भारत का प्राकृतिक सौन्दर्य Archives - Inditales श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Mon, 12 Jun 2023 05:33:27 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.7.4 भारत में जंगल सफारी – कब, कहाँ, क्या और कैसे देखें? https://inditales.com/hindi/jangal-safari-rashtriya-udyan-bharat/ https://inditales.com/hindi/jangal-safari-rashtriya-udyan-bharat/#comments Wed, 05 Jun 2019 02:30:40 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1359

क्या हमें भारत में जंगल सफारी करनी चाहिए? जी हाँ! भारत अब भी जैव विविधता का धनी है। इसका अनुभव प्राप्त करने के लिए जंगल सफारी से उत्तम अन्य कोई साधन नहीं है। प्रकृति से हस्तक्षेप किये बिना भारत की जैव धरोहर का आनंद उठाना है तो अवश्य जंगल सफारी कीजिये। छुट्टियों में जंगल सफारी […]

The post भारत में जंगल सफारी – कब, कहाँ, क्या और कैसे देखें? appeared first on Inditales.

]]>

क्या हमें भारत में जंगल सफारी करनी चाहिए? जी हाँ! भारत अब भी जैव विविधता का धनी है। इसका अनुभव प्राप्त करने के लिए जंगल सफारी से उत्तम अन्य कोई साधन नहीं है। प्रकृति से हस्तक्षेप किये बिना भारत की जैव धरोहर का आनंद उठाना है तो अवश्य जंगल सफारी कीजिये।

छुट्टियों में जंगल सफारी क्यों जाएँ?

वर्तमान में हमारा जीवन नगरीय भीड़भाड़ एवं सीमेंट कंक्रीट के जंगले में उलझ कर रह गया है। हम इस भौतिकवादी विश्व के दलदल में धंसते जा रहे हैं। इसी कारण बीच बीच में जंगल में भ्रमण करना अति आवश्यक हो जाता है।

जंगल सफारी भारत के राष्ट्रीय उद्यानों में जंगल के भीतर एक भिन्न विश्व बसता है। यहाँ इसके अपने नियम एवं जीवन शैली होती है। जंगलों एवं राष्ट्रीय अभयारण्यों की हरियाली एवं वहां के जीव-जंतुओं के बीच कुछ समय बिताना एक अविस्मरणीय अनुभव है। यह हमारे जीवन की भागदौड़ में शान्ति एवं ठहराव देता है। इसीलिए आप अपनी आगामी छुट्टी में जंगल अथवा अभयारण्य के भ्रमण का कार्यक्रम अवश्य बनाएं।

जंगल सफारी छुट्टियों में कौन कौन से अनुभव लेना चाहिए?

जंगल सफारी आपको जंगल के सम्पूर्ण पारितंत्र का अनुभव प्रदान करता है। हम में से कई पर्यटक जंगल जाकर केवल बड़े जंगली जानवरों को खोजते हैं। स्मरण रखिये कि सिंह, बाघ, तेंदुआ, भालू, जंगली कुत्ते इत्यादि जंगल में अकेले नहीं रहते। उनके साथ सम्पूर्ण पारितंत्र होता है।

कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में जीप सफारी
कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में जीप सफारी

बाघ वहीं होगा जहां उसका भोजन होगा। अर्थात जंगल में आपको हिरणों के झुण्ड दिखाई पड़ेंगे। रूककर इस मनभावन पशु की सुन्दरता निहारिये। इसकी वह मनमोहक चाल देखिये जिस पर सदियों से कवियों ने कई प्रसिद्ध कवितायें रची हैं। इनके साथ साथ आप जंगली हाथी, नीलगाय, गौर, सियार, जंगली कुत्ते इत्यादि कई जानवरों को देख सकते हैं।

नदी-तालाब के आसपास आपको मगरमच्छ अथवा घड़ियाल भी दृष्टिगोचर हो सकते हैं। यह इस तथ्य पर निर्भर है कि आप किस क्षेत्र के जंगल में विचरण कर रहे हैं।

शाकाहारी पशु

हाथी, हिरण, गेंडे, सांबर, गौर इत्यादि मेरे सामान शाकाहारी हैं। स्मरण रहे, इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि वे किसी पर हमला नहीं कर सकते। यदि उन्हें अपने प्राणों पर आघात का आभास होने लगे तो वे अवश्य हमला कर सकते हैं।

पक्षी

घने जंगलों में पक्षियों को ढूंढ पाना आसान नहीं! वहां उन्हें छुपने के लिए भरपूर स्थान प्राप्त होते हैं। वे हमसे लुका-छुपी का खेल खेलते रहते हैं। उन्हें ढूँढने का एक आसान उपाय आपको बताना चाहती हूँ। वे जब उड़ें तब उनके पीछे दृष्टि दौड़ाएं तथा उनके बैठने की प्रतीक्षा करें। कुछ पक्षियों को उनके विशिष्ट रंगों द्वारा पहचाना जा सकता है। नीलकंठ को उड़ते देखना अथवा नवरंग पक्षी के नौ रंगों को निहारना सदैव ही एक मनमोहक दृश्य होता है।

भरतपुर पक्षी उद्यान में चील
भरतपुर पक्षी उद्यान में चील

जंगलों के बाहरी सीमा पर यदि आप पगभ्रमण करें तो पक्षियों की विभिन्न प्रजातियाँ देख आप विस्मित हो जायेंगे। उनके रंगों एवं चहचहाहट को ध्यानपूर्वक सुनने की चेष्टा करें। ये आपको उन्हें पहचानने में सहायता करेंगी। कदाचित वहां आपको कई ऐसे पक्षी दिखेंगे जिन्हें इससे पूर्व ना तो आपने कभी देखा होगा ना ही इन्हें जानते होंगे। प्राप्त जानकारी के अनुसार भारत में पक्षियों की लगभग १३०० प्रजातियाँ पायी जाती हैं।

तितलियाँ

सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान में एक तितली
सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान में एक तितली

रंगबिरंगी तितलियाँ! छोटी बड़ी तितलियाँ! सूर्य के प्रकाश में फडफडाते ये नन्हे कीट सहज ही आपका मन मोह लेंते हैं। जंगलों में तो ये बहुतायत में उपलब्ध होते हैं। भारत में तितलियों की १००० से भी अधिक प्रजातियाँ पायी जाती हैं।

पतंगे

भारत के जंगलों में आप अनगिनत पतंगे देख सकते हैं। त्रिभुज के आकार के इस पतंगे को देखिये जिसे हमने सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान में किये गए जंगल सफारी के समय ढूंढा था। है ना यह अनोखा?

त्रिभुज पतंगा
त्रिभुज पतंगा

एशिया से लेकर दक्षिण प्रशांत के ऊष्णकटिबंधीय तथा उप-ऊष्णकटिबंधीय स्थानों में पाया जाने वाला यह त्रिभुज पतंगा (Trigonodes hyppasia)एक कीट है। इसके दोनों पंखों के अग्रभाग पर श्वेत किनारी के काले त्रिभुज बने होते हैं। प्रत्येक त्रिभुज के भीतर दो और त्रिभुज होते हैं।

ये जब पंख समेट कर बैठते हैं तब एक बड़ा श्वेत किनारी का त्रिभुज बनाते हैं जिसके भीतर चार त्रिभुज बन जाते हैं। अर्थात् ये चाहे उड़ रहे हों या बैठे हों, आप इन्हें आसानी से पहचान सकते हैं। पंखों पर इस आकर्षक त्रिकोणीय आकृति के कारण इसे चौकोणीय पतंगा भी कहा जाता है। इसका आकर लगभग २ सेंटीमीटर तथा पंखों का फैलाव ४ सेंटीमीटर होता है।

वृक्ष एवं लताएँ

लियाना बिना पत्तों की लम्बी तने वाली बेल है। इसकी जड़ें मिटटी की सतह पर फैली होती हैं तथा इसे ऊंचा बढ़ने के लिए अन्य वृक्षों के आधार की आवश्यकता होती है। जंगल के अन्य वृक्षों के समान यह भी धूप, जल एवं पोषण के लिये उसी मिट्टी पर निर्भर रहता है।

लियाना बेल
लियाना बेल

जंगल सफारी के समय आप वहां के वृक्षों एवं पौधों की जैव विविधता का बारीकी से अवलोकन करें। नवीन अंकुरित पौधों से ले कर दशकों पुराने वृक्षों तक, सब जंगल के पारितंत्र (ecology) का भाग हैं। इनमें कुछ वृक्ष सदियों प्राचीन हैं। जंगल के कुछ भाग इतने घने होते हैं कि सूर्य का प्रकाश जंगल के भीतर, धरती तक नहीं पहुँच पाता। इन ऊंचे ऊंचे वृक्षों पर कई प्रकार की लतायें लिपटी हुई होती हैं।

सर्प

जंगल में सर्पों की कई प्रजातियाँ दृष्टिगोचर होती हैं जिनमें कुछ विषैले भी होते हैं। नाग से लेकर वाईपर जैसे विषैले सर्प एवं अजगर से लेकर हरी वाइन सर्प से धामिन सर्प तक के बिना विषयुक्त सर्प यहाँ सफारी में बहुधा दिखाई पड़ जाते हैं। इनमें अजगर में एक विशेषता होती हैं।

लंगूर के धर दबोचे हुए अजगर
लंगूर के धर दबोचे हुए अजगर

अजगर एक विशाल सर्प होने के बाद भी विषैला नहीं होता। वह अपने शिकार को जकड़ कर उसका श्वास अवरुद्ध कर देता है, तत्पश्चात उसे निगल लेता है। सलग्न छायाचित्र में आप देख सकते हैं किस प्रकार एक अजगर लंगूर बन्दर को जकड़ रहा है।

मकड़ी

छोटे, बड़े एवं विशाल मकड़ियां एवं उनके जाले आपको जंगल में हर ओर दिखाई देंगे। जंगलों की झाड़ियों एवं वृक्षों की शाखाओं को जाले में बुनते, भिन्न भिन्न प्रकार की मकड़ियों को देख आप विस्मित हो जायेंगे।

मकड़ी और उसके बुने जाल
मकड़ी और उसके बुने जाल

नेफिला पिलिपेस मकड़ी जंगलों में बहुतायत में पायी जाती हैं। मादा मकड़ी अपेक्षाकृत बड़ी होती है। ३० से ५० मिलीमीटर के धड़ के साथ इसका सम्पूर्ण आकार २० सेंटीमीटर तक हो सकता है। वहीँ नर मकड़ी का धड़ केवल ५ से ६ मिलीमीटर तक ही होता है। जाले बुनने वाली मकड़ियों में इस प्रजाति की मकड़ियां सर्वाधिक विशाल होती हैं। इसके सुनहरे लंबवत जाल पर अनियमित आकार की जालियां होती हैं जो असममित होती हैं। यह विश्व की सर्वाधिक विशाल मकड़ियों में से एक है।

अर्गिओपे एमुला अथवा अंडाकार सेंट एंड्रू क्रॉस मकड़ी ऊष्णकटिबंधीय घास के मैदानों में पाए जाने वाली विशिष्ट मकड़ी है। ये मकड़ियां जब जाला बुनती हैं तब उन पर टेढ़ी-मेढ़ी वक्र रेखाएं बनाती हैं। छद्मावरण की भूमिका निभाते इस जाले के कारण ही इस मकड़ी को क्रॉस मकड़ी कहा जाता है।

फनल मकड़ी अथवा कीप मकड़ी द्वारा बुने जाल भी आकर्षक होते हैं। आप सोच में पड़ जाते हैं कि क्या इन्ही से ही कीप नाली की आकृति का आरम्भ हुआ था?

कीट

जंगल सफारी के समय, विशेषकर झीलों एवं जलनिकायों के समीप, आप विभिन्न प्रकार के कीट, पतंगे, कृमि एवं कुकुर्मुत्ते देखेंगे।

जंगली पुष्प

जंगली पुष्प
जंगली पुष्प

ऋतु के अनुसार जंगल में आप कई प्रकार के जंगली पुष्प देखेंगे, जैसे दुर्लभ एवं अनोखे जंगली आर्किड इत्यादि।

जंगल सफारी के प्रकार

जीप सफारी

जीप से जंगल सफारी
जीप से जंगल सफारी

जीप द्वारा राष्ट्रीय उद्यानों में सफारी करना, जंगल के जीवन का आनंद उठाने का सर्वाधिक लोकप्रिय साधन है। अधिकतर जंगल सफारी योजनाबद्ध रीत से प्रातःकाल एवं सान्झबेला में किये जाते हैं। सफारी का सही समय राष्ट्रीय उद्यान के पर्यावरण एवं वहां के नियमों पर निर्भर करता है। मेरी सलाह है कि आप अपनी सफारी पूर्व नियोजित कर लें क्योंकि अधिकतर प्रसिद्ध राष्ट्रीय उद्यानों में वहां पहुंचकर टिकट प्राप्त नहीं हो पाता।

नौका सफारी

जंगल के मध्य नौका विहार
जंगल के मध्य नौका विहार

देश में कई ऐसे राष्ट्रीय उद्यान हैं जो नदी, तालाब अथवा ऐसे ही किसी जल स्त्रोत के समीप स्थित हैं। ऐसे कुछ राष्ट्रीय उद्यानों में नौका द्वारा भी सफारी करने का विकल्प उपलब्ध होता है। आप नौका में बैठकर अपने आसपास हरे भरे जंगल देख सकते हैं।

नौका सफारी पक्षियों के अवलोकन के लिए अति-उपयुक्त है क्योंकि पक्षी बहुधा जल स्त्रोत के समीप ही विचरण करते हैं। रही बात जंगली जानवरों की, तो वे जल पीने अथवा जल में बैठकर शीतल होने के लिए इन स्त्रोतों के समीप आते ही हैं।

रात की सफारी

रात की जंगल सफारी निशाचरों को देखने के लिए
रात की जंगल सफारी निशाचरों को देखने के लिए

निशाचर जंगली जानवरों एवं पक्षियों को देखने के लिए रात की सफारी सर्वोत्तम विकल्प है। ये जानवर आसानी से नहीं दिखाई देते। मुझे स्मरण है, ऐसे ही एक सफारी में हमें दो भालू दिखे थे। रात में उनकी आँखें चमक रही थीं।

रात की सफारी अनिवार्य रूप से जीप की सवारी होती है। यह सफारी प्रतिबंधित वन क्षेत्र की बाहरी सीमा पर स्थित मार्गों अथवा बफर क्षेत्रों पर ही की जाती है।

पैदल सफारी

आप अचरज में आ गए? जी हाँ! कई राष्ट्रीय उद्यानों में पैदल सफारी करने की अनुमति दी जाती है। इनमें सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान एक है। इस सफारी में आपके साथ वन पथप्रदर्शक, प्रकृतिविद एवं वन सहायकों का दल भी चलते हैं। वन प्रदर्शक को ना केवल जंगल के भीतर की पगडंडियों का ज्ञान होता है, वहां के जानवरों एवं पक्षियों का भी ज्ञान होता है। वे इन्हें ढूँढने में अत्यंत निपुण होते हैं। जंगल में उगती वनस्पतियों एवं वृक्षों की जानकारी भी वे रखते हैं।

पैदल जंगल सफारी
पैदल जंगल सफारी

यदि आप जिज्ञासु हैं तो उनसे एवं इन जंगलों से बहुत कुछ सीख सकते हैं। यह सफारी भी मुख्य वन में नहीं की जाती, बल्कि जंगल की बाहरी सीमा अथवा बफर क्षेत्र में की जाती है। चूंकि यह सफारी पैदल की जाती है, पैरों में आरामदेह जूते एवं सर पर टोपी अवश्य लें।

हाथी पर सफारी

हाथी पर सफारी अब कुछ ही स्थानों पर कराई जाती है। मैंने हाथी पर सफारी का आनंद पश्चिम बंगाल के जलदापारा राष्ट्रीय उद्यान में उठाया था। यह अपने आप में एक अनोखी सफारी थी। एक अद्भुत अनुभव था। इतनी ऊंचाई से जंगल का दृश्य अत्यंत रोमांचक होता है। ऊंची-नीची धरती पर हाथी का इतनी आसानी से चलना आश्चर्यजनक है।

हाथी पर जंगल सफारी
हाथी पर जंगल सफारी

अचानक मैंने अनुभव किया कि हम ऊंचे ऊंचे घास के मैदानों पर चल रहे थे। हमसे भी ऊंचे इन घास के बीच से केवल हाथी की पीठ पर बैठ कर ही जा सकते हैं। मध्यप्रदेश के बांधवगड राष्ट्रीय उद्यान में जीप सफारी के साथ हाथी सफारी भी कराई जाती है। हाथी द्वारा बाघ को अत्यंत समीप से देखा जा सकता है।

जंगल सफारी के लिए सर्वोत्तम राष्ट्रीय उद्यान

भारत के कई जंगलों में मैंने सफारी की है। अब भी कई राष्ट्रीय उद्यान एवं वन्यजीव अभयारण्यों के दर्शन शेष हैं। अपने द्वारा किये गए जंगल सफारी में से मुझे जो सर्वोत्तम प्रतीत हुए, उनके विषय में यहाँ उल्लेख करना चाहती हूँ। इन्हें समझ कर कम से कम २-३ जंगल सफारी चुनिए जो भिन्न अनुभव प्रदान करने में सक्षम हैं। अपनी आगामी अवकाश में आप उन जंगल सफारी में से एक अवश्य कीजिये।

कान्हा राष्ट्रीय उद्यान – मध्य प्रदेश

कान्हा राष्ट्रीय उद्यान अर्थात् कान्हा बाघ संरक्षण क्षेत्र के जंगल में ही सर्वप्रथम मुझे जंगल के बाघ को अपने जंगली परिवेश में देखने का सुअवसर प्राप्त हुआ था। मध्य प्रदेश राज्य के १९०० वर्ग कि.मी. के क्षेत्र में पसरे कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में मध्य भाग एवं बाहरी भाग सीमांकित है। कहा जाता है कि कान्हा में बाघ के दिखने की संभावना सर्वाधिक है।

कान्हा का मुन्ना
कान्हा का मुन्ना

कान्हा का बाघों में बाघ, जिसे प्रेम से मुन्ना बुलाया जाता है, सर्वाधिक मित्रवत बाघ है। वह पर्यटकों से अत्यंत सहज है। वह हमारी जीप के समीप से शान्तिपूर्वक पदचाप करता निकल जाता था, हमारे मार्ग को काटता हुआ उस पार चला जाता था तथा अपनी जंगली प्रणाली से अपना क्षेत्र सीमांकित करता था। इस प्रकार वह पर्यटकों को आनंदित कर देता था।

और पढ़ें : मुन्ना– कान्हा राष्ट्रीय उद्यान के बाघों में बाघ से एक भेंट

कान्हा राष्ट्रीय उद्यान बारहसिंघों के लिए भी प्रसिद्ध है। इनके साथ साथ कान्हा में कई अन्य प्रकार के जंगली जानवर, पक्षियों की लगभग ३०० प्रजातियाँ तथा लगभग १००० प्रकार के पुष्पीय पौधे हैं।

और पढ़ें : कान्हा राष्ट्रीय उद्यान का मुझसे बतियाना सुनें

सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान – मध्य प्रदेश

जीप सफारी, नौका सफारी, पदयात्रा सफारी एवं रात्रि सफारी, इन सब सफारी का अप्रतिम आनंद हमने मध्य प्रदेश के इस सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान व बाघ संरक्षित क्षेत्र में उठाया। १४०० वर्ग कि.मी. के क्षेत्र में पसरे इस उद्यान के कई भाग हैं। यहाँ का एक अन्य विशेष आकर्षण है देनवा नदी का अप्रवाही जल। इस जल पर नौका विहार का आनंद लेते हुए आप प्रतिबंधित वन क्षेत्र के भीतर निर्बाध प्रवेश कर सकते हैं।

और पढ़ें: सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान में जीप सफारी

गाँव के समीप, वन के सीमावर्ती क्षेत्रों में आप पक्षी दर्शन का आनंद उठा सकते हैं। इसके लिए आवश्यक जानकारी प्राप्त कर, प्रातःकालीन पक्षीदर्शन अवश्य करें। हम जिस रेसॉर्ट में ठहरे थे, उसके उद्यान में हमने अनेक तितलियों को भी देखा। नवम्बर का महीना होने के कारण हमें कई आकर्षक रंगबिरंगी तितलियाँ दिखीं।

और पढ़ें: सतपुडा राष्ट्रीय उद्यान के जंगलों को जानने के ५ मार्ग

पेंच राष्ट्रीय उद्यान – मध्य प्रदेश

पेंच राष्ट्रीय उद्यान एवं बाघ संरक्षित क्षेत्र का नाम पेंच नदी पर रखा गया है जो इस जंगल के मध्य से बहती है। इस उद्यान में भी बाघ के दिखने की संभावना अत्यधिक है।

पेंच की कालर वाली बाघिन
पेंच की कालर वाली बाघिन

इस जंगल की प्रसिद्ध रानी बाघिन, जिसे प्रेम से कॉलरवाली बाघिन कहा जाता है, इस जंगल का मुख्य आकर्षण है। कॉलरवाली बाघिन ने अब तक २२ से भी अधिक शावकों को जन्म दिया है। यह अपने आप में एक इतिहास है। कुछ का मानना है कि कदाचित उसके २६ शावकों को जन्म दिया था। कॉलरवाली बाघिन भी पर्यटकों से अत्यंत सहज एवं निर्भय है। इसी कारण कई लोगों ने उसे अपने शावकों के संग अत्यंत समीप विचरण करते देखा। उन पर्यटकों में मैं भी एक हूँ।

और पढ़ें: कॉलरवाली बाघिन – पेंच राष्ट्रीय उद्यान की रानी

पेंच राष्ट्रीय उद्यान मध्य प्रदेश राज्य के दक्षिणी सीमा पर स्थित है जहां वह महाराष्ट्र राज्य से जुड़ता है। इस उद्यान का ७५० वर्ग कि.मी. भाग मध्य प्रदेश में तथा ७०० वर्ग कि.मी. भाग महाराष्ट्र में है।

पेंच में मिला एक उल्लुओं का जोड़ा
पेंच में मिला एक उल्लुओं का जोड़ा

सफारी के समय आप पक्षियों की अनेक प्रजातियाँ यहाँ देख पायेंगे। इस उद्यान के सीमावर्ती गावों में भी आप कई प्रकार के पक्षी देख सकते हैं।

पेंच में मेरी सफारी के समय जो पक्षी मैंने देखे उनमें मुख्य आकर्षण थे, पीले सर वाला कठफोड़वा तथा भारतीय उल्लुओं का जोड़ा।

और पढ़ें: पेंच राष्ट्रीय उद्यान के पक्षी

पेंच राष्ट्रीय उद्यान एक अन्य आकर्षण था वृक्ष के ऊपर बना भव्य अतिथि कक्ष।

आसाम का नामेरी राष्ट्रीय उद्यान

आसाम एवं अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर स्थित नामेरी राष्ट्रीय उद्यान लगभग २०० वर्ग कि.मी के क्षेत्र में पसरा हुआ है। जिया भोरोली नदी एवं उसकी सहायक नदियाँ इसका पोषण करती हैं। नामेरी के उत्तर-पूर्वी छोर पर, अरुणाचल प्रदेश राज्य के भीतर पाखुई वन्यजीव अभ्यारण्य है। ये दोनों जुड़े अभ्यारण्य जंगली पशु-पक्षियों के लिए भरपूर साधन प्रदान करते हैं।

उत्तर-पूर्वी राज्यों के भ्रमण के समय मेरे पास समय की किंचित तंगी थी। सीमित समय में हम केवल नामेरी इको कैंप से जिया भोरोली नदी तक की प्रातःकालीन सफारी ही कर पाए। मुझे विश्वास है नामेरी राष्ट्रीय उद्यान में इसके अतिरिक्त भी बहुत कुछ था जो मैं देख नहीं पायी थी। नामेरी राष्ट्रीय उद्यान का प्रमुख आकर्षण हाथी हैं।

मध्य प्रदेश का बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान

बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान में विश्व के सर्वाधिक बाघों की उपस्थिति मानी जाती है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि आप यहाँ सफारी करते समय बाघ नहीं देख पाए तो यह आपका दुर्भाग्य होगा। मेरे विषय में यह सत्य सिद्ध हुआ। मैंने ताला एवं मगधी क्षेत्र में ३ सफारी किये किन्तु मैं बाघ नहीं देख पायी। परन्तु मैं निराश नहीं हुई। मैंने जंगल के अन्य आकर्षणों की ओर ध्यान केन्द्रित किया।

और पढ़ें: बाघों के परे बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान के अन्य आकर्षण

बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान में विष्णु की प्राचीन प्रतिमा
बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान में विष्णु की प्राचीन प्रतिमा

४५० वर्ग कि.मी. के क्षेत्रफल में पसरा बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान का नामकरण बांधवगढ़ नामक एक प्राचीन दुर्ग पर किया गया है। इस उद्यान में स्तनपायी पशुओं की लगभग ३७, पक्षियों की ३५० तथा तितलियों की ८० प्रजातियाँ पायी जाती हैं। यह बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान तथा बाघ संरक्षित क्षेत्र को जीप व हाथी सफारी का उत्तम स्थान बनाता है।
बांधवगढ़ एक समय जीवित दुर्ग था। अतः इसका एक संपन्न इतिहास एवं विरासत है।

और पढ़ें: बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान का जीवन, इतिहास एवं विरासत

पश्चिम बंगाल का जल्दापारा राष्ट्रीय उद्यान

उत्तरी बंगाल क्षेत्र में हिमालय की तलहटी में जल्दापारा राष्ट्रीय उद्यान स्थित है। यह एकल सींग वाले गेंडे के लिए प्रसिद्ध है। २०० वर्ग कि.मी. के क्षेत्र में पसरा यह राष्ट्रीय उद्यान कई प्राकृतिक आरक्षित क्षेत्रों के समीप है, जैसे चिलापाटा नामक हाथी गलियारा, बुक्सा बाघ संरक्षित क्षेत्र तथा गोरुमारा राष्ट्रीय उद्यान।

बंगाल पर्यटन का होल्लोंग टूरिस्ट लॉज इस जंगल में रहने का सर्वोत्तम स्थान है। यहाँ से आप इसके समक्ष बहती छोटी सी नदी के उस पार एकल सींग वाले गेंडे, गौर, जंगली सूअर तथा हिरण देख सकते हैं। सैकड़ों पक्षी इसके ऊपर मंडराते रहते हैं।

होल्लोंग टूरिस्ट लॉज इकलौता स्थान है जहां जंगल में मुझे जीप सफारी के साथ हाथी सफारी का भी भरपूर आनंद प्राप्त हुआ।

और पढ़ें: होल्लोंग – जैव विविधता से परिपूर्ण दुआर्स का जल्दापारा राष्ट्रीय उद्यान

जी हाँ! रात होते ही एकल सींग वाले गेंडे होल्लोंग टूरिस्ट लॉज के समीप तक आ जाते थे। इससे पूर्ण इतने समीप से मैंने कभी किसी जंगली जानवर को नहीं देखा था।

उत्तराखंड का राजाजी राष्ट्रीय उद्यान

८०० वर्ग कि.मी. के क्षेत्रफल में पसरा राजाजी राष्ट्रीय उद्यान उत्तराखंड में हिमालय के चरणों में स्थित है। राजाजी राष्ट्रीय उद्यान का नामकरण भारतरत्न सी. राजगोपालचारी के नाम पर किया गया है जो भारत के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे। हाथी, हिमालयी वन्य जीवन तथा पक्षी दर्शन के लिए यह उद्यान सर्वोत्तम राष्ट्रीय उद्यानों में से एक है। भारत में पक्षियों की जितनी भी प्रजातियाँ हैं, उनमें से कम से कम एक तिहाई आप यहाँ एक उद्यान में ही देख सकते हैं।

और पढ़ें: राजाजी राष्ट्रीय उद्यान – चीला आरक्षित वन के वन्यजीवन का आनंद उठायें

भरपूर समय साथ लेकर यहाँ आईये तथा शांतिपूर्वक इस उद्यान का आनंद उठाईये।

तेलंगाना का पोचरम अभयारण्य

पोचरम बाँध द्वारा सृजित पोचरम झील पर इस अभयारण्य का नामकरण किया गया है। लगभग १०० वर्ग कि.मी. के क्षेत्र में पसरा तेलंगाना का यह अभयारण्य अपेक्षाकृत छोटा है। आप इस जंगल की पगडंडियों पर पदयात्रा करते हुए कई हिरण एवं पक्षी देख सकते हैं। यह अभयारण्य हैदराबाद से लगभग ४० कि.मी. की दूरी पर ही स्थित है। अतः आप हैदराबाद से दिवसीय यात्रा कर सकते हैं।

और पढ़ें: पोचरम अभयारण्य एवं बाँध – हैदराबाद से सप्ताहांत घुमक्कड़ी

राजस्थान का केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान

भरतपुर पक्षी अभ्यारण्य में सारस अथवा क्रोंच पक्षी
भरतपुर पक्षी अभ्यारण्य में सारस अथवा क्रोंच पक्षी

राजस्थान का केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान, भरतपुर पक्षी अभयारण्य के नाम से अधिक प्रसिद्ध है। यहाँ आप पक्षियों की लगभग ३७० प्रजातियाँ देख सकते हैं। २९ वर्ग कि.मी. में पसरे इस दलदली क्षेत्र में कई प्रवासी पक्षी डेरा डालते हैं। पुष्पों की ३७९ प्रजातियाँ देख सकते हैं। सारस, नीलगाय, सियार, अजगर इत्यादि भी देख सकते हैं।

और पढ़ें: भरतपुर पक्षी अभयारण्य

भरतपुर अभयारण्य के भीतर पक्के मार्ग हैं जिन पर सूर्योदय से सूर्यास्त के भीतर सफारी की अनुमति दी जाती है। पैदल, सायकल, घोड़ागाड़ी तथा सायकल रिक्शा द्वारा पर्यटक इस अभयारण्य का अवलोकन कर सकते हैं। हमने सर्वप्रथम सायकल रिक्शा द्वारा अभयारण्य की सफारी की। तत्पश्चात अभयारण्य के भीतर ११ कि.मी. लम्बे मार्ग पर पदयात्रा करते हुए अभयारण्य का सविस्तार अवलोकन किया। यदि आप में सहनशक्ति है तो इस अभयारण्य को जानने हेतु पैदल सफारी ही सर्वोत्तम विकल्प है।

आसाम का काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान

एक सींग वाले गैंडे का बच्चा
एक सींग वाले गैंडे का बच्चा

काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान युनेस्को द्वारा घोषित एक विश्व विरासती स्थल है जहां विश्व के लगभग दो-तिहाई एकल सींग गेंडों का वास है। इनके अलावा बाघ, हाथी, जंगली दलदलीय भैंसों इत्यादि के लिए भी यह महत्वपूर्ण स्थान है। ८०० वर्ग कि.मी. के क्षेत्र में पसरा यह राष्ट्रीय उद्यान आसाम के उत्तर-पूर्वी भाग में स्थित है। एक एकल सींग मादा गेंडे को उसके शावक के संग हमारे जीप के अत्यंत समीप देखने का सौभाग्य हमें काजीरंगा में ही प्राप्त हुआ था। यहाँ ३-४ क्षेत्र हैं जहां प्रातःकालीन एवं दोपहर की जीप सफारी कराई जाती है। हाथी की सवारी करते हुए भी सफारी का आनंद उठाया जा सकता है।

और पढ़ें: काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान – एकल सींग गेंडों का महत्वपूर्ण स्थान

काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान को आड़ी-तिरछी रखाओं में कई नदियाँ काटती हैं। इनमें ब्रह्मपुत्र नदी प्रमुख है।

राजस्थान का सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान एवं बाघ संरक्षित क्षेत्र

८६६ वर्ग कि.मी. के क्षेत्र में फैला यह अभयारण्य राजस्थान के अलवर जिले में स्थित है। यहाँ हमने जीप सफारी की थी किन्तु बाघ देख पाने में दुर्भाग्यशाली सिद्ध हुए थे। फिर भी हमने यहाँ भरपूर आनंद उठाया। हमने यहाँ कई पक्षी एवं जल स्त्रोतों के समीप कई मगरमच्छ ढूंडे। घने जंगल की छत्रछाया के नीचे से गाड़ी चलायी जहां सूर्य की किरणें भी क्वचित ही पहुँच पाती हैं।

गोवा का बोंडला अभयारण्य

८ वर्ग कि.मी. के क्षेत्र में पसरा, गोवा राज्य के उत्तर-पूर्वी परिक्षेत्र में स्थित बोंडला अभयारण्य में एक चिड़ियाघर, एक मृगवन, एक वनस्पति उद्यान तथा भरपूर पक्षी अवलोकन के सुअवसर हैं। इस छोटे से अभयारण्य में केवल पैदल चलकर ही आनंद लिया जा सकता है। अतिउत्साही पर्यटकों के लिए अभयारण्य जंगल में पैदल यात्रा भी आयोजित करता है।

और पढ़ें: बोंडला अभयारण्य एवं चिड़ियाघर – गोवा का पर्यटन आकर्षण

उत्तराखंड का जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान

उत्तराखंड राज्य के नैनीताल जिले में लगभग १३१८ वर्ग कि.मी. के क्षेत्र में फैला यह जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान भारत के प्राचीनतम राष्ट्रीय उद्यान एवं बाघ संरक्षित क्षेत्र में से एक है। पर्यटक यहाँ मुख्यतः बाघ एवं जंगली हाथी देखने आते हैं। यहाँ स्तनपायी जानवरों की लगभग ५० प्रजातियाँ एवं पक्षियों की लगभग ५८० प्रजातियाँ हैं।

जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान में चितकबरे हिरण
जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान में चितकबरे हिरण

यहाँ प्रमुख रूप से जीप सफारी कराई जाती है जो उद्यान के कई भागों में पृथक रूप से आयोजित की जाती हैं। चूंकि यह एक अत्यंत फैला हुआ उद्यान है, यहाँ कई बार सफारी के समय बाघों के दर्शन नहीं हो पाते। मैं भी उनमें से एक हूँ। अतः मैं आपको एक से अधिक सफारी करने का सुझाव देती हूँ। पैदल सफारी की अनुमति केवल बफर जोन में ही है। यहाँ की वनस्पति, जीव एवं जंतुओं के अवलोकन हेतु पैदल सफारी सर्वोत्तम उपाय है।

कर्नाटक का बांदीपुर राष्ट्रीय उद्यान

कर्नाटक राज्य के चामराजनगर जिले में लगभग ९१२ वर्ग कि.मी. के क्षेत्र में पसरा बांदीपुर राष्ट्रीय उद्यान एवं बाघ संरक्षित क्षेत्र कदाचित दक्षिण भारत का सर्वोत्तम राष्ट्रीय उद्यान है। इस उद्यान के आसपास स्थित नागरहोले एवं मदुमलाई राष्ट्रीय उद्यान, वायनाड अभयारण्य तथा निलगिरी संरक्षित जैव मंडल इस सम्पूर्ण क्षेत्र को भारत में बाघों एवं हाथियों का विशालतम संग्रह बनाता है। जीप एवं बस द्वारा यहाँ जंगल सफारी आयोजित की जाती है।

यह उद्यान वनस्पतियों, जीव-जंतुओं पक्षियों तथा तितलियों से परिपूर्ण है।

कर्नाटक का दान्डेली अभयारण्य

मलाबारी चितकबरे धनेश एवं मलाबारी विशाल गिलहरियों से भरा दान्डेली अभयारण्य कर्नाटक के पश्चिमी घाट के ऊपर स्थित है। उत्तरी कन्नड़ जिले के ८६६ वर्ग कि.मी. के क्षेत्र में फैला यह अभयारण्य एक बाघ संरक्षित एवं हाथी संरक्षित क्षेत्र है। यहाँ जीप सफारी करते समय हमने कई गीदड़ों एवं नेवलों को ढूंडा। एक दर्शन स्थल से पश्चिमी घाट के घने विशाल जंगल की हरियाली देखकर दंग रह गए। आप यहाँ जीप सफारी ले सकते हैं जो सूर्योदय से पूर्व तथा संध्या के समय की जाती हैं।

और पढ़ें: मलाबारी चितकबरे धनेश के भरा दान्डेली अभयारण्य

इस अभयारण्य के समीप से काली नदी बहती है। बाँध के जल से पोषित इस नदी में १२ महीने भरपूर जल बहता है। इसी कारण यह नदी एवं इसकी झीलें कई जलक्रीडाओं का केंद्र भी है। आप जंगल सफारी के साथ इन जल क्रीडाओं का भी आनंद ले सकते हैं। पक्षी अवलोकन के लिए भी यह उत्तम स्थान है। यहाँ आप २००से भी अधिक पक्षियों की प्रजातियाँ ढूंड सकते हैं।

और पढ़ें: काली नदी के किनारे दान्डेली – कर्नाटक का एक सम्पूर्ण पर्यटन स्थल

उत्तराखंड का बिनसर अभयारण्य

चलिए पर्यावरण का संरक्षण करें - बिनसर उत्तराखंड
चलिए पर्यावरण का संरक्षण करें – बिनसर उत्तराखंड

उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में अल्मोड़ा से लगभग ३५ कि.मी. दूर स्थित बिनसर अभयारण्य का क्षेत्रफल लगभग ४५ वर्ग कि.मी. है। बिनसर के जंगल में जीप सफारी एवं पैदल सफारी दोनों उपलब्ध है। हमने यहाँ पैदल सफारी की थी। इस जंगल को जानने के लिए यहाँ की वनस्पतियों एवं पशु-पक्षियों के मध्य पैदल सफारी सर्वोत्तम है। बिनसर अभयारण्य हिमालय दर्शन के लिए भी अत्यंत प्रसिद्ध है। अभयारण्य के भीतर स्थित कुमाऊं मंडल विकास निगम के अतिथिगृह से एवं जीरो-पॉइंट से हिमालय का अकल्पनीय दर्शन प्राप्त होता है।

और पढ़ें: कुमाऊं, उत्तराखंड के बिनसर से दीप्तिमान हिमालय के भव्य दर्शन

पहाड़ पर स्थित होने के कारण इस अभयारण्य में संकरी पगडंडियाँ हैं। यहाँ आप हिमालयी जंगली जानवरों को तो देख ही सकते हैं, साथ ही पहाड़ी शुद्ध वायु में पनपते वृक्ष एवं वनस्पतियों के भी दुर्लभ दर्शन कर सकते हैं। इस अभयारण्य में पक्षियों की भी कई प्रजातियाँ दिख जाती हैं।

जंगल सफारी का सही समय

किसी भी जंगल के भीतर सफारी करने का सर्वोत्तम समय प्रातःकाल, संध्या तथा रात्रि का समय होता है। ऐसा देखा गया है कि प्रातःकाल सूर्योदय के समय अधिकतर जंगली प्राणियों के दुर्लभ दर्शन हो जाते हैं। रात की सफारी में निशाचर प्राणियों को देखा जा सकता है।

जंगल सफारी के लिए कुछ आवश्यक जानकारियाँ:

• जंगल सफारी के समय कुछ भी खाद्य पदार्थ अपने साथ ना ले जाएँ।
• जंगल में भ्रमण केवल वन विभाग कर्मियों एवं प्रशिक्षित कर्मचारियों के संग ही करें।
• जंगल सफारी करने से पूर्व वन विभाग के अनुमति लेकर उनके दिशा-निर्देश में ही सफारी करें।
• जंगल में स्वयं भ्रमण करने कदापि ना निकलें।
• चटक एवं चमकीले रंग के वस्त्र धारण ना करें। इससे जंगली प्राणी डरकर दूर चले जाते हैं अथवा छुप जाते हैं। जंगल के परिवेश से मिलते जुलते वस्त्र ही पहनें।
• जंगल में गाना-बजाना ना करें। ना ही किसी अन्य प्रकार का शोर करें। इससे भी प्राणी दूर भाग जायेंगे। जंगल के संगीत पर ध्यान केन्द्रित करें। यह आपको अन्यथा नहीं सुनायी देंगे।
• जंगल सफारी के समय दूरबीन अवश्य साथ ले लें। इससे आप जंगली परिवेश एवं यहाँ के जीव-जंतुओं को समीप से देख सकेंगे।
• जानवरों को त्रास ना दें, ना ही उन्हें कुछ खिलाएं।
• जानवरों के समीप जाने का प्रयास ना करें। जानवरों के अपने सुरक्षित घेरे होते हैं। उस घेरे के समीप जाने पर वे भाग सकते हैं तथा कुछ दशाओं में वे आक्रामक भी हो सकते हैं। उनके क्षेत्र का आदर दें।
• जंगलों की पगडंडियाँ बहुधा ऊंची-नीच, घुमावदार एवं संकरी होती हैं। इन पर जीप द्वारा भ्रमण करते समय स्वयं का ध्यान रखें ताकि जीप के किसी भाग से आपको चोट ना पहुंचे। चौकस रहें तथा जीप की डंडी को कसकर पकड़ें।
• जंगल सफारी की जीप अधिकतर बंटवारे के आधार पर दिया जाता है। यदि आप समूह में भ्रमण कर रहें हैं तो पूर्ण जीप आपको दी जा सकती है।
• जीप सफारी करने से पूर्व इसके शुल्क की जानकारी प्राप्त कर लें। साथ ही इनकी अग्रिम बुकिंग कर लें ताकि वहां जाकर निराशा ना हो।
• अन्य सफारी के विषय में भी पूर्व जानकारी एकत्र करें। अपनी इच्छानुसार सफारी का चयन करें।
• प्रातःकालीन एवं रात्रि सफारी के समय शीतल वायु असहनीय हो सकती है। अतः सफारी के समय गर्म वस्त्र साथ ले लें। दोपहर की सफारी के समय टोपी भी अवश्य लें।
• जंगली जानवर अपने परिवेश में अपने नियमों से जीवन जीते हैं। अतः किसी भी जंगल में इन जानवरों के दिखने की गारंटी कोई नहीं दे सकता है। यदि आप बाघ, तेंदुआ अथवा अन्य दुर्लभ प्राणी ना देख पायें तो निराश ना होइये। जंगल के अन्य आकर्षणों का भी ध्यानपूर्वक अवलोकन करें। शहरी परिवेश में यह असंभव है।

छुट्टियों में जंगल सफारी की योजना

सामान्यतः वर्षा ऋतु में सभी राष्ट्रीय उद्यान एवं अभयारण्य पर्यटकों के लिए बंद होते हैं। भारत में वर्षा ऋतू की समयावधि विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न भिन्न होती है। अन्य समय में यहाँ सप्ताह में एक दिन तथा किसी राष्ट्रीय/स्थानीय उत्सवों में छुट्टी हो सकती है। अतः वन विभाग से प्रवेश की अग्रिम अनुमति एवं सफारी बुकिंग अवश्य प्राप्त कर लें। आप यह उनके वेबस्थल से प्राप्त कर सकते हैं अथवा आपने टूर ऑपरेटर या अपने होटल द्वारा भी इसकी व्यवस्था कर सकते हैं।

सफारी करने के लिए आपको राष्ट्रीय उद्यान का प्रवेश शुल्क, जीप का किराया तथा परिदर्शक का शुल्क देना पड़ेगा। वन्य जीवन प्रशिक्षण प्राप्त परिदर्शक आपको वन्य जीव-जंतु देखने में अत्यंत सहायक होते हैं। साथ ही वे आपको वन्य जीवन के विषय में आवश्यक जानकारी भी देते हैं।

प्रातःकालीन एवं दोपहर की जीप सफारी की व्यवस्था सामान्यतः उपलब्ध होती है। कई अभयारण्यों में हाथी सफारी, नौका सफारी, रात्री सफारी तथा पैदल सफारी की भी व्यवस्था होती है। इनके विषय में एवं इनके समय की पूर्ण जानकारी अवश्य प्राप्त करें। तत्पश्चात अपनी इच्छानुसार सफारी का चयन कर अग्रिम बुकिंग कर लें। सफारी के समय आपका परिचय पत्र तथा राष्ट्रीयता प्रमाण साथ रखें।

भारत के विभिन्न भौगोलिक भागों में भिन्न वन क्षेत्र हैं तथा उनमें भिन्न भिन्न ऋतुओं में सफारी की समयावधि भी भिन्न होती हैं। सफारी की योजना बनाते समय इन सब तथ्यों का अवश्य ध्यान रखें।

जंगल सफारी करने के पश्चात अपना अनुभव हमसे बांटना ना भूलें।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post भारत में जंगल सफारी – कब, कहाँ, क्या और कैसे देखें? appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/jangal-safari-rashtriya-udyan-bharat/feed/ 3 1359
कास पठार – महाराष्ट्र के सातारा में फूलों की घाटी https://inditales.com/hindi/kaas-pathar-valley-of-flowers/ https://inditales.com/hindi/kaas-pathar-valley-of-flowers/#comments Wed, 10 Oct 2018 02:30:11 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=662

कास पठार – फूलों की घाटी   महाराष्ट्र के सातारा नगर के कास पठार को फूलों की घाटी भी कहा जाता जाता है। यह उत्तराखंड की प्रसिद्ध फूलों की घाटी को महाराष्ट्र का प्रत्युत्तर है। दोनों ही घाटियों में लगभग एक ही समय, यानी वर्षा ऋतु के आखरी दो महीनों में अर्थात अगस्त और सितंबर के […]

The post कास पठार – महाराष्ट्र के सातारा में फूलों की घाटी appeared first on Inditales.

]]>

कास पठार – फूलों की घाटी  

कास पठार - फूलों की घाटी
कास पठार – फूलों की घाटी

महाराष्ट्र के सातारा नगर के कास पठार को फूलों की घाटी भी कहा जाता जाता है। यह उत्तराखंड की प्रसिद्ध फूलों की घाटी को महाराष्ट्र का प्रत्युत्तर है। दोनों ही घाटियों में लगभग एक ही समय, यानी वर्षा ऋतु के आखरी दो महीनों में अर्थात अगस्त और सितंबर के महीनों में फूलों की बहार छा जाती है। लेकिन उत्तराखंड में जहाँ, आपको पहाड़ी की तलहटी तक पहुँचने के बाद हिमालय के कठोर भूभाग से पदयात्रा करते हुए फूलों की घाटी तक जाना पड़ता है; वहीं सातारा शहर की अनेक पहाड़ियों में से एक पर बसे हुए कास पठार तक आप गाड़ी लेकर भी जा सकते हैं।

कास पठार के रंग भरे फूल
कास पठार के रंग भरे फूल

कास पठार तक जाते समय रास्ते में हमारा सामना लगभग दो मी. की लंबाई के एक साँप से हुआ जो अचानक से सड़क के बीचोबीच आ गया और अपना ही समय लेते हुए सड़क पार करते हुए चला गया। अगली सुबह जब हम महाराष्ट्र पर्यटन विकास निगम (MTDC) के गमन स्थान, जहाँ पर हम ठहरे हुए थे, से पदयात्रा करते हुए कास पठार तक जा रहे थे, तो हमे वहाँ पर बहुत सारे साँप दिखे जो मदमस्त यहाँ-वहाँ घूम रहे थे। दुर्भाग्य से वहाँ पर बहुत सारे साँप मृत भी पड़े हुए थे, जो शायद आती-जाती गाड़ियों के पहियों के नीचे कुचलकर मर गए थे। हमे वहाँ पर कुछ नेवले भी दिखे थे, तो शायद हो सकता है कि इसमें इन नेवलों का भी थोड़ा-बहुत योगदान रहा होगा। इसके अतिरिक्त यहाँ पर आपको बहुत सारी रंगबिरंगी तितलियाँ भी नज़र आती हैं। यहाँ के व्यापक परिदृश्यों के कारण इन तितलियों की एक तस्वीर लेने के लिए आपको बहुत धीरज रखना पड़ता है।

फूलों के बदलते रंग  
कास पठार के सूक्ष्म पुष्प
कास पठार के सूक्ष्म पुष्प

हमे बताया गया कि कास पठार पर खिलने वाले फूलों के रंग लगभग हर सप्ताह बदलते रहते हैं। अगस्त के तीसरे सप्ताह में जब हम वहाँ पर गए थे तो यह पूरा पठार धवल फूलों से भरा हुआ था। यद्यपि इन में से कुछ फूलों पर हल्का सा गुलाबी रंग भी झलक रहा था। वहाँ पर बहुत सारे सूक्ष्म आकार के फूल हैं जिन्हें देखने के लिए आपको गरुड जैसी तीक्ष्ण दृष्टि की आवश्यकता होती है और उनकी तस्वीरें लेने के लिए एक उत्तम कैमरे की जरूरत होती है।

यहाँ पर एक सरोवर भी है जिसे कास सरोवर कहा जाता है और जिसकी फुलवारी में नीले रंग के सुंदर फूल खिले थे। यहाँ पर आपको खाने की कुछ चीजें भी मिल सकती हैं।

यूनेस्को द्वारा जैवविविधता को धरोहर का मान     

धवल गुलाबी छोटे बड़े फूल
धवल गुलाबी छोटे बड़े फूल

भारत के पश्चिमी घाट का भाग होने के नाते कास पठार को यूनेस्को विश्व धरोहर के स्थलों में गिना जाता है। यूनेस्को ने इस मुख्य पठार की सुरक्षा हेतु वहाँ पर बाड़ लगाने का निर्णय लिया है, ताकि यहाँ के फूलों को कोई हानि ना पहुंचे और आगंतुक भी उनसे सुरक्षित दूरी बनाए रखे। हमे बताया गया कि यह सब करने से पहले यहाँ पर आनेवाले पर्यटक इन मैदानों में फूटबाल खेला करते थे, जिसके कारण यहाँ के छोटे-छोटे फूल और फुलवारियाँ उजड़ जाती थी। दुर्भाग्यवश हमे यहाँ पर लगाई गयी बाड़ में काफी छेद दिखे, जिसके द्वारा लोग इन फुलवारियों में प्रवेश करते थे। इस पठार पर यहाँ-वहाँ कुछ मार्ग बनवाए गए हैं, जिससे की लोगों को इस पूरे पठार की सैर करने में आसानी हो।

कास पठार की यात्रा हेतु कुछ सूचनाएँ     

कास पठार के बीच से जाती सड़क
कास पठार के बीच से जाती सड़क
  • यहाँ पर बहुत ठंड पड़ती है और ज़ोर की हवाएँ भी चलती हैं, इसलिए जरूरत के अनुसार चीजें ले जाएं।
  • यहाँ पर बहुत सारे मच्छर और मक्खियाँ भिनभिनाती रहती हैं, इसलिए जितना हो सके अपने आपको स्कार्फ या जैकेट से ढक लीजिये और पूरे बदन को ढकने योग्य कपड़े पहनिए। ये मक्खियाँ आपकी आँखों में भी जा सकती हैं। जब हम वहाँ गए थे तो हम में से एक इन मक्खियों को दूर भगा रहा था और दूसरा वहाँ की तस्वीरें खींच रहा था।
  • हो सके तो पूरी तरह से बंद जूते ही पहनिए, क्योंकि यहाँ पर साँप और अन्य रेंगनेवाले जीव बहुत मात्रा में पाए जाते हैं।
  • अपने साथ एक आवर्धक काँच (magnifying glass) जरूर रखिए, क्योंकि यहाँ पर सूक्ष्म आकार के बहुत सारे फूल हैं, जिन्हें सामान्य रूप से देख पाना मुश्किल है।
  • इस पठार की तलहटी में महाराष्ट्र पर्यटन विकास निगम का, पाँच कमरों वाला एक छोटा सा गमन स्थान है, जहाँ से चलते हुए आप इन फुलवारियों तक पहुँच सकते हैं। यह एक छोटी सी पदयात्रा जैसी है जिसके दौरान आप सड़क के किनारे खिले विविध फूल और पठार के दोनों तरफ बसी घाटी के सुंदर दृश्य देख सकते हैं।
  • कास पठार पर लिखी गयी एक किताब के अनुसार यहाँ पर लगभग 80 प्रकार के फूल खिलते हैं, जिनका उल्लेख इस किताब में किया गया है। जब हमने इन फूलों को नजदीक से देखा तो हमे एहसास हुआ कि इनमें से अधिकतर फूल तो भारत में अन्यत्र भी पाए जाते हैं। इसलिए इन बातों पर जरूर ध्यान दीजिए।
  • यहाँ पर सामूहिक पुष्पन बहुत ही कम समय के लिए होता है और इस दौरान यहाँ पर लोगों की बहुत सारी भीड़ होती है। वैसे शेष मौसम में भी आप कुछ फूल और फुलवारियाँ जरूर देख सकते हैं। जिस समय हम वहाँ गए थे उस वक्त वहाँ पर पर्याप्त सफेद फूल और अन्य स्थानीय फूल भी खिले थे। तो इस बात को ध्यान में रखते हुए अपनी यात्रा का आयोजन कीजिये।
  • हमे सातारा की अन्य पहाड़ियों पर भी ऐसे बहुत सारे फूल दिखे। तो कास पठार के आस-पास के इलाकों की सैर जरूर कीजिये, जहाँ पर आप सुंदर-सुंदर फूल देख सकते हैं।
  • यहाँ पर सातारा से आने-जाने वाले सार्वजनिक परिवाहन बहुत ही सीमित और अप्रत्याशित हैं। शाम के 5 बजने के बाद आपको यहाँ कोई बस नहीं मिलती।
  • कास पठार पर जाने से पहले वहाँ के पुष्पन समय के बारे में जरूर पता करे, यद्यपि सामान्य रूप से वहाँ पर जाने का उत्तम समय मध्य अगस्त से सितंबर के अंत तक होता है।

महाराष्ट्र के अन्य दर्शनीय स्थल

बांद्रा की गली चित्रकारी के दर्शन, मुंबई के शहरी परिदृश्य

बाणगंगा सरोवर – मुंबई शहर की प्राचीन धरोहर

एलिफेंटा गुफाएं – शिव के अवतार – एक विश्व धरोहर

पुणे की पेशवाई धरोहर – शनिवार वाड़ा , मंदिर और बाज़ार

अजंता गुफा क्रमांक 1 की चित्रकारी – यूनेस्को की विश्व धरोहर

The post कास पठार – महाराष्ट्र के सातारा में फूलों की घाटी appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/kaas-pathar-valley-of-flowers/feed/ 2 662
चेरापूंजी – धरती पर सबसे गीली जगह की यात्रा, मेघालय, उत्तर पूर्वीय भारत https://inditales.com/hindi/cherrapunji-meghalaya-wettest-place/ https://inditales.com/hindi/cherrapunji-meghalaya-wettest-place/#respond Wed, 09 May 2018 02:30:27 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=546

चेरापूंजी को धरती की सबसे गीली जगह के रूप में जाना जाता है। जैसा कि हमने अपनी भूगोल की कक्षा में भी पढ़ा था। इससे हमारे दिमाग में चेरापूंजी की जो छवि निर्मित हुई थी वह कुछ ऐसी थी कि, यह एक ऐसा क्षेत्र है जहां पर हर वक्त वर्षा होती रहती है। अगर आप […]

The post चेरापूंजी – धरती पर सबसे गीली जगह की यात्रा, मेघालय, उत्तर पूर्वीय भारत appeared first on Inditales.

]]>
चेरापूंजी मेघालय
चेरापूंजी मेघालय

चेरापूंजी को धरती की सबसे गीली जगह के रूप में जाना जाता है। जैसा कि हमने अपनी भूगोल की कक्षा में भी पढ़ा था। इससे हमारे दिमाग में चेरापूंजी की जो छवि निर्मित हुई थी वह कुछ ऐसी थी कि, यह एक ऐसा क्षेत्र है जहां पर हर वक्त वर्षा होती रहती है। अगर आप वहां पर जाए तो आपको सिर्फ बारिश ही बारिश देखने को मिलेगी। लेकिन हमारी यह धारणा जल्द ही गलत साबित हुई और हमे यह पता चला कि वास्तव में चेरापूंजी ऐसी जगह बिल्कुल नहीं है। देश के अन्य भागों की तरह यहां पर भी वर्षा ऋतु के समय ही बारिश होती है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस दौरान यहां पर धरती के अन्य किसी भी स्थान से अधिक बारिश होती है।

वास्तव में हमे यह जानकर बहुत आश्चर्य हुआ कि सर्दियों के मौसम में यहां पर पूरा सूखा पड़ जाता है, जिसकी वजह से इस क्षेत्र को पानी की गंभीर समस्या से गुजरना पड़ता है। इससे भी अधिक विडंबनात्मक शायद ही कभी हो सकती है – धरती की सबसे गीली जगह पर हर साल महीनों के लिए सूखा पड़ जाता है। यह सब जानने के बाद मेरे दिमाग में बार-बार एक ही सवाल उठ रहा था कि, क्या कभी भी इस क्षेत्र के लोगों ने जल संचयन के तरीके अपनाने की कोशिश की होगी या नहीं। और अगर कोशिश की होगी, तो क्या उन्हें किसी भी प्रकार की मुश्किलों का सामना करना पड़ा था, या उन्होंने इसे भी प्रकृति की भेट और अपना भाग्य समझकर अपनाया होगा। चाहे जो भी हो लेकिन इन लोगों के लिए जिंदगी दोनों तरफ से बहुत कठिन है – जब बारिश होती है तब भी और जब बारिश नहीं होती तब भी।

भारत का सबसे बेहतरीन झरना – नोहकालिकाई झरना, चेरापूंजी 

नोहकालिकाई झरना, चेरापूंजी
नोहकालिकाई झरना, चेरापूंजी

चेरापूंजी में घूमते समय आप हर वक्त बादलों को अपने आस-पास पाते हैं। यहां पर आप वास्तव में बादलों के बीच चल सकते हैं, उन्हें अपनी त्वचा पर महसूस कर सकते हैं और उन्हें सूंघ भी सकते हैं। ये बादल न सिर्फ आपके साथ मस्ती-मज़ाक ही करते हैं, बल्कि आपके लिए हर पल नए-नए नज़ारे भी पेश करते रहते हैं।

कभी कभी तो ये बादल झरने को ही छलावृत्त कर देते हैं जिसके कारण आपको बस उसकी आवाज सुनकर ही संतुष्ट होना पड़ता है। लेकिन बीच-बीच में वे, आपको झरने की छोटी सी झलक दिखाकर आपकी उत्सुकता को बढ़ाते हैं और फिर अचानक से आपकी दृष्टि से ओझल होकर आपको गहरी नीली झील में गिरते इस सुंदर से झरने की प्रशंसा करने हेतु कुछ समय के लिए एकांत में छोड़ देते हैं। नोहकालिकाई झरना लगभग 1100 फीट की ऊंचाई का है, जो उसे भारत का सबसे ऊंचा और बेहतरीन झरना बनाता है।

यहां की और एक विशेषता है, यहां के रंगबिरंगी फूल जो आपको हर जगह नज़र आते हैं। चाहे वह सड़क के किनारे हो, घाटी हो, या फिर यहां पर बसे प्रत्येक घरों के आँगन, हर कहीं आपको विभिन्न प्रकार के फूल दिखाई देते हैं। इन फूलों को देखकर ऐसा बिलकुल नहीं लगता जैसे उन्हें यहां पर जबरदस्ती लगाया गया होगा, बल्कि ये फूल भी इन पहाड़ियों, बादलों और मनुष्यों की तरह यहां की प्रकृति का एक अभिन्न अंग हैं। हमारी इस पूरी यात्रा के दौरान हमे यहां के विविध प्रकार के, रंगबिरंगी और खूबसूरत फूल देखने को मिले जो कि अन्यत्र दुर्लभ हैं।

पहाड़ी इलाका – प्रकृति की प्रचुरता 
चेरापूंजी की पहाड़ियां
चेरापूंजी की पहाड़ियां

यहां के खुले नीले आकाश में बिखरे सफ़ेद या सलेटी बादल, यहां की हरी-भरी पहाड़ियाँ और रंगबिरंगी फूल, सभी जैसे अपने उज्वलित रंगों से एक दूसरे की शोभा बढ़ाते हुए इन नज़ारों को और भी आकर्षक बना रहे थे। चेरापूंजी के इर्द-गिर्द बसी पहाड़ियों पर यहां-वहां अनेक झरने छितराये हुए हैं। आप चाहे किसी भी घाटी पर हो, आपको अपने आस-पास या तो किसी झरने की आवाज सुनाई देगी, या फिर कोई झरना ही जरूर दिखेगा। इन में से कुछ झरने यहां के मानक यात्रा कार्यक्रमों के भाग हैं, जिसके द्वारा आपको उनकी यात्रा कराई जाती है और उनसे संबंधित कुछ रोचकपूर्ण कहानियाँ भी सुनाई जाती हैं। ये सीधे खड़े झरने पहाड़ियों के बीच स्थित संकुचित मार्ग में गिरते हैं और फिर इसी मार्ग से बहते-बहते घाटी के गहन भागों में पहुँचकर नदी का रूप धारण करते हैं।

अगर पहाड़ियों के ऊपर से देखा जाए तो ये नदियां इन हरी ढलानों के बीच से बहती पानी की पतली सी रेखा के समान दिखाई देती हैं। कभी-कभी आपको इस छोटी सी नाजुक नदी की अपार शक्ति पर आश्चर्य होता है, जो इन चट्टानी पर्वतों को चीर कर स्वयं अपना रास्ता बनाते हुए आगे बढ़ती है। और आप अचानक से, कहीं पर भी जा सकने की उसकी स्वतंत्रता और सीमा पार जाने की उसकी क्षमता से ईर्ष्या करने लगते हैं। यहां की अधिकतर नदियां बहते-बहते पड़ोसी राष्ट्र बांग्लादेश में चली जाती हैं।

भारत के सबसे बेहतरीन झरने का मनमोहक विडियो – नोहकालिकाई झरना, चेरापूंजी   

नोहकालिकाई झरने से संबंधित उपाख्यान और मिथक 

उपाख्यान और मिथक मानव जीवन के अभिन्न अंग हैं। ऐसी ही एक कथा चेरापूंजी के नोहकालिकाई झरने से जुडी है, जिसके नाम के पीछे एक बहुत दुखद कहानी छिपी हुई है। माना जाता है कि, का लिकाई नामक एक महिला ने बरसों पहले गलती से अपनी खुद की बेटी को खा लिया था, जिसके बाद उसने यहां पर आकर आत्महत्या की थी। इसी घटना के बाद से इस झरने को नोहकालिकाई के नाम से जाना जाने लगा।

200 फीट की अखंड चट्टान से जुडे उपाख्यान 
उलटी टोकरी – खासी समुदाय मेघालय
उलटी टोकरी – खासी समुदाय मेघालय

यहां पर 200 फीट की अखंड चट्टान से बनी एक विशाल संरचना है, जो पलटी हुई ख़ासी टोकरी के जैसे लगती है। कहा जाता है कि यह टोकरी एक विराट राक्षस की थी जो हमेशा लोगों को परेशान करता था। एक बार सब लोगों ने मिलकर उसे कीलों का बनाया हुआ खाना खिलाया और मार डाला। इस उपाख्यान के अनुसार उस राक्षस का नाश तो हो गया लेकिन उसकी टोकरी यहीं पर औंधी पड़ी रह गयी, जो आज भी चट्टान के रूप में यहां पर खड़ी है। जिस प्रकार से यह चट्टान अपने चोटीदार शीर्ष के साथ इन पहाड़ियों और मैदानों के बीच खड़ी है, उसे देखकर आप इस उपाख्यान पर विश्वास किए बिना नहीं रह सकते।

मॉस्मई गुफाएँ 
मॉस्मई गुफाएँ – चेरापूंजी, मेघालय
मॉस्मई गुफाएँ – चेरापूंजी, मेघालय

मेघालय में लगभग 788 गुफाएँ हैं, जिन में से अधिकतर या तो नक्शे पर नहीं मिलती या फिर अब तक उनकी खोज नहीं हो पायी है। इन में से कुछ भारत में स्थित सबसे लंबी गुफाएँ हैं। इन सभी गुफाओं में से मॉस्मई गुफाएँ सबसे प्रसिद्ध गुफाएँ हैं। चेरापूंजी से कुछ ही समय की दूरी पर बसे होने के कारण बहुत से लोग इन गुफाओं को देखने आते हैं।

यहां पर बनवाई गयी पक्की सीढ़ियाँ आपको गुफा के प्रवेश द्वार तक ले जाती हैं। गुफा के द्वार पर पहुँचते ही सामने ही आपको एक विशाल कक्ष जैसी संरचना दिखेगी, जो आपको एक पतले से मार्ग की ओर ले जाती है। इस मार्ग से एक समय पर केवल एक ही व्यक्ति गुजर सकता है। इस मार्ग को पार करने के पश्चात फिर से आपको एक विशाल कक्ष जैसा मिलता है, जहां से बाहर निकलते ही आप गुफा के दूसरे छोर पर पहुँचते हैं।

इस प्रकार की कुदरती संरचनाएं आपको प्रकृति की अनेकरूपता के प्रति हमेशा मोहित कर देती हैं। लेकिन इस गुफा की अवस्था को देख आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि उसकी कितनी देखबाल होती होगी। इस गुफा के इर्द-गिर्द आपको घने जंगल नज़र आएंगे जिनमें सिर्फ जंगली पेड़-पौधे हैं। जब हम मॉस्मई गुफाओं तक पहुंचे तब तक शाम हो चुकी थी और उसी समय बारिश भी होने लगी थी। चेरापूंजी में आकर एक पूरा दिन सूखा-सूखा गुजारने के बाद अब जाकर हम उसकी असली पहचान, यानी उसके गीलेपन के अनुभव से रूबरू हो रहे थे। वर्षा की इस बौछार से लगा जैसे चेरापूंजी की हमारी यात्रा सही मायनों में अब पूरी हो गयी है।

सोहरा – चेरापूंजी का नामपरिवर्तन 
चेरापूंजी के फूल
चेरापूंजी के फूल

चेरापूंजी अब आधिकारिक तौर पर सोहरा के नाम से जाना जाता है, जो उसका मूल नाम हुआ करता था। जाहिर तौर पर चेरापूंजी नाम उसे अंग्रेजों द्वारा दिया गया था। यहां पर कुछ स्थान ऐसे हैं जहां से आप बांग्लादेश के कुछ भाग देख सकते हैं। अचरज की बात तो यह है कि सोहरा जैसे पहाड़ी क्षेत्र में जहां पर भी खेती की जाती है, वहां की पहाड़ियाँ अचानक से व्यापक मैदानों में परिवर्तित होती हैं।

सोहरा में रामकृष्ण मिशन से जुड़ा एक आश्रम है, जिसकी उत्तर पूर्वीय दिशा में एक मंदिर और एक संग्रहालय है। इस संग्रहालय में इस क्षेत्र के सभी झरनों की तस्वीरें प्रदर्शित की गयी हैं। उनके साथ उनसे जुडे इतिहास की थोड़ी-बहुत जानकारी भी प्रस्तुत की गयी है। इस आश्रम की मुख्य इमारत की दीवारों पर इस क्षेत्र से जुडे कुछ चित्र दर्शाये गए हैं। इस इमारत के ठीक पीछे ही मंदिर बसा हुआ है। यहां पर एक छोटा सा बुनाई का केंद्र भी है, जहां पर कुछ युवक और युवतियाँ अपनी पारंपरिक रीतिनुसार बुनाई कर रहे थे। यहां की महिलाएं भी पारंपरिक ख़ासी पहनावे में दालचीनी और चाय बेचती हुई नज़र आ रही थीं।

पर्यटकों के लिए सुविधाएं 
चेरापूंजी का नैसर्गिक सौंदर्य
चेरापूंजी का नैसर्गिक सौंदर्य

इतना प्रसिद्ध पर्यटक स्थल होने के बावजूद भी यहां पर पर्यटन पूर्वावश्यकता की कोई सुविधाएं नहीं मिलती। जब तक कि आप यहां के गिने-चुने और नामांकित होटलों में न रुके हों, आपको यहां पर एक वक्त का भी सही खाना नहीं मिल पाता। अधिकतर लोग अपनी शिलांग यात्रा के दौरान सिर्फ एक दिन की यात्रा के लिए ही यहां पर आते हैं, तो ऐसे में यहां पर कुछ अच्छे भोजनालयों का होना बहुत आवश्यक है, जहां पर अच्छा मौलिक खाना मिल सके। अभी के लिए तो आपको यहां पर सिर्फ छोटी-छोटी दुकानें ही मिलेंगी, जहां पर खाने की कुछ -कुछ चीजें बेची जाती हैं। लेकिन चाय की भूमि से कुछ ही दूर बसे इस क्षेत्र में एक अच्छी सी चाय मिल पाना भी कठिन सा लगता है।

The post चेरापूंजी – धरती पर सबसे गीली जगह की यात्रा, मेघालय, उत्तर पूर्वीय भारत appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/cherrapunji-meghalaya-wettest-place/feed/ 0 546