बौद्ध स्थल Archives - Inditales श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Wed, 13 Dec 2023 10:33:37 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.7.5 बुद्ध के अवशेष संरक्षित करता साँची का भव्य स्तूप https://inditales.com/hindi/sanchi-stupa-vishwa-dharohar-madhya-pradesh/ https://inditales.com/hindi/sanchi-stupa-vishwa-dharohar-madhya-pradesh/#respond Wed, 17 Apr 2024 02:30:25 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3508

साँची! मध्यप्रदेश प्रदेश के विदिशा जिले में, भोपाल के निकट स्थित एक छोटी सी नगरी। वर्तमान में जहाँ विदिशा नगर स्थित है, वहाँ से लगभग ३ किलोमीटर दूर बेसनगर नामक एक गाँव है जहाँ प्राचीन विदिशा बसी हुई थी। प्राचीन काल में यह एक लोकप्रिय व्यावसायिक केंद्र था। इसके समीप स्थित साँची नगरी बौद्ध स्तूपों […]

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साँची! मध्यप्रदेश प्रदेश के विदिशा जिले में, भोपाल के निकट स्थित एक छोटी सी नगरी। वर्तमान में जहाँ विदिशा नगर स्थित है, वहाँ से लगभग ३ किलोमीटर दूर बेसनगर नामक एक गाँव है जहाँ प्राचीन विदिशा बसी हुई थी। प्राचीन काल में यह एक लोकप्रिय व्यावसायिक केंद्र था। इसके समीप स्थित साँची नगरी बौद्ध स्तूपों के लिए प्रसिद्ध है। एक पहाड़ी के शीर्ष पर स्थित इन स्तूपों में से विशालतम स्तूप को साँची स्तूप कहते हैं।

साँची स्तूप
साँची स्तूप

साँची स्तूप को महान स्तूप भी कहते हैं।

साँची स्तूप का निर्माण किसने कराया?

राजा अशोक ने सम्पूर्ण भारत में अनेक स्थानों पर स्तूपों का निर्माण कराया था जिनके भीतर बुद्ध के अवशेषों को संरक्षित किया था। उन सभी बौद्ध स्तूपों में साँची स्तूप को सर्वोत्तम संरक्षित स्तूपों में से एक माना जा सकता है। तीसरी शताब्दी में अशोक ने इस स्तूप की नींव रखी थी। अशोक के पश्चात अनेक राजाओं ने इस स्तूप पर संवृद्धिकरण का कार्य अनवरत जारी रखा। नवीन कटघरों एवं विविध शिल्पों का संयोग करते हुए इसके आकार में वृद्धि करते रहे।

साँची का महा स्तूप
साँची का महा स्तूप

सम्राट अशोक का विवाह देवी से हुआ था जो विदिशा के एक व्यापारी की पुत्री थी। अशोक से विवाह के पश्चात भी देवी ने अनवरत विदिशा में ही निवास किया।

ऐसा कहा जाता है कि अशोक ने यहाँ के शैल स्तंभों में से एक स्तंभ को स्थापित किया था जो दुर्भाग्य से अब यहाँ उपस्थित नहीं है। इस स्तूप के अशोक से संबंध की पुष्टिकरण चुनार के बलुआ शिलाओं की यहाँ उपस्थिति एवं मौर्य शैली की चमक से भी होती है। ये तत्व हम बराबर गुफाओं में देख चुके हैं।

यह अत्यंत अचरज का विषय है कि ७वीं सदी के चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने इस स्तूप का उल्लेख कहीं नहीं किया है। क्या वह साँची कभी आ नहीं पाया या उस काल तक इस स्तूप की आध्यात्मिक महत्ता समाप्त हो गयी थी?

साँची में स्थित अन्य लघु स्तूपों के भीतर बुद्ध के शिष्यों, अन्य बौद्ध भिक्षुओं तथा बौद्ध गुरुओं के अवशेष हैं। स्तूप के चारों ओर आराधना स्थल एवं मठ हैं। इससे यह संकेत प्राप्त होता है कि लगभग २००० वर्षों पूर्व यह बौद्ध धर्म के पालन एवं अध्ययन का केंद्र था। विडम्बना यह है कि बुद्ध ने स्वयं कभी इस स्तूप का अथवा इस क्षेत्र का भ्रमण नहीं किया है।

मथुरा के संग्रहालय में प्रदर्शित चित्र यह दर्शाते हैं कि इस क्षेत्र को भी गुप्त राजाओं का संरक्षण प्राप्त था। किन्तु गांधार, मथुरा एवं सारनाथ जैसे क्षेत्रों में प्रफुल्लित स्वशैली के विपरीत साँची अपनी स्वयं की शैली विकसित करने में असफल रही।

१४वीं से १९वीं शताब्दी के मध्य साँची का यह स्तूप हमारे इतिहास में कहीं लुप्त हो गया था। सन् १८१८ में जनरल टेलर ने स्तूप क्रमांक १,२ एवं ३ के अवशेषों का अन्वेषण किया था। आगामी १०० वर्षों तक इस स्थान पर विविध उत्खनन एवं जीर्णोद्धार के कार्य किया गए। अनेक बौद्ध मंदिरों, मठों, मन्नत के स्तूपों, भित्तियों एवं आवास गृहों को उत्खनित किया गया एवं उनका पुनरुद्धार किया गया। उत्खनन स्थल से बड़ी मात्रा में मिट्टी के पात्रों के अवशेष, सिक्के, पात्र इत्यादि प्राप्त हुए।

साँची पहाड़ी के स्मारक

साँची पहाड़ी पर स्थित स्मारकों को दो विभागों में बाँटा जा सकता है। प्रथम विभाग जिसके स्तूप पहाड़ी के शीर्ष पर स्थित हैं, जैसे मुख्य स्तूप। दूसरा विभाग जिसके स्तूप पहाड़ी की पश्चिमी ढलान पर स्थित हैं।

पहाड़ी के शीर्ष पर आयताकार पठार है जो लगभग ४०० मीटर लम्बा एवं २०० मीटर चौड़ा है। यह पठार गोलाकार भित्तियों द्वारा सीमाबंध है। अधिकतर स्मारक इसी भित्ति के भीतर स्थित है। चिकनी घाटी से एक प्राचीन पथ हमें पहाड़ी के शीर्ष तक ले जाता है।

अंग्रेज अधिकारियों ने पहाड़ी के शीर्ष तक पहुँचने के लिए एक शैल पदपथ का निर्माण किया था। उसके स्थान पर अब एक चौड़ा मार्ग है जिसके द्वारा वाहन भी पहाड़ी के शीर्ष तक पहुँच सकते हैं।

पहाड़ी की पश्चिमी ढलान पर स्थित दूसरे भाग के स्मारकों तक पहुँचने के लिए भी सुगम मार्ग है। स्तूप क्रमांक १ से नीचे उतरते हुए हम इन स्मारकों तक पहुँच सकते हैं।

साँची का मुख्य स्तूप अथवा स्तूप क्रमांक १

साँची का स्तूप क्रमांक १ अथवा मुख्य स्तूप एक विशाल अर्ध गोलाकार गुम्बद है। इस स्तूप की विशेषता इसका विशाल आकार है। अपने आकार के कारण यह अन्य स्तूपों में विशेष जान पड़ता है। इसके दक्षिणी भाग पर सोपान हैं जिसके द्वारा आप परिक्रमा पथ तक चढ़ सकते हैं तथा परिक्रमा कर सकते हैं। इसकी चार दिशाओं में चार तोरण युक्त द्वार हैं जो परिक्रमा पथ से साथ मिलकर स्तूप के चारों ओर एक वृत्ताकार सीमा की रचना करते हैं।

साँची स्तूप की तोरणों पर जातक कथाएं
साँची स्तूप की तोरणों पर जातक कथाएं

स्तूप के शीर्ष पर मुकुट सदृश एक छत्रावली है। छत्रावली के ऊपर एक के ऊपर एक तीन छत्र हैं। ये तीन छत्र बौद्ध धर्म के तीन सिद्धांतों को दर्शाते हैं –

बुद्धं शरणं गच्छामि,

धम्मम शरणं गच्छामि,

संघम शरणं गच्छामि।

इस मुख्य स्तूप अथवा स्तूप क्रमांक १ का व्यास ३६.६ मीटर है तथा उसकी ऊँचाई १६.४६ मीटर है। इसमें छत्रावली की ऊँचाई सम्मिलित नहीं है।

तोरण पर उत्कीर्णित शालभंजिका
तोरण पर उत्कीर्णित शालभंजिका

स्तूप के चारों ओर स्थित परिक्रमा पथ का कटघरा शिलाखंडों द्वारा निर्मित है जिन्हें देश के विभिन्न भागों से अनेक श्रद्धालुओं ने दान में प्रदान किये हैं। शिलाखंडों पर अंकित दाताओं के नाम प्राचीन काल के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करती हैं।

मूल मंदिर टेराकोटा नामक पदार्थ से निर्मित किया गया था। टेराकोटा में निर्मित यह मंदिर वर्तमान मंदिर के भीतर अब भी स्थित है। पुरातन स्तूप के नवीनीकरण के समय उस पर ईंटों एवं चूने की एक परत बिछाई गयी है। अब चूने की परत कहीं कहीं से उखड़ रही है जो इस सम्पूर्ण संरचना को दृष्टिगत रूप से रोचक बना रही है।

शिलाओं का आवरण, छत, कटघरा, हर्मिका अथवा ग्रीष्म भवन, छत्रावली के चारों ओर की बाड़, ये सब पुरातन स्तूप पर कालांतर में नवीनीकरण के समय जोड़े गए हैं।

साँची के मुख्य स्तूप का तोरण

साँची के मुख्य स्तूप की चार दिशाओं में चार तोरण हैं जो इस स्तूप के विशेष तत्व हैं। इसका निर्माण प्रथम शताब्दी में सातवाहन वंश के राजाओं के किया था। दक्षिणी तोरण पर लगे शिलालेख द्वारा इसकी पुष्टि की जा सकती है।

साँची स्तूप की तोरण
साँची स्तूप की तोरण

स्तूप के प्रत्येक तोरण में तीन क्षैतिज फलक हैं जो दो स्तंभों पर जुड़े हुए हैं। इन तीनों फलकों को आपस में भी छोटे लम्बवत शिलाखंडों द्वारा जोड़ा गया है। सभी तोरणों एवं उनके स्तंभों पर चारों दिशाओं में सघन उत्कीर्णन किया गया है। तोरण का ऊपरी भाग ऐसा दर्शाया गया है मानो उसे हाथी, सिंह अथवा गन्धर्व अपने ऊपर ढो रहे हों। पश्चिमी तोरण पर निर्मित गन्धर्व की प्रतिमाओं के मुख पर अभिव्यक्त हाव-भाव दर्शनीय हैं। भार उठाते हुए उनके मुखड़े पर अभिव्यक्त भावनाओं को शिल्पकार ने पूर्ण सत्यता से प्रदर्शित किया है। तीनों क्षैतिज फलकों के दोनों छोरों पर कुण्डलियाँ अंकित हैं।

तोरणों के कथा कहते पट्ट
तोरणों के कथा कहते पट्ट

तीनों फलकों को आपस में जोड़ते तीन तीन लम्बवत शैलखंड रिक्त स्थान को ८ भागों में विभाजित करते हैं। इन खण्डों में अश्व तथा गज पर आरूढ़ सवारों की प्रतिमाएं हैं। जहाँ आड़ी पट्टिकाएं स्तंभों से जुड़ती हैं, उसके बाह्य भागों के ऊपर शालभंजिकाओं की प्रतिमाएं हैं। शालभंजिका स्त्री के उस रूप का चित्रण है जो साल वृक्ष के नीचे उसकी एक शाखा पकड़ कर भिन्न भिन्न मुद्राओं में खड़ी है। तोरण के शीर्ष पर धर्म चक्र है जिसके दोनों ओर चामरधारी एवं बुद्ध, धम्म एवं संघ, ये त्रिरत्न हैं।

माया का गजस्वपन - बुद्ध के जन्म का संकेत
माया का गजस्वपन – बुद्ध के जन्म का संकेत

तोरण की रचना करने वाले कारीगर हस्तदन्त कारीगर थे। उनके हाथों की कला इन उत्कीर्णनों की सूक्ष्मता एवं जटिलता में स्पष्ट विदित होती है।

तोरणों के शिल्प एवं उत्कीर्णन

सम्पूर्ण तोरण पर विविध प्रकार की मूर्तियाँ एवं उत्कीर्णन हैं। उनमें हैं-

  • बौद्ध चिन्ह जैसे, कमल, चक्र एवं स्तूप
  • बुद्ध के जीवन के दृश्य जैसे, माया के स्वप्न के द्वारा बुद्ध का जन्म, बोधि वृक्ष द्वारा प्रदर्शित परम ज्ञान की प्राप्ति का दृश्य, उनका प्रथम धर्मोपदेश जिसे चक्र द्वारा प्रदर्शित किया गया है, स्तूप द्वारा प्रदर्शित उनकी मृत्यु। जी हाँ, बुद्ध को उनके मानवी रूप द्वारा नहीं अपितु उनके चिन्हों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।
  • अन्य दृश्यों में कपिलवस्तु से उनका प्रस्थान, सुजाता द्वारा अर्पित नैवेद्य, मार के साथ उनका युद्ध आदि सम्मिलित हैं।
  • जातक कथाएं जो हमें बोधिसत्त्व की कथाएं कहती हैं। जैसे –
    • दक्षिणी, पश्चिमी व उत्तरी तोरण पर उत्कीर्णित छद्दन्त जातक
    • पश्चिमी तोरण के स्तम्भ पर अंकित साम जातक
    • पश्चिमी द्वार के स्तम्भ पर उत्कीर्णित महाकपि जातक
    • उत्तरी द्वार के दोनों ओर अंकित वेस्सन्तर जातक
    • उत्तरी द्वार पर उत्कीर्णित अलम्बस जातक
  • बौद्ध धर्म के इतिहास से सम्बंधित घटनाएँ
  • एक बौद्ध भिक्षुक के जीवन के दृश्य
  • अशोक चक्र एवं सिंह चतुर्भुज
  • सज्जा आकृतियाँ एवं रूपांकन

स्तूप के दक्षिणी भाग का तोरण स्तूप का मुख्य तोरण है। सर्वप्रथम इसी तोरण की स्थापना की गयी थी। यहीं से आगे जाकर सोपान हैं जो आपको स्तूप के शीर्ष तक ले जाती हैं। इस तोरण पर अशोक चिन्ह है जिसमें चार सिंह हैं। इस तोरण के निकट अशोक स्तंभ है। इसका केवल निचला भाग ही यथास्थान है। यह तोरण सर्वाधिक भंजित भी है। उत्तरी दिशा में स्थित तोरण का संरक्षण सर्वोत्तम रूप से किया गया है।

साँची स्तूप में बुद्ध की प्रतिमाएं

आप किसी भी तोरण के द्वारा स्तूप के भीतर जा सकते हैं। भीतर प्रवेश करते ही आपको बुद्ध की एक बड़ी प्रतिमा दृष्टिगोचर होगी। एक छत्र के नीचे विराजमान बुद्ध के मुख पर परम शान्ति का भाव है। ये गुप्त वंश के राजकाल में निर्मित प्रतिमाएं हैं। मुख्य स्तूप में इन्हें सन् ४५० में जोड़ा गया था।

बुद्ध की पाषण प्रतिमा - साँची
बुद्ध की पाषण प्रतिमा – साँची

प्रत्येक छवि में स्तूप की भित्ति का टेका लगाकर बुद्ध ध्यान मुद्रा में बैठे हैं। प्रत्येक बुद्ध प्रतिमा के पृष्ठभाग पर विस्तृत रूप से उत्कीर्णित प्रभामंडल है।

साँची के बौद्ध धरोहर में किये गए संवर्धन

साँची के मुख्य स्तूप के चारों ओर भिन्न भिन्न कालावधि में अनेक बौद्ध मंदिर बनाए गए अथवा उनमें संवर्धन किये गए। यह इस ओर संकेत करता है कि लगभग ७-८ वीं शताब्दी तक यह धरोहर एक जीवंत बौद्ध स्थल था। इसके पश्चात यह सघन वन में लुप्त हो गया। लोगों ने इसे अनेक प्रकार से भंजित किया। वे जो भी उपयोगी भाग देखते, उसे निकालकर ले जाते थे। अशोक स्तंभ को भंजित कर गन्ने का रस निकालने में उसका प्रयोग करने लगे।

धरोहरी स्मारक का परिवेश

स्तूप की भूमि पर स्थित शिलाखंडों एवं उसके गोलाकार कटघरे की भित्ति पर ब्राह्मी अथवा पाली लिपि में अनेक शिलालेख हैं। उन पर उन व्यक्तियों के नाम उकेरे हैं जिन्होंने उनका दान किया था। छोटे से दान द्वारा शिलाखंडों पर अपना नाम अमर कर लेने की यह प्रथा कितनी प्राचीन है!

साँची में अन्य स्तूप

मुख्य स्तूप के चारों ओर कई लघु स्तूप सदृश संरचनाएं हैं। ये मन्नत के स्तूप हैं जिनकी स्थापना उन व्यक्तियों ने की थी जिनकी मनोकामनाएं स्तूप के दर्शन के पश्चात पूर्णत्व को प्राप्त हुई थीं।

स्तूप क्रमांक ३

मुख्य स्तूप के पश्चात स्तूप क्रमांक ३ ही ऐसा स्तूप है जिसका उत्तम रूप से संवर्धन किया गया है। यह मुख्य स्तूप का लघु प्रतिरूप है। इसकी उंचाई एवं व्यास मुख्य स्तूप से न्यून हैं किन्तु रचना मुख्य स्तूप सदृश ही है। स्तूप के चारों ओर स्थित कटघरा अपेक्षाकृत छोटा है। शिलालेखों के अनुसार इन दोनों कटघरों का प्रायोजक एक ही व्यक्ति है।

स्तूप क्रमांक ३ में एक ही तोरण अथवा द्वार है। ऐसी मान्यता है कि इस स्तूप के भीतर सारिपुत्र एवं मौद्गल्यायन के अस्थि अवशेष समाहित हैं। ये दोनों गौतम बुद्ध के शिष्य थे।

इस स्तूप का दिनांकन २री शताब्दी अनुमानित किया गया है।

मठ

मुख्य स्तूप अथवा स्तूप क्रमांक १ के पश्चिमी ओर नीचे जाते हुए कुछ सोपान है जो आपको एक समतल क्षेत्र की ओर ले जाते हैं। वहाँ एक विशाल जलकुंड एवं कुछ मठों के भग्नावशेष हैं। मठ ५१ चौकोर आकार का है। इसके चारों ओर अनेक कक्ष हैं तथा मध्य में एक प्रांगण है।

४६ एवं ४७ क्रमांक के मठों का अन्वेषण हाल ही में किये गए उत्खनन में किया गया था।

इन मठों के भग्नावशेषों के आसपास मंदिरों समेत कई अनेक संरचनाओं के अवशेष देखे जा सकते हैं।

स्तूप क्रमांक २

यहाँ से कुछ सोपान उतारकर आप स्तूप क्रमांक २ पहुँचते हैं। यह एक सीमा तक स्तूप क्रमांक ३ के ही समान है। यहाँ भी ४ प्रवेश द्वार हैं किन्तु उन पर अलंकारिक तोरण नहीं है। इसका गोलाकार कठघरा उत्तम रूप से संरक्षित है।

मार्ग में आपको एक बड़ा भिक्षा पात्र भी दिखाई देगा।

मुख्य स्तूप के दक्षिणी एवं पूर्वी दिशा में कई लघु स्तूप हैं। उन स्तूपों में बुद्ध के शिष्यों के अवशेष हैं। उनमें से कुछ स्तूपों के आधार चौकोर आकार के भी हैं। उनकी स्थापत्य शैली यह संकेत करती है कि वे सब गुप्त काल से सम्बंधित हैं।

स्तूप क्रमांक ५ में बुद्ध की एक छवि है जिसमें बुद्ध ध्यान मुद्रा में बैठे हैं।

परिसर में स्थित पूर्वकाल के कुछ मंदिर

इस धरोहर संकुल के भीतर कुछ ऐसे भी मंदिर हैं जो प्राचीनतम ज्ञात मंदिर संरचनाएँ हैं। ये संरचनाएं गुप्त एवं मौर्य काल की हैं। इन्हें उत्तर भारतीय मंदिर स्थापत्य शैली की पूर्वतर कोपलें कहा जा सकता है।

मंदिर क्रमांक १८  एक गजपृष्ठाकार मंदिर है। ७वीं सदी में निर्मित यह मंदिर एक ऊँचे जगती एवं १२ स्तंभों पर स्थापित रहा होगा। अजंता एल्लोरा गुफाओं के भीतर आपने जो चैत्य गृह देखे थे, उसकी क्षणिक झांकी आप यहाँ भी देख सकते हैं।

मंदिर क्रमांक १७ में गर्भगृह का आकार चौकोर है। उसकी छत सपाट है तथा समक्ष एक द्वारमंडप है। द्वारमंडप के स्तंभों पर सिंह चतुर्भुज अथवा Lion Capital हैं। द्वार के चौखटों पर पुष्पाकृतियाँ उत्कीर्णित हैं। मैंने इस प्रकार के उत्कीर्णन इसी कालावधि में निर्मित महाराष्ट्र के नागपुर में स्थित रामटेक मंदिर में भी देखा था। इसमें गुप्त काल की स्थापत्य शैली का आभास होता है।

मंदिर क्रमांक ६ मंदिर क्रमांक १७ के ही समान है।

३१ क्रमांक का मंदिर आयताकार है। स्तंभों से सज्ज इस मंदिर की छत सपाट है। इसके भीतर जो बुद्ध की प्रतिमा है, वह इस मंदिर की प्रतीत नहीं होती है।

मंदिर क्रमांक ४० में ३री सदी से ८वीं सदी के मध्यकाल में पल्लवित तीन विविध राजवंशों की स्थापत्य शैली दृष्टिगोचर होती है।

यात्रा सुझाव

यह यूनेस्को द्वारा घोषित एक विश्व धरोहर स्थल है। अतः स्वाभिक रूप से इसका उत्तम रखरखाव किया गया है। चारों ओर उत्तम रूप से अनुरक्षित घास के अप्रतिम मैदान हैं। सभी स्तूपों एवं मंदिरों पर सुनियोजित रूप से संख्यांकन किया गया है।

स्तूपों एवं मंदिरों की जानकारी प्रदान करने के लिए परिदर्शकों अथवा गाइड की सुविधाएँ उपलब्ध हैं। हमारा सौभाग्य था कि हमें ऐसा परिदर्शक प्राप्त हुआ जो पुरातत्व विज्ञान का छात्र था। उसने हमें इस स्थल की अनेक सूक्ष्मताओं के विषय में विस्तार से बताया। साँची के इस विश्व धरोहर स्थल के विषय में विस्तृत रूप से जानने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संचालित विश्व धरोहर श्रंखला सर्वोत्तम साधन है।

मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग का गेटवे रिट्रीट नामक विश्राम गृह इस धरोहर स्थल के निकट स्थित है। आप इस होटल से धरोहर स्थल तक पदभ्रमण द्वारा आसानी से पहुँच सकते हैं। प्रातःकालीन पदभ्रमण के लिए भी आप होटल से स्तूपों तक जा सकते हैं।

सभी स्तूप खुले आकाश में स्थित है। भारत के मैदानी क्षेत्रों की कड़कती धूप से आप भलीभांति अवगत होंगे। अतः प्रातःकाल उनका अवलोकन करना सर्वोत्तम है। उसी प्रकार सूर्यास्त का समय भी स्तूपों के अवलोकन के लिए उत्तम है। इससे आप दिवस भर की चिलचिलाती धूप से बच सकते हैं।

आप चाहें तो इन स्तूपों को सूर्य की किरणों के नीचे भी देख सकते हैं। सूर्य की किरणों में यह स्तूप चन्दन के काष्ठ से निर्मित प्रतीत होता है।

स्तूपों के तथा उनके साथ अपने छायाचित्र लेने के लिए भी सूर्योदय एवं सूर्यास्त काल सर्वोत्तम होता है। इस कालावधि में चारों ओर छायी निस्तब्धता चित्तभेदक प्रतीत होती है। प्रातःकाल के समय सौभाग्य से आपको बड़ी संख्या में मोर के दर्शन भी प्राप्त हो सकते हैं।

पहाड़ी पर खड़े होकर आपको नीचे से जाती रेलगाड़ी की ध्वनि सुनाई देगी एवं वह दिखाई भी देगी। यदि आप रेलगाड़ी द्वारा दिल्ली से भोपाल की ओर जा रहे हैं तो आपको अपनी बायीं ओर ये स्तूप दृष्टिगोचर होंगे। विदिशा रेल स्थानक पार करते ही आप अपनी बायीं ओर की खिड़की से बाहर की ओर देखते रहें।

साँची स्तूप का भ्रमण व अवलोकन करने के लिए यदि आप वायु मार्ग द्वारा पहुँचना चाहते हैं अथवा रेल यात्रा करना चाहते हैं तो निकटतम विमानतल तथा रेल स्थानक, दोनों भोपाल में है। भोपाल देश के अन्य स्थानों से रेल मार्ग तथा सड़क मार्ग द्वारा सुगम रूप से सम्बद्ध है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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बौद्ध कलाशैली में कथाकथन के रूप – शिलालेखों में बौद्ध कथाएं https://inditales.com/hindi/bouddh-kala-shaili-katha/ https://inditales.com/hindi/bouddh-kala-shaili-katha/#respond Wed, 08 Mar 2023 02:30:28 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2992

भारत में शैल प्रतिमाओं एवं शैल कलाकृतियों का आरम्भ लगभग २२०० वर्षों पूर्व, बौद्ध कला कथाकथन से हुआ था। इन कथाओं को हम जातक कथाओं के नाम से जानते हैं। इससे पूर्व भी यह कथाकथन की कलाशैली अस्तित्व में रही होगी किन्तु काष्ठ जैसे नश्वर या नाशवान माध्यमों पर की गयी होगी जो समय की […]

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भारत में शैल प्रतिमाओं एवं शैल कलाकृतियों का आरम्भ लगभग २२०० वर्षों पूर्व, बौद्ध कला कथाकथन से हुआ था। इन कथाओं को हम जातक कथाओं के नाम से जानते हैं। इससे पूर्व भी यह कथाकथन की कलाशैली अस्तित्व में रही होगी किन्तु काष्ठ जैसे नश्वर या नाशवान माध्यमों पर की गयी होगी जो समय की मार झेल नहीं पायी तथा अब अस्तित्वहीन हो गयी।

साँची स्तूप में बुद्ध
साँची स्तूप में बुद्ध, चित्र – Shutterstock

प्रारंभिक शैल प्रतिमाएं एवं शैल कलाकृतियाँ मध्यप्रदेश में जबलपुर के निकट भरहुत क्षेत्र एवं कर्णाटक में गुलबर्गा के समीप सन्नति-कनगनहल्ली क्षेत्र में पाए गए थे। इसके पश्चात ही भारत उपमहाद्वीप में बिखरे अनेक क्षेत्रों में इनके चिन्ह प्राप्त हुए।

बौद्ध कलाशैली में कथाकथन

इस संस्करण में मैं शिलाओं पर बौद्ध कलाशैली में कथाकथन करने के लिए, उस काल के कलाकारों द्वारा अपनाए गए, ७ विभिन्न माध्यमों के विषय में चर्चा करुँगी। ये कथाएं मूलतः जातक कथाओं से आई हैं जिनमें बुद्ध के पूर्वजन्म की कथाएं कही गयी हैं। वैसे तो जातक कथाओं में लगभग ५५० से भी अधिक कथाएं हैं किन्तु अधिकतर कलाकार चित्रण के लिए सदा कुछ ही कथाओं का चयन करते आये हैं। वे उन्ही कथाओं को अपनी कलाकृतियों में प्रदर्शित करते रहे हैं।

बुद्ध के जीवन के दृश्य एवं उनकी जीवनी से सम्बंधित कथाएँ दूसरा सर्वाधिक सामान्य विषय होता था जिन्हें हम आज भी शैल कलाकृतियों में देख सकते हैं। इनके पश्चात उन दृश्यों का क्रमांक आता है जिसमें बुद्ध के पश्चात् जीवन का चित्रण किया गया है, जैसे महान सम्राटों द्वारा बौद्ध स्थलों के दर्शन एवं इन स्थलों को उभारने के लिए अनुदान प्रदान करने के दृष्य।

सभी कलाकृतियाँ स्तूप के चारों ओर होती हैं। स्तूप एक अर्धगोलाकार टीला होता है जिसके भीतर बुद्ध के अवशेषों की पेटी होती है। इसके चारों ओर प्रदक्षिणा पथ होता है। उसके बाहरी ओर कटघरा होता है जिस पर बहुधा आड़ी-सीधी पट्टियां होती हैं। कहीं कहीं स्तूप पर उत्कीर्णित शिलाखंड होते हैं तो कहीं सादे। स्तूपों की स्थापत्य शैली के विषय में अधिक चर्चा ना करते हुए मैं आरंभिक कालीन बौद्ध कथाकथन शैली के विषय में चर्चा करना चाहती हूँ।

जातक कथाओं के विषय में यहाँ पढ़ें। वेस्सन्तर जातक कथा, दीपंकर जातक कथा, महाकपि जातक कथा, नंदा जातक कथा, सिम्हला जातक कथा, आदि जातक कथा पढ़ें।

एक-दृश्य कथाकथन – विषयवस्तु का प्रदर्शन

यह कथाकथन का सर्वाधिक सरल माध्यम है। कलाकार सम्पूर्ण कथा के सार को अथवा कथा की एक घटना के सार को विषयवस्तु के रूप में चुनते हैं तथा उसे शिलाखंड पर उत्कीर्णित करते हैं। सामान्यतः वे कभी कथा के आरम्भ अथवा अंत का चित्रण नहीं करते थे, अपितु वे कथा के सर्वाधिक महत्वपूर्ण भाग का चित्रण करते थे।

एक-दृश्य कथाकथन - बौद्ध कलाशैली
एक-दृश्य कथाकथन – बौद्ध कलाशैली

कला इतिहासकारों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि कलाकार यह मान कर चलते थे कि दर्शक कथा के विषयवस्तु से परिचित हैं। इसी कारण सम्पूर्ण कथा का चित्रण ना करते हुए वे केवल महत्वपूर्ण दृश्यों द्वारा ही उन्हें सम्पूर्ण कथा का स्मरण कराते थे।

जैसे, भरहुत में कलाकारों ने वेस्सन्तर जातक कथा को केवल एक दृश्य द्वारा दर्शाने का प्रयास किया है। वेस्सन्तर ने अपनी समृद्धि के प्रतीक, मनोकामना पूर्ण करने वाले हाथी को कलिंग के ब्राह्मणों को दान के रूप में दे दिया था। दान के पुण्य को उजागर करने वाला यह दृश्य वास्तव में वेस्सन्तर जातक कथा का सार है जिसमें वेस्सन्तर को कलिंग के ब्राह्मणों को हाथी का दान करते दर्शाया गया है।

एक-दृश्य कथाकथन – सारांश

कथा के एक-दृश्य प्रदर्शन के इस रूप में कथा का सार चित्रित किया जाता है। मेरी व्याख्या के अनुसार, कथा से जो शिक्षा अथवा सीख प्राप्त होती है, उसका चित्रण किया गया है। इस चित्रण की पृष्ठभूमि में पुनः यह मान लिया गया था कि दर्शकों को कथा अथवा उसकी विषयवस्तु के विषय में पूर्व जानकारी है।

एक दृश्य कथानक सारांश में
एक दृश्य कथानक सारांश में

कथानक प्रदर्शन के इस रूप का प्रयोग बुद्ध की परम ज्ञान प्राप्ति के उपरांत की स्थिति को प्रदर्शित करने में किया जाता रहा है। अथवा महापरिनिर्वाण से पूर्व की स्थिति को दर्शाया जाता रहा है। इस कथा में वे परम व्यक्ति हैं। इस शैली का एक उत्तम उदाहरण आप भरहुत स्तम्भ पर देख सकते हैं। इस कथा में बुद्ध इंद्र एवं ब्रह्मा सहित स्वर्ण व रत्नों की सीढ़ियों से त्रयस्तृन्सा स्वर्ग से पृथ्वी पर संकिसा में अवतरित हुए थे। इस दृश्य को सीढ़ियों पर पदचिन्हों के रूप में उस स्तम्भ पर दर्शाया गया है।

अनुक्रमिक अथवा रैखिक कथाकथन

कथा की अनुक्रमिक घटनाओं अर्थात् एक के पश्चात एक आने वाली घटनाओं को अनुक्रमिक अथवा रैखिक रूप में दर्शाया जाता है। मुख्य पात्र या नायक प्रत्येक दृश्य का मुख्य भाग होता है। सभी दृश्य एक दूसरे से प्रत्यक्ष रूप से सीमांकित होते हैं। अर्थात् प्रत्येक दृश्य की पृथक सीमा इंगित होती है।

बौद्ध कलाशैली का अनुक्रमिक कथानक
बौद्ध कलाशैली का अनुक्रमिक कथानक

इसका एक उदहारण है, नन्द जातक जिसका चित्रण नागार्जुनकोंडा में किया गया है। इस उत्कीर्णन में प्रत्येक दो दृश्यों के मध्य दो स्तंभ हैं जिनके मध्य प्रेमी युगल को दर्शाया गया है जो दोनों दृश्यों की सीमा तय करता है। इस प्रकार दृश्यों को सीमाबद्ध किया गया है।

इतिहासकार यह शोध करने का प्रयास कर रहे हैं कि कथा में आये इन दृश्यों के मध्य युगल जोड़े के दृश्य का क्या औचित्य रहा होगा। यह भी उतना ही सत्य है कि इस प्रकार की सीमाबद्ध कथाकथन शैली समझने में अत्यंत आसान होती है तथा हमारी आधुनिक संवेदनशीलता के लिए अत्यंत सहज शैली होती है।

अविरत कथाकथन

कथा के अनेक दृश्यों को एक ही चौखट के भीतर दर्शाया जाता है। इसमें भी मुख्य पात्र या नायक सभी दृश्यों में अनिवार्य रूप से होता है।

साँची स्तूप पर अविरत कथाकथन
साँची स्तूप पर अविरत कथाकथन

सांची के स्तूप के तोरण खंड पर उत्कीर्णित कथा इसी शैली में है जिसमें बुद्ध महल त्याग कर प्रयाण कर रहे हैं। छत्र धारक अश्व, जिस पर सिद्धार्थ विराजमान है, उनका महल छोड़कर प्रयाण करना दर्शा रहा है। बिना सवार के अश्व का वापिस लौटने का दृश्य बुद्ध का वापिस ना आना दर्शाता है। यहाँ दृश्यों के मध्य सीमांकन नहीं हैं। दृश्यों की श्रंखला सीमाविहीन व अखंड है। अश्व की आकृति की पुनरावृत्ति द्वारा कथा की गति को दर्शाया गया है।

संक्षिप्त कथाकथन

यहाँ भी कथा के अनेक दृश्यों को एक ही चौखट के भीतर दर्शाया जाता है। किन्तु इसमें कथा के दृश्यों को क्रमवार रूप से नहीं दर्शाया जाता। इसमें भी मुख्य पात्र या नायक सभी दृश्यों में अनिवार्य रूप से होता है। एक चौकोर फलक के सीमित क्षेत्र में अनेक कथाओं को सम्मिलित किया जाता है। ये फलक किसी स्तम्भ का अथवा किसी बड़े पटल का भाग होते हैं।

संक्षिप्त कथाकथन बौद्ध कलाशैली में
संक्षिप्त कथाकथन बौद्ध कलाशैली में

इसका उदहारण है, सांची स्तूप के एक स्तम्भ पर बने एक फलक पर महाकपि जातक की कथा उत्कीर्णित है। इस चित्रण में कथानक स्पष्ट रूप से उत्कीर्णित नहीं है। यदि आप  कथानक को भलीभांति जानते हैं तो आप उस दृश्य को समझ सकते हैं।

कला इतिहासकारों ने इन दृश्यों पर क्रमांक अंकित करने का प्रयास अवश्य किया है। किन्तु फिर भी यह स्पष्ट नहीं है कि कलाकारों ने कथाकथन की यह शैली  क्यों चुनी। उन्होंने यह अवश्य माना होगा कि कथा सबको ज्ञात होगी। फिर भी वे कथा के क्रमवार घटनाओं के प्रति उदासीन क्यों थे? या जानबूझ कर उसकी उपेक्षा क्यों की?

सम्मिश्रित कथाकथन

यह शैली संक्षिप्त कथाकथन शैली के समान है। किन्तु इस शैली में मुख्य पात्र का एक ही शिल्प होता है जिसके चारों ओर कथानक के विभिन्न दृश्य दर्शाए जाते हैं। मुख्य पात्र का एक ही चित्रण होने के पश्चात भी वह सभी दृश्यों में समाहित होता है।

सम्मिश्रित कथाकथन
सम्मिश्रित कथाकथन

इसका एक उदहारण है, गांधार पटल पर दीपांकर जातक। इसमें बुद्ध की एक विशाल आकृति उत्कीर्णित है जिसके चारों ओर सुमेधा की कथा चित्रित है।

दृश्यों का संजाल – कथा का प्रसार

इस शैली में कथा विभिन्न दृश्यों के संजाल के रूप में प्रदर्शित की जाती है। सम्पूर्ण उपलब्ध स्थान पर कथा के विभिन्न दृश्य बिखरे हुए होते हैं जिनका आपस में कोई विशेष क्रम नहीं होता है। दर्शक को ही दृश्यों के क्रम को खोजते हुए कथानक को समझना पड़ता है।

भित्ति पर दृश्यों का जाल
भित्ति पर दृश्यों का जाल

जैसा कि प्रा. श्रीमती दहेजिया ने अपने व्याख्यान में समझाया था, कलाकार उपलब्ध स्थान का सबसे अच्छा उपयोग करते हुए स्थानिक कथाकथन कर रहा था, ना कि क्रमवार कथाकथन। इसका अर्थ है, एक स्थान पर जितनी भी घटनाएँ हुई, भले ही वे क्रमवार ना हों, उन्हें एक स्थान पर उत्कीर्णित किया गया। किसी दूसरे स्थान पर हुई सभी घटनाओं को दूसरे क्षेत्र में एकत्र प्रदर्शित किया गया। अतः आपको कथा के क्रमवार दृश्यों को ढूँढते हुए सम्पूर्ण क्षेत्र में घूमना पड़ता है।

अजंता के अधिकाँश चित्र इस जटिल शैली में दृश्यों का संजाल बनाते हुए कथा का प्रसार करते हैं। जैसे गुफा क्रमांक १७ के भीतर सिम्हला जातक कथा इसी शैली में चित्रित है। कथा के २९ दृश्यों को ४५ फीट चौड़ी एवं १३ फीट ऊँची भित्त पर जटिल रूप से चित्रित किया गया है। यह चित्र धरती से छत तक चित्रित किया गया है। हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि घुप्प अन्धकार भरी गुफा के भीतर इतनी विशाल व इतनी जटिल कलाकारी कैसे की गयी होगी।

मौखिक कथाकथन की परंपरा को शिलाखंडों पर दृश्य कथाकथन के रूप में उत्कीर्णित किया गया। तत्पश्चात लिखित कथाकथन की परम्परा का उद्भव हुआ। ये कथाकथन की यात्रा के महत्वपूर्ण मील के पत्थर हैं।

बौद्ध कला पर बनाया गया यह संस्करण ‘Visual Narratives in early Buddhist Art’ इस विषय पर आयोजित एक संगोष्ठी पर आधारित है जिसका आयोजन प्रा. श्रीमती विद्या दहेजिया ने किया था। उनके द्वारा किये गए शोधकार्य पर यह संस्करण लिखने से पूर्व मैंने उनसे रीतसर अनुमति ली थी। ७ चित्रों में से ६ चित्र मैंने गोवा विश्वविद्यालय द्वारा दी गयी सामग्री में से लिए हैं। इन चित्रों को अपने संस्करण में सम्मिलित करने का एकमात्र उद्देश्य यह है कि मैं विभिन्न बौद्ध कथाकथन कलाशैलियों को सम्बंधित चित्रों द्वारा स्पष्ट रूप से दर्शाना चाहती थी ताकि पाठक इन शैलियों को स्पष्ट रूप से समझ सकें।

यदि मेरे ऐसा करने से किसी भी प्रकार का कॉपीराइट अथवा प्रतिलिप्याधिकार का दुरुपयोग हुआ हो तो कृपया मुझे इसकी जानकारी दें। मैं इन चित्रों को तुरंत अपने संस्करण से निकाल दूंगी। विभिन्न बौद्ध स्थलों पर किये गए बौद्ध कथाकथन के चित्र आप इनके वेबस्थलों पर देख सकते हैं, IGNCA, कला एवं पुरातत्व संग्रहालय, MetropolitanMuseum, British Museum। मैंने यहाँ जिन कथाकथन शैलियों का उल्लेख किया है, उनके केवल सांकेतिक उदहारण दिए हैं। उन बौद्ध कलाशैली के असंख्य कथानक आपको यहाँ देखने मिलेंगे।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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हिमाचल प्रदेश का धनकर मठ और स्पीति घाटी का गढ़ एवं गाँव https://inditales.com/hindi/dhankar-math-spiti-ghati-himachal/ https://inditales.com/hindi/dhankar-math-spiti-ghati-himachal/#comments Wed, 11 May 2022 02:30:06 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2675

धनकर मठ पिन नदी के किनारे, एक खड़ी चट्टान की सतह पर निर्मित एक गोम्पा है। इसे देख ऐसा प्रतीत होता है मानो यह गुरुत्वाकर्षण को चुनौती दे रहा है। मुझे अब भी स्मरण है, जब इस मठ पर मेरी प्रथम दृष्टि पड़ी थी, मारे अचरज के मेरा मुंह खुला का खुला ही रह गया […]

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धनकर मठ पिन नदी के किनारे, एक खड़ी चट्टान की सतह पर निर्मित एक गोम्पा है। इसे देख ऐसा प्रतीत होता है मानो यह गुरुत्वाकर्षण को चुनौती दे रहा है। मुझे अब भी स्मरण है, जब इस मठ पर मेरी प्रथम दृष्टि पड़ी थी, मारे अचरज के मेरा मुंह खुला का खुला ही रह गया था। कितने क्षण मैं अवाक् उसे निहारती रही। मुझे ऐसा आभास हो रहा था जैसे यह मठ अब उस चट्टान पर से गिर पड़ेगा। कुछ क्षणों पश्चात मेरी विवेक बुद्धि जागृत हुई तथा उसने मुझे यह स्मरण कराया कि यह मठ इसी स्थिति में सैकड़ों वर्षों से अबाधित खड़ा है।

धनकर मठ स्पिति घाटी हिमाचल
धनकर मठ स्पिति घाटी हिमाचल

गोलाकार घूमती संकरी सड़क अत्यंत सुरम्य प्रतीत हो रही थी। प्रत्येक घुमाव पर मठ अधिक समीप प्रतीत हो रहा था तथा पिन घाटी के परिदृश्य अधिक चौड़े होते जा रहे थे। नदी की कलकल करती जल वाहिकाएं अपने अपने राग आलाप रही थीं। जैसे जैसे हम ऊपर चढ़ रहे थे, हमारे चारों ओर के परिदृश्य अधिक विस्तृत एवं मनमोहक होते जा रहे थे।

धनकर मठ – हिमाचल प्रदेश

धनकर मठ की और जाते पथ
धनकर मठ की और जाते पथ

धनकर के अन्य नाम हैं, धनखर, द्रंगखर तथा धंगकर जिसका हिमाचली बोली में शाब्दिक अर्थ है, पहाड़ी चट्टान पर आरोहित गढ़। धनकर मठ स्पीति घाटी के ताबो एवं काजा कस्बों के लगभग मध्य में स्थित है। यहाँ पहुँचने के लिए लगभग ८ किलोमीटर का विमार्ग लेना पड़ता है किन्तु सड़क सुगम्य व अच्छी स्थिति में है। यदि आपका निजी वाहन अथवा टैक्सी हो तो आप आसानी से यहाँ पहुँच सकते हैं। मठ लगभग १३००० फीट की ऊँचाई पर स्थित है। यदि आपने स्वयं को समुद्र सतह से ऊँचाई वाले वातावरण से भली भांति अभ्यस्त ना किया हो तो आपको इस ऊँचाई पर श्वास लेने में किंचित असुविधा हो सकती है। साथ ही यह भी कहना चाहूंगी, मार्ग इतना मनोरम है कि वह अनायास ही आपको वाहन से उतर कर पदयात्रा करने के लिए बाध्य कर देता है।

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जिस दिन हम वहां थे, वर्षा हो रही थी। किन्तु जितने भी क्षणों के लिए वर्षा थम रही थी, हम तुरंत वाहन से उतर कर पैदल चलने लगते थे। वह अत्यंत ही मनोरम पदयात्रा थी मानो हम स्वप्न प्रदेश में पहुँच गए हों। एक ओर ऊँचे-नीचे पहाड़ थे तो दूसरी ओर शांत बहती नदी थी। सम्पूर्ण परिदृश्य हमारे लिए ही था। नवीन धनकर गोम्पा पहुँचने तक हमने सड़क पर क्वचित ही किसी मानवीय उपस्थिति का अनुभव किया। नवीन गोम्पा पहुंचकर ही हमने बौद्ध भिक्षुओं एवं गाँववासियों को देखा जो अपने दैनन्दिनी क्रियाकलापों में व्यस्त थे।

धनकर दुर्ग
धनकर दुर्ग

यह अत्यंत प्राचीन स्थल है किन्तु १७वीं सदी में इसकी महत्ता अपनी चरम सीमा पर थी जब यह स्थान यहाँ के शासक, नोनो राजाओं का राज दरबार था। धनकर गढ़ एवं मठ से ऊपर जाकर एक सरोवर भी है किन्तु वहां तक पहुँचने के लिए तीव्र चढ़ाई वाले मार्ग पर पैदल चढ़ना पड़ता है। इसलिए हमने सरोवर तक ना जाने का निश्चय किया तथा मठ से ही चारों ओर के मनमोहक परिदृश्यों में स्वयं को सराबोर करने में व्यस्त हो गए।

मठ की भंगुर संरचना

दलाई लामा के कक्ष का द्वार
दलाई लामा के कक्ष का द्वार

वर्षा के कारण मठ की ओर जाता कच्चा मार्ग अत्यंत फिसलन भरा हो गया था। एक बौद्ध भिक्षु ने हाथ बढ़ा कर हमें सावधानी से मठ के प्रवेश द्वार तक पहुँचाया। द्वार पर लिखा था कि एक समय में २० से अधिक दर्शनार्थियों को प्रवेश करने की अनुमति नहीं है क्योंकि मठ की संरचना अत्यंत भंगुर है तथा अधिक लोगों का भार वहन नहीं कर सकती। साथ ही ऐसे पर्चे भी चिपकाए गए थे जिनके द्वारा मठ को बचाने के लिए धन दान देने की याचना की गयी थी। पर्चों को देख ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उन्हें शहर के किसी आधुनिक छपाई केंद्र में छापा गया है। किन्तु उन्हें यहाँ चिपकाने का औचित्य समझ में नहीं आया क्योंकि यहाँ अत्यंत सीमित संख्या में ही पर्यटक अथवा बाहरी व्यक्ति आते हैं। अन्यथा, बौद्ध भिक्षुक एवं गांववासी अपनी क्षमता के अनुसार मठ का रखरखाव कर ही रहे हैं।

साधना कक्ष
साधना कक्ष

सीढ़ियों द्वारा हम मठ के प्रथम तल पर पहुंचे। वहां मध्य में खुला प्रांगण था जिसके चारों ओर कक्ष बने हुए थे। एक कक्ष के भीतर कुछ बौद्ध भिक्षुक मंत्रोच्चारण कर रहे थे। अन्य कक्ष खुले हुए थे जिनका अवलोकन करने हम चल पड़े। प्रत्येक कक्ष के प्रवेश द्वार उत्कीर्णित थे। एक कक्ष सुन्दर कलाकृतियों से भरा हुआ था। मेरे अनुमान से विशेष उत्सवों व आयोजनों में उन कलाकृतियों का  उपयोग किया जाता होगा।

भेड़
भेड़

सीढ़ियों के अंत में एक पहाड़ी भेड़की खाल को भूसे से भरकर लटकाया गया था। मैं उस स्थान पर किंचित भयग्रस्त अनुभव कर रही थी। मुझे अपने चारों ओर तांत्रिक अनुष्ठानों की परंपरा का आभास हो रहा था। मैंने मठ की भित्तियों पर वैरोचन बुद्ध की प्रतिमा तथा अनेक थान्ग्का चित्र भी देखे।

पारंपरिक अर्चना की वस्तुएं
पारंपरिक अर्चना की वस्तुएं

एक कक्ष के भीतर कुछ स्तूप सदृश संरचनाएं थीं। कक्ष के चारों ओर की भित्तियों पर थान्ग्का चित्र थे। एक अन्य कक्ष में रंगबिरंगे ध्वज तथा संगीत के बड़े बड़े वाद्य रखे थे।

मठ की छत

धनकर मठ की छत से परिदृश्य
धनकर मठ की छत से परिदृश्य

मुझे मठ के छत की ओर जाती, भंगुर अवस्था में कुछ सीढ़ियाँ दिखाई दीं। मैं सोच रही थी कि उनके द्वारा छत तक जाऊं अथवा नहीं। मेरा मन मुझसे छत पर जाने के लिए कह रहा था किन्तु भिक्षुक मुझे ऐसा करने से रोक रहे थे। यहाँ सूचना पटल पर अंकित था कि एक समय में एक साथ ३ से अधिक व्यक्तियों को छत पर जाने की अनुमति नहीं है। इससे आप अनुमान लगा सकते हैं कि संरचना की अवस्था कितनी भंगुर होगी। उस पर, वर्षा के कारण फिसलने की आशंका अनेक गुना बढ़ गयी थी। सीढ़ियों के उस छोर पर छत की ओर खुलते छिद्र से मैंने आकाश को निहारा। आकाश पर घने मेघ छाये हुए थे। मैंने अपना मन बदल लिया। भिक्षुकों ने एक दूसरे को देख मंद हास्य द्वारा एक दूसरे से निशब्द संवाद साधा तथा अपने अपने कार्यों में पुनः रम गए।

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पिन एवं स्पीति नदियों के संगम का मनोहारी दृश्य

धनकर मठ से पिन नदी का दृश्य
धनकर मठ से पिन नदी का दृश्य

धनकर मठ के दर्शन के समय मेरा सर्वाधिक अविस्मरणीय स्थान था एक खिड़की, जहाँ से पिन नदी एवं स्पीति नदी का संगम दिखाई पड़ता है। यदि आप कुछ क्षणों के लिए यह भूल जाएँ कि आप एक कक्ष के भीतर बैठे हैं तथा खिड़की से अपने सर को किंचित बाहर निकालें तो आपको स्पीति घाटी के ऊपर उड़ते किसी पक्षी के समान प्रतीत होगा। उस समय मुझे यह समझ आया कि बौद्ध भिक्षुकों ने इस पहाड़ी चट्टान की तीव्र ढलुआ सतह पर मठ का निर्माण क्यों किया होगा। इससे उत्तम ऐसा कौन सा स्थान होगा जहां आप प्राकृतिक तत्वों के सुरक्षित होते हुए भी उनका भाग हो सकते हैं। इस खिड़की से बाह्य परिदृश्यों का अप्रतिम दृश्य दिखाई पड़ता है जिनकी सुन्दरता को शब्दों में बांधना मेरे लिए संभव नहीं है।

नवीन मठ

धनकर मठ का संगीत कक्ष
धनकर मठ का संगीत कक्ष

इस पहाड़ी चट्टान के तलहटी पर नवीन मठ स्थित है। अब इसी मठ में सभी धार्मिक अनुष्ठान किये जाते हैं। प्राचीन मठ अब एक ऐसी अनमोल संपत्ति है जहां वर्षों की पूजा-अर्चना की उर्जा संग्रहीत है। विश्व स्मारक कोष (World Monuments Fund) ने विश्व के १०० सर्वाधिक संकटग्रस्त स्मारकों में इस मठ को भी सम्मिलित किया है। मेरा प्रार्थना है कि आगे आने वाले अनेक युगों तक यह मठ संरक्षित रह सके ताकि अधिक से अधिक मनुष्य इसके दर्शन का लाभ उठा सकें।

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मठ के बाहर एक ग्रामीण संग्रहालय है। मैं जिस दिन वहां थी, उस दिन वह संग्रहालय बंद था। वापिस आने के पश्चात मैंने अनेक पर्यटकों के यात्रा संस्मरण पढ़े, किन्तु उन में से किसी ने भी उस संग्रहालय को खुला हुआ नहीं देखा है।

धनकर मठ तक की सड़क यात्रा का एक विडियो

मठ की ओर जाते समय मैंने चारों ओर के मनमोहक दृश्यों का यह विडियो लिया था। आप इसे अवश्य देखें।

मार्ग में हमने कुछ भरल को देखा जो नीले रंग की एक प्रकार की जंगली पर्वतीय भेड़ें हैं तथा हिमालयीन क्षेत्रों में पायी जाती हैं। पहाड़ों की सपाट पथरीली सतहों पर एक दूसरे के पीछे भागती नीली भेड़ें मानों पृथ्वी के रंग से एकाकार हो रही थीं।

स्पीति घाटी के विभिन्न दर्शनीय स्थलों के अवलोकन के पश्चात मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि यह मेरा सौभाग्य था जो मुझे इस प्रकार के स्थलों का अवलोकन करने तथा इसकी जादुई सुन्दरता में सराबोर होने का स्वर्णिम अवसर प्राप्त हुआ।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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हिमाचल का ताबो मठ- भित्तिचित्र, गुफाएं व शैलशिल्प https://inditales.com/hindi/tabo-math-spiti-ghaati-himachal/ https://inditales.com/hindi/tabo-math-spiti-ghaati-himachal/#comments Wed, 02 Jun 2021 02:30:56 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2312

ताबो, मनमोहक स्पीति घाटी की गोद में विराजमान एक छोटा सा शांतिपूर्ण गाँव। स्पीति नदी के तीर स्थित यह गाँव पूर्व में लियो पार्गिल की चोटी तथा पश्चिम में मणिरंग से घिरा हुआ है। हिमाचल का यह सुन्दर ताबो गाँव, १००० वर्षों से भी अधिक प्राचीन ताबो मठ तथा इसके माटी की संरचनाओं से भरे […]

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ताबो, मनमोहक स्पीति घाटी की गोद में विराजमान एक छोटा सा शांतिपूर्ण गाँव। स्पीति नदी के तीर स्थित यह गाँव पूर्व में लियो पार्गिल की चोटी तथा पश्चिम में मणिरंग से घिरा हुआ है। हिमाचल का यह सुन्दर ताबो गाँव, १००० वर्षों से भी अधिक प्राचीन ताबो मठ तथा इसके माटी की संरचनाओं से भरे परिसर में छुपे अप्रतिम विरासत के लिए अत्यंत प्रसिद्ध है। भित्तिचित्र, थांका चित्र, पांडुलिपियाँ, चूने के शिल्प व मूर्तियाँ तथा अप्रतिम एवं अनूठी वास्तुकला इस मठ की मनमोहक संपत्ति है।

ताबो मठ का प्रवेश द्वार
ताबो मठ का प्रवेश द्वार

हम दोपहर के भोजन के समय तक ताबो गाँव पहुँच गए थे। हमारी मंशा इस मठ में कुछ समय व्यतीत कर, आगे काजा के लिए प्रस्थान करने की थी। किन्तु, भोजन करते समय जब देवाचेन रिट्रीट के श्री रजिंदर बोध ने हमें यहाँ की गुफाओं एवं शैलशिल्पों के विषय में जानकारी दी, हमने तत्क्षण ताबो गाँव में कुछ घंटे नहीं, अपितु एक सम्पूर्ण दिवस व्यतीत करने का निश्चय किया। हमारे मन में इस गाँव की विरासत के दर्शन की अभिलाषा तीव्र हो चुकी थी। सत्य कहूं तो हमारा यह निश्चय सही मायनों में अनमोल सिद्ध हुआ।

ताबो गाँव समुद्र सतह से ३२८० मीटर अथवा १०,००० फीट की ऊँचाई पर स्थित है। इसकी जनसँख्या लगभग ४०० है।

ताबो मठ अथवा चोस-खोर गोम्पा

ताबो मठ को इसकी भित्तिचित्रों के कारण ‘हिमालय का अजंता’ कहा जाता है। इसका एक अन्य कारण यह भी है कि अजंता एवं ताबो दोनों को बौद्ध आस्था का प्रतीक माना जाता है। इस मठ के पूर्व भिक्षुक, लामा डेचेन ने हमें मठ परिसर का संचालित दौरा कराया। एक बौद्ध भिक्षुक होने के कारण उनका दौरा कलाकृतियों की अप्रतिम अभिव्यक्ति की अपेक्षा, भक्तिभाव से अधिक परिपूर्ण था। किन्तु उसी समय भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधिकारीगणों की एक टोली एवं कुछ प्रशिक्षु मठ के अवलोकन हेतु वहां पहुंचे। मेरे सौभाग्य से मुझे एक ऐसे व्यक्ति से चर्चा करने का सुअवसर प्राप्त हो गया जिसे मठ के एक मंदिर एवं उसके भित्तिचित्रों के जीर्णोद्धार व संरक्षण के कार्य का उत्तरदायित्व सौंपा गया था। उन्होंने मुझे वहां की चित्रकारी के विभिन्न तकनीकियों एवं पुरातनता की सूक्ष्म एवं विस्तृत जानकारी प्रदान की।

ताबो मठ – प्राचीनतम किन्तु जीवंत मठ

स्पीती नदी के किनारे ताबो मठ
स्पीती नदी के किनारे ताबो मठ

इस प्राचीनतम व जीवंत मठ में ९ मंदिर एवं कुछ स्तूप हैं जिन्हें कुछ दूरी से निहारा जाए तो ये मिट्टी के घरों से युक्त एक छोटा सा गाँव प्रतीत होते हैं। मठ का मिट्टी में लिपटा अत्यंत सादा बाहरी परिदृश्य अपने भीतर क्या छुपाये हुए है, इसका तनिक भी आभास बाहर से नहीं हो पाता। मठ के बाहर लगे एक साधारण से सूचना फलक पर केवल ताबो मठ का नाम लिखा हुआ है। मठ के भीतर प्रवेश करते ही आप स्वयं को मिट्टी की अनेक संरचनाओं से घिरा पायेंगे जिन पर यदि किसी उजले रंग की छटा है तो वह केवल लामाओं के चटक लाल रंग के वस्त्रों की। यह किसी निराले ही विश्व में प्रवेश करने के सामान है। क्यों ना हो? इससे पूर्व मैंने व कदाचित आपने भी, कभी इस प्रकार के सम्पूर्ण रूप से माटी द्वारा निर्मित संरचनाओं के मध्य स्वयं को नहीं पाया होगा।

माटी से बनी भित्तियां
माटी से बनी भित्तियां

हमने अपना अवलोकन मुख्य मंदिर से आरम्भ किया जिसे त्सुग्लान्ग्खंग अथवा सभा कक्ष कहते हैं। मठ के इस प्राचीनतम संरचना के भीतर जिस शिल्प पर हमारी प्रथम दृष्टी पड़ी, वह थी गणेश की प्रतिमा जो दो धर्मों के संगम का प्रतीक प्रतीत हो रही थी। इस कक्ष में उपस्थित चित्र १७वीं शताब्दी के हैं। इस मठ के संस्थापक के दो पुत्रों, नागराज एवं देवराज, की प्रतिमाएं सभा कक्ष के द्वार पर खड़ी हैं।

मठ का सभाकक्ष

ताबो मठ के मुख्य मंदिर का सभा कक्ष एक अत्यंत उत्कृष्ट कृति है जिसे निहारने के लिए यहाँ पर्याप्त समय व्यतीत करने की आवश्यकता है। इसकी चारों भित्तियों पर बोधिसत्वों के चूने द्वारा निर्मित ३३ उभरे हुए उत्कृष्ट शिल्प हैं। उनमें प्रत्येक प्रतिमा के विशेष नाम हैं जिनका आरम्भ वज्र शब्द से होता है, जैसे वज्र लास्य अथवा वज्र रत्न। उन्हें उत्कृष्ट रूप से चित्रित भीत्तियों के ऊपर जड़ा गया है। प्रथम दर्शनी वे अजंता का स्मरण कराते हैं। किन्तु उनकी चित्रण शैली समान नहीं है। दाहिनी ओर की भित्ति पर बुद्ध की जीवनी का चित्रण किया गया है जिन्हें स्थानिक शाक्यमुनि बुद्ध कहते हैं। कक्ष के अन्य भित्तियों पर बोधिसत्वों की जीवनी की प्राधान्यता है। इनमें कुछ चित्र ९९६ ई. से १०४२ ई. के तथा कुछ १७वीं ई. से १९वीं ई. तक के भी माने जाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो इस मठ द्वारा अनुभवित गत सहस्त्र वर्षों से भी अधिक जीवन काल के विभिन्न समयावधियों को परतों में प्रदर्शित किया गया हो।

ताबो गाँव एवं मठ
ताबो गाँव एवं मठ

इस कक्ष के भीतर उजाले का एकमात्र स्त्रोत था कक्ष की छत पर स्थित एक छिद्र जिसे कांच द्वारा ढंके एक उभरे झरोखे के समान निर्मित किया गया था। जुनिपर अथवा हपुषा की सुगन्धित लकड़ी द्वारा निर्मित स्तम्भ छत को आधार दे रहे थे। इस संरचना की एक विशेषता थी कि ये भूमि पर खोखले आधार पर खड़े थे जो इससे पूर्व मैंने कहीं नहीं देखा था।

ताबो गोम्पा

ताबो गोम्पा एक मंडल के रूप में मुख्य मंदिर के सभा कक्ष के मध्य भाग पर निर्मित है। सभा कक्ष ‘वज्रधातु मंडल’ का प्रतीक है जिसमें धर्म चक्र प्रवर्तन मुद्रा में चार गुने वैरोचन हैं। इनके समीप भित्तियों पर ३३ वज्रयान देवताओं की छवि हैं। गर्भगृह के भीतर एक सिंह पर सवार अमिताभ की प्रतिमा है। इसके दाहिनी ओर रामपानी तथा बाईं ओर महास्थानप्रता हैं। यूँ तो अमिताभ का वाहन मोर है, किन्तु यहाँ उन्हें सिंह पर सवार दर्शाया गया है। हमारे गाइड के अनुसार इस स्थान पर किसी काल में कदाचित बुद्ध की प्रतिमा थी जिसे नवीनीकरण के समय अमिताभ की प्रतिमा से प्रतिस्थापित किया गया हो तथा उनके वाहन को अविचलित ऐसे ही रखा हो।

बोधिसत्व
बोधिसत्व

साधारणतः, मठ के भीतर गोन खंग नामक एक लघु कक्ष होता है जिसके भीतर केवल वृत्तिशील भिक्षुओं को ही ध्यान हेतु जाने की अनुमति होती है। यहाँ यह सभा कक्ष के सम्मुख है। इन्हें महाकाल वज्र भैरव मंदिर भी कहा जाता है। मुझे बताया गया कि इनके भीतर महाकाल एवं श्रीदेवी की प्रतिमाएं होती हैं।

पीटर वैन हैम के संस्करण के अनुसार, चोखोर के त्सुग लाखंग के भीतर निम्न शिलालेख है-

उनके लिए जो लम्बी यात्रा के पश्चात थक चुके हैं,

तथा उन प्राणियों के लिए जो दुःख के साक्षी हैं,

मित्रों व सगे-सम्बन्धियों ने जिन्हें त्याग दिया है,

यह सुन्दर मंदिर उन्ही को समर्पित है।

-चोखोर के त्सुग लाखंग के भीतर आलेखित

स्त्रोत – पीटर वैन हैम का ब्लॉग

ताबो मठ के भित्तिचित्र

बोधिसत्व भित्ति चित्र
बोधिसत्व भित्ति चित्र

ताबो मठ के भित्तिचित्र उसी प्रकार के टेम्परा चित्र शैली के हैं जैसे अजंता की गुफाओं में हैं। इनमें किसी संश्लेषयुक्त पदार्थ के साथ जलीय रंगों का प्रयोग किया जाता है। इसी कारण ताबो मठ की भित्तियों के इन भित्तिचित्रों पर भीषण संकट मंडरा रहा है क्योंकि जल रिसाव के कारण भित्तियों की परतें उतर रही हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधिकारी इस समस्या की जांच कर रहे हैं। आशा है कि वे विशेषज्ञों की सहायता से इस समस्या का हल शीघ्र निकाल लेंगे तथा इस विरासत का संरक्षण कर सकेंगे।

अजंता के ही समरूप यहाँ के भित्तिचित्र भी बुद्ध एवं बोधिसत्व की कथाएं कहती हैं। छतों पर ज्यामितीय आकृतियाँ चित्रित हैं।

कुछ स्थानों पर अपूर्ण चित्रों की रूपरेखाएँ दृष्टिगोचर होती हैं जो चित्रकारी की प्रक्रिया प्रदर्शित करते हैं अथवा कदाचित वहां के रंग समय के साथ फीके पड़ गए हैं।

बौद्ध भिक्षुओं के चित्र
बौद्ध भिक्षुओं के चित्र

अनेक स्थानों पर भित्ति के अभिलेखन चित्रकारी की तिथि तथा चित्रित कथा के विषयवस्तु की जानकारी देते हैं। साथ ही इन चित्रों के प्रायोजकों के नाम भी हैं। सभी अभिलेखन बोटी लिपि में हैं।

गुगे साम्राज्य

गुगे साम्राज्य के राजाओं ने रिनचेन जंगपो के निर्देशन में इस मठ का निर्माण करवाया था। रिनचेन जंगपो एक महान अनुवादक थे जिन्होंने बौद्ध पांडुलिपियों का संस्कृत से तिब्बती भाषा में अनुवाद किया था। रिनचेन जंगपो नालंदा विश्वविद्यालय के विद्यार्थी थे। इस मठ का निर्माण करते समय वे भित्तियों पर चित्रकारी करने के लिए कश्मीरी कारीगरों को यहाँ लेकर आये थे। मठ के भित्तिचित्रों में उनका प्रभाव स्पष्ट झलकता है।

अन्य ८ मंदिरों के अवलोकन करने के लिए आपको लामाओं से उनके द्वार खोलने का निवेदन करना पड़ेगा।  एक मंदिर के भीतर मुझे एक विलक्षण चित्र का स्मरण है जिसमें हरित तारा तथा ३ मुख व ८ हस्तों से युक्त उश्निश्विजय को दर्शाया गया है। मैत्रेय मंदिर में मैत्रेय बुद्ध की विशाल प्रतिमा है। मंदिर के द्वार पर अप्रतिम चौखट है जो मुझे पश्चिमी चालुक्य मंदिरों का स्मरण कराता है।

मठ परिसर में २३ स्तूप हैं जिनमें कुछ के भीतर भित्तिचित्र हैं। उत्तम प्रदर्शन सुविधाओं की अनुपस्थिति में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने इनके अवलोकन की अनुमति प्रदान नहीं की है। कुछ स्तूपों पर नक्काशी अवश्य देखी जा सकती है।

ताबो गाँव को भारतीय एवं तिब्बती संस्कृतियों का प्राचीन संगम स्थल माना जाता है जहां तिब्बती विद्यार्थी भारतीय बौद्ध विद्वानों से शिक्षण ग्रहण करने यहाँ आते थे।

यहाँ का जीवन मठ तथा इसके द्वारा लघु स्तर पर उत्पन्न पर्यटन अर्थव्यवस्था के चारों ओर ही केन्द्रित रहता है।

मंदिर के भीतर छायाचित्रीकरण की अनुमति नहीं है किन्तु मंदिर के भीतर के भित्तिचित्रों के चित्र आप क्रय कर स्मारिका के रूप में ले जा सकते हैं।

यहाँ एक नवीन मठ का भी निर्माण किया गया है जहां मठ के सहस्त्र वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में दलाई लामा ने स्वयं १९९६ में कालचक्र दीक्षा कराई थी।

ताबो गुफाएं

ताबो की प्राचीन गुफाएं
ताबो की प्राचीन गुफाएं

यदि आपने सहस्त्र वर्षों पूर्व इस स्थान की यात्रा की होती तो आप कदाचित इन गुफाओं में रह रहे होते जिन्हें आज आप ताबो गाँव से सटी पहाड़ी पर बिखरी हुई देख सकते हैं। वर्त्तमान में ये गुफाएं अत्यंत जीर्ण अवस्था में हैं तथा इन तक पहुँचना अत्यंत कठिन है। तथापि ये गुफाएं ताबो मठ के अंतर्गत आते एक गुफा मंदिर के इतने समीप स्थित है कि आप वहां से इन गुफाओं को स्पष्ट देख सकते हैं। कुछ गुफाएं दो तलों की हैं तो कुछ ऐसी प्रतीत होती हैं मानो उन्हें चट्टानों को कुरेद कर बनाया गया हो। मुझे बताया गया कि इन गुफाओं के भीतर धुंए के चिन्ह हैं जो यह दर्शाते हैं कि किसी काल में इन गुफाओं में वास था। यूँ तो उनकी तिथि ज्ञात नहीं है, किन्तु ऐसा अनुमान है कि ये लगभग उस काल में अस्तित्व में आये होंगे जब ९९६ ई. में इस मठ की स्थापना की जा रही थी। तब तक ताबो गाँव अस्तित्व में नहीं था तथा यात्री भिक्षुक अनुमानतः इन गुफाओं में ही ठहराते थे।

पहाड़ों में खुदी गुफाएं
पहाड़ों में खुदी गुफाएं

गुफा मंदिर ताबो मठ के अंतर्गत एक सादी गुफा संरचना है जो इस प्रकार मिट्टी से ढंकी हुई है कि यदि आपके वस्त्र इनकी सतह को छूकर निकले तो मुट्ठी भर मिट्टी भी साथ ले ले। इसके संरक्षण का उत्तरदायित्व भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग पर है। सीमेंट-कंक्रीट द्वारा निर्मित एक पक्की सीढ़ी आपको गुफा तक ले जायेगी जिसमें एक मंदिर, एक पाकगृह तथा एक सभाकक्ष हैं।

शैलशिल्प

प्राचीन शैल्शिल्प
प्राचीन शैल्शिल्प

मुझे यहाँ के शैलशिल्पों की पूर्व जानकारी नहीं थी। उनके विषय में मुझे यहाँ आकर ही ज्ञात हुआ। अकस्मात् ही हमारे गाइड के मुख से उनके विषय में कुछ उद्गार व्यक्त हो गए जिसने हमारी जिज्ञासा को जन्म दे दिया। आरम्भ में उसने हमें वहां जाने के लिए यह कह कर हतोत्साहित किया कि वहां पहुँचने के लिए कष्टकर पदयात्रा की आवश्यकता होगी। किन्तु मैं अपने निश्चय पर अडिग रही। अंततः उसने हमें गाँव की शाला के पृष्ठभाग में स्थित एक सरकारी परिसर के भीतर कुछ अप्रतिम शैलतक्षण के दर्शन कराये। यूँ तो शिलाओं पर किये गए तक्षण उत्कृष्ट रूप से संरक्षित थे किन्तु ये शिलाएं झाड़ियों में तितर-बितर रूप से बिखरे हुए थे। मुझे कुछ कष्ट उठाकर उन तक पहुँचना पड़ा किन्तु मेरी मेहनत अत्यंत फलदायी सिद्ध हुई।

प्राचीन तक्षकला

मैंने गहरे भूरे रंग की शिलाएं देखीं जिन पर हल्के भूरे रंग द्वारा तक्षण किया गया था। अन्य प्राचीन शैलशिल्प स्थलों के समान इन शिलाओं पर भी पशुओं एवं शिकार के दृश्य उत्कीर्णित थे। वहां एक दृश्य ने मुझे सर्वाधिक अचंभित किया। लगभग सभी तक्षित शिलाओं पर स्वस्तिक के अनेक चिन्ह उत्कीर्णित थे। कुछ स्थानों पर मुझे ॐ के भी चिन्ह दृष्टिगोचर हुए।

ताबो गाँव को विश्व से जोड़ता पुल
ताबो गाँव को विश्व से जोड़ता पुल

इस स्थान का दुर्भाग्य है कि समीप कहीं भी उनके विषय में जानकारी प्रदान करते सूचना फलक नहीं थे। मुझे जानकारी दी गयी कि किसी व्यक्ति ने स्वतन्त्र रूप से इन शैलशिल्पों का अध्ययन किया एवं उन पर किये गए शोध पर एक पुस्तक भी प्रकाशित की। किन्तु मुझे ना तो वह पुस्तक मिली, ना ही उसका नाम।

अगले दिन हम सेतु पार कर धनकर व काजा की ओर जाते मार्ग पर पहुंचे। मैं ताबो की विरासत को सदा के लिए अपने मन मस्तिष्क में समेटे वहां से जा रही थी। मुझे यह विश्वास हो गया था कि मैं इस स्थान के विषय में आयुष्य भर चर्चा करूंगी।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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उदयगिरी, रत्नागिरी एवं ललितगिरी- ओडिशा का बौद्ध इतिहास https://inditales.com/hindi/odisha-ke-boudh-vihar-udaygiri-ratnagiri-lalitgiri/ https://inditales.com/hindi/odisha-ke-boudh-vihar-udaygiri-ratnagiri-lalitgiri/#comments Wed, 10 Mar 2021 02:30:17 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2216

उदयगिरी, रत्नागिरी एवं ललितगिरी ओडिशा में प्राचीन बौद्ध धर्म की अंतिम स्मृतियाँ हैं। इन स्थलों का संबंध बौद्ध धर्म के उदय से भले ही ना हो किन्तु  बौद्ध धर्म के प्रसार में इनका निश्चित ही महत्वपूर्ण योगदान है। ओडिशा में बौद्ध धर्म का इतिहास ऐसी मान्यता है कि जब भगवान बुद्ध ने सारनाथ में अपना […]

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उदयगिरी, रत्नागिरी एवं ललितगिरी ओडिशा में प्राचीन बौद्ध धर्म की अंतिम स्मृतियाँ हैं। इन स्थलों का संबंध बौद्ध धर्म के उदय से भले ही ना हो किन्तु  बौद्ध धर्म के प्रसार में इनका निश्चित ही महत्वपूर्ण योगदान है।

ओडिशा में बौद्ध धर्म का इतिहास

ऐसी मान्यता है कि जब भगवान बुद्ध ने सारनाथ में अपना प्रथम प्रवचन दिया था तब उनके आरंभिक शिष्यों में दो शिष्य उत्कल अर्थात् ओडिशा के निवासी थे। उनके नाम थे, तपस्सु (तपुसा) तथा भल्लिका (बहलिका)।

रत्नागिरी संग्रहालय ओडिशा में बुद्ध की प्रतिमा
रत्नागिरी संग्रहालय ओडिशा में बुद्ध की प्रतिमा

ऐसा कहा जाता है कि २६१ ई.पू. में हुए कलिंग युद्ध के पश्चात ओडिशा (कलिंग) के सम्राट अशोक ने अहिंसा को अपनाया तथा पूर्ण रूप से बौद्ध धर्म में प्रवेश किया। समस्त विश्व में बौद्ध धर्म का प्रचार करना उनका लक्ष्य बन गया। ऐसा माना जाता है कि बौद्ध धर्म का भारत से समस्त विश्व में प्रसार करने में सर्वाधिक योगदान सम्राट अशोक का ही था। भुवनेश्वर के समीप धौली में अशोक का स्तम्भ तथा उनके अनेक शिलालेख हैं।

कहते है कि सम्राट अशोक की सुपुत्री संघमित्रा ने यहीं से श्री लंका की यात्रा आरंभ की थी। वो श्रीलंका के अनुराधापुरा के समीप स्थित मिहिन्तले पहुंची थी। यह स्थान आज भी उसकी यात्रा का उत्सव मनाता है।

उदयगिरी, रत्नागिरी तथा मंगलगिरी, ये तीनों स्थल वास्तव में तीन विहार थे। बौद्ध धर्म में मठों या आश्रमों  को विहार कहा जाता है। कदाचित इनका प्रयोग उस समय किया गया था जब इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म अपनी समृद्धि की चरम सीमा पर था। चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने अपनी यात्रा विवरणों में कहा है कि ७ वी. शताब्दी में जब उसने इस स्थान की यात्रा की थी, तब भी ये तीनों विहार सक्रिय थे।

ओडिशा के हीरे- उदयगिरी, रत्नागिरी एवं ललितगिरी का विडिओ

हमारी उदयगिरी, रत्नागिरी एवं ललितगिरी की यात्रा के समय हमने यहाँ के प्रसिद्ध धरोहरों की झलक को आपके लिए अपने कैमरे में उतार लिया था। इन ऐतिहासिक धरोहरों को जानने एवं उचित परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए इस लघु चलचित्र को अवश्य देखिए।

तो आईए मेरे साथ इन विहारों एवं महाविहारों के दर्शन के लिए, जहां भिक्षु निवास करते थे तथा प्रार्थना एवं साधना करते थे।

उदयगिरी

तीनों ऐतिहासिक स्थलों में से विशालतम स्थल, उदयगिरी, बिरुपा नदी के किनारे स्थित है। बिरुपा नदी अब लगभग विलुप्त हो चुकी  है। इस स्थान को सन् १९५८ में उत्खनित किया गया था। सन् १९९७ में जब यहाँ पुनः खुदाई की गई तब यहाँ से कई स्तूप, मठ संकुल तथा बौद्ध विहार उत्खनित किये गए थे । उदयगिरी बौद्ध विहार का मूल नाम माधवपुरा महाविहार था। उदयगिरी, यह नाम यहाँ स्थित एक पर्वत के नाम से व्युत्पन्न है जिसका अर्थ है, उगते सूर्य का पर्वत।

बोधिसत्व प्रतिमा
बोधिसत्व प्रतिमा

ऐतिहासिक संरचनाओं से प्रथम साक्षात्कार के लिए आतुर, हम वृक्षों से घिरे एक पगडंडी से आगे बढ़े। हम जैसे ही समीप पहुंचे, बुद्ध एवं बोधिसत्व की आदमकद प्रतिमाओं से हमारा साक्षात्कार हुआ। ये प्रतिमाएं किंचित भंगित होने के पश्चात भी अत्यंत मनमोहक थीं। प्रतिमाओं का सूक्ष्म उत्कीर्णन देख हम अत्यंत रोमांचित थे। जब ऐसी प्रतिमाएं बाहर हैं तो अंदर कितनी अप्रतिम प्रतिमाएं होंगीं, इस विचार से हमारा रोम रोम प्रफुल्लित था।

उदयगिरी का बौद्ध विहार आरंभिक ईसवी से १३ वीं ई. तक सक्रिय था। निश्चित ही एक लंबे अंतराल तक यहाँ बौद्ध धर्म फल-फूल रहा था।

उदयगिरी का महास्तूप

उदयगिरी महास्तुप
उदयगिरी महास्तुप

कुछ दूरी पर ईंटों का बना एकल स्तूप खड़ा था। कुछ और आगे बढ़ने पर हम उस स्तूप तक पहुंचे। यह छोटा सा स्तूप लगभग इतनी ही ऊंची एक पीठिका पर स्थापित है। इसके आधार तक पहुँचने के लिए कुछ अर्धगोलाकार सीढ़ियाँ थी। बड़े वृक्षों के मध्य स्थित यह स्तूप अत्यंत मनोहारी दृश्य प्रस्तुत कर रहा था। ऊपर चढ़कर हमने देखा कि स्तूप के चारों ओर भित्ति पर बुद्ध की प्रतिमाएं हैं जो उन्हे उनके चार जीवन मुद्राओं में दर्शाती हैं। वे मुद्राएं हैं, भूमि स्पर्श मुद्रा, ध्यान मुद्रा, वरद मुद्रा तथा धर्मचक्र परिवर्तन मुद्रा।

यह एक छोटा पूर्वमुखी बौद्ध विहार है।

उदयगिरी का बौद्ध विहार?

उदयगिरी महाविहार
उदयगिरी महाविहार

यहाँ से हम उदयगिरी के दूसरे बौद्धस्थल पहुंचे जो एक बौद्धमठ था। यहाँ उजले रंगों से सज्ज एक छोटे से देवी मंदिर ने हमें कृतार्थ कर दिया। मंदिर के उस पार खंडहर था। द्वार की एक अलंकृत चौखट थी जो सूक्ष्मता से उत्कीर्णित थी। इसे देख ऐसा प्रतीत हो रहा था कि यह मठ का एक महत्वपूर्ण भाग था जो अब तक अखंडित बचा हुआ है। इसके भीतर भगवान बुद्ध की कुछ मूर्तियाँ थीं जो विभिन्न स्तर पर खंडित थीं। इसके चारों ओर प्रदक्षिणा पथ था जिस पर मेहराब युक्त झरोखे थे।

इसके चारों ओर आप विभिन्न कक्षों के अवशेष में इसकी मूल आकृतियों की झलक देख सकते हैं। बौद्ध भिक्षु इन कक्षों में रहते थे। प्रथम तल पर भी कक्षों की आकृतियाँ दृष्टिगोचर होती हैं जिन्हे देख ऐसा जान पड़ता है कि यह मठ विभिन्न तलों में निर्मित था।

उदयगिरी महाविहार के स्तूप
उदयगिरी महाविहार के स्तूप

मठ के चारों ओर स्थित जल की नहर यह बताती है कि उस समय जल संचयन, प्रयोग एवं निकासी की उत्तम जल प्रबंधन प्रणाली उपलब्ध थी। एक गोलाकार संरचना ने मुझे दुविधा में डाल दिया। मैं विचार करने लगी कि किसी समय यह कुआँ था अथवा किसी भंगित स्तूप का आधार।

मठ के ऊपर से आप अनेक बड़े-छोटे स्तूप देख सकते हैं। उनके ऊपर की सपाट सतहों को देख यह कल्पना करना कठिन है कि इनके शीर्ष सदा से सपाट थे अथवा काल के थपेड़ों को सह कर धराशायी हो गए हैं। अपनी दृष्टि को दूर तक खींचे तथा उस पार खड़ी पहाड़ी की ढलान पर देखें तो आपको ऐसी ही अनेक संरचनाएं दृष्टिगोचर होंगी। वहाँ कदाचित एक अन्य मठ तथा उससे संबंधित कुछ स्तूप हैं।

उदयगिरी में प्राचीन देवी मंदिर
उदयगिरी में प्राचीन देवी मंदिर

देवी मंदिर के भीतर तीन प्राचीन पाषाण की मूर्तियाँ हैं। इस मंदिर के अतिरिक्त, बावड़ी के समीप भी एक छोटा सा मंदिर है। केवल ये दोनों मंदिर ही इस क्षेत्र की जीवंत संरचनाएं हैं।

शिलाओं से बनी बावड़ी

मेरे लिए इस मठ का सर्वाधिक स्मरणीय भाग यहाँ की बावड़ी थी जिसे पत्थर को काटकर बनाया गया था। इसके अनोखे आकार ने मुझे चकित कर दिया था। बावड़ी चौकोर थी किन्तु इसकी ओर जाती सीढ़ियाँ एक लंबी घटिका अथवा गर्दन के समान थी। समीप लगा सूचना पटल हमें जूते-चप्पल पहनकर जल में प्रवेश ना करने की चेतावनी तो दे रहा था परंतु उस पर इस अनोखी पाषाणी बावड़ी के विषय में जानकारी के नाम पर लेश मात्र भी उल्लेख नहीं था।

शिला से बनी बावड़ी
शिला से बनी बावड़ी

मैं यहाँ जनवरी के मध्य में आई थी किन्तु उस समय भी बावड़ी में नाममात्र जल था। बावड़ी की भीतरी भित्तियों पर कुछ आले थे। कदाचित किसी काल में उनके भीतर प्रतिमाएं रखी हों।

मठ स्थल पर कोई भी दिशानिर्देशक पुस्तिका उपलब्ध नहीं थी, न ही कोई परिदर्शक उपलब्ध था जो हमें इस स्थान के विषय में बता सकता। एक चौकीदार अवश्य था जो पूछने पर गाइड का कार्य भी कर रहा था। जल एवं भोजन की भी कोई व्यवस्था नहीं थी। कदाचित शौचालय उपलब्ध हो। वाहन स्थानक से यहाँ तक पहुँचने के लिए कुछ दूर चलना भी पड़ता है।

इस मठ को विस्तृत रूप से अवलोकन करने के लिए एक घंटे का समय पर्याप्त है।

अवश्य पढ़ें: ओडिशा के कोणार्क सूर्य मंदिर के २४ विशेष आकर्षण

रत्नागिरी

रत्नागिरी उदयगिरी के समीप ही स्थित है। अतः उदयगिरी के पश्चात हमारा अगला गंतव्य रत्नागिरी ही था। नीचे एक टिकट खिड़की है जहां से अनेक छोटी छोटी सीढ़ियों वाली लंबी पगडंडी को पार कर आप एक पहाड़ी पर पहुंचेंगे। ऐसा कहा जाता है कि रत्नागिरी पहाड़ी तीन नदियों से घिरी हुई है, ब्राह्मणी, किमिरिया एवं बिरुपा। किन्तु इस पुरातत्व स्थल के समीप मुझे किसी नदी के चिन्ह दृष्टिगोचर नहीं हुए। यदि समीप नदियां थीं अथवा अब भी हैं तो कदाचित यही कारण हो कि बौद्ध भिक्षुओं ने यहाँ मठ की स्थापना की थी।

रत्नागिरी विहार की सीढियां
रत्नागिरी विहार की सीढियां

यद्यपि इसकी सर्वप्रथम खोज सन् १९०६ में हुई थी तथापि इस स्थान का उत्खनन १९५८ में ही हो पाया था। यूँ तो रत्नागिरी का यह मठ स्थल १६वीं सदी तक अस्तित्व में था, किन्तु यह स्थल ५वीं से १२वीं सदी के मध्य सर्वाधिक सक्रिय था। यहाँ से प्राप्त धातु की कुछ कलाकृतियों को देख कर इतिहासकारों ने यह अनुमान लगाया है कि यह तांत्रिक अनुष्ठानों का स्थल था। यहाँ के उत्खनित मिट्टी की एक पटलिका से यह जानकारी प्राप्त होती है कि इस स्थान को ‘श्री रत्नागिरी महाविहारिए आर्य भिक्षु संघश्य’ कहा जाता था। शीर्ष पर पहुँचने के पश्चात जो दृश्य सर्वप्रथम आपको आकर्षित करती है, वह है बायीं ओर स्थित इच्छापूर्ति के छोटे छोटे अनेक स्तूपों की शिस्तबद्ध पंक्तियाँ। स्तूप तो प्राचीन हैं किन्तु इन शिस्तबद्ध पंक्तियों की व्यवस्था नवीन प्रतीत होती है। ये इच्छापूर्ति के द्योतक हैं। यहाँ से एक मिट्टी की पगडंडी दाहिनी ओर जाती हुई हमें एक छोटे मठ तक ले जाती है जो ११वीं -१२वीं सदी का है। यहाँ देखने योग्य अधिक कुछ नहीं है किन्तु इसे देखकर मठ की मूल संरचना के विषय में जानकारी अवश्य प्राप्त होती है।

इच्छापूर्ति स्तूप
इच्छापूर्ति स्तूप

इच्छापूर्ति स्तूपों के बायीं ओर स्थित एक मार्ग हमें मुख्य मठ की ओर ले जाता है। यह मठ भी इच्छापूर्ति के छोटे छोटे अनेक स्तूपों से घिरा हुआ है।

बड़ा मठ अर्थात् मठ क्रमांक १

रत्नागिरी महाविहार का सुसज्जित द्वार
रत्नागिरी महाविहार का सुसज्जित द्वार

इस क्षेत्र का सर्वोच्च आकर्षण एक बौद्ध मठ है। हरे क्लोराइट पत्थर में बने एक अप्रतिम उत्कीर्णित द्वार से आप इसके भीतर प्रवेश करते हैं। इसकी भित्तियाँ विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतिमाओं से अलंकृत हैं। उनमें एक प्रतिमा देवी यमुना की भी है। इसके भीतर जाते ही आप एक बड़े मुक्त प्रांगण में पहुंचते हैं। प्रांगण के चारों ओर स्थित भित्तियों पर बुद्ध एवं बोधिसत्व की प्रतिमाएं हैं। बुद्ध के शीश की भी अनेक प्रतिमाएं हैं जिनमें अधिकांश की नासिका भंगित है। कई भंगित भाग ऐसे हैं जो किसी समय किसी विशाल प्रतिमा का भाग रहे होंगे, जैसे विशाल चरण। अपने पैर उसके समीप रखें तो आकार की विशालता आपको अचंभित कर देगी। विभिन्न भागों को जोड़कर कुछ प्रतिमाओं को पुनः निर्मित करने का प्रयास अवश्य किया गया है किन्तु उन्हे देख आसानी से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि ये भाग भिन्न भिन्न प्रतिमाओं के हैं।

रत्नागिरी महाविहार में बुद्ध की प्रतिमा
रत्नागिरी महाविहार में बुद्ध की प्रतिमा

मुख्य गर्भगृह के द्वार की चौखट भी उत्कृष्ठता से उत्कीर्णित है। इसके भीतर भूमि स्पर्श मुद्रा में बुद्ध की एक विशाल प्रतिमा है। इसकी नासिका के अतिरिक्त यह प्रतिमा लगभग अभंगित है। इसकी नासिका को देख यह आभास होता है कि किसी समय इस प्रतिमा के साथ भी दुर्व्यवहार किया गया है। बुद्ध की प्रतिमा के दोनों ओर दो द्वारपालों की खड़ी प्रतिमाएं हैं।

अपने वाहन कछुए पर सवार यमुना
अपने वाहन कछुए पर सवार यमुना

एक ओर ६ छोटे मंदिरों की पंक्ति है जिसके मध्य एक सुंदर द्वार है। अब ये पावन कक्ष रिक्त हैं। स्वयं का छायाचित्र लेने के लिए यह उत्तम पृष्ठभूमि हो सकती हैं। उन्हे देख अनेक विचार मेरे मन में विचरण करने लगे थे, क्या ये छोटे मंदिर आरंभ से यहीं थे, क्या इनके भीतर कभी कोई मूर्तियाँ थीं अथवा कांचीपुरम के कैलाशनाथ मंदिर की भांति क्या ये ध्यान स्थल थे, इत्यादि।

विशाल मुक्त प्रांगण के मध्य खड़े होकर मैं कल्पना के सागर में गोते लगाने लगी। अनेक भिक्षु यहाँ बैठकर ध्यान कर रहे हैं  अथवा अपने गुरु से शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, ऐसे दृश्य मेरे नेत्रों में तैरने लगे थे।

मठ क्रमांक २ एवं ३

रत्नागिरी बौद्ध मठ के स्तूप
रत्नागिरी बौद्ध मठ के स्तूप

मुख्य मठ से लगा हुआ ही एक अन्य मठ है जो अब खंडित हो चुका है। आप यहाँ कुछ स्तूप देख सकते हैं। उनमें से एक स्तूप पर तीन तलों का हर्मिका अर्थात् ग्रीष्मभवन अब भी लगभग अखंडित रूप से विद्यमान है।

तीसरा मठ एक कोने में है जिसमें छोटे-बड़े अनेक स्तूप हैं।

धर्म महाकाल मंदिर

धर्मं महाकाल मंदिर - रत्नागिरी ओडिशा
धर्मं महाकाल मंदिर – रत्नागिरी ओडिशा

कुछ आगे जाकर, मठ से एक तल नीचे, एक सादा किन्तु प्राचीन शिव मंदिर है। पत्थर में निर्मित इसकी ठेठ वक्रीय संरचना इसकी विशेषता है। इसे देख यह एक जीवंत मंदिर प्रतीत होता है। इंटरनेट से मुझे यह जानकारी प्राप्त हुई कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने इसे मुख्य स्थल से स्थानांतरित कर यहाँ पुनः स्थापित किया है।

रत्नागिरी स्थल संग्रहालय

रत्नागिरी संग्रहालय में शिलालेख
रत्नागिरी संग्रहालय में शिलालेख

इस पुरातात्विक स्थल से लगा हुआ ही भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग का एक संग्रहालय है जहां इस पुरातात्विक स्थल से उत्खनित अनेक कलाकृतियाँ प्रदर्शित की गई हैं। इसकी चार दीर्घाओं में इच्छापूर्ति स्तूप हैं तथा शिला, कांस्य, तांबा, हस्तिदंत इत्यादि में बनी अनेक प्रतिमाएं हैं। शिलाखंड एवं तांबे के पत्रकों में अनेक अभिलेख हैं। टेरकोट्टा(पकी मिट्टी) की अनेक मुद्रिकाएं हैं। बुद्ध, बोधिसत्व, अपराजिता, अवलोकितेश्वर, मंजुश्री, तारा, कृष्ण-यमारि इत्यादि की प्रतिमाएं हैं।

यह संग्रहालय शनिवार से ब्रहस्पतिवार तक प्रातः ९ बजे से संध्या ५ बजे तक खुला रहता है। अधिक जानकारी के लिए इस वेबस्थल से संपर्क करें।

अवश्य पढ़ें: ओडिशा के जाजपुर का बिरजा देवी शक्तिपीठ

ललितगिरी

ललितगिरी को नल्तिगिरी भी कहा जाता है। ललितगिरी अन्य दोनों स्थलों से कुछ दूरी पर स्थित है। यह स्थल तीनों स्थलों में से सबसे छोटा किन्तु सबसे उत्तम संवर्धित स्थल है। इसका उत्खनन सर्वप्रथम सन् १९७७ में किया गया था। तब से अब तक यहाँ से अनेक जानकारियाँ प्राप्त हुई हैं। यहाँ से प्राप्त टेरकोट्टा(पकी मिट्टी) की एक मुद्रिका के अनुसार इस स्थल का आधिकारिक नाम श्री चंद्रादित्य विहार समग्र आर्य भिक्षु संघ था।

ललित्गिरी का चैत्य
ललित्गिरी का चैत्य

ललितगिरी पुरातत्व स्थल के उत्खनन का चरमोत्कर्ष क्षण था यहाँ के स्तूपों के भीतर बौद्ध अवशेषों की खोज। ये अवशेष एक छोटे सुनहरे डिब्बे में रखे हुए थे। इस डिब्बे को एक के ऊपर एक अनेक डिब्बों में बंद किया हुआ था।

ललितगिरी को ओडिशा के सर्वाधिक आरंभिक काल के बौद्ध स्थलों में से एक माना जाता है। यहाँ से प्राप्त प्रमाणों के अनुसार यह स्थल ३री सदी से १०वीं सदी तक सक्रिय था।

महास्तूप

ललितगिरी में एक पहाड़ी की चोटी पर एक विशाल स्तूप है। वहाँ तक पहुँचने के लिए लंबी सीढ़ी चढ़नी पड़ती है। वहाँ से पहाड़ियों से भरा आसपास का दृश्य अत्यंत मनोहारी प्रतीत होता है।

ललित्गिरी महास्तुप
ललित्गिरी महास्तुप

स्तूप के नाम पर वहाँ एक ऊंची पीठिका पर ईंटों की गोल संरचना है। कुछ प्रतिमाएं यहाँ-वहाँ बिखरी हुई हैं किन्तु उन्हे पहचानना कठिन है।

यहाँ का चैत्यगृह विशाल है। यद्यपि अब आप इसकी केवल रूपरेखा ही देख सकते हैं, तथापि आप कल्पना कर सकते हैं कि यह अत्यंत सुंदर स्थल रहा होगा। चैत्यगृह चार छोटे मठों से घिरा हुआ है। चारों ओर मनौती स्तूप बिखरे हुए हैं।

यहाँ की पक्की पगडंडियों पर चलते हुए आप इस ऊंचाई से दूर पर ललितगिरी का सम्पूर्ण मठ देख सकते हैं। किन्तु भीतर जाकर सम्पूर्ण परिप्रेक्ष्य खो सा जाता है।

ललितगिरी में एक आधुनिक स्थल संग्रहालय है। किन्तु यहाँ छायाचित्रीकरण की मनाही है। किसी प्रकार की विवरणिका पुस्तिका भी उपलब्ध नहीं है।

पुष्पगिरी विश्वविद्यालय

ऐसा माना जाता है कि पूर्व में ये तीनों स्थल एक साथ पुष्पगिरी विश्वविद्यालय का भाग थे जो अब किसी अन्य स्थान में लांगुड़ी नाम से स्थित है। पुष्पगिरी का उल्लेख ह्वेन त्सांग के यात्रा विवरणों में भी प्राप्त होता है।

पर्यटन की दृष्टि से उदयगिरी, रत्नागिरी एवं ललितगिरी ओडिशा के त्रिकोणीय माणिक्य के नाम से लोकप्रिय हैं।

अवश्य पढ़ें: हीरापुर ओडिशा का चौसठ योगिनी मंदिर ९ वीं. सदी का अद्भुत माणिक्य

यात्रा सुझाव

बुद्ध के विशाल पैर

  • अधिकार पर्यटक भुवनेश्वर में ठहरकर इन स्थलों का एक-दिवसीय भ्रमण करते हैं। हमने भुवनेश्वर से भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान जाते समय, मार्ग में इन स्थलों का भ्रमण किया था।
  • केवल रत्नागिरी में ही ओडिशा पर्यटन विभाग का अतिथिगृह है जहां भोजनालय भी है। अन्य स्थानों की सुविधाएं सीमित हैं।
  • प्रवेश शुल्क नाममात्र है।
  • इन सभी पर्यटन स्थलों में छायाचित्रीकरण की पाबंदी नहीं है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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अनुराधापुरा – श्रीलंका की प्राचीन राजधानी की एक झलक https://inditales.com/hindi/anuradhapura-oldest-living-city-sri-lanka/ https://inditales.com/hindi/anuradhapura-oldest-living-city-sri-lanka/#comments Wed, 10 Jan 2018 02:30:30 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=591

मुझे मेरे नाम, अनुराधा से विशेष रूचि नहीं थी। इस नाम के कई अन्य लोगों से भेंट के पश्चात तो मुझे यह नाम और भी सामान्य प्रतीत होता था। अपने इस नाम का महत्व तब ज्ञात हुआ जब मुझे श्रीलंका स्थित विश्व के सबसे प्राचीन नगर अनुराधापुरा के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त हुई। अनुराधा नामक […]

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अनुराधापुरा - श्री लंका
अनुराधापुरा – श्री लंका

मुझे मेरे नाम, अनुराधा से विशेष रूचि नहीं थी। इस नाम के कई अन्य लोगों से भेंट के पश्चात तो मुझे यह नाम और भी सामान्य प्रतीत होता था। अपने इस नाम का महत्व तब ज्ञात हुआ जब मुझे श्रीलंका स्थित विश्व के सबसे प्राचीन नगर अनुराधापुरा के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त हुई। अनुराधा नामक मंत्री के नाम पर आधारित इस पवित्र स्थल के नाम ने मुझे भी गौरान्वित होने का अवसर दिया। और तभी से मैंने इस सुन्दर नगर के दर्शन का निश्चय किया।

श्रीलंका में यूनेस्को के वैश्विक विरासती स्थलों के एकल सड़क यात्रा का आरम्भ मैंने, कोलम्बो उतरने के पश्चात, अनुराधापुरा से ही किया था। भोर होते ही ‘हाबरना सिनामन लॉज’ से निकल कर प्रातः ७.३० बजे के आसपास अनुराधापुरी पहंची। एक विशाल तालाब के पीछे स्थित पवित्र अनुराधापुरा की मेरी प्रथम झलक थी तालाब के ऊपर उड़ते अनेक पक्षियों के पीछे प्रकट होते दो विशाल स्तूप। स्वच्छ, श्वेत व उत्तम रखरखावयुक्त पहला स्तूप, व उसके पास स्थित ठेठ, प्राचीन, पकी लाल ईंटों द्वारा निर्मित, किंचित भंगित शीर्ष लिए दूसरा स्तूप! इन दोनों के समक्ष उड़ते निर्मल पक्षियों को देख मैं कुछ क्षण वहीं ठहर गयी। मंत्रमुग्ध होकर यह दृश्य निहारती रही। इस दृश्य ने मेरी अनुराधापुरा दर्शन की इच्छा को और प्रबल कर दिया था।

अनुराधापुरा की प्रथम झलक
अनुराधापुरा की प्रथम झलक

कुछ ही मिनटों में मेरी गाड़ी एक प्राचीन बौद्ध मठ के अवशेषों के बीच पहुंची। जैसे ही मैंने अनुराधापुरी की पवित्र धरती पर पहला कदम रखा, यहाँ प्रार्थना किये हुए लाखों बौद्ध भिक्षुओं की महिमा ने मेरे हृदय को भावविभोर कर दिया। यहाँ से हम ताल के पीछे स्थित उस श्वेत स्तूप के दर्शन हेतु प्राचीन पत्थर की सीड़ियों की ओर बढ़ गए।

रुवन्वेली सेया अथवा रुवन्वेली दगबा

रुवन्वेली दगबा - अनुराधापुरा, श्री लंका
रुवन्वेली दगबा – अनुराधापुरा, श्री लंका

रुवन्वेली दगबा नामक इस श्वेत स्तूप के प्रवेश द्वार पर नागराज की पत्थर में बनी रक्षक प्रतिमा स्थापित थी। मैंने इस तरह की रक्षक प्रतिमा अनुराधापुरा के कई स्थानों पर देखी। स्तूप भ्रमण के समय मैंने देखा कि पर्यटकों के रंगीन वस्त्रों के विपरीत, सभी स्थानीय दर्शनार्थियों ने श्वेत वस्त्र धारण किये हुए थे। मेरे परिदर्शक के अनुसार श्वेत वस्त्र धारण की यहाँ अनिवार्यता नहीं है। यह स्थानीय दर्शनार्थियों का निजी चयन है। संभवतः किसी कारणवश आरम्भ हुई इस परिपाटी का दर्शनार्थी अब भी पालन कर रहे हैं।

“श्रीलंका में स्तूप, दगबा नाम से जाना जाता है”

रुवन्वेली दगबा की गज मुख दीवार - अनुराधापुरा, श्री लंका
रुवन्वेली दगबा की गज मुख दीवार – अनुराधापुरा, श्री लंका

श्वेत बादलों से घिरा श्वेत दगबा ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो साक्षात् बादलों से अवतरित हुआ हो। इसकी बाहरी भित्तियों पर असंख्य गजशीषों की प्रतिमाएं थीं। इस नवीन संरचना के भीतर इसी तरह की प्राचीन भंगित भित्तियाँ अब भी स्तूप के आसपास विद्यमान हैं। मैंने इस स्तूप के चारों ओर कुछ क्षण भ्रमण किया। भक्तिभाव से ओतप्रोत वातावरण में, श्वेत वस्त्र धारण किये एवं धूप व पुष्प हाथों में लिए भक्तगणों को देखने का आनंद सर्वोपरि था। कुछ भक्तगण स्तूप के समक्ष ध्यानमग्न विराजित थे।

महाराज दत्त गामिनी द्वारा २ सदी ई.पू. में निर्मित, थेरवडा या हीनयान बौद्धधर्म के इस पवित्र स्थल के अन्य नाम हैं, महास्तूपा, स्वर्णमाली चैत्य, सुवर्णमाली महासती, रत्नमाली दगबा इत्यादि।

कार्तिकेय, विष्णु एवं अन्य प्रतिमाएं

श्री लंका के बौद्ध मंदिरों में भगवान् विष्णु एवं कार्तिकेय
श्री लंका के बौद्ध मंदिरों में भगवान् विष्णु एवं कार्तिकेय

प्रथम प्रतिमा जिसने मेरा ध्यान आकर्षित किया वह थी, महाराज की, कृतज्ञता में हाथ जोड़े, स्तूप के दर्शन करती आदमकद प्रतिमा। चार दिशाओं में चार व्रत्तखण्डों के नीचे स्थित प्रकोष्ठों के भीतर बुद्ध के चित्र अंकित थे। समीप स्थित एक छोटे मंदिर के भीतर बुद्ध का रंगीन विशाल चित्र महापरिनिर्वाण रूप में पूजा जा रहा था। एक अनोखी बात जो यहाँ एवं अन्य कई स्थानों में परिलक्षित हुई, वह थी, बुद्ध के चित्र के दोनों ओर स्थित हिन्दू देवता विष्णु एवं कार्तिकेय के चित्र। भावी बुद्ध मैत्रेय के साथ साथ, बुद्ध की कई प्राचीन पत्थर की प्रतिकृतियों को भी अत्यंत सहेज कर रखा गया था। कहा जाता है कि इस श्वेत स्तूप के शीर्ष पर प्राचीनकाल में एक बड़ा माणिक्य लगा हुआ था।

रुवन्वेली दगबा - अनुराधापुरा, श्री लंका
रुवन्वेली दगबा – अनुराधापुरा, श्री लंका

स्तूप के चारों ओर भ्रमण करते स्थानीय दर्शनार्थी पुष्प, दूध व धूपबत्तियों के अलावा कई जड़ीबूटियाँ भी रुवन्वेली दगबा में अर्पित कर रहे थे।

यहाँ मेरा ध्यान एक चित्रकथा ने खींचा जिसमें इस विशाल स्तूप के निर्माण का दृश्य दर्शाया गया था। तत्कालीन महाराज द्वारा इस स्तूपनिर्माण में दिया गया श्रमदान भी इसमें स्पष्टता से दर्शाया गया था।

श्रीमहाबोधि वृक्ष – अनुराधापुरा

श्री महाबोधि वृक्ष - अनुराधापुरा, श्री लंका
श्री महाबोधि वृक्ष – अनुराधापुरा, श्री लंका

अनुराधापुरा के विशाल पीपल के वृक्ष को देख अनायास मुख से ‘बोधिवृक्ष’ शब्द फूट पड़े। उसे सुन मेरे परिदर्शक ने अत्यंत श्रद्धा से इसे ‘श्री महाबोधि’ कह संबोधित किया। उसके ये उद्गार श्रीलंका में इस वृक्ष की महत्ता के द्योतक हैं। जैसे कि हमें ज्ञात है, सम्राट अशोक की पुत्री, बौद्ध भिक्षुणी संघमित्रा ने बोध गया, बिहार के मूल बोधि वृक्ष की एक शाखा को श्रीलंका में रोपित किया था, जो आज भी यहाँ विकसित हो रहा है। २४५ई.पू. में रोपित बोधिवृक्ष की शाखा से उत्पन्न इस वृक्ष को मूलतः ‘जय श्री महाबोधि’ कहा गया। हालांकि बिहार के बोध गया में स्थित मूल बोधिवृक्ष वर्तमान में नष्ट हो चुका है, परन्तु उसका वंशज श्रीलंका के अनुराधापुरा में आज भी जीवित है। बोध गया स्थित नवीन बोधिवृक्ष को, अनुराधापुरा के इस महाबोधिवृक्ष की शाखा द्वारा पुनर्जीवित किया गया है। इसका अर्थ है कि वृक्ष विकसित करने की यह कला उस काल में भी ज्ञात थी। मेरे परिदर्शक के अनुसार वृक्ष स्थानान्तरण में इसी कला का उपयोग किया जाता था।

“अनुराधापुरा का ‘जय श्री बोधि वृक्ष’ ऐतिहासिक दृष्टी से विश्व का प्राचीनतम प्रमाणित वृक्ष है।”

पवित्र स्थल

श्री महाबोधि वृक्ष का वो हिस्सा जो बोध गया से आया था - अनुराधापुरा
श्री महाबोधि वृक्ष का वो हिस्सा जो बोध गया से आया था

श्रीलंका का सर्वाधिक पवित्र स्थल माने जाने के कारण महाबोधि वृक्ष के रक्षण की भरपूर व्यवस्था की गयी है। इसके चारों ओर खड़ी की गयी दीवार से केवल इसका ऊपरी भाग दृष्टिगोचर है। मुझे बताया गया कि वनस्पति वैज्ञानिक दिन में दो बार इसके स्वास्थ्य की जांच पड़ताल करते हैं। भारत से लायी गयी वृक्ष की मूल शाखा को सुनहरे फलकों द्वारा सुरक्षित किया गया है। मंच, जिस पर यह बोधिवृक्ष स्थापित है, उसे सुनहरे बाड़ द्वारा घेरा गया है। बोधिवृक्ष के तले एवं अनुराधापुरा के अन्य स्थलों की धरती रेतीली होने के बावजूद वृक्ष यहाँ फलफूल रहे हैं।

महाबोधि वृक्ष के दर्शन हेतु हम उत्कीर्णित पाषाणी सीड़ियों द्वारा इसके प्रांगण के भीतर पहुंचे। सीड़ियों के दोनों ओर विस्तृत चंद्रकांत एवं नागराज रक्षक प्रतिमाएं स्थापित थीं। पुष्प विक्रेता रंगबिरंगे कमलों की विक्री कर रहे थे। कलियों की पंखुड़ियों को कलात्मकता से खोलकर उन्हें पुष्प का आकार प्रदान करते देखना मेरे लिए बहुत रोचक था।

महाबोधि वृक्ष के समीप स्थित महाविहार संग्रहालय अत्यंत औपनिवेशिक प्रतीत हो रहा था। हालांकि बंद होने के कारण हम इसके संग्रह का अवलोकन नहीं कर सके।

लोह प्रसादय अथवा लोवमहापाय

लोहा प्रासाद - अनुराधापुरा
लोहा प्रासाद – अनुराधापुरा

अनुराधापुरा में महाबोधि एवं रुवन्वेली सेया के मध्य स्थित, लोवमहापाय एक प्राचीन महल है। तांबे की छत के कारण इसे तांबे का महल या लोह प्रसादय भी कहते हैं। साहित्यों के अनुसार ९ मंजिलों एवं १६०० स्तंभों के इस भवन निर्माण में ६ वर्षों का समय व्यतीत हुआ. परन्तु १५ वर्ष उपरांत एक भीषण अग्नि में यह पूर्णतः स्वाहा हो गया। वर्तमान में मूल संरचना के केवल १६०० स्तंभों के अवशेष ही शेष हैं। महल के स्थान पर अब एक छोटी इमारत का निर्माण किया गया है।

कहा जाता है कि बोधिवृक्ष की देखरेख करने हेतु लगभग १०० भिक्षु लोवमहापाय में निवास करते थे। कदाचित स्वयं के रक्षण में सक्षम इस बोधिवृक्ष को उनकी देखरेख की आवश्यकता नहीं थी।

पुरातत्व संग्रहालय

अनुराधापुरा का पुरातत्व संग्रहालय अथवा पुराविदु भवन, श्रीलंका के कई पुरातत्व संग्रहालयों में से एक है। यह लोह प्रसादय एवं रुवन्वेली सेया के बीच, कचहरी इमारत के भीतर स्थित है। इस संग्रहालय के भीतर श्रीलंका के प्राचीन स्थलों की खुदाई के समय प्राप्त हुए प्राचीन कलाकृतियों को प्रदर्शित किया गया है। यहाँ प्रदर्शित बुद्ध प्रतिमाएं, अभिलेख, चित्रकलाएं, कठपुतलियाँ, सिक्के, आभूषण तथा अन्य कई वस्तुएं प्राचीन अनुराधापुरा से आपका परिचय कराते हैं।

जेतवनरम्या दगबा

विशाल जेतवनरम्या दगबा - अनुराधापुरा
विशाल जेतवनरम्या दगबा – अनुराधापुरा

३री. शताब्दी में निर्मित यह अतिविशाल स्तूप, मिश्र के पिरामिडों के पश्चात, दूसरी सर्वाधिक विशाल संरचना थी। पुरातत्व संग्रहालय में इसके पुनरुद्धार के पूर्व एवं पश्चात के चित्र प्रदर्शित हैं।

इस स्तूप के समीप, दगबा से अपेक्षाकृत छोटा, तथापि विशाल मंदिर है। इसके भीतर महापरिनिर्वाण मुद्रा में भगवान् बुद्ध का चित्र है। श्रीलंका के अन्य मंदिरों की भांति यहाँ भी बुद्ध के रंगीन चित्र में पीले व लाल रंगों की प्रधानता है। स्तूप की परिक्रमा के समय मैंने नाग की प्रतिकृतियाँ देखी जो अभी भी पूजी जाती हैं। दो विशाल पाषाणी अभिलेख इस स्तूप की कथा कह रहे थे।

मूर्ति घर के नीचे यंत्रगल - अनुराधापुरा
मूर्ति घर के नीचे यंत्रगल

इस अतिविशाल स्तूप के सानिध्य में मैं स्वयं को तुच्छ अनुभव कर रही थी। इसकी विशालता मेरे अहम् को यह आभास करा रही थी कि मैं इस विशाल ब्रम्हाण्ड का एक नगण्य अंश हूँ।

दगबा के समक्ष एक मूर्ति गृह के अवशेष थे। इसके मध्यवर्ती कक्ष के भीतर एक गोलाकार मंच के ऊपर चौकोर यंत्रगल्ल था जिस के ऊपर किसी काल में बुद्ध की प्रतिमा स्थित थी।

कुट्टम पोकुना

कुत्तम पोकुना - अनुराधापुरा के जुड़वाँ जल कुंड
कुत्तम पोकुना – अनुराधापुरा के जुड़वाँ जल कुंड

कोट्टम पोकुना अर्थात् जुड़वे कुंड, पत्थर से बने दो कुंड हैं। आस पास  स्थित ये सुन्दर कुंड, भारत के कुछ राज्यों में स्थित बावडियों की तरह, परन्तु अपेक्षाकृत छोटे हैं। इसकी एक दीवार पर नाग की सुन्दर आकृति की नक्काशी की गयी है। दो कुंडों के औचित्य के सम्बन्ध में मैं अनुमान लगाने लगी कि यह संभवतः ऊष्ण एवं शीतल जल अथवा स्त्री एवं पुरुष हेतु बनाए गए हों।

ये कुंड अनुराधापुरा के जल प्रबंधन प्रक्रिया का भाग हैं। कुंड के समीप कई जल निथारन कोष्ठ हैं जो अनुराधापुरा के जल आपूर्ति नहर से जल प्राप्त कर, उसका क्रमशः निथारन कर, इन कुंडों को भूमिगत नालियों द्वारा जल प्रदान करते थे। इन कुंडों को देख मुझे मुंबई के कान्हेरी गुफाओं में स्थित जल संग्रह एवं वितरण प्रणाली का स्मरण हो आया।

कोलम्बो के राष्ट्रीय संग्रहालय से इन कुंडों के सम्बन्ध में जानकारी हासिल करने के पश्चात मुझे इनके दर्शन करने की बहुत उत्सुकता थी। परन्तु दूषित, मटमैले जल एवं प्लास्टिक की फेंकी हुई बोतलों से भरे इन कुंडों को देख मन खिन्न हो गया।

समाधिस्थ बुद्ध

समाधी बुद्धा - अनुराधापुरा
समाधी बुद्धा – अनुराधापुरा

समाधि अर्थात् ध्यान की उच्चावस्था जहां साधक ध्येय के ध्यान में इतना तल्लीन हो जाता है कि उसे अपने अस्तित्व का भी भान नहीं रहता। बुद्ध की अधिकतर प्रतिमाओं में उन्हें इसी ध्यान मुद्रा में प्रतिबिंबित किया जाता है।

बुद्ध की इस ध्यानमग्न प्रतिमा की एक और विशेषता यह है कि तीन विभिन्न दिशाओं से देखने पर उनके तीन भिन्न भिन्न भाव परिलक्षित होते हैं। वह हैं शांति, आनंद एवं दया भाव।

अभयगिरी विहार

अभाय्गिरी स्तूप - अनुराधापुरा, श्री लंका
अभाय्गिरी स्तूप – अनुराधापुरा , श्री लंका

जेतवनरम्या की तरह ईंटों द्वारा बना यह स्तूप भी अनुराधापुरा के विशालतम स्तूपों में से एक है। मूलतः जैन विहार होते हुए भी यह ५००० भिक्षुओं के रहने लायक, बोद्ध धर्म के विशालतम मठ के रूप में जाना जाता है। यह वही विहार है जहां के भिक्षुओं ने सर्वप्रथम बुद्ध के पवित्र दन्त को श्रीलंका में स्वीकार किया था।

इस स्तूप की परिक्रमा करते समय हमें छत्र धारण किये बुद्ध की एक सुन्दर प्रतिमा के भी दर्शन हुए। भारत के कई पाषाणी मंदिरों की भान्ति यहाँ भी पत्थरों पर शतरंज के मंच की नक्काशी की गयी है।

थुपरामा एवं मिरिस्वेती स्तूप

थुपरामा दाग्बा - अनुराधापुरा
थुपरामा दाग्बा – अनुराधापुरा

श्वेत, स्वच्छ व सुन्दर रखरखाव के ये दोनों स्तूपों के चारों ओर ऊंचे पाषाणी स्तंभ खड़े हैं। इनको देख इनकी प्राचीन भव्यता का अनुमान लगाया जा सकता है। किसी काल में छत्र के नीचे स्थित ये स्तूप अब भी बहुत आकर्षक प्रतीत होते हैं।

यूं तो अनुराधापुरा कई छोटे बड़े स्तूपों से भरा हुआ है। इनके दर्शन करते आप थक जायेंगे परन्तु स्तूपों की कतार समाप्त नहीं होगी।

अनुराधापुरा नगर का भ्रमण

चंद्रकार का प्रवेश पाषाण - श्री लंका का पुरातन चिन्ह
चंद्रकार का प्रवेश पाषाण – श्री लंका का पुरातन चिन्ह

अनुराधापुरा नगर के भ्रमण के समय आपको कई विहारों व निवासस्थानों के अवशेष दृष्टिगोचर होंगे। अधिकतर प्राचीन संरचनाएं केवल पत्थर एवं ईंटों के आधार व स्तंभों के रूप में ही शेष हैं। ये इतनी भंगित अवस्था में है कि इन्हें इनके मूल स्वरुप में कल्पना करना आसान नहीं। इन्हें देख सहसा विश्वास नहीं होता कि किसी समय यहाँ हजारों की संख्या में बोद्ध भिक्षु निवास करते थे। और वे यहाँ अध्ययन, मंत्रोच्चारण एवं प्रार्थना करते थे। तथापि इन अवशेषों द्वारा इनकी मूल विशालता का अनुमान अवश्य लगाया सकता है।

रक्षक प्रतिमा - नाग के फन लिए हुए
रक्षक प्रतिमा – नाग के फन लिए हुए

हर ओर दृष्टिगोचर चन्द्रकान्त एवं रक्षक प्रतिमाएं इस नगर को एक अदृश्य डोर से बांधती प्रतीत होती हैं।

अनुराधापुरा में स्थित कई छोटे बड़े संग्रहालय हैं। यहां खुदाई के समय प्राप्त प्रतिमाओं के अवशेष प्रदर्शित हैं। भरपूर अभिलेखों से परिपूर्ण इन संग्रहालयों को आप एक ही टिकट द्वारा देख सकते हैं।

इसुरुमुनिया पाषाणी मंदिर

इसुरुमुनिया पाषाणी मंदिर
इसुरुमुनिया पाषाणी मंदिर

अनुराधापुरा के सीमान्त पर स्थित इस मंदिर के भीतर कमलों से भरे दो सुन्दर ताल हमारा भव्य स्वागत कर रहे थे। भीतर एक सुन्दर कुंड के मध्य सपाट धरती को चीरते दो विशाल शिलाखंड थे। इस कुंड के चारों ओर आकर्षक बगीचा बनाया गया था।

एक शिलाखंड के ऊपर मंदिर स्थित था। हम दूसरी शिलाखंड पर सीड़ियों व एक पुलिया के सहारे चढ़े। यहाँ से श्रीलंका का विहंगम दृश्य दिखाई पड़ रहा था। पहाड़ियों की पृष्ठ भूमि में हरेभरे लहलहाते खेत बहुत आकर्षक दिखाई पड़ रहे थे। ऊपर से समीप स्थित कमलकुंड व बगीचा भी अप्रतिम प्रतीत हो रहा था।

गज अंकित पाशान - इसुरुमुनिया
गज अंकित पाशान – इसुरुमुनिया

इसुरुमुनिया की सबसे प्रसिद्ध प्रतिमाएं हैं एक युगल जोड़े की एवं ताल के समीप स्थित शिलाखंड के ऊपर बनायी गयी गज की प्रतिमा।

अनायास ही मेरी दृष्टी समीप ही कुछ कन्याओं पर पड़ी। वे लकड़ी के खपचियों से दोनों शिलाखंडों को जोड़ने का प्रयास कर रही थीं। काल्पनिक ही सही, किन्तु अपने प्रयास पर हुई उनकी ख़ुशी उनके चेहरे पर स्पष्ट विदित थी। उन्हें देख मुझे अपना बचपन स्मरण हो आया।

मिहिन्ताले –श्रीलंका में बौद्ध धर्म का आरंभिक स्थल

मिहिंताले की चोटी पे ले जाती सीढियां
मिहिंताले की चोटी पे ले जाती सीढियां

अपनी यात्रा के अगले पड़ाव के तहत मैं अनुराधापुरा से ११कि.मी. दूर स्थित एक पहाड़ी के पास पहुंची। ऐतिहासिक दृष्टी से महत्वपूर्ण यह पहाड़ी है, मिहिन्ताले। संघमित्रा एवं भ्राता महिंद्रा ने यहीं सर्वप्रथम श्रीलंका के तत्कालीन राजा से भेंट की थी। २४७ ई.पू. में हुई यह भेंट, श्रीलंका में बौद्ध धर्म के आरम्भ हेतु मील का पत्थर सिद्ध हुई।

निहित स्थल तक पहुँचने हेतु पहाड़ी चढ़ने की आवश्यकता थी। पहाड़ी काटकर बनायी गयी सीडियां यूँ तो बहुत आसान थीं। परन्तु भरी दुपहरी में किये गए मेरे इस प्रयास ने मुझे बहुत थका दिया था।

अनुराधापुरा की मेरी यह यात्रा मेरे लिए विशेष है। जिस दिन मैंने अनुराधापुरा में प्रवेश किया था, वह था जून के पूर्णिमा का दिन। कई सदियों पूर्व इसी पूर्णिमा के दिन महेंद्र ने भी अनुराधापुरा की धरती पर कदम रखा था। मुझे इश्वर का संकेत मिला। और मैं पहाड़ी चढ़ गयी। यहाँ से अनुराधापुरा का विहंगम दृश्य बहुत सुन्दर था। सूर्योदय एवं सूर्यास्त दर्शन हेतु यह उपयुक्त स्थल है। तथापि, अधिक श्रद्धा ना हो तो इस स्थल के दर्शन को टाला जा सकता है।

अनुराधापुरा का संक्षिप्त इतिहास

अनुराधापुरा के मंदिरों में बौद्ध प्रतिमाएं
अनुराधापुरा के मंदिरों में बौद्ध प्रतिमाएं

श्रीलंका के प्राचीनतम साहित्य महावंश के अनुसार, अनुराधापुरा को ५वी. सदी ई.पू. में श्रीलंका की पहली राजधानी घोषित किया गया था। तथापि पुरातात्विक साहित्यों ने अनुराधापुरा को १०वी. सदी ई.पू. का नगर प्रमाणित किया है। इसकी संकल्पना एवं संरचना राजा पांडुकाभया ने की थी। ३री. सदी ई.पू. में राजा देवंपिया तिस्सा के शासनकाल में इसकी समृद्धि में दिन दुगुनी रात चौगुनी वृद्धि हुई। इसी समय श्रीलंका में बौद्ध धर्म ने पदार्पण किया था।

राजा तिस्सा ने बहुत बारीकी से इस नगर की संकल्पना की थी। उन्होंने कृषि हेतु कई नहरों व तालाबों का तंत्र बनाया था। इनमें से कुछ अब भी उपयोग में लाये जा रहे हैं।

अनुराधापुरा पर कालान्तर में कई आक्रमण हुए। फिर भी ११ई. तक यह नगर प्रगति के पथ पर आगे बढ़ता रहा। तत्पश्चात पोलोनरुवा को श्रीलंका की राजधानी बनाया गया। पोलोनरुवा की कहानी मैं शीघ्र ही आपके समक्ष प्रस्तुत करुँगी।

अनुराधापुरा कई सदियों तक अदृष्ट पड़ा रहा। परन्तु सिंहलियों के मानसपटल में इसकी स्मृति धुंधली नहीं हुई। सन १९वी. शताब्दी में अंग्रेजों द्वारा की गयी खुदाई के समय लुप्त अनुराधापुरा सिंहलियों एवं सम्पूर्ण विश्व को पुनः प्राप्त हुई।

अनुराधापुरा यात्रा हेतु कुछ सुझाव

जेत्वराम्या स्तूप - अनुराधापुरा
जेत्वराम्या स्तूप – अनुराधापुरा

• पवित्र नगर अनुराधापुरा, यूनेस्को द्वारा, घोषित वैश्विक विरासती स्थल है। श्रीलंका निवासियों हेतु दर्शन शुल्क नहीं है। अन्य दर्शनार्थियों हेतु प्रवेश शुल्क २५ डॉलर है।
• संग्रहालय दर्शन हेतु समय सीमित है। अन्य सभी स्थलों के दर्शन किसी भी समय किये जा सके हैं।
• प्राचीन अनुराधापुरा में रहने योग्य कोई स्थल उपलब्ध नहीं है। तथापि नवीन अनुराधापुरा में रहने हेतु अनेक सुविधाएं उपलब्ध हैं। मैंने अपने रहने की व्यवस्था अनुराधापुरा से लगभग १ घंटे की दूरी पर स्थित हाबरना में की थी।
• यहाँ भोजन की विशेष व्यवस्था ना होते हुए, केवल कुछ जलपान, चाय एवं नारियल पानी उपलब्ध है।
• स्मारिका विक्री हेतु कई दुकानें हैं परन्तु मुझे इस स्थल से सम्बंधित कोई विशेष वस्तु प्राप्त नहीं हुई। अधिकतर दुकानों में वही वस्तुएं उपलब्ध थीं जो देश के किसी भी पर्यटन स्थल पर बेची जाती हैं।
• अनुराधापुरा भ्रमण हेतु साईकल सर्वोत्तम साधन है।
• संग्रहालय को छोड़, अन्य सभी स्थलों पर चित्रीकरण की अनुमति है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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वैशाली की पहली छवि जो मेरे मन में बनी थी वह आचार्य चतुरसेन के उपन्यास ‘वैशाली की नगरवधू’ द्वारा थी। इसमें वर्णित विलासिता और पात्र, जिनके बारे में आपने शायद सुना तो होगा लेकिन जिनके बारे में आप ज्यादा नहीं जानते, आपको इस जगह की ओर खींच लाते हैं। ऐसे में इस जगह के बारे […]

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वैशाली की पहली छवि जो मेरे मन में बनी थी वह आचार्य चतुरसेन के उपन्यास ‘वैशाली की नगरवधू’ द्वारा थी। इसमें वर्णित विलासिता और पात्र, जिनके बारे में आपने शायद सुना तो होगा लेकिन जिनके बारे में आप ज्यादा नहीं जानते, आपको इस जगह की ओर खींच लाते हैं। ऐसे में इस जगह के बारे में और जानने की उत्सुकता इसे और भी रोचक और आकर्षक बनाती है। इतिहास ज्ञानी भी इस जगह के प्रति गहरी रूचि रखते हैं।

वैशाली के आस पास के गाँव
वैशाली के आस पास के गाँव

इन सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि, वैशाली भगवान महावीर का जन्मस्थान है। अतः इसे जैन धर्म का जन्मस्थान भी माना जाता है। इन सभी बातों को मद्दे नज़र रखते हुए मेरे लिए बिहार में स्थित इस जगह को देखना जरूरी हो गया। लेकिन आज अगर इस जगह को देखा जाय तो लगता है जैसे वह अपने गौरवपूर्ण अतीत को काफी पीछे छोड़ चुकी है। वैशाली की यात्रा करके और उससे संबंधित कुछ अनभिज्ञ, नवीन और रोचकपूर्ण बातों को जानकर मैं बहुत प्रसन्न हुई। यद्यपि लोग वैशाली को बुद्ध और महावीर से जोड़ते हैं, लेकिन मेरे लिए तो वैशाली हमेशा आम्रपाली का नगर ही रहेगा।

वैशाली पटना से एक घंटे की दूरी पर बसा हुआ है। पटना से वैशाली जाते समय रास्ते में आपको वहां के ग्रामीण जीवन की झलकियाँ देखने को मिलती हैं। हमे वहां पर बहुत सी बालिकाएँ अपनी रंगबिरंगी साइकिलों पर जाते हुए दिखी। उन में से कुछ लड़कियों से हमने दो-चार बातें भी की। उनकी बातों से उनका आत्मविश्वास और उनकी प्रसन्नता साफ झलक रही थी।

वैशाली के रास्ते पे घर बहुत ही साफ-सुथरे थे और प्रत्येक घर के बाहर चारे की गोलाकार गठरियाँ बनाकर रखी गयी थीं। वह समय ही कुछ ऐसा था कि, लग रहा था जैसे हम सरसों के पीले-पीले खेतों और दूर तक फैले खुले मैदानों से गुजर रहे हो। इस भाग में अभी तक प्रगति ने पदार्पण नही किया था, यानी भवनों का निर्माण अब तक यहां पर एक अन्यदेशीय बात थी। यही कारण है कि दूर क्षितिज तक जहां भी आपकी नज़रें जाती हैं, वहां तक आपको सिर्फ खुला आसमान और दूर तक फैली धरती नज़र आती है। इसी दौरान हमे उस क्षेत्र के विधायक को भी देखने का मौका मिला जो अपने चमचमाते सफ़ेद कपड़ों में गाँव-गाँव घूमकर लोगों से मिलते, उनसे बातें करते और उन्हें आश्वासनों से भरे भाषण सुनाते थे।

बिहार में वैशाली की यात्रा 

बुद्ध का प्रथम स्तूप - वैशाली
बुद्ध का प्रथम स्तूप – वैशाली

हमने वैशाली की यात्रा का आरंभ पुराने बुद्ध अवशेष स्तूप के दर्शन के साथ किया। बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनके अवशेषों को संबंधित आठ हकदारों में समान रूप से वितरित किया गया था। जिन में से एक थे वैशाली के लिच्छवी। इन अवशेषों के लिए लिच्छवियों ने वैशाली में एक स्तूप का निर्माण किया था। लेकिन बाद में इन अवशेषों को उत्खनन द्वारा इस स्तूप से निकाल कर पटना संग्रहालय में रखा गया था। यह बुद्ध अवशेष स्तूप वास्तव में एक छोटा सा मिट्टी का स्तूप हुआ करता था, जिसका बाद में मौर्य, शुंग और कुषाण शासन काल के दौरान विस्तार किया गया था।

बुद्ध के अवशेष पत्थर की सन्दुक में पाये गए थे, जिस में उनकी अस्थियों की राख, एक छोटा सा शंख, काँच के दो मणि, एक स्वर्ण पत्ता और तांबे का एक सिक्का था।

वैशाली में एक नया विश्व शांति स्तूप बनवाया गया है, जो राजगीर के विश्व शांति स्तूप जैसा ही है। पर समय के अभाव के कारण हम यह स्तूप नहीं देख पाये।

पुरातन वैशाली शहर का कोल्हुआ भाग  

कोल्हुआ पुरातन वैशाली शहर का एक भाग है, जो बुद्ध से जुड़ा हुआ है। यही वह जगह है जहां पर बंदरों ने बुद्ध को शहद अर्पित किया था और इस प्रकार वे बुद्ध की कथा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए थे। यहां पर स्थापित बुद्ध स्तूप दरअसल इसी घटना की स्मृति में बनवाया गया था। बुद्ध अवशेष स्तूप की तरह यह स्तूप भी पहले बहुत छोटा था, जिसे बाद में इस क्षेत्र पर शासन करनेवाले विविध राजवंशों द्वारा बढ़ाया गया। कहा जाता है कि बुद्ध ने यहां पर बहुत से वर्षाऋतु बिताए थे।

दो महत्वपूर्ण बातें जो वैशाली में घटित हुई वह थी महिलाओं को संघ में शामिल करना और यहां की तपस्विनियों के लिए मठ का निर्माण करना, जो कि तपस्विनियों के लिए बनाया गया सबसे पहला मठ था। तथा उन्होंने प्रख्यात आम्रपाली को एक बौद्ध तपस्विनी में परिवर्तित कर उसे संघ में शामिल किया था। इस स्तूप के पीछे एक अशोक स्तंभ खड़ा है जिसके ऊपर सिंह चतुर्मुख का चिह्न बना हुआ है।

अशोक स्तंभ  

अशोक स्तम्भ वैशाली
अशोक स्तम्भ वैशाली

आज तक जितने भी अशोक स्तंभ मैंने देखे हैं, उन सब में से वैशाली में स्थित अशोक स्तंभ शायद सबसे अच्छे तरीके से संरक्षित किया गया है। यद्यपि इस स्तंभ की प्रसिद्ध चमक अब फीकी पड़ गयी है। इस स्तंभ पर किसी भी प्रकार के कोई अभिलेख नहीं हैं, लेकिन इस स्तंभ के ऊपर सिंह चतुर्मुख का चिह्न बड़ी शान से सजाया हुआ है। इसके अलावा अन्य अशोक स्तंभों पर पायी जानेवाली सभी विशेषताएँ इस स्तंभ पर भी देखी जा सकती हैं, जैसे कि उल्टा कमल। यहां पर स्वास्तिक के आकार का एक मठ है जो हाल ही में उत्खनन द्वारा खोजा गया है और इससे जुड़े कुछ जलकुंडों की भी खोज की गयी है। यहां का परिसर अन्य किसी भी बौद्ध क्षेत्र के परिसर जैसा ही है, जहां पर मन्नत के हजारों स्तूप और हर जगह पर छोटे-छोटे मंदिर स्थित हैं।

वैशाली में उत्खनन के क्षेत्र, बिहार 

वैशाली के एक भाग में आज भी उत्खनन का काम जारी है और हर रोज़ यहां पर नयी-नयी बातों की खोज होती रहती है। इस परिसर से कीमती पत्थर, मणि, मुहर, मृण्मूर्तियाँ आदि, जैसी अनेक वस्तुएं पायी गयी हैं, तथा यहां पर एक मुकुट जड़ित बंदर भी पाया गया है। इस जगह से जुड़े उपाख्यानों में बंदर अपना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इन बंदरों ने ना सिर्फ बुद्ध को शहद अर्पित किया था बल्कि उनके लिए एक बड़ा सा सप्त-स्तरीय जलकुंड भी खोदा था। नालंदा की तरह इन अवशेषों में भी हमे कुछ उत्कीर्णित ईंट देखने को मिले जो यहां-वहां से बाहर झांक रहे थे।

वैशाली – भगवान महावीर का जन्मस्थान 

भगवान् महावीर का जन्म स्थल
भगवान् महावीर का जन्म स्थल

वैशाली जैन धर्म के प्रतिष्ठापक भगवान महावीर का जन्मस्थान है। लेकिन दुर्भाग्य से उनका जन्मस्थान एक छोटी सी जगह में सीमित है, जहां पर लगा हुआ सूचना फ़लक आपको बताता है कि, यही वह जगह है जहां पर भगवान महावीर का जन्म हुआ था। इसी के पीछे एक अध-निर्मित संरचना है जो कि मंदिर के उद्दिष्ट से बनवाई गयी थी। स्थानीय लोगों से हमे पता चला कि यह संरचना किन्हीं कारणों से विवादों का विषय बनी हुई है, जिसकी वजह से इसके निर्माण को स्थगित रखा गया है और काफी समय से वह इसी अवस्था में है। इसके विपरीत अन्य जगहों पर पाए जाने वाले जैन मंदिर बहुत ही संपन्न और सुंदर हैं। लगता है कि इस जगह को सच में पूरी तरह से अनदेखा किया जा रहा है। इसके अलावा वैशाली में जैन शास्त्र पर संशोधन करने हेतु एक संस्थान है, जिसमें एक पुराना लेकिन बहुत ही सुंदर पुस्तकालय है।

राजा विशाल का गढ़, वैशाली 

राजा विशाल का गढ़ वैशाली का प्राचीनतम भाग है। माना जाता है कि यह महाकाव्यों के काल से जुड़े, विशाल नाम के राजा का गढ़ हुआ करता था। मुझे लगता है कि इस जगह को शायद उन्ही का नाम दिया गया होगा। कहा जाता है कि यह गढ़ उस समय राजा विशाल का महल हुआ करता था। मैं अभी तक किसी इमारत की नींव को देखकर उसकी निर्माण योजना को समझने की कला नहीं सीख पायी हूँ, इसलिए इस जगह के बारे में मैं ज्यादा कुछ नहीं जान पायी। लेकिन वहां पर लगा हुआ सूचना फ़लक आपको उस जगह से संबंधित विस्तृत जानकारी देता है। इस सूचना फ़लक के अनुसार यहां पर विविध ऐतिहासिक कालों से जुड़ी प्राचीन वस्तुएं पायी गयी हैं, जिन में से अधिकतर वस्तुओं को अब संग्रहालय में रखा गया है।

खुदाई से प्राप्त चतुर्मुखीलिंग  

वैशाली में पाया गया प्राचीन चतुर्मुख लिंग
वैशाली में पाया गया प्राचीन चतुर्मुख लिंग

हाल ही में खुदाई के दौरान यहां पर एक चतुर्मुखीलिंग की खोज हुई है। चतुर्मुखीलिंग का अर्थ है चार मुख वाला लिंग जिसके चारों मुख चारों दिशाओं की ओर मुंह किए हुए हैं। इस पर बने हुए मुख ब्रह्मा, विष्णु, शिव और सूर्य के हैं। इस लिंग के निचले भाग पर कुछ अभिलेख हैं, जो उसे गुप्त काल से जोड़ते हैं। इस चतुर्मुखीलिंग को शहर में स्थापित कर वहां पर एक मंदिर का निर्माण किया जा रहा है। जब हम वहां पर गए थे उस समय वहां पर महिलाओं का एक समुह कीर्तन कर रहा था। इसके अलावा यहां पर और भी कई पुरातन मूर्तियाँ हैं, जो बावन पोखर मंदिर में देखी जा सकती हैं। यद्यपि इन मूर्तियों को मंदिर के प्रमुख भाग में नहीं रखा गया है।

बावन पोखर मंफिर में प्राचीन प्रतिमाएं
बावन पोखर मंफिर में प्राचीन प्रतिमाएं

मान्यताओं के अनुसार जो जलकुंड आम्रपाली के प्रासाद से जुड़ा हुआ करता था वह आज भी यहां पर मौजूद है। यहां के स्थानीय लोगों ने हमे बताया कि इस कुंड की एक खासियत है कि, इसमें कभी जंगली घास नहीं उगती। वैसे तो इस कुंड के आस-पास बहुत सी जंगली झाड़ियाँ हैं लेकिन कुंड के भीतर किसी भी प्रकार की घास-पुस नहीं उगती। दुर्भाग्यवश हम वैशाली का संग्रहालय नहीं देख पाये, जहां वैशाली में स्थित अनेक स्थानों से प्राप्त पुरातन वस्तुएं रखी गयी हैं। भारत में स्थित अन्य संग्रहालय आमतौर पर सोमवार के दिन बंद रहते हैं लेकिन यह अकेला ऐसा संग्रहालय है जो शुक्रवार के दिन बंद रहता है।

मुझे वैशाली शहर सच में बहुत पसंद आया, जिसका अतीत अपने-आप में बहुत ही गौरवशाली है। इस जगह को गहराई से जानने और समझने के लिए आपको उसके इतिहास के बारे में पता होना बहुत आवश्यक है।

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राजगीर – बौद्ध परिषदों का मेजबान – बिहार के ऐतिहासिक स्थल https://inditales.com/hindi/rajgir-buddhist-council-city-bihar/ https://inditales.com/hindi/rajgir-buddhist-council-city-bihar/#comments Wed, 01 Nov 2017 02:30:45 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=457

राजगीर या राजगृह, जैसे कि यह जगह अपने अच्छे दिनों में जानी जाती थी, मगध महाजनपद की सबसे पहली राजधानी हुआ करती थी, जो बाद में गंगा नदी के किनारे बसे पाटलीपुत्र शहर में स्थानांतरित की गयी। आज यह एक छोटा सा नगर है जो पटना से दक्षिण-पूर्वी दिशा में 60 कि. मी. की दूरी […]

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विश्व शांति स्तूप - राजगीर, बिहार
विश्व शांति स्तूप – राजगीर, बिहार

राजगीर या राजगृह, जैसे कि यह जगह अपने अच्छे दिनों में जानी जाती थी, मगध महाजनपद की सबसे पहली राजधानी हुआ करती थी, जो बाद में गंगा नदी के किनारे बसे पाटलीपुत्र शहर में स्थानांतरित की गयी। आज यह एक छोटा सा नगर है जो पटना से दक्षिण-पूर्वी दिशा में 60 कि. मी. की दूरी पर बसा हुआ है। सात पहाड़ियों से घिरी यह जगह इन्हीं पहाड़ियों से घिरी घाटी में बसी हुई है। इसका शाब्दिक अर्थ है राजपरिवारों का निवासस्थान।

राजगीर – बिहार की ऐतिहासिक जगहें 

रंग बिरंगी बोद्ध पताकाएं - राजगीर, बिहार
रंग बिरंगी बोद्ध पताकाएं – राजगीर, बिहार

ऐतिहासिक दृष्टि से राजगीर जैनों, बौद्धों, हिंदुओं और इतिहास के विद्यार्थियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। कहा जाता है कि बुद्ध अनेक बार राजगीर की यात्रा कर चुके हैं। यहां पर आने का उनका प्रमुख उद्देश्य था बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार। यहीं वह जगह है जहां पर उन्होंने अपने महत्वपूर्ण उपदेशों को व्याख्यायित किया था। इन्हीं उपदेशों में से एक उपदेश ऐसा था जिसने यहां के पूर्व महाराज बिंबिसार को अन्य बहुत से लोगों के साथ बौद्ध धर्म में परिवर्तित होने के लिए मजबूर किया था।

माना जाता है कि भगवान महावीर ने भी राजगीर में 14 वर्षा ऋतु या चौमास बिताए थे। और यहीं पर उन्होंने अपना पहला उपदेश भी दिया था, यद्यपि उनके इस धर्मोपदेश को बुद्ध जितनी प्रसिद्धि नहीं मिल पायी। राजगीर में जैनों का एक श्वेतांबर और एक दिगंबर मंदिर भी है। इस शहर की जड़ें महाभारत तक फैली हुई हैं, जिसके अनुसार यह जरासंध की नगरी हुआ करती थी। कहते हैं कि इस शहर में आज भी जरासंध का अखाड़ा मौजूद है जहां पर पहलवान अपना अभ्यास करते हैं। लेकिन समय की कमी के कारण हमे यह अखाड़ा देखने का मौका नहीं मिला।

राजगीर वह जगह है, जहां पर सम्राट अशोक ने अपने प्रसिद्ध स्तंभ का निर्माण किया था, जिस पर हाथी का चिह्न बना हुआ है। यहां पर इस स्तंभ की मौजूदगी इसी बात की ओर संकेत करती है कि यह जगह सम्राट अशोक के शासनकाल में भी, यानी 2400 से भी अधिक साल पहले भी बहुत महत्वपूर्ण हुआ करती थी। कुछ लेखों के अनुसार सम्राट अशोक की मृत्यु यहीं राजगीर की किसी पहाड़ी के ऊपर हुई थी। यहां से शासन करने वाले मगध के अंतिम शासक बिंबिसार को उन्हीं के पुत्र अजातशत्रु द्वारा यहां की जेल में बंदी बनाकर रखा गया था, जिसने बाद में मगध की राजधानी को पाटलीपुत्र में स्थानांतरित किया। वह जेल आप आज भी वहां के दुर्ग की दीवारों के सहारे खड़ी देख सकते हैं।

विश्व शांति स्तूप, राजगीर 

किसी ज़माने का रोपवे - राजगीर, बिहार
किसी ज़माने का रोपवे – राजगीर, बिहार

आज विश्व शांति स्तूप राजगीर का सबसे प्रसिद्ध स्थल बन गया है, जो एक पहाड़ी के ऊपर बसा हुआ है। यहां पर पहुँचने का सिर्फ एक ही तरीका है और वह है रोपवे यानी रस्सी का मार्ग अर्थात इसी रस्सी के द्वारा आप उस स्तूप तक पहुँच सकते हैं। यह रोपवे बहुत साधारण सा है, जिसमें बैठने के लिए एक कुर्सी है जिसमें एक समय पर एक ही व्यक्ति बैठ सकता है। इस आसान को एक लोहे की रोड से ऊपर की मजबूत रस्सी से जोड़ा जाता है। जब आप इससे सवारी करते हैं तो आपको बार-बार अपने आसन से उछला और बैठना पड़ता है। आधे रास्ते तक पहुँचते-पहुँचते यह सवारी अचानक से थोड़ी डरावनी सी लगती है। रोपवे की यह सवारी लगभग 12 मिनटों की है। इसी बीच अगर अचानक से बिजली ने कुछ समय के लिए आराम करने का मन बना लिया तब तो आप इस छोटे से आसन पर, घाटी के ऊपर, बीच राह पर लटकते हुए अटके ही समझो। लेकिन अगर इन बातों को नज़रअंदाज़ किया गया तो यह सवारी बहुत ही मजेदार होती है।

विश्व शांति स्तूप एक विशाल स्तूप है जो धुँधले से सफ़ेद रंग का है और जिस पर बुद्ध की स्वर्णिम प्रतिमाएँ हैं, जो उनकी विविध मुद्राओं को दर्शाती हैं। यह स्तूप जापानी लोगों द्वारा बनवाया गया था। आज भी यहां पर एक जापानी साधु रहते हैं, जिन्हें फूजी बाबा के नाम से जाना जाता है, जो इस स्तूप और यहां के मंदिर की देखरेख करते हैं। हम बहुत भाग्यवान थे कि हमे बाबा द्वारा उनके घर पर जापानी चाय पीने के लिए आमंत्रित किया गया। उनका कक्ष उतना ही मनोहर था जितना कि वहां का स्तूप। यह कक्ष पहाड़ी की नैसर्गिक चट्टानों के सहारे बनवाया गया था, जो वहां पर मौजूद अन्य सभी वस्तुओं की तरह इस कक्ष का अविभाज्य हिस्सा थे। यहां पर खड़े होकर आप नीचे फैले पूरे राजगीर शहर और उसके आस-पास की जगहों का सुंदर नज़ारा देख सकते हैं।

इस जगह की बहुत ही अच्छे से देखरेख की जाती है। यहां पर आकर आप एक अलग ही प्रकार की खुशी और शांति महसूस करते हैं, जिसकी जरूरत आज हम सभी को है। यहां पर बहती हुई मंद-मंद हवा के साथ फहराते यहां पर लगे रगबिरंगी ध्वज इस जगह को और भी रंगीन और जीवंत बना देते हैं। यहां का वातावरण कभी भी सुस्त नहीं होता और आपको यहां कभी उबाऊपन महसूस नहीं होता।

सोन भंडार की गुफाएँ, राजगीर 

सोन भंडार गुफाएं - राजगीर, बिहार
सोन भंडार गुफाएं – राजगीर, बिहार

राजगीर की सोन भंडार की गुफाएँ आपको इस जगह से जुडे उपाख्यानों के बारे में बताती हैं। कहा जाता है कि इन गुफाओं के पीछे स्थित पहाड़ी स्वर्ण से जड़ी हुई है। इन्हीं में से किसी एक गुफा के भीतर वहां तक पहुँचने का दरवाजा है। इस दरवाजे के पास की दीवार पर शंखलिपि में एक मंत्र लिखा गया है, जिसका अर्थ अब तक नहीं पता है। कहते हैं कि जब उस मंत्र का अर्थ पता चलेगा और उसका उच्चारण होगा तभी यह दरवाजा खुल पाएगा, जिससे की उसमें छिपे स्वर्ण का पता लगाया जा सकता है।

हमे यह भी बताया गया कि अंग्रेजों ने, जिन्होंने इन सारी गुफाओं की खोज की थी, इस दरवाजे को खोलने की सारी कोशिशें की थी लेकिन सबकुछ व्यर्थ था। इन गुफाओं की दीवारों पर कुछ और भी नक्काशी काम दिखाई देते हैं, जो भारत में पत्थर पर नक्काशी काम के शुरुवाती दौर को प्रदर्शित करते हैं। इन में से एक गुफा की बाहरी दीवारों पर जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएँ भी देखी जा सकती हैं।

शीलालेखों के अनुसार जैन साधुओं का मानना है कि, इन गुफाओं का उत्खनन 3-4वी शताब्दी के दौरान हुआ था। ये गुफाएँ दुमंजिला हुआ करती थी लेकिन अब ऊपर की मंजिलों तक पहुँचना असंभव है। 20वी शताब्दी के आरंभिक काल में हुए व्यापक भूकंप में इन संरचनाओं के बहुत से भाग उद्धवस्थ हुए थे।

मनियार मठ, राजगीर 

मनियार मठ - राजगीर, बिहार
मनियार मठ – राजगीर, बिहार

मनियार मठ राजगीर का एक और खुदाई स्थल है। यह एक अष्टकोणी मंदिर है, जिसकी दीवारें गोलाकार हैं। इन गोलाकार दीवारों में नियमित अंतर की दूरी पर आले बने हुए हैं, जिनमें प्लास्टर से बनी विविध हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ और प्रतिमाएँ स्थापित थीं। इनमें से अधिकतर मूर्तियाँ आज विस्थापित हो गयी हैं। लेकिन इनके बारे में हमे जितनी भी जानकारी मिली है, उससे तो यही लगता है कि, यह जगह नाग देवताओं की पुजा के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण मानी जाती है। आप मंदिर के आलों के कोनों और छोरों पर इसके कुछ निशान देख सकते हैं। मनियार मठ के परिसर में आप विविध राजकुलों की छाप देख सकते हैं, जैसे गुप्त राजकुल का धनुष, जो आज पुराने राजगीर के बीचोबीच स्थित है और यह महाभारत में उल्लिखित मणि-नाग का समाधि स्थान माना जाता है।

राजगीर में स्थित गरम पानी के स्तोत्र  

गरम पानी के झरने - राजगीर, बिहार
गरम पानी के झरने – राजगीर, बिहार

राजगीर में ऐसे भी गरम पानी के स्तोत्र पाये जाते हैं, जिनके बारे में यह मान्यता है कि उनमें रोग निवारण की शक्तियाँ हैं। इस परिसर के बाहर लगे सूचना फलक के अनुसार यहां पर 22 कुंड और 52 छोटी-छोटी नदियां हैं, जिनके नाम भी इस फलक पर दिये गए हैं। इन स्तोत्रों का उद्गम सप्तर्णी गुफाओं के पीछे बताया जाता है जो पहाड़ियों के पीछे बसी हैं। यहां का सबसे गरम स्तोत्र है ब्रह्मकुंड, जिसके पास में ही लक्ष्मी नारायण का एक मंदिर है। जीतने भी लोग यहां पर आते हैं, वे सारे इस कुंड में स्नान करने के बाद ही मंदिर के दर्शन करने जाते हैं।

टम टम या घोड़ागाड़ी 

टमटम पड़ाव - राजगीर
टमटम पड़ाव – राजगीर

राजगीर में घूमते वक्त आप अपने आस-पास नज़र आते रंगीन और ऊंचे-ऊंचे तांगों को बिलकुल भी अनदेखा नहीं कर सकते। यहां के तांगे बहुत ही आकर्षक होते हैं। इन तांगों के लिए यहां पर एक खास अड्डा है जिसे ‘टम टम पड़ाव’ कहा जाता है। यहां पर कोई भी तांगा किराए पर लेकर शहर में जहां चाहे घूम सकते हैं। यहां का प्रत्येक तांगा सुंदर रूप से सजाया गया होता है और हर तांगे का अपना एक नाम भी होता है। सजावट के साथ इन तांगों में घुंगरू या फिर छोटी-छोटी घंटियाँ भी बांधी जाती हैं। जब भी तांगा चलता है तो ये घुंगरू एक अलग ही प्रकार की ध्वनि पैदा करते हैं। यहां के सभी तांगे एक जैसे हैं, लेकिन उनका शृंगार ही है जो उन्हें एक दूसरे से अलग बनाता है। ये तांगे इतने लुभावने होते हैं, कि जो भी तांगा आपकी नज़रों को मोह लेता है आप बस उसी पर सवारी करना चाहते हैं। इन तांगों का मूल उद्देश्य यही है कि, इस शहर में कम से कम गाडियाँ हो जिससे कि प्रदूषण भी नियंत्रण में रह सके।

सिलाओ का खाजा

सिलाओ का खाजा
सिलाओ का खाजा

राजगीर और नालंदा के बीच एक छोटी सी जगह है सिलाओ, जो खाजा, यानी बिहार का एक प्रकार का मीठा या नमकीन पदार्थ, के लिए बहुत प्रसिद्ध है। सिलाओ का खाजा बिहारी लोगों का सबसे पसंदीदा खाद्य पदार्थ है। जब भी आप इस शहर से गुजरते हैं आपको यहां हर जगह सिर्फ खाजा की ही दुकानें दिखाई देती हैं। अगर आप कभी यहां पर गए तो इस स्वादिष्ट व्यंजन का लुत्फ जरूर लीजिये।

राजगीर में और भी बहुत सी अच्छी-अच्छी जगहें हैं जो हम नहीं देख पाए। इस जगह को अच्छी तरह से देखने और घूमने के लिए आपको लगभग दो दिन चाहिए। मैं आशा करती हूँ कि मुझे यहां पर आने का एक और मौका जरूर मिले ताकि मैं इस जगह को अच्छे से देख सकू।

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नालंदा – विद्या का प्राचीनतम केंद्र, बिहार स्थित विश्व धरोहर https://inditales.com/hindi/nalanda-ancient-university-ruins-bihar/ https://inditales.com/hindi/nalanda-ancient-university-ruins-bihar/#respond Wed, 18 Oct 2017 02:30:40 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=452

बिहार की यात्रा करने के पीछे मेरा प्रमुख उद्देश था – बोध गया और नालंदा के दर्शन करना। नालंदा विश्व का सबसे प्राचीन और विख्यात शिक्षा का केंद्र रहा है। यहां पर खड़े होकर आप कुछ समय के लिए ही सही पर इस महान विरासत का भाग होने पर गर्व महसूस करने लगते हैं, जो […]

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नालंदा विश्वविद्यालय
नालंदा विश्वविद्यालय – चित्र – Shutterstock

बिहार की यात्रा करने के पीछे मेरा प्रमुख उद्देश था – बोध गया और नालंदा के दर्शन करना। नालंदा विश्व का सबसे प्राचीन और विख्यात शिक्षा का केंद्र रहा है। यहां पर खड़े होकर आप कुछ समय के लिए ही सही पर इस महान विरासत का भाग होने पर गर्व महसूस करने लगते हैं, जो इस धरोहर को और भी नजदीक से जानने की आपकी उत्सुकता को पंख देता है। ज्ञान का यह विश्व स्तरीय प्राचीनतम केंद्र, अपने अत्यंत सुनियोजित परिसर के साथ 10,000 से भी अधिक विद्यार्थियों को अपनी छत्रछाया प्रदान करता था। लेकिन 700 वर्षों से भी अधिक काल के लिए अपने विद्यार्थियों को ज्ञान से सींचने के पश्चात यह शत्रुत्व की अग्नि का शिकार हुआ। आज भी उसके कुछ भग्नावशेष अपने वैभव की महान गाथा को बयान करते हैं। इससे जुड़े इतिहास के महत्वपूर्ण अंश का परिचय तथा उसकी विस्तृत जानकारी हमे ह्वेनसांग और इत्सिंग जैसे यात्रियों के यात्रा विवरणों में मिलती है।

नालंदा – ज्ञान का दायक   

१६०० साल पुराणी ईंटें - जो आज भी नयी लगती हैं
१६०० साल पुराणी ईंटें – जो आज भी नयी लगती हैं

नालंदा संस्कृत के दो शब्दों ‘नालम्’ और ‘दा’ को जोड़कर बनाया गया है। नालम् यानी ज्ञान और दा यानी देना यानी ज्ञान का दायक । लगता है इसके प्रवर्तकों ने बहुत ही सोच विचार के साथ इसका नामकरण किया था। जब आप इसके संरक्षित अवशेषों में प्रवेश करते हैं, तो आप इतिहास से एक अजीब सा जुड़ाव महसूस करते हैं। आज भी यहां पर 1600 साल पुराने लाल ईंट के पत्थरों की दीवारें खड़ी हैं जो काफी अच्छी परिस्थिति में हैं। इन अवशेषों के बीच खड़े होकर उन्हें प्रत्यक्ष रूप से देखते हुए आप प्रसन्नता की भावना में डूब जाते हैं। आप अचानक से अपने आप को उसी मार्ग पर चलते हुए पाते हैं, जहां से कभी महान विद्वान गुजरा करते थे।

हमें वहां के वर्ग देखने का मौका मिला जो आज की पाठशालाओं के वर्गों से काफी मिलते जुलते हैं। इसके अलावा हमने वहां के छात्रालय और उनके पास स्थित कुएं भी देखे। यहां के गुरु और शिष्य यहीं पर निवास करते थे और साथ साथ अपना अभ्यास करते थे। इस विशाल सी इमारत के दर्शन करते हुए आप यहां-वहां उसके सुधारणिकरण की निशानियों को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं, जो आवश्यकतानुसार समय की विविध अवधियों के दौरान यहां के अधिकारियों और बाद में उनके उत्तराधिकारियों द्वारा किए गए थे।

यहां पर लंबे-लंबे चूल्हे हैं, जिन्हें देखकर आपके दिमाग में सबसे पहले यही विचार आता है, कि शायद ये चूल्हे खाना पकाने के लिए इस्तेमाल होते होंगे, लेकिन असल में ये चूल्हे विश्वविद्यालय के रासायनिक प्रयोगशाला का भाग थे। यहीं से आगे मंदिरों की एक पंक्ति है, जो अपने अवशेषों के माध्यम से अपने अस्तित्व की कहानी बतलाते हैं। लेकिन अवशेषों के रूप में भी उनकी आभा वैसी ही कायम है, जैसे किसी बुद्धिमान वृद्ध व्यक्ति के अलंकार के सारे उपकरणों को त्याग देने के बाद भी उसके ज्ञान का तेज उससे कोई नहीं छीन सकता।

नालंदा – ज्ञानार्जन का प्राचीन विश्व स्तरीय केंद्र  

विश्वविद्यालय

रासायनिक प्रयोगशाला - नालंदा
रासायनिक प्रयोगशाला – नालंदा

नालंदा विश्वविद्यालय के परिसर में विद्यार्थी निवासों और यहां के विभिन्न विभागों की लंबी कतारें खड़ी हैं। ग्रन्थों के अनुसार विश्वविद्यालय का यह परिसर 108 इकाईयों में विभाजित था और प्रत्येक इकाई में एक सभागृह, लगभग 30 कक्ष, कुछ स्नानकक्ष और एक कुआं हुआ करता था। लेकिन आज इनमें से सिर्फ 11 इकाइयों की ही खोज हो पायी है। यहां के शयनकक्षों में एक चारपाई, पुस्तकों के लिए खास तख्ते और एक आला है जहां पर मूर्तियाँ या फिर कोई और वस्तु रखी जा सकती है। इसके अलावा यहां और भी छोटे बड़े कक्ष हैं। यहां पर एक लंबा सा गलियारा है जिसके उस पार मंदिरों की पंक्ति है। ऐसा माना जाता है कि इनमें से अधिकतर मंदिर बौद्धों के हैं, लेकिन देखा जाए तो वहां पर हिन्दू धर्म से संबंधित काफी सारी मूर्तियाँ हैं। यहां पर बहुत सारे खाली आले हैं, जिनमें बेशक कुछ सुंदर सी मूर्तियाँ रही होंगी जो उनकी शोभा को और भी बढ़ाती होंगी। यहां-वहां कोरी दीवारों से झाँकती हुई कुछ अलंकृत आकृतियाँ हैं, जो मुख्य रूप से चैत्य के आकार की हैं।

प्राचीन संरचनाएं 

नालंदा के परिसर में कुछ आधार शिलाएँ हैं, जो शायद कभी बड़े-बड़े स्तंभों की नींवें हुआ करती थी। लेकिन अब ये शिलाएँ अवशेषों के रूप में अपने अतीत की कहानियाँ सुनाती हुई नज़र आती हैं। यहां के जलनिकास आज भी सही सलामत हैं, जो यहां पर एकत्रित होते बारिश के पानी को व्यवस्थित ढंग से नियंत्रित करते हैं। यहां पर कुछ चबूतरे हैं जो व्यायाम करने या ध्यान में बैठने के लिए बनवाए गए थे। यहां की प्रमुख प्रतिमाओं और मंदिरों के आस-पास मन्नत के स्तूप और अन्य छोटी-छोटी प्रतिमाएँ बिखरी पड़ी हैं। ये बिखरे हुए अवशेष अलग-अलग कालों में भक्तों द्वारा या फिर उत्खनन के पश्चात यहां पर स्थापित किए गए होंगे। यहां पर स्थित छोटे-छोटे स्तूपों की नींवों तथा गुबन्दों पर आज भी नज़र आता हुआ चुना उनके मूल अलंकृत स्वरूप के बारे में बताता है। इनमें से कुछ स्तूपों के ईंटों को विविध ज्यामितीय और शुभ-सूचक आकारों में ढाला गया है।

बिहार की ऐतिहासिक जगहें – नालंदा

प्राचीन स्तूपों के अवशेष - नालंदा
प्राचीन स्तूपों के अवशेष – नालंदा

नालंदा के सम्पूर्ण परिसर में मुझे सिर्फ दो ही पत्थर के स्तंभ दिखे। यहां पर स्थित इमारतें इतिहास के विविध कालावधियों के दौरान निर्मित की गयी थीं। इनमें से अधिकतर इमारतें एक-दूसरे के ऊपर बांधी गयी थी। इन इमारतों पर आप नवीकरण और सुधारणिकरण के निशान प्रमाणित रूप से देख सकते हैं। उत्खनन कर्ताओं को यहां पर पत्थर, प्लास्टर और पीतल की कुछ मूर्तियाँ मिली हैं। खुदाई द्वारा प्राप्त इन सारी मूर्तियों को आप भारत के पुरातात्विक सर्वेक्षण के संग्रहालय में देख सकते हैं। यह संग्रहालय इन खंडहरों से कुछ दूर सड़क के उस पार स्थित है। उत्खनन द्वारा प्राप्त इन सभी वस्तुओं में से सबसे रोचक वस्तु थी जले हुए चावल, जो कुछ 900 साल पुराने हैं, जो किसी धान्यागार में पाये गए थे।

नालंदा में पढ़ाये जाने वाले विषय

नालंदा के अवशेष
नालंदा के अवशेष

नालंदा में धर्मशास्त्र, तर्कशास्त्र, दर्शनशास्त्र, वैद्यकशास्त्र, खगोल विज्ञान, व्याकरण और अध्यात्मविज्ञान जैसे विषय पढ़ाये जाते थे। सिर्फ भारत के ही नहीं बल्कि विश्व के विविध कोनों के विद्यार्थी यहां पर सबसे अच्छी शिक्षा प्राप्त करने आते थे और अपने विषय में प्रवीणता हासिल कर वापस अपने देश लौटते थे। लेकिन इनमें से कुछ विद्यार्थी, जैसे ह्वेनसांग जो यहां के काफी बुद्धिमान विद्यार्थी रहे हैं, ने नालंदा में बिताए हुए अपने जीवनकाल का दस्तावेजीकरण किया था। उनके इन्हीं दस्तावेजों के कारण आज हम अपने इतिहास और विरासत से जुडी इतनी सुंदर बातें जान पाये हैं और शायद इन्हीं लेखों के मार्गदर्शन से हम इन अवशेषों से संबंधित इतनी सारी जानकारी प्राप्त कर पाये हैं, ठीक वैसे ही जैसे ऐसे ही दस्तावेजों की सहायता से आज सिंधु घाटी के अवशेषों की खोजबीन की जा रही है। ग्रन्थों के अनुसार यह विश्वविद्यालय लगभग 10 स्क्वेर कि.मी. से भी अधिक की जमीन पर फैला हुआ था। जिस में से अब तक लगभग 1 स्कवेर कि.मी. के क्षेत्र पर ही उत्खनन का कार्य पूरा हुआ है और यहां पर पाये गए अवशेषों को पुनः स्थापित करने की कोशिश की गयी है।

मैं सोच रही हूँ कि हमारी नज़रों के सामने इस पूरे विश्वविद्यालय का पुनर्निर्माण होते हुए देखने का अनुभव कैसा होगा। कहा जाता है कि जब विद्यार्थी यहां पर प्रवेश पाने के लिए आते थे तो यहां के द्वार-रक्षक जो काफी ज्ञानी व्यक्ति हुआ करते थे, विश्वविद्यालय के द्वार पर ही विद्यार्थियों की परीक्षा लेते थे। और जो भी आकांक्षी विद्यार्थी इस परीक्षा में सफल होते थे उन्हीं को विश्वविद्यालय में दाखिला दिया जाता था।

नालंदा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय 

ईंटों से बना पूर्ण घटक - नालंदा
ईंटों से बना पूर्ण घटक – नालंदा

कहा जाता है कि नालंदा में तीन बड़े-बड़े पुस्तकालय थे लेकिन उत्खनन के दौरान इन में से एक का भी पता नहीं चल पाया है। इन पुस्तकालयों के नाम इस प्रकार थे – रत्नसागर, रत्नरंजक और रत्ना उदय। इनमें से रत्नसागर 9 मंज़िला इमारत थी। खिलजी द्वारा किए गए आक्रमण के समय इस्लामी आक्रमणकारियों ने इन सभी पुस्तकालयों को जला दिया था। इन दीवारों पे यहां-वहां आज भी उस भयंकर आग के निशान नज़र आते हैं। लेकिन यहां की कुछ दीवारें बिलकुल साफ-सुथरी और नयी सी लगती हैं, जैसे कि वे हाल ही में बनवायी गयी हों। ये इमारतें भूकंप में भी उधवस्थ हुई थीं और काफी वर्षों तक उनके अवशेष मिट्टी और कीचड़ के नीचे ढके हुए थे। इन अवशेषों की खोज 20वी शताब्दी के दौरान हुए उत्खनन के समय की गयी थी। इन पुस्तकालयों की भांति इस विश्वविद्यालय के प्रमुख प्रवेश द्वारों का पता लगाना अभी बाकी है।

यहां पर एक ताड़ का वृक्ष है, जिसकी 8 शाखाएँ हैं, जो कि असामान्य सी बात है, क्योंकि, सामान्य तौर पर ताड़ के वृक्ष की सिर्फ एक ही शाखा होती है। बौद्ध धर्म के लोगों का मानना है कि यह वृक्ष बुद्ध का ही प्रतीक है।

सारिपुत्र का स्तूप

सारिपुत्र स्तूप - नालंदा, बिहार
सारिपुत्र स्तूप – नालंदा, बिहार

सारिपुत्र स्तूप नालंदा के परिसर का सबसे पुराना भाग है जो सम्राट अशोक के काल में बांधा गया था। सारिपुत्र का जन्म यहीं पर हुआ था और उनकी मृयु भी इसी स्थान पर हुई थी। वे बुद्ध के प्रमुख अनुयायियों में से एक थे। लेकिन दुर्भाग्य से अब आप इस स्तूप को समीप से नहीं देख सकते, हालांकि यह इन अवशेषों का सबसे प्रख्यात भाग है। लगता है यह मंदिर आज जितना जमीन के ऊपर है उससे कहीं ज्यादा वह जमीन के नीचे होगा क्योंकि, उसका निर्माण 7 चरणों में हुआ था। मेरे खयाल से नालंदा अपने उद्धवस्थ रूप में भी अपनी लावण्यता और महिमा को प्रदर्शित करता है।

नालंदा संग्रहालय थोड़ा छोटा है लेकिन बहुत ही सुंदर है। मुझे लगता है कि अन्य सभी संग्रहालयों की भांति इस संग्रहालय को भी दस्तावेजीकरण या फिर एक गाइड की आवश्यकता है, जो यहां पर प्रदर्शित वस्तुओं के विस्तृत विवरण प्रदान कर सके।

ह्वेनसांग स्मारक 

ह्वेनसांग स्मारक - नालंदा
ह्वेनसांग स्मारक – नालंदा

ह्वेनसांग या क्षुआन जेंग स्मारक, नालंदा का नवीनतम भूमि-चिह्न है। यह विशाल और आकर्षक इमारत नालंदा के प्रख्यात विद्वान और शिक्षक ह्वेनसांग की स्मृति में बनवाई गयी थी। यह स्मारक अपने भित्ति चित्रों द्वारा आपको ह्वेनसांग के जीवन की सैर कराता है। वहां पर लगे सूचना फ़लक आपको उनके जीवन संबंधी थोड़ी और जानकारी देते हैं। यहां पर एक नक्शा भी है जो यहां की प्राचीन सभ्यताओं में उनकी यात्राओं को अनुरेखित करता है। यहां पर एक साधारण सा लेकिन सुंदर रूप से सजाया गया दवाज़ा है, जिसके भीतर प्रवेश करते ही आपको सामने ही इस यात्री की बड़ी सी मूर्ति अपने खास अंदाज़ में खड़ी नज़र आती है। इस संग्रहालय के सभागृह में भी उनकी एक और बड़ी सी मूर्ति है जो काले रंग की है। जब आप इस मूर्ति के सामने खड़े होकर उसकी सुंदरता की प्रशंसा करते हैं, तो आप इस यात्री के प्रति कृतज्ञता महसूस करने लगते हैं, कि उन्होंने आपके और आपसे जुड़े इतिहास के बीच एक लिखित कड़ी का निर्माण किया है। उनके दस्तावेजों के कुछ नमूने इस स्मारक के पृष्ट भाग में प्रदर्शन के लिए रखे गए हैं।

मुझे लगता है कि यहां पर ऐसी भी किताबें होनी चाहिए जिन्हें आप स्मृति चिह्नों के रूप में ले जा सके और जिसमें ह्वेनसांग के यहां पर बिताए हुए जीवन की तथा नालंदा शहर के प्रति उनके विचारों की जानकारी हो।

विश्व धरोहर का स्थल   

नालंदा आज एक विश्व धरोहर के स्थलों की सूची में अपनी जगह पाता है। मेरे खयाल से आपको स्वयं नालंदा जाकर वहां के वैभव को देखना और महसूस करना चाहिए, क्योंकि नालंदा ऐसी जगह है जिसका चित्रण शब्दों और तस्वीरों में नहीं किया जा सकता। नालंदा शब्दों और चित्रों से परे अनुभव करने की जगह है। नालंदा की यात्रा के बाद अब तक्षिला देखने की मेरी इच्छा और भी बढ़ गयी है। अब मेरी यही तमन्ना है कि मैं कभी तक्षिला जाकर वहां के वैभव का अनुभव कर पाऊँ।

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कपिलवस्तु – नेपाल में बुद्ध के शाक्य वंश की राजधानी https://inditales.com/hindi/kapilavastu-buddha-sakya-capital-nepal/ https://inditales.com/hindi/kapilavastu-buddha-sakya-capital-nepal/#respond Wed, 27 Sep 2017 02:30:16 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=460

लुम्बिनी के २८ की.मी. पश्चिम में स्थित कपिलवस्तु राजा शुद्धोधन की राजधानी थी। शाक्य वंश के राजा शुद्धोधन के ही पुत्र थे गौतम बुद्ध। गौतम बुद्ध की जन्मस्थली, कपिलवस्तु के भौगोलिक निर्धारित स्थल पर मतभेद हैं। वर्तमान में यह निर्धारित करना कठिन है कि कपिलवस्तु नेपाल के तिलौराकोट में स्थित है या भारत-नेपाल सीमारेखा के […]

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कपिलवस्तु नेपाल
कपिलवस्तु नेपाल

लुम्बिनी के २८ की.मी. पश्चिम में स्थित कपिलवस्तु राजा शुद्धोधन की राजधानी थी। शाक्य वंश के राजा शुद्धोधन के ही पुत्र थे गौतम बुद्ध। गौतम बुद्ध की जन्मस्थली, कपिलवस्तु के भौगोलिक निर्धारित स्थल पर मतभेद हैं। वर्तमान में यह निर्धारित करना कठिन है कि कपिलवस्तु नेपाल के तिलौराकोट में स्थित है या भारत-नेपाल सीमारेखा के भारत की तरफ, पिप्राह्वा में। हालांकि यह दोनों स्थल लुम्बिनी के बहुत समीप स्थित है। इसलिए वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय सीमारेखा के अनुसार बुद्ध अर्थात् राजकुमार सिद्धार्थ की जन्मस्थली कपिलवस्तु, इन दोनों स्थलों में एक हो सकती है।

मेरी कपिलवस्तु की यात्रा के पश्चात मैं अपना अनुभव व संस्मरण आपके समक्ष रख रही हूँ। आशा है यह आपकी कपिलवस्तु यात्रा की तैयारी में उपयोगी सिद्ध होगी। मेरी अपनी यात्रा की तैयारी के समय मुझे कपिलवस्तु पर जानकारी हासिल करने में बड़ी कठिनाइयाँ उठानी पड़ीं थीं। इसलिए पूरे मन से मेरी यह कोशिश है कि इंडीटेल के जो पाठक कपिलवस्तु की यात्रा पर जाना चाहतें हैं, उन्हें कपिलवस्तु के आसपास के पुरातात्विक अवशेषों के सम्बन्ध में सही मार्गदर्शन प्राप्त हो सके। एक तथ्य ध्यान में रखने योग्य है कि कपिलवस्तु एक शहर अथवा गाँव नहीं, बल्कि नेपाल का एक जिला है। इसलिए प्राचीन कपिलवस्तु की यात्रा का अर्थ है कई छोटे बड़े दर्शनीय स्थलों का भ्रमण। इनमें ज्यादातर बुद्ध व बौद्ध धर्म के प्रारम्भिक दिनों से सम्बन्ध रखते हैं।

इक्ष्वाकु वंश के राजाओं ने इस स्थान का नामकरण कपिल मुनि के नाम पर किया था। अयोध्या के भगवान् राम भी इसी वंश के वंशज थे।

कपिलवस्तु – कई बुद्धों की जन्मस्थली

तिलौराकोट का उत्तरी द्वार - कपिलवस्तु नेपाल
तिलौराकोट का उत्तरी द्वार – कपिलवस्तु नेपाल

जिन भगवान् बुद्ध से ज्यादातर लोग परिचित हैं वे हैं शाक्यमुनि बुद्ध। परन्तु बौद्ध धर्म के अनुसार ऐसे कई बोधिसत्व हुए जो बुद्ध बनने की राह पर थे। कुछ मूलग्रंथों के अनुसार शाक्यमुनि बुद्ध से पूर्व ५ बोधिसत्व बुद्ध हुए हैं।

कपिलवस्तु में शाक्यमुनि बुद्ध समेत ३ बुद्धों के पुरातत्व प्रमाण प्राप्त हुए हैं।

आप इस विषय पर और जानकारी ‘प्राचीन वेबसाइट ‘ से प्राप्त कर सकतें हैं।

तिलौराकोट

तिलौराकोट दुर्ग के अवशेष - कपिलवस्तु नेपाल
तिलौराकोट दुर्ग के अवशेष – कपिलवस्तु नेपाल

तिलौराकोट का अर्थ है तीन खम्बों का शहर – लौरा स्थानीय भाषा में स्तम्भ है। यह शहर मौर्य वंश के पश्चात बसाया गया था। क्योंकि यह वही तीन खम्बें हैं जिनकी स्थापना सम्राट अशोक ने अपनी कपिलवस्तु की तीर्थयात्रा के समय की थी। कहा जाता है कि सम्राट अशोक अपनी तीर्थ यात्रा के समय कई अभिलेख खुदे खम्बे अपने साथ लेकर निकले थे। जब भी वे किसी महत्वपूर्ण स्थान पर पहुंचते, वहीं इन खम्बों की स्थापना करवाते थे। इन्हीं अभिलेखों द्वारा ही हमें उस युग व इस स्थान की जानकारी प्राप्त हुई थी।

पुरातत्ववेत्ताओं का निष्कर्ष है कि तिलौराकोट में शाक्य राजाओं का महल था। यहीं भगवान् बुद्ध ने राजकुमार सिद्धार्थ गौतम के रूप में अपने जीवन के पहले २९ वर्ष बिताये थे। आप आज भी इस शहर के चारों ओर मोटी दीवार और खंदक देख सकतें हैं। २६०० वर्षों से भी पूर्व बना यह दुर्ग अपेक्षाकृत छोटा है। तिलौराकोट के भौगोलिक सर्वेक्षण धरती के भीतर कुछ राजसी भवनों के ढाँचों की ओर इशारा करतें हैं। इनमें कई ढाँचे खुदाई द्वारा बाहर निकाले जा चुकें हैं व कुछ की खुदाई अभी शेष है।

आप जब तिलौराकोट पहुंचेंगे, आपको इस दुर्ग का पश्चिमी द्वार, सभाकक्ष, कुछ तलघर, दो स्तूप, एक मंदिर, कुछ दीवारें और पूर्वी द्वार दृष्टिगोचर होंगें। इस पूर्वी द्वार से ही सिद्धार्थ ने अपना भव्य महल व उससे जुड़े राजसी जीवन का त्याग किया था। इसलिए इसे महाद्वार भी कहा जाता है।

बुद्ध के त्याग की गाथाएँ

महाद्वार - तिलौराकोट का पूर्वी द्वार - जहाँ से गौतम ने कपिलवस्तु से प्रस्थान किया - नेपाल
महाद्वार – तिलौराकोट का पूर्वी द्वार – जहाँ से गौतम ने कपिलवस्तु से प्रस्थान किया – नेपाल

राजकुमार सिद्धार्थ द्वारा किये सांसारिक सुखों के परित्याग की गाथा आप में से कईयों ने सुनी या पढ़ी होंगीं। राजा शुद्धोधन और रानी मायादेवी के पुत्र सिद्धार्थ के जन्म पर संत असिता ने भविष्यवाणी की थी कि राजकुमार, परम ज्ञान प्राप्त कर लोगों के कल्याण हेतु, अपना जीवन समर्पित कर देंगे। अपने इकलौते पुत्र को खोने के भय से राजा ने राजकुमार को चारदीवारों के भीतर रखा। महल के भीतर ही उनका विवाह व पुत्र राहुल का जन्म हुआ। एक दिवस उनकी दृष्टी एक वृद्ध, एक बीमार व एक मृत व्यक्ति पर पड़ी। जीवन के इस रूप से अनभिज्ञ सिद्धार्थ का मन इन दृश्यों ने झकझोर दिया। सभी सांसारिक सुखों का परित्याग कर वे जीवन के मायने खोजने निकल पड़े। और इस विश्व को बुद्ध की प्राप्ति हुई।

तिलौराकोट के भ्रमण के समय मेरे परिदर्शक ने भगवान् बुद्ध के सांसारिक सुखों के परित्याग व संतत्व प्राप्ति के पीछे प्रसिद्ध दो और कथाएं बतायीं।

दूसरी कथा

शाक्य वंश के सिद्धार्थ की माता मायादेवी, उनकी सौतेली माता प्रजापति गौतमी और उनकी पत्नी यशोदा, देवदहा के कौलिया वंश की थी। सिद्धार्थ ने भी अपने बालपन का कुछ समय यहीं बिताया था। परन्तु एक नदी के जल पर स्वामित्व को लेकर शाक्य वंश का कौलिया वंश से बैर उत्पन्न हो गया था। इस विवाद के चलते दोनों में युद्ध सदृश स्थिति पैदा हो गयी थी। राजकुमार सिद्धार्थ ने इस विवाद को सुलझाने की पहल की। यौवन के जोश में उन्होंने प्रतिज्ञा कर दी कि यदि वे इस जल विवाद को सुलझाने में असमर्थ रहे तो वे राजमहल छोड़ जंगल में जीवनयापन हेतु निकल जायेंगे। दुर्भाग्यवश वे विवाद हल करने में असफल रहे और प्रतिज्ञानुसार महल का त्याग कर दिया।

तीसरी कथा

इस कथानुसार अपने पौत्र राहुल के जन्म पर राजा शुद्धोधन ने एक भव्य उत्सव का आयोजन किया था। दूर दूर से सुन्दर नर्तकियों को आमंत्रित किया था। सिद्धार्थ समेत सबने इस उत्सव का सम्पूर्ण रात्र भरपूर आनंद उठाया। प्रातः सिद्धार्थ ने वहां चारों ओर गन्दगी व कुरूपता देखी व उनका मन खिन्न हो उठा। जो नर्तकियां पिछली रात इतनी आकर्षक व सुन्दर प्रतीत हो रहीं थीं, वही श्रृंगार विहीन, शराब के नशे में अभद्रता की सीमा पर कर रहीं थीं। उन्हें बोध हुआ कि सुन्दरता क्षणभंगुर है। उन्हें इस राजसी जीवन से विरक्ति उत्पन्न हुई और उन्होंने सत्य की खोज में महल का त्याग करने का निश्चय किया।

अब यह आप पर निर्भर है कि आप किस कथा पर विश्वास करतें हैं। व्यक्तिगत तौर पर मुझे दूसरी कथा की संभावना ज्यादा प्रतीत होती है। यात्रा के समय मार्ग में स्थानीय लोगों द्वारा कही गयीं कथाएं मुझे बेहद पसंद हैं। स्थानीय निवासियों के आस्था की यह गाथाएँ बहुधा अनजानी होतीं हैं और कई बार इनके सम्बंधित साहित्य भी उपलब्ध नहीं होते। यह पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक रूप से जीवित रहतीं हैं।

कपिलवस्तु के तिलौराकोट का भ्रमण

बुद्ध के पिता रजा सुधोधन & माता माया देवी को समर्पित स्तूप - कपिलवस्तु नेपाल
बुद्ध के पिता रजा सुधोधन & माता माया देवी को समर्पित स्तूप – कपिलवस्तु नेपाल

तिलौराकोट को घेरे जो मोटी प्राचीन दीवार के अवशेष हैं उन्हें मेरे परिदर्शक शिवपाल ‘तिलौराकोट की महान दीवार’ कहते हैं। मैंने उस दीवार पर चलने का आनंद उठाया।

दुर्ग के अवशेषों के बीचोंबीच एक कमल तालाब है। एक काल में यह तालाब राज परिवार के आमोद प्रमोद हेतु बनाए बगीचे का हिस्सा था।

तिलौराकोट का समय-माई मंदिर

समय माई मंदिर - तिलौराकोट - नेपाल
समय माई मंदिर – तिलौराकोट – नेपाल

तिलौराकोट में भ्रमण के समय मुझे एक अनोखे मंदिर के दर्शन हुए। यह मंदिर समय-माई अर्थात् समय की देवी को समर्पित है। तिलौराकोट के इन निर्जीव अवशेषों में यही एक जीवित संरचना है। इस मंदिर के चारों ओर, अलग अलग आकार के सैकड़ों हाथी मूर्तियाँ रखीं हुईं हैं। जानकारी प्राप्त करने पर पता चला कि यहाँ मांगी मन्नत पूर्ण होने पर भक्तगण देवी को हाथी की मूर्ति अर्पित करते हैं। मंदिर के भीतर देवी की पिंडी रूप की पूजा की जाती है। तथापि यहाँ हाथी की सवारी करती एक देवी की प्रतिमा भी है। इसी प्रकार के हाथी मुझे यहाँ के अन्य छोटे मंदिरों में भी दिखाई दिए।

मेरे परिदर्शक शिवपाल के अनुसार शाक्य वंश के राजा युद्ध में जाने से पूर्व समय-माई देवी की आराधना किया करते थे। अर्थात् शाक्य वंश के राजा भी, अन्य राजाओं की तरह, युद्ध पूर्व माँ शक्ति का आवाहन करते थे।

तिलौराकोट दुर्ग का बाह्य परिसर

लोहे की कार्यशाला के अवशेष - तिलौराकोट - नेपाल
लोहे की कार्यशाला के अवशेष – तिलौराकोट – नेपाल

तिलौराकोट दुर्ग की दीवारों के बाहर दो रोचक स्थलों के दर्शन हुए। एक था वह स्तूप जो बुद्ध के अश्व कंटक को समर्पित है। कंटक ही वह अश्व था जिस पर सवार होकर राजकुमार सिद्धार्थ अर्थात् बुद्ध ने महल का त्याग किया था। तत्पश्चात उसे महल वापिस भेज दिया था। दूसरा स्थल किसी प्राचीन लोहे के कारखाने के अस्तित्व की ओर इशारा कर रहे थे। हालांकि इस कार्यशाला के अवशेष जिस टीले पर स्थित हैं वहां तक पहुँचने हेतु कुछ दूरी पैदल पार करनी पड़ती है। मेरे परिदर्शक ने मुझे बताया कि उसकी जानकारी अनुसार मैं पहली थी जिसने यह कष्ट उठाया। अन्यथा बाकी पर्यटक केवल जानकारी प्राप्त कर आगे बढ़ जाते थे। मुझे प्रसन्नता है कि मैंने इस ओर प्रयास किया और मुझे इसका फल भी प्राप्त हुआ। मुझे बुद्ध-पूर्व युग के छोटे छोटे लोहे के खांचे देखने का अवसर प्राप्त हुआ। मेरे अनुमान से यह लौह आयुध व अन्य लौह वस्तुएं बनाने का कारखाना था। प्रदूषित वातावरण से बचने हेतु इसका निर्माण शहर से बहुत दूर किया गया था।

वर्तमान में यहाँ केवल मिट्टी मिश्रित लौह अवशेषों का ढेर है। इसी कारण इस इलाके की धरती बंजर हो गयी है। पुरातत्ववेत्ताओं ने यहाँ हज़ारों टनों लौह अवशेषों के होने की आशंका जताई है। इसी से कारखाने की विशालता का अनुमान लगाया जा सकता है।

यहाँ की एक और बात जिसने मुझे प्रभावित किया वह यह कि हर महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल पर उस स्थान का नक्शा बनाया हुआ है जो पर्यटकों को उस स्थान की जानकारी देता है। हालांकि दिशा-निर्देशों का अभाव महसूस हुआ परन्तु समयाभाव ना होने के कारण मुझे स्थलों को ढूँढने में कोई कठिनाई नहीं हुई।

तिलौराकोट संग्रहालय

तिलौराकोट संग्रहालय में मृण्मयी गहने
तिलौराकोट संग्रहालय में मृण्मयी गहने

तिलौराकोट दुर्ग से करीब ४०० मीटर दूर एक छोटा पुरातात्विक संग्रहालय है। मेरे देखे सभी संग्रहालयों में यह सबसे मूलभूत संग्रहालय है। दो कक्षों में रखीं कलाकृतियों में मुख्य हैं-
• पाषाणी मूर्तियाँ
• लाल पक्की मिट्टी अर्थात् टेराकोटा की मूर्तियाँ
• सिक्के
• धूसर व लाल कुम्हारी
• मोती
• इतिहास के विभिन्न युगों में उपयोग में लायीं गईं ईंटें
• गुफाओं की खुदाई द्वारा प्राप्त वस्तुएं
• तिलौराकोट में पाए गए छिद्र बनाने के ढाँचे

गोतीहावा

गोतीहावा का अशोक स्तम्भ - नेपाल
गोतीहावा का अशोक स्तम्भ – नेपाल

गोतीहावा का सम्बन्ध क्रकुछंद बुद्ध से है। इसकी जानकारी हमें यहाँ खड़े अशोक स्तम्भ पर लिखे अभिलेखों से प्राप्त होती है। इस स्तम्भ की स्थापना भी सम्राट अशोक ने अपनी तीर्थ यात्रा के समय की थी। चीनी यात्रियों के अभिलेखों से यह पता चलता है कि इस अशोक स्तम्भ के शीर्ष पर सिंहचतुर्मुख स्तंभशीर्ष था। खुदाई के समय पुरातत्ववेत्ताओं ने यहाँ एक स्तूप की खोज की थी। उन्हें यहाँ ९-१० वीं ई. के मानव सभ्यता के भी चिन्ह प्राप्त हुए।

क्रकुछंद बुद्ध स्तूप - गोतीहावा - नेपाल
क्रकुछंद बुद्ध स्तूप – गोतीहावा – नेपाल

वर्तमान में यह स्तूप एक टीले के रूप में है जिस पर एक विशाल वृक्ष खड़ा है। अशोक स्तम्भ इसी स्तूप के बगल में बनाया गया था।

हालांकि अशोक स्तम्भ अपने मूल स्थान पर स्थित है परन्तु वर्तमान में यह भंगित है। इसके आधार का कुछ भाग ही शेष है। परन्तु इसकी महत्ता इसके ऊपर चिपके सोने की पत्तियों व इसके चारों ओर लगे रंगीन ध्वजों से स्पष्ट विदित होती है।

गोतीहावा के स्तूप व अशोक स्तम्भ के दर्शन हेतु एक लम्बा कच्चा रास्ता पार करना पड़ता है। फिर भी इसके आसपास एक संपन्न गाँव बसा हुआ है।

कुदान

कुदान - ताल, स्तूप एवं कुआँ - गोतीहावा - नेपाल
कुदान – ताल, स्तूप एवं कुआँ – गोतीहावा – नेपाल

कुदान प्राचीन काल में निग्रोधाराम नाम से जाना जाता था। गौतम बुद्ध के विश्राम की सुविधा हेतु शाक्यों ने नगर के बाहर, शांत वातावरण में निग्रोधाराम नामक एक विहार बनवाया था। यह वही स्थान है जहां परमज्ञान प्राप्ति के पश्चात गौतम बुद्ध ने सर्वप्रथम परिवारजनों से भेंट की थी। उन्होंने यहाँ अपने माता पिता, सौतेली माता प्रजापति गौतमी, अपनी पत्नी व पुत्र से भेंट की थी। उनकी सौतेली माता ने उन्हें वस्त्र भेंट किये थे। अंत में वे सब गौतम बुद्ध के साथ बौद्ध धर्म के प्रचार में शामिल हो गए थे।

पुरातत्ववेत्ताओं ने कुदान में खुदाई के समय ३ स्तूपों की खोज की थी। इनमें से एक स्तूप के ऊपर, सारनाथ के चौखंडी स्तूप की तरह, अष्टभुजा मंदिर स्थापित है। बुद्ध व अन्य भिक्षुओं की सुविधा हेतु यहाँ एक तालाब भी खुदवाया गया था।
यहाँ ईंटों से बना एक अनोखा कुआं भी है।

ईंटों से बने प्रमुख स्तूप पर चढ़ा जा सकता है। मैंने इस स्तूप के ऊपर एक अनोखा शिवलिंग देखा। इस स्तूप पर लगीं ईंटों को देखकर मुझे नालन्दा में लगीं ईंटों का स्मरण हो आया। ऊपरी सतह की ईंटें विशेष रूप से स्तूप के अलंकरण हेतु बनाए गए थे।

निगलीहावा

निगलीहावा अशोक स्तम्भ - नेपाल
निगलीहावा अशोक स्तम्भ – नेपाल

निगलीहावा एक वीरान रास्ते पर बना एक छोटा आहाता है। इस आहाते के भीतर एक अशोक स्तम्भ दो टुकड़ों में टूटा हुआ रखा है। इनमें से छोटा टुकड़ा जमीन में गढ़ा हुआ, कुछ तिरछा सा खड़ा है जबकि लम्बा निचला हिस्सा आधार से पृथक हो, उसी के समीप पड़ा हुआ है। इस स्तम्भ के लापता शीर्ष की जानकारी यहाँ किसी को नहीं है। इस स्तम्भ की स्थापना भी सम्राट अशोक ने अपने तीर्थयात्रा के समय किया था। इस स्तम्भ पर लिखे अभिलेख के अनुसार यह स्तम्भ एक स्तूप के स्थान पर खड़ा है जिसके भीतर कनकमुनी बुद्ध के पार्थिव अवशेष रखे थे। कालान्तर में इस तथ्य की पुष्टि चीनी यात्रियों ने भी की थी। जिस स्तूप के स्थान पर यह स्तम्भ खड़ा था, उसका अब अस्तित्व नहीं है। मेरे अनुमान से इस स्तूप को, आहाते के पास स्थित तालाब बनाने हेतु ध्वस्त किया गया हो।

मैंने इस स्तम्भ पर कई मोरों की नक्काशी देखी। उस पर लिखे अभिलेख मुझे कुछ नवीन प्रतीत हुए। अभिरक्षक ने इसे प्रथम प्राचीन अभिलेख बताया परन्तु बाद में इस तथ्य पर सहमति जताई कि तालाब से इस स्तम्भ की खोज के पश्चात इस पर अभिलेख खोदे गए थे।

कनकमुनी बुद्ध को कोआगमन बुद्ध और कनकगमन भी कहा जाता है।

आहाते के समीप स्थित एक छोटे मंदिर में कनकमुनि बुद्ध की प्रतिमा स्थापित है। काले रंग की इस मूर्ति को भक्तगणों ने सोने की पत्तियाँ अर्पित कर अलंकृत किया है। इस मूर्ति की बनावट भी अन्य बुद्ध की मूर्तियों से साम्य रखती है।

अरोराकोट

कनकमुनि बुद्ध की जन्मस्थली अरोराकोट, निगलीहावा से कुछ दो की.मी. दूर स्थित एक प्राचीन शहर है। इस शहर के नाम पर यहाँ केवल एक दीवार के मिटते अवशेष देख सकतें हैं। वह भी ध्यान से ढूँढने पर ही दिखाई देते हैं। मिट्टी से ढका यह अवशेष पुरातत्ववेत्ताओं की खुदाई का इंतज़ार कर रहा है।

सागरहावा

सागरहावा - जहाँ कभी हज़ारों स्तूप थे - नेपाल
सागरहावा – जहाँ कभी हज़ारों स्तूप थे – नेपाल

किवदंतियों के अनुसार शाक्य वंश का, शाक्य सीमा के दक्षिण स्थित कोसल राज से वैर था। प्रतिशोध की मंशा से कोसला सेना ने शाक्यों का नरसंहार किया था। उन्ही मृत शाक्यों की स्मृति में उनके वंशजों ने हज़ारों की संख्या में स्मारक स्तूप बनवाये थे। कहा जाता है कि यह सारे स्तूप सागरहावा में स्थित थे। १८९० में डॉ. फुहरर ने इनमें से कई स्तूपों की खोज की थी।

वर्तमान में यहाँ सिर्फ एक तालाब है। मैंने उस तालाब में तैरते कई सारस पक्षी भी देखे।

जगदीशपुर जलाशय

यह पक्षीदर्शन हेतु सर्वोपयुक्त, एक बड़ा जलाशय है। इसकी स्थापना १९७० में सिंचाई हेतु किया गया था। बाणगंगा के जल से भरा यह जलाशय कृषिभूमि व कुछ छोटे तालाबों से घिरा हुआ है। यह नेपाल का सर्वाधिक बड़ा व प्रमुख जलाशय है।

नेपाल के कपिलवस्तु की यात्रा हेतु सुझाव

• इस संस्मरण में बताये गए दर्शनीय स्थलों के दर्शन हेतु ६-८ घंटों का समय लगता है। इनमे लुम्बिनी से आने-जाने का समय भी शामिल है।
• ज्यादातर स्थलों पर खाने-पीने की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है। अतः अपने खाने-पीने का सामान साथ रखें।
• तिलौराकोट में पुरातन अवशेषों की जानकारी हेतु परिदर्शक उपलब्ध हैं। परन्तु अन्य स्थलों पर जानकारी देने हेतु कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है।
• तिलौराकोट में उपलब्ध प्रलेख आपको इतनी जानकारी अवश्य देते हैं कि आप बाकी स्थलों के दर्शन परिदर्शन के बिना भी पूर्ण कर सकतें हैं।
• समय का अभाव हो तो कुछ घंटे केवल तिलौराकोट में बिताकर भी आप कपिलवस्तु दर्शन के आनंद से अभिभूत हो सकतें हैं।
• यहाँ केवल संग्रहालय दर्शन हेतु टिकट खरीदना आवश्यक है। बाकी स्थलों का दर्शन मुफ्त है।

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बोरोबुदुर – विश्व का सबसे बड़ा बौद्ध मंदिर

हिंदी अनुवाद : मधुमिता ताम्हणे

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