भारत के ग्रन्थ Archives - Inditales श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Wed, 11 Nov 2020 05:25:42 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.7.4 राम राज्य क्या है? जानिए गोस्वामी तुलसीदास जी से https://inditales.com/hindi/ram-rajya-kya-hota-hai/ https://inditales.com/hindi/ram-rajya-kya-hota-hai/#comments Wed, 11 Nov 2020 02:30:24 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2059

राम राज्य! यह शब्द हम सबने अनेक बार सुना है। किन्तु राम राज्य का अर्थ क्या है, यह जानने का प्रयत्न कदाचित हम में से किसी ने नहीं किया होगा। मैंने ६ मास व्यतीत कर गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित रामचरितमानस पढ़ा था। इस मूल रचना को पढ़ने के पश्चात मैंने अनेक तथ्यों के विषय में […]

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राम राज्य! यह शब्द हम सबने अनेक बार सुना है। किन्तु राम राज्य का अर्थ क्या है, यह जानने का प्रयत्न कदाचित हम में से किसी ने नहीं किया होगा।

राम राज्य मैंने ६ मास व्यतीत कर गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित रामचरितमानस पढ़ा था। इस मूल रचना को पढ़ने के पश्चात मैंने अनेक तथ्यों के विषय में जाना। लाख व्याख्याएँ, समीक्षाएं तथा वाग्विस्तार कार्य भी मुझे वो संतुष्टि नहीं दे पाते जो मुझे कुछ समय व्यतीत कर इस मूल रचना को पढ़ने में प्राप्त हुआ है।

मेरा ये संस्करण पढ़ें: रामचरितमानस की मूल रचना पढ़ने के पक्ष में ५ तर्क

रामचरितमानस पढ़ते समय राम राज्य की व्याख्या ने मुझे सर्वाधिक मंत्रमुग्ध किया था। जब भी नेतागण सुशासन का दृष्टांत देते हैं तो वे बहुधा राम राज्य का उल्लेख करते हैं। मेरे अनुमान से मैं निस्संकोच यह अनुमान लगा सकती हूँ कि हम में से अधिकतर पाठकों ने राम राज्य के विषय में क्वचित ही पढ़ा होगा।

राम राज्य क्या है?

महाकाव्य रामायण के अनुसार, श्री राम जब लंका में रावण का वध कर अयोध्या लौटते हैं तब वे राम राज्य की स्थापना करते हैं। अयोध्या के राजा श्री राम ऐसे राज्य की रचना करते हैं जहां सम्पूर्ण प्रजा आनंदित एवं सुखी है। आज के समय में हमें राम राज्य की व्याख्या अत्यंत काल्पनिक प्रतीत होती है। यह कल्पना सहस्त्रो वर्षों पश्चात भी जीवित है, इसका यही अर्थ हो सकता है कि किसी समय ऐसा राम राज्य अस्तित्व में था, भले ही वह चिरकाल तक ना रहा हो।

राम राज्य की व्याख्या रामचरितमानस के उत्तर कांड अर्थात ७ वें. कांड में की गई है। श्री राम ने रावण वध एवं लंका विजय के पश्चात अपने साथ आए लंका, किष्किन्धा एवं प्रयाग के मित्रों को उनके संबंधित स्थलों में वापिस भेज दिया था। इस घटना के पश्चात उत्तर कांड है। दोहों एवं चौपाईयों के प्रयोग द्वारा इस कांड में राम राज्य के विभिन्न आयामों का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया गया है। यह वर्णन इतना मनमोहक है कि उसने मुझे यह संस्करण लिखने के लिए तीव्रता से प्रेरित किया।

आशा करती हूँ कि २१ वीं. सदी के मेरे पाठक इस लेख को पढ़ेंगे तथा इससे प्रेरित होकर अपने स्वयं के राम राज्य की रचना करेंगे।

राम राज्य के अवयव

इस दोहे में तुलसीदासजी राम राज्य का सार प्रस्तुत कर रहे हैं:

बरनाश्रम निज निज धरम निरत बेद पथ लोग   
चलहिं सदा पावहिं सुखहि नहि भय सोक न रोग

जब प्रत्येक व्यक्ति अपने वर्ण एवं आश्रम के धर्म के अनुसार जीवन व्यतीत करता है अथवा जब प्रत्येक व्यक्ति जीवन के विभिन्न चरणों के अनुसार अपने निहित कार्य उसी प्रकार करता है जैसा कि वेदों में परिभाषित है, जब कहीं भी किसी भी प्रकार का भय ना हो, दुख ना हो तथा रोग ना हो – वही राम राज्य है।

कितनी सुंदरता से राम राज्य के सर्वोत्तम जीवन का सार यहाँ प्रस्तुत किया गया है। इसे पढ़कर इस कल्पना को सजीव करना कितना आसान प्रतीत होता है। जो कार्य आपके लिए निहित है उसे अपनी पूर्ण क्षमता के अनुसार प्रामाणिकता से करें। कल्पना कीजिए, जब हम सब वे सभी कार्य सम्पूर्ण श्रद्धा से करें जो हमारे लिए निहित है तो विश्व की ९९% समस्याएं चुटकी में हल हो जाएंगी।

इस दोहे के पश्चात तुलसीदासजी हमें राम राज्य के विषय में विस्तार से बताते हैं।

प्रजा एवं उनका आचरण

तुलसीदासजी कहते हैं कि राम राज्य में किसी को भी शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक स्तर पर किसी भी प्रकार की पीड़ा नहीं होती।

शास्त्रों में उल्लेख किये गए कर्तव्यों का पालन करते हुए प्रत्येक व्यक्ति दूसरों के साथ सामंजस्य एवं प्रेम का भाव रखता है। आज के परिवेश में हम इसे कानून का अनुसरण करते हुए नैतिकता से जीवनयापन करना कह सकते हैं।

धर्म के चारों अंग – सत्य, पवित्रता, करूणा एवं दान की पूर्ति हो तथा कोई भी व्यक्ति स्वप्न में भी पाप ना करे। सब राम की भक्ति करें तथा जन्म मृत्यु के चक्र से मोक्ष अधिकार प्राप्त करें। संभव है, यहाँ राम का संबंध अयोध्या के राजा से ना हो अपितु वे कबीर द्वारा कहे गए निर्गुण राम हों।

किसी की भी अकाल मृत्य ना हो। प्रत्येक मनुष्य की रोगमुक्त सुंदर देह हो। कोई भी दरिद्र, दुखी अथवा दयनीय ना हो। कोई भी शुभ-लक्षण-विहीन मूर्ख ना हो।

कोई भी तुच्छ ना हो। प्रत्येक मानव धार्मिक हो तथा अपना धर्म निभाने में व्यस्त हो। सभी स्त्री एवं पुरुष बुद्धिमान एवं प्रतिभाशाली हों। सभी सुशिक्षित एवं ज्ञानी हों तथा दूसरों के ज्ञान का सम्मान करें। प्रत्येक मनुष्य कृतज्ञ हो तथा किसी भी प्रकार के छल कपट में लिप्त ना हो।

प्रत्येक व्यक्ति दानी, दयालु एवं सहायक हो तथा ज्ञानी का सम्मान करे। पुरुष केवल एक स्त्री से विवाह करे तथा स्त्री अपने तन, मन एवं आत्मा से अपने पति की ओर पूर्णतः समर्पित हो।

परिवर्तित अर्थ

राम राज्य में दंड केवल योगीयों के हाथों में विराजमान रहता है जिस पर तपस्यारत योगी अपने हाथ टिकाते हैं। जाति भेद, यह शब्द केवल नर्तकों के शब्दकोश में पाया जाता है जिसका प्रयोग वे विभिन्न ताल, लय, स्वरों इत्यादि में भेद करने हेतु करते हैं। जीत, यह शब्द मन जीतने के लिए प्रयोग किया जाता है क्योंकि राम राज्य में जीतने के लिए कोई शत्रु शेष नहीं होता है।

अयोध्या का पर्यावरण

सभी वन पुष्प एवं फलों से लदे हैं। वन में सिंह एवं हाथी एक साथ रहते हैं। पशु-पक्षी आपसी शत्रुता से अनभिज्ञ, आपस में सद्भाव एवं स्नेह से रहते हैं।

पक्षी चहचहाते हैं तथा विभिन्न पशु निर्भय होकर प्रसन्नता से जीते हैं। चारों ओर कोमल, शीतल एवं सुगंधित वायु बहती है तथा पुष्प से मधु एकत्र करते भौंरों की गुंजन सुनाई देती है।

और पढ़ें – अयोध्या : राम एवं रामायण की नगरी

लताएं एवं वृक्ष मधु प्रदान करते हैं तथा गौएं मांगते ही दूध दे देती हैं। खेत खलिहान सदैव धान्य से भरे होते हैं। त्रेता युग में भी सतयुग प्रतीत होता है। यद्यपि सतयुग राम के त्रेता युग से पूर्व था। सतयुग में सब सर्वोत्तम था। पर्वत एवं पहाड़ अनमोल मणियों की खान हैं। सभी नदियां शीतल, स्वच्छ एवं मीठे जल से परिपूर्ण हैं जो आनंद का स्त्रोत हैं।

समुद्र अपनी सीमा में रहते हैं तथा मनुष्यों के लिए अपनी गोद से अनमोल रत्न तटों पर लाकर छोड़ देते हैं। सभी तालाब एवं पोखर कमल पुष्प से भरे हुए हैं जो दसों दिशाओं में हर्ष प्रसारित कर रहे हैं। चंद्रमा अपनी शीतल किरणें पृथ्वी पर बिखेरता है, सूर्य आवश्यकतानुसार चमकता है तथा मेघ जितना आवश्यक हो उतनी ही वर्षा करते हैं।

राजपरिवार का व्यवहार

श्री राम स्वयं दस लाख यज्ञ का आयोजन करते हैं तथा ब्राह्मणों को दान देते हैं। कुशल सेविकाओं के साथ होते हुए भी देवी सीता अपने गृह की देखभाल स्वयं करती है, जिसमें सासु-माँओं की सेवा भी सम्मिलित है। सभी भ्राता किसी भी आवश्यकता के लिए सदैव चौकस रहते हैं। श्री राम उन्हे राजकौशल के विभिन्न कूटनीतियों की शिक्षा देते हैं।

अयोध्या का वैभव

अयोध्या की प्रजा संतुष्ट एवं प्रसन्न है। सभी हवेलियों की भित्तियाँ अनमोल रत्नों से जड़ी हुई हैं। नगर की भित्तियों पर रंगबिरंगे कंगूरे बने हुए हैं। वैभवशाली अयोध्या सीधे इन्द्र की अमरावती से स्पर्धा करती प्रतीत होती है। भवनों के शीर्ष पर स्थित चमचमाते कलश दमकते सूर्य एवं चमकीले चंद्रमा से प्रतिस्पर्धा करते हैं। हवेलियों के झरोखे प्रज्जवलित दीपों से प्रकाशमान हो रहे हैं जिन पर अनमोल मणियाँ जड़ी हुई हैं। मूँगे की किनारियाँ, मणियों की भित्तियाँ तथा पन्ने से जड़ी सुनहरी भित्तियाँ हैं। गलियारे स्फटिक द्वारा निर्मित हैं।

प्रत्येक गृह की भित्तियों पर चित्रशाला हैं जिन पर राम का चरित्र दर्शाया गया है। वे इतने मनमोहक हैं कि सन्यासियों का भी मन मोह लेते हैं।

प्रत्येक व्यक्ति का उद्यान पुष्प से तथा सतत फलते-फूलते वृक्षों से भरा हुआ है मानो सदैव वसंत ऋतु हो। कोमल बयार के मध्य भँवरों की गुंजन चारों ओर गूँजती है। नन्हे बालक बलिकाएं भी पक्षियों के संग दौड़ते हुए क्रीडा करते हैं।

मोर, हंस, सारस, कबूतर इत्यादि भवनों के ऊपर बैठते हैं तथा अपनी ही परछाई देखते हुए नृत्य करते हैं।

नन्हे बालक-बालिका तोते एवं मैनाओं से बतियाते हैं तथा श्री राम के विषय में चर्चा करते हैं। नगर में आकर्षक प्रवेश द्वार, पथ, चौराहे तथा हाट बाजार हैं। बाजार बिना मूल्य की अनेक वस्तुओं से भरी हुई हैं। वस्त्र व्यापारी, सुनार तथा  बाजार में  व्यापारी धन के देवता कुबेर के समान बैठे हैं।

सरयू तथा उसके तट

उत्तर में अथाह सरयू नदी बहती है जिसका जल अत्यंत निर्मल है। सरयू के किनारे स्वच्छ तट हैं जिस पर अंश मात्र भी कीचड़ एवं गंदगी नहीं है। कुछ दूरी पर घोड़े तथा हाथी नदी का शीतल जल पीने आते हैं।

सरयू के किनारे अनेक मंदिर हैं तथा उनके चारों ओर बाग-बगीचे हैं। कुछ सन्यासी नदी के तट के समीप निवास करते हैं जिन्होंने नदी के किनारे तुलसी के अनेक पौधे उगाए हैं।

अयोध्या नगरी वनों, बगीचों, बावड़ियों तथा तालाबों से सुशोभित है तथा दूर से भी अत्यंत मनोहर प्रतीत होती है। कुंड के भीतर जल तक पहुँचने के लिए आकर्षक उत्कीर्णित सीढ़ियाँ हैं। कुंडों एवं तालाबों के जलसतह कमल पुष्प की चादर से ढंके हुए हैं। पक्षी अपनी मधुर चहचहाहट से हमें आमंत्रित करते प्रतीत होते हैं।

राम राज्य – निष्कर्ष

राम राज्य क्या है राम राज्य एक ऐसे क्षेत्र की सम्पूर्ण परिभाषा है जहां सर्व क्रियाकलाप एक दूसरे के सामंजस्य से परिपूर्ण होते हैं। जिस प्रकार राम राज्य को परिभाषित किया गया है उसका अनुभव हमें रोमांचित कर देता है। सर्वप्रथम मानवी आचरण सर्वोत्तम होना चाहिए, तत्पश्चात पर्यावरण तथा उसके पश्चात किसी राज्य अथवा नगर का वैभव।

इसके विषय में आपके विचार क्या हैं, इसे जानने के लिए उत्सुक हूँ। कृपया निम्न टिप्पणी खंड मे अपने विचार हमसे अवश्य साझा करें।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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पाप एवं पुण्य – एक गणितीय आंकलन स्कन्द पुराण से https://inditales.com/hindi/paap-punya-kartik-mahatmay-skand-puran/ https://inditales.com/hindi/paap-punya-kartik-mahatmay-skand-puran/#respond Wed, 30 Oct 2019 02:30:26 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1640

स्कन्द पुराण के अनुसार सुसंगति एवं दुसंगति के प्रभावों का लेखा जोखा इस लेख के साथ पढ़िए – स्कन्द पुराण वर्णित कार्तिक मास महात्मय प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन को सुखी बनाने के लिए अन्य मनुष्यों का संग ढूंढता है। सज्जनों की संगति जीवन सुखमय करती है, वहीं दुर्जनों की संगति से जीवन दुखदाई हो जाता […]

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स्कन्द पुराण के अनुसार सुसंगति एवं दुसंगति के प्रभावों का लेखा जोखा

इस लेख के साथ पढ़िए – स्कन्द पुराण वर्णित कार्तिक मास महात्मय

प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन को सुखी बनाने के लिए अन्य मनुष्यों का संग ढूंढता है। सज्जनों की संगति जीवन सुखमय करती है, वहीं दुर्जनों की संगति से जीवन दुखदाई हो जाता है। मनुष्य जैसी संगति में रहता है, उस पर वैसा ही प्रभाव पड़ता है। जैसे एक ही स्वाति बूंद केले के गर्भ में पड़कर कपूर बन जाती है, सीप में पड़कर मोती बन जाती है और अगर सांप के मुंह में पड़ जाए तो विष बन जाती है। पारस के छूने से लोहा सोना बन जाता है, पुष्प की संगति में रहने से कीड़ा भी देवताओं के मस्तक पर चढ़ जाता है।

एक ओर जीजाबाई की संगति मे शिवाजी ‘छत्रपति शिवाजी’ बने, डाकू रत्नाकर, महर्षि नारद की सुसंगति के प्रभाव से महागुनि महर्षी वाल्मीकि बनें तथा अमर काव्य ‘रामायण’ लिखा । डाकू अंगुलिमाल, महात्मा बुद्ध के संगति में आकर उनका शिष्य बन गया।

वहीं दूसरी ओर कुसंगति में पड़कर भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, कर्ण, दुर्योधन आदि पतन की गर्त में गिरे। ये सभी अपने आप में विद्वान और वीर थे । लेकिन कुसंगति का प्रभाव इन्हें विनाश की ओर ले गया। किसी कवि ने ठीक ही कहा है – जैसी संगति बैठिए तैसी ही फल दीन

सुसंगति – सुसंगति या सत्संगति का अर्थ है अच्छे मनुष्यों की संगति में रहना, उनके विचारों को अपने जीवन में ढालना तथा उनके सुकर्मों का अनुसरण करना। सज्जनों की सुसंगति मार्ग से भटके मनुष्य को सही राह दिखाती है। व्यक्ति की अच्छी संगति से उसके स्वयं का परिवार तो अच्छा होता ही है, साथ ही उसका समाज व राष्ट्र पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है।

कुसंगति – कुसंगति का अर्थ होता है बुरी संगत। यह कभी नहीं हो सकता कि परिस्थितियों का प्रभाव हम पर न पड़े। दुष्ट और दुराचारी व्यक्ति के साथ रहने से सज्जन व्यक्ति का चित्त भी दूषित हो जाता है। एक कहावत है – अच्छाई चले एक कोस, बुराई चले दस कोस । अच्छी बातें सीखने में समय लगता है। जो जैसे व्यक्तियों के साथ बैठेगा, वह वैसा ही बन जाएगा।

कहते हैं कि व्यक्ति योगियों के साथ योगी और भोगियों के साथ भोगी बन जाता है। जहां अच्छी संगति व्यक्ति को कुछ नया करते रहने की समय-समय पर प्रेरणा देती है, वहीं बुरी संगति से व्यक्ति गहरे अंधकूप में गिर जाता है।

स्कन्द पुराण कार्तिक महात्मय - पाप पुण्य का लेखा जोखा
स्कन्द पुराण कार्तिक महात्मय – पाप पुण्य का लेखा जोखा

उन्नति करने वाले व्यक्ति को अपने आसपास के समाज के साथ बड़े सोच-विचारकर संपर्क स्थापित करना चाहिए, क्योंकि मानव मन तथा जल का स्वभाव एक जैसा होता है। यह दोनों जब गिरते हैं, तो तेजी से गिरते हैं, परंतु इन्हें ऊपर उठाने में बहुत प्रयत्न करना पड़ता है। कुसंगति काम, क्रोध, मोह और मद पैदा करने वाली होती है। अतः प्रत्येक मानव को कुसंगति से दूर रहना चाहिए क्योंकि उन्नति की एकमात्र सीढ़ी सत्संगति है।

स्कन्द पुराण के अनुसार पाप-पुण्य का गणितीय आंकलन

संक्षिप्त स्कन्दपुराण के वैष्णवखण्ड-कार्तिकमास-माहात्म्य के अनुसार ब्रम्हाजी ने कहा है कि काम, क्रोध व लोभ के वशीभूत मनुष्य धर्मकृत्य नहीं कर पाते। जो इनसे मुक्त हैं वे ही धर्मकार्य करते हैं। इस पृथ्वी पर श्रद्धा एवं मेधा ये दो वस्तुएं ऐसी हैं जो काम, क्रोध आदि का नाश करती हैं।

ब्रम्हाजी आगे कहते हैं कि-

  • दूसरों को पढ़ाने से, यज्ञ कराने से तथा दूसरों के साथ एक पंक्ति में बैठकर भोजन करने से मनुष्य को दूसरों के किये पुण्य व पाप का चौथाई भाग प्राप्त होता है ।
  • एक आसन पर बैठने, एक सवारी पर यात्रा करने तथा श्वास से शरीर का स्पर्श होने से मनुष्य निश्चय ही दूसरे के पुण्य व पाप के छठे अंश के फल का भागी होता है।
  • दूसरे के स्पर्श से, भाषण से तथा उसकी प्रशंसा करने से भी मानव सदा उसके पुण्य व पाप के दसवें अंश को प्राप्त करता है।
  • दर्शन एवं श्रवण के अथवा मन के द्वारा उसका चिंतन करने से, वह दूसरे के पुण्य एवं पाप का शतांश प्राप्त करता है।
  • जो दूसरे की निंदा करता, चुगली खाता तथा उसे धिक्कार देता है, वह उसके किया हुए पातक को स्वयं लेकर बदले में उसे अपना पुण्य देता है।
  • जो मनुष्य किसी पुण्यकर्म करने वाले मनुष्य की सेवा करता है, वह यदि उसकी पत्नी, भृत्य तथा शिष्य नहीं है तथा उसे उसकी सेवा के अनुरूप कुछ धन नहीं दिया जा रहा है, तो वह भी सेवा के अनुसार उस पुण्यात्मा के पुण्यफल का भागी हो जाता है।
  • जो एक पंक्ति में बैठे हुए किसी मनुष्य को रसोई परोसते समय छोड़कर आगे बढ़ जाता है, उसके पुण्य का छटा अंश वह छूटा हुआ व्यक्ति पा लेता है।
  • स्नान एवं संध्या आदि करते समय जो दूसरे का स्पर्श अथवा दूसरे से भाषण करता है, वह अपने कर्मजनित पुण्य का छठा अंश उसे निश्चय ही दे डालता है।
  • जो धर्म के उद्देश्य से दूसरों के पास जाकर धन की याचना करता है उसके उस पुण्यकर्मजनित फल का भागी वह धन देने वाला भी होता है।
  • जो दूसरों का धन चुराकर उसके द्वारा पुण्य कर्म करता है, वहां कर्म करने वाला तो पापी होता है तथा जिसका धन चुराकर उस कर्म में लगाया गया है वही उसके पुण्यफलों को प्राप्त करता है।
  • जो दूसरों का ऋण चुकाए बिना मर जाता है, उसके पुण्य में से वह धनी अपने धन के अनुरूप हिस्सा पा लेता है।
  • जो बुद्धि(सलाह) देने वाला, अनुमोदन करने वाला, साधन सामग्री देनेवाला तथा बल लगाने वाला है, वह भी पुण्य व पाप में से छठे अंश को ग्रहण करता है।
  • प्रजा के पुण्य एवं पाप में से छठा अंश शासक लेता है।
  • इसी प्रकार शिष्य से गुरु, स्त्री से उसका पति, पुत्र से उसका पिता पुण्य-पाप का छठा अंश ग्रहण करता है।

अगर आप स्कन्द पुराण पढना चाहें तो यहाँ उपलब्ध है

सुसंगति-कुसंगति पर कुछ महान संतों के विचार

दोष और गुण सभी संसर्ग से उत्पन्न होते हैं। मनुष्य में जितना दुराचार, पापाचार, दुश्चरित्रता और दुव्यसन होते हैं, वे सभी कुसंगति के फलस्वरूप होते हैं। कुसंगति के कारण बड़े-बड़े घराने नष्ट-भ्रष्ट हो जाते हैं। बुद्धिमान्-से-बुद्धिमान् व्यक्ति पर भी कुसंगति का प्रभाव पड़ता है। श्रेष्ठ विद्यार्थियों नीच लोगों की संगति पाकर बरबाद हो जाते हैं।

कवि रहीम कहते हैं-

बसि कुसंग चाहत कुसल, यह रहीम जिय सोच।

महिमा घटी समुद्र की, रावन बस्यौ पड़ोस ॥

अर्थात् सज्जन और दुर्जन का संग हमेशा अनुचित है बल्कि यह विषमता को ही जन्म देता है। जैसे रावण के पड़ोस में रहने का कारण समुद्र की भी महिमा घट गयी। बुरा व्यक्ति तो बुराई छोड़ नहीं सकता, अच्छा व्यक्ति ज़रूर बुराई ग्रहण कर लेता है।

रहीम यह भी लिखते हैं-

कह रहीम कैसे निभै, बेर केर को संग।

वे डोलत रस आपने, उनके फाटत अंग ॥

अर्थात् बेरी और केले की संगति कैसे निभ सकती है ? बेरी तो अपनी मस्ती में झूमती है लेकिन केले के पौधे के अंग कट जाते हैं। बेरी में काँटे होते हैं और केले के पौधे में कोमलता। अत: दुर्जन व्यक्ति का साथ सज्जन के लिए हानिकारक ही होता है।

जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग ।

चंदन विषा व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग ॥

अर्थात् यदि आदमी उत्तम स्वभाव का हो तो कुसंगति उस पर प्रभाव नहीं डाल सकती। यद्यपि चंदन के पेड़ के चारों ओर साँप लिपटे रहते हैं तथापि उसमें विष व्याप्त नहीं होता।

हम अपने जीवन को सफल बनाना चाहते हैं तो हमें दुर्जनों की संगति छोड़कर सत्संगति करनी होगी। सत्संगति का अर्थ है-श्रेष्ठ पुरुषों की संगति। मनुष्य जब अपने से अधिक बुद्धिमानू, विद्वान् और गुणवान लोगों के संपर्क में आता है तो उसमें अच्छे गुणों का उदय होता है। उसके दुर्गुण नष्ट हो जाते हैं। सत्संगति से मनुष्य की बुराइयाँ दूर होती हैं और मन पावन हो जाता है। कबीरदास ने भी लिखा है-

कबीरा संगति साधु की, हरे और की व्याधि।

संगति बुरी असाधु की, आठों पहर उपाधि।

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कार्तिक मास की तीर्थ यात्रायें – स्कन्दपुराण कार्तिक मास माहात्म्य https://inditales.com/hindi/kartik-maas-mahatmay-skand-puran/ https://inditales.com/hindi/kartik-maas-mahatmay-skand-puran/#comments Mon, 19 Nov 2018 06:37:58 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1191

कार्तिक मास भगवान् विष्णु को सदा ही प्रिय है। कार्तिक सब मासों में उत्तम है। इस महीने में तैंतीसों देवता मनुष्य के सन्निकट हो जाते हैं तथा इस माह में किये हुए व्रत-स्नान, भोजन, व्रत, तिल, धेनु, सुवर्ण, रजत, भूमि, वस्त्र आदि के दानों को विधिपूर्वक ग्रहण करते हैं। कार्तिक में जो भी तप किया […]

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कार्तिक मास भगवान् विष्णु को सदा ही प्रिय है। कार्तिक सब मासों में उत्तम है। इस महीने में तैंतीसों देवता मनुष्य के सन्निकट हो जाते हैं तथा इस माह में किये हुए व्रत-स्नान, भोजन, व्रत, तिल, धेनु, सुवर्ण, रजत, भूमि, वस्त्र आदि के दानों को विधिपूर्वक ग्रहण करते हैं।

कार्तिक मास महात्मय - स्कन्द पुराणकार्तिक में जो भी तप किया जाता है, जो भी दान दिया जाता है, भगवान् विष्णु ने उसे अक्षय फल देने वाला बताया है। विष्णु-भक्त कार्तिक में गुरु की सेवा कर मोक्ष प्राप्त करते हैं। इस समय अन्नदान का महत्व अधिक है। यद्यपि कन्यादान श्रेष्ठ बताया जाता है तथापि उससे श्रेष्ठ क्रमशः विद्यादान,गोदान तथा सर्वाधिक श्रेष्ठ अन्नदान है।

कार्तिक मास स्नान एवं स्नान के लिए श्रेष्ठ तीर्थ

हिन्दू पञ्चांग के अनुसार, कार्तिक का व्रत आश्विन शुक्ल पक्ष की दशमी से कार्तिक शुक्ल पक्ष की दशमी तक अथवा आश्विन की पूर्णिमा से कार्तिक की पूर्णिमा तक की जाती है।

सूर्य की प्रीति के लिये जब तक सूर्यनारायण तुला राशि पर स्थित है तब तक व्रत किया जाता है।

भगवान् शंकर की प्रसन्नता के लिए आश्विन की पूर्णिमा से कार्तिक की पूर्णिमा तक व्रत किया जाता है।

भगवती दुर्गा की प्रसन्नता के लिए आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी की महारात्री तक व्रत किया जाता है।

गणेशजी की प्रसन्नता के लिए आश्विन कृष्ण चतुर्थी से कार्तिक कृष्ण चतुर्थी तक व्रत किया जाता है।

भगवान् जनार्दन की प्रसन्नता के लिए आश्विन शुक्ल पक्ष की एकादशी से कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी तक नियमपूर्वक प्रातःस्नान का विधान है।

सूर्य रुपी नारायण को पूजनोपचार समर्पित किया जाता है।

पीपल भगवान् विष्णु तथा वट भगवान् शंकर का स्वरूप है। अतः इनकी यथोचित पूजा एवं सांगोपन करना चाहिये। शालग्राम शिला के चक्र में सदा भगवान् विष्णु का निवास है इसलिए सदा उसकी पूजा की जाती है। पलाश ब्रम्हाजी के अंश से उत्पन्न हुआ है। अतः स्कन्दपुराण में कार्तिक में पलाश के पत्तल में भोजन कर विष्णु लोक को प्राप्त करने का भी उल्लेख है।

जलाशय, कुँए, बावडी, पोखर, झरना व नदी में स्नान क्रमशः अधिक पुण्यवान होता जाता है। जहां दो अथवा तीन नदियों का संगम हो तो पुण्य की कोई सीमा नहीं।

सिन्धु, कृष्णा, वेणी(वेन्ना), यमुना, सरस्वती, गोदावरी, विपासा(व्यास), नर्मदा, तमसा(गंगा की सहनदी), माही, कावेरी, सरयू, क्षिप्रा, चर्मण्वती(चम्बल), बितस्ता(झेलम), वेदिका, शोणभद्र(सोन नद), वेत्रवती(बेतवा), अपराजिता, गण्डकी, गोमती, पूर्णा(गोदावरी की सहनदी), ब्रम्हपुत्र, मानसरोवर, वाग्मती(नेपाल), शतद्रु(सतलज) इत्यादि पवित्र नदियाँ हैं जिनमें स्नान अत्यंत पुण्यदायी माना गया है|

स्नान हेतु कोल्हापुर, उससे श्रेष्ठ क्रमशः विष्णुकांची, शिवकांची, वराह्क्षेत्र(उ.प्र.), चक्रकक्षेत्र(उड़ीशा), मुक्तिकक्षेत्र(कर्नाटक) हैं। इनसे श्रेष्ठ हैं क्रमशः अवन्तिपुरी(उज्जैन), बद्रिकाश्रम, अयोध्या, गंगाद्वार, कनखल(हरिद्वार) एवं मथुरा जहां भगवान् राधाकृष्ण स्नान करते थे। इनसे श्रेष्ठ द्वारका, तत्पश्चात भागीरथी, प्रयाग एवं काशी हैं।

कुछ रात्री शेष रहे तभी स्नान किया जाय तो वह उत्तम तथा सूर्योदयकाल का स्नान मध्यम श्रेणी का है। विलम्ब से किया गया स्नान कार्तिक स्नान में नहीं आता।

स्नान के विविध प्रकार

स्नान के चार प्रकार बतलाये गए हैं- वायव्य, वारुण, ब्राम्ह तथा दिव्य। गोधूलि में किया हुआ स्नान वाव्य कहलाता है। समुद्र आदि के जल में जो स्नान किया जाता है उसे वारुण कहते हैं। वेद-मन्त्रों के उच्चारपूर्वक किया गया स्नान ब्राम्ह तथा मेघों अथवा सूर्या की किरणों द्वारा जो जल शरीर पर गिरता है उसे दिव्य स्नान कहा जाता है। इन सब में वारुण स्नान सबसे उत्तम है।

कार्तिक मास में दीपदान एवं आकाशदीप की महिमा

कार्तिकमास में स्नान व दान आदि कर दीपदान करने का विधान है। पुराण के अनुसार यह समस्त उपद्रवों का नाश कर भगवान् विष्णु की प्रसन्नता बढ़ाता है। दीपदान के साथ आकाशदीप के दान का भी उल्लेख किया गया है। स्कन्दपुराण के अनुसार आकाशदीपदान करने वाला सुख-संपत्ति एवं मोक्ष प्राप्त करता है। अतः कार्तिक में स्नान-दान कर भगवान् विष्णु के मंदिर के कंगूरे पर एक मास तक दीपदान अवश्य करना चाहिए। एकादशी से, तुलाराशि के सूर्य से अथवा पूर्णिमा से लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णु का ध्यान कर आकाशदीप दान आरम्भ किया जाता है।

कार्तिक मास में दीप दान
कार्तिक मास में दीप दान

इस पुराण के अनुसार आकाश में दीपदान करते हैं उनके पूर्वज उत्तम गति को प्राप्त होते हैं। जो देवालय में, नदी के किनारे, सड़क पर तथा नींद लेने के स्थान पर दीप प्रज्वलित करता है वह लक्ष्मी को प्रसन्न करता है। जो कीट एवं काँटों से भरी हुई दुर्गम एवं ऊंची-नीची भूमिपर दीपदान करता है उसे किसी प्रकार का कष्ट नहीं भोगना पड़ता। अनुमानतः इस प्रकार दीप एवं आकाशदीप दान द्वारा चारों ओर प्रकाश फैलाकर दूसरों के जीवन को प्रकाशमान करना चाहिए। इससे हमारे जीवन में भी प्रसन्नता एवं संतुष्टी का प्रादुर्भाव होता है।

कार्तिक मास में तुलसीवृक्ष के आरोपण व पूजन की महिमा

स्कन्दपुराण के अनुसार तुलसी पाप का नाश एवं पुण्य की वृद्धी करने वाली है। अतः घर घर में तुलसी का पौधा लगाना चाहिए। जिस घर में तुलसी का बगीचा विद्यमान है वह तीर्थस्थल बन जाता है। कहा जाता है कि देवताओं एवं असुरों द्वारा समुद्र मंथन करने पर लक्ष्मी एवं अन्य के साथ अमृत भी प्राप्त हुआ था। अमृतकलश हाथ में लिए विष्णु के नेत्रों से हर्ष के अश्रु निकल पड़े तथा अमृत पर गिरे। तत्काल उस से तुलसी उत्पन्न हुई थी। ब्रम्हा आदि देवताओं ने लक्ष्मी एवं तुलसी को श्रीहरी को समर्पित किया। तब से दोनों भगवान् विष्णु को अत्यंत प्रियकर हैं। अतः इस समय लक्ष्मी एवं तुलसी दोनों को पूजने का विधान है।

त्रयोदशी से दीपावली तक के उत्सव

स्कन्दपुराण के अनुसार, हिन्दी पञ्चांग के कार्तिकी कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी के प्रदोषकाल में घर के द्वार पर दीप जलाना शुभकारी होता है। कदाचित इसीलिए दीपावली के उत्सव में हम त्रयोदिशी के दिवस से ही द्वार पर दीये जलाना आरम्भ करते हैं। दीपावली से पूर्व चतुर्दशी को तेलमात्र में लक्ष्मी तथा जलमात्र में गंगा निवास करती है। अतः इस दिन प्रातःकाल तेल व उबटन लगाकर जल से स्नान बताया गया है। इसे अभ्यंगस्नान कहते हैं। इस दिन से लेकर तीन दिनों तक दीपोत्सव करना चाहिए।

कार्तिक महात्मय स्कन्द पुराणपुराण के अनुसार वामन रूप में विष्णु ने राजा बलि द्वारा दी गयी भूमि को तीन दिनों में तीन पगों द्वारा नाप लिया था। भूमि दान में देने के उपरांत बलि ने विष्णु से वर माँगा कि आज से तीन दिवसों तक पृथ्वी पर उसका राज रहे। इन तीन दिनों तक जो पृथ्वी पर दीपदान करे उसके गृह में लक्ष्मी निवास करे। भगवान् ने बलि की इच्छा पूर्ण की। इसलिए इन तीन दिनों तक महोत्सव करना चाहिए।

तदनंतर अमावस्या को लक्ष्मीदेवी का पूजन कर दीपदान किया जाता है। अपनी शक्ति के अनुसार देवमन्दिर में दीपों का वृक्ष बनाना चाहिए। चौराहे पर, श्मशान भूमि में, नदी के किनारे, पर्वत पर, घरों में, वृक्षों की जड़ों के समीप, गोशालाओं में, चबूतरों पर तथा प्रत्येक गृह में दीप जलाकर रखना चाहिए। सर्वप्रथम ब्राम्हणों एवं भूखे मनुष्यों को भोजन कराकर पीछे स्वयं नूतन वस्त्र एवं आभूषण से विभूषित होकर भोजन करना चाहिये। जीवहिंसा, मदिरापान, अगम्यागमन, चोरी तथा विश्वासघात ये पांच नरक के द्वार कहे गये हैं एवं इनका सदैव त्याग करना चाहिए। तदनंतर आधी रात के समय नगर की शोभा देखने के लिए धीरे धीरे पैदल चलाना चाहिए तथा आनंदोत्सव देखकर घर लौटना चाहिए।

भाईदूज का उत्सव एवं बहन के घर भोजन का महत्त्व

दीपावली के अगले दिन अर्थात् बलिप्रतिपदा के दिवस बलिराज गौओं को भोजन अर्पित कर अलंकार से विभूषित किया जाता है। उनकी आरती उतारी जाती है।

अगला दिवस यम द्वितीय कहलाता है जिसे भाईदूज के रूप में मनाया जाता है। पूर्वकाल में हिंदी पञ्चांग के कार्तिक शुक्ल द्वितीय को यमुनाजी ने भ्राता यम को अपने घर भोजन कराया था तथा उसका सत्कार किया था। तभी से भाईदूज की यह प्रथा आरम्भ हुई। इस दिन भाई अपनी बड़ी बहन के घर जाकर उसे प्रणाम कर उससे आशीर्वाद प्राप्त करता है। तत्पश्चात बहन के घर भोजन ग्रहण करता है। भोजन के पश्चात भाई बहन को वस्त्राभूषण देता है। इस प्रकार बहन के कुशलक्षेम की जानकारी उसके मायकेवालों तक पहुँचती थी। उन्हें यह संतुष्टि प्राप्त होती थी कि उनकी पुत्री अपने ससुराल में कुशल एवं संतुष्ट है।

आँवले के वृक्ष की उत्पत्ति एवं उसका माहात्म्य

स्कन्दपुराण के अनुसार वैकुण्ठ चतुर्दशी को आँवले के वृक्ष की पूजा की जाती है। ऐसा कहा जाता है कि सम्पूर्ण विश्व जब जलमग्न हो गया था व सर्व चराचर प्राणी नष्ट हो गए थे, तब देवाधिदेव ब्रम्हा अविनाशी परब्रम्ह का जप करने लगे। तत्पश्चात भगवत दर्शन के अनुरागवश उनके नेत्रों से अश्रु निकल पड़े। प्रेम से परिपूर्ण अश्रु की बूँद जब पृथ्वी पर गिरी तब वहां से आँवले का महान वृक्ष उत्पन्न हुआ।

आंवला के फल
आंवला

सब वृक्षों में सर्वप्रथम उत्पन्न होने के कारण इसे आदिरोह भी कहा जाता है। इसके पश्चात ही ब्रम्हा ने समस्त प्रजा एवं देवताओं की सृष्टि की। इसीलिए समस्त कामनाओं की सिद्धि हेतु आँवले के वृक्ष का पूजन एवं इसके फल के सेवन का विधान है।

दूसरा भाग – सुसंगति और कुसंगति के पाप-पुण्य का लेखा जोखा 

कार्तिक मास में मनाये जाने वाले मुख्य पर्व

धनतेरस

दिवाली

अन्नकूट

भाई दूज

तुलसी विवाह

देव दीपावली

त्रिपुरारी पूर्णिमा

पुष्कर मेला

आप कार्तिक मास में क्या क्या करते हैं, नीचे टिपण्णी में हमें बताइए! 

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