भारत के ग्राम Archives - Inditales श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Wed, 26 Oct 2022 06:03:45 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.7.5 ५०० वर्ष पुराना गियु ममी के रहस्य की खोज यात्रा https://inditales.com/hindi/giu-mummy-spiti-ghati-himachal/ https://inditales.com/hindi/giu-mummy-spiti-ghati-himachal/#respond Wed, 15 Feb 2023 02:30:37 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2971

गियु ममी अर्थात् गियु का परिरक्षित शव! इसके विषय में मैंने सर्वप्रथम तब पढ़ा था जब मैं अपनी हिमाचल भ्रमण की विस्तृत यात्रा सूची पढ़ रही थी। मुझमें जिज्ञासा अवश्य उत्पन्न हुई थी किन्तु दर्शनीय स्थलों की लम्बी सूची में मेरी यह जिज्ञासा कुछ काल के लिए लुप्त हो गयी। इससे पूर्व ममी से मेरा […]

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गियु ममी अर्थात् गियु का परिरक्षित शव! इसके विषय में मैंने सर्वप्रथम तब पढ़ा था जब मैं अपनी हिमाचल भ्रमण की विस्तृत यात्रा सूची पढ़ रही थी। मुझमें जिज्ञासा अवश्य उत्पन्न हुई थी किन्तु दर्शनीय स्थलों की लम्बी सूची में मेरी यह जिज्ञासा कुछ काल के लिए लुप्त हो गयी। इससे पूर्व ममी से मेरा साक्षात्कार हैदराबाद के आन्ध्र प्रदेश राज्य संग्रहालय में हुआ था जहां मिस्र की एक नवयुवती के परिरक्षित शव के साथ हैदराबाद के निजाम का उपाख्यान था कि कैसे निजाम उस ममी को यहाँ ले कर आया था। मुझे तो वह ममी लकड़ी की एक गुड़िया प्रतीत हो रही थी जिसे उत्तम रीति से सुगंधित लेप लगाकर संरक्षित किया हुआ था।

गियु ममीइसके अतिरिक्त कुछ प्राचीन छवियाँ स्मृति में थीं जिनमें मिस्र की विशेषता के रूप में उनके परिरक्षित शव दर्शाए गए थे। उन चित्रों में शव को श्वेत वस्त्र की पट्टियों से लपेटा गया था। अधिकांशतः उन्हें खड़ी अथवा शयनावस्था में प्रदर्शित किया गया था।

वो तो शिमला में मेरी दो हिमाचली विशेषज्ञों से भेंट हुई जिन्होंने मुझे ममी की आसनस्थ मुद्रा के विषय में जानकारी दी। मुझे गियु ममी के विषय में बताया। गियु ममी के विषय में एक महत्वपूर्ण व विशेष जानकारी दी कि उस शव के ऊपर किसी भी प्रकार का कृत्रिम परिरक्षक द्रव नहीं लगाया गया है। इसका अर्थ है कि उस ममी के परिरक्षण के लिए किसी भी प्रकार के रसायन का प्रयोग नहीं किया गया है।

गियु गाँव की यात्रा

नाको एवं ताबो के मध्य, स्पीति के सेतु को पार करते ही हमने एक विमार्ग लिया तथा उस पर लगभग ७ से ८ किलोमीटर तक यात्रा करने के पश्चात एक छोटे से गियु गाँव पहुंचे। आसपास का सम्पूर्ण भूभाग छोटे छोटे पत्थरों से भरा हुआ था। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो किसी दलन यंत्र की सहायता से चट्टानों के टुकड़े कर टेनिस की गेंद के आकार के छोटे छोटे गोल टुकड़ों को चारों ओर बिखेर दिया गया हो।

गियु ममी के लिए निर्माणाधीन मंदिर
गियु ममी के लिए निर्माणाधीन मंदिर

गाँव पर प्रथम दृष्टि पड़ते ही एक छोटी पहाड़ी पर हमें एक निर्माणाधीन मठ दृष्टिगोचर हुआ। मेरी अभिलाषा थी कि मैं इस मनमोहक शांत से गाँव के भीतर भ्रमण करूँ, किन्तु इंद्र देव की कृपा कुछ अधिक थी। अतः हमें मठ तक वाहन द्वारा ही पहुँचना पड़ा। वाहन से उतर कर हम उस धार्मिक स्थल की ओर बढे। मार्ग में ही मुझे एक छोर पर स्थित एक लघु कक्ष की ओर जाने का संकेत किया गया तथा भय विहीन होकर कक्ष का द्वार खोलने के लिए कहा गया। वहीं पर वह ममी रखी हुई थी, या यह कहूँ, जीवंत थी।

गियु ममी

उस कक्ष के भीतर एक लघु आकार की देह आसीन मुद्रा में स्थित थी। उसे देख ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो उसकी देह सिकुड़कर लघु आकार की हो गई हो, जैसे उसकी देह के सभी तरल पदार्थ सूख गए हों। उसकी देह का रंग गहरे भूरा था जो कदाचित जीवन के अंत से अब तक के दीर्घ काल का परिणाम था। एक हाथ ध्यान मुद्रा में घुटने पर रखा हुआ था किन्तु दूसरा हाथ मुझे भ्रमित कर रहा था। वह हाथ ठुड्डी के नीचे था या वक्र मुद्रा में रखा था अथवा कुछ अन्य भाग देह से सटाकर रखा था, मैं निश्चित नहीं कर पायी।

कांच के बक्से में गियु ममी
कांच के बक्से में गियु ममी

ऐसा कहा जाता है कि उसके केश एवं नख अब भी बढ़ते हैं। उसके दांत अब भी अक्षत थे।

गियु मठ
गियु मठ

ममी की देह पर श्वेत एवं पीत रंग के पारंपरिक भिक्षुक वस्त्र थे। उसे काँच के लघु कक्ष में रखा हुआ था। कक्ष के बाहर दीप एवं पूजा-अर्चना की अन्य वस्तुएं रखी थीं। वह ममी अब भी अपना एकाकी जीवन जी रही थी किन्तु उसके दर्शन करने अनेक पर्यटक स्पीति घाटी के इस भाग में आते हैं।

गियु ममी की खोज

कुछ वर्ष पूर्व, मार्ग का सुधार कार्य करते समय भारत तिब्बत सीमा पुलिस के एक अधिकारी को यह ममी प्राप्त हुई थी। यह ममी गियु गाँव में प्राप्त नहीं हुई थी। वहां से उसे गियु गाँव लाया गया था। कदाचित यह गाँव खोज स्थल से निकटतम रहा होगा। ममी के खोजस्थल की सटीक अवस्थिति की जानकारी किसी को नहीं है।

गियु ममी
गियु ममी

विएना स्थित रेडियो कार्बन डेटिंग के विशेषज्ञों के एक समूह ने इस ममी की आयु ५५० वर्ष के आसपास बताया है। ऐसी मान्यता है कि यह शव एक बौद्ध भिक्षुक का है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि मृत्यु के समय उसकी आयु चालीस वर्ष के आसपास थी। उन्हें भिक्षुक के शरीर पर किसी भी रसायन के अंश मात्र भी प्राप्त नहीं हुए। उनका निष्कर्ष था कि इस शव का संरक्षण किसी भी रसायन के बिना, पूर्णतः प्राकृतिक रूप से हुआ है। ऐसा माना जाता है कि बौद्ध भिक्षुक गहन ध्यान मुद्रा में बैठे हुए हैं।

स्पीती घाटी में गियु गाँव
स्पीती घाटी में गियु गाँव

इस भिक्षुक के शव के संरक्षण के विषय में सर्व सामान्य व्याख्या जो मैंने सुनी, वह यह है कि यह भिक्षुक कदाचित हिमस्खलन के भीतर दब गया होगा। भारत तिब्बत सीमा पुलिस द्वारा इसकी खोज होने के पूर्व तक, वह एक दीर्घ काल तक बर्फ की अनेक परतों के नीचे दबा रहा। अत्यंत शीत वातावरण के कारण शव का संरक्षण स्वयं ही हो गया। मौखिक परम्पराएं कहती हैं कि इस भिक्षुक का नाम संघा तेनजिन था तथा वह बौद्ध धर्म के गेलुग्पा पंथ का अनुयायी था।

ममी का संरक्षण

इस ममी के दर्शनोपरांत मेरे भीतर एक जिज्ञासा उमड़ रही थी जिसके कारण मैं शरीर के स्वसंरक्षण की जानकारी देते इस संकेतस्थल पर पहुँची। मैंने जाना कि बौद्ध धर्म के कुछ पंथों में बौद्ध भिक्षुओं के शरीर संरक्षण की यह नियोजित परंपरा थी। इस परंपरा के अनुसार बौद्ध भिक्षुक स्वेच्छा से भोजन का त्याग करते थे तथा अपने शरीर को समाधिस्थ कर ममी रूप की ओर प्रस्थान कराते थे। कदाचित उन्हें देह संरक्षण के विज्ञान का भलीभांति ज्ञान था।

सीमित आहार एवं ध्यान के संतुलन से वे देह संरक्षण करते थे। स्वाभाविक रूप से, संरक्षण की सफलता भिक्षुक की आध्यात्मिक योग्यता पर भी निर्भर करती होगी। इससे मुझे जैनियों की संथारा प्रथा का स्मरण हो आया जहां वे स्वेच्छा से भोजन का त्याग कर एवं ध्यान मग्न होकर समाधि ग्रहण कर लेते थे। गियु ममी ने विज्ञान एवं अनुसंधान की एक नवीन शाखा को जन्म दिया है जहां शरीर का संरक्षण बिना किसी रसायन के प्राकृतिक रूप से कैसे किया गया है, इस पर शोध किया जाए।

पर्यटन मानचित्र

गियु ममी ने गियु गाँव को हिमाचल प्रदेश पर्यटन के मानचित्र पर ला कर रख दिया है। यह विशेष रूप से स्पीति घाटी पर्यटक का अभिन्न अंग बनता जा रहा है। इस ममी की जानकारी ना होती तो कदाचित गिने-चुने पर्यटक ही विमार्ग लेकर गियु गाँव पहुँचने का कष्ट उठाते। अब यह गाँव एक ठेठ हिमाचली गाँव है जहां कुछ आवास एवं एक मठ है।

गियु का एक मनमोहक द्वार
गियु का एक मनमोहक द्वार

गाँव में भ्रमण करते समय मेरा ध्यान भूमिगत जल नलिका प्रणाली ने खींचा, जो मेरी दृष्टि से अद्भुत है। गाँव में एक मंदिर की संरचना की जा रही है जो कदाचित इस ममी के लिए है। कुछ वर्षों के पश्चात इस मंदिर से भी अनेक अनुष्ठान एवं किवदंतियां जुड़ जायेंगी।

आप सब पर्यटकों से मेरा आग्रह है कि इस ममी के अवलोकन से पूर्व, शरीर संरक्षण के विज्ञान की कुछ जानकारी अवश्य ले कर आयें। सम्पूर्ण विश्व में इस प्राचीन परम्परा एवं इसकी प्रणाली की तुलना करें। हिमाचल प्रदेश पर्यटन से भी मेरा आग्रह है कि वे भी इस विषय में कार्य करें तथा आवश्यक ज्ञान उपलब्ध कराएं।

इस बौद्ध भिक्षुक के जीवन एवं उसके ध्येय के विषय में विचार करूँ तो इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए बाध्य हो जाती हूँ कि मरणोपरांत ५०० वर्ष पश्चात भी, स्पीति घाटी के अपने छोटे से गाँव की वह अब भी सहायता कर रहा है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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संखेड़ा के रंगीन गृह सज्जा सामग्री बनाने वाला कला ग्राम https://inditales.com/hindi/sankheda-kala-gram-gujarat/ https://inditales.com/hindi/sankheda-kala-gram-gujarat/#respond Wed, 21 Dec 2022 02:30:35 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=766

संखेड़ा, वडोदरा से दक्षिण-पूर्वीय दिशा में लगभग 45 कि.मी. की दूरी पर बसा हुआ एक छोटा सा गाँव है। यह भारत का एक सामान्य सा गुजराती गाँव है, जहाँ पर रहनेवाले अधिकतर परिवार लकड़ी की कारीगरी का व्यवसाय करते हैं। ये लोग लकड़ी के बड़े ही सुंदर फर्नीचर बनाते हैं, जो सिर्फ यहीं पर बनाए […]

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संखेड़ा, वडोदरा से दक्षिण-पूर्वीय दिशा में लगभग 45 कि.मी. की दूरी पर बसा हुआ एक छोटा सा गाँव है। यह भारत का एक सामान्य सा गुजराती गाँव है, जहाँ पर रहनेवाले अधिकतर परिवार लकड़ी की कारीगरी का व्यवसाय करते हैं। ये लोग लकड़ी के बड़े ही सुंदर फर्नीचर बनाते हैं, जो सिर्फ यहीं पर बनाए जाते हैं। यहाँ पर उत्पादित इन वस्तुओं को संखेड़ा के फर्नीचर के नाम से जाना जाता है।

संखेडा गुजरात में बनी रंग बुरंगी चौकियां
संखेडा गुजरात में बनी रंग बुरंगी चौकियां

इनकी विशेष बात यह है कि इन वस्तुओं को लाख के प्रयोग से चमकदार परिष्करण दिया जाता है। हालांकि अब इस कार्य के लिए लाख के स्थान पर तामचीनी का उपयोग किया जाता है। यह न केवल प्रयोग करने में ही आसान है, बल्कि इससे यहाँ के कारीगरों को रंगों की व्यापक विविधता भी प्राप्त हुई है, जिससे कि वे अपनी कलाकृतों को और भी सुंदर बना सकते हैं।

संखेड़ा के फर्नीचर अथवा गृह सज्जा का सामान

वडोदरा से संखेड़ा जाते वक्त हम दभोई से होते हुए गुजरे थे। संखेड़ा की इन संकरी गलियों में घूमते हुए हमे चाँदी की वस्तुएं बेचनेवाली बहुत सारी दुकाने दिखी, जिनमें चाँदी के बने ठेठ आदिवासी गहने बेचे जा रहे थे। जब हमने इन लोगों से लकड़ी की कलाकृतियों के बारे में पूछा तो उन्होंने हमे एक और गली की ओर मार्गदर्शित किया, जहाँ पर फर्नीचर की बहुत सी दुकानें और कार्यशालाएं थीं।

संखेडा में बना झूला
संखेडा में बना झूला

जिस दिन हम वहाँ गए थे वह दशहरे का दिन था जिसके कारण वहाँ की अधिकतर दुकानें बंद थीं। लेकिन जो भी दुकानें खुली थीं उनमें भी हमे एक से बढ़कर एक काष्ठ की वस्तुएं देखने को मिली। इन में से एक दुकान पर हमे दो महिलाएं दिखीं जो उस दुकान की कर्ता-धर्ता थीं। उन्होंने हमे लकड़ी की विविध वस्तुएं दिखाई, जो यहाँ पर बनायी जाती हैं; जैसे कि छोटी-छोटी चौकियाँ, डांडिया में प्रयुक्त छड़ियाँ, मंदिर और पालने आदि। यहाँ पर झूले भी थे जो गुजराती घरों की साज-सज्जा से बहुत मेल खा रहे थे।

कार्यशाला

संखेडा की कार्यशाला
संखेडा की कार्यशाला

थोड़ा-बहुत निवेदन करने के पश्चात उन में से एक महिला ने मुझे उनकी कार्यशाला के दर्शन करवाए। वहाँ पर मैंने सागौन लकड़ी के छोटे-बड़े टुकड़े देखे जिन्हें बाद में यंत्रों के द्वारा विविध आकार दिये जाते थे। आकार देने के बाद इन कलाकृतियों पर प्राइमर पोता जाता था और फिर आखिर में उनपर मेलामाइन रंगों की परत चढ़ाई जाती थी। यह रंग सूखने के बाद उस पर हाथ से विविध चित्र बनाए जाते थे, जो अधिकतर फूलों से संबंधित होते थे या फिर किसी प्रकार के ज्यामितीय आकार होते थे।

बाजोड़
बाजोड़

पुराने समय में इन वस्तुओं पर परिष्करण के तौर पर लाख की परत चढ़ाई जाती थी, जिसके कारण ये वस्तुएं भूरे से रंग की नज़र आती थीं; लेकिन अब इसके स्थान पर पोलिश का इस्तेमाल किया जाता है जो हूबहू वैसे ही परिणाम देती है। हमे बताया गया कि पुरानी प्रक्रिया बहुत ही थकाऊ थी और उसमें बहुत समय भी लगता था जिसका अनुसरण अब कोई नहीं करता। बाद में जब हम यहाँ की कारीगरों की गली में घूम रहे थे, तो हमने देखा कि यहाँ के अधिकतर घरों के बरामदों में लकड़ी के अध-उत्कीर्णित टुकड़े रखे गए थे।

संखेड़ा की प्रसिद्ध काष्ठ की वस्तुएं

काष्ठ का बना एक मनमोहक मंदिर
काष्ठ का बना एक मनमोहक मंदिर

संखेड़ा में उत्पादित प्रसिद्ध लकड़ी की वस्तुएँ हैं, बाजोड़ या चौकी – जो पूजा के समय बैठने के लिए इस्तेमाल की जाती है, कंगन रखने के स्टैंड, डांडिया की छड़ियाँ, मंदिर, सोफा, झूला आदि। इस छोटे से गाँव में उत्पादित इन वस्तुओं का राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी संख्या में निर्यात भी किया जाता है। अगर आप कभी भी गुजराती घरों में गए हैं, तो आपने उनके घरों में संखेड़ा की कोई न कोइन लकड़ी की वस्तु जरूर देखी होगी।

यह भारत में स्थित अनेक छोटे-छोटे कला केन्द्रों में से एक है, जिनके अस्तित्व के बारे में बहुत से लोगों को जरा भी ज्ञान नहीं है।

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हर्वले गाँव – गोवा में पांडव गुफाएं, वल्लभाचार्य बैठक और जलप्रपात https://inditales.com/hindi/harvale-goa-pandav-gufa-waterfall/ https://inditales.com/hindi/harvale-goa-pandav-gufa-waterfall/#comments Wed, 09 Jun 2021 02:30:52 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2314

गोवा के उत्तर गोवा जिले में स्थित बिचोली गाँव के आगे हर्वले नामक एक गाँव है। इसे अर्वलेम भी कहा जाता है। यहाँ स्थित, ६० फीट ऊंचा, बारहमासी जल-प्रपात एवं अनेक किवदंतियों से जुड़ा, प्राचीन गुफाओं का एक समूह, इस गाँव के ना केवल गौरव हैं, अपितु मुख्य परिचायक भी हैं। गोवा के इस शांतिपूर्ण […]

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गोवा के उत्तर गोवा जिले में स्थित बिचोली गाँव के आगे हर्वले नामक एक गाँव है। इसे अर्वलेम भी कहा जाता है। यहाँ स्थित, ६० फीट ऊंचा, बारहमासी जल-प्रपात एवं अनेक किवदंतियों से जुड़ा, प्राचीन गुफाओं का एक समूह, इस गाँव के ना केवल गौरव हैं, अपितु मुख्य परिचायक भी हैं। गोवा के इस शांतिपूर्ण गाँव में विचरण करने से पूर्व मैं इस गाँव के विषय में केवल इतना ही जानती थी। जिस दिन मैं हर्वले गाँव के अवलोकन के लिए वहां पहुंची, मूसलाधार वर्षा हो रही थी।

हर्वले गाँव - गोवा में पांडव
हर्वले गाँव – गोवा में पांडव

हरियाली से ओतप्रोत, गोवा के ग्रामीण क्षेत्रों से होकर हम हर्वले गाँव की ओर जा रहे थे। चित्ताकर्षक दृश्यों से मन आनंदविभोर हो उठा था। उत्तर गोवा के कई छोटे-बड़े गाँवों से होते हुए, प्रकृति की सुन्दरता को आत्मसात करते हुए, घुमावदार रास्ते से हम हर्वले गाँव पहुंचे।

गोवा के हर्वले गाँव की खोज

प्राचीन रुद्रेश्वर मंदिर

हर्वले गाँव में प्रवेश करते ही सर्वप्रथम हमारा साक्षात्कार प्राचीन गुफाओं से हुआ। किन्तु मूसलाधार वर्षा अनवरत सक्रिय थी। अतः गुफाओं के अवलोकन को विलंबित कर हम आगे बढे तथा रुद्रेश्वर महादेव मंदिर पहुंचे। मंदिर की सूचना पट्टिका पर इस क्षेत्र का नाम ‘तीर्थ क्षेत्र’ अंकित था। इसका तात्पर्य है कि यह स्थान सनातन धर्मावलम्बियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। मंदिर के भीतर प्रवेश करते ही हमारी दृष्टी एक अप्रतिम शिवलिंग पर केन्द्रित हो गयी जिसके ऊपर चांदी का आवरण था, जैसे फोंडा के मंगेशी मंदिर के शिवलिंग पर है। गुरूजी से वार्तालाप करने के उद्देश्य से मैं वहीं उनके समीप बैठ गयी। गुरूजी ने मुझे बताया कि यह स्वयंभू शिवलिंग है, अर्थात् मानव निर्मित नहीं, अपितु स्वयं उद्भवित लिंग है।

प्राचीन रुद्रेश्वर महादेव मंदिर
प्राचीन रुद्रेश्वर महादेव मंदिर

यह मंदिर सहस्त्रों वर्ष प्राचीन माना जाता है। मंदिर अवश्य प्राचीन प्रतीत होता है। इसके समक्ष एक नवीन सभागृह निर्माणाधीन है। मंदिर के एक ओर मंदिर के गुरूजी का आवास है। उनका आवास गोवा की ठेठ वास्तु शैली में निर्मित एक विशाल एवं सुन्दर निवास गृह है।

रुद्रेश्वर महादेव शिवलिंग
रुद्रेश्वर महादेव शिवलिंग

मैंने भीतर प्रवेश किया तथा गुरूजी से मंदिर से सम्बंधित कथा कहने का आग्रह किया। उनसे मुझे ज्ञात हुआ कि यह मंदिर भगवान शिव के रूद्र रूप को समर्पित है। इस मंदिर की एक अन्य विशेषता है कि हिन्दू धर्म के अनुयायी अपने स्वर्गवासी परिजनों के श्राद्ध संस्कार के लिए इस मंदिर में आते हैं। स्वर्गवासी परिजनों के अस्थियों को समीप स्थित जल-प्रपात से निर्मित नदी के जल में प्रवाहित करते हैं। आगे उन्होंने मुझे गोवा की  इन विरासती धरोहरों, प्राचीन गुफाओं एवं जल-प्रपात से सम्बंधित अनेक कथाएं सुनाईं। तत्पश्चात, उन्होंने नदी के दूसरे छोर पर स्थित एक मंदिर की ओर संकेत किया जो जैन गुजराती समुदाय से सम्बन्ध रखता है। मुझे यह आभास हो गया था कि गोवा के ग्रामीण क्षेत्र पर्यटन के अंतर्गत अनेक स्थल हैं जिनके अवलोकन का सौभाग्य मुझे प्राप्त हो रहा है।

हर्वले जल प्रपात का विडियो

वर्षा ने कुछ क्षणों का विराम लिया हुआ था। अतः मैंने गोवा के इस बारहमासी जल-प्रपात की ओर जाने का निश्चय किया। कुछ सीढ़ियाँ चढ़कर मैं एक अवलोकन मंच पर पहुँची। यह मंच सर्वोत्तम अवलोकन बिंदु पर विशेष रूप से जल-प्रपात को देखने के लिए निर्मित प्रतीत होता है। यहाँ से जल-प्रपात का उत्तम दृश्य प्राप्त होता है। मंच पर पहुंचते ही जल-प्रपात से उठते तुषार की बूंदों ने हमारा स्वागत किया।

जल-प्रपात का जल ऊंचाई से अत्यंत वेग से गिर रहा था तथा परवर्तित होकर उछल रहे बूंदों से अठखेलियाँ खेल रहा था। उनके संगम से उत्पन्न तुषार के कारण जल-प्रपात के निचले भाग में धुंए जैसा वातावरण उत्पन्न हो गया था। जल-प्रपात के कोलाहल एवं चारों ओर उड़ते तुषार के कारण हमारा सम्पूर्ण अस्तित्व अन्यत्र वातावरण से असम्बद्ध हो चुका था। कुछ क्षण मंत्रमुग्ध सी मैं जल-प्रपात एवं उसके आसपास के वातावरण को निहारती रही। तत्पश्चात अपने कैमरे में उनकी छवि को स्थाई रूप से संजोने लगी। जल-प्रपात से उड़ती जल की बूँदें तथा तुषार भरे वातावरण के कारण छायाचित्रीकरण कठिन हो रहा था।

फिर भी, प्रयत्न पूर्वक मैंने आपके लिए यह लघु चलचित्र  संकलित किया है। आप जब भी गोवा भ्रमण के लिए आयें तथा गोवा के ग्रामीण क्षेत्रों में यदि आपकी रूचि हो तो यह विडियो आपके लिए ही है। इसे अवश्य देखें।

लोहे का पुल
लोहे का पुल

जल-प्रपात का जल एक जलाशय में गिरता है। वहां से निकलती एक जलधारा रुद्रेश्वर मंदिर की परिक्रमा करती है। तत्पश्चात वनों एवं गाँवों से होते हुए वह जलधारा मेरी प्रिय नदी माण्डवी से जा मिलती है। मंदिर के गुरूजी ने बताया था कि इस जलाशय की रचना पांडव भीम ने की थी। हर्वले की गुफाओं में वास करते समय उन्होंने एक अन्यत्र जल स्त्रोत से जल यहाँ की ओर पथान्तरित किया था।

महाप्रभु वल्लभाचार्य बैठक

लोहे के एक छोटे से सेतु को पार कर मैं नदिया के उस पार पहुँची। कुछ ऊपर चढ़कर मैं एक अन्य मंदिर में पहुँची। अधिकारिक रूप से यह स्थान ४३वें महाप्रभु वल्लभाचार्य की बैठक के रूप में जाना जाता है जो एक गुजराती संत थे। मुझे बताया गया कि गुजराती भाषा के ५०० वर्षों से भी अधिक प्राचीन ग्रंथों में इस स्थान का विस्तृत रूप से उल्लेख किया गया है। उनमें रुद्रेश्वर मंदिर, जल-प्रपात एवं गुफाओं का भी उल्लेख है। उस दिन मंदिर बंद होने के कारण, आरम्भ में, मुझे किसी अन्य दिवस उपस्थित होने का निर्देश दिया गया। किन्तु निवेदन करने पर पुजारी जी बाहर आये तथा उन्होंने दर्शन के लिए मंदिर के द्वार खोल दिए।

महाप्रभु वल्लभाचार्य के पदचिन्ह
महाप्रभु वल्लभाचार्य के पदचिन्ह

इस मंदिर में किसी मूर्ति की पूजा नहीं होती। अपितु लेटराइट शिला पर अंकित गुरु के पदचिन्हों की आराधना की जाती है। गुरु महाप्रभु वल्लभाचार्यजी किसी काल में यहाँ आये थे तथा प्रवचन दिया था। कौन सोच सकता है कि गोवा के किसी दूरस्थ गाँव में गुजरात का एक अंश जीवित है। यदि आप विरासती धरोहरों में रूचि रखते है तो गोवा के धरोहरों का अवलोकन अवश्य करें। गोवा में ऐसे धरोहरों की असीमित संपत्ति जो है।

हर्वले की गुफाएं – गोवा की अनोखी धरोहर

जब तक हम वापिस हर्वले की गुफाओं के समीप पहुंचे, वर्षा ने हम पर उपकार कर दिया था। भारत में देखे अनेक गुफाओं में से यह सर्वाधिक सामान्य एवं सादी उत्खनित गुफाएं हैं। लेटराइट की एक विशाल शिला को काटकर ६ कक्षों की रचना की गई है। उनपर किसी भी प्रकार का उत्कीर्णन अथवा नक्काशी नहीं है। इसका प्रमुख कारण शिला का प्रकार हो सकता है क्योंकि लेटराइट शिला पर किसी भी प्रकार का सूक्ष्म उत्कीर्णन कठिन है।

हर्वले में गोवा की पांडव गुफाएं
हर्वले में गोवा की पांडव गुफाएं

५ कक्षों में काले ग्रेनाईट शिला में निर्मित ५ शिवलिंग स्थापित हैं। किवदंतियों के अनुसार, अज्ञातवास के समय, पांडव भ्राता यहाँ आकर कुछ काल निवास किये थे। ५ कक्षों में वे पृथक रूप से शिव की आराधना करते थे। छठा कक्ष द्रौपदी का रसोईघर था। यह छठा कक्ष अत्यंत जिज्ञासा उत्पन्न करता है। किसी आधुनिक रसोईघर के सामान इस कक्ष में भी एक ओर रसोई बनाने के लिए एक चबूतरा है। इस चबूतरे पर सामान आकार के एवं सामान दूरी पर ८ गड्ढे हैं जो चूल्हों के सामान प्रतीत होते हैं।

ये गड्ढे चूल्हें है, यह केवल एक अनुमान है। हो सकता है कि ये गड्ढे ऊपर से टपकते जल के प्रहार से बने हों। किन्तु कक्ष के भीतर जाते ही, प्रथम दर्शन में ऐसा प्रतीत होता है मानो हम एक आधुनिक रसोईघर में प्रवेश कर रहे हैं।

और पढ़ें: पन्सोइमोल का प्रागैतिहासिक शैल-कलाकृतियाँ

गुफाएं हिन्दू हैं या बौद्ध?

ये गुफाएं आरम्भ से हिन्दू थीं अथवा बौद्ध, यह चर्चा का विषय है। कक्षों के भीतर स्थापित शिवलिंगों से तो ऐसा प्रतीत होता है कि इन गुफाओं का भूतकाल एवं वर्त्तमान काल हिन्दू धर्म से सम्बंधित है। किन्तु ऐसा भी कहा जाता है कि गुफाओं के निकट बुद्ध की आवक्ष प्रतिमा भी प्राप्त हुई थी। बुद्ध की ऐसी ही एक अन्य आवक्ष प्रतिमा दक्षिण गोवा के रिवोना गुफाओं से भी प्राप्त हुई थी। गोवा में बौद्ध धर्म के केवल यही ज्ञात चिन्ह उपस्थित हैं। किन्तु पड़ोसी राज्यों, कर्णाटक एवं महाराष्ट्र में बौद्ध धर्म के चिन्ह बहुतायत में दृष्टिगोचर होते हैं।

और पढ़ें: चोर्ला घाट – गोवा के हरियाली भरे ग्रामीण परिवेश की अप्रतिम झलक

मेरे अनुमान से भारत में उपस्थित अधिकतर गुफाओं का उत्खनन ३ई.पू. के पश्चात ही हुआ था। बोध गया की बराबर गुफाएं भारत के प्राचीनतम गुफा समूह हैं। हर्वले गुफाओं की कटाई भी उन्ही गुफाओं समान है। इन गुफाओं का प्रयोग कदाचित उन धुमक्कड़ गवैयों ने किया होगा जो उस काल में इस स्थान पर प्रचलित धर्म का पालन करते थे। प्राचीन काल में इनका प्रयोग उन तीर्थयात्रियों ने भी किया होगा जो अपने स्वर्गवासी परिजनों की स्मृति में धार्मिक अनुष्ठान कराने रुद्रेश्वर मंदिर आये होंगे। उस काल में कदाचित इनका प्रयोग इस क्षेत्र से जाते व्यापारियों ने भी किया होगा।

यदि आप प्रत्येक स्थान की संस्कृति एवं इतिहास में रूचि रखते हैं तथा गोवा भ्रमण करना चाहते हैं तो गोवा भ्रमण स्थलों की यात्रा सूची में हर्वले गुफाओं का नाम अवश्य सम्मिलित करें।

कुछ ही वर्ग किलोमीटर के छोटे से क्षेत्र में विचरण करते हुए मेरा साक्षात्कार अनेक ऐतिहासिक तत्वों से हुआ। अनेक कथाएं, भिन्न भिन्न धर्म तथा प्राकृतिक सौंदर्य से एक साथ सामना हुआ। मेरा महान भारत मुझे आश्चर्यचकित करने में सदेव अग्रसर रहता है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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गोवा का भुतहा होता कुर्डी गाँव जो साल में ११ महीने जलमग्न रहता है https://inditales.com/hindi/goa-haunted-curdi-gaon/ https://inditales.com/hindi/goa-haunted-curdi-gaon/#respond Wed, 22 Apr 2020 02:30:11 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1834

कुर्डी गाँव सन १९८३ तक एक जीता जागता गाँव था। तब से यह एक भूतिया गाँव बन के रह गया है। यह गाँव गोवा के सालावली बाँध के जल में वर्ष के लगभग ११ मास जलमग्न रहता है। मानसून से पहले, गोवा में जिसका पदार्पण जून मास में होता है, बाँध का जल स्तर नीचे […]

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कुर्डी गाँव सन १९८३ तक एक जीता जागता गाँव था। तब से यह एक भूतिया गाँव बन के रह गया है। यह गाँव गोवा के सालावली बाँध के जल में वर्ष के लगभग ११ मास जलमग्न रहता है। मानसून से पहले, गोवा में जिसका पदार्पण जून मास में होता है, बाँध का जल स्तर नीचे चला जाता है। उन्ही दिनों यह गाँव कुछ समय के लिए पुनः प्रकट होता है।

गोवा के कुर्डी गाँव का सोमेश्वर मंदिर
गोवा के कुर्डी गाँव का सोमेश्वर मंदिर

गाँव के एक समय अस्तित्व रखते घर, मंदिर, गुफाएं तथा पगडंडियाँ ३५ वर्ष से जलमग्न होने के बाद भी अपना अस्तित्व बनाए रखने का असफल प्रयास कर रही हैं। भय है कि किसी दिन उनका यह प्रयास पूर्णतः निष्फल हो जाएगा।

अतः, कुर्डी गाँव के दर्शन करना, गोवा के इतिहास के उस भाग के दर्शन करने के समान था, जो हम जानते हैं कि हमारी भावी पीढ़ी को कदाचित देखने नहीं मिलेगा। यदि इस सभ्यता के कुछ अंश बच भी जाएँ, तो उनकी अवस्था प्रत्येक बीतते वर्ष के साथ बिगड़ती जायेगी।

कुर्डी गाँव कब देखें?

गोवा के कुर्डी गाँव के दर्शन करने के लिए एक छोटी सी समयावधि प्राप्त होती है। मई मास का उत्तरार्ध इस गाँव के दर्शन करने के लिए सर्वोत्तम समय है। आप मानसून आगमन के पूर्वानुमान की जानकारी ले लें तथा उस के अनुसार जितना विलम्ब संभव हो, उतने विलम्ब से जाएँ। किन्तु ध्यान रहे, गोवा में पूर्व-मानसून के आगमन से भी पूर्व यहाँ की यात्रा नियोजित करें।

गाँव का कितना भाग एवं कितने ऐतिहासिक अंश आप यहाँ देख सकेंगे यह जल स्तर निर्भर करता है। जलस्तर जितना नीचे होगा, उतना ही अधिक अंश आप देख सकेंगे। इसलिए सोमेश्वर मंदिर जैसे ऊंचाई पर स्थित कुछ स्थल को छोड़कर प्रत्येक वर्ष आप यहाँ किंचित भिन्न दृश्य देखेंगे।

कुर्डी गाँव का इतिहास

कुर्डी गाँव के खण्डहर
कुर्डी गाँव के खण्डहर

सालावली बाँध की कल्पना गोवा के प्रथम मुख्य मंत्री द्वारा १९७० के दशक के अंत में की गयी थी। बाँध के जलग्रहण क्षेत्र को निर्मित करने के लिए केवल कुर्डी ही नहीं, गोवा के सांगे तालुका के लगभग १७ गाँवों को स्थानांतरित किया गया था। १९८३-८४ में सब गांव वासियों को समीप के वेलिप एवं वल्किनी गाँवों में स्थानांतरित किया गया था।

कुर्डी गाँव कुशावती नदी के तट पर बसा हुआ था। नदी तट के समीप एक टेकड़ी के ऊपर सोमेश्वर मंदिर स्थित है। एक समय अपने चारों ओर बसे कुर्डी गाँव का स्मरण कराता यह मंदिर आज भी उस टेकड़ी पर गर्व से खड़ा है।

कुर्डी से जुड़े अनोखे तथ्य

कुर्डी गाँव प्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका पद्म विभूषण मोगूबाई कुर्डीकर का निवास स्थान था। आपने स्वर सम्राज्ञी स्वर्गीय सुश्री किशोरी अमोणकर जी के विषय में अवश्य सुना होगा। किशोरी जी मोगूबाई कुर्डीकर की सुपुत्री थीं एवं स्वयं एक पारंगत शास्त्रीय गायिका थीं। हो सकता है, मोगूबाई ने अपना बालपन यहाँ बिताया होगा हलाँकि उन्होंने शास्त्रीय संगीत में पांडित्य एवं व्यवसाय मुंबई में ही प्राप्त किया।

उनका जलमग्न निवास कुर्डी का सर्वाधिक आकर्षण का स्थल है। तीव्र ग्रीष्म ऋतू में जैसे ही जलस्तर नीचे जाता है, पर्यटक यहाँ आकर इसे ढूँढने का प्रयास करते हैं। हमारे कुर्डी दर्शन का एक कारण यह भी था। इस गाँव के अन्य गणमान्य व्यक्ति हैं, गणेश वेलिप एवं श्रीराम कुर्डीकर।

कुर्डी गाँव के मंदिर

भारत का ग्रामीण जनजीवन मंदिरों के चारों ओर ही केन्द्रित रहता है। मंदिर केवल धार्मिक श्रद्धा का केंद्र ही नहीं था, अपितु सर्व सामाजिक कार्यकलापों का भी केंद्रबिंदु होते हैं।

श्री सोमेश्वर मंदिर

श्री सोमेश्वर प्रसन्न मंदिर - कुर्डी गोवा
श्री सोमेश्वर प्रसन्न मंदिर – कुर्डी गोवा

यह गाँव का प्रमुख मंदिर रहा होगा। इसके दो तलों का गर्भगृह अब भी गर्व से खड़ा है। इसके भीतर सोमेश्वर नाम का शिवलिंग स्थापित है। मैंने इस मंदिर के विषय में जो कुछ पढ़ा है, उसके अनुसार गांववासी इस लिंग को स्वयंभू लिंग मानते हैं। इसीलिए इस मंदिर को स्थानांतरित नहीं किया गया।

सोमेश्वर मंदिर की भित्ति पर इस मंदिर की मूल छवि छायाचित्र के रूप में लगाई हुई है। इस चित्र के अनुसार मूल मंदिर वर्तमान स्थिति से कहीं अधिक विशाल था। मंदिर के भीतर पत्थर की पटिया है जिस पर १२ चिन्ह खुदे हुए हैं। कदाचित ये चिन्ह १२ मास अथवा १२ राशिचिन्ह के प्रतीक हैं। चूंकि मंदिर बंद था, मैं इन चिन्हों को देख नहीं पायी।

सोमेश्वर महादेव मंदिर का दीपस्तंभ
सोमेश्वर महादेव मंदिर का दीपस्तंभ

मंदिर के दीपस्तंभ पर जलमग्न होने के चिन्ह स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहे थे किन्तु यह अब भी गर्व से खड़ा, सोमेश्वर मंदिर एवं कुर्डी के स्वर्णिम दिवसों का साक्षी बन कर।

मंदिर के समक्ष कंक्रीट की संरचना है जिसे ‘शेज़ो’ कहा जाता है। इनमें वृत्ताकार तोरण युक्त दो द्वार हैं जिनमें एक मंदिर की ओर तथा दूसरा उस पार स्थित नदी की ओर मुख किये हुए है। यह कदाचित कलाकारों का साजसज्जा कक्ष था। मंदिर एवं नदी के मध्य एक प्रदर्शन मंच था जिस पर कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करते थे। इसका प्रयोग मंदिर एवं कलाकारों के लिए संगीत कक्ष एवं गोदाम के रूप में भी किया जाता था।

२०१६ के पश्चात से, कुर्डी गाँव के मूल निवासी यहाँ वार्षिक कुर्डी उत्सव का आयोजन करते हैं जिसमें वे यहाँ एकत्र होकर पूजा अर्चना करते हैं। मैं इस कुर्डी उत्सव के तुरंत पश्चात यहाँ आयी थी। उत्सव एवं पूजा अर्चना के चिन्ह चारों ओर स्पष्ट दिखाई पड़ रहे थे।

कुर्डी महादेव मंदिर

स्थानान्तरण से पूर्व यह महादेव मंदिर कुर्डी में स्थित था। बाँध निर्माण से पूर्व इस मंदिर को सालावली बाँध के समीप एक सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित किया गया है। १२वी. शताब्दी में निर्मित इस मंदिर को सावधानी पूर्वक, एक एक पत्थर पृथक कर उसी क्रम में नवीन स्थान पर पुनर्निर्मित किया गया है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने इस कार्य को इतनी कुशलता से पूर्ण किया है कि उन्हें अपनी सफलता पर गर्व अनुभव होना उचित है। वे अवश्य सराहना के पात्र हैं। किसी संरचना को इस प्रकार स्थानांतरित किया गया हो, ऐसी इमारतें अधिक नहीं होंगी।

यह मंदिर अब सालावली बाँध के समीप स्थित है। इसकी शिलाओं पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा स्थानान्तरण किये जाने के चिन्ह शिला-क्रमांक के रूप में अंकित हैं। इन्हें देख आप अनुमान लगा सकते हैं कि इसे किस प्रकार क्रमवार स्थानांतरित किया गया होगा।

देवी माँ की छवि

लेटराइट की एक चट्टान पर देवी माँ की विशाल छवि उकेरी गयी थी। स्थानान्तरण के समय इस चट्टान को कुशलता पूर्वक धरती के निकाल कर दक्षिण गोवा के वेरणा गाँव ले जाया गया। वेरणा के मूल महालसा नारायणी मंदिर के समीप रखी इस चट्टान को आप अपनी आगामी भेंट के समय अवश्य देखें।

गुफाएं

रिवोणा गुफाओं के समान कुर्डी गाँव में भी चट्टानों में कटी कुछ गुफाएं हैं। इन्हें खोजना अब आसान नहीं है। हाँ इतना कह सकती हूँ कि बाँध परियोजना के परितंत्र में ये कहीं छुपी हुई हैं।

कुर्डी दर्शन

पिछले कुछ वर्षों से प्रत्येक मई मास में कुर्डी गाँव के दर्शन करने की अभिलाषा हृदय में थी। यह छोटी सी समयावधि किसी न किसी कारणवश तुरंत गुजर जाती थी एवं मुझे इसके दर्शन का अवसर ही नहीं मिल पाता था। इस वर्ष मुझे वह स्वर्णिम अवसर मिल ही गया जब एक दिन हमने प्रातः गाड़ी निकाली एवं कुर्डी गाँव के आकर्षणों को खोजने निकल पड़े।
मार्ग में हमने रिवोणा की गुफाएं ढूँढी। इन्हें ढूंढने में अत्यंत रोमांचित भी अनुभव किया। इनके साथ ही आप कुशावती नदी के तल पर स्थित पन्सैमोल शैलचित्र भी देख सकते हैं। इन्हें देखने के लिए भी मई का मास सर्वोत्तम है। समीप ही गोवा का बुलबुलों वाला बुड़बुड़े ताल एवं कोटिगाव वन्यजीव अभ्यारण्य है। आप चाहें तो, इसी यात्रा में इनके भी दर्शन कर सकते हैं।

कुर्डी के आस पास जलमग्न स्थान
कुर्डी के आस पास जलमग्न स्थान

जैसे जैसे हम कुर्डी गाँव के समीप पहुँच रहे थे, मार्ग संकरा होता जा रहा था तथा जंगल घना होता जा रहा था। मार्ग का अनुसरण करते हुए हम एक ऐसे गाँव में पहुंचे जहां कुर्डी के निवासियों को स्थानांतरित किया गया है। इस गाँव की सर्वाधिक विशाल संरचना उजले पीले रंग में रंगा एक अपेक्षाकृत नवीन किन्तु छोटा मंदिर है।

छोटे छोटे शिवलिंग
छोटे छोटे शिवलिंग

इस मंदिर के चारों ओर हमें धरती पर कई शिवलिंग दिखाई दिए। इन शिवलिंगों के तीन ओर छोटी भित्तियाँ निर्मित थीं। हम समझ नहीं पाए कि क्या यह योनी का मौलिक रूप है? हमने वहां के निवासियों से जानकारी प्राप्त करने का प्रयास किया किन्तु वे अधिक जानकारी नहीं दे पाए। उन्होंने केवल यही कहा कि इन्हें पूर्वजों ने स्थापित किया है।

सालावली का जलग्रहण क्षेत्र

सलावली का जलग्रहण क्षेत्र
सलावली का जलग्रहण क्षेत्र

कुर्डी गाँव पहुँचने हेतु दिशा निर्देश प्राप्त कर हमने गाड़ी एक कच्चे मार्ग पर उतार ली। संकरा कच्चा मार्ग अचानक हमें एक विशाल खुले क्षेत्र में ले आया। हमारे समक्ष कुछ दूरी पर हमें जल स्त्रोत दिखाई पड़ रहा था। जल स्त्रोत के उस पार कुछ दूरी पर सूखे दलदली क्षेत्र में हमें कुछ खँडहर दृष्टिगोचर हो रहे थे। खँडहर दूर थे। यहाँ से कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वे क्या हैं।

हम कुछ और आगे बढ़ें। जल स्त्रोत के समीप से आगे जाकर हम खँडहरों की प्रथम खेप के समीप पहुंचे। अधिकांशतः सूखी धरातल अब भी कई स्थानों पर नम थी। हम असमंजस में थे कि इन पर पैर रखें कि नहीं। कहीं पैर दलदल में धंस तो नहीं जायेंगे? कुछ दुर्घटना होने की स्थिति में समीप कोई सहायतार्थ भी उपलब्ध नहीं था।

जलमग्न कुर्डी गाँव के खँडहर

जलमग्न रहने के बाद भी तन कर खड़े हैं यह तने
जलमग्न रहने के बाद भी तन कर खड़े हैं यह तने

दलदल में धँसे पत्थरों को सुरक्षित जानकार हम उन पर पाँव रखकर खंडहरों की ओर बढ़े। मैंने स्वयं को कुछ टूटी भित्तियों से घिरा पाया। कदाचित ये किसी के निवासस्थान के अवशेष थे। एक ओर तुलसी वृन्दावन था जिसे देख हमने निवास के अग्रभाग का अनुमान लगाया। मुझे दलदली धरती पर एक अस्पष्ट रेखा दिखाई दी। यह कदाचित सड़क थी जिसके दोनों ओर घर थे।

दलदली धरती पर, जलस्त्रोत के चारों ओर तथा इसके भीतर स्थित एक छोटे मिट्टी के टापू पर नारियल के पेड़ों के अनेक ठूंठ थे। पिछले ३५ वर्षों से निरंतर जलमग्न रहते हुए भी ये अब तक वहां खड़े अपना अस्तित्व बनाए रखे हुए हैं। प्रत्येक वर्ष कुछ समय के लिए जल से बाहर आकर सूर्य की किरणों का आनंद उठाते हैं। जल ने इन ठूंठों पर आकृतियाँ बनायी हुई हैं। समय ना गंवाते हुए कुछ मकड़ियों ने उन पर अपने जाले भी बना लिए थे। सब कुछ अत्यंत भूतिया प्रतीत हो रहा था। यदि मैं यहाँ संध्या के पश्चात आयी होती तो मैं निःसंदेह ही इन्हें आपस में वार्तालाप करते भूतप्रेत मान लेती।

गाँव पहुँचने के पश्चात पहली बार मुझे एक अलौकिक अनुभूति हुई। भानगढ दुर्ग जैसे प्रेतबाधित स्थलों में प्राप्त अनुभूति से ये भिन्न अनुभव था।

खरीज़

खरीज़
खरीज़

संकरे मार्ग से हम आगे बढे। समक्ष हमारे मार्ग में धरती पर आड़ी खरीज निर्मित थी। धरती की चट्टानों को काटकर खाई बनायी हुई थी। इन्हें ‘खरीज़’ कहा जाता है। यह खरीज़ मानव निर्मित था या प्राकृतिक रूप से जल द्वारा कटकर बना था, यह नहीं जान पायी। देखने पर तो यह मानवनिर्मित प्रतीत हो रहा था जो कदाचित कुछ निचले स्थानों को जोड़ने हेतु बनाया गया था। खाई के उस पार, पत्थर की सूली निर्मित थी जिसके चारों ओर छोटी शिलाएं रख कर उसे सीमाबंद किया गया था। खाई के ऊपर निर्मित एक छोटे से पुलिये से हम आगे बढ़े।

कुर्डी महोत्सव की चिन्ह
कुर्डी महोत्सव की चिन्ह

भिन्न भिन्न आकार के जलस्त्रोतों के समीप से जाते हुए अंततः हमें एक ऊंची संरचना दिखाई पड़ी। इसे देखते ही मैंने जान लिया कि यह श्रीस्थल का सोमेश्वर महादेव मंदिर है। इस पर नवीन रंगरोगन किया गया था। चारों ओर पताकाएं फड़फड़ा रही थी।

सोमेश्वर महादेव - एक स्वयंभू लिंग
सोमेश्वर महादेव – एक स्वयंभू लिंग

मंदिर बंद था। द्वार के सलाखों से हम लिंग के दर्शन कर पा रहे थे। मैंने मन ही मन प्रार्थना की। तत्पश्चात मंदिर के चारों ओर अवलोकन आरम्भ किया। मुख्य मंदिर के आसपास किसी अन्य मंदिर के अस्तित्व को खोजने लगी। मुझे योनी सहित कुछ शिवलिंग दिखाई दिए। इसी शिला द्वारा निर्मित कुछ भंगित प्रतिमाएं भी थीं। उनमें से कुछ पर हल्दी-कुमकुम अर्पित किये हुए थे। मुझे बताया गया था कि एक समय यहाँ एक वेताल मंदिर भी था। बहुत खोजा किन्तु मुझे उसके अस्तित्व के कोई चिन्ह दृष्टिगोचर नहीं हुए।

सोमेश्वर मंदिर के एक पुराना चित्र
सोमेश्वर मंदिर के एक पुराना चित्र

मैं कल्पना करने लगी, प्रत्येक महाशिवरात्रि, चैत्र पूर्णिमा तथा दशहरा के उत्सव में यह कैसा प्रतीत होगा।

प्राचीन शिवलिंग
प्राचीन शिवलिंग

टेकड़ी पर स्थित इस मंदिर से मैंने जब चारों ओर दृष्टी दौड़ाई, वहां के परिदृश्यों ने मुझे मोह लिया। नुकीली पहाड़ियों की श्रंखला एवं शांत जल पर पड़ते उनके प्रतिबिम्ब मुझे हतप्रभ कर रहे थे। मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो मैं एक प्याले के मध्य में खड़ी हूँ जिसकी भित्तियाँ नुकीली पहाड़ियों से बनी हैं तथा मेरे चारों ओर जल के कई पोखर हैं।

कुशावती नदी का सामीप्य

लगभग ढहते हुए ‘शेज़ो’ को पार कर मैं कुशावती नदी की ओर जाते मार्ग पर चल पड़ी। इसे ‘पाज़’ कहते हैं। यहाँ इस जलमग्न गाँव के सर्वाधिक सघन खँडहर हैं।

शेज़ो
शेज़ो

दाहिनी ओर एक निवासस्थान से सटा एक कुआं था। कुआँ अखंडित एवं सुव्यवस्थित था। समीप ही एक सुन्दर तुलसी वृन्दावन था जो इस घर में रहते परिवार के सर्वाधिक शक्तिशाली सदस्य होने का प्रमाण देता प्रतीत हो रहा था। उस पर तुलसी का पौधा नहीं था। किन्तु मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे किसी समय इसके भीतर लगी तुलसी से ही इसने अपनी शक्ति अर्जित की होगी।

खुशावती नदी का तट
खुशावती नदी का तट

कुछ दूरी पर एक मंच था। कदाचित अपने समृद्ध काल में इस मंच पर कलाकारों ने अपनी कला का प्रदर्शन किया होगा। यहाँ मेरी दृष्टी टेराकोटा में उत्कीर्णित एक टुकड़े पर पड़ी। यह किसी उत्कीर्णित भित्ति का भाग होगा। यहाँ-वहां बिखरे द्वार के चौखट एवं लकड़ी के कोष्टकों के टुकड़े क्षय के विभिन्न चरणों में थे।

मोगूबाई कुर्डीकर के निवासस्थान का अधिकांश भाग अब भी जलमग्न था। उसका कुछ भाग ही हमें जल के बाहर दिखाई दिया। जल स्तर अत्यंत नीचे होने की स्थिति में ही हम उनका सम्पूर्ण घर देख सकते हैं। उनके निवासस्थान से जब मैंने अपनी दृष्टी सोमेश्वर मंदिर की ओर डाली, मंदिर अत्यंत ऊंचा प्रतीत हुआ। इतनी ऊंचाई पर स्थित मंदिर भी वर्षा के जल में जलमग्न हो जाता है, यह कल्पना से परे है।

एक चौकोर मंच, जिस पर पालकी के समय बाहर निकाली गयी उत्सव मूर्ति रखी जाती थी, अब भी आप देख सकते हैं। एक मांड भी है जहां कदाचित विभिन्न उत्सव आयोजित किये गए होंगे।

मंदिर के समीप

मंदिर के दूसरी ओर एक छोटा चौकोर मंच था जिस पर पूजा अर्पण किये जाने के चिन्ह स्पष्ट विदित थे। यहाँ से लगभग १०० मीटर की दूरी पर ऊंची खड़ी शिलाएं धरती पर गड़ी हुई थीं। जहां अन्य शिलाएं साधारण थे, वहीं एक शिलाखंड पर कुछ उत्कीर्णित था। उन्हें गोलाकार में धरती पर खड़ा किया गया था। उनकी पृष्ठभागीय कथा यदि है, तो मुझे ज्ञात नहीं।

मंदिर के आप पास खुदाई किये हुए पत्थर
मंदिर के आप पास खुदाई किये हुए पत्थर

कुछ दूर पत्थरों के एक ढेर पर एक झंडा फड़फड़ा रहा था। इस ढेर के चारों ओर भी शिलाखंडों को रखकर सीमा बनायी गयी थी।

यहाँ एक घंटे से कुछ अधिक समय बिताकर हम यहाँ से वापिस आ गए।

कुर्डी में एक अद्भुत प्रकार की सुन्दरता एवं आकर्षण है। यह आपको आनंदित करने के साथ साथ दुखी भी करता है। यह मुझे जैसलमेर के निकर स्थित कुल्धारा गाँव का स्मरण कराता है।

कुछ तो शक्ति है इस तुलसी वृन्दावन में
कुछ तो शक्ति है इस तुलसी वृन्दावन में

इन खंडहरों को देख अत्यंत दुःख होता है। किन्तु यहाँ का परिदृश्य अत्यंत ही मनमोहक है। यह परिदृश्य एवं ये अद्भुत खँडहर वर्ष में केवल कुछ ही दिन दृष्टिगोचर होते हैं, यह तथ्य इन्हें और भी मूल्यवान बना देता है।

कुर्डी गाँव के निवासियों को विस्थापित करने के पश्चात सालावली बाँध बनाया गया था जिसके जल की आपूर्ति सम्पूर्ण दक्षिण गोवा में की जाती है। दक्षिण गोवा के निवासी निश्चित रूप से कुर्डी निवासियों के आभारी होंगे जिनके कारण आज उन्हें भरपूर पेयजल की प्राप्ति होती है।

जलमग्न कुर्डी गाँव का एक विडियो

पुनः प्रकट हुए इस जलमग्न कुर्डी गाँव की मेरी यात्रा का एक विडियो आपके समक्ष प्रस्तुत है।

यात्रा सुझाव

• कुर्डी गाँव मडगांव से दक्षिण-पूर्वी दिशा में लगभग ३०कि.मी. की दूरी पर स्थित है। यात्रा का अंतिम भाग किंचित भ्रामक है। आप जब भी यहाँ आयें, प्रयत्न कर समूह में आना उचित होगा।
• अपने साथ पर्याप्त पेयजल रखें। मई मास अत्यंत ऊष्ण होता है। सूर्य की तपती किरणों से बचने के लिए कोई आश्रय भी नहीं है।
• यहाँ किसी भी प्रकार का खाद्य पदार्थ उपलब्ध नहीं है। अतः अपने साथ इच्छानुसार खाद्यपदार्थ रखें। किन्तु इस संवेदनशील स्थल की मर्यादा का ध्यान रखते हुए इस स्थान को गन्दा न करें।
• आरामदायक जूते पहनें ताकि आप इन खंडहरों में आसानी से ऊपर-नीचे जा सकते हैं।
• नम प्रतीत होने पर धरती को जांच कर ही उस पर पैर रखें। धरती दलदली भी हो सकती है।
• ध्यान रखें, यह एक वनीय प्रदेश है। यहाँ आपको कई प्रकार के जीव-जंतु दिखाई पड़ सकते हैं।
• इस स्थान के अवलोकन के लिए केवल दिन के समय ही आयें। रात्रि से पूर्व वापिस आ जाएँ।
• यहाँ की कुछ भी वस्तु वापिस लाने का प्रयत्न ना करें। विशेषतः वनीय क्षेत्र की वस्तुएं।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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मत्तूर – कर्नाटक के शिवमोग्गा का संस्कृत भाषी गाँव https://inditales.com/hindi/mattur-shivamogga-sanskrit-village/ https://inditales.com/hindi/mattur-shivamogga-sanskrit-village/#comments Wed, 17 Jul 2019 02:30:29 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1429

जब से मैंने सुना कि मत्तूर गाँव का बच्चा बच्चा संस्कृत में वार्तालाप करता है, मैं इस गाँव को देखने के लिए आतुर थी। मन में उत्सुकता जागृत हो गयी, प्राचीन काल में जो हमारी संस्कृति थी, भाषा थी, वह आज की २१ वीं. सदी में भी कहीं जीवित है! यह अविश्वसनीय है। मैं सोचने […]

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जब से मैंने सुना कि मत्तूर गाँव का बच्चा बच्चा संस्कृत में वार्तालाप करता है, मैं इस गाँव को देखने के लिए आतुर थी। मन में उत्सुकता जागृत हो गयी, प्राचीन काल में जो हमारी संस्कृति थी, भाषा थी, वह आज की २१ वीं. सदी में भी कहीं जीवित है! यह अविश्वसनीय है।

मत्तूर - कर्णाटक का संस्कृत भाषी गाँव मैं सोचने लगी, क्या मैं २००० वर्ष से भी अधिक प्राचीन भारत की यात्रा करने वाली हूँ? कई प्रश्न मष्तिष्क में गूँज रहे थे। क्या यहाँ के निवासी संस्कृत के साथ साथ अन्य भाषा भी बोलते हैं? क्या उन्हें संस्कृत भाषा धरोहर के रूप में मिली है या उन्होंने इसे वैसे ही सीखी है जैसे हम-आप मातृभाषा के साथ अन्य भाषाएँ भी सीख लेते हैं? मेरी जिज्ञासा चरम सीमा पर थी। अंततः, पिछले महीने मुझे मुत्तूर जाकर कुछ घंटे वहां बिताने का स्वर्णिम अवसर मिल ही गया।

परिवार के एक विवाह समारोह में भाग लेने के लिए मैं शिवमोग्गा गयी हुई थी। विवाह की विधियों के बीच समय निकालकर मैं शिवमोग्गा की सीमा पर स्थित मुत्तूर गाँव जाने के लिए निकल पड़ी। खेतों एवं सुपारी के बागों के बीच, धूल भरी सडकों से होते हुए हम मुत्तूर गाँव पहुँचे। वहां पहुंचकर हमने श्री अश्वथ अवधानी जी को ढूंढना आरम्भ किया। उन्होंने हमें गाँव दिखाने के लिए अपना बहुमूल्य समय दिया। हमारे पास उनका संपर्क अथवा फोन नंबर नहीं था। किन्तु हमें बताया गया था कि हम गाँव में किसी से भी उनका पता पूछ सकते हैं। है ना यह प्राचीन पद्धति से गाँव का दर्शन, जहां सब एक दूसरे के विषय में जानते थे!

मत्तूर गाँव का पैदल भ्रमण

हमने पैदल गाँव का भ्रमण आरम्भ किया। हमारे चारों ओर पारंपरिक दक्षिण भारतीय शैली के घर थे। चौड़े रास्तों पर खुलते घर के गलियारों में कई काष्ठ स्तंभ थे। ऊंचे वृक्षों के नीचे बने चबूतरे यह बता रहे थे कि यहाँ अब भी चौपाल बैठती होंगी। जवान हो या वृद्ध, सब पुरुषों ने एक सामान वेष्टि पहनी हुई थी जो एक पारंपरिक दक्षिण भारतीय वेशभूषा है।

दक्षिण भारत के पारंपरिक घर - मत्तूर
दक्षिण भारत के पारंपरिक घर – मत्तूर

सम्पूर्ण गाँव की कुछ अलग ही आभा थी। एक प्रकार की एकरूपता थी जो अधिकतर स्थानों में नहीं पायी जाती। अधिकतर घरों के द्वार खुले थे जो हमें चारों ओर फैले विश्वास के वातावरण का आभास करा रहे थे। वहां लोग ना तो हमें जानते थे, ना ही हमारे आने के प्रयोजन से परिचित थे। फिर भी वे बिना झिझक हमें अपने घर आमंत्रित कर रहे थे।

हम अश्वथ जी के साथ एक खुले चबूतरे पर बैठ गए। इससे पूर्व उनके गांव वासियों से अनवरत संस्कृत भाषा में वार्तालाप सुनकर हम चकित हो रखे थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो हम कोई स्वप्न जी रहे थे। मैंने स्वयं को चूंटी काटी और कहा कि मैं सच में संस्कृत भाषा में दैनिक जीवन के सामान्य वार्तालाप सुन रही थी।

मुत्तूर गाँव का इतिहास

विजयनगर सम्राट ने संकेती ब्राम्हणों को रहने के लिए मुत्तूर गाँव दिया था जब वे कुछ ५०० वर्ष पूर्व तमिल नाडू से पलायन कर यहाँ आये थे। जी हाँ! संस्कृत भाषी मुत्तूर गाँव एक अग्रहार है जिसे यहाँ के परिवारों ने राजसी अनुदान के रूप में प्राप्त किया था। सम्राट कृष्णदेवराय के दरबार के मंत्री, त्र्यम्बकराय ने त्र्यम्केश्वर मंदिर की स्थापना करवाई थी जिसके चारों ओर यह गाँव बस गया।

मत्तूर का लक्ष्मी नारायण मंदिर
मत्तूर का लक्ष्मी नारायण मंदिर

गाँव के ४० परिवारों में यह अग्रहार की भूमि माप कर बांटी गयी थी। प्रत्येक परिवार के लिए तीन भूखंड! मापने के चिन्ह आप अब भी यहाँ देख सकते हैं। अग्रहार में लगभग १२० परिवार के ६०० लोग निवास करते हैं। यद्यपि, गाँव की कुल जनसँख्या लगभग २००० है। ये सभी एक ही ब्राम्हण जाति के हैं। इसी कारण चारों ओर एकरूपता दिखाई पड़ती है। गाँव का नाम मुत्तूर कैसे पड़ा, यह कोई नहीं जानता। हो सकता है यह महत + ऊरु को मिलाकर बना हो जिसका अर्थ है, एक बड़ा गाँव या एक महत्वपूर्ण गाँव।

मत्तूर तथा संस्कृत

यहाँ के अधिकतर निवासी किसी ना किसी प्रकार से संस्कृत से जुड़े हुए हैं। एक विद्यालय है जहां विद्यार्थियों को संस्कृत भाषा में पाठ पढ़ाया जाता है। एक वेद पाठशाला है जहां विद्वान पंडित हिन्दू शास्त्रों का अभ्यास करते हैं। हमने यहाँ पूरे दक्षिण भारत से आये कुछ विद्यार्थियों से भेंट की जो यहाँ संस्कृत एवं शास्त्रों का अध्ययन करने आये हैं।

संस्कृत संभाषण करते मत्तूर निवासी
संस्कृत संभाषण करते मत्तूर निवासी

मैंने जब अश्वथजी से पूछा कि गाँव में संस्कृत में वार्तालाप कब आरम्भ हुआ, उन्होंने तुरंत उत्तर दिया – परंपरा। हमारे पूर्वज जो वेदों एवं शास्त्रों में पारंगत थे, संस्कृत में ही वार्तालाप करते थे। यद्यपि, पिछले कुछ दिनों में संस्कृत को जो बढ़ावा मिला है उसका श्रेय संस्कृत भारती द्वारा संचालित पाठ्यक्रमों को भी जाता है।

मैंने उनसे पूछा कि यह परंपरा सम्पूर्ण भारत में ना सही, भारत के कई भागों में अवश्य विद्यमान थी, तो केवल मुत्तूर में ही ये अब तक कैसे जीवित है? उन्होंने कहा कि मुत्तूर के निवासियों के पास जो कुछ है उससे वे अन्यंत संतुष्ट एवं प्रसन्न हैं। मुत्तूर के युवाओं को भी श्रेय देते हुए उन्होंने कहा कि गाँव के युवाओं ने संस्कृत भाषा को सहेज कर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके योगदान के बिना भाषा को बचाकर रखना कठिन होता।

आज, अग्रहार के सभी लोग तथा गाँव के अधिकतर निवासी तमिल, कन्नड़ तथा संस्कृत भाषा बोल सकते हैं। तमिल इनकी मातृभाषा है, कन्नड़ यहाँ की स्थानीय भाषा है तथा संस्कृत इनकी स्वयं चुनी हुई भाषा है।

मत्तूर के संस्कृत विद्यार्थी
मत्तूर के संस्कृत विद्यार्थी

अश्वथजी ने मुझे दक्षिण भारत के कुछ अन्य गाँवों के विषय में बताया जहां संस्कृत को बोलचाल की भाषा के रूप में पुनः सजीव करने का प्रयास किया जा रहा है। धारवाड़ के समीप स्थित राधाकृष्ण नगर इनमें से एक है। उनका मानना है कि जब गाँव के युवा शहरों की ओर पलायन करते हैं तब गाँव की संस्कृति के साथ भाषा भी लुप्त होने लगती है। यदि हम गाँव में रहेंगे तो गाँव की भाषा भी स्वाभाविक रूप से सहेज कर रखी जायेगी।

मुझे यह जानकार सुखद आश्चर्य हुआ कि मुत्तूर गाँव विश्व को संस्कृत सिखाने के लिए आधुनिक तकनीकों का प्रयोग कर रहा है। कई युवा उद्यमी मुत्तूर गाँव से ऑनलाइन लोगों को संस्कृत सिखाते हैं। यह सुनकर मुझे लगा कि अधिक से अधिक युवाओं को उनके गाँव में ही जीविका का साधन ढूँढना चाहिए। इससे वे गाँव की धरोहर को सहेज कर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

मत्तूर गाँव में दर्शनीय स्थल

अश्वथ जी हमें मत्तूर गाँव की सैर पर ले गए। ६०० लोगों के इस छोटे से गाँव में हमने कई अनोखे स्थल देखे। मुझे यहाँ की सड़कें तथा उनकी सामुदायिकता व खुलापन अत्यंत भाया।

तुंग नदी का तट

तुंग नदी के तट पर, एक खुला मैदान था जहां अग्निहोत्र अथवा हवन का आयोजन किया जाता है। चूंकि मैं यहाँ दोपहर को आयी थी, मुझे इन्हें देखने का सौभाग्य नहीं मिला। मैंने निश्चय किया है कि मैं यहाँ फिर आऊँगी तथा एक प्राचीन नदी के तट पर हवन आयोजित होते देखने का प्रयत्न अवश्य करूंगी।

मत्तूर गाँव के मंदिर

इस छोटे से गाँव मत्तूर में कुल ७ मंदिर हैं। इनमें ३ मंदिर भगवान् विष्णु को समर्पित हैं – केशव मंदिर, श्री राम मंदिर एवं लक्ष्मी नारायण मंदिर हैं। अन्य ३ मंदिर, त्रयम्बकेश्वर मंदिर, गौरी शंकर मंदिर एवं सोमेश्वर मंदिर, भगवान् शिव को समर्पित हैं। एक अन्य मंदिर आंजनेय अर्थात् हनुमानजी को समर्पित है।

हमने गाँव के प्रवेश द्वार पर स्थित लक्ष्मी नारायण मंदिर के दर्शन किये। इसे दुर्गा मंदिर भी कहते हैं। यह एक छोटा सा, एक कक्ष का मंदिर है। यहां प्रत्येक संध्या को स्त्रियाँ आती हैं व कीर्तन करती हैं।

वेदशाला एवं गुरुकुल

गाँव के गुरुकुल के दर्शन मेरी इस यात्रा के सर्वाधिक आनंददायी क्षण थे। यह एक सादा पुराना घर था जहां आप अपने चप्पल-जूते उतारकर प्रवेश करते हैं, जहां छोटे छोटे बालक रहते हैं एवं भारतीय शास्त्रों का अध्ययन करते हैं।

मत्तूर गुरुकुल का पुस्तकालय
मत्तूर गुरुकुल का पुस्तकालय

मत्तूर के गुरुकुल में एक छोटा पुस्तकालय भी है जहां कई पुस्तकों एवं संस्कृत शास्त्रों का संग्रह है। मैंने सोचा, यदि इसके पास पर्याप्त पूँजी होती तो यहाँ एक बड़ा पुस्तकालय बनाया जा सकता है जहां लोग आकर अध्ययन कर सकते। अभी तो यहाँ स्टील की अलमारियां थीं जिनमें पांडुलिपियाँ एवं संस्कृत की पुस्तकें रखी हुई हैं।

गाँव की पाठशाला

गाँव की पाठशाला में मेरा अनुभव अत्यंत भावविभोर करने वाला था। मैंने वहां ५वी. कक्षा के विद्यार्थियों से भेंट की। उन नन्हें बालकों ने मुझे अपने संस्कृत ज्ञान से अचंभित कर दिया। भगवान् करे ये हमें उस भविष्य की ओर ले जाएँ जो हमारी संस्कृति से पोषित व सिंचित हो।

संस्कृत भाषी गाँव - मत्तूर मत्तूर गाँव की यात्रा का सर्वाधिक दिलचस्प अनुभव था, संस्कृत भाषा में वार्तालाप को सुनना। यदि आपको कम से कम एक भारतीय भाषा का ज्ञान है तो इन संवादों को थोड़ा-बहुत समझ सकते हैं।

वीरगल अथवा हीरो पत्थर

वीरों की स्मृति में बने वीरगल
वीरों की स्मृति में बने वीरगल

एक मंदिर के बाहर हमने एक हीरो पत्थर स्थापित देखा। यह स्मारक गाँव के स्थानीय शहीदों अथवा हीरो को समर्पित है। यह प्रथा इस क्षेत्र में बहुत सामान्य है। समय की कमी के कारण मैं इस स्मारक से जुड़ी किवदंती जान नहीं पायी। किन्तु मुझे यह आभास अवश्य हुआ कि यह संस्कृत भाषी गाँव अनूठा एवं भिन्न होने के बाद भी मुख्यधारा से अलग नहीं है।

मत्तूर का विडियो देखिये

मत्तूर गाँव कैसे पहुंचें

आप शिवमोग्गा या शिमोगा से सड़क मार्ग से आसानी से यहाँ पहुँच सकते हैं। शिमोगा बेंगलुरु से सड़क एवं रेल मार्ग से जुड़ा है।

मत्तूर गाँव के दर्शन की योजना इस प्रकार बनाएं कि आप वहां प्रातःकाल अथवा संध्या के समय रह सकें। इस प्रकार आप मत्तूर गाँव का सम्पूर्ण अनुभव ले सकते हैं, अग्निहोत्र व हवन होते देख सकते हैं तथा नदी के तट पर शास्त्रों के उच्चारण का आनंद ले सकते हैं।

यूँ तो मत्तूर गाँव के दर्शन आप लगभग एक घंटे में कर सकते हैं किन्तु वहां बैठकर वहां के लोगों से वार्तालाप करने की इच्छा हो तो थोडा अधिक समय लग सकता है।

गाँव के आसपास घूमने की इच्छा हो तो आप मंदिरों की नगरी श्रृंगेरी तथा इक्केरी व केलदी में केलदी राज्य के अवशेष भी देख सकते हैं।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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नाको हिमाचल प्रदेश – एक पवित्र झील और प्राचीन मठ https://inditales.com/hindi/nako-adarsh-gaon-himachal-pradesh/ https://inditales.com/hindi/nako-adarsh-gaon-himachal-pradesh/#respond Wed, 20 Feb 2019 02:30:19 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1108

नाको एक छोटा सा बौद्ध ग्राम है जो स्पीति घाटी के किनारे एक दूरस्थ पहाड़ी पर बसा हुआ है। वैसे तो यह गाँव किन्नौर जिले में पड़ता है, लेकिन यहाँ का रहन-सहन सबकुछ अधिकतर स्पीति घाटी की संस्कृति से मिलता-झूलता है। जब हम नाको जा रहे थे, तो मुझे उसके बारे में सिर्फ इतना पता […]

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नाको - हिमाचल प्रदेश का एक आदर्श गाँव
नाको – हिमाचल प्रदेश का एक आदर्श गाँव

नाको एक छोटा सा बौद्ध ग्राम है जो स्पीति घाटी के किनारे एक दूरस्थ पहाड़ी पर बसा हुआ है। वैसे तो यह गाँव किन्नौर जिले में पड़ता है, लेकिन यहाँ का रहन-सहन सबकुछ अधिकतर स्पीति घाटी की संस्कृति से मिलता-झूलता है। जब हम नाको जा रहे थे, तो मुझे उसके बारे में सिर्फ इतना पता था कि, वहाँ पर पुराना मठ और एक सुंदर झील है। मैंने सोचा कि यह बहुत से ट्रेकिंग के मार्गों का प्रस्थान बिन्दु होगा, जो कि वह वास्तव में है। तथापि नाको में एक बहुत ही अनोखी बात थी जो मेरा इंतेजार कर रही थी।

नाको या किसी लक्ष्यहीन स्थल की यात्रा   

किन्नर शिविर से नाको गाँव
किन्नर शिविर से नाको गाँव

नाको गाँव तक की हमारी यात्रा बहुत ही लुभावनी थी। हमारे बाकी के हिमाचल सफर की तुलना में यहाँ की सड़कें अपेक्षाकृत अच्छी थीं। स्पीति घाटी के नजदीक पहुँचते-पहुँचते आप देख सकते हैं कि वहाँ की पहाड़ियों का हरितआवरण लुप्त होते-होते अंत में एकदम जीर्ण सी अवस्था में रह जाता है। रेत के विशाल टीलों जैसे दिखने वाली इन पहाड़ियों को देखते ही सबसे पहले आपके मन में यही एक शब्द आता है ‘नग्न’।

ये भंगुर पर्वत मालाएँ हैं, जहाँ से छोटे-छोटे पत्थर हमेशा सड़कों पर गिरते रहते हैं। सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) इन पत्थरों को रास्ते पर से निकालकर इन सड़कों को साफ और सुरक्षित रखने का बहुत बढ़िया काम कर रहा है। लेकिन इन विराट पर्वत मालाओं से लड़ते समय उन्हें बहुत सी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। उनका यह काम काबिले तारीफ है। मुझे याद है कि नाको की यात्रा के दौरान मुझे ऐसा लगा जैसे हम किसी लक्ष्यहीन स्थान की ओर जा रहे हैं। मीलों तक हमे उस रास्ते पर दूसरी कोई गाड़ी नहीं दिखी। ऐसा लग रहा था जैसे इन रास्तों की कोई मंजिल ही न हो। यह सिर्फ तर्कशील बुद्धि ही थी जो कह रही थी कि अगर रास्ता है तो घर और मनुष्यों का वास भी जरूर होगा।

नाको की पहली झलक

कुछ देर बार हमे दो अलग-अलग पहाड़ियों की चोटियों पर बसे दो गाँव दिखे जो लगभग चोटी पर बैठे हुए से लग रहे थे। थ। इन गांवों की बौद्ध विशेषताएँ हवा में लहरा रहे रंगबिरंगी प्रार्थना के ध्वजों से स्पष्ट झलक रही थीं। हो सकता है कि शायद ध्वज लगाने की यह प्रथा गाँव के अस्तित्व को दर्शाने का तथा उसकी रक्षा करने का एक तरीका है।

नाको पहुँचने के बाद हमने आस-पास के लोगों से किन्नर शिविर के बारे में पूछा। इस लंबे सफर के बाद हम बहुत थक गए थे और थोड़ा आराम करना चाहते थे। हम गाँव के अंतिम छोर तक पहुंचे जहाँ से आप प्रसिद्ध नाको झील का सुंदर दृश्य देख सकते हैं और गाँव के मनोरम नज़ारे का आनंद उठा सकते हैं। हाथ-मुह धो कर थोड़ा आराम करने के बाद मैंने वहाँ पर पूछताछ की कि अगर मुझे गाँव की सैर कराने तथा वहाँ का प्रसिद्ध मठ दिखाने के लिए कोई गाइड मिल सकता है। और उन्होंने तुरंत मेरा परिचय प्रेम सिंह से कराया जिन्हें साहिल नाम से बुलाना ज्यादा पसंद था। उसने हमारे सफर की शुरुआत नाको शब्द की व्युत्पत्ति के बारे में बताते हुए की। नाको शब्द की व्युत्पत्ति तिब्बती शब्द ‘नेगो’ से हुई है, जिसका अर्थ है तीर्थ का द्वार या किसी पवित्र स्थान तक जाने का मार्ग।

नाको झील
रमणीय नाको झील
रमणीय नाको झील

हमने अपनी पदयात्रा नाको झील से प्रारंभ की, क्योंकि मैं अंधेरा होने से पहले इस झील की परिक्रमा करना चाहती थी। जब हम झील के पास पहुंचे तो मैंने देखा कि यह झील मेरी अपेक्षा के विपरीत बहुत ही छोटी थी। गाँव के एक तरफ बसी इस छोटी सी अंडाकार झील की चारों ओर छोटी सी पगडंडी बनी हुई थी। इसके चारों ओर खड़े पेड़ झील के पानी में प्रतिबिंबित हो रहे थे जिसके कारण झील का पानी हरा होने का आभास हो रहा था लेकिन मुझे याद है कि इस झील की जो तस्वीरें मैंने देखी थीं उनमें तो यह साफ नीली झील थी।

नाको झील को एक पवित्र झील माना जाता है। कहा जाता है कि सालों पहले गुरु पद्मसंभव यहाँ पर तपस्या करने बैठे थे। किसी को भी इस पावन झील में मछली पकड़ने, स्नान करने या पैर तक डुबोने की अनुमति नहीं है।

नाको झील एक प्रकृतिक झील है, जो बारिश के मौसम में पूरी तरह से भरी होती है और सर्दियों के मौसम में उसका पानी कम हो जाता है। पानी का स्तर कम होने से झील में उगने वाले पेड़ों को आप स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। यह छोटी सी सैर सच में बहुत ही सुखदायक है। बीच-बीच में यहाँ-वहाँ आपको पानी की छोटी-छोटी धाराएँ पार करनी पड़ती हैं जो जिन्हें पार करते हुए आपको अपने पैर पानी में डुबाने ही पड़ते हैं। अगर आप पवित्र स्थानों में विश्वास करते हैं तो, शायद आपको अपना आशीर्वाद देने का यह उनका अनोखा तरीका है।

गुरु पद्मसंभव
गुरु पद्मसंभव के पदचिन्ह
गुरु पद्मसंभव के पदचिन्ह

नाको झील देखने के पश्चात हम गुरु पद्मसंभव के पदचिह्न देखने के लिए गाँव की ओर बढ़े, जो 6ठी-8वी सदी में निर्मित मंदिर के भीतर सुरक्षित हैं। बाहर से तो यह मंदिर काफी साधारण दिखता है। इसके भीतर गुरु पद्मसंभव की मूर्ति स्थापित है और वहीं पर स्थित एक पत्थर पर उनके पदचिह्न हैं। वहाँ पर एक रंगीन विशाल प्रार्थना चक्र भी है जो भक्तों द्वारा लगातार घुमाया जाता है।

नाको मठ

नाको का बौद्ध मठ
नाको का बौद्ध मठ

रींचेन जेंगपो जिन्हें रत्न भद्र भी कहा जाता है, को महान अनुवादक के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने सभी बौद्ध शास्त्रों को संस्कृत से तिबत्ती भाषा में अनुवादित किया था। माना जाता है कि 11 सदी के दौरान उन्होंन इस क्षेत्र में 108 मठों की स्थापना की थी और नाको मठ उन्हीं में से एक है। नाको में दो ऐसे मंदिर हैं जिन्हें बहुत ही अच्छे तरीके से संरक्षित किया गया है। इनमें से मुख्य मंदिर 5 ध्यानी बौद्धों को समर्पित किया गया है, जिन्हें अपने अभिहित रंग से दर्शाया गया है :

  • अक्षोभय – नीला
  • अमिताभ – लाल
  • वैरोचन – सफ़ेद
  • रत्नसंभव – पीला
  • अमोघसिद्धि – हरा

यहाँ की दीवारों पर आप प्रचुर चित्रकारी देख सकते हैं। बायीं तरफ वैरोचन मंडल बना हुआ है और दाहिने तरफ बुद्ध मंडल बना हुआ है। ये चित्र नाको मठ के निर्माण काल के समय यानी 11वी सदी में बनवाए गए थे। ऐसी स्थिति में यह सोचना गलत नहीं होगा कि इन चित्रों को वैसे ही बनाए रखने के लिए बाद के वर्षों में उनका सुधारणिकरण किया गया होगा। यहाँ पर पीली तारा का एक मंदिर है, जिसके साथ 8 औषधि बौद्ध हैं। पीली तारा वैद्यों या चिकित्सकों के अभिभावक देवी हैं। यहाँ पर गाँव की स्थानीय भाषा यानी कि बोटी भाषा में एक मण्डल है।

हिमाचल के नाको गाँव का नया मठ
हिमाचल के नाको गाँव का नया मठ

हाल ही में यहाँ पर एक नया मंदिर बनवाया गया है। यह तब बनवाया गया था जब दलाई लामा यहाँ पर आए थे और 7 दिनों के लिए यहाँ पर रुके थे। लगता है जैसे यहाँ के प्रत्यके गाँव में दलाई लामा के लिए एक नया मठ बनवाया गया था, ताकि अगर कभी भी वे उनके गाँव में आए तो वहाँ पर रह सके।

नाको गाँव की सैर

गाँव में घूमते हुए, मैंने देखा कि वहाँ के घरों की दीवारें सफ़ेद रंग की थीं और उनकी खिड़कियों और दरवाजों की चौखटें काले–नीले रंग की थीं। इन गलियों से गुजरते हुए मुझे एहसास हुआ कि अगर ज्यादा नहीं तो यहाँ पर उतने ही पशु थे जितने कि मनुष्य। घरों के आस-पास से गुजरती ये संकीर्ण गलियाँ पशुओं के मलमूत्र से भरी हुई थीं। यह गंध मेरे नथुनों में इस प्रकार भर गयी थी कि आस-पास वह बदबू न होने के बावजूद भी में उसे महसूस कर पा रही थी। यहाँ रास्ते पर यहाँ-वहाँ कुदरती खाँचो वाले पत्थर रखे गए थे जिनमें पशुओं के लिए चारा – पानी रखा जाता था।

नाको की कच्ची पक्की सड़कें
नाको की कच्ची पक्की सड़कें

नाको गाँव के लोग मुख्य फसल के रूप में आलू और मटर की खेती करते हैं। इसके अलावा यहाँ पर देशव्यापी राजमा भी उगाए जाते हैं। हिमाचल प्रदेश में जैसे ही सेबों का राज्य खत्म होता है मटर का राज्य आरंभ होता है। नाको में स्थित पुराने घरों के दरवाजों की अलंकृत रूप से उत्कीर्णित चौखटें बहुत ही मनमोहक है। यहाँ-वहाँ स्थित प्रार्थना-चक्र गांववालों की धार्मिकता को उजागर कर रहे थे। लोग इन चक्रों के पास से गुजरते हुए आदत के चलते अनजाने ही उन्हें घुमाते हुए आगे बढ़ते थे।

नाको गाँव के काष्ठ द्वार
नाको गाँव के काष्ठ द्वार

मैंने देखा कि नाको में जगह-जगह पर पाए जाने वाले मंत्र उत्कीर्णित पत्थरों के ढेर के समान हर जगह सोलर पेनल्स लगे हुए थे। कुछ घरों पर तो स्पीति ईकोस्फियर द्वारा तख्ते भी लगाए गए थे जिन पर लिखा था कि वे ‘सोलर पेसिव हाउस’ हैं। जिसका अर्थ यह है कि ये घर जलाऊ लकड़ी का कम प्रयोग करते हैं जिसके चलते कार्बन का कम उत्सर्जन होता है।

नाको युवा क्लब  

मेरे गाइड साहिल ने मुझे इस पूरे सफर क दौरान नाको युवा क्लब और उसकी गतिविधियों के बारे में बताया। इस क्लब के सदस्य पर्यटकों को गाँव की सैर कराने और ट्रेक पर ले जाते हैं जिस के लिए कुछ निर्धारित शुल्क होता है। इससे इकट्ठा की गयी निधि फिर गाँव के विकास के लिए इस्तेमाल की जाती है।

नाको यूथ क्लब का कार्यालय
नाको यूथ क्लब का कार्यालय

गाँव में प्रवेश करते ही आप रास्ते में लगा हुआ तंबू देख सकते हैं जिसपर लगा हुआ तख़्ता बताता है कि यह युवा क्लब का कार्यालय है। बाद में मुझे एहसास हुआ है कि, गाँव में प्रवेश करते समय जब हमारी गाड़ी वहाँ के पत्थरिले रास्ते में फंस गयी थी तब इसी क्लब के सदस्यों ने हमे अपनी गाड़ी निकालने में मदद की थी।

युवा क्लब की गतिविधियां

हमारा सफर समाप्त होने के पश्चात मैंने साहिल के साथ बैठकर इस युवा क्लब की गतिविधियों और कार्य विधियों के बारे में थोड़ा-बहुत जानने की कोशिश की। उनके कार्यों के बारे में सुनकर मैं सच में बहुत प्रभावित हुई। वे अपनी सेवाओं के लिए यथोचित शुल्क लेते हैं, जैसे 50/- रु. प्रति व्यक्ति जिसमें वे आपको पूरे गाँव की सैर करवाते हैं जो लगभग 1 घंटे की होती है। सामान्य तौर पर वे एक समय पर ज्यादा से ज्यादा 3-4 चार लोगों को ही ले जाते हैं, तथा वे एक अकेले व्यक्ति को भी ले जाते हैं जैसे वे मुझे ले गए थे।

नाको यूथ क्लब द्वारा लगाया गया घंटा
नाको यूथ क्लब द्वारा लगाया गया घंटा

पास में स्थित ‘टर्टल रॉक’ की पूरे दिन की यात्रा के लिए वे 200/- रु. प्रति व्यक्ति लेते हैं, और 2-3 दिनों के ट्रेक के लिए 500/- प्रति व्यक्ति लेते हैं। इस क्लब के गाइड्स को हिमाचल पर्यटन द्वारा प्रशिक्षित किया जाता है। मैंने वहाँ पर लगे तख्ते देखे जिनपर लिखा था कि बस स्थानक जैसी जगहों पर पर्यटकों के वाहन रखना मना है तथा मठ या झील के पास धूम्रपान करना मना है। इन तख्तों पर यह भी लिखा गया था कि गाँव में किसी भी प्रकार का अनुचित व्यवहार स्वीकार नहीं किया जाएगा।

नाको युवा क्लब द्वारा सामाजिक योगदान

नाको युवा क्लब द्वारा इकट्ठा की गयी धन राशि गाँव की साफ-सफाई करने के लिए इस्तेमाल की जाती है। इन पैसों से उन्होंने पहाड़ी के ऊपर एक सुंदर सी घंटी भी लगवायी है – जो अब इस छोटे से गाँव का प्रतिकात्मक तत्व बनती जा रही है। गाँव में घूमते समय उसने मुझे क्लब द्वारा स्थापित की गई विविध कचरे की पेटियाँ दिखाई; तथा उनके द्वारा गाँव में वितरित कपड़े की थैलियाँ भी दिखाई जो पुराने पॉलिथीन बेग्स के स्थान पर इस्तेमाल किए जाते हैं। वास्तव में मुझे गाँव की सैर कराते समय साहिल रास्ते पर पड़ा हुआ कचरा उठाते हुए आगे बढ़ रहा था। रास्ते में हमे उसकी माँ भी मिली जिन्हें निश्चित रूप से अपने बेटे पर बहुत गर्व होगा। नाको की यह यात्रा सच में मेरे लिए बहुत ही संतोषजनक थी।

नाको गाँव प्राचीन विरासत और धार्मिक मूल्यों को साथ लेकर चलते हुए बेहतरीन जीवन के लिए आधुनिक विचारों और तकनीकों को अपने दैनिक जीवन में ढालते हुए विकास की ओर बढ़ानेवाला एक सुंदर उदाहरण है।

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