भारत के पर्व Archives - Inditales श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Fri, 07 Oct 2022 15:57:00 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.7.5 नृसिंह जयंती कैसे मनाई जाती हैं ब्रज भूमि में https://inditales.com/hindi/narsimha-jayanti-leela-utsav-braj/ https://inditales.com/hindi/narsimha-jayanti-leela-utsav-braj/#comments Wed, 19 Oct 2022 02:30:33 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2827

वैष्णव संप्रदाय के अंतर्गत चार मुख्य जयंती व्रत एवं उत्सवों को अत्यधिक मान्यता दी गई है। यह चार जयंती व्रत क्रमशः है जन्माष्टमी, वामन जयंती, राम नवमी और नृसिंह जयंती। वैष्णव संप्रदाय के सिद्धांत अनुसार जगत का कल्याण करने के लिए भगवान अवतार ग्रहण करते हैं और अवतार लेकर ही वह अपने भक्तों के अभीष्ट […]

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वैष्णव संप्रदाय के अंतर्गत चार मुख्य जयंती व्रत एवं उत्सवों को अत्यधिक मान्यता दी गई है। यह चार जयंती व्रत क्रमशः है जन्माष्टमी, वामन जयंती, राम नवमी और नृसिंह जयंती। वैष्णव संप्रदाय के सिद्धांत अनुसार जगत का कल्याण करने के लिए भगवान अवतार ग्रहण करते हैं और अवतार लेकर ही वह अपने भक्तों के अभीष्ट को सिद्ध करते हैं। श्रीमद् भागवत पुराण के अनुसार बाल भक्त प्रहलाद की भक्ति को सिद्ध करने एवं हिरण्यकश्यपु का वध करने के लिए ही श्री विष्णु नृसिंह रूप में प्रगट हुए। वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को अवतार लेकर प्रभु ने इस लीला को सम्पादित किया इसलिए इस तिथि को नृसिंह चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है। इस लीला को ब्रज में त्योहार के रूप में बड़ी ही धूम धाम से मनाया।

सत्यं विधातुं निज-भृत्य भाषितं
व्याप्तिं च भूतेष्वखिलेषु चात्मनः |
अदृश्यतात्यद्भुत रूपं उद्वहन्
स्तम्भे सभायां न मृगं न मानुषं ||

अपने भक्तो की वाणी को सत्य करने के लिए भगवन सदैव तत्पर रहते है इसीलिए भक्त प्रह्लाद की बात को सत्य करने के लिए भगवान नृसिंह खम्बा फाड़कर प्रकट हुए जो न तो पूरे सिंह थे और न ही पूरे मनुष्य।

प्राचीन नृसिंह मंदिर, केशी घाट, वृन्दावन
प्राचीन नृसिंह मंदिर, केशी घाट, वृन्दावन (आभार- लक्ष्मी नारायण तिवारी जी)

ब्रज की नृसिंह जयंती

ब्रज में विशेषतः मथुरा एवं वृंदावन में यह उत्सव अत्यंत ही उत्साह पूर्वक मनाया जाता है। देवालयों से पृथक लोक संस्कृति में नृसिंह उत्सव की अपनी एक विशिष्ट पहचान है। वृंदावन में स्थित नृसिंह मंदिरों में यह उत्सव विधि विधान के साथ मनाया जाता है। कथा अनुसार हिरण्यकशिपु को दिए हुए वर के कारण भगवान नृसिंह संध्या समय प्रगट हुए थे क्योंकि वर अनुसार न उसको दिन में मारा जा सकता था न ही रात में। इसी परंपरा के कारण श्री नृसिंह जी का अभिषेक मंदिरों में सांय काल विभिन्न अनुष्ठान के अंतर्गत संपादित किया जाते हैं। इस उत्सव में किन्ही किन्ही मंदिरों में भगवान को नृसिंह वेश भी धारण कराया जाता है। श्री राधादामोदार मंदिर एवं श्री राधा श्यामसुंदर मंदिर में इस दिन विशेष नृसिंह झांकी में भगवान दर्शन देते है।

राधा श्यामसुंदर नृसिंह वेश में
राधा श्यामसुंदर नृसिंह वेश में (आभार- लक्ष्मी नारायण तिवारी जी)

भगवान का नृसिंह स्वरूप चूंकि उग्र था इसलिए भगवान को शीतलता देने के लिए विभन्न प्रकार के पेय पदार्थ भोग रूप में दिए जाते है। आमरस और सत्तू इसमें अत्यंत विशेष माना जाता है। ठाकुर जी को खीरा, ककड़ी, खरबूजा, मिष्ठान आदि का भोग अर्पित कर प्रसाद भक्तजनों में वितरित किया जाता है। परंतु इस उत्सव का सबसे मुख्य आकर्षण है इस कथा पर की जाने वाली नृसिंह लीला।

नृसिंह लील के मुखौटे
नृसिंह लील के मुखौटे (आभार- लक्ष्मी नारायण तिवारी जी)

नृसिंह जयंती पर नृसिंह लीला

नृसिंह लीला में वास्तव में नृसिंह कथा का मुखौटा पहन कर नृत्यात्मक मंचन होता है जिसमे भागवत पुराण में वर्णित हिरण्यकश्यप वध को दिखाया जाता है। नृसिंह लीला में नृसिंह बनने वाले प्रमुख पात्र ब्राह्मण होते है, क्योंकि यह देव लीला है और भावुक जनता अपने आप को लीला के साथ आत्मसात कर नृसिंह बने पात्र को साक्षात भगवान का स्वरूप मानकर उसका पूजन व चरण स्पर्श करती है। प्रातः काल नृसिंह मंदिरों में नृसिंह, वराह, हनुमान, मकरध्वज, गणेश आदि मुखोटों की भाव वत पूजा अर्चना की जाती है।

नृसिंह लील के मुखौटो को धारण करते हुए
नृसिंह लील के मुखौटो को धारण करते हुए  (आभार- लक्ष्मी नारायण तिवारी जी)

लीला के मंचन के पहले इन मुखौटो के बनने की विधा भी अत्यंत रोचक है। मुखौटों का निर्माण कागज की लुगदी और चिकनी मुलतानी मिट्टी के मिश्रण से किया जाता है। सब से पहले पुराने अखबार या साफ सुथरे कागजों को पानी में एक बड़ी मिट्टी की नांद में डालकर तीन चार दिनों के लिए भिगोने के लिए छोड़ दिया जाता है। वृन्दावन के शुकदेव शर्मा जो काफी लंबे अर्से से इन मुखौटों का निर्माण करते आ रहे है उन्होंने हमे बताय कि पहले हम लुगदी को बनाने के लिए कागज को भिगोते थे कई बार एक एक सप्ताह तक कागज भिगोने के बाद भी कागज की आवश्यकतानुसार ‘मुलायम ‘ लुगदी नहीं बन पाती थी इसलिए एक बार हमारे घर की ही एक छोटी बिटिया ने जादुई परामर्श दिया कि क्यों न कागज को पानी में उबाल लिया जाए। हमने प्रयोग किया तो पाया की परिणाम अच्छा है और समय बीच बचा।

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कागज की लुगदी और उसमें सही अनुपात में मुलतानी मिट्टी का मिश्रण मिलाने से पहले ‘सांचा ‘ बनाना पड़ता है और यह भी मिट्टी से ही बनता है। इसमें मुखौटे के सारे अवयवों के उभार उठान,गहराई आदि का ध्यान रखकर चाकू, कील और अन्य लकड़ी-लोहे की नुकीली चपटी चीजों से ‘सांचा ‘ बनाना पड़ता है। सांचा बनाने में भी काफी समय लगता है और फिर इसे कड़ी धूप में सुखाना पड़ता है।  सूख जाने के बाद रेगमाल आदि से रगड़ कर उसे चिकना किया जाता है ताकि मुखौटा ठीक से आकार ले सकें। इसके बाद मुखौटा बनाने से पहले एक साफ स्वच्छ और पतले कागज से सांचे को अच्छी तरह मढ़ दिया जाता है जिससे लुगदी और मिट्टी के मिश्रण का लेप चढ़ाने के बाद सूखने पर वह सांचे से चिपक न जाए और आसानी से सूख जाने पर निकल आए।

इसके बाद अत्यंत कौशल से साथ मुखौटे के ‘आकार’ को ध्यान में रखकर आधा इंच से एक इंच मोटी तक लुगदी तथा मुल्तानी मिट्टी के मिश्रण का लेप पूरे सांचे पर इस तरह चढ़ाया जाता है कि सारे अंग प्रत्यंग के अवयव स्पष्ट उभर आएं । इस लेपन में भी खासी मेहनत और कौशल की जरूरत रहती है तथा इसके बाद मुखौटे को पुनः सुखाया जाता है। अच्छी तरह सूख जाने पर इस सांचे से पुनः बड़ी बारीकी और कुशलता से अलग किया जाता है और एक बार पुनः संपूर्ण मुखौटे की रेगमाल आदि से घिसाई करके उसे ‘चिकना’ किया जाता है। मुखौटे को सांचे से अलग करते समय कई बार कुछ चीजें टूट या चटक भी  जाती है ऐसे में उनकी तत्काल रिपेयरिंग भी करनी पड़ती है, जैसे खास तौर पर नृसिंह और वराह के दांतों पर तो दोबारा मेहनत करना ही पड़ती है।

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नेत्र खोखले बनाए जाते हैं और उन्हें भी ठीक करना होता है । घिसाई के बाद असली काम होता है  और वह है मुखौटे का श्रृंगार यानी उसको ‘रंग प्रदान करना । यह श्रम साध्य तो है ही साथ ही बेहद कलात्मक कार्य भी है जिसमे चित्रकला का ज्ञान होना भी बहुत जरूरी है। पहली बार सफेद रंग से पहली परत प्रदान की जाती है। किसी जमाने में मिट्टी के रंगों को घोलकर चेहरे को चित्रित किया जाता था परन्तु अब तो ‘ ऑयल पेंट का ही प्रयोग  होता है और मुखौटों की भाव भंगिमा आदि पर रंग भरा जाता है। रंग को सूखने 3-4 दिन लग जाते हैं और सूख जाने के बाद भी आवश्यकतानुसार दोबारा रंग करना पड़ जाता है । भौहें तथा आंखें सबसे बाद में रंग भरा जाता है और इस तरह मुखौटा बन कर तैयार हो जाता है।

नृसिंह लीला का मंचन

नृसिंह का स्वरूप धारण करने वाला व्यक्ति उस दिन व्रत रखता है तथा अन्य धार्मिक अनुष्ठानों को संपादित करता है। नृसिंह लीला का कथानक उनके बाल भक्त प्रह्लाद एवं उसके पिता हिरण्यकशिपु के साथ संबंध रखता है। प्रह्लाद को उसकी भक्ति निष्ठा का वरदान देने तथा हिरण्यकश्यपु के अत्याचारों से पृथ्वी को मुक्त कराने के लिए भगवान विष्णु का आविर्भाव नृसिंह के रूप में खम्भ फाड़कर हुआ था सो ठीक उसी प्रकार से लीला को संपादित किया जाता है।

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सांय काल गोधूलि बेला के समय नृसिंह लीला का आयोजन होता है। इससे पूर्व नृसिंह भगवान के आगमन से पहले वराह, हनुमान, मकरध्वज, गणेश आदि के स्वरूप नगर में भ्रमण कर भगवान के आगमन की शुभ सूचना देते हैं। नगर के प्रमुख स्थलों पर नृसिंह लीला का भावपूर्ण नृत्य करके मंचन किया जाता है। इस मंचन में अलग अलग पात्र अलग अलग मुद्रा व नृत्य करके इस लीला में आनंद लेते है।अंत में घंटों की घनघोर विशिष्ट ध्वनि के मध्य भगवान नृसिंह आवेश रूप में खम्भ फाड़ कर अवतरित होते हैं। कुछ देर हिरण्यकश्यपु से युद्ध करने के बाद उसे अपनी जँघाओं पर लिटा कर नाखूनों से उसका सीना चीर कर वध करते हैं।

नृसिंह लील के पात्र नृसिंह आगमन की सूचना करते हुए 
नृसिंह लील के पात्र नृसिंह आगमन की सूचना करते हुए  (आभार- लक्ष्मी नारायण तिवारी जी)

प्रह्लाद की स्तुति से उनका क्रोध शांत होता है तथा वह प्रह्लाद को गोद में बिठाकर उस पर अपना वात्सल्य लुटाते हैं। लीला का मंचन देख कर धर्म प्राण जनता प्रभु की जय जय कार करती है। इसके उपरांत नृसिंह भगवान की आरती की जाती है फिर विजय घंटे की ध्वनि के मध्य नृसिंह भगवान नगर में भ्रमण करने जाते हैं, जगह जगह उनका पूजन किया जाता है।

नृसिंह लील का मंचन
नृसिंह लील का मंचन (आभार- लक्ष्मी नारायण तिवारी जी)

लोक में मान्यता है कि भगवान नृसिंह का गृहस्थों के घर में आगमन कल्याणकारी होता है, इसलिए गृहस्थ लोग नृसिंह भगवान को अपने घर में बुलाते हैं एवं यथाशक्ति उनका पूजन कर अपने को धन्य मानते हैं। नृसिंह नृत्य परंपरा युद्धक नृत्य से अभिप्रेत है। नृसिंह भगवान का मुखौटा बहुत भारी होता है, अतः नृसिंह बनने वाले व्यक्ति का शरीर शारीरिक रूप से सुडौल होना चाहिए। श्रीधाम वृंदावन में यह उत्सव ठखम्भा, केशी घाट, शाह जी मंदिर, बनखंडी, अनाज मंडी आदि क्षेत्रों में मनाया जाता है। नगर के सभी विद्वत जन, वृद्ध, नर एवं नारी इस उत्सव का भरपूर उत्साह पूर्वक आनंद लेते हैं।

अतिथि संस्करण

नृसिंह जयंती उत्सव सुशांत भारती द्वारा प्रदत्त एक अतिथि संस्करण है।

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बसंत पंचमी कैसे मनाई जाती है ब्रज में! https://inditales.com/hindi/braj-basant-panchami-utsav/ https://inditales.com/hindi/braj-basant-panchami-utsav/#respond Wed, 03 Aug 2022 02:30:27 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2748

ब्रज में बंसंत पंचमी सदा बसंत रहत वृंदावन पुलिन पवित्र सुभग यमुना तट।। जटित क्रीट मकराकृत कुंडल मुखारविंद भँवर मानौं लट। ब्रज में यूं तो ऋतुओं की भरमार है किंतु एक ऋतु ऐसी है जो ब्रज में अपने उन्माद को लिए हुए नित्य विराजमान है और वह है वसंत ऋतु। वृंदावन के रसिक आचार्य ने […]

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ब्रज में बंसंत पंचमी

सदा बसंत रहत वृंदावन पुलिन पवित्र सुभग यमुना तट।।
जटित क्रीट मकराकृत कुंडल मुखारविंद भँवर मानौं लट।

ब्रज में यूं तो ऋतुओं की भरमार है किंतु एक ऋतु ऐसी है जो ब्रज में अपने उन्माद को लिए हुए नित्य विराजमान है और वह है वसंत ऋतु। वृंदावन के रसिक आचार्य ने तो यहां तक कहा है की ब्रज से वसंत कभी भी एक क्षण के लिए बाहर नही जाता अपितु वह तो सदा सर्वदा यही श्री राधा कृष्ण की सेवा में रत रहता है। बसंत पंचमी का उत्सव इसी के अंतर्गत मनाया जाता है।

ज्योतिष एवं आयुर्वेद के अनुसार चैत्र तथा वैशाख मास को वसंत ऋतु माना गया है। शल्य चिकित्सा के प्रवर्तक सुश्रुत ने तो वसंत के लिए कहा है कि “मधुमाधवौ वसन्तः” अर्थात मधु(चैत्र) और माधव(वैशाख) ही वसंत है। तैत्तिरीय संहिता में भी कहा गया है कि “मधुश्व माधवश्व वासन्तिकावृत” अर्थात् मधु और माधव मास ही वसन्त ऋतु। तैत्तिरीय ब्राह्मण में ऋतुओं का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि “तस्य ते वसन्तः शिरः” अर्थात् वर्ष का सिर (शीर्ष) ही वसन्त ऋतु है। कालिदास ने वसंत ऋतु के वर्णन में अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ऋतुसंहार में कहा है “सर्वप्रिये चारूतरं वसन्ते” अर्थात वसंत ऋतु में सब कुछ मनोहर ही मालूम पड़ता है। इसके साथ ही गीत गोविंद में श्री जयदेव गोस्वामी लिखते है “विहरति हरिरिह सरस वसंते” अर्थात वसंत के वियोग से सभी दिशाएं प्रसन्न हो रही है। किंतु वर्तमान लोकांचल यानी उत्तर एवं पूर्वी भारत में मुख्यतः वसंत का आगमन माघ शुक्ल पंचमी अर्थात वसंत पंचमी के दिन ही माना जाता है।

सरसों के खेत
सरसों के खेत (साभार- निशांत शर्मा)

वसंत ऋतु के आगमन की बात करें तो माघ मास में भगवान भास्कर के मकर राशि में प्रवेश के उपरांत शीत ऋतु का प्रकोप कम होने लगता है। माघ शुक्ल पक्ष की पंचमी को ऋतुराज वसंत का आगमन पृथ्वी पर एक उत्सव के रूप में होता है। बसंत के स्वागत में वसुधा अपने रूप को सँवार कर बसंत का स्वागत करती है। बसंत के आगमन पर संपूर्ण सृष्टि में मादकता सी छा जाती है साथ ही पेड़ों के नवीन पात, वन उपवन में फूलों से लदी डाली, आम के बौर, कोयल की कूक एवं सरसों के रूप में पीली चुनर ओढ़े धरती यह सब सूचना देती हैं कि बसंत अब आ चुका है।

ब्रज में यह उत्सव अत्यंत ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। जहां प्राय भारत में अन्य जगह इस उत्सव पर लोग पीले वस्त्र धारण कर वाग्देवी श्री सरस्वती मां का पूजन अर्चन करते है वही दूसरी और ब्रज में यह उत्सव कुछ अलग ही ढंग से मनाया जाता है। वसंत पंचमी के दिन से ब्रज के सुप्रसिद्ध ४५ दिवसीय होलीकोत्सव का प्रारंभ हो जाता है। वसंत पंचमी को ब्रज में होली का प्रथम दिन माना जाता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने ऋतुओं में स्वयं को वसंत ऋतु बताया है :-

बृहत्साम तथा साम्नांगायत्री छन्दसामहम।

मासानां मार्गशीर्षोहमृतूनां कुसमाकरः।।

गायी जानेवाली श्रुतियों में बृहत्साम हूँ, वैदिक छन्दों में गायत्री छन्द हूँ, बारह महीनों में मार्गशीर्ष हूँ तथा छः ऋतुओं में, मैं ही वसन्त हूँ।

ब्रज के गांवों, नगरों एवं मंदिरों में वसंत उत्सव मनाने की परंपरा अनवरत रूप से आज भी जारी है। बसंत पंचमी से ब्रज में बसंत उत्सव का श्रीगणेश हो जाता है। इस दिन ठाकुरजी नवीन पीले वस्त्र धारण करते है। मंदिरों की सजावट भी पीले साज, वस्त्रों एवं फूलों से की जाती है। यहां तक कि पुजारी भी पीले वस्त्र पहन कर ही मंदिरों में सेवा करने हेतु पधारते है। नए सरसों के फूल ठाकुरजी को वसंत आगमन के उपलक्ष्य में निवेदित किए जाते है। साथ ही साथ कई जगह तो विशेष पीले रंग के भोग निवेदित किए जाते है। अपने इष्ट के मनमोहक स्वरूप को देखकर बृजवासी प्रेम के वशीभूत होकर सहज ही गा उठते हैं-

“श्यामा श्याम बसंती सलोनी सूरत को श्रंगार बसंती है”

श्री राधा कृष्ण की जो छटा है वह भी वसंती है (नित्य नवीन) तथा उनका श्रृंगार भी वसंती है।

बसंत पंचमी के दिन होली का डांढ़ा (खूंटा) गढ़ जाता है। होली का डांढ़ा वास्तव में वह खम्बा होता है जिसके ऊपर होलिका दहन हेतु लकड़ियाँ लगाई जाती है। आज से ही वृंदावन में होली का प्रारंभ भी हो जाता है। सभी देवालयों में होलिकाष्टक( होली से आठ दिन पहले) तक राजभोग पर यानि दोपहर समय अबीर गुलाल उड़ाया जाता है। विश्वविख्यात ठाकुर बांके बिहारी मंदिर में प्रसाद स्वरूप अबीर -गुलाल भक्तों और दर्शनार्थियों के ऊपर बहुत ही अधिक मात्रा में उड़ाया जाता है।

इसी के साथ वृंदावन में स्थित शाह बिहारी मंदिर में बसंत पंचमी के दिन बसंती कमरा 3 दिनों के लिए खुलता है। रंग- बिरंगी रोशनी से सराबोर बसंती कमरे में विराजमान ठाकुर राधा रमण लाल की अलौकिक छटा होती है। यह कमरा वर्ष में बहुत ही कम दिनों के लिए खुलता है। इस कमरे में बेल्जियन कांच के बने झाड़ फ़ानूस लगे हुए है जिससे इसकी शोभा और बढ़ जाती है। होली का छेता निकलने के साथ ही वृंदावन के प्रमुख मंदिर श्री राधावल्लभ मंदिर, श्री राधारमण मंदिर, श्री राजबिहारी कुंज बिहारी मंदिर, श्री राधा दमोदर मंदिर आदि अन्य मंदिरों में भी बसंत उत्सव का प्रारंभ हो जाता है।

बांके बिहारी मंदिर में अबीर गुलाल - बसंत पंचमी
श्रीबांकेबिहारी मंदिर में वसंतोत्सव पर अबीर गुलाल का खेल (साभार-श्रीकृष्णचंद्र गोस्वामी जी)
वसंतोत्सव पर श्रीराधारमणलालजी - बंसंत पंचमी श्रृंगार
वसंतोत्सव पर श्रीराधारमणलालजी (साभार- निशांत शर्मा)
वसंतोत्सव पर श्री कृष्ण बलराम,नंदगांव
वसंतोत्सव पर श्री कृष्ण बलराम,नंदगांव (साभार- अंजलि स्याल)

कुहू कुहू कोकिला सुनाई। सुनि सुनि नारि परम हरषाई।।
बार बार सो हरिहि सुनावति। ऋतु बसंत आयौ समुझावति।।
फाग-चरित-रस साध हमारै। खेलहिं सब मिलि संग तुम्हारै।।
सुनि सुनि ‘सूर’ स्याम मुसुकाने। ऋतु बसंत आयौ हरषाने।।

कोयल की कुहू कुहू सुनकर सभी सखियाँ हर्ष से फूली नहीं समा रही है और वह श्री कृष्ण को नित्य विहार हेतु यह कह कर मना रही है कि सुनो प्रिय वसंत ऋतु का आगमन हो चूका है। अतः अंत में सखियों के मनाने से श्रीकृष्ण मंद-मंद मुस्काने लग जाते है और सखियों के संग वसंत उत्सव मानने चले जाते है।

वसंतोत्सव पर बसंती कमरा, शाहजी मंदिर, वृन्दावन
वसंतोत्सव पर बसंती कमरा, शाहजी मंदिर, वृन्दावन (साभार- श्री प्रशांत शाह)

वृंदावन के मंदिरों में बसंत की समाज भी अद्भुत होती है। वाणी साहित्य में श्यामा- श्याम के बसंत खेल का वर्णन प्रचुर मात्रा में किया गया है। इन पदों का गायन ठाकुर जी के समक्ष पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ किया जाता है। ब्रज में बसंत गायन की एक सुदीर्घ परंपरा रही है। रसिक उपासना का केंद्र रहे वृंदावन में बसंत लीला को निकुंज लीला से जोड़कर भी देखा जाता है। हरित्रयी के नाम से विख्यात रसिक संत स्वामी श्री हरिदास जी, श्री हरिराम व्यास जी एवं श्री हित हरिवंश जी ने अपने रचित पदों में बसंत का भरपूर गान किया है। वृंदावन की मंदिर परंपरा में आज भी बसंत के इन पदों का गान किया जाता है। ब्रज में बसन्त पूजन की परंपरा अत्यंत प्राचीन है।

बसंत पंचमी पूजन विधि

महावाणी’ नामक ग्रंथ में बसंत पूजन विधि का विशद वर्णन किया गया है जिसे गोलोक वृन्दावन (नित्य वृन्दावन जहां केवल राधा कृष्ण एवं सखियाँ होती है) में सखियाँ मिल कर सम्पादित करती है। इसमें मुख्य रूप से सखियों द्वारा पुष्प समर्पण और संगीत द्वारा सेवा निवेदित कर श्री राधा कृष्ण की वसंत सेवा को बड़ी ही सुंदरता के साथ बताया गया है। चूंकि भौम वृंदावन उस गोलोक वृंदावन का ही प्रतिबिंब है इसलिए ठीक उसी प्रकार वृंदावन एवं ब्रज में वसंत पंचमी पर उत्सव आदि किए जाते है। हरिभक्तिविलास के अनुसार वसंत पंचमी पर मंदिरों में नव पत्र, पुष्प एवं अनुलेपन द्वारा मंदिरों में पूजा संपादित की जाती है। श्री राधा कृष्ण की वसंत के नए पीले सरसों के फूल चढ़ाए जाते है। इसके साथ ही संगीत सेवा जो कि वृंदावन की सेवा परिपाटी का अभिन्न अंग है वो भी वसंत पंचमी पर विशेष महत्व रखती है। वसंत राग का प्रारंभ इसी दिन से शुरू हो जाता है व समाज गायन ने वसंत राग से भरे पदावलियों का गायन किया जाता है।

और राग सब बने बराती दुल्हो राग बसंत,

मदन महोत्सव आज सखी री विदा भयो हेमंत।

रसिक शिरोमणि स्वामी हरिदास वृंदावन की रस निकुंज में जहाँ कुंजबिहारी अपना वसंतोत्सव मना रहे हैं, इस दिव्य रस उत्सव का दर्शन कराते हुए गान करते हैं-

कुंजबिहारी कौ बसन्त सखि, चलहु न देखन जाँहि।

नव-बन नव निकुंज नव पल्लव नव जुबतिन मिलि माँहि।

बंसी सरस मधुर धुनि सुनियत फूली अंग न माँहि।

सुनि हरिदास” प्रेम सों प्रेमहि छिरकत छैल छुवाँहि।।

श्रीराधारमण मंदिर में समाज गायन बसंत पंचमी पर
श्रीराधारमण मंदिर में समाज गायन (साभार- निशांत शर्मा)

सखी कह रही है की चलो नव पल्लवों से युक्त वसंत से ओत प्रोत उस कुञ्ज की ओर चले जहां श्याम वंसी बजा रहे है। उस कुञ्ज में सभी आनंद से फुले हुए है और प्रेम रूपी अबीर ही सब पर डाला जा रहा है।

भारतेंदु बाबू द्वारा रचित ‘मधु मुकुल’ की पंक्तियां वृंदावन के बसंत का वर्णन कुछ इस प्रकार करती हैं-

एहि विधि खेल होत नित ही नित, वृन्दावन छवि छायो।

सदा बसन्त रहत जँह हाजिर,कुसुमित फलित सुहायो।।

वृन्दावन की दिव्य लीलास्थली पर नित प्रति वसंत का खेल होता ही रहता है। यहां वसंत सदा सर्वदा पुष्पित पल्लवित होकर विराजमान है।

वृंदावन और बसंत का संबंध अभिन्न है। इस संबंध के विषय में जितना कहा जाए उतना ही कम प्रतीत होता है। श्रीकृष्ण का पूरा जीवन हर्ष का प्रतीक है ,उल्लास का प्रतीक है, नवीनता का प्रतीक है और ऐसे में वसंत से सुन्दर और कौन सी ऋतु होगी जिसमे स्वयं भगवान प्रफुल्लित न हो। इस ऋतु के आगमन से चहुँ और वनस्पति की छटा पुनः हरी भरी होनी शुरू हो जाती है। सर्दी के आलस्य को त्याग प्रकर्ति दोबारा पुष्पित पल्लवित नव कलेवर में जाने को तत्पर रहती है। वातावरण में एक विचित्र ऊर्जा विद्यमान रहती है तथा सरसो से लहलहाते हुए खेत मानव ह्रदय को एक अलग ही भाव से भर देते है। वास्तव में वसंत और कुछ नहीं भगवान कृष्ण द्वारा दिया हुआ समस्त मानव जाति को एक छुपा हुआ सन्देश है जिसमे वह आवाहन कर रहे है कि हम सब अपने जीवन के उल्लास को सभी व्याधि और कष्टों से हटकर पुनः जीवित करे ताकि आनंद सदा सर्वदा बना रहे। क्योंकि जब तक आनंद है तब तक रस है और जब तक रस है केवल तब तक ही नवीनता है क्योंकि रस का आनंद तभी तक है जब तक वो नवीन रहता है अर्थात ताज़ा रहता है जैसे ही वह बासी हुआ वैसे ही अधोगति प्रारम्भ। अपने जीवन को सदा वृन्दावन बनाये ताकि नवीनता सदा बनी रहे और स्वयं रसमूर्ति श्रीकृष्ण आपके ह्रदय रूपी रसशाला में विहार करते रहे।

नवल वसंत, नवल वृंदावन, नवल ही फूले फूल,
नवल ही कान्हा, नवल सब गोपी, नृत्यत एक ही तूल।
नवल ही साख, जवाह, कुमकुमा, नवल ही वसन अमूल,
नवल ही छींट बनी केसर की, भेंटत मनमथ शूल।
नवल गुलाल उड़े रंग बांका, नवल पवन के झूल,
नवल ही बाजे बाजैं, “श्री भट” कालिंदी के कूल।
नव किशोर, नव नगरी, नव सब सोंज अरू साज,
नव वृंदावन, नव कुसुम, नव वसंत ऋतुराज ।


यह श्री सुशांत भारती द्वारा प्रदत्त एक अतिथि संस्करण है। श्री सुशांत भारती एक संरक्षक वास्तुविद हैं। उन्होंने नई दिल्ली के स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर तथा वास्तुकला अकादमी कॉलेज ऑफ आर्किटेक्चर से वास्तुकला में क्रमशः स्नातकोत्तर एवं स्नातक की उपाधियाँ प्राप्त की हैं। भारत के विभिन्न सांस्कृतिक आयामों में उनकी विशेष रुचि है। वास्तुकला की विविधता उनके अध्ययन का मुख्य विषय है। ‘ब्रज की सांस्कृतिक धरोहर’ एवं ‘भारतीय मंदिरों की वास्तुकला’ उनके शोध के प्रमुख क्षेत्र हैं। वर्तमान में वे जनपथ, नई दिल्ली में स्थित, भारतीय संग्रहालय के भारतीय संग्रहालय संस्थान में अनुसंधान सहायक के पद पर कार्यरत हैं।

सुशांत द्वारा लिखे ये अन्य संस्करण पढ़ें:

सांझी कला –ब्रज वृंदावन की पारंपरिक अलंकरण कला

ब्रज की फूल बंगला परंपरा

रसिकप्रिया – बुंदेलखंड का गीत गोविंद

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फूल बंगला प्रथा ब्रज के मंदिरों का ग्रीष्मकालीन उत्सव https://inditales.com/hindi/phool-bangla-utsav-braj-uttar-pradesh/ https://inditales.com/hindi/phool-bangla-utsav-braj-uttar-pradesh/#respond Wed, 15 Jun 2022 02:30:39 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2712

मानवी चेतना के आरंभ से मनुष्य प्रकृति के विभिन्न रूपों की आराधना करता आ रहा है। मनुष्य ने अपनी कल्पना में प्रकृति के अनेक दैवी रूपों को प्रकट किया है। देव सदृश प्रकृति की ओर अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने में वह सदैव आनंद का अनुभव करता आया है। जैसे जैसे समय व्यतीत हुआ, उसकी प्रथाओं […]

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मानवी चेतना के आरंभ से मनुष्य प्रकृति के विभिन्न रूपों की आराधना करता आ रहा है। मनुष्य ने अपनी कल्पना में प्रकृति के अनेक दैवी रूपों को प्रकट किया है। देव सदृश प्रकृति की ओर अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने में वह सदैव आनंद का अनुभव करता आया है। जैसे जैसे समय व्यतीत हुआ, उसकी प्रथाओं में परिवर्तन होते गए। अब मनुष्य प्रकृति से प्राप्त विभिन्न पदार्थों का अर्पण कर भगवान के दिव्य रूप की आराधना करने लगा है। यह प्रथा परोक्ष अथवा अपरोक्ष रूप से अब भी वनस्पति एवं जीव-जंतुओं से संबंध रखती है। फूल बंगला ऐसी ही एक प्रथा है जिसमें प्रकृति का उत्सव मनाया जाता है।

भारत में प्रकृति से प्राप्त लगभग सभी पदार्थों को भगवान को अर्पित करने के लिए सर्वाधिक पवित्र माना जाता है। उनमें पुष्पों को सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं विशेष चढ़ावा जाना जाता है। श्रीमद् भगवत गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं:

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः।।9.26।।

हे अर्जुन! जो भी भक्त मेरे लिए पत्र, पुष्प, फल, जल आदि भक्ति से अर्पण करता है, उस शुद्ध मन के भक्त द्वारा वह भक्तिपूर्वक अर्पण की गई भेंट मैं प्रेम से स्वीकार करता हूँ।

वेदों, उपनिषदों, पुराणों जैसे सभी प्राचीन ग्रंथों ने प्रकृति एवं उसके विभिन्न रूपों की आराधना की परम महत्ता को विस्तृत रूप से उजागर किया है। इस परिप्रेक्ष्य में ब्रज का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। सम्पूर्ण कृष्ण लीला किसी ना किसी रूप में प्रकृति के चारों ओर ही केंद्रित थी। गोवर्धन, यमुना, वृंदा, गऊ इत्यादि प्रकृति के वे प्रतिनिधि हैं जिन्होंने भगवान कृष्ण के जीवन में विशेष भूमिकाएं निभायी हैं।

फूल बंगला प्रथा का इतिहास

फूल बंगला के लिए फूल
फूल बंगला के लिए फूल

१६ वीं. सदी में भारत में भक्ति आंदोलन का समय था जब सम्पूर्ण भारत से अनेक साधू-महात्मा ब्रजभूमि आए थे। उस समय विद्यमान राजनैतिक एवं सामाजिक परिस्थिति में कृष्ण भाव पुनः स्थापित करने में ब्रज का अविस्मरणीय योगदान रहा है। इन साधु-महात्माओं ने ब्रज में विद्यमान वृक्ष वाटिकाओं एवं उपवनों में प्रकृति की प्रचुरता को मुक्त हृदय से स्वीकार किया था। उन्होंने चारों ओर स्थित प्रकृति को अपने दैनिक अनुष्ठानों एवं सेवाओं का अभिन्न अंग बना लिया था।

धर्म गुरुओं द्वारा आरंभ किये गए अनेक पंथों ने किसी ना किसी रूप में प्रकृति को अपनी रीति से भगवान की आराधना का अभिन्न अंग बनाया है। इस प्रथा के चलते ब्रज की पावन भूमि में अनेक मंदिरों का निर्माण हुआ। इसके साथ ही ब्रज में अनेक पारंपरिक एवं सांस्कृतिक कला शैलियाँ विकसित एवं पोषित हुईं जिनके द्वारा भगवान को सेवा अर्पित की जाती थी। इस प्रकार की गई भगवान की सेवा ने अनेक सांस्कृतिक शिल्पों एवं कला शैलियों को विकसित होने का अवसर प्रदान किया। रथयात्रा में प्रयुक्त भव्य रथ, झूला यात्रा में प्रयोग किया गया झूला इत्यादि इसके कुछ उदाहरण हैं। इस संस्करण में हम भगवान की जिस सेवा का उल्लेख कर रहे हैं वह है वृंदावन व ब्रज के मंदिरों में पुष्प सज्जा, जिसे फूल बंगला  भी कहा जाता है।

धन्यं वृन्दावनं तेन भक्तिर्नृत्यति यत्र च॥

– पद्म पुराण, भागवत माहात्म्य (1.61)

धन्य है वृंदावन की पावन भूमि, जहाँ भक्ति सम्पूर्ण परमानन्द में नृत्य करती हैं।

वृंदावन का भक्ति नृत्य सर्वोच्च परमानन्द का प्रतीक है। यह विविध पूजा अनुष्ठानों का परिणाम है जिन्हे उस काल के विभिन्न आध्यात्मिक महानुभावों ने आरंभ किया था। इसी की स्पष्ट झलक हमें ब्रज भूमि के अनेक सांस्कृतिक कलाओं में आज भी दृष्टिगोचर होती हैं।

वृंदावन का फूल बंगला

वृंदावन की वर्तमान फूल बंगला परंपरा प्राचीन अनुष्ठानिक परंपरा की ही निरन्तरता है। यद्यपि यह फूल बंगला सम्पूर्ण ब्रज में बनाया जाता है एवं इसका उत्सव मनाया जाता है, तथापि परंपरा में विविधता के कारण वृंदावन में इसे विशेष सम्मान प्रदान किया जाता है।

१६ वीं. सदी के साहित्यों में फूल महल, फूल कुंज, फूल भवन तथा फूल बैठक जैसे शब्दों का उल्लेख है। फूल बंगला, यह शब्द १७ वीं. सदी के साहित्यों में देखा गया है। हरिभक्तिविलास, केलीमाल, हित चौरासी तथा सुरसागर जैसे मध्यकालीन ग्रंथ भी फूल बंगला अनुष्ठान की, भगवान को अर्पित सेवा के रूप में, विस्तृत चर्चा करते हैं।

हमारे प्राचीन ग्रंथों के अनुसार पुष्प सज्जा उन ६४ कलाओं में से एक है जिसे मनुष्य आत्मसात कर सकता है। मानवी भावनाओं एवं धार्मिक संस्कारों का यह अद्भुत संगम ब्रज को एक अप्रतिम आभा प्रदान करता है। ग्रीष्म ऋतु की चिलचिलाती उष्णता में ब्रज के दैवी वनों के प्राकृतिक परिदृश्यों को पुनर्सृजन करने का यह प्रयास, वास्तव में मंदिर की प्रतिमाओं को सुवासित पुष्पों की शीतलता द्वारा सुख प्रदान करने की एक चेष्टा है। मंदिरों में किये जाने वाली इस पुष्प सज्जा का मूल सिद्धांत भी यही है।

फूल बंगला कब मनाया जाता है?

यह उत्सव चैत्र शुक्ल एकादशी अर्थात् अक्षय तृतीया से आरंभ होकर हरियाली तीज से एक दिवस पूर्व समाप्त होता है। अर्थात् यह उत्सव वैशाख, ज्येष्ठ तथा आषाढ़, ये तीन मास की अवधि तक मनाया जाता है। अंग्रेजी पंचांग के अनुसार यह अवधि अप्रैल के मध्य से जुलाई के मध्य तक होती है।

इस पुष्पोत्सव के दर्शन करने का एवं इसका आनंद उठाने का सर्वोत्तम समय ग्रीष्मऋतु है क्योंकि इस समय प्रचुर मात्रा में पुष्प उपलब्ध होते हैं। जैसे ही वर्षा ऋतु आरंभ होती है, पुष्प सजावट का आकार छोटा होने लगता है। वर्षा ऋतु में पुष्पों की आवक घट जाती है जिससे फूल बंगले की सज्जा में प्रयुक्त पुष्पों की प्रचुर मात्रा की आपूर्ति नहीं हो पाती।

बेला, गेंदा और पाटाल के फूल
बेला, गेंदा और पाटाल के फूल

इस पुष्प सज्जा में विशेषतः बेला अथवा चमेली पुष्प का सर्वाधिक प्रयोग होता है। गुलाब एवं गेंदे के पुष्प तथा अशोक वृक्ष की पत्तियों का भी प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया जाता है। केले के तने की छाल को उत्कीर्णित कर भी इस सज्जा में प्रयोग किया जाता है। वृंदावन के विभिन्न धार्मिक समुदायों के अभिलेखों व ग्रंथों में विविध प्रकार के पुष्पों का उल्लेख किया गया है जो १६ वीं. सदी से अब तक इस पुष्प सजा की कला को प्रभावित करते आए हैं। वृंदावन के लगभग सभी मंदिर इस परंपरा का पालन करते हैं। उनमें से कुछ लोकप्रिय मंदिर हैं, बाँके बिहारी जी, राधावल्लभ जी, राधारमण जी, राधादामोदर जी, रंग जी, राधाश्याम सुंदर जी, भट्ट जी इत्यादि।

फूल बंगला कैसा दिखता है?

लकड़ी के भिन्न भिन्न आकार के चौखटों को व्यवस्थित रीति से लगा कर एक अस्थायी संरचना निर्मित की जाती है। इसे स्थानीय भाषा में थाट कहते हैं। तत्पश्चात विभिन्न पुष्पों द्वारा अलंकृत कर इस अस्थायी संरचना को एक मंदिर का रूप दिया जाता है। संध्या के समय भगवान के विग्रह अथवा मूर्ति को पुष्प के मंदिर के भीतर बिठाया जाता है। रात्रि तक मूर्ति इस पुष्प मंदिर में ही विराजमान रहती है।

बेला के फूलों से थाट की सज्जा
बेला के फूलों से थाट की सज्जा

फूल बंगले की चौखटों को विभिन्न नामों से पहचाना जाता है, जैसे छज्जा, पिछवाई, हाथी, बगली इत्यादि। इनके नामों से आप भी इन्हे पहचान गए होंगे। रूपरेखा के अनुसार इन चौखटों को अपने अपने स्थानों पर बिठाया जाता है। इन चौखटों की किनारियों पर आवश्यकतानुसार कीलें गढ़ी होती हैं। कलाकार इन कीलों की सहायता से एवं रूपरेखा के अनुसार चौखटों पर बेला पुष्प की लंबी लंबी लड़ियाँ सजाते हैं। चौखटों की व्यवस्था जगमोहन की आकृति एवं माप के अनुसार की जाती है जो गर्भगृह के ठीक बाहर का क्षेत्र होता है।

बेला के फूलों से सजा थाट
बेला के फूलों से सजा थाट
फूल बंगला बनते हुए
फूल बंगला बनते हुए

केले के तने की छाल द्वारा अलंकरण

केले की छाल से सज्जा
केले की छाल से सज्जा

केले के तने की छाल से अलंकरण करने के लिए तने के सबसे भीतरी भाग को सावधानी पूर्वक निकाला जाता है। इन्हे विभिन्न आकृतियों में काटकर चौखटों पर लगाया जाता है। एक बड़ा फूल बंगला बनाने के लिए ६ से १० लोगों को लगभग ४ से ६ घंटों का समय लग जाता है। वर्तमान में वृंदावन तथा वृंदावन के बाहर स्थित ब्रज के अन्य मंदिरों में कलाकारों के ६ से ७ ऐसे समूह हैं जिन्होंने यह पारंपरिक पुष्प सज्जा बनाने का प्रशिक्षण प्राप्त किया है।

१८ वीं. शताब्दी में श्री प्रेमदास जी द्वारा ब्रज भाषा में रचित यह प्रसिद्ध दोहा इस परंपरा की सुंदरता का बखान करता है:

मोतिया की जाली में गुलाब ही के फूल खांचे, बंगला में रचे सोनजूही के से द्वार है

कंज के कमल राजे माधवी के छज्जा छान्जे, पीत चमेली के लटकन अति चारु है

फूल के सिंघासन पे फूल रहे श्यामा श्याम, फूलन के अभिराम शोभित शृंगार है

प्रेमदास हित वारी फूली अति फुलवारी, कुंज केली फूली भारी फूले रतिमार है

उत्सव क्षेत्र

वृन्दावन के श्री राधारमण मंदिर में अक्षय तृतीया पर फूल बंगला
वृन्दावन के श्री राधारमण मंदिर में अक्षय तृतीया पर फूल बंगला

वृंदावन उत्सवों की धरती है। वृंदावन में कदाचित एक भी ऐसा दिवस नहीं होगा जब किसी उत्सव अथवा अनुष्ठान का आयोजन नहीं किया जा रहा हो। ब्रज की भक्ति परंपरा में कहावत है, भाव ग्राही जनार्दन। इसका अर्थ है कि भाव से अर्पित सभी पदार्थ भगवान कृष्ण सहर्ष स्वीकार करते हैं। वृंदावन भक्ति का प्रतीक है। इस प्रथा का आनुष्ठानिक दृष्टिकोण मुख्यतः उष्ण वातावरण में भगवान को सुख एवं समाधान प्रदान करने की भावना है जो एक भक्त के हृदय को तृप्त करता है।

अन्याभिलाषिता-शून्यम ज्ञान-कर्मध्यानवृतम,

अनुकुल्येन् कृष्णानुसील नम् भक्ति-उत्तम।

— श्री भक्ति-रसामृत-सिंधु (१.१.११)

संक्षेप में इसका अर्थ है, जब कृष्ण की सुख-सुविधा के लिए कोई सेवा अर्पित की जाती है तो वह सेवा भक्ति की चरम सीमा मानी जाती है।

वृंदावन सदा से सेवभाव की भूमि रही है। वृंदावन के कोने कोने में वर्षों से यह सेवा भाव देखा जा रहा है। सेवा वृंदावन के आनुष्ठानिक स्वरूप का अखंड भाग है। वृंदावन के मंदिरों को विभिन्न सांस्कृतिक कार्यकलापों से जोड़ने में यही सेवा भाव उत्प्रेरक है। यह भगवान एवं एक भक्त के मध्य के सुमधुर संबंध का परम प्रतीक है।

इस संस्करण में प्रयुक्त अधिकांश छायाचित्र निशांत शर्मा फोटोग्राफी के सौजन्य से प्राप्त किये गए हैं। उन अप्रतिम छायाचित्रों के लिए उनका विशेष आभार!!!

राधे-राधे !!!

यह सुशांत भारती द्वारा अभिदत्त एक अतिथि संस्करण है।

सुशांत भारती एक संरक्षण वास्तुकार हैं। उन्होंने वास्तुकला अकादमी कॉलेज ऑफ आर्किटेक्चर से वास्तुशास्त्र में स्नातक के उपाधि तथा नई दिल्ली के स्कूल ऑफ प्लैनिंग एण्ड आर्किटेक्चर से स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की है। भारत के विभिन्न सांस्कृतिक आयामों के शोध में उनकी विशेष रुचि है। वास्तु विविधता के साथ साथ उनके शोध के मूल विषय हैं, ‘ब्रज की सांस्कृतिक धरोहर’ एवं ‘भारतीय मंदिर वास्तुकला’। वर्तमान में वे नई दिल्ली के जनपथ पर स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय के राष्ट्रीय संग्रहालय संस्थान में रिसर्च असिस्टन्ट के पद पर कार्यरत हैं।

सुशांत भारती द्वारा लिखा यह संस्करण अवश्य पढ़ें – RasikPriya – The Geet Govind of Bundelkhand

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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नवरात्रि उत्सव में सर्वोत्तम डांडिया रास एवं गरबा गीत https://inditales.com/hindi/navratri-garba-daandiya-raas-ke-prasiddh-geet/ https://inditales.com/hindi/navratri-garba-daandiya-raas-ke-prasiddh-geet/#comments Wed, 22 Sep 2021 02:30:14 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2422

नवरात्रि अपने साथ में गरबा व डांडिया रास ले कर आती है। यूँ तो नवरात्रि देश भर में भिन्न भिन्न रीति से मनायी जाती है, किन्तु उनमें सर्वाधिक लोकप्रिय है पारंपरिक गुजराती नवरात्रि। अपने घर में देवी माँ की पूजा-अर्चना कर हम संध्या की प्रतीक्षा करते हैं जब हमारे पग अनायास ही पारंपरिक गुजराती उत्सव […]

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नवरात्रि अपने साथ में गरबा व डांडिया रास ले कर आती है। यूँ तो नवरात्रि देश भर में भिन्न भिन्न रीति से मनायी जाती है, किन्तु उनमें सर्वाधिक लोकप्रिय है पारंपरिक गुजराती नवरात्रि। अपने घर में देवी माँ की पूजा-अर्चना कर हम संध्या की प्रतीक्षा करते हैं जब हमारे पग अनायास ही पारंपरिक गुजराती उत्सव पंडालों की ओर चल पड़ते हैं, जहां गरबा एवं डांडिया रास आयोजित किए जाते हैं। आरंभ में नवरात्रि के गरबे एवं डांडिया केवल गुजरात तक ही सीमित थे। गुजरात के बाहर भी केवल गुजराती समाज के लोग ही इस आयोजन में भाग लेते थे। किन्तु अब गरबा एवं डांडिया इस स्तर तक लोकप्रिय हो गए हैं कि ये केवल गुजरात अथवा भारत ही नहीं, अपितु विदेशों के अप्रवासी भारतीयों में भी प्रमुख आकर्षण बन गए हैं।

गरबा डांडिया रास गीत - नवरात्रि
गरबा डांडिया रास गीत के साथ नवरात्रि

रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधान धारण कर जब नर्तक व नर्तकियाँ, लोकप्रिय गरबा तथा डांडिया गीतों पर लहराते हुए नृत्य करते हैं तो वह दृश्य देखते ही बनाता है। इन गीतों में अनेक गीत ठेठ गुजराती भाषा में गाए गए पारंपरिक गीत होते हैं। इसमें मुंबई चित्रपट उद्योग कैसे पीछे रह सकता है? अनेक चित्रपटों में गरबा व डांडिया के दृश्य चित्रित किए गए हैं व उनके गीत अत्यंत लोकप्रिय भी हो गए हैं।

गरबा एवं डांडिया रास क्या हैं?

जैसा कि नाम से ही ज्ञात होता है, नवरात्रि देवी के नौ रात्रियों से संबंधित है। सम्पूर्ण भारत में नवरात्रि के नौ दिवस एवं रात्रि अपनी अपनी रीति से मनाए जाते हैं। बंगाल में दुर्गा पूजा मनाई जाती है तो तेलंगाना में बतुकम्मा, तमिलनाडु में गोलू सजाया जाता है तो उत्तर भारत शाकाहारी होकर उपवास करने लगता है। किन्तु इन सब में गुजरात का उत्सव सर्वाधिक रंगबिरंगा एवं जोशपूर्ण होता है जिसमें प्रमुख आकर्षण गरबा एवं डांडिया होते हैं।

गरबा गर्भ का द्योतक है जो प्रजनन क्षमता का प्रतीक है। मिट्टी के घट के भीतर दीप प्रज्ज्वलित कर, उसमें  देवी का आह्वान किया जाता है। इसे गरबा कहते हैं। घट के भीतर दीप प्रज्ज्वलित कर उनके भीतर देवी को आमंत्रित करने के लिए भक्तगण उसके चारों ओर नृत्य करते हैं। इस नृत्य को गरबा कहा जाने लगा। गरबा आरती से पूर्व किया जाता है। गरबा के चारों ओर नृत्य करते हुए भक्तगण लय में गोलाकार घूमते हैं जो हम  जैसे जीवों के लिए जीवन व मृत्यु के अनवरत चक्र का प्रतीक है। वहीं घट में विराजमान दीप, देवी सदृश, परम तत्व का द्योतक हैं। अतः गरबा की प्रकृति भक्तिभाव से परिपूर्ण है। इसमें गाए जाने वाले गीतों में देवी की स्तुति की जाती है।

अवश्य पढ़ें:  देवी के नामों पर आधारित ५० भारतीय नगरों के नाम

नवरात्रि समारोह

डांडिया रास साधारणतः आरती के पश्चात किया जाता है। कुछ सूत्रों के अनुसार आरंभ में डांडिया केवल पुरुषों द्वारा किया जाता था। किन्तु अब इसे स्त्री व पुरुष दोनों ही करते हैं। इस नृत्य में रंबबिरंगी डंडियों का प्रयोग किया जाता है तथा यह नृत्य जोड़े में किया जाता है।

डांडिया नृत्य की डंडियाँ वास्तव में देवी के शस्त्रों का प्रतीक हैं जिनका प्रयोग कर देवी ने असुरों का वध किया था। डांडिया करते समय विभिन्न मुद्राओं में इन डंडियों को शस्त्रों जैसा मान दिया जाता है। इस नृत्य में प्रचुर मात्रा में उत्साह व ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

डांडिया का सर्वोत्तम आकर्षण है नर्तकों का परिधान। पुरुषों का पारंपरिक परिधान है, केडियु, कफ़नी पैजमा तथा पगड़ी। केडियु को कांच के टुकड़ों एवं बेल-बूटियों की कढ़ाई द्वारा सजाया जाता है। स्त्रियाँ कसीदाकारी युक्त रंगबिरंगे भव्य लहंगे, चोली एवं उससे भी अधिक चटक व अलंकृत ओढ़नियाँ धारण करती हैं। उन्हे देख ऐसा प्रतीत होता है मानो साक्षात देवी धरती पर अवतरित हुई हैं।

गुजरात में डांडिया पंडाल के दर्शन, रंगों के सर्वोत्तम सम्मिश्रण में घुल जाने जैसा होता है। क्यों ना हो? यह विश्व का विशालतम नृत्योत्सव जो है।

डांडिया रास के गरबा गीत

नवरात्रि के पारंपरिक गुजराती डांडिया व गरबा गीत

फाल्गुनी पाठक द्वारा – केसरियो रंग तने लाग्योल्या गरबा

यह विडिओ लोकप्रिय गायिका/कलाकार फाल्गुनी पाठक का है जो १८ अक्टोबर २०१२ के दिन, मुंबई के गोरेगांव स्पोर्ट्स क्लब में मंगल एंटरटेनमेंट द्वारा आयोजित मंगल नवरात्रि में सादर कर रही थी। देखिए उनके गाये दो लोकप्रिय गुजराती गीत, केसरियो रंग तने लाग्योल्या गरबा एवं हामु काका बाबा न पोरिया

के ओढनी ओढू ओढू ने उड़ी जाए   

गायिका अलका याग्निक एवं गायक प्रफुल देव द्वारा सादर किया गया ये गीत, के ओढनी ओढू ओढू ने उड़ी जाए सुनिए जो, सारेगामा इंडिया लिमिटेड के मेरु मालन अल्बम से लिया गया है। इसके गीतकार हैं, कान्ति अशोक तथा संगीतकार हैं, महेश-नरेश।

मेहंदी ते वावी – रंग गयो गुजरात

आईए सुनें यह नवरात्रि का विशेष डांडिया गरबा गीत जिसे अपने सुमधुर स्वरों में प्रस्तुत किया है, गरबा गीतों की महाराज्ञी व लोकप्रिय गायिका फाल्गुनी पाठक ने।

गुजराती भाषा में सर्वोत्तम डांडिया गरबा गीतों का अद्भुत सम्मिश्रण

गुजराती भाषा में गाये गए १० नवरात्रि-विशेष गरबा गीत, जिन्हे आप अवश्य देखिये। इनका आनंद उठाईये एवं उनके सुरों पर झूमकर नृत्य करिये।

  • नवरात्र नवेली बड़ी अलबेली
  • पडवेथि पेलु मानु नोरतु जीवे
  • रमतो भमतो जाय माँ नो गरबो रमतो जाय
  • हिचको अम्बा तानो संभालये
  • सोनानों गरबो रुपानो गरबो
  • अम्बे माँ नो घम्मर घड़ोलिओ
  • तरने तरने अमे मेले ज्ञाता
  • माँ तारो गरबो झाकमझोल
  • झूले खुले छे गबरनी माँ आंबा झूले छे
  • पत्णनि शहरणि नार पदमणि

ये सभी गीत राघव म्यूजिक कंपनी द्वारा प्रकाशित गरबा गीत झंकारो एलबम से लिए गए हैं। इन गीतों के गीतकार हैं, मनुभाई रबारी धनुदास ने तथा इन्हे अपने स्वरों से सजाया है, कविता, जयदीप एवं दीपक ने।

बॉलीवुड के गरबा गीत

अब हिन्दी भाषा में कुछ चुने हुए गरबा गीतों की सूची प्रस्तुत है जिनमें कुछ पारंपरिक गीत हैं तथा कुछ बॉलीवुड चित्रपटों में प्रदर्शित किए गए गीत हैं।

सबसे बड़ा तेरा नाम रे

हे नाम रे सबसे बड़ा तेरा नाम ओ शेरोवाली, ऊँचे डेरों वाली, बिगड़े बना दे मेरे काम, माँ शेरावाली की स्तुति में प्रस्तुत इस भक्तिगीत का विडिओ सुनें व देखें। इसके लिए निम्न वेब स्थल पर जाएँ।

He Naam Re Sabse Bada Tera Naam – Sherawali Mata, Devotional Song

ओ शेरोंवाली गीत – चित्रपट-सुहाग

सुहाग चित्रपट का यह गीत, ओ शेरोंवाली सुनिए। इस चित्रपट के नायक-नायिका अमिताभ बच्चन एवं रेखा हैं। इस गीत के रचयिता आनंद बक्शी हैं तथा लक्ष्मीकांत प्यारेलाल इसके संगीतकार हैं। इसे गाया है, आशा भोसले एवं मोहम्मद रफी ने। इस गीत का विडिओ देखने के लिए निम्न वेबस्थल पर जाएँ।

O Sheronwali | Amitabh Bachchan | Rekha | Suhaag 1979 Songs | Asha Bhosle | Mohd Rafi

मैं तो भूल चली बाबुल का देश – चित्रपट-सरस्वतीचंद्र

१९६८ में निर्मित चित्रपट, सरस्वतीचंद्र में मुख्य भूमिका नूतन, मनीष, विजय चौधरी एवं डॉ रमेश देव ने निभायी है। इस चित्रपट को गोविंद सरैया ने निर्देशित किया है। मैं तो भूल चली बाबुल का देश, पिया का घर प्यारा लगे, इस गीत को सुरों से सजाया है, कल्याणजी आनंदजी ने व इस गीत को अपने स्वर प्रदान किए, लता मंगेशकर ने। इस गीत का आनंद उठाने के लिए निम्न वेबस्थल पर जाएँ।

Main To Bhool Chali Babul Ka Des

ढोली तारो ढोल बाजे – चित्रपट-हम दिल दे चुके सनम

चित्रपट हम दिल दे चुके सनम का एक लोकप्रिय गीत है, ढोली तारो ढोल बाजे। इसके संगीतकार हैं, इस्माइल मर्चेन्ट एवं इसे हरिहरण एवं कविता कृष्णमूर्ति ने गाया है। इस चित्रपट के निर्माता व निर्देशक संजय लीला भंसाली हैं एवं इसके कलाकार सलमान खान, ऐश्वर्या राय एवं अजय देवगन हैं।

अवश्य पढ़ें: बॉलीवुड के २० सर्वोत्तम वर्षा गीत – वर्षा ऋतु का संगीत

राधा कैसे ना जले – चित्रपट-लगान

लगान चित्रपट में चित्रित इस मधुर गीत में कृष्ण राधा को छेड़ रहे हैं। आमिर खान एवं ग्रेसी सिंग पर चित्रित इस गीत के बोल जावेद अख्तर ने लिखे हैं तथा उसे संगीतबद्ध किया है, ए. आर. रहमान ने। सोनी म्यूजिक एंटेरटैनमेंट प्राइवेट लिमिटेड के अंतर्गत इस गीत को आशा भोसले एवं उदित ने गाया है।

नगाड़ा संग ढोल बाजे – चित्रपट-गलियों की रासलीला राम-लीला

नगाड़ा संग ढोल बाजे, गलियों की रासलीला राम-लीला चित्रपट में चित्रित इस गीत के साथ नवरात्रि का आनंद उठाइए। इस चित्रपट में मुख्य भूमिका दीपिका पादुकोण एवं रणवीर सिंग की है। श्रेया घोषाल एवं ओसमान मीर द्वारा गाए गए इस गीत के रचयिता सिद्धार्थ-गरिमा एवं संगीतकार संजय लीला भंसाली हैं।

छोगाड़ा तारा – चित्रपट-लवयात्री

बॉलीवुड चित्रपट लवयात्री का यह गीत, छोगाड़ा तारा, गरबा नृत्य करने के लिए नवीन एवं लोकप्रिय गीत है। इस चित्रपट में आयुष शर्मा एवं वारीना हुसैन मुख्य भूमिका में हैं तथा इसका निर्देशन अभिराज मिनावाला ने किया है। इस लोकप्रिय गीत को दर्शन रावल एवं असीस कौर ने गाया है। इस गीत के बोल दर्शन रावल ने लिखे हैं जिसमें शब्बीर अहमद ने भी सहयोग किया है। इसके संगीतकार लीलो जॉर्ज तथा डीजे चेतस हैं। यह गीत अविनाश व्यास द्वारा रचित व संगीतबद्ध गीत, ‘हे रंगालो’ पर आधारित है।

अवश्य पढ़ें: रेलगाड़ी पर चित्रित बॉलीवुड के २० सर्वोत्तम गीतों के विडिओ देखें।

कमरिया – चित्रपट-मित्रों

मित्रों चित्रपट का यह ऊर्जा भर गीत प्रस्तुत है। इस चित्रपट में जॅकी भगनानी एवं कृतिका कामरा ने मुख्य भूमिका निभाई है। कमरिया, यह गीत नृत्य समारोहों का प्रिय गीत है। दर्शन रावल द्वारा गाये इस गीत को संगीतबद्ध किया है, लीलो जॉर्ज तथा डीजे चेतस ने तथा इसके बोल लिखे हैं, कुमार गायकों ने।

अवश्य पढ़ें: बॉलीवुड गीत – लोकप्रिय भारतीय पर्यटन गंतव्य एवं स्मारकें

तो, इनमें से आपके प्रिय गरबा डांडिया गीत कौन से हैं?

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे  

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केरल की सर्प नौका दौड़ – अप्रवाही जल पर गति का तांडव https://inditales.com/hindi/sarp-nauka-daud-alleppey-kerala/ https://inditales.com/hindi/sarp-nauka-daud-alleppey-kerala/#respond Wed, 04 Mar 2020 02:30:52 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1720

केरल की सर्प नौका दौड़ अर्थात स्नैक बोट रेस के विषय में मेरी प्रथम स्मृति मेरी पाठ्यक्रम पुस्तक से जुड़ी हुई है। मुझे स्मरण है, मैंने अपनी पुस्तक में सर्प के समान एक लंबी नौका का श्वेत-श्याम चित्र देखा था जिसका एक छोर सर्प के फन के समान उठा हुआ था। वह चित्र मेरी आँखों […]

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केरल की सर्प नौका दौड़ अर्थात स्नैक बोट रेस के विषय में मेरी प्रथम स्मृति मेरी पाठ्यक्रम पुस्तक से जुड़ी हुई है। मुझे स्मरण है, मैंने अपनी पुस्तक में सर्प के समान एक लंबी नौका का श्वेत-श्याम चित्र देखा था जिसका एक छोर सर्प के फन के समान उठा हुआ था। वह चित्र मेरी आँखों में स्वप्न के रूप में अमिट छाप छोड़ गया था। किसी दिन मैं केरल के अप्रवाही जल पर आयोजित इस सर्प नौका दौड़ को स्वयं अपनी आँखों से देखूँ। भले ही मेरे इस स्वप्न को साकार होने में कई दशक लग गए किन्तु मेरा स्वप्न सत्य अवश्य हुआ।

केरल की प्रसिद्द सर्प नौका दौड़कुछ दिनों पूर्व मैं अलपुझा अर्थात अल्लेप्पी गई थी। मेरी इस यात्रा का उद्देश्य था ६७वीं. नेहरू नौका दौड़ देखना। साथ ही मैं हाल ही में आरंभ की गई चॅम्पियन्स बोट लीग की सर्वप्रथम दौड़ भी देखना चाहती थी।

केरल की सर्प नौका दौड़ का इतिहास

अलपुझा केरल का जलप्रधान जिला है। इस क्षेत्र में कई आड़ी –तिरछी अप्रवाही जल-धाराएं हैं जो अरब सागर से जुड़ी हुई हैं। यहाँ आप कहीं भी चले जाएँ, आप जल के समीप ही रहते हैं। जल यहाँ के निवासियों के जीवन का एक अभिन्न अंग है। जैसे हम अनजाने ही चलना सीख जाते हैं, ठीक वैसे ही यहाँ के निवासी अनजाने ही समुद्र के जल में तैरना सीख जाते हैं। यहाँ के प्रत्येक घर में कम से कम एक नौका अवश्य रहती है तथा परिवार के प्रत्येक सदस्य नौका खेना जानता है।

केरल के मंदिरों का जलोत्सव

परंपरा के अनुसार नौका दौड़ मंदिर के उत्सव का ही एक भाग था। भगवान की उत्सव मूर्ति को नौका में बिठाकर समुद्र के अप्रवाही जल पर शोभायात्रा निकली जाती थी। यह उत्सव ३ दिवसों तक जारी रहता था। भगवान की उपस्थिति में लोग नौका दौड़ में भाग लेते थे। इस क्षेत्र में कई प्रकार के जलोत्सव आयोजित किए जाते थे। प्राचीन काल में नौका दौड़ का समय पंचांग देखकर तय किया जाता था।

केरल के सर्प नौका दौड़ को मलयालम भाषा में वल्लम काली कहा जाता है। पारंपरिक रूप से इस स्पर्धा का आयोजन ओणम पर्व के आसपास किया जाता है।

युद्ध नौकाएं

लगभग ५००-६०० वर्षों पूर्व, इस प्रकार की नौकाओं का प्रयोग पड़ोसी राज्य के राजा आपस में युद्ध करने के लिए युद्ध नौकाओं के समान करते थे।

२० वीं. सदी के अवतार स्वरूप, तात्कालीन प्रधान मंत्री नेहरू ने इस नौका दौड़ की एक रोलिंग ट्रॉफी घोषित कर दी। तब से केरल के नौका दौड़ प्रतियोगिता में भाग लेने वाले समुदायों में नेहरू नौका दौड़ ट्रॉफी एक अत्यन्त महत्वपूर्ण आयोजन बन गया है।

चॅम्पियन्स बोट लीग

केरल के सर्प नौका दौड़ का नवीनतम अवतार है, चॅम्पियन्स बोट लीग। इसका शुभारंभ इस वर्ष २०१९ में किया गया है। लीग के रूप में कुल ९ टोलियाँ अर्थात दलों की नीलामी होगी। इस लीग का कुल समयकाल ३ मास है जब केरल के सम्पूर्ण जलक्षेत्र में नौका दौड़ प्रतियोगिताएं आयोजित किए जाएंगे।

इस प्रकार दौड़ का आयोजन करने पर अधिकतम लोगों को इस दौड़ में भाग लेने तथा देखने का आनंद प्राप्त हो सकेगा। दौड़ प्रतियोगिता उस समय आयोजित की जाती है जब केरल में अधिक पर्यटक नहीं होते। केरल राज्य के बाहर के लोगों को भी इस प्रतियोगिता में भाग लेने का अवसर प्राप्त हो, इसलिए २५ प्रतिशत टोलियाँ राज्य के बाहर से आमंत्रित करने की अनुमति होती है। मैंने उत्तर पूर्वी भारत के सदस्यों की ए टोली यहाँ देखी थी।

नौका दौड़ आयोजन को बढ़ावा देने के लिए, केरल पर्यटन विभाग शीघ्र ही एक नौका संग्रहालय का आरंभ करने की योजना बना रहा है।

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केरल सर्प नौका दौड़ की समयसारणी

वल्लम कली - केरल की पारंपरिक नौकाएं
वल्लम कली – केरल की पारंपरिक नौकाएं

नेहरू ट्रॉफी नौका दौड़ – इसका आयोजन अलपुझा के पुन्नमदा झील में अगस्त के दूसरे रविवार के दिन किया जाता है। इस वर्ष बाढ़ के कारण इस आयोजन को विलंबित किया गया है।

चंपाकुलम मूलम नौका दौड़ – इसका आयोजन भी अलपुझा जिले में किया जाता है। यह आयोजन अंबलपुजा में स्थित श्री कृष्ण मंदिर के उत्सव का एक भाग है। ऐसा माना जाता है कि जब मंदिर की मूर्ति को मंदिर तक लाया जा रहा था, वह कुछ क्षण के लिए यहाँ रुक गई थी। इसके दर्शन के लिए इसके चारों ओर नौकाएं एकत्र हो गई थीं। वही दृश्य अब तक दुहराया जाता है। यह कदाचित प्राचीनतम पारंपरिक दौड़ है। प्रत्येक वर्ष आयोजित किए जाने वाली प्रतियोगिताओं में यह वर्ष की प्रथम दौड़ भी है। यह वर्षा ऋतु के आरंभ में, जून/जुलाई में आयोजित की जाती है।

अरणमुला नौका दौड़ – पंपा नदी पर आयोजत की जाने वाली यह दौड़ अरणमुला पार्थसारथी मंदिर के वार्षिक उत्सव का भाग है जो प्राचीनतम जलोत्सवों में से एक है। इसका आयोजन श्री कृष्ण द्वारा पंपा नदी को पार करने की घटना की स्मृति में किया जाता है।

पईपड़ जलोत्सव – यह हरिपड़ के स्वामी सुब्रमन्य मंदिर में आयोजित ३ दिवसीय जलोत्सव है। ऐसा माना जाता है कि एयप्पा स्वामी की मूर्ति कायमकुलम झील से प्राप्त हुई थी। यह उत्सव उस मूर्ति के इस मंदिर के भीतर स्थापना किए जाने की स्मृति में आयोजित किया जाता है।

अन्य उत्सव

साडी पहने महिलाएं नौका दौड़ में
साडी पहने महिलाएं नौका दौड़ में

इंदिरा गांधी स्मारक नौका दौड़, एर्णाकुलम के मरीन ड्राइव में ओणम के समय आयोजित किया जाता है।
राष्ट्रपति ट्रॉफी नौका दौड़, कोलम के अष्टमुंडी झील में आयोजित की जाती है।
कलड़ा नौका दौड़ कोलम के कलड़ा नदी में आयोजित की जाती है।
कुमारकोम नौका दौड़
कानेट्टी श्री नारायण नौका दौड़ कोलम के करूनागपल्ली में आयोजित की जाती है।
थजथंगड़ी नौका दौड़, कोट्टायम
गोथुरुथ नौका दौड़ एर्णाकुलम के पेरियार नदी में आयोजित की जाती है।
पिरवोम नौका दौड़, पिरवोम

मैं प्रयास कर रही हूँ कि आपको इन आयोजनों की पंचांग तिथियाँ ढूंढकर दूँ जिससे आप स्वयं ही प्रत्येक वर्ष इनके समय की गणना कर सकें। तब तक के लिए आप केरल पर्यटन द्वारा अपने वेबस्थल ‘उत्सव समयसारिणी’ में प्रत्येक वर्ष प्रकाशित तिथियाँ देख सकते हैं।

कुछ छोटी नौका दौड़ आयोजनों की सूची आप यहाँ देख सकते हैं

चॅम्पियन बोट लीग केरल का सर्वाधिक नवीन आयोजन है जिसमें विभिन्न दलों को राज्य स्तर पर भाग लेने की अनुमति प्रदान की जाती है।

अवश्य पढ़ें: अष्टमुंडी झील – केरल के अतिसुन्दर अप्रवाही जल में नौका विहार

चूडन वल्लम अर्थात सर्प नौका

पतली लम्बी चूड्म वल्ली नौका
पतली लम्बी चूड्म वल्ली नौका

केरल की प्रसिद्ध नौकाएं, जिन्हें मैं यहाँ सर्प नौका कह रही हूँ, उन्हें मलयालम भाषा में चूडन वल्लम कहा जाता है। यह लकड़ी की बनी एक संकरी लंबी नौका है जिसकी लंबाई लगभग १००-१५० फीट तक होती है। इसके पृष्ठभागीय छोर की ऊंचाई २० फीट तक होती है जिससे यह नौका सर्प के समान दिखायी पड़ती है। इस प्रकार की नौकाओं के निर्माण की कला का उद्भव प्राचीन हिन्दू शास्त्र, स्थापत्य शास्त्र, से हुआ है। उदाहरण के लिए इसका पेंदा एक विशेष आकार की लकड़ी से ही निर्मित किया जाता है।

एक चूडन वल्लम एक समुदाय अथवा एक गाँव की अधिकारिक संपत्ति होती है। इन नौकाओं का अत्यन्त सम्मान से प्रयोग किया जाता है। इन पर चढ़ने से पूर्व लोग अपने जूते-चप्पल उतार देते हैं। उत्तम रखरखाव की सहायता से ये नौकाएं एक समुदाय में कई पीढ़ियों तक चलती रहती हैं।

दौड़ के पहले विश्राम करती नौका
दौड़ के पहले विश्राम करती नौका

इस नौका के निर्माण में अंजली लकड़ी का प्रयोग किया जाता है जो स्थानीय स्तर पर उपलब्ध है। नारियल के वृक्ष के प्राप्त लकड़ी से इसकी पतवारें निर्मित की जाती हैं। गाँव में आप ऐसी नौकाओं को देख सकते हैं। दौड़ से एक दिवस पूर्व इन नौकाओं को स्वच्छ किया जाता है। उस पर रंगरोगन कर उसे चमकाया जाता है। यह गाँव के सम्मान का प्रश्न जो है।

इनके अलावा अन्य भी कई नौकाएं हैं जो आकार में किंचित छोटी हैं। हमने स्त्रियों को इन छोटी नौकाओं पर सवार होकर प्रतियोगिता में भाग लेते देखा। पल्लीयोडम इन सर्प नौकाओं का एक अन्य नाम है।

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सर्प नौका दौड़ की टोलियाँ

१९५५ में अस्तित्व में आया यूनाइटेड बोट क्लब केरल का सर्वाधिक प्राचीन बोट क्लब है। हमने इस क्लब के दो सदस्यों, श्री सुनील एवं श्री प्रमोद से चर्चा की। उन्होंने हमें बताया कि यूनाइटेड बोट क्लब ने १४ बार नेहरू बोट ट्रॉफी जीती है, जिसमें ३ बार लगातार अनवरत ३ वर्षों तक जीती है। २०१३ उनके लिए विशेष है क्योंकि उस वर्ष उनका नेतृत्व एक स्त्री, हरिता अनिल ने किया था। उन्होंने हमें नौका दौड़ के लिए एक टोली की संरचना कैसी होनी चाहिए, यह समझाया।

अपनी मौका के साथ नौका चलाने वाले
अपनी मौका के साथ नौका चलाने वाले

एक टोली में ११० तक सदस्य हो सकते हैं। उनमें से ८५ सदस्य चप्पू चालक होते हैं जिन्हे तुजकर कहा जाता है। २ से ३ किलो भार के छोटे छोटे चप्पुओं द्वारा वे नौका खेते हैं।

५ सदस्य नौका के दोनों छोर से नौका की दिशा तय करते हैं। इन्हें वलियवीडु कहा जाता है। उनके चप्पू लंबे तथा १५ किलो तक भारी हो सकते हैं।

नारियल की लकड़ी से बना चप्पू
नारियल की लकड़ी से बना चप्पू

नौका में ११ संगीतज्ञ होते हैं जिन्हे तजकर कहा जाता है। उनमें २ सदस्य ढोल बजाते हैं तथा ९ सदस्य नौका गीत गाकर अन्य सदस्यों की हिम्मत बढ़ाते हैं। अपने सदस्यों को प्रोत्साहित करने के लिए जो नौका गीत वे गाते हैं, उसे वंचिपट्टु कहा जाता है। नौका पर सवार सदस्य विभिन्न क्षेत्रों से आते हैं। कुछ किसान तो कुछ मछुआरे तथा कुछ विद्यार्थी तो कुछ नौकरी-धंधे में संलग्न हो सकते हैं। सर्व सदस्य १८ से ३० वर्ष की आयु सीमा के मध्य होते हैं। कुछ अतिरिक्त सदस्य भी होते हैं जो किसी विपरीत परिस्थिति में किसी सदस्य के विकल्प के रूप में उपस्थित होते हैं।

ताल

इन नौकाओं की ताल देखते ही बनती है। इनका खरा अनुभव प्राप्त करने के लिए इन्हे प्रत्यक्ष देखना आवश्यक है। आप सोच में पड़ जाएंगे कि वे वास्तव में नृत्य कर रहे हैं या युद्धाभ्यास का खेल खेल रहे हैं।

वल्लम कल्ली के प्रतियोगी
वल्लम कल्ली के प्रतियोगी

प्रतियोगिता से लगभग एक मास पूर्व से विभिन्न दलों का पूर्वाभ्यास आरंभ हो जाता है। वे प्रातः ३ घंटे तथा दोपहर के समय ३ घंटों तक अभ्यास करते हैं। इस के अंतर्गत वे केवल उत्तम तादाम्य के साथ नौका खेने का ही अभ्यास नहीं करते, बल्कि कसरत द्वारा शक्ति एवं आंतरिक बल में वृद्धि भी करते हैं। कसरत करने के लिए वे दौड़ते हैं, भारोत्तोलन करते हैं तथा योग भी करते हैं।

प्रतियोगिता से पूर्व वे अपनी नौका को सज्ज करते हैं। प्रतियोगिता से पूर्व जब हमने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई तो हमने देखा कि एक टोली अपने पतवारों को चमका रही थी तो दूसरी टोली अपनी नौका को रंग-रोगन देने का कार्य पूर्ण कर रही थी। एक टोली अपने प्रशिक्षक, एक सेवा निवृत्त सेना कप्तान, से प्रतियोगिता के विषय में कुछ बारीकियाँ समझ रही थी। अपने गाँव के चारों ओर स्थित अप्रवाही जल पर इन टोलियों को नौका दौड़ में भाग लेते देखना अत्यन्त आनंद की अनुभूति है।

दौड़ प्रतियोगिता सम्पन्न होने के पश्चात सारे प्रतियोगी जल में छलांग लगाते हुए ऊंचे स्वरों में अपने ईश का नामोच्चारण करते हैं, जैसे आरपो-रोरो, स्वामी आयप्पा अथवा जय श्री राम इत्यादि।

वल्लम काली अनुष्ठान अर्थात सर्प नौका दौड़ प्रतियोगिता

यद्यपि सर्प नौका दौड़ अब व्यावसायिक खेल का रूप लेने लगी है तथापि एक पारंपरिक खेल होने के कारण यह इस धरती के संस्कारों से अधिक दूर नहीं जा सकती। या कहूँ, यहाँ के जल के संस्कारों से भिन्न नहीं हो सकती है।

कथकली नर्तक नेहरु बोट रेस के उद्घाटन पर
कथकली नर्तक नेहरु बोट रेस के उद्घाटन पर

प्रतियोगिता के दिन, सर्व टोलियाँ प्रातः ६:३० बजे मंदिर में दर्शन के लिए जाते हैं। सभी दल अपने अपने मंदिर में जाते हैं। जैसे यूनाइटेड बोट क्लब के सदस्य पनेक्कल शिव मंदिर जाते हैं। तत्पश्चात वे गिरिजाघर जाते हैं। इसके पश्चात ११ बजे तक वे स्वास्थ्य से परिपूर्ण स्वल्पाहार ग्रहण करते हैं। दोपहर का भोजन करने के पश्चात वे दोपहर २ बजे तक वल्लम काली अर्थात नौका दौड़ प्रतियोगिता के लिए सज्ज हो जाते हैं।

उद्घाटन समारोह के समय पारंपरिक ढोल बजाए जाते हैं। कथकली एवं बाघ नर्तक नौकाओं पर नृत्य करते हैं। दर्शकों के समक्ष ट्रॉफी का अनावरण किया जाता है। एक नौका पर रखे मंदिर में पूजा अर्चना की जाती है। चारों ओर उत्साह एवं उत्सव का वातावरण आकाश के रंगों को आत्मसात करते हुए हमें आत्मविभोर करने लगता है।

अलपुझा के पुन्नमदा झील के दोनों ओर दर्शकों की कतार लग जाती है। १.२५ किलोमीटर लंबे जलमार्ग को पार कर नौकाएं झील में स्थित नेहरू टापू तक पहुंचते हैं।

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केरल की नौका दौड़ प्रतियोगिता के जादू का दर्शन

सर्प नौकाओं को सर्प के समान चपलता व गति से आगे बढ़ते देखना किसी जादू से कम नहीं है। तजकरों के गीत एवं संगीत अन्य ध्वनियों को मंद कर देते हैं। लयबद्ध चलते चप्पू एक साथ जब जल को काटते हुए उसे उछालते हैं वह दृश्य किसी गतिमान गद्य के समान प्रतीत होता है।

छोटी नौकाएं
छोटी नौकाएं

नौका के सभी सदस्यों के परिधानों के रंग कुछ इस प्रकार होते हैं मानो उनके रंग आपस में ही प्रतियोगिता कर रहे हों। यह नौका दौड़ प्रतियोगिता कौन जीतेगा अथवा कौन हारेगा, एक दर्शक के रूप में मुझ पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला था। मेरी तो केवल इतनी ही अभिलाषा थी कि जल पर बजते किसी संगीत के समान इन नौकाओं को ऊपर-नीचे अठखेलियाँ करते देख सकूँ। चारों ओर स्थित नारियल के वृक्षों के संग मैं भी उनकी लंबी लंबी उछालों को देखने का आनंद उठा सकूँ।

अलपुझा में चॅम्पियन बोट लीग तथा नेहरू नौका दौड़

पोंनुमदा झील में नेहरू नौका दौड़ प्रतियोगिता के दिन वह स्थान लोगों एवं रेड़ी वालों से भरा हुआ था। रेड़ी वाले भिन्न भिन्न प्रकार की सीटियाँ एवं भोंपू बिक्री कर रहे थे। उस दिन यह प्रतियोगिता विशेष थी क्योंकि नेहरू नौका दौड़ एवं चॅम्पियन बोट लीग दोनों का आयोजन एक ही स्थान पर होने जा रहा था। प्रसिद्ध क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेंडुलकर इस आयोजन के मुख्य अतिथि थे। सचिन को एक नौका में सवार होकर उपस्थित प्रशंसकों का अभिवादन स्वीकार करते देख वही दर्शक बावले हुए जा रहे थे।

अल्लेप्पी की नौका दौड़
अल्लेप्पी की नौका दौड़

झील में रंग बिरंगे पताकाओं को लगाकर नौका दौड़ का जलपथ अंकित किया गया था। दर्शकों एवं झील के मध्य नारियल के वृक्षों की पंक्ति मानो आपस में ही प्रतियोगिता कर रहे हों, कौन इस दौड़ का अधिक आनंद उठाएगा। झील का जल एवं उसके चारों ओर स्थित हरे-भरे नारियल के वृक्ष हमें यथार्थ जीवन के कठोर सत्य से दूर लिए जा रहे थे। इन पर चार चाँद लगा रहे थे पंक्ति में खड़ी नौकाएं।

श्रेष्ठता का अभ्यास

प्रातःकाल ही सभी छोटी-बड़ी नौकाएं झील में उतर गई थीं। झील में एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाते हुए अधिकतर प्रतियोगी दोपहर में आयोजित होने वाली प्रतियोगिता का अभ्यास कर रहे थे। उनके साथ ही झील में जेट स्की तथा मोटरबोट थीं। साथ ही कई बड़ी नौकाएं थीं जो अतिमहत्वपूर्ण एवं गणमान्य व्यक्तियों सहित टिकटधारी दर्शकों को तट से टापू पर ले जा रही थीं। उनमें से कुछ के साथ अपने सुरक्षा कर्मी भी थे जो सम्पूर्ण आयोजन का जायजा ले रहे थे।

उद्घाटन समारोह की झलकियाँ
उद्घाटन समारोह की झलकियाँ

लगभग २ बजे रोमांच आरंभ होने लगा। सभी नौकाओं को १.२५ किलोमीटर तक जाने में ४ से ५ मिनटों का समय लगता है। आप कहाँ खड़े हैं यह निर्धारित करता है कि आप दौड़ का कौन सा भाग देखने वाले हैं। सौभाग्य से मैं अंत रेखा के समक्ष ही बैठी थी। अतः मुझे कई दौड़ों के रोमांचक अंत का आनंद उठाने का अवसर प्राप्त हुआ।

लयबद्ध रीति से चप्पू चलाकर जलसतह को काटते हुए जैसे ही नौकाएं अंत रेखा की ओर बढ़ने लगीं, चारों ओर उत्तेजना का वातावरण हो गया। दर्शक अपने इच्छित दल का उत्साह वर्धन कर रहे थे। सम्पूर्ण प्रक्रिया कुछ क्षणों में ही समाप्त हो जाती है। पलक झपकायी तो आप कुछ देख नहीं पाएंगे। किन्तु उत्साह एवं उत्तेजना इतनी शीघ्र समाप्त नहीं होती। विजयी होने का उत्सव दौड़ समाप्त होने के पश्चात भी बहुत देर तक जारी रहता है।

प्रमुख दौड़ों के मध्य अन्य प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। जैसे स्त्रियों की नौका दौड़ जिसमें स्त्रियाँ रंगबिरंगी साड़ियाँ धारण कर नौकाएं खेती हैं।

इस प्रतियोगिता के विजयी थे ट्रापिकल टाइटन। इनके विजय के समान उनका विजयोत्सव भी उतना ही मनोरंजक था।

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केरल नौका दौड़ प्रतियोगिता देखने के लिए कुछ यात्रा सुझाव

केरल नौका दौड़ के लिए यात्रा सुझाव नेहरू नौका दौड़ अगस्त के दूसरे रविवार को आयोजित की जाती है। अन्य प्रतियोगिताओं के लिए केरल पर्यटन का वेबस्थल देखें

प्रतियोगिता के टिकट ऑनलाइन उपलब्ध हैं। अन्यथा प्रतियोगिता स्थल से भी आप टिकट क्रय कर सकते हैं। प्रतियोगिता के टिकट १०० रूपये से लेकर ३००० रुपयों तक हैं। ३००० रुपयों का टिकट लेकर आप अतिविशिष्ट व्यक्तियों के साथ टापू पर बैठकर दौड़ देख सकते हैं।

यह स्थान अत्यन्त भीड़-भाड़ भरा होता है। अतः भीड़ का सामना करने के लिए सज्ज हो जाईए।

प्रतियोगिता स्थल पर मूलभूत खाद्य पदार्थ उपलब्ध हैं। केरल का सर्वप्रसिद्ध खाद्य पदार्थ, ‘केले के चिप्स’ केरल में हर ओर उपलब्ध हैं।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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होली का पर्व भारत का सर्वाधिक उल्हासपूर्ण पर्व है। इसी होली के आनंददायक पर्व का यदि आप कहीं पारंपरिक रूप से अनुभव लेना चाहते हैं तो वह स्थान है, ब्रज भूमि अथवा मथुरा वृन्दावन जो। ब्रज की होली का अपना ही आनंद है। रंगों का उत्सव – होली रंगों का पर्व होली भारत के कई […]

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होली का पर्व भारत का सर्वाधिक उल्हासपूर्ण पर्व है। इसी होली के आनंददायक पर्व का यदि आप कहीं पारंपरिक रूप से अनुभव लेना चाहते हैं तो वह स्थान है, ब्रज भूमि अथवा मथुरा वृन्दावन जो। ब्रज की होली का अपना ही आनंद है।

रंगों का उत्सव – होली

मथुरा वृन्दावन में ब्रज की होली
मथुरा वृन्दावन में ब्रज की होली

रंगों का पर्व होली भारत के कई महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह सम्पूर्ण भारत का सर्वाधिक आनंददायी उत्सव है। लोग एक दूसरे को अबीर गुलाल लगाकर उन्हें रंगों में सराबोर करते हैं। भिन्न भिन्न प्रकार के मिष्ठान बनाकर मित्रों एवं परिवारजनों में बाँटते हैं। यह पर्व जिस समय मनाया जाता है, उस समय भारत में फसल की कटाई होती है तथा उसकी बिक्री कर किसान के हाथों में धन आता है। मौसम भी अत्यंत सुहावना रहता है जब वह शीत ऋतु की चौखट के बाहर आ चुका होता है तथा ग्रीष्म ऋतु उसकी प्रतीक्षा में कुछ दूर खड़ी रहती है।

यद्यपि होली का उत्सव भारत के अधिकतर स्थानों में मनाया जाता है, तथापि रंगों का यह उत्सव उत्तर भारत में अधिक लोकप्रिय है।

होली के रंग

गुलाल और गेंदा
गुलाल और गेंदा

होली के रंगों में गुलाबी गुलाल सबका प्रिय रंग है। गुलाबी के साथ लोग लाल, हरे, नीले, पीले, जामुनी इत्यादि रंगों से भी होली खेलते हैं। प्राचीन काल में लोग प्राकृतिक वस्तुओं से होली के रंग प्राप्त करते थे जैसे, हल्दी, मेहंदी, केसर, सिन्दूर, रेत इत्यादि। ये आरोग्य को हानि नहीं पहुंचाते। कालान्तर में प्राकृतिक रंगों का स्थान रासायनिक रंगों ने ले लिया जिनमें कुछ हानिकारक भी हो सकते हैं। इसलिए अब यह प्रयत्न किये जा रहे हैं कि लोग अधिक से अधिक प्राकृतिक रंगों का प्रयोग करें।

श्री बांके बिहारी मंदिर की एक पुरानी पिचकारी
श्री बांके बिहारी मंदिर की एक पुरानी पिचकारी

होली में सूखे एवं जल मिश्रित, दोनों रंगों का प्रयोग होता है। मेरा अनुभव कहता है कि लोग रंगीन जल की होली का अधिक आनंद उठाते हैं। बच्चे प्रातः से ही गुब्बारों में रंगीन जल भरना आरम्भ कर देते हैं। तत्पश्चात एक दूसरे पर ये गुब्बारों मारते हैं। सड़क पर आतेजाते बेसुध लोगों पर गुब्बारे मारना उन्हें अधिक भाता है। पिचकारी में भी रंगीन जल भरकर लोगों पर दूर से वार करते हैं। पिचकारी से स्मरण हुआ कि मैंने वृन्दावन के ब्रज संग्रहालय में बांके बिहारी मंदिर की एक पुरानी किन्तु सुन्दर पिचकारी देखी थी।

रंगों से खेलने के पश्चात अनेक प्रकार के स्वादिष्ट मिष्ठान खाए एवं खिलाये जाते हैं। इनमें गुझिया सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। ठंडाई भी होली का सर्वप्रिय पेय है। इसमें कहीं कहीं भांग मिलाने की भी रीत है।

होली पर्व कब मनाते हैं?

यमुना किनारे होली के रंग
यमुना किनारे होली के रंग

हिन्दू पंचांग के अनुसार ब्रज में होली वसंत पंचमी से आरम्भ होकर फाल्गुन पूर्णिमा तक खेली जाती है। इस समयावधि के अंतिम चरण अर्थात् फाल्गुन पूर्णिमा के दिन होली सम्पूर्ण भारत में मनाई जाती है। जूलियन कैलेंडर के अनुसार यह लगभग मार्च के महीने में आती है। आप होली की सही तिथि के विषय में जानकारी किसी भी पञ्चांग अथवा इन्टरनेट से प्राप्त कर सकते हैं।

मथुरा वृन्दावन में होली का उत्सव लगभग ४० दिनों तक मनाया जाता है। आप चौंक गए ना! वास्तव में होली का पर्व फरवरी मास की बसंत पंचमी से आरम्भ होकर फाल्गुन में अपनी चरम सीमा पर पहुंचता है।

२०१९ में होली की तिथियाँ

१. लड्डू होली – १४ मार्च २०१९
२. लठमार होली – बरसाना में १५ मार्च २०१९ एवं नंदगाँव में १६ मार्च २०१९
३. श्री कृष्ण जन्मभूमि होली – मथुरा में १७ मार्च २०१९
४. बांके बिहारी मंदिर होली – वृन्दावन में १७ – २० मार्च २०१९
५. छड़ीमार होली – गोकुल में १८ मार्च २०१९
६. होलिका दहन – फालेन में २० मार्च २०१९
७. चतुर्वेदी समाज का डोला – मथुरा में २० – २१ मार्च २०१९
८. दाउजी का हुरंगा – बलदेव में २२ मार्च २०१९
९. मुखराय नृत्य – २२ मार्च २०१९

ब्रज की होली से सम्बंधित किवदंतियां

होली का पर्व ब्रजभूमि में मनाये जाने वाले दो सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं बड़े उत्सवों में से एक है। ब्रजभूमि का दूसरा बड़ा उत्सव है कृष्ण जन्माष्टमी। ८४ कोस अर्थात् लगभग ३०० किलोमीटर के क्षेत्र में फैली ब्रजभूमि की दो प्रमुख नगर हैं, मथुरा एवं वृन्दावन। आज के परिप्रेक्ष्य में, उत्तर प्रदेश एवं राजस्थान राज्यों के मध्य पसरा हुआ यह क्षेत्र श्रीकृष्ण की भूमि है। यहीं उन्होंने बाललीला एवं रासलीला रचाई थी। होली का पर्व उन उत्सवों में से है जो उनकी गाथाओं एवं किवदंतियों का मंगलगान करता है।

मथुरा वृन्दावन में ब्रज की होली के विभिन्न स्वरूप

जहां भारत के अन्य भागों में होली का त्यौहार रंगों एवं गीत-संगीत द्वारा मनाया जाता है, वहीं मथुरा वृन्दावन में कई भिन्न प्रकारों से होली मनाई जाती है। प्रत्येक होली की अपनी तिथी एवं अपना स्थान है। प्रत्येक वर्ष मनाई जाने वाली होली के इन भिन्न प्रकारों के विषय में कालानुक्रमिक रूप से यहाँ उल्लेख करना चाहती हूँ।

बरसाना की लड्डू होली

राधा एवं उनके पिता वृषभानु का गाँव है यह बरसाना। बरसाना में ब्रह्मगिरी पर्वत के शिखर पर राधा का एक सुन्दर मंदिर भी है।

बरसाना में होली के उत्सव का औपचारिक आरम्भ होता है जब नंदगाँव के निवासी बरसाना के निवासियों को होली का उत्सव मनाने के लिए आमंत्रित करते हैं। इसे फाग आमंत्रण उत्सव कहते हैं। इसी दिन बरसाना में लड्डू होली मनाई जाती है। दूसरे दिन बरसाना में तथा तीसरे दिन नंदगाँव में लठमार होली मनाई जाती है।

आप सोच रहे होंगे कि यह लड्डू होली वास्तव में क्या है! यह होली मन्दिर में मनाई जाती है जहां लोग एक दूसरे के ऊपर पीले पीले स्वादिष्ट लड्डू फेंकते हैं। इससे मुझे अपने विद्यालय में स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस के समारोह का स्मरण होता है। उन दिनों में हम भी दिए गए लड्डुओं से इसी प्रकार खेलते थे। लड्डू होली के समय सम्पूर्ण मंदिर पीतवर्ण हो जाता है जो कृष्ण का प्रिय रंग भी है। आप को स्मरण होगा, कृष्ण को पीताम्बर भी कहते हैं, जिसका अर्थ है पीतवस्त्र धारण करने वाला।

समय – फाल्गुन मास की शुक्ल अष्टमी

बरसाना व नंदगांव की लठमार होली

लट्ठमार होली - बरसना
लट्ठमार होली – बरसना

गोकुल में बचपन बीतने के पश्चात कृष्ण के पिता नन्द, कृष्ण एवं गोप-ग्वालों को लेकर सपरिवार नंदगांव में निवास करने लगे। नवयुवक कृष्ण नंदगांव एवं बरसाना में राधा एवं अन्य गोपिकाओं के संग होली खेलते थे। यहीं विश्व प्रसिद्ध लठमार होली मनाई जाती है। गाँव की स्त्रियाँ रंग में सराबोर पुरुषों को बड़ी लाठियों से पीटती हैं तथा गालियाँ सुनाती हैं। यदि आप इस प्रकार की अनोखी होली देखना चाहते हैं तो नंदगांव एवं बरसाना अवश्य जाएँ।

आपको अचरज होता होगा कि अंततः इस प्रकार की होली की रीत कहाँ से आयी? इस होली का सम्बन्ध कृष्ण एवं राधा से है। कृष्ण नंदगांव में रहते थे एवं राधा बरसाना गाँव की थी। इन दोनों गाँव के मध्य सम्बन्ध भी राधा एवं कृष्ण के सम्बन्ध से व्युत्पन्न है। कृष्ण के नंदगांव से पुरुष राधा के बरसना गाँव की स्त्रियों से होली खेलते हैं।

नंदगाँव की लट्ठमार होली
नंदगाँव की लट्ठमार होली

बरसाना की स्त्रियाँ नंदगांव के पुरुषों को लाठियों से मारती हैं। ढाल द्वारा पुरुष स्वयं को बचाने का प्रयत्न करते हैं। दोनों दल एक दूसरे को चुन चुन कर गालियाँ भी देते हैं। चारों ओर सम्पूर्ण वातावरण अबीर गुलाल से भर जाता है।

बरसाना नंदगाँव की लट्ठमार होली
बरसाना नंदगाँव की लट्ठमार होली

यदि आप इस समय यहाँ आना चाहें तो रंगों में सराबोर होने के लिए तत्पर रहिये। आप चाहकर भी रंगों से अछूते नहीं रह सकते। उसी प्रकार कुछ गालियाँ एवं मीठी छेड़खानी के लिए भी सजग रहिये, विशेषतः यदि आप स्त्री हैं। क्योंकि सम्पूर्ण वातावरण रंगों के साथ साथ ऊर्जा से भी ओतप्रोत हो जाता है।

समय – बरसना में फाल्गुन शुक्ल नवमी एवं नंदगांव में फाल्गुन शुक्ल दशमी

गोकुल की छड़ीमार होली

आप सब जानते हैं, बचपन में कृष्ण, यमुना नदी के बाएं तट पर स्थित गाँव, गोकुल में निवास करते थे। कृष्ण के जन्म के पश्चात उन्हें कंस से बचाने के लिए, उनके पिता वसुदेव ने तूफानी रात में उफनती यमुना नदी पार की तथा उन्हें गोकुल ले आये। कृष्ण ने अपना बालपन गोकुल में ही बिताया। इसलिए गोकुल में उनके बाल स्वरूप को पूजा जाता है।

गोकुल के अधिकाँश मंदिरों में आप नन्हे बालकृष्ण को झूले में विराजमान देखेंगे। मंदिरों में दर्शनार्थ आये भक्तगण इन्हें झूला झुलाते हैं।

गोकुल में छड़ीमार होली मनाई जाती है। इसके लिए एक छोटी नाजुक छड़ी का प्रयोग होता है। ये होली बरसाना एवं नंदगांव की लठमार होली का मृदु रूप है।

मथुरा की कृष्णजन्म भूमि का होली उत्सव

मथुरा के कृष्ण जन्मभूमि संकुल में एक विशाल प्रांगण है जहां होली मनाई जाती है। मुझे बताया गया कि यहाँ रंगों को फव्वारों द्वारा हवा में फेंका जाता है। प्रांगण में उपस्थित कोई भी इससे नहीं बच सकता। अंततः होली के उत्सव में कोई रंगों से क्यों बचना चाहेगा? रंगों में रंगे सब एकरूप हो जाते हैं। जात-पात, धर्म, धन एवं व्यक्तिमत्व की भिन्नता भूलकर सब प्रसन्नता से होली का उत्सव मनाते हैं।

समय – रंगभरी एकादशी अथवा फाल्गुन शुक्ल एकादशी

वृन्दावन में बाँके बिहारी के मंदिर की होली

श्री बांके बिहारी मंदिर की होली
श्री बांके बिहारी मंदिर की होली

वृन्दावन में सर्वाधिक आनंददायी स्थल है बाँके बिहारी का मंदिर। ४ दिवसों तक यहाँ होली का उत्सव जारी रहता है। यह फाल्गुन की एकादशी को आरम्भ होकर पूर्णिमा तक मनाया जाता है।

लोगों पर रंग उड़ाते पुजारियों की कई छवियाँ आपने भी देखी होंगी। उनमें से अधिकतर छवि इसी मंदिर की होंगी। यह एक प्रसिद्ध एवं भीड़भाड़ वाला मंदिर है।

समय – रंगभरी एकादशी अथवा फाल्गुन शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक

मथुरा के द्वारकाधीश मंदिर की होली

मथुरा के द्वारकाधीश मंदिर की होली
मथुरा के द्वारकाधीश मंदिर की होली

मथुरा वृन्दावन के अन्य मंदिरों के समान, विश्राम घाट के समीप स्थित रंगीन द्वारकाधीश मंदिर के परिसर में भी होली का उत्सव धूमधाम से मनाया जाता है।

मैंने द्वारकाधीश मंदिर के दर्शन होली से एक सप्ताह पूर्व किये थे। तब मैंने मंदिर परिसर के मंच पर स्त्रियों के समूहों को पारंपरिक गीत गाते देखा था। होली डोला एक प्रसिद्ध सांस्कृतिक शोभायात्रा है जो द्वारकाधीश मंदिर से आरम्भ होती है।

और पढ़ें: द्वारका का द्वारकाधीश मंदिर

मथुरा के चतुर्वेदी समाज का डोला

मथुरा का होली डोला
मथुरा का होली डोला

होली के अवसर पर चतुर्वेदी समाज द्वारा एक विशाल शोभायात्रा निकाली जाती है। यह विश्राम घाट के समीप स्थित द्वारकाधीश मंदिर से आरम्भ होती है तथा छत्ता बाजार, होली द्वार, कोतवाली द्वार, घिया मंडी तथा स्वामी द्वार होते हुए वापिस विश्राम घाट पहुंचती है।

जैसे जैसे शोभायात्रा आगे बढ़ती है, लोग एक दूसरे पर रंग, इत्र तथा पुष्प छिड़कते हैं। वादकों द्वारा बजाते संगीत के सुरों पर उत्सव गीत गाते हैं। पारंपरिक रूप से भांग का भी सेवन करते हैं।

होली डोला साधारणतः दोपहर २ बजे से आरम्भ होता है।

फगुआ

फगुआ एक ऐसी परंपरा है जहां देवर भाभी या जीजा साली से भेंट करते हैं तथा उन्हें उपहार देते हैं। अधिकांशतः उपहार के रूप में मिठाई के डिब्बे देते हैं। तथापि भेंट क्या हो, यह उपहार देने एवं लेने वालों पर निर्भर है।

स्त्रियाँ विवाह के पश्चात प्रथम होली का पर्व अपने मायके में मनाती हैं। तब उनके पतिदेव उपहार लेकर उनसे मिलने अपने ससुराल अर्थात पत्नी के मायके जाते हैं।

मेरे अनुमान से यह होली के उत्सव के औपचारिक समापन हेतु उत्तम रीत है, विशेषतः जब अज्ञानवश किसी के द्वारा किसी का अपमान हुआ हो। अतः, यदि आप एक स्त्री हैं तथा पुरुष वर्ग आपसे होली खेलने की इच्छा व्यक्त करता हो तो आप अधिकारपूर्वक उनसे फगुआ की मांग कर सकते हैं।

समय – चैत्र कृष्ण प्रथम – २० मार्च २०१९

फूलवाली होली अर्थात् पुष्पों की होली

मथुरा वृन्दावन में एक भिन्न प्रकार की मनभावन होली भी खेली जाती है। पुष्पों की होली! यह अपेक्षाकृत नवीन प्रथा प्रतीत होती है। यहाँ आयोजित अनेक समारोहों के एक भाग के रूप में यह एक अनोखा चलन बन गया है। कहीं लोग एक दूसरे पर पुष्पों की वर्षा करते हैं तो कहीं वे एक दूसरे पर पुष्पों की पंखुड़ियां फेंकते हैं।

इस प्रकार की होली के आयोजन को पारंपरिक रूप से अब तक मथुरा वृन्दावन के किसी भी मंदिर से सम्बंधित नहीं किया गया है। कौन जाने, भविष्य में होली मनाने की यह एक प्रमुख परंपरा बन जाये। क्यों ना हो, चारों ओर पुष्पों से घिरा रहना किसे नहीं भायेगा? वैसे भी, इस समय अनेक प्रकार व रंग के पुष्प इस क्षेत्र में उपलब्ध होते हैं।

मथुरा में निवास करती विधवाओं द्वारा खेली जाने वाली होली का मैं यहाँ विशेष उल्लेख करना चाहती हूँ। मेरे लिए वे भी ब्रज तथा भारत के उतने ही नागरिक हैं जितने हम। वे भी हमारे ही सामान होली का पर्व मनाते हैं।

मथुरा वृन्दावन के मंदिरों में होली उत्सव

मथुरा वृन्दावन अथवा ब्रज मंडल के लगभग प्रत्येक मंदिर में होली के मौसम में प्रत्येक दिवस होली खेली जाती है। पत्ते के एक दोने में गुलाबी रंग के गुलाल के साथ गेंदे के कुछ पुष्प भगवान् को अर्पित करते हैं। आप भगवान् के ऊपर गुलाल एवं पुष्प उछाल सकते हैं तथा स्वयं व आसपास के लोगों को गुलाल लगा भी सकते हैं।

वृन्दावन के एक मंदिर में होली के रंग
वृन्दावन के एक मंदिर में होली के रंग

मंदिर में मैंने अधिकतर परिवारों के सदस्यों को देखा जो रंगों से खेलते हुए होली के गीत गा रहे थे। उनमें एक था, ‘ आज बिरज में होली है रे रसिया’। मैंने कुछ लोगों को विश्राम घाट पर यमुना के साथ होली खेलते देखा। आप सोच रहे होंगे कि वे यमुना के संग कैसे होली खेल रहे थे? वे होली के गीत गाते हुए यमुना को सांकेतिक रूप से रंग लगाते थे। तत्पश्चात आपस में एक दूसरे को रंग लगाते थे।

होलिका दहन

होली के पर्व से राधा कृष्ण की कई गाथाएँ एवं रासलीलाएं जुड़ी हुई हैं। इसके साथ होली से एक अन्य किवदंती भी सम्बन्ध रखती है। जी हाँ! होलिका दहन की कथा।

होलिका दहन की कथा

एक समय हिरण्यकश्यप नामक एक शक्तिशाली दानव राज था जिसने सम्पूर्ण धरती पर अपना अधिपत्य स्थापित कर लिया था। उसने अपनी प्रजा को आदेश दिया कि वे भगवान् की पूजा अर्चना त्याग कर उसकी ही आराधना करें। संयोग देखिये, स्वयं उसके पुत्र प्रहलाद ने उसकी आराधना करना अस्वीकार किया। प्रहलाद भगवान् विष्णु का परम भक्त था। यह तथ्य हिरण्यकश्यप की सहनशक्ति से परे था।

कुंठित हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र की निष्ठा परिवर्तित करने के अनेक प्रयत्न किये। उसका ह्रदय परिवर्तन करने में असमर्थ होने पर उसकी हत्या करने के भी अनेक प्रयास किये। हिरण्यकश्यप अपने प्रत्येक प्रयास में असफल हुआ। अंततः उसने अपनी भगिनी होलिका से निवेदन किया कि वह प्रहलाद को गोद में लेकर अग्नि में प्रवेश करे। होलिका को वरदान प्राप्त था कि अग्नि उसे किसी भी प्रकार की हानि नहीं पहुंचा सकती।

विधि का विधान देखिये, भगवान् विष्णु के नाम का जप करते प्रहलाद को साथ लेकर जब होलिका ने अग्नि में प्रवेश किया, वरदान प्राप्त होलिका अग्नि में भस्म हो गयी किन्तु भक्त प्रहलाद सुरक्षित बच गए। यह अच्छाई की बुराई पर विजय का प्रतीक है।

इसी कथा के आधार पर, आज भी इस दिन, अर्थात् फाल्गुन पूर्णिमा के दिन, होलिका दहन करते हैं। लोग कंडे एवं लकड़ी का ढेर खडा कर उसे अग्नि को समर्पित करते हैं। भारत के अन्य भागों के समान मथुरा वृन्दावन में भी यह प्रथा निभाई जाती है। एक गाँव है, कोसी, जहां होलिका दहन किंचित भिन्न रीत से किया जाता है।

फलेन कोसी में जलती होली से पण्डे का निकलना

कोसी के समीप स्थित फलेन गाँव में भी, भक्त प्रहलाद की विजय के प्रतीक स्वरूप, होलिका दहन किया जाता है। एक पुजारी, जिसे यहाँ पंडा भी कहते हैं, गाँव के प्रहलाद मंदिर में पूजा अर्चना करते हैं। तत्पश्चात वे प्रहलाद कुण्ड में डुबकी लगाते हैं। इसके पश्चात वे सैकड़ों लोगों के समक्ष विशाल अग्नि के बीच से चलते हैं।

३० फीट दूर चलना कोई कठिन कार्य नहीं, किन्तु यदि जलती लकड़ियों के ऊपर चलना हो तो यह लगभग असंभव है। अग्नि के दूसरे छोर पर लोग गीले वस्त्र हाथों में लिए पण्डे की प्रतीक्षा करते हैं तथा उसके अंगों को शीतलता प्रदान करते हैं। इस सम्पूर्ण अग्नि यात्रा में कुछ क्षणों का ही समय लगता है जिसके अंत में पंडा सुरक्षित निकल आते हैं। तत्पश्चात वे अग्नि की परिक्रमा कर घर की ओर प्रस्थान करते हैं।

लोगों की मान्यता है कि यह प्रथा ब्रज के कृष्ण काल से चली आ रही है। ऐसा भी माना जाता है कि फलेन भक्त प्रहलाद का गाँव था। कहते हैं कि अग्नि में चलने से पूर्व, पंडा अर्थात् पुजारीजी सम्पूर्ण दिवस प्रहलाद के नाम का जप करते हैं।

यह भी ब्रज को होली का अनूठा रूप है।

समय – फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा

बलदेव के दाउजी मंदिर में दाऊ जी का हुरंगा

श्रीकृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता बलराम को प्रेम से दाऊ अथवा दाउजी भी कहा जाता था। यमुना के दूसरे छोर पर, मथुरा से लगभग ३० किलोमीटर दूर, ब्रज के एक क्षेत्र बलदेव में बलराम को समर्पित एक विशाल मंदिर है। एक समय यह ब्रज के १२ वनों में से एक, खदिर वन का एक भाग था।

ब्रज की होली
ब्रज की होली

दाउजी का मंदिर ऐसा स्थान है जहां मथुरा वृन्दावन की होली अपनी चरम सीमा पर होती है। होली को यहाँ दाउजी का हुरंगा कहा जाता है। हुरंगा का अर्थ है हुड़दंग या दंगा।

अधिकतर ब्रजवासी होली के उत्सव का समापन दाउजी के हुरंगे से करते हैं।

समय – चैत्र कृष्ण द्वितीया

मुखराई का मुखराई चरकुला नृत्य

मुखराई राधा की नानी का गाँव है। इस गाँव को उनकी नानी का ही नाम दिया गया है। कहा जाता है कि जब राधा रानी का जन्म हुआ था तब उनकी नानी मुखरा ने बैलगाड़ी के पहिये पर दीपक जलाकर नृत्य किया था।

तभी से यह नृत्य चरकुला के नाम से ख्याति प्राप्त कर परंपरा का रूप ले चुका है। ऐसा माना जाता है कि चरकुला शब्द चक्र से व्युत्पन्न है। चक्र अर्थात् पहिया अथवा गोलाकार आकार। इस दिन मुखराई गाँव में यह नृत्य गाँव की स्त्रियों द्वारा किया जाता है।

गोलाकार चरकुला लगभग ४० से ५० किलो वजन का होता है। इसमें १०८ दीपक होते हैं जिन्हें ४ से ५ तलों में रखा जाता है। स्त्रियाँ इन्हें सिर पर रखकर नृत्य करती हैं। अचरज होता है, राधा व कृष्ण जिन गाँवों से सम्बन्ध रखते थे उन सब गाँवों में अब भी वे वहाँ की परम्पराओं, किवदंतियों अथवा गाथाओं में जीवित है।

समय – चैत्र कृष्ण द्वितीया

होली के गीत

होली हर्षोल्हास का पर्व है। ऐसा पर्व संगीत के बिना अधूरा है। यद्यपि मथुरा वृन्दावन के सभी मंदिरों में प्रत्येक संध्या के समय पारंपरिक गीत गाये जाते हैं, तथापि विभिन्न युगों के अधिकतर भक्ति कवियों तथा वैष्णव कवियों ने फागुन उत्सव तथा होली पर अनेक गीत लिखे हैं। बोलचाल की भाषा में ये होरी के नाम से प्रचलित हैं।

बरसाना के राधा रानी मंदिर में समाज गायन
बरसाना के राधा रानी मंदिर में समाज गायन

मंदिर में गायक-वादकों के समूह भगवान् के समक्ष बैठते हैं तथा गीत प्रस्तुत करते हैं। गाँवों के मध्य गायन की स्पर्धाएं भी होती हैं, विशेषतः बरसना तथा नंदगाँव के मध्य। बरसना के मंदिर में ऐसे ही गायन के अभ्यास सत्र का आनंद लेने का अवसर मुझे प्राप्त हुआ। वह अत्यंत ही आनंदमय अनुभव था।

यदि आप भी इन गीतों को गाना चाहते हैं तो इन गीतों की एक पुस्तक, श्रृंगार रस सागर, मथुरा वृन्दावन में पुस्तक की दुकानों में उपलब्ध है।

भारतीय शास्त्रीय संगीत के कुछ दिग्गज संगीतज्ञों द्वारा गाई गयी रचनाएँ आप यहाँ सुन सकते हैं।

होरी ठुमरी – रंगों में सराबोर करते होली के चंचल गीत

मैंने यहाँ होरी गीतों को मंदिरों में, यमुना किनारे, सडकों पर या कहूं मथुरा वृन्दावन में सर्वत्र सुना।

क्या ब्रज के होली उत्सव में भाग लेना सुरक्षा की दृष्टी से उपयुक्त है?

ब्रज की होली के रंग

  • मथुरा वृन्दावन के उत्सवों के सम्बन्ध में बहुधा यह प्रश्न किया जाता रहा है। इस विषय में मैं अपने विचार आपके समक्ष रखना चाहती हूँ।
  • यदि आपको भीड़ से भय है तो आप कुछ दूरी पर अपना स्थान चुन सकते हैं।
  • आप ऐसे कल्पना भी ना करें कि आप पिचकारियों से आती रंगों अथवा जल की धार से बच पायेंगे! यहाँ तक कि होली पर्व से पहले ही मुझ पर जल के गुब्बारे गिरे थे जब मैं रिक्शे में बैठ कर जा रही थी। यूँ तो मंदिरों में लोग अनुमति प्राप्त करने के पश्चात ही रंग लगाते हैं। किन्तु हो सकता है ऐसी औपचारिकता होली के दिन अथवा सड़कों पर उतनी श्रद्धा से ना निभाई जाये।
  • होली एक ऐसा उत्सव है जहां किंचित स्वच्छंदता की अनुमति रहती है। स्त्री पुरुष जो अन्यथा एक दूसरे से भले ही ना बतियाएं, पर होली के दिन आप उन्हें एक दूसरे पर रंग लगाते देख सकते हैं। यदि आप होली खेलने के स्थान पर उपस्थित हैं, तो आप की उपस्थिति ही आपकी अनुमति मानी जाती है।
  • यदि भीड़ में आपको कोई पहचानता नहीं अथवा आपका मुखड़ा रंग के पीछे छुप गया हो तो कुछ उपद्रवी तत्व इसका लाभ उठा सकते हैं। अतः भीड़ का सूक्ष्म अवलोकन करें तथा सहज हों तभी भीड़ में सम्मिलित होयें। यदि कोई अप्रिय स्थिति उत्पन्न होने की आशंका हो तो उत्तर प्रदेश पर्यटन पुलिस अधिकारियों को खोजें। वे आसपास ही होंगे तथा आपकी सहायता करेंगे।
  • यदि आप इस ब्रज की होली का मृदु रूप देखना चाहते हैं तो आप उत्सव की चरम बिंदु से कुछ दिवस पूर्व मथुरा वृन्दावन की यात्रा पर आयें। आपको होली के उत्सव की झलक मिल जायेगी। आप शान्ति से बैठकर संगीत एवं अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आनंद उठायें जो इस समय आयोजित किये जाते हैं। हाँ, इस सौदे में आप रंग भरे वातावरण की रंगीन छायाचित्र लेने से चूक जायेंगे। कहते हैं ना, कुछ सुविधाएं प्राप्त करने के लिए कुछ समझौते करने पड़ते हैं! मैंने भी होली से कुछ दिवस पूर्व यात्रा करना सुविधाजनक जाना।

यात्रा के सुझाव

मथुरा के लिए निकटतम विमानतल दिल्ली है। तत्पश्चात, दिल्ली से मथुरा तक सड़क मार्ग द्वारा जाना अत्यंत सुविधाजनक तथा सर्वोत्तम विकल्प है। सड़क मार्ग द्वारा दिल्ली से मथुरा पहुँचने में मात्र २ घंटों का समय लगता है। आप रेल द्वारा भी मथुरा आसानी से पहुंच सकते हैं।

मथुरा मे मैंने ठहरने के लिए ‘ब्रजवासी लैंड्स इन’ नामक अतिथिगृह का चुनाव किया था। मुझे यह मथुरा नगरी के मध्य स्थित एक सुविधाजनक अतिथिगृह प्रतीत हुआ। मथुरा में इसी प्रबंधन के दो अन्य अतिथिगृह भी हैं। यद्यपि वृन्दावन एवं गोवर्धन की सीमावर्ती क्षेत्रों में अनेक रिसॉर्ट्स भी उपलब्ध हैं, तथापि सही मायने में होली उत्सव का आनंद उठाने के लिए नगर के भीतर ठहरना उचित होगा।

नगर के भीतर घूमने के लिए जन-परिवहन के साधन आसानी से उपलब्ध हैं। संकरी गलियों में जाने के लिए ई-रिक्शा सर्वोत्तम साधन है।

आपको सावधान कर दूं, वृन्दावन में वानरों का आतंक है। आप अपने मोबाइल फोन, कैमरे तथा अन्य मूल्यवान वस्तुओं का ध्यान रखें।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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जब मुझे भगोरिया उत्सव में भाग लेने के लिये झाबुआ जाने का निमंत्रण मिला, मुझे इस उत्सव के विषय में तनिक भी जानकारी नहीं थी। ना ही झाबुआ के अस्तित्व के विषय में कोई ज्ञान था। तत्काल गूगल की सहायता ली। भला हो इस गूगल का जिसने मुझे झाबुआ एवं भगोरिया उत्सव की जानकारी क्षण […]

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जब मुझे भगोरिया उत्सव में भाग लेने के लिये झाबुआ जाने का निमंत्रण मिला, मुझे इस उत्सव के विषय में तनिक भी जानकारी नहीं थी। ना ही झाबुआ के अस्तित्व के विषय में कोई ज्ञान था। तत्काल गूगल की सहायता ली। भला हो इस गूगल का जिसने मुझे झाबुआ एवं भगोरिया उत्सव की जानकारी क्षण भर में ही उपलब्ध करा दी। भगोरिया उत्सव के विषय में जानते ही इसमें भाग लेने के इस स्वर्णिम अवसर को मैंने हाथों से जाने नहीं दिया।

भगोरिया - भील जनजाति का होली उत्सव भगोरिया उत्सव के विषय में उपलब्ध जानकारियों के अनुसार, इस उत्सव में आदिवासी भील युवक अपनी पसंद की भील युवती से अपना प्रेम व्यक्त करता है। यदि युवती उसका प्रेम स्वीकार करती है तो वे दोनों भाग कर छुप जाते हैं। वे तब तक वापस नहीं आते, जब तक उनके परिवार आपस में चर्चा कर उनके विवाह हेतु सहमत नहीं हो जाते। यह पढ़ने के पश्चात क्या आप भी यह देखने के लिए उत्सुक नहीं होंगे कि पश्चिमी मध्य प्रदेश के इस ग्रामीण क्षेत्र में, कैसे भील युवक सम्पूर्ण बिरादरी के समक्ष अपना प्रेम व्यक्त करते हैं? तथा युवतियों की क्या प्रतिक्रिया होती है? वे कैसे प्रेम स्वीकार करती हैं? है ना यह मनोरंजक उत्सव!

मेरे लिए यह एक स्वर्णिम अवसर था। होली के पर्व से ठीक पूर्व भील आदिवासियों का यह उत्सव एक बड़ा प्रलोभन था। निमंत्रण पत्र पर छपे भगोरिया उत्सव के छायाचित्र, निमंत्रण को और अधिक प्रलोभी बना रहे थे। मैं स्वयं को रोक नहीं पायी। शीघ्र ही मैं अपने सभी कार्यक्रमों का समायोजन कर रही थी, देर रात काम कर, सभी कार्य निर्धारित समयसीमा में पूर्ण करने की होड़ में लग गयी थी ताकि मध्य प्रदेश के इस झाबुआ जिले में मैं कम से कम ४ दिन व्यतीत कर सकूं।

भगोरिया हाट को देखने उमड़ी भीड़
भगोरिया हाट को देखने उमड़ी भीड़

अगले ही दिन हम इंदौर पहुंच गए। मार्ग में कुछ समय उज्जैन में रूककर, नगर के पीठासीन देव, महाकाल के दर्शन किये। धूल भरे मार्ग एवं सूखी बंजर पहाड़ियों से जाते हुए, दिन समाप्त होने से पूर्व हम झाबुआ पहुँच गए। मध्य प्रदेश पर्यटन ने हमें भगोरिया उत्सव के विषय में जानकारी देने के लिए एक छायाचलचित्र का प्रदर्शन किया। एक स्वतन्त्र छायाचित्रकार द्वारा निर्मित यह चलचित्र कई वर्षों के भगोरिया उत्सव का सुन्दर संकलन था। आप भी इस संस्करण को पढ़ने से पूर्ण इस उत्सव के विषय में जानना चाहते होंगे। तो आईये आपको बताती हूँ, मैंने इस चलचित्र एवं साहित्यों से क्या जानकारी प्राप्त की।

भगोरिया हाट अर्थात् भगोरिया उत्सव से जुडी किवदंतियां

बोलचाल की भाषा में भगोरिया शब्द का प्रयोग भागने के लिए किया गया है। इसका शब्दशः अर्थ है पलायन करना अथवा भागना। अर्थात् वह समय जब युवक अपनी इष्ट युवती के संग भाग जाता है।

भगोरिया मेले का आनंद लेते लोग
मेले का आनंद लेते लोग

एक किवदंती के अनुसार इस उत्सव के सर्वप्रथम नायक एवं नायिका भाव एवं गौरी थे। यह शिव एवं पार्वती के ही नाम हैं। इसी कारण इस उत्सव को भगोरिया कहा जाता है।

एक अन्य किवदंती के अनुसार भागोर के राजा ने इस क्षेत्र पर विजय प्राप्त की थी। राजा ने अपने सैनिकों को यह अनुमति दी थी कि होली से कुछ दिन पूर्व लगते इस हाट में वे अपनी पसंद की युवती को प्रेम प्रस्ताव दे सकते हैं। यदि युवती की स्वीकृति हो तो दोनों पलायन कर सकते हैं। उस समय से अब तक यह एक प्रथा बन चुकी है जिसका अब भी किसी ना किसी रूप में पालन किया जाता है।

भगोरिया उत्सव का समय

भगोरिया हाट होली पर्व से कुछ दिनों पूर्व लगता है। होली इस क्षेत्र का बड़ा उत्सव है। इस समय अधिकतर लोगों को काम का मेहनताना मिलता है तथा खर्च करने के लिए उनके पास पर्याप्त धन होता है। इस समय विश्व के कोने कोने से इस जनजाती के लोग यहाँ वापस आते हैं। अतः यह विवाह करने के लिए अथवा अपने संतानों का विवाह करवाने के लिए सर्वोत्तम समय होता है। वर्तमान में यह प्रथा किस सीमा तक पाली जाती है इसका अनुमान लगाना कठिन है।

सजी धजी बांसुरी लिए कृष्णा कन्हैय्या
सजी धजी बांसुरी लिए कृष्णा कन्हैय्या

हमने कई युवक युवतियों को सजधज कर मेले में घूमते देखा। प्रेम प्रस्ताव के रूप में युवकों को युवतियों को रंग लगाते भी देखा। साथ ही प्रेम प्रस्ताव पर अपनी मोहर लगाते हुए कई युवतियों को पान स्वीकार करते भी देखा। इस सब को हमारा समाज कितनी स्वीकृति देता है, यह चर्चा का विषय है। हमने कई लोगों से इस विषय में चर्चा की। भगोरिया उत्सव में विवाह करने की इस तथाकथित प्रथा के विषय में हमें भिन्न भिन्न प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुईं।

भगोरिया उत्सव के विषय में मैंने जितना कुछ पढ़ा, सुना तथा देखा, उसके आधार पर मेरा विश्लेषण यह कहता है कि किसी समय यह युवक-युवतियों के लिए एक दूसरे से मिलने एवं अपनी भावनाएं प्रकट करने का अवसर रहा होगा। कदाचित उन में से कुछ ने इसका लाभ उठाते हुए अपने साथी के संग पलायन भी किया होगा। समय के साथ इसे मान्यता प्राप्त होने लगी तथा यह एक परंपरा बन गयी।

झाबुआ के भील जनजाती का भगोरिया उत्सव

भगोरिया हाट अथवा बाजार का कोई निश्चित स्थान नहीं है। प्रत्येक वर्ष, होली से पूर्व के सात दिनों तक, प्रत्येक दिवस एक भिन्न गाँव इस बाजार का आयोजन करता है। निर्धारित स्थल के विषय में जानकारी प्राप्त करने के लिए कोई भी स्थानीय समाचार पत्र देख सकते हैं।

भगोरिया के अनुष्ठान सर्वप्रथम हमने वालापुर गाँव का भ्रमण किया जो लगभग गुजरात सीमा पर स्थित है। वहां पहुंचते पहुंचते दोपहर हो गयी थी। बाजार पहले से ही रंगों में सराबोर युवक-युवतियों से भरा हुआ था। अनायास जिसने हमारा ध्यान आकर्षित किया, वह था, युवतियों के कई समूह जिन्होंने एक ही प्रकार का श्रृंगार किया था। एक समूह के भीतर सभी युवतियों ने एक ही रंग एवं एक ही प्रकार के वस्त्र एवं आभूषण धारण किये हुए थे। तथापि प्रत्येक समूह का रंग भिन्न था। काला, नीला, लाल, हरा, जामुनी, नारंगी तथा कहीं कहीं दो रंगों का मिश्रण। इन युवतियों के मोहक आभूषण ठोस चांदी के थे । उन्होंने अपनी ओढ़नियाँ भी एक ही प्रकार से ओढ़ी हुई थीं। यह सब देख मुझे आभास हुआ कि उनके मुख पर हर्शोल्ल्हास के भाव भी सामान थे।

वालापुर का भगोरिया हाट उत्सव

रंगों का सामंजस्य लिए युवतियों के झुंड
रंगों का सामंजस्य लिए युवतियों के झुंड

हमें कुछ समय लगा तथा थोड़ी मेहनत लगी उन नवयुवकों के समूहों को ढूँढने में जो भावी दुल्हे हैं तथा वधू ढूंढ रहे हैं। ऐसे समूह कम थे किन्तु उन्हें पहचानना आसान था। वे सब सुन्दर धोती पहने हुए थे तथा रंगबिरंगी बांसुरियां पकडे हुए थे। बांसुरियों पर सुन्दर आकृतियाँ चित्रित थीं। कदाचित यह उन नवयुवकों का अनोखा ढंग था यह बताने का कि वे कुंवारे हैं तथा वधू की तलाश में हैं। उनसे चर्चा करने में मुझे अत्यंत आनंद आया। वे बात तो करना चाह रहे थे किन्तु किंचित सकुचा भी रहे थे। बहुत समय तक तो ये समूह इधर उधर डोलते रहे, एक दूसरे को निहारते रहे। हम भी थक कर बैठ गये। कुछ समय पश्चात हमने उन्हें एक दूसरे पर रंग लगाते देखा। लडके लड़कियों पर रंग लगाने का प्रयत्न कर रहे थे, वहीं लड़कियां रंगों से बचने के लिए इधर उधर भाग रहीं थीं।

हम में से एक ने देखा कि एक युवती ने एक युवक से पान स्वीकार किया। अर्थात् उसने युवक के प्रेम प्रस्ताव को स्वीकार किया। उसके पश्चात क्या हुआ यह जानना हमारे लिये असंभव है। इसके लिए हमें कुछ दिन गाँव में ही पड़ाव डालना पड़ता।

वालपुर के उत्सव

यहाँ का वातावरण एक ठेठ ग्रामीण मेले का सा था। चारों ओर कई दुकाने थीं। इनमें हलवाइयों की दुकानें तो प्रमुखता से थीं ही, साथ ही मिट्टी के बर्तन से लेकर चांदी के बर्तन तक, गोदना गोदने से लेकर खिलौनों की दुकान तक, फलों से लेकर भाजी तक, अनेक रंगबिरंगी दुकानें थीं। इनमें सबसे अधिक व्यस्त दुकानें मिठाईयों एवं नमकीन की थीं।

पोहे जलेबी - मध्य भारत का चहेता नाश्ता
पोहे जलेबी – मध्य भारत का चहेता नाश्ता

एक ओर खेल व मनोरंजन के साधन थे। पुराने ढंग के लकड़ी के ऊंचे गोल झूले थे जिन्हें हाथ से घुमाया जा रहा था। कई अन्य झूले एवं खेल भी थे। कुल्फी, बर्फ के गोले एवं रंग बिरंगे शीत पेय भी बिक रहे थे। लोग नित्योपयोगी वस्तुओं की खरीदी कर रहे थे। कहीं झूला झूल रहे थे तथा खाद्य पदार्थों का आस्वाद भी ले रहे थे। लोगों के उपयोग एवं पसंद की प्रत्येक वस्तु यहाँ उपलब्ध थी। स्त्रियों को देख ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो यह उन कुछ अवसरों में से है जब वे मन भर के सज सकती हैं, श्रृंगार कर सकती हैं एवं घर से बाहर निकल कर मौज मस्ती कर सकती हैं क्योंकि हमने इन स्त्रियों को समूहों में हँसते-खिलखिलाते हुए घूमते देखा।

हेलिकॉप्टर का आकर्षण

जिस दिन हम वालपुर आये थे, उस दिन उस क्षेत्र के सांसद अपनी पत्नी के साथ हेलिकॉप्टर में वहां आये। हेलिकॉप्टर को नीचे आते एवं वापस उड़ते देखने के लिए लोगों की कतार लग गयी थी। जब तक हेलिकॉप्टर वहां उपस्थित था, वही यहाँ का प्रमुख आकर्षण बना हुआ था। हेलिकॉप्टर के चारों ओर लोगों की भीड़ जमा हो गयी थी। सांसद हेलिकॉप्टर से आये, कुछ क्षण ढोल बजाया, स्थानीय लोगों के साथ नृत्य किया तथा हमारे साथ नाश्ता भी किया। तत्पश्चात उन्होंने हमें आदिवासी क्षेत्र में हुए विकास, विशेषतः कन्याओं के शिक्षण के विषय में अवगत कराया। उन्होंने हमें निकट भविष्य में एक बड़े आवासीय विद्यालय के निर्माण के विषय में भी बताया।

कुल मिलाकर सम्पूर्ण दिवस हमने भरपूर हर्षोल्ल्हास एवं खूब सारी धूल में बिताया। उस दिन कितने जोड़े प्रेम-बंधन में बंधे, यह ज्ञात नहीं हो सकता क्योंकि अब अधिकतर लोग इस परम्परा से इनकार करते हैं।

राणापुर का भगोरिया उत्सव

भगोरिया हाट या उत्सव का दूसरा दिन हमने राणापुर गाँव में बिताया। यह झाबुआ के अधिक समीप था, जहां हम रह रहे थे। राणापुर के भगोरिया हाट में अपेक्षाकृत अधिक भीड़ थी। हाट एवं उत्सव उसी प्रकार का था, जैसा हमने वालापुर में देखा था किन्तु वस्त्रों एवं आभूषणों की शैली अत्यंत भिन्न थी।

राणापुर का भगोरिया हाट
राणापुर का भगोरिया हाट

यहाँ कन्याओं ने छाप के, विशेषतः बांधनी छाप के वस्त्र धारण किये थे। वालापुर में बिना छाप के, सादे रंगों के वस्त्रों का चलन था। चांदी के आभूषण उसी प्रकार भारी थे किन्तु उनकी बनावट बिलकुल भिन्न थी। यहाँ वालापुर के सामान कुछ भी नहीं था, ना वैसे लोग, ना ही वैसी दुकानें! कन्याओं ने बालों में चटक चमकीले चिमटे लगाकर, चिमटे बालों को खुला छोड़ा हुआ था। बाकी के बाल एवं सर को उन्होंने ढँक कर रखा था। उन्हें देख मुझे एक पुरानी पंजाबी बोली का स्मरण हुआ ‘खुल्ला रखदी क्लिप वाला पासा’।

चरखी झूला
चरखी झूला

विशाल चक्र झूले अब और विशाल एवं मोटरयुक्त हो गए थे। पान की दुकानें भी कहीं अधिक थीं। कुल मिलाकर सम्पूर्ण बाजार एवं व्यापार अधिक चुस्त एवं फुर्तीला था। ऊपर तक लोगों से भरी गाड़ियां, ट्रक एवं बैलगाड़ियां देखने योग्य थीं। कुछ कोनों में नृत्य के कार्यक्रम हो रहे थे। नाचते गाते लोगों की शोभायात्रायें निकल रही थीं। वालापुर में आये सांसद ने यहाँ भी भेंट दी किन्तु इस समय हेलिकॉप्टर दिखाई नहीं दिया। एक स्थान पर एक नर्तक हल्दी में सना हुआ नृत्य कर रहा था। उसने ऊपरी देह को एक लाल कपडे से ढँक रखा था एवं हाथ में एक सजा हुआ नारियल पकड़ा हुआ था। उसके चारों ओर कुछ वादक ढोल बजा रहे थे।

भगोरिया हाट की दुकानें

पान की दुकान
पान की दुकान

भगोरिया हाट की छोटी छोटी दुकानें अत्यंत अनोखी थीं। मैं चांदी के कुछ आभूषण खरीदना चाहती थी। किन्तु वहां आभूषण अत्यंत भारी थे। वे मेरे शहरी परिवेश के लिए उपयुक्त नहीं थे। मैंने मिट्टी के कुछ अनोखे तवे देखे जिन्हें इस प्रकार पकाया गया था कि उपयोग से पूर्व इन्हें तोड़ना पड़ता है। यहाँ मुझे कुछ अनोखी ग्रामीण खोजें दिखाई दिए। जैसे, पुराने रबर के टायरों से चप्पल एवं बाल्टियां बनाकर उनका पुनर्नवीनीकरण किया गया था। कुछ बुद्धिमान दर्जी विदेशी पर्यटकों के लिए तत्काल वेशभूषा सिलकर तैयार कर रहे थे। इसके लिए वे अपने घर के हथकरघे में बुने हुए वस्त्रों का प्रयोग कर रहे थे।

हमने कुछ गांव वासियों से भगोरिया उत्सव के विषय में चर्चा की। हमने पाया कि उत्सव के विषय में हर एक का अपना संस्करण एवं अपनी व्याख्या है। मैंने एक युवा दम्पति से चर्चा की एवं उत्सव के विषय में उनके विचार जानने का प्रयत्न किया। उन्हें चर्चा करने तथा कैमरे के समक्ष आने में संकोच हो रहा था। उन्होंने बताया कि उनका विबाह उनके माता-पिता तथा परिवारजनों ने तय किया था। परिस्थिति चाहे जो हो, यहाँ प्रत्येक व्यक्ति इस उत्सव की प्रतीक्षा करता है। यह उत्सव उन्हें मनोरंजन के साथ साथ खरीददारी एवं व्यापार के भरपूर अवसर प्रदान करता है।

उत्सव एक, रंग-रूप अनेक! यह हमारे लिए एक रहस्योद्घाटन था। कुछ किलोमीटर दूर स्थित गाँवों में एक ही उत्सव मोटे तौर पर एक सामान मनाया जाता है किन्तु प्रत्येक गाँव की अपनी संस्कृति एवं विशेषता इसे नए आयाम प्रदान करती है तथा इसे नए रंग में रंग देती है।

भगोरिया हाट में भील जनजातियों का आदिवासी नृत्य – एक विडियो

इस नृत्य को लहरी कहा जाता है क्योंकि इस नृत्य का प्रदर्शन करते भील युवक एवं युवतियां सागर की लहरों के समान लहराते हुए नृत्य करते हैं। युवक हाथों में धनुष बाण तथा युवतियाँ हाथों में एक संगीत वाद्य लेकर भगोरिया उत्सव का यह नृत्य करते हैं।

झाबुआ की हस्तनिर्मित गुड़ियाँ

आईये आपको एक और विडियो दिखाते हैं जो आपको मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले में हस्त निर्मित गुड़ियों के विषय में जानकारी देती है। कपास एवं कपड़े से निर्मित ये गुड़ियाँ झाबुआ के आदिवासी जनजाति जा प्रतिनिधित्व करती हैं। भगोरिया उत्सव के दौरान, मेरे झाबुआ यात्रा के समय यह पुरस्कार विजेता कलाकार अपनी कला के विषय में जानकारी दे रहा है।

गुड़ियाँ बनाने की इस कला के विषय में और अधिक जानने के लिए यह पढ़ें – झाबुआ के सूक्ष्म मणकों के आभूषण

भारत चित्ताकर्षक उत्सवों की धरती है। भारत में आप जहां भी जाएँ, आप को कई मनमोहक, अनोखे एवं मनोरंजक उत्सव दिखाई देंगे।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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लद्दाख के स्पितुक बौद्ध मठ का रहस्यमयी चाम नृत्य https://inditales.com/hindi/cham-nritya-spituk-math-ladakh/ https://inditales.com/hindi/cham-nritya-spituk-math-ladakh/#comments Wed, 22 Jan 2020 02:30:17 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1673

बौद्ध चाम नृत्य एक आनुष्ठानिक नृत्य है। हिमालयीन क्षेत्रों, विशेषतः लद्दाख के विभिन्न बौद्ध मठों में इस उत्सव का आयोजन किया जाता है। प्रत्येक मठ अपने पञ्चांग के अनुसार भिन्न भिन्न दिवसों में इस उत्सव का आयोजन करता है तथा अपना स्वयं का गुस्तोर उत्सव मनाता है। यह लद्दाख का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उत्सव है। मैंने […]

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बौद्ध चाम नृत्य एक आनुष्ठानिक नृत्य है। हिमालयीन क्षेत्रों, विशेषतः लद्दाख के विभिन्न बौद्ध मठों में इस उत्सव का आयोजन किया जाता है। प्रत्येक मठ अपने पञ्चांग के अनुसार भिन्न भिन्न दिवसों में इस उत्सव का आयोजन करता है तथा अपना स्वयं का गुस्तोर उत्सव मनाता है। यह लद्दाख का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उत्सव है। मैंने जनवरी के मास में लद्दाख का भ्रमण किया था। तब लेह के समीप स्थित स्पितुक मठ में इस गुस्तोर उत्सव में भाग लेने का अवसर प्राप्त हुआ।

मुस्कुराती हुई लद्दाखी महिला
मुस्कुराती हुई लद्दाखी महिला

बुद्ध एवं बौध धर्म को मैं जितना समझती थी, चाम नृत्य उससे ठीक विपरीत प्रतीत हुआ। चाम नृत्य रंगों से परिपूर्ण अत्यंत मनभावन उत्सव है जिसे लामा कठोर अनुष्ठानों एवं नियमों के अंतर्गत प्रस्तुत करते हैं। एक ओर हम उन्हें पहाड़ों के ऊपर स्थित बौध मठों में रहते एवं प्रार्थना करते देखते हैं, वहीं दूसरी ओर उन्हें इस मनमोहक नृत्य में तल्लीन देखना अत्यंत विस्मयकारी है। हिमायालीन बौद्ध मठ, जो अन्यथा शांत क्षेत्र होते हैं, इस उत्सव के समय जीवंत हो उठते हैं। रंगबिरंगे चटक एवं भव्य परिधान धारण किये लामा संगीत के सुरों पर थिरकते एवं झूमते हुए नृत्य करते हैं।

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चाम नृत्य का इतिहास

नीला मुखौटा पहने चाम नृत्य करते एक बोद्ध भिक्षुक
नीला मुखौटा पहने चाम नृत्य करते एक बोद्ध भिक्षुक

यह एक प्राचीन नृत्य परंपरा है जिसकी उत्पत्ति संभवतः तिब्बत में हुई थी। किवदंतियों के अनुसार इस नृत्य परंपरा का सम्बन्ध ८ वीं. शताब्दी के गुरु पद्मसंभव से है। ऐसा माना जाता है कि तिब्बत के तत्कालीन सम्राट त्रिशोंग डेस्टन ने गुरु पद्मसंभव को आमंत्रित किया था। वे उनसे उन आत्माओं से मुक्ति प्राप्त करने में सहायता चाहते थे जो उन्हें साम्ये बौद्ध मठ निर्माण करने में अड़चन उत्पन्न कर रहे थे। दिन के समय जो भी निर्माण कार्य सम्पूर्ण किया जाता था, रात्रि में वे आत्माएं उसे समूल नष्ट कर देती थीं। गुरु पद्मसंभव ने उन आत्माओं को नष्ट करने के लिए अनुष्ठान किये थे। समय के साथ ये अनुष्ठान बढ़ते चले गए। आज ये अनुष्ठान चाम नृत्य के रूप में किया जाता है। यह अनुष्ठान विशेषतः महायान बौद्ध धर्म से सम्बंधित है।

पीला मुखौटा पहने चाम नर्तक
पीला मुखौटा पहने चाम नर्तक

‘कोर ऑफ़ कल्चर’ द्वारा चाम नृत्य पर किये विस्तृत अनुसंधान के अनुसार यह नृत्य संभवतः गुरु पद्मसंभव के इस घटना से भी पूर्व अस्तित्व में था। समय के साथ इसमें परिवर्तन आते चले गए। यह नृत्य एक तांत्रिक नृत्य से सार्वजनिक प्रदर्शन में परिवर्तित हो गया है।

चाम, यह शब्द इस नृत्य में प्रयुक्त एक मुद्रा से उत्पन्न है। इस नृत्य शैली में इस मुद्रा का प्रयोग व्यापक रूप से किया जाता है। इस नृत्य शैली में हस्त मुद्राओं, पहनावों तथा हाथों में धारण किये चिन्हों का अत्यंत महत्व है। जैसे, हाथों में तलवार धारण करने का अर्थ है अज्ञानता का नाश करना।

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कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इस परम्परा का आरम्भ शाक्यमुनि अर्थात् ऐतिहासिक बुद्ध के जीवनकाल में हुआ था। यह सिद्धांत इस परंपरा का उद्भव छठीं ईसा पूर्व बताता है।

मुखौटा नृत्य अथवा चाम नृत्य की कथा

लद्दाख में चाम नृत्य प्रदर्शन का विडियो देखें।

इस नृत्य का पूर्ण उद्देश्य है, मानवता की भलाई के लिए दुष्ट आत्माओं का अंत। यह कैसे किया जाता है, यह अत्यंत रोचक है। उत्सव से पूर्व बौद्ध भिक्षुक लम्बे समय तक ध्यान एवं प्रार्थना करते हैं। गुस्तोर उत्सव के दिन, वे बेल बूटेदार जरी से निर्मित परिधान धारण करते हैं। सर पर भयंकर मुखौटे तथा हाथों में प्रतीकात्मक वस्तुएं धारण करते हैं। इस प्रकार भयावह रूप धरकर वे दुष्ट आत्माओं को डराते हैं तथा उन्हें वहां से भगा देते हैं।

चाम नृत्य की गोपनीयता

सीढ़ियों से नीचे आते मुखौटाधारी नर्तक
सीढ़ियों से नीचे आते मुखौटाधारी नर्तक

प्रारम्भ में यह नृत्य अत्यंत गोपनीय हुआ करता था। लामा एकांत में यह नृत्य प्रदर्शन करते थे। मेरे अनुमान से तांत्रिक तत्वों से जुड़े होने के कारण इस परंपरा को गुप्त रखा गया था।

वर्तमान में यह नृत्य पूर्णतः सार्वजनिक प्रदर्शन में परिवर्तित हो गया है। गाँव निवासी मठ के चप्पे चप्पे पर स्थान ग्रहण कर बैठ जाते हैं। मध्य में केवल नर्तकों द्वारा प्रदर्शन के लिए पर्याप्त स्थान छोड़ देते हैं। चारों ओर लगे कैमरे भविष्य के लिए इस नृत्य को कैद करते रहते हैं। तकनीकी की सहायता से आज इस नृत्य को हम कहीं भी बैठकर देख सकते हैं तथा इसका आनंद ले सकते हैं।

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यह नृत्य परम्परा लामाओं में पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रही है। इसके विषय में कहीं भी लिखित प्रमाण उपलब्ध नहीं है। हाँ, मेरे द्वारा प्रत्यक्ष लिया गया यह विडियो आने वाली पीढ़ियों के लिए अवश्य एक वैद्य प्रमाण है।

लाल मुखौटाधारी नर्तक
लाल मुखौटाधारी नर्तक

चाम एक तांत्रिक अनुष्ठान है। इसकी जड़ें हिन्दू तांत्रिक सम्प्रदाय की प्राचीन भारतीय तांत्रिक परम्पराओं में पाया गया है।

दुष्ट आत्माओं का अंत

ऐसा माना जाता है कि नृत्य करते लामा भिक्षुओं में रक्षात्मक देवी-देवता अवतरित हो जाते हैं। नृत्य करते समय वे इन देवी-देवताओं के प्रत्यक्ष स्वरूप बन जाते हैं। मेरा अनुभव जानना चाहें तो, स्पितुक मठ में मैंने जो चाम प्रदर्शन देखा, वहां मुझे ऐसा कुछ भी प्रतीत नहीं हुआ।

नृत्य प्रदर्शन के समय लामा जो विस्तृत मुखौटे धारण करते हैं, उन्हें मिट्टी एवं सूत के मिश्रण द्वारा निर्मित किया जाता है। प्राकृतिक रंगों द्वारा उन्हें रंग कर उन पर बहुमूल्य घातुओं द्वारा चमक दी जाती है। प्रत्येक मुखौटा किसी वेशेष देवता को दर्शाता है। जैसे, काला मुखौटा धारण किया हुआ लामा महाकाल का स्वरूप धरता है, वहीं पीला मुखौटा धन के देव वैश्रमण को दर्शाता है। कुछ मुखौटों पर हिरण तथा भैंस जैसे पशुओं के शीश की आकृति होती है। मध्य में विदूषक जैसे परिधान धारण कर भी कई लामा नृत्य करते हैं। मेरे गाइड के अनुसार ये लामा अनुयायियों को दर्शाते हैं।

मैंने केवल पुरुष लामाओं को ही यह नृत्य प्रदर्शित करते देखा है। मैंने इसके विषय में जितना भी साहित्य पढ़ा था, वहां भी केवल पुरुष बौद्ध भिक्षुओं द्वारा यह नृत्य किये जाने का उल्लेख था। नृत्य के कुछ भागों में नर्तक देवी-देवताओं के जोड़े को दर्शाते हुए नृत्य करते हैं मानो भगवान् अपनी पत्नी सहित पधार रहे हैं। यहाँ भी दोनों पात्र पुरुष ही निभाते हैं।

स्पितुक मठ के गुस्तोर उत्सव का चाम नृत्य

यह मेरा सौभाग्य था कि मुझे लेह के बाहर एक छोटी पहाड़ी के ऊपर स्थित स्पितुक मठ के गुस्तोर उत्सव में भाग लेने का स्वर्णिम अवसर प्राप्त हुआ। हमने दिन का आरम्भ इस बौद्ध मठ के दर्शन से किया जहां तक पहुँचने के लिए ऊंची चढ़ाई करनी पड़ती है। यह चढ़ाई अत्यंत आनंददायी थी। चारों ओर लेह नगरी एवं लेह विमानतल का मनमोहक दृश्य था। मार्ग में हम कई लद्धाखियों से मिले। हमने जब उनके छायाचित्र लेने की इच्छा व्यक्त की, उन्होंने सहर्ष हमारे आग्रह को मान कर हमें कई चित्र लेने दिए।

लेह का स्पितुक बौद्ध मठ

स्पितुक मठ में, मुख्य सभागृह के पृष्ठभाग में स्थित एक कक्ष में हमने प्रवेश किया। वहां सम्पूर्ण भित्तियाँ बौद्ध कथाओं, चिन्हों तथा प्रतिमाओं से भरी हुई थीं। स्पितुक मठ का निर्माण ११वी. सदी में किया गया था, वहीं भित्तिचित्र १४वी. शताब्दी में बनाए गए हैं। महीन चूने द्वारा श्वेत चिंतामणी, षट-भुजाधारी महाकाल, वैश्रवण, वज्र भैरव, श्री देवी तथा चामुंडी सहित अनेक उपासिकाओं की प्रतिमाएं भी बनायी गयी थीं। आपको अचरज हो रहा होगा कि बौद्ध मठ के भीतर बौद्ध धर्म के चिन्हों के साथ हिन्दू देवी-देवताओं के भी चित्र हैं। इन्हें देख आप सोच में पड़ जाते हैं कि क्या इनमें कोई भेद है?

मठ के भीतर विभिन्न मंदिरों के दर्शन के उपरांत हम एक प्रांगण में पहुंचे जहां नृत्य प्रदर्शन के प्रबंध किये जा रहे थे। सम्पूर्ण प्रांगण दर्शकों से भरने लगा था। सौभाग्य से हमें एक मुंडेर के पीछे, एक ऊंचे स्थान पर बैठने के लिए कहा गया जहां से हमें प्रांगण का दृश्य भलीभांति दिखाई पड़ रहा था। कई लोग छत पर, खिड़कियों पर तथा प्रांगण के दूसरी ओर भी बैठे थे।

स्पितुक मठ का गुस्तोर उत्सव

लद्धाख का स्पितुक मठ
लद्धाख का स्पितुक मठ

उत्सव का आरम्भ भित्ति पर टंगे एक विशाल थान्ग्का के अनावरण से हुआ। शनैः शनैः जब इसका अनावरण हो रहा था, तब ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो देवी देवताओं को अनुष्ठान में भाग लेने के लिए आमंत्रित कर रहा हो। कुछ भिक्षुक संगीत वाद्य बजा रहे थे। अचानक एक ओर स्थित ऊंची सीढियाँ आकर्षण का केंद्र बिंदु बन गयी। कई भिक्षुक रंगबिरंगे परिधान तथा मुखौटे धारण कर सीढियाँ उतर रहे थे। वे जोड़ों में अथवा छोटे छोटे समूहों में आते, अपना निर्धारित नृत्य प्रदर्शन करते तथा वहां से चले जाते थे। मध्य में कुछ भिक्षुक दर्शकों से हंसी-मजाक करते, उन्हें छेड़ते तथा चले जाते थे। दोपहर के भोजन का समय होते ही सब दर्शकों ने भोजन के डब्बे खोले तथा खाने लगे। भोजन ग्रहण करने के लिए अनुष्ठान में अल्प विराम दिया गया था। इतना समय उपलब्ध था कि हमने अपने अतिथिगृह ‘होटल दी ग्रैंड ड्रैगन’ जाकर भोजन किया।

गुस्तोर उत्सव का मेला – लद्दाख
गुस्तोर उत्सव का मेला – लद्दाख

भोजन के समय तक मठ के बाहर मेला लग गया था। मठ के पृष्ठभाग से हमें तम्बोला की बोलियों के स्वर सुनायी दे रहे थे। मठ के सामने कई छोटी छोटी दुकानें लग गयी थीं जहां खाद्य पदार्थों सहित कई प्रकार की वस्तुएं बिक्री की जा रही थीं। हम भीड़ में लगभग फंस गए थे। न जाने कहाँ से अचानक इतने लोग एकत्र हो गए थे। दोपहर के भोजन के उपरांत भी हमें उत्सव के प्रदर्शनों को देखने की इच्छा थी। किन्तु खचाखच भरी भीड़ को देख हमें आभास हो गया कि मठ के भीतर जाना लगभग असंभव है। अतः हमने भीतर ना जाकर लेह में कुछ और करने का निश्चय किया।

इतना अवश्य कहना चाहूंगी कि जितना आनंद मुझे नृत्य देखने में आ रहा था, उतना ही आनंद मुझे नृत्य देखते लद्दाख के लोगों को देखने में भी आ रहा था। वृद्ध लोगों ने हाथों में प्रार्थना चक्र लिया हुआ था तथा वे उसे ऐसे घुमा रहे थे मानो यह उनका स्वभाव बन गया हो। कई स्त्रियों ने फिरोजा मणी के सुन्दर हार गले में पहने हुए थे। सभी बालक बालिकाएं सुन्दर एवं गोल-मटोल थे।

समापन

लद्दाख के गुस्तोर उत्सव के बाज़ार
लद्दाख के गुस्तोर उत्सव के बाज़ार

बौद्ध मठ के इस उत्सव को देखना तथा इसमें भाग लेना, यह मेरे लिए अतुलनीय अनुभव था। मार्ग में लगे बैनरों में इस उत्सव को ‘हिमालय का कुंभ मेला’ कहा गया था। मठ से वापिस आते समय लोगों की जो भीड़ हमने देखी, उससे तो हमें भी यह कुंभ मेला ही प्रतीत हुआ। ऐसी भीड़ जिसमें परिवार एवं मित्रों से बिछड़ सकते हैं, ऐसा कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी।

लद्दाख के विभिन्न मठों में गुस्तोर उत्सव भिन्न भिन्न दिवसों में वर्ष भर मनाया जाता है। अतः अपनी यात्रा का नियोजन करते समय इन उत्सवों के दिन, स्थान एवं समय ज्ञात कर लें। अपनी यात्रा का नियोजन ऐसे करें कि कम से कम एक मठ में आपको इस उत्सव में भाग लेने का अवसर प्राप्त हो सके। 

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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गोवा कानकोण के मल्लिकार्जुन मंदिर का अनोखा शीर्षा रान्नी उत्सव https://inditales.com/hindi/mallikarjuna-mandir-cancona-goa/ https://inditales.com/hindi/mallikarjuna-mandir-cancona-goa/#respond Wed, 15 Jan 2020 02:30:30 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1524

गोवा का मल्लिकार्जुन मंदिर, गोवा राज्य के दक्षिणतम जिले, कानकोण में स्थित है। यह लगभग गोवा एवं कर्नाटक की सीमा पर स्थित है। गोवा के अन्य मंदिरों के समान यह मंदिर भी अपने आप में एक अनूठा मंदिर है। इसका इतिहास भी रोचक कथाओं से परिपूर्ण है। शीर्षा रान्नी, इस अनुष्ठान के विषय में सर्वप्रथम […]

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गोवा का मल्लिकार्जुन मंदिर, गोवा राज्य के दक्षिणतम जिले, कानकोण में स्थित है। यह लगभग गोवा एवं कर्नाटक की सीमा पर स्थित है। गोवा के अन्य मंदिरों के समान यह मंदिर भी अपने आप में एक अनूठा मंदिर है। इसका इतिहास भी रोचक कथाओं से परिपूर्ण है। शीर्षा रान्नी, इस अनुष्ठान के विषय में सर्वप्रथम जब मैंने सुना, मुझे विश्वास ही नहीं हुआ। यह ऐसा अनुष्ठान है जिस पर आप सहसा विश्वास ही नहीं कर सकते। इसलिए इस अनुष्ठान को मैं स्वयं अपनी आँखों से देखना चाहती थी।

मल्लिकार्जुन मंदिर श्रीस्थल का प्रथम द्वार
मल्लिकार्जुन मंदिर श्रीस्थल का प्रथम द्वार

इसका सुअवसर मुझे शीघ्र प्राप्त हुआ। होली के पर्व से कुछ दिवस पश्चात, गोवा के विभिन्न गाँवों में रंगबिरंगा पर्व शिगमोत्सव मनाया जाता है। इस उपलक्ष में कानकोण के मल्लिकार्जुन मंदिर में शीर्षा रान्नी उत्सव आयोजित किया जाता है। समाचार प्राप्त होते ही मैंने इसे देखने दक्षिण गोवा की ओर निकलने का निश्चय कर लिया।

एक छोटे से द्वार समान संरचना तथा उसके समक्ष स्थित एक श्वेत रंग के प्रदर्शन मंच ने श्रीस्थल में हमारा स्वागत किया। इस स्थान पर अपने जूते-चप्पल उतारकर हमें आगे का पथ नंगे पाँव पार करना पड़ा। ये तो अच्छा था कि आगे पथ पर दरी बिछी बिछाई हुई थी। किन्तु तपती धूप में दरी भी इतनी गर्म हो गयी थी कि इस पर चलने के कारण मेरे पाँव में फफोले हो गए थे।

मल्लिकार्जुन मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार
मल्लिकार्जुन मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार

यहाँ से आगे लगभग २०० मीटर तक चलने के पश्चात हम श्रीस्थल के मल्लिकार्जुन मंदिर पहुंचे। वह उत्सव का दिवस था। अतः सम्पूर्ण मार्ग पर कई विक्रेता भिन्न भिन्न वस्तुओं की बिक्री कर रहे थे। न्यूनतम वस्त्र धारण किये कई आदिवासी पुरुष रस बिक्री करने के लिए गन्नों की रेढियाँ लगा रहे थे। वहां पहुंचते ही एक लाल किनारी वाले श्वेत तोरण ने मंदिर परिसर में हमारा स्वागत किया। यह वृत्तखंड सामान्य होते हुए भी अत्यंत आकर्षक था।

कानकोण के मल्लिकार्जुन मंदिर का इतिहास

मल्लिकार्जुन, इस नाम की व्युत्पत्ति महाभारत की एक कथा से हुई है। मल्ल नामक एक असुर पाँडव पुत्र अर्जुन से युद्ध कर रहा था। भगवान् शिव ने एक व्याध का रूप धरकर मल्ल को मारने में अर्जुन की सहायता की। इसलिए शिव को मल्लिकार्जुन भी पुकारा जाता है।

लिंग स्वरुप मल्लिकार्जुन
लिंग स्वरुप मल्लिकार्जुन

एक अन्य किवदंती के अनुसार मल्लिका एवं अर्जुन, पार्वती एवं शिव के ही नाम हैं। एक दीर्घ वियोग के पश्चात यहीं उनका मिलन हुआ था। इसलिए इसे मल्लिकार्जुन कहा जाता है। इस मंदिर को गोवा के प्राचीनतम मंदिरों में से एक माना जाता है।

मल्लिकार्जुन मंदिर एक सुन्दर स्थान पर स्थित है जिसका नाम भी अत्यंत सुन्दर है – श्रीस्थल, अर्थात् श्री का स्थल अथवा लक्ष्मी का स्थान। चारों ओर पहाड़ियों से घिरी हरीभरी सुन्दर घाटी अत्यंत मनोहारी है। वैसे भी हरियाली गोवा के परिक्षेत्र का एक अभिन्न अंग है।

स्थानीय निवासी यहाँ के देव को अदवत सिंहासनधीश्वर महापति कहते हैं। इसका अर्थ है, सिंह पर विराजमान, अर्थात् देवी। महापति का अर्थ उनके सहचरी अर्थात पति हो सकता है। चूंकि इस स्थान को श्रीस्थल कहा जाता है, इन तथ्यों में सत्यता हो सकती है। किन्तु विशेषज्ञों द्वारा प्रमाणित करने की आवश्यकता है।

मंदिर की वर्तमान संरचना १८वी. शताब्दी के अंतिम चरण की है। अतः आप इसकी एवं गोवा के अन्य मंदिरों की वास्तु-संरचना में समानता देख सकते हैं। मूल मंदिर इससे प्राचीन है। कुछ का मानना है कि मूल संरचना १६वी. शताब्दी की है। वहीं कुछ इसे उस से भी अधिक प्राचीन मानते हैं। मैं केवल इतना कह सकती हूँ कि जीवंत मंदिर सतत निर्माण की स्थिति में रहते हैं।

मल्लिकार्जुन मंदिर का लिंग

निराकार रूप में पूजा जाने वाला शिवलिंग लकड़ी का है। मुख्य मंदिर के समीप इसका एक छोटा पृथक मंदिर है। यह लिंग ऊंचा है तथा इस पर सुन्दर नक्काशी की गयी है। इसके चारों ओर एक छोटी संगमरमर की भित्त है। इसके समक्ष एक दीप प्रज्वलित किया गया था। यह ऐसा स्थान है जहां भक्तगण लिंग के समीप बैठकर पूजा अर्चना कर सकते हैं।

निराकार लिंग - काष्ठ में बना
निराकार लिंग – काष्ठ में बना

मुख्य मंदिर के भीतर स्थापित पत्थर के शिवलिंग के विषय में कहा जाता है कि कुनबी समुदाय के एक सदस्य को यह इसी रूप में वन में प्राप्त हुआ था। इसलिए इस लिंग को स्वयंभू कहा जाता है। इसे चांदी के मुकुट से ढंका गया है। दर्शन करते समय हम इसी चांदी के मुकुट के दर्शन करते हैं।

श्रीसैलम की पहाड़ियों में स्थित मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग से भी इसका सम्बन्ध माना जाता है। इतिहासकार गोवा की कुनबी जनजाती एवं आन्ध्र की चेंचू जनजाती के मध्य समांतरता मानते हैं। एक अन्य मान्यता के अनुसार इसका सम्बन्ध हब्बू ब्राम्हणों से बताया जाता है जो उत्तर कन्नड़ अथवा कानकोण में जा कर बस गए थे जिसके कारण मूल कुनबी समुदाय पीछे परिक्षेत्र में ढकेल दिए गए थे।

श्रीस्थल का मल्लिकार्जुन मंदिर

श्री मल्लिकार्जुन मंदिर कानकोण गोवा
श्री मल्लिकार्जुन मंदिर कानकोण गोवा

मल्लिकार्जुन मंदिर एक अत्यंत आकर्षक एवं मनमोहक संरचना है। कदाचित यह गोवा का सर्वाधिक सलोना मंदिर है। यह गोवा का एकमेव जीवंत मंदिर है जहां मैंने शिलाओं पर शिल्पकारियाँ देखी। भीतरी भित्तियों को उत्तम उत्कीर्णित लकड़ी के फलकों द्वारा मढ़ा गया है। मंदिर के भीतर प्रवेश से पूर्व आप दोनों ओर अश्वारोहक योद्धाओं की प्रतिमाओं को देखेंगे। भीतर प्रवेश करते ही पत्थर से बनी दो सुन्दर द्वारपालों की प्रतिमाएं द्वार के दोनों ओर दृष्टिगोचर होंगी।

पाषण अश्व पे सवार योद्धा
पाषण अश्व पे सवार योद्धा

मंदिर का मंडप छः विशाल स्तंभों पर टिका हुआ है जिस पर उत्तम नक्काशी की गयी है। हमें ज्ञात हुआ कि इनमें से एक स्तंभ का प्रयोग कुछ अनुष्ठानों में देववाणी के रूप में भी किया जाता है। किन्तु कौन से अनुष्ठानों में एवं कैसे प्रयोग किया जाता है, यह मैं नहीं जान पायी।

काष्ठ में उत्कीर्णित द्वारपाल
काष्ठ में उत्कीर्णित द्वारपाल

मंदिर की भीतरी भित्तियों पर लगे फलकों पर चित्रमालिका द्वारा शिवपुराण उत्कीर्णित किया गया है। दर्शन के उपरांत दक्षिणावर्त आगे बढ़ने पर आप इन फलकों पर शिवपुराण में उल्लेखित विभिन्न घटनाओं को देख सकते हैं। मैंने यहाँ ब्रम्हांड के कई ज्यामितीय निरूपण देखे किन्तु सामान्य दृष्टी से किंचित दूर होने के कारण इन्हें समझ कर इनका विश्लेषण करना संभव नहीं हो पाया।

इन फलकों के अंतिम भाग पर, शिव पुराण की कथाएं समाप्त होते ही, शीर्षा रान्नी उत्सव का चित्रण किया गया था। इस अनुष्ठान को भलीभांति समझने हेतु मुझे यह चित्र सर्वोत्तम प्रतीत हुआ।

मल्लिकार्जुन मंदिर का मंडप
मल्लिकार्जुन मंदिर का मंडप

गर्भगृह की बाहरी भित्तियों पर लगे लकड़ी के फलकों पर विष्णु की गाथाएँ उत्कीर्णित हैं। मुझे बताया गया कि इनमें से अधिकतर शिल्पकारी कर्नाटक स्थित कुमटा के कारीगरों ने किया है।

भीतर प्रवेश करते ही आपके बाईं ओर बगिलपाइक की प्रतिमा है जिन्हें संरक्षक देव कहा जाता है।

परिसर के अन्य मंदिर

काशी पुरुष मंदिर

कशी पुरुष मंदिर की छत
कशी पुरुष मंदिर की छत

मुख्य मंदिर के समक्ष स्थित यह एक छोटा सा मंदिर है जो उस योद्धा को समर्पित है जिसने सभी हब्बू पुरुषों का वध किया था। स्तंभों एवं छत पर की गयी नक्काशी अत्यंत सराहनीय है।

उत्कर्ष काष्ठ कला लिए कशी पुरुष मंदिर के स्तम्भ
उत्कर्ष काष्ठ कला लिए कशी पुरुष मंदिर के स्तम्भ

चूंकि मुख्य मंदिर के भीतर छायाचित्रण की अनुमति नहीं थी, मैंने इस मंदिर की लकड़ी पर की गयी उत्कीर्णन के कुछ छायाचित्र लिए। स्तंभों के मध्य में मंगल चिन्हों के अतिरिक्त मुझे राम एवं कृष्ण की कई गाथाएँ उत्कीर्णित दृष्टिगोचर हुए।

परशुराम मंदिर

कोंकण तट को परशुराम की भूमि माना जाता है। परशुराम भगवान् विष्णु के अवतार हैं जिन्होंने सारस्वत ब्राम्हणों को बसाने के लिए इस धरती को समुद्र से बाहर निकाला था। इस परिसर में उन्हें समर्पित मंदिर देख अन्यंत आनंद आया।

मल्लिकार्जुन मंदिर में भगवन परशुराम की प्रतिमा
मल्लिकार्जुन मंदिर में भगवन परशुराम की प्रतिमा

यह अत्यंत सादा मंदिर है। या यूँ कहें कि सादगी की पराकाष्ठा है। इसके भीतर परशुराम की शिला में बनी केवल एक प्रतिमा है। इस प्रतिमा का अनोखा तत्व यह है कि यह लिंग की भान्ति योनी पर स्थापित है।

देवी मंदिर

छोटी पहाड़ी पर स्थित देवी मंदिर
छोटी पहाड़ी पर स्थित देवी मंदिर

कुछ दूरी पर, एक छोटी पहाड़ी के ऊपर एक देवी मंदिर स्थित है। पहाड़ी के शीर्ष तक पहुँचने के लिए व्यवस्थित सीड़ियाँ हैं। मंदिर में देवी की पत्थर में बनी एक प्रतिमा है। मंदिर पर देवी के नाम का कहीं उल्लेख नहीं है। आसपास पूछने पर लोग इन्हें पार्वती देवी कह रहे थे। इसका कारण कदाचित इसका शिव मंदिर प्रांगन में स्थित होना हो सकता है।

येलम्मा देवी
येलम्मा देवी

जात्रा में मैंने कई येल्लम्मा प्रतिमाएं देखीं। सुन्दर साड़ियों एवं भव्य आभूषणों द्वारा अलंकृत येल्लम्मा की उजली तथा चमकदार प्रतिमाओं को कई पुरुष सम्पूर्ण उत्सव में उठाकर यहाँ वहां घूम रहे थे। जो भक्तगण इनके समक्ष आते, वे उन्हें प्रणाम कर उन्हें कुछ अर्पण करते।

छोटे शिव मंदिर

मल्लिकार्जुन मंदिर परिसर के छोटे बड़े शिव मंदिर
मल्लिकार्जुन मंदिर परिसर के छोटे बड़े शिव मंदिर

परिसर में कई छोटे मंदिर थे जिनके भीतर एकल अथवा बहुल शिवलिंग स्थापित हैं। सर्व शिवलिंगों पर उनकी आराधना किये जाने के चिन्ह थे किन्तु उनके विषय में कोई मुझे जानकारी नहीं दे पा रहा था।

मंदिर का जलकुंड

मल्लिकार्जुन मंदिर पुष्कर्णी
मल्लिकार्जुन मंदिर पुष्कर्णी

परिसर में एक चौकोर जलकुंड है जो मुझे कुछ कुछ राजस्थान अथवा हम्पी के विस्तृत बावड़ियों के सामान प्रतीत हो रहा था। सम्पूर्ण परिसर का केवल यही भाग मुझे उपेक्षित पड़ा हुआ प्रतीत हुआ। अब तक मेरा यह मानना था कि इन जलकुंडों का मन्दिर के अनुष्ठानों में महत्वपूर्ण स्थान है किन्तु यहाँ मंदिर के एक ओर स्थित नलकूप, जल की सभी आवश्यकताओं को पूर्ण कर रहा था।

श्रीस्थल के मल्लिकार्जुन मंदिर के उत्सव

महाशिवरात्रि, शिग्मो तथा रथसप्तमी जैसे कई उत्सवों का यहाँ आयोजन किया जाता है। तथापि मैं आज यहाँ गोवा के एक अनोखे उत्सव की चर्चा करने वाली हूँ।

शीर्षा रान्नी अनुष्ठान

शीर्षा रन्नी का चित्र
शीर्षा रन्नी का चित्र

इस मंदिर का सर्वाधिक अनूठा उत्सव है वार्षिक जात्रा जहां शीर्षा रान्नी अनुष्ठान किया जाता है। हिन्दू पञ्चांग के अनुसार, यह उत्सव फाल्गुन मास की कृष्ण षष्ठी के दिवस पर आयोजित किया जाता है। आप जानते ही हैं कि एक दिवस पूर्व देश के विभिन्न भागों में रंग पंचमी भी मनाई जाती है तथा इसके ५ दिवस पूर्व होली का पर्व मनाया जाता है।

इस दिन यहाँ किसी काल में घटी किसी घटना का नाट्य रूपांतरण किया जाता है। ३ पुरुष जिन पर दैवी शक्ति का आगमन हुआ है, भूमि पर शयनावस्था में आकर अपने शीर्ष एक दूसरे से सटा कर त्रिकोण बनाते हैं। त्रिकोण के मध्य अग्नि प्रज्वलित की जाती है। अग्नि के संग शीर्ष का त्रिकोण चूल्हे का रूप ले लेता है। इस चूल्हे पर, मिट्टी की हांड़ी में चावल पकाया जाता है।

क्षत्रिय उत्सव में तलवार
क्षत्रिय उत्सव में तलवार

मंदिर के समीप का क्षेत्र सामान्य दर्शकों हेतु प्रतिबंधित किया जाता है। केवल अनुष्ठान में भाग लेते भक्त ही इस क्षेत्र में आ सकते हैं। इसके समीप स्थित सीड़ियों के ऊपर अस्थायी छत बनायी जाती है जहां बैठकर सभी दर्शक इस उत्सव का अवलोकन करते हैं।

रंग-बिरंगी साड़ियाँ पहनी स्त्रियाँ इस स्थान को अत्यंत जीवंत बना रही थीं। सम्पूर्ण उत्सव में पूर्ण समय वीर रस से ओत-प्रोत संगीत बजाया जा रहा था।

तरंग

तरंग - शीर्षा रन्नी उत्सव की साक्षी
तरंग – शीर्षा रन्नी उत्सव की साक्षी

अनेक साड़ियों को चुन्नटों में एकत्र कर छत्री बनायी जाती है। ऐसी कई रंग-बिरंगी छत्रियां हाथों में उठाये, लोग गाजे-बाजे के साथ, धूमधाम से मंदिर से गाँव तक की फेरी लगाकर वापिस मंदिर आते हैं। इन्हें तरंग कहते हैं।

गोवा के अन्य मंदिरों के सामान इस मंदिर में भी इन तरंगों का महत्वपूर्ण स्थान है। फेरी लगाकर जब ये तरंगें नृत्य एवं संगीत के साथ मंदिर वापिस लौटते हैं, तब हाथों में तलवार लिए कुछ युवक इसके समक्ष युद्धविद्या प्रस्तुत करते हैं। वहीं तरंगे हाथों में उठाये भक्तगण संगीत के सुर पर नृत्य करते रहते हैं। सम्पूर्ण दृश्य अद्भुत व दर्शनीय हो जाता है।

तरंग के शीष पर विराजित देवता
तरंग के शीष पर विराजित देवता

संध्या लगभग ४ बजे छः तरंगों को एक पंक्ति में भूमि पर खड़ा किया गया। मैंने इनमें से तीन छत्रियों के ऊपर भगवान् की प्रतिमाएं देखीं। ध्यान से इन प्रतिमाओं को देखने पर मुझे नंदी पर सवार शिव दिखाई दिए। साहित्यों के अनुसार वे कदाचित अवतार पुरुष हैं। तरंगों के लाल खम्बों पर कुछ बूटियाँ रंगी गयी थीं। किन्तु मैं उन्हें समीप से नहीं देख पायी। दूर से मुझे उन खम्बों पर कुछ हाथों के चिन्ह रंगे हुए दिखे। ये तरंगें तीन पुरुषों के शीर्ष पर भात पकाने के अनुष्ठान के साक्षात साक्षी होते हैं।

इन तरंगों के साथ हाथों में तलवार लिए पुरुष खड़े रहते हैं। इस क्षेत्र में स्त्रियों का जाना प्रतिबंधित है। इसलिए हम कुछ दूरी पर बैठ गए।

गड़े

तीन पुरुष जिनके शीर्ष पर चावल पकाया जाता है, उन्हें गड़े कहते हैं। इनके अंगों पर भस्म मलकर इनके शीर्ष पर केले की पत्तियों के एक मोटी परत बांधी जाती है। इनके शीर्ष पर भात पकाकर, एक गड़े का किंचित रक्त इस भात में मिलाया जाता है। तत्पश्चात इस पके हुए भात के दानों को भीड़ पर फेंका जाता है। भात के दानों के नकारात्मक प्रभाव से बचने के लिए लोग इधर उधर भागते हैं।

शीर्षा रन्नी की प्रथा
शीर्षा रन्नी की प्रथा

वर्तमान में यह सम्पूर्ण अनुष्ठान केवल प्रतीकात्मक रूप से मनाया जाता है। किन्तु मैं सोचती हूँ, किसी काल में यह अनुष्ठान, बुरी आत्माओं को समाप्त करने के लिए, अत्यंत विस्तृत रूप में मनाया जाता रहा होगा। साथ ही क्षत्रियों को उनके धर्म का स्मरण कराने हेतु भी यह उत्सव मनाया जाता रहा होगा। यह एक अत्यंत प्रसिद्ध उत्सव है। इसके दर्शन के लिए लोगों की इतनी भीड़ थी कि अनुष्ठान स्थल से कुछ ही मीटर की दूरी पर बैठने के पश्चात भी मैं सही प्रकार से अनुष्ठान देख नहीं पा रही थी।

यह उत्सव दो वर्षों में एक बार आयोजित किया जाता है। मैंने २०१९ में यह अनुष्ठान देखा था। अनुमानतः यह प्रत्येक विषम वर्षों में आयोजित किया जाता है।

मल्लिकार्जुन मंदिर के शीर्षा रान्नी उत्सव का विडियो

वीरमल उत्सव

वीरमल उत्सव फाल्गुन मास की शुक्ल द्वादशी के दिवस आयोजित किया जाता है अर्थात् होली से तीन दिवस पूर्व।

पुरुष सम्पूर्ण दिवस व्रत-उपवास करते हैं। इन्हें भगत कहा जाता है। संगीतज्ञों संग कुल १८ भगतों का एक समूह बनाया जाता है। ऐसे कई समूह बनाए जाते हैं। इन समूहों को गड़े कहते हैं। संध्याकाल के समय, ढोल की ताल पर, गड़े तलवार हाथों में लिए घर-घर दौड़ते हैं। उन घरों के वासी उन्हें पान-सुपारी भेंट चढ़ाते हैं।

मेरे अनुमान से यह युद्ध काल के किसी अनुष्ठान का नाट्य रूपांतरण हो सकता है। अथवा गांववासियों को सुरक्षा की दृष्टी से आश्वस्त करने हेतु युवकों द्वारा किया जाने वाला कोई अनुष्ठान हो। मुझे बताया गया कि इस उत्सव के समय गाँव की बिजली भी बंद कर दी जाती है।

क्षत्रिय समाज का मंदिर

दीपस्तंभ - गोवा के मंदिरों की विशेष शैली मैं
दीपस्तंभ – गोवा के मंदिरों की विशेष शैली मैं

यह क्षत्रिय समाज अर्थात् योद्धा कुलों का मंदिर है। निःसंदेह यह मल्लिकार्जुन के स्वरूप में शिव को समर्पित मंदिर है। ठीक वैसे ही जैसे तेलंगाना में श्रीसैलम की पहाड़ियों पर है। विचित्र तथ्य यह है कि जब जब मैं इसे हिन्दू मंदिर कहती, मुझे ‘यह क्षत्रिय मंदिर है’ कहकर संशोधित किया जाता था।

मैंने कहा भी कि क्षत्रिय भी हिन्दू ही हैं। उन्होंने कहा, सत्य है। किन्तु यह मंदिर सर्व हिन्दुओं का ना होकर केवल क्षत्रियों का है। चलिए, यह भी ठीक है।

गोवा में कुल १३ मल्लिकार्जुन मंदिर हैं जिनमें कानकोण में ही ४ मंदिर हैं।

कानकोण के निकवर्ती दर्शनीय स्थल

कानकोण का मूल नाम कण्व ऋषि पर कण्वपुर था। कण्व ऋषि के विषय में आप जानते ही हैं। कुछ समय पूर्व उत्तराखंड के कण्वाश्रम में मैं भी आप सबको ले गयी थी।

पालोले समुद्रतट – यह पर्यटकों में अत्यंत प्रसिद्ध समुद्रतट है। यह सदैव पर्यटकों से भरा रहता है। शान्ति से बैठकर सूर्यास्त दर्शन करने के लिए यह सर्वोत्तम स्थान है। दो पहाड़ियों के मध्य समुद्र के जल में सूर्य को अस्त होते देखना अत्यंत अद्भुत अनुभव है।

पालोले समुद्रतट पर कई भोजन कुटियाएँ एवं भोजनालय हैं। समुद्र की लहरों का आनंद उठाते हुए आप स्वादिष्ट भोजन का स्वाद ले सकते हैं। हमने यहाँ के सुप्रसिद्ध भोजनालय, द्रोपदी के भोजन का भरपूर आस्वाद लिया।

कोटिगाओ वन्यजीव अभयारण्य – यह एक अत्यंत मनोरम वन्यजीव अभयारण्य है। वर्षा ऋतु में यह कुसके जलप्रपात जैसे कई अनेक आकर्षक जलप्रपातों से भर जाता है। कोटिगाओ वन्यजीव अभयारण्य पर मेरा विस्तृत संस्मरण पढ़ें।

बुडबुडे ताल – बुलबुलों से भरा गोवा का यह जलाशय नेत्रवती क्षेत्र में है। यहाँ एक सुन्दर स्पाइस गार्डन अर्थात् मसालों के वृक्षों का वन भी है। बुडबुडे ताल के विषय में और पढ़ें।

श्रीस्थल कैसे पहुंचें?

मल्लिकार्जुन मंदिर कानकोण - गोवा

  • श्रीस्थल गोवा की राजधानी पणजी से ७५ की.मी. दक्षिण की ओर स्थित है। यह कानकोण के तालुका मुख्यालय चावडी से ५ की.मी. की दूरी पर स्थित है।
  • मडगाव से नियमित बसें आपको यहाँ पहुंचा सकती हैं।
  • यदि आप चाहें तो टैक्सी द्वारा यहाँ पहुँच सकते हैं। श्रीस्थल पहुँचने का यह श्रेयस्कर साधन है।
  • उत्सव के दिन मंदिर में भक्तगणों, दर्शकों एवं पर्यटकों का तांता लगा रहता है। परिसर में निःशुल्क भोजन की व्यवस्था है। यह और बात है कि मंदिर में भोजन कर आप चाहें तो कुछ दान दक्षिणा अवश्य कर सकते हैं।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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श्री कृष्ण के काल को बहुधा इन तीन धरोहरों से जोड़ा जाता है, गोवर्धन पर्वत, ब्रज भूमि तथा यमुना नदी। यमुना नदी का श्याम वर्ण जल कृष्ण के श्याम वर्ण के समान है। यमुना उनकी आठ पत्नियों में से एक है। यहाँ मथुरा में तो वह उनकी पटरानी है। ब्रज भूमि के दर्शन यमुना नदी […]

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श्री कृष्ण के काल को बहुधा इन तीन धरोहरों से जोड़ा जाता है, गोवर्धन पर्वत, ब्रज भूमि तथा यमुना नदी।

चुनरी मनोरथ अनुष्ठान मथुरा में यमुना नदी पर यमुना नदी का श्याम वर्ण जल कृष्ण के श्याम वर्ण के समान है। यमुना उनकी आठ पत्नियों में से एक है। यहाँ मथुरा में तो वह उनकी पटरानी है। ब्रज भूमि के दर्शन यमुना नदी के दर्शन के बिना अपूर्ण है।

मथुरा में यमुना नदी पर नौका विहार

इस पवित्र नदी पर नौका विहार तीर्थ यात्रियों तथा पर्यटकों का लोकप्रिय क्रियाकलाप है। अतः एक दिवस प्रातः काल मैंने भी नौका द्वारा मथुरा के विभिन्न घाटों के दर्शन करने का निश्चय किया। प्रतिदिन यमुना नदी जिन दृश्यों को निहारती है, कदाचित उन्ही दृश्यों को निहारने की कामना मुझमें थी।

नौका विहार का विडियो

मैंने जब घाट की ओर चलना आरम्भ किया, मैंने कुछ नवयुवकों को एक मंडप के नीचे, अपने गुरूजी के संग वेदों का जाप करते सुना। बाजार खुलना आरंभ हो रहा था। चारों ओर से मंदिर की घंटियों का नाद सुनायी दे रहा था।

विश्राम घाट

विश्राम घाट - मथुरा

मैं प्रसिद्ध विश्राम घाट पहुँची तथा वहां एक रंग बिरंगी नौका में बैठ गयी। ऐसा माना जाता है कि कंस का वध करने के पश्चात कृष्ण ने यहीं विश्राम किया था। इसीलिए इस घाट का नाम विश्राम घाट पड़ा। दोनों ओर १२-१२ घाटों के ठीक मध्य यह विश्राम घाट है।

नौका के चारों ओर रंग बिरंगी पताकाएं फहरा रही थीं। बैठने के लिये भी उतनी ही रंगबिरंगी दरी बिछी हुई थी। नाविक ने हमें ब्रज भाषा में ब्रज भूमि की कई कथाएं सुनाईं। कवितायें एवं मुहावरें उसके मुंह से झरने के समान बह रहे थे। मार्च के सुहावने वातावरण में नौका विहार का आनंद उसने कई गुना बढ़ा दिया था।

कंस किला अर्थात कंस का दुर्ग

कृष्णा के मामा कंस का दुर्ग
कृष्णा के मामा कंस का दुर्ग

विश्राम घाट से हम बाईं ओर कंस का किला अर्थात् दुर्ग की ओर बढ़ रहे थे। नाविक हमें विभिन्न घाटों एवं उनसे सम्बंधित कथाओं के विषय में बता रहा था। कंस के दुर्ग के भीतर जाकर देखने की मेरी प्रबल इच्छा थी, जबकि मुझे भलीभांति ज्ञात था कि यह कंस का दुर्ग है। सबने मुझे बताया कि भीतर देखने योग्य कुछ नहीं है। लाल बलुआ पत्थर से निर्मित यह दुर्ग अपेक्षाकृत नवीन है। दूर से यह दुर्ग विशाल प्रतीत हो रहा था। नदी की सतह पर पड़ते अपने प्रतिबिम्ब के साथ वह और भी अधिक भव्य दिखाई पड़ रहा था।

यमुना की होली

यमुना किनारे रंग बिरंगी नावें
यमुना किनारे रंग बिरंगी नावें

सम्पूर्ण नदी के किनारे स्थित रंगबिरंगे घाटों पर विभिन्न कार्यकलापों की गजबजाहट स्पष्ट दिखाई पड़ रही थी। मैं यहाँ होली के पर्व से कुछ दिनों पूर्व आयी थी। किन्तु यह ऐतिहासिक नगरी अभी से होली के रंग में रंग गयी थी। मैंने यहाँ कई परिवारों को यमुना से होली खेलते देखा। जी हाँ, आपने सही पढ़ा। पवित्र नदी यमुना के संग होली! वे होली के लोकगीत गाते, नदी में कुछ रंग छिड़कते तत्पश्चात आपस में होली खेलते। यह प्रथा अधिकतर उन सभी अनुष्ठानों में पाली जाती है जिनका आयोजन घाटों में होता है। चारों ओर हर्ष एवं उल्हास का वातावरण था जो यहाँ सदैव रहता है। यूँ ही नहीं कृष्ण ने इस स्थान को खेलने तथा रास लीला रचाने के लिए चुना था।

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यहाँ एक संरचना विशेषतः मेरी स्मृति में है। लाल बलुआ पत्थर द्वारा राजस्थानी झरोखा शैली में निर्मित एक ऊंचा बुर्ज जिसे सती बुर्ज कहा जाता है। कहा जाता है कि एक रानी जो अकबर की सास भी थीं, यहाँ सती हुई थीं। उनकी स्मृति में यह बुर्ज खड़ा किया गया था।

पुराणों के छंद

पुराणों में मथुरा और यमुना
पुराणों में मथुरा और यमुना

घाट के उस पार, कुछ फलकों पर पुराणों के छंद थे जो संस्कृत भाषा में मथुरा की गाथा कह रहे थे। साथ ही हिंदी में उनका अर्थ भी प्रदर्शित था। यह मुझे अत्यंत भाया। आशा करती हूँ कि अन्य तीर्थ स्थलों पर भी यह प्रथा शीघ्र आरम्भ की जायेगी जो उस स्थान का स्थल पुराण अर्थात् उस स्थान के पौराणिक आलेख सार्वजनिक स्थानों पर इसी प्रकार प्रदर्शित करेंगे।

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यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि नदी के घाट स्वच्छ नहीं हैं। मैंने स्वयं देखा कि गंदे नाले द्वारा मैला सीधे नदी में जा रहा था। कचरा तो इतना था कि वह घाट की सीड़ियों एवं नदी के जल के बीच ड्योढी के समान प्रतीत हो रहा था। नदी के मलिन जल को देख मेरा हृदय अत्यंत आहत हुआ था।

उपरोक्त चर्चा के पश्चात भी मैं यही कहूंगी कि मथुरा की महिमा इसके परे है। यहाँ के अर्धचन्द्राकार घाटों पर शांत बहते जल के किनारे बैठकर इनकी कथाओं में खो जाना अतुलनीय अनुभव है। शान्ति से बैठिये तथा ब्रजवासियों के मुख से इस धरती की कथाएं सुनकर आत्म विभोर हो जाईये।

चुनरी मनोरथ – जब यमुना चुनरी ओढ़ती है

नौका सवारी के समय मेरे गाइड ने मुझे इस पवित्र नदी पर आयोजित किये जाने वाले इस अनोखे अनुष्ठान की जानकारी दी। और मेरा सौभाग्य देखिये, नाविक ने जानकारी दी कि उस दिन भी कुछ चुनरी मनोरथ अनुष्ठान नियोजित थे। मैंने अपने दिन के बचे कार्यक्रम की सूची में झटपट फेर-बदल किया तथा यह सुनिश्चित किया कि मैं भी इस अनोखे अनुष्ठान का आनंद ले सकूं।

यह चुनरी मनोरथ क्या है?

चुनरी मनोरथ के लिए सजे कृष्ण एवं यमुना
चुनरी मनोरथ के लिए सजे कृष्ण एवं यमुना

मनोरथ का अर्थ है मनोकामना अथवा इच्छा। चुनरी का अर्थ आप जानते ही हैं, जो भारतीय परिधान का एक अभिन्न अंग है। किसी भी घरेलू उत्सव में अथवा विवाह, मंगनी जैसे पवित्र आयोजनों में स्त्रियों को चुनरी ओढाने की रीत है। यह सुहागन का अधिकार है। दिव्य नारी सुलभ पवित्रता का प्रतीक है।

चुनरी मनोरथ में यमुनाजी को चुनरी अर्पित की जाती है। उन्हें पावन मथुरा की देवी माना जाता है। परिवारजन उन्हें अर्पित करने के लिए अत्यंत लम्बी साड़ी लाते हैं जिसे वे कई साड़ियों को जोड़कर बनाते हैं। अधिकतर १०१ साड़ियों को आपस में सिलकर यह साड़ी तैयार की जाती है। कभी कभी तो भक्तगण ४०० साड़ियों तक को जोड़कर ये लम्बी साड़ी तैयार करते हैं। इस लम्बी साड़ी के एक छोर को इसी तट पर रखकर साड़ी को अनेक नौकाओं द्वारा पावन नदी के उस पार तक ले जाते हैं। जब साड़ी का दूसरा छोर नदी पार कर दूसरे किनारे तक पहुंचता है तो ऐसा प्रतीत होता है मानो नदी ने चुनरी ओढ़ ली है।

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साधारणतः यह परिवारजनों द्वारा किसी विशेष प्रयोजनों में आयोजित किया जाता है अथवा किसी मनोकामना के पूर्ण होने पर कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए आयोजित किया जाता है। उस दिन मैंने दो चुनरी मनोरथ देखे। एक चुनरी मनोरथ में एक गुजराती परिवार के ९०-१०० सदस्य अपने आदरणीय कुलपिता के जन्म दिवस का उत्सव मना रहे थे। वे वृद्ध पुरुष अपनी अर्धांगिनी के संग सर्व पूजा विधि संपन्न कर रहे थे। दूसरे चुनरी मनोरथ में एक राजस्थानी परिवार के १०-१२ सदस्य अपने परिवार में प्रवेश करती नयी नवेली दुल्हन के स्वागतार्थ यह अनुष्ठान कर रहे थे।

चुनरी मनोरथ कौन कर सकता है?

सपरिवार चुनरी मनोरथ करते दम्पति
सपरिवार चुनरी मनोरथ करते दम्पति

चुनरी मनोरथ मुख्यतः गुजरात एवं राजस्थान के वैष्णव परिवार के सदस्य करते हैं जो पुष्टिमार्ग के अनुयायी हैं। यमुना देवी पुष्टिमार्ग भक्ति के अनुयायियों की प्रमुख देवी हैं। इनके अतिरिक्त किसी अन्य भक्त के लिए यह अनुष्ठान करने के लिए कोई बंधन नहीं है। वहां के पुजारीगण प्रसिद्ध सांसद हेमा मालिनी द्वारा किये गए चुनरी मनोरथ की कथा सुनाते नहीं थकते। उन्होंने यह अनुष्ठान करवाया था, कदाचित सांसद बनने के पश्चात कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए।

यह अनुष्ठान वर्ष भर किसी भी समय किया जा सकता है। घाट की सीड़ियों पर एक आश्रय निर्मित किया गया है ताकि अनुष्ठान के समय लोग इसके नीचे बैठकर देख सकें। यह अनुष्ठान अत्यंत विस्तृत है तथा इसके संपन्न होने तक कई घंटे लग जाते हैं।

चुनरी मनोरथ की कथा

एक समय ब्रज की गोपियों को कृष्ण के संग खेलते एवं रास लीला रचाते हुए गर्व उत्पन्न हो गया था। उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ कि कृष्ण सदैव उनका कहा मानते हैं तथा वे जो कहें वह करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। जैसे ही कृष्ण को यह आभास हुआ, उन्होंने गोपियों को सही दिशा दिखने का निश्चय किया। वे पवित्र यमुना के जल के भीतर जाकर छुप गए। उन्हें ना देखकर सभी गोपियों को अत्यंत पीड़ा हुई तथा उनकी दुर्गति होने लगी। बावरी होकर उन्होंने गोपी गीत गाना आरम्भ किया।

वे एक वन से दूसरे वन तक तथा एक तालाब से दूसरे तालाब तक दर दर भटकने लगीं। अंततः वे यमुना के समीप गयीं तथा उनसे कृष्ण के विषय में पूछा। गोपियों की दुर्दशा एवं उनका दुःख देख पावन नदी का हृदय पिघल गया। उन्होंने कृष्ण से बाहर आकर गोपियों के मुख व जीवन में आनंद वापिस लाने का अनुनय किया।

गोपियों ने यमुनाजी को धन्यवाद दिया तथा कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु उन्हें चुनरी अर्पित की। उस समय से यह परंपरा स्थापित हो गयी। भक्तगण इच्छा पूर्ति के उपरांत पावन नदी की ओर कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए उन्हें चुनरी उढ़ाते हैं।
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अनुष्ठान

परिवारजन अपने शीश पर साड़ियों का गट्ठा रख कर धूमधाम से शोभायात्रा निकालते हैं। वे स्वयं भी जितना संभव हो, उत्तम वस्त्र धारण करते हैं। मैंने देखा, चुनरी मनोरथ करते एक परिवार की सभी स्त्रियाँ लाल रंग की बांधनी साड़ी पहने, विशेष रूप से सजी हुई थीं। दूसरे परिवार की स्त्रियों ने भारी रेशमी साड़ियाँ एवं भव्य आभूषण धारण किया हुआ था। मेरे अनुमान से सभी साड़ियाँ नवीन थीं। सभी मधुर तान पर गीत गाते एवं नृत्य करते पवित्र नदी के घाट पर जा रही थीं। वे जब बाजार से होते हुए जा रही थीं, वहां उपस्थित सभी के मुख पर दिव्य प्रसन्नता थी क्योंकि उनकी लाडली यमुनाजी का आज विशेष श्रृंगार होने जा रहा है।

वे सब जाकर यमुना के घाट की सीड़ियों पर बैठ गयीं तथा पुजारीजी को चुनरी मनोरथ की तैयारियां करते देखने लगीं। वहां एक मंच तैयार किया गया था जिस पर क्रमशः ये अनुष्ठान किये जाने थे:

गणेश पूजा
कैलाश पूजा
मातृका पूजा
कृष्ण तथा यमुना पूजा

श्री कृष्ण एवं यमुना जी
श्री कृष्ण एवं यमुना जी

दो घड़ों को रंग कर कृष्ण एवं यमुना का रूप प्रदान किया गया था। उनका वर-वधु के समान श्रृंगार किया गया था। अनुष्ठान में भाग लेने वाला प्रत्येक सदस्य उन्हें वस्त्र एवं आभूषण अर्पित कर रहा था। उनके चारों ओर भिन्न भिन्न प्रकार के मिष्टान रखे थे। मैंने देखा कि पुजारीजी एवं परिवार के सदस्य मूर्तियों को अत्यंत प्रेम एवं श्रद्धा से सुसज्जित कर रहे थे।

पवित्र नदी का चढ़ावा

पवित्र नदी के किनारे बैठकर परिवारजन उन्हें वे सर्व चढ़ावे चढ़ा रहे थे जो अन्यथा वे मंदिर में भगवान् को चढ़ाते हैं, जैसे दूध, दही, हल्दी, कुमकुम इत्यादि। होली का समय होने के कारण उन्होंने यमुना को होली के ५ रंग भी अर्पित किये।

यमुना जी के संग होली खेलने के लिए रंग
यमुना जी के संग होली खेलने के लिए रंग

सर्व पूजा विधि समाप्त होते ही वे सब नौकाओं पर सवार होने लगे। उन्होंने अपने हाथों में साड़ी उठायी हुई थी। उनके समक्ष चुनौती थी कि उन्हें इतनी लम्बी साड़ी ऊंची उठाकर पकड़नी थी । जैसे जैसे नदी उस पार जाने के लिए आगे बढ़ रही थी वैसे वैसे रंग बिरंगी साड़ी का गट्ठा खुल रहा था। यमुना नदी इसकी रंगीन छटा में खिल रही थी। परिवारजनों के मुख पर अपार आनंद स्पष्ट झलक रहा था, मानो वे एक स्वप्न को जी रहे थे।

“यमुना मैय्या की जय” चारों ओर यमुना मैया की जय जयकार गूँज रहा था। यमुना को चुनरी उढ़ाने का कार्य सम्पूर्ण होते ही वे एक दूसरे को बधाइयां दे रहे थे।

विस्तृत अनुष्ठान

जितना समय इस सम्पूर्ण अनुष्ठान के पूर्ण होने में व्यतीत हुआ तथा जितनी वस्तुएं यमुनाजी को अर्पित की गयीं, उनसे मैंने यह अनुमान लगाया कि यह एक मूल्यवान अनुष्ठान है।

मैंने कुल ३ घंटे यहाँ व्यतीत किये थे इस अनुष्ठान को देखने में। जो बड़ा परिवार यहाँ अनुष्ठान करवा रहा था, उन्होंने मुझे भी अनुष्ठान में सहभागी होने का आमंत्रण दिया तथा मुझे भी यमुना को रंग अर्पित करने का अवसर दिया। उन्होंने तो मुझे नौका में सवार होकर चुनरी उढ़ाने में भी भाग लेने का आमंत्रण दिया था। किन्तु मैंने उन्हें विनम्रता से मना कर दिया तथा तट पर बैठकर यहाँ से वह विहंगम दृश्य देखने का निश्चय किया।

यह मेरे लिए वह आकस्मिक लाभ था जो मुझे सही समय पर सही स्थान में उपस्थित होने के कारण प्राप्त हुआ था। एक दिवस पूर्व तक मैं इस अनुष्ठान से पूर्णतः अनभिज्ञ थी। प्रातःकाल मैंने यूँ ही निश्चय किया था कि नौका पर सवारी करते हुए यमुना के तटों का आनंद लूंगी तत्पश्चात मथुरा के अन्य स्थलों के दर्शन करूंगी। किन्तु यमुनाजी ने मेरे लिए कुछ और ही निश्चित किया हुआ था। वे चाहती थीं कि मैं उनका चुनरी श्रृंगार होते देखूं। उनके आशीर्वाद के बिना यह असंभव था। ये वे क्षण थे जो एक यात्री को सही मायने में तृप्त कर देते हैं।

मुझे बाद में यह जानकारी प्राप्त हुई कि नर्मदा नदी में भी इसी प्रकार का अनुष्ठान किया जाता है। मैं प्रतीक्षा में हूँ कि कब नर्मदा माँ भी मुझे इसी प्रकार बुलाएंगी तथा उनके श्रृंगार में सहभागी होने का अवसर प्रदान करेंगी।
आप भी जैसे ही अवसर प्राप्त हो, इस अनोखे अनुष्ठान को अवश्य देखिये।

कृष्ण एवं यमुना की कथाएं

यमुना के घाटों पर आप कई गाथाएँ सुनेंगे।

जब यमुना जी चुनरी ओढती हैं

एक कथा के अनुसार, कृष्ण के जन्म के पश्चात् सर्वप्रथम यमुनाजी को उनके चरण स्पर्श करने का अवसर प्रदान हुआ था। जब कृष्ण का जन्म हुआ था, उनके पिता वसुदेव उन्हें एक टोकरी में रखकर यमुना पार गोकुल ले गए थे जहां उनके मित्र नन्द एवं यशोदा का निवास था। वे जब यमुना में उतरे, नदी का जल उनके गले तक पहुँच गया था। तब कृष्ण ने टोकरी से चरण बाहर निकाल लिए। जैसे ही यमुना ने उनके चरण स्पर्श किये, उसका जल स्तर नीचे जाने लगा। वसुदेव ने आसानी से यमुना पार कर ली।

एक अन्य किवदंती के अनुसार, कृष्ण ने अपनी अनेक लीलाएं यमुना नदी के तट पर ही की थीं, जैसे रास लीला, बंसी बजाना, गायें चराना, गोपियों का चीर हरण इत्यादि।

एक अन्य कथा में दर्शाया गया है कि यमुना नदी मानवी रूप धर कर, हाथों में कमल पुष्प की वरमाला लिए कृष्ण से विवाह करने आयी थीं।

यमुनाजी सूर्य की पुत्री एवं मृत्यु देव यम की भगिनी हैं। उन्हें कृष्ण की प्रवाही शक्ति भी कहा जाता है। कुछ लोग उन्हें बिरजा देवी भी बुलाते हैं। यहाँ और पढ़ें

नौका सवारी के लिए सुझाव

• घाट एवं नौका सवारी का आनंद उठाने के लिए १ घंटे का समय आवश्यक है।
• १ घंटे की विशेष सवारी के लिए मैंने ४००/- रुपये भुगतान किये थे। यह नौका १५-२० लोगों को बिठाने में सक्षम है।
• प्रयत्न कर यहाँ प्रातः आने का प्रयास करें। तब ये घाट विविध क्रियाकलापों से जीवंत रहता है। सूर्य भी अनुकूल रहता है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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