भारत के लोग Archives - Inditales श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Mon, 12 Jun 2023 05:19:14 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.7.5 लद्दाख की महिला बौद्ध दैवज्ञ से एक अविस्मरणीय भेंट https://inditales.com/hindi/mahila-bouddh-devagya-ladakh/ https://inditales.com/hindi/mahila-bouddh-devagya-ladakh/#respond Wed, 26 Oct 2022 02:30:26 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2841

लद्दाख ही नहीं, समूचा हिमालयीन क्षेत्र रहस्यों से परिपूर्ण प्रतीत होता है। पग पग पर हमारा सामना मायावी कथाओं एवं लोगों की विभिन्न आस्थाओं से होता है जिन्होंने इस रहस्यपूर्ण इंद्रजाल को जीवंत रखा है। चंद्रताल में मैंने एक गड़ेरिये की कथा सुनी थी जो सरोवर में स्थित एक जलपरी के प्रेम में बावला हो […]

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लद्दाख ही नहीं, समूचा हिमालयीन क्षेत्र रहस्यों से परिपूर्ण प्रतीत होता है। पग पग पर हमारा सामना मायावी कथाओं एवं लोगों की विभिन्न आस्थाओं से होता है जिन्होंने इस रहस्यपूर्ण इंद्रजाल को जीवंत रखा है। चंद्रताल में मैंने एक गड़ेरिये की कथा सुनी थी जो सरोवर में स्थित एक जलपरी के प्रेम में बावला हो गया था। वहीं गुलमर्ग में मैंने बाबा रेशी की कथा सुनी थी। उन्ही रहस्यमयी अनुभवों को जीवंत रखते हुए लद्दाख में मेरी भेंट एक बौद्ध दैवज्ञ अस्तित्व से हुई।

महिला बौद्ध दैवज्ञ से एक साक्षात्कार
महिला बौद्ध दैवज्ञ से एक साक्षात्कार

लद्दाख के थिकसे एवं चेमरे मठों तक सड़क यात्रा करने के पश्चात हम लेह से पूर्व, चोग्लाम्सर गाँव में रुके। हमारे परिदर्शक हमें वहां एक साधारण से लद्धाखी घर में ले गये। शीत ऋतु का प्रातःकाल था। घर के सभी सदस्य घर के बाहर बैठकर धूप सेक रहे थे। वे हमें घर के एक कक्ष के भीतर ले गए तथा वहां बैठने के लिए आसन दिया। हमने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई। कक्ष के भीतर सम्पूर्ण स्त्री वर्ग सामने की ओर बैठा था तथा पुरुष वर्ग कक्ष के पृष्ठभाग में विराजमान था।

लद्दाख की बौद्ध दैवज्ञ पद्मा लामो

कुछ क्षण पश्चात बौद्ध दैवज्ञ पद्मा लामो ने अपने नन्हे पोते के साथ कक्ष में प्रवेश किया तथा स्मित हास्य द्वारा हमारा अभिवादन स्वीकार किया। उन्होंने एक सामान्य सा सलवार व कुर्ता धारण किया हुआ था। किसी भी अन्य दादी की भाँति वे अपने पोते का हाथ पकड़कर कक्ष में आयी थी। हमारा अभिवादन स्वीकार करने के पश्चात वे कक्ष से चली गयीं। कुछ क्षणों पश्चात वे पारंपरिक बौद्ध परिधान धारण कर आध्यात्मिक बैठक हेतु पुनः उपस्थित हो गयीं। उन्होंने पूर्व के परिधान के ऊपर एक लम्बा पारंपरिक बौद्ध चोगा धारण कर लिया था। वैसे भी जनवरी मास में लद्दाख जैसे स्थान पर वस्त्रों की कितनी भी परतें हों, आवश्यक ही प्रतीत होती हैं।

बौद्ध दैवज्ञ पद्मा लामो जी
बौद्ध दैवज्ञ पद्मा लामो जी

आज मेरी प्रसन्नता चरम सीमा पर थी क्योंकि मैं अपने समक्ष एक स्त्री दैवज्ञ के दर्शन कर रही थी। हम में से अधिकांश आगंतुकों ने अपने मानसपटल पर मानव स्वभाववश एक पुरुष बौद्ध दैवी अस्तित्व की छवि उभार ली थी। हमें पूर्व सूचना प्रदान की गयी थी कि हमें उनके व सम्पूर्ण आध्यात्मिक बैठक के छायाचित्र अथवा चलचित्र नहीं लेने हैं। उन्हें विचारने योग्य प्रश्नों की पूर्व सूची भी तैयार रखने के लिए कहा गया था। हमारे जीवन से सम्बंधित किसी भी विषय पर प्रश्न पूछने की हमें अनुमति थी।

बौद्ध अनुष्ठान

अनुष्ठान के लिए धान्य एवं दीप
अनुष्ठान के लिए धान्य एवं दीप

पद्मा लामो जी ने बौद्ध अनुष्ठानों का आरम्भ करते हुए समक्ष एक पंक्ति में रखे पीतल के अनेक पात्रों में जल भरना आरम्भ किया। कुछ पत्रों में सत्तू तथा गेहूं जैसे धान्य भी भरे। तत्पश्चात उन्होंने एक दीप प्रज्ज्वलित किया। हमें यह जानने की उत्सुकता थी कि दीपक में तेल भरा है अथवा याक का मक्खन। उन्होंने हास्य करते हुए कहा कि ‘यह अमूल मक्खन है’। मुझे अमूल कंपनी की पहुँच पर अचम्भा हुआ। पद्मा लामो जी के सधे हुए हाथों में अनेक वर्षों का अभ्यास स्पष्ट झलक रहा था।

चीख

अनुष्ठान की सभी आवश्यकताएँ पूर्ण करने के पश्चात पद्मा लामो जी ने एक बंधी हुई पोटली अपने समीप अपने आसन पर रख दी तथा वेदी पर विराजमान देवों के समक्ष नतमस्तक हो गयीं। अचानक हमारे आसपास स्थित मौन भरे वातावरण में कर्णभेदी स्वर गूँज उठा। नतमस्तक हुई पद्मा जी अचानक एक तीव्र चीख के साथ उठकर बैठ गयीं। उनकी चीख इस तथ्य का द्योतक थी कि वे एक दैवी अवस्थिति में प्रवेश कर चुकी हैं। वे प्रबलता से अपना शीष हिला रही थीं। उनके केशों से छिटकता जल कक्ष में चारों ओर पसर गया था। उनके मुंह से ऊँचे स्वर में निकलते अस्पष्ट शब्द मुझे व्याकुल व भयभीत कर रहे थे। मुंह से तीव्र अस्पष्ट स्वर निकालते हुए ही उन्होंने अपनी पोटली खोली तथा उसमें से एक मुकुट निकाल कर अपने शीष पर धारण कर लिया। उस मुकुट पर विभिन्न बोधिसत्वों के चित्र चित्रित थे। बैठक के पश्चात मुझे बताया गया था कि इस मुकुट को अपने शीष पर वही धारण कर सकता है जो दैवी स्थिति में प्रवेश कर चुका है।

पद्मा लामो जी अपना अनुष्ठान का सामान समेटते हुए
पद्मा लामो जी अपना अनुष्ठान का सामान समेटते हुए

तत्पश्चात पद्मा जी ने एक ब्रोकेड का वस्त्र ओढ़ लिया, जो वैसा ही था जैसा हमने इससे पूर्व स्पितुक मठ के गस्टर उत्सव में चाम नर्तकों को धारण करते देखा था। दीर्घ काल तक झूमने, हिलने एवं चीखने के पश्चात वे हमारे प्रश्नों के उत्तर प्रदान करने के लिए तत्पर हुईं। ऐसा माना जाता है कि उनकी इस स्थिति में कुछ दिव्य आत्माएँ उनके शरीर पर आधिपत्य जमा लेती हैं। वे उन आत्माओं एवं हमारे मध्य एक माध्यम की भूमिका निभाती हैं जिनके द्वारा हम उन आत्माओं से चर्चा कर सकते हैं। प्रश्न पूछने से पूर्व हमने उन्हें एक श्वेत दुपट्टा अर्पित किया जिसे उन्होंने उत्तर देने से पूर्व हमें वापिस दे दिया। हमारे परिदर्शक अर्थात् गाइड ताशी ने एक दुभाषिये की भूमिका निभाते हुए हमारे प्रश्नों को एक भिन्न भाषा में अनुवादित कर उन्हें सुनाया। हमने अनुमान लगाया कि वह लद्दाखी भाषा होगी। उनका उत्तर सुनने के पश्चात ताशी ने उन्हें पुनः हिन्दी/अंग्रेजी में अनुवाद कर हमें बताया।

बौद्ध दैवज्ञ के साथ प्रश्नोत्तरी

प्रत्येक प्रश्न सुनने के पश्चात पद्मा जी गेहूं के कुछ दानों को डमरू पर छिड़कती थीं। दाने कहाँ गिर रहे हैं, उसके आधार पर वे हमें उत्तर प्रदान कर रही थीं। हममें से कुछ के कोई प्रश्न नहीं थे। हमने केवल उनसे आशीष माँगा। हो सकता है कि हमारे इस व्यवहार को उन्होंने अपनी दैवी शक्ति व क्षमता पर हमारे विश्वास की कमतरता माना हो। किन्तु हम असमंजस में थे। इस प्रकार के व्यक्तिगत व अन्तरंग प्रश्नोत्तरी के लिए एकांत एवं घनिष्ठता की आवश्यकता होती है जो लोगों से भरे उस कक्ष में उपलब्ध नहीं था। हममें से कुछ लोगों ने सामान्य प्रश्न अवश्य पूछे थे, जैसे क्या भविष्य में उनके स्वास्थ्य में सुधार होगा? इन प्रश्नों के वे सामान्य व व्यापक उत्तर दे रही थीं, जैसे आपके शरीर का भार आवश्यकता से अधिक है, अतः आपको भविष्य में कष्ट हो सकता है अथवा आप वैद्य से आवश्यक सलाह लें, आदि।

हमारे वाहन चालक ने अपने स्वर व भावभंगिमाओं द्वारा पूर्ण विश्वास प्रदर्शित करते हुए उनसे लद्दाखी भाषा में प्रश्न किया। तब उन्होंने उसके कष्ट का पूर्ण रूप से संज्ञान लेते हुए अत्यंत आत्मीयता से उसे लद्दाखी भाषा में उत्तर दिया। हमारा वाहन चालक उनके उत्तर से अत्यंत संतुष्ट था। हमारे सन्दर्भ में कदाचित हमारी भाषा से लद्दाखी भाषा तथा विपरीत अनुवाद करने में हमारे प्रश्नों एवं उनके उत्तरों के सटीक भाव कहीं लुप्त हो रहे थे। इसीलिए हम उनकी इस शक्ति का अनुभव नहीं ले सके।

सभी के प्रश्न समाप्त होते ही पद्मा जी अपनी तन्मयावस्था से बाहर आयीं तथा पूर्व रूप से आचरण करने लगीं। किन्तु उनके मुख पर थकान स्पष्ट दिखाई पड़ रही थी। कुछ क्षण पूर्व वे जिस उग्र रूप में स्थित थीं, उससे बड़ी मात्रा में उनकी उर्जा व्यय होती होगी। सम्पूर्ण कालावधि में यदि कुछ उन्हें विचलित कर रहा था, तो वह था उनका नन्हा पोता।

पुनः सामान्य स्थिति में प्रवेश

सामान्य स्थिति में पुनः प्रवेश करते ही पद्मा जी हमसे हिन्दी भाषा में वार्तालाप करने लगीं। हम यह विचार करने के लिए विवश हो गए कि उनकी तन्मयावस्था में हमें एक अनुवादक की आवश्यकता क्यों पड़ी? हिन्दी भाषा में वार्तालाप करते हुए हम उनसे अधिक आत्मीयता से जुड़ सकते थे। किन्तु हमें बताया गया कि अपनी तन्मयावस्था में वे केवल तिब्बती भाषा में ही संवाद कर सकती हैं। उस क्षण मुझे यह आभास हुआ कि वे तिब्बती भाषा में संवाद कर रही थीं, ना कि लद्दाखी भाषा में।

पद्मा जी से वार्तालाप करते हुए हमें ज्ञात हुआ कि वे अपनी वंशावली एवं अपने पारिवारिक परम्पराओं के आधार पर बौद्ध दैवज्ञ बनी हैं। पद्मा जी से पूर्व उनके दादाजी भी बौद्ध दैवज्ञ थे तथा उन्होंने अपनी धरोहर पद्मा जी को विरासत के रूप में प्रदान की थी। दैवज्ञ पदवी प्राप्त करने के लिए पद्मा जी ने अनेक बौद्ध लामाओं से प्रशिक्षण प्राप्त किया था। वे अपने दैवज्ञ प्राप्ति की प्रक्रिया के विषय में अधिक चर्चा करने में उत्सुक नहीं थीं। ना ही वे इस प्रक्रिया के विषय में सामान्य ज्ञान प्रदान करने के लिए तत्पर थीं। अतः तिब्बती बौद्ध धर्म के अंतर्गत एक दैवज्ञ आत्मा की पहचान कैसे की जाती है, इस विषय पर मैंने एक विडियो एवं संस्करण ढूंढा है। आप इसे देखकर आवश्यक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

श्रद्धा व सम्मान

हम इस तथ्य से अत्यंत ही आनंदित थे कि हमें एक स्त्री बौद्ध दैवज्ञ से भेंट करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। हमने प्रत्यक्ष अनुभव किया कि उनके गाँव के स्थानिक अपने बौद्ध दैवज्ञ पद्मा जी से अत्यंत श्रद्धा व सम्मान से व्यवहार करते हैं। पद्मा जी इसे अपना सौभाग्य मानती हैं कि भगवान ने उन्हें लोगों के कष्टों एवं समस्याओं के निवारण के लिए एक माध्यम  के रूप में चयनित किया है। अनेक दुखियारे उनके पास विविध समस्याएं लेकर आते हैं। वहां से वापिस जाते समय वे अपने साथ समस्याओं का निवारण ले जाते हैं। यदि संतोषजनक निवारण प्राप्त ना भी हो तो अपने साथ कम से कम एक आशा तथा आनंद अवश्य लेकर जाते हैं।

और पढ़ें – दिल्ली श्रीनगर लेह सड़क यात्रा – जहां मार्ग ही लक्ष्य बन जाता है!

श्रद्धा एवं विश्वास

श्रद्धा उसे ही होती है जिसके भीतर विश्वास होता है। मैंने उस कक्ष में बैठे सभी लद्दाखियों में पद्मा लोमा जी के प्रति असीम श्रद्धा एवं विश्वास देखा। उन्हें पूर्ण विश्वास था कि उनके बौद्ध दैवज्ञ के पास उन की सभी समस्याओं एवं कष्टों का निवारण है। मुझे आभास हुआ कि इस प्रकार की श्रद्धा एवं विश्वास कुछ क्षणों में निर्मित नहीं होती हैं। ऐसी श्रद्धा व विश्वास का निर्माण होने में एक कालावधि व्यतीत हो जाती है। अपने अनेक अनुभवों द्वारा पुष्टिकरण के पश्चात् ही हम किसी नवीन संकल्पना पर विश्वास करने के लिए तत्पर होते हैं।

मेरे लिए दैवी आत्मा पद्मा लामोजी से प्रत्यक्ष भेंट करना स्वयं में एक अनोखा अनुभव था। साथ ही उनकी पूर्ण तन्मयावस्था में लिप्त होने की प्रक्रिया को भी प्रत्यक्ष देखने का अवसर प्राप्त हुआ। वे जिस प्रकार से लोगों के प्रश्नों एवं समस्याओं को सुनकर उन्हें उत्तर दे रही थीं, वह भी अत्यंत दर्शनीय था। अंत में वे जिस प्रकार एक सामान्य स्थिति में पुनः आयीं तथा जिस सहजता से एक अनुरक्त दादी की भूमिका में समाहित हो गयीं, यह सब अनुभव करना हमारे लिए अद्वितीय था। स्वयं को एक भूमिका से दूसरी भूमिका में अत्यंत सहजता एवं सत्यता से आत्मसात करना, अनेक वर्षों के अनुभव से ही संभव हो सकता है।

वे हमें एक असाधारण एवं दिव्य सिद्धि से परिपूर्ण स्त्री प्रतीत हुईं।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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गंगा देवी – मिथिला की मधुबनी चित्रकार और उनकी चित्रकारी https://inditales.com/hindi/ganga-devi-mithila-madhubani-artist/ https://inditales.com/hindi/ganga-devi-mithila-madhubani-artist/#comments Wed, 17 Jan 2018 02:30:27 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=498

मिथिला की प्रसिद्ध चित्रकार गंगा देवी की मधुबनी चित्रकारी   आज मधुबनी और वार्ली चित्रकारी भारत की आदिवासी चित्रकला या लोक कला का प्रतीक बन चुकी है। यह चित्रकारी दिल्ली हाट की गलियों में, सूरजकुंड मेले में और अन्य कला उत्सवों में भी देखी जा सकती है। ये कला उत्सव भारत भर के विविध प्रकार […]

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मिथिला की प्रसिद्ध चित्रकार गंगा देवी की मधुबनी चित्रकारी  

गंगा देवी द्वारा अमरीका यात्रा का चित्रण
गंगा देवी द्वारा अमरीका यात्रा का चित्रण

आज मधुबनी और वार्ली चित्रकारी भारत की आदिवासी चित्रकला या लोक कला का प्रतीक बन चुकी है। यह चित्रकारी दिल्ली हाट की गलियों में, सूरजकुंड मेले में और अन्य कला उत्सवों में भी देखी जा सकती है। ये कला उत्सव भारत भर के विविध प्रकार के कलाकारों को एकत्र लाने का सबसे अच्छा माध्यम है। भारत के ग्रामीण घरों की दीवारों पर सजी इस चित्रकारी को जब कागज का सहारा मिला, तो चित्रकारों ने भी इस नए माध्यम के जरिये अपनी कला को पंख देने का निश्चय कर लिया। इस प्रकार पिछले 2-3 दशकों से आदिवासी चित्रकला व्यापक स्तर पर अपनी विशेष पहचान बनाने में सफल रही है।

एक बार मुझे गोवा विश्वविद्यालय में आदिवासी चित्रकला के संबंध में हुई संगोष्ठी में भाग लेने का मौका मिला था, जो नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्राध्यापक श्री ज्योतीन्द्र जैन द्वारा आयोजित की गयी थी। इस संगोष्ठी में उन्होंने कुछ आदिवासी चित्रकारों की जीवनकथाएं सुनाई थी, जिन्होंने ग्रामीण चित्रकला के क्षेत्र में आए परिवर्तनों को लाने में प्रमुख भूमिका निभाई थी। इन्हीं में से एक थी मिथिला की गंगा देवी, जिन्होंने मधुबनी चित्रकारी के आंदोलन का मार्गदर्शन किया।

तो अब मैं इस महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध चित्रकार की जीवन कथा को आपके साथ साझा करने जा रही हूँ।

गंगा देवी और मधुबनी चित्रकारी   

गंगा देवी द्वारा रामायण में रावण वध का चित्रण
गंगा देवी द्वारा रामायण में रावण वध का चित्रण

गंगा देवी बिहार के मिथिला क्षेत्र में बसे एक छोटे से गाँव में रहती थी। बच्चा न हो पाने के कारण उनके पति ने उन्हें छोड़ दिया और दूसरा विवाह कर लिया। और इतना ही नहीं, उनके पास जो कुछ बचा था वह घरेलू मतभेदों के चलते उन्हें अपनी सौतन को सौपना पड़ा। समय के जिस दौर और वातावरण में गंगा देवी रह रही थी, उसमें उनकी किस्मत कुछ खास अलग नहीं थी। यद्यपि उनका भाग्य दूसरों से अलग जरूर था। इसी भाग्य ने एक दिन एक फ़्रांसिसी कला संग्राहक को उनके दरवाजे पर लाकर खड़ा कर दिया। इस कला संग्राहक ने गंगा देवी को कागज देकर उसपर उनके लिए कुछ चित्र बनाने को कहा। उनकी चित्रकारी देखकर वे इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने गंगा देवी को इनाम के तौर पर बहुत बड़ी रकम दे दी। उनके लिए शायद उन पैसों का कोई मोल नहीं था, लेकिन गंगा देवी के लिए ये पैसे ज़िंदगी काटने के लिए काफी थे।

इस प्रकार धीरे-धीरे उनकी कला चित्रकारी के क्षेत्र में उभरने लगी और उनके चित्रों की मांग बढ़ती गयी। वे दिल्ली के संग्रहालयों के अध्यक्षों की नजरों पर छाने लगी, जिन्होंने उन्हें शिल्प संग्रहालय जैसी जगहों पर आमंत्रित करना शुरू किया। इसी के साथ उन्होंने साधिकार चित्रों पर काम करना आरंभ किया। इसके बाद जैसे प्रसिद्धि ने उनके कदम चूम लिए।

मधुबनी चित्रकारी 

अनंतता का प्रतीक - मधुबनी, गंगा देवी
अनंतता का प्रतीक – मधुबनी, गंगा देवी

मधुबनी चित्रकारी पारंपरिक रूप से मिथिला के ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित घरों की दीवारों पर की जाती थी। ये चित्र धार्मिक क्रियाकर्मों पर आधारित हुआ करते थे, जिन्हें कोहबर कहा जाता था। इन चित्रों में वर्णनात्मक प्रतीकों का प्रयोग किया जाता है जिन्हें विशिष्ट रंगों में दर्शाया जाता है। ये चित्र ज्यादातर शादी-ब्याह जैसे समारोहों पर बनाए जाते थे। उदाहरण के लिए, दूल्हे का कमरा जिसमें नव-विवाहित दूल्हा-दुल्हन रहते थे, उसे प्रजनन के प्रतीकों से चित्र रूप में सजाया जाता था, जैसे बांस का पेड़ या पूर्ण रूप से खिला हुआ कमल का फूल।

इन भित्तिचित्रों से एक प्रकार की पवित्रता की भावना जुड़ी होती थी। ये चित्र घर की औरतों से संबंधित हुआ करते थे, जो स्वयं ये चित्र बनाती थीं। यह मानने में कोई हर्ज नहीं कि यह कला उन्होंने अपने परिवार की बुजुर्ग औरतों के अनुसरण द्वारा सीखी है क्योंकि, उस समय चित्रकारी सीखने के लिए कोई खास प्रशिक्षण केंद्र नहीं होते थे और महिलाओं के लिए तो इसकी उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी। इसके पीछे या तो इन महिलाओं की व्यक्तिगत रुचि रही होगी या फिर हालात कारणीभूत रहे होंगे। वजह चाहे जो भी हो, लेकिन इनके चलते इनमें से कुछ महिलाओं ने शायद अपनी सखियों से कई अधिक चित्र बनाए होंगे।

मधुबनी चित्रकारी का कागजी सफर  

1960 के दौरान भारत सरकार ने इस गाँव में मुफ्त के कागज वितरित करने का निश्चय किया, जिसने महिलाओं को दीवारों के बदले कागजों पर अपनी कलाकारी को आकार देने के लिए प्रोत्साहित किया। चित्रकारी के बदलते माध्यम के साथ-साथ उसके विषयवस्तु की व्यापकता भी बढ़ती गयी। अब तक अनभिज्ञता के आवरण में ढके इस नए और प्रभावपूर्ण माध्यम की अचानक उपलब्धि ने गंगा देवी जैसी अनेकों महिलाओं की रचनात्मकता को अनावृत किया।

आगे जाकर इनमें से बहुत सी महिलाएं अपनी अनोखी चित्रण शैली के कारण सुविख्यात चित्रकार बन गईं। तथापि, विरासत के रूप में इन महिलाओं ने अपने क्षेत्र के लोगों के लिए कलाकेंद्र बनवाया। मधुबनी चित्रकारों की वृद्धि देखने के लिए आपको दिल्ली हाट जैसी जगहों की सैर करनी चाहिए या फिर किसी कला उत्सव में जाना चाहिए। इन कलाकारों के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने का यही सबसे प्रभावी माध्यम है। इससे भी अधिक यह ग्रामीण समुदायों के लिए रोजगार का प्रमुख स्त्रोत है।

गंगा देवी द्वारा निर्मित रामायण की चित्रकथा  

राम लक्ष्मण सीता का केवट के नाव पे जाना - मधुबनी चित्र गंगा देवी
राम लक्ष्मण सीता का केवट के नाव पे जाना – मधुबनी चित्र गंगा देवी

धार्मिक क्रिया-कर्मों पर आधारित भित्तिचित्र बनाने वाली गंगा देवी ने रामायण जैसे विषय पर किस प्रकार की चित्रकारी की होगी? वैसे तो बचपन से हम सभी रामायण जैसे महाकाव्यों की गाथाएँ सुनते आए हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी से गुजरती रामायण की इन्हीं कथाओं को गंगा देवी ने अपनी चित्र श्रृंखला में अनुवादित किया। इसके अलावा उन्होंने बचपन से सुनती आयी अन्य लोक कथाओं को भी अपने चित्रों में ढाल दिया।

उनकी चित्रकारी में हाथ की संयमता, चित्रों की स्पष्टता और रंगों की प्रयोगात्मकता साफ झलकती है, जो चित्रकारी के इस व्यापक क्षेत्र में अन्यत्र दुर्लभ है। कागज के चौखटे में उपलब्ध सीमित जगह को चित्रकारी में इस्तेमाल करने की उनकी कला अप्रतिम है। चाहे उन्हें एक ही चित्र में अनेक दृश्य दिखाने हो या फिर गुजरते समय को दिखाना हो, उस छोटी सी जगह का प्रयोग वे उत्तम रूप से करती हैं।

गंगा देवी द्वारा बनाई गयी मानव जीवन की चित्र श्रृंखला  

गंगा देवी की मानव जीवन श्रृंखला
गंगा देवी की मानव जीवन श्रृंखला

मानव जीवन की चित्र श्रृंखला गंगा देवी की चित्रकारी का उत्कृष्ट नमूना है। इसमें उन्होंने एक ग्रामीण स्त्री का जीवन-चक्र चित्रित किया है। उस स्त्री के जन्म से लेकर यौनावस्था में उसका प्रवेश, उसकी शादी, उसका गर्भवती होना और विविध संस्कारों से गुजरना, बच्चे को जन्म देना, उसका पालन-पोषण करना, ताकि वह बच्चा आगे जाकर अपना एक नया जीवन चक्र आरंभ करने में सक्षम बन सके।

गर्भवती स्त्री का चित्रण - गंगा देवी
गर्भवती स्त्री का चित्रण – गंगा देवी

इस चित्र श्रृंखला में उन्होंने एक स्त्री के जीवन पड़ावों का चित्रण बहुत ही सादगी और सरलता के साथ किया है। इस में चित्रित दृश्यों को दर्शाने के लिए उन्होंने विशिष्ट प्रतीकों का उपयोग किया है और इन प्रतीकों के साथ भी उनकी प्रयोगात्मकता साफ दिखाई देती है। उनकी चित्रकारी जैसे समकालीन समाज की सांस्कृतिक बुनावट का दस्तावेजीकरण बन गयी है। जिसमें बच्चे को बुरी नज़र से बचाना या बच्चे के जन्म पर क्लीवों का नाच-गाना या कुलदेवता की पूजा करना जैसी छोटी-छोटी बातों को कलात्मक रूप से प्रस्तुत किया गया है।

गंगा देवी और अमरीका    

गंगा देवी की अमरीका यात्रा के दृश्य - मधुबनी चित्र शैली में
गंगा देवी की अमरीका यात्रा के दृश्य – मधुबनी चित्र शैली में

अमरीका जैसे पाश्चात्य देशों की यात्रा करने के पश्चात गंगा देवी के चित्रों में एक परिवर्तनात्मक मोड आया। अपनी यात्रा के दौरान उन्होंने जो भी देखा या अनुभव किया वह उनके लिए बिलकुल नया था। इन अनुभवित नज़ारों को उन्होंने अपनी चित्र श्रृंखला के जरिए अभिव्यक्त किया। उनकी इस चित्र श्रृंखला के कुछ चित्र मुझे सच में बहुत पसंद आए। उनके ये चित्र प्राच्य लोक कला और पश्चिमी समाज के अद्भुत सम्मिश्रण की उत्तम कलकारी है।

इन चित्रों को देखकर लगता है, जैसे गंगा देवी ने अपने अनुभवों को पूर्ण रूप से आत्मसात कर लिया हो। मुझे याद है कि जब गोंड चित्रकार लंदन से वापस आए थे तब उन्होंने भी तारा बुक्स द्वारा प्रकाशित एक किताब के लिए कुछ इसी प्रकार की चित्रकारी की थी। इसके अलावा गंगा देवी ने अपनी अन्य यात्राओं, जैसे बद्रीनाथ और उत्तराखंड की यात्रा से अर्जित अनुभवों के आधार पर ऐसे ही चित्र बनाए थे।

बद्रीनाथ यात्रा - गंगा देवी की मधुबनी शैली में
बद्रीनाथ यात्रा – गंगा देवी की मधुबनी शैली में

अपने अनुभवों को चित्रानुवाद द्वार अभिव्यक्त करने की गंगा देवी की कला अद्वितीय है। चित्रकला के प्रति उनके इस योगदान के लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

जीवन की इतनी सारी उपलब्धियों के दौरान गंगा देवी कैंसर जैसी भयानक बीमारी से जूझ रही थी। लेकिन उन्होंने इसे अपनी कमजोरी न बनाकर, अपने संघर्षों को कलात्मकता का रूप देकर उन्हें अपने चित्रों में ढाल दिया। तथापि कैंसर से उनकी इस लड़ाई में आखिर जीत उन्हीं की हुई और वे वापस अपने गाँव में रहने चली गयी। लेकिन नियति को शायद कुछ और मंजूर था। उनके सौतेले बेटे, जो शायद उनकी नयी-नयी अधिग्रहीत संपत्ति को हड़पना चाहता था, के हाथों गंगा देवी को बहुत ही हिंसक मृत्यु प्राप्त हुई।

चित्रकार और चित्रकारी  

गंगा देवी ने जिन परिस्थितियों में चित्रकारी का यह सफर शुरू किया था, उससे स्पष्ट होता है कि इस सफर में उन्होंने बहुत कुछ अर्जित किया है। लेकिन इससे अधिक वे अपने गाँव में अपने लिए एक पक्का घर बनवाना चाहती थी। आज उनकी इस कला के माध्यम से बहुत से लोग उन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं। उनके द्वारा बनाए गए चित्र, कला के बाज़ारों में लाखों–करोड़ों में बिक रहे हैं। इसके अलावा उनके कुछ भित्तिचित्र आप आज भी दिल्ली के शिल्प संग्रहालय में देख सकते हैं।

किसी भी चित्रकार की चित्रकारी की महत्ता और उसका मूल्य गुजरते समय के साथ बढ़ता जाता है। जो चित्रकारी जितनी पुरानी होती है, उसका मोल भी उतना ही अधिक होता है। ये कलाकृति जिसके भी पास जाती है उसकी झोली खुशियों और संपत्ति से भर देती है।

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गंगुबाई हंगल – हुबली धारवाड़ से निकली एक संगीत धारा https://inditales.com/hindi/dr-gangubai-hangal-hubballi-dharwad/ https://inditales.com/hindi/dr-gangubai-hangal-hubballi-dharwad/#comments Wed, 05 Jul 2017 02:30:57 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=307

धारवाड़ – हुबली जाने के पीछे मेरा बस एक ही कारण रहा है और वह है, प्रख्यात गायिका डॉ. गंगुबाई हंगल के बारे में थोड़ा और जानने की मेरी इच्छा। उनका देहांत होने के कुछ ही दिनों बाद मैंने किसी अखबार में उनसे संबंधित एक लेख पढ़ा जिसमें बताया गया था कि धारवाड़ में स्थित […]

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डॉ गंगुबाई हंगलधारवाड़ – हुबली जाने के पीछे मेरा बस एक ही कारण रहा है और वह है, प्रख्यात गायिका डॉ. गंगुबाई हंगल के बारे में थोड़ा और जानने की मेरी इच्छा। उनका देहांत होने के कुछ ही दिनों बाद मैंने किसी अखबार में उनसे संबंधित एक लेख पढ़ा जिसमें बताया गया था कि धारवाड़ में स्थित उनका घर अब संग्रहालय में रूपांतरित किया गया है। तथा हुबली में उनकी स्मृति में एक गुरुकुल भी बनवाया जा रहा है। तब से मेरे मन में इन जगहों पर जाकर गंगुबाई हंगल को करीब से जानने की इच्छा ने जन्म लिया। वहां पर जाकर मैं देखना चाहती थी कि डॉ. गंगुबाई हंगल जैसे संगीतकारों को पैदा करने वाली और उन्हें निखारने वाली जगह और वहां का वातावरण कैसा होता होगा। क्या वहां के वातावरण में ही ऐसा कुछ खास है या फिर यह इन महान व्यक्तियों का ही सौभाग्य है।

धारवाड़ से जुड़े उपाख्यान

धारवाड़ के बारे में थोड़ा और पढ़ने के बाद मुझे मालूम हुआ कि, गंगुबाई हंगल इस शहर द्वारा जनित इकलौती उस्ताद नहीं है, बल्कि उनके अलावा यह शहर मल्लिकार्जुन मंसूर, भीमसेन जोशी, रमाकांत जोशी, सवाई गंधर्व, बसवराज राजगुरु जैसे उस्तादों का भी जनक रहा है। वास्तव में कुमार गंधर्व बेलगाम के भी रहिवासी है जो यहां से बहुत दूर नहीं है। ‘स्पीकिंग ट्री’ द्वारा पोस्ट किया गया एक लेख इस बात पर प्रकाश डालता है कि, किस प्रकार से संगीत के उस्ताद और श्रोता संगीतमय वातावरण का निर्माण कर उभरते हुए संगीतकारों को खिलने और अपनी महक चारों ओर बिखेरने के लिए उचित मंच प्रदान करते है। संगीत में डूबे इस धारवाड़ शहर ने मुझे जर्मनी में स्थित लेपजिग शहर की याद दिला दी जो वर्षों से संगीत की विरासत को संभालते आ रहा है।

धारवाड़ में होसयल्लापुर नामक एक इलाका है जहां के चौक पर एक छोटा सा मंदिर बसा हुआ है। इस मंदिर से बाहर निकलती हुई, विराट रूप ग्रहण करती हनुमान जी की अप्रतिम मूर्ति को देखकर लगता है, जैसे शक्षात हनुमान जी ही वहां पर खड़े हैं। इस चौक से चलते हुए मैं लाइन बाज़ार की ओर गयी, जो बाबू सिंह ठाकुर का पेढ़ा के लिए मशहूर है। यहां पर मैंने आस-पास के लोगों से गंगुबाई हंगल के घर का पता पूछा, जिन्होंने मुझे गांधी चौक तक जाकर, वहां पर किसी से भी उनके घर का पता पूछने के लिए कहा। इसके अनुसार गांधी चौक पहुँचकर मैंने वहीं के कुछ बच्चों से गंगुबाई के घर के बारे में पूछा। तो उनसे मुझे यह जवाब मिला कि उन्होंने गंगुबाई के बारे में पहले कभी नहीं सुना था। लेकिन पीछे से आती हुई एक महिला ने रुकर मुझे उनके घर तक जाने का रास्ता बता दिया। यहां पर आपको अपनी मंजिल तक ले जाने वाले कोई भी दिशा निर्देशक पट्ट नहीं मिलते। लेकिन शुक्र है कि भारत में कम से कम लोग तो आपको सही जगह तक पहुंचा ही देते हैं। बहुत सी छोटी-छोटी गलियों से गुजरते हुए, छोटे-बड़े मंदिरों को पार करते हुए आखिर मैं उनके घर तक पहुँच ही गयी।

गंगोत्री – डॉ. गंगुबाई हंगल की जन्मभूमि

गंगोत्री - डॉ गंगुबाई हंगल का जन्मस्थान
गंगोत्री – डॉ गंगुबाई हंगल का जन्मस्थान

डॉ. गंगुबाई हंगल के घर के बाहर ही लगे नामपट्ट पर लिखा था – ‘गंगोत्री – डॉ. गंगुबाई हंगल की जन्मभूमि’। घर के छोटे से बरामदे में कोकम सुखाने के लिए रखा गया था। घर के प्रवेश द्वार की ओर बढ़कर मैंने देर तक दरवाजा खटखटाया और कुछ समय बाद एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति ने दरवाजा खोलते हुए मुझे शाम के 5 बजे फिर से आने के लिए कहा। लेकिन थोड़ा सा अनुरोध और कुछ मीठी बातें करने पर उन्होंने मुझे अंदर आने की अनुमति दे ही दी। भीतर प्रवेश करते ही उन्होंने घर की सारी बत्तियाँ जला दी, जिससे पूरा घर प्रकाशमय हो उठा। एक पतले से दलान, जिसमें डॉ. गंगुबाई हंगल की बड़ी-बड़ी तस्वीरें लगाई गयी थीं, से गुजरते हुए वे मुझे मुख्य घर तक ले गए। जो शायद कभी घर का बैठक कक्ष हुआ करता था अब संग्रहालय में परिवर्तित किया गया था। यह पूरा संग्रहालय परिवार की सबसे प्रख्यात बालिका को समर्पित किया गया था।

तस्वीरें – कुछ कैद की हुई यादें

५० सालों के अंतर पे - डॉ गंगुबाई हंगल
५० सालों के अंतर पे – डॉ गंगुबाई हंगल

इस संग्रहालय के बीचोबीच एक तस्वीर है जिसमें गंगुबाई हंगल अपने संगीत वाद्यों के साथ गाते हुए नज़र आती हैं। यहां पर चारों ओर आपको उन्हीं की तस्वीरें दिखाई देती हैं। इस कक्ष के एक दीवार पर उनकी दादी से लेकर उनके माता-पिता तथा उनके पति और बच्चों तक पूरे परिवार की तस्वीरे हैं। यहीं पर मैंने जाना कि उन्हें अपना ‘हंगल’ उपनाम ना ही अपने पति से मिला है और ना अपने पिता से, बल्कि यह उपनाम उन्हें अपनी नानी से मिला है, जो कि मातृप्रधान वंशावली को दर्शाता है। लेकिन इसके पीछे के कारणों की मुझे ठीक जानकारी नहीं मिल पायी। शायद, जिस समाज से गंगुबाई हंगल आई है वहां पर यही परंपरा रही होगी या फिर हंगल परिवार के संबंध में यह बात एक अपवाद का रूप भी हो सकती है।

यहां पर दो बड़े-बड़े सूचना पट्ट लगाए गए हैं, जिनमें से एक अंग्रेजी और दूसरा कन्नड में है। ये दोनों पट्ट गंगुबाई हंगल के जीवन से जुड़ी प्रमुख घटनाओं द्वारा उनके जीवन को रेखांकित करते हैं। उनके जीवन की उपलब्धियों पर गौर करें तो आपके रोंगटे खड़े हो जाते हैं, खास कर तब जब आपको एहसास होता है कि आप उन्हीं कि जन्मभूमि पर खड़े हैं।

मंच प्रदर्शन की तस्वीरें

बाकी 2-3 कमरों में उनके विविध जगहों पर आयोजित गायन कार्यक्रमों की तस्वीरें लगाई गयी हैं। यहां पर उनकी और भी तस्वीरें हैं जिनमें गंगुबाई हंगल अन्य जाने-माने संगीतकारों तथा फिल्मी हस्तियों के साथ नज़र आती है। उनके परिवार की भी कुछ तस्वीरें आपको यहां पर नज़र आती हैं। इसके अलावा यहां पर उनके जीवन के विविध चरणों की तस्वीरें भी मिलती हैं, जो एक नन्ही सी लड़की से एक महान संगीतकार बनने तक के उनके सफर को दिखाती हैं। इन सभी तस्वीरों में से उनकी दो तस्वीरें मुझे सबसे ज्यादा पसंद आयी जो एक साथ लगाई गयी हैं। इन दोनों तस्वीरों में वे सितार पकड़े एक जैसे खड़ी हैं, फर्क सिर्फ इतना है कि दोनों तस्वीरों के बीच 50 सालों का अंतर है। इसके बाद मैं उस जगह पर गयी जहां गंगुबाई हंगल ने अपना बचपन बिताया था। वहां पर कुछ पल बिताने के बाद उनके घर को चुप-चाप अलविदा कहकर मैं वहां से निकल गयी।

डॉ. गंगुबाई हंगल गुरुकुल, हुबली

डॉ गंगुबाई हंगल गुरुकुल
डॉ गंगुबाई हंगल गुरुकुल

दूसरे दिन मैं हुबली गयी जहां पर डॉ. गंगुबाई हंगल ने अपनी अंतिम सांसे ली थीं। इस स्थान पर अब उनके नाम से गुरुकुल बनवाया गया है। नृपटुंगा पहाड़ी के चक्कर काटते हुए आखिर मैंने इस गुरुकुल के व्यापक परिसर में प्रवेश किया। यहां पर प्रवेश करते ही मुझे आस-पास सिर्फ हरियाली ही हरियाली दिखाई दी जिसके बीच में गुरुकुल की इमारतें खड़ी थीं। मैंने वहां के प्रशासकीय भवन में जाकर इस गुरुकुल के पूरे परिसर की यात्रा करने की इच्छा प्रकट की। पद्मश्री नामक एक युवा महिला, जो इस गुरुकुल की करता-धरता है, ने मुझे गुरुकुल का पूरा परिसर घुमाया। उन्होंने मुझे गुरुकुल के वर्ग तथा यहां के शिक्षकों के निवास स्थान भी दिखाये। उन्होंने मुझे बताया कि गुरुकुल में कुल 6 गुरु हैं और प्रत्येक गुरु के 6 शिष्य हैं। इन शिष्यों को गुरुकुल में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित किया जाता है, ताकि वे अपने प्रेक्षकों के सामने अपनी काला का उत्तम प्रदर्शन कर सके।

शिष्य – गुरुकुल का भविष्य

गंगुबाई हंगल गुरुकुल - कक्षा
गंगुबाई हंगल गुरुकुल – कक्षा

यह गुरुकुल कर्नाटक की सरकार द्वारा चलाया जाता है और शिष्यत्व के अंतर्गत लिए गए शिष्यों के लिए यहां पर निशुल्क प्रवेश होता है। यहां के गुरु और शिष्य दोनों गुरुकुल द्वारा दिये गए निशुल्क निवासों में ही रहते हैं। शिष्यत्व रहित शिष्य भी इस गुरुकुल में प्रवेश पा सकते हैं। इस गुरुकुल में प्रवेश पाने के लिए एक शिष्य के पास 10वी उत्तीर्ण करने का प्रमाणपत्र तथा संगीत का मूल ज्ञान होना आवश्यक है। एक बार शिष्यों का चुनाव होने पर उन्हें 2-4 सालों के लिए संगीत में पूर्ण रूप से प्रशिक्षित किया जाता है। इन शिष्यों को रोज़ संगीत के वर्गों में उपस्थित रहना पड़ता है और नियमित रूप से अपनी शिक्षा भी करनी पड़ती है। इसके अलावा उन्हें रोज़ मंच प्रदर्शन भी करना पड़ता है। जिसके लिए गुरुकुल के उद्यान में एक खुला मंच बनाया गया है, जहां पर ये शिष्य अपना मंच प्रदर्शन करते हैं। मेरे खयाल से इन उभरते हुए कलाकारों को निखारने का यह बहुत ही बढ़िया तरीका है।

गुरुकुल के वर्ग

भिन्न भिन्न प्रकार के वाद्य यन्त्र
भिन्न भिन्न प्रकार के वाद्य यन्त्र

इस गुरुकुल के वर्ग बहुत ही भिन्न रूप से बनाए गए हैं। रोशनी का स्वागत करती इनकी त्रिकोणी खिड़कियाँ वास्तुकला की दृष्टि से बहुत ही सुंदर लगती हैं। इसकी छत भी एक ओर से थोड़ी ढलती हुई सी बनाई गयी है जैसे कि वह वर्ग में उपस्थित सकारात्मक शक्तियों को गुरु के आसान पर केन्द्रित करती हो।

गुरुकुल में संगीत वाद्यों के लिए भी एक खास कक्ष बनवाया गया है जिसमें सारे वाद्ययंत्र रखे गए हैं। और यही नहीं, यहां पर उपस्थित सभी वाद्ययंत्रों के चित्रों द्वारा उनके विविध भागों के विस्तृत विवरण भी दिये गए हैं।

पूरा गुरुकुल घूमने के बाद जब में अपनी गाड़ी की ओर जा रही थी, तो मेरे दिमाग में एक विचार आया कि कितनी अजीब बात है कि, कोई महान व्यक्ति अपने पीछे कितनी अनमोल विरासत और बहुत सारी अच्छी बातें छोड़ जाते हैं। वे सिर्फ अपनी कला द्वारा प्राप्त की गयी अपनी उपलब्धियों को ही अपने पीछे नहीं छोड़ जाते बल्कि वे अनेवाली पीढ़ी के लिए एक परंपरा छोड़ जाते हैं, जो उत्तम रूप से उसका अनुसरण कर उसे और आगे ले जाएंगे।

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