मध्य कालीन भारत Archives - Inditales श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Mon, 12 Jun 2023 05:28:35 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.7.5 लक्ष्मी विलास महल – वड़ोदरा स्थित गायकवाड वंश की शोभा https://inditales.com/hindi/lakshmibvilas-mahal-gaikwad-vadodara/ https://inditales.com/hindi/lakshmibvilas-mahal-gaikwad-vadodara/#respond Wed, 22 Dec 2021 02:30:22 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=784

वडोदरा की यात्रा पर जाते वक्त सबसे पहले आपको लक्ष्मी विलास महल के दर्शन करने के लिए जरूर कहा जाएगा। इस शहर में घूमते हुए हमने बहुत बार इस महल की कुछ-कुछ झलकियाँ जरूर देखी थीं। उसका आलीशान मेहराबदार प्रवेश द्वार सड़क के पास ही स्थित है। इस महल का परिसर इतना विशाल है कि […]

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वडोदरा की यात्रा पर जाते वक्त सबसे पहले आपको लक्ष्मी विलास महल के दर्शन करने के लिए जरूर कहा जाएगा। इस शहर में घूमते हुए हमने बहुत बार इस महल की कुछ-कुछ झलकियाँ जरूर देखी थीं।

लक्ष्मी विलास महल - वड़ोदरा
लक्ष्मी विलास महल – वड़ोदरा

उसका आलीशान मेहराबदार प्रवेश द्वार सड़क के पास ही स्थित है। इस महल का परिसर इतना विशाल है कि वहाँ पर स्थित विविध भवनों के, जैसे फतेह सिंह संग्रहालय और लक्ष्मी विलास महल के दर्शन करने हेतु आपको अलग-अलग प्रवेश द्वारों से जाना पड़ता है। इस महल के परिसर में एक सुव्यवस्थित गोल्फ कोर्स और क्रिकेट का मैदान भी है। इसके अलावा यहाँ पर घास के व्यापक मैदान हैं, जहाँ पर आप यहाँ-वहाँ घूमते हुए ढेर सारे मोर देख सकते हैं तथा वृक्षों पर चहचहाते हुए पक्षियों को सुन सकते हैं।

लक्ष्मी विलास महल, वडोदरा

गायकवाड वंश

लक्ष्मी विलास महल की बाहरी दीवारों पर चित्रकारी
लक्ष्मी विलास महल की बाहरी दीवारों पर चित्रकारी

वडोदरा शहर में गायकवाड परिवार के अनेक भवन हैं। पर इनमें से जो सबसे अधिक प्रसिद्ध है और जिसे सबसे अच्छी तरह से संरक्षित किया गया है, वह है लक्ष्मी विलास महल। यह आज भी विश्व का सबसे बड़ा व्यक्तिगत निवास स्थान है। यहाँ का भूतपूर्व राज परिवार आज भी इस महल में आते-जाते रहता है। जब भी महाराज यहाँ पर आते हैं तो उनकी उपस्थिति की घोषणा महल के प्रवेश द्वार पर केसरी ध्वज फहराकर की जाती है। 19वी शताब्दी के उत्तरकाल में महाराज सयाजी राव गायकवाड तृतीय ने इस महल को अपनी महारानी का नाम दिया, जो तंजौर के दक्षिणी राज्य से थी। हमे बताया गया कि गायकवाड वंश के वर्तमान राजकुमार डॉक्टरेट की उपाधि हेतु पगड़ियों अर्थात साफ़ा या भारत के पारंपरिक सिर के पहनावों पर अपना शोधकार्य कर रहे हैं।

महल का एक अंश
महल का एक अंश

लक्ष्मी विलास महल के कर्मचारी बहुत ही अशिष्ट और असभ्य थे। वे आज भी इसी मनोवृत्ति से व्यवहार करते  हैं जैसे कि महाराज आज भी यहाँ पर राज कर रहे हों। शायद उन्हें इससे कोई दिक्कत न हो क्योंकि उन्हें तो राज परिवार द्वारा ही काम पर रखा गया है। यहाँ का प्रवेश शुल्क 175/- रुपया है, जो मेरे अनुमान से अधिक है जिसके कारण देश के अधिकतर लोग इस अद्वितीय धरोहर के दर्शन करने में असमर्थ हैं। लेकिन चूंकि यह एक व्यक्तिगत महल है, तो उससे संबंधित सभी निर्णय लेने का अधिकार भी उसके स्वामी का ही होता है।

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यद्यपि इसकी एक बात अच्छी है कि टिकिट के साथ आपको एक श्रव्य मार्गदर्शिका भी दी जाती है जिससे कि आप आराम से बिना किसी गाइड के अपने आप इस पूरे महल के दर्शन कर सकते हैं। इस श्रव्य मार्गदर्शिका में इस महल की अधिकतर वस्तुओं को बहुत ही विस्तार से समझाया गया है। इसके अलावा इस श्रव्य मार्गदर्शिका में आप गायकवाड कुल के वर्तमान वंशज को इस महल से जुड़ी अपनी यादों को आपके साथ साझा करते हुए सुन सकते हैं। इस महल के लंबे-लंबे गलियारों में चलते हुए उन्हें अपनी बाल लीलाओं का वर्णन करते हुए सुनना और परिवार के अन्य सदस्यों के चित्रों से सजी दीवारों वाले उसे गलियारे में खड़े होकर उनके विवरणों को कल्पना का रूप देना जैसे बहुत ही रोचकपूर्ण अनुभव था।

लक्ष्मी विलास महल की वास्तुकला

विभिन्न वास्तु शैलियों का मिश्रण
विभिन्न वास्तु शैलियों का मिश्रण

लक्ष्मी विलास महल विविध वास्तु शैलियों की परिणति है जैसे मुगल, राजपूत, जैन, गुजराती और वेनिशियन। यहाँ तक कि इसके निर्माण में इस्तेमाल किए गए पत्थर भी पुणे, अजमेर और आगरा जैसे दूर-दूर के स्थानों से लाए गए थे। इस महल के मध्य भाग में महाराज रहते थे तो दाहिने तरफ वाले भाग में राज घराने की महिलाएं रहती थीं और महल का बाईं तरफ वाला भाग मेहमानों के लिए बनवाया गया था।

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अन्य देखने की वस्तुएं

लक्ष्मी विलास महल का प्रवेश द्वार
लक्ष्मी विलास महल का प्रवेश द्वार

लक्ष्मी विलास महल महल के भीतर तस्वीरें खिचाना माना है इसलिए मैं आपको वहाँ की कुछ देखने योग्य वस्तुओं के बारे में बता दूँ ताकि जब आप वहाँ पर जाए तो इन वस्तुओं को देख सके।

  1. महाराज और महारानी की अर्ध-प्रतिमाएँ जिन्हें इतनी बारीकी से बनवाया गया है कि, महारानी का मोतियों वाला हार उनकी साड़ी की सिलवटों से भी साफ झलकता है।
  2. प्रताप शस्त्रागार, जो शस्त्र प्रदर्शन का कक्ष है। वैसे तो मुझे शस्त्रों में ज्यादा दिलचस्पी नहीं है। लेकिन इस शस्त्रागार में प्रदर्शित कुछ तलवारें आपको जरूर देखनी चाहिए जैसे कि दो-धारी तलवार, गुरु गोबिन्द सिंह की पंचकला तलवार और सोने और चाँदी के बने तोप। वहाँ पर कुछ तख्ते भी हैं जिन पर इन तलवारों के विभिन्न भागों को दर्शाया गया है तथा यह भी बताया गया है कि कब और किस स्थिति में कौनसी तलवार का इस्तेमाल करना चाहिए। यह प्रदर्शन कक्ष जैसे तलवारों का जीता-जागता विश्वकोश है।
  3. महल के बीचोबीच खड़ा 300 फिट का घंटाघर जो बाद में दीपस्तंभ में परिवर्तित किया गया था।
  4. महल के गद्दी सभागृह या राज परिवार के राज-तिलक कक्ष में प्रदर्शित राजा रवि वर्मा के चित्र। उनके राजसिंहासन की सादगी आपको आश्चर्य चकित कर देगी।
  5. दरबार कक्ष जो आपको अपनी अभियांत्रिकी की ओर आकर्षित करता है। इसकी 95 फीट की लंबी ऊंची दीवारें जो बिना किसी स्तंभ के सहारे के खड़ी हैं, सच में बहुत ही प्रशंसनीय हैं। यहाँ पर प्रदर्शित भिन्न भिन्न विषयों पर की गयी काँच की चित्रकारी एक अनोखा सम्मिश्रण है। इस महल की पहली मंजिल पर महिलाओं के लिए बने झरोखे प्रचुरता से उत्कीर्णित हैं। इस कक्ष के दोनों तरफ परिवार के अन्य सदस्यों की अर्ध-प्रतिमाएँ सजी हुई हैं। यहाँ पर वार्षिक बरोड़ा संगीत महोत्सव का भी आयोजन किया जाता था।
  6. इस महल को बाहर से भी जरूर देखिये, उसकी कुछ बाह्य दीवारों पर आपको प्रचुर चित्रकारी देखने को मिलती है।
  7. वहाँ के घास के मैदानों में टहलते हुए इस महल को एक पूर्ण संरचना के रूप देखिये जो बहुत ही सुंदर और आकर्षक लगता है।

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व्यक्तिगत महल

क्योंकि यह एक व्यक्तिगत महल है तो प्रबंधकों की इच्छा के अनुसार वह जब चाहे खुलता है और बंद होता है। जब हम पहली बार वहाँ गए तो महल खुला होने के बावजूद भी हमे वापस जाने के लिए कहा गया, क्योंकि उस दिन वहाँ पर किसी विज्ञापन का चित्रीकरण चल रहा था। इसलिए जाने से पहले एक बार जरूर पता कीजिए।

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नग्गर – कुल्लू मनाली का महल, इतिहास एवं प्रकृति https://inditales.com/hindi/naggar-kullu-manali-himachal/ https://inditales.com/hindi/naggar-kullu-manali-himachal/#comments Wed, 28 Jul 2021 02:30:24 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2362

नग्गर हिमाचल प्रदेश का एक आकर्षक स्थान है जो चित्रपट निर्माताओं में अत्यंत लोकप्रिय है। उन्हें जब भी हिमाचल प्रदेश में चित्रपट का चित्रण करना हो तो वे अधिकतर नग्गर की ओर ही जाना चाहते हैं। कुल्लू एवं मनाली के मध्य स्थित, प्राकृतिक दृश्यों से परिपूर्ण नग्गर केवल चित्रपट निर्माताओं का ही प्रिय गंतव्य नहीं […]

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नग्गर हिमाचल प्रदेश का एक आकर्षक स्थान है जो चित्रपट निर्माताओं में अत्यंत लोकप्रिय है। उन्हें जब भी हिमाचल प्रदेश में चित्रपट का चित्रण करना हो तो वे अधिकतर नग्गर की ओर ही जाना चाहते हैं। कुल्लू एवं मनाली के मध्य स्थित, प्राकृतिक दृश्यों से परिपूर्ण नग्गर केवल चित्रपट निर्माताओं का ही प्रिय गंतव्य नहीं था। कुल्लू-मनाली क्षेत्र के राजाओं व शासकों ने जब ब्यास नदी की पृष्ठभूमि में महलों एवं दुर्गों का निर्माण किया था तब उन्होंने नग्गर में ही अपनी गद्दी स्थापित की थी। रूसी चित्रकार, लेखक, पुरातत्त्वविद, थियोसोफिस्ट व दार्शनिक निकोलाई रोरिक ने भी निवास करने के लिए इन्ही महलों का चुनाव किया था। अपने परिदृश्यों से प्रोत्साहित होकर उन्होंने अनेक प्रख्यात कलाकृतियाँ रची थीं। वर्तमान में यह हिमाचल प्रदेश का लोकप्रिय पर्यटन स्थल है। आप यहाँ कुल्लू अथवा मनाली से पहुँच सकते हैं। आप यहाँ ठहर भी सकते हैं क्योंकि कुल्लू-मनाली के मध्य स्थित इस नगरी में अधिक भीड़ नहीं होती।

कुल्लू मनाली के नग्गर का महल
नग्गर का महल

मेरे Himachal Odyssey के अंतिम पड़ाव के अंतर्गत मैं नग्गर गयी थी। यहाँ आने का उत्साह वही था जो इस यात्राक्रम के प्रथम दिवस था। मैं इस छोटी सी मनमोहक नगरी, नग्गर के दुर्गों एवं कला दीर्घाओं के विषय में पूर्व में ही बहुत कुछ सुन चुकी थी। मुझे वह एक उत्तम पर्यटन स्थल प्रतीत हुआ था। ब्यास नदी द्वारा पोषित प्रकृति की गोद में बसी नगरी जिसके महल एवं दुर्ग अद्भुत इतिहास एवं अप्रतिम कला से ओतप्रोत हैं। यदि आप सही मौसम में यहाँ आये तो आपको चारों ओर अनेक प्रकार के पुष्प प्रफुल्लित होते दृष्टिगोचर होंगे।

प्रस्तुत है हिमाचल प्रदेश के अप्रतिम पर्यटन गंतव्य नग्गर से सम्बंधित यात्रा निर्देशिका।

नग्गर महल

ज्ञात ऐतिहासिक सूत्रों के अनुसार नग्गर कुल्लू के महाराजाओं की राजगद्दी हुआ करती थी। खड़ी चट्टान की चोटी पर स्थित नग्गर का महल अपेक्षाकृत छोटा है। इसका निर्माण १६वीं शताब्दी में किया गया था। औपनिवेशिक काल में इसका प्रयोग एक न्यायालय के रूप में किया जाता था। स्वतंत्रता के पश्चात इसे एक विश्राम गृह में परिवर्तित कर दिया गया। वर्तमान में यह हिमाचल प्रदेश पर्यटन विकास निगम द्वारा संचालित एक विरासती होटल है। कुल्लू मनाली में छुट्टियां मनाते समय यहाँ ठहरना एक उत्तम विकल्प है।

नग्गर के महल से परिदृश्य
नग्गर के महल से परिदृश्य

इस महल के निर्माण में केवल लकड़ी एवं शिलाओं का प्रयोग किया गया है। इसका निर्माण स्थानिक काठ-कुणी वास्तु तकनीक के अनुसार किया गया है जिसमें लोहे का प्रयोग नहीं किया जाता है। इस महल में अनेक विशेष तत्व हैं। इसकी निर्मिती में लोहे की एक कील भी प्रयोग में नहीं लाई गई है। इस महल के लिए ब्यास नदी के उस पार से शिलाएं कैसे लायी गई थी, इससे सम्बंधित दो कथाएं प्रचलित हैं। महल के सूचना फलक पर आप उन्हें पढ़ सकते हैं। महल के द्वार पूर्णतः अखंड लकड़ी के हैं जो अत्यंत विस्मयकारी हैं. आप उस विशाल वृक्ष की कल्पना ही कर सकते हैं जिससे द्वार के लिए लकड़ी का इतना बड़ा टुकड़ा प्राप्त हुआ होगा।

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महल में चहुँ ओर भ्रमण के लिए गलियारें है जहां सैर करते हुए आप आस-पास के अप्रतिम परिदृश्यों का आनंद उठा सकते हैं। एक ओर घाटी का अत्यंत मनमोहक दृश्य दिखाई पड़ता है तो दूसरी ओर नग्गर नगरी स्थित है। नगरी की ओर दृष्टी डाले तो ऊंचे शिखरों से युक्त अनेक मंदिर अपनी उपस्थिति दर्शाते हैं। यहाँ से आप नगर की चहल-पहल एवं वहां के क्रियाकलापों को स्पष्ट देख सकते हैं।

नग्गर महल में एक लघु संग्रहालय भी है। समय ना हो तो इसका अवलोकन छोड़ भी सकते हैं, किन्तु महल की स्मारिका दुकान अवश्य जाएँ जहां से आप स्थानीय वस्तुएं क्रय कर सकते हैं।

नग्गर के मंदिर

जगतीपट्ट मंदिर

जगतीपट्ट मंदिर नग्गर
जगतीपट्ट मंदिर नग्गर

जगतीपट्ट मंदिर नग्गर महल के भीतर स्थित एक छोटा मंदिर है। सांस्कृतिक रूप से यह महल का सर्वाधिक महत्वपूर्ण भाग है क्योकि इसे कुल्लू के देवताओं की गद्दी माना जाता है। नग्गर में आज भी यह प्रथा है कि महामारी अथवा भूकंप जैसे किसी भी प्राकृतिक आपदाओं के समय गाँव के सभी गुरु एवं बुद्धिजीवी यहाँ एकत्र होकर जनता के कल्याण हेतु चर्चा करते हैं एवं उपयुक्त निर्णय लेते हैं। आपदाओं पर नियंत्रण पाने के लिए वे यहाँ संयुक्त रूप से यज्ञों तथा अन्य अनुष्ठानों का आयोजन करते हैं। मेरे मत से यह किसी भी संकट को मात देने का सर्वाधिक लोकतांत्रिक एवं सामूहिक मार्ग है।

ऐसी मान्यता है कि विभिन्न दैवी आत्माएँ मधुमक्खियों का रूप धर कर भृगु तुंग पर्वत का एक खंड यहाँ लाये तथा उसे यहाँ स्थापित किया। १९९९ में इस मंदिर का नवीनीकरण किया गया।

नशाला गाँव का चामुंडा देवी मंदिर

नशाला गाँव का चामुंडा देवी मंदिर
नशाला गाँव का चामुंडा देवी मंदिर

यह एक अनूठा मंदिर है जिसमें गहरे रंग की लकड़ी का नीले रंग से संगम किया गया है। इससे पूर्व मैंने ऐसा ही संगम रामपुर बुशहर के पदम महल में देखा था जो हरे-भरे वन के उत्कृष्ट रंग की पृष्ठ भूमि में उभर कर दिखाई पड़ता है। यह एक साधारण मंदिर है जिसके द्वार एक साथ खुले एवं बंद थे, जैसा कि समूचे हिमाचल प्रदेश के मंदिरों में दृष्टिगोचर होता है। इस मंदिर के विषय में अधिक जानकारी प्राप्त नहीं हो पायी किन्तु देवी को देख मुझे आभास हुआ कि हिमालय के इस भाग में शक्ति का वास अवश्य था।

त्रिपुर सुंदरी मंदिर

त्रिपुरसुंदरी मंदिर नग्गर
त्रिपुरसुंदरी मंदिर नग्गर

मुल्लू मनाली के इस क्षेत्र में यह दूसरा शक्ति मंदिर था जिसके मैंने दर्शन किये थे। यह एक अत्यंत आकर्षक मंदिर है। दुहरी तिरछी छत के ऊपर शंक्वाकार शिखर अद्वितीय प्रतीत होता है। उत्कीर्णित लकड़ी द्वारा इस मंदिर के स्तंभों एवं द्वारों को बनाया गया है। यद्यपि हिमाचल के अन्य मंदिरों के समान इस मंदिर में भी लकड़ी व शिलाओं एवं काठ-कुणी वास्तुशैली का प्रयोग किया गया है, तथापि त्रिपुर सुंदरी मंदिर में लकड़ी का अत्यधिक प्रयोग किया गया है, वह भी सूक्ष्मता व सघनता से उत्कीर्णित।

काष्ठ में उत्कीर्णित त्रिपुरसुन्दरी मंदिर
काष्ठ में उत्कीर्णित त्रिपुरसुन्दरी मंदिर

ऐसा प्रतीत होता है कि मंदिर के वास्तुविद मंदिर की अधिष्ठात्री देवी की सुन्दरता को मंदिर की संरचना में भी दर्शाना चाहते थे। मंदिर में एक मुक्तांगण है। प्रवेश करते ही सर्वप्रथम गणेशजी की आकर्षक काष्ठ प्रतिमा मन मोह लेती है। मंदिर परिसर में अनेक छोटे देवालय हैं जिनमें अनेक उत्कीर्णित शिलाएं रखी हुई हैं। परन्तु  उनके विषय में मुझे कोई जानकारी प्राप्त नहीं हो पायी।

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नरसिंह देव मंदिर

नरसिंह देव मंदिर
नरसिंह देव मंदिर

नग्गर महल के सम्मुख यह नरसिंह देव मंदिर स्थित है। मंदिर तक पहुँचाने वाली दुहरी सीढ़ियाँ यूरोपीय शैली की प्रतीत होती हैं।

निकोलस रियोरिच कला दीर्घा

रियोरिच कला दीर्घा से दृश्य
रियोरिच कला दीर्घा से दृश्य

रियोरिच कला दीर्घा वास्तव में कलाकार निकोलस रियोरिच का निवासस्थान है जिन्होंने अपने जीवनकाल में कलाक्षेत्र में अनेक झंडे गाड़े हैं। उनके विषय में अधिक जानने के लिए उनके Wikipedia पेज पर जाएँ। निकोलस रियोरिच अपनी पत्नी एलेना के संग १९२८ में इस महल में आये थे। उससे पूर्व यह कुल्लू राजाओं का महल था। इमारत के चारों ओर सुन्दर बाग हैं। मैं जब यहाँ जुलाई मास में आयी थी, यह बाग विभिन्न प्रकार के रंगबिरंगे पुष्पों से भरा हुआ था। पुष्पों से भरे बगीचे के मध्य से एक मार्ग हमें दो-तल की इस इमारत तक ले जाता है जहां से घाटियों का अप्रतिम दृश्य प्राप्त होता है। निकोलस रियोरिच कला दीर्घा में छायाचित्रीकरण की अनुमति नहीं है।

रोयरिच कला दीर्घा
रोयरिच कला दीर्घा

कला दीर्घा के प्रथम तल पर निकोलस रियोरिच द्वारा चित्रित कलाकृतियाँ हैं। उनके द्वारा चित्रित परिदृश्यों में आपको उनकी विशिष्ट शैली अवश्य दिखाई देगी। यदि इस स्थान पर इतनी भीड़-भाड़ नहीं होती तो यह स्थल किसी भी कलाकार के लिए अधिक प्रीतिकर व प्रेरणादायी होता।

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दूसरे तल पर खुला गलियारा है जिस पर चलते हुए आप रियोरिच परिवार के निजी आवासीय क्षेत्रों का अवलोकन कर सकते हैं। आपको ज्ञात होगा कि भारतीय चित्रपटों के आरंभिक चरण की लोकप्रिय नायिकाओं में से एक थी देविका रानी जिनका विवाह रियोरिच परिवार में हुआ था। आप उनका कक्ष भी देख सकते हैं। यह गृह सदृश संग्रहालय तो सुन्दर है ही, किन्तु इस इमारत के छज्जे से दृष्टिगोचर बाहरी परिदृश्य इस इमारत की विशेषता का सर्वोत्कृष्ट भाग है। अधिक जानकारी के लिए इस वेबस्थल पर जाएँ।

वृक्ष के नीचे स्थित प्रतिमाएं

प्राचीन पाषाण प्रतिमाएं
प्राचीन पाषाण प्रतिमाएं

रियोरिच कला दीर्घा के प्रवेश द्वार के समक्ष, एक वृक्ष के नीचे गहरे रंग की लकड़ी में बनी अनेक प्रतिमाएं रखी हुई थीं। कुतुहलतावश मैंने उन पर सरसरी दृष्टी दौड़ाई। ३ प्रतिमाओं में पुरुष घुड़सवारी करते दर्शाए गए थे। उनके चारों ओर अनेक प्रतिमाएं थीं जिनमें एक मुझे लज्जा गौरी के समान प्रतीत हुई। उन सभी प्रतिमाओं के माथे पर तिलक-टीका लगाया हुआ था जो इस तथ्य का द्योतक है कि उनकी अब भी पूजा अर्चना की जाती है। उनके विषय में उल्लेख करता हुआ कोई भी सूचना फलक उपलब्ध नहीं था। वहां के चौकीदार ने यह जानकारी दी कि वे कुल्लू के वीर राजाओं की प्रतिकृतियाँ हैं।

उरुस्वती – हिमालय शोध संस्थान

उरुस्वती - हिमालय शोध संस्थान
उरुस्वती – हिमालय शोध संस्थान

रियोरिच कला दीर्घा से कुछ १० मिनट चढ़ाई करते हुए हम दो सुन्दर इमारतों के निकट पहुंचे। इनमें हिमालय लोककला से सम्बंधित कलाकृतियों को प्रदर्शित किया गया है। यह हिमालय शोध संस्थान आरम्भ में दार्जिलिंग में स्थापित किया गया था। किन्तु शीघ्र ही इसे कुल्लू घाटी में स्थानांतरित कर दिया गया।

इस संग्रहालय में अत्यंत रोचक वस्तुओं एवं कलाकृतियों का प्रदर्शन किया गया है, जैसे इस क्षेत्र से एकत्रित विशेष शिलायें व पत्थर, जीवाश्म, उत्कीर्णित शिलाएं इत्यादि।

कुल्लू राजा स्मारिका शिला

हिमालय शोध संस्थान के भीतर जाने के लिए सीढ़ियाँ चढ़ने से पूर्व, आप देखेंगे कि कुछ उत्कीर्णित शिलाखंडों को व्यवस्थित प्रकार से पंक्तियों में रखा गया है। उन पर इतनी सुन्दर शिल्पकारी की गयी है कि आप कुछ क्षण ठहरकर उन्हें निहारना चाहेंगे। प्रत्येक शिलाखंड पर की गयी शिल्पकारी अपनी एक कथा कहती है। समीप लगे परिचय फलक के अनुसार ये कुल्लू के राजा व रानियों की स्मृति में लगायी गयी स्मारिका शिलाएं हैं। ये शिलाएं नग्गर महल के नीचे से प्राप्त हुई थीं। कालान्तर में रियोरिच परिवार ने इन्हें यहाँ पुनः स्थापित कर दिया। इन शिलाओं को सती शिलाएं अथवा वीर शिलाएं भी कहा जाता है।

कुल्लू राजाओं की समरक शिलाएं
कुल्लू राजाओं की समरक शिलाएं

ऐसी शिलाओं में बहुधा राजा को मध्य में दर्शाया जाता है जिनके दोनों ओर उनकी रानियाँ होती हैं। इनमें स्त्रियों को विशेष राजपुताना शैली के वस्त्रों एवं आभूषणों में दिखाया गया है। प्रत्येक शिलाखंड के ऊपर वैसा ही शिखर है जैसा कि हम उत्तर भारत के मंदिरों में देखते हैं। इसका अर्थ है कि यहाँ राजाओं एवं रानियों को देवता समान मान दिया जाता था।

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नग्गर जैसे एक छोटे से गाँव में इतना कुछ दर्शनीय है। एक छोटे से गाँव से इससे अधिक क्या उम्मीद की जा सकती है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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जींद रियासत की भूतपूर्व राजधानी- संगरूर के पर्यटक स्थल https://inditales.com/hindi/sangrur-punjab-paryatak-sthal/ https://inditales.com/hindi/sangrur-punjab-paryatak-sthal/#comments Wed, 17 Feb 2021 02:30:14 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2201

कल के बिना आज संभव नहीं। किन्तु आज केवल उनकी स्मृतियाँ ही शेष रह गई हैं। बीते हुए कल की स्मृतियाँ मन-मस्तिष्क में सदा के लिए घर कर जाती हैं। छोटे-बड़े नगरों की अनेक स्मृतियाँ मेरे मस्तिष्क में भी हैं किन्तु पंजाब के संगरूर जैसे ऐतिहासिक स्थल की कोई बराबरी नहीं। संगरूर का संक्षिप्त इतिहास […]

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कल के बिना आज संभव नहीं। किन्तु आज केवल उनकी स्मृतियाँ ही शेष रह गई हैं। बीते हुए कल की स्मृतियाँ मन-मस्तिष्क में सदा के लिए घर कर जाती हैं। छोटे-बड़े नगरों की अनेक स्मृतियाँ मेरे मस्तिष्क में भी हैं किन्तु पंजाब के संगरूर जैसे ऐतिहासिक स्थल की कोई बराबरी नहीं।

संगरूर का संक्षिप्त इतिहास

भूतपूर्व जींद रियासत अब हरियाणा राज्य में एक जनपद है। किसी काल में संगरूर नगरी इसकी राजधानी थी। अब संगरूर पंजाब राज्य में एक जनपद है।

शाही समाधान संकुल - संगरूर
शाही समाधान संकुल – संगरूर

जींद का इतिहास हमें प्राचीन काल में ले जाता है। इसका नामकरण देवी जयंती अथवा जैन्ती देवी पर किया गया है जो विजय की देवी हैं। इसे पूर्व में जैन्तापुरी कहा जाता था। महाभारत काल में पांडवों ने जैन्ती देवी के सम्मान में यहाँ एक मंदिर का निर्माण कराया था। कौरवों के विरुद्ध अपने युद्ध में विजय प्राप्त करने की प्रार्थना लिए वे इस मंदिर में आते थे। पूर्व-महाभारत काल से १९ वी. सदी तक जींद का भूगोल अनेक परिवर्तनों का साक्षी रहा है। अंततः जींद नामक राज्य की रचना की गई जो अपभ्रंशित हो कर जिंद हो गई। उसकी राजधानी संगरूर को बनाई गई थी।

फुलकिया राज्य

जींद उन तीन फुलकिया राज्यों में दूसरा विशालतम राज्य था जिसका नाम उनके एक ही पूर्वज रहे फुल के नाम पर रखा गया था। तीन फुलकिया राज्यों में अन्य दो राज्य पटियाला एवं नाभा हैं। फुलकिया शासक भट्टी राजपूतों के वंशज है जो घोर अकाल के समय जैसलमेर राजस्थान से स्थलांतरित होकर यहाँ आए थे।

संगरूर की बारादरी की जाली
संगरूर की बारादरी की जाली

फुलकिया सिख समूह के महाराजा गजपत सिंह ने, जो सिख संधिकर्ताओं में से एक थे, सन् १७६३ में जींद राज्य की रचना की थे। सरहिन्द के अफगानी गवर्नर जैन खान को पराजित करने के पश्चात महाराजा गजपत सिंह को उनके अंश की यह भूमि प्राप्त हुई थी। भूमि के इस अंश में जींद, सफीदों, कुरुक्षेत्र के कुछ भाग, पानीपत तथा करनाल सम्मिलित हैं। सन् १७७२ में महाराज शाह आलम के नेतृत्व में दिल्ली सल्तनत के मालगुजारों ने गजपत सिंह को राजा की उपाधि प्रदान की थी।

कालांतर में जींद राज्य के क्षेत्र का उत्तर में सतलज नदी से और दक्षिण में रोहतक के गोहाना तक विस्तार किया गया। राजा गजपत सिंह ने सन् १७७२ से सन् १७८६ तक यहाँ राज किया। तत्पश्चात राजा भाग सिंह ने सन् १७८६ से सन् १८१९ तक तथा राजा फतेह सिंह ने सन् १८१९ से सन् १८२२ तक शासन किया। राजा फतेह सिंह के पुत्र राजा संगत सिंह ने सन् १८२२ से सन् १८३४ तक शासन किया। उन्होंने सन् १८३० में अपनी राजधानी जींद से नव-स्थापित संगरूर में स्थानांतरित की थी।

संगरूर शब्द की व्युत्पत्ति

स्थानीय अभिलेखों के अनुसार, संगरूर गाँव की स्थापना लगभग ४०० वर्षों पूर्व संगु नामक एक जाट ने की थी। सन् १७७४ तक यह नाभा रियासत का एक भाग था। जींद रियासत के महाराजा गजपत सिंह एवं नाभा रियासत के महाराजा हमीर सिंह के मध्य हुए अनबन के कारण जींद रियासत की सेना ने अमलोह, भादसों एवं संगरूर पर अपना नियंत्रण स्थापित किया। महाराजा हमीर सिंह को बंदी बना लिया गया। कालांतर में पटियाला के महाराजा के हस्तक्षेप के पश्चात जींद रियासत ने उन्हे मुक्त कर दिया। भादसों एवं अमलोह गाँव वापिस किए गए। किन्तु उन्होंने संगरूर अपने पास ही रखा।

जींद रियासत की राजधानी

सन् १८३० से संगरूर ही जींद रियासत की राजधानी रही है। किन्तु राज्याभिषेक का आयोजन अब भी जींद में ही किया जाता है जो उनका पैतृक पावन स्थल है।

जींद राज्य का चिन्ह
जींद राज्य का चिन्ह

राजा स्वरूप सिंह के पश्चात उनका पुत्र राजा रघुबीर सिंह उनका उत्तराधिकारी हुआ जिसने सन् १८६४ से सन् १८८७ तक गद्दी संभाली। उनके जीवनकाल में ही उनके पुत्र बलबीर सिंह का देहांत हो गया था। इस कारण उनके पोते महाराजा रणबीर सिंह ने सन् १८८७ से सन् १९४८ तक राजगद्दी का कार्यभार संभाला। उनके पश्चात महाराजा राजबीर सिंह राजा बने। उनके शासनकाल के पश्चात जींद रियासत का पेप्सु (पटियाला एवं पूर्वी पंजाब राज्य संघ) में विलय हो गया। आगे जाकर पेप्सु का एक बार फिर भारतीय संघ के संयुक्त पंजाब में विलय हुआ। कालांतर में इनका जींद एवं संगरूर में विभाजन हो गया। जींद हरियाणा का भाग बना तथा संगरूर पंजाब का एक भाग बन गया।

महाराजा रघुबीर सिंह ने संगरूर को एक प्रगतिशील एवं विशिष्ट राज्य की राजधानी के रूप में विकसित किया। वे इतने कर्मठ एवं उत्साही थे कि एक आदर्श राजधानी का निर्माण करने के लिए सुझावों एवं विचारों को एकत्रित करने हेतु उन्होंने दूर दूर तक व्यापक भ्रमण किया। सन् १८७० में मनमोहक नगरी जयपुर की रूपरेखा का अध्ययन करने के लिए उन्होंने भेस बदल कर जयपुर का भ्रमण किया। अंततः सन् १८७५ में उन्होंने अपनी राजधानी की रूपरेखा नियोजित की तथा उसका कार्य आरंभ किया। सरदार राम सिंह जैसे उस काल के सर्वोत्तम वास्तुविदों को इस कार्य के लिए नियुक्त किया। सरदार राम सिंह ने अमृतसर के अमृतसर खालसा महाविद्यालय की भी रूपरेखा बनाई थी। इसके अतिरिक्त उन्होंने लंदन के बकिंघम पैलिस के एक खंड एवं अनेक ऐसी संरचनाओं की भी योजना तैयार की थी।

ख्यातिप्राप्त महापुरुष 

संगरूर के अनेक निवासियों ने भारतीय फौज की १३ वी. पंजाब बटालियन में सेवाएं दी हैं। यह बटालियन पूर्व में प्रथम जींद इन्फन्ट्री अथवा पैदल सेना थी। संगरूर नगरी अनेक महान बहादुर सेनानियों एवं कमांडरों की नगरी रही है। काहन सिंह, रतन सिंह, गुरनाम सिंह, नाथा सिंह तथा जनरल गुलाम बेग खान उनमें से कुछ वीरों के नाम हैं।

यहाँ के लोगों को लाभप्रद रोजगार में संलग्न होने के लिए प्रशिक्षण दिया जाता था। यहाँ के लोग तलवार, बंदूक तथा कलम एक साथ रखते थे।

संगरूर के दर्शनीय धरोहर

यह नगरी एक ऐसा ऐतिहासिक केंद्र है जो ऐतिहासिक धरोहरों में रुचि रखने वाले पर्यटकों, शोधकर्ताओं, इतिहासकारों, छायाचित्रकारों एवं ब्लॉगर्स के लिए स्वर्ग है।

संगरूर नगरी के चारों ओर चार प्रवेश द्वार थे। उनके नाम थे, पटियाला द्वार, नाभा द्वार, सुनामी द्वार तथा धुरी द्वार। ये नाम उन समीप की नगरियों के ऊपर रखे गए थे जहां इन द्वारों से जाते मार्ग द्वारा पहुंचा जा सकता था। दुर्भाग्य से इन चारों द्वारों में से एक भी अब अस्तित्व में नहीं है।

शाही समाधान संकुल

शाही समाधान के मंदिर से शिखर
शाही समाधान के मंदिर से शिखर

नाभा द्वार के बाहर निर्मित इस संकुल के भीतर जींद रियासत के सभी शासकों की समाधियाँ हैं। महाराजा गजपत सिंह से महाराजा रणबीर सिंह तक तथा रियासत की सभी महारानियों की यहाँ समाधियाँ हैं। इन समाधियों की विशेषता यह है कि इनके शीर्ष किसी मंदिर के शिखर के समान प्रतीत होते हैं। इन संरचनाओं की ढलुआं छत किसी तटीय प्रदेश की संरचनाओं के समान भी प्रतीत होती हैं।

दो तलवारें लिए माँ काली
दो तलवारें लिए माँ काली

बनसार बाग बारादरी तथा दरबार

महाराजाओं के समय से बनसार बाग सज्जित पुष्पों से अलंकृत एक सुंदर विश्राम बाग था। इसमें एक बारादरी अर्थात् बैठक है जो चारों ओर एक जलधारा से घिरी हुई है।

बनसार बारादरी - संगरूर
बनसार बारादरी – संगरूर

इस बाग को राजपरिवार के मनोरंजन क्रीड़ाओं के लिए बनाया गया था। इस परिसर के बागों के मध्य एक राजसी बारादरी है। यह बारदारी महाराजा रंजीत सिंह द्वारा दीनानगर में बनाए गए इसी प्रकार के एक बारादरी से प्रेरित है। महाराजा रंजीत सिंह ने दीनानगर की बारादरी जींद रियासत को भेंट स्वरूप दी थी। आपको स्मरण करा दूँ कि महाराजा रंजीत सिंह की माँ महाराजा जींद की पुत्री थी जिनका विवाह शुकरचरिया मिसल में हुआ था।

घंटाघर

संगरूर का घंटाघर
संगरूर का घंटाघर

यह विरसती घंटाघर सन् १८७० में निर्मित है।

आयुधागार इमारत

इस आयुधागार का प्रयोग जींद रियासत के गोलाबारूद एवं युद्ध के अन्य उपकरणों के भंडार के रूप में किया जाता था।

निहंग सिंह वाला गुरुद्वारा

प्रथम विश्व युद्ध के समय प्रार्थना करने के लिए एक पुराने मस्जिद का प्रयोग किया गया था। सन् १९४७ के पश्चात इसे निहंग सिंह वाला गुरुद्वारा में परिवर्तित कर दिया गया।

सन् १९०५ में एक रेल स्थानक का भी निर्माण किया गया।

जींद सहकारी बैंक

जींद सहकारी बैंक
जींद सहकारी बैंक

जींद सहकारी बैंक की स्थापना सन् १९२२ में की गयी थी। सन् १९२२ में हुए इसके उद्घाटन के समय की एक प्राचीन शिलाखंड अब भी यहाँ उपस्थित है। सन् १९४७ में भारत में पंजीकृत होते समय जब जींद रियासत का पेप्सु (पटियाला एवं पूर्वी पंजाब राज्य संघ) में विलय हुआ था तब यह इमारत स्टेट बैंक ऑफ पटियाला को भेंट स्वरूप दी गई थी। सहयोगी स्टेट बैंकों के विलय के पश्चात अब इस इमारत में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की एक शाखा कार्यरत है। नगर के बीचों बीच बारा चौक में स्थित यह शाखा अपनी स्थापना शताब्दी सन् २०२२ में मनाने वाली है।

पशु चिकित्सालय

पशु चिकित्सालय - संगरूर
पशु चिकित्सालय – संगरूर

पशु चिकित्सालय का निर्माण सन् १९१० में शाही परिवार के घोड़ों एवं हाथियों की चिकित्सा-सुश्रूषा के लिए किया गया था। इस संकुल का प्रयोग उन परिवारों के लिए शरणार्थी शिविर के रूप में भी किया गया था जो सन् १९४७ में पाकिस्तान से स्थानांतरित होकर यहाँ आए थे। नगर के सार्वजनिक सिवल अस्पताल में महाराजा जॉर्ज पंचम के राज्याभिषेक का भी एक भाग है।

गवर्नर राज उच्च विद्यालय इमारत की संरचना भी एक धरोहर है। एक काल में यह जींद रियासत का अनाथ आश्रम था।

संगरूर दुर्ग

संगरूर दुर्ग
संगरूर दुर्ग

बनसार बाग संकुल के निकट इस दुर्ग के अवशेष देखे जा सकते हैं। यहाँ के निवासियों के अनुसार इस दुर्ग का निर्माण महाराजा गजपत सिंह के शासनकाल में सन् १७७५ से सन् १७८६ के आसपास हुआ था।

बदरूखान दुर्ग तथा बगरियाँ हवेली   

महाराजा रंजीत सिंह के शासनकाल में जींद रियासत की बढ़ती शक्तियों का मुख्य कारण महाराजा रंजीत सिंह की माँ बीबी कौर हैं जो जींद रियासत के महाराजा गजपत सिंह की पुत्री भी हैं। प्रचलित कथाओं के अनुसार महाराजा रंजीत सिंह का जन्मस्थल समीप स्थित एक गाँव, बदरूखान माना जाता है। वहाँ जींद रियासत के राजपरिवार का दुर्ग है।

बागरियां हवेली
बागरियां हवेली

कथाओं के अनुसार जब बीबी कौर का जन्म हुआ था, तब बगरियाँ हवेली के भाई गुद्दार सिंह को उन्हे आशीष देने के लिए आमंत्रित किया था। किन्तु योजना उस नवजात शिशु को दफनाने की थी। तब भाई गुद्दार सिंह ने राजा से ऐसा ना करने का आग्रह किया। कालांतर में वही कन्या पंजाब के सर्वोत्तम योद्धा को जन्म जो देने वाली थी। वस्तुतः, कालांतर में बीबी कौर महाराजा रंजीत सिंह की माँ बनी।

बगरियाँ हवेली एक प्राचीन गुरुद्वारा है। किसी समय यहाँ गुरु हरगोबिन्द जी ने लंगर सेवा को आशीष दिया था। आज भी इस लंगर में गीली हरी लकड़ी पर खाना पकाया जाता है।

राज राजेश्वरी मंदिर

राज राजेश्वरी मंदिर
राज राजेश्वरी मंदिर

दुर्ग के समक्ष माता काली देवी का मंदिर है। मंदिर के भीतर माता काली देवी की प्रतिमा उसी काली शिला में बनी है जैसी कोलकाता के काली बाड़ी में है।

गुरुद्वारा ननकियाना साहिब

गुरद्वारा ननकियाना साहिब
गुरद्वारा ननकियाना साहिब

गुरुद्वारा ननकियाना साहिब में सिखों के छठवें गुरु, गुरु हरगोबिंद जी ठहरे थे। यहाँ एक प्राचीन करेर का वृक्ष अब भी है जिस के तने से गुरु जी ने अपना अश्व बांधा था तथा उसकी छाँव में विश्राम किया था। यहाँ इस वृक्ष की पूजा अर्चना की जाती है।

वड्डा घल्लुघारा

वड्डा घल्लुघारा
वड्डा घल्लुघारा

वड्डा घल्लुघारा हमें कूप रोहिरा गाँव में हुए निहत्थे सिखों के वीभत्स नरसंहार का स्मरण कराता है। यह स्मारिका संगरूर के माले कोटला तहसील के समीप स्थित है।

संगरूर धरोहर संरक्षण संस्था

इस संस्था की स्थापना २८ जनवरी २०१४ में हुई थी। इसका ध्येय था, संगरूर का संरक्षण एवं पुनर्स्थापना ताकि इस नगरी को उसकी प्राचीन महिमा एवं सुंदरता पुनः प्राप्त हो सके। यह एक गैर लाभ संस्था है। इसके कार्यक्षेत्र हैं, धरोहरों के संरक्षण, जागरूकता अभियान, कला, संगीत व काव्यशास्त्र को बढ़ावा, संगीत वाद्यों की धरोहर, युवा लेखक, हस्तकला तथा अब पर्यटक विकास एवं बढ़ावा।

इस हरित प्रदेश में शब्दों, सुरों एवं कला के विश्व को नवीन ऊँचाइयाँ प्रदान करने हेतु यह संस्था विरासत एवं साहित्य उत्सव का आयोजन करता है।

कैसे पहुंचे?

काली माता मंदिर की चित्रकारी
काली माता मंदिर की चित्रकारी

संगरूर चंडीगढ़, दिल्ली, भटिंडा तथा लुधियाना से सड़क मार्ग द्वारा भलीभाँति जुड़ा हुआ है। यह नगर चंडीगढ़-भटिंडा राष्ट्रीय राजमार्ग तथा दिल्ली-जालंदर राजमार्ग पर स्थित है।

रेल मार्ग द्वारा संगरूर दिल्ली एवं लुधियाना से जुड़ा हुआ है।

यह एक अतिथि यात्रा संस्मरण है। इसे नवलदीप थरेजा ने लिखा है।


नवलदीप थरेजा संगरूर में ही शिक्षित एक वस्त्र अभियंता हैं। अपने व्यवसाय के अंतर्गत उन्हे भारत के अनेक ऐसे स्थानों की यात्रा करनी पड़ती है जिनके विषय में लोग अधिक नहीं जानते। उन्हे भारत देश के विभिन्न शिल्पकलाओं एवं वास्तु रत्नों के छायाचित्र लेने में विशेष रुचि है। उनमें पूर्ववर्ती रियासतें उन्हे अत्यंत प्रिय हैं। दिसंबर २०१९ में संगरूर नगर के विरासत उत्सव में उन्होंने अपनी छायाचित्रों की प्रदर्शनी लगायी थी। इंस्टाग्राम में उनके हैन्डल ‘बहरूपिया’ को अवश्य देखें।

यह संस्करण की रचना श्री करणवीर सिंह सिबिया के मार्गदर्शन में किया गया है। श्री करणवीर सिंह सिबिया संगरूर विरासत संरक्षण संस्था (Sangrur Heritage Preservation Society) के प्रमुख संस्थापक हैं। संगरूर को भारत के धरोहरों के नक्शे पर लाना उनका प्रमुख ध्येय है। उनसे आप ksibia54@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।


अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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बुरहानपुर – जहां कभी ताज महल बनवाया जाने वाला था! https://inditales.com/hindi/burhanpur-paryatan-sthal/ https://inditales.com/hindi/burhanpur-paryatan-sthal/#comments Wed, 19 Jun 2019 02:30:23 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1394

बुरहानपुर – इस नगर को मैं केवल इसलिए जानती थी कि यहाँ शाहजहाँ की पत्नी मुमताज महल की मृत्यु हुई थी। वही मुमताज महल जिनकी स्मृति में ताज महल बनवाया गया था। अपनी १४वी.संतान को जन्म देते समय उनकी मौत हुई थी। इसके सिवाय इस नगर के विषय में मुझे कुछ अधिक जानकारी नहीं थी। […]

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बुरहानपुर – इस नगर को मैं केवल इसलिए जानती थी कि यहाँ शाहजहाँ की पत्नी मुमताज महल की मृत्यु हुई थी। वही मुमताज महल जिनकी स्मृति में ताज महल बनवाया गया था। अपनी १४वी.संतान को जन्म देते समय उनकी मौत हुई थी। इसके सिवाय इस नगर के विषय में मुझे कुछ अधिक जानकारी नहीं थी। अतः जब मैं मध्य प्रदेश की रानियों के विषय में जानकारी एकत्र करने के उद्देश्य से मध्यप्रदेश की यात्रा पर थी, मैंने बुरहानपुर भी भ्रमण किया।

बुरहानपुर मेरे लिए एक अनोखी खोज से कम नहीं था। खोज तो मेरे लिए सदेव रोमांचक व आनंददायी होता है। नगर में प्रवेश करने के उपरांत जैसे जैसे हम प्राचीन दुर्ग की भित्ति की ओर गाड़ी हांक रहे थे, मैं समझ गयी थी कि मेरे आगामी दो दिनों में यह नगर मुझ पर अचरजों की बौछार करने वाला है!

कैसे? आईये आपको अपने साथ मध्यप्रदेश के इस नगर, बुरहानपुर का भ्रमण कराती हूँ। आपको स्वयं ही इस प्रश्न का उत्तर प्राप्त हो जाएगा।

असीरगढ़ दुर्ग

असीरगढ़ दुर्ग - बुरहानपुर
असीरगढ़ दुर्ग – बुरहानपुर

हम इंदौर की ओर से बुरहानपुर जा रहे थे। बुरहानपुर से कुछ २५ की.मी. पहले हम असीरगड़ दुर्ग पहुंचे। एक पहाड़ी के ऊपर बना यह दुर्जेय दुर्ग बहुत दूर से ही अपनी उपस्थिति दर्शा रहा था। यूँ तो आप पैदल भी इस पहाड़ी पर चढ़कर इस दुर्ग तक पहुँच सकते हैं, किन्तु मैं इसके लिए उद्धत नहीं थी। जानकर आनंदित हुई कि हम गाड़ी द्वारा भी यह ऊंची पहाड़ी चढ़कर गढ़ के प्रवेशद्वार तक पहुँच सकते हैं।

अश्वत्थामा

हिन्दू महाकाव्यों के अनुसार असीरगड़ दुर्ग एक प्राचीन दुर्ग है। इसके भीतर एक शिव मंदिर भी है। कहा जाता है कि अनंत पथिक अश्वत्थामा अभी भी प्रत्येक दिन इस मंदिर के दर्शनार्थ यहाँ आते है तथा शिवलिंग को पुष्पांजलि अर्पित करते है। यह मंदिर अत्यंत छोटा है। इसके समीप अश्वत्थामा नामक एक जलकुंड भी है। मुझे बताया गया कि कभी यहाँ मंदिर में खुलती एक गुप्त सुरंग भी थी।

ज्ञात इतिहास के अनुसार यादवों के स्थानीय मुखिया, आसा अहीर ने १४वी. सदी में इस दुर्ग का निर्माण करवाया था। असीरगढ़ का नामकरण भी इन्ही के नाम पर किया गया था। कालान्तर में फारुकी नासिर खान ने सन १४०० में आसा अहीर एवं उनके परिवार की धोखे से हत्या करवा दी थी। असीरगड़ को दक्खन का द्वार भी कहते हैं।

असीरगढ़ दुर्ग में अश्वथामा मंदिर
असीरगढ़ दुर्ग में प्राचीन अश्वथामा मंदिर

असीरगड़ चारों ओर से हरी-भरी सतपुड़ा पर्वतमाला से घिरा हुआ है। कहीं भी दृष्टी घुमाइये, घाटियों से उभरती पठारी पहाड़ियां अप्रतिम दृश्य प्रस्तुत करती हैं। मांडू के सामान असीरगड़ की भी विशेषता है यहाँ के कई जल स्त्रोत जो पहाड़ का जीवन सरल एवं सुखमय बनाते हैं। मुझे यहाँ के जलकुण्डों के नाम अत्यंत भाये। बादाम कुण्ड जिसके जल में, लोगों के कहने के अनुसार, बादाम की सुगंध आती थी। रानी की तालाब, जिसके विषय में ऐसी मान्यता है कि इसमें पौराणिक पारसमणी समाई हुई है। मामा-भांजा तालाब, जो मेरे अनुमान से किसी मामा एवं भांजे द्वारा निर्मित हो। अंत में गंगा-जमुना तालाब!

आज आप यहाँ की अधिकतर संरचना खँडहर में परिवर्तित हुई पायेंगे जिनमें मुख्य हैं, एक कोने में एक मस्जिद, दूसरे में गिरिजाघर, फांसी खाना जहां कैदियों को फांसी की सजा दी जाती थी, इधर उधर बिखरे महल के अवशेष तथा कुछ परित्यक्त जल स्त्रोत।

बुरहानपुर का संक्षिप्त इतिहास

हिन्दू धर्मं-ग्रंथों में बुरहानपुर को भृग्नपुर कहा गया है। यह नाम भृगु ऋषि पर रखा गया है जिन्होंने ना केवल यहाँ कठोर तप किया, बल्कि ताप्ती नदी के तीर बैठकर भृगु संहिता की भी रचना की थी। मुझे ब्रम्हपुरी यह नाम कई स्थानों पर लिखा दिखायी दिया किन्तु ब्रम्हा का कोई भी मंदिर मुझे यहाँ नहीं मिला, ना ही उनके विषय में कुछ लिखित उल्लेख ही मिले।
मुझे बुरहानपुर में एवं उसके आसपास कई प्राचीन देवी मंदिर भी दिखाई दिए।

बुरहानपुर का नवीन इतिहास फारुकियों एवं मुगलों से सम्बंधित है। शाहजहाँ एवं औरन्गजेब ने यहाँ कुछ समय बिताया था।

बुरहानपुर के दर्शनीय स्थल

कुण्डी भंडारा

कुण्डी भंडारा - बुरहानपुर
कुण्डी भंडारा – बुरहानपुर

यदि आप यह कहें कि बुरहानपुर में आपके पास केवल एक ही स्थल देखने का समय है तो मैं आपको कुण्डी भंडारा देखने की सलाह दूंगी। यह एक अनोखा जल प्रबंधन है जिसमें प्राकृतिक जल गंतव्य स्थान तक भूमिगत प्रणाली द्वारा ले जाया जाता है। सतपुड़ा पर्वतों से ताप्ती नदी की ओर जाते ताजे झरने के जल को नगर तक लाया जाता है। इस के लिए नियमित अंतराल पर १०० से भी अधिक कुएँ खोदे गए हैं जो इस जल को एकत्र करते हैं तथा नगर तक पहुँचाते हैं। चटकदार रंगों में रंगे इन कुओं के पास से जाते जाते आप इन्हें निहार सकते हैं। जल का दुरुपयोग रोकने हेतु कुछ कुओं के चारों ओर बाड़ बना दी गयी है।

कुण्डी भंडारा की कुण्डियाँ
कुण्डी भंडारा की कुण्डियाँ

कुण्डी भंडार में एक बिजली-चालित लिफ्ट है जो आपको २५ मीटर नीचे एक पगडंडी तक ले जाती है। यहाँ आप प्रत्यक्ष जल संचयन प्रणाली देख सकते हैं। जिस दिन मैं यहाँ पहुंची थी, दुर्भाग्य से उस दिन यह लिफ्ट बंद थी। स्पष्ट प्रतीत हो रहा था कि इसमें कोई बड़ी समस्या है एवं यह शीघ्र ही दुरुस्त होने वाली नहीं है। यह मध्यप्रदेश पर्यटन एवं पर्यटकों, दोनों के लिए एक लाभदायक अवसर गँवाने के सामान था। इन कुओं के जो चित्र मैंने देखे उनसे ज्ञात हुआ कि यहाँ शिलाओं में कटी हुई सुरंगें हैं जिनसे जल बहता है। पर्यटक के रूप में आप इन सुरंगों के भीतर से जा सकते हैं।

आपको जानकर अत्यंत आश्चर्य होगा कि अंततः बुरहानपुर की इस अनोखी जल प्रणाली के पीछे जिसकी बुद्धी है, वह कोई और नहीं बल्कि अब्दुल रहीम खानेखाना हैं। जी हाँ, वही कवी रहीम जिन्हें आप उनके द्वारा रचित दोहों से जानते हैं।

शाही किला

ताप्ती नदी के तट पर शाही किला
ताप्ती नदी के तट पर शाही किला

बुरहानपुर का शाही किला एक जीवंत किला है जहां पुराने बुरहानपुर का एक भाग अब भी निवास करता है। जिस प्रवेशद्वार द्वारा हम परिसर के भीतर गए उसे शनिवारा कहा जाता है। यह लाल रंग में रंगा एक बहुमंजिला द्वार है। इस द्वार के भीतर प्रवेश कर हमने संकरी गलियों में प्रवेश किया जिसके चारों ओर पुराने घर एवं दुकानें थीं। इन गलियों को पार कर हम शाही किले के मुख्य प्रवेश द्वार तक पहुँचे।

भारत के अन्य जीवंत किले अथवा गढ़ इस प्रकार हैं:-

मुमताज महल का हमाम

हमाम पर बना ताज महल का चित्र
हमाम पर बना ताज महल का चित्र

शाही किले का सर्वाधिक अनोखा भाग था हमाम अर्थात् शाही स्नानगृह। इसका उपयोग स्वयं मुमताज महल करती थी। इस हमाम की विशेषताएं थीं नीले-हरे रंग में रंगी छत तथा इसकी प्रणाली जो इसे एक उत्तम जल स्त्रोत बनाती है। हमारे परिदर्शक ने हमारा ध्यान हमाम पर बने भित्तिचित्रों की ओर खींचा। वहां ताजमहल का चित्र था जिसे आगरा में निर्मित जगप्रसिद्ध संगमरमर के मकबरे का प्रेरणा स्त्रोत माना जाता है। अन्य फलकों पर मुमताज एवं शाहजहाँ के ताजों के चित्र थे। इन चित्रों के देख ऐसा प्रतीत हो रहा था कि इन्हें तत्काल संरक्षण की सख्त आवश्यकता है। अन्यथा कुछ ही समय में ये नष्ट हो जायेंगे।

इस दुर्ग का एक अन्य आकर्षण है इसकी प्राचीर जहां से आप ताप्ती नदी का घाट तथा नदी के उस पार स्थित जैनाबाद देख सकते हैं। यहाँ से नीचे देखते ही आपको ज्ञात होगा कि आप भू-तल पर नहीं, बल्कि चौथी मंजिल पर खड़े हैं। निचली मंजिलों पर जाने की अनुमति नहीं है। किन्तु नदी के तीर खड़े होकर आप इन्हें स्पष्ट देख सकते हैं।

ताप्ती घाट

ताप्ती घाट पर छीटे छोटे शिव मंदिर
ताप्ती घाट पर छीटे छोटे शिव मंदिर

गंगा से भी प्राचीन ताप्ती नदी संभवतः भारत की प्राचीनतम नदी है। इसे सूर्यपुत्री भी कहा जाता है। किवदंतियों के अनुसार जब गंगा को धरती पर आने का आग्रह किया गया था, तब उसे ताप्ती को प्राप्त असीम आदर से भय हुआ। अतः गंगा से शर्त रखी कि उसके धरती पर अवतरण से पूर्व ताप्ती नदी को संकुचित किया जाए। गंगा की मांग को सहमति मिली। अतः इसमें कोई अचरज नहीं कि गंगा के वैभव के समक्ष अब हम ताप्ती अथवा तापी नदी का गुणगान नहीं करते।

ताप्ती घाट - बुरहानपुर
ताप्ती घाट – बुरहानपुर

बुरहानपुर के पास से बहती ताप्ती नदी के घाट पर कई छोटे व रंगबिरंगे शिव मंदिर हैं। यह मंदिर भिन्न भिन्न तलों पर बने हैं। अतः इनके द्वारा ताप्ती के जल स्तर का प्राकृतिक अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है। उदाहरणतः यदि जल स्तर चटक लाल रंग के मंदिर तक पहुंचा है तो अगले दिन ३०० की.मी. दूर स्थित सूरत में बाढ़ की संभावना होगी। गर्व होता है कि हमारी प्राचीन प्रणालियां कितनी अप्रतिम एवं व्यवहारिक बुद्धिमत्ता से परिपूर्ण होती थीं। तंत्रों एवं यंत्रों की दौड़ में हमने कब इन्हें खो दिया हमें इसकी कल्पना भी नहीं!

और पढ़ें:- महेश्वर – नर्मदा के चरणों में अहिल्या बाई होलकर की प्राचीन नगरी

ताप्ती नदी में गज संरचना

ताप्ती नदी के बीचों बीच गज प्रतिमा
ताप्ती नदी के बीचों बीच गज प्रतिमा

बुरहानपुर की ताप्ती नदी में एक और अत्यंत अनोखी वस्तु है। वह है नदी के बीचोंबीच खड़ी एक हाथी की विशाल पाषाणी मूर्ति। मुझे बताया गया कि इस हाथी के साथ एक शिशु हाथी की मूर्ति भी है किन्तु यह तभी दृष्टिगोचर होती है जब नदी का जलस्तर नीचे हो। जिन दिनों मैंने यहाँ की यात्रा की थी, गजमाता की केवल पीठ ही जल सतह से ऊपर दृष्टिगोचर थी। तथापि मुझे यह ज्ञात नहीं हो पाया कि इस गजों का निर्माण किसने और कब करवाया। मष्तिष्क को खंगालने पर भी मैं निश्चित नहीं कर पायी कि नदी के बहते जल के बीचोंबीच गज के सिवाय किसी और मूर्ति की कल्पना भी की जा सकती है!

और पढ़ें:- वाराणसी के घाट पर गंगा आरती

ताप्ती नदी के राज घाट पर प्रत्येक संध्या ताप्ती देवी की आरती की जाती है। मैंने अपने जीवन में कई नदियों की आरतियां देखी हैं। मुझे ताप्ती नदी की आरती उन सब में सर्वाधिक साधारण प्रतीत हुई।

गुरुद्वारा बड़ी-संगत

गुरुद्वारा बड़ी सांगत - बुरहानपुर
गुरुद्वारा बड़ी सांगत – बुरहानपुर

सिक्ख धर्म के इतिहास में बुरहानपुर का अत्यंत महत्त्व है। बुरहानपुर के गुरुद्वारा बड़ी-संगत में गुरु ग्रन्थ साहिब की वह प्रतिलिपि है जिस पर गुरु गोबिंद सिंग ने स्वयं सुनहरी हस्ताक्षर किये हैं। वह अतुल्य ग्रन्थ साहिब आप उस विडियो में देख सकते हैं जो यहाँ एक पटल पर सतत दिखाई जाती है। इस ग्रन्थ साहिब की मूल प्रति वर्ष में केवल एक बार ही भक्तों के समक्ष प्रदर्शित की जाती है।

और पढ़ें:- हिंडोल सेनगुप्ता द्वारा लिखित “दि सेक्रेड सोर्ड”

शुभ्र स्वच्छ श्वेत रंग में रंगा यह एक विशाल गुरुद्वारा है। यहाँ का लंगर भी अत्यंत विशाल है। आप अनुमान नहीं लगा सकते हैं कि कितने भक्तों को यहाँ प्रसाद रूपी भोजन कराया जाता है।

दरगाह-ए-हकीमी

दरगाह-ए-हकीमी - बुरहानपुर
दरगाह-ए-हकीमी – बुरहानपुर

दरगाह-ए-हकीमी मुझे बुरहानपुर का सर्वाधिक संरक्षित स्थल प्रतीत हुआ। श्वेत रंग के मकबरों पर चांदी के नक्काशे हुए द्वार हैं। इन मकबरों के चारों ओर के बगीचे अत्यंत मनमोहक तो हैं ही, साथ ही इनका रखरखाव भी अत्यंत सजगता से किया हुआ प्रतीत हुआ। मुझे लगा कि इस स्थान को स्वच्छता पुरस्कार हेतु अनुमोदित किया जा सकता है।

रस्म के अंतर्गत दर्शनार्थी इस दरगाह में घोड़ागाड़ी अथवा तांगे पर बैठकर आते हैं। अतः आप को दरगाह के बाहर बाजार में कई रंगबिरंगे तांगे दिखाई देंगे।

जामा मस्जिद

बुरहानपुर की जामा मस्जिद में संस्कृत अभिलेख
बुरहानपुर की जामा मस्जिद में संस्कृत अभिलेख

जामा मस्जिद, व्यस्त बाजार के मध्य स्थित एक बड़ी मस्जिद है जिसमें काले पत्थर में बनी दो ऊंची मीनारें हैं। इसका एक अनोखापन जो मुझे दिखाया गया, वह था उत्कीर्णित आलों के एक ओर संस्कृत में लिखे शिलालेख। १००० बड़े बड़े मनकों की एक लम्बी जपमाला भी वहाँ रखी हुई थी। आप जब भी इस मस्जिद को देखने यहाँ आयें, मौलवी से इन्हें देखने का आग्रह अवश्य करें।

जैनाबाद में अहुखाना

ताप्ती नदी के दूसरे तट पर स्थित जैनाबाद बुरहानपुर की जुड़वा नगरी है। एक पुल द्वारा आप यहाँ पहुँच सकते हैं। फेरी नौका द्वारा भी आप बुरहानपुर से यहाँ पहुँच सकते हैं जो नियमित रूप से चालू रहती है।

जैनाबाद का अहुखाना
जैनाबाद का अहुखाना

बुरहानपुर के शाही दुर्ग से जब आप ताप्ती नदी के उस पार जैनाबाद की ओर देखें तो आपको एक शिकार-खाना दिखाई देगा। यह है अहुखाना। इसका प्रयोग मूलतः मुग़ल स्त्रियों द्वारा शिकार हेतु किया जाता था। हिरण को पारसी में अहू कहा जाता है। अतीत में इस शिकार-खाने के विशाल परिसर में कई हिरणों को खुला छोड़ दिया जाता था ताकि उन्हें मार कर मुग़ल स्त्रियों को भी शिकार का आनंद प्राप्त हो सके। वर्तमान में शिकार-खाने के परिसर के चारों ओर चार-बाग़ पद्धति से बगीचा बनाया गया है।

अहुखाना की प्रसिद्धि का एक कारण यह भी है कि मुमताज महल की मृत्यु के पश्चात उनके पार्थिव देह को आगरा ले जाने से पूर्व ६ मास की अवधि के लिए यहाँ दफनाया गया था।

यहाँ पहुँचने के लिए एक कच्चे रास्ते से गाड़ी चलानी पड़ती है। अतः वर्षा की स्थिति में यहाँ आना टालें।

काला ताज महल

काला ताज महल - बुरहानपुर
काला ताज महल – बुरहानपुर

मेरी स्मृति में मैंने देखे अब तक के सर्वाधिक गन्दगी भरे रास्तों से होते हुए हमारी गाड़ी नवाब खान के मकबरे तक पहुँची। यह मकबरा काले ताज महल के नाम से अधिक प्रसिद्ध है। इसकी संरचना आगरे के ताज महल से मिलते हुए भी यह भिन्न है। यह अपेक्षाकृत छोटा स्मारक स्थानीय काली शिलाओं से निर्मित है। मकबरे के भीतर भित्तिचित्र भी काले रंग में किये गए हैं। ऐसा विचित्र दृश्य मैंने इससे पूर्व कहीं नहीं देखा था।

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आगरे के ताज महल की कुछ कुछ छटा आपको बुरहानपुर में कई स्थानों पर दिखाई देंगी।

राजा जयसिंह छत्री

राजा जय सिंह की छतरी - बुरहानपुर
राजा जय सिंह की छतरी – बुरहानपुर

बुरहानपुर नगर से थोड़ी दूरी पर तापी नदी एवं मोहना नदी का संगम है। यहाँ पर मैंने एक अकेली संरचना देखी। यह राजा जयसिंह की छत्री अथवा स्मारक है। इस इकलौते मंडप में ३२ स्तंभ एवं ५ गुम्बद हैं।

रेणुका देवी मंदिर

बुरहानपुर को घेरते तीन देवी-मंदिर हैं जो आपस में त्रिकोण बनाते हैं। आशादेवी मंदिर जो असीरगढ़ के पास है, इच्छापुरी देवी मंदिर तथा रेणुका देवी मंदिर।

रेणुका देवी मंदिर - बुरहानपुर
रेणुका देवी मंदिर – बुरहानपुर

इनमें रेणुका देवी मंदिर बुरहानपुर से सर्वाधिक समीप है तथा मैं केवल इसके ही दर्शन कर पायी। इस केसरिया रंग के छोटे से मंदिर का दीपस्तंभ अपेक्षाकृत विशाल था।

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कपड़ा बाजार

पिछले कुछ समय से बुरहानपुर सूती उत्पादित कपड़ों का बड़ा बाजार है। यहाँ की सूती कपड़ों के मिल अब भी चालू हैं। ये मिलें ही बुरहानपुर की अर्थव्यवस्था का प्रमुख स्त्रोत हैं। आप चारों ओर जहां भी दृष्टी दौड़ाएं, साइकिल, रिक्शा, ऑटो एवं छोटे ट्रकों पर सूती कपड़ों की गठरियाँ लिए लोग यहाँ-वहां जाते दिखायी पड़ेंगे।

सूती कतरनों से बनती रस्सियाँ
सूती कतरनों से बनती रस्सियाँ

सूती कपड़ों की मीलों से निकले अवशेषों से रस्सियाँ बनायी जाती हैं। रस्सा उद्योग बुरहानपुर के कपड़ा उद्योग पर फलता एक बड़ा सहायक उद्योग है। ऐसी कई रस्सा औद्योगिक इकाईयां आपको रास्तों के किनारे दिखेंगी। सूती धागों को गोल घुमाकर व मोड़कर ये रस्सियाँ बनायी जाती हैं जिसके लिए यांत्रिक मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है।
बुरहानपुर का एक अन्य सफल उद्योग है कागज़ उद्योग।

मावा जलेबी – बुरहानपुर की प्रसिद्ध मिठाई जिसे खाना ना भूलें!

मावा जलेबी
मावा जलेबी

किसी भी प्राचीन नगरी का दर्शन तब तक सम्पूर्ण नहीं होता जब तक आपने वहाँ के प्राचीन व्यंजन चखे ना हों! बुरहानपुर का ऐतिहासिक प्राचीन व्यंजन है मावा जलेबियाँ । बुरहानपुर की प्राचीन नगरी में आप इसे हर ओर देख सकते हैं। मावे की मोटी बड़ी जलेबियाँ यहाँ के निवासियों का प्रमुख प्रातःकालीन नाश्ता होता है। मावे से भरा एवं शक्कर की चाशनी में भीगा हुआ यह व्यंजन भले ही गरिष्ठ हो किन्तु होता यह अवश्य ही स्वादिष्ट है। इसे चखना ना भूलें।

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मुगलिया प्रभावों के कारण बुरहानपुर रुमाली रोटियों के लिए भी अत्यंत प्रसिद्ध है। इन रोटियों को उल्टे तवे पर बनाया जाता है जिसे तंदूर पर रख कर गर्म करते हैं।

गलियों में बनती रूमाली रोटी
गलियों में बनती रूमाली रोटी

जब मैं बुरहानपुर आयी थी तब मैंने नहीं सोचा था कि यह शहर मुझे दो दिनों तक व्यस्त रख सकेगा। कैसे मेरे दो दिन बीत गए पता ही नहीं चला। जिस स्थानों के विषय में अधिक लिखा नहीं गया हो वैसे स्थलों में एक विशेष अछूतापन होता है। ऐसे शहरों का भोलापन एवं सादगी बड़े शहरों व पर्यटन स्थलों में ढूंढें नहीं मिलता। ऐसे शहरों की कई कहानियाँ होती हैं जिनके विषय में अधिक लोग नहीं जानते। ऐसे अछूते स्थल मुझे सदैव नवीन ऊर्जा से भर देते हैं।

इंदौर शहर के बाहर बुरहानपुर एक सादा किन्तु प्रभावशाली स्फूर्तिदायक पर्यटन स्थल है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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वायस रीगल लॉज से राष्ट्रपति निवास तक की यात्रा, शिमला https://inditales.com/hindi/indian-institute-advanced-studies-shimla/ https://inditales.com/hindi/indian-institute-advanced-studies-shimla/#respond Wed, 08 May 2019 02:30:31 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1324

शिमला अंग्रेजों का चहेता पहाड़ी प्रदेश था। बहुत सालों तक वह अंग्रेजों की ग्रीष्मकालीन राजधानी भी रहा है। तो ऐसे में इन पहाड़ियों पर उनकी छाप न हो ऐसा कैसे हो सकता है। यहाँ की भूतपूर्व वायस रीगल लॉज अंग्रेजों की सबसे अनोखी छाप है शिमला में। जिसे अब राष्ट्रपति निवास के रूप में जाना […]

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शिमला अंग्रेजों का चहेता पहाड़ी प्रदेश था। बहुत सालों तक वह अंग्रेजों की ग्रीष्मकालीन राजधानी भी रहा है। तो ऐसे में इन पहाड़ियों पर उनकी छाप न हो ऐसा कैसे हो सकता है। यहाँ की भूतपूर्व वायस रीगल लॉज अंग्रेजों की सबसे अनोखी छाप है शिमला में। जिसे अब राष्ट्रपति निवास के रूप में जाना जाता है। इस इमारत में आज भारतीय उन्नत अध्ययन संस्थान बसता है। लेकिन आज भी वह उसी समय में जकड़ा है जिन दिनों में वह जब वह भारत को अंग्रेजों से स्वतंत्रता मिलने से ठीक पूर्व जब ये को बड़ी योजनाओं का स्थान हुआ करता था।

भारतीय अद्यतन शिक्षा संस्थान शिमला
भारतीय अद्यतन शिक्षा संस्थान शिमला

राष्ट्रपति निवास आम जनता के लिए खुला है। आप चाहें तो यहाँ पर गाइड की सहायता से घूम सकते हैं या फिर अपने आप भी यहाँ के व्यापक फैले मैदानों का लुत्फ उठा सकते हैं।

वायस रीगल लॉज या राष्ट्रपति निवास आकाशलोचनीय पहाड़ी पर बसा हुआ है, जिसकी अपनी खास विशेषताएँ हैं। इस पहाड़ी की एक तरफ से बहता हुआ पानी पूरब में बंगाल की खाड़ी में जा मिलता है तो दूसरी तरफ से बहता हुआ पानी पश्चिम में अरब सागर से जा मिलता है।

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इस इमारत की प्रारंभिक अनुमानित लागत रु. 38 लाख थी तथा इसकी वार्षिक रखरखाव की कीमत रु. 1.5 लाख थी। याद रहे कि हम सन 1880 की बात कर रहें हैं।

इस इमारत की वास्तुकला अँग्रेजी नवजागरण काल से प्रेरित है, लेकिन आप देख सकते हैं कि यह हूबहू स्कॉटलैंड के महल की तरह दिखाता है।

वायस रीगल लॉज अथवा राष्ट्रपति निवास शिमला

वायस रीगल लॉज 110 एकड़ की जमीन पर फैला हुआ है। यहाँ की अधिकतर जमीन विविध प्रकार के फूलों और घास से भरी हुई है। शुरू-शुरू में यह अब के आकार से तीन गुना ज्यादा था। प्रकृति प्रेमियों के लिए इन रंग-बिरंगी फूलों से गुजरते हुए जाने का एक अलग ही आनंद है। इन में से कुछ फूल दुर्लभ प्रकार के भी हैं। इस उद्यान में सैर करते समय आप न केवल सुंदर बागों से गुजरते हैं, बल्कि आप रीगल भवन को दूर से भी देखने का लुत्फ उठा सकते हैं। उसकी प्रशंसा कर सकते हैं। आप उसे उसकी पूर्णता में देखा सकते हैं। याद रहे की आप दुनिया के सबसे ऊंचे उद्यानों में से एक की सैर कर रहे हैं।

शिमला राष्ट्रपति निवास के आँगन के रंग बिरंगे फूल
शिमला राष्ट्रपति निवास के आँगन के रंग बिरंगे फूल

बर्मा से सागौन की लकड़ी इस भवन के निर्माण के लिए आयात की गई थी। स्थानीय देवदार और अखरोट की लकड़ी से आंतरिक सजावट के लिए सुसंपन्न दीवारों के तख्ते बनाए जाते थे। ये विशाल लकड़ी की कारीगरी आज भी इस भवन के मुख्य सभागार में अपने पूर्ण वैभव में देखी जा सकती है। यहाँ की एक दीवार पर भारतीय मूल के युद्ध शस्त्र प्रदर्शित किए गए थे। आप यहाँ की ऊंची-ऊंची दीवारों पे आज भी उनकी छाप देख सकते हैं।

इस भवन में बारिश के पानी के संग्रहण की अंतर्निहित व्यवस्था है, जिसकी पानी की टंकियां यहाँ के घास के मैदानों के नीचे हैं। भवन के ऊपर से सारा पानी इन टंकियों में जमा होता है जो बाद में उद्यान के रखरखाव के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

भारतीय अद्यतन शिक्षा संस्थान का सुन्दर भवन
भारतीय अद्यतन शिक्षा संस्थान का सुन्दर भवन

इस भवन में अंतर्निहित अग्निशामक यंत्र-रचना भी है, जो तापमान 60 डिग्री से ऊपर चढ़ते ही अपने आप ही पानी का फव्वारा छोड़ता है। लेकिन कभी भी इसका वास्तविक रूप से उपयोग नहीं किया गया है। लेकिन हमारे गाइड ने बताया कि हर कुछ महीनों में इसकी जांच की जाती है और वह आज भी काम करने की स्थिति में है। है न यह एक हैरान करने वाला तथ्य!

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जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी ने सन 1887 में छिपी और सुरक्षित तारों से वायस रीगल लॉज का विद्युतीकरण किया था। देखा जाए तो उन्हें अपने-आप पर बहुत गर्व होगा।

वायस रीगल लॉज के प्रथम निवासी लॉर्ड और लेडी दुफ़्फेरिन 1888 में यहाँ पर आए थे। और उसके बाद 1927 तक अनेक निवासी यहाँ पर आते रहे।

सिमला सम्मेलन

वायस रीगल लॉज ऐतिहासिक ‘सिमला सम्मेलन’ का गवाह रहा है जिसके कारण भारत का विभाजन हुआ। असल में जिस मेज पर विभाजन के कागजात तैयार किए गए थे, वह आज भी इस भवन में मौजूद है। उस समय के लगभग सभी बड़े नेता जैसे जवाहरलाल नेहरू, मौलाना आज़ाद, लियाक़त अली खान, मास्टर तारा सिंह और मोहम्मद अली जिन्नाह इस सम्मेलन में मौजूद थे। जिसकी तस्वीरें आज आप वहाँ की दीवारों पर देख सकते हैं।

स्वतंत्रता के बाद इस भवन को यह नया नाम ‘राष्ट्रपति निवास’ मिला। और एक नए निवासी यानी भारत के राष्ट्रपति यहाँ पर रहने आ गए। नई दिल्ली में इससे भी बड़े निवास के साथ मुझे लगता है कि भारत के शुरुवाती राष्ट्रपति इसे ग्रीष्मकालीन आवास के रूप में इस्तेमाल करते थे। वर्तमान रूप से भारत के राष्ट्रपति का शिमला में एक और ग्रीष्मकालीन आवास है जिसे ‘द रिट्रीट’ कहा जाता है।

क्या आपको पता है कि हैदराबाद में भारत के राष्ट्रपति का एक और शिशिर-कालीन निवास है जिसे राष्ट्रपति नीलायम कहा जाता है।

भारतीय अद्यतन शिक्षा संस्थान

राष्ट्रपति निवास अब भारतीय अद्यतन शिक्षा संस्थान का घर है। यह एक ऐसा संस्थान है जो मानविकी, समाज और प्रकृति विज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान को प्रोत्साहित करता है। अगर आपके पास पीएचडी की उपाधि है तो आप इस संस्थान में फेलोशिप के लिए आवेदन कर सकते हैं। और मेरे ख्याल से पढ़ने और लिखने के लिए उत्तम वातावरण है जहां से आप अपना अनुसंधान कार्य कर सकते हैं।

तस्वीर प्रदर्शन के कक्ष

यहाँ पर तस्वीर प्रदर्शन के तीन कक्ष हैं, जहां पर शाही शिमला, शिमला में स्वतंत्रता के पूर्व की गतिविधियों और भारतीय अद्यतन शिक्षा संस्थान की अनेक तस्वीरें प्रदर्शित की गई है। यहाँ के पथ-प्रदर्शित दौरे आगंतुकों को इन तीनों कक्षों की यात्रा कराते हैं। यहाँ पर आप शिमला की पुरानी तस्वीरें देखा सकते हैं। तथा कक्ष में मौजूद उपस्कर की वस्तुएं पूर्वकालीन माहौल का निर्माण करते हैं। मुझे विशेष रूप एक तस्वीर याद है जिसमें राजकुमारी अमृत कौर शिमला में अपने खुद के घर के बाहर गांधीजी का इंतज़ार कर रही हैं।

पुस्तकालय

राष्ट्रपति निवास के उस कक्ष में जो पहले बॉलरूम हुआ करता था उसमें अब भारतीय अद्यतन शिक्षा संस्थान का एक बड़ा सा पुस्तकालय है। जिसमें 1.5 लाख किताबें हैं जो पूरे पुस्तकालय में दो स्तरों पर प्रदर्शित की गई हैं। इस पुस्तकालय में घूमते हुए मुझे ऐसे लगा कि बस मैं यहीं पर बस जाऊ।

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भवन के भीतर तस्वीरें खींचने की अनुमति नहीं है, लेकिन आप संस्थान की वैबसाइट से पुस्तकालय और तस्वीर प्रदर्शन कक्ष से आभासी यात्रा कर सकते हैं जो आम जनता के लिए खुली है।

यहाँ पर प्रत्येक कक्ष में एक छोटा सा पुस्तक-ताक है जिसमें दुर्लभ और ऐतिहासिक पुस्तकें शान से प्रदर्शित की गई हैं। मैंने यहाँ पर कला इतिहास पर बहुत सारी किताबें देखी। मैं आशा करती हूँ कि एक दिन मैं इतिहास की इन खूबसूरत सी रचनाओं पर अनुसंधान कार्य कर पाऊँ।

सुभोध केरकर द्वारा निर्मित नर्तकी की मूर्ति

सुबोध केरकर की हरप्पा कालीन नर्तकी
सुबोध केरकर की हरप्पा कालीन नर्तकी

वहाँ के उद्यान में मुझे गोवा के कलाकार सुभोध केरकर द्वारा बनाई गई एक मूर्ति दिखी जो सिंधु घाटी सभ्यता की नर्तकी की थी। नेगेटिव स्पेस में निर्मित यह मूर्ति रेल्वे लाइन पर रखी गई है जो यह याद दिलाता है कि उसकी खोज एक रेल्वे अभियंता द्वारा की गई थी।

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यहाँ पर एक केफे-कम-बुकशोप है जिसे फायर स्टेशन केफे कहा जाता है। यह एक पुराना दमकल केंद्र है जिसे केफे में परिवर्तित किया गया है। यहाँ पर आप कॉफी का मजा लेते हुए संस्थान के प्रकाशनों को देख सकते हैं और अपने लिए स्मृति-चिह्नों का चुनाव भी कर सकते हैं। गाइडेड टूर की टिकिट भी यहाँ पर बेची जाती हैं।

तो जब आप शिमला जाएँ तो भारतीय अद्यतन शिक्षा संस्थान जाना न भूलें।

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जंतर मंतर जयपुर की अद्भुत सवाई जयसिंह वेधशाला https://inditales.com/hindi/jantar-mantar-jaipur-world-heritage/ https://inditales.com/hindi/jantar-mantar-jaipur-world-heritage/#comments Wed, 16 Jan 2019 02:30:28 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1165

क्या आपकी गणित एवं आकलन इत्यादि विषयों में रूचि है? क्या विज्ञान एवं खगोलशास्त्र आपको प्रेरित करते हैं? तो मेरे पास आपके लिए एक अति उत्तम दर्शनीय स्थल का सुझाव है। जंतर मंतर। जी हाँ! जंतर मंतर जयपुर ऐसा स्थान है जो आपको अपने विद्यार्थी जीवन का स्मरण करा देता है। यहाँ आते ही ऐसा […]

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क्या आपकी गणित एवं आकलन इत्यादि विषयों में रूचि है? क्या विज्ञान एवं खगोलशास्त्र आपको प्रेरित करते हैं? तो मेरे पास आपके लिए एक अति उत्तम दर्शनीय स्थल का सुझाव है। जंतर मंतर। जी हाँ! जंतर मंतर जयपुर ऐसा स्थान है जो आपको अपने विद्यार्थी जीवन का स्मरण करा देता है।

यहाँ आते ही ऐसा प्रतीत होता है मानो आपके ज्यामिति मंजूषा के छोटे छोटे यंत्र, विशाल अवतार ग्रहण कर आपके समक्ष उपस्थित हो गए हैं। एक ओर यहाँ की अर्धवृत्त संरचनायें चांद का स्मरण कराती हैं, तो दूसरी ओर त्रिकोणीय संरचनाएं गुनिया सदृश प्रतीत होती हैं। यंत्रों के ऊपर स्थिन चिन्हांकन मापक-पट्टी का स्मरण कराते हैं तो कुछ यंत्र घूमती पृथ्वी प्रतीत होते हैं। हो सकता है कि विद्यालय की ज्यामिति मंजूषा में उपस्थित यंत्र, जंतर मंतर के यंत्रों का ही लघु रूप हों! आखिरकार जंतर अर्थात् यंत्र तथा मंतर अर्थात् मंत्रणा या गणना, इन्ही के द्वारा ही तो ज्यामिति मंजूषा, अध्ययन में हमारी सहायता करती थी।

जंतर मंतर क्या है?

लघु सम्राट यन्त्र - जंतर मंतर जयपुर
लघु सम्राट यन्त्र – जंतर मंतर जयपुर

जयपुर का जंतर मंतर, राजा सवाई जयसिंह द्वारा निर्मित कराये गए ५ वेधशालाओं में से एक है। अन्य वेधशालाएं दिल्ली, वाराणसी, उज्जैन एवं मथुरा में स्थापित हैं। जयपुर की वेधशाला इस कड़ी की अंतिम, अतः कदाचित सर्वोत्तम वेधशाला है। इसका निर्माण सन १७२८ के आरंभिक कालावधि में किया गया था एवं २० वीं सदी के अंत में इसका पुनरुद्धार किया गया था। वेधशाला की सूचना पटलों पर इसके निर्माण एवं पुनरुद्धार का सम्पूर्ण विवरण अंकित है। साथ ही उन ज्योतिषाचार्यों के नाम भी अंकित हैं जिन्होंने इन यंत्रों के चिन्हित संख्याओं को प्रमाणित किया था।

जंतर मंतर के यंत्रों के निर्माण में पत्थर, संगमरमर एवं पीतल का उपयोग किया गया है।

जयपुर का जंतर मंतर यहाँ के प्रसिद्ध सिटी पैलेस के निकट एवं हवा महल के पृष्ठ स्थान में स्थापित है। सिटी पैलेस अर्थात् जयपुर के मुख्य राजनिवास के ऊपर गर्व से फहराते, राजा सवाई जयसिंह के ध्वज को आप जंतर मंतर में कहीं भी खड़े होकर निहार सकते हैं। सम्पूर्ण ध्वज के साथ साथ एक चौथाई ध्वज भी फहराया जाता है यदि राजा राजमहल में उपस्थित हों।

जंतर मंतर देखने क्यों जाएँ?

• यह भारत में उपस्थित कुछ ही वेधशालाओं में से एक है।
• इसके निरिक्षण द्वारा खगोलशास्त्र के सम्बन्ध में प्रत्यक्ष रूप से जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
• यह आपको वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सम्पूर्ण पृथ्वी के दर्शन कराता है। यहाँ यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यह जंतर मंतर कवियों को वैज्ञानिक एवं वैज्ञानिकों को कवि प्रतीत कराने में सक्षम है।
• आप सम्पूर्ण ब्रम्हांड के परिप्रेक्ष्य में अपनी स्थिति का आंकलन कर सकते हैं।
• जंतर मंतर विज्ञान एवं खगोलशास्त्र के आधारभूत सिद्धांतों को इतनी सरलता से आपके समक्ष प्रस्तुत करता है कि आप अपने घर में इसे स्वयं निर्मित करने हेतु प्रेरित हो जाते हैं।

जयपुर के स्थानीय ज्योतिषविद, आषाढ़ मास की पूर्णिमा के दिन, सूर्यास्त के समय जंतर मंतर के दर्शन अवश्य करते हैं। वे यहाँ आकर आगामी वर्षा ऋतू के आगमन बेला का आकलन करते हैं।

जयपुर जंतर मंतर के यंत्रों के मूलभूत सिद्धांत

आईये इस जंतर मंतर में भ्रमण करते हुए यहाँ स्थापित विभिन्न यंत्रों के मूलभूत सिद्धांतों एवं उनकी कार्यप्रणालियों को समझने का प्रयत्न करें।

सम्राट यंत्र

वृहत सम्राट यन्त्र - जंतर मंतर जयपुर
वृहत सम्राट यन्त्र – जंतर मंतर जयपुर

सम्राट यंत्र अर्थात् यंत्रों के सम्राट! जंतर मंतर में दो सम्राट यंत्र अथवा धूप-घड़ियाँ हैं, एक लघु एवं एक विशाल अर्थात् वृहत्। जंतर मंतर में प्रवेश करते ही आपकी दृष्टि लघु सम्राट यंत्र पर जा टिकती है, जबकि वृहत् सम्राट यंत्र यहाँ से समक्ष स्थित विकीर्ण कोने में स्थापित है। वृहत सम्राट यंत्र की विशेषता यह है कि वह इस परिसर का सर्वाधिक विशाल यंत्र होते हुए सूक्ष्मता एवं उत्कृष्टता का बेजोड़ उदाहरण है।

लघु सम्राट यंत्र एवं वृहत सम्राट यंत्र, ये दोनों धूप घड़ियाँ हैं जिनकी कार्यप्रणाली सामान है। इन यंत्रों में एक त्रिकोणीय भित्त की परछाई इसके पूर्वी तथा पश्चिमी दिशाओं में स्थित चतुर्थांश चापों पर पड़ती है जिससे जयपुर के स्थानीय समय की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। इस भित्त का भीतरी कोण २७ अक्षांश उत्तर में होने के कारण यह भित्त उत्तर-दक्षिण दिशा के समानांतर स्थित है। पश्चिम एवं पूर्व चतुर्थांश क्रमशः प्रातः एवं अपरान्ह के समय की जानकारी देते हैं। सही समय की जानकारी हेतु चतुर्थांश चापों को घंटा, मिनट एवं सेकण्ड दर्शाने हेतु योग्य खण्डों में विभाजित किया गया है। लघु सम्राट यंत्र २० सेकंड की सूक्ष्मता एवं वृहत सम्राट यंत्र २ सेकंड की सूक्ष्मता से समय बता सकती है।

कुछ परिदर्शकों का कहना है कि वृहत् सम्राट यंत्र के निर्माण पूर्व, लघु सम्राट यंत्र का प्रायोगिक निर्माण किया गया था।किसी भी धुप भरे उजले दिन, इन यंत्रों पर गिरती सूर्य की परछाई को चतुर्थांश चापों के खण्डों पर निर्विघ्न रूप से सरकते देखने का आनंद अतुलनीय है।

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सम्राट यंत्र का नामकरण पंडित जगन्नाथ सम्राट को समर्पित है जिन्होंने महाराजा सवाई जय सिंह को खगोलशास्त्र के अध्ययन हेतु सहायता की थी। इस कार्य में पंडित केवल रामजी का भी योगदान माना जाता है। खगोलशास्त्र में पांडित्य प्राप्त करने हेतु इन पंडितों ने प्राचीन संस्कृत ग्रंथों एवं वेदांगों के अध्ययन के साथ साथ यूनान, अरब, पुर्तगाल, ब्रिटेन इत्यादि देशों का भी भ्रमण किया था।

ध्रुवदर्शक पट्टिका

ध्रुवदर्शक पट्टिका - जंतर मंतर जयपुर
ध्रुवदर्शक पट्टिका – जंतर मंतर जयपुर

जयपुर के जंतर मंतर में स्थापित सर्व यंत्रों में सर्वाधिक सरल यंत्र है, ध्रुवदर्शक पट्टिका। जैसा की इसका नाम दर्शाता है, यह यंत्र ध्रुव तारे की स्थिति की जानकारी प्रदान करता है। समलम्ब संरचना के इस यंत्र के ऊपर एक पट्टिका है जो समतल के साथ वेधशाला के अक्षांश, २७ अंश उत्तर, का कोण बनाती है। पट्टिका का ऊपरी तल उत्तर ध्रुव की ओर इंगित करता है जहां ध्रुव तारा स्थित है। रात्रि के समय, नीचे के तल में आँख लगा कर यंत्र की ऊपरी सतह की सीध में देखने पर ध्रुव तारा आसानी से देखा जा सकता है। ध्रुवदर्शक चक्र को प्राचीनकाल का दिशा सूचक यंत्र भी कहा जाता था।

जय प्रकाश यंत्र

जय प्रकाश यन्त्र - जंतर मंतर जयपुर
जय प्रकाश यन्त्र – जंतर मंतर जयपुर

यह जयपुर जंतर मंतर का सर्वाधिक विचित्र एवं पहेली सदृश यंत्र है। इस यंत्र में संगमरमर के गोलार्धों की एक जोड़ी धंसी हुई है। श्वेत संगमरमर में बने ये गोलार्ध एक दूसरे के पूरक हैं। यदि इन्हें जोड़ दिया जाय तो ये सम्पूर्ण अर्धगोला बना लेंगे। संगमरमर में कटी प्रत्येक पट्टी एक घंटे को दर्शाती है। अर्थात् प्रत्येक घंटे के पश्चात आप बारी बारी से अर्धगोला बदल कर खड़े हो जाते हैं एवं माप लेते हैं।

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इस विलक्षण यंत्र का केंद्र एक लघु धातु का टुकड़ा है जिसके मध्य एक छिद्र है। इस छिद्र के द्वारा इसे अर्धगोले के मध्य में लटकाया हुआ है। इस टुकड़े के द्वारा अर्धगोले पर बनायी गयी परछाई ही इसके सर्व मापों का आधार है। किनारे को क्षितिज मानकर यह अर्धखगोल का परिदर्शन कराता है।

जय प्रकाश यन्त्र - जयपुर
जय प्रकाश यन्त्र – जयपुर

मुझे यह यंत्र इस जंतर मंतर का सर्वाधिक आकर्षक यंत्र प्रतीत हुआ। लाल पत्थर की पृष्ठभूमि में अर्धगोलाकार बनाती श्वेत संगमरमर की कटी पट्टियां अत्यंत मनमोहक प्रतीत होती हैं। परिदर्शक द्वारा आसान शब्दों में दिए गए व्याख्या को सुन खगोलशास्त्र अत्यंत मनोरंजक एवं रोचक प्रतीत होता है।

कपाली यंत्र

यह जय प्रकाश यंत्र के ही समान यंत्र है। इसमें किनारे को क्षितिज मानकर प्रकाशगोले का परिदर्शन प्राप्त किया जाता है।

नाड़ी वलय यंत्र

नाड़ी वलय यन्त्र - जयपुर
नाड़ी वलय यन्त्र – जयपुर

इस विशेष यंत्र में दो वृत्ताकार सतहें हैं। एक का मुख उत्तर दिशा की ओर तथा दूसरे का मुख दक्षिण दिशा की ओर है। यह सतहें इस यंत्र की अंकपट्टिकाएं हैं। यह सतहें दक्षिण की ओर इस अंश में झुकी हैं कि वे भूमध्य रेखा की सतह के समान्तर हो जाती हैं। अतः इसके केंद्र से निकलती एक छोटी कील सदृश छड़ी पृथ्वी की धुरी के समान्तर हो जाती है। इसी छड़ी की परछाई हमें समय की जानकारी देती है। प्रत्येक सतह तीन वृत्ताकार अंकपट्टिकाओं में विभाजित है, जिनमे दो अंकपट्टिकाएं पाश्चात्य पद्धति से घंटा व मिनट बताती हैं तथा तीसरी हिन्दू समयानुसार घटी एवं पल दर्शाती है।

इस यंत्र की दक्षिणी सतह सूर्य द्वारा शरद ऋतु के विषुव से बसंत ऋतु के विषुव तक प्रकाशित रहती है तथा उत्तरी सतह बसंत ऋतू के विषुव से शरद ऋतू के विषुव तक प्रकाशित होती है। अर्थात् प्रत्येक सतह की कार्यक्षमता वर्ष के छः महीने तक उपयोग में लाई जाती है।

नाड़ी वलय यन्त्र पर संस्कृत अभिलेख - जंतर मंतर जयपुर
नाड़ी वलय यन्त्र पर संस्कृत अभिलेख – जंतर मंतर जयपुर

यंत्र की दक्षिणी सतह पर लिखे संस्कृत के अभिलेख इस नाड़ीवलय यंत्र के संरक्षण एवं नवीनीकरण की कथा कहती हैं। इतने व्यवस्थित तरीके से लिखे इस अभिलेख को पढ़कर अत्यंत प्रसन्नता हुई। आरम्भ में भगवान् गणेश का नमन किया गया है, तत्पश्चात इस यंत्र के उद्देश्य की व्याख्या की गयी है। इसके उपरांत इसके निर्माता पूर्वज की यंत्र सम्बंधित जिज्ञासा का उल्लेख किया गया है। अंत में इसके नवीनीकरण का विवरण अंकित है। इसे देखकर मेरी तीव्र अभिलाषा हुई कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग सरल भाषा में इसका अनुवाद दर्शनार्थियों हेतु उपलब्ध कराये।

राज यंत्र

यहाँ अष्टधातु से बनी एक विशाल लटकती चकती है जिस पर नभमंडल के सर्व नक्षत्र अंकित है। यह एक सम्पूर्ण तारेक्ष अथवा तारक्षवेधयंत्र है।

राज यन्त्र और उसपे लिखा मेरा नाम - अनुराधा
राज यन्त्र और उसपे लिखा मेरा नाम – अनुराधा

हम सब ने राज यंत्र के समीप बहुत आनंद उठाया। हम सब इस यन्त्र पर अंकित नक्षत्रों को ढूँढने का आखेट करने लगे। ज्यों ही मेरी दृष्टी इस यंत्र पर पड़ी, मुझे देवनागरी में लिखा हुआ रोहिणी नक्षत्र दृष्टिगोचर हुआ। कुछ क्षणों के शोध के उपरांत मैंने कई और नक्षत्रों के नाम ढूंढ निकाले। चूंकि मेरा नाम, अनुराधा, भी एक नक्षत्र का नाम है, मैंने इस यंत्र पर उसकी खोज आरम्भ की। गूगल से किंचित सहायता लेने के पश्चात मैंने उसे इस चकती के ऊपरी दायें भाग में खोज निकाला। अपना नाम इस राज यंत्र पर खुदा देख मेरी प्रसन्नता की सीमा न रही। मैं खुशी से झूम उठी।

हमारी जिज्ञासा से हमारे परिदर्शक श्री दिनेशजी अत्यधिक प्रभावित हो गए एवं उन्होंने हमारी जिज्ञासा शांत करने का मानो बीड़ा उठा लिया। इसके पश्चात उन्होंने तीन घंटे लगाकर सम्पूर्ण जंतर मंतर के विषय में हमें समझाने की कड़ी मेहनत की।

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राजयंत्र में उपरोक्त चकती के अलावा लोहे में बनी एक और चकती लटकी हुई है जो संभवतः मुख्य यंत्र का प्रारूप है।
भारतीय तिथिपत्र के आंकलन हेतु प्रत्येक मास में एक बार राजयंत्र का अवलोकन किया जाता है।

राशि वलय यंत्र

राशी वलय यन्त्र का वृश्चिक यन्त्र - जंतर मंतर जयपुर
राशी वलय यन्त्र का वृश्चिक यन्त्र – जंतर मंतर जयपुर

राशिवलय यंत्र द्वारा खगोलीय अक्षांश व देशांतर रेखाओं को मापा जाता है। इसमें उपस्थित १२ यंत्र, १२ राशियों को प्रदर्शित करते हैं। प्रत्येक यंत्र का उपयोग उस समय किया जाता है जब उससे सम्बंधित राशि मध्यान्ह रेखा से पार होती है। यद्यपि प्रत्येक यंत्र की रचना सम्राट यंत्र के सामान है, तथापि ये १२ यंत्र शंकु के आकार एवं कोण के आधार पर भिन्न हैं। राशिवलय यंत्र जयपुर वेधशाला के अतिरिक्त अन्य किसी वेधशाला में उपलब्ध नहीं है।

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इस यंत्र के दर्शन के समय मैं किंचित स्वार्थी हो गयी और केवल स्वयं की जन्म राशि वृश्चिक के यंत्र को ही विस्तार से समझने का प्रयत्न किया।

राम यंत्र

राम यंत्र अत्यंत आकर्षक यंत्र है। दिल्ली के जंतर मंतर में देखा राम यंत्र मुझे अब भी स्मरण है। वहां यह यंत्र चटक लाल रंग में निर्मित है।

राम यन्त्र - जंतर मंतर जयपुर
राम यन्त्र – जंतर मंतर जयपुर

इस यंत्र का उपयोग किसी खगोलीय पिंड की ऊंचाई (उन्नतांश) एवं दिगंश के स्थानीय निर्देशांकों को मापने में किया जाता है। क्षितिज से किसी पिंड की कोणीय ऊंचाई को उन्नतांश कहा जाता है तथा उत्तरी दिशा से पूर्वी दिशा में उस पिंड की कोणीय स्थिति को दिगंश कहा जाता है।
• दिगंश यंत्र – खगोलीय पिंड के दिगंश को मापने वाला यह बेलनाकार यंत्र है।
• क्रान्ति वृत्त यंत्र – यह यंत्र खगोलीय पिंडों के अक्षांश एवं देशांतर मापने में उपयोग में आता है।

षष्ठांश यंत्र

वृहत सम्राट यंत्र के समीप एक ६० अंश का वृत्तखंड है। यदि आप इस वृत्तखंड के भीतर प्रवेश करें, आप देखेंगे कि सूर्य प्रकाश इस अन्धकोष्ठ के भीतर एक छिद्र के द्वारा प्रवेश करता है। इसी का उपयोग कर सूर्य से दूरी नापी जाती है।

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इस यंत्र के भीतर खड़े होकर, उस छिद्र को निहारते, इस जंतर मंतर के वास्तुकार व निर्माता के समक्ष नतमस्तक होने की अभिलाषा होती है।

चक्र यंत्र

चक्र यन्त्र - जंतर मंतर जयपुर
चक्र यन्त्र – जंतर मंतर जयपुर

चक्र यंत्र एक विशाल धातुई चक्र है। इसकी कार्यप्रणाली एवं उद्देश्य की जानकारी मुझे नहीं मिल पायी।

यंत्रों के प्रारूप

जयपुर जंतर मंतर के भ्रमण में मुझे अवश्य अत्यंत आनंद आया था। यद्यपि जिसने मेरा ध्यानाकर्षित किया वे थे यंत्रों के प्रारूप, अर्थात् आरंभिक अवस्था। इन प्रारूपों को देखकर हम जान सकते हैं कि यहाँ उपस्थित सर्व अचूक एवं सटीक यंत्रों पर, उनकी अंतिम अवस्था प्राप्त होने से पूर्व, अविष्कारक द्वारा कितने ही प्रयोग किये गए थे। प्रत्येक यंत्र का कम से कम एक लघु प्रारूप यहाँ उपलब्ध है। उदाहरणतः धातु में बने सर्व यंत्रों के प्रारूपों में भिन्न भिन्न धातुओं का उपयोग प्रायोगिक तौर पर किया गया था। तत्पश्चात सर्वोपयुक्त धातु सुनिश्चित किया गया था। यहाँ खड़े होकर ऐसा प्रतीत होता है मानो हम किसी प्रयोगशाला में आ गए हों।

कपाली यन्त्र - जंतर मंतर जयपुर
कपाली यन्त्र – जंतर मंतर जयपुर

प्रत्येक यंत्र के सूक्ष्मता से मापन हेतु सीड़ियाँ बनायी गयी हैं जिन पर चढ़कर शोध-अधिकारी चिन्हित संख्या का निरिक्षण करते हैं। यद्यपि यंत्रों की सुरक्षा एवं संसाधन हेतु दर्शनार्थियों एवं पर्यटकों को इन सीड़ियों पर चढ़ने की अनुमति नहीं है।

जयपुर जंतर मंतर के यंत्रों के दर्शन एवं जानकारी प्राप्त करते समय मुझे स्मरण हुआ कि मैंने भौतिक शास्त्र में ही अध्ययन कर स्नातक की उपाधि प्राप्त की है। मैं सोच में पड़ गयी कि भौतिक शास्त्र पर आधारित व्यवसाय का चुनाव मेरे हेतु अत्यंत रोचक होता!

जंतर मंतर की सर्व विशाल भित्तियों पर चापाकार झरोखे कटे हुए थे। ये भित्तियों का भार तो उठा ही रहे थे, तथापि सपाट सादी भित्तियों को सुन्दरता प्रदान कर रहे थे। अन्यथा यंत्रों हेतु आवश्यक ये ऊंची भित्तियाँ किंचित उबाऊ हो सकती थीं।

अंततः मैं यह कहना चाहूंगी कि जयपुर के जंतर मंतर ने मेरा मन मोह लिया था। मेरे मष्तिष्क की दबी परतों को झाड़ पोछ कर सचेत कर दिया था। सर्व यंत्रों की कार्यप्रणाली अत्यंत सरल होते हुए भी सुचारू रूप से सटीक खगोलीय मापन करने में सक्षम थी। प्राचीन काल से हमारे देश के वैज्ञानिक इतने बुद्धिमान एवं निपुण थे । तभी तो इतने जटिल मापन को सरल यंत्रों द्वारा कितनी आसानी से प्राप्त करते थे। जंतर मंतर इसी तथ्य का जीता जागता उदाहरण है।

जयपुर जंतर मंतर के भ्रमण हेतु कुछ सुझाव

ज्यामितीय संरचनाएं - जंतर मंतर जयपुर
ज्यामितीय संरचनाएं – जंतर मंतर जयपुर

• जयपुर का जंतर मंतर यूनेस्को द्वारा घोषित विश्व विरासत स्थल है। यह सूर्योदय से सूर्यास्त तक दर्शनार्थ खुला रहता है। वेधशाला के यन्त्र भी इसी समयावधि में कार्यशील रहते हैं।
• इस वेधशाला में प्रवेश शुल्क ५० रुपये भारतवासियों के लिए तथा २०० रुपये विदेशी पर्यटकों के लिए निश्चित है।
• यह वेधशाला जयपुर के मधोमध स्थित है। अतः किसी भी साधन द्वारा यहाँ तक सरलता से पहुंचा जा सकता है।
• साधारणतः पर्यटक जंतर मंतर के यंत्रों के दर्शन ४५ मिनट से १ घंटे के समयावधि में पूर्ण कर लेते हैं। यद्यपि मुझे इनके निरिक्षण हेतु ३ घंटों का समय लगा। वह भी अनुमानतः मेरे द्वारा कुछ यंत्रों के दर्शन चूकने के पश्चात! अतः अपनी इच्छा एवं विज्ञान के प्रति आपकी रूचि के अनुरूप आप स्वयं अपनी समयावधि निश्चित करें।
• जिस तरह मैं उत्तेजित होकर अपना नाम, अनुराधा, राज यंत्र में खोज रही थी, आप भी अपना पसंदीदा नक्षत्र इस यंत्र में ढूंढ सकते हैं। आपकी सुविधा हेतु मैं यहाँ नक्षत्रों की सूची प्रदान कर रही हूँ।
• जंतर मंतर के सर्वोत्तम दर्शन हेतु तेज धूप आवश्यक है। अतः खुले आकाश में सूर्य की चमक तेज हो तभी इसके दर्शनों का अनुभव अविस्मरणीय होगा।
• इन यंत्रों को जानने एवं समझाने हेतु परिदर्शक आवश्यक है। श्री दिनेश शर्मा (८५५९८ ९३३९९), हमारे परिदर्शक अत्यंत निपुण थे। उन्होंने इन यंत्रों की कार्यप्रणाली को सरल शब्दों में हम तक पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोडी थी।
• जंतर मंतर के सम्बन्ध में और जानकारी इस वेबसाईट से पायें।
• बच्चों के ज्ञानवर्धन एवं मनोरंजन हेतु यह स्थल अत्यंत उपयुक्त है।

स्वर्णिम त्रिकोण पर्यटन समूह में उपस्थित एवं यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत स्थल घोषित अन्य पर्यटन स्थल हैं-
• ताजमहल – विश्व का सर्वाधिक छायाचित्रण योग्य स्मारक
• फतहपुर सीकरी
• दिल्ली का लाल किला
• दिल्ली का हुमायूं दरगाह

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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भानगढ़ दुर्ग – भारत का सर्वाधिक भुतहा एवं डरावना स्थल https://inditales.com/hindi/haunted-bhangarh-fort-rajasthan/ https://inditales.com/hindi/haunted-bhangarh-fort-rajasthan/#comments Wed, 21 Feb 2018 02:30:18 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=638

भानगढ़ दुर्ग – जब भी भारत के सबसे भुतहा स्थलों के सम्बन्ध में कहीं चर्चा हो तो इस दुर्ग का नाम अवश्य लिया जाता है। सूर्यास्त के उपरांत इस दुर्ग में प्रवेश करने वालों के साथ हुई भयावह घटनाओं से सम्बंधित कहानियां भी अत्यंत प्रचलित हैं। आपको यह जानकर अत्यंत आश्चर्य होगा कि भानगढ़ दुर्ग […]

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भानगढ़ दुर्ग – जब भी भारत के सबसे भुतहा स्थलों के सम्बन्ध में कहीं चर्चा हो तो इस दुर्ग का नाम अवश्य लिया जाता है। सूर्यास्त के उपरांत इस दुर्ग में प्रवेश करने वालों के साथ हुई भयावह घटनाओं से सम्बंधित कहानियां भी अत्यंत प्रचलित हैं। आपको यह जानकर अत्यंत आश्चर्य होगा कि भानगढ़ दुर्ग परिसर में सूर्यास्त से सूर्योदय तक प्रवेश की अनुमति आधिकारिक तौर पर निषिद्ध है। इस दुर्ग की कहानियां यात्री मित्रों, समाचारपत्रों एवं किताबों द्वारा मुझ तक भी पहुँची। चाह कर भी इस दुर्ग के दर्शनों का संयोग प्राप्त नहीं हो पा रहा था। और आकस्मिक ही मुझे अपनी जयपुर यात्रा के समय भानगढ़ के दर्शन का योग आया।

भानगढ़ दुर्ग - रत्नवती प्रासाद
भानगढ़ दुर्ग – रत्नवती प्रासाद

मेरी पिछली जयपुर यात्रा के समय, एक रात्रि भोज पर हम अगले दिन के लिए निश्चित चाँद बावड़ी के सम्बन्ध में चर्चा कर रहे थे। तभी वहां साथी यात्रियों ने भानगढ़ दुर्ग पर चर्चा आरम्भ कर दी। इसकी मंत्रमुग्ध कर देने वाली कहानियां एवं किस्सों ने अपना जादू चला ही दिया और भानगढ़ दुर्ग ने हमारे अगले दिन के कार्यक्रम सूची में अपना स्थान निश्चित कर लिया। अगले दिन चाँद बावड़ी के दर्शन तो किये ही, साथ ही वहां से वापसी के समय भानगढ़ दुर्ग का भी निरिक्षण किया।

भानगढ़ दुर्ग की भुतहा किवदंतियां

अरावली पहाड़ियों में भानगढ़ दुर्ग के खँडहर
अरावली पहाड़ियों में भानगढ़ दुर्ग के खँडहर

इस अभिशप्त, वीरान, उजाड़ एवं भुतहा दुर्ग के सम्बन्ध में मुख्यतः दो किवदंतियां प्रचलित हैं।

पहली किवदंती के अनुसार, इस पहाड़ी पर कभी एक तपस्वी बाबा बालकनाथ निवास करते थे। उन्होंने राजा माधो सिंह को इस पहाड़ी पर दुर्ग बनाने हेतु एक ही अवस्था में अनुमति प्रदान की थी। वह यह कि महल के किसी भी भाग की छाया उन पर या उनकी झोपड़ी पर नहीं पड़नी चाहिए। अन्यथा वह महल उजड़ जाएगा। किन्तु राजा माधो सिंह के देहांत के उपरांत उनके पौत्र अजब सिंह ने गढ़ का निर्माण कराते समय उसे इतना ऊँचा बनवाया कि सूर्य की किरणें तपस्वी की झोपड़ी तक नहीं पहुँच पा रही थी। स्वयं पर गढ़ की छाया पड़ते ही तपस्वी ने श्राप द्वारा समूचे राज्य को अपनी चपेट में ले लिया। और भानगढ़ दुर्ग एक भुतहा महल में परिवर्तित हो गया।

इस दुर्ग की दूसरी किवदंती के सम्बन्ध में निम्नलिखित, ‘भानगढ़ दुर्ग का इतिहास’ में पढ़ें।

भानगढ़ दुर्ग का इतिहास

रत्नावती का मंदिर - खंडहरों से घिरा हुआ - भानगढ़
रत्नावती का मंदिर – खंडहरों से घिरा हुआ – भानगढ़

भानगढ़ दुर्ग राजस्थान के अलवर जिले में सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान के एक छोर पर स्थित है। इस किले का निर्माण आमेर के राजा भगवंत दास ने सन १५७३ में अपने द्वितीय पुत्र माधो सिंह हेतु करवाया था। उनका प्रथम पुत्र मानसिंह, मुग़ल शासक अकबर के दरबार के नवरत्नों में शामिल सेनाध्यक्ष था। माधोसिंह के पश्चात उनके द्वितीय पुत्र छत्र सिंह ने भानगढ़ पर शासन किया जिनके शासनकाल से भानगढ़ का पतन आरम्भ हुआ। भारत के अन्य स्थानों में औरंगज़ेब के शासनकाल के समय राजकुमारी रत्नावती पर भानगढ़ के कार्यभार का उत्तरदायित्व था। राजकुमारी अपूर्व सुंदरी थी एवं उनके स्वयंवर की तैय्यारी आरम्भ हो चुकी थी। राजकुमारी तंत्र-मन्त्र विद्या में भी निपुण थी एवं काला जादू करने में सक्षम थी।

पड़ोस के राज्य अजबगढ़ का राजकुमार सिंघिया एक प्रचलित तांत्रिक था। वह राजकुमारी से अगाध प्रेम करता था एवं राजकुमारी की इच्छा के विरुद्ध उसे प्राप्त करना चाहता था। अतः उसने राजकुमारी को तंत्र विद्या द्वारा प्राप्त करने हेतु, इत्र क्रय करने बाजार आई राजकुमारी के सुगन्धित तेल को सम्मोहक बना दिया। इसकी भनक लगते ही राजकुमारी ने वह तेल एक चट्टान पर गिराकर चट्टान को तांत्रिक की ओर लुढ़का दिया। इसके फलस्वरूप तांत्रिक की मृत्यु हो गयी। किन्तु मृत्यु पूर्व तांत्रिक सिंघिया ने भानगढ़ नगर एवं राजकुमारी को नाश होने का श्राप दे दिया। ऐसी मान्यता है कि भानगढ़ का विनाश उसी श्राप के फलस्वरूप हुआ।

इसके उपरांत भानगढ़ एवं अजबगढ़ के बीच हुए युद्ध से भानगढ़ का पतन आरम्भ हो गया। तत्पश्चात सन १७८३ में हुए सूखे में इसकी सर्व प्रजा की अकाल मृत्यु हो गयी। तब से भानगढ़ भुतहा नगरी में परिवर्तित हो गयी तथा कोई जीवित मनुष्य इस गढ़ में नहीं रह सका।

भानगढ़ दुर्ग के दर्शन

भानगढ़ की चारदीवारी के बाहर एक खंडहर
भानगढ़ की चारदीवारी के बाहर एक खंडहर

भानगढ़ दुर्ग की ओर जाते धुल धूसरित सड़क के दोनों ओर सूर्यमुखी पुष्प के खेत फैले हुए थे। कुछ क्षण पश्चात यह सड़क हमें अरावली की हरी भरी पहाड़ियों के बीच ले गयी। वृक्षों से अटी अरावली पहाड़ी पर अचानक मेरी दृष्टि एक इकलौते भव्य मंडप पर जा कर ठहर गयी जो हमारे दाहिने ओर के वृक्षों में से झाँक रही थी। भानगढ़ दुर्ग की चारदीवारी के बाहर निर्मित यह मंडप वास्तव में उसी की समाधि है जिसने भानगढ़ दुर्ग को श्रापित किया था। आगे बढ़ कर हमने अपनी गाड़ी एक ओर खड़ी की एवं भुट्टे विक्रेताओं के समक्ष से होते हुए दुर्ग के प्रवेश द्वार पर पहुंचे। प्रथम दर्शन पर यह दुर्ग भारत में फैले ऐसे कई दुर्ग की तरह सामान्य संरचना प्रतीत हुई। सोच में पड़ गयी कि क्यों इसका सम्बन्ध भयावह कहानियों से जोड़ दिया गया है।

प्रवेशद्वार पर ही एक पाषाणी सूचना पटल पर भानगढ़ दुर्ग का नक्शा खुदा हुआ था। इस नक़्शे से ज्ञात होता है कि भानगढ़ एक व्यवस्थित एवं सुनियोजित नगरी थी। इसके अनुसार नगर में निर्धारित स्थानों पर आवासगृह, हवेलियाँ, मंदिर, हाट एवं अंत में राजमहल निर्मित थे। इतने सुनियोजित नगरी में वास करने का आनंद एवं सुविधाएं अतुलनीय रहे होंगे।

दुर्ग की भित्तियों से घिरी नगरी से प्रवेश कर हम आवासग्रहों एवं हवेलियों के दर्शनार्थ आगे बढे। विध्वस्त स्थिति में भी आप इन हवेलियों की भव्यता का अनुमान लगा सकते हैं। सुव्यवस्थित ढंग से निर्मित जौहरी बाजार की दुकानें जयपुर के जौहरी बाजार का स्मरण कराती हैं।

रेगिस्तान के बीच निर्मित होने के पश्चात भी भानगढ़ दुर्ग एवं भानगढ़ नगर हरियाली से परिपूर्ण है।

भानगढ़ दुर्ग के मंदिर

मंगला माता मंदिर - भानगढ़
मंगला माता मंदिर – भानगढ़

भानगढ़ दुर्ग परिसर में कई मंदिर हैं। इस सम्पूर्ण परिसर में केवल मंदिर ही ऐसी संरचनाएं हैं जो अखंडित एवं जीवंत हैं एवं स्पष्ट पहचानी जाती हैं।

प्रवेशद्वार से भीतर जाते ही दाहिनी ओर एक वृक्ष के समीप एक लघु मंदिर है। इसके भीतर प्रवेश करते ही आपके समक्ष परिसर के घने वृक्षों के बीच से मंदिर का शिखर प्रकट होने लगता है।

गोपीनाथ मंदिर

गोपीनाथ मंदिर - भानगढ़
गोपीनाथ मंदिर – भानगढ़

प्रवेश करते ही प्रथम भव्य एवं प्रमुख संरचना है गोपीनाथ मंदिर। एक ऊंचे मंच के ऊपर स्थापित यह मंदिर प्राचीन नगरी के मंदिरों का स्मरण कराती हैं। कुछ सीड़ियाँ चढ़ कर हम मंदिर पहुंचे। द्वार के चौखट पर महीन व आकर्षक नक्काशी की गयी थी। द्वार के दोनों ओर आलों पर गणेश एवं शिव-पार्वती की मूर्तियाँ स्थापित हैं। हालांकि गर्भगृह रिक्त था।

गोपीनाथ मंदिर विशाल ना होते हुए भी इसका मंच बहुत ऊंचा था। यह इस तथ्य का द्योतक है कि यह एक महत्वपूर्ण मंदिर था।

सोमेश्वर मंदिर

सोमेश्वर मंदिर - भानगढ़
सोमेश्वर मंदिर – भानगढ़

भानगढ़ परिसर के मुख्य महल के बाहर एक जलकुंड है जिसके एक ओर एक शिव मंदिर है। जलकुंड को भरता प्राकृतिक झरना कदाचित् इस स्थल पर दुर्ग के निर्माण का मुख्य कारण रहा होगा। इस छोटे शिव मंदिर के भीतर एक शिवलिंग तथा नंदी की प्रतिमा स्थापित है जिनकी आज भी पूजा अर्चना की जाती है।

जलकुंड में आखेट करते नौनिहालों को देखते हुए मैंने कुछ क्षण वहां बिताए। जल में कई मछलियों को तैरते देखने का भी आनंद उठाया।

केशव राय मंदिर एवं मंगला देवी मंदिर के दर्शन समयाभाव के रहते मैंने दूर से ही किये।

भानगढ़ मुख्य महल

भानगढ़ का महल
भानगढ़ का महल

भानगढ़ दुर्ग का मुख्य महल अपेक्षाकृत ऊंचाई पर निर्मित था। कहा जाता है कि निर्माण के समय इसमें ७ मंजिलें थीं, परन्तु अब केवल ४ मंजिलें ही शेष हैं। तीव्रता से चढ़ती सड़क घूमती एवं बलखाती हुई महल के प्रवेशद्वार तक जा रही थी।
प्रवेशद्वार के सम्मुख सीड़ियाँ थीं जिसके दोनों ओर एक एक लम्बा गलियारा था। यह गलियारे ही वास्तव में राजमहल था। फौजी सैनिकों के आवासगृह के सामान प्रतीत होते इन गलियारों को महल मान कर इसमें लोग कैसे निवास करते थे, इसका अनुमान भी मैं नहीं लगा पायी।

सीड़ियाँ चढ़कर जब मैं ऊपर तक पहुँची, मेरे चारों ओर भंगित भित्तियों के अवशेष बिखरे हुए थे। महल के समक्ष, दुर्ग की भित्तियों के भीतर स्थित भानगढ़ नगरी के दर्शन आप यहाँ से स्पष्टता से कर सकते हैं। यहाँ से आप दुर्ग की भित्तियाँ, पगडंडियाँ, मंदिर एवं खँडहर प्रत्यक्ष देख सकते हैं। आसपास की पहाड़ियों की सतहें ऊबड़ खाबड़ थीं जैसे इन्हें अतिरिक्त संरचना निर्मिती हेतु खोदा गया हो और खुदाई कार्य अधूरा त्याग दिया गया हो।

वहां स्थित एक लघु एवं रिक्त कक्ष पर दृष्टि जा टिकी। पूछने पर ज्ञात हुआ कि वह राजकुमारी रत्नावती का मंदिर था। वहां खड़े जब मैंने चारों ओर दृष्टि घुमाई, चारों ओर बिखरे खंडहरों को देख कुछ क्षण विचारमग्न हो गयी कि वह विध्वंस प्राकृतिक था अथवा मानवीय या भुतहा।

हालांकि उजाले में दुर्ग का वातावरण अत्यंत सामान्य प्रतीत हो रहा था। दर्शनार्थी चारों ओर घूम रहे थे एवं बच्चे जलकुंड में आखेट कर रहे थे। तथापि ध्यानमग्न होकर आसपास की वस्तुस्थिति से स्वयं को पृथक कर अनुभव किया तब वहां एक अदृष्ट एवं अनजान ऊर्जा के होने की अनुभूति हुई। ऐसी ऊर्जा जो मुझे यहाँ से चले जाने हेतु बाध्य कर रही थी। इस नकारात्मक अनिष्ट ऊर्जा का अनुभव इससे पूर्व मुझे कभी नहीं हुआ था।

भानगढ़ दुर्ग दर्शन का मेरा अनुभव

भानगढ़ दुर्ग का मानचित्र
भानगढ़ दुर्ग का मानचित्र

भानगढ़ दुर्ग के भुतहा होने की चर्चा यदि आप लोगों के समक्ष करे तो दो प्रकार की प्रतिक्रिया प्राप्त होती है। कुछ इस तथ्य को स्वीकार कर उस पर अपनी मुहर अंकित करते हैं, तथापि कुछ अविश्वास व्यक्त कर इसे हंसी में उड़ा देते हैं। चूंकि मैं इस दुर्ग के दर्शन करना चाहती थी, मैंने कोई पूर्वकल्पित धारणा मन में नहीं रखी। पूर्णतः जिज्ञासा द्वारा मार्गदर्शित, मैं स्वयं अनुभव करना चाहती थी कि भारत के सर्वाधिक भुतहा घोषित इस दुर्ग के भीतर कैसा प्रतीत होता है!

जब मैंने इस दुर्ग में प्रवेश किया, मैंने किंचित भी भिन्न अनुभव नहीं किया, सिवाय उस नीरवता एवं उदासी के जो किसी भी खँडहर का अभिन्न अंग होती है। दोनों ओर खँडहरों के बीच स्थित पगडंडी से चलते समय हम हंसते खेलते पर्यटकों का हिस्सा थे जो इन खंडहरों को देखने एवं छायाचित्र लेने में पूर्णतः लिप्त थे। मैं स्वयं भी छायाचित्र लेने में व्यस्त थी। बरगद के एक वृक्ष ने मेरा ध्यान विशेष रूप से आकर्षित किया। दुर्ग के खंडित अवशेषों को लपेटे इस वृक्ष की जड़ें अत्यंत चित्ताकर्षक कलाकृति प्रतीत हो रही थी। क्यों ना हो! बरगद का वृक्ष अपनी इन्ही कलाओं के लिए ही तो प्रसिद्ध है।

भानगढ़ में भ्रमण करती महिलाएं
भानगढ़ में भ्रमण करती महिलाएं

किन्तु यहाँ की असामान्य ऊर्जा का प्रथम अनुभव मुझे तब हुआ जब मैं दुर्ग के भीतर स्थित जौहरी बाजार से होकर जा रही थी। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे अकस्मात् मुझे किसी ने बाईं ओर धक्का दिया। मेरे आसपास कोई उपस्थित नहीं था, फिर भी कुछ कदम मुझे कोई शक्ति बाईं ओर धकेलती रही। जब मैंने पीछे पलटकर देखा, वहां एक विचित्र रिक्त स्थान था। सम्पूर्ण पगडंडी पर लोग चल रहे थे, सिवाय उस रिक्त स्थान के, जहां वे दायें अथवा बाएं से चल रहे थे। मानो उस रिक्त स्थान पर कोई अदृष्ट व्यक्ति खड़ा हो।

राजकुमारी रत्नावती का महल

कुछ देर पश्चात जब हम महल के ऊपर पहुँचने हेतु सीड़ियाँ चढ़ रहे थे, रिक्त गलियारों से हवा का झोंका आ रहा था। यह झोंका मुझे असामान्य सा, एक अनोखे ऊर्जा से भरा प्रतीत हुआ। ऊपर पहुँच कर मुझे ज्ञात हुआ कि वह राजकुमारी रत्नावती का महल था। खंडहरों को देख ऐसा आभास हो रहा था जैसे वह महल एक बिजली की कड़कड़ाहट से एक क्षण में खँडहर बन गया था। यद्यपि ऊर्जा का आभास अत्यंत तीव्र था, तथापि यहाँ से दुर्ग का परिदृश्य अत्यंत मनमोहक था। मेरे विचार से यहाँ के छोटे छोटे मंदिरों की अपेक्षा, इस लुभावने परिदृश्य ने मुझे अधिक आकर्षित किया था। केवल एक तथ्य मन को कचोट रहा था, वह यह कि इस दुर्ग के दर्शनार्थ मैं इस वर्ष अगस्त के महीने में आयी थी जब यह दुर्ग पर्यटकों से भरा हुआ था। कदाचित यहाँ अकेले उपस्थित होने पर यहाँ का अनुभव कुछ और ही हो!

भानगढ़ पर इप्सिता रॉय चौधरी के अनुभव

प्राचीन बरगद के पेड़ - भानगढ़
प्राचीन बरगद के पेड़ – भानगढ़

इप्सिता रॉय चौधरी एक प्रशिक्षित विक्का तांत्रिक हैं। जनवरी २०१२ में वे अपने अन्य तांत्रिक साथियों की पलटन लेकर भानगढ़ दुर्ग पहुंची थीं। वे अपने साथ अत्याधुनिक कैमरे, चुम्बकीय बल मापक उपकरण एवं दिशा सूचक यंत्र भी ले गए थे। इप्सिता का मानना है कि इस धरती पर कुछ स्थल ऐसे हैं जहां अतृप्त आत्माओं की ऊर्जा रहती है एवं संवेदनशील लोगों को ही इसका आभास होता है। रत्नावती-सिंघिया की कहानी को आगे ले जाते हुए वे कहती हैं कि भानगढ़ कदाचित जादुई शक्तियों का स्थल है जहां लोग शारीरिक एवं मानसिक विकारों के निवारण एवं आध्यात्मिक शक्तियों की प्राप्ति हेतु आते हैं। उनका अनुमान है कि स्थानीय लोग बुरी आत्माओं के अधीन स्त्रियों को यहाँ झाड़फूंक हेतु अब भी लाते हैं। उन्होंने ऐसा ही एक दृश्य प्रत्यक्ष अपनी आँखों से देखा था। इस हेतु उनका इशारा लंबी कतारों में निर्मित छोटे छोटे कक्षों की ओर था जो ना तो आवासगृह हो सकते थे ना ही दुकानें। इनमें से कुछ कक्ष दुमंजिली भी थे जिन तक पहुँचने हेतु एक कोने में सीड़ियाँ बनी हुई थीं।

अग्नि संस्कार

मुख्य महल में स्थित गलियारे के अंत में दो अन्धकक्ष थे जहां इप्सिता ने अग्नि संस्कार क्रियान्वित होते देखा था। इप्सिता का कहना है कि उन्होंने ना केवल भूतकाल की जादुई शक्तियों का अनुभव किया, तथापि उन्हें यह भी ज्ञात हुआ कि इन जादुई शक्तियों को अग्नि संस्कारों द्वारा आज भी जागृत रखा हुआ है। उनका मानना है कि यह संस्कार भानगढ़ दुर्ग में स्थित आत्माओं की ऊर्जा को विचलित करती है। अतः हमें इस ऊर्जा को शांत होने देना चाहिए।

इप्सिता का कहना है कि उनके संवेदनशील कैमरों ने लिए चित्रों में एक अनोखा प्रकाश उपस्थित था। इप्सिता इस प्रकाश की गुत्थी सुलझाने में असमर्थ हैं। उनकी दृड़ मान्यता है कि भानगढ़ सैन्य दुर्ग ना होकर जादुई शक्तियों का दुर्ग है।

इप्सिता आगे कहती हैं कि भानगढ़ दुर्ग के दर्शनोपरांत उन्हें साथियों के व्यवहार में भी अजीब परिवर्तन का आभास हुआ था।

इप्सिता ने भानगढ़ दुर्ग के अपने अनुभवों का संकलन किया है एवं इस पुस्तक में प्रकाशित किया है – “ट्रेवलिंग इन, ट्रेवलिंग आउट”। आप इप्सिता की आत्मकथा भी पढ़ सकते हैं, उनका जीवन एक बहुत ही अनूठा जीवन है।

 भानगढ़ दुर्ग के दर्शन हेतु आवश्यक सुझाव:-

यात्रियों को पानी पिलाती महिला
यात्रियों को पानी पिलाती महिला

• भानगढ़ दुर्ग में प्रवेश निःशुल्क है।
• भानगढ़ दुर्ग जयपुर से ८०कि.मी. एवं दिल्ली से २६०की.मी की दूरी पर स्थित है।
• दुर्ग में हल्के जलपान के अलावा खाद्य पदार्थ उपलब्ध नहीं हैं।
• अपने साथ पीने का पानी अवश्य रखें। यद्यपि भानगढ़ के दयालु नागरिक पर्यटकों की पानी की आवश्यकता को पूर्ण करने हेतु तत्पर रहते हैं।
• प्रातः मुँह अँधेरे एवं सूर्यास्त के पश्चात दुर्ग में ना जाएँ। तथापि दिन चढ़ने के उपरांत यहाँ आने पर धूप से त्रास भी संभव है। दुर्ग में छाँव हेतु कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है।
• महल की ओर तीव्रता से चढ़ती पगडंडी अत्यंत ऊबड़-खाबड़ है। चढ़ने की संपूर्ण तैयारी हो तभी चढ़ें। अन्यथा चढ़ने से बचें।

भानगढ़ में विश्रामगृह

भानगढ़ के आसपास मुझे किसी भी प्रकार के होटल अथवा विश्रामगृह दिखाई नहीं दिए। मेरे अनुभव से भानगढ़ के दर्शन हेतु जयपुर के किसी विश्रामगृह में रहना सुविधाजनक होगा। हम जयपुर के लेबुआ रिसोर्ट में ठहरे थे।

यदि आप सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर हैं तो राजस्थान पर्यटन के विश्रामगृह सर्वाधिक उपयुक्त रहेंगे।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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तटीय दमन और दीव में दमन के पर्यटक स्थल https://inditales.com/hindi/daman-diu-travel-guide/ https://inditales.com/hindi/daman-diu-travel-guide/#respond Wed, 03 Jan 2018 02:30:05 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=583

दमन एक छोटा सा शहर है जो भारत के पश्चिमी तट पर महाराष्ट्र और गुजरात के बीच बसा हुआ है। इन दो राज्यों से घिरे होने के बावजूद भी वह अपनी अलग और विशेष पहचान बनाने में सफल रहा है। आज दमन जो भी है और जैसा भी है उसकी जड़ें कहीं ना कहीं उसके […]

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दमन का समुद्र तट
दमन का समुद्र तट

दमन एक छोटा सा शहर है जो भारत के पश्चिमी तट पर महाराष्ट्र और गुजरात के बीच बसा हुआ है। इन दो राज्यों से घिरे होने के बावजूद भी वह अपनी अलग और विशेष पहचान बनाने में सफल रहा है। आज दमन जो भी है और जैसा भी है उसकी जड़ें कहीं ना कहीं उसके भूतकाल से जुडी हुई हैं। एक समय ऐसा था जब दमन भी गोवा की तरह पुर्तुगालियों का उपनिवेश हुआ करता था। पाठशाला में पढे हुए केंद्र शासित प्रदेश गोवा, दमन और दीव तो आपको याद होंगे ही। इस बात से परे, आज दमन एक छोटे से द्वीप के रूप में जाना जाता है, जहां पर पानी की कोई कमी नहीं है। पडौसी गुजरात में शराब पर पाबन्दी होने के कारण, गुजरात के लोग यहाँ जी भर के पीकर वापस अपने घर चले जाते हैं। वास्तव में गुजरातियों का दमन जाने के पीछे का सबसे बड़ा कारण भी यही है। लोग छुट्टियों के दिनों में और खास कर सप्ताह के अंत में यहां पर जरूर जाते हैं।

दमन गंगा  

अरब सागर में विलीन होती दमन गंगा नदी
अरब सागर में विलीन होती दमन गंगा नदी

दमन राज्य दमन गंगा नदी के दोनों किनारों पर फैला हुआ है। यह नदी दमन को दो भागों में विभाजित करती है। यही वह जगह है जहां पर यह नदी अरब सागर में विलीन होती है। इस नदी के दक्षिणी किनारे पर मोटी दमन और उत्तरी किनारे पर नानी दमन बसा हुआ है। दमन में गुजराती भाषा व्यापक स्तर पर बोली जाती है, जिसका प्रभाव आप यहां के स्थानों के नाम पर देख सकते हैं, जैसे कि मोटी दमन और नानी दमन। गुजराती में मोटी यानी बड़ा और नानी यानी छोटा होता है। मज़े की बात तो यह है कि दोनों दमनों में से मोटी दमन असल में भौगोलिक रूप से छोटा है और दमन का प्राचीन हिस्सा भी है। मोटी दमन इतिहास प्रेमियों का आकर्षण बिंदु है, तो नानी दमन सामान्य तौर पर व्यापार यात्रियों और रोमांच प्रेमियों का मेजबान है।

दमन की प्रसिद्ध जगहें    

दमन का समुद्री किनारा
दमन का समुद्री किनारा

मैंने अपनी यात्रा की शुरुआत नानी दमन से की थी, क्योंकि में वहीं पर स्थित द डेल्टीन होटल में ठहरी हुई थी।

नानी दमन 

हमने अपनी यात्रा की शुरुआत दमन गंगा के मुहाने के दर्शन के साथ की। यहां पर एक तरफ यानी नानी दमन में सेंट जेरोम का किला है, तो दूसरी तरफ यानी नदी के उस पार मोटी दमन में मोटी दमन किला खड़ा है। जब हम वहां पर पहुंचे, उस समय समुद्र का ज्वार थोड़ा कम था जिसके कारण किनारे पर बंधी हुई नावों को देखकर ऐसा लग रहा था मानो उन्हें रेत पर खड़ा किया गया हो। बाद में वहां के लोगों से बातचीत करते-करते मुझे पता चला कि हर शाम इस भाग में समुद्र का ज्वार बढ़ जाता है और रेत पर खड़ी ये नावें पानी में तैरते हुई नज़र आती हैं। यहां से पानी के उस पार आपको काले और सफ़ेद रंग की पहरे की मीनार नज़र आती है जो अकेले रक्षक की तरह खड़ी समंदर की निगरानी करती है।

सेंट जेरोम का किला  

सेंट जेरोम दुर्ग का मुख्य द्वार
सेंट जेरोम दुर्ग का मुख्य द्वार

दमन गंगा नदी के उत्तरी किनारे पर एक परिश्रांत सा किला बसा हुआ है जिसके प्रवेश द्वार पर सुंदर नक्काशी काम किया गया है। इन उत्कीर्णित प्रतिमाओं तथा उनमें छुपी कहानियों को तो मैं नहीं समझ पायी, लेकिन उसपर उत्कीर्णित पुर्तुगाली भाषा के कुछ अभिलेखों के अनुसार यह किला उस दौर में बनवाया गया था, जब दमन पुर्तुगालियों का उपनिवेश हुआ करता था। इस किले के प्रवेश द्वार पर बने मेहराब के ऊपर सेंट जेरोम की मूर्ति खड़ी है और उससे थोड़ा ऊपर यानी प्रवेश द्वार के शीर्ष पर एक क्रॉस बना हुआ है। इतिहास की पुस्तकों के अनुसार यह किला लगभग चार शताब्दियों पहले बनवाया गया था, ताकि अरब सागर में हो रही समुद्री गतिविधियों पर नज़र रखी जा सके।

आवर लेडी ऑफ़ सी चर्च - दमन दुर्ग
आवर लेडी ऑफ़ सी चर्च – दमन दुर्ग

इस किले में प्रवेश करते ही आपको एक बड़ा सा खुला मैदान नज़र आता है, जिसके एक कोने में अवर लेडी ऑफ द सी चर्च स्थित है। यह गिरजाघर किले की मोटी-मोटी दीवारों से घिरा हुआ है, जो अपने से भी मोटा प्राचीनता का आवरण ओढ़े हुए हैं। इस गिरजाघर के ऊपरी मजले, जो नीचे से देखने में छत की तरह लग रहा था, तक जाती सीढ़ियों से मैंने ऊपर जाने का निश्चय किया। ऊपर पहुँचकर मैंने वहां पर जो देखा उससे मैं बिलकुल अवाक रह गयी। वहां से हमे एक मोटी सी दीवार दिखी जो इस पूरे मैदान को घेरकर खड़ी थी। वह दीवार इतनी चौड़ी थी कि उस पर से कई लोग एक बराबर बड़ी आसानी से चल सकते थे और यहां से किले के आस-पास की जगहों पर भी नज़र रखना आसान था। इसके अलावा यहां पर और भी छोटी-छोटी अव्यवस्थित सी कुछ संरचनाएं थीं जिनसे संबंधित मुझे कोई भी दस्तावेज़ नहीं मिले, जिससे मैं जान सकू कि ये किस प्रकार की संरचनाएं हैं।

पुर्तुगाली युद्ध स्मशान भूमि   
पुर्तगाली युद्ध शमशान भूमि - सेंट जेरोम दुर्ग - दमन
पुर्तगाली युद्ध शमशान भूमि – सेंट जेरोम दुर्ग – दमन

गिरजाघर के ऊपरी मजले पर जाते समय बाईं तरफ आपको एक यथोचित सुव्यवस्थित स्मशान भूमि दिखाई देती है जहां पर एक छोटा सा चैपल है। इस चैपल के सामने ही एक कुसुमित गुलमोहर का पेड़ था जो कोमलता से इन कब्रों पर अपने फूल बरसा रहा था। बाद में मुझे पता चला की यह पुर्तुगाली युद्ध स्मशान भूमि है।

ध्वजारोहण स्थल - सैंट जेरोम दुर्ग - दमन
ध्वजारोहण स्थल – सैंट जेरोम दुर्ग – दमन

सेंट जेरोम के किले के एक कोने में एक छोटा सा आँगन है जिसके इर्द-गिर्द कुछ कमरे थे और सभी कमरों के दरवाजों पर ताला लगा हुआ था। इसके कारण हम इन कमरों का आंतरिक रख-रखाव तो नहीं देख पाए लेकिन इनमें मौजूद छोटे-छोटे झरोकों से भीतर झाँक कर आप थोड़ा बहुत अनुमान तो लगा सकते है। इसी अनुमान के आधार पर मुझे लगता है कि शायद ये कमरे कभी इस किले के निवास स्थान रहे होंगे। किले में घूमते-घूमते एक जगह पर मुझे एक चबूतरा दिखा जिस पर टूटा हुआ सा लकड़ी का खंबा खड़ा था जो ध्वज फहराने के लिए इस्तेमाल होता था। मुझे लगता है कि शायद यह स्तंभ इसलिए बनवाया होगा ताकि उसपर लगा हुआ द्वाज हमेशा ऊंचा फहराता रहे।

आज सेंट जेरोम का किला अवर लेडी ऑफ द सी चर्च के कारण बहुत प्रसिद्ध है। बहुत से लोग यहां पर खास तौर से इसी गिरजाघर को देखने आते हैं।

पुरानी किश्तियाँ - दमन
पुरानी किश्तियाँ – दमन

नानी दमन में समुद्र के पास ही बर्फ का एक कारख़ाना है, जो मत्स्य पालन विभाग से संबद्ध है। यहां पर आपको रास्ते भर यहां-वहां पड़ी हुई लकड़ी की नावें नज़र आती हैं जो टूटी-फूटी अवस्था में थीं। उनकी इस स्थिति को देखकर मुझे कुछ अस्वस्थ सा महसूस होने लगा। ये नावें आज भले ही किसी काम की ना हो लेकिन उनके इस दुखभरे मौन के पीछे बहुत सारी कहानियाँ छुपी हैं जिन्हें किसी सुननेवाले की जरूरत है।

समुद्र नारायण मंदिर   
समुद्र नारायण यस वरुण देव - दमन
समुद्र नारायण यस वरुण देव – दमन

दमन गंगा नदी के किनारे पर एक छोटा सा मंदिर है जो समुद्र नारायण अथवा वरुण देव, जिन्हें समुद्र के देवता माना जाता है, को समर्पित किया गया है। यहां पर नदी को तटबंध करता हुआ चबूतरा बनवाया गया है जिसके किनारे पर यानी नदी के पास ही इस मंदिर का निर्माण किया गया है। छोटा होने पर भी उज्वल रंगों से सुसज्जित यह सुंदर सा मंदिर अनेक भाविकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। यह पहली बार है कि मैंने वरुण देव को समर्पित कोई मंदिर देखा हो। यहां के लोगों का कहना है कि तटीय क्षेत्रों पर तो समुद्र के देवता अथवा वरुण देव को समर्पित ऐसे कई सारे मंदिर होते हैं। पर आज तक मैंने जितने भी तटीय क्षेत्रों की यात्रा की है मुझे तो ऐसा एक भी मंदिर नहीं दिखा जो वरुण देव को समर्पित हो।

यहीं पर पास में कुछ छोटी-छोटी अस्थायी दुकाने हैं, जिनमें लटकते रंगबिरंगी कपड़े उनकी मौजूदगी की गवाही दे रहे थे।

नानी दमन की यात्रा के दौरान मैंने वहां पर बहुत सारी पुरानी इमारतें देखी जो आज भी काफी अच्छी अवस्था में खड़ी हैं। इनके बारे में जब भी मैंने किसी से कुछ पूछने की कोशिश की तो हर बार मुझे यही जवाब मिलता कि, “अरे, ये तो बस एक पुरानी इमारत है, यहां देखने योग्य कुछ नहीं है।”

दमन का व्यापार केंद्र होने के नाते नानी दमन के बाज़ार हमेशा लोगों और व्यापारियों से भरे रहते हैं। इसमें भी राह चालकों के रंग में भंग डालती हुई गाडियाँ यहां-वहां घूमती रहती हैं। बाज़ार की इस चहल-पहल के बीचोबीच तटस्थ रूप से खड़ा तीन बत्तियों वाला एक घंटा-घर है जो लोगों को भागते हुए समय के पीछे भागने के लिए उकसाता है।

देविका समुद्र तट  
देविका समुद्र तट - दमन
देविका समुद्र तट – दमन

दमन के दोनों भागों के अपने अपने समुद्र तट हैं। मोटी दमन में जैसे जैमपोरे समुद्र तट है उसी प्रकार नानी दमन में भी देविका समुद्र तट है जो यहां का बहुत ही प्रसिद्ध समुद्र तट है। अगर आपने कभी गोवा के समुद्र तट देखे हैं, तो आप इसे किसी भी रूप से एक समुद्र तट नहीं कहेंगे। जब इस क्षेत्र में समुद्र का ज्वार कम होता है, तो आप इस तट पर पानी के नीचे कैद रहनेवाली चट्टानी जमीन देख सकते हैं। चट्टानों की इस भूल भुलैया से गुजरते हुए आप चाहे तो इन चट्टानों पर बैठकर समुद्र का पूरा लुत्फ उठा सकते हैं। तट पर आती-जाती इन लहरों को देखते हुए कुछ समय अपने साथ बिता सकते हैं।

सोमनाथ महादेव मंदिर 
सोमनाथ महादेव मंदिर - दमन
सोमनाथ महादेव मंदिर – दमन

सफ़ेद रंग का यह छोटा सा मंदिर दिखने में काफी साधारण है, परंतु बाहर से यह जितना साधारण दिखता है भीतर से उसकी चमक-दमक उतनी ही लुभावनी है। इस मंदिर के आंतरिक भाग कांच के बने हुए हैं। कांच की ऐसी कारीगरी मैंने बहुत से जैन मंदिरों की आंतरिक छतों पर देखी है, लेकिन इस मंदिर की विशेष बात यह है कि, इसकी दीवारें भी कांच की बनी हुई हैं। यह मंदिर सच में बहुत ही खूबसूरत है। यद्यपि यहां पर तस्वीरें खींचना मना है।

मोटी दमन 

मोटी दमन - प्रवेश द्वार
मोटी दमन – प्रवेश द्वार

अगर आप सच्चे इतिहास प्रेमी हैं तो मोटी दमन आपके लिए एकदम सही जगह है, जहां पर आप इतिहास के साथ थोड़ा बहुमूल्य समय बिता सकते हैं। इसके अलावा यहां का प्रमुख आकर्षण है जैमपोरे समुद्र तट, जिसके बारे में मैं पहले लिख चुकी हूँ। नानी दमन से दमन गंगा नदी पार कर जब आप दूसरी तरफ पहुँचते हैं तो आपके सामने मोटी दमन का विराट दुर्ग खड़ा हो जाता है। यह दुर्ग आज भी अपना अस्तित्व कायम रखे हुए है, जिसकी अधिकतर इमारतें किसी ना किसी प्रकार के सरकारी कार्यालय के रूप में कार्यरत हैं। इसका मतलब यही हुआ कि सामान्य पर्यटकों को यहां पर आने की अनुमति नहीं है। आप सिर्फ बाहर से ही उनकी जी भरकर प्रशंसा कर सकते हैं।

इस किले का सबसे अधिक दृष्टिगोचर भाग है उसकी विशाल दीवार जो दमन गंगा नदी से भी दिखाई देती हैं। यद्यपि उसका सर्वाधिक देखा जानेवाला हिस्सा उसका प्रवेश द्वार है, जो आज भी किले के भीतर जाने और किले से बाहर आने के लिए इस्तेमाल होता है।

मोटी दमन में स्थित गिरजाघर  

मोटी दमन में पुर्तुगाली काल के बहुत सारे गिरजाघर स्थित हैं। उनका सूक्ष्म आकार ही बताता है कि वे बहुत ही छोटी सी जनसंख्या के लिए बनवाए गए थे। मैंने यहां के 3 गिरजाघरों के दर्शन किए हैं।

चर्च ऑफ बोम जीजस 
चर्च ऑफ़ बोम जीसस - मोटी दमन
चर्च ऑफ़ बोम जीसस – मोटी दमन

बोम जीजस के इस गिरजाघर से मुझे गोवा में इसी नाम से स्थित एक गिरजाघर की याद आयी। यद्यपि मोटी दमन में स्थित यह गिरजाघर गोवा में बसे गिरजाघर से बहुत छोटा, काफी विलक्षण और बहुत ही शांतिपूर्ण है।

बोम जीसस चर्च में लकड़ी का काम
बोम जीसस चर्च में लकड़ी का काम

उत्कीर्णित पत्थरों से बना इसका प्रवेश द्वार गिरजाघर की इस शुभ्र दीवार पर बहुत फबता है। यह दीवार अपनी त्रिकोणी शिखर से जैसे आसमान छूना चाहती है। इस गिरजाघर का आंतरिक भाग भी काफी साधारण है लेकिन वहां के प्रचुरता से उत्कीर्णित लकड़ी के छज्जे बहुत ही आकर्षक हैं। नीले और लाल रंग से सुसज्जित यह नक्काशीकाम अपने धुंदले पड़ते हुए रंगों के साथ आज भी काफी उज्वलित नज़र आता है। ये उत्कीर्णन आपको समकालीन लकड़ी कारीगरों के बारे में बहुत कुछ बताते हैं और साथ ही साथ उनके आश्रयदाताओं को भी रोशन करते हैं। अगर आपको कभी भी यहां पर जाने का मौका मिले तो इस गिरजाघर का एक चक्कर जरूर लीजिये, जहां पर आपको पत्थर से बना हुआ एक और प्रवेश द्वार मिलेगा जो सच में प्रशंसा के योग्य है। यह प्रवेश द्वार आस-पास खड़े पेड़ों की नाजुक शाखाओं की आड़ से देखने में और भी खूबसूरत दिखता है।

चैपल ऑफ अवर लेडी ऑफ रोजरी   
चैपल ऑफ़ पुर लेडी ऑफ़ रोजरी - मोटी दमन
चैपल ऑफ़ पुर लेडी ऑफ़ रोजरी – मोटी दमन

बोम जीजस के गिरजाघर के परिसर में बने बगीचे को पार करते ही आप साधारण से दिखने वाले एक चैपल के पास पहुँच जाते हैं। जब मैं इस चैपल के दर्शन करने गयी थी तब वह बंद था, जिसकी वजह से मैं केवल बाहर से ही उसके दर्शन कर पायी। लेकिन यहां पर लगे हुए सूचना फ़लक के अनुसार इस चैपल का आंतरिक भाग प्रचुर रूप से अलंकरणों से सजाया गया है।

डॉमनिकन का कान्वेंट 
डोमनिकन मठ के अवशेष - मोटी दमन
डोमनिकन मठ के अवशेष – मोटी दमन

यहां पर बिखरे हुए इन सुंदर अवशेषों तक पहुँचने के लिए आपको कुछ संकीर्ण गलियों से गुजरते हुए जाना पड़ता है। ये अवशेष अपने बिखरे हुए रूप में भी अति सुंदर लगते हैं। दूर किसी कोने में स्थित इन अवशेषों को देखने बहुत ही कम लोग आते हैं। ऐसा लगता है जैसे इन अवशेषों को अपने अकेलेपन से एक प्रकार का लगाव सा हो गया है, जैसे उन्हें अपने होने में ही सुख मिलता हो।

अपने ऐश्वर्य काल में ये अवशेष डॉमनिकन मठ का भाग हुआ करते थे, जहां पर दुनिया भर के कैथलिक विद्वान आते थे। इस मठ की अधोगति के पीछे छुपे कारणों को आज तक कोई नहीं जान पाया। सोचने की बात तो यह है कि, जब आस-पास के अधिकतर गिरजाघर आज भी सुव्यवस्थित रूप से खड़े हैं तो सिर्फ इसी मठ की यह दुर्गति क्यों हुई। मेरे ड्राईवर, जो कि मेरे गाइड भी थे, ने मुझे बताया कि उन्होंने सुना था कि आखरी बार यहां पर किंगफ़िशर कलेंडर का फोटो शूट हुआ था। श्रीमान विजय मल्ल्या के स्थान सूचकों की तो सच में दाद देनी पड़ेगी।

चर्च ऑफ अवर लेडी ऑफ रेमेडीस 
चर्च ऑफ़ आवर लेडी ऑफ़ रेमेडीज - मोटी दमन
चर्च ऑफ़ आवर लेडी ऑफ़ रेमेडीज – मोटी दमन

यह भी एक गिरजाघर है जो 1607 में बनवाया गया था। इसका बहिर्भाग साधारण सा है जिसे धवल रंग से रंगवाया गया है और उसके किनारों को नीले रंग से सुशोभित किया गया है। इस गिरजाघर के भीतर उपस्थित वेदी अलकरणों से सुंदर रूप से सजायी गयी है।

दमन जेल 
दमन जेल
दमन जेल

बोम जीजस के गिरजाघर और अवर लेडी ऑफ रोजरी के चैपल के बीच एक सफ़ेद इमारत खड़ी है। इसमें बहुत सारी छोटी-छोटी खिड़कियाँ हैं जो हमेशा बंद रहती हैं। जब हमने आस-पास के लोगों से इसके बारे में पूछा तो हमे पता चला कि यह दमन की जेल है और इसीलिए इसकी सभी खिड़कियाँ हमेशा बंद रहती हैं। इस इमारत की एक बात तो मैं नहीं जान पायी कि क्या यह आज भी सक्रिय है या नहीं।

मुक्ति स्मारक 
लिबरेशन मेमोरियल - मोटी दमन
लिबरेशन मेमोरियल – मोटी दमन

सफ़ेद और स्वर्ण रंग का यह छोटा सा स्मारक 19 दिसम्बर 1961 की स्मृति में बनवाया गया था। इसी दिन दमन को गोवा और दीव के साथ 400 सालों से भी अधिक काल के पुर्तुगाली शासन से आजादी मिली थी और वह भारतीय गणराज्य में विलीन हुआ था। इस मुक्ति स्मारक पर लिखा गया था कि, ‘दमन को 19 दिसम्बर 1961 के दिन मराठा के प्रथम सैन्य दल यानी पैदल सेना दल द्वारा पुर्तुगाली शासन से आजाद करवाया गया था। इस युद्ध में उन्होंने प्रशंसनीय साहस और शूरवीरता का प्रदर्शन कर 450 सालों के पुर्तुगाली शासन का पतन किया था।’

बोकेज हाउस 
बोकेज़ हाउस - मोटी दमन
बोकेज़ हाउस – मोटी दमन

दमन से जुड़ा यह मिथक पर्यटकों द्वारा निर्मित किया गया है। दमन किले के प्रवेश द्वार के पास ही एक छोटा सा घर है जिसे बोकेज हाउस कहा जाता है। इसके ऊपर लगा हुआ फ़लक इस बात को प्रमाणित करता है। तथापि अगर आप इस घर को भीतर से देखे तो यह किसी गोदाम की तरह लगता है, जहां पर निर्माण की कुछ सामाग्री रखी गयी है।

जिस स्थान पर यह घर बसा हुआ है, उससे तो यही लगता है जैसे वहां पर कभी इस किले के रक्षक रहते होंगे। या फिर यह एक साधारण सा घर भी तो हो सकता है। दमन में किसी को भी इस घर की कोई जानकारी नहीं है, ना ही उन्हें इस बात का कोई अंदाज़ा है कि यह घर विदेशी पर्यटकों के बीच इतना प्रसिद्ध क्यों हैं। किसी भी व्यक्ति को इसके बारे में कुछ नहीं पता। वास्तव में अगर आप गूगल पर भी इसे ढूंढने जाओ तो भी आपको इससे संबंधित कोई जानकारी नहीं मिलती। मुझे तो लगता है कि शायद किसी ने इस घर का उल्लेख किसी प्रसिद्ध यात्रा वरणिका में किया होगा जिसके चलते बहुत से पर्यटक इसे देखने आते होंगे।

परगोला गार्डन 
पेर्गोला गार्डन - मोटी दमन
पेर्गोला गार्डन – मोटी दमन

परगोला गार्डन मुक्ति स्मारक के ठीक सामने और दमन किले के प्रवेश द्वार के काफी नजदीक स्थित है। यह एक छोटा सा बगीचा है जिसमें बैठने के लिए गोलाकार प्रकार की व्यवस्था है और इस बैठक के बीचोबीच चट्टान की संरचना बनी हुई है। यह पुर्तुगाली सैनिकों के लिए बनवाया गया चट्टान का स्मारक था, लेकिन आजादी के बाद इस स्थान को बगीचे में परिवर्तित किया गया। आज भी इस स्मारक पर पुर्तुगाली भाषा में कुछ स्मृति फ़लक नज़र आते हैं जो आजादी के पूर्व के काल को दर्शाते हैं।

दमन में स्थित ये सारी जगहें आप केवल एक दिन में देख सकते हैं, लेकिन मेरे खयाल से आपको अपनी यात्रा एक रात और दो दिनों के हिसाब से नियोजित करनी चाहिए, ताकि आप इन स्थानों को अच्छे से देख सके और पूर्ण रूप से उन्हें समझ और जान सके।

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पुणे की पेशवाई धरोहर – शनिवार वाड़ा , मंदिर और बाज़ार https://inditales.com/hindi/pune-peshwa-heritage-shaniwar-wada/ https://inditales.com/hindi/pune-peshwa-heritage-shaniwar-wada/#comments Wed, 13 Sep 2017 02:30:48 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=312

एक समय था जब मैं पुणे के नारायण पेठ में रहती थी। अपनी भूली बिसरी यादों को फिर से ताज़ा करने की इच्छा हुई, इसलिए पिछले साल मैंने एक बार फिर पुणे के हवा पानी का अनुभव लिया| पुणे विरासती पैदल भ्रमण के तहत मैंने पुणे के शनिवार पेठ की सडकों पर चलने का आनंद […]

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शनिवार वाड़ा पुणे
शनिवार वाड़ा

एक समय था जब मैं पुणे के नारायण पेठ में रहती थी। अपनी भूली बिसरी यादों को फिर से ताज़ा करने की इच्छा हुई, इसलिए पिछले साल मैंने एक बार फिर पुणे के हवा पानी का अनुभव लिया| पुणे विरासती पैदल भ्रमण के तहत मैंने पुणे के शनिवार पेठ की सडकों पर चलने का आनंद उठाया। या यूं कहिये पेशवाकाल के पुणे की फिर एक बार खोज की।जाहिर है इतने सालों में पुणे में बहुत कुछ बदल गया था परन्तु कुछ था जो अब भी वैसा ही था। शुक्र है इस स्थान का मराठी पहलू अब भी यथावत है। आईये मैं आपको उन सब विषयों व स्थानों के बारे में जानकारी दूं जिनका आप अपने पुणे यात्रा के दौरान अनिवार्य रूप से अनुभव ले सकें, मुख्यतः पुणे में हर तरफ फैलीं पेशवाई धरोहरें।

इस पैदल भ्रमण की शुरुआत होती है शनिवार वाड़ा से, पेशवाओं का मध्यकालीन निवास स्थान, जहां से उन्होंने साम्राज्य संभाला।

शनिवार वाड़ा – पेशवाओं का निवास स्थल

शनिवार वाड़ा - खंडहरों के बीच उद्यान
शनिवार वाड़ा – खंडहरों के बीच उद्यान

पुणे के सबसे प्राचीन भाग, कस्बा पेठ के निकट स्थित हैं शनिवार पेठ एवं शनिवार वाड़ा। यह एक महल है जो चारों तरफ शहर से घिरा एक किले का आभास देता है। इसे हाल ही में और प्रसिद्धी दिलाई फिल्म बाजीराव मस्तानी जिसकी कहानी शनिवार वाड़े की ही कहानी है। मैं आपको आगाह करा दूं कि यदि आपने यह फिल्म देखी है और उसमें चित्रित भव्यता के दर्शन हेतु आप शनिवार वाड़ा पधारें तो निश्चित ही आपका मोहभंग हो सकता है। शनिवार वाड़ा एक सादा सरल स्थान है।इसके अग्रभाग व दुर्जेय प्रतीत होतीं दीवारों के भीतर ज्यादा कुछ बचा नहीं है।

दोनों तरफ बुर्ज के बीच स्थित एक ऊंचे लकड़ी के प्रवेशद्वार से हम इस वाड़े के भीतर गए। द्वार के ऊपर लगे एक छोटे फलक पर शनिवार वाड़ा लिखा हुआ था। टिकट खरीदने के उपरांत, अपनी नजर ऊपर फेर कर देखें तब आपको अपने आसपास की सब दीवारों पर भगवान् गणेश के धुंधले पड़ते चित्र दिखाई पड़ेंगे। भगवान् गणेश पेशवा वंश के कुलदेवता थे।

शनिवार वाड़ा का इतिहास

शनिवार वाड़ा - मुख्या द्वार
शनिवार वाड़ा – मुख्या द्वार

शनिवार वाड़े का निर्माण सर्वप्रथम १७३० ई. में पेशवाओं के निवासस्थान के रूप में किया गया था| यह राज परिवार की भव्य हवेली हुआ करती थी। विशाल प्रवेशद्वार, बुर्ज और बगीचों का समय समय पर समावेश किया जाता रहा। इन महलों के निर्माण हेतु प्रचुर मात्र में लकड़ी का इस्तेमाल किया गया था। दुर्भाग्यवश यह महल १८२८ में आग में ख़ाक हो गया था। कुछ बचा तो वह था इमारत की केवल नींव व फव्वारों के ढाँचे।

यहाँ लगी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की सूचना पट्टी शनिवार वाड़ा के महलों, कक्षों व बगीचों की उस समय की व्याख्या करती है जब शनिवार वाड़ा अपनी समृद्धि की चरम सीमा पर था। फलक यह भी जिक्र करतें हैं कि शनिवार वाड़े के भित्तिचित्र रामायण व महाभारत की कहानियाँ कहतें हैं। और यह भी कि इनकी चित्रकारी हेतु कलाकार सम्पूर्ण विश्व से यहाँ बुलाये गए थे। शनिवार वाड़े का सर्वोत्तम भाग, सात मंजिला संरचना का भी जिक्र इस फलक में किया गया है।

बगीचे की सैर करते वक्त आपको कुछ पुराने वृक्ष, हजारी कारंजे नामक एक सुन्दर फव्वारा और कई अन्य फव्वारें भी दृष्टिगोचर होंगे। कहा जाता है कि हजारी कारंजे में, अपने नामानुसार एक हज़ार फुहारें थीं। दीवारों के आसपास, किनारों पर कुछ संरचनाएं नष्ट होने से बच गयीं थीं। यहाँ स्थित ५ विशाल प्रवेशद्वार बहुत हद तक सुरक्षित बचीं रहीं| इनमें २ पूर्व की ओर, २ उत्तर दिशा में और १ दक्षिण दिशा में हैं। मुख्य प्रवेश द्वार को दिल्ली दरवाजा कहा जाता है क्योंकि इसका मुख उत्तर दिशा में दिल्ली की तरफ खुलता है।

दूसरा एक फलक पेशवाओं के वंशवृक्ष की जानकारी देता है।

मस्तानी दरवाजा

पेशवा वंशावली - पुणे
पेशवा वंशावली – पुणे

यह दीवार के अंत में स्थित छोटा परन्तु अनोखा द्वार है। कहानियाँ कहतीं हैं कि पेशवा बाजीराव जब मस्तानी को शनिवार वाड़ा लाये थे तब रानी ने उन्हें मुख्य प्रवेशद्वार द्वारा प्रवेश की अनुमति नहीं दी थी। तब बाजीराव ने मस्तानी के लिए विशेष रूप से इस द्वार का निर्माण करवाया था। यह दरवाजा कभी कभी मस्तानी के पोते अली बहादुर के नाम से भी जाना जाता है। अभिलेखों के हिसाब से इस द्वार को नाटकशाला द्वार भी कहा जाता है।

यहाँ स्थित गणपति रंग महल, अपने चारदीवारों के बीच घटित कई राजनैतिक युद्ध का साक्षी है।

नगारखाना

शनिवार वाडा की दीवारों पे गणेश
शनिवार वाडा की दीवारों पे गणेश

शनिवार वाड़े का सर्वाधिक संरक्षित भाग है पहली मंजिल पर मुख्य द्वार के ऊपर स्थित है नगारखाना। यह एक सुन्दर स्तंभों युक्त कक्ष है जहां से एक तरफ शनिवार वाड़ा व दूसरी तरफ बाहर स्थित पुणे शहर दिखाई पड़ता है। यहीं पेशवाई वास्तुकला की झलक बखूबी दिखाई पड़ती है। वह है केले के पुष्पों की नक्काशी जो इन स्तंभों पर की गयी है। यहाँ के अलावा इस नक्काशी को मैंने पुणे के अन्य प्राचीन स्मारकों पर भी देखा।

क्या आप जानते हैं शनिवार वाड़े ने यह नाम कहाँ से अर्जित किया? कहा जाता है कि महल के विशाल प्रवेशद्वार के सम्मुख शनिवार को बाज़ार भरा करता था। इसलिए इस इलाके को शनिवार वाड़ा कहा जाने लगा।

पुणे का मानचित्र
पुणे का मानचित्र

वास्तव में सप्ताह के अन्य दिनों के नाम पर भी पुणे में वाड़े हैं, जैसे बुधवार पेठ, शुक्रवार पेठ।

यह ध्यान देने योग्य है कि पेशवाओं ने इसे कभी महल या किला नहीं माना। वे इसे वाड़ा कहते थे जिसका अर्थ है निवासस्थान। तथापि अपने समृद्ध दिनों में यहाँ करीब १००० रहवासी निवास करते थे।

क़स्बा गणपति

क़स्बा गणपति मंदिर - क़स्बा पेठ - पुणे
क़स्बा गणपति मंदिर – क़स्बा पेठ – पुणे

क़स्बा पेठ स्थित क़स्बा गणपति पुणे के ग्राम देवता हैं। यह स्थान अब गाँव तो नहीं रहा जिसे पहले पूनावाड़ी कहा जाता था परन्तु क़स्बा गणपति अभी भी पुणे के मध्य में स्थित है ।

लोगों का मानना है कि बहुत समय पूर्व १६३० ई. में महारानी जीजाबाई अपने नवजात पुत्र शिवाजी के साथ पुणे में निवास करती थीं। उनके हाथ गणपति की एक प्रतिमा लगी। इस घटना को इश्वर का संकेत मानकर उन्होंने एक मंदिर की स्थापना करवाई व उस मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा की। उस समय से कस्बा पेठ गणपति, पुणे के पीठासीन देव माने जाते हैं। कहा जाता है कि इस मंदिर के समीप स्थित शनिवार वाड़े में गणेश चतुर्थी पर बड़ा उत्सव मनाया जाता था।

यह मंदिर अत्यंत छोटा होने के बावजूद अपने संरक्षण में स्थित गाँव का प्रतिबिम्ब है। मंदिर के अन्दर चित्र खींचने की मनाही है। इसकी तस्वीरें आप मंदिर के वेबसाइट पर देख सकतें हैं।

कस्बा पेठ के मार्ग पर स्थित पुराने घरों के मुंडेरों पर विक्टोरिया कालीन अलंकरण देखना ना भूलें।

नाना वाड़ा

लकड़ी पे केले के फूल - पेशवा वास्तुकला की पहचान
लकड़ी पे केले के फूल – पेशवा वास्तुकला की पहचान

शनिवार पेठ के बेहद समीप स्थित नाना वाड़ा, नाना फड़नवीस का निवास स्थान था। नाना फड़नवीस पेशवाओं के प्रशासक थे। १७८० ई. में बनाया गया लकड़ी का यह वाड़ा भी पेशवाई वास्तुकला की मिसाल है। इसके लकड़ी के स्तम्भ सरो वृक्ष के आकार के हैं जिसे लकड़ी के बने केले के फूलों से सजाया गया है।

नाना वाड़ा के पहिले मंजिल पर दीवानखाना है। मैंने जब अगस्त २०१६ में नाना वाड़ा में भेंट दी थी तब यहाँ भारी जीर्णोद्धार का कार्य आरम्भ था। मुझे यहाँ उछल कूद करके थोड़ी बहुत तस्वीरें लेने को मिलीं।

ताम्बडी जोगेश्वरी मंदिर

ताम्बडी जोगेश्वरी मंदिर के बाहर की दुकानें
ताम्बडी जोगेश्वरी मंदिर के बाहर की दुकानें

ताम्बडी जोगेश्वरी मंदिर के प्रवेश द्वार की ओर एक संकरी गली जाती है। यहाँ श्री जोगेश्वरी को अर्पित किये जाने हेतु, दुकानों में रखे रंगबिरंगे चोलियों के कपडे आपका स्वागत करते प्रतीत होते हैं। यहाँ की मुख्य मूर्ति स्वयंभू मानी जाती है अर्थात् स्वयं प्रकट होने वाली। इस मूर्ति का रंग लाल है जिसका मराठी भाषा में अर्थ ताम्बडी है।

ताम्बडी जोगेश्वरी मंदिर पुणे का सर्वाधिक प्राचीन मंदिर है। ताम्बडी जोगेश्वरी पुणे की पीठासीन ग्रामदेवी मानी जाती है। इस मंदिर में कई छोटे नक्काशीदार पत्थर लगे हुए हैं। मैंने यहाँ कई महिलाओं को देवी की पूजा आराधना करते देखा।

पेशवा शासकों के अभिलेख यह कहते हैं कि किसी भी सैनिक अभियान से पूर्व वे देवी का आशीर्वाद लेने यहाँ अवश्य आते थे।

दगडू शेट गणपति मंदिर

दगडू शेट गणपति मंदिर - पुणे
दगडू शेट गणपति मंदिर – पुणे

दगडू शेट गणपति मंदिर का निर्माण व स्थापना १८०० ई. में दगडू शेट नामक एक धनी व सत्यवादी हलवाई ने करवाया थी। १८९३ में पुणे में आये प्लेग में अपने पुत्र को खोने के पश्चात दगडू शेट व उनकी पत्नी अत्यंत दुखी थे। उनके गुरु श्री माधवनाथ महाराज ने उन्हें सांत्वना दी व उन्हें गणपति व दत्त की मूर्तियाँ तैयार कर, उनकी पूजा करते हुए, उन्हें पुत्रवत संभालने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि यह दोनों देव, पुत्र के समान तुम्हारा नाम उज्जवल करेंगे। तब उन्होंने दत्त व गणेश की मूर्तियाँ तैयार करवाई जिनकी प्राणप्रतिष्ठा लोकमान्य तिलक के हाथों हुई। तत्पश्चात लोकमान्य तिलक के मन में इस मंदिर में सार्वजनिक गणेशोत्सव मनाने का विचार आया जो आगे आने वाले समय में भारत के स्वतंत्रता अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला था।

आज यह मंदिर महाराष्ट्र का परम पूजनीय मंदिर है। गणेश चतुर्थी के उत्सव के दौरान पुणे शहर व महाराष्ट्र राज्य के जानेमाने व्यक्ति यहाँ दर्शनार्थ आते हैं। आम दिनों में आप इस मंदिर के समक्ष खड़े होकर भीतर की सारी पूजा विधियों को देख सकतें हैं। आपके और भगवान् की मूर्ति के बीच मात्र एक कांच की दीवार होती है| कई भक्तगण मूर्ति का चित्र लेते भी दिखाई पड़ते हैं।

इस मंदिर के शिखर को सराहने हेतु थोड़े अंतराल पर खड़े होना पड़ता है। तभी आप इसकी घंटी के आकार की, जालीदार काम से भरी अधिरचना का आनंद ले सकते हैं। रास्ते के उस पार से मंदिर की दीवार पर दो झरोखे दिखाई पड़ते हैं। निचली मंजिल की दीवारों पर संगमरमर का काम किया गया है। इस मंदिर की सर्वोत्तम विशेषता है गणेशजी की ऊंची व भव्य मूर्ति।

मंदिर के बाहर दुकानों में पुष्पहार, फल व अन्य पूजासामग्री थाल में सजा कर बेचीं जा रहीं थीं।

महात्मा फुले मंडई – पुणे

महात्मा फुले मंडई - पुणे
महात्मा फुले मंडई – पुणे

महात्मा फुले मंडई या मंडी केंद्रीय सब्जी बाज़ार है जिसकी स्थापना अंग्रेजों ने १८८५ में की थी। तत्पश्चात विभिन्न वाड़ों के बाहर स्थित भाजी बाज़ार भी यहाँ स्थानांतरित हो गए। यह एक अनोखा अष्टभुजाकार संरचना है जिसके मध्य एक मीनार है।

इस महात्मा फुले मंडी के आठों भुजाएं बाज़ार के ख़ास उपखंडों को समर्पित है। इसके नारियल बाज़ार में विचरण करते समय मैंने ध्यान दिया कि मेरे चारों केवल नारियल विक्रेता ही मौजूद थे।

महात्मा फुले मंडी दरअसल शुक्रवार पेठ में स्थित है।

विश्रामबाग वाड़ा

विश्रामबाग वाडा - पुणे
विश्रामबाग वाडा – पुणे

मेरे पैदल विरासती भ्रमण का आखरी पड़ाव था सुन्दर विश्राम बाग़ वाड़ा। लकड़ी की सुन्दर हवेली जिसके आँगन अब पुणे शहर की कहानियां कहते हैं। १९ वीं शताब्दी में बना विश्राम बाग़ वाड़ा पेशवा बाजीराव द्वितीय का निवासस्थान था। इस वाड़े का सबसे खूबसूरत हिस्सा है इसका लकड़ी का बना अग्रभाग, जिस पर बारीक नक्काशीयुक्त दीवारगीर अर्थात् ब्रैकेट है और व्यस्त रस्ते के ऊपर लटकती बालकनी उसकी खूबसूरती को चार चाँद लगातीं हैं।

पुणे के पेठ इलाके का मानचित्र
पुणे के पेठ इलाके का मानचित्र

पूनावाड़ी से पुण्यनगरी, पुणे शहर की इस यात्रा को दर्शाती एक प्रदर्शनी यहाँ लगी हुई थी। यह प्रदर्शनी पुणे शहर का इतिहास दोहराती है जो विभिन्न पेठों के विकास, जल प्रबंधन प्रणाली और यहाँ के रहवासियों के योगदान द्वारा पूनावाड़ी से पुण्यनगरी तक पहुंचा।

विश्रामबाग पुणे के काष्ठ स्तम्भ
विश्रामबाग पुणे के काष्ठ स्तम्भ

इस इमारत का पिछवाड़ा आम जनता हेतु खुला नहीं है। इसके कुछ भागों पर डाकघर व कुछ अन्य विभागों का कब्जा है। फिर भी मैं पिछवाड़े स्थित आँगन को देखने में सफल हुई। वह आँगन यकीनन आलिशान था| थोड़े जीर्णोद्धार के उपरांत यह वाड़ा पुणे शहर का विरासती गहना बनने में पूर्णतः सक्षम है।

तुलसीबाग राम मंदिर

पुणे के तुलसी बाग़ का राम मंदिर
पुणे के तुलसी बाग़ का राम मंदिर

व्यस्त बाज़ार को चीरकर आसमान में उठते तुलसीबाग़ राम मंदिर को आप नज़रंदाज़ नहीं कर सकते। औन्धे शंकु के आकार का शिखर, जिस पर भरपूर महीन चूना अथवा गचकारी का काम किया गया है, आपकी नज़रों से छुप नहीं सकता। मंदिर को घेरे तुलसीबाग़ का व्यस्त बाज़ार छोटी छोटी दुकानों से बना है जहां उपयोग की हर वस्तु उपलब्ध है।

इस मंदिर का आधार लकड़ी का था जिस पर ऊंचा शिखर कुछ समय पश्चात जोड़ा गया था| इन पर की गयी लकड़ी की नक्काशी देखने लायक है। उसी तरह रामायण के दृश्यों को दर्शाती चित्रकारी भी बेहद खूबसूरत है| परन्तु मंदिर के भीतर फोटो खींचने की मनाही है। राम मंदिर का शिखर हमें ओरछा और अयोध्या के राम मंदिरों की याद दिलाता है।

और पढ़ें – अयोध्या – राम और रामायण की नगरी

मेरा पैदल भ्रमण समाप्त हुआ एक बेनाम पवित्र स्थान पर जो मूला नदी के किनारे स्थित है। यहाँ एक शिवलिंग है जहां एक संगमरमर के पत्थर पर गीता के श्लोक लिखे हुए हैं।

मैंने यह यात्रा “दी वेस्टर्न रूट्स” के जयेश परांजपे के साथ, उनके दिशा निर्देशों पर पूर्ण की। “दी वेस्टर्न रूट्स” पुणे शहर में ऐसे कई पैदल भ्रमण आयोजित करतें हैं।

हिंदी अनुवाद : मधुमिता ताम्हणे

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