भारत के बाज़ार Archives - Inditales श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Mon, 12 Jun 2023 04:46:11 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.7.5 गोवा के सुप्रसिद्ध म्हापसा बाज़ार की सैर https://inditales.com/hindi/goa-ka-shukravaar-mapusa-bazaar/ https://inditales.com/hindi/goa-ka-shukravaar-mapusa-bazaar/#respond Wed, 01 Feb 2023 02:30:35 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2946

म्हापसा गोवा की चार प्रमुख नगरियों में से एक है। प्राचीन युग से यह उत्तर गोवा का व्यापार केंद्र रहा है। गोवा के निवासी अब भी म्हापसा बाज़ार पर अत्यंत मोहित रहते हैं। यहाँ तक कि म्हापसा नगरी का नाम भी म्हापसा बाज़ार से आया है जो अब इसकी पहचान बन गया है। आप सब […]

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म्हापसा गोवा की चार प्रमुख नगरियों में से एक है। प्राचीन युग से यह उत्तर गोवा का व्यापार केंद्र रहा है। गोवा के निवासी अब भी म्हापसा बाज़ार पर अत्यंत मोहित रहते हैं। यहाँ तक कि म्हापसा नगरी का नाम भी म्हापसा बाज़ार से आया है जो अब इसकी पहचान बन गया है।

म्हापसा बाज़ार गोवा
म्हापसा बाज़ार गोवा

आप सब ने गोवा के मडगांव नगर के विषय में सुना ही होगा। जैसे मडगांव दक्षिण गोवा का केंद्र बिंदु है, वही स्थान उत्तर गोवा में म्हापसा का है। पणजी नगर ने गोवा एवं गोवा-वासियों के जीवन में विलंब से प्रवेश किया था। म्हापसा शब्द की व्युत्पत्ति माप शब्द से हुई है जिसका अर्थ है मापना। किसी व्यापारिक क्षेत्र का नाम इससे अधिक उपयुक्त नहीं हो सकता। व्यंगय में लोग इसे महा पिशे अर्थात महान पागलों की नगरी भी कहते हैं।

म्हापसा बाज़ार

म्हापसा एवं इसके आसपास के क्षेत्रों से लोग प्रत्येक शुक्रवार को आवश्यक वस्तुएँ क्रय करने हेतु म्हापसा बाज़ार आते हैं। लोग इस बाज़ार को अब भी शुक्रवार से जोड़कर ही देखते हैं क्योंकि प्रत्येक शुक्रवार को यहाँ पारंपरिक बाज़ार भरता था। यह और बात है कि आजकल सप्ताह के अन्य दिनों में भी म्हापसा बाज़ार उतना ही चहल-पहल एवं भीड़ भाड़ भरा होता है। सप्ताह के अन्य दिनों में भिन्न गाँवों में यह बाज़ार भरता है।

जड़ी बूटियाँ - म्हापसा बाज़ार
जड़ी बूटियाँ – म्हापसा बाज़ार

इतिहास की दृष्टि से देखें तो जो बाज़ार आज हम देखते हैं, उसका आरंभ १९६० में हुआ था। अर्थात १९६१ में प्राप्त गोवा मुक्ति से ठीक एक वर्ष पूर्व। यह गोवा का प्रथम योजनाबद्ध एवं आयोजित बाज़ार है। इसे उस काल का शॉपिंग मॉल कह सकते हैं। दुकानों की गलियों के मध्य खुले स्थान होते हैं जहां व्यापारिक वस्तुओं की लदाई व उतराई की जा सकती है। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि यह स्थान सिपाहियों द्वारा बाज़ार पर निगरानी रखने हेतु नियोजित किया गया था। दुकानों के समक्ष समानांतर जाते हुए स्तम्भ युक्त गलियारे प्रमाण हैं।

कंकना पाव
कंकना पाव

बाज़ार को इस प्रकार नियोजित किया गया है कि एक प्रकार की वस्तुएं एक ही गली में उपलब्ध हो जाती हैं। उसी प्रकार भिन्न वस्तुओं के लिए भिन्न गालियाँ नियोजित हैं। जैसे सुनारों की सभी दुकानें एक गली में स्थित हैं तो कपड़ों की दुकानें दूसरी गली में। अंतिम गली बहुधा उन वस्तुओं के लिए होती है जिन्हे आप बाज़ार के अंत में खरीदना चाहते हैं। जैसे मछली तथा उसी प्रकार की अन्य वस्तुएं।

शकुंतला की प्रतिमा

बाज़ार चौक में फव्वारे के रूप में शकुंतला की प्रतिमा है। हम सब जानते हैं कि शकुंतला उत्तराखंड के कण्वाश्रम में पली–बढ़ी है। उसका गोवा से क्या संबंध? अपने आसपास पूछताछ करिये। कदाचित आपको इसका उत्तर प्राप्त हो जाएगा।

गोवा के मसाले
गोवा के मसाले

पारंपरिक रूप से गोवा के दूर-सुदूर गांवों से यहाँ बाज़ार में बेचने के लिए अनेक प्रकार की ताजी वस्तुएं लायी जाती थीं। आज भी आप अधिकतर उसी प्रकार की वस्तुएं यहाँ देखेंगे। किन्तु समय के साथ हुए परिवर्तन की भी झलक दिखाई पड़ ही जाती है। खरीददारों के इच्छानुरूप वस्तुएं लाने का प्रयत्न व्यापारी सदैव करते हैं, फिर वह चीनी वस्तु ही क्यों ना हो।

बाज़ार में नानबाई अर्थात डबलरोटी वालों के क्षेत्र में जाना ना भूलें। यहाँ गोवा के कई डबलरोटी वाले अनेक प्रकार की ताजी डबलरोटियों के प्रकार लेकर आते हैं। जैसे पोई, काकना, उने, पाव इत्यादि। दैनिक प्रयोग के लिए कई लोग यहाँ से डबलरोटियाँ ले जाते हैं। आप देख सकते हैं कैसे डबलरोटीवाले के हाथ जल्दी जल्दी इन डबलरोटियों को समाचारपत्र में बांधते हैं। देखते हो देखते उनकी टोकरी रिक्त होने लगती है।

म्हापसा के कुम्हार
म्हापसा के कुम्हार

बाज़ार का मेरा सर्वाधिक प्रिय भाग है गोवा के कुम्हार।

बाज़ार का पिछला भाग केलों एवं टोकरियों को समर्पित है। सींक की टोकरियों को बुनने वाली अधिकतर स्त्रियाँ हैं। वे यहाँ टोकरियाँ, छोटी थैलियाँ तथा हस्त पंखे इत्यादि लाकर बेचती हैं। गोवा में विवाह के अवसर पर दो टोकरियाँ, एक पर्स तथा एक हस्त पंखे का उपहार वधू को दिया जाता है। मेरे गाइड के अनुसार यह कला इसी परंपरा के कारण अब भी जीवित है।

१९६० से पूर्व, यह बाज़ार आज के बाज़ार के समीप स्थित गलियों में भरता था। उस क्षेत्र को अब अँगोद कहा जाता है। यह शब्द कन्नड भाषा के शब्द अंगदी से व्युत्पन्न है जिसका अर्थ बाज़ार है। आप जब यहाँ की दुकानों के फलक देखेंगे तो आपको पते पर यह शब्द अंकित दृष्टिगोचर होगा।

शांतादुर्गा धारगल

म्हापसा की ग्रामदेवी शांतादुर्गा हैं। अब वे धारगल में निवास करती हैं जो चापोरा नदी के उस पार, यहाँ से लगभग १४ की. मी. दूर है। गोवा में पुर्तगालियों के आक्रमण के समय उन्हे यहाँ से धारगल में स्थानांतरित किया गया था। उन्हे अब भी म्हापसा की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है।

शांतादुर्गा मंदिर
शांतादुर्गा मंदिर

म्हापसा के निवासी किसी भी महत्वपूर्ण अथवा नवीन कार्य आरंभ करने से पूर्व देवी का आशीर्वाद लेने वहाँ अवश्य जाते हैं। होली के समान कई उत्सवों का शुभारंभ धारगल के मंदिर में किया जाता है। तत्पश्चात लोग अपने गाँव में उत्सव मनाते हैं।

पुराने बस स्थानक के समक्ष एक गृह के भीतर एक छोटा शांतादुर्गा मंदिर आप देखेंगे। देवी को म्हापसा से धारगल स्थानांतरित करते समय उन्हे अस्थायी समय के लिए यहाँ बिठाया गया था। उनकी स्मृति में यह छोटा मंदिर बनाया गया है। जब मैं यहाँ आई थी तब यह मंदिर बंद था। किन्तु ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे भक्तगण इस मंदिर में दर्शनार्थ आते रहते हैं। कदाचित आपको दर्शन प्राप्त हो जाएँ।

म्हापसा नगरी की बाहरी सीमाओं पर चार दिशाओं में ४ देव हैं जिन्हे राष्ट्रोली कहा जाता है। लोग जब भी नगर से बाहर यात्रा पर जाते थे तब वे संबंधित मंदिर में दर्शन करते थे। जैसे दक्षिण में प्रसिद्ध बोडगेश्वर मंदिर है।

हनुमान मंदिर

आप जब बाज़ार अथवा बस स्थानक की ओर आयेंगे तो आपके समक्ष एक उजला केसरिया रंग का मंदिर दिखेगा जिसे आप चाह कर भी अनदेखा नहीं कर सकते। इस मंदिर के अधिष्ठात्र देव दक्षिणमुखी मारुति हैं। उनका मुख दक्षिण दिशा की ओर है।

दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर - म्हापसा
दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर – म्हापसा

ऐसा कहा जाता है कि लगभग २०० वर्षों पूर्व इस मंदिर के स्थान पर एक दुकान थी। उस दुकान का स्वामी एक हनुमान भक्त था। उसने चंदन की लकड़ी द्वारा निर्मित हनुमान की एक मूर्ति लाकर दुकान के भीतर स्थापित की थी। चूंकि दुकान का मुख दक्षिण की ओर था, हनुमान जी की मूर्ति भी दक्षिणमुखी स्थापित हुई। जब वे हनुमानजी की पूजा अर्चना करते थे तब अन्य भक्तगण भी उनके साथ आराधना में सम्मिलित हो जाते थे। धीरे धीरे भक्तों की संख्या में वृद्धि होने लगी तथा यह दुकान मंदिर में परिवर्तित हो गई।

म्हापसा तथा स्वतंत्रता आंदोलन

गोवा की एक स्वतंत्रता सेनानी सुधाताई जोशी एक आम सभा को संबोधित करने म्हापसा आई थीं। ‘जय हिन्द’ का उद्घोष करने के अपराध में उन्हे बंदी बनाया गया था। उन पर अर्थदंड लगाकर उन्हे कारागृह में कुछ वर्षों के लिए बंद किया गया था। इस विषय में और जानकारी प्राप्त करने के लिए इस फेसबुक पन्ने पर जाइए।

मुकुंद पुण्डलिक कामत-धाकणकर एवं उनके साथियों को बैंक एवं पुलिस स्थानक लूटने का प्रयत्न करने के अपराध में अंगोला निर्वासित किया गया था। इस नगर के एक मार्ग का नामकरण उन्ही के नाम पर किया गया है। वे गोवा के पूर्व मुख्य मंत्री स्व. श्री मनोहर पार्रिकर के सगे-संबंधी भी थे।

मारुति मंदिर के समीप लगे एक सूचना पट्टिका पर बारदेज तालुका के हुतात्मा स्वतंत्रता सेनानियों के नाम अंकित हैं। म्हापसा बारदेज तालुका के अंतर्गत एक नगर है।

चाचा नेहरू बागीचा

म्हापसा की गलियों में पुरानी गाड़ियाँ
म्हापसा की गलियों में पुरानी गाड़ियाँ

मारुति मंदिर के समक्ष एक बच्चों के खेलने के लिए एक बगीचा है। बच्चों के लिए इस बगीचे का मुख्य आकर्षण है धूसर रंग की तथा हाथी के आकार की एक फिसलपट्टी। मुझे बताया गया कि स्थानीय निवासियों को इस हाथी को अखंड रखने के लिए अनेक संघर्ष करने पड़े थे।

पुस्तकालय

मारुति मंदिर से आगे बढ़ने पर आपको एक और मंदिर दिखेगा। उजले पीले रंग का यह मंदिर लक्ष्मी नारायण मंदिर है।

मार्ग में आप एक प्राचीन पुस्तकालय देखेंगे। मुझे यहाँ कई दर्जी तथा आधुनिक वस्त्रों की दुकानें भी दिखीं। दवाई की एक प्रसिद्ध दुकान भी थी। किसी समय प्रसिद्ध वैद्य अपने निवासस्थान पर ही बीमार व्यक्तियों को जाँचते थे। उनमें से कुछ अब भी इस सेवा में सक्रिय हैं।

समीप ही श्वेत भित्तियों से घिरा हुआ एक चौक है जिसके मध्य में अंबेडकर की एक मूर्ति है। यह पुराना बस स्थानक था। यद्यपि बसों ने तो कुछ काल के पश्चात पदार्पण किया था, तथापि नगर से धारगल अथवा शिओली तक यात्रियों को तांगा अथवा बैलगाड़ी द्वारा ही जाना पड़ता था। उससे आगे उन्हे पैदल ही जाना पड़ता था।

इसके समीप अट्टई पुस्तकालय है जिसका नाम फादर अट्टई पर रखा गया था। फादर अट्टई पादरी नहीं थे, अपितु एक समाजसेवी थे।

स्विस चैपल

नगर के मध्य में एक छोटा श्वेत रंग का उजला चैपल है जो ईसाइयों का पूजास्थल है। इसे स्विस चैपल क्यों कहते हैं यह कोई नहीं जानता। दूर की संभावना यह हो सकती है कि इसमें स्विस वास्तुकला की कुछ झलक दिखाई पड़ती है।

स्विस चैपल म्हापसा गोवा
स्विस चैपल म्हापसा गोवा

कुछ आगे जाने पर अलंकार सिनेमगृह है जो अब निष्क्रिय है। इस पर बाहुबली चलचित्र का विज्ञापन अब भी चिपका हुआ है जो इस सिनेमगृह में दिखाई जाने वाली अंतिम फिल्म थी। इसके बाहर छोटी छोटी गुमटियाँ हैं जो संध्या ७ बजे के पश्चात खुलती हैं। और तब यह स्थान अत्यंत क्रियाशील एवं गुंजायमान हो जाता है। यह म्हापसा का रात्रि का स्ट्रीट फूड बाज़ार बन जाता है। यहाँ एक बप्पा गुमटी है जो विशेषतः इसलिए प्रसिद्ध है कि गोवा के पूर्व मुख्य मंत्री स्व. श्री मनोहर पार्रिकर यहाँ कई बार आते थे। उन्होंने अनेक बार यहाँ अपने साथियों के साथ पार्टी बैठकें भी आयोजित की थीं तथा राजनैतिक विचार विमर्ष किया था। यह स्थान मीठे पेय के लिए प्रसिद्ध है।

गोवा के घर
गोवा के घर

आसपास सैर करते हुए कुछ समय बिताईए। लेटराइट पत्थर द्वारा निर्मित कुछ निवास अत्यंत मनमोहक हैं तो कुछ जर्जर स्थिति में भी हैं।

खाने-पीने के कुछ प्रसिद्ध स्थल

बाबाजी कैफै – मारुति मंदिर के एक ओर स्थित है। लिमसी यहाँ का प्रसिद्ध पुदीना डला नींबू शिकंजी है। यह कैफै नगर के युवाओं की मनपसंद बैठक है।

वृंदावन – यह प्रथम अल्पाहारगृह है जहां इडली बनाने का यंत्र लाया गया था। इस तथ्य ने इस अल्पाहारगृह को प्रसिद्धि दिलाई थी। कहा जाता है कि लोग यहाँ विशेष रूप से यह देखने आते थे कि यह यंत्र कैसा दिखता है। इसे देख यह विश्वास होता है कि एक बार पाई प्रसिद्धि आप के साथ सदैव रह सकती है।

ले जार्डिन –  एक समय यह नगर का बड़ा भोजनालय था।

म्हापसा बाज़ार यात्रा सुझाव

पणजी तथा मडगाव से म्हापसा तक सार्वजनिक परिवहन द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है।

खाने-पीने की उत्तम सुविधाएं उपलब्ध हैं। कुछ के नाम उपरोक्त उल्लेख किए गए हैं।

म्हापसा के साथ आप पास के कुछ अन्य गाँव भी घूम सकते हैं, जैसे मोइरा, अलदोना, असागाव तथा अंजुना

ठहरने के लिए भी अनेक उत्तम सुविधाएं उपलब्ध हैं। गोवा पर्यटन विकास निगम द्वारा संचालित म्हापसा रेज़िडन्सी भी उनमें से एक है।

म्हापसा बाज़ार में विशेषतः शुक्रवार के दिन बहुत लोग आते हैं। इसीलिए इस बाज़ार को शुक्रवार बाज़ार अथवा फ्राइडे मार्केट भी कहा जाता है। आजकल यह बाजार सप्ताह के सभी दिन ग्राहकों एवं विक्रेताओं की चहल-पहल से भरा रहता है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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लाड बाजार – हैदराबाद की प्रतिष्ठा,प्रतीक एवं जीविका https://inditales.com/hindi/hyderabad-ka-laad-bazar-chudi-moti-khada-dupatta/ https://inditales.com/hindi/hyderabad-ka-laad-bazar-chudi-moti-khada-dupatta/#comments Wed, 09 Sep 2020 02:30:17 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1627

हैदराबाद में निवास करते समय मैंने यहाँ की धरोहरों के दर्शन हेतु कई पदयात्राएं की थीं। लाड़ बाज़ार उनमें से एक है। जिस किसी ने लाड बाजार के आसपास अथवा इसकी गलियों में भ्रमण किया है, वह इसकी चमक-धमक से अछूता नहीं होगा। यहाँ बिकती रंग-बिरंगी चूड़ियाँ, स्वच्छ श्वेत मोती एवं विभिन्न प्रकार के वस्त्र […]

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हैदराबाद में निवास करते समय मैंने यहाँ की धरोहरों के दर्शन हेतु कई पदयात्राएं की थीं। लाड़ बाज़ार उनमें से एक है। जिस किसी ने लाड बाजार के आसपास अथवा इसकी गलियों में भ्रमण किया है, वह इसकी चमक-धमक से अछूता नहीं होगा। यहाँ बिकती रंग-बिरंगी चूड़ियाँ, स्वच्छ श्वेत मोती एवं विभिन्न प्रकार के वस्त्र व परिधान एक दूसरे के पूरक होकर आपका ध्यान आकर्षित करने में एक दूसरे से स्पर्धा करते भी प्रतीत होते हैं।

हैदराबाद का लाड बाजारयूँ तो मैं वहां हैदराबाद का एक विशेष दुपट्टा, खड़ा दुपट्टा क्या है एवं इसे कैसे धारण किया जाता है, यह जानने के लिए गयी थी। किन्तु बाजार में प्रवेश करते ही आपका ध्यान लाख की चूड़ियों पर ना जाए, यह हो नहीं सकता।

लाड बाजार हैदराबाद के दो प्रसिद्ध स्मारकों, चारमिनार एवं चौमहल्ला महल के मध्य स्थित है। यह बाजार चूड़ियों, आभूषणों एवं वस्त्रों के लिए अत्यंत प्रसिद्ध है। मूसी नदी के तट पर स्थित हैदराबाद के लाड़ बाजार को मैं इस मनोरम नगरी का श्रृंगार रस मानती हूँ।

आईये मैं आपको इस लाड बाजार के मुख्य आकर्षण दिखाती हूँ।

खड़ा दुपट्टा – हैदराबाद की वधु पोशाक

हैदराबाद का खड़ा दुपट्टा
हैदराबाद का खड़ा दुपट्टा

मैंने जैसे ही लाड बाजार की गली में प्रवेश किया, स्वभाववश मैंने कैमरे में दृश्यों को अमर करना आरम्भ कर दिया। कैमरे की आँखों से भी वहां की चमक मुझे चकाचौंध करने लगी थीं। मेरे मन मष्तिष्क में सर्वप्रथम जो विचार कौंधा, वह था, ‘क्या यह हैदराबाद की शान है?’। चारों ओर चटकीले उजले रंगों के लहंगे, दुपट्टे एवं साड़ियाँ लटकी हुई थीं। उनमें खड़े दुपट्टे कुछ अधिक ही चटक एवं चमचमा रहे थे। उन पर पसरी रंगों की छटा एवं चमकीले जड़ाऊ काम ध्यान खींच रहे थे। किन पर दृष्टी टिके, किन पर नहीं, मेरी दृष्टी को ही समझ नहीं आ रहा था। मैंने निश्चय किया कि कुछ दुकानों में जाकर उन्हें खड़ा दुपट्टे दिखाने का आग्रह करूँ।

मेरी चाल-ढाल एवं मेरे परिधान देख दुकानदारों को गंभीर शंका हो रही थी कि मैं वास्तव में खड़ा दुपट्टा खरीदना चाहती हूँ। मैंने सत्यवादी बनाना ही ठीक समझा। मैंने उन्हें बताया कि मैं हैदराबाद की विशेष वस्तुओं की खोज में निकली हूँ तथा खड़ा दुपट्टा उनमें से एक है। उनमें से एक दुकानदार ने मुझे कृतार्थ किया तथा ६ मीटर से भी अधिक लंबा, पीले रंग का खड़ा दुपट्टा ओढ़ने व अपने कन्धों पर उसे संभालने में मेरी सहायता की।

वधु के लिए खड़ा दुपट्टा

12 मीटर की पोषक - खड़ा दुपट्टा
12 मीटर की पोषक – खड़ा दुपट्टा

मुझे बताया गया कि इस ६ मीटर के दुपट्टे के साथ २ मीटर का एक और दुपट्टा वधु को अपने सिर पर संभालना पड़ता है। इसके अतिरिक्त ४ मीटर कपड़ा कुर्ती एवं सलवार बनाने में आवश्यक होता है। इन सब पर भारी कढ़ाई एवं जरदोजी का काम होता है। आप सोच रहे होंगे इतना भार वधू कैसे ढोती होगी? यहाँ एक जानकारी आप को दे दूँ कि खड़ा दुपट्टा बनाने में प्रयोग किये जाने वाले वस्त्र का भार अधिक नहीं होता। अतः वधु के परिधान का भार अधिक नहीं होता।

खड़े दुपट्टों को सजाते कारीगर
खड़े दुपट्टों को सजाते कारीगर

लाड बाजार की गलियों में जाएँ तो आपको वहां कई कारीगर वस्त्रों पर कढ़ाई का कार्य करते दिखाई देंगे। एक खड़ा दुपट्टे पर एक साथ कई कारीगर कार्य करते हैं। कुछ उस पर धागों से कढ़ाई करते हैं तो कुछ उस पर सलमे-सितारे जड़ते हैं। इतने लम्बे दुपट्टे पर कढ़ाई करना आसान कार्य नहीं है।

लाड बाजार में लाख की चूड़ियाँ

मैं जब भी लाड बाजार आती थी, सदैव चूड़ियों की दुकानों के समक्ष मेरे पैर ठहर से जाते थे। मैंने यहाँ से अनेक चूड़ियाँ खरीदी हैं। रंगबिरंगी चूड़ियों से भरी यहाँ कई दुकानें हैं। इनमें सर्वाधिक प्रसिद्ध वे चूड़ियाँ हैं जिन पर पुष्पाकृतियाँ बनी हुई हैं।

हैदराबाद के लाड़ बाज़ार में चमचमाती चूड़ियाँ
हैदराबाद के लाड़ बाज़ार में चमचमाती चूड़ियाँ

इस समय मैं चूड़ियाँ खरीदने नहीं, अपितु उन्हें बनाने वालों से भेंट करने की अभिलाषा लिए इन गलियों में आयी थी।

लाख की चूड़ियों की निर्मिती

धातु चूड़ी पे लाख चढाते कारीगर
धातु चूड़ी पे लाख चढाते कारीगर

टुकड़ों टुकड़ों में ही सही, अंततः मुझे लाख की चूड़ियों की निर्मिती की सम्पूर्ण प्रक्रिया को देखने एवं समझने का अवसर लाड़ बाजार की इन गलियों में प्राप्त हुआ।

धीमी आग पर सिकती चूड़ियाँ
धीमी आग पर सिकती चूड़ियाँ

• लाख की चूड़ियाँ बनाने के लिए सर्वप्रथम धातु की पतली चूड़ियाँ ली जाती हैं।
• इन्हें हाथों द्वारा पूर्ण गोलाकार दिया जाता है।
• लाख को अंगारों पर गर्म किया जाता है तथा इच्छित रंग उसमें मिलाया जाता है। इस लाख की पट्टियों को इच्छित आकृति एवं आकार दिया जाता है।
• तत्पश्चात इस लाख को धातु की चूड़ी पर चढ़ाया जाता है। हाथों द्वारा एक एक चूड़ी के आकार में सुधार किया जाता है ताकि इन्हें सही वृत्ताकार प्राप्त हो सके।
• तत्पश्चात इन मौलिक चूड़ियों को अन्य कारीगरों के पास भेजा जाता है जो इन पर सलमे-सितारे एवं नग जड़ते हैं।

हैदराबाद एवं राजस्थान की लाख की चूड़ियों में भिन्नता

हाथों से गढती एक एक चूड़ी
हाथों से गढती एक एक चूड़ी

एक कारीगर ने मुझे राजस्थान एवं हैदराबाद की लाख की चूड़ियों में भिन्नता समझाई। उसने अत्यंत गर्व से मुझे बताया कि हैदराबाद के कारीगरों में पायी जानी वाली कला अन्यत्र कहीं भी नहीं है। हैदराबाद की लाख की चूड़ियों को पहचानने का आसान माध्यम है उसकी चमक। जितनी अधिक चमक, उतनी ही अधिक संभावना है कि वह हैदराबाद की गलियों में बनी है। चमचमाती चूड़ियाँ हैदराबाद की विशेषताओं में से एक है।

राजस्थानी शैली में बनी लाख की चूड़ियों में एक चूड़ी पर सम्पूर्ण आकृति रंगी होती है जबकि हैदराबादी शैली की चूड़ियों में चूड़ियों का एक सम्पूर्ण समूह मिलकर एक आकृति चित्रित करता है।

और पढ़ें – बिदरी धातु-शिल्पकला सृजन का प्रत्यक्ष दर्शन

लाख की चूड़ियों की अर्थव्यवस्था

मैंने यहाँ गलियों में कई कार्यशालाएं देखीं जहां स्त्री एवं पुरुष एक छोटी अंगीठी के चारों ओर बैठकर लाख की चूड़ियाँ बनाते हैं। तत्पश्चात ये रंगबिरंगी मनमोहक चूड़ियाँ मुख्य बाजार पहुंचकर ग्राहकों को आकर्षित करती हैं। मुझे सहसा आभास हुआ कि ये चूड़ियों कितने ही घरों में उजाला करती हैं तथा कितने ही लोगों का उदर भरण करती हैं।

लाड बाज़ार में लाख की चूड़ियाँ
लाड बाज़ार में लाख की चूड़ियाँ

मुझे व्यक्तिगत रूप से कभी गहनों एवं साजसज्जा का मोह नहीं रहा। मेरे लिए ये आभूषण, चूड़ियाँ इत्यादि ऐसी वस्तुएं हैं जिनके बिना भी आसानी से जिया जा सकता है। मैंने इन्हें सदैव दूसरों पर ही सराहा है। किन्तु हैदराबाद के लाड बाजार की इन गलियों में घूमते हुए मुझे आभास हुआ कि एक एक चूड़ी बनाने में कितना परिश्रम एवं समय लगता है। किसी की कलाइयों में सजने से पूर्व ये चूड़ियाँ कितने ही कारीगरों के हाथों से होकर जाती हैं। कितने परिवार इस उद्योग पर निर्भर हैं।

लाख की चूड़ियाँ ऑनलाइन खरीदें

अचानक मेरी भी इच्छा हुई कि मैं कुछ चूड़ियाँ अपने लिए भी ले लूं। नग जड़ी कुछ चूड़ियाँ मैंने भी खरीदी। लाड बाजार की गलियों में घूमने के पश्चात इन चूड़ियों एवं इन्हें बनाने वाले कारीगरों के प्रति मेरे दृष्टिकोण में अब परिवर्तन आने लगा है। मेरे लिए अब ये मात्र आभूषण नहीं, अपितु इस उद्योग में रत कई परिवारों की जीविका है।

लाड बाजार के मोती

हैदराबाद के मोती हार
हैदराबाद के मोती हार

हैदराबाद को भारत की मोतियों की नगरी कहा जाता है। हैदराबाद किसी भी ऐसी नदी अथवा समुद्र के समीप स्थित नहीं है जहां मोतियों का उत्पादन होता हो। फिर भी यह मोतियों का सर्वाधिक विशाल संसाधन एवं व्यापारिक केंद्र है। आप जैसे ही इस बाजार के समीप पहुंचेंगे, आपको मोतियों की दूकान ढूंढनी नहीं पड़ेगी। जहां आपकी दृष्टी जायेगी, वहां मोतियों की दुकानें होंगी। दुकानों के विक्रेता आपको प्रेम से भीतर बुलाते हैं तथा मोतियों के आभूषणों को देखने का आमंत्रण देते हैं। आप चाहकर भी उन्हें अनदेखा नहीं कर सकते।

श्वेत एवं धूमिल श्वेत रंग की मोतियों की लड़ियाँ चारों ओर लटकी हुई दृष्टिगोचर होंगी। मोतियों से बने गले के हार, कान के झुनके, चूड़ियाँ तथा अन्य आभूषण छलने लगते हैं। सबकी रूचि के अनुसार आभूषणों का अम्बार है। यहाँ मुझे भी मेरी रूचि के अनुसार मोती मिले। मैंने धूसर जैसे असाधारण रंगों के एवं असामान्य आकार के कई बड़े मोती खरीदे।

मोती उद्योग

मोतियों की छान बीन
मोतियों की छान बीन

यहाँ भी मुझे मोती संसाधन एवं उनसे आभूषण बनाने की कला को देखने की अभिलाषा थी। अतः मैं दुकान के पिछवाड़े स्थित मोती संसाधन इकाई में गयी। मोतियों को सर्वप्रथम इनके आकार के अनुसार छांटा जाता है। बड़ी बड़ी छलनियों द्वारा एक आकार की मोतियों के प्रथक ढेर बनाए जाते हैं। तत्पश्चात हाथों से उसकी माप एवं आकार के अनुसार छंटनी की जाती है।

हैदराबाद के मोती
हैदराबाद के मोती

तत्पश्चात छंटी हुई मोतियों में एक एक कर छोटी मशीन द्वारा छिद्र बनाए जाते हैं। इसके पश्चात उन्हें धागे में पिरोया जाता है। कुछ लड़ियाँ ऐसे ही बेची जाती हैं तथा कुछ को आभूषण निर्मिती इकाई में आकर्षण आभूषण बनाने के लिए भेज दिया जाता है। हम सबने इन इकाईयों को अवश्य देखना चाहिए। अंततः हमें भी जानना चाहिए कि जो आभूषण हम रूचि से धारण करते हैं, उन्हें बनाते कैसे हैं।

मोती के गहने
मोती के गहने

मेरी हार्दिक अनुशंसा है कि हैदराबाद के इस बाजार में आप अवश्य जाएँ एवं उसकी गलियों में विचरण करें। यह खरीददारों का स्वर्ग है।

और पढ़ें – पुरानी दिल्ली की गलियों के 10 प्रसिद्ध बाजार

सरोजिनी नायडू की कविता ‘हैदराबाद के बाजारों में’

१०० से अधिक वर्षों पूर्व, प्रसिद्ध कवियित्री, लेखिका, स्वतंत्रता सेनानी एवं हैदराबाद की निवासी सरोजिनी नायडू ने हैदराबाद के बाजारों पर एक स्तुतिपूर्ण कविता रची थी। यह स्वदेशी अभियान का एक भाग भी था जहां देश के तात्कालिक नेताओं ने देश में बनी स्वदेशी वस्तुओं के उपभोग को बढ़ावा दिया था तथा विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने का अव्वाहन किया था। सरोजिनी नायडू ने हैदराबाद के इस जीवंत बाजार को किस प्रकार अपनी कविता द्वारा सजीव किया, यह आप इस कविता में देख सकते हैं। उस समय से अब तक इस बाजार में अधिक परिवर्तन नहीं हुआ है।

In The Bazaars of Hyderabad
What do you sell, O merchants?
Richly your wares are displayed
Turbans of crimson and silver
Tunics of purple brocade
Mirrors with panels of amber
Daggers with handles of jade
What do you weigh, O ye vendors?
Saffron, lentil, and rice
What do you grind, O ye maidens?
Sandalwood, henna, and spice
What do you call, O ye pedlars?
Chessmen and ivory dice
What do you make, O ye goldsmiths?
Wristlet and anklet and ring
Bells for the feet of blue pigeons
Frail as a dragonfly’s wing
Girdles of gold for the dancers
Scabbards of gold for the kings
What do you cry, O fruitmen?
Citron, pomegranate and plum
What do you play, O ye musicians?
Sitar, Sarangi, and drum
What do you chant, O magicians?
Spells for the aeons to come
What do you weave, O ye flower-girls?
With tassels of azure and red?
Crowns for the brow of a bridegroom
Chaplets to garland his bed
Sheets of white blossoms new-garnered
To perfume the sleep of the dead.

और पढ़ें – हैदराबाद के अद्भुत संग्रहालय 

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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पुरानी दिल्ली की गलियों के 10 प्रसिद्ध बाजार https://inditales.com/hindi/10-old-delhi-bazaars-shopping/ https://inditales.com/hindi/10-old-delhi-bazaars-shopping/#comments Wed, 10 May 2017 02:30:47 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=239

पुरानी दिल्ली के सबसे अच्छे बाजार जो अपनी इन खासियतों के लिए जाने जाते हैं जैसे - खारी बावली मसलों के लिए प्रसिद्ध है, नई सड़क किताबों की नगरी है, बल्लीमारान जूतों के लिए मशहूर है, चावडी बाजार निमंत्रण पत्रों और पीतल की वस्तुओं के लिए विख्यात है, मीना बाजार अपने गौरवशाली अतीत के लिए नामवर है, दरीबा कलां और सीताराम बाजार गहनों के लिए प्रचलित है, भागीरथ महल घरेलू सजावटी वस्तुओं के लिए प्रख्यात है, तो किनारी बाजार कपड़ों के लिए नामी जगह है।

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पुरानी दिल्ली बाज़ारपुरानी दिल्ली के बाजारों के बारे में बात करें तो शायद खरीदारी से हमारा मन कभी नहीं भरेगा। यहां के कुछ जाने-माने बाजारों के बारे में तो आपको पता ही होगा। जैसे कि चाँदनी चौक के बारे में तो आपने सुना ही होगा। यहां पर बहुत अच्छा और स्वादिष्ट खाना मिलता है। भोजन प्रेमियों के बीच यह जगह बहुत प्रचलित है। लेकिन चाँदनी चौक का यह क्षेत्र अब बहुत बड़े बाजार में तब्दील हो गया है। आज दिल्ली का यह सबसे चर्चित स्थान खरीदारी के लिए स्वर्ग माना जाता है। तथा भारत के व्यापक हिस्से के लिए यह व्यापार के प्रमुख केंद्र का कार्य भी करता है।

वैसे देखा जाए तो अपने पसंदीदा बाजार तक पहुँचने के लिए पुरानी दिल्ली की इन भीड़ भरी पतली सी गलियों से गुजरते हुए जाना बहुत कठिन है। तो चलिये चाँदनी चौक के कुछ नामी बाजारों में घूम कर आएं, जो दिल्ली के सबसे अच्छे बाजारों में गिने जाते हैं।

खारी बावली – मसालों का सबसे बड़ा बाजार

खारी बावली - पुरानी दिल्ली
खारी बावली – पुरानी दिल्ली

खारी बावली पुरानी दिल्ली का सबसे सुरभित बाजार है, जो हमेशा विविध प्रकार के मसालों की सुगंध से महकता रहता है। यह शायद, दुनिया में मसालों का सबसे बड़ा बाजार है। लेकिन यात्रा और पाक काला के पेशेवरों द्वारा मसालों से भरे-पूरे इस बाजार के साथ पूरा न्याय नहीं हो पाया है। अगर आप इस बाजार में घूमेंगे तो आपको यहां की दुकानों में व्यवस्थित रूप से रखे हुए मसालों के ढेर दिखेंगे। तो दुकानों के बाहर बोरियों में रखी हुई मसालों की सामग्री की वस्तुएं, जैसे लाल मिर्च नज़र आएगी। इन में से जो मसाले थोडे महंगे होते हैं, जैसे केसर, उन्हें छोटे-छोटे बक्सों में रखा जाता है, जिनपर उनकी कीमत लिखी गयी होती है।

यहीं पे पास में ही गड़ोडिया हवेली है, आप चाहें तो वहां जा सकते हैं। इस हवेली की छत से शाहजहांबाद में फैली विरासत देखी जा सकती है। यहां से आप नीचे स्थित खारी बावली का उपर से दिखनेवाला सुंदर सा नज़ारा भी देख सकते हैं। जहां पर मसालों की विविध सामग्री, जैसे हल्दी के टुकडे, लाल मिर्च तथा सामग्री की अन्य वस्तुओं को सुखाते हुए देखा जा सकता है।

खारी बावली फतेहपुरी मस्जिद के ठीक पीछे बसा हुआ है, जिसे ढूंढने में आपको ज्यादा कठिनाई नहीं होती। अगर आपको लगे कि आप रास्ता भटक गए हैं, तो बेझिजक किसी से भी पूछ लीजिये या फिर मसालों की सुगंध की ओर चलते जाइए।

दरीबा कलां – चाँदी की गली

दरीबां कलां - चांदी के गहने
दरीबां कलां – चांदी के गहने

यह महिलाओं की पसंदीदा गली है, खासकर उन महिलाओं की जिन्हें चाँदी के गहने बहुत पसंद है। यहां के छोटे-बड़े सारे दुकान चाँदी की वस्तुओं से भरे हुए हैं, जिनमें से अधिकतर गहने बेचते हुए दिखाई देते हैं। लेकिन इन में कुछ दुकानें ऐसी भी हैं, जो चाँदी के बर्तन और चाँदी की बनी देवी-देवताओं की मूर्तियाँ भी बेचते हैं। ये दुकानें छोटी जरूर लगती हैं पर अगर आप उन्हें कुछ भी दिखाने को कहे तो वह चीज उनके पास जरूर मिलती है। चाँदी के अलावा आपको यहां पर रत्न और जवाहर बेचती हुई दुकानें भी नज़र आएंगी। जिनमें इन कीमती पत्थरों से बनाई गयी मालाएँ बेची जाती हैं, जैसे लापिस लाजुली, कोरल्स, बाघ की आँख और रोज क्वोर्ट्ज। आप इनमें से छोटी बड़ी कोई भी माला ले सकते हैं। बड़े-बड़े चमकीले दुकानों की तुलना में यहां पर इन गहनों की कीमत बहुत कम होती है। यहां पर मोती भी बेचे जाते हैं, लेकिन मेरे खयाल से मोतियों की खरीदारी के लिए हैदराबाद सबसे अच्छी जगह है। इसलिए अगर आपको मोती पसंद है तो मैं आपको हैदराबाद से ही मोती खरीदने की सलाह दूँगी। लेकिन अगर आप चाहें तो यहां से भी अपने पसंदीदा मोतियों की खरीद कर सकते हैं।

दरीबा कलां में आपको हाथों से बनाए गए इत्तरों की दुकानें भी मिलेंगी, जैसे ‘गुलाब सिंह जोहरी माल दुकान’। दरीबा कलां की गली लाल किले से ज्यादा दूर नहीं है। यहां से आप गौरी शंकर मंदिर और सीसगंज गुरुद्वारे के बीच में स्थित एक छोटी सी गली से गुजरकर लाल किले तक पहुँच सकते हैं। अगर आप जामा मस्जिद की ओर से आ रहे हैं, तो यही वह रास्ता है जो जामा मस्जिद के पृष्ठ भाग को चाँदनी चौक से जोड़ता है।

मीना बाजार – जिसके बारे में आपने सुना तो होगा, पर कभी देखा नहीं होगा

पुरानी दिल्ली का मीना बाज़ार
पुरानी दिल्ली का मीना बाज़ार

मीना बाजार मुगल काल का सबसे प्रसिद्ध बाजार है। आज यह नाम कपड़ों के प्रसिद्ध ब्रांड द्वारा अपनाया गया है जो दिल्ली की बड़ी-बड़ी दुकानों में नज़र आता है। इसी नाम से प्रेरित होकर ‘दिल्ली शहर का सारा मीना बाजार लेकर…’ जैसे गाने भी बनवाए गए थे। मुझे लगता है कि शायद यह नाम मीनाकारी काम, जो लाख के कंगनों पर किया जाता था, से लिया गया होगा। इस प्रकार की कारीगरी आप आज भी हैदराबाद और राजस्थान के कुछ हिस्सों में देख सकते हैं। मुझे याद है कि जब हम लाल किले में प्रकाश और ध्वनि का कार्यक्रम देखने गए थे, तो वहां पर इस कार्यक्रम के द्वारा मीना बाजार की ध्वनियों को पुनः निर्मित करने का प्रयास किया गया था, जहां महिलाओं की हंसी के बीच झनझनाती घंटियों और खनकते हुए कंगनों की आवाजें गूँजती हुई सुनाई देती थी।

मीना बाजार के इस गौरवशाली अतीत का एक छोटा सा अंश आज जामा मस्जिद के पीछे देखा जा सकता है। आज भी आप यहां पर रंगीन साड़ियाँ और कपड़े खरीद सकते हैं। समाज का एक छोटा सा भाग आज भी यहां पर अपनी खरीदारी करने आता है। मेरे जैसे यात्रियों के लिए तो यह एक प्रसिद्ध बाजार है, जिसने कभी इससे भी अच्छे दिन जरूर देखे होंगे। मीना बाजार जामा मस्जिद और लाल किले के ठीक बीचो-बीच ही बसा हुआ है।

नई सड़क – किताबों की दुनिया

नयी सड़क - किताबों की दुकानें
नयी सड़क – किताबों की दुकानें

नई सड़क का नयापन सिर्फ उसके नाम तक ही सीमित है। यहां पर आस-पास आपको कुछ भी नया नहीं दिखाई देता। एक जमाने में यह सड़क नर्तकियों के लिए मशहूर हुआ करती थी। अगर आप अपने आस-पास देखे तो, यहां के छज्जे आपको अपने अतीत की दास्तां बयां करते हुए नज़र आएंगे। लेकिन आज इस जगह पर थोक में किताबों की बिक्री होती है। यहां के दुकानदार फुटकर ग्राहकों में ज्यादा रुचि नहीं लेते क्योंकि वे थोक व्यापारियों की ताक में होते हैं। फुटकर ग्राहक उनके व्यस्त से जीवन में किसी बाधा के समान होते हैं। मुझे याद है, जब मैं वहां पहली बार गयी थी तो मुझे किस प्रकार से उनसे निपटना पड़ा था।

नई सड़क ऐसी जगह है, जहां पर विविध विषयों की किताबें उपलब्ध होती हैं। एक पुस्तक प्रेमी होने के नाते इतनी सारी किताबों के पास से गुजरते हुए जाना एक अलग ही अनुभव है। अगर आपको कुछ गिनी-चुनी किताबें, खासकर हिन्दी की किताबें चाहिए हो तो उसके लिए इससे अच्छी जगह आपको नहीं मिलेगी। यहां पर आप स्वयं ही अपनी मनपसंद किताब ढूंढ सकते हैं, जिसके लिए आपको पता होना जरूरी है कि आप क्या चाहते हैं। आज मेरा व्यक्तिगत पुस्तकालय नई सड़क की विलक्षण दुकानों से खरीदी गयी काफी सारी किताबों से सुसज्जित है।

मुझे याद है, एक बार मैं किताबों की किसी दुकान में गयी थी जहां पर आयुर्वेद तथा अन्य औषधि विज्ञानों से संबंधित किताबें बेची जाती थी। सिर्फ एक ही विषय पर इतना सारा साहित्य पाकर मैं हैरान रह गयी थी।

नई सड़क की गली चाँदनी चौक के नगर सभागृह के ठीक सामने ही है। या फिर आप चावडी बाजार तक दिल्ली की मेट्रो ले सकते हैं और वहां से नई सड़क तक पैदल ही जा सकते हैं।

भागीरथ महल – आपके घर का विभूषक

भागीरथ महल के झाड़ फानूस
भागीरथ महल के झाड़ फानूस

जो जगह कभी बेगम समरू का महल हुआ करती थी, आज उसे दो भागों में विभाजित कर, एक को बैंक और दूसरे भाग को दीयों के बाज़ार में तब्दील किया गया है। यह वही जगह है जहां बहादुर शाह जफर को 1857 की क्रांति के बाद बंदी बनाकर रखा गया था। लेकिन आज इस स्थान का बदला हुआ रूप देखकर इसके अतीत की कल्पना करना थोड़ा कठिन है। अब यह महल विरासत भवन बन गया है, जिसमें आपको अनेक प्रकार की दुकानें मिलेंगी और दिन भर ग्राहकों की चहल-पहल भी दिखेगी। इस जगह को अपना नाम सेठ भागीरथ माल से प्राप्त हुआ है, जो इस महल के खरीदार और मालिक थे।

अगर आप अपने घर के नवीकरण के बारे में सोच रहे हैं तो आपको यहां पर जरूर जाना चाहिए। मुझे वहां के लोगों द्वारा बताया गया कि दिवाली के समय यहां पर बहुत भीड़ रहती है। यह सुनकर मैं सोच में पड़ गयी कि इतनी भीड़ भरी जगह पर लोग कैसे खड़े रहते होंगे और अपनी खरीदारी कैसे करते होंगे।

भागीरथ महल चाँदनी चौक के मेट्रो स्टेशन से ज्यादा दूर नहीं है।

सीताराम बाजार – सजीले गहने

हड्डियों से बने गहने - सीताराम बाज़ार
हड्डियों से बने गहने – सीताराम बाज़ार

यह बाजार तुर्कमान दरवाज़े, जो शाहजहांबाद में सुरक्षित बचे कुछ ही प्रवेश द्वारों में से एक है, के पास ही स्थित है। अगर आपको कृत्रिम और सजीले गहने पसंद हो तो यह स्थान आपके लिए एकदम सही है। ये गहने विविध रंगों और आकारों के तराशे हुए मनकों से बनवाए गए हैं। इनमें से कुछ गहने जानवरों की हड्डियों से भी बनवाए गए हैं।

यहां पर मिलनेवाले गहने आप दिल्ली के हाट बाजारों तथा देश में फैले गहनों के अनेक दुकानों में भी देख सकते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां पर आपको इन गहनों के ढेर दिखाई देते हैं जो अस्थ-व्यस्त से जमीन पर पड़े होते हैं या फिर उनका समूह बनाकर उन्हें किसी रस्सी या लटकन से लटकाया जाता है। जबकि बड़ी-बड़ी दुकानों में इन्हें व्यवस्थित रूप से प्रदर्शित किया जाता है। यहां की अव्यवस्था में आपको अपने पसंदीदा गहने ढूंढने के लिए इन सारी वस्तुओं को ध्यान से देखना पड़ता। इनका मूल्य ज़्यादातर निर्धारित ही होती है। लेकिन देखा जाए तो शहर के अन्य दुकानों की तुलना में यहां के दुकानों में ये गहने इतने सस्ते में मिलते हैं कि, आपको मोल-भाव करने की जरूरत ही महसूस नहीं होती।

किनारी बाजार – पुरानी दिल्ली का सबसे रंगीन बाजार

किनारी बाज़ार - पुरानी दिल्ली
किनारी बाज़ार – पुरानी दिल्ली

यह दिल्ली की सबसे रंगीन, चमकीली और जगमगाने वाली गली है। मेरे हिसाब से यह दिल्ली की सबसे प्रज्वलित गली है। यह गली चाँदनी चौक के समानांतर ही है, जिसके एक छोर पर आपको परांठेवाली गली मिलती है। किनारी बाजार वह जगह है जहां पर आपको अपने कपड़ों और घर को सजाने की सारी आवश्यक वस्तुएं उपलब्ध होती हैं। दर्जी, पोशाक डिज़ाइनर, फ़ैशन डिज़ाइनर, जैसे लोगों के लिए यह जगह किसी स्वर्ग से कम नहीं है। आते-जाते हुए यात्रियों के लिए तो यह सिर्फ विविध प्रकार के रंगीन फीतों का ढेर है, जो वे अपनी साड़ियों और दुपट्टे को और भी आकर्षक बनाने हेतु उपयोग कर सकते हैं। अगर महिलाओं को यहां पर अकेले ही छोड़ दिया जाए तो वे यहां के माहौल में इतनी लीन हो जाएंगी कि शायद यहां से बाहर निकलना ही भूल जाएं।

मैं किनारी बाजार में वहां की रंगीनता का आनंद लेने और वहां पर मिलने वाली खुरचन मिठाई खाने जाती हूँ।

चोर बाजार – जहां विक्रेता चोर होते हैं और आप ग्राहक

चोर बाज़ार - पुरानी दिल्ली
चोर बाज़ार – पुरानी दिल्ली

हर बड़े शहर में चोर बाजार या फिर उनका कोई और दूसरा रूप जरूर होता है, जहां पर चोर अपनी लूट का सामान बेचते हैं। पुरानी दिल्ली का यह चोर बाजार जामा मस्जिद के पीछे ही स्थित है। अगर आप इस बाजार में जाए तो आपको अपने आस-पास सिर्फ ऑटो पार्ट्स ही नज़र आएंगे। पुरानी दिल्ली के लोगों का कहना है कि अगर आपकी गाड़ी का कोई भी पार्ट चोरी हो जाए तो आप अगले ही दिन चोर बाजार जाकर उसे खरीदकर वापस ला सकते हैं। बेशक, अगर आपकी किस्मत इसमें आपका थोड़ा सा भी साथ दे तो आपको अपनी वस्तु जरूर मिलेगी।

इन्हीं सारी बातों को ध्यान में रखकर जब आप पुरानी दिल्ली के चोर बाजार में जाते हैं, तो आप अनायास ही वहां की सारी वस्तुओं का निरीक्षण करने लगते हैं, जैसे कि यहां पर पड़ा कोई पार्ट आपकी गाड़ी का भी हो।

यह एक अजीब सा बाजार है, जहां पर गाड़ी प्रेमी मुश्किल से मिलने वाले स्पैर पार्ट्स ढूंढने आते हैं। कभी-कभी जब मैं इस बाजार से गुजरती हूँ तो मैं ऐसे ही वहां के एकाध लड़के से बातचीत करने के लिए ठहरती हूँ ताकि उनके व्यापार की कुछ जानकारी प्राप्त कर सकू। और हर बार उनके पास बताने के लिए कोई न कोई कहानी जरूर होती है। ये कहानियाँ सच्ची हैं या काल्पनिक यह तो वे ही जानते हैं।

चावडी बाजार – निमंत्रण पत्रों की कलाकारी

चावडी बाज़ार - पुरानी दिल्ली
चावडी बाज़ार – पुरानी दिल्ली

यह बाजार शादियों के निमंत्रण पत्र बनावने के लिए बहुत प्रसिद्ध है। यह पूरी गली ही शादी के कार्ड बेचनेवालों की दुकानों से भरी है। यहां पर भी थोक में खरीदारी करनेवाले ग्राहक ही आते हैं। शादियों के समय के ठीक पहले यहां की दुकानों में बैठकर अनेकों परिवार निमंत्रण पत्रों के रंग और प्रकार पर बहस करते हुए नज़र आते हैं। जब भी मैं चावडी बाजार से गुजरती हूँ, एक ही खयाल हमेशा मेरे दिमाग में आता है, कि ऐसे में ये लोग न जाने शादी के कितने सारे निमंत्रण पत्र बेचते होंगे, कि उन्हें अपने लिए पूरे बाजार की ही जरूरत हो।

इससे पहले कि आप सोचे कि मैं शादियों के निमंत्रण पत्रों के बाजार में क्या कर रही हूँ, तो मैं आपको बता दूँ कि यहां पर शादियों के पत्रकों के अतिरिक्त और भी कुछ है जो शायद आपकी जरूरत का हो सकता है। यहां स्टेशनरी की सबसे अच्छी वस्तुएं किफायती मूल्य में उपलब्ध होती हैं। मैं 2011 में दिल्ली से स्थानांतरित हुई थी, लेकिन आज भी मेरे कार्य तालिका पर चावडी बाजार की बहुत सी वस्तुएं हैं।

आप चावडी बाजार की प्राचीन वस्तुओं की दुकानों में भी जा सकते हैं, जहां पर पीतल की बनी पुरानी वस्तुएं बेची जाती हैं।

आप चावडी बाजार के मेट्रो स्टेशन से आसानी से यहां पहुँच सकते हैं।

बल्लीमारान – चमड़े के सामान के लिए मशहूर

चमड़े की दुकानें
चमड़े की दुकानें

बल्लीमारान, कासिम जान की गली में स्थित वह जगह है जहां मिर्ज़ा ग़ालिब रहा करते थे। यहीं पर उन्होंने अपने लिए किराए पे एक हवेली ली थी, जहां पर उन्होंने अपने जीवन के अंतिम दिन गुजारे थे। यह हवेली अब एक संग्रहालय बन गयी है। यह विडंबना की ही बात है, कि जिस हवेली में वे रहा करते थे, उस के बाहर आज जूतों का या चमड़े का बाजार लगता है। यहां पर सड़क के दोनों तरफ जूते बेचनेवाले नज़र आते हैं। इसके अलावा यहां पर ऐनक भी बेचे जाते हैं।

बल्लीमारान फतेहपुरी मस्जिद के पास ही स्थित है।

चाँदनी चौक में इनके अलावा और भी छोटे-बड़े बाजार हैं। मैं कपड़ों के बाजार में नहीं गयी हूँ क्योंकि, वहां पर फुटकर ग्राहकों को ज्यादा भाव नहीं दिया जाता है।

तो अब आप पुरानी दिल्ली के किस बाजार में जाने की सोच रहें हैं?

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