिक लोकप्रिय नगरों में से एक है।

राधा कृष्ण लीला मथुरा
राधा कृष्ण लीला मथुरा

मथुरा नगर का प्राचीनतम उल्लेख पद्म पुराण में किया गया है जहां इसका सम्बन्ध अयोध्या के राजा श्री राम के अनुज, शत्रुघ्न से बताया गया है। शत्रुघ्न ने असुर मधु के पुत्र लवणासुर का वध करने के पश्चात इस क्षेत्र की रचना की थी। यह वही असुर मधु है जिसके विषय में आपने देवी महाम्त्य में पढ़ा होगा। इसका अर्थ है कि इस स्थान की उत्पत्ति त्रेता युग में हुई थी। द्वापर युग में यह स्थान श्री कृष्ण का लीलास्थल था। वास्तव में यह स्थान कृष्ण की लीलाओं के लिए सर्वाधिक लोकप्रिय है।

मथुरा भारत की सप्तपुरियों अर्थात सात मोक्षदायिनी नगरों में से एक है। सप्तपुरियों में अन्य नगर हैं, अयोध्या, हरिद्वार, काशी, कांचीपुरम, द्वारका एवं उज्जैन।

मथुरा के मंदिर

कृष्ण जन्मभूमि मंदिर

मथुरा का कृष्ण जन्मभूमि मंदिर निस्संदेह, ना केवल मथुरा का, अपितु सम्पूर्ण ब्रज क्षेत्र का सर्वाधिक महत्वपूर्ण मंदिर है। इसी नगर के कारागृह की एक कोठरी में श्री कृष्ण का जन्म हुआ था जहां उनके माता एवं पिता को उनके मामा कंस ने बंदी बनाकर रखा हुआ था। कृष्ण भगवान विष्णु के अवतार हैं जिन्होंने द्वापर युग में जन्म लेने के लिए इस स्थान का चयन किया था।

कृष्ण जन्मभूमि का प्रवेश द्वार
कृष्ण जन्मभूमि का प्रवेश द्वार

इस मंदिर के विषय में सर्वप्रथम उल्लेख के अनुसार इस मंदिर की स्थापना श्री कृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने करवाया था। उन्होंने ही द्वारका में द्वारकाधीश मंदिर का भी निर्माण करवाया था। पुरातात्विक दृष्टिकोण से, उपलब्ध प्रमाण छठीं शताब्दी में निर्मित एक मंदिर की ओर संकेत करते हैं।

गजनी ने ११वीं शताब्दी में इस मंदिर पर प्रथम आक्रमण किया था। उसके संस्मरण में उल्लेख किया गया है कि यह मंदिर मानव निर्मित नहीं अपितु कोई दैवी रचना ही हो सकती है। १६वीं शताब्दी में सिकंदर लोधी ने इस मंदिर को उध्वस्त कर दिया था किन्तु शीघ्र ही बुन्देल राजा ने इसका पुनर्निर्माण कराया। १७वीं शताब्दी में औरंगजेब ने इसे पुनः नष्ट कर दिया। प्राचीन काल के अनेकों यात्रियों ने अपने यात्रा संस्मरणों में इस मंदिर की अद्वितीय सुन्दरता एवं भव्यता का उल्लेख किया है। ब्रिटिश अधिकारी फेड्रिक सालमन ग्राउस ने अपने मथुरा संस्मरण में इस केशवदेव मंदिर की भव्यता का उल्लेख किया है।

मदन मोहन मालवीय

वर्तमान में जो मंदिर हम देखते हैं, उसका निर्माण सन् १९५० में किया गया था जो मदन मोहन मालवीय एवं उद्योगपति जुगल किशोर बिरला के अथक प्रयासों का फल है। इस पावन कार्य में गोयनका एवं डालमिया जैसे अनेक उद्योगपति परिवारों ने भी सहयोग प्रदान किया था। यह उस स्थान से सटा हुआ है जहां मस्जिद बनाई गई थी। मंदिर के भीतर एक कारागृह सदृश संरचना है। यह मंदिर का गर्भगृह है।

गर्भगृह के समीप श्री भागवत भवन नामक एक विशाल भवन का निर्माण किया गया है। यह एक अत्यंत सुन्दर मंदिर है। इस मंदिर का सर्वाधिक लक्षणीय तत्व है, इस मंदिर की भित्तियों पर लगे ताम्रपत्र जिस पर सम्पूर्ण भागवत पुराण अभिलेखित है। भागवत भवन में जगन्नाथ, श्री राम, शिव एवं दुर्गा के मंदिर हैं। किंचित ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर से नगर का अप्रतिम दृश्य दृष्टिगोचर होता है।

इस मंदिर के विशाल प्रांगण में होली का भव्य उत्सव धूमधाम से मनाया जाता है। स्वाभाविक रूप से मथुरा नगरी एवं इस मंदिर का सर्वाधिक लोकप्रिय उत्सव कृष्ण जन्माष्टमी है।

प्राचीन श्री केशवदेव जी मंदिर
प्राचीन श्री केशवदेव जी मंदिर

कृष्ण जन्मभूमि मंदिर के बाह्य भाग में केशवदेवजी का मंदिर है।

दुखद यह है कि मंदिर के भीतर किसी भी प्रकार के यन्त्र ले जाने की अनुमति नहीं है। अतः आप मंदिर के भीतर चित्र नहीं ले सकते।

पोतरा कुण्ड

पोतरा कुंड मथुरा
पोतरा कुंड मथुरा

पोतरा कुण्ड एक अत्यंत आकर्षक बावड़ी है। यह कृष्ण जन्मस्थान मंदिर के समीप स्थित है। ऐसी मान्यता है कि देवकी ने अपने पुत्र कृष्ण के वस्त्र-उपवस्त्र इसी कुण्ड में धोए थे। इसीलिए इस कुण्ड को अत्यंत पावन माना जाता है।

द्वारकाधीश मंदिर

मथुरा का द्वारकाधीश मंदिर
मथुरा का द्वारकाधीश मंदिर

चटक पीले रंग का यह मंदिर मथुरा नगर के विशालतम एवं जागृत मंदिरों में से एक है। यहाँ चारों ओर भक्तों का आनंदमय कलरव एवं भजन की मधुर तान सुनाई देती रहती है। १९वीं सदी में ग्वालियर के राजाओं एवं सेठों ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था जो ठेठ राजपुताना वास्तुशैली पर आधारित है। मुख्य मंदिर की पृष्ठभागीय भित्ति पर आप गाय के गोबर से बने स्वस्तिक देखेंगे। परिसर में मथुरा महारानी का एक भित्तिचित्र भी है किन्तु उनके विषय में मुझे अधिक जानकारी प्राप्त नहीं हो पायी। अनेक सालिग्राम भी थे जिनकी उसी प्रकार पूजा-अर्चना की जा रही थी जैसा कि ब्रज के अन्य मंदिरों में की जाती है।

द्वारकाधीश मंदिर के दीवार पर स्वस्तिक
द्वारकाधीश मंदिर के दीवार पर स्वस्तिक

मंदिर के विभिन्न क्रियाकलापों एवं देखरेख का उत्तरदायित्व वल्लभाचार्य वैष्णवों पर है। यहाँ उनकी परम्पराओं का पालन किया जाता है।

यह मंदिर यमुना घाट के समीप स्थित है। अनेक श्रद्धालु यमुना के जल में पवित्र स्नान कर मंदिर में प्रवेश करते हैं।

यमुना धर्मराज मंदिर

यह मंदिर यमुना एवं उनके भ्राता यम को समर्पित है। यमुना के भ्राता यम को धर्मराज भी कहा जाता है। दिवाली के दो दिवस पश्चात भाई दूज का उत्सव मनाने की परंपरा यम एवं यमुना से ही सम्बंधित है। यम एवं यमुना सूर्य देव के पुत्र एवं पुत्री हैं।

यह विश्राम घाट के निकट स्थित एक छोटा सा मंदिर है।

दीर्घ विष्णु मंदिर

दीर्घ विष्णु मंदिर भी यहाँ के प्राचीन मंदिरों में से एक है। दीर्घ का अर्थ है विशाल। हो सकता है विष्णु के विशाल अथवा ऊंचे होने के विषय में कोई कथा इस मंदिर से जुड़ी हुई हो। किन्तु इस मंदिर को देख मुझे ना ऐसा आभास हुआ, ना ही इस विषय में कोई जानकारी प्राप्त हुई। इसे देख ऐसा प्रतीत होता है कि यह मंदिर एक हवेली के भीतर स्थित है।

आदि वराह मंदिर

ऐसी मान्यता है कि यह मंदिर मथुरा का प्राचीनतम मंदिर है। इसे लाल वराह मंदिर भी कहा जाता है। वराह वास्तव में विष्णु का शूकर अवतार है।

महाविद्या कुण्ड एवं महाविद्या मंदिर

श्री महाविद्या मंदिर
श्री महाविद्या मंदिर

महाविद्या मंदिर एक पहाड़ी के ऊपर स्थित है। पहाड़ी के समीप ही महाविद्या कुण्ड है जो अब सूख गया है। जिस समय मैंने यहाँ की यात्रा की थी, कुछ बालक कुण्ड के भीतर क्रिकेट खेल रहे थे। पहाड़ी पर स्थित मंदिर छोटा है किन्तु इसके भीतर माँ महाविद्या, माँ बगलामुखी एवं माँ उग्रतारा की अत्यंत मनमोहक प्रतिमाएं हैं। यह एक महत्वपूर्ण शक्तिपीठ है। ऐसा माना जाता है कि यह शक्ति श्री कृष्ण के पालक पिता अर्थात् गोकुल के नन्द बाबा की कुलदेवी थी।

मंदिर के समीप, एक स्तर नीचे, एक शिव मंदिर है। इसके भीतर एक चतुष्कोण में चार विभिन्न आकार के शिवलिंग स्थापित हैं। बड़े शिवलिंग मुखलिंग थे जबकि छोटे लिंग भूमि पर स्थित शिला के रूप में थे। यह मंदिर भक्तों में लोकप्रिय प्रतीत हो रहा था क्योंकि मैंने अनेक भक्तों को यहाँ आकर शिवलिंग पर जल चढ़ाते देखा।

मथुरा के चार शिव मंदिर

मथुरा नगरी को विष्णु के अवतार, कृष्ण की नगरी कहा जाता है। इसके चार दिशाओं में स्थित चार शिव मंदिर इसकी रक्षा करते हैं। इन चार मंदिरों को भी मथुरा के प्राचीनतम मंदिरों में गिना जाता है। ऐसी मान्यता है कि ये चार मंदिर द्वापर युग से भी पूर्व के हैं। भगवान कृष्ण का जन्म द्वापर युग में हुआ था।

भूतेश्वर महादेव मंदिर - मथुरा
भूतेश्वर महादेव मंदिर – मथुरा

भूतेश्वर महादेव मंदिर  मथुरा नगर के पश्चिमी ओर स्थित है। ऐसी मान्यता है कि यह मथुरा का प्राचीनतम मंदिर है। इस मंदिर के शिवलिंग की स्थापना शत्रुघ्न ने की थी, जैसे रामेश्वरम मंदिर के शिवलिंग की स्थापना स्वयं राम ने की थी। यह श्वेत रंग का एक मुखलिंग है जिस पर शिव के सभी पावन चिन्ह प्रदर्शित हैं। इस मंदिर में भक्तों का तांता लगा रहता है।

कंकाली टीला
कंकाली टीला

कंकाली टीला  भूतेश्वर महादेव मंदिर के समीप ही है। कुछ लोगों की मान्यता है कि यह कंकाली देवी का मंदिर है। वर्तमान में यह किसी प्राचीन पाषाणी मंदिर के अवशेषों का ढेर प्रतीत होता है। किसी समय यहाँ किये गए उत्खनन में अनेक कलाकृतियाँ प्राप्त हुई थीं जिनमें से अधिकतर कलाकृतियाँ अब विभिन्न संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रही हैं। यहाँ रखे शेष अवशेष किसी मंदिर के सार मात्र हैं।

रंगेश्वर महादेव मंदिर   मथुरा नगर के दक्षिणी ओर स्थित है। इसके परिसर में महाकाली मंदिर भी है।

गर्तेश्वर महादेव मंदिर  अथवा गोकर्णेश्वर मंदिर  उत्तरी दिशा में स्थित है तथा इसे ढूँढना किंचित कठिन कार्य है।

पिपलेश्वर महादेव मंदिर  पूर्व दिशा में स्थित है। यह विश्राम घाट के समीप है।

मथुरा की गलियों में सैर

मथुरा की मनोहर गलियां
मथुरा की मनोहर गलियां

यमुना के घाटों की ओर जाती संकरी गलियों में पैदल सैर करना ऐसा प्रतीत होता है मानो हम समय चक्र में कुछ सदियाँ पीछे चले गए हों। इन गलियों में सुन्दर हवेलियाँ हैं जिनके अग्रभाग उत्कृष्ट रूप से उत्कीर्णित हैं। उनमें अनेक हवेलियाँ वास्तव में मंदिर हैं जो हवेलियों के समान प्रतीत होती हैं। गलियों में आप जहां देखेंगे वहां आपको हलवाई कुछ ताजा व्यंजन बनाते दृष्टिगोचर हो जायेंगे। गलियों में लोगों की भीड़भाड़ अवश्य है किन्तु चारों ओर आनंदमय चहलपहल का आभास होता है।

गलियों में पदचाप करते हुए मैंने कई मंदिर देखे जैसे, ठाकुर गोपीनाथ जी तथा श्री मदन मोहन जी।

मथुरा नगर की गलियों में आप वैद्य रूप से भांग भी बिकते देखेंगे।

यमुना के घाट एवं परिसर

यमुना नदी कान्हा नगरी मथुरा का अभिन्न अंग है। इसके घाटों के किनारे खड़ी रंगबिरंगी नौकाओं की पंक्तियाँ सम्पूर्ण वातावरण को उल्हासपूर्ण बना देती हैं। ये नौकाएं आपको नौका विहार का रोमांच तो देती ही हैं, साथ ही, राधा-कृष्ण की कथाएं सुनकर नाविक आपको आनंदविभोर भी कर देते हैं।

यदि संभव हो तो यमुना घाट पर चुनरी मनोरथ का आयोजन अवश्य देखें जिसमें यमुना नदी को चुनरी उढ़ाई जाती है।

और पढ़ें: चुनरी मनोरथ – मथुरा में यमुना जी का चुनरी ओढ़ना

कंस किला  यमुना नदी के तट पर स्थित बलुआ पत्थर का दुर्ग है। कहा जाता है कि यमुना के उत्तरी तट पर स्थित कंस किला ही कृष्ण के दुष्ट मामा कंस का दुर्ग था किन्तु यह उतना प्राचीन प्रतीत नहीं होता। हो सकता कि यह दुर्ग उस स्थान पर स्थित हो जहां किसी समय कंस का दुर्ग था। इस दुर्ग की विशाल भित्तियाँ यमुना की लहरों से नगर की रक्षा करती हैं। कालांतर में महाराजा सवाई जयसिंह ने गृह-नक्षत्रों का अध्ययन करने के लिए यहाँ वेधशाला का निर्माण कराया था जो अब अस्तित्व में नहीं है। खंडित हो चुका यह दुर्ग अब मथुरा का लोकप्रिय पर्यटन स्थल है।

मथुरा पेढा

आप मथुरा नगर आयें तथा यहाँ का प्रसिद्ध पेढा ना खाएं, यह मथुरा तथा आप, दोनों के साथ अन्याय होगा। मैंने ‘मथुरा नगर के पेढे’ पर एक विशेष संस्करण लिखा एवं प्रकाशित किया है। निम्न विडियो में मैं आपको ब्रजवासी मिष्टान के रसोईघर में ले चलती हूँ जहां आप उन्हें मथुरा नगर के पेढे बनाते प्रत्यक्ष देख सकते हैं।

मथुरा के स्मृतिचिन्ह

आप मथुरा नगरी से अनेक ऐसी वस्तुएं क्रय कर सकते हैं जो मथुरा की विशेषता हैं। उनमें सर्वाधिक लोकप्रिय वस्तु है बाल गोपाल की पोशाक, जिसे आप अपने घर के मंदिर में बैठे बालगोपाल के लिए ले जा सकते हैं। अन्य वस्तुओं के विषय में मैं एक विस्तृत संस्करण शीघ्र प्रकाशित करने जा रही हूँ।

मथुरा संग्रहालय

मथुरा संग्रहालय में यक्ष प्रतिमा
मथुरा संग्रहालय में यक्ष प्रतिमा

यह संग्रहालय देश के सर्वोत्तम संग्रहालयों में से एक है। इस संग्रहालय पर मेरा विस्तृत संस्करण इस वेबसंकेत पर पढ़ें – Gems of Mathura Museum

जैन संग्रहालय

मथुरा का जैन संग्रहालय
मथुरा का जैन संग्रहालय

मथुरा संग्रहालय किसी समय एक लघु संग्रहालय था जिसे अब वर्तमान इमारत में स्थानांतरित किया है। उस लघु संग्रहालय को अब जैन संग्रहालय में परिवर्तित किया है। यह अत्यंत सुन्दर इमारत है जिसके भीतर उत्कृष्ट जैन कलाकृतियों का उत्तम संग्रह है।

मथुरा जैन विरासत का प्रमुख केंद्र है। इस नगर में अनेक छोटे-बड़े जैन मंदिर हैं। उनमें विशालतम मंदिर मथुरा चौरासी मंदिर है। मुख्य मार्ग के निकट स्थित इस मंदिर में श्वेत संगमरमर में उत्कीर्णित अनेक छवियाँ हैं।

यात्रा सुझाव

  • एक लोकप्रिय पर्यटन एवं तीर्थस्थल होने के कारण यहाँ यात्रियों के लिए सभी प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध हैं।
  • आप जब यहाँ आयें तो मंदिरों के साथ साथ मथुरा की गलियों में पैदल सैर, स्मृतिचिन्हों का क्रय, कलाकृतियों एवं विशेष व्यंजनों का भी आनंद लें।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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प्राचीन भारत में यात्राएं कैसे करते थे लोग? -सुमेधा वर्मा ओझा https://inditales.com/hindi/prachin-bharat-mein-yatrayen-varta/ https://inditales.com/hindi/prachin-bharat-mein-yatrayen-varta/#comments Wed, 14 Jul 2021 02:30:50 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2348

अनुराधा: नमस्ते। आज हमसे चर्चा करने के लिए हमारे साथ है, सुश्री सुमेधा वर्मा ओझा जी । सुमेधा जी एक भूतपूर्व भारतीय राजस्व सेवा अधिकारी हैं। अतः उन्हें अर्थव्यवस्था, कर इत्यादि में तो निपुणता प्राप्त है ही, साथ ही भारतीय साहित्य में भी उनकी विशेष रूचि है। उन्होंने वाल्मीकि रामायण का अनुवाद किया है। ‘उर्नभी’ […]

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अनुराधा: नमस्ते। आज हमसे चर्चा करने के लिए हमारे साथ है, सुश्री सुमेधा वर्मा ओझा जी । सुमेधा जी एक भूतपूर्व भारतीय राजस्व सेवा अधिकारी हैं। अतः उन्हें अर्थव्यवस्था, कर इत्यादि में तो निपुणता प्राप्त है ही, साथ ही भारतीय साहित्य में भी उनकी विशेष रूचि है। उन्होंने वाल्मीकि रामायण का अनुवाद किया है। ‘उर्नभी’ नामक एक रोमांचकारी जासूसी उपस्यास भी लिखा है जो मौर्य काल पर आधारित है। यह उपन्यास हमें उस काल का स्मरण करता है जब आचार्य चाणक्य मौर्य साम्राज्य की स्थापना कर रहे थे। मुझे यह उपन्यास इतना भाया है कि मैं इसके आगामी संस्करण की आतुरता से प्रतीक्षा कर रही हूँ। हमारी आज की चर्चा भी कुछ इसी विषय से जुड़ी हुई है। हमारी चर्चा का विषय है- प्राचीन भारत में यात्राएं। आज हम यह जानने का प्रयास करेंगे कि प्राचीन काल में भारत में यात्राएं किस प्रकार से की जाती थीं।

प्राचीन भारत में यात्राएं

अनुराधा: सुमेधाजी, प्राचीन इतिहास में आपकी विशेष रूचि है, वहीं मेरी रूचि भ्रमण करने में है। स्पष्ट है कि हमारे मार्गों का संगम वहां होता है जहां इन दोनों विषयों का संगम होता है। अर्थात् जब हम प्राचीन भारत में भ्रमण के विषय में चर्चा करते हैं। प्राचीन भारत में लोग किस प्रकार यात्राएं करते थे? वर्तमान में हमारे पास एक सम्पूर्ण पर्यटन एवं आतिथ्य उद्योग है जो अवकाश एवं आनंद यात्राओं पर आधारित है। अनेक यात्री अपने व्यवसाय एवं व्यापार संबंधी कारणों से भी यात्राएं करते हैं। कुछ अन्य कारणों से यात्राएं करते हैं। किन्तु सम्पूर्ण पर्यटन एवं आतिथ्य उद्योग अंततः अवकाश एवं आनंद यात्राओं पर ही फलता-फूलता है।

मैं यह जानना चाहती हूँ कि प्राचीन भारत में लोग किन प्रमुख कारणों से यात्राएं करते थे?

सुमेधा: अनुराधाजी, मुझे चर्चा के इस सत्र में आमंत्रित करने के लिए आपको ह्रदय पूर्वक धन्यवाद। मैं विश्वास दिलाती हूँ कि यह चर्चा अत्यंत रोचक रहेगी। आपने पूछा है कि प्राचीन भारत में लोग किन प्रमुख कारणों से यात्राएं करते थे?  मानवों ने यात्राएं आरम्भ की क्योंकि अस्तित्व के लिए यात्रा को सहचरी बनाना आवश्यक था। स्थानान्तर्गमन प्राचीन काल में यात्रा करने का प्रथम कारण था। लोग भिन्न भिन्न स्थानों में स्थानांतरण करते थे ताकि उन्हें वास करने के लिए श्रेष्ठतर स्थान प्राप्त हो सके अथवा श्रेष्ठतर संसाधनों की प्राप्ति हो सके। प्रश्न यह उठता है कि जब मानवजाति ने स्वयं को स्थापित कर लिया, तब उन्हें यात्रा करने की क्या आवश्यकता प्रतीत हुई? इसका प्रथम कारण था, व्यापार। आरम्भ में व्यापार केवल आसपास के लोगों से किया जाता था। कालान्तर में वही व्यापार दूर-सुदूर स्थित लोगों के साथ भी किया जाने लगा। समय के साथ परिवहन के साधनों, सड़क तंत्र तथा आश्रय स्थलों इत्यादि के आगमन से सम्पूर्ण प्रणाली अत्यंत जटिल होती गयी।

यात्रा करने का एक अन्य कारण था, अतिक्रमण, युद्ध, प्रभुता स्थापित करने जैसी मूल मानवी प्रकृति। प्राचीन काल में यह भावना अधिक प्रबल होती थी। अतः नवीन मार्गों के तंत्र स्थापित किया जाते थे ताकि सेना के मार्ग में कोई रूकावट ना आये, अन्य प्रदेशों पर विजय प्राप्त करने जा रहे सैनिकों का मार्ग प्रशस्त हो अथवा नवीन संसाधनों को प्राप्त करने के मार्ग खुल सकें। कभी उनके प्रयोजन हितकारी होते थे तो कभी उसके विपरीत। किन्तु सत्य यही है कि इसी प्रकार विशाल देश एवं राष्ट्रीय प्रणालियाँ अस्तित्व में आयीं।

तीर्थ यात्राएं

प्राचीन काल में यात्राएं करने का एक अन्य कारण था, तीर्थ यात्राएं। लोग भिन्न भिन्न तीर्थ स्थलों के दर्शन करने हेतु यात्राएं करते थे। तीर्थ यात्राओं की पृष्ठभूमि में अत्यंत जटिल तथा बहुआयामी मान्यताएं होती हैं। एक ओर तीर्थस्थल धार्मिक मान्यताओं के धरातल पर अत्यंत महत्वपूर्ण होते थे। दूसरी ओर लोग ज्ञान अर्जित करने की आकांशा से भी इस स्थलों की यात्राएं करते थे। लोग एक आश्रम से दूसरे आश्रम तक, एक ऋषि से दूसरे ऋषि तक भ्रमण करते रहते थे ताकि ज्ञान अर्जित कर सकें, साथ ही अपने ज्ञान की पुष्टि कर सकें अथवा स्वयं द्वारा रचित ग्रंथों पर समकक्षों के विचार जान सकें। ये आश्रम अधिकांशतः अत्यंत दुर्गम स्थानों पर होते थे। नगरों की चहल-पहल से दूर, आश्रम बहुधा वनों में अथवा किसी नदी के तट पर स्थित होते थे।

मेरे उपरोक्त उल्लेख का यह तात्पर्य नहीं है कि प्राचीन भारत एक अत्यंत गंभीर स्थान था। प्राचीन भारत में आनंद एवं मनोरंजन का भी भरपूर समावेश था। अतः लोग इस उद्देश्य से भी यात्राएं करते थे, जैसे नाट्य मंडली इत्यादि। नाट्य मंडलियों पर अनेक रोचक कथाएं प्रचलित हैं, जैसे, किस प्रकार लोग उनके द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान तक सन्देश पहुँचाया करते थे  अथवा खोये हुए व्यक्तियों को ढूँढने का प्रयास करते थे। उस समय अवकाश एवं आनंद पर आधारित यात्राओं की संख्या नगण्य होती थी किन्तु अभिलेखों में ऐसी यात्राओं का भी उल्लेख प्राप्त होता है। यदि आप समुद्री यात्राओं को आनंद यात्राओं के अंतर्गत मानेंगे तो अर्थशास्त्र में उनका प्राधान्यता से उल्लेख किया गया है।

अनुराधा: एक आश्रम से दूसरे आश्रम तक, इस उक्ति से ऐसा प्रतीत होता है मानो वे सामान्य जीवन से मुक्ति पाने के लिए यात्राएं करते थे।

सुमेधा: मेरा अभिप्राय अध्ययन सम्मेलनों एवं परिसंवादों से है। उस काल में प्रभावशाली व गणमान्य व्यक्ति इन विद्वानों एवं सिद्धपुरुषों को संरक्षण देते थे। दृष्टांत के लिए, राजा जनक एक अत्यंत प्रभावशाली व विद्वान राजा थे। उनके द्वारा आयोजित शास्त्रार्थ अत्यंत प्रसिद्ध थे। प्राचीन काल में विद्यार्थी गुरुकुलों एवं विश्वविद्यालयों में जाने के लिए भी यात्राएं करते थे। अतः ज्ञान अर्जन हेतु अनेक यात्राएं की जाती थीं। किन्तु, व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो यात्राओं का सबसे प्रमुख कारण व्यापार ही था। प्राचीन काल में व्यापार एवं व्यापार मार्ग एक प्रकार से राज-निकाय के धमनी एवं शिराएँ थे।

नाट्य मंडलियाँ

अनुराधा: आपने अभी नाट्य मंडलियों द्वारा की जाने वाली यात्राओं का उल्लेख किया। इसे संयोग ही कहिये कि मैंने अपने संस्करण ‘१० सर्वोत्तम व्यवसाय जो देश विदेश घुमाएं’ में प्रदर्शन कला को भी एक यात्रा संबंधी व्यवसाय के रूप में सम्मिलित किया है। प्रदर्शन कलाकारों को विश्व के दूर-सुदूर भागों में यात्रा करने का संयोग प्राप्त होता है। वे विश्व भर में यात्राएं कर अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं तथा अपनी संस्कृति के संवाहक बनते हैं। इस कल्पना मात्र से रोमांच होता है कि हम २००० वर्षों प्राचीन विरासत को आगे ले जा रहे हैं।

सुमेधा: नाट्य कलाकार, कलाबाज एवं सभी प्रकार के प्रदर्शन कलाकार ना केवल शहरी क्षेत्रों में यात्राएं करते थे, अपितु लघु अथवा ग्रामीण क्षेत्रों में भी जाते थे।

अनुराधा: प्राचीन भारत में लोग कैसे यात्राएं करते थे, यह जानकारी आपको कहाँ से प्राप्त हुई? ऐसे कौन कौन से साहित्य हैं जिनमें ऐसी जानकारी उपलब्ध है?

सुमेधा: अच्छा प्रश्न है। इस जानकारी के प्रमुख स्त्रोतों में से एक है पुरातात्विक अवशेष। प्राचीन भारत के व्यापार मार्गों पर अनेक लोगों ने गहन शोधकार्य किया है। जिन वस्तुओं का व्यापार किया जाता था, उनके अवशेषों का उन्होंने अध्ययन किया है। जिन मार्गों को व्यापार मार्ग में परिवर्तित किया था, उनका विश्लेषण किया है। अपने शोधकार्यों के आधार पर उन्होंने प्राचीन व्यापार मार्गों के जाल की एक संकल्पना प्रस्तुत की है। उसमें उन्होंने उस काल के नगरों एवं बस्तियों को दर्शाया है तथा वस्तु-विनिमय अर्थात् आदान-प्रदान की गयी वस्तुओं का भी उल्लेख किया है।

जानकारी का एक प्रमुख स्त्रोत मुद्रा शास्त्र भी है। विभिन्न पुरातात्विक स्थलों से प्राप्त मुद्राओं का शोधकर्ताओं ने गहन अध्ययन किया है। उनसे भी प्राचीन काल में प्रचलित यात्राओं एवं व्यापारों से सम्बंधित महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त हुई हैं।

अभिलेख/शिलालेख

जानकारी का तीसरा महत्वपूर्ण स्त्रोत है, अभिलेख अथवा शिलालेख। इसका एक उदहारण देना चाहती हूँ। एक समय मकरध्वज योगी नामक एक प्रसिद्ध धार्मिक एवं अध्यात्मिक गुरु थे। उनका जीवन-काल प्रथम सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व में था। उनके साथ यात्रियों एवं अनुयायियों का एक विशाल समूह था जो यात्राओं में उनके साथ चलता था। वे जहां जहां जाते, अपने एवं अपनी यात्रा के विषय में अभिलेख अवश्य छोड़ जाते थे। आज वही अभिलेख हमें भारत के कोने कोने एवं सीमावर्ती देशों के संग्रहालयों में देखने मिलते हैं। उनके अनुयायियों में अनेक स्त्रियाँ भी थीं जो उनके साथ आध्यात्मिक यात्राओं में भाग लेती थीं।

रामगढ गुफाओं से प्राप्त एक शिलालेख अत्यंत रोचक है क्योंकि लोगों ने दो प्रकार से इसकी व्याख्या की है। कुछ लोगों का मानना है कि वह विश्व का सर्वप्रथम प्रेम शिलालेख है। वहीं अन्य कुछ शोधकर्ताओं ने उसका विवेचन स्त्री यात्रियों के लिए विश्रामगृह के रूप में किया है। छत्तीसगढ़ के जोगीमारा गुफाओं से प्राप्त शिलालेख भी ऐसे ही हैं। प्रारंभ में इनका विवेचन एक नाटकशाला के रूप में किया गया था किन्तु नवयुगीन विवेचनकर्ता इसे यात्रियों का विश्रामगृह मानते हैं। इन अभिलेखों से प्राप्त सूक्ष्मतम जानकारी भी हमें प्राचीन काल के जनजीवन में झांकने का अवसर प्रदान करती है। हमें ऐसा प्रतीत होता है मानो हम प्राचीन काल के जनमानस को जानते हैं। एक इतिहासकार के लिए यह एक अत्यंत आनंद की भावना है।

हमें इस विषय में जानकारियाँ मुख्यतः संस्कृत, प्राकृत, तमिल इत्यादि भाषाओं में रचित रचनाओं से प्राप्त होती हैं। हमारे तीन प्रमुख महाकाव्य एवं महारचनाएं रामायण, महाभारत एवं बड़कहा या बडकथा हैं। राजा सातवाहन के मंत्री ‘गुणाढ्य’ द्वारा रचित ‘बड़कहा’ को संस्कृत में बृहत्कथा कहा जाता है। ईसा पूर्व ४९५ में   रची गयी बड़कहा में उस काल के समाज पर आधारित कथाएं हैं। बड़कहा से ही अधिकतर जातक कथाएं भी ली गयी हैं। अनेक जातक कथाएं जैन मुनियों एवं बौद्ध भिक्षुओं ने भी लिखी हैं। अतः जातक कथाएं भी हमारे लिए जानकारियों का महत्वपूर्ण स्त्रोत हैं।

परिवहन के साधन

अनुराधा:  मेरी दूसरी जिज्ञासा परिवहन के साधनों के विषय में है। आधुनिक काल के द्रुतमार्गों एवं महामार्गों के समान क्या प्राचीन काल में भी परिवहन के लिए उत्तम मार्ग थे? वे किस प्रकार के वाहनों का प्रयोग करते थे? वे किस प्रकार यात्राएं करते थे? मुझे उस काल में उपलब्ध, यात्रा के मूलभूत ढाँचे के विषय में जानने की उत्सुकता है।

सुमेधा: परिवहन का आरम्भ सडकों से नहीं हुआ था। सड़कें कालांतर में अस्तित्व में आयीं। हमारे पास जल सदैव से था। अतः परिवहन के साधन के रूप में सर्वप्रथम जलमार्गों का आरम्भ हुआ क्योंकि मानव ने नौकाओं का आविष्कार अत्यंत आरम्भ में कर लिया था। सिन्धु घाटी सभ्यता के कुछ अभिलेखों में नौकाओं के प्रकार एवं उनके निर्माण कार्य के विषय में बताया गया है। जहाज़ों, नौका संचालकों, संचालन उपकरणों इत्यादि जैसे मूलभूत आवश्यक तत्वों से लैस जल परिवहन प्रणाली के विषय में ना केवल ऋग्वेद में लिखा है, अपितु जातक कथाओं में भी इनका उल्लेख प्राप्त होता है। ऋग्वेद में ना केवल १०० पतवारों से युक्त पोतों के विषय में लिखा गया है, अपितु इसके विभिन्न तत्वों के सटीक तकनीकी नामों का भी उल्लेख है। जैसे, पतवार को अर्त, नाविक को अरित्री तथा छोटे जहाज़ों के बेड़े को अद्युम्न कहा गया है। अतः जल मार्गों पर नौचालन से सम्बंधित अनेक तकनीकी शब्दों का उल्लेख प्राप्त होता है। यहाँ तक कि अंग्रेजी के ‘navigation’ शब्द की व्यत्पत्ति संस्कृत शब्द, नाविक से ही हुई है।

जल मार्ग  

अनुराधा: मैं सदैव यह जानने के लिए उत्सुक रहती थी कि आदि शंकराचार्य ने २४ वर्षों में सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किस प्रकार किया था। मेरे अनुमान से केरल के कलदी से लेकर मध्य प्रदेश के ओंकारेश्वर तक, भारत के कोने कोने में उन्होंने जल मार्गों द्वारा ही यात्रा की होगी।

सुमेधा: जी हाँ। मैं आपको थोलकपियार के विषय में बताना चाहती हूँ जो आज से २३०० वर्ष पूर्व कांचीपुरम में रहते थे। महान संतों से शिक्षा प्राप्त करने के लिए उन्होंने सालाटुरा तक की यात्रा की थी जो महान संस्कृत व्याकरण-विद् पाणिनि की जन्मस्थली भी है। सर्वप्रथम उन्होंने जलमार्गों का प्रयोग किया। तत्पश्चात उन्होंने सड़क मार्गों से यात्रा की। उन्होंने सर्वप्रथम दक्षिण पथ का अनुगमन किया, तत्पश्चात उत्तर पथ का पालन करते हुए उत्तरागमन किया।

इस मानचित्र में अनेक नदियाँ देख सकते हैं। ये सभी नदियाँ नौगम्य हैं, अर्थात इन सभी नदियों पर जल परिवहन किया जा सकता है। सभी सड़क मार्गों पर जोड़-मार्ग हैं जो इन सड़क मार्गों को पूर्वी व पश्चिमी तट पर स्थित बंदरगाहों से जोड़ती हैं।

प्राचीन काल में वे उत्तम विहार नौकाओं का भी निर्माण करते थे। अर्थशास्त्र में भी उनके नौका विहारों के आनंद के विषय में उल्लेख है। बहुधा यह राजाओं द्वारा उपहार स्वरूप उन्हें दिया जाता था जो सौंपे गए कार्य उत्तम रीति से पूर्ण करते थे।

प्राचीन भारत में यात्रायें
प्राचीन भारत में यात्रायें

यात्रा के साधन

अनुराधा: वे सड़क मार्गों पर किस प्रकार के वाहनों का प्रयोग करते थे?

सुमेधा: निसंदेह, अपने दो पैर। इनके अतिरिक्त वे अश्वों, बैलों, ऊंटों जैसे पशुओं का भी प्रयोग करते थे। आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि अत्यधिक कठिन एवं पथरीले मार्गों पर हलके बोझे ढोने के लिए वे बकरियों का भी प्रयोग करते थे। यद्यपि उनका प्रयोग मार्गों के छोटे भागों पर ही किया जाता था। सिन्धु घाटी सभ्यता में बैलगाड़ियां का प्रयोग सामान्य रूप से किया जाता था। इनके अतिरिक्त, राजसी सवारियों के लिए तथा युद्ध इत्यादि में रथों का प्रयोग किया जाता था। किन्तु व्यापारिक गतिविधियों के लिए पशुओं एवं बैलगाड़ियों का प्रयोग ही प्रचलित था।

हमें भव्य पालकियों एवं डोलियों को नहीं भूलना चाहिए। रेशमी वस्त्रों एवं अन्य अलंकरणों से सज्ज पालकियों को कहार अपने कन्धों पर उठाकर चलते थे। इनका प्रयोग संपन्न घराने के पुरुष एवं स्त्रियाँ ही करती थीं। वह एक प्रकार से सम्पन्नता का प्रदर्शन करने का एक मार्ग था। किन्तु लम्बी दूरी के लिए वे भी बैलगाड़ियों का ही प्रयोग करते थे तथा बड़े काफिलों के रूप में सहयात्रा करते थे।

विश्राम गृह

अनुराधा: आज हम जहां भी यात्रा करते हैं, वहां विविध सुविधाओं से लैस विश्राम गृहों, होटलों, रिसॉर्ट्स इत्यादि की भरमार है। प्राचीन काल में एक यात्रा संपन्न करने में अनेक दिवस व्यतीत हो जाते थे। वे मार्ग में तथा अपने गंतव्य में कहाँ विश्राम करते थे?

सुमेधा: प्राचीन काल में भूतल पर सड़क मार्गों द्वारा यात्राएं की जाती थीं। सिन्धु घाटी सभ्यता, वैदिक सभ्यता तथा अन्य ऐतिहासिक समयावधियाँ अपने विशेष सड़क मार्गों के लिए प्रसिद्ध थीं। ऋग्वेद के विभिन्न सन्दर्भों से यह ज्ञात होता है कि बैलगाड़ियों के लिए विशेष रूप से उठे हुए मार्ग बनाए जाते थे। उनके दोनों ओर वृक्ष लगाए जाते थे। महान व्याकरण विद् पाणिनि ने भी लोगों के सामाजिक जीवन पर अनेक टिप्पणियाँ की हैं।  जैसे, विशेष प्रयोग के लिए निर्मित मार्गों के विशेष नाम भी रखे जाते थे। बकरियों के मार्ग को अजपथिका कहा जाता था। उसी प्रकार उन्होंने देवपथिका, हंसपथिका, करिपथ, राजपथ, संखपथ इत्यादि के विषय में भी उल्लेख किया है। अतः, उस काल में सड़क मार्गों का निर्माण एवं मरम्मत का कार्य उत्तम रीति से तथा सजगता से किया जाता था। मार्गों के निर्माण एवं दुरुस्ती के लिए विशेष रूप से अधिकारियों एवं कामगारों के संगठनों की तैनाती की जाती थी।

रामायण – एक उदहारण

मैं रामायण के एक प्रसंग की ओर आपका ध्यान खींचना चाहती हूँ। श्री राम के १४ वर्षों के लिए वनवास प्रस्थान के पश्चात भरत ननिहाल से अयोध्या वापिस लौटे। राम के वनवास की सूचना प्राप्त होते ही वे अत्यंत विचलित हो गए तथा उन्हें वापिस अयोध्या लेकर आने के लिए सम्पूर्ण सेना साथ वन की ओर चले पड़े। अयोध्या से वन तक सम्पूर्ण सेना को लेकर जाने के लिए उन्होंने उत्तम सड़कों का निर्माण करवाया। उन्होंने कामगारों के विशाल समूह को इस कार्य में नियुक्त किया था। वाल्मीकि रामायण में इन सडकों एवं उनके निर्माण का विस्तृत वर्णन किया गया है।

इन सडकों के निर्माण में उनकी सहायता करने के लिए विशेषज्ञों की टोली भी थी, जैसे स्थल निरीक्षक, सर्वेक्षक, वास्तुविद, अभियंता, मिस्त्री, बढ़ई, पौधे लगाने के लिए माली इत्यादि।

प्राचीन भारत में यात्रा सहायक – पथप्रदर्शक

उनके साथ एक पथप्रदर्शक अथवा मार्गदर्शक भी सदैव रहता था। उसे सम्पूर्ण क्षेत्र की पूर्व जानकारी होती थी तथा वह अज्ञात क्षेत्रों में यात्रियों का मार्गदर्शन करता था। अन्यथा सघन वनीय प्रदेशों में अज्ञात परिस्थितियाँ संकट में डाल सकती थीं। मार्गदर्शक का कार्य बहुधा यात्रा समूह का मुखिया करता था जिसे सात्वाहक कहा जाता था। सात्वाहक अपने कार्य में अत्यंत निपुण होता था। आप जब भी वाल्मीकि रामायण पढ़ें तो इस प्रसंग को ध्यानपूर्वक पढ़ें। प्राचीन काल में कैसे सडकों का निर्माण किया जाता था तथा कैसे विशाल सेनायें इन मार्गों पर चलती थीं, इनके विषय में आपको विस्तृत जानकारी प्राप्त होगी।

अतिथिगृह

मार्गों के किनारे सराय एवं अतिथिगृह होते थे। इन अतिथिगृहों के विषय में ऋग्वेद, अर्थशास्त्र एवं जातक कथाओं में भी उल्लेख प्राप्त होता है। पाणिनि ने भी इनके विषय में उल्लेख किया है। वेदों में भी इन अतिथिगृहों के विषय में लिखा गया है। अथर्व वेद में अतिथिगृहों को अवसत कहा गया है तो ऋग्वेद में उन्हें प्रपत अथवा प्रथमा कहा गया है। इतिहास में मौर्यवंशियों का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है जिन्होंने प्रवासियों की यात्राओं को सुखकर बनाने के लिए बड़ी संख्या में अतिथिगृहों का निर्माण करवाया था। अतिथिगृहों में खाद्य एवं पेय पदार्थों की उत्तम सुविधाएं होती थीं। इन सब के रखरखाव का उत्तरदायित्व राज्य पर ही होता था।

इनके अतिरिक्त आश्रम होते थे जो यात्रियों का स्वागत सत्कार करने के लिए तत्पर रहते थे। पौराणिक कथाओं में हमने ऋषि-मुनियों के विषय में पढ़ा है जो यात्राएं करते थे तथा मार्ग में अन्य ऋषियों के आश्रम में विश्राम करते थे। आप सब को शकुंतला की कथा तो स्मरण ही होगी। यात्रा करते दुर्वासा ऋषि विश्राम की इच्छा से ऋषि कणव के आश्रम में पहुंचे तथा शकुंतला द्वारा उपेक्षित होने पर उसे श्राप दे दिया था।

अतिथि देवो भवः, इस मूलमंत्र का पालन करने वाले प्राचीन भारत के प्रत्येक व्यक्ति का निवासस्थान किसी भी यात्री के लिए अतिथिगृह ही होता था। किसी विश्रामगृह की अनुपस्थिति में गांववासी ही परिवार के सदस्य की भांति यात्रियों की सेवा करते थे। अतिथि सत्कार के चलते किसी भी यात्री को रात्रि में आसरा पाने में कठिनाई नहीं होती थी।

सहप्रवास

प्राचीन काल में लोग अनेक बैलगाड़ियों के समूह में एक साथ सहप्रवास करते थे। अतिथिगृह के अभाव में खुले में डेरा डाल देते थे। वे अपने बैलगाड़ियों में अथवा वृक्षों के नीचे ही सो जाते थे। किन्तु यह सुरक्षित व्यवस्था नहीं थी। चोर-डाकुओं अथवा जंगली पशुओं का संकट सदैव बना रहता था।

अनुराधा: मेरा अगला प्रश्न है कि क्या प्राचीन काल में स्त्रियाँ भी यात्राएं करती थीं?

सुमेधा: जी हाँ। प्राचीन काल में स्त्रियाँ विभिन्न परिस्थितियों में यात्राएं करती थीं। अनेक व्यापारी अपने सम्पूर्ण परिवार के साथ व्यापार-यात्रायें करते थे क्योंकि उनकी यात्राएं एक अथवा दो दिवसों की नहीं होती थीं। एक व्यापार संबंधी यात्रा सम्पूर्ण करने में अनेक दिवस व्यतीत हो जाते थे। इनके अतिरिक्त, प्राचीन काल में भी अनेक विदुषी स्त्रियाँ होती थीं जो ज्ञान अर्जन हेतु यात्राएं करती थीं। नाट्य मंडलियों में भी स्त्रियों का समावेश होता था जो नाट्य प्रदर्शन के लिए अपनी मंडलियों के साथ यात्राएं करती थीं।

प्राचीन भारत में एकल स्त्री यात्री

प्राचीन काल में स्त्रियों का एक ऐसा भी समूह था जो ज्ञान अर्जन के लिए एकल यात्राएं करता था। वे पूर्णतः स्वतन्त्र यात्रिक होती थीं। ऐसी ही एक यात्री थी, सुलभा। महाभारत में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को प्राचीन काल की एक सन्यासिनी सुलभा के विषय में जानकारी दी थी जो योगधर्म के अनुष्ठान द्वारा सिद्धि प्राप्त कर अकेली ही पृथ्वी पर विचरण करती थी। मोक्षतत्व के जानकार, मिथिलापुरी के राजा जनक एवं सिद्धि प्राप्त सन्यासिनी सुलभा के मध्य हुए संवादों के रूप में भीष्म इस प्रसंग का सुन्दर वर्णन करते हैं। एक अन्य उदहारण है, ययाति पुत्री माधवी का, जिसने लम्बे समय के शोषित जीवनकाल के पश्चात स्वतन्त्र यात्री के रूप में तपोवन का मार्ग ग्रहण किया था। अतः प्राचीन काल में ऐसे अनेक उदहारण हैं जहां स्त्रियों ने आत्मबोध एवं ज्ञान अर्जन के लिए अकेले ही भूलोक की यात्राएं की थीं। तपोवन को आत्मसात किया था।

एकल स्त्री यात्रियों का एक वर्ग ऐसा भी था जो मोक्ष प्राप्ति के लिए अत्यंत गंभीर था। वे किसी स्थान विशेष से सम्बन्ध नहीं जोड़ती थीं तथा किसी स्थान पर एक रात्रि से अधिक ठहरती भी नहीं थीं। सर्व सामाजिक बंधनों से सम्बन्ध विच्छेद कर केवल ज्ञान एवं मोक्ष प्राप्ति के लिए अग्रसर रहती थीं।

प्राचीन भारत की यात्रा पुस्तकें

अनुराधा: हमारे शास्त्रों में भी तीर्थ यात्राओं एवं तीर्थस्थलों के विषय में विस्तृत जानकारी दी गयी है। तीर्थ यात्राएं किस प्रकार की जानी चाहिए, इस विषय में भी लिखा गया है। इसी लिए यह देखा गया है कि हमारे अधिकतर तीर्थस्थल दूर-सुदूर के दुर्गम स्थानों  में होते हैं जहां तक पहुँचने के लिए साधक को विशेष जतन करने पड़ते हैं।

मैं आपसे एक प्रश्न पूछना चाहती हूँ कि प्राचीन भारत में की जाने वाले यात्राओं के विषय में जानने के लिए कौन कौन सी पुस्तकें पढ़नी चाहिए?

सुमेधा: मेरा सुझाव है कि आप Moti Chandras’s Trade and Trade Routes पढ़ें। इस पुस्तक में सटीक तिथियों सहित आर्य प्रवास सिद्धांत पर विस्तृत रूप से विश्लेषण एवं प्रमाण प्रस्तुत किये गए हैं। यद्यपि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह किंचित नकारात्मक प्रतीत हो सकता है तथापि इसमें प्राचीन भारत में यात्राएं अवन उनसे सम्बंधित  सर्व आयामों पर उत्तम जानकारी दी गयी है।

Upinder Singh की भी पुस्तक पढ़ें। प्राचीन भारत पर लिखित उनके इस पुस्तक में उन्होंने यात्राओं का भी उल्लेख किया है। Nayanjot Lahiri द्वारा व्यापार मार्गों पर लिखित पुस्तक मेरे अनुमान से भारत की सर्वोत्तम पुस्तक है।

अनुराधा:  सुमेधा जी, आज की चर्चा में भाग लेने एवं हमें ज्ञानवर्धक जानकारी प्रदान करने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद।

सुमेधा: मुझे इस चर्चा में आमंत्रित करने के लिए आपका भी धन्यवाद। हमारी चर्चा अत्यंत रोचक रही।

प्राचीन भारत में यात्राएं पर सुमेधाजी से हुई चर्चा की लिखित प्रतिलिपि IndiTales Internship Program के अंतर्गत हर्षिल गुप्ता ने तैयार की।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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जब भी हैदराबाद का उल्लेख हमारे सामने होता है तो सर्वप्रथम दम बिरयानी, ईरानी चाय, उस्मानिया बिस्कुट जैसे स्वादिष्ट व्यंजनों के स्मरण से मुंह में पानी आ जाता है। एक पल यदि अपनी जठराग्नि से पृथक जा कर सोचें तो हैदराबाद, इस शब्द से हमारे समक्ष चारमीनार, सैकड़ों वर्ष प्राचीन गोलकोंडा दुर्ग जैसे कई धरोहरों […]

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जब भी हैदराबाद का उल्लेख हमारे सामने होता है तो सर्वप्रथम दम बिरयानी, ईरानी चाय, उस्मानिया बिस्कुट जैसे स्वादिष्ट व्यंजनों के स्मरण से मुंह में पानी आ जाता है। एक पल यदि अपनी जठराग्नि से पृथक जा कर सोचें तो हैदराबाद, इस शब्द से हमारे समक्ष चारमीनार, सैकड़ों वर्ष प्राचीन गोलकोंडा दुर्ग जैसे कई धरोहरों की छवि उभर कर आ जाती है। यदि आप इतिहास में रुचि रखते हैं तो आप कदाचित यह जानते होंगे कि यह सब आरंभ कब तथा कैसे हुआ। १४ वी. सदी में हुए इस्लामिक आक्रमण से भी पूर्व, मोतियों के इस नगर में गोल्ला-कोंडा (गोलकोंडा) दुर्ग की माटी के नीचे से इसका आरंभ हुआ था। तीन सहस्त्र वर्षों पूर्व यहाँ जिस महापाषाण युगीन जीवन का अस्तित्व था, वह स्थल गोलकोंडा दुर्ग के समीप ही है। उस स्थान पर अब हैदराबाद विश्वविद्यालय स्थित है।

मिट्टी के शमशान कुंड
मिट्टी के शमशान कुंड

हैदराबाद के विकास को ५ पृथक चरणों में बांटा जा सकता है:

  • प्रागैतिहासिक
  • इस्लाम पूर्व
  • इस्लामी
  • स्वतंत्र
  • उच्च-तकनीकी नगर

ये इसके विकास की विभिन्न समय सीमाएं हैं। अंतिम चार चरणों पर अनेक अनुसंधान एवं सामग्री उपलब्ध हैं। फिर भी हैदराबाद विश्वविद्यालय के कुछ ही शिक्षक एवं वैज्ञानिक हैं जिन्होंने इस क्षेत्र के प्रथम मूल निवासियों के विषय में जाना है। गच्छीबावली के चकाचौंध भरे क्षेत्र के नाक के ठीक नीचे इस प्राचीनतम महापाषाण स्थल को गुप्त रूप से अंधकार एवं विस्मृति में छुपा दिया गया था।

भारत का प्राचीनतम महापाषाण स्थल

यह स्थल कहाँ है?

मेनहिर या स्मारक शिला
मेनहिर या स्मारक शिला

आप यह गुप्त कलाकोष विश्वविद्यालय के मुख्य प्रवेशद्वार से कुछ सौ मीटर की दूरी पर देख सकते हैं। हैदराबाद के आई टी हब से घिरा यह क्षेत्र गच्छीबावली में पुराने बॉम्बे राजमार्ग से केवल सौ मीटर दूर स्थित है। फिर भी यह प्राचीनतम महापाषाण स्थल इस विश्वविद्यालय परिसर के एक अंधेरे कोने में लुप्त था। यदि इस स्थान को रास्ता बनाने के लिए विशेष रूप से स्वच्छ नहीं किया गया होता तो यह स्थान तथा वहाँ जाने का मार्ग अच्छे जानकार के प्रशिक्षित आँखों को भी दृष्टिगोचर नहीं हो पाता। एक प्रकार से ऐसा कह सकते हैं कि यह अंधकार ही इस स्थल का सर्वोत्तम सुरक्षा कवच था।

यह कितना प्राचीन है?

हैदराबाद विश्वविद्यालय के भीतर स्थित यह भारत का प्राचीनतम महापाषाण स्थल है। इस स्थल को विश्व का प्राचीनतम लौह युगीन स्थल भी माना जाता है। विश्वविद्यालय के दो प्राध्यापक, के. पी. राव तथा आलोका पाराशर ने सन २००३-०४ में इस स्थान को खोजा था। लौह युग सामान्यतः १००० वर्ष ईसा पूर्व माना जाता है। किन्तु यहाँ पायी गई कई महापाषाण वस्तुएं उससे भी १००० वर्ष पीछे ले जाती हैं, अर्थात लगभग २७९५-२१४५ ईसा पूर्व।

हैदराबाद में महापाषाण काल का स्नानीय संग्रहालय
हैदराबाद में महापाषाण काल का स्नानीय संग्रहालय

यहाँ प्राप्त हुए मिट्टी के पात्रों की आयु मापने के लिए थर्मो-ल्यूमिनेसेंस तकनीक का उपयोग किया गया है। इन्हे सर्वप्रथम १९७२ में देखा गया था। प्रथम प्रारम्भिक खुदाई पुरातात्विक विभाग के तत्कालीन ए. पी. ने किया था। तत्पश्चात खुदाई एवं खोज का कार्य विश्वविद्यालय के अपने इतिहास प्राध्यापकों द्वारा किया गया।

जिन्हे प्राचीन युग के विषय में अधिक जानकारी नहीं है, उनके लिए महापाषाण का अर्थ है बड़ा पत्थर जो यूनानी शब्द ‘मेगास’ अर्थात बड़ा तथा ‘लिथोस’ अर्थात पत्थर से मिलकर बना है। महापाषाण सामान्यतः आवासीय क्षेत्र से दूर स्थित शमशानगृह के भीतर बड़े समाधि पत्थरों से भी संबंध रखता है। यह स्थान वास्तव में महापाषाणी शमशान स्थान था।

 ग्रेनाइट मेनहिर (स्मारक शिला)

इस पुरातत्व स्थल पर एक विशाल २०,००० किलोग्राम की ग्रेनाइट स्मारक शिला है। पुरातात्विक दृष्टिकोण से इस मेनहिर का अर्थ है, ‘मेन’ अर्थात शिला तथा ‘हिर’ अर्थात लंबा। इसका अर्थ है लंबी शिला जो कब्र पर रखी जाती है। इस शिला की ऊंचाई भूमि के ऊपर २० फुट से अधिक हो सकती है तथा भूमि के नीचे भी यह आधार देने के लिए २० फुट गहरी जा सकती है।

हैदराबाद में महापाषाण काल का स्नानीय संग्रहालय
हैदराबाद में महापाषाण काल का स्नानीय संग्रहालय

यह स्थल २१ समाधिस्थल भी पाए गए है। यहाँ काली एवं लाल मिट्टी के बर्तन पाए गए हैं। जैसे कुछ उदाहरण यहाँ प्रस्तुत हैं। इस स्थल की एक विशेष खोज है एक मापक पात्र जिसका माप २५० मिलीलीटर है।

पुरातात्विक उत्खनक मानते हैं कि यदि यह एक शमशान स्थल है तो जिन पूर्व-ऐतिहासिक महापाषाण कालीन लोगों ने इसकी संरचना की थी वे इस स्थल से कुछ किलोमीटर दक्षिण की ओर बसे होंगे। इसका अर्थ है कि वे जहां निवास करते थे वह भाग विश्वविद्यालय के दक्षिण भाग में कहीं था। विकास एवं आवास के नाम पर मानव सभ्यता ने वह भूमि हड़प ली है।

हैदराबाद में पाए गए प्राचीन मिट्टी के बर्तन
हैदराबाद में पाए गए प्राचीन मिट्टी के बर्तन

इस स्थान के आसपास कई जल स्त्रोत हैं जो इस परिकल्पना को समर्थन देते हैं कि विश्वविद्यालय का दक्षिण परिसर एक समय एक जीवित महापाषाणी सभ्यता को बसाया हुआ था।

इतिहास

यदि कोई हैदराबाद का इतिहास जानने का इच्छुक है तो यही वह स्थान है जहां उसे हैदराबाद का इतिहास देखने मिलेगा। शाब्दिक रूप से हमें प्रागितिहास कहना चाहिए क्योंकि इस स्थल के विषय में ना तो लिखा गया है ना ही संचयन किया गया है। इस स्थल के विषय में कोई भी मौखिक अथवा लिखित सामग्री उपलब्ध नहीं है। यह चित्र स्थल-संग्रहालय का है जहां दर्शकों को देखने के लिए उत्खनन खुला छोड़ा गया है। आप यहाँ उस काल के मिट्टी के पात्र तथा उनके टुकड़े देख सकते हैं।

यहाँ एक तथ्य आप ध्यान रखें कि यह इकलौता भारतीय पुरातात्विक उत्खनन स्थल है जिसे स्थल-संग्रहालय के रूप में संरक्षित किया गया है।

और पढ़ें: १५ अद्भुत हैदराबाद संग्रहालय जो आपको अपनी ही दुनिया में ले जाएँ

इस महापाषाणी स्थल पर प्राप्त कलाकृतियों को देख कर यह ज्ञात होता है कि इस स्थान के निवासियों ने भैंसों एवं बकरियों को पाला था। यह भी निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वे खाने के लिए ज्वार, बाजरा इत्यादि की खेती करते थे।

जैव विविधता

भारत का यह प्राचीनतम शमशान स्थल, परिकल्पित जीविका स्थल तथा विश्वविद्यालय का परिसर सभी अधिसूचित जैव विविधता आरक्षित क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं। यह विश्वविद्यालय, जिसका क्षेत्रफल लगभग २२०० एकड़ है, एक जैव विविधता संवेदनशील केंद्र है। यहाँ तेलंगाना राज्य की सर्वाधिक जैव विविधता उपलब्ध है जो किसी भी वन से अधिक है।

सौभाग्यवश अथवा दुर्भाग्यवश, यह स्थल किसी भी बाहरी व्यक्ति, यहाँ तक कि विश्वविद्यालय के अपने विद्यार्थियों के लिए भी सहज उपलब्ध नहीं है। विश्वविद्यालय के मानव जाती विज्ञान विभाग के विद्यार्थियों का इस स्थल में वर्ष में एक भ्रमण आयोजित किया जाता है जो उनके पुरातत्व पाठ्यक्रम का एक भाग है तथा जिसके लिए पूर्व-व्यवस्था की जाती है। यह भ्रमण तब आयोजित किया जाता है जब दक्षिण-पश्चिम मानसून अपने अंतिम चरण को पार कर गया हो तथा धरती की नमी सूख गई हो। धरती इतनी स्थायी हो गई हो कि झाड़ियों को हटा सकें तथा समीप स्थित सड़क से यहाँ तक का मार्ग पुनः खींचा जा सके।

तेलंगाना के ऐसे ही प्रागैतिहासिक स्थलों के विषय में आप ऐबीड्स के गन –फाउन्ड्री में स्थित राज्य पुरातात्विक संग्रहालय में देख सकते हैं।

अतिथि संस्करण

यह मेरे एक मित्र, श्रीराम द्वारा प्रदत्त एक अतिथि संस्करण है।


श्रीराम वर्तमान में एक शोधकर्ता हैं जो CRIDP में ‘Research in Infrastructure Development and Practice’ पर कार्यरत हैं। शैक्षणिक दृष्टि से उन्होंने MBA तथा हैदराबाद विश्वविद्यालय से मानव जाती विज्ञान में स्नातक की शिक्षा प्राप्त की है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) हैदराबाद से मानव जाती विज्ञान-समाज, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (STS) में ‘Burnout: An ethnographic study of Mid-Career Professionals in Hyderabad, India‘ इस विषय पर एम. फिल किया है। उन्होंने व्यावसायिक क्षेत्र में एक दशक तक कार्यरत रहते हुए अनेक भूमिकाएं निभाई हैं। इसके पश्चात उन्होंने शिक्षण के क्षेत्र में पदार्पण किया तथा मानव जाती वैज्ञानिक बने।

इससे पूर्व उन्होंने बैक-पैक करते हुए ११ देशों में भ्रमण किया है। वे Go-UNESCO यात्रा चुनौती २०१२ के द्वितीय विजेता भी रह चुके हैं। इसमें उन्हे ४५ दिनों में २०,००० किलोमीटर बैक-पैक करते हुए भारत के २७ विश्व धरोहर स्थलों में से २४ स्थलों का भ्रमण करना था। वे ‘हैदराबाद रनर’ के लिए धावक भी हैं। उन्होंने गुरु पद्म भूषण डॉक्टर वेम्पति चिन्न सत्यम की सुपुत्री गुरु श्रीमती बाला त्रिपुरसुंदरी से कुचीपुड़ी नृत्य की भी शिक्षा प्राप्त की है। आप उनसे ट्विटर पर @bhsriram अथवा Linkedin पर संपर्क कर सकते हैं।


अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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प्राचीन कान्हेरी गुफाएं मुंबई के संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान में https://inditales.com/hindi/prachin-kanheri-gufaayen-mumbai/ https://inditales.com/hindi/prachin-kanheri-gufaayen-mumbai/#comments Wed, 26 May 2021 02:30:43 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2304

मुझे जब कान्हेरी गुफाओं के विषय में जानकारी प्राप्त हुई थी, उसके पूर्व मुंबई के भीतर स्थित इन अद्भुत प्राचीन ऐतिहासिक गुफाओं के विषय में मैंने ना तो पढ़ा था, ना ही सुना था। सर्वप्रथम ब्रिटिश काल के समय इन कान्हेरी गुफाओं के अस्तित्व के विषय में जानकारी प्राप्त हुई थी। बोरिवली के संजय गांधी […]

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मुझे जब कान्हेरी गुफाओं के विषय में जानकारी प्राप्त हुई थी, उसके पूर्व मुंबई के भीतर स्थित इन अद्भुत प्राचीन ऐतिहासिक गुफाओं के विषय में मैंने ना तो पढ़ा था, ना ही सुना था। सर्वप्रथम ब्रिटिश काल के समय इन कान्हेरी गुफाओं के अस्तित्व के विषय में जानकारी प्राप्त हुई थी। बोरिवली के संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान के भीतर स्थित इन गुफाओं तक पहुँचने के लिए सुव्यवस्थित सड़क मार्ग उपलब्ध हैं। इन गुफाओं के आरंभिक बिन्दु तक गाड़ियां पहुँच सकती हैं। यहाँ से कुछ सीढ़ियाँ चढ़कर आप टिकट खिड़की तक पहुंचेंगे, तत्पश्चात गुफा में प्रवेश करेंगे।

पाषाण में उत्कीर्णित बुद्ध की विशाल मूर्ति
पाषाण में उत्कीर्णित बुद्ध की विशाल मूर्ति

कान्हेरी गुफाएं – मुंबई का लोकप्रिय पर्यटन स्थल

अजंता एवं एलोरा की प्रसिद्ध गुफाओं के समान ही, कान्हेरी गुफाओं का उत्खनन भी १ ई.पू. से ११ ई. तक किया गया था। ये गुफाएं महायान एवं हीनयान, बौद्ध धर्म के इन दोनों पथों से सम्बंधित हैं। इस तथ्य का साक्ष्य देती हैं वे गुफाएं, जहां कुछ गुफाओं में बुद्ध को स्तूप एवं चरण पादुका जैसे संकेतों से दर्शाया गया है तो कुछ गुफाओं में उनके मानवरूपी छवियाँ हैं।

कान्हेरी गुफाएं मुंबई
कान्हेरी गुफाएं मुंबई

कान्हेरी गुफाओं के नाम की व्युत्पत्ति उस पहाड़ के नाम से हुई है जिस पर ये स्थित हैं, कृष्णगिरी। यह एक ज्वालामुखी से उत्पन्न पर्वत है। इस पर्वत पर कुल ११० गुफाओं का समूह है जो इस समूह को सर्वाधिक विशाल गुफा समूह बनाता है। यद्यपि कुछ गुफाएं अपूर्ण प्रतीत होती हैं। प्राचीन काल में ये गुफाएं उस व्यापार मार्ग पर थीं जो सोपारा, नासिक, पैठन तथा उज्जैन को जोड़ती थी।

चट्टान पर सुव्यवस्थित प्रकार से उकेरी गई सीढ़ियाँ अत्यंत दर्शनीय हैं।

चैत्य गृह

इन गुफाओं में एक चैत्य गृह अथवा प्रार्थना कक्ष है। एक विशाल भोजन कक्ष भी है जिसके भीतर भोजन करने के लिए दोनों ओर कम ऊंचाई की लम्बे शिलापाट हैं। अनेक भूमिगत जलकुण्ड हैं। भिक्षुओं के निवास के रूप में अनेक विहार हैं जिसके बाह्य प्रांगण में बैठकें भी हैं। ऐसा कहा जाता है कि ३री सदी तक कान्हेरी गुफ़ाएं बौद्ध भिक्षुओं की स्थाई बस्ती बन चुकी थीं।

गुफा क्र. ३

गुफा क्र. ३ अथवा चैत्य गृह वर्तमान प्रवेश स्थल के समीप स्थित है। इसकी छत पर उत्कीर्णित आकृतियाँ लकड़ी पर की जानी वाली नक्काशी के समान है। ठीक वैसी ही जैसी, लोनावला के समीप स्थित कारले गुफाओं के भीतर हैं। इस विशाल कक्ष के मध्य में एक विशाल स्तूप है। इसके पार्श्व भाग में कुछ उत्कीर्णित स्तम्भ हैं जिन पर गजों की आकृतियाँ हैं। यह कक्ष कम से कम दो तलों का है किन्तु ऊपरी तलों तक पहुँचने का मार्ग ढूँढना अब कठिन है। गुफा के बाहर, ड्योढ़ी पर,बुद्ध की विशाल, उभरी हुई प्रतिमाएं हैं। अग्र भित्तियों पर उन दाताओं की छवियाँ हैं जिन्होंने इन गुफाओं को प्रायोजित किया था। गुफा के बाहर आप कुछ अन्य स्तूप भी देखेंगे। उनमें से एक स्तूप पूर्णतः ढका हुआ है किन्तु अन्य स्तूप अपेक्षाकृत कुछ खुले हैं जिनके चारों ओर आप चल सकते हैं।

यहाँ पर उन सभी ठेठ कठघरों जैसी मेढ हैं जो सामान्यतः प्रसिद्ध स्तूपों के चारों ओर बनी हुई हैं। जैसे अमरावती, सांची, सतना जिले के भरहुत तथा महाबोधि मंदिर में पाए जाने वाले स्तूपों में हैं। उन पर बनी आकृतियाँ ठेठ आड़ी-तिरछी रेखाएं हैं जिन पर कमल पुष्प का चिन्ह उत्कीर्णित है। १६ वीं से १७ वीं सदी के मध्य इन गुफाओं को ईसाई गिरिजाघरों में परिवर्तित कर दिया गया था। वर्तमान में इस परिवर्तन के किसी भी प्रकार के चिन्ह अस्तित्व में नहीं हैं।

विहार

विहार की रूपरेखा भी चैत्य गृह के ही समान है। इनके समक्ष स्थित प्रांगण में बैठने के लिए बैठकें हैं। इनके पश्चात भिक्षुओं के लिए कक्ष हैं। ऊपरी तल की भी यही रूपरेखा है। कक्षों के भीतर शिला के शयन हैं। सामान्यतः गुफाओं के दोनों ओर जलकुण्डों की व्यवस्था है। साहित्यों के अनुसार, दक्षिणपूर्वी देशों से अनेक साधक इस विहार में अध्ययन हेतु आते थे जिस के कारण यह अध्ययन का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया था।

गुफा क्र. ११ को महाराजा अथवा दरबार गुफा भी कहते हैं क्योंकि यह एक प्रकार से सभा कक्ष प्रतीत होता है।

गुफा संबंधी सुरक्षा निर्देश

गुफाओं के भीतर से ऊपर-नीचे जाती सीढ़ियों में से कुछ अत्यंत भंगित अवस्था में हैं। उनका प्रयोग करते समय अत्यंत सावधानी का पालन करें। अन्यथा दुर्घटना की संभावना हो सकती है। गुफाओं के बाहर स्थित एक सूचना पटल के अतिरिक्त अन्य कहीं भी, गुफाओं एवं उत्कीर्णित आकृतियों की जानकारी नहीं दी गई है। टिकट घर पर भी कोई सूचना पुस्तिका अथवा जानकारी प्रदान करते साहित्य उपलब्ध नहीं है। यदि आपने इससे पूर्व कहीं बौद्ध गुफाएं देखी हों तो वहाँ से प्राप्त जानकारी का स्मरण करें। इससे इन गुफाओं एवं उत्कीर्णित आकृतियों को समझने में आसानी हो सकती है।

कान्हेरी गुफाओं की जल प्रबंधन प्रणाली

इन गुफाओं का एक अत्यंत उत्कृष्ट एवं रोचक तत्व है यहाँ की जल प्रबंधन प्रणाली। अनेक नलिकाएं एवं धाराएं वर्षा के जल को एक विशाल भूमिगत कुण्ड तक ले जाती हैं। यह प्राचीन काल के आरंभिक वर्षा जल संचयन प्रणाली का उत्तम उदाहरण हो सकता है। जल का प्रबंधन किस प्रकार सावधानी से किया जाता था, यह इसका उत्कृष्ट दृष्टांत है।

गुफाओं में भ्रमण करते हुए आप देख सकते हैं कि कैसे गुफाओं की छतें वर्षा के जल को गुफा के बाहर स्थित नलिकाओं की ओर ले जाती हैं। तत्पश्चात, ये नलिकाएं विभिन्न तलों पर कुण्डों से इस प्रकार जुड़ती हैं ताकि जल का अपव्यय न हो तथा सम्पूर्ण गुफा प्रणाली में शुद्ध जल उपलब्ध हो सके। इन गुफाओं का वास योग्य होने का प्रमुख कारण यह एकीकृत जल प्रबंधन प्रणाली ही हो सकता है। वर्तमान में यह शोध का विषय है कि किस प्रकार इन उत्खनित प्राकृतिक गुफा प्रणाली में इस प्रकार की आत्मनिर्भर जल प्रबंधन प्रणाली अंतर्निहित की गई थी।

मैंने ऐसी ही जल प्रबंधन प्रणाली जोर्डन की प्राचीन नगरी पेट्रा में भी देखी थी। उन्हे भी प्राकृतिक चट्टानों में उत्खनित किया गया था।

शिलालेख

आप गुफा की भित्तियों पर अनेक शिलालेख देख सकते हैं किन्तु उन्हे समझने का कोई साधन नहीं है। कान्हेरी गुफाओं में ब्राह्मी, देवनागरी एवं पाहलवी लिपि में कुल ५१ अभिलेखों एवं २६ उद्धरणों की खोज हो चुकी है। अधिकतर अभिलेखों में उन राजा-महाराजाओं के नाम हैं जिन्होंने इन गुफाओं को संरक्षण प्रदान किया था। एक अभिलेख में राजगद्दी पर विराजमान सातवाहन राजा सतकर्णी वशिष्टिपुत्र के विवाह का उल्लेख है।

कान्हेरी गुफाओं में कुछ ताम्रपत्र भी प्राप्त हुए थे जो अब ब्रिटिश संग्रहालय में संरक्षित हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की सूचना पट्टिका के अनुसार एक गुफा में अजंता की गुफाओं के समान भित्तिचित्र हैं। किन्तु मैं उस गुफा को ढूंढ नहीं पायी। उसे खोजने का कोई साधन अथवा सूचना भी उपलब्ध नहीं थी।

चित्रपट चित्रीकरण

जब मैं इन गुफाओं में भ्रमण कर रही थी, उस समय यहाँ, एक गुफा के ऊपर यशराज फिल्म्स के किसी चित्रपट का चित्रीकरण हो रहा था। किसी चित्रपट के चित्रीकरण में कितने बड़े स्तर पर परिश्रम, ऊर्जा तथा साधनों की आवश्यकता होती है, इस तथ्य से वह मेरा प्रथम साक्षात्कार था। कदाचित यह चित्रपट देखते समय, वह परिदृश्य दर्शकों के ध्यान में भी न आए, किन्तु उसे साकार करने में कम से कम १०० व्यक्तियों का जनबल जुटा हुआ था। वहाँ बिजली उत्पादक वाहन, अभिनेताओं के लिए चलित प्रसाधन कक्ष, खाद्य पदार्थों के वाहन, साज-सज्जा का सामान तथा अनेक उपकरण भी थे।

कान्हेरी गुफाओं में फिल्मीकरण
कान्हेरी गुफाओं में फिल्मीकरण

अनेक सुरक्षा कर्मचारी तैनात थे जो साधारण जनमानस को को चित्रीकरण स्थल पर जाने से निषिद्ध कर रहे थे। उन्होंने चित्रीकरण के लिए एक विस्तृत क्षेत्र घेर कर रखा था। यह न्यायसंगत नहीं है। यह एक सार्वजनिक स्थल है। सभी पर्यटक प्रवेश-शुल्क देकर भीतर प्रवेश किए हैं। उन्हे सभी स्थानों पर जाने एवं अवलोकन करने की स्वतंत्रता है।

गांधी स्मारक

जब आप कान्हेरी गुफाएं देखने यहाँ आएं तब आप गांधी स्मारक भी देख सकते हैं। गांधी स्मारक एक पहाड़ी की चोटी पर बना एक मंडप है जिसे महात्मा गांधी की स्मृति में बनवाया गया था। वहाँ से आप सम्पूर्ण नगर का ३६० अंश का परिदृश्य देख सकते हैं।

संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान

आप इस राष्ट्रीय उद्यान में विचरण कर सकते हैं तथा यहाँ की शुद्ध वायु का आनंद उठा सकते हैं। यहाँ एक छोटी झील है जिसमें आप नौका विहार का आनंद ले सकते हैं। एक छोटी रेलगाड़ी आपको सम्पूर्ण पहाड़ी की सैर  कराती है। यहाँ बाघ सफारी का भी आनंद लिया जा सकता है। कुल मिलाकर आप एक सम्पूर्ण दिवस यहाँ व्यतीत कर सकते हैं। यह उद्यान अन्य घने राष्ट्रीय उद्यानों जैसा हरा-भरा नहीं है। फिर भी यह मुंबई जैसी भीड़भाड़ भरी महानगरी के फेफड़ों के समान है।

मंडपेश्वर गुफाएँ

यहाँ से कुछ किलोमीटर की दूरी पर मंडपेश्वर गुफाएँ हैं जो गुफाओं का लघु समूह है। इन गुफाओं की भिन्नता यह है कि ये हिन्दू गुफाएं हैं। एक भित्ति पर भगवान शिव की नृत्य मुद्रा में एक विशाल प्रतिमा है। ऐसा कहा जाता है कि यहाँ एक विशाल शिवलिंग था। किन्तु वह शिवलिंग अब कहाँ है, इसकी जानकारी नहीं है। उसके स्थान पर अब एक नवीन लिंग की आराधना की जाती है। एक लंबे समय तक इन गुफाओं का प्रयोग एक गिरिजाघर के रूप में भी किया जाता था। अब यह हिंदुओं का पूजनीय स्थल है। हमने यहाँ स्त्रियों के एक विशाल समूह को पूजा-अर्चना करते देखा। किन्तु विडंबना यह है कि ये गुफाएं अत्यंत ही मलिन परिवेश में स्थित है।

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अब मेरा आगामी लक्ष्य है, मुंबई नगरी के अन्य ब्रिटिश-पूर्व ऐतिहासिक तत्वों की खोज, जैसे बाणगंगा कुण्ड। उन ऐतिहासिक स्थलों में से कुछ का उल्लेख इस पॉडकास्ट में किया गया है जिसमें हम हमारे मित्र भरत गोठोस्कर जी से मुंबई के विषय में चर्चा कर रहे हैं।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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मुंबई भारत की वित्तीय राजधानी है। लोकप्रिय मान्यता यह कहती है कि मुंबई महानगर के यशस्वी इतिहास का आरंभ औपनिवेशिक काल के साथ होता है। किन्तु वास्तविकता यह है कि केवल आज के आधुनिक मुंबई को ही अंग्रेजों ने बनाया था। मुंबई का वास्तविक इतिहास उससे कहीं अधिक प्राचीन है। ऐतिहासिक दृष्टि से, आज की […]

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मुंबई भारत की वित्तीय राजधानी है। लोकप्रिय मान्यता यह कहती है कि मुंबई महानगर के यशस्वी इतिहास का आरंभ औपनिवेशिक काल के साथ होता है। किन्तु वास्तविकता यह है कि केवल आज के आधुनिक मुंबई को ही अंग्रेजों ने बनाया था। मुंबई का वास्तविक इतिहास उससे कहीं अधिक प्राचीन है। ऐतिहासिक दृष्टि से, आज की मुंबई का प्राचीनतम विधान सोपारा से आता है जिसे अब नालासोपारा कहते हैं। नालासोपारा को मुंबई का एक तुच्छ उपनगर माना जाता है। विडंबना यह है कि मुंबई से संबंधित प्राचीनतम ऐतिहासिक प्रमाण इसी स्थान से प्राप्त होते हैं। ये प्रमाण अशोक के ९वें अध्यादेश के रूप में है जो नगर के छत्रपती शिवाजी महाराज वास्तु संग्रहालय में रखा हुआ है।

सम्राट अशोक का शिलालेख ३ री ईपू
सम्राट अशोक का शिलालेख ३ री ईपू

सोपारा को प्राचीनकाल में शुर्पारक(शुरपारक) कहा जाता था। इस स्थान का एक वैभवशाली इतिहास है। भारत के पश्चिमी तट पर एक महत्वपूर्ण बंदरगाह के रूप में ही नहीं, अपितु एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र के रूप में भी यह प्रसिद्ध था। सोपारा के मिस्र, यूनान, रोम तथा मध्य पूर्वी क्षेत्रों से व्यापारिक संबंध थे। आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि इसका उल्लेख २००० वर्ष प्राचीन पुस्तक, ‘PERIPLUS OF THE ERYTHRAEAN SEA’ में भी किया गया है। सोपारा को अपरांत (कोंकण का प्राचीन नाम) की राजधानी भी माना जाता था। सनातन ब्राम्हण, बौद्ध एवं जैन धर्म, भारत के ये तीनों स्वदेशी धर्मों के महत्वपूर्ण साहित्यों में सोपारा का उल्लेख प्राप्त होता है।

धर्म ग्रंथों, महाकाव्यों एवं मिथकों का सोपारा

ऐसी मान्यता है कि शुर्पारक की स्थापना भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम ने की थी। यहाँ तक कि स्थानीय प्रजा को शिक्षा प्रदान करने के लिए परशुराम संस्कृत के विभिन्न विद्वानों को यहाँ लेकर आए थे। उन्होंने अपने परशु द्वारा इस स्थान का परिरक्षण भी किया था। इसीलिए सोपारा को परशुरामतीर्थ भी कहा जाता है। परशुराम ने यहाँ दो विशाल सरोवरों का निर्माण किया था जिनके नाम थे, निर्मल व विमल।

निर्मल वह स्थान है जहां एक समाधि है। ऐसा माना जाता है कि यह समाधि ५वें शंकराचार्य विद्यारण्य स्वामी की है। कुछ शोधकर्ता इस समाधि का संबंध बाद के शंकराचार्य से जोड़ते हैं जो द्वारका से यहाँ आए थे। निर्मल सरोवर के महत्व का अनुमान आप इस तथ्य से लगा सकते हैं कि इसके नाम पर एक स्थलपुराण भी है जिसका नाम है, निर्मल माहात्मय। पद्म पुराण में १०८ तीर्थों का उल्लेख है। उनमें निर्मल को सर्वाधिक पवित्र स्थलों में से एक माना गया है।

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बौद्ध परम्पराएं

सोपारा का बौद्ध परंपराओं में एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। अपने पूर्व जन्म में गौतम बुद्ध ने बोधिसत्व सुप्पारका के रूप में जन्म लिया था। बोधिसत्व पुन्ना(पूर्णा) की कथाओं में भी कहा गया है कि जब पुन्ना श्रावस्ती गए थे तब उनके अनुनय पर बुद्ध सुप्पारका आए थे। जब बुद्ध यहाँ आए थे तब उन्होंने सनातन ब्राम्हण ऋषि वक्कली एवं ५०० विधवाओं को बौद्ध धर्म में धर्मांतरण किया था। बुद्ध ने उन्हे स्मृतिचिन्ह के रूप में अपने नख एवं कुछ केश दिए थे। ऋषि एवं विधवाओं ने बुद्ध की इन स्मृतियों पर एक स्तूप का निर्माण किया जिसे विधवाओं का स्तूप कहा जाता है।

यहाँ से प्राप्त, ८वीं एवं ९वीं सदी के अशोक शिलालेख इस ओर संकेत करते हैं कि ३री सदी में इस स्थान की महत्ता अपनी चरम सीमा पर थी। अशोक ने अपने एक धर्म-प्रचारक, यवन धम्मरखिता(धम्मरक्षिता) को बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अपरांत(कोंकण) भेजा था। कहा जाता है कि उस प्रचारक ने ७०,००० श्रोताओं को बौद्ध धर्म में धर्मांतरित किया था। शोधकर्ताओं का मानना है कि धम्मरक्षिता ने इस स्थान को अपनी मूल कर्मभूमि बनाई थी। यहीं से उसने पश्चिम भारत में बौद्ध धर्म का प्रसार किया था।

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जैन ग्रंथ

जैन साहित्यिक ग्रंथ भी सोपारा को महत्वपूर्ण स्थान प्रदान करते हैं। जैन धर्म के अनुयायी सोपारा को पवित्र शत्रुंजय पहाड़ी की प्राचीन तलेटी मानते हैं। शत्रुंजय, जिसे सामान्यतः पालीताना भी कहा जाता है, श्वेताम्बर जैनियों का सर्वाधिक महत्वपूर्ण तीर्थ है। १४वीं शताब्दी के आचार्य जीनाप्रभासूरी ने अपनी रचना ‘विविध तीर्थ कल्प’ में उल्लेख किया है कि सोपारा जैनियों के ८४ सर्वाधिक महत्वपूर्ण तीर्थों में से एक है। उन्होंने यह भी कहा कि यहाँ आदिनाथजी की प्रतिमा भी थी जिसे भक्तगण पूजते थे। जैन भक्तों की मान्यता है कि यह आदिनाथ की जीवितस्वामी प्रतिमा थी, अर्थात् तीर्थंकर के जीवनकाल में बनाई गई थी। १२२३ ई. से १२८३ ई. के मध्य एक धनी व्यापारी, पेठद शाह ने सम्पूर्ण भारत में कुल ८४ मंदिरों का निर्माण करवाया था। उनमें से ५१वां मंदिर एक पार्श्वनाथ मंदिर था जो सोपारा में स्थित था।

जैन सूर्य प्रतिमा १४१२ ईसवी
जैन सूर्य प्रतिमा १४१२ ईसवी

कालांतर में इस क्षेत्र में जैनियों की जनसंख्या में भारी कटौती हुई। जीविका की खोज में मुंबई के सम्पन्न क्षेत्रों की ओर तेजी से पलायन इसका प्रमुख कारण है। प्राचीन काल में, रेल परिवहन का मानवी जीवन में पदार्पण से पूर्व, अनेक जैन व्यापारी यहाँ आकर बस गए थे। उन्होंने देशीय एवं समुद्री मार्ग द्वारा अन्तर्देशीय व्यापार में अपना सिक्का जमा लिया था। आगाशी के चलपेठ में स्थित लगभग २०० वर्ष प्राचीन जैन मंदिर इसका जीवंत प्रमाण है। इसकी स्थापना एक धनी व्यापारी मोतिशा सेठ ने करवाई थी जो अपने अन्य व्यापारों के अतिरिक्त अन्तर्देशीय व्यापार में भी एक सफल व्यापारी थे।

महाकाव्य महाभारत का कथन है कि जब अर्जुन भारत के पश्चिमी तटों के विभिन्न स्थानों की यात्रा कर रहे थे तब वे अतिपावन शुर्पारक भी आए थे। पउमचरियम, जो रामायण का जैन संस्करण है, उस में उल्लेख है कि शुर्पारक उन अनेक स्थलों में से एक है जिस पर लव-कुश ने विजय प्राप्त की थी।

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प्राचीन यात्रियों के संस्मरण

मानवों में अपने मस्तिष्क में उभरते प्रश्नों के उत्तर खोजने की सदा से ही एक ललक रही है। यात्रा मानवजाति की उसी कुतूहलता का परिणाम है। फिर भले ही यात्रा धार्मिक हो या आनंद के लिये, प्रिय रुचि से संबंधित हो अथवा दैनंदिनी जीवन की विरक्ति से मुक्ति पाने के लिए हो। जहां तक सोपारा का प्रश्न है, इसने प्राचीन काल से सभी धर्मों व पंथों के तीर्थ यात्रियों को आकर्षित किया है। आईए, उनमें से कुछ विशेष यात्रियों के विषय में जानते हैं।

प्रथम शताब्दी से ही अनेक यात्रियों के यात्रा संस्मरणों में सोपारा का उल्लेख मिलता है। एक अज्ञात लेखक की पुस्तक, ‘Periplus Of The Erythraean Sea’ में अनेक स्थानों पर सोपारा का उल्लेख किया गया है। तत्पश्चात, ग्रीक भूगोलवेत्ता क्लाडियस टॉलमी ने इस स्थान को अरियाके कहा है तथा यहाँ की नदियों के विषय में भी विवरण प्रस्तुत किया है। किन्तु कुछ शोधकर्ताओं के अनुसार इसकी अवस्थिति सटीक अंकित नहीं है। इन दोनों कृतियों में जो तथ्य स्पष्ट है, वह ये कि सोपारा या औप्पारा अथवा अरियाके एक महत्वपूर्ण बंदरगाह था। उनमें इस स्थान को कल्याण एवं भरूच को जोड़ने वाली कड़ी भी कहा गया है।

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६वीं सदी में ग्रीक व्यापारी तथा भिक्षु कोसमास इंडिकोप्लेयस्टेस ने कल्याण के निकट सीबोर का संदर्भ दिया था। १०वीं सदी में अरब यात्री अल मसुदी ने थाना के साथ सुबारा का भी उल्लेख किया था। फारसी यात्री इब्न हाउकल व अल इस्तखु तथा अरब भूगोलवेत्ता अल बिरुनी ने क्रमशः सुर्बारह, सुरबाया तथा सुबारा का संदर्भ दिया था। १२वीं सदी में अफ्रीका के भूगोलवेत्ता अल इदरिसी ने सुबारा को भारत का महान बिक्री भंडार कहा था। सन् १३२२ में ईसाई प्रचारक जॉर्डनस ने थाना के मुसलमानों के साथ संघर्ष का उल्लेख किया था। उसने, उस काल में, सोपारा में ईसाइयों की उपस्थिति की ओर भी संकेत किया था। उसने अपने यात्रा संस्मरण में सुपेरा होते हुए थाना से ब्रोच जाने का विवरण दिया है।

साहित्यों में उल्लेखित सोपारा के विभिन्न नाम

साहित्यों में अनेक स्थानों पर सोपारा का उल्लेख किया गया है। उसे विभिन्न नामों से संबोधित किया है। वे नाम हैं, सोपारा, सुरपुर, शुर्पारक, सोपारक, सोपार, सुरपक्का, सुर्पापारक, सुर्पारक, सुरीपक्का, सुम्हला, सहुआला, सुहालक, सुम्हलका, सुम्हलाका, सोपारपुर, सोपारपुर पट्टन, सोफिर, ओफिर, सोपारग, सहुपारा, सोर्पारक, सुपारिक इत्यादि।

आधुनिक यात्रियों के लिए सोपारा के मायने

सोपारा ऐसा स्थल है जो हर प्रकार के यात्रियों की रुचि को संतुष्ट करने की क्षमता रखता है, वह चाहे यात्रा में आनंदित होने वाले घुमक्कड़ हों या कला के क्षेत्र में रुचि रखने वाले यात्री, किसी स्थान के वैभवशाली इतिहास को जानने में रुचि रखने वाले हों अथवा आध्यात्मिक कारणों से यात्रा करने वाले तीर्थयात्री।

ये हैं सोपारा के कुछ दर्शनीय स्थल:
१. बुद्ध स्तूप
२. चक्रेश्वर तलाव तथा उसके निकट स्थित प्रतिमाएं
३. निर्मल शंकराचार्य समाधि
४. चलपेठ जैन मंदिर
५. आगाशी हनुमान मंदिर तथा पुष्करणी
६. जीवदानी मंदिर
७. वसई दुर्ग
८. नंदखल गिरिजाघर तथा वसई के अन्य प्राचीन गिरिजाघर
९. दिवस भर की थकान मिटाने के लिए अनेक समुद्र तट

बुद्ध स्तूप – सोपारा

बुद्ध स्तूप - सोपारा
बुद्ध स्तूप – सोपारा

बुद्ध स्तूप का स्थल, जिसे स्थानीय स्तर पर बरूड राजाचा कोट कहा जाता है, इसका उत्खनन सन् १८८२ में भगवानलाल इंद्राजी ने करवाया था। यहाँ से ईंटों से बना एक कक्ष उत्खनित किया गया था जिसके भीतर पत्थर का एक बड़ा सन्दूक प्राप्त हुआ था। इस सन्दूक में बुद्ध की धातु में बनी ८ मूर्तियाँ थी जिनमें मैत्रेय बुद्ध की भी एक प्रतिमा सम्मिलित थी। इनके अतिरिक्त रत्नों से भरी तांबे की मंजूषा, स्वर्ण पुष्प, सुगंधित चूर्ण, आभूषण, भिक्षापात्र जैसे बुद्ध के स्मृतिचिन्ह, गौतमीपुत्र सत्करणी का प्रथम शताब्दी का रजत सिक्का इत्यादि भी प्राप्त हुए थे।

सोपारा का लघु स्तूप
सोपारा का लघु स्तूप

इस स्तूप का निर्माण काल ३री सदी आँका गया है। निकट स्थित भटेला कुंड से सम्राट अशोक द्वारा घोषित ८वां आज्ञापत्र एक शिलालेख के अवशेष के रूप में प्राप्त हुआ था। यह शिलालेख अध्यादेश न केवल सोपारा का, अपितु मुंबई के आरंभिक अस्तित्व का प्रमाण है।

चक्रेश्वर तलाव

चक्रेश्वर अक्कलकोट स्वामी मठ - सोपारा
चक्रेश्वर अक्कलकोट स्वामी मठ – सोपारा

चक्रेश्वर तलाव अनेक अर्थों में अत्यंत महत्वपूर्ण है। हिन्दू अनुयायियों की प्रतीति है कि चक्रेश्वर तलाव उस समय अस्तित्व में आया जब भगवान कृष्ण के अपने चक्र के द्वारा इस जलस्त्रोत की खुदाई की। वहीं जैन धर्म के अनुयायी मानते हैं कि इसका संबंध प्रथम जैन तीर्थंकर आदिनाथ की यक्षिणी से था। आधुनिक काल के चक्रेश्वर तलाव ने अब एक अत्यंत ही परिवर्तित स्वरूप अपना लिया है। इसे अत्यंत स्वच्छ एवं सुंदर रूप प्रदान कर इसके चारों ओर दौड़ने व सैर करने के लिए पथ का निर्माण किया गया है। जहां तक एक यात्री का प्रश्न है, उसकी दृष्टि से चक्रेश्वर तलाव की महत्ता का कारण इसके निकट स्थित चक्रेश्वर महादेव मंदिर है।

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अग्नि अपने वाहन बकरी पर
अग्नि अपने वाहन बकरी पर

चक्रेश्वर महादेव मंदिर

इस मंदिर के वास्तविक उद्भव के विषय में विवाद है क्योंकि इसके उद्भव के विषय में लोगों की भिन्न भिन्न धारणाएं हैं। किन्तु अधिकतर इतिहासकारों तथा पुरातत्ववेत्ताओं का मानना है कि यह मंदिर १९वीं सदी में अस्तित्व में आया है। आज इसे चक्रेश्वर महादेव मंदिर कहा जाता है। यह मंदिर यहाँ का प्रमुख आराधना स्थल होते हुए भी, लोगों की कल्पना से विपरीत, एक भव्य मंदिर नहीं है। ऐसी मान्यता है कि यह वही स्थान है जहां स्वामी समर्थ रहते थे। यह मंदिर अक्कलकोट स्वामी मठ से लगा हुआ है जहां स्वामी मयूरानंद की समाधि है।

ब्रह्मा की प्रतिमा
ब्रह्मा की प्रतिमा

इस मंदिर का मुख्य आकर्षण है इसकी पुरातनता जो बड़ी मात्रा में इसके आसपास पसरी हुई है। मंदिर के भीतर तो प्रतिमाएं हैं ही, मंदिर के बाहर, इसके परिसर में भी चारों ओर अनेक शिल्प हैं।

महिषासुरमर्दिनी - अक्कलकोट मठ सोपारा
महिषासुरमर्दिनी – अक्कलकोट मठ सोपारा

हम इन प्रतिमाओं का विस्तृत रूप से अवलोकन करेंगे। शैलीगत रूप से कुछ प्रतिमाएं १०वीं से ११वीं सदी की भी हैं।स्थानीय मान्यता है कि अधिकतर मूर्तियों को चक्रेश्वर तलाव से निकाला गया था। मूल मंदिर को नष्ट करते समय पुर्तगलियों ने इन मूर्तियों को इस तालाब में डाला था।

गजलक्ष्मी - सोपारा
गजलक्ष्मी – सोपारा

स्थानीयों की एक अन्य मान्यता के अनुसार, पुर्तगाली आक्रमणकारियों से इन मूर्तियों का रक्षण करने के लिए, यहाँ के लोगों ने ही जानबूझ कर उन्हे तलाव में डाल दिया था।

हरिहर - देखिये जटामुकुट एवं किरीट का संगम
हरिहर – देखिये जटामुकुट एवं किरीट का संगम

दोनों संदर्भों से एक तथ्य स्पष्ट है कि स्थानीयों के मस्तिष्क में पुर्तगलियों की स्मृति किसी घाव के समान चिन्हित है।

सूर्य अपने सात घोड़ों पे स्वर
सूर्य अपने सात घोड़ों पे स्वर

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निर्मल शंकराचार्य मंदिर

निर्मल एक विलक्षण गाँव है जिसे भक्तगण अत्यंत पावन मानते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार परशुराम ने निर्मल की रचना की थी। ऐसा माना जाता है कि परशुराम ने समुद्र की ओर एक तीर फेंका जिससे समुद्र का जलस्तर घट गया तथा एक नवीन भूमिखण्ड का जन्म हुआ। परशुराम ने उस भूमि पर ब्राह्मणों को बसाया। निर्मल उसी भूमिखण्ड का भाग है। यह पूर्ण दंतकथा निर्मल माहात्मय नामक स्थलपुराण में अभिलेखित है। इस पुराण में परशुराम एवं निर्मल या सोपारा में किये उनके विजय अभियानों के अनेक उल्लेख हैं। यह पुराण परशुराम द्वारा रचित दोनों तीर्थ, निर्मल एवं विमल के विषय में भी विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है।

निर्मल पहाड़ी पर शंकराचार्य समाधि
निर्मल पहाड़ी पर शंकराचार्य समाधि

निर्मल से संबंधित मान्यताओं का साक्षी है निर्मल पहाड़ी के शीर्ष पर स्थित जगतगुरु शंकराचार्य मंदिर। इस मंदिर का संबंध शंकराचार्य से जोड़ने के विषय में भिन्न भिन्न मत हैं। कुछ का विश्वास है कि यहाँ ५वें शंकराचार्य विद्यारण्य स्वामी की समाधि है। वहीं कुछ की मान्यता है कि यह कालांतर में गुजरात से आकर बसे शंकराचार्य की समाधि है। दोनों ही मान्यताओं में इस मंदिर का संबंध शंकराचार्य से ही है। वर्तमान में जो मंदिर यहाँ है वह एक आधुनिक पुनर्निर्माण है।

परशुराम अपने माता पिता के साथ
परशुराम अपने माता पिता के साथ

चलपेठ जैन मंदिर

यह मंदिर २०वें जैन तीर्थंकर मुनिसुव्रत स्वामी को समर्पित है। इसका निर्माण १९वीं शताब्दी के आरंभ में सेठ मोती चंद द्वारा किया गया था जो मुंबई के एक समृद्ध व्यापारी थे। इस विषय में कुछ लोग सेठ मोती शाह का संदर्भ भी देते हैं जो सेठ मोती चंद के पिता थे। यह मंदिर लगभग १९० वर्ष प्राचीन है। इसके निर्माण के विषय में एक रोचक कथा प्रचलित है।

मुनिसुव्रत तीर्थंकर - सोपारा
मुनिसुव्रत तीर्थंकर – सोपारा

किवदंतियों के अनुसार लगभग २५० वर्षों पूर्व तीर्थंकर की एक प्रतिमा चक्रेश्वर तलाव से प्राप्त हुई थी। निकटवर्ती क्षेत्रों के बड़े बड़े जैन संघों में होड़ सी लग गई। सभी उस प्रतिमा को अपने अपने क्षेत्रों में ले जाकर मंदिर का निर्माण करना चाहते थे। जब यह विवाद अपनी चरम सीमा पर था, तब बिना बैल की एक बैलगाड़ी वहाँ आकर रुकी। उसे देख सभी आश्चर्यचकित हो गए थे। मंत्रमुग्ध से उन्होंने उस प्रतिमा को बैलगाड़ी में रख दिया। बैलगाड़ी स्वयं ही चलने लगी। बिना बैल की बैलगाड़ी को स्वयं ही जाते देख सभी स्तब्ध थे। वे बैलगाड़ी का पीछा करने लगे। उस स्थान से लगभग ५ से ७ किलोमीटर दूर जाकर बैलगाड़ी स्वयं ही रुक गई। यह स्थान आगाशी का चलपेठ क्षेत्र था। सभी लोग सर्वसम्मति से इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि उस प्रतिमा को वहीं एक छोटे से कक्ष के भीतर स्थापित किया जाए। इस प्रकार चलपेठ जैन मंदिर में तीर्थंकर की प्रतिमा स्थापित हुई।

सन् २०१९ में इस मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया था। आज यह मंदिर अपने नवीनतम स्वरूप में विद्यमान है।

आगाशी हनुमान मंदिर तथा पुष्करणी

जैन मंदिर से केवल एक किलोमीटर दूर ही पेशवा काल का एक शिव मंदिर है। आगाशी में स्थित इस शिव मंदिर का सन् २०१२-१३ में जीर्णोद्धार किया गया जिसके पश्चात अब इसे हनुमान मंदिर के रूप में पूजा जाता है। इस मंदिर से लगी हुई इसकी एक अत्यंत सुंदर पुष्करणी है। प्राचीन काल में लगभग सभी प्रमुख उत्सवों के समारोहों के लिए यह एक लोकप्रिय स्थल हुआ करता था। पूर्व में यह पुष्करणी अनेक मनमोहक प्रतिमाओं एवं शिल्पों से अलंकृत थी किन्तु उनमें से अधिकतर प्रतिमाएं अब अस्तित्व में नहीं हैं। दुर्भाग्य से जीर्णोद्धार में मंदिर का मूल स्वरूप भी खो गया है। प्राचीन भित्तियों एवं सतहों का स्थान अब टाइलों एवं तैलीय रंगों ने ले लिया है। ये तथ्य भले ही एक यात्री अथवा धरोहर प्रेमी के हृदय को दुख पहुंचाएं, फिर भी यह एक अत्यंत दर्शनीय स्थल है। आगाशी तलाव से लगा हुआ एक भवानी मंदिर है। संयोग से, उपरोक्त उल्लेखित मंदिरों के समान, इस मंदिर से संबंधित भी एक रोचक दंतकथा है।

पेशवा काल का शिव मंदिर - जीर्णोधार २०११
पेशवा काल का शिव मंदिर – जीर्णोधार २०११

एक प्रचलित दंतकथा के अनुसार, सांगली के पटवर्धन राज-परिवार का एक सदस्य एक असाध्य रोग से ग्रसित हो गया था, जिसके कारण वह अत्यंत दुखी था। एक रात्रि उसके स्वप्न में उसे एक देवी ने दर्शन दिए तथा कहा कि यदि उसे उस असाध्य रोग से मुक्ति पानी हो तो इस क्षेत्र के आगाशी गाँव में जाये। वहाँ जाकर स्वयं के व्यय पर एक जलकुंड का निर्माण करे। छः मास वहाँ वास करे तथा उस जलकुंड के जल में स्नान करे। रोग से त्रस्त उस व्यक्ति ने ठीक वैसा ही किया जैसा देवी ने कहा था। छः मास तक जलकुंड में स्नान करने के पश्चात वह रोगमुक्त हो गया।

भवानी शंकर मंदिर एवं दीपस्तंभ
भवानी शंकर मंदिर एवं दीपस्तंभ

अब तक आप जान ही गए होंगे कि यह तलावों एवं जलस्त्रोतों की भूमि है। ऐसे अनेक संदर्भ हैं जहां इस क्षेत्र को १०८ कुंडों की भूमि कहा गया है!

जीवदानी मंदिर

जीवदानी मंदिर एक पहाड़ी के शीर्ष पर स्थित है जिसे स्थानीय लोग जीवदानी कहते हैं। यद्यपि यह एक आधुनिक मंदिर है तथापि यह स्थानीय भक्तों के साथ साथ दूर-सुदूर से आए तीर्थयात्रियों के लिए भी अत्यंत पूजनीय है। इस मंदिर की मुख्य देवी जीवदानी माता है। माता की एक झलक पाने के लिए अनेक श्रद्धालु एक छोटी पगडंडी से पहाड़ी पर चढ़ते हैं। यह मंदिर एक गुफा के भीतर स्थित है जो मूलतः कुछ बौद्ध गुफाओं का एक भाग था। मंदिर की गुफा से लगी अन्य गुफाओं में लोगों ने अतिक्रमण कर लिया है। वहाँ वे दुकानें लगा कर जलपान की वस्तुएं एवं पूजा सामग्रियों की विक्री कर रहे हैं। एक जर्जर गुफा के एक भाग में तो मंदिर में दर्शन के लिए जाते भक्तों के पादत्राण भी सुरक्षित रखे जा रहे थे। यह सब देखना अत्यंत दुखद था।

वसई दुर्ग

वसई दुर्ग उन सर्वाधिक प्रतिष्ठित स्मारकों में से एक है जिसका दर्शन प्रत्येक यात्री करना चाहेगा। वसई दुर्ग इस क्षेत्र के लगभग ६०० वर्षों के इतिहास तथा हस्तांतरणों का गौरवशाली साक्षी रहा है। यद्यपि यह दुर्ग वसई में स्थित है तथापि यहाँ वैतरणी एवं उल्हास नदियों के सम्पूर्ण क्षेत्र को सोपारा माना गया है। यह दुर्ग इस क्षेत्र की सर्वाधिक दक्षिणी सीमा को अंकित करता है।

वसई दुर्ग का प्रवेशद्वार
वसई दुर्ग का प्रवेशद्वार

नाथाराव सिंह भण्डारी भोगले ने १४वीं शताब्दी में इस दुर्ग का निर्माण करवाया था। कालांतर में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने इस पर विजय प्राप्त की थी। तत्पश्चात पुर्तगालियों ने बहादुर शाह से न केवल यह दुर्ग जीता, अपितु उस का अत्यधिक विस्तार भी किया। तदनंतर उन पुर्तगलियों ने लगभग २०० वर्षों तक इस दुर्ग को अपना सैन्य संचालन केंद्र बनाया। अंत में मराठा पेशवा चिमाजी अप्पा ने पुर्तगलियों को परास्त किया। अंततोगत्वा यह दुर्ग अंग्रेजों के हाथ चला गया। इस दुर्ग का यही नानारूप इतिहास पर्यटकों को, विशेष रूप से इतिहास के शोधकर्ताओं व इतिहास में रुचि रखने वालों को अत्यंत आकर्षित करता है।

एक समय इस दुर्ग के भीतर ७ गिरिजाघर थे। उनमें से ५ अब भी अस्तित्व में हैं। उनमें से एक गिरिजाघर उपयोग में है। दुर्ग के भीतर एक वज़्रेश्वरी मंदिर है जिसे चिमाजी अप्पा ने बनवाया था।

गिरिजाघर

इस क्षेत्र में लगभग २ शताब्दियों तक पुर्तगाली शासन होने के कारण इस सम्पूर्ण क्षेत्र में अनेक सुंदर प्राचीन गिरिजाघर हैं। उनमें से नंदखल गिरिजाघर एवं आवर लेडी ऑफ रेमेडी गिरिजाघर प्राचीनतम एवं भव्य गिरिजाघरों में से हैं। आवर लेडी ऑफ रेमेडी गिरिजाघर को रमेदी माता चर्च भी कहते हैं।

नंदखल का होली स्पिरिट गिरिजाघर एवं दक्षिण वसई का आवर लेडी ऑफ रेमेडी गिरिजाघर, इन दोनों का निर्माण १६वीं सदी के दूसरे भाग में हुआ था। पुनः, अन्य धार्मिक किवदंतियों के समान, ईसाइयों का भी मानना है कि वसई को स्वयं प्रभु ने ५३ मीठे जल के स्त्रोतों से अभिमंत्रित किया है। इस स्थान के विषय में एक अत्यंत रोचक तथ्य जो उभरकर आता है, वह यह है कि सभी धर्मों में यहाँ के जलस्त्रोतों की महत्ता थी।

समुद्रतट

रजोड़ी समुद्रतट का सूर्यास्त
रजोड़ी समुद्रतट का सूर्यास्त

सोपारा की यात्रा का सर्वोत्तम समापन, समुद्र तट पर बैठकर शांत चित्त सूर्यास्त को देखने से उत्तम कुछ हो ही नहीं सकता। सोपारा का लंबा समुद्र किनारा होने के कारण यहाँ आपको अनेक सुंदर समुद्र तट मिलेंगे। उनमें प्रमुख हैं, अरनाला, भुईगाँव, रजोडी, कलंब, नवापुर एवं रानगाँव। इन सभी समुद्र तटों से सूर्यास्त का अप्रतिम दृश्य देखने मिलता है। सोपारा दर्शन के जिस भी अंतिम पड़ाव पर आप पहुंचेंगे, उसी अनुसार इनमें से निकटतम समुद्र तट का आप चुनाव कर सकते हैं। सोपारा के प्रत्येक दर्शनीय स्थल से इनमें से एक तट पर आसानी से पहुंचा जा सकता है।


मोनीश दीपक शाह मोनीश दीपक शाह द्वारा अभिदत्त यह एक अतिथि संस्करण है। जब तक किसी अन्य को श्रेय ना दिया हो, सभी छायाचित्र भी श्री शाह द्वारा ही प्रदत्त हैं।

मोनीश दीपक शाह व्यवसाय से एक अभियंता हैं जिन्होंने मुंबई विश्वविद्यालय से इलेक्ट्रानिक्स एवं दूरसंचार में स्नातक की उपाधि प्राप्त की है। पुरातत्व एवं इतिहास के क्षेत्र में अत्यधिक रुचि होने के कारण अपने अध्ययनक्षेत्र में परिवर्तन करते हुए उन्होंने तिलक महाराष्ट्र विद्यापीठ, पुणे से भारतीय विद्या में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने मुंबई विश्वविद्यालय से पुरातत्व, जैन शास्त्र एवं पुराण शास्त्र में विविध डिप्लोमा भी अर्जित किए हैं। व्यावसायिक रूप से उन्होंने ‘Robotics and Embedded Systems’ के क्षेत्र में कार्य किया है। वर्तमान में वे निर्माण उद्योग में कार्यरत हैं। अपने प्रिय विषय, पुरातत्व, जैन शास्त्र तथा इतिहास के क्षेत्र में कार्य करने का कोई भी अवसर वे चूकते नहीं है। ‘Indica Yatra Conference’ सहित अनेक राष्ट्रीय सम्मेलनों में उन्होंने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए हैं। वर्तमान में वे सोपारा एवं जैन शास्त्र के क्षेत्र में अनेक पुरातात्विक विषयों पर शोध कार्य कर रहे हैं। उनके कार्य के विषय में अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए ‘BawArchaeology on Instagram’ पे संपर्क करें।


अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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