भारत के जल स्तोत्र Archives - Inditales श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Mon, 03 Jul 2023 13:32:29 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.7.5 राजस्थान की जल संस्कृति – नीरज दोशी से वार्ता https://inditales.com/hindi/rajasthan-jal-sanskriti-dharohar/ https://inditales.com/hindi/rajasthan-jal-sanskriti-dharohar/#comments Wed, 25 Oct 2023 02:30:18 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3304

अनुराधा – नमस्ते। इंडीटेल्स डीटुअर्स के इस संस्करण में आप सबका स्वागत है। आज हमारे साथ हैं नीरज दोशीजी जो जयपुर के जल धरोहर पदभ्रमण, Heritage water walks नाम की संस्था के संस्थापक हैं। यह इस दिशा में एक अत्यंत ही रोचक पहल है। मैंने सदा ही इस मांग पर पुरजोर बल दिया है कि […]

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अनुराधा – नमस्ते। इंडीटेल्स डीटुअर्स के इस संस्करण में आप सबका स्वागत है। आज हमारे साथ हैं नीरज दोशीजी जो जयपुर के जल धरोहर पदभ्रमण, Heritage water walks नाम की संस्था के संस्थापक हैं। यह इस दिशा में एक अत्यंत ही रोचक पहल है। मैंने सदा ही इस मांग पर पुरजोर बल दिया है कि यदि भारत को अपनी स्वर्णिम संस्कृति पुनः प्राप्त करनी है तो उसे अपनी प्राचीन राजस्थान की जल संस्कृति को वापिस लाना होगा। जल का सम्मान करना होगा। जल की विक्री नहीं, उसकी आराधना करनी होगी क्योंकि जल हमारे जीवन का मूलभूत आधार है।

जल के बिना किसी जीव का जीवित रहना संभव नहीं है। भारत में जल स्त्रोतों की अवस्था एवं उसके संरक्षण की आवश्यकता किसी से छुपी नहीं है। वह भी राजस्थान में, जिसका अधिकतर भाग मरुभूमि के अंतर्गत आता है। जयपुर के निवासी होने के कारण जल से हमारे संबंधों, उस के संरक्षण एवं संस्कृति के विषय में चर्चा करने के लिए नीरज से उत्तम जानकार कौन हो सकता है? वे एक ऐसे राज्य के निवासी हैं जो सबसे सूखे राज्यों एवं जल संरक्षण व संग्रहण के क्षेत्र में सर्वाधिक विकसित राज्यों में से एक है। तो आईये आज की इस महत्वपूर्ण चर्चा में हम सब नीरजजी का स्वागत करते हैं।

नीरज – डीटुअर्स में मुझे आमंत्रित करने के लिए धन्यवाद अनुराधाजी। विश्व भर के पाठकों से राजस्थान के जल की गाथाओं को साझा करते हुए मुझे प्रसन्नता हो रही है। मैं आप सबको यह भी बताना चाहता हूँ कि जल धरोहर पदभ्रमण, Heritage water walks का आरम्भ करने की प्रेरणा मुझे कहाँ से मिली। साथ ही यहाँ के जल स्त्रोतों की विलक्षणता की भी चर्चा करना चाहता हूँ।

अनुराधा – आईये राजस्थान की जल संस्कृति के विषय में चर्चा आरम्भ करते हैं। राजस्थान में जल संरक्षण व संचयन के अनेक उदहारण देखने को मिलते हैं। वहां लोगों का जल से कैसा सम्बन्ध है?

नीरज – जी। जल के बिना जीवन असंभव है। राजस्थान में इसी जल का अभाव है। इसीलिए वहां के निवासियों का जल के साथ प्रगाढ़ सम्बन्ध है। राजस्थान जैसी मरुभूमि भी वसाहत से परिपूर्ण है, यह विश्व का प्रथम अचम्भा है। राजस्थान में जल का विशेष महत्त्व है।

सम्पूर्ण विश्व में २५ मरुस्थल हैं। भारतीय उपमहाद्वीप के पश्चिमोत्तर भाग में महान भारतीय मरुस्थल थार है, जिसे ग्रेट इंडियन डेजर्ट भी कहा जाता है। उस मरुस्थल का ७५ प्रतिशत भाग राजस्थान में है। शेष भाग पाकिस्तान में है। इस मरुस्थल का कुल क्षेत्रफल लगभग २००,००० वर्ग किलोमीटर है। वहीं अफ्रीका के विशालतम मरुस्थल, सहारा मरुस्थल का क्षेत्रफल लगभग ९,२००,००० वर्ग किलोमीटर है। विश्व के अन्य मरुभूमियों की तुलना में थार मरुस्थल की विशेषता उसकी प्राकृतिक रूप से निवास कर रही बड़ी जनसँख्या है। सहारा की जनसँख्या का घनत्व एक व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। इसके ठीक विपरीत थार मरुस्थल की जनसँख्या का घनत्व १४३ व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है जो एरिज़ोना अथवा अमेरिका के मरुभूमि के जनसँख्या घनत्व से १४० गुना अधिक है। राजस्थान में जिस प्रकार जीवन विकसित हुआ, उसका सम्बन्ध जल से अवश्य ही होगा क्योंकि सब कुछ अंततः जल से ही जुड़ा हुआ है। यदि आप राजस्थान की संस्कृति के भीतर झाँक कर देखें तथा उसकी परतों को खोलते हुए उसके मूल में जाएँ तो आपको वहां जल ही जल दिखाई देगा।

राजस्थान की जल संस्कृति – जल प्रबंधन

अनुराधा – राजस्थान की मरुभूमि में इतनी बड़ी संख्या में लोग निवास करते हैं, इसका एक ही अर्थ है कि वे अपने जल का उपयुक्त प्रबंधन करने में सफल हुए हैं।

नीरज – जल प्रबंधन एक आयाम है। जल प्रबंधन का उनके जीवन का अभिन्न अंग बनना एक दूसरा किन्तु महत्वपूर्ण आयाम है जहां उन्हें यह प्रतीत ही नहीं होता है कि वे इस दिशा में परिश्रम कर रहे हैं। जैसे जब भी किसी गाँव में कुआँ आदि खोदा जाता है तब सभी गांववासी पूर्ण उत्साह से उसमें भाग लेते हैं। उन्हें यह आभास ही नहीं होता है कि वे अपने दैनिक कार्य से हटकर कुछ कर रहे हैं। जल संचयन एवं प्रबंधन के प्रत्येक कार्य को अपनी परंपरा मानते हुए उन्होंने अपना जीवन जल के चारों ओर ही विकसित किया है। अपने दैनिक कार्यों के भाग के रूप में वे जल संचयन, संरक्षण एवं प्रबंधन करते हैं।

उदहारण के लिए, विवाह, जन्म तथा मृत्यु जैसे सुखद व दुखद अवसरों पर वे प्रतिज्ञा लेते हैं कि नवजात शिशु अथवा स्वर्गवासी व्यक्ति के नाम पर वे जल के एक स्त्रोत का निर्माण अवश्य कराएँगे। ऐसे अवसरों के लिए किया गया कार्य उन्हें श्रम प्रतीत नहीं होता है, अपितु वह आनंद का अवसर होता है। मेरे बालपन में मेरी दादी स्नान के लिए मुझे केवल आधी बाल्टी जल देती थी तथा कहती थी कि यदि अधिक जल चाहिए तो स्वयं लेकर आओ। वह मेरे लिये बड़ी सीख सिद्ध हुई। उसके पश्चात मुझे कभी भी जल के अभाव का तनिक भी आभास नहीं हुआ।

अनुराधा – मैं देवी भागवत पुराण पढ़ रही हूँ। उसके अनुसार किसी भी जल स्त्रोत का निर्माण कराना एक पुण्य कार्य है। किन्तु उससे भी बड़ा पुण्य कार्य उस जल स्त्रोत का प्रबंधन होता है, संरक्षण होता है। जल स्त्रोत का केवल निर्माण ही नहीं, अपितु उसका संरक्षण भी आवश्यक है। इसी तथ्य में भारत का सम्पूर्ण जल दर्शन समाया हुआ है।

नीरज – महाभारत का युद्ध १८ दिवसों तक चला था। महाभारत महाकाव्य १८ अध्यायों में विभक्त है जिसकी १८ पुस्तकें हैं। इसके १३वें अध्याय को अनुशासन पर्व कहा जाता है। इस अध्याय में मृत्यु शैय्या पर लेटे भीष्म पितामह एवं युधिष्ठिर के मध्य हुए संवाद हैं। मृत्यु से पूर्व भीष्म पितामह अपना सम्पूर्ण ज्ञान युधिष्ठिर को देना चाहते थे। युधिष्ठिर ने भीष्म से पूछा था कि सबसे उत्तम कर्म कौन सा होता है? उन्होंने उत्तर दिया कि सर्वोत्तम कर्मों में एक है, प्यासे को जल पिलाना, चाहे वह मनुष्य हो अथवा पशु, पक्षी, वृक्ष आदि। ऐसा करने से ६०,००० पुनर्जन्मों से मुक्ति मिल जाती है।

अनुराधा –  इससे मुझे प्याऊ संस्कृति का स्मरण हो आया जो विशेषतः ग्रीष्म ऋतु में देखे जाते हैं। भारत के राजस्थान, मध्य प्रदेश या उत्तर प्रदेश जैसे अनेक उष्ण प्रदेशों में ग्रीष्म ऋतु की चिलचिलाती धूप में मैंने कई लोगों को देखा है जो घड़ों में जल भरकर उसका शीतल जल प्यासे को पिलाते हैं। किसी भी प्रकार का प्रश्न पूछे बिना वे लोगों की सेवा करते हैं। वहीं दूसरी ओर जब हम विमानतल पर जाते हैं तो वहां पाव या आधा लीटर जल की बोतल के लिए ५० रुपये से भी अधिक शुल्क माँगा जाता है। दोनों में कितनी भिन्नता है। एक ओर सेवा की प्राचीन परंपरा है तो दूसरी ओर स्वार्थी व्यापार। मेरा यही मानना है कि जिस दिन से हम जल एवं जल स्त्रोतों का आदर करना सीखेंगे, उसी दिन से भारत की भूतपूर्व गरिमा पुनः वापिस आ जायेगी।

जल स्त्रोतों के विभिन्न प्रकार

अनुराधा – क्या आप हमें राजस्थान के जल स्त्रोत संरक्षण तकनीकियों एवं प्राचीन प्रक्रियाओं के विषय में कुछ बताएँगे? वहां कौन कौन से जल स्त्रोत उपलब्ध हैं?

नीरज –  राजस्थान में जल स्त्रोतों की अनेक वास्तु शैलियाँ हैं। कई जल स्त्रोत ऐसे हैं जो देखने में तो एक प्रकार के ही हैं किन्तु भिन्न भिन्न क्षेत्रों में होने के कारण उनके नाम भिन्न हैं। राजस्थान को ५ प्रमुख क्षेत्रों में विभाजित किया जा सकता है। शेखावटी, मारवाड़, मेवाड़, ढूंढाड़ तथा हाडोती। जल के विषय में हाडोती अन्य चारों से अधिक भाग्यशाली है क्योंकि यह चम्बल नदी के समीप है। चम्बल नदी राजस्थान से बहती इकलौती चिरस्थाई नदी है।

शेखावाटी के चुरू नगर में सेठानी का जोहारा - राजस्थान की जल संस्कृति
शेखावाटी के चुरू नगर में सेठानी का जोहारा

राजस्थान के जल स्त्रोतों में प्रमुखतः कुआं, जलाशय एवं बावड़ियां हैं। राजस्थान में लगभग ३००० जल स्त्रोत हैं तथा सभी मानव निर्मित हैं। यदि किसी गाँव, नगर या शहर का नाम ‘सर’ से अंत होता है तो वह स्थान निश्चित रूप से अपने जल स्त्रोत के नाम से ही जाना जाता है क्योंकि ‘सर’ का अर्थ है, सरोवर। जैसे अलसीसर, पदमसर, लूणकरणसर, इन सभी के नाम वहां के जल स्त्रोतों के नाम पर आधारित हैं। यही दर्शाता है कि प्राचीनकाल में लोग जल को इतना महत्त्व देते थे तथा उसका आदर करते थे।

राजस्थान में जल स्त्रोत का एक ऐसा प्रकार भी है जो आप भारत में अन्यत्र कहीं नहीं देखेंगे। वह है, कुईं, जो कुआं का स्त्रीलिंग संस्करण है। ये कुईं किसी भी क्षेत्र के भूविज्ञान एवं स्थलाकृति पर आधारित हैं। शेखावटी क्षेत्र में अनेक कुईं हैं जो ‘रेजानी पानी’ के अंतर्गत आते हैं। राजस्थान में जल के तीन प्रकार हैं। प्रथम है, पालर पानी, जो वर्षा का जल है। दूसरा है, पातालपानी, जो भूमिगत जल है। तीसरा है, रेजानी पानी, जिसे वायु की आर्द्रता से एकत्र किया जाता है।

शेखावाटी के कुछ भागों में भूमि सतह से कुछ फीट नीचे जिप्सम की परतें हैं तथा उनके ऊपर बालू है। इसके कारण वर्षा का जल भूमि के भीतर नहीं जा पाता तथा बालू की परत में ही एकत्र रहता है। यहाँ के लोगों ने व्यक्तिगत उपयोग के लिए उस जल के निकास का भी उपाय खोज लिया है। उन्होंने संकरी(४-५ फीट व्यास), खड़ी व बेलनाकार कुओं का निर्माण किया।

मंडावा में हरलालका कुआँ
मंडावा में हरलालका कुआँ

इसकी गहराई लगभग ४०-५० फीट तक हो सकती है। इस प्रक्रिया में कुँए के भीतर कम दबाव का क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है। इससे बालू में एकत्र जल का वाष्पीकरण होने के पश्चात भी वायु की आर्द्रता पुनः जल में परिवर्तित हो जाती है। कुईं कुँए का ही संकरा प्रकार है।

कुईं व्यक्तिगत अथवा सार्वजनिक दोनों हो सकते हैं। वे किसी विशेष परिवार, क्षेत्र अथवा जाति की व्यक्तिगत संपत्ति हो सकती हैं। परिवार की कुईं उनके निवास के भीतर ही होती हैं। एक क्षेत्र में होने के पश्चात भी ये कुईं आपस में जुड़े हुए नहीं होते हैं। इस जल की शुद्धता अधिक होती है क्योंकि कुईं में एकत्र होने से पूर्व यह बालू की अनेक परतों से होकर जाता है।

अनुराधा – इससे मुझे बुरहानपुर के कुओं का स्मरण हो गया। वे भूमिगत रूप से  आपस में जुड़े हुए हैं तथा सम्पूर्ण नगरी में झरने एवं वर्षा के जल की आपूर्ती करते हैं। ये भी कुईं के समान लगते हैं किन्तु वहां का भूविज्ञान एवं स्थलाकृति भिन्न होने के कारण उनका जल संचयन तकनीक भिन्न है।

नीरज – नाहरगढ़ दुर्ग जल संसाधन पदभ्रमण के समय आप दो कृत्रिम जल प्रणालियाँ देख सकते हैं। इस प्रणाली का आविष्कार प्रथम ईसवी में रोम वासियों ने किया था। यह तकनीक मध्य-पूर्वी देशों से होते हुए भारत में आई थी।

जल स्त्रोतों की स्थापत्य शैली

अनुराधा – भारत के पश्चिमी भागों में, गुजरात एवं राजस्थान में अत्यंत सुन्दर बावड़ियां हैं। वे सब उत्कृष्ट रूप से उत्कीर्णित होते हुए भी एक दूसरे से भिन्न हैं क्योंकि वे सब अपने स्थानीय परिवेश एवं संस्कृति को उजागर करती हैं। मुझे राजस्थान की चाँद बावडी एवं गुजरात की रानी की वाव के विषय में जानना है। उनका निर्माण कैसे किया गया? उनमें तिरछी पौढ़ियाँ क्यों हैं? उन्हें भूमि को गहराई तक खोदकर बनाया गया है। आज ८००-९०० वर्षों पश्चात भी वे अखंड कैसे खड़ी हैं?

नीरज – ये बावड़ियां अत्यंत गहरी हैं। इस कारण उनके भीतर सीधे सीधे नहीं उतरा जा सकता क्योंकि ऐसा करने के लिए एकाग्रता एवं समन्वय की तीव्र आवश्यकता पड़ेगी। अन्यथा हम अपना संतुलन खो कर सीधे जल की गहराई में गिर जायेंगे। वहीं तिरछी सीढ़ियों से गहराई का आभास नहीं होता है।

आभानेरी की चाँद बावड़ी - राजस्थान की जल संस्कृति
आभानेरी की चाँद बावड़ी

संतुलन भी बना रहता है तथा गिरने पर भी २-३ पौढ़ियाँ  से ही गिरेंगे। इस संरचना में पौढ़ियों की संख्या भी बढ़ जाती है तथा प्रत्येक पौढ़ी की ऊँचाई भी अधिक नहीं होती। अन्यथा इतनी गहरी बावड़ी में यदि सीधी पौढ़ियाँ बनाई जाएँ तो या तो प्रत्येक पौढ़ी की ऊँचाई अत्यधिक हो जायेगी जिससे नीचे उतरने का संकट कई गुना बढ़ जाएगा, या पौढ़ियों की ऊँचाई कम कर उनकी संख्या बढ़ाई जाए, उससे बावड़ी का घेरा प्रभावित होगा। तिरछी सीढ़ियाँ देखने में भी अत्यंत आकर्षक लगती हैं तथा एक समय में अधिक से अधिक लोग बिना संकट के नीचे उतर सकते हैं।

राजस्थान की जल संस्कृति

अनुराधा –  राजस्थान की संस्कृति में जल की क्या भूमिका है?

नीरज – किसी भी क्षेत्र की संस्कृति उसकी जीवनशैली, वस्त्रशैली, परम्पराएं एवं खान-पान से परिभाषित होती है। हमारे लिए जल एक उत्सव है। पुष्कर का ही उदहारण लें। वहां सब कुछ जल के चारों ओर ही केन्द्रित है, चाहे वह होटल व धर्मशालायें हों, विद्यालय व महाविद्यालय हों, या मेले एवं उत्सवों का आयोजन हो।

लहरिया साडीपर जल तरंगों का आभास
लहरिया साडीपर जल तरंगों का आभास

जल ही जीवन है। जल हमारी आवश्यकता तब भी थी, अब भी है। किन्तु जल संस्कृति में बड़ा परिवर्तन आ गया है। पारंपरिक जल संस्कृति का स्थान आधुनिक संस्कृति ने ले लिया है। अब हमारे घरों में सीधे नल से जल की आपूर्ति की जाती है। इसके अपने लाभ व हानियाँ हैं। एक ओर जल प्राप्त करने में परिश्रम नहीं करना पड़ता है तो दूसरी ओर हम जल स्त्रोतों के महत्त्व एवं उनके संरक्षण के विषय से दूर हो जाते हैं। आप ही सोचिये, क्या घर में नल के जल का प्रयोग करते समय आपके मस्तिष्क में उस स्त्रोत की छवि भी आती है जहां से इस जल की आपूर्ति की जा रही है? क्या एक क्षण के लिए भी उसकी परिस्थिति आपको चिंता में डालती है? कदाचित नहीं!

राजस्थान की एक पारंपरिक वस्त्र शैली है, बांधनी। उसमें लहरिया एक लोकप्रिय आकृति है जो जल की तरंगों को दर्शाती हैं। किन्तु राजस्थान में तो कहीं भी बहता हुआ जल नहीं है। इसीलिए लोग भगवान से प्रार्थना करते हैं कि वे शीघ्रातिशीघ्र वर्षा दें ताकि उन्हें भी बहता हुआ जल प्राप्त हो। उसी  के प्रतीक स्वरूप यह लहरिया साड़ी मानसून के आरम्भ में तथा तीज में पहनी जाती है।

अनुराधा – बहते जल की कितनी सुन्दर अभिव्यक्ति है यह लहरिया साड़ी। इसमें भगवान से प्रार्थना भी है कि वे उन्हें वर्षा से अनुग्रहीत करें।

नीरज – कल्पना कीजिये कि सहस्त्रों महिलायें एक साथ लहरिया साड़ियाँ पहन कर एक साथ खड़ी हैं। उन्हें देख आपको बहते हुए जल का आभास होगा। पुरुष भी तीज त्योहारों में लहरिया शैली के वस्त्रों से बने साफे धारण करते हैं।

जैसलमेर का गडीसर सरोवर - राजस्थान की जल संस्कृति
जैसलमेर का गडीसर सरोवर

जल से सम्बंधित दो प्रकार की नृत्य शैलियाँ हैं। पहला है, गुजरात का भवाई जिसमें स्त्रियाँ अपने सर पर कई मटके रखकर नृत्य करती हैं। दूसरा है राजस्थान का चारी नृत्य जिसमें स्त्रियाँ अपने सर पर एक घड़ा रख कर नृत्य करती हैं। भवाई का मटका टेराकोटा अथवा मिट्टी का होता है तो चारी का मटका ताम्बे या पीतल का होता है। स्थानीय भाषा में ताम्बे के घड़े को चारी कहते हैं। वे अपने नृत्य में घर से जल लेने के लिए जाने का दृश्य प्रस्तुत करती हैं। किन्तु एक सर पर अनेक घड़े क्यों? प्राचीन काल में समय की कमी तथा जल स्त्रोतों की दूरी के कारण स्त्रियाँ एक समय में ही कई घड़ों को अपने सर पर उठाती थीं। बिना जल छलकाए, कई मटके सर पर उठाकर घर तक पहुँचना कोई आसान कार्य नहीं है। जल से भरे मटकों को सर पर रखकर वे नीचे कंकड़ पत्थर नहीं देख सकती थीं। वह भी नंगे पैर। बिना नीचे देखे ही अपने पैरों से कंकड़-पत्थर का आभास लेते हुए, बिना जल छलकाए वे कैसे घर पहुँचती थीं, यह नृत्य उसी का चित्रण है। यह नृत्य अत्यंत मनमोहक व सुन्दर होता है।

अनुराधा –  मैंने कई सांस्कृतिक आयोजनों में यह नृत्य देखा है। किन्तु मैं नहीं जानती थी कि अपने नृत्य में वे जल ले जाने का दृश्य प्रस्तुत करती हैं।

नीरज – यह उनकी दिनचर्या से प्रेरित नृत्य है। इस क्षेत्र में पनिहारी संगीत भी लोकप्रिय है। पनिहारी का अर्थ है, वह स्त्री जो नदी आदि से जल भरने जा रही है। समुदाय की सभी स्त्रियाँ एकत्र होकर एक साथ जल भरने जाती हैं। मार्ग में वे आपस में चर्चा करते हुए अपने सुख-दुख बांटती हैं, हंसी-ठिठोली करती हैं। उनके पायल एवं कंगनों से निकलती मधुर ध्वनी वातावरण में संगीत का रस घोल देती हैं।

अनुराधा –  मैंने भी वह मधुर संगीत सुना है।

नीरज – अनेक संगीतज्ञों ने अनेक शैलियों में यह संगीत बजाया व गाया है। उनमें यह कथा बहुधा प्रस्तुत की जाती है। एक स्त्री सम्पूर्ण श्रृंगार कर घूंघट ओढ़कर जल लेने के लिए जा रही है। मार्ग में उसे एक घुड़सवार मिलता है जो प्यासा है। वह उसे जल पिलाती है। उस समय उसे यह ज्ञान नहीं होता है कि वह उसका मंगेतर है क्योंकि उसने अपने मंगेतर को इससे पूर्व कभी नहीं देखा था। घर पहुंचकर वह उसी युवक को अपने घर में बैठे देखती है। पनिहारी संगीत में यह कथा अवश्य प्रस्तुत की जाती है।

जल के अभाव में यहाँ बर्तन धोने की प्रक्रिया भी भिन्न होती थी। वे घर के बर्तन सूखी राख या बालू से धोते थे। यह प्रक्रिया वैज्ञानिक रूप से भी उत्तम है। राख में शुद्ध कार्बन होता है जिसकी सरंध्रता अत्यधिक होती है। जब राख को जूठे बर्तन पर फैलाया जाता है तो वो तेल, घी आदि को तुरंत सोख लेता है। तत्पश्चात बर्तनों को सूखे कपडे से पोंछ लिया जाता था। इसे जलबिन स्वच्छता कहते हैं।

ऐसा नहीं है कि अब चारकोल अथवा कार्बन का प्रयोग नहीं किया जाता। जल स्वच्छ करने वाले यंत्रों में, दन्त मंजन तथा चेहरे धोने वाले साबुन आदि में इसका प्रयोग किया जाता है।

जयपुर में जल धरोहर पदभ्रमण

अनुराधा –  हमें अपने धरोहर पदभ्रमण के विषय में भी बताएं जो आप जयपुर के दो महलों में करते हैं। इन पदभ्रमणों के कौन से विशेष बिंदु हैं?

नीरज – हम जयपुर में दो स्थानों पर धरोहर पदभ्रमण कराते हैं। एक है, नाहरगढ़ दुर्ग तथा दूसरा है, आमेर दुर्ग

जलेब चौक से आमेर दुर्ग का दृश्य
जलेब चौक से आमेर दुर्ग का दृश्य

२०२१ में मैं अमेरिका से जयपुर वापिस आ गया था। जयपुर में मैंने एक वर्षा जल अनुसन्धान कंपनी खोली जो संस्थागत स्तर जल प्रबंधन के क्षेत्र में कार्य करती है। मैं एक मरुस्थल निवासी हूँ। मेरी १६ पीढ़ियाँ मरुभूमि में ही जन्मी तथा समाप्त हो गयीं। जब मैंने नाहरगढ़ जल प्रणाली तथा आमेर जल प्रणाली को देखा, मैं अचंभित रह गया। वे पहाड़ी के शीर्ष पर जल एकत्र करते हैं। यह अत्यंत अनोखा है। मुझे ऐसा लगा कि इसके विषय में सबको जानकारी देना कितना आवश्यक है।

राजस्थान की जल संस्कृति – ना जल, ना संस्कृति, ना सभ्यता!

पर्यटन की दृष्टि से राजस्थान भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय गंतव्यों में से एक है। इसे क्या विशेष बनाता है? जल। यदि राजस्थान में जल ना होता तो संस्कृति नहीं होती, सभ्यता नहीं होती तथा राजस्थान ही नहीं होता। आमेर नाहरगढ़ की तुलना में अधिक प्राचीन है। जब जयपुर की रचना की जा रही थी तब इसे जयपुर के रक्षण के लिए बनाया गया था। जब सेना के लिए दुर्ग का निर्माण किया जाता है तो उसके भीतर सक्षम जल प्रणाली भी बनाई जाती है। सैनिक-दुर्ग में प्रतिदिन बाहर से जल नहीं लाया जा सकता। दुर्ग की भित्तियाँ उस राजा की गाथाएँ कहती हैं जिन्होंने इस अद्वितीय दुर्ग की संरचना की थी तथा एक सक्षम जल प्रणाली भी बनाई थी।

हमारा जल धरोहर पदभ्रमण दो घंटों का है। इस भ्रपदमण में हम ३०० प्राचीन जल स्त्रोतों का अवलोकन करते हैं। इस पदभ्रमण के तीन घटक हैं, राजस्थान की वास्तु धरोहर, तकनीकी धरोहर तथा सांस्कृतिक धरोहर। आमेर दुर्ग राजस्थान की अनमोल धरोहर है जिसे राजा मानसिंह ने बनवाया था। दुर्ग का वास्तु शिल्प व स्थापत्य तथा जल संचयन प्रणाली इसकी तकनीकी धरोहर हैं। यह दुर्ग राजस्थान की संस्कृति का द्योतक है, जल जिसका एक महत्वपूर्ण भाग है। इस पदभ्रमण का ध्येय है कि लोग यहाँ आयें, इन धरोहरों को जाने, समझे तथा उनका आनंद उठायें तथा राजस्थान के मूल तत्व से जुड़ें।

जल संस्कृति के विषय में पर्यटकों का मत

अनुराधा –  पर्यटकों को आमेर दुर्ग में सबसे अधिक क्या भाता है?

नीरज – पर्यटकों को सबसे अधिक क्या भाता है, यह बता पाना कठिन है। मैं लोगों की प्रतिक्रियाओं से अभिभूत हो गया हूँ। उन्हें कथाएं रुचिकर लगीं। जल प्रणाली ने उन्हें अत्यंत प्रभावित किया। उन्हें यह सत्य अचंभित कर देता है कि कैसे हम सब जल द्वारा एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।

अनुराधा –  क्या इन पदभ्रमणों के पश्चात आपने उनमें जल के प्रति कृतज्ञता का भाव देखा?

नीरज – अवश्य। भारत में लोग सामान्यतः जल के प्रति संवेदनशील हैं। किन्तु मैंने विदेशों से आये पर्यटकों में जल के प्रति अधिक संवेदनशीलता देखी है। उन्हें आमेर दुर्ग की सम्पूर्ण जल प्रणाली अचंभित कर देती है। वे जल संग्रहण एवं संरक्षण के साथ साथ, दुर्ग की जल प्रणाली के अन्य आयामों को जानने के लिए भी अत्यंत उत्सुक रहते हैं। आमेर दुर्ग एवं नाहरगढ़ दुर्ग की भिन्न आवश्यकताएं थीं। इसलिए उनकी जल प्रणाली भी भिन्न हैं। राजस्थान में इस प्रकार के अनेक दुर्ग हैं जो पहाड़ियों पर निर्मित हैं तथा सभी में इनके क्षेत्र के अनुसार जल प्रणालियाँ हैं।

जयपुर जल धरोहर का पदभ्रमण

अनुराधा –  इस संस्करण के पाठकों से मेरा कहना है कि यदि आप जयपुर की यात्रा कर रहे हैं, तो आप नीरज से अवश्य भेंट करें तथा जल धरोहर का पदभ्रमण करें। नीरज, भारत में कौन से अन्य जल-विशेष क्षेत्र हैं? मध्यप्रदेश का मांडू जल संरक्षण का अप्रतिम उदहारण है। मुंबई के कान्हेरी गुफाओं में भी उत्तम जल संरक्षण  प्रणाली है। पहाड़ियों पर निर्मित सभी दुर्गों में अप्रतिम जल प्रणालियाँ हैं क्योंकि सेना के लिए यह अत्यावश्यक है। क्या इनके अतिरिक्त भी ऐसे स्थान हैं जो विशेष रूप से जल को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं?

नीरज – दिल्ली एक ऐसी जल समृद्ध नगरी है।

अपने आसपास के जल धरोहरों को ढूँढें व जानें

अनुराधा –  मैं पणजी में रहती हूँ जो दो ओर से दो नदियों से तथा तीसरी ओर से अरब महासागर से घिरी हुई एक द्वीप नगरी है। इसके पश्चात भी इस नगरी का मूल धरोहर भूमिगत जल का स्तोत्र है। मूल नगरी पहाड़ी से आते हुए भूमिगत जल स्त्रोत के चारों ओर केन्द्रित थी। मैं आपसे सहमत हूँ कि हम सब जहां भी रह रहे हों, नगर, गाँव अथवा कस्बा, हमें अपने जल के धरोहरों को खोजना चाहिए। हमें भी उनके विषय में अवश्य बताएं।

नीरज – इस प्रकार की धरोहरों को खोजना तथा उनके विषय में सब को जानकारी देना, यह पर्यटन की दृष्टि से अत्यंत लाभकारी होगा। भारत में ऐसे अनेक धरोहर होंगे। यही कारण है कि राजस्थान सरकार ने मुझे ऐसे पदभ्रमणों का विकास करने के लिए आमंत्रित किया था। राजस्थान एक मरुभूमि होने के कारण उसकी जल संरक्षण प्रणाली अत्यंत विकसित थी। भारत के अन्य राज्यों में भी ऐसे हीरे अवश्य होंगे।

अनुराधा – जल के विषय में इतनी रोचक जानकारी देने के लिए आपका हृदयपूर्वक धन्यवाद।

IndiTales Internship Program के अंतर्गत नीरज दोशी के साथ चर्चा के ध्वनी संस्करण का पल्लवी ठाकुर ने प्रतिलेखन किया है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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जल शक्ति – जल संसाधनों के प्रति श्रद्धा को पुनर्जीवित करने का एक प्रयास https://inditales.com/hindi/jal-shakti-jal-sansdhan-satkaar/ https://inditales.com/hindi/jal-shakti-jal-sansdhan-satkaar/#comments Wed, 22 Jun 2022 02:30:09 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2717

हमारे पूर्वजों ने सदैव हमसे यही कहा है कि प्यासे को जल पिलाने से तत्काल पुण्य की प्राप्ति होती है। सम्पूर्ण भारत में हम कहीं भी जाएँ, हमें इस परंपरा का जीवंत उदहारण दृष्टिगोचर होगा। भारत के अनेक प्रदेशों में मार्गों के किनारे मिट्टी के घड़े में जल रखा जाता है जिसे कोई भी ग्रहण […]

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हमारे पूर्वजों ने सदैव हमसे यही कहा है कि प्यासे को जल पिलाने से तत्काल पुण्य की प्राप्ति होती है। सम्पूर्ण भारत में हम कहीं भी जाएँ, हमें इस परंपरा का जीवंत उदहारण दृष्टिगोचर होगा। भारत के अनेक प्रदेशों में मार्गों के किनारे मिट्टी के घड़े में जल रखा जाता है जिसे कोई भी ग्रहण कर सकता है। मध्य एवं उत्तर भारत में ग्रीष्म ऋतु में यह दृश्य अत्यंत सामान्य है। काल के साथ घड़ों का स्थान विद्युत् चालित शीत जल यंत्रों ने ले लिया है जो शीतल जल उपलब्ध कराते हैं। राजस्थान एवं मध्य प्रदेश में भरी दुपहरी की तपती धूप में भी आप सड़क के किनारे महिलाओं को बैठे देखेंगे जो प्रत्येक प्यासे जो जल शक्ति प्रदान करती हैं, अर्थात् जल पिलाती हैं। गर्मी बढ़ते ही मानव ही क्यों, हम पशु एवं पक्षियों के लिए भी बाहर जल रखते हैं।

चाँद बावड़ी - आभानेरी - राजस्थान
चाँद बावड़ी – आभानेरी – राजस्थान

शास्त्रों के अनुसार जल उन पंच तत्वों में से एक है जिनसे सृष्टि की रचना हुई है। अन्य चार हैं, पृथ्वी, आकाश, वायु एवं अग्नि। जल शक्ति अथवा जल प्रमुख पोषणकर्ता है जिसके अभाव में मानव समेत सभी जीवों का जीवन असंभव है। इसी कारण मानवों ने जब भी बस्ती बसाई, उन्होंने बसने के लिए पर्वतों से बहकर आती नदियों के तटीय  क्षेत्रों का ही चयन किया। नदी किनारे की उपजाऊ भूमि ने सदा उनका भरण-पोषण किया। इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि सभी की विविध आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए नदियों में भरपूर जल विद्यमान होता था। कालांतर में बढ़ती जनसँख्या एवं औद्योगीकरण के चलते मानवों ने नित-नवीन संसाधनों की खोज में नदियों से दूर बस्ती बसाना आरम्भ किया। जल की आपूर्ति हेतु अनेक विशाल सरोवरों की संरचना की ताकि जल संसाधन प्राप्त हो सके तथा भूमिगत जल की भी भरपाई भी हो सके। भोपाल, हैदराबाद तथा बंगलुरु ऐसे ही अनेक उत्तम उदाहरणों में से हैं जो अनेक मानवनिर्मित विशाल सरोवरों से संपन्न हैं।

जल शक्ति – जल संसाधनों के प्रति मानवी श्रद्धा को पुनर्जीवित करना

भारतीय परम्पराओं व संस्कारों में उन सभी तत्वों को देवता माना जाता है जो हमारा पोषण करते हैं। उनके प्रति श्रद्धा व सम्मान की भावना रखी जाती है। उन्ही पोषक तत्वों में एक है, जल। इन्ही परम्पराओं के अंतर्गत जल के प्रत्येक स्त्रोत की आराधना की जाती है तथा उसे जल शक्ति कहा जाता है। जल के ये प्राकृतिक स्त्रोत हैं, समुद्र, नदियाँ, जलाशय, कुँए, मानव निर्मित बावड़ियां तथा मंदिरों के जलकुंड इत्यादि। जल की आराधना वैदिक काल से चली आ रही है। ऋग्वेद में उपस्थित नदी स्तुति स्तोत्र में उन सभी नदियों का उल्लेख है जो भरत की भूमि का पोषण करती हैं। जैसे गंगा, यमुना, शताद्री (सतलज), सरसुती (सरस्वती), असिक्नी (चेनाब), परुष्णी (रावी), वितस्ता (झेलम) तथा अनेक अन्य नदियाँ जो अब लुप्त हो चुकी हैं। सभी प्रमुख नदियों की स्वयं की स्तुतियाँ हैं जो उनकी आराधना करते समय गाई जाती हैं।

दूधसागर जलप्रपात गोवा
दूधसागर जलप्रपात गोवा

किन्तु यह हमारा दुर्भाग्य है कि जल-संपन्न परंपरा द्वारा हमने जिन जल शक्तियों की आराधना की, आज उनका जल तीव्र गति से घट रहा है। नदी किनारे स्थित औद्योगिक इकाईयों द्वारा अनियंत्रित रूप से निस्सारण किये गए विषाक्त अवशेषों के कारण नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं। नगरों के अनियंत्रित निस्सारण भी उन्हें दूषित कर रहे हैं। ग्रीष्म ऋतु में यह समस्या अपनी चरम सीमा पर होती है. यह सत्य है कि पर्वतीय राज्य मेघालय के चेरापूंजी एवं मौसिनराम को धरती का सर्वाधिक नम स्थान माना जाता है क्योंकि यहाँ सर्वाधिक मात्रा में वर्षा होती है। किन्तु ग्रीष्म ऋतु में ऐसे स्थानों को भी जल का अभाव सहन करना पड़ता है।

अनियंत्रित उपयोग एवं दोषपूर्ण नीतियों के कारण सम्पूर्ण भारत में भूमिगत जल का स्तर शीघ्रता से घट रहा है। वहीं, घनी आबादी वाले नगरीय क्षेत्रों में उनका स्तर भयावह रूप से कम हो गया है। भूमिगत जल के संरक्षण एवं पुनःपूर्ति की ओर भी अब तक आवश्यक प्रयास नहीं किये गए थे। बंगलुरु जैसे महानगरों के विषय में यह अनुमान लगाया जा रहा है कि वह दिन दूर नहीं है, जब वे शीघ्र ही जल विहीन हो जायेंगे। PARI (People’s Archive of Rural India) के संस्थापक सम्पादक पी साईनाथ कहते हैं कि सन् १९५१ में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता ५१७७ घनमीटर थी जो अनवरत घटते हुए सन् २०११ में लगभग ३३०० घनमीटर हो गयी है। वे नदी के जल को छोटे जमींदार किसानों से उद्योगों एवं नगरी क्षेत्रों की ओर निर्देशित करना ही इसका प्रमुख कारण मानते हैं।

जल को वस्तु मानना – एक भारी चूक

जल संकट के अनेक मनोवैज्ञानिक कारण भी हैं। उनमें कुछ हैं, जल को वस्तु मानना तथा उससे हमारे संबंधों का विच्छेद होना। नगरी क्षेत्रों में जल की आपूर्ति नलों द्वारा की जाती है। यहाँ तक कि अधिकाँश ग्रामीण क्षेत्रों में भी अब नलकूप के साथ साथ नलों द्वारा जल की आपूर्ति की जाती है। इसका विपरीत प्रभाव हम पर यह पड़ा है कि ये जल कहाँ से आ रहा है, ना तो हम जानते हैं, ना ही जानने की चेष्टा करते हैं। मानवों एवं जल स्त्रोतों के मध्य किसी प्रकार का आध्यात्मिक सम्बन्ध अब शेष नहीं रह गया है। भारत वह राष्ट्र है जहां के पूर्वज अपने दिन का आरम्भ अपने आसपास के जल स्त्रोतों एवं दूर-सुदूर की नदियों की स्तुति से करते थे। विभिन्न जल स्त्रोतों के प्रति प्रत्येक भारतीय के हृदय में श्रद्धा व सम्मान का भाव विद्यमान रहता था। ‘गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती। नर्मदे सिन्धु कावेरी जले अस्मिन् सन्निधिम् कुरु॥’ जैसे मंत्रों द्वारा पवित्र नदियों का आह्वान करते हुए वे स्नान करते थे। वही राष्ट्र अब ऐसे दिवस का साक्षी है जहां जल को एक वस्तु माना जा रहा है। जल को क्रय कर पिया जा रहा है। जिस धरती के ऐसे संस्कार थे जहां प्यासे को जल पिलाना सर्वोत्तम पुण्य माना जाता था, अब उसी धरती पर विक्रेता पेयजल की विक्री करते हैं। उनकी स्वयं की धरती के गर्भ से जल खींच कर, बोतलों में भरकर ग्राहकों तक पहुँचाया जाता है। वह भी ऐसी प्लास्टिक की बोतलों में, जो कभी विघटित नहीं होती हैं तथा उसी धरती माँ को वर्षों प्रदूषित करती रहती हैं।

अब समय आ गया है कि हम जल के साथ हमारे सम्बन्ध को जाने व समझें। हम इस संबध की पुनः रचना करें, पुनर्स्थापना करें, उसे महत्त्व दें तथा पोषित करें। अपने पूर्वजों के मार्ग पर चलते हुए जल स्त्रोतों को सहेजें, उनकी आराधना करें तथा उनके प्रति कृतज्ञ होयें।

अभय मिश्रा, लेखक एवं शोधकर्ता (Riverine Culture Scholar) इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली, इस विचार का समर्थन करते हैं कि नलों द्वारा जल आपूर्ति ने हमें हमारे जल स्त्रोतों से पृथक कर दिया है। वही जल स्त्रोत, जिनका प्रबंधन एक काल में सामूहिक रूप से हमारा समाज ही करता था। वे हमारे परिवारिक एवं सामाजिक अनुष्ठानों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका का स्मरण कराते हैं। वे कहते हैं कि हमारा पोषण करने के लिए हमने इन जल स्त्रोतों का आभार मानना भी विस्मृत कर दिया है। वे सौरभ सिंह के प्रयासों की प्रशंसा करते हैं जो गाजीपुर में पेयजल की आपूर्ति के लिए कुओं को पुनर्जीवित करने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। वहां के भूमिगत जल में विषैले आर्सेनिक तत्वों की उपस्थिति जैसे गंभीर समस्याओं का निवारण करने में भी उनके प्रयास अत्यंत कारगर सिद्ध हो रहे हैं। यह समस्या खेतों में आवश्यकता से कहीं अधिक जलकूप खोदने के कारण उपस्थित हुई है। खेतों में छिड़के गए विषैले कीटनाशक इत्यादि जल स्त्रोतों को प्रदूषित कर देते हैं। वे हलमा का उदहारण देते हैं, जो आम समस्याओं के निवारण हेतु एक सामाजिक प्रयास है। इसका प्रबंधन मध्य भारत के झाबुआ में स्थित आदिवासी क्षेत्र की शिवगंगा समिति करती है।

जल शक्ति का संचयन

मध्य प्रदेश में झाबुआ जिले का भूमिगत जल स्तर अत्यंत निम्न स्तर पर पहुँच गया था। अतः जल सहेजने हेतु गांव वासियों ने हाथीपावा की पहाड़ी पर एक विशाल जन अभियान चलाया। सप्ताह में एक दिवस सैकड़ों की संख्या में गांव वासी हाथीपावा की पहाड़ी पर एकत्र होते हैं तथा सामूहिक श्रमदान करते हैं। इस प्रकार उन्होंने पहाड़ी पर ३०,००० खंदक खोदे हैं जिसमें वर्षा का जल एकत्र होता है, जो अन्यथा बह जाता था। प्रत्येक खंदक लगभग दो मीटर लम्बा, एक मीटर चौड़ा तथा आधा मीटर गहरा है। ये खंदक वर्षा के जल का संचय करते हैं तथा उन्हें सही दिशा देते हैं जिससे इस क्षेत्र की जल उपलब्धता में बढ़ोतरी हो सके तथा जैव विविधता एवं पर्यावरण में सुधार हो सके। यह विशाल कार्य न्यूनतम लागत में सामूहिक प्रयास द्वारा संभव हो पाया है। इसी प्रकार के क्रियाकलाप देश के अन्य भागों में भी लघु स्तर पर किये जा रहे हैं। आशा है, शीघ्र ही इस प्रकार की जल स्त्रोत पुनरुद्धार गतिविधियाँ देश के सभी क्षेत्रों में विशाल स्तर पर किये जायेंगे। इसके द्वारा जल प्रबंधन एवं जल उपभोग के मध्य अतिआवश्यक संतुलन पुनः प्राप्त किया जा सके। इन प्रयासों को सफल बनाने के लिए यह आवश्यक है कि हम अपने पुरातनकाल में झाँक कर भारत के जल धरोहर को जानें व समझें।

जल प्रधान भारत

भारत एक जल प्रधान देश है। भारत को ना केवल तीन महासागरों एवं ७५१७ किलोमीटर लम्बे समुद्रतट का वरदान है, अपितु इसके सम्पूर्ण परिदृश्य पर नदियों का जाल बिछा हुआ है जो भिन्न भिन्न पर्वतों से निकल कर मैदानी क्षेत्रों का पोषण करते हुए अंततः समुद्र में समा जाती हैं। ये नदियाँ देश की शिराएँ हैं जो जल रूपी पोषक तत्व को देश के विभिन्न भागों में पहुँचाती हैं। सैकड़ों जलप्रपातों की जलधाराएं विभिन्न शैलप्रदेशों से होते हुए इन नदियों में आ कर समा जाती हैं। भारत की जल धरोहरों का उल्लेख पुराणों में भी किया गया है। पौराणिक काल से भारत को सात नदियों का प्रदेश कहा जाता है। प्रत्येक प्रमुख हिन्दू धार्मिक अनुष्ठानों से पूर्व इन सातों नदियों का आह्वान किया जाता है। विस्तृत स्तर पर देखा जाए तो भारत के प्रत्येक क्षेत्र में इतनी संख्या में नदियाँ तथा नदी-घाटी सभ्यताएँ हैं कि भारत को ‘सैकड़ों नदियों की भूमि’ कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी।

भारतीय नदियाँ – हमारी जल शक्ति

वाराणसी में गंगा
वाराणसी में गंगा

नदियाँ हमारी जीवनदायिनी हैं। प्रकृति का अभिन्न अंग हैं। वे हमारी जल शक्ति हैं। सम्पूर्ण विश्व में नदियों को सभ्यता का पालना कहा जाता है। इन नदियों से ही मानव का विकास जुड़ा हुआ है। हमारी अधिकतम आवश्यकताएं भी इन्हीं नदियों से पूर्ण होती हैं। अतः विश्व व भारत के अधिकतर नगर इन नदियों के किनारे ही बसे हैं। भारत के प्रत्येक नदी के तट पर प्रसिद्ध नगर तथा तीर्थस्थल बसे हुए हैं। इनमें से कुछ प्रसिद्ध स्थल हैं, यमुना नदी के तट पर मथुरा, क्षिप्रा नदी के तट पर उज्जैन, गोमती नदी के तट पर द्वारका, गंगा, यमुना व सरस्वती के संगम पर प्रयागराज, तुंगभद्र नदी के तट पर हम्पी, गोदावरी नदी के तट पर नासिक, सरयू नदी के तट पर अयोध्या, मन्दाकिनी नदी के निकट केदारनाथ, अलखनंदा नदी के निकट बद्रीनाथ इत्यादि। हिमालय से उतर कर मैदानी क्षेत्रों में प्रवेश करती गंगा के किनारे हरिद्वार एवं काशी बसे हुए हैं। कावेरी नदी दक्षिण भारत के कुर्ग अथवा कोडगु के पर्वतों से प्रस्फुटित होती है। तत्पश्चात कर्णाटक एवं तमिलनाडु का पोषण करती हुई पूर्व की ओर बहती है तथा बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है।

ब्रह्मपुत्र उस स्थान से निकलती है जहाँ कभी ब्रह्मा के पुत्र थे, जो इसे एक नद बनता है। पुराणों के अनुसार नदियाँ देवी का स्वरुप हैं जो की धरती पर द्रव्य रूप में रहती हैं। इन्द्रलोक की सुप्रसिद्ध सुंदरियाँ भी जल से अवतरित होती है इसि लिए उन्हें अप्सरा कहा जाता है, अप यानि जल।

वर्षा – जल शक्ति का स्त्रोत

पुरातन काल से जल के प्रति भारतीयों की श्रद्धा केवल नदियों, जलाशयों तथा सागरों के प्रति ही नहीं है, अपितु धरती को अपने प्रेम से सराबोर करती वर्षा की एक एक बूँद तक जाती है। ग्रीष्म ऋतु की चरम सीमा तक पहुँचते पहुँचते धरतीवासी आकाश की ओर आस से ताकना आरम्भ कर देते हैं कि कब आकाश में मेघ छाएंगे तथा वर्षा का सन्देश लायेंगे। कृषि प्रधान विकासशील राष्ट्र होने के कारण भारत की अर्थव्यवस्था का चक्र वर्षा पर निर्भर करता है। अतः चातुर्मास के चार मास में यदि भरपूर वर्षा हो जाए तो भारतीयों के लिए, विशेष रूप से किसानों के लिए इससे प्रसन्नता का विषय अन्य नहीं हो सकता है।

लदाख में आधी जमी हुई जांसकर नदी
लदाख में आधी जमी हुई जांसकर नदी

मानसून के लिए संस्कृत भाषा में शव्द है, वर्षा। मानसून मूलतः हिन्द महासागर एवं अरब सागर की ओर से भारत के दक्षिण-पश्चिम तट पर आने वाली वायु को कहते हैं जो भारत में अधिकाँश वर्षा के लिए उत्तरदायी होती हैं। ये मौसमी वायु है जो दक्षिण एशिया क्षेत्र में जून से सितम्बर तक प्रायः चार मास तक सक्रिय रहती है। मानसून का व्यापक अर्थ है, ऐसी वायु जो किसी क्षेत्र में किसी ऋतु विशेष में ही अधिकाँश वर्षा कराती है।  भारत के छः ऋतुकाल में से एक काल वर्षाकाल है। मानसून की वायु जून मास में भारत के दक्षिण-पश्चिम तट से प्रवेश कर ऊपरी दिशा की ओर अग्रसर होती है।

राजस्थान एवं लद्धाख जैसे उष्ण एवं शीत मरुभूमि को क्वचित ही वर्षा के दर्शन होते हैं। वहीं तटीय क्षेत्रों में सामान्यतः ३००० मिलीमीटर प्रतिवर्ष तक वर्षा हो जाती है। भारत के आर्द्रतम स्थल मौसिंराम में औसतन १४००० मिलीमीटर प्रतिवर्ष तक वर्षा हो जाती है। मानसून में गाये जाने वाले ‘कजरी’ जैसे लोकगीत वर्षा के प्रति आस्था एवं कृतज्ञता की भावनाओं से ओतप्रोत होते हैं। कालीदास ने अपने काव्य संग्रह ऋतुसंहारम् में मानसून को ललक एवं तृष्णा का मौसम वर्णित किया है।

वर्षा-जल का संग्रहण व संरक्षण

अनुपम मिश्रा वर्षा-जल संग्रहण एवं संरक्षण के अग्रणी अन्वेषकों में से एक हैं। अनेक पारंपरिक जल संरक्षक तकनीकों के पुनरुद्धार का श्रेय उन्हें दिया जाता है। उनकी प्रतिलिप्याधिकार-मुक्त पुस्तक ‘Ponds are still relevant’ में वे भारत के विभिन्न क्षेत्रों के जल स्त्रोतों के पारिस्थितिकी तंत्र के विषय में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं। वे बताते हैं कि किस प्रकार प्राचीनकाल से भारतवासियों ने उपयुक्त समय व स्थान पर सरोवरों का निर्माण किया तथा समाज के सभी वर्गों के सहयोग से किस प्रकार उन्होंने वर्षानुवर्ष उनका रखरखाव किया। जैसलमेर जैसे अल्प वर्षा वाले मरु नगरों में प्रत्येक घर की छत को जल संचयन प्रणाली से जोड़ा गया तथा प्रत्येक कुँए में जल संचय किया गया, जबकि वहां ५२ अप्रतिम जलाशय हैं। प्राचीनकाल से वर्षा-जल के संचयन हेतु किये गए अनेक प्रयासों के कुछ उदहारण हैं,

बावड़ियां

सम्पूर्ण भारत में अनेक अप्रतिम प्राचीन बावड़ियां हैं जो वर्षा-जल का संचयन करने में अग्रणी है। उनमें से अधिकतर बावड़ियां राजस्थान एवं गुजरात जैसे उत्तर-पश्चिमी सूखे राज्यों में स्थित हैं। वे एक प्रकार से मानव-निर्मित मरूद्यान हैं। उनका उद्देश्य ना केवल जल संचयन है अपितु वे ऐसे सामाजिक स्थलों का कार्य करते हैं जहां जल के समीप बैठकर लोग आनंद लेते हुए वार्तालाप करते हैं। ये बावड़ियां एक प्रकार से भगवान विष्णु को समर्पित मंदिर का प्रतीक होती हैं जिन्हें क्षीरसागर के जल में विश्राम करना प्रिय है।

रानी की वाव
रानी की वाव

११वीं सदी में निर्मित रानी की वाव की संरचना सोलंकी वंश की रानी उदयमती ने करवाया था। यह भूमि से नीचे की ओर जाती हुई सात तलों की संरचना है। इसके चारों ओर अलंकृत भित्तियाँ एवं चबूतरे हैं। जब आप ऊपर से इसे देखेंगे तो यह भूमि में खोदे गए एक विशाल कुँए जैसा प्रतीत होती है। यह देख आपको अत्यंत आश्चर्य होगा कि इतने वर्षों के पश्चात भी इसकी भित्तियाँ अखंडित खड़ी हैं। इसके मंडप को केवल २९२ स्तम्भ ही आधार प्रदान कर रहे हैं। इस विशालकाय बावड़ी के भीतर प्रवेश करने पर इसका भव्यतम रूप शनैः शनैः प्रकट होने लगता है। नीचे १० मीटर व्यास का एक कुआं है जो लगभग ३०० मीटर गहरा है तथा समीप स्थित सरस्वती नदी से भूमिगत रूप से जुड़ा हुआ है। आप सोच रहे होंगे कि रानी द्वारा अपने दिवंगत पति की स्मृति में इस बावडी की संरचना हेतु क्या प्रेरणा रही होगी? इसका उत्तर है, पुण्य। अपनी प्रजा के लिए प्रचुर मात्रा में जल उपलब्धि सुनिश्चित करने से अधिक पुण्य क्या हो सकता है?

जयपुर के आभानेरी में चाँद-बावडी है जो अपनी समरूपता के लिए प्रसिद्ध है। इसे सर्वाधिक छायाचित्र अनुकूल बावड़ियों में से एक माना जाता है। इसमें ३५०० से भी अधिक तालबद्ध ज्यामितीय तिरछी सीढ़ियाँ हैं जो यह सुनिश्चित करती हैं कि आप किसी भी समय अथवा ऋतु में बावड़ी के जल तक पहुँच सकते हैं।

बाढ़ जल प्रबंधन

प्रयागराज के निकट श्रिंगवेरपुर में जलकुण्डों को जोड़ती एक प्राचीन विस्तृत संरचना है जो वर्षा ऋतु में बाढ़ की स्थिति में गंगा के जल को एकत्र करती थी तथा अतिरिक्त जल को पुनः गंगा में प्रवाहित करती थी। ये जलकुंड ना केवल जल एकत्र करते थे, अपितु अवसादन प्रक्रिया द्वारा जल का शुद्धिकरण भी करते थे। अंतिम जलकुंड में सर्वाधिक शुद्ध जल एकत्र होता था।

ढोलावीरा जैसे पुरातात्विक स्थलों में विस्तृत जल प्रबंधन प्रणालियाँ दृष्टिगोचर होते हैं। उनका सम्बन्ध ८वीं शताब्दी की सिन्धु सरस्वती नदी घाटी सभ्यता से लगाया जाता है। मुंबई नगर के बीचोबीच कान्हेरी जैसे २००० वर्ष प्राचीन बौद्ध गुफाएं भी प्राचीनकालीन उत्तम जल प्रबंधन का साक्ष्य देती  हैं। आप उन उत्खनित गुफाओं में चारों ओर जल नलिकाएं देख सकते हैं। नियमित अंतराल पर परस्पर जुड़े हुए जलकुंड हैं। चट्टानों के प्राकृतिक ढलान का उपयोग करते हुए गुफाओं की छतों पर गिरते जल को एकत्र किया जाता था। चार मास में एकत्रित मानसून जल बौद्ध भिक्षुओं के वर्ष भर की जल आवश्यकताओं की पूर्ती करने में सक्षम होता था।

गाँव के जलाशय

भारत के पूर्वी राज्य ओडिशा में जब आप किसी ग्रामीण भाग की ओर वाहन चलाते हैं, तब विशाल जलाशयों की पंक्ति को देखते ही आप समझ सकते हैं कि आप गाँव के समीप पहुँच रहे हैं। बहुधा इन जलाशयों के मध्य अथवा तट पर छोटे सुन्दर मंदिर हैं। उसी प्रकार भारत के अनेक राज्यों में जलाशयों की उपस्थिति दृष्टिगोचर होती है। अधिकतर जलाशय कमल पुष्पों से भरे होते हैं जिनके चौड़े पत्ते जल सतह को ढँक लेते हैं ताकि जल वाष्पीकरण निम्नतम हो।

मंदिर के जलकुंड

मुंबई का प्राचीन बाणगंगा कुंड
मुंबई का प्राचीन बाणगंगा कुंड

प्राचीन भारत के सभी मंदिर परिसरों में कम से कम एक जलकुंड अवश्य होता था। स्कन्द पुराण का अयोध्या महात्मय अयोध्या नगरी का मानचित्र प्रदर्शित करता है जिसमें चिरकालीन सरयू नदी के तट पर बसे होने के पश्चात भी उसमें परस्पर जुड़े हुए अनेक जलकुंड थे। दक्षिण भारत की प्राचीन मंदिर नगरी कांचीपुरम जलकुण्डों से भरा हुआ है जिनमें कुछ मंदिर परिसर के भीतर तथा कुछ बाह्यस्थल पर स्थित हैं। नगरी के मधोमध सर्व तीर्थं कुलम् है जो एक विशाल जलकुंड है। इसके तीन ओर मंदिर हैं। आप कल्पना कर सकते हैं कि प्राचीनकाल में ऐसे संपन्न स्थल पर स्थानिक एवं तीर्थयात्री परस्पर भेंट करते हुए अपने विचारों व अनुभवों का आदान-प्रदान करते रहे होंगे।

तमिलनाडु के मंदिरों के जलकुण्डों का नवीनीकरण आशा की किरण दिखाता है। वहां के भूमिगत जल संचय के स्तर में उन्नति इसका त्वरित प्रभाव दर्शाता है। यदि इन जलकुण्डों में जल प्रवेश एवं निकास द्वारों को सुनियंत्रित किया जाए तो वर्षा-जल का पर्याप्त मात्रा में भूमि में रिसना सुनिश्चित हो सकता है।

जल संरक्षण – जल शक्ति के प्रति श्रद्धा

मांडू का जल महल
मांडू का जल महल

जल संरक्षण का सर्वोत्तम उदहारण मध्य प्रदेश के मांडू में दृष्टिगोचर होता है। मध्यप्रदेश के एक ऊंचे सपाट पठार पर स्थित मांडू एक प्राचीन नगरी है जो प्राचीन काल में जल के लिए केवल वर्षा पर निर्भर था। इसके शीर्ष से धुंधली सी दृष्टिगोचर नर्मदा नदी, निकटतम नदी है किन्तु वह यहाँ से लगभग ४० मील दूर स्थित है। प्राचीनकाल में यह नगरी विश्व की सर्वाधिक सघन आबादी वाले क्षेत्रों में से एक थी। इसके पश्चात भी ऐसा माना जाता है कि मांडू में कभी भी जल का अभाव नहीं था। जब आप मांडू में विचरण करेंगे तो आप पायेंगे कि सम्पूर्ण मांडू क्षेत्र में अनेक सरोवर हैं जो वर्षा के जल का संचयन करते हैं। सभी राजसी भवनों की संरचनाएं गहरे कुओं के चारों ओर की गयी हैं जो वर्षा की प्रत्येक बूँद को संचित करते हैं। आपको इन महलों की छतों पर भव्य तरणताल दृष्टिगोचर होंगे। यहाँ के एक महल का नाम ही जलमहल है। इसके दोनों ओर विशाल सरोवर हैं जिनके मध्य यह महल ऐसा प्रतीत होता है मानो जल सतह पर कोई विशाल नौका अथवा जहाज तैर रहा हो। सम्पूर्ण मांडू नगरी जल संचयन व जल संरक्षण के ध्येय पर निर्मित की गयी है।

जल शक्ति की आराधना

ओम्कारेश्वर में नर्मदा तट
ओम्कारेश्वर में नर्मदा तट

भारत में सभी तीर्थयात्राओं का समापन वहां स्थित पवित्र जल में स्नान के पश्चात ही होता है। क्या काशी की तीर्थयात्रा गंगा के जल में डुबकी लगाने से पूर्व सम्पूर्ण हो सकता है? काशी की प्रसिद्ध पंचक्रोशी यात्रा का शुभारम्भ एवं समापन दोनों ही मणिकर्णिका घाट से व मणिकर्णिका घाट तक गंगा में नौकायन द्वारा ही होता है। भारत की प्राचीनतम नदी, नर्मदा की आराधना का सर्वोत्तम साधन नर्मदा परिक्रमा है। तीर्थयात्री पैदल चलते हुए नर्मदा की परिक्रमा करते हैं। प्रत्येक प्रातः नर्मदा के जल में स्नान करते हैं। इस परिक्रमा की २६०० किलोमीटर से भी अधिक दूरी पार करने के लिए महीनों, कभी कभी वर्षों व्यतीत हो जाते हैं। वे मंदिरों एवं आश्रमों में रात्रि व्यतीत करते हैं। जो उन्हें भाग्य से प्राप्त हो जाए वही भोजन करते हैं।

कुम्भ मेला

अब हम पहुंचते हैं, जल शक्ति के सर्वाधिक विशाल पर्व, कुम्भ मेले में। कुम्भ मेला भारत के चार स्थानों पर प्रत्येक १२ वर्षों में एक बार आयोजित किया जाता है। इस पर्व में उन स्थानों के पावन जल में कुम्भ स्नान किया जाता है। जैसे, प्रयाग में गंगा, यमुना व सरस्वती नदियों का संगम, हरिद्वार में गंगा नदी, उज्जैन में क्षिप्रा नदी तथा नासिक में गोदावरी नदी। हिन्दुओं का जल से सम्बंधित यह विशालतम पर्व होता है। भारत भर से, यहाँ तक कि विदेशों से भी, लाखों की संख्या में तीर्थयात्री ग्रहों की विशेष युति में इन स्थानों पर जाते हैं तथा जल में पावन स्नान करते हैं। यद्यपि कुम्भ में आप सत्संग, संतों से संवाद, ज्ञानवर्धक चर्चाओं जैसी अनेक गतिविधियाँ कर सकते हैं, तथापि कुम्भ मेले की सर्वोपरि आवश्यकता है कि आप नदी के दर्शन करें, उसके प्रति कृतज्ञता दर्शाये, उसकी आराधना करें, जितना हो सके उसके पावित्र्य व अस्तित्व को चिरायु रखने का प्रण करें। उसके पावन जल में स्नान करें।

गंगा यमुना के संगम में डुबकी लगाते श्रद्धालु
गंगा यमुना के संगम में डुबकी लगाते श्रद्धालु

यद्यपि प्रत्येक स्थान पर कुम्भ मेला १२ वर्षों में एक बार आयोजित होता है तथापि पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में कुछ विशेष तिथियाँ होती हैं जिन्हें पावन नदियों में स्नान के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। जैसे जनवरी में आने वाला माघ मास तथा कार्तिक मास की पूर्णिमा जो दीपावली पर्व के १५ दिवसों पश्चात पड़ती है। सूर्य ग्रहण जैसे कुछ विशेष अवसरों पर भी विशेष स्नान किये जाते हैं जिनमें श्रद्धालु उपरोक्त नदियों के अतिरिक्त कुरुक्षेत्र की भी यात्रा करते हैं तथा वहां के जल में पावन स्नान करते हैं। आवश्यक यह है कि आप अपने निकटतम किसी भी पवित्र जल में स्नान करें।

चार धाम यात्रा

भारतवर्ष के चार प्रमुख दिशाओं में चार पावन धाम हैं जिनके स्वयं के विशेष उद्देश्य हैं। देवता उत्तर दिशा में हिमालय की गोद में स्थित बद्रीनाथ में ध्यान करते हैं, पूर्व में स्थित पुरी के अन्न क्षेत्र में भोजन करते हैं, पश्चिम में स्थित द्वारका में निद्रामग्न होते हैं तथा दक्षिण में स्थित रामेश्वरम में स्नान करते हैं। आप रामेश्वरम मंदिर परिसर के भीतर २२ कुँए देख सकते हैं। श्रद्धालु काशी से गंगाजल लाकर इस मंदिर में शिवलिंग का अभिषेक करते हैं, तत्पश्चात कुँए के जल से स्नान करते हैं।

ऐसी मान्यता है कि इन चिरस्थायी कुओं के जल से स्नान करने से उनके सभी पापों का नाश हो जाता है। प्रत्येक कुँए का एक नाम है तथा उनसे सम्बंधित पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं। उन कथाओं में उन ऋषि-मुनियों व राजाओं का उल्लेख है जिन्होंने इन कुओं के जल से स्नान किया था तथा उन पापों का भी उल्लेख है जिनसे उन्हें मुक्ति प्राप्त हुई थी। जैसे, कोडी तीर्थम में स्नान के पश्चात श्री कृष्ण को कंस वध के पाप से मुक्ति प्राप्त हुई थी। चक्र तीर्थ में स्नान के उपरांत सूर्य को स्वर्णिम आभा प्राप्त हुई थी।

दान का महत्त्व

राजस्थान में पीने के पानी का दान
राजस्थान में पीने के पानी का दान

भारत में प्यासे को जल का दान करना सर्वोच्च दानों में से एक माना जाता है। इसके कारण भारत सदा से जल का निर्यातक बना रहा है। जी नहीं, इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि भारत जल की विक्री करता है। अपितु इसके प्रमुख निर्यातित वे वस्तुएं हैं जिसके उत्पादन में प्रचुर मात्रा में जल का निवेश होता है। कुछ प्रमुख निर्यातित फसलें हैं, चावल, कपास तथा गन्ना। इन सभी फसलों में प्रचुर मात्रा में जल का प्रयोग होता है। इसके अतिरिक्त भारत बड़ी मात्रा में मांस का भी निर्यातक है। इसका यह अर्थ है कि भारत अपने निर्यातक देशों की जल आवश्यकताओं के भार को एक प्रकार से अपने कंधे पर उठा रहा है। स्वयं भारत में जल के अभाव को दृष्टी में रखते हुए क्या उसे यह भार उठाना चाहिये अथवा नहीं, यह एक भिन्न चर्चा का विषय है।

भारत सरकार ने सन् २०१९ में जल शक्ति मंत्रालय का गठन किया था। यह मंत्रालय जल को एक प्रमुख संसाधन के रूप में देखता है। नदियों को पुनर्जीवित करना इसका प्रमुख कार्य है। इसके कार्यक्षेत्र में गंगा जैसी अनेक प्रदूषित नदियों का शुद्धिकरण एवं भारत के सभी नागरिकों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध करना सम्मिलित हैं। आशा है सरकार का यह प्रयास भारत को एक दिवस पुनः जल संपन्न राष्ट्र बनाने में सहायक सिद्ध होगा। इसके साथ ही वह परंपरा भी पुनः जीवित हो सकेगी जिसके अंतर्गत जल को धार्मिक अनुष्ठानों के साथ दैनन्दिनी जीवन में भी अत्यंत पावन स्थान प्राप्त हो सकेगा।

अनुराधा गोयल द्वारा लिखित यह संस्करण सर्वप्रथम Hinduism Today में प्रकाशित किया गया है।

इस लिखित संस्करण को प्रकाशन से पूर्व सम्पादित किया गया है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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विंध्य पर्वत श्रंखला के एक पहाड़ी क्षेत्र पर, लगभग २००० फीट की ऊंचाई पर विराजमान मांडू एक प्राचीन दर्शनीय धरोहर है। उत्तर में मालवा पठार तथा दक्षिण में नर्मदा की घाटियों से घिरी इस नगरी में कोई भी प्राकृतिक जल स्त्रोत नहीं है। नर्मदा नदी भी मांडू से दूर होने के कारण इसका पालन पोषण […]

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विंध्य पर्वत श्रंखला के एक पहाड़ी क्षेत्र पर, लगभग २००० फीट की ऊंचाई पर विराजमान मांडू एक प्राचीन दर्शनीय धरोहर है। उत्तर में मालवा पठार तथा दक्षिण में नर्मदा की घाटियों से घिरी इस नगरी में कोई भी प्राकृतिक जल स्त्रोत नहीं है। नर्मदा नदी भी मांडू से दूर होने के कारण इसका पालन पोषण करने में असमर्थ है। नर्मदा के जल को २००० फीट की ऊंचाई तक खींचना आसान नहीं है। किसी भी प्रकार के मोटर-चालित प्रणालियों के अभाव में तो यह लगभग असंभव है। अर्थात् पहाड़ी के ऊपर भूजल प्राप्त होना संभव नहीं है।

मांडू की जल प्रबंधन प्रणालीतो हज़ारों वर्षों से लोग इस पहाड़ी पर जीवन-यापन कैसे कर रहे थे? जी हाँ, मांडू में अद्भुत जल प्रबंधन प्रणाली उपलब्ध थी, जिसके द्वारा यहाँ के निवासियों को जल आपूर्ति की जाती थी। इस प्रणाली के अवशेष किसी ना किसी रूप में अब भी दिखाई पड़ते हैं। इन्हें देख आप आश्चर्यचकित हुए बिना नहीं रह पायेंगे।

चूंकि मांडू में वर्षा ही एकमात्र जलस्त्रोत था, अतः जल प्रबंधन मांडू की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता थी। पहाड़ी पर गिरते वर्षा के जल की प्रत्येक बूँद को कुशलता से संचित कर मांडू के नागरिकों ने अपनी सूझबूझ का परिचय दिया है। वर्षा के जल का इतनी सुन्दरता से संचन किया है कि इस पर विश्वास करने के लिए इसका अवलोकन आवश्यक हो जाता है। इनमें से कई ठेठ व्यवहारिक प्रणालियाँ हैं। किन्तु यह तो आप भी मानेंगे कि, आज के युग में कई बार सामान्य व्यवहारिकता की अपेक्षा भी नहीं की जा सकती, ऐसा कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी।

जल प्रबंधन, संचयन एवं संरक्षण – मांडू के प्रमुख आकर्षण

मांडू की जल प्रबंधन प्रणाली के अंतर्गत विभिन्न मापों व आकृतियों के लगभग १२०० जलाशयों का समावेश है। इनमें से कई अब भी अखंड हैं। यदि आप बरसात के मौसम में मांडू आयेंगे तो इनमें से कई जलाशय आपको जल से परिपूर्ण दिखायी देंगे। प्रत्येक जलाशय का अपना विशेष आकर्षण है। आईये आपको मांडू के कुछ महत्वपूर्ण एवं अत्यंत आकर्षक जल स्त्रोतों के दर्शन कराती हूँ।

मांडू किले के राजवाड़े में स्थित जलाशय व बावड़ियां

जहाज महल

मांडू का जहाज महल
मांडू का जहाज महल

यह एक लंबा सा महल है जो दो मानव निर्मित जलाशयों द्वारा दोनों ओर से घिरा हुआ है। इसके नामकरण के पीछे दो कारण हैं। एक यह कि इसकी परछाई एक जहाज के सामान प्रतीत होती है। दूसरा एवं अधिक प्रासंगिक कारण यह है कि जब दोनों जलाशय पानी से लाबालब भर जाते हैं तब यह महल किसी सागर में तैरते जहाज की भान्ति प्रतीत होता है। कुल मिलाकर इसके नाम में भी मांडू के जल प्रबंधन की झलक मिलती है।

मांडू के राजवाड़े में भ्रमण करते समय पग पग पर आपको जल स्त्रोत के दर्शन होंगे जो सौंदर्य की दृष्टी से इस महल के प्रारूप के कलात्मक अंग है।

मुंज ताल एवं कपूर ताल

जहाज महल के प्रांगण में आप जैसे ही प्रवेश करेंगे, अपने बांयी ओर जहाज महल देखेंगे। महल के पृष्ठ भाग पर मुंज ताल तथा दाहिने ओर कपूर ताल है जिसे कई सरिताएं पोषित करती हैं।

मांडू का कपूर ताल
मांडू का कपूर ताल

कपूर ताल के एक ओर इसमें प्रवेश करता एक मंडप बना हुआ है जिसके भीतर चलते हुए ऐसा प्रतीत होता है मानो हमने ताल के भीतर प्रवेश कर लिया हो। इसके विपरीत मुंज ताल के मध्य एक जल महल बनाया गया है। इसके एक ओर एक स्विमिंग पूल अर्थात् तरण ताल भी है। मुंज ताल का निर्माण राजा मुंजदेव ने करवाया था। यह दोनों तालों में अधिक बड़ा एवं अधिक प्राचीन है। यह एक ओर से खुला हुआ है तथा एक ओर यह जहाज महल के चरण स्पर्श करता है। वहीं कपूर ताल के चारों ओर तटबंध बने हुए हैं जो इसे एक बंद झील बनाते हैं।

कूर्म आकृति में बना तरन ताल - जहाज महल मांडू
कूर्म आकृति में बना तरन ताल – जहाज महल मांडू

जहाज महल में दो अनोखे तरण ताल हैं जिनमें एक की आकृति कुर्म अथवा कछुए की है तथा दूसरा पुष्प के आकार का है। दो भिन्न स्तरों में निर्मित ये ताल अप्रतिम कलाकृति एवं जल की व्यवहारिक आवश्यकता का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है। मुझे अचंभा होता है कि उस काल में भी जल का इतनी सफलतापूर्वक संचयन एवं प्रबंधन किया जाता था कि मांडू जैसे वर्षा पर निर्भर स्थान पर भी तरण ताल जैसे जल-विलास साधनों का आसानी से उपभोग किया जाता था।

जल को छानने और गति नियंत्रण की अद्भुद प्रणाली - जहाज महल मांडू
जल को छानने और गति नियंत्रण की अद्भुद प्रणाली – जहाज महल मांडू

ऊपरी स्तर पर बने तरण ताल का मैं यहाँ विशेष उल्लेख करना चाहती हूँ। इस ताल की ओर जाती जल सरिताएं वर्तुलाकार नलिकाओं से बहती हैं। इन नलिकाओं की कलाकृति देखते ही बनती है। हमारे परिदर्शक ने हमें बताया कि इन नलिकाओं में रेत भरी जाती थी जिनके द्वारा जल छनता था एवं स्वच्छ जल ताल में भरता था। कुछ सूत्रों के अनुसार ये नलिकाएं जल के प्रवाह की गति धीमी करती हैं। कारण कुछ भी हो, आशा है आधुनिक वास्तुविद इनकी कलात्मकता को आत्मसात करें एवं आज के परिवेश में इनका समावेश करने का प्रयत्न करें।

चंपा बावड़ी

मांडू की चंपा बावड़ी
मांडू की चंपा बावड़ी

यह एक अत्यंत अनोखी बावड़ी है। यूँ तो यह किसी भी अन्य बावड़ी के सामान एक बड़ा कुआं है जिस में वर्षा का जल भरता है। किन्तु इसकी संरचना अत्यंत कलात्मक है। चम्पा बावड़ी की आतंरिक संरचना चौकोर है तथा बाहर से यह गोलाकार है जिस पर आले बने हुए हैं। इसकी संरचना की विशेषता है इस गोलाकार कुँए के चारों ओर निर्मित बहुमंजिली आवास कक्ष। आप विश्वास नहीं करेंगे, इस कुँए के चारों ओर महल के आवासीय कक्षों की चार मंजिलें निर्मित हैं। इसकी सर्वाधिक ऊपरी मंजिल लगभग मुंज ताल के स्तर तक आती है।

इन्ही बावड़ियों के जल के कारण ये इमारतें शीतलता प्रदान करते हैं। लम्बे गलियारे हवा बहने में सहायता करते हैं। जल संचयन की यह एक अनुपम पद्धति है जो जल उपलब्ध कराने के साथ साथ पर्यावरण के अनुकूल वातानुकूलन प्रदान करता है।

चंपा, यह नाम इस बावडी को चंपा पुष्प के वृक्षों द्वारा प्राप्त हुआ है जो किसी काल में इस बावडी के चारों ओर उगाये गए थे। आप सब भी कल्पना जगत में खो गए होंगे, अतिसुन्दर संरचना, चौड़े गलियारे एवं उनमें बहती चंपा द्वारा सुगन्धित शीतल वायु!

प्राचीन हिन्दू बावड़ी

जहाज महल के ठीक समक्ष एक गहरी एवं सीधी उतार-युक्त बावड़ी है। इसके समीप लगे सूचना फलक पर प्राचीन हिन्दू बावड़ी लिखा है। मैंने अनुमान लगाया, कदाचित यह बावड़ी परमार राजाओं अथवा उससे भी पूर्वकालीन होगी। बावडी के समीप मंदिर के होने को भी नकारा नहीं जा सकता।

उजाला बावड़ी – अँधेरा बावड़ी

उजाला बावड़ी - मांडू
उजाला बावड़ी – मांडू

जहाज महल परिसर से कुछ ही दूरी पर दो जुड़वा बावड़ियाँ हैं। किसी काल में इनके समीप बाजार परिसर निर्मित था। खुले में निर्मित होने के कारण उजाला बावड़ी एवं अँधेरे में स्थित होने के कारण अँधेरा बावड़ी इनके नामकरण किये गए थे।

और पढ़ें:- आभानेरी की मनमोहक चाँद बावड़ी

उजाला बावड़ी अत्यंत आकर्षक है। इसकी ज्यामतीय आकृति ने मुझे आभानेरी के चाँद बावड़ी का स्मरण करा दिया था। बावड़ी के दोनों ओर स्थित बुर्ज सदृश मंडप से भी यह बहुत सुन्दर दिखाई पड़ रहा था। मैं मन ही मन उजाला बावडी के चारों ओर जमती संध्या बैठकों की कल्पना करने लगी।

बाज बहादुर महल – जल प्रबंधनण प्रणाली

प्राचीन रेवा कुंड के समीप, एकांत में यह बाज बहादुर महल निर्मित है। रेवा कुंड में भूमिगत झरनों का जल भरता है जो, कहा जाता है कि, नर्मदा नदी से आती हैं।

बाज़ बहादुर महल पर जल सींचने की व्यवस्था
बाज़ बहादुर महल पर जल सींचने की व्यवस्था

आपने आज तक बाज बहादुर एवं रानी रूपमती की कई प्रेम कथाएं सुनी होंगी। यहाँ मैं उनकी चर्चा नहीं करना चाहती। अपितु इस महल की एक विशेषता का उल्लेख करना चाहती हूँ। पानी की हर एक बूँद का संचय। आप जब भी इस महल के दर्शन करें, इसकी भित्तियों के ऊपरी भागों को अवश्य देखें। वहां आपको जल नलिकाएं दिखेंगी जो वर्षा का जल एकत्र कर उसे मध्य स्थित कुंड तक पहुंचाती हैं। जहां द्वार स्थित है, वहां ये नलिकाएं नीचे भूमिगत हो जाती हैं तथा द्वार के उस पार फिर ऊपर आ जाती हैं। आश्चर्य!

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बाज बहादुर महल में स्थित कुंड एक खुले प्रांगण के मध्य सममितीय रूप से स्थित है। इसके एक ओर स्थित शाही मंडप तथा दूसरी ओर सज्जित संगीतज्ञों का मंडप अत्यंत सुन्दर है।

बाज़ बहादुर महल का जल ताल
बाज़ बहादुर महल का जल ताल

संस्मरण का इतना भाग पढ़ कर आप अवश्य सोच रहे होंगे कि ये मंडप भी अवश्य जल प्रबंधन में सम्मिलित होंगे। जी हाँ! आप बिलकुल सही सोच रहे हैं। बाज बहादुर महल के संगीत कक्ष में निकलते संगीत के सुरों को सौम्य बनाने के लिए भी जल का उपयोग किया जाता था। संगीत कक्ष से निकलकर संगीत प्रेमियों से भरे शाही कक्ष तक संगीत के सुर जल द्वारा ही पहुंचते थे। संगीत के इन सुरों में से अवांछित सुरों को पृथक् करने का कार्य भी जल करता था।

रानी रूपमती का मंडप दुर्ग की भित्तियों के समक्ष एक चौकी के सामान है जो दुर्ग की भित्तियों एवं आसपास के क्षेत्र की निगरानी करता प्रतीत होता है। इस महल के नीचे भी लंबा भूमिगत जल कुंड है जहां महल पर गिरते वर्षा का सम्पूर्ण जल एकत्र होता है। आप कल्पना कर सकते हैं, युद्ध काल अथवा ऐसी किसी स्थिति में, मांडू के इस भाग में, राजसी परिवार आसानी से रह सकता था जहां जल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होता था।

यहाँ आप भारत के पारंपरिक जल प्रबंधन पद्धातियों के विषय में और पढ़ सकते हैं।

सागर ताल

जहाज महल एवं रूपमती मंडप के दोनों छोरों के मध्य यह विशाल ताल स्थित है। स्थानीय प्रशासन ने इस ताल के ऊपर एक मंडप का निर्माण करवाया है जहां बैठकर आप इस ताल एवं आसपास के हरे-भरे पहाड़ियों के दृश्यों का आनंद ले सकते हैं।

नीलकंठ महादेव मंदिर का ताल - मांडू
नीलकंठ महादेव मंदिर का ताल – मांडू

आपने देखा कि मांडू का राजसी परिसर तालों से परिपूर्ण है। यहाँ तक कि मांडू नगरी के लगभग सीमावर्ती क्षेत्र में स्थित नीलकंठ महादेव मंदिर परिसर में भी एक सुन्दर ताल है। यहाँ भी जल संचयन एवं प्रबंधन हेतु नलिकाएं बनी हुई हैं।

मांडू में आप कहीं भी खड़े हो जाएँ, आपको हर ओर बावड़ियाँ, कुँए, कुंड अथवा ताल दिखाई पड़ेंगे। बारीकी से देखने पर आप उन जल नलिकाओं को भी ढूंढ पायेंगे जो वर्षा का जल एकत्र कर इन जल सरोवरों को भरते हैं। कुल मिलाकर मांडू की जल प्रबंधन प्रणाली हमें बहुत कुछ सिखाती है।

इंदौर से मांडू की दूरी

मध्य प्रदेश के इंदौर नगरी में विमानतल है जो हर महत्वपूर्ण स्थानों से वायुमार्ग द्वारा जुड़ा हुआ है। मांडू एवं इसके धरोहर से सर्वाधिक समीप स्थित प्रमुख नगरी इंदौर ही है। मांडू से इंदौर की दूरी लगभग ८० की.मी. है। मांडू की वास्तुकला एवं विरासती धरोहर के साथ साथ यहाँ की वर्षा-आधारित जल प्रबंधन प्रणाली भी पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण है।

मांडू के जल प्रबंधन प्रणाली की सीख

विश्व के जल प्रबंधन/ जल संरक्षण/ जल संचयन से सम्बंधित आज के पेशेवरों/ अधिकारियों के लिए मांडू के प्राचीन जल प्रबंधन प्रणाली/ योजना एवं चलन में बहुत कुछ सीखने योग्य है। आशा है अधिक से अधिक लोग भारत की इस प्राचीन विद्या एवं इसके उपयोग से ज्ञान वर्धन करेंगे एवं विश्व को इसका लाभ पहुंचाएंगे।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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