भारत के राष्ट्रीय उद्यान Archives - Inditales श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Wed, 25 Dec 2024 05:57:28 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.7.5 नामेरी राष्ट्रीय उद्यान और बाघ अभयारण्य, असम – भारत के राष्ट्रीय उद्यान https://inditales.com/hindi/nameri-rashtriya-udyan-assam/ https://inditales.com/hindi/nameri-rashtriya-udyan-assam/#respond Wed, 25 Dec 2024 02:30:58 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=650

अरुणाचल प्रदेश जाते समय हमने नामेरी राष्ट्रीय उद्यान की पहली झलक देखी थी, लेकिन उस समय हम उसके दर्शन नहीं कर पाए थे। बाद में अरुणाचल से वापस आते समय जब हम रास्ते में स्थित पर्यावरण शिविर में रुके थे, तब कई बार हमे इस उद्यान की अनेक झलकियाँ देखने को मिली। नामेरी राष्ट्रीय उद्यान   […]

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अरुणाचल प्रदेश जाते समय हमने नामेरी राष्ट्रीय उद्यान की पहली झलक देखी थी, लेकिन उस समय हम उसके दर्शन नहीं कर पाए थे। बाद में अरुणाचल से वापस आते समय जब हम रास्ते में स्थित पर्यावरण शिविर में रुके थे, तब कई बार हमे इस उद्यान की अनेक झलकियाँ देखने को मिली।

नामेरी राष्ट्रीय उद्यान  

अरुणाचल जाते वक्त हमे रास्ते में एक खोदे हुए मार्ग से गुजरना पड़ा था, जिस पर से जाते समय मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे हम किसी रोलर कोस्टर की सवारी पर बैठे हो। अरुणाचल से जुड़ा यह मेरा पहला यादगार पल था। इसी बीच अचानक से एक हाथी ने आकर हमारा रास्ता रोक दिया और अपनी सूंढ से गाड़ी-चालक की खिड़की खटखटाने लगा। मैं उत्सुकतापूर्वक यह सब देखती रही।

नामेरी राष्ट्रीय उद्यान में जिया भोरोली नदी
नामेरी राष्ट्रीय उद्यान में जिया भोरोली नदी

हमारे चालक ने अपनी खिड़की का काँच नीचे किया और उस हाथी को 10 रूपय का नोट दे दिया और पैसे लेकर वह हाथी दूसरी गाड़ी की ओर बढ़ गया। उसके जाने के बाद हमारे चालक ने हमे बताया कि जब तक आप इन हाथियों को पैसे नहीं देते तब तक वे आपको आगे बढ़ने नहीं देते। वैसे कहा जाए तो यह एक प्रकार का हाथी कर ही है। जाहीर है कि उनके मालिकों ने उन्हें इस कार्य के लिए प्रशिक्षित किया होगा।

जो भी यहाँ पर पहली बार आता है, उसके लिए यह सबकुछ बहुत ही मनोरंजक होता है। क्योंकि अचानक से किसी हाथी का इस प्रकार से गाड़ी के पास आकर शहरों की सड़कों पर मिलनेवाले भिखारियों की तरह या फिर शायद पुलिस वालों की तरह व्यवहार करना कुछ अजीब सा है।

नामेरी पर्यावरण शिविर   

वापस आते समय जब तक हम भालुकपोंग पार कर चुके थे हम सब एक लंबी यात्रा के कारण काफी थक चुके थे और रात भी अपनी काली चादर ओढ़ते हुए दस्तक देने लगी थी। ऐसे में यहाँ की सुनसान सड़कों पर सफर करना थोड़ा खतरनाक हो सकता था। थोड़ा आगे जाने के बाद हमे रास्ते में नामेरी पर्यावरण शिविर का एक तख़्ता दिखा और हमने वहाँ पर जाने का निश्चय कर लिया। शुक्र है कि यह पर्यटन का मौसम नहीं था, जिसकी वजह से हमे यहाँ पर रहने की जगह मिल गयी और हम सब रात को यहीं पर रुक गए।

पर्यावरण शिविर एक ऐसी जगह है जहां पर कोई भी निसर्ग प्रेमी जरूर रहना पसंद करेगा। लेकिन एक बात है कि यहाँ पर भिनभिनानेवाले मच्छरों से आपको अपनी रक्षा स्वयं ही करनी पड़ती है। यहाँ पर बहुत ही सुंदर झोपड़ियाँ और तम्बू हैं और उन्हीं से जुड़कर उनके स्नानकक्ष बनवाए गए हैं। इनके पास ही एक खुला मैदान है जहाँ पर लकड़ी के लट्ठों से बनी बैठकें और रंगबिरंगी झूले हैं। यहाँ पर एक भोजनालय भी है जहाँ पर साधारण लेकिन पौष्टिक भोजन परोसा जाता है। इस भोजनालय में यहाँ-वहाँ उद्यान से जुड़ी जानकारी प्रदर्शित की गयी है। यह संपत्ति किसी पुरानी मछली पकड़ने वाली समिति की है जो आज भी यहाँ से संचालित होती है।

जंगलों की सैर

दूसरे दिन सुबह-सुबह हम सब चलते हुए जिया–भोरोली नदी (और उसकी उप-नदियां यानी डीजी, दिनाई, डोईगुरुंग, नामेरी, डिकोराइ, खारी आदि) के किनारे चले गए जो नामेरी राष्ट्रीय उद्यान से आड़े-तिरछे तरीके से होते हुए गुजरती है। यहाँ पर एक कीचड़वाला मार्ग है, जिसमें बने हुए पैरों के निशान ये साफ बता रहे थे कि अभी कुछ घंटों पहले ही यहाँ से एक हाथी गुजरा था।

हमे इसी मार्ग के आधार पर आगे बढ़ने के लिए कहा गया था और जंगल में जाने से मना किया गया था। हमने हमारे गाइड की इस सलाह का पूरी तरह से पालन किया। इतनी सुबह-सुबह नदी का यह पूरा नज़ारा सचमुच बहुत ही सुखदायक था। कलकल बहता हुआ नदी का साफ नीला पानी, किनारे पर पड़े हुए पत्थर, नदी पार करती हुई एक नाव और वहाँ पर मौजूद कुछ लोग। यह सबकुछ जैसे किसी खूबसूरत सपने की भांति लग रहा था।

ऐसे वातावरण में नदी के किनारे किसी बड़े से पत्थर पर बैठकर पानी में पाँव डुबोना और बालों के साथ खेलती ठंडी हवा का आनंद लेना, ये सारे पल जैसे इस पूरी यात्रा को और भी खूबसूरत बना रहे थे। यहाँ पर आकर आप जैसे अपनी सारी मुश्किलें भूल जाते हैं और सिर्फ इस मंत्रमुग्ध कर देनेवाले वातावरण में खो जाना चाहते हैं और इस पल को पूरी तरह से जीना चाहते हैं। अगर आपकी किस्मत अच्छी हुई तो आपको नदी के उस पार कुछ जंगली जानवर भी दिखाई दे सकते हैं। इस वक्त मुझे अपनी दूरबीन की बहुत ज्यादा याद आ रही थी। ये पल मेरी पूरी उत्तर पूर्वीय भारत की यात्रा के सबसे शांतिपूर्ण और यादगार पल थे।

उद्यान और आस-पास के जगहों की सैर   

आपको इस उद्यान के आस-पास की जगहें जरूर देखनी चाहिए। वहाँ पर एक छोटा सा मंदिर है जो एक सुंदर से पेड़ की छाया में खड़ा है। उज्वलित लाल रंग का यह पेड़ यहाँ के पूरे हरे-भरे परिदृश्य को और भी आकर्षक बनाता है। यहाँ पर एक मत्स्य पालन केंद्र भी है जहाँ पर मछलियों की नयी-नयी जातियों को लाकर उनका पोषण किया जाता है। इसी के साथ उन मछलियों पर संशोधन भी किया जाता है और फिर उसका दस्तावेजीकरण किया जाता है। बाद में संशोधन पूर्ण होने के पश्चात इन मछलियों को नदी में छोड़ दिया जाता है।

यहाँ पर रंगबिरंगी तितलियाँ और पक्षी भी हैं जो आपको उन्हें अपने कैमरे में कैद करने के लिए लुभाते हैं, लेकिन वे इतनी आसानी से आपकी पकड़ में नहीं आते। इसके अतिरिक्त यहाँ पर एक आवासशाला भी है जो 12-15 लोगों एक साथ अपनी छत्रछाया में ले सकता है, ताकि लोगों को कोई असुविधा ना हो। पर्यटन के मौसम में आप चाहे तो यहाँ पर रिवर राफ्टिंग के लिए जा सकते हैं, मछली भी पकड़ सकते हैं और वहाँ के जंगली प्राणियों को देखने के लिए आरक्षित क्षेत्रों में भी जा सकते हैं।

मुझे तो लगता है कि वन्यजीवन के सरगर्मों को एक बार तो नामेरी राष्ट्रीय उद्यान जरूर जाना चाहिए।

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बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान – बाघ दर्शन के परे वन्य-जीवन https://inditales.com/hindi/bandhavgarh-rashtriya-udyaan-safari/ https://inditales.com/hindi/bandhavgarh-rashtriya-udyaan-safari/#respond Wed, 09 Aug 2023 02:30:36 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3136

बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान बाघों के दर्शन के लिए अत्यंत लोकप्रिय है। अन्य राष्ट्रीय उद्यानों की तुलना में यह एक छोटा राष्ट्रीय उद्यान है जहां बाघों की संख्या प्रशंसनीय है। इस कारण सफारी के समय यहाँ बाघों के दर्शन सामान्य है। इन परिस्थितियों में बाघों के दर्शन ना हो पाना दुर्भाग्य ही कह सकते हैं। जब […]

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बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान बाघों के दर्शन के लिए अत्यंत लोकप्रिय है। अन्य राष्ट्रीय उद्यानों की तुलना में यह एक छोटा राष्ट्रीय उद्यान है जहां बाघों की संख्या प्रशंसनीय है। इस कारण सफारी के समय यहाँ बाघों के दर्शन सामान्य है। इन परिस्थितियों में बाघों के दर्शन ना हो पाना दुर्भाग्य ही कह सकते हैं।

बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान सफारी
बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान सफारी

जब हम यहाँ सफारी के लिए आये, हमारा भी कुछ ऐसा ही भाग्य रहा। उद्यान के ताला एवं मगधी क्षेत्र में हमने तीन सफारियाँ की किन्तु हमें एक भी बाघ नहीं दिखा। हमारे साथ आये कुछ अन्य पर्यटकों को बाघ ने अवश्य दर्शन दिए। सत्य ही है, उनके दर्शन कर पाना अथवा ना करना नियति का ही खेल है।

जब हम बाघ दर्शन की आस में जंगल में घूम रहे थे, तब बाघ तो हमसे छुपे रहे किन्तु वन के अन्य वैशिष्ट्य एवं उसके परितंत्र हमारा ध्यान आकर्षित करने में सफल हो रहे थे। हमने बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान के विविध आयामों को सूक्ष्मता से देखा व जाना।

बाघ दर्शन के परे बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान का वन्य-जीवन

वृक्ष

बांधवगढ़ के वनों में मुख्य रूप से चटक हरे पत्तों से आच्छादित साल वृक्ष बहुसंख्य में उपस्थित हैं। इसके पश्चात, बांस वृक्षों की संख्या है। इस क्षेत्र की रेतीली भूमि, जिनमें ये वृक्ष प्रस्फुटित होते हैं, उस काल का स्मरण कराते हैं, जब यह क्षेत्र कदाचित सागर का एक भाग रहा होगा। सागर ने इस भूमि पर बालू से अपने चिन्ह छोड़ दिए हैं।

वृक्षों को जकड़े हुए लताएँ
वृक्षों को जकड़े हुए लताएँ

इस क्षेत्र की एक अन्य विशिष्ठता है, साल वृक्षों का संबल लेते हुए उगती मोटी मोटी लताएँ, जो वृक्ष के तने को ढँक लेती है। यह एक परजीवी बेल होती हैं जो जिस वृक्ष का संबल लेते हुए उगती है, उसी वृक्ष को खा जाती है। वृक्ष के मरते ही शनैः शनैः वह स्वयं भी मृत हो जाती है। दार्शनिक रूप से इसका विश्लेषण करें तो क्या अधिकतर मानवों का व्यवहार ऐसा नहीं होता है? जिन वृक्षों पर उनका जीवन निर्भर होता है, क्या वे उन्ही वृक्षों की कटाई नहीं कर देते? वे यह भूल जाते हैं कि इन वृक्षों के अस्तित्वहीन होने पर उनका स्वयं का अस्तित्व भी शेष नहीं रहेगा।

हमारे गाइड ने वन में उगते अनेक औषधीय पौधों एवं वृक्षों से हमारा परिचय कराया। वनों के आसपास रहते जनजाति के लोग अनेक रोगों के निवारण के लिए इनका प्रयोग करते हैं। उदहारण के लिए, Chloroxylon Swietania नामक पौधे का प्रयोग मलेरिया से छुटकारा पाने के लिए किया जाता है जिसे स्थानिक भीरा का पौधा भी कहते हैं।

यहाँ वृक्ष की एक अन्य प्रजाति है, साजा, जिसका तना राख के रंग का होता है। इसकी सतह पर मगरमच्छ की त्वचा के समान आकृतियाँ होती है। स्थानिक इसे शिव रूप मानते हुए इसकी आराधना करते हैं क्योंकि इसके तने का रंग भस्म निरुपित शिव की त्वचा के रंग के अनुरूप दृष्टिगोचर होती है। वे इस वृक्ष की कटाई कभी नहीं  करते हैं। इसके पास से जाते समय वे इसे झुक कर प्रणाम करते हैं।

जामुन के भी अनेक वृक्ष हैं जिनसे टपके हुए जामुनों से निकले रंग पगडंडियों की मिट्टी को लाल व जमुनी कर देते हैं।

बांधवगढ़ के पक्षी

मेरे कैमरे के लिए सर्वाधिक प्रिय दृश्य थे, अपने स्वयं के परिवेश में स्वच्छंद उड़ते रंगबिरंगे पक्षी। नौरंगा (Pitta) एवं नीलकंठ(Indian Roller) अपने पंखों के रंगों का प्रदर्शन करते आकाश में उड़ रहे थे।

नीलकंठ
नीलकंठ

शांत बैठे नौरंगा के पंखों के उजले किन्तु सौम्य रंग अत्यंत मनमोहक प्रतीत होते हैं। वही जब आकाश में उड़ान भरता है, उसके पंख मानों विभिन्न रंगों की होली खेलते प्रतीत होते हैं। इसी कारण इसे नौरंगा कहते हैं।

नौरंगा
नौरंगा

वहीं जब नीलकंठ उड़ान भरता है तब अपना चटक नीला रंग प्रकट करता है तथा जब बैठता है तब उसके नीले पंख राखाड़ी रंग के पंखों के साथ आंखमिचौली खेलने लगते हैं।

कठफोड़वा (Woodpecker) एवं भारतीय सुनहरे पीलक (Oriole) पक्षियों ने मेरे कमरे के संग खूब आंखमिचौली खेली। वे मेरे कमरे में बंद होने के लिए कदापि तत्पर नहीं थे। मानो यह कह रहे हों कि कमरे छोड़िये एवं आँखों से हमें देखकर आनंद उठाइये। आप सब भी यह ध्यान में रखिये।

पक्षियों की विभिन्न प्रजातियाँ

शिकारी अथवा परभक्षी पक्षी, जैसे मधुबाज (Oriental Honey Buzzard), कलगीदार सर्प चील (Crested Serpent Eagle) आदि, वृक्षों की शाखाओं पर आत्मविश्वास से बैठे, अपनी पैनी दृष्टी से शिकार ढूंढ रहे थे। वे उन पर्यटकों से तनिक भी विचलित नहीं थे जो अपने कैमरे के लम्बे लम्बे लेंस उनकी ओर ताने हुए थे।

मधुबाज़
मधुबाज़

दूर स्थित घास के मैदानों में बैठे जांघिल सारस (Painted Storks) घास में छुपे कीट-भोज ढूंढ रहे थे। यूँ तो Jungle Babblers अथवा सात भाई पक्षियों के समूह छद्मावरण के कारण मिट्टी के परिवेश में अदृश्य से प्रतीत होते हैं किन्तु निरंतर आंदोलित होते अंगों के कारण वे हमारी दृष्टी को खींच रहे थे। वे सदा समूह में ही रहते हैं।

कलगीदार सर्प चील
कलगीदार सर्प चील

श्वेत श्याम दहियर (Magpie) भी मेरे कैमरे व मेरे साथ लुका-छुपी का खेल खेल रही थी। उस खेल में अंततः उसकी ही विजय हुई तथा मेरा कैमरा उसके छायाचित्र से वंचित रह गया।

चितरोखा (Spotted dove) जंगल में शांत बैठे रहते हैं। काला बाजा (Black Ibis), भीमराज / बुजंगा (Drongo), जलकाक (Cormorant) तथा  टिटहरी (Lap wing) अधिकतर आकाश में ही उड़ते हुए दिखाई पड़ रहे थे। जंगल में मंगल करते व विविध रंग बिखेरते मोर यहाँ-वहाँ दौड़ रहे थे।

वन्यजीव

एक भालू भूमि टटोलता हुआ भोजन ढूंढ रहा था जिसने अनेक क्षणों तक हमारा मनोरंजन किया। उसने उग्रता से दीमकों की एक बाम्बी पर आक्रमण कर दिया। उसके चारों ओर घूमते हुए वह उस पर अनेक दिशाओं से टूट पडा।

बांधवगढ़ में भालू
बांधवगढ़ में भालू

विडियो एवं छायाचित्र लेते हम छायाचित्रकारों को उसने निमिष मात्र के लिए अपना मुखड़ा दिखाया, तत्पश्चात बाम्बी को तोड़कर वह दीमकों को ढूंढ ढूंढ कर चट करने लगा।

जंगले में अठखेलियाँ करते हिरण
जंगले में अठखेलियाँ करते हिरण

यत्र-तत्र हमें जंगली सूअर दिख जाते थे। सर्वाधिक अधिक संख्या थी चितकबरे हिरणों की, जो सदा समूहों में दृष्टिगोचर हो रहे थे। कदाचित समूहों में वे स्वयं को परभक्षी पशुओं से सुरक्षित अनुभव करते होंगे। सांभर भी जोड़ों में सतर्क कानों के साथ यहाँ-वहाँ विचरण कर रहे थे।

बन्दर एवं हनुमान लंगूर भी दिखे जिनमें कुछ अपने शिशुओं को सीने से चिपटाए कूद-फांद रहे थे तो कुछ वृक्षों पर लटके हुए थे। अनेक बन्दर एक विशाल समूह में समीप स्थित एक जलाशय से जल ग्रहण कर रहे थे तथा जल में अपना प्रतिबिम्ब देख इतरा रहे थे।

बांधवगढ़ में रीछ का एक चलचित्र

राष्ट्रीय उद्यान में रीछ का एक सुन्दर विडियो लेने में मैं सफल हुई। आप इसे अवश्य देखें।

रीछ का एक जोड़ा हमने सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान में हमारे रात्रि सफारी में भी देखा था। सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान में रात्रि सफारी के विषय में अवश्य पढ़ें।

तितलियाँ एवं अन्य कीट

छोटे छोटे श्वेत पुष्पों से लदे एक विशेष वृक्ष को मैंने गूंजता हुआ वृक्ष, यह नाम प्रदान कर दिया क्योंकि उस पर तितलियों एवं कीटों की अनेक प्रजातियाँ गुंजन कर रही थीं।

मनमोहक तितलियाँ
मनमोहक तितलियाँ

हमने प्रातः एवं संध्या, दो सफारियों में उस वृक्ष के नीचे अनेक क्षण व्यतीत किये। प्रातःकालीन एवं संध्याकालीन सफारियों में तितलियों एवं कीटों की प्रजातियों की भिन्नता देख हम दंग रह गए।

बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान के ३ क्षेत्र अथवा जोन

राष्ट्रीय उद्यान को ३ प्रमुख क्षेत्रों में बाँटा गया है, खतौली, मगधी एवं ताला।

जल की होड़ में बंदरों के झुण्ड
जल की होड़ में बंदरों के झुण्ड

उनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण क्षेत्र ताला है, तत्पश्चात मगधी है। ये दोनों जोन विशाल चट्टानी पहाड़ी के ऊपर स्थित प्राचीन बांधवगढ़ दुर्ग के दोनों ओर स्थित हैं। एक दूसरे से सटे होने के पश्चात भी उन दोनों क्षेत्रों में तीव्र भिन्नता है।

पंख फैलाये पक्षी
पंख फैलाये पक्षी

ताला क्षेत्र अत्यंत सघन क्षेत्र है जिसमें मगधी जोन की तुलना में अधिक घने वृक्ष तथा मनमोहक परिदृश्य हैं। मैंने मगधी जोन में दो तथा ताला क्षेत्र में एक सफारी की। यद्यपि मगधी क्षेत्र में बाघों के दर्शन की संभावना अधिक रहती है, तथापि मैं मगधी क्षेत्र की तुलना में ताला क्षेत्र की अधिक अनुशंसा करूंगी।

हाथियों के लिए विशेष रोटियाँ

वन विभाग के पास कुछ हाथी हैं जिन पर बैठकर वन रक्षक वन के भीतर विचरण करते हैं। वे बाघों की उपस्थिति एवं उनके क्रियाकलापों की जानकारी रखते हैं तथा उन पर किसी संकट के अंदेशा का अनुमान लगाते हैं। बाघों की उपस्थिति ज्ञात होते ही वे सफारी के जीपों को सूचना देते हैं ताकि जीपें पर्यटकों को वहां ले जा सकें। यदि बाघ वन में भीतर हों जहाँ जीप ना पहुँच सके तब वे पर्यटकों जो हाथी पर बिठाकर उनके समीप तक ले जाते हैं।

हाथी के लिए बनती रोटियां
हाथी के लिए बनती रोटियां

हमने देखा, विभाग के कर्मी उन हाथियों के लिए मोटी व बड़ी बड़ी रोटियाँ बना रहे थे। प्रत्येक रोटी में लगभग एक किलो आटे का प्रयोग किया जा रहा था। उसके पश्चात भी, हाथी के समक्ष रोटियाँ कितनी लघु प्रतीत हो रही थीं। कर्मियों ने हमें बताया कि एक हाथी को प्रतिदिन दो ऐसी रोटियां प्रातः जलपान के लिए दी जाती हैं। तत्पश्चात भोजन में आठ ऐसी रोटियाँ दी जाती हैं। उसके पश्चात भी वह वन में चरने के लिए स्वतन्त्र होता है।

यहाँ-वहाँ वृक्षों के तने पर से आर्किड प्रस्फुटित हो रहे थे। मुझे बैगा जनजाति का एक व्यक्ति दिखा जो भूमि पर पड़ी कुछ वस्तुएं चुन रहा था। उसे देख मुझे अत्यंत आनंद हुआ कि कैसे वनों के आसपास जीवन व्यतीत करती जनजातियाँ वनों के प्रति श्रद्धा रखती हैं तथा आदर पूर्वक वही स्वीकारती हैं जो वन उन्हें स्वयं देते हैं।

हमें वन में बाघ भले ही नहीं दिखे किन्तु हमारी सफारी व्यर्थ नहीं थी। बाघों के ना दिखने पर हम निराश हुए बिना वन को अधिक सूक्ष्मता से निहार पाए। बाघों का ना दिखना एक प्रकार से वरदान ही सिद्ध हुआ जिसके कारण हमें इस वन की अन्य विशेषताओं की भी जानकारी प्राप्त हुई। इसके पश्चात भी इस वन के विषय में जानना अभी शेष है क्योंकि अनेक वन्य जीव एवं पक्षी वन के भीतर छुप कर बैठे थे जिनमें बाघ भी सम्मिलित हैं। कदाचित उन्हें देखने का अवसर मुझे पुनः शीघ्र ही प्राप्त होगा।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान भारत का प्रथम राष्ट्रीय उद्यान https://inditales.com/hindi/jim-corbett-rashtriya-udyaan-uttarakhand/ https://inditales.com/hindi/jim-corbett-rashtriya-udyaan-uttarakhand/#respond Wed, 17 May 2023 02:30:20 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3060

जंगल का राजा रॉयल बंगाल टाइगर या बंगाल बाघों के लिए विश्व प्रसिद्ध, हिमालय की तलहटी पर स्थित जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान को भारत का प्रथम राष्ट्रीय उद्यान होने का गौरव प्राप्त है। सन् १९३६ में स्थापित यह उद्यान पूर्व में हेली नेशनल पार्क के नाम से जाना जाता था। जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान – […]

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जंगल का राजा रॉयल बंगाल टाइगर या बंगाल बाघों के लिए विश्व प्रसिद्ध, हिमालय की तलहटी पर स्थित जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान को भारत का प्रथम राष्ट्रीय उद्यान होने का गौरव प्राप्त है। सन् १९३६ में स्थापित यह उद्यान पूर्व में हेली नेशनल पार्क के नाम से जाना जाता था।

जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान – भारत का प्राचीनतम राष्ट्रीय उद्यान

५२० वर्ग किलोमीटर से भी अधिक क्षेत्रफल में फैले इस राष्ट्रीय उद्यान में विभिन्न प्रकार के भूभाग हैं, जैसे पहाड़ियाँ, दलदली भूमि, घास के मैदानी क्षेत्र, जल के विभिन्न स्त्रोत आदि। एक अत्यंत विस्तृत उद्यान होने के पश्चात भी इसका मुख्यालय रामनगर उत्तराखंड के नैनीताल जिले में स्थित है।

जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान का इतिहास

इस क्षेत्र को राष्ट्रीय उद्यान घोषित करने से पूर्व यह वन टेहरी गढ़वाल रियासत की एक निजी संपत्ति थी। टेहरी के राजा ने इस क्षेत्र के एक भाग को इस करार के अंतर्गत ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दी थी कि गोरखाओं के विरुद्ध ईस्ट इंडिया कंपनी राजा की सहायता करेगी। इसके पश्चात अंग्रेजों ने सन् १८६० में इस क्षेत्र में बसे एवं खेती कर जीवन निर्वाह कर रहे तराई क्षेत्र के बुक्सा जनजाति के लोगों को यहाँ से खदेड़ दिया। वन संरक्षण का कार्य सन् १८६८ में आरम्भ हो गया।

जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान में हाथी
जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान में हाथी

इस भूभाग की संरचना एवं यहाँ के वन्य प्राणी इतने उत्कृष्ट थे कि सन् १९०७ में इस क्षेत्र को वन्यजीव संरक्षित क्षेत्र में परिवर्तित करने का प्रारूप बनाया गया। किन्तु वह प्रारूप सन् १९३० में ही सजीव रूप ले पाया जब जिम कॉर्बेट के मार्गदर्शन में इस उद्यान की सीमांकन प्रक्रिया पूर्ण की गयी। तब सन् १९३६ में हेली नेशनल पार्क के नाम से एक संरक्षित वनक्षेत्र की रचना हुई जिसका कुल क्षेत्रफल ३२३.७५ वर्ग किलोमीटर था। उस समय सर विलियम मैल्कम हेली संयुक्त प्रांत के गवर्नर थे।

स्वतंत्रता के पश्चात, सन् १९५४-५५ में इस संरक्षित क्षेत्र का नाम रामनगर राष्ट्रीय उद्यान रखा गया। जिम कॉर्बेट की मृत्यु के पश्चात, उनकी स्मृतियों को व उनके अथक संवर्धन कार्य को जीवित रखने के उद्देश्य से सन् १९५५-५६ में इस उद्यान का  नाम पुनः परिवर्तित कर जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान रखा गया।

जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान में बाघ
Bengal Tiger Crossing a river in Corbett National Park

समय के साथ इस उद्यान के क्षेत्रफल में वृद्धि होती गयी। सन् १९९१ तक इसका क्षेत्रफल बफर झोन अथवा मध्यवर्ती क्षेत्र के साथ ७९७.७२ वर्ग किलोमीटर हो गया। इसके साथ ही भारत के विशालतम वन्यजीव अभ्यारण्यों में इसकी गिनती होनी लगी। सन् १९७४ में वन्यजीव संरक्षण प्रकल्प के अंतर्गत स्व. प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी द्वारा प्रोजेक्ट टाइगर का शुभारम्भ किया गया।

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जिम कॉर्बेट

एडवर्ड जेम्स कॉर्बेट या जिम कॉर्बेट का जन्म सन् १८५७ में उत्तराखंड के नैनीताल में हुआ था। वे ब्रिटिश मूल के निवासी थे तथा सोलह सदस्यों के विशाल परिवार में आठवें क्रमांक के सदस्य थे। यद्यपि वे उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहते थे किन्तु अपने परिवार के भरण-पोषण में सहायता करने के लिए उन्होंने रेलवे सेवा में इंधन निरीक्षक का पदभार ग्रहण कर लिया।

जिम कॉर्बेट का पुतला
जिम कॉर्बेट का पुतला

जिम कॉर्बेट ने अपने जीवन काल में अनेक नरभक्षी तेंदुओं एवं बाघों को खोज निकाला एवं उन्हें समाप्त किया। सर्वप्रथम नरभक्षी एक बंगाल बाघिन थी जो ‘द चंपावत टाईग्रेस’ के नाम से कुख्यात हो गयी थी। उसने लगभग ४३६ मनुष्यों के प्राण लिए हैं जिसके कारण उसका नाम गिनीस बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड्स में अंकित है। जिम कॉर्बेट एक निष्णात आखेटक के अलावा वन्य जीव प्रेमी व अत्यंत प्रभावी कथाकार व लेखक भी थे। जिम कॉर्बेट ने अपने जीवन काल में जितने भी बाघों एवं तेंदुओं को समाप्त किया था, उनके विषय में उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखी हैं, जैसे Man-Eaters of Kumaon, The Man-Eating Leopard of Rudraprayag तथा The Temple Tiger, जो अब तक भी लोकप्रिय हैं.

उद्यान की भौगोलिक अवस्थिति

उत्तर में हिमाचल पर्वतमाला जिसे लघु हिमालय अथवा मध्य हिमालय भी कहा जाता है, एवं दक्षिण में शिवालिक पर्वतमाला के मध्य स्थित जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान में अनेक दर्रे, पहाड़ी टीले, जलधाराएं एवं छोटे पठार हैं। उद्यान से होते हुए रामगंगा नदी बहती है।

जिम कॉर्बेट का गाँव
जिम कॉर्बेट का गाँव

इस सम्पूर्ण उद्यान का केवल २० प्रतिशत भाग ही पर्यटकों के लिए खुला रहता है। शेष भाग केवल वन्यप्राणियों के संवर्धन के लिए संरक्षित रखा गया है। इस उद्यान में वृक्षों की लगभग ११० प्रजातियाँ, स्तनपायी जीवों की लगभग ५० प्रजातियाँ, पक्षियों की लगभग ५८० प्रजातियाँ तथा सरीसृपों की लगभग २५ प्रजातियाँ हैं।

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जंगल सफारी एवं अन्य गतिविधियाँ

अन्य वन्यप्राणी उद्यानों के समान जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान में भी प्रमुख गतिविधि जंगल सफारी ही है। इस उद्यान में अनेक प्रकार के सफारी आयोजित किये जाते हैं। जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान का भ्रमण नियोजित करते समय अपने नियत दिनांक से एक मास पूर्व Uttarakhand Government website, इस वेबस्थल से अपने टिकट सुनिश्चित कर लें। अधिकारिक वन्य क्षेत्रों में जंगल सफारी के लिए तात्कालिक टिकट बुकिंग संभव नहीं है। यदि आप इस टिकट को सुनिश्चित करने में चूक जाएँ तो आप सीताबनी सफारी की टिकट ले सकते हैं जो बफर झोन अथवा मध्यवर्ती क्षेत्र में की जाती है।

प्रातः सफारी का परिदृश्य
प्रातः सफारी का परिदृश्य

प्रत्येक सफारी २ से ३ घंटों की होती है। ग्रीष्मकालीन समयावधि एवं शीतकालीन समयावधि में अंतर होता है। उद्यान आने से पूर्व सफारी के टिकट एवं सरकार द्वारा जारी अधिकारिक परिचय पत्र अवश्य साथ रखें।

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जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान के ५ विभिन्न क्षेत्र

जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान को पाँच भागों में बाँटा गया है जिन्हें झोन कहा जाता है। प्रत्येक क्षेत्र अथवा झोन की भूभागीय संरचना भिन्न है। ये पाँच भागों का नाम इस प्रकार हैं-

ढिकाला

जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान का ढिकाला भाग पर्यटकों में सर्वाधिक लोकप्रिय है। पर्यटकों में इसका एक विशेष स्थान है। यह जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान के पाँचों क्षेत्रों में सर्वाधिक विशाल है। इसमें प्राणियों एवं वनस्पतियों की अनेक प्रजातियाँ हैं। यह क्षेत्र एक-दिवसीय यात्रियों के लिए उपलब्ध नहीं है। इस सफारी का आनंद उठाने के लिए आपको वन विभाग के रेस्ट हाउस में अपने ठहरने की सुविधा पूर्व-नियोजित करनी होगी। इस क्षेत्र में बाघों के दर्शन की संभावना सर्वाधिक रहती है।

जिम कॉर्बेट उद्यान के विभिन्न द्वार
जिम कॉर्बेट उद्यान के विभिन्न द्वार

सन् २०१९ में प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी एवं Bear Grylls पर दूरदर्शन मालिका Man vs Wild का एक विशेष संस्करण इसी राष्ट्रीय उद्यान के इसी भाग में चित्रित किया गया था। यह उद्यान १५ नवम्बर से १५ जून तक पर्यटकों के लिए खुला रहता है।

बिजरानी

बाघों के दर्शन के लिए ढिकाला के पश्चात बिजरानी भाग पर्यटकों में लोकप्रिय है। इस सफारी के लिए रात्रि में वहाँ ठहरने की अनिवार्यता नहीं है। इस कारण इसके टिकटों की विक्री शीघ्र समाप्त हो जाती है। इस क्षेत्र की भूभागीय संरचना में घास के विस्तृत मैदान, साल वृक्ष के घने वन एवं नदियाँ सम्मिलित हैं। पर्यटकों के लिए यह भाग १५ अक्टूबर से ३० जून तक खुला रहता है।

झिरना

हाथी, हिरण और आरण्य पथ
हाथी, हिरण और आरण्य पथ

झिरना भाग कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान की दक्षिणी सीमा पर स्थित है। यह झोन पर्यटकों के लिए वर्षभर खुला रहता है। इसी कारण इस क्षेत्र में पर्यटकों की संख्या सर्वाधिक रहती है। इन भाग के मुख्य आकर्षण हैं, रूपवान बाघों के दर्शन के साथ साथ काले रीछ के दर्शन।

ढेला

दिसंबर २०१४ में घोषित ढेला भाग इस राष्ट्रीय उद्यान के विभिन्न पर्यटन क्षेत्रों में नवीनतम झोन है। उद्यान का यह क्षेत्र भी पर्यटकों के लिए वर्ष भर उपलब्ध रहता है। किन्तु सफारी का आयोजन वातावरण की स्थिति पर निर्भर करता है। वन्यजीवों के दर्शन के साथ साथ यह क्षेत्र पक्षी दर्शन के लिए भी अत्यंत लोकप्रिय है।

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दुर्गा देवी

यह भाग कॉर्बेट वन-उद्यान के उत्तर-पूर्वी सीमा पर स्थित है। यह क्षेत्र वनस्पतियों एवं वन्य प्राणियों के अनेक प्रजातियों से संपन्न है। रामगंगा नदी एवं मंडल नदी इस क्षेत्र के सभी जल स्त्रोतों को पोषित करती हैं तथा इस वन की सुन्दरता को चार गुना करती हैं। यह भाग पर्यटकों के लिए १५ नवम्बर से १५ जून तक खुला रहता है।

सीताबनी

घने जंगले
घने जंगले

जिम कॉर्बेट वन उद्यान का सीताबनी भाग एक संरक्षित वन क्षेत्र है जो कॉर्बेट बाघ संरक्षित क्षेत्र के बाहर स्थित है। इस भाग को बाघ अभयारण्य का बफर भाग अथवा मध्यवर्ती क्षेत्र माना जाता है। यह क्षेत्र सभी पर्यटकों के लिए खुला रहता है। यहाँ पक्षियों की लगभग ६०० प्रजातियाँ देखी जा सकती हैं जिनमें अधिकाँश प्रजातियाँ प्रवासी पक्षियों की हैं। इनके अतिरिक्त यहाँ अनेक शाकाहारी प्राणी भी दिखाई देते हैं जैसे, हाथी, हिरण, सांभर, नीलगाय आदि।

सफारी के अतिरिक्त इस राष्ट्रीय उद्यान के अन्य आकर्षण हैं, ढिकाला का संग्रहालय एवं कालाढूंगी में स्थित जिम कॉर्बेट का पैतृक निवास।

ढिकाला का संग्रहालय अत्यंत विशाल है जहाँ वन्यप्राणियों के विषय में विस्तृत जानकारी उपलब्ध है। वन उद्यान में विचरण करते स्तनपायी जीवों के विभिन्न प्रकार से लेकर भिन्न भिन्न पक्षियों के विविध कलरव के स्वरों तक सभी जानकारी यहाँ प्रदान की गयी है। ३डी एवं प्रकाश प्रदर्शन द्वारा इस वन के रात्रि काल के परिदृश्यों को भी परदे पर सजीव किया जाता है।

गिरिजा देवी मंदिर
गिरिजा देवी मंदिर

कोसी नदी के तट पर, एक पहाड़ी के टीले पर गर्जिया माता मंदिर है जिसे गिरिजा देवी मंदिर भी कहा जाता है। पार्वती माता के स्वरूप गर्जिया देवी को समर्पित यह मंदिर लगभग १५० वर्ष प्राचीन है। प्रतिदिन सहस्त्रों की संख्या में भक्तगण माता के दर्शन के लिए यहाँ आते हैं। इस स्थान पर पक्षियों की कुछ दुर्लभ प्रजातियाँ भी दिख जाती हैं, विशेषतः हिमालय नीलकंठ(Himalayan Kingfisher)।

यदि रोमांचक क्रीड़ाओं में आपकी रूचि हो तो यहाँ कुछ टूर ऑपरेटर हैं जो वन में पदभ्रमण, उफनती नदी पर नौका चलाना(river rafting), पर्वतों पर सायकल चलाना(mountain biking) जैसी अनेक गतिविधियाँ आयोजित करते हैं।

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जिम कॉर्बेट प्राणी उद्यान कैसे पहुंचें?

यहाँ पहुँचने के लिए निकटतम विमानतल पंतनगर में है जो यहाँ से ८३ किलोमीटर दूर है। रेलगाड़ी द्वारा आना चाहें तो निकटतम रेल स्थानक रामनगर में है जो दिल्ली से रेल मार्ग द्वारा जुड़ा हुआ है। दिल्ली से सड़क मार्ग द्वारा ५ घंटे की यात्रा कर पहुंचा जा सकता है।

जिम कॉर्बेट प्राणी उद्यान में ठहरने की व्यवस्था

संग्रहालय एवं उद्यान का मानचित्र
संग्रहालय एवं उद्यान का मानचित्र

जिम कॉर्बेट प्राणी उद्यान देश-विदेश में प्रसिद्ध होने के कारण एक अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन गंतव्य है। यहाँ अनेक प्रकार के रिसॉर्ट्स, होटल व होमस्टे हैं तथा नदीतट पर तम्बुओं की भी व्यवस्था है। किन्तु सरकारी विश्रामगृहों के अतिरिक्त इनमें से कोई भी व्यावसायिक संस्थान वनीय प्रदेश के भीतर नहीं हैं। ये सभी या तो महामार्ग के किनारे स्थित हैं अथवा बफर भाग  के भीतर स्थित हैं।

यहाँ इस वनीय प्रदेश के अनछुए प्राकृतिक सौंदर्य का दर्शन अद्भुत प्रतीत होता है। एक ओर जहाँ यह वन तथा इसका पारिस्थितिक तंत्र है तो दूसरी ओर, अर्थात् रिसोर्ट एवं होटलों की ओर त्वरित गति से बहती कोसी नदी की सौम्यता यहाँ की सुन्दरता को एक पृथक आयाम प्रदान करती है।

यदि आपको रोमांच भाता है तथा आप अभयारण्य के भीतर ठहरना चाहते हैं तो उत्तराखंड के अधिकृत वेबस्थल पर जाकर अपने ठहरने की व्यवस्था यहाँ आने से पूर्व ही सुनिश्चित कर लें। जिम कॉर्बेट प्राणी उद्यान के प्रत्येक झोन में विश्राम गृह हैं जिन्हें फारेस्ट लॉज कहा जाता है। केवल ढिकाला झोन में ही अभयारण्य के भीतर ठहरने की अनिवार्यता है। अन्य सभी क्षेत्रों में उद्यान के भीतर ठहरने की अनिवार्यता नहीं है। फारेस्ट लॉज के भीतर वहाँ के परिचारक आपके भोजन एवं अन्य आवश्यक सामग्रियों की व्यवस्था करते हैं। अभयारण्य के भीतर मदिरापान एवं सामिष भोजन पर कड़ा प्रतिबन्ध है।

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जिम कॉर्बेट प्राणी उद्यान के दर्शन का सर्वोत्तम समय

दिसंबर से मार्च मास की समयावधि कॉर्बेट प्राणी उद्यान के दर्शन के लिए सर्वोत्तम समय है। १२००० फीट की ऊँचाई पर स्थित इस उद्यान एवं इसके आसपास के क्षेत्र का तापमान शीत ऋतु में लगभग ५ डिग्री सेल्सियस तक रहता है। शीत ऋतु में यहाँ का वातावरण शीतल रहता है तथा अभयारण्य में विचरण करना भी सुखमय होता है। प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व बाघों को देख पाने की संभावना अधिक रहती है।

कॉर्बेट में ग्रीष्मकालीन वातावरण किंचित कष्टकारक होता है। मई एवं जून मास में तापमान ४० डिग्री सेल्सियस तक हो जाता है। मैं जून मास में कॉर्बेट उद्यान के दर्शन के लिए आयी थी। उस समय यहाँ के तापमान एवं आर्द्रता के कारण वातावरण अत्यंत असहनीय था।

जून से अक्टूबर मास के मध्य मानसून अवधि में अधिकांश प्राणी उद्यान पर्यटकों के लिए बंद हो जाते हैं। सभी जल स्त्रोत एवं नदियाँ जल से भर जाती हैं तथा सफारी गाड़ियों का चलाना दूभर हो जाता है। मानसून में आये पौधे पदमार्गों को अवरुद्ध कर देते हैं तथा वन के भीतर पैदल चलना भी लगभग असंभव हो जाता है।

यह संस्करण Inditales Internship Program के अंतर्गत अक्षया विजय द्वारा लिखा गया है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान के वन का आनंद उठाने के ५ प्रकार https://inditales.com/hindi/satpura-rashtriya-udyaan-safaari-madhya-pradesh/ https://inditales.com/hindi/satpura-rashtriya-udyaan-safaari-madhya-pradesh/#respond Wed, 23 Nov 2022 02:30:25 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2872

सतपुड़ा के वनों के विषय में कवि भवानी प्रसाद ने सुन्दर उद्गार व्यक्त किये हैं, घने किन्तु उनिंदे। मैं उनसे पूर्णतः सहमत हूँ। लताओं व मकड़ियों से भरे वन वास्तव में उनिंदे हैं। एक समय बाघों से भरे इन वनों में अब उतने बाघ नहीं हैं जितने कदाचित कवि भवानी प्रसाद ने देखे होंगे। इस […]

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सतपुड़ा के वनों के विषय में कवि भवानी प्रसाद ने सुन्दर उद्गार व्यक्त किये हैं, घने किन्तु उनिंदे। मैं उनसे पूर्णतः सहमत हूँ। लताओं व मकड़ियों से भरे वन वास्तव में उनिंदे हैं। एक समय बाघों से भरे इन वनों में अब उतने बाघ नहीं हैं जितने कदाचित कवि भवानी प्रसाद ने देखे होंगे।

सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान के उनींदे जंगल
सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान के उनींदे जंगल

इस मास के आरम्भ में हमें पगडण्डी सफारी से आमंत्रण मिला था कि हम देन्वा नदी के तट पर स्थित उनके मनमोहक देन्वा बैकवाटर एस्केप रिसोर्ट (Denwa Backwater Escape resort) में ठहरे व उसका आनंद उठायें। रिसोर्ट के समक्ष ही सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान स्थित है। तीन दिवसों तक हम रिसोर्ट एवं राष्ट्रीय उद्यान में पूर्णतः मग्न रहे। देन्वा के अप्रवाही जल को पार कर राष्ट्रीय उद्यान का विभिन्न किन्तु रोचक रीति से अवलोकन करना अत्यंत रोमांचक अनुभव था। इस राष्ट्रीय उद्यान में हमने भिन्न भिन्न सफरियों का कैसे आनंद उठाया, उसका विस्तृत विवरण एवं अनुभव मैं आपके साथ बांटना चाहती हूँ।

सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान के वनों का आनंद उठाने के ५ प्रकार

जीप सफारी

यह राष्ट्रीय उद्यानों के अवलोकन का सर्वसामान्य मार्ग है। लगभग सभी राष्ट्रीय उद्यानों में जीप सफारी की सुविधा होती है। वन विभाग का वनरक्षक आपको जीप में बिठाकर पूर्व निर्धारित मार्गों द्वारा वन के आतंरिक भागों में ले जाता है ताकि हमें वन्य पशु-पक्षियों को उनके प्राकृतिक परिवेश में देखने का अवसर प्राप्त हो सके। हमने भी दो सफारियाँ की, एक प्रातः काल में जो लगभग ६:३० बजे आरम्भ होती है तथा दूसरी संध्या में जो लगभग संध्या ४ बजे आरम्भ होती है। ऋतुओं के अनुसार इन समयों में किंचित फेरबदल हो सकता है।

जंगल में खेलते हिरण
जंगल में खेलते हिरण

हमारे रिसोर्ट के कुछ रहवासियों को एक सफारी में एक तेंदुआ एवं एक रीछ दृष्टिगोचर हुए थे। इस समाचार ने हमारी आशाओं में पर्याप्त वृद्धि कर दी तथा हम भी इन वन्य पशुओं के दर्शन करने के लिए आतुर हो उठे। सफारी के समय हमने हिरणों व बंदरों की हांक सुनी जो यह दर्शाती है कि कोई मांसाहारी वन्य पशु निकट ही है। किन्तु बाघ, रीछ अथवा तेंदुए जैसे विशाल वन्य पशुओं को देख पाने के लिए भाग्य एवं सही समय की आवश्यकता होती है।

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हमारा सौभाग्य नहीं था कि हम उस सफारी में बाघ, रीछ अथवा तेंदुए देख पाते। किन्तु हमने बड़ी संख्या में भारतीय गौर अथवा जंगली भैंसे तथा सांभर हिरण देखे जो विभिन्न क्रियाकलापों में व्यस्त थे। हमने लंगूर, बन्दर तथा चित्तीदार हिरणों के अनेक झुण्ड देखे। वन में अनेक पक्षी भी देखे। वास्तव में ये पक्षी ही थे जिनके कारण हम पुनः पुनः वन में जाने के लिए इच्छुक हो रहे थे।

सतपुड़ा की विशालकाय मकड़ियाँ
सतपुड़ा की विशालकाय मकड़ियाँ

सतपुड़ा के वनों में हमारी सर्वोत्तम खोज थी, विशालकाय मकड़ियाँ। उनके जाले इतने विस्तृत थे कि उनके द्वारा ऊँचे ऊँचे वृक्ष आपस में जुड़कर एक हो रहे थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वे विशालकाय मकड़ियाँ वृक्षों के ऊपर एक छत बुन रही हों। रात्रि के अन्धकार में अन्य वृक्ष लुप्त हो जाते थे किन्तु भूतिया वृक्ष अथवा कटीरा अपने उजले तने के कारण चन्द्रमा के प्रकाश में भूत के समान चमकता रहता था।

पदयात्रा सफारी

वन के मूल क्षेत्र की सीमा पर पगडंडियाँ बनाई गयी हैं जहां पदयात्रा करने की अनुमति होती है। टिकट क्रय करने के पश्चात वन संरक्षक आपको एक परिदर्शक प्रदान करता है जो आपको उन पगडंडियों के द्वारा वन का भ्रमण करवाता है। वन में वृक्षों के मध्य पक्षियों, पशुओं, मकड़ियों एवं तितलियों को ढूँढने में आपकी सहायता करता है। वन एवं आसपास के क्षेत्रों में उगने वाले वृक्षों एवं अन्य पौधों की जानकारी भी देता है। किन वृक्षों व पौधों के समीप जाना जोखिम भरा हो सकता है तथा किन के समीप जाना सुरक्षित है, इसकी भी जानकारी देता है। वन के कुछ पौधे अथवा झाड़ियाँ काँटों से भरी होती हैं, कुछ हमारे वस्त्रों में अटक जाती है अथवा खाज उत्पन्न कर सकती हैं, इत्यादि जानकारी हमारा परिदर्शक भी हमें निरंतर दे रहा था। हमारे सचेत परिदर्शक ने हमें झाड़ियों में छुपी सरीसर्प जैसी कई प्रजातियाँ दिखाई।

सतपुड़ा की पहाड़ियों पर सूर्योदय
सतपुड़ा की पहाड़ियों पर सूर्योदय

१४ वर्ष से कम आयु के बालक-बालिकाओं को इस सफारी की अनुमति नहीं होती है। इस सफारी के लिए ऐसे वस्त्र एवं जूते धारण करें जो आपके अधिकतम अंगों को पूर्णतः ढँक सकें, सुखद हों तथा वन के सामान्य परिवेश से साम्य रखते रंगों के हों। इससे आप स्वयं को सुरक्षित रख पायेंगे तथा वन्य पशु-पक्षियों को आशंकित भी नहीं करेंगे।

सतपुड़ा के अप्रवाही जल में नौका सफारी

यह सफारी लगभग एक घंटे की है जो देन्वा नदी के अप्रवाही जल पर नौका द्वारा की जाती है। नदी में अनेक लघु द्वीप हैं जो पक्षियों के लिए सर्वोत्तम वास हैं। इस सफारी में हरेभरे घने वन आपको चारों ओर से घेर लेते हैं। यहाँ का सर्वोत्तम आकर्षण है, उड़ते हुए पक्षियों को देखना। उन्हें देख आपकी आँखे स्तब्ध रह जायेंगी। पक्षी कभी एकल, कभी जोड़े में तो कभी झुण्ड में उड़ते हुए आपका मन मोह लेंगे।

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दोपहर की सफारी का एक अन्य आकर्षण है जल में डूबते हुए सूरज को देखना। यह दृश्य प्रतिदिन एवं प्रतिक्षण परिवर्तित होता रहता है। जिस दिन हम यहाँ आये थे, सूर्य जल को केसरिया एवं नीले रंगों की सम्मिश्रित छटा प्रदान कर रहा था। उस दृश्य को शब्दों में सीमित करना अन्याय होगा। उसका आनंद उठाने के लिए आपको यहाँ प्रत्यक्ष आना होगा ताकि आप स्वयं प्रकृति के विभिन्न आयामों का अद्भुत आनंद उठा सकें तथा उन रंगों की अठखेलियों से एकाकार हो सकें।

रात्रिकालीन जीप सफारी

यह अत्यंत रोमांचक सफारी है। रात्रि के अन्धकार में खुली जीप में वनों में घूमना, भयावह प्रतीत होता है। वर्षों के अनुभव से सफारी के परिदर्शक को पशु-पक्षियों की उपस्थिति का आभास हो जाता है। तब वह तेज बत्ती अथवा टॉर्च का प्रयोग कर उसके प्रकाश में हमें वन्य पशु दिखाता है। यह सफारी नदी के तट पर की जाती है। सामान्यतः यह सफारी रिसोर्ट द्वारा ही आयोजित की जाती है। प्रकृति तज्ञ परिदर्शक भी रिसोर्ट ही प्रदान करता है जो रात्रि में पशुओं को देख पाने में हमारी सहायता करता है, विशेषतः निशाचर पशु।

रात्रि की जीप सफारी
रात्रि की जीप सफारी

हमारे परिदर्शक अथवा सफारी गाइड ने हमें चमकती आँखों को ढूँढते रहने का महत्वपूर्ण परामर्श दिया। रात्रि में पशुओं को ढूँढने का यह एक कारगर व एकमात्र उपाय है। इसका अर्थ है कि उस समय आप उन पशुओं के समीप भी हों तथा वे आपकी ओर देख भी रहें हों। इसके लिए अच्छे भाग्य की अत्यंत आवश्यकता होती है। आरम्भ में हमने केवल कुछ भारतीय खरगोश यहाँ-वहां कूदते-फांदते देखे। वे मानो हमारे लिए सौभाग्य का पिटारा ही ले आये।

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इसके पश्चात, सर्वप्रथम हमने दो भारतीय रीछ देखे, उनमें से एक ने हमारी जीप के समक्ष ही सड़क पार की। उसे देख तो मानो हमारी सफारी सफल हो गयी। इसके पश्चात हमने कुछ निशाचर पक्षी भी देखे। उनमें इंडियन नाईट जार अथवा चपका पक्षी को देखना हमारे लिए विशेष था।

पक्षी दर्शन पगडंडी

पक्षियों के दर्शन का सर्वोत्तम उपाय है, पैदल चलना। उस पर, यदि आप विशाल समूह में ना हो तो अति उत्तम। हमने अपने रिसोर्ट के चारों ओर स्थित जलभूमि के चारों ओर पैदल भ्रमण किया। हमने जलाशय के आसपास अनेक पक्षी देखे, जैसे कठफोड़वा, नीलकंठ, तुइया तोता एवं कुछ रंगबिरंगी बतखें। पक्षी दर्शन का सर्वोत्तम समय सूर्योदय एवं सूर्यास्त होता है। पक्षी दर्शन के समय मेरे पतिदेव तो पक्षियों के छायाचित्रीकरण में जुट गए।

सूखे पेड़ों पर पक्षी
सूखे पेड़ों पर पक्षी

वहीं मैंने पक्षियों के साथ इस क्षेत्र में उगते अनेक औषधिक पौधों को भी देखा। इन वनों में तेंदू पत्तों के अनेक वृक्ष हैं जिनका प्रयोग बीड़ी बनाने में होता है। यह इन वनों से प्राप्त राजस्व का प्रमुख स्त्रोत है। यहाँ उपलब्ध घिरिया के वृक्षों के भी अनेक उपयोग हैं। इसके पत्तों का प्रयोग मच्छरों को भगाने के लिए तथा रोगाणुरोधक के रूप में किया जाता है। इसकी लकड़ी से हल के हत्थे बनाये जाते हैं क्योंकि यह हल्के होने के पश्चात भी इनमें अपार शक्ति व दृढ़ता होती है।

रिमझा वृक्ष की लकड़ी से बैलगाड़ी के चक्के बनाए जाते हैं क्योंकि यह शीघ्र झिरता नहीं है। जंगली तुलसी का प्रयोग यहाँ के लोग औषधि निर्माण में किया जाता है।

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इन सफारियों के अतिरिक्त, हाथी पर सवार होकर सफारी करने का विकल्प भी उपलब्ध है। इस सफारी की विशेषता यह है कि आप ऊँचाई से वन्य परिवेश का अवलोकन कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त ग्रामीण परिवेश के अवलोकन के लिए ग्राम-सफारी भी होती है। यह विशेष रूप से विदेशी पर्यटकों के लिए अत्यंत रोचक हो सकती है एवं हमारे ग्रामीण परिवेश से परिचित होने में उनकी सहायक हो सकती है।

हमने जिन वनस्पतियों, वृक्षों व पौधों, पशु-पक्षियों एवं अन्य जीवों को यहाँ देखा उनके अन्य चित्र हम शीघ्र ही आपसे साझा करेंगे।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान उन प्रसिद्ध बाघों के लिए अत्यंत लोकप्रिय है जो अधिकतर पर्यटकों को अपने अद्वितीय दर्शन देकर तृप्त कर देते हैं। यद्यपि राष्ट्रीय उद्यान अथवा वन्यजीव उद्यान का नाम सुनते ही मन मस्तिष्क में एक घने वन की कल्पना उभर कर आ जाती है जहां केवल वन्य प्राणियों का वास होता है, तथापि […]

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बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान उन प्रसिद्ध बाघों के लिए अत्यंत लोकप्रिय है जो अधिकतर पर्यटकों को अपने अद्वितीय दर्शन देकर तृप्त कर देते हैं। यद्यपि राष्ट्रीय उद्यान अथवा वन्यजीव उद्यान का नाम सुनते ही मन मस्तिष्क में एक घने वन की कल्पना उभर कर आ जाती है जहां केवल वन्य प्राणियों का वास होता है, तथापि बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान केवल एक राष्ट्रीय उद्यान नहीं है। बांधवगढ़, इस नाम को ध्यानपूर्वक पढ़ें। बांधव का अर्थ है बंधु व सखा तथा गढ़ का अर्थ है महल अथवा दुर्ग। क्या इस राष्ट्राय उद्यान में कोई गढ़ अथवा दुर्ग है? जी हाँ। इस वन के भीतर, एक विशाल चट्टान के ऊपर एक दुर्जेय गढ़ है जिसकी ऊँचाई ८११ मीटर है।

बांधवगढ़ का इतिहास और धरोहर
बांधवगढ़ का इतिहास और धरोहर

जिस पहाड़ी पर यह दुर्ग स्थित है, उसका शीर्ष सपाट मंच सदृश है जो इस पहाड़ी को एक आवास योग्य पठार बनाता है। आप इस पहाड़ी को वन के ताला एवं मागधी दोनों क्षेत्रों से देख सकते हैं। इस दुर्ग एवं इसकी धरोहर के दर्शन के लिए विशेष मार्ग पर जाना पड़ता है। मुझे भी यहाँ की धरोहरों के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान की अनमोल ऐतिहासिक धरोहर

बांधवगढ़ की धरोहर
बांधवगढ़ की धरोहर

भारत की अधिकाँश किवदंतियों के समान इस स्थान का सम्बन्ध भी महाकाव्य रामायण से जुड़ा हुआ है। ऐसी मान्यता है कि यह दुर्ग भगवान राम के अनुज भ्राता लक्ष्मण का था जिसके कारण इसका नाम बांधवगढ़ पड़ा। यहाँ से प्राप्त कुछ प्राचीन ब्राह्मी शिलालेखों के आधार पर पुरातत्वविद इसे ईसापूर्व युग का मानते हैं। पुरातात्विक साक्ष्य दुर्ग की संरचना को १०वीं सदी का मानते हैं जो यह दर्शाता है कि यह दुर्ग ज्ञात ऐतिहासिक काल तक अनवरत बसा हुआ था। ऐसा माना जाता है कि बघेल वंश के शासकों ने १७वीं सदी के आरम्भ तक इस गढ़ से शासन के कार्यभार का निर्वाह किया था, जिसके पश्चात उन्होंने अपनी राजधानी यहाँ से १२० किलोमीटर दूर रीवा में स्थानांतरित कर दी थी। इस दुर्ग पर अब भी राज परिवार का स्वामित्व है।

बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान में शिव मंदिर
बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान में शिव मंदिर

सिद्धबाबा मंदिर

वन के भीतर श्रद्धा का प्रथम चिन्ह जो मैंने देखा, वह था एक छोटा सा सिद्धबाबा मंदिर, जिसके भीतर एक शिवलिंग एवं त्रिशूल था। यह स्थान बाघों के दर्शन के लिए भी लोकप्रिय है। वाहन द्वारा यहाँ के कुछ दूर जाते ही हम बांधवगढ़ पहाड़ी पर चढ़ने लगे थे। दूर से ही पहाड़ी पर मानव निर्मित संरचनाएं दृष्टिगोचर होने लगी थीं। मैंने अपने कैमरे को जूम करते हुए एक मंदिर देखा जो एक मध्ययुगीन संरचना प्रतीत होती है। तीव्र ढलुआ मार्ग गुफा जैसी संरचनाओं के सामने से जाता है। विशाल चट्टानों को काटकर ये स्तम्भ युक्त कक्ष निर्मित किये गए हैं जिन्हें देख ऐसा प्रतीत होता है मानो यहाँ मानव एवं वन्य प्राणी दोनों आश्रय लेते हैं। वे इन संरचनाओं के विषय में क्या धारणा रखते हैं, यह मेरी कल्पना के परे है।

शेषशायी भगवान विष्णु की प्रतिमा

शेषाशायी विष्णु की विशाल प्रतिमा - बांधवगढ़
शेषाशायी विष्णु की विशाल प्रतिमा – बांधवगढ़

पहाड़ी के शीर्ष की ओर जाते समय, आधी पहाड़ी चढ़ते ही हमारी सफारी जीप जलकुंड के समक्ष रुक गयी। यह जलकुंड एक बावड़ी के समान है। इस जलकुंड के पृष्ठभाग में सुप्रसिद्ध शेषशायी की प्रतिमा है। अर्थात्  शेषनाग के ऊपर योगनिद्रा में लीन भगवान विष्णु। ३५ फीट लम्बी इस प्रतिमा को एक ही शिला में उत्कीर्णित किया गया है। १०वीं सदी में निर्मित इस प्रतिमा का श्रेय कलाचुरी राजवंश के राजा युवराजदेव के मंत्री गोल्लक को दिया जाता है।

चरणगंगा का उद्गम
चरणगंगा का उद्गम

इस क्षेत्र में बहती सरिता को चरण गंगा कहते हैं, जिसका अभिप्राय है, भगवान विष्णु के चरणों के समीप से बहती गंगा। इस नदी का प्राचीन नाम वेत्रावली है। यह नदी आज भी वन एवं यहाँ बसे गाँवों के लिए एक महत्वपूर्ण जल स्त्रोत है।

शिव एवं ब्रह्मा

बांधवगढ़ वन में भगवान विष्णु अकेले विराजमान नहीं हैं। यहाँ उनका साथ देने के लिए ब्रह्माजी  एवं शिवजी  भी हैं। विष्णु के समीप एक सादा किन्तु बड़ा शिवलिंग स्थापित है। शिवलिंग के समीप विष्णु की नरसिंह अवतार की प्रतिमा है। मुझे बताया गया कि एक कोने में ब्रह्मा की प्रतिमा है। कोने में कुछ शिल्पकारी थी किन्तु मैं उसमें ब्रह्मा की छवि नहीं देख पायी। जलकुंड के समीप ऊपर जाती सीढ़ियाँ हैं जिससे आप पहाड़ी के ऊपर चढ़कर चारों ओर के परिदृश्यों का विहंगम दृश्य देख सकते हैं। ऊपर से देखने पर आपको जलकुंड के चारों ओर छोटी छोटी अर्धगोलाकार सुन्दर सीढ़ियाँ दिखाई देंगी। चारों ओर के वृक्षों के जल पर पड़ते प्रतिबिम्ब अप्रतिम दृश्य प्रस्तुत करते हैं। ये प्रतिबिम्ब पुनः आपको स्मरण करा देते हैं कि आप अब भी वन में ही हैं।

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मुझे ज्ञात हुआ कि पहाड़ी पर अधिक ऊपर जाने पर दुर्ग के विभिन्न भागों में विष्णु के अनेक अवतारों की प्रतिमाएं उत्कीर्णित हैं।  विभिन्न सूत्रों के अनुसार दिवाली एवं जन्माष्टमी के अवसरों पर शेषशैय्या के समीप उत्सव आयोजित किये जाते हैं। ये दोनों दिवस विष्णु के दो अवतारों से सम्बंधित हैं, राम एवं कृष्ण। किन्तु वन विभाग के कड़े नियमों देखते हुए मुझे ऐसा प्रतीत नहीं होता कि यहाँ भव्य स्तर पर उत्सव आयोजित किये जाते होंगे। मैंने मध्यप्रदेश पर्यटन विभाग के वेबस्थल पर कबीर मेले के विषय में पढ़ा था जो दिसंबर मास में पहाड़ी के ऊपर मनाया जाता है। किन्तु वहां कोई मुझे यह जानकारी नहीं दे सका कि ये उत्सव अब भी मनाया जाता है अथवा नहीं।

बांधवगढ़ के भीतर के गाँव

बांधवगढ़ की पारंपरिक कलाकारी
बांधवगढ़ की पारंपरिक कलाकारी

मेरे बांधवगढ़ भ्रमण की कालावधि में एक दुपहरी हम रान्छा गाँव गए जो हमारे होटल किंग्स लॉज से अधिक दूर नहीं था। हमने पैदल भ्रमण करते हुए इस गाँव को समीप से देखा। पाठशाला का भवन किंचित जीर्ण था किन्तु वहां के घर सुन्दर थे। मुझे हमारे परिदर्शक के स्नेही, श्रीमती मुन्नी के घर के भीतर जाने का अवसर प्राप्त हुआ। उनका घर विशाल था। परिसर में कुआँ एवं खेत भी थे। मुन्नीजी अपने नातिन की देखभाल करते हुए अपने बड़े घर, कुआँ व खेतों की देखरेख भी कर रही थीं। उनके घर में अप्रतिम रूप से सजा गलियारा था। प्रत्येक कक्ष के प्रवेश द्वार को प्लास्टर अथवा गचकारी द्वारा अलंकृत किया गया था। द्वार के चौखट के ऊपरी भागों पर मिट्टी की उभरी हुई शिल्पकारी हैं। हमें शीघ्र ही यह ज्ञात हुआ कि इन रंग-बिरंगी प्रतिमाओं को घर के कर्ता पुरुष अर्थात् मुन्नी जी के पतिदेव ने उत्कीर्णित किया है।

चूल्हा
चूल्हा

हम घर के गलियारों में घूमते हुए उस पर किये गए कलाकारी को सराहते जा रहे थे। इस प्रकार के घर को समीप से देखना हमारे भूतकाल के अवशेषों को देखने के समान था। मिट्टी के चूल्हे, अब भी उपयोग में लाया जा रहा कुआं इत्यादि हमें हमारे पूर्वकाल का स्मरण करा रहे थे।

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रान्छा गाँव के इस घर पर की गयी कलाकारी को देख कर मुझे मध्यप्रदेश के सरगुजा जिले की प्रसिद्ध कलाकार सोनाबाई रजवार का भी स्मरण हो आया जिनकी अद्भुत कला का उदहारण मैंने रायपुर के पुरखौती मुक्तांगन में देखा था। यहाँ की कलाशैली भी उसी प्रकार की है जिसमें गचकारी द्वारा भित्तियों एवं द्वार के चौखटों पर उभरी हुई आकृतियाँ चित्रित की गयी हैं। यद्यपि दोनों कलाकृतियों के स्तरों में भिन्नता थी तथापि ये कलाकृतियाँ छत्तीसगढ़ समेत इस सम्पूर्ण क्षेत्र की उत्तम लोककला का स्पष्ट अनुमान प्रदान करती हैं। ये कलाकृतियाँ यह दर्शाती हैं कि कैसे इस क्षेत्र के आदिवासी अपने सादे घरों को अपनी कला के रूप में स्वयं का एक अस्तित्व प्रदान करते हैं। कैसे गाँव के स्त्री-पुरुष अपनी रचनात्मकता को उजागर करते हुए अपनी कलाक्षमता को गर्व से प्रदर्शित करते हैं, यह अनुसरणीय है।

बांधवगढ़ की बैगा जनजाति

नृत्य की वेशभूषा में बैगा जनजाति के सदस्य
नृत्य की वेशभूषा में बैगा जनजाति के सदस्य

मेरी तीव्र अभिलाषा रहती थी कि मैं मध्य भारत के कुछ आदिवासी जनजातियों से भेंट कर सकूं। मेरी यह अभिलाषा छोटी मात्रा में उस दिन पूर्ण हुई जब बैगा जनजाति के कुछ सदस्यों से मेरा साक्षात्कार हुआ। यद्यपि मैं उनके गाँवों के दर्शन नहीं कर सकी, तथापि हमारे आयोजक ‘पगडंडी सफारी’ ने एक नृत्य प्रदर्शन का आयोजन किया जिसमें बैगा जनजाति के सदस्यों ने कुछ पारंपरिक नृत्यों का प्रदर्शन किया था। उन्होंने विवाह समारोहों में गाये जाने वाले पारंपरिक गीतों पर लोकनृत्य किये। वे लयबद्ध गति से गोलाकार आकृति में घूमते हुए नृत्य कर रहे थे। कुछ क्षणों के पश्चात उनकी मुद्राएँ हमें भी समझ में आने लगीं। हममें से कुछ ने उनके साथ नृत्य करने की पहल की। उनकी मुद्राएँ भले ही समझ आ जाएँ किन्तु उन्हें प्रदर्शित करने की शक्ति हम कहाँ से लायेंगे? शीघ्र ही थक कर हमारे साथी पुनः अपने स्थान पर बैठ गए। नृत्य के अंतिम भाग में नृत्य संघ के पुरुष सदस्यों ने आश्चर्यजनक करतब प्रदर्शित किये जिन्हें देख हमारी आँखें फटी की फटी रह गयीं।

बैगा जनजाति का भव्य रूप

दो दिवसों के पश्चात हमें बैगा जनजाति के सदस्यों को उन के भव्य परिधान एवं अलंकरण के साथ देखने का अवसर प्राप्त हुआ। उनकी भव्य केशसज्जा, वैभवशाली आभूषण तथा रंगबिरंगे वस्त्र व परिधान अद्भुत व दर्शनीय थे। स्त्रियों ने गले में जो चाँदी के हार धारण किये थे उन्हें सुतिया कहते हैं। मुझे वे हंसली समान प्रतीत हो रहे थे। वयस्क स्त्रियों व पुरुषों ने टखने में मिश्र धातु द्वारा निर्मित भारी कड़े पहने हुए थे। मुझे बताया गया कि बैगा आदिवासी ये कड़े तभी धारण करते हैं जब उन्हें अपने परिवार एवं समाज के अनुभवी व सयाना माना जाता है। अतः आप किसी भी बैगा युवक अथवा युवती को यह कड़ा धारण करते नहीं देखेंगे। यह एक प्रकार का संकेत है कि कड़ा धारक बैगा समाज का एक सम्माननीय व्यक्तित्व है। उनके परिधानों ने भी मेरा ध्यान आकर्षित किया। उनकी देह पर वस्त्रों की अनेक परते थीं। मध्य भारत के उष्ण तापमान में आदिवासी जीवन जीते हुए ऐसे वस्त्रों का परिधान अचरज कारक है। मैं सोच में पड़ गयी कि क्या ये उनके दैनिक वस्त्र हैं अथवा उन्होंने प्रदर्शन के लिए इन्हें धारण किया है?

जंगल में बैगा जनजाति के पुरुष
जंगल में बैगा जनजाति के पुरुष

मेरे सहयात्री पुनीत ने मेरी शंकाओं की पुष्टि की। बैगा जनजाति ने ऐसे भारी परिधानों को नृत्य प्रदर्शनों के कारण स्वीकार किया है। अन्यथा वे इस प्रकार के वस्त्र धारण नहीं करते हैं। सामान्य जनजीवन में ना स्त्रियाँ सर पर तुरे धारण करती हैं, ना ही पुरुष भारी अंगरखे धारण करते हैं। ना जाने केवल प्रदर्शन के लिए उन्होंने यह रूपांतरण क्यों किया तथा वे किससे प्रभावित हुए है? ऐसे अनुभवों से यह प्रश्न उठता है कि वास्तव में प्रामाणिक एवं मूल परंपरा क्या है? क्या हम परिकल्पित अवधारणाओं को इतना महत्त्व देते हैं कि मनुष्य अपनी परंपरा को त्याग कर काल्पनिक व्यक्तित्व को धारण कर ले?

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मैंने बैगा जनजाति के एक पुरुष को उसके मूल पारंपरिक परिवेश में देखा जब वह वन्य क्षेत्र के भीतर छोटे छोटे पौधे बीन रहा था। उसके सर पर बड़ी टोपी, कटि पर छोटी धोती, हाथ में कुल्हाडी थी तथा कंधे पर कपडे का बस्ता था।

बांधवगढ़ वन के विभिन्न तत्व

बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान के विभिन्न तत्वों को एक साथ देखकर मेरे मन मस्तिष्क में अनेक प्रश्न उभर कर आ रहे थे। उद्यान का वन्य जीवन, आदिवासी जनसँख्या, गाँव, खेत, विभिन्न कला शैलियाँ, पहाड़ी दुर्ग, मंदिर, जलस्त्रोत एवं इसकी जैव-विविधता, इन सब को एक चौखट में देखने का बांधवगढ़ एक स्वर्णिम अवसर है। इन्हें देख मैं सोच में पड़ गयी कि कब व कैसे हमने प्रकृति के साथ पूर्ण सामंजस्यता से जीवन निर्वाह करने की कला को विस्मृत कर दिया है? प्रकृति कब से हमारे लिए इतनी गौण हो गयी है? मनुष्य ने कब से यह धारणा बना ली है कि वही इस प्रकृति का सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व है तथा वह इसके अन्य तत्वों के साथ मनमाने ढंग से खिलवाड़ कर सकता है? वह भी केवल अपने क्षणभंगुर व्यक्तिगत संतुष्टि व अभिमान के लिए?

इस पर विचार एवं कृत्य अत्यावश्यक है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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होलोंग – जलदापारा राष्ट्रीय उद्यान का जैव विविधता अतिक्षेत्र https://inditales.com/hindi/hollong-jaldapara-rashtriya-udyaan-pashchim-bengal/ https://inditales.com/hindi/hollong-jaldapara-rashtriya-udyaan-pashchim-bengal/#comments Wed, 18 May 2022 02:30:35 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2681

जलदापारा राष्ट्रीय उद्यान को स्थानीय भाषा में दुआर कहते हैं। इस दुआर का एक छोटा सा कोना है, होलोंग। यह भारत के उत्तर-पूर्वी भाग में उस स्थान पर स्थित है जिसे मुर्गी का गला कहते हैं। तकनीकी रूप से यह जैव विविधता अतिक्षेत्र पश्चिम बंगाल राज्य में स्थित है। किन्तु यह भूटान, बांग्लादेश एवं असम […]

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जलदापारा राष्ट्रीय उद्यान को स्थानीय भाषा में दुआर कहते हैं। इस दुआर का एक छोटा सा कोना है, होलोंग। यह भारत के उत्तर-पूर्वी भाग में उस स्थान पर स्थित है जिसे मुर्गी का गला कहते हैं। तकनीकी रूप से यह जैव विविधता अतिक्षेत्र पश्चिम बंगाल राज्य में स्थित है। किन्तु यह भूटान, बांग्लादेश एवं असम से घिरा हुआ है। आप किसी भी दिशा में कुछ किलोमीटर जाएँ तो आप कदाचित अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा पार कर लेंगे। किन्तु पशु क्या करते होंगे? वे कैसे मानवों द्वारा बनाई गई सीमारेखा का सम्मान कर पाते हैं?

जलदापारा राष्ट्रीय उद्यान – जैव विविधता अतिक्षेत्र

जलदापारा राष्ट्रीय उद्यान का सफारी मार्ग
जलदापारा राष्ट्रीय उद्यान का सफारी मार्ग

जोरेथाँग, पेलिङ्ग, गंगटोक तथा कुछ दिन सिलिगुड़ी में, इस प्रकार सिक्किम में कुछ ७ दिवस व्यतीत करने के पश्चात हम जलदापारा राष्ट्रीय उद्यान पहुंचे। हम आगामी कुछ दिवस होलोंग वन विश्रामगृह में रहना चाहते थे। किन्तु इस विश्रामगृह की मांग अत्यधिक होने के कारण हमें यहाँ केवल एक ही रात्रि ठहरने की सुविधा प्राप्त हो पायी। अन्य रात्रियों के लिये हम ने अपनी व्यवस्था जलदापारा विश्रामगृह में की। यह विश्रामगृह ठीक उस मुख्य मार्ग पर स्थित है जो जलदापारा के मध्य से होकर जाती है।

दुआर का वन्य जीवन व्याख्या केंद्र
दुआर का वन्य जीवन व्याख्या केंद्र

दुआर से हमारा साक्षात्कार एक व्याख्या केंद्र से आरंभ हुआ जहाँ हमें वन के विषय में श्रेष्ठ जानकारी प्रदान की गई। हमें यहाँ कैसा व्ययहार करना चाहिए तथा हमें यहाँ क्या क्या देखने की आस रखनी चाहिए इत्यादि। दुआर हाथियों का एक निकास गलियारा है। अतः हमें हाथियों को देख पाने की आस थी। हमें यह भी बताया गया कि दुआर में गेंडे, गौर तथा हिरण भी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। इस व्याख्या केंद्र की दीर्घा में घूमते हुए हमें इस वन के विषय में पर्याप्त दिशानिर्देश प्राप्त हुए।

जलदापारा राष्ट्रीय उद्यान के मदारीहाट प्रवेशद्वार से जीप सफारी

जलदापारा विश्रामगृह से हमने वन में दो बार जीप सफारी की। उन सफ़ारियों में हमने केवल कुछ गेंडों को देखा, वह भी दूर से। वे ऊंचे ऊंचे घास के बीच में लगभग छुपे हुए थे। उन्हे देखने के लिए हमें पर्यवेक्षण अटारी पर चढ़ना पड़ा था। किन्तु दोनों सफ़ारियों में जंगली हाथी हमसे लुक-छुपी का खेल खेलते रहे। हमारी भेंट वन विभाग के एक पालतू हाथी से अवश्य हुई किन्तु वह भी हमारी ओर ध्यान केंद्रित करने का इच्छुक नहीं था। सफारी करते समय हमने चारों ओर अनेक प्रकार के पक्षी देखे। उनके छायाचित्र लेने की हमारी तीव्र इच्छा थी। हमने हमारे गाइड से कहा भी, किन्तु हमारी प्रार्थनाएँ भैंस के आगे बीन बजाने जैसी व्यर्थ हो रही थीं। सजीले हावभाव वाला एक मनमोहक मोर मुझे आज भी स्मरण है। अत्यंत सामान्य घटना बता कर गाइड तब भी नहीं रुका था। जैसा कि बहुधा देखा गया है, उसका लक्ष्य केवल हमें विशाल वनीय पशु दिखाने की ओर केंद्रित था। शेष वन तथा छोटे पशु व पक्षी दिखाने में उसकी अधिक रुचि नहीं थी।

दुआर का चिलापाटा वन

अगले दिन हमने कूच बिहार का भ्रमण करने का निश्चय किया। वहाँ से वापिस आते समय हम चिलापाटा वन के मध्य से आए। वह वन कुछ ही किलोमीटर लंबा था किन्तु उसके मध्य से गाड़ी की सवारी करना किसी जादुई अनुभव से कम नहीं था। हमें पूर्व निर्देश दिए गए थे कि हमें ना तो कहीं रुकना है, ना ही कहीं गाड़ी से उतरना है क्योंकि कहीं से भी जंगली पशु के आने की संभावना सदैव रहती है तथा समीप कोई सहायता केंद्र भी उपस्थित नहीं है। हम धीमी गति से चलती गाड़ी से बाहर देखते हुए मनोरम वनीय परिदृश्यों को आँखों में भर रहे थे। हरेभरे वन ने हमें तीन ओर से घेर रखा था। जी हाँ, ऊंचे ऊंचे बांस के वृक्ष मार्ग के ऊपर मंडप सा बना रहे थे। सूर्यास्त का समय था। वन से अनेक प्रकार के स्वर सुनायी दे रहे थे। मार्ग में अन्य कोई वाहन भी नहीं था। अर्थात् वहाँ मानवी शोर नाममात्र भी नहीं था।

चिलापाटा वन्य मार्ग
चिलापाटा वन्य मार्ग

वन के सर्वाधिक सघन भाग को पार करने के पश्चात हम एक पुलिया के समीप कुछ क्षण रुके। पुलिये के नीचे से एक छोटी जलधारा बह रही थी। जैसे ही हमने अपने पाँव धरती पर रखे, हमें ऐसा आभास हुआ मानो हम भी इसी वन का एक अभिन्न अंग हों। हमें ऐसा लग रहा था मानो हम भी वन के भीतर विचरण कर सकते हैं, वृक्षों की शाखाओं पर रह सकते हैं। मदमस्त चाल से चलते जंगली हाथी एवं इधर उधर कूदते-फाँदते हिरणों के बीच रह सकते हैं। अचानक मन से सम्पूर्ण भय लुप्त हो गया था।

जैसे ही अंधकार छाने लगा, हमने चिलापाटा वन से विदा ली। एक आस लिए यहाँ से निकले कि हम पुनः कभी इस वन के दर्शन करने आ पाएं।

होलोंग वन विश्राम गृह – वन्यजीव उत्साहियों के लिए एक अविस्मरणीय स्थल

तीसरे दिन हम होलोंग वन विश्राम गृह में स्थानांतरित हो गए। यहाँ तक पहुँचने के लिए कुछ बाधाओं को पार करना पड़ता है। सर्वप्रथम एक किराये की गाड़ी द्वारा वन के प्रवेश द्वार तक पहुंचना पड़ता है। यहाँ आपके पहचान पत्र की जांच की जाती है। तत्पश्चात आपके पहचान पत्र के साथ आपका छायाचित्र लिया जाता है। इसके पश्चात वन विभाग की गाड़ी आपको विश्रामगृह तक ले जाती है।

होल्लोंग जलदापारा का वन विश्राम गृह
होल्लोंग जलदापारा का वन विश्राम गृह

होलोंग वन विश्राम गृह को देख ऐसा आभास होता है मानो किसी शिकारी के प्राचीन बंगले को परिवर्तित कर इस विश्रामगृह की रचना की गई है। इस विश्रामगृह में गिने-चुने ही कक्ष हैं। उनमें से कक्ष क्रमांक ५ की मांग सर्वाधिक है क्योंकि यहाँ से सीधे वन का दृश्य प्राप्त होता है। यदि आपको इस कक्ष में ठहरने का अवसर प्राप्त हुआ तो आप अपने कक्ष में बैठकर भी वन एवं वहाँ की गतिविधियों को ऐसे देख सकते हैं मानो आप एक वन्यजीव चलचित्र देख रहे हों। अन्य पर्यटकों को भी इसी प्रकार का अनुभव प्राप्त कराने के लिए विश्रामगृह में एक सामूहिक क्षेत्र है जहाँ से आप भी सीधे वन के परिदृश्यों का अवलोकन कर सकते हैं। हमारा भाग्य अच्छा था जो हमें इस कक्ष क्रमांक ५ में ठहरने का अवसर प्राप्त हुआ। इसका कारण यह था कि उस दिन इस विश्रामगृह में पहुँचने वाले प्रथम पर्यटक हम थे। जी हाँ। आपने सही अनुमान लगाया। जो सर्वप्रथम यहाँ पहुँचकर उस कक्ष की मांग करे, उसे ही यह कक्ष दिया जाता है।

होलोंग वन विश्राम गृह भी अन्य वन्यजीव अभयारण्य के भीतर स्थित अतिथिगृहों के समान विशेष है जहाँ सूर्यास्त के पश्चात आपको अतिथिगृह के भीतर ही सुरक्षित कर दिया जाता है। रात्रि के समय गौर तथा गेंडों जैसे जंगली पशु विश्रामगृह के परिसर में स्वच्छंद विचरण करने आ सकते हैं। अतः आपको कड़े निर्देश दिए जाएंगे कि आप सूर्यास्त के पश्चात विश्रामगृह की चारदीवारी के भीतर ही रहें। चिड़ियाघर में तो पशु-पक्षी पिंजड़े में रखे जाते हैं तथा आप उन्हे बाहर से देखते हैं। इसके विपरीत, यहाँ जैसे ही अंधकार छाता है, आप पिंजड़े में बंद तथा जंगली पशु आपको देखने दूर से आते हैं।

होलोंग वन विश्राम गृह में भोजन की अत्यंत मूलभूत सुविधा है तथा भोजन निर्धारित समय पर ही परोसा जाता है।

होलोंग के जलदापारा राष्ट्रीय उद्यान के वन्यजीव

एकल सींग वाला गैंडा - जलदापारा राष्ट्रीय उद्यान
एकल सींग वाला गैंडा

होलोंग वन विश्राम गृह के कर्मचारी अत्यंत जागरूक हैं तथा रात्रि में भी आपको जंगली पशु दिखाने से नहीं चूकते। हम जब रात्रि का भोजन कर रहे थे, हमें सूचना दी गई कि सामने के बगीचे में कई गौर आ गए हैं। हम सब अपना भोजन छोड़कर उन्हे देखने के लिए दौड़ पड़े। विश्रामगृह में इस प्रकार रात्रि में आये जीवों को न्यूनतम प्रकाश में दिखाने की अत्यंत रोचक व्यवस्था है। रात्रि के भोजन के पश्चात निद्रा के अतिरिक्त अधिक कुछ गतिविधि नहीं रहती। जैसे ही हम निद्रामग्न हुए, किसी कर्मचारी ने हमारे द्वार पर आघात कर हमें जगा दिया क्योंकि वह हमें पिछवाड़े बगीचे में आए कुछ गेंडे दिखाना चाहता था। घूमते घूमते गेंडे भोजन कक्ष के समीप तक आ गए थे। १० से १२ फीट की दूरी से, अर्थात् अत्यंत निकट से हमने उन्हे देखा, वह भी बिना किसी भय के क्योंकि हम भीतर थे तथा वे बाहर। हमारी उपस्थिति से उन्हे किसी भी प्रकार की बाधा उत्पन्न होती प्रतीत नहीं हो रही थी। मैंने अनुमान लगाया कि वे अचंभित पर्यटकों  की उपस्थिति से अभ्यस्त होंगे। अततः यह विश्रामगृह सदैव भरा जो रहता है।

हिरण
हिरण

विश्रामगृह के बगीचे एवं वन के मध्य से एक छोटी जलधारा बहती है। जलधारा के उस ओर एक छोटा सा खुला क्षेत्र है। प्रत्येक दिवस प्रातःकाल में विश्रामगृह के कर्मचारी यहाँ नमक के ढेर रखते हैं। पशु एवं पक्षी इस नमक को खाने के लिए आते हैं। मैंने इससे पूर्व अनेक वन्यजीव अभयारण्यों का भ्रमण किया है किन्तु इस प्रकार नमक रखने की प्रथा सर्वप्रथम देख रही थी। सम्पूर्ण दिवस एक-दो गेंडे विश्रामगृह के आसपास विचरण करते रहे। थोड़े अंतराल में हमें गौर तथा जंगली सूअर भी दिख जाते थे। किन्तु हाथी अब भी हमसे दूर ही थे।

होलोंग के वन्यजीवों का विडिओ

होलोंग वन विश्राम गृह में हमें एकल-सींग गेंडे, गौर तथा अनेक प्रकार के पक्षी दृष्टिगोचर हुए जिनका एक छोटा सा विडिओ चलचित्र आपके समक्ष प्रस्तुत कर रही हूँ। मेरा सुझाव है कि उत्तम दर्शन हेतु आप यह विडिओ HD पद्धति में देखें। आप हमारा यात्रा विडिओ इंडिटेल के यूट्यूब चैनल में भी देख सकते हैं।

एकल-सींग गेंडे का विडिओ

इस विडिओ में आप एकल-सींग गेंडों को स्वच्छंद विचरण करते एवं घास खाते देख सकते हैं। जंगली जीव किस प्रकार अपनी सुरक्षा के प्रति सजग रहते हैं, इसका अनुमान आप उनके कानों की हलचल देख कर लगा सकते हैं।

भारतीय गौर का विडिओ

इस विडिओ में देखिए कि किस प्रकार एक जंगली भारतीय गौर लवणों की आपूर्ति हेतु नमक के ढेर की ओर आया, तत्पश्चात नमक खाकर जल पीने के लिए जलधारा की ओर चला गया। अपने मार्ग पर आगे बढ़ने से पूर्व किस प्रकार उसने अपने आसपास की स्थिति का सर्वेक्षण किया, यह भी आपके ध्यान में आएगा।

जलदापारा राष्ट्रीय उद्यान के पक्षी

जलदापारा राष्ट्रीय उद्यान में हमें कुछ पक्षी देखने की आशा अवश्य थी किन्तु जो हमने देखा उसके लिए भी हम कदापि तैयार नहीं थे। हमने हजारों की संख्या में पीले पैरों वाले हरे कबूतर अर्थात् हरियाल पक्षी नाचते व फुदकते देखे। वे नमक के ढेरों पर बैठते थे, तत्पश्चात एक साथ आकाश में उड़ जाते थे जिसके पश्चात फिर से नमक के ढेरों पर आकर किंचित सुस्ताते थे। हरियाल के विशाल झुंड में अनेक प्रकार के जंगली हरियाल पक्षी थे, जैसे सादा हरियाल, मोटी चोंच वाला हरियाल, पीले पाँव वाला हरियाल, नारंगी गले वाला हरियाल इत्यादि।

नमक का आनंद लेते रंग बिरंगे पक्षी
नमक का आनंद लेते रंग बिरंगे पक्षी

तोते भी हरियालों के समान व्यवहार कर रहे थे। तोतों की भी अनेक प्रजातियाँ हमें यहाँ देखने मिली। उनमें ढेलहरा तोते, लाल गले के तोते, टुइयाँ सुग्गा, हीरामन तोते, मदना तोते, लाल चोंच का साधारण तोता, कुसुमशीर्ष सुग्गा इत्यादि सम्मिलित थे।

नदी के आसपास मोर छलांग लगा रहे थे। उन्हे देख अत्यंत आनंद आ रहा था। वे नदी तक चलकर जाते थे, जल के घूंट भरते थे तथा उड़कर नदी के उस पार पहुँच जाते थे। उनकी प्रत्येक क्रिया में उल्हास कूट कूट कर भरा हुआ था। उन्हे देख हमें भी उनके साथ प्रफुल्लित होने की इच्छा होने लगी थी।

होलोंग के पक्षियों का विडिओ

हजारों की संख्या में नमक चुगते अनोखे जंगली पक्षी आहट होते ही उड़ जाते थे तथा सब शांत होते ही उड़कर वापिस आ जाते थे। इन्ही सुंदर क्षणों को इस विडिओ के माध्यम से आपके समक्ष प्रस्तुत कर रही हूँ। मेरा सुझाव है कि उत्तम दर्शन हेतु आप यह विडिओ HD पद्धति में देखें।

एक नीलकंठ पक्षी बड़े ही ठाठ से एक शाखा पर बैठ था। शहरी नीलकंठों के विपरीत उसमें किसी भी प्रकार की आकुलता नहीं थी। वृक्षों के अनावृत शाखाओं पर अनेक रंगबिरंगे पक्षी बैठे थे। उनके एवं हमारे मध्य के अंतराल से अबाधित, हमारा कैमरा प्रफुल्लित होकर उनके छायाचित्र ले रहा था। जंगल के विषय में हमने जो भी पढ़ा था अथवा दूरदर्शन में देखा था वह सब जीवंत होकर हमारे समक्ष उपस्थित हो गया था।

नीलकंठ
नीलकंठ
चील
चील

चूंकि पशु एवं पक्षी अपने स्थानों पर ही क्रीड़ा कर रहे थे, हमें उनके छायाचित्र एवं चलचित्र लेने में कठिनाई नहीं हुई।

हाथी की सफारी

दूसरे दिवस हमने हाथी की प्रातःकालीन सफारी की। हाथी की पीठ पर बैठकर, उस ऊंचाई से हमने एक घंटे में जो जंगल का दृश्य देखा, उससे जंगल का एक भिन्न स्वरूप हमारे समक्ष प्रस्तुत हुआ। उथले जल एवं ऊंचे ऊंचे घास को चीरते हुए हाथी आगे बढ़ रहा था। कई बार हमें वृक्षों की शाखाओं को हाथों से पकड़ कर उनसे स्वयं को बचाना पड़ रहा था। जब हाथी तालाब के उथले जल में चल रहा था तब उसके प्रत्येक पग पर मेरी हृदयगति बढ़ जाती थी। जब वह ऊंची-नीची सतह पर चल रहा था तो प्रत्येक क्षण मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मैं उसकी पीठ पर से नीचे गिर जाऊँगी। महावत मुझे सांत्वना दे रहा था कि हाथी की पीठ पर से साधारणतः कोई नीचे नहीं गिरता है।

हाथी की सवारी
हाथी की सवारी

हाथी की सफारी में हमें केवल पक्षी ही दृष्टिगोचर हुए। स्वाभाविक ही है, हाथी की पीठ पर बैठकर हम वृक्षों की ऊपरी शाखाओं के सम्मुख थे। उस ऊंचाई पर, जंगल के ऊपरी परत का भाग बनकर ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो हम वृक्षों से आमने-सामने चर्चा कर रहे हों।

जलदापारा जंगल से मिलाते रास्ते
जलदापारा जंगल से मिलाते रास्ते

उस समय हम जंगल के जीवन को सर्वाधिक समीप से अनुभव कर रहे थे। जंगल के जीवन से हमारा पूर्ण सामंजस्य स्थापित हो रहा था। वन्यजीवन का यह अप्रतिम अनुभव मेरे मस्तिष्क में सर्वाधिक प्रगाड़ स्मृति के रूप में सदा के लिए अंकित हो गया है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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घुघुआ जीवाश्म उद्यान में भारत के प्राचीनतम निवासियों से एक भेंट https://inditales.com/hindi/ghughua-jeevashm-udyaan-madhya-pradesh/ https://inditales.com/hindi/ghughua-jeevashm-udyaan-madhya-pradesh/#comments Wed, 30 Mar 2022 02:30:08 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2632

मेरी प्रत्येक यात्रा मेरे लिए नवीन अनुभव का भण्डार लेकर आती है। इस वर्ष मेरी मध्य प्रदेश यात्रा के समय मुझे बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान एवं कान्हा राष्ट्रीय उद्यान के मध्य एक अनोखा व अद्वितीय अनुभव प्राप्त हुआ। मार्ग में हम एक स्थान पर कुछ क्षणों के लिए रुके थे। जो स्थान मुझे आरम्भ में किंचित […]

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मेरी प्रत्येक यात्रा मेरे लिए नवीन अनुभव का भण्डार लेकर आती है। इस वर्ष मेरी मध्य प्रदेश यात्रा के समय मुझे बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान एवं कान्हा राष्ट्रीय उद्यान के मध्य एक अनोखा व अद्वितीय अनुभव प्राप्त हुआ। मार्ग में हम एक स्थान पर कुछ क्षणों के लिए रुके थे। जो स्थान मुझे आरम्भ में किंचित विश्राम के लिए लिया गया अल्पावकाश प्रतीत हुआ, वह स्थान वास्तव में एक अचम्भा था। कदाचित वह विश्व का सर्वाधिक प्राचीन स्थान हो सकता है। वह घुघुआ जीवाश्म उद्यान था।।

घुघुआ जीवाश्म उद्यान
घुघुआ जीवाश्म उद्यान

वहां मुझे ६.५ करोड़ वर्ष पूर्व, गोंडवाना महाद्वीप के काल के जीवाश्म देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उन्हें देखते ही मेरी उत्सुकता तीव्र हो उठी। मैंने उनके विषय में जानने के लिए किसी जानकार परिदर्शन को ढूँढना आरम्भ कर दिया। उद्यान के टिकट के साथ हमें एक परिदर्शक अर्थात् गाइड भी उपलब्ध कराया गया।

घुघुआ जीवाश्म उद्यान – एक राष्ट्रीय उद्यान

घुघुआ जीवाश्म उद्यान एक मुक्त आँगन है। जो वस्तु ६.५ करोड़ वर्ष से हर प्रकार के थपेड़ों को सहन कर चुकी हो, उसे खुले आकाश में कौन नष्ट कर सकता है? किन्तु शीघ्र ही मुझे इसका उत्तर भी प्राप्त हो गया। इस अनमोल धरोहर को हमारी ही पीढ़ी ने सस्ते रंगों से चिन्हित कर अत्यंत क्षति पहुंचाई है। यह एक विस्तृत उद्यान है जहां घास के विशाल मैदान हैं। पगडंडी के दोनों ओर वृक्ष हैं। इन प्राचीन अनमोल धरोहरों का अवलोकन करते हुए आप उद्यान में शांति से समय व्यतीत कर सकते हैं।

विभिन्न वृक्षों के जीवाश्म

जीवाष्म मुक्तांगन संग्रहालय
जीवाष्म मुक्तांगन संग्रहालय

विशेष रूप से निर्मित गोलाकार मंचों पर विभिन्न वृक्षों के जीवाश्मों को रखा गया है। एक छोटे सूचना पटल पर जीवाश्मों के विषय में लघु जानकारी दी गई है किन्तु वह कदाचित प्रदर्शित जीवाश्मों के विषय में ना हो। जीवाश्म कैसे बनाते हैं तथा उनका हमारे जीवन में क्या महत्त्व है, इस पर संक्षिप्त में जानकारी दी गयी है। हमारे गाइड ने वृक्षों की परतों के मध्य फंसे कुछ कीटों एवं बीजों की ओर संकेत किया जो अपने स्थान पर ही जीवाश्म में परिवर्तित हो गए थे। उसने अनेक जीवाश्मों पर पत्तियों के चिन्हों की ओर संकेत किया। देखने पर ये जीवाश्म वृक्ष के तने के टुकड़े प्रतीत होते हैं किन्तु स्पर्श करने पर अनुभव होता है कि वे शिला बन चुके हैं। जहां वृक्ष का अनुप्रस्थ परिच्छेद(cross-section) दृष्टिगोचर होता है, वहां वह स्फटिक के अन्तर्भाग सा प्रतीत होता है। वह उज्जवल रूप से चमकीला होता है।

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इस उद्यान में सर्व ओर जीवाश्म रखे हुए हैं। मैं नहीं जानती कि प्रत्येक जीवाश्म का कोई लेखा-जोखा रखता है अथवा उद्यान में आये पर्यटक कुछ टुकड़े उठा भी लें तो किसी को इसकी भनक भी ना हो। यद्यपि इस उद्यान में अधिक पर्यटक नहीं आते हैं, तथापि उन जीवाश्मों का व्यवस्थित रूप से संरक्षण व लेखा-जोखा किया जाना चाहिए।

वृक्ष तले वृक्षों के जीवाश्म
वृक्ष तले नए पुराने का मिलन

जीवाश्म उद्यान की स्थापना सन् १९७० में डॉ. धर्मेन्द्र प्रसाद ने की थी जो उस समय मध्य प्रदेश के मंडला जिले के सांख्यिकीय अधिकारी तथा जिला पुरातत्व इकाई के मानद अधिकारी थे। इस उद्यान को सन् १९८३ में राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया। इस उद्यान की विशेषता वनस्पतियों का वह गौरवशाली इतिहास है जिसका यह प्रतिनिधित्व करता है। यहाँ विभिन्न प्रकार के अनेक पौधों, पत्तियों, फलों, बीजों तथा सीपियों के जीवाश्म हैं।

जीवाश्म हुआ एक प्राचीन वृक्ष
जीवाश्म हुआ एक प्राचीन वृक्ष

उनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, ताड़ का जीवाश्म। मुझे बताया गया कि यहाँ स्थित अनेक जीवाश्म ऐसे वृक्षों के हैं जो इस क्षेत्र के स्थानीय उपज नहीं हैं। यह दीर्घकालीन जलवायु परिवर्तन की ओर संकेत करते हैं।

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प्राचीन ताड़ का पेड़
प्राचीन ताड़ का पेड़

इन जीवाश्मों के सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रदर्शनों में नीलगिरी वृक्ष का एक जीवाश्म भी सम्मिलित है जिसे इस प्रकार का सर्वाधिक प्राचीन जीवाश्म माना जाता है। ऐसे वृक्ष ऑस्ट्रेलिया में पाए जाते हैं। ताड़ वृक्ष का जीवाश्म भी अनोखा है क्योंकि यह भी इस क्षेत्र का नैसर्गिक वृक्ष नहीं है। अन्य जीवाश्मों में रुद्राक्ष एवं आंवले के वृक्ष भी सम्मिलित हैं।

नीलगिरी के पेड़ का जीवाश्म
नीलगिरी के पेड़ का जीवाश्म

उद्यान में जीवित जामुन वृक्ष भी हैं। यदि आपकी यात्रा के समय जामुनों का मौसम हो तो आपको ताजे जामुनों का आस्वाद लेने का भी अवसर प्राप्त होगा।

संग्रहालय

संग्रहालय की इमारत के भीतर कुछ प्राचीनतम जीवाश्मों को संरक्षित किया गया है। जीवाश्म बनने की प्रक्रिया को विस्तृत चित्रों व विवरणों समेत दर्शाते हुए कुछ सूचना पटल हैं। जीवाश्मों के विषय में अन्य जानकारी भी दी गयी हैं जैसे, जीवाश्मों के प्रकार इत्यादि। यहाँ का सर्वाधिक अनोखा आकर्षण है, डायनासोर का अंडा, जिसने इस उद्यान को विशेष प्रसिद्धि प्रदान की है।

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घुघुआ जीवाश्म उद्यान में जीवाश्म बनने की प्रक्रिया का चित्रण
घुघुआ जीवाश्म उद्यान में जीवाश्म बनने की प्रक्रिया का चित्रण

आप जब भी कान्हा अथवा बांधवगढ़ या दोनों राष्ट्रीय उद्यानों की यात्रा का नियोजन करें, तब आप गोंडवाना महाद्वीप के इन प्राचीनतम वृक्षों के दर्शन को अपने यात्रा कार्यक्रम में अवश्य सम्मिलित करें। यह भारत का एक अति विशेष उद्यान है जहाँ प्रदर्शित जीवाश्म एक महान शैक्षिकीय अनुभव सिद्ध हो सकते हैं। यह प्रदर्शन आपके भीतर स्थित, प्राचीन युग के प्रति वैज्ञानिक कुतूहलता को जगाता है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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अचानकमार वन्यजीव अभयारण्य से जुड़े उपाख्यान और मिथक, छत्तीसगढ़  https://inditales.com/hindi/achanakmar-vanya-jeevan-abhyaranya-chhattisagrh/ https://inditales.com/hindi/achanakmar-vanya-jeevan-abhyaranya-chhattisagrh/#respond Wed, 29 Dec 2021 02:30:52 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=833

छत्तीसगढ़ के उत्तरी भाग में बसे इस अचानकमार वन्यजीव अभयारण्य में हम देर रात को पहुंचे। यद्यपि उस अंधेरी रात में हम आस-पास के ऊंचे-ऊंचे पेड़ देख सकते थे, लेकिन इसके अलावा हमे वहाँ पर और कुछ नहीं दिखाई दे रहा था। हम जंगल के विभिन्न भागों के प्रवेश स्थलों पर स्थित नाकों को पार […]

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छत्तीसगढ़ के उत्तरी भाग में बसे इस अचानकमार वन्यजीव अभयारण्य में हम देर रात को पहुंचे। यद्यपि उस अंधेरी रात में हम आस-पास के ऊंचे-ऊंचे पेड़ देख सकते थे, लेकिन इसके अलावा हमे वहाँ पर और कुछ नहीं दिखाई दे रहा था। हम जंगल के विभिन्न भागों के प्रवेश स्थलों पर स्थित नाकों को पार करते हुए आगे बढ़ते गए और अंत में अमाडोब आश्रय घर के पास जाकर रुके, जहाँ पर हम ठहरे हुए थे। वहाँ पहुँचते ही आश्रय घर के कर्मचारियों ने बड़ी ही प्रसन्नता से हमारा स्वागत किया। उसके बाद अपने कमरे की ओर जाने से पहले मैंने आश्रय घर के प्रबंधक के साथ थोड़ी बातचीत की।

अचानकमार वन्य प्राणी अभ्यारण्य छत्तीसगढ़
अचानकमार वन्य प्राणी अभ्यारण्य छत्तीसगढ़

उन्होंने मुझे अचानकमार वन्यजीव अभयारण्य में स्थित तथा उसके आस-पास स्थित कुछ महत्वपूर्ण स्थलों के बारे में बताया। यह अभयारण्य एक टाईगर रिजर्व भी है जो बाघ परियोजना का एक भाग है। इस अभयारण्य से जुड़े एक उपाख्यान के अनुसार कहा जाता है कि बहुत साल पहले यहाँ पर एक बाघ द्वारा हुए अचानक आक्रमण के कारण एक अंग्रेज़ व्यक्ति की मौत हुई थी और इसी वजह से इस अभयारण्य को अचानकमार के नाम से जाना जाने लगा।

अचानकमार वन्यजीव अभयारण्य – उपाख्यान और कथाएं

दूसरे दिन सुबह जल्दी उठकर जब मैं बाहर टहलने गयी तो वहाँ का नज़ारा देखकर मुझे एक गहन शांति का आभास हुआ। इस आश्रय घर का पूरा आँगन सागौन, साल और महुए के पेड़ों से गिरे सूखे पत्तों से भरा पड़ा था, जैसे कि अभी-अभी पतझड़ गुजरा हो। वहाँ पर सब कुछ इतना शांत था कि पवन के मंद-मंद झोकों की वह मधुर धुन स्पष्ट सुनाई दे रही थी। इन सूखे पत्तों पर चलते हुए मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे पैरों तले बीता हुआ कल बिछा हुआ है और ऊपर पेड़ों की शाखों पर अंकुरित होते नए पत्ते जैसे आने वाले भविष्य की ओर संकेत कर रहें हो।

विश्राम गृह
विश्राम गृह

इन सूखे पत्तों के बीच महुआ के छोटे-छोटे पीले फूल भी गिरे हुए थे। हमे बताया गया कि यह महुआ का पुष्पणकाल है और इस दौरान यहाँ के सभी स्थानीय लोग पूरे दिन इन फूलों को एकत्रित करने में जुटे हुए दिखाई देते हैं। साल वृक्ष पर भी उज्ज्वलित हरे रंगे के पत्ते अंकुरित हो रहे थे। इनका यह उज्ज्वलित हरा रंग आस-पास खड़े पलाश के पेड़ों के उज्ज्वलित केसरी रंग तथा अन्य पेड़ों के लाल, गुलाबी और पीले रंगों से बहुत विषम सा लग रहा था। कुछ साल के वृक्षों पर तो सफ़ेद फूल भी खिल आए थे। पूरे अभयारण्य में फैले इन ऊंचे-ऊंचे सुंदर से पेड़ों का वह नज़ारा सच में बहुत ही सुखदायक अनुभव था। इनकी छाव में सूर्य की तपती हुई धूप भी जैसे बहुत ही नरम महसूस हो रही थी।

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वन्यजीव अभयारण्य

अचानकमार के घने जंगले
अचानकमार के घने जंगले

अचानकमार वन्यजीव अभयारण्य छत्तीसगढ़ में स्थित 11 वन्यजीव अभयारण्यों में से एक है। 555 वर्ग कि.मी. की जमीन पर फैला हुआ यह वन एक पहाड़ी क्षेत्र है जो सतपुड़ा पर्वतश्रेणी की मैकल पर्वतमाला से घिरा हुआ है। इसे उत्तरीय उष्णकटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वन के रूप में वर्गीकृत किया जाता है यह पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश में स्थित कान्हा राष्ट्रीय उद्यान से जुड़ा हुआ है। कहते हैं कि यहाँ पर बाघ, तेंदुआ, लकड़बग्धा, सियार, सांभर, नीलगाय, गौर और जंगली सांड जैसे अनेक पशु हैं, लेकिन जब हम वहाँ पर गए थे तो हमे वहाँ पर इनमें से एक भी जानवर नहीं दिखा। पर हमे वहाँ बहुत सारे लंगूर और बंदर जरूर दिखे जो एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर छलांग मरते हुए यहाँ-वहाँ खेल रहे थे। वहाँ पर पशुओं के बहुत से झुंड थे जो जंगल में यहाँ-वहाँ चर रहे थे।

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अगर वृक्षों की बात करें तो इस अभयारण्य में आप साल, साजा, तेंदू, बांस, धावड़ा, हल्दू, करौंदा, जामुन, बेल और कतीरा जैसे अनेक पेड़ देख सकते हैं। जिन में साल वृक्षों की संख्या सबसे अधिक है, तो करौंदे के पेड़ों की तरह बांस भी कहीं-कहीं नज़र आ रहे थे। इस जंगल के आंतरिक क्षेत्रों में बसे बहुत से गांवों को जंगल के बाह्यांचल में स्थानांतरित किया जा रहा था। इन गांव वालों द्वारा पीछे छोड़े हुए उनके जीवन की कुछ झलकियाँ अभी भी वहाँ पर थीं, जैसे कि उनके मिट्टी के घर और छोटे-छोटे तालाब।

श्रद्धेय साल वृक्ष

अचानकमार जंगल की सफारी के दौरान हमे उससे जुड़े एक और उपाख्यान के बारे में जानने का मौका मिला। वहाँ पर एक बहुत ही पुराना साल का वृक्ष है, जिस पर साल 1955 और 1990 में बिजली गिरी थी। कहा जाता है कि पहले उसकी ऊंचाई लगभग 155 फीट की थी और चौढ़ाइ 6 फीट की। लेकिन उस दुर्घटना के बाद अब उसकी ऊंचाई सिर्फ 25-30 फीट ही रह गयी है और उसका तना भीतर से बिलकुल खोखला हो गया है। यहाँ के स्थानीय लोग आज भी इस पेड़ की पूजा करते हैं। इस पेड़ के नजदीक जाते समय आपको अपने जूते उतारकर जाना पड़ता है। जो भी स्थानीय व्यक्ति यहाँ से गुजरता है वह इस पेड़ को अपना प्रणाम अवश्य अर्पित करता है। यहाँ तक कि यात्रियों या आगंतुकों को उसका परिचय देने से पहले भी ये लोग इस पेड़ को प्रणाम करते हैं। इन लोगों का मानना है कि उनके आराध्य भगवान बुद्ध देव इसी पेड़ में बसते हैं। उनकी इसी आस्था ने इस पेड़ को एक जीता जागता मंदिर बना दिया है।

साल का विशाल, प्राचीन एवं वन्दनीय वृक्ष
साल का विशाल, प्राचीन एवं वन्दनीय वृक्ष

जैसे कि अधिकतर आदिवासी इलाकों में होता है, यहाँ पर भी आदिवासी लोग इस जंगल के संरक्षक के रूप में यहाँ निवास करते हैं। वे यहाँ पर स्थानांतरणीय खेती भी करते हैं, जिसमें एक सीमित अवधि के लिए वे जमीन के छोटे से टुकड़े पर अपनी खेती करते हैं। और फिर खेती का काम पूर्ण होने के पश्चात उस जमीन को फिर से उपजाऊ बनने के लिए वैसी ही छोड़कर दूसरे स्थान पर चले जाते हैं। कुछ आदिवासी जातियाँ तो खेती करते समय हल का भी उपयोग नहीं करते क्योंकि वे धरती को अपनी माँ के समान मानते हैं।

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इस अभयारण्य की सफारी करने का सबसे अच्छा तरीका है, कि आप बिलासपुर में ठहरे और फिर इस वन के दर्शन करने जाइए। यहाँ की अन्य सुविधाओं की तरह इस अभयारण्य में निवास की योजना भी बहुत सीमित है।

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भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान – खारे जल के मगरमच्छों व रामचिरैयों का बसेरा https://inditales.com/hindi/bhitarkanika-rashtriya-udyaan-odisha/ https://inditales.com/hindi/bhitarkanika-rashtriya-udyaan-odisha/#comments Wed, 21 Oct 2020 02:30:37 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2032

खारे जल के मगरमच्छों एवं रामचिरैयों की दुर्लभ प्रजातियां! मिलना चाहते हैं इनसे? तो आईए चलें ओडिशा के भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान में! गूगल नक्शे में भितरकनिका ढूंढ कर उसे पास से देखें तो ओडिशा के उत्तर-पूर्वी तट पर हरियाली भरा राष्ट्रीय उद्यान/ वन्यजीवन अभयारण्य क्षेत्र देख आपका हृदय भी बागबाग हो जाएगा। पूर्व की ओर […]

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खारे जल के मगरमच्छों एवं रामचिरैयों की दुर्लभ प्रजातियां! मिलना चाहते हैं इनसे? तो आईए चलें ओडिशा के भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान में! गूगल नक्शे में भितरकनिका ढूंढ कर उसे पास से देखें तो ओडिशा के उत्तर-पूर्वी तट पर हरियाली भरा राष्ट्रीय उद्यान/ वन्यजीवन अभयारण्य क्षेत्र देख आपका हृदय भी बागबाग हो जाएगा।

अप्रवाही जल पर नौका विहार - भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान
अप्रवाही जल पर नौका विहार – भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान

पूर्व की ओर बहती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती ब्राह्मणी, वैतरणी, धामरा तथा पथसल नदियां वैश्विक रूप से महत्वपूर्ण इस आर्द्रभूमि का सृजन करती हैं तथा इसे पोसती हैं। ओडिशा के केंद्रपाड़ा जिले में स्थित भारत का दूसरा विशालतम मैंग्रोव पारितंत्र इसी आर्द्रभूमि के क्षेत्र में पोषित होता है। १४५ वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में पसरे इस राष्ट्रीय उद्यान को घेरता हुआ ६७० वर्ग किलोमीटर के वन्यजीवन अभयारण्य का अतिरिक्त क्षेत्र है।

भुवनेश्वर से सड़क-यात्रा द्वारा उदयगिरी, रत्नागिरी तथा ललितगिरी गुफाओं में स्थित बौद्ध धरोहरों के दर्शन करते समय हम एक संध्या ‘सैंड पेबल्स भितरकनिका जंगल रिज़ॉर्ट टेंट हाउस’ परिसर में पहुंचे।

भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान में नौका विहार

दूसरे दिवस प्रातः हम मुंह-अंधेरे ही उठ गए। खारे जल के मगरमच्छों से मिलने का उतावलापन जो हिलोरे मार रहा था। किन्तु वातावरण हमारा साथ निभाने हेतु तत्पर नहीं हुआ। चारों ओर गहन कोहरा छाया हुआ था। धुंध छँटने के लिए हमें दीर्घ काल तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। गाँव की पगडंडियों में पदयात्रा करते समय कुछ मीटर के परे हमें कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा था। हमें पूर्ण कल्पना थी कि खाड़ी के समीप धुंध इससे भी अत्यधिक गहन होगी। लगभग एक घंटे से भी अधिक समय प्रतीक्षा करने के पश्चात हमें वन विभाग के अधिकारियों ने हरी झंडी दिखायी।

भितरकनिका के परिदृश्य
भितरकनिका के परिदृश्य

तब आरंभ हुआ खाड़ियों एवं अप्रवाही जल-धाराओं के जाल में हमारा नौका विहार! हमारी नौका इंजन संचालित नौका थी। इस प्रकार की नौकाओं को इस राष्ट्रीय उद्यान में सवारी करने हेतु अनुमति प्राप्त है। प्रत्येक नौका में लगभग १२ से २० व्यक्ति बैठ सकते हैं। यह जल सतह पर धीमी गति से तैरते हैं ताकि हम आसपास का परिदृश्य देख सकें। इन नौकाओं में शौचालय भी हैं जो एक अत्यंत महत्वपूर्ण सुविधा है।

भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान की खाड़ियों का शांत जल वास्तव में लगभग २० से ३० फीट गहरा है। मानसून एवं ज्वार के समय इसकी गहराई में परिवर्तन हो सकता है। प्रमुख खाड़ी लगभग १०० मीटर चौड़ी हैं। खाड़ी के इस जाल के कुछ भाग सँकरे एवं अत्यंत उथले भी हैं।

भारत के अधिकतर राष्ट्रीय उद्यानों में सिंह, बाघ, जंगली हाथी, गेण्डे, हिरण इत्यादि अत्यंत लोकप्रिय हैं। इसके विपरीत भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान का प्रमुख आकर्षण है खारे जल के शक्तिशाली मगरमच्छ। प्रत्येक कुछ मीटर की दूरी पर आपको छोटे-बड़े मगरमच्छों के झुंड सूर्य स्नान करते दृष्टिगोचर होंगे। यही नहीं, खाड़ी, द्वीप, हरे-भरे अप्रवाही जलक्षेत्र, नभचर तथा घने जंगल, जिनके भीतर आप पदयात्रा कर सकते हैं, सभी आपका मन मोह लेने के लिए आतुर व तत्पर प्रतीत होते हैं।

खारे जल के मगरमच्छ

भारत के खारे जल के मगरमच्छों के लिए सर्वोत्तम प्राकृतिक वास की चर्चा की जाए तो कदाचित भितरकनिका से उपयुक्त स्थल नहीं हो सकता। पोषक अप्रवाही जलक्षेत्र, खाड़ी के जल मार्गों का पर्याप्त जाल, नदियां, बंगाल की खाड़ी, यह सभी उनके लिए प्रचुर संसाधन उपलब्ध कराते हैं। भितरकनिका का यदि कोई निकटतम प्रतियोगी है तो वह है सुंदरबन।

कालिया - खारे जल के मगरमच्छों का एक वयोवृद्ध
कालिया – खारे जल के मगरमच्छों का एक वयोवृद्ध

सन् १९७० तक ओडिशा की नदी प्रणाली में घड़ियाल, मगर एवं खारे पानी के मगरमच्छ, यह तीनों प्रजातियाँ लगभग विलुप्ति की कगार पर आ गए थे। खारे पानी के १०० से भी कम मगरमच्छों से आज १७०० से भी अधिक मगरमच्छों तक की लंबी यात्रा में डाँगमाल की नदी प्रणाली को चार दशकों का समय लग गया। इनमें से अधिकतर मगरमच्छ खोल-ब्राह्मणी नदी संगम से लेकर भितरकनिका-पथसल नदी संगम तक के क्षेत्र में पाए जाते हैं।

सूर्य स्नान करते मगर
सूर्य स्नान करते मगर

खारे पानी के इन विशाल मगरमच्छों के विषय में कुछ रोचक जानकारी:

  • जन्म के समय उनका वजन १०० ग्राम से भी कम होता है। युवावस्था तक पहुंचते पहुंचते उनका वजन लगभग १००० किलोग्राम तक हो जाता है।
  • जन्म से समय एक फुट से भी कम लंबे ये मगरमच्छ २० फीट से भी अधिक लंबे हो जाते हैं।
  • प्रकृति में उनके प्रथम १० वर्ष उनके लिए कदाचित सर्वाधिक दुष्कर समयावधि होती है क्योंकि नवजात शिशुओं में से केवल १% ही परभक्षियों तथा प्राकृतिक आपदाओं से बचकर जीवित रह पाते हैं।
  • वर्षा ऋतु के समय नर एवं मादा मगरमच्छ सहवास करते हैं। अतः यह राष्ट्रीय उद्यान प्रत्येक वर्ष १ मई से ३१ जुलाई तक पर्यटकों के लिए बंद रहता है।
  • यद्यपि सम्पूर्ण वर्ष वयस्क मगरमच्छ अपने क्षेत्र हेतु अत्यंत संवेदनशील रहते हैं तथा मृत्युपर्यंत अपने क्षेत्र हेतु लड़ने के लिए तत्पर रहते हैं, तथापि वही मगरमच्छ वर्षा ऋतु में अत्यंत मिलनसार बन जाते हैं।
  • किसी भी प्रकार का मांस उनका भोजन है तथा विशाल वयस्क मगरमच्छों की भूख केवल बड़े शिकार द्वारा ही शांत होती है।
  • विशाल वयस्क मगरमच्छों के लिए मनुष्य भी उत्तम शिकार है।
  • अत्यंत वेग एवं चपलता से खिसकते हुए वे जल एवं तट पर उपस्थित शिकार को तुरंत अपने जबड़े में पकड़ लेते हैं।
  • उनके जबड़ों की पकड़-शक्ति अन्य स्तनपायियों से अपेक्षाकृत सर्वाधिक शक्तिशाली मानी जाती है। एक बार अपने जबड़े में उसने किसी शिकार को जकड़ लिया तो या तो शिकार को जीवन से हाथ धोना पड़ता है अथवा कम से कम वह भाग खोना पड़ता है जो जबड़े में फंसा है।
  • वे ४ से ५ दर्जन अंडे देते हैं। अंडे देने के लिए वे बहुधा ज्वार के जल सतह से भी ऊपर तक जाते हैं ताकि उनके अंडे सुरक्षित रहें। नर तथा मादा, दोनों मगरमच्छ अंडों से नवजातों के बाहर निकालने तक उनकी सुरक्षा करते हैं। उनके अंडे गोह सरीसृपों का प्रिय भोजन है जो थल पर मगरमच्छों से अधिक चपल होते हैं।
  • मगरमच्छ मछली, केकड़े, पक्षी से लेकर जंगली सूअर, हिरण जैसे स्तनपायियों का शिकार करते हैं।
  • वहीं चील, बाज तथा कनकैयों जैसे गिद्ध मगरमच्छों के नवजात शिशुओं का शिकार करते हैं।

आलसी

सामान्यतः मगरमच्छ इस क्षेत्र के अन्य वन्य जीवों से अपेक्षाकृत सर्वाधिक आलसी प्राणी हैं। भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान में ५ घंटे की सैर में हमने अनेक मगरमच्छों को तट पर आलसियों के समान अनवरत पड़े हुए सूर्य की ऊष्मा का आनंद उठाते देखा। उन्हे देख ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वे हर प्रकार की चिंता से मुक्त हैं। केवल कुछ गिने-चुने मगरमच्छ जल में तैर रहे थे। कदाचित वे भूखे होंगे। इन मगरमच्छों में दो विशालतम नर मगरमच्छ ऐसे हैं जो इस क्षेत्र के प्रत्येक नौका सैर में दृष्टिगोचर होते हैं। स्थानीय गाइड इन्हे कालिया तथा बालिया के नाम से पुकारते हैं।

खारे जल के मगरमच्छों का प्रजनन केंद्र

मगर प्रजनन केंद्र में बढ़ते मगरमच्छ
मगर प्रजनन केंद्र में बढ़ते मगरमच्छ

हमारे द्वारा अभ्यागमन किए गए द्वीपों में से एक द्वीप पर मगरमच्छ प्रजनन केंद्र है। यहाँ मगरमच्छ के नवजात शिशुओं की देखरेख की जाती है। प्रत्येक वर्ष वय के अनुसार उन्हे पृथक कर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है। उनके जीवन के प्रथम १० वर्ष यहाँ उनकी प्रत्येक आवश्यकता का ध्यान रखा जाता है, जैसे उनकी सुरक्षा, भोजन, चिकित्सकीय ध्यान, वन्य क्षेत्र के अन्य प्राकृतिक आपदाएं इत्यादि। यह क्षेत्र पशु चिकित्सकों के लिए एक अध्ययन केंद्र भी है। १० वर्ष की आयु के पश्चात मगरमच्छों को सावधानी से वन्य क्षेत्र में छोड़ा जाता है। उस समय इस तथ्य का ध्यान रखा जाता है कि किसी आक्रामक वयस्क मगरमच्छ के अधिकृत क्षेत्र का उल्लंघन ना हो।

प्रजनन केंद्र के दर्शन के लिए १० से १५ मिनटों का अतिरिक्त समय लगता है। आप यहाँ विभिन्न वय समूहों के शिशुओं का विकास देख सकते हैं।

गौरवर्ण गोरी मगरमच्छ
गौरवर्ण गोरी मगरमच्छ

समीप ही एक जल कुंड में हमें एक वर्णहीन मगरमच्छ दिखाई दिया जिसे गोरी कहा जाता है। उसकी त्वचा का रंग अत्यंत हल्का, किंचित पीले रंग की आभा लिए हुए था। इसी रंग के कुछ शावक हमें वन्य क्षेत्र में भी दृष्टिगोचर हुए थे।

संग्रहालय

इस द्वीप पर एक छोटा शिक्षाप्रद संग्रहालय है जहां १९.८ फीट का कंकाल रखा है। यह इस राष्ट्रीय उद्यान में प्राकृतिक मृत्यु प्राप्त खारे जल के एक मगरमच्छ का कंकाल है। इसके समीप खड़े होने पर इसके विशाल आकार का आभास होता है। आप इसकी शरीर रचना समीप से जांच सकते हैं। प्रथम दृष्टि में यह एक सटीक यांत्रिक नमूना प्रतीत होता है। सूक्ष्मता से जाँचने पर आप प्रकृति की इस उत्तम रचना की प्रशंसा किए बिना नहीं रहेंगे।

मृत मगरमच्छों के कंकाल
मृत मगरमच्छों के कंकाल

किसी जीवित मगरमच्छ के समीप खड़े होने का साहस तो हममें से किसी में भी नहीं है। वैसे भी, ऐसा साहस करना साक्षात मृत्यु को आमंत्रित करने के समान है। अतः ऐसा करने का विचार भी मस्तिष्क में ना लाएं। अन्यथा कुछ क्षणों का रोमांच जीवन को मृत्यु में परिवर्तित कर सकता है। इस राष्ट्रीय उद्यान के अवलोकन के समय उद्यान अधिकारी इस विषय पर अत्यंत भार देते हैं तथा नौका से उतर कर जल के अत्यंत समीप जाने की अनुमति कदापि नहीं देते। किन्तु किसी मगरमच्छ के समीप खड़े होने की अभिलाषा आप संग्रहालय के इस कंकाल के समीप खड़े होकर अवश्य पूर्ण कर सकते हैं।

मगरमच्छ का खुला मुख
मगरमच्छ का खुला मुख

इस संग्रहालय में मगर, हिरण, डॉल्फिन इत्यादि के कंकालों के कपाल भी रखे हैं। इनके आकारों की विशालता की उपेक्षा करना संभव नहीं। इसने अतिरिक्त भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान में पाए जाने वाले जीव-जन्तु, पक्षी तथा वनस्पतियों के भी चित्र यहाँ आप देख सकते हैं। संग्रहालय के अवलोकन हेतु औसतन १० से २० मिनटों का समय पर्याप्त है। केवल एक वस्तु की कमतरता का आभास हुआ। उद्यान की सर्व जानकारी प्रदान करते किसी विवरणिका की जिसे पर्यटक अपने साथ ले जा सकें।

जलपान

उद्यान में नौका विहार करते हुए हम जिस समय इस द्वीप पर पहुंचे, हम बहुत थक गए थे। द्वीप पर उपलब्ध पेयजल, शौचालय तथा बैटरी-चालित रिक्शा की सुविधाएं देख मन प्रसन्न हो गया। इनसे भी अधिक मन प्रफुल्लित हुआ ताजे कोमल नारियलों की बिक्री करते ठेलों को देख कर। हमने ताजे नारियल का जल पीकर अपनी क्षुधा शांत की। देह में एक बार फिर स्फूर्ति आ गई। वैसे भी हमारे दोपहर के भोजन को अब भी एक घंटा शेष था।

अवश्य पढ़ें: भारत में जंगल सफारी – कब, कहाँ, क्या और कैसे देखें?

जंगल में पदयात्रा

हम द्वीप के जंगल में स्थित घने मैन्ग्रोव में ३ से ४ किलोमीटर तक पैदल चले। हमारी सुविधा के लिए  वन विभाग ने स्पष्ट पद-मार्ग निश्चित किए हैं। साथ ही वन विभाग ने गाइड अथवा पथ-प्रदर्शक भी नियुक्त किए हैं जिनके बिना इस जंगल में पद-यात्रा करना लगभग असंभव है। मेरा सुझाव है कि आप इन पगडंडियों में बिना गाइड के जाने की चेष्टा भी ना करें। ये पगडंडियाँ पर्यटकों के लिए अत्यंत भ्रामक सिद्ध हो सकते हैं तथा वे सहज ही उनमें खो सकते हैं।

भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान के जंगल
भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान के जंगल

इन जंगलों में नाग, अजगर, जंगली सूअर, गोह, चितकबरे हिरण तथा कई अन्य जंगली पशुपक्षी हैं। अतः सावधानी बरतें तथा निर्धारित पद-मार्गों पर ही चलें। सर्पों के लिए आँखें खुली रखें। हमें यात्रा के समय सर्प नहीं दिखे, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि आप उनकी उपेक्षा करें।

जंगल में विचरण करते हिरण
जंगल में विचरण करते हिरण

घने वृक्षों के हरे-भरे छत्र के बीच से छन छन कर आती सूर्य की किरणें, वृक्षों के तनों पर लिपटी लताएं, मार्ग में अनेक छोटे छोटे तालाब तथा तालाब के जल पर थिरकती वृक्षों की परछाई, यह सब अत्यंत स्वप्निल था। इन्हे निहारना स्वयं में एक भावविभोर करने देने वाला अनुभव था। हरे-भरे जंगलों से घिरे तालाब अत्यंत ही अद्भुत दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे। हमने इनमें से अधिकतर तालाबों के समीप रुककर प्रकृति के प्रत्येक तत्व को शांति से आत्मसात किया। प्रकृति के इन अप्रतिम तत्वों के उत्तम सामंजस्य एवं उनके द्वारा बिखेरी माया ने हमारे मन-मस्तिष्क में अमिट छाप छोड़ दी थी। तालाब के जल में अनेक जल-पक्षी थे। उनके अत्यंत समीप पहुंचना संभव नहीं था तथा सूर्य प्रकाश भी पर्याप्त नहीं था। अतः हम उन पक्षियों के छायाचित्र नहीं ले पाए।

गोह

जंगल में सैर करते समय हमें एक गोह अवश्य दिखाई दी थी। मार्ग के किनारे, आलस्य में अविचल पड़ी थी। हमने जैसे ही छायाचित्र लेने की चेष्टा की, वह वहाँ से सरपट भागते हुए घनी झाड़ियों में कहीं लुप्त हो गई।

भितरकनिका के जंगल में गोह
भितरकनिका के जंगल में गोह

वर्षा ऋतु में इस मैंग्रोव जंगल के वृक्षों के शीर्ष पर अनेक पक्षी सैकड़ों घोंसले बना देते हैं। किन्तु तब यहाँ पर्यटकों के आने पर मनाही होती है। यही समय है जब इन पक्षियों के विषय में शोध किया जा सकता है तथा उनके अच्छे छायाचित्र लिए जा सकते हैं। इस तथ्य से अनुमान लगाया जा सकता है कि यह उद्यान प्रवासी पक्षियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

शिव मंदिर

जंगल के भीतर विचरण करते हुए, एक नौका घाट से दूसरे घाट पर जाते समय हमें ऊंचे मचान दिखे जिसके ऊपर से जंगल का निरीक्षण किया जाता है। यहाँ से प्रवासी पक्षियों पर भी दृष्टि रखी जाती है।

हमें कान्क्रीट में निर्मित दो तलों की एक विचित्र सी संरचना दृष्टिगोचर हुई जिसमें अनेक चौकोर छिद्र थे। पूछने पर हमारे गाइड ने मुसकुराते हुए उत्तर दिया कि यह प्राचीन काल के राजाओं का शिकार स्थल था। संरचना के भीतर खड़े होकर तथा इन छिद्रों में बंदूक रखकर जानवरों का शिकार किया जाता था। यह संरचना मुझे एक छिद्रयुक्त ठोस पिंजरे के समान प्रतीत हुई। इसी संरचना के पीछे छुपकर राजाओं ने वापिस लौटते अनेक प्रवासी पक्षियों का शिकार किया होगा।

प्राचीन शिव एवं वन दुर्गा मंदिर - भितरकनिका
प्राचीन शिव एवं वन दुर्गा मंदिर – भितरकनिका

एक उजला चटक हरे रंग का शिव मंदिर अपने रंग के कारण पृथक दृष्टिगोचर हो रहा था। यह एक छोटा मंदिर है तथा इसकी शैली विशाल अमलका लिए अन्य ओडिशा मंदिरों के समान है। उस समय मंदिर बंद था। एक छोटा नंदी बाहर बैठा मानो मंदिर की रखवाली कर रहा था। पिरामिड के आकार के एक गमले में तुलसी का पौधा था।

समीप ही पत्थर का एक और छोटा मंदिर था जो वन दुर्गा को समर्पित था। इस छोटे एवं जीर्ण मंदिर के भीतर अनेक मूर्तियाँ थीं तथा कुछ मूर्तियाँ बाहर भी थीं। यहाँ नियमित पूजा अर्चना के चिन्ह दिखाई पड़ रहे थे। किन्तु दोपहर होने के कारण उस समय वहाँ कोई भी उपस्थित नहीं था।

दुर्लभ रामचिरैया पक्षी

रामचिरैया भारत में सामान्यतः पाए जाने वाले पक्षियों में से एक है। हमने इन्हे सभी स्थानों में देखा है। भितरकनिका के इस घने मैंग्रोव में रामचिरैया की ६ भिन्न प्रजातियाँ  पायी जाती हैं। उनमें से ३ प्रजातियों को देखने का हमारा यह प्रथम अवसर था। इस राष्ट्रीय उद्यान के दर्शन का उद्देश्य भी तो यही था। हमें ज्ञात था कि इस उद्यान में इन प्रजातियों के दर्शन हो ही जाते हैं। जब हम हमारी नौका के आरंभ होने की प्रतीक्षा कर रहे थे, तब हमारे गाइड ने हमें इन पक्षियों के कुछ छायाचित्र दिखाए थे जिन्हे उसने अपने मोबाईल द्वारा खींचे थे। उसने हमारी उत्सुकता और भी बढ़ा दी थी।

भूरे पंख वाली रामचिरैय्या
दुर्लभ भूरे पंख वाली रामचिरैय्या

भूरे पंखों वाली रामचिरैया, काले टोपी वाली रामचिरैया तथा गले की पट्टी वाली रामचिरैया, इन सब के दर्शन कर पाना हमारे लिए सोने पर सुहागा जैसा था। हमने सुना था कि गोवा में जुआरी नदी के मुहाने पर भी इन पक्षियों के दर्शन होते हैं। किन्तु वहाँ किसी संयोजित नियमित नौका सेवा एवं गाइड की आवश्यकता है।

काली टोपी वाली राम चिरैय्या
काली टोपी वाली राम चिरैय्या

हमारे गाइड की अनुभवी आँखें पक्षियों को दूर से ही ढूंढने में सफल हो रही थीं। जैसे ही हमारे नौकाचालक को वन्य प्राणियों में हमारी रुचि का आभास हुआ, उसने प्रसन्नतापूर्वक नौका को घुमा ली तथा हमें ऐसे स्थान पर ले गया जहां से हमें बेहतर दृश्य प्राप्त हुआ। हमें पक्षियों के उत्तम छायाचित्र लेने में भी सहायता मिली। नौका मोटर-यंत्र चालित होने के कारण कभी भी पूर्णतः शांत नहीं होती। अतः पक्षियों के छायाचित्र लेने के लिए शक्तिशाली लेंस तथा अत्यंत गतिमान कैमरे की आवश्यकता होती है।

पक्षियों के दर्शन का सर्वोत्तम स्थल है खाड़ी के समीप उगे मैंग्रोव की निचली शाखाएं। प्रार्थना करते रहिए कि ये पक्षी पत्तियों के पीछे ना छुप जाएँ अथवा उड़कर कहीं और ना चले जाएँ।

रामचिरैया की अन्य ३ प्रजातियाँ वे थीं जिन्हे हम देश भर में किसी भी जल स्त्रोत के समीप देख सकते हैं, जैसे सामान्य रामचिरैया, श्वेतकंठी रामचिरैया तथा चितकबरी रामचिरैया।

अन्य पक्षी

खाड़ी के साथ साथ नौका विहार करते समय तथा जंगल में पद-यात्रा के समय आप हेरोन व इग्रेट जैसे बगुले, गिद्ध, कनकैया, बाज इत्यादि अनेक पक्षी देख सकते हैं। मैंग्रोव के घने जंगल में सैर करते समय हमें कुछ कठफोड़वों की कूजिका सुनाई दी। वे बौने कठफोड़वे थे। मैंग्रोव वृक्षों के आच्छादन से उत्पन्न छाँव के कारण हम उनके स्वच्छ छायाचित्र नहीं ले पाए।

भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान में सैर का एक विडिओ

आईए आपको हमारे भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान में भ्रमण का एक छोटा सा विडिओ दिखाती हूँ जिसे मैंने मेरे यूट्यूब चैनल में रोपित किया है। यदि आप इस उद्यान का भ्रमण करना चाहते हैं तो वहाँ क्या एवं कैसे देखना है, आप इस विडिओ से जान पाएंगे।

नौका विहार

यहाँ नौका सवारी सुविधाएं उपलब्ध हैं जिसके द्वारा आप बंगाल की खाड़ी से लगे तटों पर पहुँच सकते हैं, बड़े द्वीपों पर जा सकते हैं, यहाँ तक कि उस पार स्थित गांवों तक भी पहुँच सकते हैं। आप की रुचि के अनुसार आप नौका निश्चित कर मन पसंद स्थल के दर्शन कर सकते हैं। समुद्र तथा अप्रतिम समुद्र तटों से भरे गोवा की निवासी होने के कारण हमें तट दर्शन में कदापि रुचि नहीं थी।

इस राष्ट्रीय उद्यान के दर्शन तथा नौका की सवारी करने से पूर्व आपको इन तथ्यों की पूर्व जानकारी होना आवश्यक है:

  • नौका पर चढ़ने से पूर्व पंजीकरण करने के लिए प्रत्येक पर्यटक के पास छायाचित्र सहित पहचान पत्र होना आवश्यक है।
  • राष्ट्रीय उद्यान में भ्रमण करने के लिए वन विभाग को नाममात्र का शुल्क देना पड़ता है।
  • नौका में भ्रमण करने के लिए भिन्न भिन्न शुल्क हैं जो आपके सुनिश्चित स्थल तथा वहाँ तक पहुँचने के लिए लगने वाले समय पर निर्भर है।
  • नौकाओं पर शौचालय की अत्यंत मौलिक सुविधाएं उपलब्ध हैं।
  • आप नौका पर खाद्य सामग्री ले जा सकते हैं किन्तु प्लास्टिक थैली/बोतल जैसा किसी भी प्रकार का गैर-जैविक कचरा जल में अथवा वन में ना डालें।
  • वनीय पशु-पक्षियों को किसी भी प्रकार की खाद्य सामग्री ना दें।
  • यदि आपकी नौका सवारी लंबी है तो अपने साथ पर्याप्त पेयजल तथा सिर पर टोपी अवश्य ले लें।
  • वनीय पशु-पक्षियों के अवलोकन के लिए दूरबीन सहायक होते हैं।
  • नवीनतम शुल्क की जानकारी के लिए यह वेबस्थल देखें।

भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान में कहाँ ठहरें?

हम ‘सैंड एण्ड पेबल्स भितरकनिका जंगल रेसॉर्टस’ में ठहरे थे। राष्ट्रीय उद्यान में भ्रमण करने के लिए यह हमें सर्वोत्तम प्रतीत हुआ। अतः मैं आपको भी इसे ही चुनने की सलाह दूँगी।

ताल किनारे तम्बू में रहना का आनंद
ताल किनारे तम्बू में रहना का आनंद

यहाँ नौका अवतरण तट के अत्यंत समीप तंबू सदृश आवास सुविधाएं हैं। यहाँ रहते हुए इस वनीय क्षेत्र का भ्रमण अत्यंत आसान हो जाता है। यह एक ग्रामीण क्षेत्र के अंतर्गत आता है जिसके कारण आपको ओडिशा के ग्रामीण जीवन को जानने के लिए गाँव के भीतर भ्रमण का भी अत्यंत ही उत्तम अवसर प्राप्त हो जाता है। हम ने रिज़ॉर्ट के समीप स्थित गाँव के भीतर भ्रमण कर यहाँ के मिट्टी के घरों की भित्तियों पर किये अप्रतिम भित्तिचित्रों को देखा। पशु तथा मानव किस प्रकार एक दूसरे साथ शांतिपूर्वक सहवास करते हैं इसका जीवंत उदाहरण आप यहाँ देख सकते हैं।

पास ही बहती नदी पर बना सेतु प्रातःकाल व संध्याकाल पक्षियों को देखने का सर्वोत्तम स्थल है। हमारे तंबू के समक्ष, अत्यंत समीप एक छोटा सा तालाब था। हमें ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो हम तालाब के किनारे की रह रहे हैं।

प्रत्येक तंबू अत्यंत सुविधाजनक है जिसके भीतर ही शौचालय सुविधा उपलब्ध है। यहाँ के कर्मचारी अत्यंत नम्र तथा पेशा-अनुरूप अनुभवी हैं। स्थानीय होने के कारण अधिकतर कर्मचारी जंगल के भीतर-बाहर से पूर्ण रूप से अवगत हैं। रिज़ॉर्ट के भीतर ही उन्होंने हमें अनेक पक्षी दिखा दिए। भोजन रिज़ॉर्ट में ही पकाया जाता है, वह भी अधिकतर स्थानीय सामग्रियों का प्रयोग कर। प्रकृति के सानिध्य में बैठकर भोजन करना स्वयं में एक आनंदपूर्ण अनुभव है। हमने ‘सैंड एण्ड पेबल्स भितरकनिका जंगल रेसॉर्टस’ में रहते समय पक्षियों की चचहाहट के बीच ताजे भोजन का भरपूर आस्वाद लिया।

हमें बताया गया कि झींगे एवं केकड़े यहाँ के लोकप्रिय स्थानीय व्यंजन हैं। यदि आप मांसाहारी हैं तो इस पर विचार कर सकते हैं।

गाँव में भ्रमण करने के लिए तथा समीप स्थित जगन्नाथ मंदिर के दर्शन करने के लिए आप रिज़ॉर्ट के कर्मचारियों की सहायता ले सकते हैं। मंदिर में आप शिलाओं पर की गई सुंदर कलाकृतियाँ देख सकते हैं।

भितरकनिका एक जैव-विविधता हॉट-स्पॉट क्षेत्र है जिसे आप पूर्ण उत्तरदायित्व के साथ अवलोकन करें एवं जानने का प्रयत्न करें।

हमने ललितगिरी – रत्नागिरी – उदयागिरी बौद्ध त्रिकोण, जाजपुर, पुरी, कोणार्क, भुवनेश्वर, उदयगिरी खँडगिरी गुफ़ाएं, मंगलजोड़ी, रघुराजपुर इत्यादि की भी यात्रा की। इनके संदर्भ में मेरे आगामी संस्करण अवश्य पढ़ें।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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भारत में जंगल सफारी – कब, कहाँ, क्या और कैसे देखें? https://inditales.com/hindi/jangal-safari-rashtriya-udyan-bharat/ https://inditales.com/hindi/jangal-safari-rashtriya-udyan-bharat/#comments Wed, 05 Jun 2019 02:30:40 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1359

क्या हमें भारत में जंगल सफारी करनी चाहिए? जी हाँ! भारत अब भी जैव विविधता का धनी है। इसका अनुभव प्राप्त करने के लिए जंगल सफारी से उत्तम अन्य कोई साधन नहीं है। प्रकृति से हस्तक्षेप किये बिना भारत की जैव धरोहर का आनंद उठाना है तो अवश्य जंगल सफारी कीजिये। छुट्टियों में जंगल सफारी […]

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क्या हमें भारत में जंगल सफारी करनी चाहिए? जी हाँ! भारत अब भी जैव विविधता का धनी है। इसका अनुभव प्राप्त करने के लिए जंगल सफारी से उत्तम अन्य कोई साधन नहीं है। प्रकृति से हस्तक्षेप किये बिना भारत की जैव धरोहर का आनंद उठाना है तो अवश्य जंगल सफारी कीजिये।

छुट्टियों में जंगल सफारी क्यों जाएँ?

वर्तमान में हमारा जीवन नगरीय भीड़भाड़ एवं सीमेंट कंक्रीट के जंगले में उलझ कर रह गया है। हम इस भौतिकवादी विश्व के दलदल में धंसते जा रहे हैं। इसी कारण बीच बीच में जंगल में भ्रमण करना अति आवश्यक हो जाता है।

जंगल सफारी भारत के राष्ट्रीय उद्यानों में जंगल के भीतर एक भिन्न विश्व बसता है। यहाँ इसके अपने नियम एवं जीवन शैली होती है। जंगलों एवं राष्ट्रीय अभयारण्यों की हरियाली एवं वहां के जीव-जंतुओं के बीच कुछ समय बिताना एक अविस्मरणीय अनुभव है। यह हमारे जीवन की भागदौड़ में शान्ति एवं ठहराव देता है। इसीलिए आप अपनी आगामी छुट्टी में जंगल अथवा अभयारण्य के भ्रमण का कार्यक्रम अवश्य बनाएं।

जंगल सफारी छुट्टियों में कौन कौन से अनुभव लेना चाहिए?

जंगल सफारी आपको जंगल के सम्पूर्ण पारितंत्र का अनुभव प्रदान करता है। हम में से कई पर्यटक जंगल जाकर केवल बड़े जंगली जानवरों को खोजते हैं। स्मरण रखिये कि सिंह, बाघ, तेंदुआ, भालू, जंगली कुत्ते इत्यादि जंगल में अकेले नहीं रहते। उनके साथ सम्पूर्ण पारितंत्र होता है।

कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में जीप सफारी
कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में जीप सफारी

बाघ वहीं होगा जहां उसका भोजन होगा। अर्थात जंगल में आपको हिरणों के झुण्ड दिखाई पड़ेंगे। रूककर इस मनभावन पशु की सुन्दरता निहारिये। इसकी वह मनमोहक चाल देखिये जिस पर सदियों से कवियों ने कई प्रसिद्ध कवितायें रची हैं। इनके साथ साथ आप जंगली हाथी, नीलगाय, गौर, सियार, जंगली कुत्ते इत्यादि कई जानवरों को देख सकते हैं।

नदी-तालाब के आसपास आपको मगरमच्छ अथवा घड़ियाल भी दृष्टिगोचर हो सकते हैं। यह इस तथ्य पर निर्भर है कि आप किस क्षेत्र के जंगल में विचरण कर रहे हैं।

शाकाहारी पशु

हाथी, हिरण, गेंडे, सांबर, गौर इत्यादि मेरे सामान शाकाहारी हैं। स्मरण रहे, इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि वे किसी पर हमला नहीं कर सकते। यदि उन्हें अपने प्राणों पर आघात का आभास होने लगे तो वे अवश्य हमला कर सकते हैं।

पक्षी

घने जंगलों में पक्षियों को ढूंढ पाना आसान नहीं! वहां उन्हें छुपने के लिए भरपूर स्थान प्राप्त होते हैं। वे हमसे लुका-छुपी का खेल खेलते रहते हैं। उन्हें ढूँढने का एक आसान उपाय आपको बताना चाहती हूँ। वे जब उड़ें तब उनके पीछे दृष्टि दौड़ाएं तथा उनके बैठने की प्रतीक्षा करें। कुछ पक्षियों को उनके विशिष्ट रंगों द्वारा पहचाना जा सकता है। नीलकंठ को उड़ते देखना अथवा नवरंग पक्षी के नौ रंगों को निहारना सदैव ही एक मनमोहक दृश्य होता है।

भरतपुर पक्षी उद्यान में चील
भरतपुर पक्षी उद्यान में चील

जंगलों के बाहरी सीमा पर यदि आप पगभ्रमण करें तो पक्षियों की विभिन्न प्रजातियाँ देख आप विस्मित हो जायेंगे। उनके रंगों एवं चहचहाहट को ध्यानपूर्वक सुनने की चेष्टा करें। ये आपको उन्हें पहचानने में सहायता करेंगी। कदाचित वहां आपको कई ऐसे पक्षी दिखेंगे जिन्हें इससे पूर्व ना तो आपने कभी देखा होगा ना ही इन्हें जानते होंगे। प्राप्त जानकारी के अनुसार भारत में पक्षियों की लगभग १३०० प्रजातियाँ पायी जाती हैं।

तितलियाँ

सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान में एक तितली
सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान में एक तितली

रंगबिरंगी तितलियाँ! छोटी बड़ी तितलियाँ! सूर्य के प्रकाश में फडफडाते ये नन्हे कीट सहज ही आपका मन मोह लेंते हैं। जंगलों में तो ये बहुतायत में उपलब्ध होते हैं। भारत में तितलियों की १००० से भी अधिक प्रजातियाँ पायी जाती हैं।

पतंगे

भारत के जंगलों में आप अनगिनत पतंगे देख सकते हैं। त्रिभुज के आकार के इस पतंगे को देखिये जिसे हमने सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान में किये गए जंगल सफारी के समय ढूंढा था। है ना यह अनोखा?

त्रिभुज पतंगा
त्रिभुज पतंगा

एशिया से लेकर दक्षिण प्रशांत के ऊष्णकटिबंधीय तथा उप-ऊष्णकटिबंधीय स्थानों में पाया जाने वाला यह त्रिभुज पतंगा (Trigonodes hyppasia)एक कीट है। इसके दोनों पंखों के अग्रभाग पर श्वेत किनारी के काले त्रिभुज बने होते हैं। प्रत्येक त्रिभुज के भीतर दो और त्रिभुज होते हैं।

ये जब पंख समेट कर बैठते हैं तब एक बड़ा श्वेत किनारी का त्रिभुज बनाते हैं जिसके भीतर चार त्रिभुज बन जाते हैं। अर्थात् ये चाहे उड़ रहे हों या बैठे हों, आप इन्हें आसानी से पहचान सकते हैं। पंखों पर इस आकर्षक त्रिकोणीय आकृति के कारण इसे चौकोणीय पतंगा भी कहा जाता है। इसका आकर लगभग २ सेंटीमीटर तथा पंखों का फैलाव ४ सेंटीमीटर होता है।

वृक्ष एवं लताएँ

लियाना बिना पत्तों की लम्बी तने वाली बेल है। इसकी जड़ें मिटटी की सतह पर फैली होती हैं तथा इसे ऊंचा बढ़ने के लिए अन्य वृक्षों के आधार की आवश्यकता होती है। जंगल के अन्य वृक्षों के समान यह भी धूप, जल एवं पोषण के लिये उसी मिट्टी पर निर्भर रहता है।

लियाना बेल
लियाना बेल

जंगल सफारी के समय आप वहां के वृक्षों एवं पौधों की जैव विविधता का बारीकी से अवलोकन करें। नवीन अंकुरित पौधों से ले कर दशकों पुराने वृक्षों तक, सब जंगल के पारितंत्र (ecology) का भाग हैं। इनमें कुछ वृक्ष सदियों प्राचीन हैं। जंगल के कुछ भाग इतने घने होते हैं कि सूर्य का प्रकाश जंगल के भीतर, धरती तक नहीं पहुँच पाता। इन ऊंचे ऊंचे वृक्षों पर कई प्रकार की लतायें लिपटी हुई होती हैं।

सर्प

जंगल में सर्पों की कई प्रजातियाँ दृष्टिगोचर होती हैं जिनमें कुछ विषैले भी होते हैं। नाग से लेकर वाईपर जैसे विषैले सर्प एवं अजगर से लेकर हरी वाइन सर्प से धामिन सर्प तक के बिना विषयुक्त सर्प यहाँ सफारी में बहुधा दिखाई पड़ जाते हैं। इनमें अजगर में एक विशेषता होती हैं।

लंगूर के धर दबोचे हुए अजगर
लंगूर के धर दबोचे हुए अजगर

अजगर एक विशाल सर्प होने के बाद भी विषैला नहीं होता। वह अपने शिकार को जकड़ कर उसका श्वास अवरुद्ध कर देता है, तत्पश्चात उसे निगल लेता है। सलग्न छायाचित्र में आप देख सकते हैं किस प्रकार एक अजगर लंगूर बन्दर को जकड़ रहा है।

मकड़ी

छोटे, बड़े एवं विशाल मकड़ियां एवं उनके जाले आपको जंगल में हर ओर दिखाई देंगे। जंगलों की झाड़ियों एवं वृक्षों की शाखाओं को जाले में बुनते, भिन्न भिन्न प्रकार की मकड़ियों को देख आप विस्मित हो जायेंगे।

मकड़ी और उसके बुने जाल
मकड़ी और उसके बुने जाल

नेफिला पिलिपेस मकड़ी जंगलों में बहुतायत में पायी जाती हैं। मादा मकड़ी अपेक्षाकृत बड़ी होती है। ३० से ५० मिलीमीटर के धड़ के साथ इसका सम्पूर्ण आकार २० सेंटीमीटर तक हो सकता है। वहीँ नर मकड़ी का धड़ केवल ५ से ६ मिलीमीटर तक ही होता है। जाले बुनने वाली मकड़ियों में इस प्रजाति की मकड़ियां सर्वाधिक विशाल होती हैं। इसके सुनहरे लंबवत जाल पर अनियमित आकार की जालियां होती हैं जो असममित होती हैं। यह विश्व की सर्वाधिक विशाल मकड़ियों में से एक है।

अर्गिओपे एमुला अथवा अंडाकार सेंट एंड्रू क्रॉस मकड़ी ऊष्णकटिबंधीय घास के मैदानों में पाए जाने वाली विशिष्ट मकड़ी है। ये मकड़ियां जब जाला बुनती हैं तब उन पर टेढ़ी-मेढ़ी वक्र रेखाएं बनाती हैं। छद्मावरण की भूमिका निभाते इस जाले के कारण ही इस मकड़ी को क्रॉस मकड़ी कहा जाता है।

फनल मकड़ी अथवा कीप मकड़ी द्वारा बुने जाल भी आकर्षक होते हैं। आप सोच में पड़ जाते हैं कि क्या इन्ही से ही कीप नाली की आकृति का आरम्भ हुआ था?

कीट

जंगल सफारी के समय, विशेषकर झीलों एवं जलनिकायों के समीप, आप विभिन्न प्रकार के कीट, पतंगे, कृमि एवं कुकुर्मुत्ते देखेंगे।

जंगली पुष्प

जंगली पुष्प
जंगली पुष्प

ऋतु के अनुसार जंगल में आप कई प्रकार के जंगली पुष्प देखेंगे, जैसे दुर्लभ एवं अनोखे जंगली आर्किड इत्यादि।

जंगल सफारी के प्रकार

जीप सफारी

जीप से जंगल सफारी
जीप से जंगल सफारी

जीप द्वारा राष्ट्रीय उद्यानों में सफारी करना, जंगल के जीवन का आनंद उठाने का सर्वाधिक लोकप्रिय साधन है। अधिकतर जंगल सफारी योजनाबद्ध रीत से प्रातःकाल एवं सान्झबेला में किये जाते हैं। सफारी का सही समय राष्ट्रीय उद्यान के पर्यावरण एवं वहां के नियमों पर निर्भर करता है। मेरी सलाह है कि आप अपनी सफारी पूर्व नियोजित कर लें क्योंकि अधिकतर प्रसिद्ध राष्ट्रीय उद्यानों में वहां पहुंचकर टिकट प्राप्त नहीं हो पाता।

नौका सफारी

जंगल के मध्य नौका विहार
जंगल के मध्य नौका विहार

देश में कई ऐसे राष्ट्रीय उद्यान हैं जो नदी, तालाब अथवा ऐसे ही किसी जल स्त्रोत के समीप स्थित हैं। ऐसे कुछ राष्ट्रीय उद्यानों में नौका द्वारा भी सफारी करने का विकल्प उपलब्ध होता है। आप नौका में बैठकर अपने आसपास हरे भरे जंगल देख सकते हैं।

नौका सफारी पक्षियों के अवलोकन के लिए अति-उपयुक्त है क्योंकि पक्षी बहुधा जल स्त्रोत के समीप ही विचरण करते हैं। रही बात जंगली जानवरों की, तो वे जल पीने अथवा जल में बैठकर शीतल होने के लिए इन स्त्रोतों के समीप आते ही हैं।

रात की सफारी

रात की जंगल सफारी निशाचरों को देखने के लिए
रात की जंगल सफारी निशाचरों को देखने के लिए

निशाचर जंगली जानवरों एवं पक्षियों को देखने के लिए रात की सफारी सर्वोत्तम विकल्प है। ये जानवर आसानी से नहीं दिखाई देते। मुझे स्मरण है, ऐसे ही एक सफारी में हमें दो भालू दिखे थे। रात में उनकी आँखें चमक रही थीं।

रात की सफारी अनिवार्य रूप से जीप की सवारी होती है। यह सफारी प्रतिबंधित वन क्षेत्र की बाहरी सीमा पर स्थित मार्गों अथवा बफर क्षेत्रों पर ही की जाती है।

पैदल सफारी

आप अचरज में आ गए? जी हाँ! कई राष्ट्रीय उद्यानों में पैदल सफारी करने की अनुमति दी जाती है। इनमें सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान एक है। इस सफारी में आपके साथ वन पथप्रदर्शक, प्रकृतिविद एवं वन सहायकों का दल भी चलते हैं। वन प्रदर्शक को ना केवल जंगल के भीतर की पगडंडियों का ज्ञान होता है, वहां के जानवरों एवं पक्षियों का भी ज्ञान होता है। वे इन्हें ढूँढने में अत्यंत निपुण होते हैं। जंगल में उगती वनस्पतियों एवं वृक्षों की जानकारी भी वे रखते हैं।

पैदल जंगल सफारी
पैदल जंगल सफारी

यदि आप जिज्ञासु हैं तो उनसे एवं इन जंगलों से बहुत कुछ सीख सकते हैं। यह सफारी भी मुख्य वन में नहीं की जाती, बल्कि जंगल की बाहरी सीमा अथवा बफर क्षेत्र में की जाती है। चूंकि यह सफारी पैदल की जाती है, पैरों में आरामदेह जूते एवं सर पर टोपी अवश्य लें।

हाथी पर सफारी

हाथी पर सफारी अब कुछ ही स्थानों पर कराई जाती है। मैंने हाथी पर सफारी का आनंद पश्चिम बंगाल के जलदापारा राष्ट्रीय उद्यान में उठाया था। यह अपने आप में एक अनोखी सफारी थी। एक अद्भुत अनुभव था। इतनी ऊंचाई से जंगल का दृश्य अत्यंत रोमांचक होता है। ऊंची-नीची धरती पर हाथी का इतनी आसानी से चलना आश्चर्यजनक है।

हाथी पर जंगल सफारी
हाथी पर जंगल सफारी

अचानक मैंने अनुभव किया कि हम ऊंचे ऊंचे घास के मैदानों पर चल रहे थे। हमसे भी ऊंचे इन घास के बीच से केवल हाथी की पीठ पर बैठ कर ही जा सकते हैं। मध्यप्रदेश के बांधवगड राष्ट्रीय उद्यान में जीप सफारी के साथ हाथी सफारी भी कराई जाती है। हाथी द्वारा बाघ को अत्यंत समीप से देखा जा सकता है।

जंगल सफारी के लिए सर्वोत्तम राष्ट्रीय उद्यान

भारत के कई जंगलों में मैंने सफारी की है। अब भी कई राष्ट्रीय उद्यान एवं वन्यजीव अभयारण्यों के दर्शन शेष हैं। अपने द्वारा किये गए जंगल सफारी में से मुझे जो सर्वोत्तम प्रतीत हुए, उनके विषय में यहाँ उल्लेख करना चाहती हूँ। इन्हें समझ कर कम से कम २-३ जंगल सफारी चुनिए जो भिन्न अनुभव प्रदान करने में सक्षम हैं। अपनी आगामी अवकाश में आप उन जंगल सफारी में से एक अवश्य कीजिये।

कान्हा राष्ट्रीय उद्यान – मध्य प्रदेश

कान्हा राष्ट्रीय उद्यान अर्थात् कान्हा बाघ संरक्षण क्षेत्र के जंगल में ही सर्वप्रथम मुझे जंगल के बाघ को अपने जंगली परिवेश में देखने का सुअवसर प्राप्त हुआ था। मध्य प्रदेश राज्य के १९०० वर्ग कि.मी. के क्षेत्र में पसरे कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में मध्य भाग एवं बाहरी भाग सीमांकित है। कहा जाता है कि कान्हा में बाघ के दिखने की संभावना सर्वाधिक है।

कान्हा का मुन्ना
कान्हा का मुन्ना

कान्हा का बाघों में बाघ, जिसे प्रेम से मुन्ना बुलाया जाता है, सर्वाधिक मित्रवत बाघ है। वह पर्यटकों से अत्यंत सहज है। वह हमारी जीप के समीप से शान्तिपूर्वक पदचाप करता निकल जाता था, हमारे मार्ग को काटता हुआ उस पार चला जाता था तथा अपनी जंगली प्रणाली से अपना क्षेत्र सीमांकित करता था। इस प्रकार वह पर्यटकों को आनंदित कर देता था।

और पढ़ें : मुन्ना– कान्हा राष्ट्रीय उद्यान के बाघों में बाघ से एक भेंट

कान्हा राष्ट्रीय उद्यान बारहसिंघों के लिए भी प्रसिद्ध है। इनके साथ साथ कान्हा में कई अन्य प्रकार के जंगली जानवर, पक्षियों की लगभग ३०० प्रजातियाँ तथा लगभग १००० प्रकार के पुष्पीय पौधे हैं।

और पढ़ें : कान्हा राष्ट्रीय उद्यान का मुझसे बतियाना सुनें

सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान – मध्य प्रदेश

जीप सफारी, नौका सफारी, पदयात्रा सफारी एवं रात्रि सफारी, इन सब सफारी का अप्रतिम आनंद हमने मध्य प्रदेश के इस सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान व बाघ संरक्षित क्षेत्र में उठाया। १४०० वर्ग कि.मी. के क्षेत्र में पसरे इस उद्यान के कई भाग हैं। यहाँ का एक अन्य विशेष आकर्षण है देनवा नदी का अप्रवाही जल। इस जल पर नौका विहार का आनंद लेते हुए आप प्रतिबंधित वन क्षेत्र के भीतर निर्बाध प्रवेश कर सकते हैं।

और पढ़ें: सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान में जीप सफारी

गाँव के समीप, वन के सीमावर्ती क्षेत्रों में आप पक्षी दर्शन का आनंद उठा सकते हैं। इसके लिए आवश्यक जानकारी प्राप्त कर, प्रातःकालीन पक्षीदर्शन अवश्य करें। हम जिस रेसॉर्ट में ठहरे थे, उसके उद्यान में हमने अनेक तितलियों को भी देखा। नवम्बर का महीना होने के कारण हमें कई आकर्षक रंगबिरंगी तितलियाँ दिखीं।

और पढ़ें: सतपुडा राष्ट्रीय उद्यान के जंगलों को जानने के ५ मार्ग

पेंच राष्ट्रीय उद्यान – मध्य प्रदेश

पेंच राष्ट्रीय उद्यान एवं बाघ संरक्षित क्षेत्र का नाम पेंच नदी पर रखा गया है जो इस जंगल के मध्य से बहती है। इस उद्यान में भी बाघ के दिखने की संभावना अत्यधिक है।

पेंच की कालर वाली बाघिन
पेंच की कालर वाली बाघिन

इस जंगल की प्रसिद्ध रानी बाघिन, जिसे प्रेम से कॉलरवाली बाघिन कहा जाता है, इस जंगल का मुख्य आकर्षण है। कॉलरवाली बाघिन ने अब तक २२ से भी अधिक शावकों को जन्म दिया है। यह अपने आप में एक इतिहास है। कुछ का मानना है कि कदाचित उसके २६ शावकों को जन्म दिया था। कॉलरवाली बाघिन भी पर्यटकों से अत्यंत सहज एवं निर्भय है। इसी कारण कई लोगों ने उसे अपने शावकों के संग अत्यंत समीप विचरण करते देखा। उन पर्यटकों में मैं भी एक हूँ।

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पेंच राष्ट्रीय उद्यान मध्य प्रदेश राज्य के दक्षिणी सीमा पर स्थित है जहां वह महाराष्ट्र राज्य से जुड़ता है। इस उद्यान का ७५० वर्ग कि.मी. भाग मध्य प्रदेश में तथा ७०० वर्ग कि.मी. भाग महाराष्ट्र में है।

पेंच में मिला एक उल्लुओं का जोड़ा
पेंच में मिला एक उल्लुओं का जोड़ा

सफारी के समय आप पक्षियों की अनेक प्रजातियाँ यहाँ देख पायेंगे। इस उद्यान के सीमावर्ती गावों में भी आप कई प्रकार के पक्षी देख सकते हैं।

पेंच में मेरी सफारी के समय जो पक्षी मैंने देखे उनमें मुख्य आकर्षण थे, पीले सर वाला कठफोड़वा तथा भारतीय उल्लुओं का जोड़ा।

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पेंच राष्ट्रीय उद्यान एक अन्य आकर्षण था वृक्ष के ऊपर बना भव्य अतिथि कक्ष।

आसाम का नामेरी राष्ट्रीय उद्यान

आसाम एवं अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर स्थित नामेरी राष्ट्रीय उद्यान लगभग २०० वर्ग कि.मी के क्षेत्र में पसरा हुआ है। जिया भोरोली नदी एवं उसकी सहायक नदियाँ इसका पोषण करती हैं। नामेरी के उत्तर-पूर्वी छोर पर, अरुणाचल प्रदेश राज्य के भीतर पाखुई वन्यजीव अभ्यारण्य है। ये दोनों जुड़े अभ्यारण्य जंगली पशु-पक्षियों के लिए भरपूर साधन प्रदान करते हैं।

उत्तर-पूर्वी राज्यों के भ्रमण के समय मेरे पास समय की किंचित तंगी थी। सीमित समय में हम केवल नामेरी इको कैंप से जिया भोरोली नदी तक की प्रातःकालीन सफारी ही कर पाए। मुझे विश्वास है नामेरी राष्ट्रीय उद्यान में इसके अतिरिक्त भी बहुत कुछ था जो मैं देख नहीं पायी थी। नामेरी राष्ट्रीय उद्यान का प्रमुख आकर्षण हाथी हैं।

मध्य प्रदेश का बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान

बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान में विश्व के सर्वाधिक बाघों की उपस्थिति मानी जाती है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि आप यहाँ सफारी करते समय बाघ नहीं देख पाए तो यह आपका दुर्भाग्य होगा। मेरे विषय में यह सत्य सिद्ध हुआ। मैंने ताला एवं मगधी क्षेत्र में ३ सफारी किये किन्तु मैं बाघ नहीं देख पायी। परन्तु मैं निराश नहीं हुई। मैंने जंगल के अन्य आकर्षणों की ओर ध्यान केन्द्रित किया।

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बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान में विष्णु की प्राचीन प्रतिमा
बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान में विष्णु की प्राचीन प्रतिमा

४५० वर्ग कि.मी. के क्षेत्रफल में पसरा बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान का नामकरण बांधवगढ़ नामक एक प्राचीन दुर्ग पर किया गया है। इस उद्यान में स्तनपायी पशुओं की लगभग ३७, पक्षियों की ३५० तथा तितलियों की ८० प्रजातियाँ पायी जाती हैं। यह बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान तथा बाघ संरक्षित क्षेत्र को जीप व हाथी सफारी का उत्तम स्थान बनाता है।
बांधवगढ़ एक समय जीवित दुर्ग था। अतः इसका एक संपन्न इतिहास एवं विरासत है।

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पश्चिम बंगाल का जल्दापारा राष्ट्रीय उद्यान

उत्तरी बंगाल क्षेत्र में हिमालय की तलहटी में जल्दापारा राष्ट्रीय उद्यान स्थित है। यह एकल सींग वाले गेंडे के लिए प्रसिद्ध है। २०० वर्ग कि.मी. के क्षेत्र में पसरा यह राष्ट्रीय उद्यान कई प्राकृतिक आरक्षित क्षेत्रों के समीप है, जैसे चिलापाटा नामक हाथी गलियारा, बुक्सा बाघ संरक्षित क्षेत्र तथा गोरुमारा राष्ट्रीय उद्यान।

बंगाल पर्यटन का होल्लोंग टूरिस्ट लॉज इस जंगल में रहने का सर्वोत्तम स्थान है। यहाँ से आप इसके समक्ष बहती छोटी सी नदी के उस पार एकल सींग वाले गेंडे, गौर, जंगली सूअर तथा हिरण देख सकते हैं। सैकड़ों पक्षी इसके ऊपर मंडराते रहते हैं।

होल्लोंग टूरिस्ट लॉज इकलौता स्थान है जहां जंगल में मुझे जीप सफारी के साथ हाथी सफारी का भी भरपूर आनंद प्राप्त हुआ।

और पढ़ें: होल्लोंग – जैव विविधता से परिपूर्ण दुआर्स का जल्दापारा राष्ट्रीय उद्यान

जी हाँ! रात होते ही एकल सींग वाले गेंडे होल्लोंग टूरिस्ट लॉज के समीप तक आ जाते थे। इससे पूर्ण इतने समीप से मैंने कभी किसी जंगली जानवर को नहीं देखा था।

उत्तराखंड का राजाजी राष्ट्रीय उद्यान

८०० वर्ग कि.मी. के क्षेत्रफल में पसरा राजाजी राष्ट्रीय उद्यान उत्तराखंड में हिमालय के चरणों में स्थित है। राजाजी राष्ट्रीय उद्यान का नामकरण भारतरत्न सी. राजगोपालचारी के नाम पर किया गया है जो भारत के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे। हाथी, हिमालयी वन्य जीवन तथा पक्षी दर्शन के लिए यह उद्यान सर्वोत्तम राष्ट्रीय उद्यानों में से एक है। भारत में पक्षियों की जितनी भी प्रजातियाँ हैं, उनमें से कम से कम एक तिहाई आप यहाँ एक उद्यान में ही देख सकते हैं।

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भरपूर समय साथ लेकर यहाँ आईये तथा शांतिपूर्वक इस उद्यान का आनंद उठाईये।

तेलंगाना का पोचरम अभयारण्य

पोचरम बाँध द्वारा सृजित पोचरम झील पर इस अभयारण्य का नामकरण किया गया है। लगभग १०० वर्ग कि.मी. के क्षेत्र में पसरा तेलंगाना का यह अभयारण्य अपेक्षाकृत छोटा है। आप इस जंगल की पगडंडियों पर पदयात्रा करते हुए कई हिरण एवं पक्षी देख सकते हैं। यह अभयारण्य हैदराबाद से लगभग ४० कि.मी. की दूरी पर ही स्थित है। अतः आप हैदराबाद से दिवसीय यात्रा कर सकते हैं।

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राजस्थान का केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान

भरतपुर पक्षी अभ्यारण्य में सारस अथवा क्रोंच पक्षी
भरतपुर पक्षी अभ्यारण्य में सारस अथवा क्रोंच पक्षी

राजस्थान का केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान, भरतपुर पक्षी अभयारण्य के नाम से अधिक प्रसिद्ध है। यहाँ आप पक्षियों की लगभग ३७० प्रजातियाँ देख सकते हैं। २९ वर्ग कि.मी. में पसरे इस दलदली क्षेत्र में कई प्रवासी पक्षी डेरा डालते हैं। पुष्पों की ३७९ प्रजातियाँ देख सकते हैं। सारस, नीलगाय, सियार, अजगर इत्यादि भी देख सकते हैं।

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भरतपुर अभयारण्य के भीतर पक्के मार्ग हैं जिन पर सूर्योदय से सूर्यास्त के भीतर सफारी की अनुमति दी जाती है। पैदल, सायकल, घोड़ागाड़ी तथा सायकल रिक्शा द्वारा पर्यटक इस अभयारण्य का अवलोकन कर सकते हैं। हमने सर्वप्रथम सायकल रिक्शा द्वारा अभयारण्य की सफारी की। तत्पश्चात अभयारण्य के भीतर ११ कि.मी. लम्बे मार्ग पर पदयात्रा करते हुए अभयारण्य का सविस्तार अवलोकन किया। यदि आप में सहनशक्ति है तो इस अभयारण्य को जानने हेतु पैदल सफारी ही सर्वोत्तम विकल्प है।

आसाम का काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान

एक सींग वाले गैंडे का बच्चा
एक सींग वाले गैंडे का बच्चा

काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान युनेस्को द्वारा घोषित एक विश्व विरासती स्थल है जहां विश्व के लगभग दो-तिहाई एकल सींग गेंडों का वास है। इनके अलावा बाघ, हाथी, जंगली दलदलीय भैंसों इत्यादि के लिए भी यह महत्वपूर्ण स्थान है। ८०० वर्ग कि.मी. के क्षेत्र में पसरा यह राष्ट्रीय उद्यान आसाम के उत्तर-पूर्वी भाग में स्थित है। एक एकल सींग मादा गेंडे को उसके शावक के संग हमारे जीप के अत्यंत समीप देखने का सौभाग्य हमें काजीरंगा में ही प्राप्त हुआ था। यहाँ ३-४ क्षेत्र हैं जहां प्रातःकालीन एवं दोपहर की जीप सफारी कराई जाती है। हाथी की सवारी करते हुए भी सफारी का आनंद उठाया जा सकता है।

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काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान को आड़ी-तिरछी रखाओं में कई नदियाँ काटती हैं। इनमें ब्रह्मपुत्र नदी प्रमुख है।

राजस्थान का सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान एवं बाघ संरक्षित क्षेत्र

८६६ वर्ग कि.मी. के क्षेत्र में फैला यह अभयारण्य राजस्थान के अलवर जिले में स्थित है। यहाँ हमने जीप सफारी की थी किन्तु बाघ देख पाने में दुर्भाग्यशाली सिद्ध हुए थे। फिर भी हमने यहाँ भरपूर आनंद उठाया। हमने यहाँ कई पक्षी एवं जल स्त्रोतों के समीप कई मगरमच्छ ढूंडे। घने जंगल की छत्रछाया के नीचे से गाड़ी चलायी जहां सूर्य की किरणें भी क्वचित ही पहुँच पाती हैं।

गोवा का बोंडला अभयारण्य

८ वर्ग कि.मी. के क्षेत्र में पसरा, गोवा राज्य के उत्तर-पूर्वी परिक्षेत्र में स्थित बोंडला अभयारण्य में एक चिड़ियाघर, एक मृगवन, एक वनस्पति उद्यान तथा भरपूर पक्षी अवलोकन के सुअवसर हैं। इस छोटे से अभयारण्य में केवल पैदल चलकर ही आनंद लिया जा सकता है। अतिउत्साही पर्यटकों के लिए अभयारण्य जंगल में पैदल यात्रा भी आयोजित करता है।

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उत्तराखंड का जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान

उत्तराखंड राज्य के नैनीताल जिले में लगभग १३१८ वर्ग कि.मी. के क्षेत्र में फैला यह जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान भारत के प्राचीनतम राष्ट्रीय उद्यान एवं बाघ संरक्षित क्षेत्र में से एक है। पर्यटक यहाँ मुख्यतः बाघ एवं जंगली हाथी देखने आते हैं। यहाँ स्तनपायी जानवरों की लगभग ५० प्रजातियाँ एवं पक्षियों की लगभग ५८० प्रजातियाँ हैं।

जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान में चितकबरे हिरण
जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान में चितकबरे हिरण

यहाँ प्रमुख रूप से जीप सफारी कराई जाती है जो उद्यान के कई भागों में पृथक रूप से आयोजित की जाती हैं। चूंकि यह एक अत्यंत फैला हुआ उद्यान है, यहाँ कई बार सफारी के समय बाघों के दर्शन नहीं हो पाते। मैं भी उनमें से एक हूँ। अतः मैं आपको एक से अधिक सफारी करने का सुझाव देती हूँ। पैदल सफारी की अनुमति केवल बफर जोन में ही है। यहाँ की वनस्पति, जीव एवं जंतुओं के अवलोकन हेतु पैदल सफारी सर्वोत्तम उपाय है।

कर्नाटक का बांदीपुर राष्ट्रीय उद्यान

कर्नाटक राज्य के चामराजनगर जिले में लगभग ९१२ वर्ग कि.मी. के क्षेत्र में पसरा बांदीपुर राष्ट्रीय उद्यान एवं बाघ संरक्षित क्षेत्र कदाचित दक्षिण भारत का सर्वोत्तम राष्ट्रीय उद्यान है। इस उद्यान के आसपास स्थित नागरहोले एवं मदुमलाई राष्ट्रीय उद्यान, वायनाड अभयारण्य तथा निलगिरी संरक्षित जैव मंडल इस सम्पूर्ण क्षेत्र को भारत में बाघों एवं हाथियों का विशालतम संग्रह बनाता है। जीप एवं बस द्वारा यहाँ जंगल सफारी आयोजित की जाती है।

यह उद्यान वनस्पतियों, जीव-जंतुओं पक्षियों तथा तितलियों से परिपूर्ण है।

कर्नाटक का दान्डेली अभयारण्य

मलाबारी चितकबरे धनेश एवं मलाबारी विशाल गिलहरियों से भरा दान्डेली अभयारण्य कर्नाटक के पश्चिमी घाट के ऊपर स्थित है। उत्तरी कन्नड़ जिले के ८६६ वर्ग कि.मी. के क्षेत्र में फैला यह अभयारण्य एक बाघ संरक्षित एवं हाथी संरक्षित क्षेत्र है। यहाँ जीप सफारी करते समय हमने कई गीदड़ों एवं नेवलों को ढूंडा। एक दर्शन स्थल से पश्चिमी घाट के घने विशाल जंगल की हरियाली देखकर दंग रह गए। आप यहाँ जीप सफारी ले सकते हैं जो सूर्योदय से पूर्व तथा संध्या के समय की जाती हैं।

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इस अभयारण्य के समीप से काली नदी बहती है। बाँध के जल से पोषित इस नदी में १२ महीने भरपूर जल बहता है। इसी कारण यह नदी एवं इसकी झीलें कई जलक्रीडाओं का केंद्र भी है। आप जंगल सफारी के साथ इन जल क्रीडाओं का भी आनंद ले सकते हैं। पक्षी अवलोकन के लिए भी यह उत्तम स्थान है। यहाँ आप २००से भी अधिक पक्षियों की प्रजातियाँ ढूंड सकते हैं।

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उत्तराखंड का बिनसर अभयारण्य

चलिए पर्यावरण का संरक्षण करें - बिनसर उत्तराखंड
चलिए पर्यावरण का संरक्षण करें – बिनसर उत्तराखंड

उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में अल्मोड़ा से लगभग ३५ कि.मी. दूर स्थित बिनसर अभयारण्य का क्षेत्रफल लगभग ४५ वर्ग कि.मी. है। बिनसर के जंगल में जीप सफारी एवं पैदल सफारी दोनों उपलब्ध है। हमने यहाँ पैदल सफारी की थी। इस जंगल को जानने के लिए यहाँ की वनस्पतियों एवं पशु-पक्षियों के मध्य पैदल सफारी सर्वोत्तम है। बिनसर अभयारण्य हिमालय दर्शन के लिए भी अत्यंत प्रसिद्ध है। अभयारण्य के भीतर स्थित कुमाऊं मंडल विकास निगम के अतिथिगृह से एवं जीरो-पॉइंट से हिमालय का अकल्पनीय दर्शन प्राप्त होता है।

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पहाड़ पर स्थित होने के कारण इस अभयारण्य में संकरी पगडंडियाँ हैं। यहाँ आप हिमालयी जंगली जानवरों को तो देख ही सकते हैं, साथ ही पहाड़ी शुद्ध वायु में पनपते वृक्ष एवं वनस्पतियों के भी दुर्लभ दर्शन कर सकते हैं। इस अभयारण्य में पक्षियों की भी कई प्रजातियाँ दिख जाती हैं।

जंगल सफारी का सही समय

किसी भी जंगल के भीतर सफारी करने का सर्वोत्तम समय प्रातःकाल, संध्या तथा रात्रि का समय होता है। ऐसा देखा गया है कि प्रातःकाल सूर्योदय के समय अधिकतर जंगली प्राणियों के दुर्लभ दर्शन हो जाते हैं। रात की सफारी में निशाचर प्राणियों को देखा जा सकता है।

जंगल सफारी के लिए कुछ आवश्यक जानकारियाँ:

• जंगल सफारी के समय कुछ भी खाद्य पदार्थ अपने साथ ना ले जाएँ।
• जंगल में भ्रमण केवल वन विभाग कर्मियों एवं प्रशिक्षित कर्मचारियों के संग ही करें।
• जंगल सफारी करने से पूर्व वन विभाग के अनुमति लेकर उनके दिशा-निर्देश में ही सफारी करें।
• जंगल में स्वयं भ्रमण करने कदापि ना निकलें।
• चटक एवं चमकीले रंग के वस्त्र धारण ना करें। इससे जंगली प्राणी डरकर दूर चले जाते हैं अथवा छुप जाते हैं। जंगल के परिवेश से मिलते जुलते वस्त्र ही पहनें।
• जंगल में गाना-बजाना ना करें। ना ही किसी अन्य प्रकार का शोर करें। इससे भी प्राणी दूर भाग जायेंगे। जंगल के संगीत पर ध्यान केन्द्रित करें। यह आपको अन्यथा नहीं सुनायी देंगे।
• जंगल सफारी के समय दूरबीन अवश्य साथ ले लें। इससे आप जंगली परिवेश एवं यहाँ के जीव-जंतुओं को समीप से देख सकेंगे।
• जानवरों को त्रास ना दें, ना ही उन्हें कुछ खिलाएं।
• जानवरों के समीप जाने का प्रयास ना करें। जानवरों के अपने सुरक्षित घेरे होते हैं। उस घेरे के समीप जाने पर वे भाग सकते हैं तथा कुछ दशाओं में वे आक्रामक भी हो सकते हैं। उनके क्षेत्र का आदर दें।
• जंगलों की पगडंडियाँ बहुधा ऊंची-नीच, घुमावदार एवं संकरी होती हैं। इन पर जीप द्वारा भ्रमण करते समय स्वयं का ध्यान रखें ताकि जीप के किसी भाग से आपको चोट ना पहुंचे। चौकस रहें तथा जीप की डंडी को कसकर पकड़ें।
• जंगल सफारी की जीप अधिकतर बंटवारे के आधार पर दिया जाता है। यदि आप समूह में भ्रमण कर रहें हैं तो पूर्ण जीप आपको दी जा सकती है।
• जीप सफारी करने से पूर्व इसके शुल्क की जानकारी प्राप्त कर लें। साथ ही इनकी अग्रिम बुकिंग कर लें ताकि वहां जाकर निराशा ना हो।
• अन्य सफारी के विषय में भी पूर्व जानकारी एकत्र करें। अपनी इच्छानुसार सफारी का चयन करें।
• प्रातःकालीन एवं रात्रि सफारी के समय शीतल वायु असहनीय हो सकती है। अतः सफारी के समय गर्म वस्त्र साथ ले लें। दोपहर की सफारी के समय टोपी भी अवश्य लें।
• जंगली जानवर अपने परिवेश में अपने नियमों से जीवन जीते हैं। अतः किसी भी जंगल में इन जानवरों के दिखने की गारंटी कोई नहीं दे सकता है। यदि आप बाघ, तेंदुआ अथवा अन्य दुर्लभ प्राणी ना देख पायें तो निराश ना होइये। जंगल के अन्य आकर्षणों का भी ध्यानपूर्वक अवलोकन करें। शहरी परिवेश में यह असंभव है।

छुट्टियों में जंगल सफारी की योजना

सामान्यतः वर्षा ऋतु में सभी राष्ट्रीय उद्यान एवं अभयारण्य पर्यटकों के लिए बंद होते हैं। भारत में वर्षा ऋतू की समयावधि विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न भिन्न होती है। अन्य समय में यहाँ सप्ताह में एक दिन तथा किसी राष्ट्रीय/स्थानीय उत्सवों में छुट्टी हो सकती है। अतः वन विभाग से प्रवेश की अग्रिम अनुमति एवं सफारी बुकिंग अवश्य प्राप्त कर लें। आप यह उनके वेबस्थल से प्राप्त कर सकते हैं अथवा आपने टूर ऑपरेटर या अपने होटल द्वारा भी इसकी व्यवस्था कर सकते हैं।

सफारी करने के लिए आपको राष्ट्रीय उद्यान का प्रवेश शुल्क, जीप का किराया तथा परिदर्शक का शुल्क देना पड़ेगा। वन्य जीवन प्रशिक्षण प्राप्त परिदर्शक आपको वन्य जीव-जंतु देखने में अत्यंत सहायक होते हैं। साथ ही वे आपको वन्य जीवन के विषय में आवश्यक जानकारी भी देते हैं।

प्रातःकालीन एवं दोपहर की जीप सफारी की व्यवस्था सामान्यतः उपलब्ध होती है। कई अभयारण्यों में हाथी सफारी, नौका सफारी, रात्री सफारी तथा पैदल सफारी की भी व्यवस्था होती है। इनके विषय में एवं इनके समय की पूर्ण जानकारी अवश्य प्राप्त करें। तत्पश्चात अपनी इच्छानुसार सफारी का चयन कर अग्रिम बुकिंग कर लें। सफारी के समय आपका परिचय पत्र तथा राष्ट्रीयता प्रमाण साथ रखें।

भारत के विभिन्न भौगोलिक भागों में भिन्न वन क्षेत्र हैं तथा उनमें भिन्न भिन्न ऋतुओं में सफारी की समयावधि भी भिन्न होती हैं। सफारी की योजना बनाते समय इन सब तथ्यों का अवश्य ध्यान रखें।

जंगल सफारी करने के पश्चात अपना अनुभव हमसे बांटना ना भूलें।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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