भारत की नदियाँ Archives - Inditales श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Wed, 13 Mar 2024 05:56:49 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.7.5 चम्बल नदी – भारत की स्वच्छतम नदी एवं उसका बीहड़ https://inditales.com/hindi/chambal-nadi-aur-beehad/ https://inditales.com/hindi/chambal-nadi-aur-beehad/#respond Wed, 17 Jul 2024 02:30:11 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3646

चम्बल की घाटी! जैसे कि इसके नाम से ही विदित है, चम्बल घाटी चम्बल नदी के तट पर स्थित है। उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश को प्राकृतिक रूप से विभक्त करती चम्बल नदी ऐसी प्रतीत होती है मानो यह सम्पूर्ण उत्तर भारत को मध्य भारत से पृथक करती है। चम्बल घाटी एवं उसके बीहड़ बीहड़! […]

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चम्बल की घाटी! जैसे कि इसके नाम से ही विदित है, चम्बल घाटी चम्बल नदी के तट पर स्थित है। उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश को प्राकृतिक रूप से विभक्त करती चम्बल नदी ऐसी प्रतीत होती है मानो यह सम्पूर्ण उत्तर भारत को मध्य भारत से पृथक करती है।

चम्बल नदी पर सूर्यास्त
चम्बल नदी पर सूर्यास्त

चम्बल घाटी एवं उसके बीहड़

बीहड़! यूँ तो इस शब्द का शाब्दिक अभिप्राय किसी भी प्रकार की उबड़-खाबड़ तथा विषम भूमि होता है, किन्तु बीहड़ शब्द सुनते ही अनायास चम्बल घाटी का ही स्मरण हो आता है जो डाकुओं की उपस्थिति के लिए कुप्रसिद्ध है। हमने प्रसार माध्यमों में तथा चित्रपटों में भी इस सन्दर्भ में वास्तविक/काल्पनिक विवरण देखे हैं। जैसे, चम्बल के डाकू। इस सन्दर्भ में सर्वाधिक प्रचलित नाम है, फूलन देवी। स्त्रियाँ यहाँ भी पीछे नहीं हैं! चम्बल के बीहड़ों में एक समय सर्वाधिक प्रचलित डाकू एक स्त्री ही थी।

चम्बल घाटी का बीहड़
चम्बल घाटी का बीहड़

बीहड़ उबड़-खाबड़ विषम भूमि होती है जिनमें डाकू आसानी से छुप सकते हैं। वे इन बीहड़ों में आसानी से अपना जीवन व्यतीत कर लेते हैं। चम्बल के डाकुओं का एक लंबा इतिहास रहा है। प्राचीन काल से लेकर मध्ययुगीन एवं आधुनिक काल तक उन्होंने अनेक सरकारों को परिवर्तित होते देखा है। जब मेरे पिता भरतपुर में कार्यरत थे, तब मेरे नव-विवाहित माता-पिता बहुधा चित्रपट देखने के लिए आगरा जाते थे। तब उनको यह  क्षेत्र पार करना पड़ता था। उन्होंने मुझे उन यात्राओं से सम्बंधित अनेक रोचक घटनाओं के विषय में बताया था।

मुझे चम्बल के इन बीहड़ों को निकट से देखने का अवसर तब प्राप्त हुआ था जब मैं उत्तर प्रदेश सरकार के संरक्षण में इस क्षेत्र का भ्रमण कर रहे यात्रा-संस्मरण लेखकों के एक विशाल समूह का भाग थी। इस बीहड़ की उबड़-खाबड़ भूमि में समूह में विचरण करते हुए मैं कल्पना करने लगी कि इन निर्जन बीहड़ों में अकेले विचरण करना कैसा प्रतीत होता होगा! क्या मुझे उन प्रचलित डाकुओं के प्रेत दिखाई देंगे जो स्वयं को डाकू नहीं, अपितु विद्रोही कहते थे? क्या वहाँ के गांववासी मुझे उन डाकुओं के चरम काल की रोमांचक कथाएं सुनायेंगे? मेरे ये प्रश्न अनुत्तरित ही रह गए।

नदी का पाट और नाव
नदी का पाट और नाव

इन उबड़-खाबड़ बीहड़ों में विचरण करना तथा उन्हें पार कर चम्बल नदी के दर्शन करना स्वयं में एक रोमांचक अनुभव था। नदी के तट पर पहुंचकर हमने अनुभव किया कि चम्बल नदी अपनी शान्त गति से बह रही थी। मिट्टी के ऊँचे-नीचे टीलों के मध्य एक नीली रेखा सी प्रतीत हो रही थी। नदी के दोनों तटों को जोड़ता हुआ ना तो कोई मार्ग था, ना ही कोई सेतु। अतः नदी पार करने के लिए नौकायन ही एकमात्र साधन है। गाँववासियों को एक तट से दूसरे तट पर ले जाने के लिए एक नाव थी जो दोनों तटों के मध्य चक्कर लगा रही थी।

चम्बल नदी से सम्बंधित लोककथाएँ

चम्बल नदी का प्राचीन नाम चर्मण्वती अथवा चर्मनवती था। महाभारत एवं विभिन्न पुराणों में इसका उल्लेख प्राप्त होता है। ऐसा माना जाता है कि राजा रन्तिदेव द्वारा यहाँ अतिथि यज्ञ किया गया था। देवी भागवत पुराण में कहा गया है कि विभिन्न यज्ञों में बलि चढ़ाए गए पशुओं के चर्म से बहते रक्त से इस नदी का उद्गम हुआ था। इसी कारण इसका नाम चर्मण्वती पड़ा। ऐसा भी माना जाता है कि यह उक्ति सांकेतिक है। राजा रन्तिदेव द्वारा आयोजित अतिथि यज्ञ में बलि का संकेत केले अथवा कदली के स्तंभों को काटना है। राजा रन्तिदेव ने फलों से होम एवं अतिथि सत्कार किया था। केले के पत्तों एवं छिलकों को भी चर्म कहा जता है। ऐसे कदलीवन से चर्मण्वती नदी का उद्गम हुआ था।

ऐसा माना जाता है कि महाभारत काल में चम्बल नदी के आसपास के क्षेत्रों पर कौरवों के मामा शकुनी का अधिपत्य था। यहीं किसी स्थान पर आयोजित चौसर के खेल में मामा शकुनी की धूर्तता के कारण पांडव सर्वप्रथम कौरवों से पराजित हुए थे। उनके द्वारा महारानी द्रौपदी के चीरहरण का भी प्रयास किया गया था। ऐसा भी माना जाता है कि रानी द्रौपदी ने श्राप दिया था कि जो भी इस चर्मण्वती अथवा चम्बल नदी का जल ग्रहण करेगा, उसका विनाश हो जाएगा। उस काल से चम्बल नदी को श्रापित माना जाता है।

चम्बल नदी उन क्वचित नदियों में से एक है जिसकी आराधना नहीं की जाती है।

नदी को देख ऐसा प्रतीत होता है कि द्रौपदी का वही श्राप उसके लिए वरदान सिद्ध हो गया है। चम्बल नदी को भारत की निर्मलतम नदियों में से एक माना जाता है। यदि आपको प्रदूषणरहित चम्बल नदी के पारिस्थितिकी तंत्र का अनुभव करना हो तो नदी में नोकायन करना आवश्यक है।

चम्बल नदी एक बारहमासी नदी है। भौगोलिक दृष्टि से चम्बल नदी का उद्गम स्थान मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में स्थित जानापाव की पहाड़ी है। यह नदी महू नगर तथा इंदौर नगर के निकट विन्ध्य श्रंखला की ढलान से निकलती है। मध्यप्रदेश-राजस्थान तथा मध्यप्रदेश-उत्तरप्रदेश सीमा रेखाओं को अंकित करती हुई ये लगभग १००० किलोमीटर की दूरी तय करती है। तत्पश्चात यमुना नदी में समा जाती है।

चम्बल नदी का पारिस्थितिकी तंत्र

नदी में नौकायन का आनंद उठाते हुए आपको इसके दोनों तटों पर विविध पक्षियों के भी दर्शन होंगे। हमने सारस, बाज, कचपचिया (Babbler) आदि पक्षियों की अनेक प्रजातियाँ देखीं। उनसे भी अधिक संख्या में उपस्थित हैं, घड़ियाल, जो आपको नदी में तैरते अथवा तटों पर विश्राम करते दिखाई देंगे।

यदि भाग्य साथ दे तो आपको मीठे जल के कछुए भी दिखाई देंगे। इस क्षेत्र में इन कछुओं की लगभग आठ प्रजातियाँ पायी जाती हैं। लगभग ४५ मिनटों के सम्पूर्ण नौकायन काल में हमने अनेक प्रकार के पक्षियों को आकाश में चारों ओर उड़ते देखा।

चम्बल नदी के घड़ीयाल
चम्बल नदी के घड़ीयाल

सम्पूर्ण नौकायन काल में घड़ियाल जल से बाहर आकर हमें तो दर्शन दे रहे थे किन्तु हमारे कैमरों के संग लुकाछिपी की क्रीड़ा में वे विजयी भी हो रहे थे। नदी के तट पर स्थित दलदल पर उनकी विषम त्वचा अपने चिन्ह अंकित करती ही है, साथ ही निर्मल जल सतह के नीचे भी अपनी उपस्थिति त्वरित दर्शा देती है। मुझे बताया गया कि चम्बल नदी में बड़ी संख्या में मीठे जल के डॉलफिन भी हैं जो गंगा नदी में लुप्तप्राय हो रहे हैं।

मेरे अनुमान से पक्षियों एवं नदी के घड़ियालों के दर्शन के लिए यह सम्पूर्ण भारत का सर्वोत्तम स्थान है।

सूर्यास्त काल में नदी का परिदृश्य अद्वितीय प्रतीत हो रहा था। वह दृश्य अविस्मरणीय था। मुझे अरब महासागर में सूर्यास्त के दृश्य का स्मरण हो आया। हमने चम्बल नदी से विदाई ली तथा वापिसी की यात्रा आरम्भ की।

मुझे ऐसा अनुभव हो रहा था मानो मैंने देश के एक ऐसे दुर्लभ व रोमांचकारी भाग का दर्शन किया है जिसकी मुझे जानकारी तो थी लेकिन कभी कल्पना भी नहीं की थी कि एक दिवस मुझे उसके दर्शन प्राप्त होंगे। चित्रपटों के काल्पनिक कथानकों के पृष्ठभूमि में दर्शाए गए दृश्यों से अत्यंत विपरीत हमें इसके यथार्थ रूप का अनुभव प्राप्त करने का सुअवसर प्राप्त हुआ था।

चम्बल एक दुर्लभ नदी है। एक ओर जहाँ भारत में नदियों को देवी स्वरूप पूजा जाता है, वहीं पारंपरिक मान्यताओं के कारण चम्बल नदी को श्रापित मानकर उसे पूजनीय नहीं माना जाता है। यह वही नदी है जिसके तटों पर चम्बल के डाकुओं ने सर्वाधिक काल के लिए अपना वर्चस्व स्थापित कर रखा था।

विश्रामगृह – चम्बल सफारी लॉज

हम चम्बल सफारी लॉज में ठहरे थे जो नदी से कुछ ही दूरी पर स्थित है। यह ऐसा स्थान है जहाँ आप अनेक प्रकार के पक्षियों के दर्शन कर सकते हैं। मैं प्रातः शीघ्र ही उठ गयी थी। मैंने देखा कि मेरे कक्ष के समक्ष एक वृक्ष की शाखाओं से सैकड़ों की संख्या में चमगादड़ (Flying Fox) लटके हुए थे। चम्बल सफारी लॉज के विषय में अधिक जानकारी के लिए उनके अधिकारिक वेबस्थल पर देखें।  यहाँ से आपको इस लॉज के इतिहास की जानकारी प्राप्त होगी जो इस क्षेत्र के वन्य प्राणियों के ताने-बाने से पूर्णतः संलग्न है। उस समय यह लॉज मेला कोठी के नाम से जाना जाता था। वर्तमान में यह पर्यावरण को बढ़ावा देता एक इको लॉज है जो आपको इस क्षेत्र की अनछुई सुन्दरता का आनंद उठाने का अवसर प्रदान करता है। उनकी पूर्ण प्रशिक्षित टोली आपकी सहायता करने के लिए सदैव तत्पर रहती है।

मेला कोठी चम्बल सफारी लॉज
मेला कोठी चम्बल सफारी लॉज

प्रातः काल मैं लॉज के आसपास के खेतों में पदभ्रमण कर रही थी। तभी मेरे साथ अनेक मोर भी पदभ्रमण करने के लिए आ गए थे।

चम्बल नदी एवं उसके पारिस्थितिक तंत्र का दर्शन कर मैं भावविभोर हो गयी थी। एक स्वच्छ निर्मल जीवंत नदी तथा उस पर आधारित मानव, पक्षी एवं जलीय प्राणी, ये सर्व स्वयं में एक सम्पूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र है। ऐसा दृश्य अत्यंत दुर्लभ है। आशा है यह नदी सदा इसी प्रकार स्वच्छ व निर्मल बनी रहे। इसे किसी भी प्रकार का प्रदूषण स्पर्श भी नहीं कर पाए।

यात्रा सुझाव

आगरा से चम्बल घाटी पहुँचने में लगभग एक घंटे का समय लगता है। अतः, आप ताज महल भ्रमण एवं चम्बल नदी भ्रमण एक ही यात्रा कार्यक्रम के अंतर्गत कर सकते हैं।

दिल्ली अथवा जयपुर से भी चम्बल घाटी तक सुगमता से पहुंचा जा सकता है। दिल्ली एवं जयपुर भारत के स्वर्णिम त्रिभुज (Golden Triangle) के भाग भी हैं।

चम्बल से आप द्रौपदी की जन्मस्थली काम्पिल्य का भ्रमण भी कर सकते हैं।

चम्बल घाटी एवं इसके पारिस्थितिकी तंत्र का अवलोकन करने एवं उसे समझने के लिए प्रशिक्षित परिदर्शक की सहायता अवश्य लें। उनकी सहायता से आप घाटी के सौंदर्य का आनंद उठाने के साथ साथ यहाँ के वन्य प्राणियों एवं वनस्पतियों से भी परिचित हो सकते हैं।

चम्बल नदी में नौकायन अवश्य करें।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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भारत के दो से अधिक नदियों के तट एवं संगम वाले अद्भुत नगर https://inditales.com/hindi/do-nadiyon-ke-tat-par-bhartiya-nagar/ https://inditales.com/hindi/do-nadiyon-ke-tat-par-bhartiya-nagar/#comments Wed, 19 Jul 2023 02:30:19 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3117

इंडीटेल यात्रा प्रश्नावली – नदियाँ एवं नगर कुछ समय पूर्व हमने आपसे एक प्रश्न किया था, भारत में ऐसे कौन कौन से नगर हैं जिनमें एक से अधिक नदियाँ हैं। हमें इस प्रश्न के उत्तर में उत्तम प्रतिसाद मिला है। हमने आप सभी के उत्तरों को संकलित किया है तथा इस संस्करण की रचना की […]

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इंडीटेल यात्रा प्रश्नावली – नदियाँ एवं नगर

कुछ समय पूर्व हमने आपसे एक प्रश्न किया था, भारत में ऐसे कौन कौन से नगर हैं जिनमें एक से अधिक नदियाँ हैं। हमें इस प्रश्न के उत्तर में उत्तम प्रतिसाद मिला है। हमने आप सभी के उत्तरों को संकलित किया है तथा इस संस्करण की रचना की है। यह संस्करण उन भारतीय तटीय नगरों के विषय में है जो एक से अधिक नदियों द्वारा पोषित होते हैं।

अन्य प्रश्नावलियों के लिए हमारा फेसबुक, ट्विटर एवं इन्स्टाग्राम देखें।

भारत के  नगर जन्हें एक से अधिक नदियों का वरदान प्राप्त है:

सदियों पूर्व अपनी बस्ती बसाने के लिए लोग नदी के तट का चयन करते थे क्योंकि जल हमारी मूलभूत आवश्यकता है। प्राचीन काल में जल के प्राकृतिक स्त्रोत ही उपलब्ध होते थे। इसी कारण भारत की लगभग सभी नदियों के तट पर बस्तियां बसी थीं जो अब फलफूल कर बड़े नगर बन गए हैं।

उन्ही के विषय में हमने आप से एक प्रश्न पूछा था कि भारत में ऐसे कौन कौन से नगर हैं जिनमें एक से अधिक नदियाँ हैं। आपके उत्तर के आधार पर हमने यह सूची बनाई है। इन्हें पढ़ने के पश्चात यदि आपको ऐसा लगे कि इसमें कुछ अन्य नगर भी सम्मिलित किये जाने चाहिए तो हमें अवश्य बताएं।

११. वाराणसी – वरुणा, असी एवं गंगा नदियाँ

वाराणसी में गंगा
वाराणसी में गंगा

भारत का ऐतिहासिक नगर, वाराणसी वास्तव में तीन-तटीय नगर है। अर्थात् यह तीन नदियों के तटों को छूता है। यूँ तो लोग वाराणसी को गंगा नदी के तट पर बसे नगर के रूप में ही अधिक जानते हैं। किन्तु हम में से अनेक इस ओर ध्यान नहीं देते कि वाराणसी नाम ही दो अन्य नदियों के नामों के संगम से बना है। वाराणसी के उत्तर की ओर स्थित वरुणा नदी जो आदिकेशव घाट पर गंगा नदी से मिलती है। वहीं दक्षिणी ओर असी नदी है जिसके नाम पर ही प्रसिद्ध असी घाट का नाम पड़ा है।

ये तीन नदियाँ एवं उनके घाट वाराणसी को वह अद्भुत नगर बनाते हैं जो तीन नदियों से घिरा हुआ है।

१०. पटना – गंगा, सोन एवं पुनपुन नदियाँ

पटना में गंगा
पटना में गंगा

मुझे केवल इतना ही ज्ञात था कि पटना नगरी गंगा के तट पर बसी है। प्रश्नावली के उत्तर में कुछ ने सोन नदी भी कहा। इस संस्करण को लिखते समय मैंने कुछ शोध किये तथा यह जानकारी प्राप्त की कि पटना की सीमा से लग कर दो नहीं, अपितु तीन नदियाँ बहती हैं। तीसरी नदी है, पुनपुन। ये तीन नदियाँ पटना को भी तीन नदियों से घिरा नगर बनाते हैं।

सोन नदी एवं पुनपुन नदी पटना आकर गंगा से मिल जाती हैं।

इस तथ्य को सम्मुख लाने के लिए आदिवर्हा का अनेक धन्यवाद।

९. हैदराबाद – मुसी एवं एसी नदियाँ

मैं हैदराबाद में रह चुकी हूँ। हैदराबाद में घूम चुकी हूँ। मुसी नदी को तो मैंने सैकड़ों बार पार किया होगा। किन्तु मुझे यह ज्ञात नहीं था कि मुसी नदी की एक सहायक नदी भी है जिसका नाम एसी नदी है तथा जो हैदराबाद नगरी में ही मुसी नदी से मिलती है।

हैदराबाद में मूसी और ऐसी
हैदराबाद में मूसी और ऐसी

वृजिलेश का मैं धन्यवाद करती हूँ जिसने हमें हैदराबाद के विषय में यह जानकारी दी। उन्होंने यह भी बताया कि एसी नदी हिमायत सागर से आती है तथा मुसी नदी गंडिपेट से। लंगर हाउस के समीप बाबूघाट संगम पर मुसी नदी एवं एसी नदी एक दूसरे से मिलती हैं।

मेरी अगली हैदराबाद यात्रा में मैं इस घाट के दर्शन अवश्य करूँगी।

मुसी के विषय में मुझे एक अन्य तथ्य भी ज्ञात हुआ कि यह नदी अनंतगिरी पहाड़ों से निकलती है तथा इसका प्राचीन नाम मुचिकुंडा था। किवदंतियों के अनुसार मुचुकुंडा इक्ष्वाकु वंश का वंशज था अथवा यह कहा जाए कि सूर्यवंशी भगवान राम के ही वंश का था। ऐसा माना जाता है कि वह अनंतगिरी पहाड़ों में निद्रामग्न है। उसी के नाम पर नदी का नाम मुचिकुंडा पड़ा।

८. पुणे – मुला, मुठा एवं पवना नदियाँ

पुणे में दो नदियाँ हैं, मुला एवं मुठा। जो भी पुणे गया है उसे यह ज्ञात ही होगा। इसीलिए मैंने पुणे को दो नदियों वाले नगरों की सूची में डाला था।

पुणे में मुला-मूठा
पुणे में मुला-मूठा

किन्तु जब मैं इस संस्करण को लिखने के लिए शोध कर रही थी तथा विभिन्न साहित्य पढ़ रही थी तब मुझे ज्ञात हुआ कि पुणे में तीसरी नदी भी है जिसका नाम है, पवना। मुला नदी पवना नदी से उसके बाएं तट पर मिलती है तथा मुठा नदी उसके दाहिने तट पर, जो आगे जाकर मुला-मुठा नदी बन जाती है। तीनों नदियाँ पश्चिमी घाटों से निकलती हैं।

मुला-मुठा नदी सहायक नदियों की उस श्रंखला का एक भाग हैं जो आगे जाकर कृष्णा नदी में समा जाती हैं। तत्पश्चात सभी बंगाल की खाड़ी से जा मिलती हैं।

७. प्रयागराज – गंगा, यमुना एवं सरस्वती नदियाँ

मेरी प्रश्नावली के प्रत्युत्तर में अधिकाँश लोगों ने प्रयाग का नाम सुझाया था। सभी जानते हैं कि प्रयाग में गंगा एवं यमुना का संगम है। कुम्भ मेले ने भी इस तथ्य को अधिकतम लोगों तक पहुँचाने में बड़ी भूमिका निभाई है। यहाँ संगम का भी अपना स्वयं का नाम है, त्रिवेणी संगम। इसका अर्थ है तीन नदियों का संगम।

प्रयाग में गंगा, यमुना, सरस्वती
प्रयाग में गंगा, यमुना, सरस्वती

गंगा एवं यमुना दोनों दृश्य नदियाँ हैं तथा तीसरी नदी, सरस्वती नदी अदृश्य है। सरस्वती नदी के अस्तित्व पर अनेक वैज्ञानिकों ने प्रश्न उठाये हैं किन्तु आस्था रखने वालों के भीतर ये सदा जीवित रहेगी।

६. कटक – महानदी एवं उसकी अनेक वितरिकाएं

कटक की स्थिति अनोखी है। एक ओर जहां अन्य नगरों में नदियों का संगम होता है, कटक ऐसा नगर है जहां महानदी अनेक भागों में विभक्त होकर शाखा नदियाँ या वितरिकाएं बनाती है। उन वितरिकाओं में अधिकतर नदियाँ कटक नगर से होकर जाती हैं। इन वितरिकाओं के नाम हैं, महानदी, काठजोड़ी, कुआखाई तथा बिरुपा। काठजोड़ी आगे जाकर देवी एवं बिलुआखाई नदियों में विभक्त होती है।

कट्टक में महानदी
कट्टक में महानदी

काठजोड़ी का अर्थ है, काठ के फलक से जोड़ा हुआ। हो सकता है कि किसी काल में इस नदी के ऊपर लकड़ी का सेतु रहा होगा या इस नदी को एक लकड़ी के फलक की सहायता से पार किया जाता होगा।

५. देवप्रयाग – भागीरथी, अलकनंदा एवं गंगा नदियाँ

देवप्रयाग के विषय में हम सब ने सुना है किन्तु हम में से अनेक की इस हिमालयी नगर में पहुँचने की अभिलाषा कदाचित अब तक पूर्ण ना हुई हो।

देवप्रयाग में अलकनंदा एवं भागीरथी
देवप्रयाग में अलकनंदा एवं भागीरथी

गंगोत्री में गंगा को भागीरथी कहते हैं। देवप्रयाग में अलकनंदा नदी एवं भागीरथी नदी का संगम होता है जो गंगा नदी बनकर आगे जाती है।

इससे पूर्व ४ अन्य नदियाँ गंगा में समाहित होती हैं, धौलीगंगा, नंदाकिनी, पिंडार एवं मन्दाकिनी। इन्हें मिलाकर कुल पांच नदियों का संगम अलकनंदा में होता है जिसे पंच प्रयाग कहते हैं।

४. चेन्नई – अड्यार एवं कूउम नदियाँ

मुझे केवल अड्यार नदी के विषय में ही जानकारी थी। कूउम नदी के विषय में मुझे इस प्रश्नावली पर संस्करण बनाते समय ही प्राप्त हुई थी। ये दोनों छोटी नदियाँ हैं जिनका उद्गम चेन्नई से लगभग १०० किलोमीटर की दूरी पर है।

चेन्नई में अड़यार नदी
चेन्नई में अड़यार नदी

कूउम नदी को ट्रिप्लिकेन नदी भी कहते हैं। कूउम शब्द का सम्बन्ध कूपं शब्द से है जिसका अर्थ कुआं होता है।

चेन्नई की नदियों के विषय में यहाँ पढ़ें।

चेन्नई की नदियों के विषय में यह जानकारी अनंत रुपनगुडी से प्राप्त हुई है। चित्र – श्रीनिधि हंडे।

३. नासिक – गोदावरी एवं दाराणा नदियाँ

हम सब यह जानते हैं कि कुम्भ मेले का एक आयोजन स्थल नासिक भी है जहां इसे गोदावरी नदी के तट पर आयोजित किया जाता है। पर क्या आप जानते हैं कि वहां दाराणा नाम की भी एक नदी है जो नासिक नगर को छूती हुई जाती है?

नासिक में गोदावरी
नासिक में गोदावरी

विकिपीडिया के अनुसार नासिक में इनके अतिरिक्त भी अनेक नदियाँ हैं जो नासिक से होकर बहती हैं, जैसे वैतरणा, भीमा, गिरणा एवं काश्यपी नदियाँ। किन्तु मैं इनकी पुष्टि नहीं कर पायी हूँ। आशा है आप में से नासिक में रहने वाले किसी पाठक से मुझे इस विषय में अधिक जानकारी मिले।

नासिक की नदियों के विषय में जानकारी देने के लिए सचिन पाटिल का धन्यवाद।

२. पणजी – मांडवी एवं जुआरी नदियाँ

पणजी में मांडवी
पणजी में मांडवी

गोवा की राजधानी पणजी दो नदियों के मध्य बसी हुई है, मांडवी नदी एवं जुआरी नदी। पणजी के दोनों ओर से आते हुए, ये दोनों नदियाँ आगे जाकर अरब महासागर में मिल जाती हैं। मांडवी नदी पर्यटकों की नौकाओं एवं कैसिनो नौकाओं से भरी एक उल्लासपूर्ण नदी है। वहीं जुआरी नदी कोलाहल से दूर, अत्यंत शांत नदी है तथा अपेक्षाकृत अधिक चौड़ी है।

भारत में नदियों के तट पर एवं संगम पर अनेक प्राचीन नगर बसे हैं। इसमें तनिक भी आश्चर्य नहीं है कि इसी कारण हम संगम को अत्यंत पवित्र मानते हैं तथा उसकी आराधना करते हैं। उन्होंने ही सदियों से हमारा पालन-पोषण किया है।

. भारत के अन्य नगर जहां एक से अधिक नदियों के तट हैं

ये सूची भारत के उन छोटे नगरों की है जहां एक से अधिक नदियों के तट हैं।

  • तमिल नाडू में श्रीरंगम – कावेरी एवं कोल्लिदम नदियों के मध्य स्थित है।
  • तमिल नाडू में करुर – कावेरी एवं अमरावती नदियों के तटों पर बसा हुआ है।
  • आन्ध्र प्रदेश में कुरनूल – तुंगभद्र, नीव एवं हुन्द्री नदियों के तट
  • महाराष्ट्र में कराड – कृष्णा एवं कोयना नदियाँ
  • कर्नाटक में मंगलुरु – नेत्रवती एवं गुरुपुरा की अप्रवाही नदियाँ

यदि आप ऐसे भारतीय नगरों के विषय में जानते हैं जो एक से अधिक नदियों के तट पर या संगम पर बसे हैं तथा जिन्हें इन सूची में सम्मिलित नहीं किया गया है तो उनके विषय में टिप्पणी खंड में अवश्य लिखें। मैं संस्करण में उनका भी उल्लेख करना चाहूंगी।

लद्धाख में सिन्धु जांसकर का संगम
लद्धाख में सिन्धु जांसकर का संगम

इस संस्करण की रचना करते समय मेरे लिए सबसे बड़ी सीख यह थी कि गूगल मानचित्र केवल बड़ी नदियाँ दर्शाता है। उसमें छोटी नदियों का उल्लेख बहुधा नहीं मिलता है। अब मुझे A History of World in 12 Maps इस पुस्तक में लिखे जेरी ब्रोट्टन के कथन का अर्थ समझ में आता है।

आप सब ने इस प्रश्नावली में जिस उत्साह से भाग लिया, उसके लिए मैं आप सब का धन्यवाद करना चाहती हूँ। संस्करण के अंत में पुनः इस तथ्य को दुहराना चाहती हूँ कि सभी बड़ी नदियाँ अनेक सहायक नदियों के संगम से ही बनती हैं।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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जल शक्ति – जल संसाधनों के प्रति श्रद्धा को पुनर्जीवित करने का एक प्रयास https://inditales.com/hindi/jal-shakti-jal-sansdhan-satkaar/ https://inditales.com/hindi/jal-shakti-jal-sansdhan-satkaar/#comments Wed, 22 Jun 2022 02:30:09 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2717

हमारे पूर्वजों ने सदैव हमसे यही कहा है कि प्यासे को जल पिलाने से तत्काल पुण्य की प्राप्ति होती है। सम्पूर्ण भारत में हम कहीं भी जाएँ, हमें इस परंपरा का जीवंत उदहारण दृष्टिगोचर होगा। भारत के अनेक प्रदेशों में मार्गों के किनारे मिट्टी के घड़े में जल रखा जाता है जिसे कोई भी ग्रहण […]

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हमारे पूर्वजों ने सदैव हमसे यही कहा है कि प्यासे को जल पिलाने से तत्काल पुण्य की प्राप्ति होती है। सम्पूर्ण भारत में हम कहीं भी जाएँ, हमें इस परंपरा का जीवंत उदहारण दृष्टिगोचर होगा। भारत के अनेक प्रदेशों में मार्गों के किनारे मिट्टी के घड़े में जल रखा जाता है जिसे कोई भी ग्रहण कर सकता है। मध्य एवं उत्तर भारत में ग्रीष्म ऋतु में यह दृश्य अत्यंत सामान्य है। काल के साथ घड़ों का स्थान विद्युत् चालित शीत जल यंत्रों ने ले लिया है जो शीतल जल उपलब्ध कराते हैं। राजस्थान एवं मध्य प्रदेश में भरी दुपहरी की तपती धूप में भी आप सड़क के किनारे महिलाओं को बैठे देखेंगे जो प्रत्येक प्यासे जो जल शक्ति प्रदान करती हैं, अर्थात् जल पिलाती हैं। गर्मी बढ़ते ही मानव ही क्यों, हम पशु एवं पक्षियों के लिए भी बाहर जल रखते हैं।

चाँद बावड़ी - आभानेरी - राजस्थान
चाँद बावड़ी – आभानेरी – राजस्थान

शास्त्रों के अनुसार जल उन पंच तत्वों में से एक है जिनसे सृष्टि की रचना हुई है। अन्य चार हैं, पृथ्वी, आकाश, वायु एवं अग्नि। जल शक्ति अथवा जल प्रमुख पोषणकर्ता है जिसके अभाव में मानव समेत सभी जीवों का जीवन असंभव है। इसी कारण मानवों ने जब भी बस्ती बसाई, उन्होंने बसने के लिए पर्वतों से बहकर आती नदियों के तटीय  क्षेत्रों का ही चयन किया। नदी किनारे की उपजाऊ भूमि ने सदा उनका भरण-पोषण किया। इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि सभी की विविध आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए नदियों में भरपूर जल विद्यमान होता था। कालांतर में बढ़ती जनसँख्या एवं औद्योगीकरण के चलते मानवों ने नित-नवीन संसाधनों की खोज में नदियों से दूर बस्ती बसाना आरम्भ किया। जल की आपूर्ति हेतु अनेक विशाल सरोवरों की संरचना की ताकि जल संसाधन प्राप्त हो सके तथा भूमिगत जल की भी भरपाई भी हो सके। भोपाल, हैदराबाद तथा बंगलुरु ऐसे ही अनेक उत्तम उदाहरणों में से हैं जो अनेक मानवनिर्मित विशाल सरोवरों से संपन्न हैं।

जल शक्ति – जल संसाधनों के प्रति मानवी श्रद्धा को पुनर्जीवित करना

भारतीय परम्पराओं व संस्कारों में उन सभी तत्वों को देवता माना जाता है जो हमारा पोषण करते हैं। उनके प्रति श्रद्धा व सम्मान की भावना रखी जाती है। उन्ही पोषक तत्वों में एक है, जल। इन्ही परम्पराओं के अंतर्गत जल के प्रत्येक स्त्रोत की आराधना की जाती है तथा उसे जल शक्ति कहा जाता है। जल के ये प्राकृतिक स्त्रोत हैं, समुद्र, नदियाँ, जलाशय, कुँए, मानव निर्मित बावड़ियां तथा मंदिरों के जलकुंड इत्यादि। जल की आराधना वैदिक काल से चली आ रही है। ऋग्वेद में उपस्थित नदी स्तुति स्तोत्र में उन सभी नदियों का उल्लेख है जो भरत की भूमि का पोषण करती हैं। जैसे गंगा, यमुना, शताद्री (सतलज), सरसुती (सरस्वती), असिक्नी (चेनाब), परुष्णी (रावी), वितस्ता (झेलम) तथा अनेक अन्य नदियाँ जो अब लुप्त हो चुकी हैं। सभी प्रमुख नदियों की स्वयं की स्तुतियाँ हैं जो उनकी आराधना करते समय गाई जाती हैं।

दूधसागर जलप्रपात गोवा
दूधसागर जलप्रपात गोवा

किन्तु यह हमारा दुर्भाग्य है कि जल-संपन्न परंपरा द्वारा हमने जिन जल शक्तियों की आराधना की, आज उनका जल तीव्र गति से घट रहा है। नदी किनारे स्थित औद्योगिक इकाईयों द्वारा अनियंत्रित रूप से निस्सारण किये गए विषाक्त अवशेषों के कारण नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं। नगरों के अनियंत्रित निस्सारण भी उन्हें दूषित कर रहे हैं। ग्रीष्म ऋतु में यह समस्या अपनी चरम सीमा पर होती है. यह सत्य है कि पर्वतीय राज्य मेघालय के चेरापूंजी एवं मौसिनराम को धरती का सर्वाधिक नम स्थान माना जाता है क्योंकि यहाँ सर्वाधिक मात्रा में वर्षा होती है। किन्तु ग्रीष्म ऋतु में ऐसे स्थानों को भी जल का अभाव सहन करना पड़ता है।

अनियंत्रित उपयोग एवं दोषपूर्ण नीतियों के कारण सम्पूर्ण भारत में भूमिगत जल का स्तर शीघ्रता से घट रहा है। वहीं, घनी आबादी वाले नगरीय क्षेत्रों में उनका स्तर भयावह रूप से कम हो गया है। भूमिगत जल के संरक्षण एवं पुनःपूर्ति की ओर भी अब तक आवश्यक प्रयास नहीं किये गए थे। बंगलुरु जैसे महानगरों के विषय में यह अनुमान लगाया जा रहा है कि वह दिन दूर नहीं है, जब वे शीघ्र ही जल विहीन हो जायेंगे। PARI (People’s Archive of Rural India) के संस्थापक सम्पादक पी साईनाथ कहते हैं कि सन् १९५१ में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता ५१७७ घनमीटर थी जो अनवरत घटते हुए सन् २०११ में लगभग ३३०० घनमीटर हो गयी है। वे नदी के जल को छोटे जमींदार किसानों से उद्योगों एवं नगरी क्षेत्रों की ओर निर्देशित करना ही इसका प्रमुख कारण मानते हैं।

जल को वस्तु मानना – एक भारी चूक

जल संकट के अनेक मनोवैज्ञानिक कारण भी हैं। उनमें कुछ हैं, जल को वस्तु मानना तथा उससे हमारे संबंधों का विच्छेद होना। नगरी क्षेत्रों में जल की आपूर्ति नलों द्वारा की जाती है। यहाँ तक कि अधिकाँश ग्रामीण क्षेत्रों में भी अब नलकूप के साथ साथ नलों द्वारा जल की आपूर्ति की जाती है। इसका विपरीत प्रभाव हम पर यह पड़ा है कि ये जल कहाँ से आ रहा है, ना तो हम जानते हैं, ना ही जानने की चेष्टा करते हैं। मानवों एवं जल स्त्रोतों के मध्य किसी प्रकार का आध्यात्मिक सम्बन्ध अब शेष नहीं रह गया है। भारत वह राष्ट्र है जहां के पूर्वज अपने दिन का आरम्भ अपने आसपास के जल स्त्रोतों एवं दूर-सुदूर की नदियों की स्तुति से करते थे। विभिन्न जल स्त्रोतों के प्रति प्रत्येक भारतीय के हृदय में श्रद्धा व सम्मान का भाव विद्यमान रहता था। ‘गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती। नर्मदे सिन्धु कावेरी जले अस्मिन् सन्निधिम् कुरु॥’ जैसे मंत्रों द्वारा पवित्र नदियों का आह्वान करते हुए वे स्नान करते थे। वही राष्ट्र अब ऐसे दिवस का साक्षी है जहां जल को एक वस्तु माना जा रहा है। जल को क्रय कर पिया जा रहा है। जिस धरती के ऐसे संस्कार थे जहां प्यासे को जल पिलाना सर्वोत्तम पुण्य माना जाता था, अब उसी धरती पर विक्रेता पेयजल की विक्री करते हैं। उनकी स्वयं की धरती के गर्भ से जल खींच कर, बोतलों में भरकर ग्राहकों तक पहुँचाया जाता है। वह भी ऐसी प्लास्टिक की बोतलों में, जो कभी विघटित नहीं होती हैं तथा उसी धरती माँ को वर्षों प्रदूषित करती रहती हैं।

अब समय आ गया है कि हम जल के साथ हमारे सम्बन्ध को जाने व समझें। हम इस संबध की पुनः रचना करें, पुनर्स्थापना करें, उसे महत्त्व दें तथा पोषित करें। अपने पूर्वजों के मार्ग पर चलते हुए जल स्त्रोतों को सहेजें, उनकी आराधना करें तथा उनके प्रति कृतज्ञ होयें।

अभय मिश्रा, लेखक एवं शोधकर्ता (Riverine Culture Scholar) इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली, इस विचार का समर्थन करते हैं कि नलों द्वारा जल आपूर्ति ने हमें हमारे जल स्त्रोतों से पृथक कर दिया है। वही जल स्त्रोत, जिनका प्रबंधन एक काल में सामूहिक रूप से हमारा समाज ही करता था। वे हमारे परिवारिक एवं सामाजिक अनुष्ठानों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका का स्मरण कराते हैं। वे कहते हैं कि हमारा पोषण करने के लिए हमने इन जल स्त्रोतों का आभार मानना भी विस्मृत कर दिया है। वे सौरभ सिंह के प्रयासों की प्रशंसा करते हैं जो गाजीपुर में पेयजल की आपूर्ति के लिए कुओं को पुनर्जीवित करने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। वहां के भूमिगत जल में विषैले आर्सेनिक तत्वों की उपस्थिति जैसे गंभीर समस्याओं का निवारण करने में भी उनके प्रयास अत्यंत कारगर सिद्ध हो रहे हैं। यह समस्या खेतों में आवश्यकता से कहीं अधिक जलकूप खोदने के कारण उपस्थित हुई है। खेतों में छिड़के गए विषैले कीटनाशक इत्यादि जल स्त्रोतों को प्रदूषित कर देते हैं। वे हलमा का उदहारण देते हैं, जो आम समस्याओं के निवारण हेतु एक सामाजिक प्रयास है। इसका प्रबंधन मध्य भारत के झाबुआ में स्थित आदिवासी क्षेत्र की शिवगंगा समिति करती है।

जल शक्ति का संचयन

मध्य प्रदेश में झाबुआ जिले का भूमिगत जल स्तर अत्यंत निम्न स्तर पर पहुँच गया था। अतः जल सहेजने हेतु गांव वासियों ने हाथीपावा की पहाड़ी पर एक विशाल जन अभियान चलाया। सप्ताह में एक दिवस सैकड़ों की संख्या में गांव वासी हाथीपावा की पहाड़ी पर एकत्र होते हैं तथा सामूहिक श्रमदान करते हैं। इस प्रकार उन्होंने पहाड़ी पर ३०,००० खंदक खोदे हैं जिसमें वर्षा का जल एकत्र होता है, जो अन्यथा बह जाता था। प्रत्येक खंदक लगभग दो मीटर लम्बा, एक मीटर चौड़ा तथा आधा मीटर गहरा है। ये खंदक वर्षा के जल का संचय करते हैं तथा उन्हें सही दिशा देते हैं जिससे इस क्षेत्र की जल उपलब्धता में बढ़ोतरी हो सके तथा जैव विविधता एवं पर्यावरण में सुधार हो सके। यह विशाल कार्य न्यूनतम लागत में सामूहिक प्रयास द्वारा संभव हो पाया है। इसी प्रकार के क्रियाकलाप देश के अन्य भागों में भी लघु स्तर पर किये जा रहे हैं। आशा है, शीघ्र ही इस प्रकार की जल स्त्रोत पुनरुद्धार गतिविधियाँ देश के सभी क्षेत्रों में विशाल स्तर पर किये जायेंगे। इसके द्वारा जल प्रबंधन एवं जल उपभोग के मध्य अतिआवश्यक संतुलन पुनः प्राप्त किया जा सके। इन प्रयासों को सफल बनाने के लिए यह आवश्यक है कि हम अपने पुरातनकाल में झाँक कर भारत के जल धरोहर को जानें व समझें।

जल प्रधान भारत

भारत एक जल प्रधान देश है। भारत को ना केवल तीन महासागरों एवं ७५१७ किलोमीटर लम्बे समुद्रतट का वरदान है, अपितु इसके सम्पूर्ण परिदृश्य पर नदियों का जाल बिछा हुआ है जो भिन्न भिन्न पर्वतों से निकल कर मैदानी क्षेत्रों का पोषण करते हुए अंततः समुद्र में समा जाती हैं। ये नदियाँ देश की शिराएँ हैं जो जल रूपी पोषक तत्व को देश के विभिन्न भागों में पहुँचाती हैं। सैकड़ों जलप्रपातों की जलधाराएं विभिन्न शैलप्रदेशों से होते हुए इन नदियों में आ कर समा जाती हैं। भारत की जल धरोहरों का उल्लेख पुराणों में भी किया गया है। पौराणिक काल से भारत को सात नदियों का प्रदेश कहा जाता है। प्रत्येक प्रमुख हिन्दू धार्मिक अनुष्ठानों से पूर्व इन सातों नदियों का आह्वान किया जाता है। विस्तृत स्तर पर देखा जाए तो भारत के प्रत्येक क्षेत्र में इतनी संख्या में नदियाँ तथा नदी-घाटी सभ्यताएँ हैं कि भारत को ‘सैकड़ों नदियों की भूमि’ कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी।

भारतीय नदियाँ – हमारी जल शक्ति

वाराणसी में गंगा
वाराणसी में गंगा

नदियाँ हमारी जीवनदायिनी हैं। प्रकृति का अभिन्न अंग हैं। वे हमारी जल शक्ति हैं। सम्पूर्ण विश्व में नदियों को सभ्यता का पालना कहा जाता है। इन नदियों से ही मानव का विकास जुड़ा हुआ है। हमारी अधिकतम आवश्यकताएं भी इन्हीं नदियों से पूर्ण होती हैं। अतः विश्व व भारत के अधिकतर नगर इन नदियों के किनारे ही बसे हैं। भारत के प्रत्येक नदी के तट पर प्रसिद्ध नगर तथा तीर्थस्थल बसे हुए हैं। इनमें से कुछ प्रसिद्ध स्थल हैं, यमुना नदी के तट पर मथुरा, क्षिप्रा नदी के तट पर उज्जैन, गोमती नदी के तट पर द्वारका, गंगा, यमुना व सरस्वती के संगम पर प्रयागराज, तुंगभद्र नदी के तट पर हम्पी, गोदावरी नदी के तट पर नासिक, सरयू नदी के तट पर अयोध्या, मन्दाकिनी नदी के निकट केदारनाथ, अलखनंदा नदी के निकट बद्रीनाथ इत्यादि। हिमालय से उतर कर मैदानी क्षेत्रों में प्रवेश करती गंगा के किनारे हरिद्वार एवं काशी बसे हुए हैं। कावेरी नदी दक्षिण भारत के कुर्ग अथवा कोडगु के पर्वतों से प्रस्फुटित होती है। तत्पश्चात कर्णाटक एवं तमिलनाडु का पोषण करती हुई पूर्व की ओर बहती है तथा बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है।

ब्रह्मपुत्र उस स्थान से निकलती है जहाँ कभी ब्रह्मा के पुत्र थे, जो इसे एक नद बनता है। पुराणों के अनुसार नदियाँ देवी का स्वरुप हैं जो की धरती पर द्रव्य रूप में रहती हैं। इन्द्रलोक की सुप्रसिद्ध सुंदरियाँ भी जल से अवतरित होती है इसि लिए उन्हें अप्सरा कहा जाता है, अप यानि जल।

वर्षा – जल शक्ति का स्त्रोत

पुरातन काल से जल के प्रति भारतीयों की श्रद्धा केवल नदियों, जलाशयों तथा सागरों के प्रति ही नहीं है, अपितु धरती को अपने प्रेम से सराबोर करती वर्षा की एक एक बूँद तक जाती है। ग्रीष्म ऋतु की चरम सीमा तक पहुँचते पहुँचते धरतीवासी आकाश की ओर आस से ताकना आरम्भ कर देते हैं कि कब आकाश में मेघ छाएंगे तथा वर्षा का सन्देश लायेंगे। कृषि प्रधान विकासशील राष्ट्र होने के कारण भारत की अर्थव्यवस्था का चक्र वर्षा पर निर्भर करता है। अतः चातुर्मास के चार मास में यदि भरपूर वर्षा हो जाए तो भारतीयों के लिए, विशेष रूप से किसानों के लिए इससे प्रसन्नता का विषय अन्य नहीं हो सकता है।

लदाख में आधी जमी हुई जांसकर नदी
लदाख में आधी जमी हुई जांसकर नदी

मानसून के लिए संस्कृत भाषा में शव्द है, वर्षा। मानसून मूलतः हिन्द महासागर एवं अरब सागर की ओर से भारत के दक्षिण-पश्चिम तट पर आने वाली वायु को कहते हैं जो भारत में अधिकाँश वर्षा के लिए उत्तरदायी होती हैं। ये मौसमी वायु है जो दक्षिण एशिया क्षेत्र में जून से सितम्बर तक प्रायः चार मास तक सक्रिय रहती है। मानसून का व्यापक अर्थ है, ऐसी वायु जो किसी क्षेत्र में किसी ऋतु विशेष में ही अधिकाँश वर्षा कराती है।  भारत के छः ऋतुकाल में से एक काल वर्षाकाल है। मानसून की वायु जून मास में भारत के दक्षिण-पश्चिम तट से प्रवेश कर ऊपरी दिशा की ओर अग्रसर होती है।

राजस्थान एवं लद्धाख जैसे उष्ण एवं शीत मरुभूमि को क्वचित ही वर्षा के दर्शन होते हैं। वहीं तटीय क्षेत्रों में सामान्यतः ३००० मिलीमीटर प्रतिवर्ष तक वर्षा हो जाती है। भारत के आर्द्रतम स्थल मौसिंराम में औसतन १४००० मिलीमीटर प्रतिवर्ष तक वर्षा हो जाती है। मानसून में गाये जाने वाले ‘कजरी’ जैसे लोकगीत वर्षा के प्रति आस्था एवं कृतज्ञता की भावनाओं से ओतप्रोत होते हैं। कालीदास ने अपने काव्य संग्रह ऋतुसंहारम् में मानसून को ललक एवं तृष्णा का मौसम वर्णित किया है।

वर्षा-जल का संग्रहण व संरक्षण

अनुपम मिश्रा वर्षा-जल संग्रहण एवं संरक्षण के अग्रणी अन्वेषकों में से एक हैं। अनेक पारंपरिक जल संरक्षक तकनीकों के पुनरुद्धार का श्रेय उन्हें दिया जाता है। उनकी प्रतिलिप्याधिकार-मुक्त पुस्तक ‘Ponds are still relevant’ में वे भारत के विभिन्न क्षेत्रों के जल स्त्रोतों के पारिस्थितिकी तंत्र के विषय में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं। वे बताते हैं कि किस प्रकार प्राचीनकाल से भारतवासियों ने उपयुक्त समय व स्थान पर सरोवरों का निर्माण किया तथा समाज के सभी वर्गों के सहयोग से किस प्रकार उन्होंने वर्षानुवर्ष उनका रखरखाव किया। जैसलमेर जैसे अल्प वर्षा वाले मरु नगरों में प्रत्येक घर की छत को जल संचयन प्रणाली से जोड़ा गया तथा प्रत्येक कुँए में जल संचय किया गया, जबकि वहां ५२ अप्रतिम जलाशय हैं। प्राचीनकाल से वर्षा-जल के संचयन हेतु किये गए अनेक प्रयासों के कुछ उदहारण हैं,

बावड़ियां

सम्पूर्ण भारत में अनेक अप्रतिम प्राचीन बावड़ियां हैं जो वर्षा-जल का संचयन करने में अग्रणी है। उनमें से अधिकतर बावड़ियां राजस्थान एवं गुजरात जैसे उत्तर-पश्चिमी सूखे राज्यों में स्थित हैं। वे एक प्रकार से मानव-निर्मित मरूद्यान हैं। उनका उद्देश्य ना केवल जल संचयन है अपितु वे ऐसे सामाजिक स्थलों का कार्य करते हैं जहां जल के समीप बैठकर लोग आनंद लेते हुए वार्तालाप करते हैं। ये बावड़ियां एक प्रकार से भगवान विष्णु को समर्पित मंदिर का प्रतीक होती हैं जिन्हें क्षीरसागर के जल में विश्राम करना प्रिय है।

रानी की वाव
रानी की वाव

११वीं सदी में निर्मित रानी की वाव की संरचना सोलंकी वंश की रानी उदयमती ने करवाया था। यह भूमि से नीचे की ओर जाती हुई सात तलों की संरचना है। इसके चारों ओर अलंकृत भित्तियाँ एवं चबूतरे हैं। जब आप ऊपर से इसे देखेंगे तो यह भूमि में खोदे गए एक विशाल कुँए जैसा प्रतीत होती है। यह देख आपको अत्यंत आश्चर्य होगा कि इतने वर्षों के पश्चात भी इसकी भित्तियाँ अखंडित खड़ी हैं। इसके मंडप को केवल २९२ स्तम्भ ही आधार प्रदान कर रहे हैं। इस विशालकाय बावड़ी के भीतर प्रवेश करने पर इसका भव्यतम रूप शनैः शनैः प्रकट होने लगता है। नीचे १० मीटर व्यास का एक कुआं है जो लगभग ३०० मीटर गहरा है तथा समीप स्थित सरस्वती नदी से भूमिगत रूप से जुड़ा हुआ है। आप सोच रहे होंगे कि रानी द्वारा अपने दिवंगत पति की स्मृति में इस बावडी की संरचना हेतु क्या प्रेरणा रही होगी? इसका उत्तर है, पुण्य। अपनी प्रजा के लिए प्रचुर मात्रा में जल उपलब्धि सुनिश्चित करने से अधिक पुण्य क्या हो सकता है?

जयपुर के आभानेरी में चाँद-बावडी है जो अपनी समरूपता के लिए प्रसिद्ध है। इसे सर्वाधिक छायाचित्र अनुकूल बावड़ियों में से एक माना जाता है। इसमें ३५०० से भी अधिक तालबद्ध ज्यामितीय तिरछी सीढ़ियाँ हैं जो यह सुनिश्चित करती हैं कि आप किसी भी समय अथवा ऋतु में बावड़ी के जल तक पहुँच सकते हैं।

बाढ़ जल प्रबंधन

प्रयागराज के निकट श्रिंगवेरपुर में जलकुण्डों को जोड़ती एक प्राचीन विस्तृत संरचना है जो वर्षा ऋतु में बाढ़ की स्थिति में गंगा के जल को एकत्र करती थी तथा अतिरिक्त जल को पुनः गंगा में प्रवाहित करती थी। ये जलकुंड ना केवल जल एकत्र करते थे, अपितु अवसादन प्रक्रिया द्वारा जल का शुद्धिकरण भी करते थे। अंतिम जलकुंड में सर्वाधिक शुद्ध जल एकत्र होता था।

ढोलावीरा जैसे पुरातात्विक स्थलों में विस्तृत जल प्रबंधन प्रणालियाँ दृष्टिगोचर होते हैं। उनका सम्बन्ध ८वीं शताब्दी की सिन्धु सरस्वती नदी घाटी सभ्यता से लगाया जाता है। मुंबई नगर के बीचोबीच कान्हेरी जैसे २००० वर्ष प्राचीन बौद्ध गुफाएं भी प्राचीनकालीन उत्तम जल प्रबंधन का साक्ष्य देती  हैं। आप उन उत्खनित गुफाओं में चारों ओर जल नलिकाएं देख सकते हैं। नियमित अंतराल पर परस्पर जुड़े हुए जलकुंड हैं। चट्टानों के प्राकृतिक ढलान का उपयोग करते हुए गुफाओं की छतों पर गिरते जल को एकत्र किया जाता था। चार मास में एकत्रित मानसून जल बौद्ध भिक्षुओं के वर्ष भर की जल आवश्यकताओं की पूर्ती करने में सक्षम होता था।

गाँव के जलाशय

भारत के पूर्वी राज्य ओडिशा में जब आप किसी ग्रामीण भाग की ओर वाहन चलाते हैं, तब विशाल जलाशयों की पंक्ति को देखते ही आप समझ सकते हैं कि आप गाँव के समीप पहुँच रहे हैं। बहुधा इन जलाशयों के मध्य अथवा तट पर छोटे सुन्दर मंदिर हैं। उसी प्रकार भारत के अनेक राज्यों में जलाशयों की उपस्थिति दृष्टिगोचर होती है। अधिकतर जलाशय कमल पुष्पों से भरे होते हैं जिनके चौड़े पत्ते जल सतह को ढँक लेते हैं ताकि जल वाष्पीकरण निम्नतम हो।

मंदिर के जलकुंड

मुंबई का प्राचीन बाणगंगा कुंड
मुंबई का प्राचीन बाणगंगा कुंड

प्राचीन भारत के सभी मंदिर परिसरों में कम से कम एक जलकुंड अवश्य होता था। स्कन्द पुराण का अयोध्या महात्मय अयोध्या नगरी का मानचित्र प्रदर्शित करता है जिसमें चिरकालीन सरयू नदी के तट पर बसे होने के पश्चात भी उसमें परस्पर जुड़े हुए अनेक जलकुंड थे। दक्षिण भारत की प्राचीन मंदिर नगरी कांचीपुरम जलकुण्डों से भरा हुआ है जिनमें कुछ मंदिर परिसर के भीतर तथा कुछ बाह्यस्थल पर स्थित हैं। नगरी के मधोमध सर्व तीर्थं कुलम् है जो एक विशाल जलकुंड है। इसके तीन ओर मंदिर हैं। आप कल्पना कर सकते हैं कि प्राचीनकाल में ऐसे संपन्न स्थल पर स्थानिक एवं तीर्थयात्री परस्पर भेंट करते हुए अपने विचारों व अनुभवों का आदान-प्रदान करते रहे होंगे।

तमिलनाडु के मंदिरों के जलकुण्डों का नवीनीकरण आशा की किरण दिखाता है। वहां के भूमिगत जल संचय के स्तर में उन्नति इसका त्वरित प्रभाव दर्शाता है। यदि इन जलकुण्डों में जल प्रवेश एवं निकास द्वारों को सुनियंत्रित किया जाए तो वर्षा-जल का पर्याप्त मात्रा में भूमि में रिसना सुनिश्चित हो सकता है।

जल संरक्षण – जल शक्ति के प्रति श्रद्धा

मांडू का जल महल
मांडू का जल महल

जल संरक्षण का सर्वोत्तम उदहारण मध्य प्रदेश के मांडू में दृष्टिगोचर होता है। मध्यप्रदेश के एक ऊंचे सपाट पठार पर स्थित मांडू एक प्राचीन नगरी है जो प्राचीन काल में जल के लिए केवल वर्षा पर निर्भर था। इसके शीर्ष से धुंधली सी दृष्टिगोचर नर्मदा नदी, निकटतम नदी है किन्तु वह यहाँ से लगभग ४० मील दूर स्थित है। प्राचीनकाल में यह नगरी विश्व की सर्वाधिक सघन आबादी वाले क्षेत्रों में से एक थी। इसके पश्चात भी ऐसा माना जाता है कि मांडू में कभी भी जल का अभाव नहीं था। जब आप मांडू में विचरण करेंगे तो आप पायेंगे कि सम्पूर्ण मांडू क्षेत्र में अनेक सरोवर हैं जो वर्षा के जल का संचयन करते हैं। सभी राजसी भवनों की संरचनाएं गहरे कुओं के चारों ओर की गयी हैं जो वर्षा की प्रत्येक बूँद को संचित करते हैं। आपको इन महलों की छतों पर भव्य तरणताल दृष्टिगोचर होंगे। यहाँ के एक महल का नाम ही जलमहल है। इसके दोनों ओर विशाल सरोवर हैं जिनके मध्य यह महल ऐसा प्रतीत होता है मानो जल सतह पर कोई विशाल नौका अथवा जहाज तैर रहा हो। सम्पूर्ण मांडू नगरी जल संचयन व जल संरक्षण के ध्येय पर निर्मित की गयी है।

जल शक्ति की आराधना

ओम्कारेश्वर में नर्मदा तट
ओम्कारेश्वर में नर्मदा तट

भारत में सभी तीर्थयात्राओं का समापन वहां स्थित पवित्र जल में स्नान के पश्चात ही होता है। क्या काशी की तीर्थयात्रा गंगा के जल में डुबकी लगाने से पूर्व सम्पूर्ण हो सकता है? काशी की प्रसिद्ध पंचक्रोशी यात्रा का शुभारम्भ एवं समापन दोनों ही मणिकर्णिका घाट से व मणिकर्णिका घाट तक गंगा में नौकायन द्वारा ही होता है। भारत की प्राचीनतम नदी, नर्मदा की आराधना का सर्वोत्तम साधन नर्मदा परिक्रमा है। तीर्थयात्री पैदल चलते हुए नर्मदा की परिक्रमा करते हैं। प्रत्येक प्रातः नर्मदा के जल में स्नान करते हैं। इस परिक्रमा की २६०० किलोमीटर से भी अधिक दूरी पार करने के लिए महीनों, कभी कभी वर्षों व्यतीत हो जाते हैं। वे मंदिरों एवं आश्रमों में रात्रि व्यतीत करते हैं। जो उन्हें भाग्य से प्राप्त हो जाए वही भोजन करते हैं।

कुम्भ मेला

अब हम पहुंचते हैं, जल शक्ति के सर्वाधिक विशाल पर्व, कुम्भ मेले में। कुम्भ मेला भारत के चार स्थानों पर प्रत्येक १२ वर्षों में एक बार आयोजित किया जाता है। इस पर्व में उन स्थानों के पावन जल में कुम्भ स्नान किया जाता है। जैसे, प्रयाग में गंगा, यमुना व सरस्वती नदियों का संगम, हरिद्वार में गंगा नदी, उज्जैन में क्षिप्रा नदी तथा नासिक में गोदावरी नदी। हिन्दुओं का जल से सम्बंधित यह विशालतम पर्व होता है। भारत भर से, यहाँ तक कि विदेशों से भी, लाखों की संख्या में तीर्थयात्री ग्रहों की विशेष युति में इन स्थानों पर जाते हैं तथा जल में पावन स्नान करते हैं। यद्यपि कुम्भ में आप सत्संग, संतों से संवाद, ज्ञानवर्धक चर्चाओं जैसी अनेक गतिविधियाँ कर सकते हैं, तथापि कुम्भ मेले की सर्वोपरि आवश्यकता है कि आप नदी के दर्शन करें, उसके प्रति कृतज्ञता दर्शाये, उसकी आराधना करें, जितना हो सके उसके पावित्र्य व अस्तित्व को चिरायु रखने का प्रण करें। उसके पावन जल में स्नान करें।

गंगा यमुना के संगम में डुबकी लगाते श्रद्धालु
गंगा यमुना के संगम में डुबकी लगाते श्रद्धालु

यद्यपि प्रत्येक स्थान पर कुम्भ मेला १२ वर्षों में एक बार आयोजित होता है तथापि पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में कुछ विशेष तिथियाँ होती हैं जिन्हें पावन नदियों में स्नान के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। जैसे जनवरी में आने वाला माघ मास तथा कार्तिक मास की पूर्णिमा जो दीपावली पर्व के १५ दिवसों पश्चात पड़ती है। सूर्य ग्रहण जैसे कुछ विशेष अवसरों पर भी विशेष स्नान किये जाते हैं जिनमें श्रद्धालु उपरोक्त नदियों के अतिरिक्त कुरुक्षेत्र की भी यात्रा करते हैं तथा वहां के जल में पावन स्नान करते हैं। आवश्यक यह है कि आप अपने निकटतम किसी भी पवित्र जल में स्नान करें।

चार धाम यात्रा

भारतवर्ष के चार प्रमुख दिशाओं में चार पावन धाम हैं जिनके स्वयं के विशेष उद्देश्य हैं। देवता उत्तर दिशा में हिमालय की गोद में स्थित बद्रीनाथ में ध्यान करते हैं, पूर्व में स्थित पुरी के अन्न क्षेत्र में भोजन करते हैं, पश्चिम में स्थित द्वारका में निद्रामग्न होते हैं तथा दक्षिण में स्थित रामेश्वरम में स्नान करते हैं। आप रामेश्वरम मंदिर परिसर के भीतर २२ कुँए देख सकते हैं। श्रद्धालु काशी से गंगाजल लाकर इस मंदिर में शिवलिंग का अभिषेक करते हैं, तत्पश्चात कुँए के जल से स्नान करते हैं।

ऐसी मान्यता है कि इन चिरस्थायी कुओं के जल से स्नान करने से उनके सभी पापों का नाश हो जाता है। प्रत्येक कुँए का एक नाम है तथा उनसे सम्बंधित पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं। उन कथाओं में उन ऋषि-मुनियों व राजाओं का उल्लेख है जिन्होंने इन कुओं के जल से स्नान किया था तथा उन पापों का भी उल्लेख है जिनसे उन्हें मुक्ति प्राप्त हुई थी। जैसे, कोडी तीर्थम में स्नान के पश्चात श्री कृष्ण को कंस वध के पाप से मुक्ति प्राप्त हुई थी। चक्र तीर्थ में स्नान के उपरांत सूर्य को स्वर्णिम आभा प्राप्त हुई थी।

दान का महत्त्व

राजस्थान में पीने के पानी का दान
राजस्थान में पीने के पानी का दान

भारत में प्यासे को जल का दान करना सर्वोच्च दानों में से एक माना जाता है। इसके कारण भारत सदा से जल का निर्यातक बना रहा है। जी नहीं, इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि भारत जल की विक्री करता है। अपितु इसके प्रमुख निर्यातित वे वस्तुएं हैं जिसके उत्पादन में प्रचुर मात्रा में जल का निवेश होता है। कुछ प्रमुख निर्यातित फसलें हैं, चावल, कपास तथा गन्ना। इन सभी फसलों में प्रचुर मात्रा में जल का प्रयोग होता है। इसके अतिरिक्त भारत बड़ी मात्रा में मांस का भी निर्यातक है। इसका यह अर्थ है कि भारत अपने निर्यातक देशों की जल आवश्यकताओं के भार को एक प्रकार से अपने कंधे पर उठा रहा है। स्वयं भारत में जल के अभाव को दृष्टी में रखते हुए क्या उसे यह भार उठाना चाहिये अथवा नहीं, यह एक भिन्न चर्चा का विषय है।

भारत सरकार ने सन् २०१९ में जल शक्ति मंत्रालय का गठन किया था। यह मंत्रालय जल को एक प्रमुख संसाधन के रूप में देखता है। नदियों को पुनर्जीवित करना इसका प्रमुख कार्य है। इसके कार्यक्षेत्र में गंगा जैसी अनेक प्रदूषित नदियों का शुद्धिकरण एवं भारत के सभी नागरिकों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध करना सम्मिलित हैं। आशा है सरकार का यह प्रयास भारत को एक दिवस पुनः जल संपन्न राष्ट्र बनाने में सहायक सिद्ध होगा। इसके साथ ही वह परंपरा भी पुनः जीवित हो सकेगी जिसके अंतर्गत जल को धार्मिक अनुष्ठानों के साथ दैनन्दिनी जीवन में भी अत्यंत पावन स्थान प्राप्त हो सकेगा।

अनुराधा गोयल द्वारा लिखित यह संस्करण सर्वप्रथम Hinduism Today में प्रकाशित किया गया है।

इस लिखित संस्करण को प्रकाशन से पूर्व सम्पादित किया गया है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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बिठूर कानपुर से अधिक दूर नहीं है। दोनों नगर गंगा तट पर बसे हुए हैं। हमने कानपुर की अनेक विशेषताओं के विषय में सुना है, वह चाहे उच्च एवं उच्चतर शिक्षा संस्थान हों, उसका रेल स्थानक हो अथवा वहां के औद्योगिकी संस्थान। भारतीय संस्कृति एवं परम्पराओं के परिप्रेक्ष्य में भी कानपुर अत्यंत महत्वपूर्ण नगर रहा […]

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बिठूर कानपुर से अधिक दूर नहीं है। दोनों नगर गंगा तट पर बसे हुए हैं। हमने कानपुर की अनेक विशेषताओं के विषय में सुना है, वह चाहे उच्च एवं उच्चतर शिक्षा संस्थान हों, उसका रेल स्थानक हो अथवा वहां के औद्योगिकी संस्थान। भारतीय संस्कृति एवं परम्पराओं के परिप्रेक्ष्य में भी कानपुर अत्यंत महत्वपूर्ण नगर रहा है।

बिठूर के स्थानिकों का कहना है कि बिठूर शब्द ‘बीरों का ठौर’ इस मुहावरे से आया है जिसका शाब्दिक अर्थ है, वीरों की भूमि। जब आप बिठूर के विषय में जानने का प्रयत्न करेंगे, आप भी अनुभव करेंगे कि यह नगरी वीर स्त्री-पुरुषों की कथाओं से गौरवान्वित है।

उत्पलारण्य, ब्रह्मासमतिपुरी तथा ब्रह्मव्रत बिठुर के अन्य नाम हैं।

बिठूर की दंतकथाएं

बिठूर नगर का प्राचीनतम उल्लेख सृष्टि के रचयिता, ब्रह्मा की कथाओं में प्राप्त होता है। ऐसी मान्यता है कि सम्पूर्ण मानवता के जन्मदाता मनु एवं सतरूपा की रचना करने से पूर्व, ब्रह्माजी ने गंगा के तट पर ९९ यज्ञ किये थे। इसी कारण इस स्थान को धरती का केंद्र बिंदु माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि धरती के इस केंद्र बिंदु को चिन्हित करने के लिए स्वयं ब्रह्मा जी ने अपनी खड़ाऊ की एक कील यहाँ गाड़ दी थी। उस कील को आज भी ब्रह्मव्रत घाट पर देखा जा सकता है।

बिठूर का वाल्मीकि आश्रम
बिठूर का वाल्मीकि आश्रम

बिठूर से सम्बंधित दूसरी कथा रामायण से है। बिठूर अयोध्या की सीमा से बाहर स्थित है। राम द्वारा त्यागे जाने के पश्चात सीता को लक्ष्मण ने यहीं छोड़ा था। गंगा नदी के समीप ही वाल्मीकि का आश्रम है जहां पर माता सीता ने लव एवं कुश को जन्म दिया था तथा उनका पालन-पोषण किया था। इसी स्थान पर लव एवं कुश ने श्री राम के अश्वमेधयज्ञ के अश्व को रोका था तथा हनुमान को बंदी बनाया था। इसी स्थान पर वाल्मीकि ने रामायण की रचना की थी।

तीसरी कथा ध्रुव से सम्बंधित है जिसे हम ध्रुव तारा मानते हैं। ऐसी मान्यता है कि ध्रुव के पिता उत्तानपाद उत्पलारण्य नामक स्थान के राजा थे। उत्पलारण्य बिठूर का ही प्राचीन नाम है। पिता द्वारा उपेक्षित होने के पश्चात पांच वर्ष की कोमल आयु में ध्रुव ने राजमहल का त्याग किया तथा एक पैर पर खड़े होकर भगवान विष्णु की कठोर तपस्या की। भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर उसे तारामंडल में उच्चतम पद पर स्थापित होने का वरदान दिया। आज वो जहां स्थित है उसे हम ध्रुव तारा कहते हैं। यह स्थान सूर्य, चन्द्र, ग्रहों, नक्षत्रों एवं सप्तऋषियों से भी उच्च है। जिस स्थान पर खड़े होकर ध्रुव ने तपस्या की थी, उसे ध्रुव टीला कहते हैं।

बिठूर की चौथी लोककथा हमारे कालखंड के समीप है। यह वही स्थान है जहां रानी लक्ष्मीबाई ने युद्ध-कौशल का प्रशिक्षण प्राप्त किया था। वे एक वीर योद्धा थीं। नन्ही बालिका लक्ष्मीबाई ने चार वर्ष की कोमल आयु से सोलह वर्ष की आयु तक यहाँ प्रशिक्षण प्राप्त किया था। पेशवा बाजी राव द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहेब ने बिठूर को अपनी राजधानी बनाया था। अनेक मराठी भाषी परिवार उस काल से बिठूर में निवास करते आ रहे हैं।

अवश्य पढ़ें: पुणे की पेशवा धरोहर

बिठूर के दर्शनीय स्थल

गंगा नदी एवं उसके घाट

गंगा पुल से गंगा घाट के दर्शन
गंगा पुल से गंगा घाट के दर्शन

बिठूर गंगा नदी के तट पर बसा है। घाटों की लम्बी पंक्ति के एक ओर से शांत गंगा नदी बहती रहती है। यहाँ के अप्रतिम दृश्य से मेरा प्रथम साक्षात्कार गंगा के ऊपर बने सेतु से हुआ था। वहां से बिठूर नगर के जलीय अग्रभाग का दृश्य अत्यंत विहंगम दिखाई पड़ रहा था। ऊँचाई से वह दृश्य ठीक वैसा ही प्रतीत हो रहा था  जैसा प्राचीन काल में दृष्टिगोचर रहा होगा, जब पृष्ठभाग में स्थित ऊँची इमारतें उसके सौंदर्य पर अपनी अवांछित परछाई नहीं डालती थीं। कुछ तीर्थ यात्रियों को गंगा की सैर कराती एक नौका भी शांत जल में विचरण कर रही थी।

गंगा पे नौका विहार करते यात्री
गंगा पे नौका विहार करते यात्री

नगर में प्रवेश करते ही आपको अनुभव होगा कि अधिकांश नगर का जीवन नदी के किनारे व्यतीत होता है।

यहाँ के घाटों की ढलान अत्यंत तीक्ष्ण है। वाराणसी के घाटों के समान ये जुड़े हुए भी नहीं हैं। इसलिए सभी घाटों पर पैदल सैर करने के लिए मुझे पुनः पुनः घाट चढ़ना एवं उतरना पड़ रहा था। किसी भी प्राचीन नगर के समान यहाँ के घाटों पर भी मंदिरों एवं पुरोहितों के निवास स्थानों की पंक्तियाँ थीं। सभी मंदिर छोटे थे तथा अधिकांश मंदिरों के भीतर शिवलिंग स्थापित थे। भैरव घाट पर मुझे भैरव मंदिर दिखाई दिया। मैंने तुरंत आसपास के लोगों से समीप ही देवी के मंदिर के विषय में पूछताछ आरम्भ कर दी। क्योंकि सामान्यतः जहाँ देवी का मंदिर होता है, समीप ही भैरव का भी मंदिर होता है। कुछ लोगों ने एक वृक्ष के नीचे स्थित देवी के कुछ विग्रहों की ओर संकेत किया। उन्हें देख ऐसा प्रतीत हो रहा था कि किसी काल में वे किसी ऐसे मंदिर में स्थापित रहे होंगे, जो अब समय के साथ नष्ट हो चुका है।

बिठूर के गंगा घाट
बिठूर के गंगा घाट

यहाँ के अधिकाँश मंदिर १९वीं सदी में निर्मित अथवा पुनर्निर्मित हैं। घाट के समीप स्थित कुछ संरचनाओं में जो ईंटें प्रयोग में लाई गयी हैं, उनका प्रयोग सामान्यतः दूसरी से चौथी सदी में किया जाता था। जितना संभव हो पा रहा था, मैं घाटों के किनारे ही पैदल चलने का प्रयास कर रही थी। एक स्थान पर मिट्टी का घाट था। हो सकता है कि इस ऋतु में जलस्तर नीचे जाने के कारण मिट्टी का भाग उभर कर आ गया हो।

ब्रह्मव्रत घाट

ब्रह्मव्रत घाट को जाती गलियां
ब्रह्मव्रत घाट को जाती गलियां

यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण घाट है। इसी घाट पर ब्रह्माजी ने ९९ यज्ञ पूर्ण किये थे। घाट की ओर जाने वाले मार्ग पर एक तोरण है जिससे भीतर जाते ही आप संकरी गलियों से होकर आगे बढ़ेंगे। गलियों के दोनों ओर रंगबिरंगी दुकानें हैं जहां भक्तों के लिए आवश्यकतानुसार सभी पूजन सामग्रियां उपलब्ध हैं। मैं महाशिवरात्रि से कुछ दिवस पूर्व ही यहाँ आयी थी। उस समय ये दुकानें काँवढ़ियों के लिए आवश्यक वस्तुओं से भरी थीं ताकि वे गंगा का जल शिव मंदिरों तक ले जा सकें।

घाट तक पहुँचने के लिए हमने एक सभामंडप को पार किया। उस मंडप की भित्तियों पर मकर वाहिनी गंगा, हंस वाहिनी सरस्वती तथा सिंह वाहिनी दुर्गा के सुन्दर चित्र थे।

ब्रह्मा जी की खूँटी
ब्रह्मा जी की खूँटी

घाट पर आप ब्रह्माजी द्वारा गाड़े गए कील को देख सकते हैं। इसे एक खुले मंदिर की भाँति बनाया गया है। पृष्ठभाग की भित्ति पर इस कील के विषय में जानकारी दी गयी है। वहां बैठे पुरोहित ने बताया कि पुष्कर में ब्रह्मा की मूर्ति की आराधना की जाती है तथा यहाँ उनके चरणों की पूजा की जाती है।

ब्रह्मव्रत घाट के द्वार पर गंगा, सरस्वती और दुर्गा
ब्रह्मव्रत घाट के द्वार पर गंगा, सरस्वती और दुर्गा

एक बालक छोटे पात्रों में दूध की बिक्री कर रहा था जिसे इस कील पर चढ़ाया जाता है। पुरोहितजी ध्वनियंत्र पर दूध अर्पण करने के लाभों के विषय में बता रहे थे। वे प्रत्येक भक्त का नाम एवं उसकी अर्पित मात्रा की भी घोषणा कर रहे थे। भक्तगण दूध अर्पण कर, कुछ दक्षिणा देकर तथा प्रार्थना कर घाट की ओर जा रहे थे।

बिठूर के गंगा घाट

घाट पर कई श्रद्धालु स्नान कर रहे थे। एक ओर रंगबिरंगी नौकाएं पंक्ति में खड़ी थीं। नाविक लोगों को नदी में नौका विहार करने के लिए पुकार रहे थे।

एक घाट पर घोड़े की सवारी करती एवं आकाश में अपनी तलवार उठायी हुई, झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई की आदमकद मूर्ति थी। एक अन्य घाट पर भक्तगण अपने काँवड़ के घड़ों को गंगा के जल से भर रहे थे ताकि वे उसे बाराबंकी के शिव मंदिर में ले जा सकें। वे गंगा जल से भरे काँवड़ को कन्धों पर उठाये लगभग २०० किलोमीटर तक पैदल यात्रा करते हैं।

टिकैत राय मंदिर - गंगा घाट बिठूर
टिकैत राय मंदिर – गंगा घाट बिठूर

यत्र-तत्र छोटे छोटे मंदिर हैं, कुछ सम्पूर्ण, कुछ त्यक्त तथा कुछ अपूर्ण। आप कई प्राचीन पाषाणी मूर्तियाँ मंदिर के भीतर एवं बाहर देख सकते हैं। नवीन एवं प्राचीन गृह हैं जिनमें लकड़ी के नक्काशी युक्त सुन्दर द्वार हैं। आसपास अनेक वानर उछल-कूद करते रहते हैं।

कुछ घाटों का नवीनीकरण किया गया है। यहाँ से गंगा का अप्रतिम दृश्य दिखाई देता है। घाट के एक छोर पर एक बारादरी है जिसे लखनऊ के नवाब के दरबार के एक मंत्री, टिकैत राय ने बनवाया था। १९५० में इसका नवीनीकरण किया गया था। आसपास अनेक सुन्दर हवेलियाँ हैं जिनके मध्य में खुला प्रांगण है।

बिठूर गंगा घाट पर देवी की मूर्तियाँ
बिठूर गंगा घाट पर देवी की मूर्तियाँ

यहाँ का प्रमुख मंदिर एक शिव मंदिर है जिसके विषय में मान्यता है कि इसका निर्माण स्वयं ब्रह्मा ने करवाया था। इसे ब्रह्मेश्वर मंदिर कहते हैं। यहाँ ऐसे दो मंदिर हैं। उनमें से मूल ब्रह्मेश्वर मंदिर कौन सा है, किसी को ज्ञात नहीं है।

घाट के पीछे कई मंदिर एवं आश्रम हैं। जब मैं वहां की यात्रा कर रही थी, उनमें से अधिकतर मंदिरों एवं आश्रमों के द्वार बंद थे। एक संकरी गली में एक भित्ति पर मैंने गंगा का एक लघु मंदिर भी ढूँढा।

ध्रुव टीला

ध्रुव टीला
ध्रुव टीला

गंगा के घाट एवं सेतु के उस पार ध्रुव टीला स्थित है। वहाँ तक पहुँचने के लिए सूचना पट्टिकाओं पर आवश्यक संकेत दिए गए हैं। वहां प्राचीन इतिहास का नाममात्र चिन्ह भी अब शेष नहीं है। यहाँ रंगों से ओतप्रोत एक आश्रम है। जब मैं वहां पहुँची थी तब भीतर राम धुन गाई जा रही थी। कुछ दूर नीचे जाने पर एक प्राचीन हनुमान मंदिर है जिसके भीतर हनुमान की माता अंजनी की प्रतिमा है।

गंगा के इस तट पर घाट नहीं हैं। जंगलों से गंगा अपना मार्ग कैसे बनाती है, इसका आभास आप गंगा के इस तट पर आकर ले सकते हैं।

वाल्मीकि आश्रम

वाल्मीकि आश्रम स्तिथ मंदिर का दीपस्तंभ
वाल्मीकि आश्रम स्तिथ मंदिर का दीपस्तंभ

यह बिठूर का दूसरा सर्वाधिक लोकप्रिय दर्शनीय स्थल है। गंगा नदी से किंचित दूरी पर स्थित वाल्मीकि आश्रम की भित्ति पर चित्रावली है जिसमें लव एवं कुश को हनुमान एवं अश्मेध यज्ञ के घोड़े को रस्सियों से बाँध कर बंदी बनाते दर्शाया गया है।

श्वेत रंग में एक सुन्दर मंदिर है जिसका उत्तम रूप से रखरखाव किया गया है। इसका निर्माण नाना पेशवाजी ने किया था। गर्भगृह के भीतर काली शिला में बना शिवलिंग स्थापित है। मंदिर के ऊपर प्रायिक शिखर के स्थान पर गुम्बद है। उत्तम रीति से उत्कीर्णित लकड़ी का द्वार-चौखट है। स्तंभों से युक्त खुला सभामंडप है। मंदिर के सम्मुख ठेठ मराठा शैली का दीपस्तंभ है।

सीता समाधि

दीपस्तंभ के निकट एक चौकोर गड्ढा है जिस पर पक्की मेंढ़ बनाई हुई है। ऐसी मान्यता है कि सीता माता इसी स्थान पर धरती में समाई थीं। समाधि के एक ओर कुछ लघु मंदिर हैं जो वन देवी, रामायण लिखते वाल्मीकि एवं रत्नाकर को समर्पित हैं। वहां कुछ सन्यासी बैठकर ध्यान कर रहे थे।

वाल्मीकि आश्रम में सीता समाधि स्थल
वाल्मीकि आश्रम में सीता समाधि स्थल

समाधि के दूसरी ओर एक लघु संरचना के भीतर एक खंडित घंटा लटका था। उस संरचना के भीतर कुछ प्राचीन शैल विग्रह भी थे। ऐसा कहा जाता है कि नाना पेशवा इस घंटे का प्रयोग तात्या टोपे को पुकारने के लिए करते थे। इसे सीता रसोई भी कहते हैं। वहां कुछ पात्र भी रखे हुए थे। मुझे बताया गया था कि समीप ही एक जलाशय है जिसे सीता कुण्ड कहते हैं किन्तु मुझे वह दिखाई नहीं दिया।

इस स्थान में मुझे अत्यंत शान्ति की अनुभूति हुई। मैं वहां एक प्राचीन वटवृक्ष के नीचे बैठ गयी। मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मैं वहां कुछ समय शान्ति से व्यतीत करूँ। वहां के वातावरण में आध्यात्म की भावना थी। ऐसा वातावरण एवं शान्ति किसी की रचनात्मक क्षमताओं को उभरने का सर्वोत्तम साधन है।

आश्रम के चारों ओर सीता माता एवं उनके पुत्रों के कई मंदिर हैं। कुछ मंदिर यह घोषणा कर रहे थे कि लव एवं कुश का जन्म उसी स्थान पर हुआ था। हनुमान तो इस नगर के प्रिय भगवान हैं ही। समीप ही एक वैदिक गुरुकुल भी है।

नाना राव पेशवा स्मारक उद्यान – बिठूर

नाना साहेब का महल १८५७ के युद्ध में नष्ट हो गया था। आज आप कुछ दूरी से उस महल की भंगित भित्तियाँ देख सकते हैं। अब इस स्थान पर एक सुन्दर स्मारक का निर्माण किया गया है।

नाना राव पेशवा स्मारक उद्यान
नाना राव पेशवा स्मारक उद्यान

यहाँ एक लघु संग्रहालय है जहाँ अनेक सुन्दर वस्तुएं प्रदर्शित की गयी हैं। मुझे विशेषतः रानी लक्ष्मीबाई का मूल चित्र अब भी स्मरण है। एक अन्य शिल्प में उन्हें अपने अश्व पर आरूढ़ प्रदर्शित किया है। संग्रहालय के दूसरे छोर पर नाना साहेब की भी एक विशाल प्रतिमा है।

अवश्य पढ़ें: झांसी – रानी लक्ष्मीबाई की नगरी

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का स्मारक
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का स्मारक

यह सम्पूर्ण उद्यान भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में इस स्थान का एवं विशेषतः नाना साहेब के योगदान का स्मरण करता है। यहाँ आने से पूर्व मुझे यह ज्ञात नहीं था कि इसी स्थान पर रानी लक्ष्मीबाई ने एक योद्धा का प्रशिक्षण प्राप्त किया था। वास्तव में, गंगा द्वारा पोषित यह स्थान वीरों की पावन भूमि है।

यात्रा सुझाव

मनोहारी काष्ठ द्वार
मनोहारी काष्ठ द्वार
  • बिठूर का भ्रमण लखनऊ अथवा कानपुर से एक दिवसीय यात्रा के रूप में आसानी से किया जा सकता है।
  • यहाँ भोजन व्यवस्था सीमित है। सड़कों पर कुछ मिठाई तथा फलों की दुकानें अवश्य हैं।
  • आप निर्देशित भ्रमण के अंतर्गत बिठूर का भ्रमण करें को अधिक सुविधाजनक होगा। मैंने लखनऊ के Tornos Indiaकी सेवायें ली थीं।
  • पैरों में ऐसे सुविधाजनक जूते अथवा चप्पल पहनें जिससे आपको चलने में कष्ट ना हो तथा जिसे तुरंत पहने या निकाले जा सकें।

यदि आपको इस नगर के कुछ ऐसे आयामों की जानकारी है जो इस संस्करण में सम्मिलित नहीं है तथा आप उसे सम्मिलित करना चाहें तो आप उसे हमसे अवश्य साझा करें। आप अपनी जानकारी टिप्पणी खंड में दे सकते हैं।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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चुनरी मनोरथ – मथुरा में यमुना जी का चुनरी ओढ़ना https://inditales.com/hindi/mathura-yamuna-chunri-manorath/ https://inditales.com/hindi/mathura-yamuna-chunri-manorath/#respond Wed, 08 Jan 2020 02:30:26 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1631

श्री कृष्ण के काल को बहुधा इन तीन धरोहरों से जोड़ा जाता है, गोवर्धन पर्वत, ब्रज भूमि तथा यमुना नदी। यमुना नदी का श्याम वर्ण जल कृष्ण के श्याम वर्ण के समान है। यमुना उनकी आठ पत्नियों में से एक है। यहाँ मथुरा में तो वह उनकी पटरानी है। ब्रज भूमि के दर्शन यमुना नदी […]

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श्री कृष्ण के काल को बहुधा इन तीन धरोहरों से जोड़ा जाता है, गोवर्धन पर्वत, ब्रज भूमि तथा यमुना नदी।

चुनरी मनोरथ अनुष्ठान मथुरा में यमुना नदी पर यमुना नदी का श्याम वर्ण जल कृष्ण के श्याम वर्ण के समान है। यमुना उनकी आठ पत्नियों में से एक है। यहाँ मथुरा में तो वह उनकी पटरानी है। ब्रज भूमि के दर्शन यमुना नदी के दर्शन के बिना अपूर्ण है।

मथुरा में यमुना नदी पर नौका विहार

इस पवित्र नदी पर नौका विहार तीर्थ यात्रियों तथा पर्यटकों का लोकप्रिय क्रियाकलाप है। अतः एक दिवस प्रातः काल मैंने भी नौका द्वारा मथुरा के विभिन्न घाटों के दर्शन करने का निश्चय किया। प्रतिदिन यमुना नदी जिन दृश्यों को निहारती है, कदाचित उन्ही दृश्यों को निहारने की कामना मुझमें थी।

नौका विहार का विडियो

मैंने जब घाट की ओर चलना आरम्भ किया, मैंने कुछ नवयुवकों को एक मंडप के नीचे, अपने गुरूजी के संग वेदों का जाप करते सुना। बाजार खुलना आरंभ हो रहा था। चारों ओर से मंदिर की घंटियों का नाद सुनायी दे रहा था।

विश्राम घाट

विश्राम घाट - मथुरा

मैं प्रसिद्ध विश्राम घाट पहुँची तथा वहां एक रंग बिरंगी नौका में बैठ गयी। ऐसा माना जाता है कि कंस का वध करने के पश्चात कृष्ण ने यहीं विश्राम किया था। इसीलिए इस घाट का नाम विश्राम घाट पड़ा। दोनों ओर १२-१२ घाटों के ठीक मध्य यह विश्राम घाट है।

नौका के चारों ओर रंग बिरंगी पताकाएं फहरा रही थीं। बैठने के लिये भी उतनी ही रंगबिरंगी दरी बिछी हुई थी। नाविक ने हमें ब्रज भाषा में ब्रज भूमि की कई कथाएं सुनाईं। कवितायें एवं मुहावरें उसके मुंह से झरने के समान बह रहे थे। मार्च के सुहावने वातावरण में नौका विहार का आनंद उसने कई गुना बढ़ा दिया था।

कंस किला अर्थात कंस का दुर्ग

कृष्णा के मामा कंस का दुर्ग
कृष्णा के मामा कंस का दुर्ग

विश्राम घाट से हम बाईं ओर कंस का किला अर्थात् दुर्ग की ओर बढ़ रहे थे। नाविक हमें विभिन्न घाटों एवं उनसे सम्बंधित कथाओं के विषय में बता रहा था। कंस के दुर्ग के भीतर जाकर देखने की मेरी प्रबल इच्छा थी, जबकि मुझे भलीभांति ज्ञात था कि यह कंस का दुर्ग है। सबने मुझे बताया कि भीतर देखने योग्य कुछ नहीं है। लाल बलुआ पत्थर से निर्मित यह दुर्ग अपेक्षाकृत नवीन है। दूर से यह दुर्ग विशाल प्रतीत हो रहा था। नदी की सतह पर पड़ते अपने प्रतिबिम्ब के साथ वह और भी अधिक भव्य दिखाई पड़ रहा था।

यमुना की होली

यमुना किनारे रंग बिरंगी नावें
यमुना किनारे रंग बिरंगी नावें

सम्पूर्ण नदी के किनारे स्थित रंगबिरंगे घाटों पर विभिन्न कार्यकलापों की गजबजाहट स्पष्ट दिखाई पड़ रही थी। मैं यहाँ होली के पर्व से कुछ दिनों पूर्व आयी थी। किन्तु यह ऐतिहासिक नगरी अभी से होली के रंग में रंग गयी थी। मैंने यहाँ कई परिवारों को यमुना से होली खेलते देखा। जी हाँ, आपने सही पढ़ा। पवित्र नदी यमुना के संग होली! वे होली के लोकगीत गाते, नदी में कुछ रंग छिड़कते तत्पश्चात आपस में होली खेलते। यह प्रथा अधिकतर उन सभी अनुष्ठानों में पाली जाती है जिनका आयोजन घाटों में होता है। चारों ओर हर्ष एवं उल्हास का वातावरण था जो यहाँ सदैव रहता है। यूँ ही नहीं कृष्ण ने इस स्थान को खेलने तथा रास लीला रचाने के लिए चुना था।

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यहाँ एक संरचना विशेषतः मेरी स्मृति में है। लाल बलुआ पत्थर द्वारा राजस्थानी झरोखा शैली में निर्मित एक ऊंचा बुर्ज जिसे सती बुर्ज कहा जाता है। कहा जाता है कि एक रानी जो अकबर की सास भी थीं, यहाँ सती हुई थीं। उनकी स्मृति में यह बुर्ज खड़ा किया गया था।

पुराणों के छंद

पुराणों में मथुरा और यमुना
पुराणों में मथुरा और यमुना

घाट के उस पार, कुछ फलकों पर पुराणों के छंद थे जो संस्कृत भाषा में मथुरा की गाथा कह रहे थे। साथ ही हिंदी में उनका अर्थ भी प्रदर्शित था। यह मुझे अत्यंत भाया। आशा करती हूँ कि अन्य तीर्थ स्थलों पर भी यह प्रथा शीघ्र आरम्भ की जायेगी जो उस स्थान का स्थल पुराण अर्थात् उस स्थान के पौराणिक आलेख सार्वजनिक स्थानों पर इसी प्रकार प्रदर्शित करेंगे।

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यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि नदी के घाट स्वच्छ नहीं हैं। मैंने स्वयं देखा कि गंदे नाले द्वारा मैला सीधे नदी में जा रहा था। कचरा तो इतना था कि वह घाट की सीड़ियों एवं नदी के जल के बीच ड्योढी के समान प्रतीत हो रहा था। नदी के मलिन जल को देख मेरा हृदय अत्यंत आहत हुआ था।

उपरोक्त चर्चा के पश्चात भी मैं यही कहूंगी कि मथुरा की महिमा इसके परे है। यहाँ के अर्धचन्द्राकार घाटों पर शांत बहते जल के किनारे बैठकर इनकी कथाओं में खो जाना अतुलनीय अनुभव है। शान्ति से बैठिये तथा ब्रजवासियों के मुख से इस धरती की कथाएं सुनकर आत्म विभोर हो जाईये।

चुनरी मनोरथ – जब यमुना चुनरी ओढ़ती है

नौका सवारी के समय मेरे गाइड ने मुझे इस पवित्र नदी पर आयोजित किये जाने वाले इस अनोखे अनुष्ठान की जानकारी दी। और मेरा सौभाग्य देखिये, नाविक ने जानकारी दी कि उस दिन भी कुछ चुनरी मनोरथ अनुष्ठान नियोजित थे। मैंने अपने दिन के बचे कार्यक्रम की सूची में झटपट फेर-बदल किया तथा यह सुनिश्चित किया कि मैं भी इस अनोखे अनुष्ठान का आनंद ले सकूं।

यह चुनरी मनोरथ क्या है?

चुनरी मनोरथ के लिए सजे कृष्ण एवं यमुना
चुनरी मनोरथ के लिए सजे कृष्ण एवं यमुना

मनोरथ का अर्थ है मनोकामना अथवा इच्छा। चुनरी का अर्थ आप जानते ही हैं, जो भारतीय परिधान का एक अभिन्न अंग है। किसी भी घरेलू उत्सव में अथवा विवाह, मंगनी जैसे पवित्र आयोजनों में स्त्रियों को चुनरी ओढाने की रीत है। यह सुहागन का अधिकार है। दिव्य नारी सुलभ पवित्रता का प्रतीक है।

चुनरी मनोरथ में यमुनाजी को चुनरी अर्पित की जाती है। उन्हें पावन मथुरा की देवी माना जाता है। परिवारजन उन्हें अर्पित करने के लिए अत्यंत लम्बी साड़ी लाते हैं जिसे वे कई साड़ियों को जोड़कर बनाते हैं। अधिकतर १०१ साड़ियों को आपस में सिलकर यह साड़ी तैयार की जाती है। कभी कभी तो भक्तगण ४०० साड़ियों तक को जोड़कर ये लम्बी साड़ी तैयार करते हैं। इस लम्बी साड़ी के एक छोर को इसी तट पर रखकर साड़ी को अनेक नौकाओं द्वारा पावन नदी के उस पार तक ले जाते हैं। जब साड़ी का दूसरा छोर नदी पार कर दूसरे किनारे तक पहुंचता है तो ऐसा प्रतीत होता है मानो नदी ने चुनरी ओढ़ ली है।

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साधारणतः यह परिवारजनों द्वारा किसी विशेष प्रयोजनों में आयोजित किया जाता है अथवा किसी मनोकामना के पूर्ण होने पर कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए आयोजित किया जाता है। उस दिन मैंने दो चुनरी मनोरथ देखे। एक चुनरी मनोरथ में एक गुजराती परिवार के ९०-१०० सदस्य अपने आदरणीय कुलपिता के जन्म दिवस का उत्सव मना रहे थे। वे वृद्ध पुरुष अपनी अर्धांगिनी के संग सर्व पूजा विधि संपन्न कर रहे थे। दूसरे चुनरी मनोरथ में एक राजस्थानी परिवार के १०-१२ सदस्य अपने परिवार में प्रवेश करती नयी नवेली दुल्हन के स्वागतार्थ यह अनुष्ठान कर रहे थे।

चुनरी मनोरथ कौन कर सकता है?

सपरिवार चुनरी मनोरथ करते दम्पति
सपरिवार चुनरी मनोरथ करते दम्पति

चुनरी मनोरथ मुख्यतः गुजरात एवं राजस्थान के वैष्णव परिवार के सदस्य करते हैं जो पुष्टिमार्ग के अनुयायी हैं। यमुना देवी पुष्टिमार्ग भक्ति के अनुयायियों की प्रमुख देवी हैं। इनके अतिरिक्त किसी अन्य भक्त के लिए यह अनुष्ठान करने के लिए कोई बंधन नहीं है। वहां के पुजारीगण प्रसिद्ध सांसद हेमा मालिनी द्वारा किये गए चुनरी मनोरथ की कथा सुनाते नहीं थकते। उन्होंने यह अनुष्ठान करवाया था, कदाचित सांसद बनने के पश्चात कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए।

यह अनुष्ठान वर्ष भर किसी भी समय किया जा सकता है। घाट की सीड़ियों पर एक आश्रय निर्मित किया गया है ताकि अनुष्ठान के समय लोग इसके नीचे बैठकर देख सकें। यह अनुष्ठान अत्यंत विस्तृत है तथा इसके संपन्न होने तक कई घंटे लग जाते हैं।

चुनरी मनोरथ की कथा

एक समय ब्रज की गोपियों को कृष्ण के संग खेलते एवं रास लीला रचाते हुए गर्व उत्पन्न हो गया था। उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ कि कृष्ण सदैव उनका कहा मानते हैं तथा वे जो कहें वह करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। जैसे ही कृष्ण को यह आभास हुआ, उन्होंने गोपियों को सही दिशा दिखने का निश्चय किया। वे पवित्र यमुना के जल के भीतर जाकर छुप गए। उन्हें ना देखकर सभी गोपियों को अत्यंत पीड़ा हुई तथा उनकी दुर्गति होने लगी। बावरी होकर उन्होंने गोपी गीत गाना आरम्भ किया।

वे एक वन से दूसरे वन तक तथा एक तालाब से दूसरे तालाब तक दर दर भटकने लगीं। अंततः वे यमुना के समीप गयीं तथा उनसे कृष्ण के विषय में पूछा। गोपियों की दुर्दशा एवं उनका दुःख देख पावन नदी का हृदय पिघल गया। उन्होंने कृष्ण से बाहर आकर गोपियों के मुख व जीवन में आनंद वापिस लाने का अनुनय किया।

गोपियों ने यमुनाजी को धन्यवाद दिया तथा कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु उन्हें चुनरी अर्पित की। उस समय से यह परंपरा स्थापित हो गयी। भक्तगण इच्छा पूर्ति के उपरांत पावन नदी की ओर कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए उन्हें चुनरी उढ़ाते हैं।
विडियो: चुनरी मनोरथ अनुष्ठान देखें

अनुष्ठान

परिवारजन अपने शीश पर साड़ियों का गट्ठा रख कर धूमधाम से शोभायात्रा निकालते हैं। वे स्वयं भी जितना संभव हो, उत्तम वस्त्र धारण करते हैं। मैंने देखा, चुनरी मनोरथ करते एक परिवार की सभी स्त्रियाँ लाल रंग की बांधनी साड़ी पहने, विशेष रूप से सजी हुई थीं। दूसरे परिवार की स्त्रियों ने भारी रेशमी साड़ियाँ एवं भव्य आभूषण धारण किया हुआ था। मेरे अनुमान से सभी साड़ियाँ नवीन थीं। सभी मधुर तान पर गीत गाते एवं नृत्य करते पवित्र नदी के घाट पर जा रही थीं। वे जब बाजार से होते हुए जा रही थीं, वहां उपस्थित सभी के मुख पर दिव्य प्रसन्नता थी क्योंकि उनकी लाडली यमुनाजी का आज विशेष श्रृंगार होने जा रहा है।

वे सब जाकर यमुना के घाट की सीड़ियों पर बैठ गयीं तथा पुजारीजी को चुनरी मनोरथ की तैयारियां करते देखने लगीं। वहां एक मंच तैयार किया गया था जिस पर क्रमशः ये अनुष्ठान किये जाने थे:

गणेश पूजा
कैलाश पूजा
मातृका पूजा
कृष्ण तथा यमुना पूजा

श्री कृष्ण एवं यमुना जी
श्री कृष्ण एवं यमुना जी

दो घड़ों को रंग कर कृष्ण एवं यमुना का रूप प्रदान किया गया था। उनका वर-वधु के समान श्रृंगार किया गया था। अनुष्ठान में भाग लेने वाला प्रत्येक सदस्य उन्हें वस्त्र एवं आभूषण अर्पित कर रहा था। उनके चारों ओर भिन्न भिन्न प्रकार के मिष्टान रखे थे। मैंने देखा कि पुजारीजी एवं परिवार के सदस्य मूर्तियों को अत्यंत प्रेम एवं श्रद्धा से सुसज्जित कर रहे थे।

पवित्र नदी का चढ़ावा

पवित्र नदी के किनारे बैठकर परिवारजन उन्हें वे सर्व चढ़ावे चढ़ा रहे थे जो अन्यथा वे मंदिर में भगवान् को चढ़ाते हैं, जैसे दूध, दही, हल्दी, कुमकुम इत्यादि। होली का समय होने के कारण उन्होंने यमुना को होली के ५ रंग भी अर्पित किये।

यमुना जी के संग होली खेलने के लिए रंग
यमुना जी के संग होली खेलने के लिए रंग

सर्व पूजा विधि समाप्त होते ही वे सब नौकाओं पर सवार होने लगे। उन्होंने अपने हाथों में साड़ी उठायी हुई थी। उनके समक्ष चुनौती थी कि उन्हें इतनी लम्बी साड़ी ऊंची उठाकर पकड़नी थी । जैसे जैसे नदी उस पार जाने के लिए आगे बढ़ रही थी वैसे वैसे रंग बिरंगी साड़ी का गट्ठा खुल रहा था। यमुना नदी इसकी रंगीन छटा में खिल रही थी। परिवारजनों के मुख पर अपार आनंद स्पष्ट झलक रहा था, मानो वे एक स्वप्न को जी रहे थे।

“यमुना मैय्या की जय” चारों ओर यमुना मैया की जय जयकार गूँज रहा था। यमुना को चुनरी उढ़ाने का कार्य सम्पूर्ण होते ही वे एक दूसरे को बधाइयां दे रहे थे।

विस्तृत अनुष्ठान

जितना समय इस सम्पूर्ण अनुष्ठान के पूर्ण होने में व्यतीत हुआ तथा जितनी वस्तुएं यमुनाजी को अर्पित की गयीं, उनसे मैंने यह अनुमान लगाया कि यह एक मूल्यवान अनुष्ठान है।

मैंने कुल ३ घंटे यहाँ व्यतीत किये थे इस अनुष्ठान को देखने में। जो बड़ा परिवार यहाँ अनुष्ठान करवा रहा था, उन्होंने मुझे भी अनुष्ठान में सहभागी होने का आमंत्रण दिया तथा मुझे भी यमुना को रंग अर्पित करने का अवसर दिया। उन्होंने तो मुझे नौका में सवार होकर चुनरी उढ़ाने में भी भाग लेने का आमंत्रण दिया था। किन्तु मैंने उन्हें विनम्रता से मना कर दिया तथा तट पर बैठकर यहाँ से वह विहंगम दृश्य देखने का निश्चय किया।

यह मेरे लिए वह आकस्मिक लाभ था जो मुझे सही समय पर सही स्थान में उपस्थित होने के कारण प्राप्त हुआ था। एक दिवस पूर्व तक मैं इस अनुष्ठान से पूर्णतः अनभिज्ञ थी। प्रातःकाल मैंने यूँ ही निश्चय किया था कि नौका पर सवारी करते हुए यमुना के तटों का आनंद लूंगी तत्पश्चात मथुरा के अन्य स्थलों के दर्शन करूंगी। किन्तु यमुनाजी ने मेरे लिए कुछ और ही निश्चित किया हुआ था। वे चाहती थीं कि मैं उनका चुनरी श्रृंगार होते देखूं। उनके आशीर्वाद के बिना यह असंभव था। ये वे क्षण थे जो एक यात्री को सही मायने में तृप्त कर देते हैं।

मुझे बाद में यह जानकारी प्राप्त हुई कि नर्मदा नदी में भी इसी प्रकार का अनुष्ठान किया जाता है। मैं प्रतीक्षा में हूँ कि कब नर्मदा माँ भी मुझे इसी प्रकार बुलाएंगी तथा उनके श्रृंगार में सहभागी होने का अवसर प्रदान करेंगी।
आप भी जैसे ही अवसर प्राप्त हो, इस अनोखे अनुष्ठान को अवश्य देखिये।

कृष्ण एवं यमुना की कथाएं

यमुना के घाटों पर आप कई गाथाएँ सुनेंगे।

जब यमुना जी चुनरी ओढती हैं

एक कथा के अनुसार, कृष्ण के जन्म के पश्चात् सर्वप्रथम यमुनाजी को उनके चरण स्पर्श करने का अवसर प्रदान हुआ था। जब कृष्ण का जन्म हुआ था, उनके पिता वसुदेव उन्हें एक टोकरी में रखकर यमुना पार गोकुल ले गए थे जहां उनके मित्र नन्द एवं यशोदा का निवास था। वे जब यमुना में उतरे, नदी का जल उनके गले तक पहुँच गया था। तब कृष्ण ने टोकरी से चरण बाहर निकाल लिए। जैसे ही यमुना ने उनके चरण स्पर्श किये, उसका जल स्तर नीचे जाने लगा। वसुदेव ने आसानी से यमुना पार कर ली।

एक अन्य किवदंती के अनुसार, कृष्ण ने अपनी अनेक लीलाएं यमुना नदी के तट पर ही की थीं, जैसे रास लीला, बंसी बजाना, गायें चराना, गोपियों का चीर हरण इत्यादि।

एक अन्य कथा में दर्शाया गया है कि यमुना नदी मानवी रूप धर कर, हाथों में कमल पुष्प की वरमाला लिए कृष्ण से विवाह करने आयी थीं।

यमुनाजी सूर्य की पुत्री एवं मृत्यु देव यम की भगिनी हैं। उन्हें कृष्ण की प्रवाही शक्ति भी कहा जाता है। कुछ लोग उन्हें बिरजा देवी भी बुलाते हैं। यहाँ और पढ़ें

नौका सवारी के लिए सुझाव

• घाट एवं नौका सवारी का आनंद उठाने के लिए १ घंटे का समय आवश्यक है।
• १ घंटे की विशेष सवारी के लिए मैंने ४००/- रुपये भुगतान किये थे। यह नौका १५-२० लोगों को बिठाने में सक्षम है।
• प्रयत्न कर यहाँ प्रातः आने का प्रयास करें। तब ये घाट विविध क्रियाकलापों से जीवंत रहता है। सूर्य भी अनुकूल रहता है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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मणिकरण साहिब और कुल्लू मनाली में स्थित पार्वती घाटी के रहस्य    https://inditales.com/hindi/manikaran-kullu-manali-himachal/ https://inditales.com/hindi/manikaran-kullu-manali-himachal/#respond Wed, 10 Jul 2019 02:30:08 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1399

हमारे 18 दिनों के लंबे हिमाचल भ्रमण के अंतिम दिन हम मणिकरण साहिब के दर्शन करने चले। घर वापस जाने से पहले हम आभार प्रकट करने के रूप में मणिकरण साहिब के दर्शन लेना चाहते थे। हम सुबह ही नाश्ता करने के बाद मनाली से निकले और दोपहर के भोजन के काफी समय पहले मणिकरण […]

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हमारे 18 दिनों के लंबे हिमाचल भ्रमण के अंतिम दिन हम मणिकरण साहिब के दर्शन करने चले। घर वापस जाने से पहले हम आभार प्रकट करने के रूप में मणिकरण साहिब के दर्शन लेना चाहते थे। हम सुबह ही नाश्ता करने के बाद मनाली से निकले और दोपहर के भोजन के काफी समय पहले मणिकरण पहुंचे।

पार्वती घाटी के मणिकरण के उष्ण झरने
पार्वती घाटी के मणिकरण के उष्ण झरने

हमे मणिकरण के उष्ण जलस्रोतों और रास्ते में मिलने वाले हिप्पी गाँव कसोल के बारे में तो पहले से ही जानकारी थी, लेकिन जब आप हर दिन यात्रा करते हुए गुजारते हैं तो आपको हर समय ऐसी चीजें देखने को मिलती हैं जिसके बारे में आपने कभी नहीं सोचा होगा।

पार्वती घाटी  

रास्ते में हम पार्वती नदी के किनारे से गुजरते हुए चल रहे थे। पार्वती नदी जो पार्वती घाटी को अपना नाम देती है एक छोटी सी लड़की की तरह है। अगर एक शब्द में उसका वर्णन करना है तो ‘अल्हड़’ से बेहतर शब्द आपको नहीं मिलेगा। वह अधीरता, अठखेलियों और उत्साह से भरपूर है। वह विशाल हिमालय पर्वतों को काटते हुए अपना रास्ता बनाते हुए आगे बढ़ती है। वह अजेय है। उसे एक नज़र में देखते ही आप यह भाँप लेते हैं कि, आप उसे पकड़ नहीं सकते, उसे नियंत्रित नहीं कर सकते और उसकी प्रचुर शक्ति को बांध नहीं सकते। आप सिर्फ दूर से ही उसकी प्रशंसा कर सकते हैं और केवल उसके लिए प्रार्थना कर सकते हैं।

पार्वती घाटी बनाती पार्वती नदी - हिमाचल प्रदेश
पार्वती घाटी बनाती पार्वती नदी – हिमाचल प्रदेश

तो सड़क के दूसरी तरफ थे चट्टानी पर्वत। यह सड़क जैसे संतुलन का केंद्रीय उत्तोलक है; जो पहाड़ों की स्थिर शक्ति और पार्वती नदी के पानी की प्रवाही शक्ति के बीच संतुलन बनाए रखती है।

मणिकरण साहिब के पास पार्वती नदी पे पुल
मणिकरण साहिब के पास पार्वती नदी पे पुल

मणिकरण साहिब तक पहुँचने के लिए हमे पार्वती नदी पर बने पुल को पार करते हुए आगे बढ़ना था। नदी के पुल के ऊपर खड़े होकर मुझे उसके जल प्रवाह की शक्ति की प्रचुरता का आभास हुआ। उस बहते हुए पानी में इतना बल था कि, कोई भी उसके रास्ते में खड़ा नहीं हो सकता था। उसके सामने मेरे विचार भी जैसे स्तब्ध हो गए थे। उस पुल के नीचे बहती इस नदी की गर्जना के सिवाय मुझे और कुछ सुनाई नहीं दे रहा था।

गुरुद्वारा मणिकरण साहिब 

गुरुद्वारा मणिकरण साहिब
गुरुद्वारा मणिकरण साहिब

गुरुद्वारा मणिकरण साहिब 16वी शताब्दी के उत्तर काल के दौरान मणिकरण में गुरु नानक देव की यात्रा का स्मारक चिह्न है। उपाख्यान के अनुसार जब गुरु नानक देव जी मणिकरण आए थे और उन्होंने गाँव से लंगर मांगा था। यहाँ के लोगों से उन्हें बस कच्ची सामग्री ही प्राप्त हुई थी लेकिन उसे पकाने के लिए कोई चूल्हा नहीं था। तब गुरु नानक देव जी ने अपने अनुयायियों से एक पत्थर उठाने के लिए कहा। पत्थर उठाते ही उसके नीचे उबलता हुआ पानी देखकर सभी हैरान रह गए। यह पानी खाना पकाने के लिए एकदम योग्य था।

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परन्तु, खाना उस गरम पानी के तालाब में डूबता गया और सभी अनुयायि गुरु को देखने लगे। तब गुरु ने कृतज्ञता से उन्हें एक सीख दी। उन्होंने अपने अनुयायियों से कहा कि, अगर उन्हें खाना खाना है तो उन्हें वह खाना भगवान को अर्पित करना होगा। और जैसे ही यह शपथ ली गयी कि, यह खाना भगवान को चढ़ाया जाएगा, तो सारा खाना अपने-आप तैरने लगा।

महारिशी वेद व्यास ने भविष्य पुराण में गुरु नानक देव की भेट की भविष्यवाणी की थी।

आज उसी स्थान पर यह गौरवशाली गुरुद्वारा खड़ा है। प्रत्येक सिख भक्त अपनी जिंदगी में एक बार तो गुरुद्वारा मणिकरण साहिब के दर्शन करना चाहता है। हमने गुरुद्वारा मणिकरण साहिब में कुछ समय बिताया। उस समय वहाँ पर गुरुबानी का पाठ पढ़ा जा रहा था। वर्षों बाद मैंने कढ़ा प्रसाद खाया जो मेरे लिए मात्र स्वादिष्ट भोजन ही नहीं था बल्कि उसके साथ पंजाब में गुरुद्वारे के आसपास बड़े होने की मेरी ढेर सारी बचपन की यादें जुड़ी हुई थीं। हमने अपनी प्रार्थना की और हम मणिकरण साहिब के पीछे स्थित उष्ण जलस्रोत देखने के लिए चले गए।

गुरु गोबिंद सिंह भी अपने पंज प्यारों के साथ मणिकरण के दर्शन करने आए थे।

मणिकरण साहिब में उष्ण जलस्रोत

गरम कोठी - मणिकरण साहिब
गरम कोठी – मणिकरण साहिब

गुरुद्वारा मणिकरण साहिब के बाहर, हम एक लंबे से सुरंग-जैसे गलियारे से गुजरते हुए ‘गरम कोठी’ नाम के एक कक्ष तक पहुंचे। हमारे पाँव के नीचे के पत्थर बहुत गरम थे। कक्ष में खड़े रहना जैसे असंभव था। गर्मी या उष्णता असहनीय थी। हमने वहाँ पर बहुत से बूढ़े लोगों को पत्थरों पर बैठे हुए देखा और जब हमने उनसे पूछा कि वे वहाँ पर क्यों बैठे हैं। उनका जवाब सुनकर हम हैरान रह गए।

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उन्होंने बताया कि यहाँ की गर्मी आपकी अनेक बीमारियों को ठीक कर सकती है, खास कर जोड़ों के दर्द से संबंधित परेशानियाँ। ऐसी गर्मी में बैठने के लिए आपके पास दृढ़ इच्छा शक्ति होनी चाहिए। मेरे खयाल से अगर आप खुद को गोलियों के बिना ठीक कर सकते हैं तो यह बहुत ही अच्छी बात है। हम वहाँ से निकले और भरे बाज़ार से गुजरते हुए आगे बढ़े, जो भारत में किसी भी तीर्थ-स्थल की पहचान है।

मणिकरण के झरनों में पकता पानी
मणिकरण के झरनों में पकता खाना

वहाँ से हम शिव मंदिर के प्रांगण में पहुंचे जहां पर हमे उबलते हुए पानी के कुएं जैसे दिखने वाले अनेक जलस्रोत दिखे। पृष्ठ भाग में बहती पार्वती नदी के साथ इस पर विश्वास करना असंभव था कि, एक दूसरे के इतने पास स्थित दो जलस्रोतों के तापमान में लगभग 100 डिग्री सेंटीग्रेड का फर्क हो सकता है। एक तरफ जहां पार्वती नदी का पानी बर्फ जैसा ठंडा था तो दूसरी तरफ उसके ठीक पास में स्थित उष्ण जलस्रोतों में उबलता हुआ पानी था। यह पानी इतना गरम था कि, वहाँ पर लोगों को आस-पास घूमने के लिए लकड़ी के तख्ते बिछाये गए थे।

उष्ण जलस्रोतों में खाना पकाना

मणिकरण के उष्ण पानी के झरने
मणिकरण के उष्ण पानी के झरने

इन उष्ण जलस्रोतों में आप लगभग आधे घंटे में सूती की थैली में डालकर अपने अनाज खुद उबाल सकते हैं। यहाँ पर आस-पास हमे ऐसे अनेक थैले देखने को मिले। एक बड़े बर्तन में मणिकरण साहिब का लंगर पकाया जा रहा था। उष्ण जलस्रोतों से निकलती हुई भाप के बीच से जब आप मंदिर को देखते हैं, तो आप इसी सोच में पड़ जाते हैं कि, क्या हम कभी भी इस दुनिया के रहस्यों को समझ पाएंगे? क्या ये रहस्य इसीलिए बिखेरे गए हैं कि हमे याद दिला सके कि, हम प्रकृति के बारे में कितना जानते हैं और हमे कितना कुछ जानना-समझना बाकी है?

मणिकरण से जुड़े उपाख्यान

कहते हैं की उन दिनों की बात है जब भगवान शिव अपनी पत्नी देवी पार्वती के साथ यहाँ पर 1100 वर्षों तक रहे थे। एक बार तालाब में कुछ चंचल से पल बिताते समय देवी पार्वती के कान की बलियों से एक मणि टूटकर सीधा शेषनाग के पास जा गिरी – जिनके बारे में यह मान्यता है कि, हमारी पृथ्वी उसके फन पर अपना संतुलन बनाए हुए है। पार्वती ने शिव से अपना मणि खोज कर लाने की जिद की और जब शिव जी वह मणि नहीं खोज पाये तो उन्होंने अपनी तीसरी आँख खोली और नैना देवी का जन्म हुआ।

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नैना देवी शिव की आँखें बनकर वह मणि खोजने के लिए निकल पड़ी। तब शेषनाग ने बहुत सारे मणि बाहर थूके और पार्वती से उनकी मणि चुनने के लिए कहा। तब देवी पार्वती ने अपना मणि निकालकर बाकी सारे मणियों को पत्थर बनने का श्राप दिया। यह कहा जाता है कि, शेषनाग के थूकने के साथ ही इन उष्ण जलस्रोतों का निर्माण हुआ था। लोगों का यह भी कहना है कि पहले इन जलस्रोतों से मणियाँ निकला करती थी लेकिन 1905 में यहाँ पर हुए भूकंप के बाद यह बंद हो गया।

आप अपने प्रकार से इस कहानी की जैसे चाहे व्याख्या कर सकते हैं। आप इसे इतिहास या मिथक के रूप में ले सकते हैं या इसे हमारे पूर्वजों का हम तक कोई गोपनीय कथा पहुंचाने का एक भाव समझ सकते हैं।

मणिकरण का शिव मंदिर

मणिकरण शिव मंदिर
मणिकरण शिव मंदिर

उष्ण जलस्रोतों से भाप लेने के पश्चात मैं उनके पीछे स्थित शिव मंदिर के दर्शन लेने चली गयी। यह एक साधारण सा शिव मंदिर है जिसके निर्माण को मुझे लगता है कि, ज्यादा साल नहीं हुए होंगे।

मणिकरण और उष्ण जलस्रोतों की हमारी यात्रा का विडियो देखें।

जैसे मैं अपनी गाड़ी की ओर बढ़ी, उष्ण जलस्रोतों का रहस्य, गरम कोठी की गर्मी और पुल के नीचे पार्वती नदी की गरज मेरे साथ बनी रही।

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वाराणसी के दशाश्वमेध घाट में गंगा जी की दर्शनीय आरती https://inditales.com/hindi/kashi-ganga-arti-dashashwamedh-ghat/ https://inditales.com/hindi/kashi-ganga-arti-dashashwamedh-ghat/#respond Wed, 27 Feb 2019 02:30:53 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1205

वाराणसी के दशाश्वमेध घाट में गंगाजी की आरती एक विलोभनीय दृश्य है। नदियों को पूजने की भारत की प्राचीन परंपरा को नवीनता प्रदान कर विभिन्न जन समुदायों को कैसे आकर्षित किया जाता है, गंगाजी की आरती इसका जीवंत उदाहरण है। एक ओर भक्त गण यहाँ आकर पवित्र गंगाजी की आराधना करते हैं, वहीं पर्यटक यहाँ […]

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वाराणसी के दशाश्वमेध घाट में गंगाजी की आरती एक विलोभनीय दृश्य है। नदियों को पूजने की भारत की प्राचीन परंपरा को नवीनता प्रदान कर विभिन्न जन समुदायों को कैसे आकर्षित किया जाता है, गंगाजी की आरती इसका जीवंत उदाहरण है। एक ओर भक्त गण यहाँ आकर पवित्र गंगाजी की आराधना करते हैं, वहीं पर्यटक यहाँ आकर इस अप्रतिम दृश्य का आनंद लेते हैं जब अग्नि जीवनदायिनी जल का अभिषेक करती है।

गंगा आरती दशाश्वमेध घाट वाराणसीवाराणसी, यह शब्द जैसे ही कानों में पड़ता है, गंगाजी के इन चंद्राकार घाटो की छवि मानसपटल पर छा जाती है। गंगा को वाराणसी नगरी से जोड़ती सीधी गहरी सीड़ियाँ गंगा आरती के प्रसिद्ध दृश्यों एवं मधुर सुरों का पावन स्थल है।

प्रत्येक संध्या, भक्तगण अपनी प्रिय गंगा मैय्या के समक्ष उपस्थित होकर उसकी पूजा अर्चना करते हैं तथा लाखों दीपों से उसकी आरती करते हैं। उनका पालन पोषण करने के लिए तथा अपने पवित्र जल से उनके तन-मन को शुद्ध करने के लिए वे गंगा मैय्या को धन्यवाद देते हैं। लाखों भक्तगण, तीर्थयात्री, पर्यटक एवं यात्रीगण वाराणसी के प्रसिद्ध दशाश्वमेध घाट में गंगा की आरती का विलक्षण दृश्य देखने यहाँ आते हैं।

वाराणसी में गंगा आरती

दशाश्वमेध घाट पर गंगा आरती करते पंडित
दशाश्वमेध घाट पर गंगा आरती करते पंडित

वर्षों से होती आ रही गंगा की आरती इतनी प्रसिद्ध हो चुकी है कि यह वाराणसी में पर्यटकों हेतु आवश्यक दर्शनीय कृत्य हो गयी है। यूँ तो गंगा की यह आरती विधिपूर्ण की जाने वाली एक गंभीर, संस्कारपूर्ण एवं पावन कृति है, किन्तु पर्यटकों एवं यात्रियों की नित नयी अपेक्षाओं ने इसमें चकाचौंध भी जोड़ दिया है।

आरती करते सभी युवा पंडितों के कुलीन वस्त्र एक सामान होने के कारण आरती को गंभीरता प्रदान करते हैं, साथ ही एक विलक्षण छटा बिखेरते हैं। सुनहरे किनारी वाली रेशमी धोती, भगवा कुर्ता एवं कन्धों पर रेशमी उपवस्त्र डाले ये पंडित ऊंचे मंचों पर खड़े होकर जन समुदायों से ऊपर उठकर दिखायी देते हैं। हाथों में आरती के दिये लेकर वे अपने हाथों को एक साथ घुमाते हैं। आरती करते समय वहां उपस्थित सब पर्यटकों व श्रद्धालुओं की आँखें उन पर ही केन्द्रित होती हैं, इसकी चेतना उन्हें भली भांति रहती है। अतः उनके मुखमंडल पर दर्शित भाव भी देखने योग्य होते हैं।

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सामान्यतः सूर्यास्त के पश्चात नाविकों के पास जीविका के साधनों में कमी आ जाती है। किन्तु यहाँ वाराणसी के घाट पर उन्होंने सूर्यास्त के पश्चात भी जीविका का अनोखा साधन ढूंढ लिया है। वे लोगों को अपनी नौका में बिठाकर नदी में घाट के ठीक सामने तक ले जाते हैं जहां से दर्शक इस आरती को सामने से देख सकते हैं। इसके लिए वे पर्यटकों व श्रद्धालुओं से मोटा शुल्क भी वसूलते हैं। यूँ तो गंगा आरती को आप घाट एवं नदी, दोनों ओर से देख सकते हैं, फिर भी मैं यह कहना चाहूंगी कि आरती की भव्यता देखने एवं उन क्षणों को छायाचित्र में कैद करने के लिए नौका में बैठकर नदी की ओर से देखना अधिक अच्छा विकल्प होगा। परन्तु, यदि आप गंगा मैय्या की पूजा करवाना चाहते हों तो आप घाट की सीड़ियों पर आरती करते पुजारियों के पास खड़े होकर पूजा कर सकते हैं।

गंगा आरती के विभिन्न स्थल

आप सब जानते हैं कि गंगा नदी हिमालय से निकल कर पूर्व की ओर अग्रसर हो अंततः बंगाल की खाड़ी में समुद्र में समा जाती है। अपने लम्बे प्रवास में कुछ ही स्थानों में गंगा की पूजा आर्चना की जाती है। सर्वप्रथम गंगा की आरती ऋषिकेश एवं हरिद्वार में की जाती है जब गंगा पहाड़ों से बाहर आकर मैदानी क्षेत्रों में प्रवेश करती है। अर्थात् देवों भूमि से निकलकर मानव भूमि में प्रवेश करती है।

गंगा आरती की तैय्यारी
गंगा आरती की तैय्यारी

तत्पश्चात गंगा वाराणसी में पूजी जाती है। गंगाजी का पूर्व दिशा की ओर का प्रवाह यहाँ कुछ दूरी के लिए उत्तर दिशाभिमुख होता जाता है। सांकेतिक रूप से ऐसा माना जाता है कि आगे बढ़ने से पूर्व गंगा पीछे मुड़कर अपनी मातृभूमि को अंतिम बार देख रही है, जैसे कोई नई नवेली दुल्हन विदा के समय मुद कर अपने मायके के तरफ देखती है। वाराणसी की जनता विनोदपूर्वक कहती है कि ‘वाराणसी में तो गंगा भी उलटी बहती है’।

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गंगा भारत में सबसे पावन नदी है, यह आप सब जानते ही हैं। इसके तटों में बसे नगरों में से कई और छोटी नगरियों में भी इसकी पूजा की जाती है। इसकी जानकारी अधिक लोगों को नहीं है। कदाचित छोटे प्रमाण में की जाती हो अथवा इतनी भव्य न हो या प्रत्येक दिवस ना की जाती हो। परन्तु यह भी उतना ही सत्य है कि पवित्र गंगा की आराधना सम्पूर्ण भारत के करोड़ों नागरिक अपने मन व ह्रदय में करते हैं।

दशाश्वमेध घाट

वाराणसी में गंगा के अनेकों घाटों के लगभग मध्य में स्थित है यह दशाश्वमेध घाट। उत्तरी छोर पर राज घाट है जहां किसी समय यह नगरी फल-फूल रही थी। दक्षिणी छोर पर अस्सी घाट है जो रूढ़ीमुक्त अर्थात् स्वतन्त्र विचार रखते लोगों में अत्यंत प्रसिद्ध है। दशाश्वमेध घाट एक ऐसा घाट है जहां अन्य घाटों की अपेक्षा सड़क मार्ग द्वारा अधिक आसानी से पहुंचा जा सकता है। अन्य घाटों तक पहुँचने के लिए संकरी गलियाँ पार करनी पड़ती हैं।

गंगा आरती के लिए एकत्रित हुआ जन समूह
गंगा आरती के लिए एकत्रित हुआ जन समूह

काशी विश्वनाथ मंदिर के समीप स्थित इस घाट के विषय में ऐसा कहा जाता है कि इस घाट की रचना भगवान् शिव का इस नगरी में स्वागत करने के लिए स्वयं ब्रम्हाजी ने की थी । आप सब जानते हैं कि काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी नगरी की पहचान है। वस्तुतः दशाश्वमेध का अर्थ है दस अश्वमेध यज्ञों के बराबर। अश्वमेध यज्ञ कर राजा-महाराजा दूर दूर तक अपनी सत्ता का लोहा मनवाते थे।

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विगत अभिलेखों से यह पता चलता है कि मालवा की रानी अहिल्या बाई होलकर ने १८वी. सदी में इस घाट का पुनर्निर्माण करवाया था।

दशाश्वमेध घाट में गंगा आरती

दशाश्वमेध घाट में गंगा आरती सर्वाधिक भव्य एवं विस्तृत होने के कारण सर्वाधिक प्रसिद्ध है। पिछले कुछ समय से गंगा की आरती अस्सी घाट जैसे अन्य घाटों में भी की जा रही है।

गंगा आरती दर्शन के लिए नौकाएं
गंगा आरती दर्शन के लिए नौकाएं

दशाश्वमेध घाट के दो विभिन्न भागों में मंचों के दो समूह थे। मुझे ये आरती देखने का अवसर कई बार मिला। प्रत्येक मंच के ऊपर पुष्पों से सजी छत्री डंडे द्वारा लगाई गयी थी। प्रत्येक डंडे पर बिजली का एक कंदील भी लगाया गया था। हर मंच के ऊपर एक और छोटा मंच था जिस पर केसरिया वस्त्र बिछाकर उस पर पूजा सामग्री रखी गयी थी। पुष्प, जल भरा तांबे का लोटा, धातु का भारी व तपा हुआ दीप-समूह पकड़ने के लिए गीला वस्त्र, शंख इत्यादि सजाये हुए थे। दीप-समूह में तेल डालकर, उन्हें प्रज्ज्वलित कर मंचों पर रखा गया था। मंत्रमुग्ध कर देने वाला यह सम्पूर्ण दृश्य हमें किसी दूसरे विश्व में ले जा रहा था।

इन सब के बीचों-बीच स्थित मंच पर एक छोटा मंदिर है जो देवी गंगा को समर्पित है। मंदिर के भीतर देवी गंगा की मानवरूपी प्रतिमा है जिसे सुन्दर पुष्पहारों द्वारा सजाया गया था।

वाराणसी की भव्य गंगा आरती आप तक पहुंचाता यह विडियो

वाराणसी की पावन नगरी में मेरी यात्रा के समय दशाश्वमेध घाट पर हुए भव्य गंगा आरती की कुछ छटा मैं अपने कैमरे में कैद करने में सफल हुई। यह विडियो आपको गंगा आरती के विलक्षण दृश्य की एक झलक दिखायेगी। HD प्रणाली में देखने पर यह और अधिक भव्य प्रतीत होती है।

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गंगा मैय्या की आरती

आरती का शुभारम्भ शंखनाद कर किया गया। शंखनाद द्वारा भक्तगणों को गंगा आरती के औपचारिक आरम्भ की सूचना दी जाती है। इसके पूर्व किये गए सर्व धार्मिक संस्कार आरती की पूर्व तैयारी में आते हैं। शंखनाद के पश्चात सभी युवा पंडित पीतल की घंटियाँ बजाकर पूर्ण वातावरण गुंजायमान कर रहे थे। तत्पश्चात अगरबत्तियों के धूप से उन्होंने गंगा की आराधना की जिससे चारों ओर की वायु सुगन्धित हो गयी। इन सभी धार्मिक क्रियाकलापों के साथ सतत होते मंत्रोच्चारण हमें सांसारिक परिवेश से दूर एक भिन्न विश्व में ले जा रहे थे।

गंगा एवं वाराणसी पर कुछ अप्रतिम पुस्तकें:

और यह भक्ति भाव एवं रोमांच अपनी चरम सीमा पर पहुंचा जब पीतल के शुण्डाकार विशाल दीप-समूह हाथों में उठाये सब पंडित मंच पर आ गये। दूर से भी इन प्रज्ज्वलित दीपों के वजन एवं उनसे आती ऊष्मा का आभास हमें हो रहा था। इन भारी दीपों को उठाकर पंडित इन्हें दक्षिणावर्त घुमाते हुए शनैः शनैः स्वयं भी दक्षिणावर्त घूम रहे थे। इस प्रकार वे चारों दिशाओं में दीप आराधना अर्पित कर रहे थे।

एक बड़े दीप के नीचे छोटे छोटे अनेक दीपों के स्तरों से बना होता है यह दीपसमूह। मेरे अनुमान से यह आरती कपूर द्वारा की जाती है। अंत में पंडितों ने माँ गंगा को पुष्प अर्पित किया, मोरपंखों से बने पंखों से माँ गंगा को पंखा झला तथा एक बार फिर शंखनाद कर उस दिन की आरती समाप्ति की घोषणा की।

वाराणसी की गंगा आरती का विहंगम दृश्य

यदि आप एक भक्त के रूप में वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर यह आरती देखेंगे तो यह शायद आपको अनावश्यक दिखावे से परिपूर्ण प्रतीत हो सकता है। यदि आप इसे एक पर्यटक के रूप में देखेंगे तो यह एक चकाचौंध कर देने वाला अद्भुत दृश्य है। मंत्रोच्चारण, घंटानाद, संध्या के अप्रतीम रंग, अग्नि एवं जल का अनोखा मिश्रण! दीपों के अनेक समूहों को सब पंडित जब तालमेल के साथ घुमा रहे थे तब उसे देख सब मंत्रमुग्ध हो गए थे। सांध्यप्रकाश के स्याह होते आकाश में आरती की लौ एवं उनसे निकालता धुंआ मनमोहक आकृतियाँ बना रहे थे। यह अद्भुत दृश्य गंगा के शांत जल पर सुन्दर प्रतिबिम्ब बना रहा था। गंगा भी ध्यान लगा कर भक्तों व पर्यटकों के संग आरती का आनंद उठा रही थी।

आरती के दर्शन करने आया जन-समूह चाहे जितना भी विशाल हो, वह सरलता से यहाँ समा जाता है। कुछ लोग इन मंचों के चारों ओर खड़े होते हैं तो कुछ उनके पीछे व कुछ उनके समक्ष सीड़ियों पर। कई लोग गंगा के जल पर तैरती नौकाओं में बैठकर भी आरती का आनंद लेते हैं।

गंगा आरती - काशी के दशाश्वमेध घाट पर

वाराणसी की गंगा आरती में बजता संगीत

गायक व वादक मंचों के पीछे बैठकर आरती गा रहे थे। वहां एकत्रित भक्तगण जिन्हें आरती ज्ञात थी, वे भी उनके साथ गा रहे थे। बाकी ताली बजाकर साथ दे रहे थे। यह मेरे लिए आरती का सर्वोत्तम क्षण था। इतनी स्वाभाविकता से लोग आरती में अपने अपने सामर्थ्य के अनुसार भाग ले रहे थे। आशा है भक्तों में यह भाव सदैव बना रहे।

जगह जगह साधुओं की भी उपस्थिति थी जो आरती में भाग ले रहे थे। इनमें से कुछ दानधर्म की आशा से भक्तों को खोज रहे थे।

वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर यह आरती औपचारिक अनुष्ठान एवं अनौपचारिक चकाचौंध का अद्भुत मिश्रण है।

वाराणसी की गंगा आरती के लिए कुछ यात्रा सुझाव

• वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर यह आरती प्रत्येक संध्या को आयोजित की जाती है।
• आरती में भाग लेने के लिए कोई शुल्क नहीं है। दान-धर्म भी आवश्यक नहीं है। आरती का आनंद लेने किसी भी दिन यहाँ आ सकते हैं।
• मौसम के अनुसार आरती के समय में परिवर्तन किया जाता है। यह सूर्यास्त के पश्चात, दिन ढलने पर किया जाता है। कार्तिक पूर्णिमा के आसपास अर्थात् नवम्बर-दिसंबर में यह आरती सर्वाधिक आकर्षक दिखायी पड़ती है। इस समय संध्या लगभग ७ बजे आरती आरम्भ होती है। स्थानीय लोगों से आरती के समय का अनुमान लेकर यहाँ आयें।
• मेरी सलाह है कि आप आरती से लगभग आधे घंटे पूर्व ही यहाँ आकर इच्छित स्थान ग्रहण कर लें जहां से उत्तम दृश्य प्राप्त हो एवं सर्वोत्तम छायाचित्रिकरण भी संभव हो।
• गंगा आरती में लगभग ४५ मिनट का समय लगता है।
• आरती के समय दशाश्वमेध घाट पर अत्यधिक भीड़ रहती है। आप अपने सामान की सुरक्षा का ध्यान रखें।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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