यात्रा उपहार Archives - Inditales श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Thu, 17 Oct 2024 03:20:06 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.7.5 पंजाब की १५ सर्वोत्तम उपहार- अमृतसर, पटियाला से क्या लायें? https://inditales.com/hindi/panjab-ke-prasiddh-uphaar/ https://inditales.com/hindi/panjab-ke-prasiddh-uphaar/#respond Wed, 16 Oct 2024 02:30:34 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3701

अपनी यात्राओं एवं भ्रमण अनुभवों को दीर्घकालीन बनाने के लिए हम सदा वहाँ से कुछ ना कुछ स्मारिकायें अपने घर लाते हैं। अपनी पंजाब यात्रा से भी मैं अनेक वस्तुएं लेकर घर ले आयी थी। पंजाब से स्मारिकायें लेकर आना मेरे लिये अति विशेष है क्योंकि वे स्मारिकायें अपने साथ मेरी स्मृतियों का पिटारा लेकर […]

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अपनी यात्राओं एवं भ्रमण अनुभवों को दीर्घकालीन बनाने के लिए हम सदा वहाँ से कुछ ना कुछ स्मारिकायें अपने घर लाते हैं। अपनी पंजाब यात्रा से भी मैं अनेक वस्तुएं लेकर घर ले आयी थी। पंजाब से स्मारिकायें लेकर आना मेरे लिये अति विशेष है क्योंकि वे स्मारिकायें अपने साथ मेरी स्मृतियों का पिटारा लेकर आती हैं। उनमें से प्रत्येक वस्तु मेरे बाल्यकाल की किसी न किसी स्मृति से जुड़ी है, कुछ लोककथाएं, कुछ लोकगीत, ढेर सारे बालसुलभ आल्हाददायक क्षण!

पंजाब के उपहार
पंजाब के उपहार – फुलकारी दुपट्टे 

इन्ही दिनों की गयी मेरी पटियाला यात्रा के समय, विशेषतः पटियाला की एतिहासिक धरोहर के शोध में पदभ्रमण करते हुए, नगर की प्राचीन गलियों में विचरण करते हुए, मार्ग की छोटी छोटी दुकानों में पंजाब के स्वादिष्ट व्यंजनों का आस्वाद लेते हुए मैं उन स्मृतियों से सराबोर हो गयी थी।

अब पंजाब से अपने साथ लाये उन विशेष उपहारों पर यह संस्करण लिखते समय, वे सभी स्मृतियाँ पुनः मेरे नेत्रों के समक्ष नृत्य करने लगी हैं। पुनः अपना बालपन जीते हुए ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो वह एक भिन्न जीवनकाल था। पंजाब की संस्कृति का सटीक प्रतिनिधित्व करते हैं, वहाँ का उत्कृष्ट भोजन एवं वहाँ के उत्कृष्ट परिधान। वहाँ से लायी स्मारिकाओं में पंजाब की ये संस्कृति स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है।

आप भी जब पंजाब जाएँ, तब इन उपहारों को अपने साथ अवश्य लायें । मुझे विश्वास है, पंजाब की इन आकर्षक वस्तुओं को लाकर अपने प्रियजनों को उपहार स्वरूप देने में आपको प्रसन्नता होगी व आनंद आयेगा।

पंजाब के उपहार

फुलकारी ओढ़नी

फुलकारी पंजाब की एक पारंपरिक कढ़ाई की शैली है जो चुनरी, ओढ़नी, साड़ियों आदि पर की जाती हैं। इसका शब्दशः अर्थ है, फूलों की कलाकारी। यह कढ़ाई सामान्यतः खद्दर जैसे मोटे सूती वस्त्र पर की जाती है जो सामान्यतः हलके भूरे रंग का होता है। कढ़ाई में प्रयुक्त रेशमी धागे उजले चटक रंगों के होते हैं, जैसे रानी, नारंगी, हरा, पीला, लाल आदि। मुझे स्मरण नहीं कि फुलकारी में काले अथवा गहरे नीले रंग का भी प्रयोग होता है।

फुलकारी दुपट्टे
फुलकारी दुपट्टे

फुलकारी में भी अनेक प्रकार होते हैं, जिनमें एक शैली है, बाग। कढ़ाई की इस शैली में सम्पूर्ण वस्त्र को रेशमी धागों द्वारा इस प्रकार आच्छादित कर दिया जाता है कि मूल वस्त्र दृश्यमान नहीं रहता। मैंने फुलकारी में अधिकांशतः ज्यामितीय आकृतियाँ ही देखी हैं।

अनेक पंजाबी गीतों में भी फुलकारी का उल्लेख होता है। कुछ लोगों का कहना है कि अविभाजित पंजाब के साहित्यिक लेखनों में भी फुलकारी का उल्लेख मिलता है किन्तु इसके सत्यापन का मेरे पास कोई प्रमाण नहीं है।

पंजाब में विवाह एवं अन्य मंगल कार्यों में स्त्रियाँ अत्यंत प्रेम से फुलकारी कढ़ाई किये गए परिधान धारण करती थीं। जब भी किसी परिवार में बालिका का जन्म होता था तो घर की महिलाएं फुलकारी कढ़ाई का कार्य आरम्भ कर देती थीं ताकि उसके विवाह के समय उपहार स्वरूप उसे दे सकें। ये ऐसी कलाकारी है जो मूलतः स्त्रियों के लिए स्त्रियों द्वारा की जाती है।

पारंपरिक रूप से फुलकारी कढ़ाई में केवल दुपट्टे बनाए जाते थे। अब फुलकारी कढ़ाई के दुपट्टे, साड़ियाँ, सलवार-कमीज आदि भी प्रचलन में हैं। यहाँ तक कि फुलकारी कढ़ाई की चादरें भी बनाई जाती हैं। मैंने अपने लिए फुलकारी की चादर का चुनाव किया था।

यदि आपसे कहा जाए कि पंजाब से एक स्मारिका लेकर आयें तो मेरा विश्वास है कि प्रथम चयन फुलकारी ही होगी!

पंजाबी जुत्ती

चमड़े के आकर्षक जूते जिन पर उजले चटक धागों से कढ़ाई की जाती है, उन्हें हम पंजाबी जुत्ती के नाम से जानते हैं। पंजाब में इन्हें पटियाला जुत्ती या कसूरी जुत्ती कहा जाता है। कसूर पंजाब के पश्चिमी क्षेत्र में स्थित एक गाँव है। हाथों से बने ये जूते कड़क चमड़े के होते हैं। मैंने अपने महाविद्यालयीन काल में इन जुत्तियों का भरपूर उपयोग किया है। प्रारंभ में कड़क चमड़े के कारण ये जुत्तियाँ किंचित कष्ट पहुँचा सकती हैं। इसलिए सूती वस्त्र से पाँव को ढँक कर इन्हें पहनना पड़ सकता है।

पंजाबी जुत्ती
पंजाबी जुत्ती

पंजाबी जुत्तियाँ मूल चमड़े के रंग के भी होते हैं। इनमें गहरे एवं हलके दोनों रंग उपलब्ध होते हैं। ये जुत्तियाँ सामान्यतः पुरुध धारण करते हैं। स्त्रियों की जुत्तियाँ चटक रंगों में बनाई जाती हैं। कई महिलायें भिन्न भिन्न रंगों के वस्त्रों के साथ उन रंगों की जुत्तियाँ धारण करती हैं। आप कल्पना कर सकते हैं कि महिलाओं में ये जुत्तियाँ कितनी लोकप्रिय हैं।

पंजाबी सलवार कमीज

मेरे अनुमान से हमारे देश की लगभग सभी स्त्रियों ने सलवार कमीज धारण की होगी। वर्तमान काल में भारत के सभी सामाजिक स्तर पर कार्यरत स्त्रियों में सलवार कमीज एक मूलभूत परिधान बन चुका है। सलवार कमीज धारण करने वाली स्त्रियों से पंजाबी सलवार कमीज का वैशिष्ट्य छुपा नहीं है। पंजाबी सलवार कमीज क्रय करने के लिए अमृतसर अथवा पटियाला के बाजारों से उत्तम कौन सा स्थान होगा!

आप जब भी पंजाब भ्रमण के लिए जाएँ तो अमृतसर अथवा पटियाला के बाजारों में अवश्य भ्रमण करें। वहाँ सलवार कमीजों के भिन्न भिन्न प्रकार देख विस्मय से आपकी आँखें चौड़ी हो जायेंगी।

पटियाला में पंजाबी सूट क्रय करने के लिए अदालत बाजार या AC मार्केट अवश्य जाएँ। अमृतसर में आप कपड़ा बाजार जा सकते हैं। आपको यहाँ खरीददारी का आनंद अवश्य आएगा। विशेषतः दुकानदारों की कला-कौशल देख आप दंग रह जायेंगे। वे बड़े प्रेम से आप जो चाहें, वो परिधान दिखाने के लिए तत्पर रहते हैं। आपके परिधान देखकर एवं आपके चुनाव देखकर आपकी पसंद का अनुमान लगाते हैं तथा उसी प्रकार के वस्त्र दिखाते हैं।

पंजाबी परांदे

महिलायें जब चोटियाँ बनाती हैं तो विशेष अवसरों पर उन चोटियों के अंत में रंग-बिरंगे लटकन लटकाती हैं। उन्हें परांदा कहते हैं। ये एक ऐसी वस्तु है जो पूर्व काल में अत्यंत लोकप्रिय हुआ करती थी किन्तु आधुनिकता के चलते अब यह प्रासंगिकता खोती जा रही है। अपनी परम्पराओं को जीवंत रखते हुए विशेष अवसरों पर इनका प्रयोग किया जा सकता है। पटियाला एवं अमृतसर के बाजारों में विविध प्रकार के आकर्षक परांदे उपलब्ध हैं।

पंजाबी परांदे
पंजाबी परांदे

मुझे इन परान्दों को एक स्मारिका के रूप में लाना अवश्य भायेगा। ये बाजारों से पूर्णतः लुप्त हो जाएँ, इससे पूर्व आप कम से कम एक परांदा अवश्य लाना चाहेंगे।

पंजाबी पगड़ी

पंजाबी पगड़ी सिक्खों की शान होती है। यह एक लम्बा सूती वस्त्र होता है जो विविध रंगों में उपलब्ध होता है। श्वेत अथवा हलके रंग की पगड़ियां बहुधा वृद्ध पंजाबी पुरुष धारण करते हैं, वहीं युवा पुरुष चटक रंग की पगड़ियां धारण करते हैं।

जो सिख धर्म से सम्बन्ध नहीं रखते, वे इन पगड़ियों को दैनिक जीवन में भले ही ना पहने, किन्तु विशेष आयोजनों में इन्हें धारण कर सकते है।

पंजाबी पंखी

पंखी, जिसे पंजाब में पखी भी कहा जाता है, यह एक छोटा पंखा होता है जिसे हाथ से झुलाया जाता है। पूर्वकाल में महिलायें अपने पंखी स्वयं बनाकर उन पर कसीदाकारी करती थीं। अपने कला-कौशल एवं रूचि के अनुसार महिलायें ये पंखी बनाकर उनका प्रयोग करती थीं।

पंजाबी पक्खी
पंजाबी पक्खी

पुराना बाजार में आप अब भी ये पंखी देख सकते हैं। मैंने पटियाला में भी ऐसे पंखी देखे थे। मुझे विश्वास है कि अमृतसर, जालंधर तथा लुधियाना में भी ये पंखी अवश्य मिलते होंगे।

ऊनी वस्त्र

लुधियाना हाथ से बुने हुए तथा कालांतर में यंत्रों पर बुने हुए ऊनी वस्त्रों के लिए प्रसिद्ध है। शीत ऋतु के लिए यंत्रों पर बुने परिधान आपको फिर भी अन्यत्र मिल जायेंगे किन्तु हाथों से बुने हुए ऊनी परिधानों के लिए लुधियाना से उत्तम कोई अन्य स्थान नहीं है। आप यहाँ से ऊनी स्वेटर, दस्ताने, शाल, गुलबंद, कम्बल, कालीन आदि क्रय कर सकते हैं।

अमृतसर में आप हॉल बाजार से ऊनी परिधान ले सकते हैं।

उपहार स्वरूप पंजाब के व्यंजन

पापड़ वड़ियाँ

अमृतसर के पापड़ एवं दाल की वड़ियाँ अत्यंत लोकप्रिय हैं। पंजाबी भाषा में अनेक लोकगीतों में भी इनका उल्लेख किया गया है। जिन्हें पंजाबी भोजन प्रिय है, उनके लिए ये प्रिय उपहार सर्वोपरि हैं। पंजाबी व्यंजन किसी को ना भायें, ऐसा क्वचित ही होता है।

पंजाब में पापड़ बहुधा उड़द दाल के बने हुए होते हैं। वे भिन्न भिन्न स्वादों में उपलब्ध है। उनमें काली मिर्च का स्वाद सर्वाधिक लोकप्रिय है। वड़ियाँ भी विविध आकारों एवं स्वादों में उपलब्ध होती हैं। आप उनसे अनेक प्रकार के व्यंजन बना सकते हैं।

अमृतसर में आप पापड़ एवं वड़ियाँ क्रय करना चाहें तो आप पापड़ वड़ियाँ बाजार जा सकते हैं या मंजीत मंडी से भी ले सकते हैं।

सूखे मेवे वाला गुड़ तथा सादा स्थानीय गुड़

पंजाब में गन्नों के खेतों के आसपास अनेक लघु उद्योग हैं जहाँ गुड़ बनाया जाता है। गुड़ पंजाबी भोजन का एक अभिन्न अंग है। एक सर्व सामान्य पंजाबी प्रत्येक भोजन के उपरान्त गुड़ का एक टुकड़ा मुंह में अवश्य डालता है। इससे कंठ स्वच्छ एवं अनवरुद्ध हो जाता है।

पटियाला में मुझे सूखे मेवे युक्त गुड़ मिला। इस प्रकार के गुड़ में अनेक प्रकार के सूखे मेवे मिलाये जाते हैं। मुझे यह अत्यंत भा गया। आप सूखे मेवे वाला गुड़ अवश्य ले जाएँ। यह अत्यंत स्वादिष्ट एवं पौष्टिक होता है। यह पंजाब का एक पूर्णतः स्थानीय उपहार है।

पंजाबी अचार

मेरा जन्म पंजाब में हुआ किन्तु अब व्यावसायिक कारणों से पंजाब से दूर घर बसाया हुआ है। यहाँ मुझे पंजाब के गुठली वाले आम के अचार की कमी खलती हैं। मैं जब भी पंजाब जाकर आती हूँ, पंजाबी अचार मेरे साथ अवश्य आता है। पंजाब की सौगात के रूप में सदाबहार अचार हैं, आम का अचार, भरी हुई लाल मिर्चों का अचार तथा नींबू का अचार।

शीत ऋतु में आप फूलगोभी का अचार तथा गाजर का अचार भी ले सकते हैं जो इसी ऋतु में उपलब्ध होते हैं।

अचार एक ऐसी खाद्य वस्तु है जो अत्यंत स्थानिक है। भारतीय अचार जैसी कोई संकल्पना सही नहीं है। प्रत्येक क्षेत्र में अचार बनाने की अत्यंत स्थानीय विधि होती होती है। उन सब में पंजाबी अचार का अपना एक विशेष स्थान है। यह आपके स्वयं के लिए तथा आपके अपनों के लिए एक अनुपम सौगात सिद्ध होगी।

अमृतसरी कुलचा

यदि आप अमृतसर से अधिक दूर नहीं रहते तो आप अपने साथ अपने परिवार के अन्य सदस्यों के लिए कुछ कुलचे ले जा सकते हैं। वे अवश्य आनंदित होंगे।

सूत के लड्डू

ये पटियाला की विशेष सौगात हैं। ये मेरा भी प्रिय व्यंजन भी है। किन्तु पंजाब के बाहर इसे लोग क्वचित ही जानते हैं। आप इनका आस्वाद लें तथा अपने प्रियजनों के लिए भी अवश्य ले जाएँ।

आध्यात्मिक उपहार

पंजाब पंजाबियों का प्रदेश है, विशेषतः सिख धर्म का पालन करने वालों का। इसलिए आपको यहाँ चारों ओर अनेक गुरूद्वारे दृष्टिगोचर होंगे। आपकी पंजाब यात्रा कैसे पूर्ण होगी यदि आप गुरूद्वारा ना जाएँ! इन गुरुद्वारों के बाहर आपको अनेक दुकानें दृष्टिगोचर होंगी जहाँ वे सभी वस्तुएँ रखी रहती हैं जिन्हें धारण करना एक सिख के लिए अनिवार्य होता है। उनमें से आप कुछ वस्तुएं आप पंजाब की स्मारिकाओं के रूप में अवश्य ला सकते हैं।

कड़ा

यह लोहे अथवा स्टील का एक ठोस कड़ा होता है जिसे एक सिख अपनी कलाई में अवश्य धारण करता है। जो भी गुरूद्वारे की पावन उर्जा से स्वयं को प्रभावित जानते हैं अथवा उससे सम्बंधित मानते हैं, उनके लिए यह एक उत्तम आध्यात्मिक उपहार है। इन्हें अपने साथ ले जाना भी आसान है। जो सिख नहीं हैं, वे भी इसे धारण कर सकते हैं। यह कलाइयों पर आकर्षक प्रतीत होता है। साथ ही ऐसी मान्यता है कि यह सभी विपदाओं से रक्षण करता है।

खंडा अथवा कंडा

कंडा सिख धर्म के अनुयायियों का एक पावन चिन्ह है। इसे आप लॉकेट के रूप में गले में धारण कर सकते हैं। अन्यथा इसे अपने घर में शुभ चिन्ह के रूप में रख सकते हैं। पाँच नदियों की भूमि पंजाब की यह विशेष स्मारिका है तथा यह आपको सदा आपके पंजाब भ्रमण का स्मरण कराती रहेगी।

धार्मिक पुस्तकें

यदि मेरे समान आपको भी पुस्तकों में रूचि है, तो आप छोटे आकार की धार्मिक पुस्तकें ले सकते हैं। इन्हें गुटका पुस्तक कहते हैं। इनमें दनंदिनी प्रार्थनाएं तथा स्तुतियाँ होती हैं। इनमें कुछ पुस्तकें हैं, नितनेम गुरबाणी, सुखमनी साहिब तथा जपुजी साहिब। आप यहाँ से गुरु ग्रन्थ साहिब की प्रति भी ले सकते हैं जो इन सभी स्मारिकाओं में सर्वाधिक पावन सौगात है। किन्तु गुरु ग्रन्थ साहिब सामान्यतः गुरुमुखी लिपि में ही उपलब्ध होती है जो पंजाबी भाषा की लिखित लिपि है।

लघु तलवारें एवं कटारें

आपको यहाँ उत्कृष्ट रूप से उत्कीर्णित छोटी छोटी तलवारें एवं कटारें भी मिल जायेंगी। तलवारें एवं कटारें पंजाबियों की पावन वस्तुओं में से एक हैं। किन्तु ये छोटी छोटी तलवारें एवं कटारें केवल दिखावे की होती हैं।

आधुनिक उपहार

1469(१४६९) के आधुनिक एवं आकर्षक उत्पाद

१४६९ एक आधुनिक समकालीन कंपनी है जो पंजाब से सम्बंधित विशेष वस्तुओं की विक्री करती है। १४६९ वास्तव में गुरु नानक देवजी के जन्म का वर्ष है। उन्हें सिख धर्म का संस्थापक माना जाता है।

मुझे उनकी कार्यशाला में भ्रमण करने में अत्यंत आनंद आया। वहाँ अनेक प्रकार की आकर्षक व आधुनिक वस्तुएं प्रदर्शित की हुई हैं। उनमें आधुनिकता एवं परंपरा का अद्भुत सम्मिश्रण देखा जा सकता है। उनका स्टोर पंजाब में नहीं अपितु दिल्ली के जनपथ पर स्थित है। इसके अतिरिक्त भी यदि उनकी कार्यशाला अथवा स्टोर कहीं हो तो मुझे उसकी जानकारी नहीं है।

यहाँ से आप ऐसे टीशर्ट ले सकते हैं जिन पर गुरुमुखी भाषा में सद्वचन लिखे होते हैं।

तो आप अपने आगामी पंजाब भ्रमण से इनमें से कौन सी स्मारिका अपने साथ लायेंगे?

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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सिक्किम के १२ सर्वोत्तम स्मृति चिन्ह https://inditales.com/hindi/sikkim-ke-uphaar/ https://inditales.com/hindi/sikkim-ke-uphaar/#respond Wed, 31 Jan 2024 02:30:07 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3375

क्या आप सिक्किम भ्रमण के लिए जा रहे हैं? क्या आप यह विचार कर रहे हैं कि सिक्किम से कौन कौन सी विशेष वस्तुएँ स्मृति चिन्हों के रूप में ला सकते हैं? यह संस्करण पढ़कर आपकी जिज्ञासा अवश्य तृप्त हो जायेगी। जी हाँ, सिक्किम एक छोटा सा राज्य है लेकिन उसके आकार पर ना जाएँ। […]

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क्या आप सिक्किम भ्रमण के लिए जा रहे हैं? क्या आप यह विचार कर रहे हैं कि सिक्किम से कौन कौन सी विशेष वस्तुएँ स्मृति चिन्हों के रूप में ला सकते हैं? यह संस्करण पढ़कर आपकी जिज्ञासा अवश्य तृप्त हो जायेगी। जी हाँ, सिक्किम एक छोटा सा राज्य है लेकिन उसके आकार पर ना जाएँ।

सिक्किम के स्मृति चिन्ह
सिक्किम के स्मृति चिन्ह

सिक्किम भले ही एक विशाल राज्य ना हो लेकिन यह एक संस्कृति संपन्न राज्य है। यहाँ की संस्कृति एवं परम्पराएं यहाँ के विशेष वस्त्रों, आभूषणों तथा अनुष्ठानिक वस्तुओं में स्पष्ट परिलक्षित होते हैं। मेरे गत सिक्किम भ्रमण के समय अल्प समयावधि के चलते मैं वहाँ से कुछ ही स्मृति चिन्ह ला पायी थी किन्तु इस समय मेरे पास भरपूर समय था। मैंने निश्चिन्तता से गंगटोक के सभी पर्यटन बिन्दुओं के समक्ष स्थित बाजारों एवं दुकानों का अवलोकन किया। उसी के आधार पर सिक्किम से साथ लाने योग्य कुछ आकर्षक व रोचक स्मृति चिन्हों की एक सूची बनाई है। केवल आपके लिए!

सिक्किम के सर्वोत्तम स्मृति चिन्ह – गंगटोक में खरीददारी

सिक्किम भ्रमण की मधुर स्मृतियों को संजोकर रखने के लिए वहाँ से इन विशेष वस्तुओं का क्रय करें।

प्रार्थना ध्वज

सिक्किम में आप जहाँ भी जाएँ, वायु में लहराते रंगबिरंगे प्रार्थना ध्वज आपका स्वागत करते प्रतीत होते हैं। आप उन्हें पहाड़ियों के ऊपर, झरनों के समीप, मार्गों के ऊपर, सरोवरों की ओर जाती पगडंडियों के ऊपर,  अर्थात् अक्षरशः सभी स्थानों पर देखेंगे।

बौद्ध प्रार्थना ध्वज
बौद्ध प्रार्थना ध्वज

इन प्रार्थना ध्वजों का उद्देश्य है, सब के कल्याण के लिए की गयी प्रार्थना को वायु में आत्मसात कराना। मेरे विचार से ये प्रार्थना ध्वज सिक्किम की सर्वोत्तम स्मारिका है। आप इन ध्वजों को अपने आवास के बाहर फहरा सकते हैं। ये भिन्न भिन्न आकारों में उपलब्ध हैं। आप अपनी इच्छा के अनुसार आकार का चयन कर सकते हैं।

आप इन ध्वजों का लघु रूप भी ले सकते हैं। उन पर ‘ॐ मणि पद्मे हूँ’ लिखा होता है। यह बौद्ध धर्म का एक मंत्र है। ये ध्वज तोरण के रूप में उपलब्ध होते हैं जिन्हें आप आवास द्वार के ऊपर अथवा वाहन के पृष्ठ कांच पर लटका सकते हैं।

थान्ग्का चित्र – कला प्रेमियों के लिए सिक्किम की स्मारिका

थान्ग्का चित्र आप सम्पूर्ण हिमालयी क्षेत्रों में देख सकते हैं, जैसे भूटान, नेपाल, लद्दाख, सिक्किम आदि। थान्ग्का चित्र सूती वस्त्रों, रेशमी वस्त्रों तथा कागज जैसे भिन्न भिन्न माध्यमों पर चित्रित किये जाते हैं। ये एक प्रकार की सूक्ष्म चित्रकला शैली होती है जो बुद्ध के जीवन से सम्बंधित दृश्यों, बौद्ध देवी-देवताओं, विभिन्न बोधिसत्वों तथा रहस्यमयी मंडलों पर आधारित होती है। यदि आप एक बौद्ध हैं तथा इन दैव-चित्रण से सम्बद्ध हैं तो आप अपनी मान्यता अनुसार इनका चुनाव करें। अन्यथा आपको जो चित्र भाये, आप वो क्रय कर सकते हैं।

थान्ग्खा मण्डल चित्र
थान्ग्खा मण्डल चित्र

थान्ग्का चित्र मूल्यवान अवश्य होते हैं किन्तु वे सिक्किम के सर्वोत्तम स्मृतियों में से एक हैं। थान्ग्का चित्र सिक्किम के सांस्कृतिक ताने-बाने का एक महत्वपूर्ण भाग है।

थान्ग्का चित्र अत्यंत कोमल होते हैं। उनकी उत्तम देखभाल आवश्यक है। बौद्ध मठों में विशाल थान्ग्का चित्र होते हैं जिन्हें वे रेशम की अनेक परतों के मध्य सुरक्षित रखते हैं। वे उन्हें विशेष अवसरों पर ही प्रदर्शित करते हैं।

सुरीले पात्र

सिक्किम के स्मृति चिन्हों में यह मेरी सर्वाधिक प्रिय वस्तु है। आपने अनेक बौद्ध मठों में सुरीले स्वर उत्पन्न करते पात्र देखे होंगे। ये सुरीले पात्र अनेक आकारों के होते हैं जो मिश्रित धातु से बने होते हैं। इन आकर्षक पात्रों पर मनमोहक उत्कीर्णन होते हैं। कुछ पात्रों पर बौद्ध मंत्र भी उत्कीर्णित होते हैं। इन पात्रों के साथ लकड़ी का टुकड़ा दिया जाता है। जब हम इस लकड़ी को पात्र के किनारों पर घुमाते हैं तो पात्र से अत्यंत सुरीला स्वर उत्पन्न होता है। इसी प्रकार लकड़ी को अनवरत घुमाते रहे तो वह सुरीला स्वर अपने चरम उत्कर्ष तक पहुँच जाता है जो मंत्रमुग्ध कर देता है।

संगीतमय सुरीले पात्र
संगीतमय सुरीले पात्र

विक्रेता जब इस सुरीले पात्र की कार्यप्रणाली अपने हाथों द्वारा दिखाते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि यह अत्यंत सुगम है। किन्तु आप स्वयं जब इसे अपने हाथों में लेकर छड़ी घुमायेंगे तब हो सकता है कि सुरीले स्वर प्रस्फुटित ना हों। इसके लिए आपको इस विशेष तकनीक का प्रयोग करना होगा।

पात्र को हथेली पर इस प्रकार रखें कि दोनों के मध्य रिक्त स्थान बने। अब लकड़ी की छड़ी को इसकी किनार पर घुमाएं। मधुर स्वर अवश्य प्रस्फुटित होंगे।

सुरीले पात्र अनेक आकारों में उपलब्ध हैं। मैंने माध्यम आकार का एक पात्र अपनी भूटान-सिक्किम यात्रा से क्रय किया था।

प्रार्थना चक्र

प्रार्थना चक्र एक लघु बेलनाकार डिबिया होती है जो एक लकड़ी की मूठ से जुड़ी होती है। इस डिबिया से डोरी का एक टुकड़ा बंधा होता है जिसके दूसरे छोर पर एक बड़ा मोती होता है। यह बेलनाकार डिबिया धातु की होती है जिस पर आकर्षक उत्कीर्णन होते हैं। अधिक मूल्य के प्रार्थना चक्रों की डिबिया मणि जड़ित होती हैं। इस चक्र का सर्वाधिक महत्वपूर्ण भाग होता है, इस डिबिया के भीतर रखी एक पत्रावली जिस पर प्रार्थना लिखी होती है। ऐसा माना जाता है कि जब इस चक्र को मूठ से पकड़ कर गोल घुमाया जाता है तब यह चक्र भीतर रखी प्रार्थना को वायु में सन्निहित करता है। वायु में सकारात्मक उर्जा का विसरण करता है।

प्रार्थना चक्र के साथ बुद्ध की प्रतिमा
प्रार्थना चक्र के साथ बुद्ध की प्रतिमा

जिस प्रकार साधु, संन्यासी अथवा साधक के हाथ में जपमाला होती है, उसी प्रकार बौद्ध लामा के हाथ में यह प्रार्थना चक्र होता है। जब आप इस प्रार्थना चक्र को घुमायेंगे, आप सम्मोहित से हो जायेंगे। यह चक्र आपको ध्यान अवस्था में ले जायेगी। यह भी सिक्किम की एक अविस्मरणीय स्मारिका होगी जिसे आप क्रय कर अपने साथ ला सकते हैं।

इसी प्रकार के अनेक विशाल प्रार्थना चक्र बौद्ध मठों में भी होते हैं। बौद्ध भिक्षुक परिक्रमा करते हुए इन चक्रों को घुमाते हैं तथा प्रार्थना करते हैं। ऐसे खड़े प्रार्थना चक्र छोटे आकर में भी उपलब्ध होते हैं जिन्हें आप क्रय कर सकते हैं। इन खड़े चक्रों को आप अपने आवास की भित्तियों पर लगा सकते हैं अथवा मेज पर रख सकते हैं।

दोरजी घंटी तथा वज्र

दोरजी घंटी एवं वज्र ऐसी दो वस्तुएं हैं जिन्हें आप केवल सिक्किम ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण भारत के सभी ऐसी दुकानों में देखेंगे जो धातु निर्मित कलाकृतियाँ विक्रय करते हैं। ये बहुधा पीतल अथवा कांसे धातु के बने होते हैं। ये पुरुषप्रधान एवं स्त्रीप्रधान ऊर्जा के द्योतक होते हैं तथा इन्हें बहुधा एक साथ ही रखा जाता है। दोरजी घंटी स्त्रीप्रधान उर्जा का प्रतिनिधित्व करती है तथा वज्र पुरुषप्रधान उर्जा का प्रतिनिधित्व करता है।

दोरजी घंटी और वज्र
दोरजी घंटी और वज्र

इन दुकानों में आप बुद्ध की भिन्न भिन्न मुद्राओं में तथा विभिन्न आसनों पर आरूढ़ अनेक प्रतिमाएं देखेंगे। आपको उनका जैसा रूप भाये, आप वैसी प्रतिमा क्रय कर सकते हैं। ये तीनों ऐसे स्मृति चिन्ह हैं जो देखने में अत्यंत मनमोहक होते हैं तथा जिन्हें अधिक रखरखाव की आवश्यकता नहीं होती है।

पारंपरिक परिधान

यदि आप उन पर्यटकों में से हैं जिन्हें पर्यटन गंतव्य के परिधान विशेष में रूचि होती है तथा सभी गंतव्यों से उनके विशेष परिधानों को क्रय करना तथा धारण करना भाता है तो आप सही गंतव्य की ओर जा रहे हैं।

सिक्किम का पारंपरिक परिधान
सिक्किम का पारंपरिक परिधान

सिक्किम के पारंपरिक रंगबिरंगे रेशमी परिधान अत्यंत सुन्दर होते हैं। वे नेपाली परिधानों से मेल खाते हैं। क्यों ना हों? पड़ोसी जो हैं। सिक्किम के औपचारिक परिधान बहुधा रेशमी एवं बेल-बूटे युक्त जरी वस्त्रों द्वारा बने होते हैं। किन्तु ये ऊन मिश्रित मोटे उष्म वस्त्रों में भी उपलब्ध होते हैं जो वहाँ के शीत वातावरण के लिए आवश्यक हैं।

सिक्किम में लेप्चा पुरुषों की वेशभूषा थोकोरो-दम होता है जिसमें पायजामा, लेप्चा कुरता, शंबो तथा टोपी सम्मिलित हैं। लेप्चा स्त्रियों की वेशभूषा को डमवम अथवा डुमिडम कहते हैं। वहीं, भूटिया स्त्रियों की पोशाख को बखू कहते हैं।

सिक्किम की पारंपरिक टोपी
सिक्किम की पारंपरिक टोपी

यदि आपको भिन्न भिन्न शैली के परिधानों को धारण करने में रूचि नहीं है तो सिक्किम से अन्य पारंपरिक वस्तुएं ले सकते हैं। पुरुष सिक्किमी टोपी ले सकते हैं जिसे आप अपने परिधानों के साथ विशेष अवसरों में धारण कर सकते हैं। ये टोपियाँ शीत वातावरण के लिए भी उत्तम सह-परिधान होती हैं। स्त्रियाँ सिक्किम के विशेष आभूषण ले सकती हैं।

पारंपरिक आभूषण

हिमालयीन स्त्रियों के आभूषणों का उल्लेख होते ही नेत्रों के समक्ष नीलवर्ण मणिजड़ित आभूषण उभर कर आ जाते हैं। मेरी इस सिक्किम यात्रा में मैंने यह निश्चय किया कि इन मनमोहक नीलवर्ण मणिजड़ित आभूषणों के पार भी जाकर अन्य आभूषणों की खोज करूँ। मैं वहाँ के एक स्थानीय जौहरी के पास गयी तथा उनसे सिक्किम के पारंपरिक आभूषणों के विषय में जानकारी एकत्र की। उनसे आभूषणों के पारंपरिक नमूनों एवं शैलियों के विषय में जाना। उसी के आधार पर मैं आपको दो विशेष आभूषणों के विषय में जानकारी देना चाहती हूँ।

गले के हार के लिए घौ लटकन: गले के हार के लिए ये लटकन भिन्न भिन्न आकारों की सुन्दर अलंकृत डिबिया होती हैं जिनके भीतर प्रार्थना पत्रावली रखी जाती है। कुछ लोग इसके भीतर दिवंगत गुरु के अवशेष तथा पवित्र जड़ी-बूटियाँ भी रखते हैं। चाँदी धातु में बने इस लटकन पर उपचारात्मक प्रस्तर मणि जड़ा होता है। नीलम उनमें से एक है जो हिमालयीन क्षेत्रों में पाया जाता है। अन्य लोकप्रिय मणियाँ हैं, लाजवर्द तथा मूंगा। बौद्ध धर्म के धर्मनिष्ठ अनुयायियों के लिए घौ लटकन एक प्रकार से निजी चल मंदिर सदृश होते हैं। कदाचित इस लटकन का मूल सम्बन्ध घुमक्कड़ी बौद्ध समुदायों से रहा होगा।

घौ लटकन
घौ लटकन

कुछ लटकन डिबियों में प्रार्थना पत्रावली होती हैं जिन पर ‘ॐ मणि पद्मे हूँ’ लिखा होता है। ये आभूषण आकृति एवं शैली में समकालीन प्रतीत होते हैं।

अकोर झुमके: ये अत्यंत आकर्षक झुमके होते हैं जिन्हें ल्हासा स्त्रियाँ धारण करती हैं। इन झुमकों की एक विशेषता होती है कि इनके अंतिम छोर पर कमल की कली की आकृतियाँ होती हैं। अकोर झुमकों पर नीलम मणि जड़ा होता है। कभी कभी एक छोटा मूंगा भी होता है जो इसकी एकरसता को तोड़ता है।

अकोर झुमके
अकोर झुमके

आरंभ में ये झुमके अत्यंत वजनी होते थे जिन्हें कर्णपाली पर धारण नहीं किया जाता था। इन्हें कानों के पार्श्व भागों पर धारण किया जाता था तथा भार अधिक होने के कारण उन्हें डोरी द्वारा सर के आभूषणों से बंधा जाता था। अब ये अत्यंत हलके वजन में भी उपलब्ध हैं। भार कम करने के पश्चात भी उनकी मूल शैली में परिवर्तन नहीं किया गया है। आप इन्हें उत्तम दुकानों से लें। वहाँ पारंपरिक शैली के हलके व मनमोहक अकोर झुमके उपलब्ध होते हैं।

मुखौटे

यदि आपने किसी भी बौद्ध मठ में उनके पारंपरिक उत्सव देखे होंगे तो आपने रंगबिरंगे विशाल मुखौटे भी देखे होंगे जिनका प्रयोग विभिन्न बौद्ध अनुष्ठानों में किया जाता है। बौद्ध लामा इन्हें धारण कर पारंपरिक नृत्य करते हैं। रंगबिरंगे विशाल मुखौटे धारी बौद्ध लामाओं द्वारा किये गए पारंपरिक चाम नृत्य का यह विडियो देखिये। इसमें आप मुखौटों की विभिन्नता को देख पायेंगे।

काष्ठ के मुखौटे
काष्ठ के मुखौटे

कुदृष्टि एवं दुष्ट आत्माओं से बचने के लिए सामान्य जन-मानस भी इन मुखौटों का प्रयोग करता है। सिक्किम में आप कई घरों व दुकानों के समक्ष ये मुखौटे लटकते देखेंगे। मुझे बताया गया कि प्रत्येक मुखौटा एक विशेष उद्देश्य का प्रतीक होता है। इसलिए आपको जो भाये वो आप लें। सभी मुखौटे लकड़ी के होते हैं जिन पर उत्कीर्णन व चित्रकारी की जाती है। बहुधा यह मुखौटा लकड़ी के एकल टुकड़े द्वारा निर्मित होता है।

मैंने यहाँ से गणेश का मुखौटा लिया था। जी हाँ गणेश! आपको आश्चर्य होगा कि सिक्किम की स्मारिका के रूप में गणेश एवं पंख फैलाए गरुड़ के मुखौटे अत्यंत लोकप्रिय हैं।

चाय – सुगम व कम लागत

आप दार्जिलिंग चाय व आसाम चाय के विषय में अवश्य जानते होंगे। कदाचित सिक्किम चाय के विषय में नहीं जानते होंगे। सिक्किम दार्जिलिंग से अधिक दूर नहीं है। सिक्किम में भी चाय का मनमोहक उद्यान है। सड़क मार्ग द्वारा गंगटोक से दार्जिलिंग जाते हुए हम टेमी चाय के उद्यान से होकर गए थे। वह दृश्य इस क्षेत्र का हमारा सर्वोत्तम दृश्य था।

सिक्किम की चाय
सिक्किम की चाय

टेमी चाय उद्यान सिक्किम का इकलौता चाय उद्यान है जिसकी गिनती देश-विदेश के सर्वोत्तम चाय उद्यानों में की जाती है। इस चाय उद्यान की स्थापना एवं कार्यान्वयन का श्रेय सिक्किम सरकार को जाता है। इस उद्यान के उत्पाद का कुछ भाग टेमी चाय के ब्रांड नाम पर विक्रय किया जाता है। शेष भाग अन्य ब्रांड नामों पर उपलब्ध हैं, जैसे खो-चा तथा गोल्डन टिप्स।

यदि आप एवं आपके परिजनों को चाय प्रिय है तो यह एक उत्तम स्मारिका सिद्ध हो सकती है। वह भी सीधे चाय के उद्यान से ली गयी चाय!

डमरू

हिमालय को भगवान शिव का आवास माना जाता है। यदि आप शिव भक्त हैं तो आप सिक्किम की स्मृति के रूप में यहाँ से डमरू ले जा सकते हैं। हिन्दू एवं बौद्ध, दोनों अनुयायियों के लिए डमरू का विशेष महत्त्व है। ऐसा माना जाता है कि संस्कृत व्याकरण की रचना ऋषि पाणिनि ने डमरू द्वारा उत्पन्न स्वरों के आधार पर की थी।

सिक्किम के डमरू
सिक्किम के डमरू

मैंने यहाँ डमरू क्रय तो नहीं किया किन्तु उसे बजाना अवश्य सीख लिया। देखने में यह आसान प्रतीत होता है किन्तु जब तक आप उसे सही रीति से ना पकड़ें, उसे बजाना असंभव होता है। डमरू को हाथ में लेकर घुमाने से उस पर बंधा मोती डमरू की सतह पर चोट करता है जिससे स्वर उत्पन्न होते हैं। आप जैसे हाथ घुमायेंगे, वैसे ही सुर में डमरू बजेगा।

मोमो बनाने का उपकरण

मोमो बनाने के उपकरण
मोमो बनाने के उपकरण

यदि आपको मोमो खाना भाता है तो यह भी सिक्किम की एक उत्तम स्मारिका है। सिक्किम की दुकानों में भिन्न भिन्न प्रकार के मोमो यंत्र उपलब्ध हैं। आपको जो आसान प्रतीत हो, आप ले सकते हैं।

अपनी सिक्किम यात्रा से आप इनमें से कौन कौन से स्मृति चिन्ह लाना चाहेंगे?

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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शिमला, मनाली से क्या लायें? सर्वोत्तम हिमाचली स्मारिकाएं https://inditales.com/hindi/himachal-shimla-manali-uphaar/ https://inditales.com/hindi/himachal-shimla-manali-uphaar/#respond Wed, 03 May 2023 02:30:13 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3047

हिमाचल का नाम सुनते ही हमारे समक्ष मनमोहक प्राकृतिक परिदृश्य, बर्फ से आच्छादित पर्वत श्रंखलायें, लाल चटक सेब, लकड़ी एवं शिलाओं से निर्मित भवन उभर कर आ जाते हैं। अनेक पर्यटक स्वच्छ वायु, शीत वातावरण तथा रोमांचक क्रीड़ाओं के लिए भी हिमाचल का भ्रमण करते हैं। यही सर्वश्रेष्ठ हिमाचली स्मारिकाएं हैं। हिमाचल को देव भूमि […]

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हिमाचल का नाम सुनते ही हमारे समक्ष मनमोहक प्राकृतिक परिदृश्य, बर्फ से आच्छादित पर्वत श्रंखलायें, लाल चटक सेब, लकड़ी एवं शिलाओं से निर्मित भवन उभर कर आ जाते हैं। अनेक पर्यटक स्वच्छ वायु, शीत वातावरण तथा रोमांचक क्रीड़ाओं के लिए भी हिमाचल का भ्रमण करते हैं। यही सर्वश्रेष्ठ हिमाचली स्मारिकाएं हैं। हिमाचल को देव भूमि भी कहा जाता है।

यूँ तो हिमाचल के पर्यटक तन व मन की प्रफुल्लता, स्वास्थ्य तथा सकारात्मकता का भण्डार तो साथ लाते ही हैं, साथ ही हिमाचल की अनेक ऐसी वस्तुएं भी साथ लाते हैं जो वहां की पहचान हैं, लोकप्रिय हैं तथा साथ लाने में आसान भी हैं। यहाँ मैं हिमाचल के प्रसिद्ध वस्तुओं का उल्लेख करने का प्रयास कर रही हूँ जिन्हें आप अपनी आगामी हिमाचल यात्रा से स्मारिका के रूप में ला सकते हैं।

शिमला मनाली की हिमाचली स्मारिकायें

हिमाचली टोपी

यदि आप किसी व्यक्ति को देखें जिसने अपने सर पर ऐसी टोपी पहनी हुई है जिसके सामने एक चमकीली पट्टी हो, तो वह व्यक्ति अवश्य हिमाचली होगा। हिमाचली टोपियों की विशेषता है कि उसे स्त्री तथा पुरुष, दोनों धारण कर सकते हैं।

किन्नौरी टोपी - हिमाचल के उपहार
किन्नौरी टोपी – हिमाचल के उपहार

यह हिमाचली टोपी हिमाचल यात्रा से अपने साथ लाने के लिए एक सुन्दर वस्तु है। यह आपको हिमाचल के किसी भी पर्यटन बिंदु अथवा बाजार में प्राप्त हो जायेगी। इनका मूल्य भी अधिक नहीं है। आप अपने परिजन व मित्रों के लिए कई टोपियाँ क्रय कर सकते हैं।

हिमाचल के विभिन्न क्षेत्रों की टोपियों में किंचित स्थानीय विशेषताओं के साथ भिन्नता आ जाती है। प्रत्येक क्षेत्र की टोपियों की मूल रूपरेखा समान ही होती है, किन्तु सूक्ष्म भिन्नताओं के साथ इनके नामों में भी परिवर्तन आ जाते हैं, जैसे किन्नौरी, कुल्लूवी, बुशहरी तथा लाहौली टोपियाँ।

मेरे यात्रा संस्करण, Shimla Manali Road trip से आप इन टोपियों के विषय में अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

किन्नौरी टोपियाँ – इस टोपी के अग्र भाग पर चटक हरे रंग की पट्टी होती है जिसकी किनारी लाल होती है।

किन्नौरी टोपियों को क्रय करने के लिए Amazon।in पर जाएँ।

बुशहरी टोपियाँ – ये टोपियाँ किन्नौरी टोपियों के सामान ही होती हैं किन्तु अग्र भाग में सुनहरे रंग की पट्टी होती है।

कुल्लुवी टोपियाँ – इन टोपियों के अग्र भाग की पट्टी पर रंगबिरंगी ज्यामितीय आकृतियाँ होती है।

कुल्लुवी टोपियों के क्रय के लिए Amazonin पर जाएँ।

लाहौली टोपियाँ – ये टोपियाँ कुल्लुवी टोपियों के सामान होती हैं किन्तु अपेक्षाकृत कम अलंकृत होती हैं।

सादे श्वेत रंग की भी एक टोपी होती है जिसे मलाणा टोपी कहते हैं। एक अन्य प्रकार की टोपी चटक लाल रंग की होती है जो अत्यंत उजली एवं प्रफुल्लित प्रतीत होती है।

कुल्लू एवं किन्नौरी टोपी - हिमाचली स्मारिकाएं
कुल्लू एवं किन्नौरी टोपी – हिमाचली स्मारिकाएं

स्थानिक हिमाचली इन टोपियों  को उत्सवों एवं विशेष आयोजनों में अवश्य धारण करते हैं। यह एक ऐसी हिमाचली परंपरा है जिसका आनंद आप हिमाचल के बाहर, अपने निवास स्थलों में भी ले सकते हैं।

कुल्लू शाल

हिमाचल की जलवायु अत्यंत शीत प्रकृति की है। अतः यहाँ ऊनी वस्त्रों की अधिक आवश्यकता होती है। हिमाचल में ऐसे पशु भी बहुतायत में उपलब्ध हैं जिनसे हमें ऊन प्राप्त होता है। अतः इसमें अचरज नहीं कि हिमाचल में ऊन की बुनाई का कार्य एक कलात्मक व्यवसाय के रूप में विकसित हुआ है।

कुल्लू की प्रसिद्द शाल
कुल्लू की प्रसिद्द शाल

यहाँ की ऊनी शाल पर सादी किन्तु अत्यंत सुरुचिपूर्ण आकृतियाँ होती हैं। स्त्री एवं पुरुष दोनों ही शाल का उपयोग करते हैं। किन्तु उन में किंचित भिन्नता होती है। पुरुषों की शाल को लोई अथवा पट्टू कहते हैं जो लम्बाई में किंचित अधिक होती है तथा उसकी रूपरेखा भी साधारण होती है।

वहीं, स्त्री की शाल पर रंगबिरंगी ज्यामितीय आकृतियाँ होती हैं। साधारणतया शाल के मूल रंग हलके होते हैं किन्तु उनकी किनारों पर की गयी रंगबिरंगी बुनाई उन्हें उजला एवं चटक बनाती हैं। कभी कभी शाल पर पुष्पाकृतियों की भी बुनाई की जाती है।

ऊन के प्रकार तथा आकृतियों की सूक्ष्मता व रंगों के आधार पर विभिन्न मूल्यों की शालें उपलब्ध हैं।

कुल्लू शाल Amazonin से क्रय करें।

आप धोरू शाल भी अवश्य देखें। यह भी एक ऊनी शाल है जिस की किनारियों पर सघन कढ़ाई की जाती है। यह शाल लम्बी होती है जो कन्धों से एड़ियों तक पहुँचती है।

चंबा रुमाल

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, चंबा रुमालों का मूल स्थान हिमाचल का चंबा क्षेत्र है। रेशमी अथवा महीन सूती वस्त्र के टुकड़े पर हाथों से अप्रतिम कढ़ाई की जाती है। इन रुमालों पर कढ़ी आकृतियाँ सामान्यतः किसी पौराणिक कथा पर आधारित होती है। आप इन पर रामायण तथा महाभारत जैसे भारतीय महाकाव्यों के दृश्य देख सकते हैं। हिमाचल में प्रचलित सूक्ष्म कारीगरी का यह उत्तम प्रतिबिम्ब है।

ऐसा माना जाता है कि कढ़ाई किया हुआ प्राचीनतम ज्ञात रुमाल गुरु नानकजी जी के लिए उनकी बहिन बेबे नानकी ने बनाया था। इसका प्रयोग प्रायः उपहार स्वरूप देने के लिए अथवा उत्सवों एवं विवाह इत्यादि समारोहों में भेंट वस्तुओं को ढंकने के लिए किया जाता है।

चंबा रुमाल Amazonin से क्रय करें।

चंबा रुमाल को भौगोलिक संकेत का मान प्राप्त है जो इसे दृढ़ता से इसके मूल स्थान से बांधता है।

चित्रकारी – हिमाचली स्मारिकाएं

हिमाचल अपने पहाड़ी सूक्ष्म-चित्रकारी के लिए प्रसिद्ध है। भारत के सभी प्रमुख संग्रहालयों में आप इन उत्कृष्ट चित्रकारियों का संग्रह देख सकते हैं। कांगड़ा, चंबा, गुलेर तथा बसोली की सूक्ष्म-चित्रकारी अपनी उत्कृष्टता के लिए लोकप्रिय हैं। प्राचीन काल में सम्पूर्ण रामायण अथवा महाभारत को इस सूक्ष्म चित्रकला द्वारा चित्रफलकों पर चित्रित किया जाता रहा है।

पहाड़ी चित्र शैली में सप्तमात्रिका का चित्रण
पहाड़ी चित्र शैली में सप्तमात्रिका का चित्रण

वास्तविक चित्रकृति को ढूंढना जितना कठिन है, उसे क्रय करना उससे भी अधिक कष्टकर है। इन वास्तविक अप्रतिम चित्रों के मूल्य अत्यधिक होते हैं। अतः वर्तमान में अनेक नवोदित कलाकार इन चित्रों की पुनर्रचना कर रहे हैं। अनेक कलाकार प्राचीन शैली का प्रयोग कर नवीन विषयों पर भी ऐसी चित्रकारी कर रहे हैं। आप मनाली एवं शिमला के बाजारों में इन चित्रकारियों को देख सकते हैं।

थांका बौद्ध चित्र हैं जिनकी अपनी एक विशेष शैली होती है। आप इन्हें लद्दाख से लेकर नेपाल, सिक्किम तथा भूटान तक देख सकते हैं जहां बौद्ध धर्म का प्रमुखता से पालम किया जाता है। हिमाचल में भी लाहौल एवं  स्पिति जैसे क्षेत्र हैं जो विशेष रूप से बौद्ध धर्म बहुल क्षेत्र हैं। अतः इन क्षेत्रों में भी थांका चित्रीकरण किया जाता है।

बौद्ध थांका चित्रकारी
बौद्ध थांका चित्रकारी

इन चित्रों में बौद्ध देवों, बुद्ध की जीवनी तथा मंडल जैसे अनेक बौद्ध चिन्हों को चित्रित किया जाता है। ये अधिकतर अनुष्ठानिक चित्र हैं जिनका प्रयोग अनेक बौद्ध उत्सवों में किया जाता है। बौद्ध मठों में विशाल थांका चित्रों को विशेष रूप से उत्सवों के समय बाहर निकालकर उनका प्रदर्शन व अर्चना की जाती है जिसके पश्चात इन्हें लपेटकर सुरक्षित रख दिया जाता है। लेह के बौद्ध मठ में आप इन विशाल चित्रों के लपेटने की विशेष प्रक्रिया भी देख सकते हैं।

आप हिमाचल के सभी लोकप्रिय पर्यटन स्थलों से इन चित्रों को क्रय कर सकते हैं।

थांका चित्रों को Amazon।in से क्रय करें।

दोरजे

दोरजे का उपयोग मुख्यतः ध्यान प्रक्रिया में किया जाता है। यह उस संगम का प्रतीक है जो हमारे दैनन्दिनी अनुभवों एवं उस अनुभव के मध्य होता है, जो हमें प्रकृति एवं अपने चारों ओर उपस्थित सभी जड़ व चेतन से एकाकार होकर जीवन व्यतीत करने से प्राप्त होता है। यह तांत्रिक बौद्ध परम्पराओं का प्रमुख यन्त्र है।

ध्यान में प्रयोग आने वाले दोरजे
ध्यान में प्रयोग आने वाले दोरजे

जहां तक हिमाचली स्मारिकाओं का प्रश्न है, आप इन्हें स्वयं के लिए ले सकते हैं तथा परिजनों को उपहार स्वरूप भी दे सकते हैं। पुरानी मनाली में खरीददारी करते समय आप इन्हें ले सकते हैं।

ध्यान प्रक्रिया के लिए दोरजे Amazon।in से लें।

हिमाचली आभूषण

भारत के प्रत्येक क्षेत्र के आभूषणों की अपनी अनूठी विशेषताएँ होती हैं। हिमाचल में आप चाँदी के बने अनेक प्रकार के आभूषण देखेंगे।

चांदी के आभूषण - हिमाचली स्मारिकाएं
चांदी के आभूषण – हिमाचली स्मारिकाएं

हिमाचल के कुछ विशेष आभूषण इस प्रकार हैं:

छाक – यह चाँदी का एक आभूषण है जिसे वे अपने सिर पर धारण करते हैं।

छीरी – यह माँगटीका के सामान दिखने वाला एक आभूषण होता है।

झुमका – कानों में धारण करने वाले इस विशेष प्रकार के आभूषण को आप सम्पूर्ण हिमाचल में देख सकते हैं।

चंदरहार – गले का हार, जिसमें लटकन भी होता है तथा जिसे विशेष आयोजनों में पहना जाता है।

टोके – कलाइयों में पहने जाने वाला आभूषण जिसे कभी नहीं उतारा जाता है।

पारी – यह पाँव के पायल का एक प्रकार है।

खाने में रूचि रखने वालों के लिये हिमाचली स्मारिकाएं

सेब – यदि आपको ताजे सेबों का आनंद उठाना हो तो आप अगस्त-सितम्बर के आसपास हिमाचल की यात्रा नियोजित करें। आप वृक्षों से लटकते सेबों को अपने हाथों से तोड़कर खा सकते हैं। हिमाचली सेब की गाथा पर लिखा हमारा संस्करण अवश्य पढ़ें।

हिमाचली फलों की टोकरी
हिमाचली फलों की टोकरी

सेबों के अतिरिक्त आप सेब की कैंडी, जैम, रस तथा गूदा भी क्रय कर सकते हैं।

नाशपाती – हिमाचल का यह दूसरा प्रसिद्ध फल है। यदि आप अगस्त-सितम्बर के आसपास हिमाचल की यात्रा करेंगे तब सेबों के साथ नाशपाती का भी आनंद उठा सकेंगे।

चिलगोजा – यह एक सूखा मेवा है जिसे हिमाचल के कुछ भागों में उगाया जाता है।

यह सूखा मेवा चीड़ के वृक्ष का फल है। पोषक तत्वों से भरपूर यह मेवा कुरकुरा तथा स्वाद में अखरोट के सामान होता है। चिलगोजों की ३० से अधिक विभिन्न प्रजातियाँ उपलब्ध हैं किन्तु उनमें से केवल ३ प्रकार के चिलगोजे ही मानव के लिए सुरक्षित हैं। चिलगोजा के दानों के ऊपर कड़ा छिलका होता है जिसे खोलकर ही दानों को खाया जाता है।

इन्हें क्रय करने के लिए सर्वोत्तम स्थान है, रिकांग पिओ का स्थानीय बाजार।

आलूबुखारे, खुरमा तथा काफल इत्यादि जैसे विशेष मौसमी फल भी इस क्षेत्र में उगते हैं जो अन्य स्थानों में कदापि उपलब्ध नहीं होते। अतः इनका स्वाद अवश्य चखें।

हिमाचली सिद्दू

सिद्दू एक विशेष हिमाचली व्यंजन है जो खाने की थाली को चार चाँद लगा देता है। इसे अत्यंत परिश्रम से बनाया जाता है। आटा में नमक, घी एवं यीस्ट मिलकर उसे खमीर उत्पन्न होने तक रखा जाता है। तत्पश्चात उनके गोले बनाकर भाप में पकाया जाता है। कई बार इन गोलों के भीतर भरावन भी भरी जाती है।

देसी घी डालकर इन्हें परोसा जाता है। यह एक प्रकार का भाप में पकाया हुआ डबल रोटी है। हिमाचल में आये पर्यटकों को हिमाचली खाने का स्वाद देने के लिए यह स्थानिक भोजनालयों में बहुधा उपलब्ध होता है।

काष्ठ कलाकृतियाँ – हिमाचली स्मारिकाएं

पहाड़ों का भ्रमण तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक आप वहां के कलाकारों द्वारा उत्कीर्णित काष्ठ कलाकृतियाँ ना देखें। शिमला में तो एक सम्पूर्ण बाजार है, लक्कड़ बाजार, जिसका अर्थ है, लकड़ी की वस्तुओं का बाजार।

यहाँ लकड़ी के खिलौने, चलने की छड़ी, शिमला के परिदृश्य, चाबी का गुच्छा, कलम दानी, रसोईघर की वस्तुएं, परोसने की थाली तथा अनेक अन्य प्रदर्शन की वस्तुएं उपलब्ध हैं। छड़ियाँ बनाने के लिए रौंस वृक्ष की लकड़ी का प्रयोग किया जाता है जो ऊपरी शिमला के बागी एवं खाद्रला क्षेत्र में पाया जाता है।

शिमला में हिमाचली स्मारिकाएं कहाँ से लें?

हिमाचल एम्पोरियम

शिमला में माल रोड पर हिमाचल एम्पोरियम स्थित है। यहाँ आप कांगड़ा रेशमी वस्त्र एवं किन्नौरी शाल के अनेक प्रकार देख सकते हैं। इस एम्पोरियम में स्थानिक रूप से निर्मित ऊनी वस्त्र, मिटटी के पात्र तथा आभूषण भी उपलब्ध हैं। इस भण्डार का संचालन हिमाचल प्रदेश की सरकार करती है। अतः यहाँ उपलब्ध कलाकृतियों की गुणवत्ता सत्यापित होती हैं। इसके अतिरिक्त इन वस्तुओं के मूल्य भी सब प्रकार के ग्राहकों के लिए वहन करने योग्य हैं।

लक्कड़ बाजार

यह एक सुन्दर बाजार है जहां अनेक प्रकार की काष्ठ कलाकृतियाँ उपलब्ध हैं। यहाँ से आप लकड़ी के खिलौने, कलम, चाबी के गुच्छे तथा अन्य स्मारिका वस्तुएं ले सकते हैं। इन दुकानों में आप भारी मोल-भाव कर सकते हैं। यह बाजार क्राइस्ट चर्च के बाईं ओर स्थित है। यह शिमला के पर्यटकों का प्रिय बाजार है।

लवी मेला में हिमाचली स्मारिकाएं

हिमाचल का प्रसिद्ध लवी मेला रामपुर में प्रत्येक वर्ष, कार्तिक मास में भरता है जो अंग्रेजी नवम्बर मास के आसपास पड़ता है। सदियों से यह मेला बुशहर रियासत एवं तिब्बत के मध्य व्यापार में सहायता करता रहा है।

मैदानी क्षेत्रों के लोग एवं व्यापारी गण इस मेले में तिब्बत से आयातित काष्ठ वस्तुएं, सूखे मेवे तथा जडी-बूटियाँ क्रय करते थे। उसकी एवज में उन्हें धान, वस्त्र तथा बर्तन इत्यादि विक्रय किये जाते थे। अतः यह एक प्राचीन मेला है जिसका सम्बन्ध वस्तुओं के क्रय-विक्रय से है। ‘नाटी नृत्य’ तथा अन्य अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रम इस मेले के प्रमुख आकर्षण हैं।

महासू यात्रा

शिमला-कोटखाई मार्ग से ६ किलोमीटर दूर महासू गाँव है। इस गाँव के समीप, प्रत्येक बैशाख मास के तीसरे मंगलवार के दिन से यह दो-दिवसीय मेला लगता है। यह भी एक प्राचीन मेला है। यह मेला दुर्गा देवी मंदिर के समक्ष लगता है जहां बड़ी संख्या में लोग आते है। यहाँ भी ‘नाटी नृत्य’ तथा अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। धनुर्विद्या सम्बंधित क्रीड़ाएं इस मेले के प्रमुख आकर्षण व मनोरंजन हैं। पूर्णतः हिमाचली स्मारिकाएं खरीदने के लिए यह एक उत्तम स्थान है।

आपकी प्रिय हिमाचली स्मारिकाएं कौन सी है? क्या आपने उन्हें हिमाचल के किसी स्थान से क्रय किया है? टिप्पणी खंड में अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें।

अमेजोन के सहयोगी के रूप में इस संस्करण में उल्लेखित वस्तुओं की अमेजोन द्वारा क्रय पर IndiTales को उसका अंश दिया जाता है।  

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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केरल के उपहार – भगवान के अपने देश से कौन से स्मृति चिन्ह साथ लाएं? https://inditales.com/hindi/kerala-ke-upahaar-kya-layen/ https://inditales.com/hindi/kerala-ke-upahaar-kya-layen/#respond Wed, 02 Mar 2022 02:30:24 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2605

केरल भारत का सर्वाधिक प्रिय पर्यटन स्थल है। केरल के निवासी इसे भगवान का अपना देश कहते हैं। देशी एवं विदेशी पर्यटकों में यह स्वप्निल पर्यटन स्थल के रूप में अत्यंत लोकप्रिय है। आप इतने मनमोहक राज्य में भ्रमण के लिए जाएँ तथा साथ में वहाँ की स्मृति को सदैव के लिए सँजोने के लिए […]

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केरल भारत का सर्वाधिक प्रिय पर्यटन स्थल है। केरल के निवासी इसे भगवान का अपना देश कहते हैं। देशी एवं विदेशी पर्यटकों में यह स्वप्निल पर्यटन स्थल के रूप में अत्यंत लोकप्रिय है। आप इतने मनमोहक राज्य में भ्रमण के लिए जाएँ तथा साथ में वहाँ की स्मृति को सदैव के लिए सँजोने के लिए कोई केरल के उपहार ना लाएं, यह केरल के प्रति अन्याय होगा।

मैंने अब तक केरल राज्य के विभिन्न क्षेत्रों के अनेक भ्रमण किए हैं। प्रत्येक भ्रमण के अंत में मेरे संग केरल की अनेक स्मृतियाँ वापिस आयीं हैं। कुछ मेरे मानसपटल को शोभित कर रही हैं तो कुछ मेरे एवं मेरे सगे-संबंधियों  के निवासस्थान को। उन्ही अनेक भ्रमणों से प्राप्त अनुभवों के आधार पर मैंने केरल की स्मृति चिन्हों पर इस संस्करण की रचना की है। किन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि मुझे केरल से संबंधित सर्व स्मारिकाओं को लाने का अवसर प्राप्त हो गया है। केरल की अनेक ऐसी वस्तुएं हैं जो मेरी ‘वहाँ से लाने वाली वस्तुओं की सूची’ में अभी भी शेष हैं।

केरल से कौन सी स्मारिकाएं क्रय करें? – एक दिशा निर्देश

केरल के मसाले

केरल के उपहार - मसाले
केरल के उपहार – मसाले

केरल मसालों के लिए अत्यंत प्रसिद्ध है। आप जब भी केरल का भ्रमण करेंगे तो किसी न किसी मसालों के बाग का दर्शन अवश्य करेंगे। आपको काली मिर्च की बेलें, इलायची के पौधे इत्यादि देखने का सुअवसर प्राप्त होगा। आपने भारत के इतिहास में भी पढ़ा होगा कि कैसे विश्व भर के यात्री समुद्र मार्ग से केरल के तट पर इन मसालों की चाह में ही उतरे थे। अतः केरल से कोई विशेष वस्तु अपने साथ लानी हो तो मसालों से बेहतर क्या होगा।

मसाले हमारे भोजन का अभिन्न अंग हैं। वह यदि उसके स्त्रोत स्थल से प्राप्त किया जाए तो इनकी गुणवत्ता अतुल्य हो जाती है। अतः आप बिना हिचक इन ताजे मसालों को अपने प्रयोग के लिए तथा सगे-संबंधियों के लिए ले सकते हैं।

मसालों में आप काली मिर्च, सफेद मिर्च, इलायची, लौंग, दालचीनी, जायफल इत्यादि ले सकते हैं। हो सकता है आपको वनीला की भी अच्छी फलियाँ मिल जाएंगी।

चाय मसाले तथा अन्य मिश्रण

यदि आप इन मूल मसालों से विशेष मिश्रण चूर्ण तैयार करते हैं तो मेरा सुझाव यही होगा कि आप पृथक पृथक मसाले क्रय कर उनसे मिश्रण स्वयं बनाएं। यदि आप बने बनाए समालों के मिश्रण क्रय करना चाहते हैं तो भी ले सकते हैं। चाय मसालों जैसे मसालों की छोटी छोटी शीशियाँ अत्यंत उपयोगी हैं। मसाले की गंध लिए इन अर्को की दो से तीन बूंदे चाय में डालकर आप इच्छित गंध व स्वाद प्राप्त कर सकते हैं। पर्यटकों में अदरक, तुलसी, पुदीना इत्यादि चाय मसालों के अर्क अत्यंत प्रसिद्ध हैं।

भोजन से प्रेम करने वालों के लिए केरल की स्मारिकाएं

केले के कुरकुरे कतले

जब आप केरल भ्रमण के लिए आएंगे, मेरा विश्वास है कि तब आप केले के कुरकुरे चिप्स अथवा कतलों को चबाते हुए ही पर्यटन स्थलों का आनंद लेंगे। क्यों ना हो? ये चिप्स केरल में सर्वत्र उपलब्ध हैं, वह भी ताजे ताजे कढ़ाई से निकले हुए। वे अनेक स्वादों में भी उपलब्ध हैं। आप उन्हे वहाँ भी खा सकते हैं तथा अपने साथ भी जितना चाहें ला सकते हैं।

केरल के प्रसिद्ध केले के चिप्स
केरल के प्रसिद्ध केले के चिप्स

आपके नगर में निवास करते केरल के किसी प्रवासी को यदि आपने ये चिप्स लाकर दिए तो वह आपको आशीषों  से सराबोर कर देगा।

कसावा (टैपियोका) के चिप्स

कसावा (टैपियोका) का सम्पूर्ण भारत में प्रयोग किया जाता है। आप सोच रहे होंगे कि यह मैं क्या कह रही हूँ। जी हाँ, आपने साबूदाना का नाम अवश्य सुना होगा। साबूदाना टैपियोका से ही बनाया जाता है। किन्तु इसके मूल से चिप्स केवल दक्षिण भारत में, विशेषतः केरल में बनाए जाते हैं। ये पतले कुरकुरे चिप्स किंचित कड़क होते हैं। इनका स्वयं का स्वाद अधिक नहीं होता। इन्हे नमक व मसाले डालकर स्वादिष्ट बनाया जाता है।

केले के चिप्स के समान आप ये चिप्स भी अपने साथ ले जा सकते हैं तथा परिजनों का मन जीत सकते हैं।

हलवा

केरल का यह सुप्रसिद्ध हलवा अनेक रंगों एवं स्वादों में आता है। कुछ हल्के रंगों के तथा कुछ गहरे रंगों के होते हैं। यह हलवा मेवों से भरा जेली के समान दिखता है। गहरे रंग के हलवे में गुड का प्रयोग किया जाता है तथा हल्के रंगों के हलवे में शक्कर का। अन्य सामग्री हैं चावल का आटा, नारियल, सूखे मेवे, इलायची इत्यादि। घी तथा सूखे मेवे से भरपूर यह हलवा किंचित गरिष्ट हो सकता है किन्तु इसका स्वाद अत्यंत सुंदर होता है।

आप हलवे के विभिन्न प्रकारों का स्वाद चखें तथा जो पसंद आ जाए वह अपने साथ अवश्य लाएं। इस सुझाव के लिए आप हमें धन्यवाद अवश्य देंगें।

केरल की चाय तथा कॉफी

आप जब भी मुन्नार जाएंगे तथा वहाँ के सुंदर चाय के बागानों के बीच पैदल सैर करेंगे तो आप वहाँ के  बागानों से स्थानीय चाय अवश्य क्रय करेंगे। मुन्नार की स्मारिका के लिए इससे अधिक उपयुक्त अन्य कोई वस्तु नहीं हो सकती। मेरा यह सुझाव है कि आप अपने मुन्नार भ्रमण के समय चाय के बागानों के साथ चाय के किसी कारखाने का अवलोकन अवश्य करें। जिस चाय को आप दिन में दो बार पीते हैं, वह कारखाने में कैसे तैयार होती है, यह देखना अत्यंत रोमांचक होता है। वे आपको चाय प्रोद्योगिकी के विभिन्न चरणों का विवरण देंगे तथा भिन्न भिन्न प्रकार के चाय की भी जानकारी देंगे। इस जानकारी तथा आपके स्वाद के आधार पर आप चाय की पत्ती का चयन कर सकते हैं।

यदि आप दक्षिण भारत के नागरिक नहीं हैं तो आप यहाँ से फ़िल्टर कॉफी भी क्रय कर सकते हैं। अन्यथा दक्षिण भारत में विभिन्न प्रकार की कॉफी के लिए भिन्न भिन्न स्थल हैं।

कलाकृतियों के रूप में स्मारिकाएं

भारत की दो विशेष शास्त्रीय नृत्य कला शैलियों तथा अनेक प्रकार की लोक कला शैलियों का संबंध केरल से है। आप केरल के किसी भी भाग में भ्रमण करें आपको इनकी झलक किसी ना किसी रूप में अवश्य दृष्टिगोचर हो जाएगी।

कथकली मुखौटे

कथकली मूलतः केरल की शास्त्रीय नृत्य शैली है जो अपने विस्तृत साज-श्रंगार तथा रंग-बिरंगे मुखौटों के लिए प्रसिद्ध है। नर्तकों को अपने अलंकरण तथा विस्तृत वेशभूषा में सज्ज होने के लिए घंटों व्यतीत करने पड़ते हैं। तब जाकर वे मंच पर प्रदर्शन करने के लिए उतरते हैं जहाँ वे अत्यंत भारी वेशभूषा व मुखौटे धारण कर नृत्य करते हैं।

कथकली के मुखौटे - केरल के उपहार
कथकली के मुखौटे

यदि आपको उनके साज-सज्जा कक्ष में जाने का अवसर प्राप्त हो तो आप उनके इस कष्टदायी अलंकरण को देख सकते हैं। तब आप उनके नृत्य की अधिक न्यायपूर्वक सराहना कर सकते हैं। आप नर्तकों के नृत्य एवं उनकी वेशभूषा से इतने प्रभावित हो जाएंगे कि उनकी स्मृति में एक कथकली मुखौटा अवश्य ले लेंगे। कथकली मुखौटे भिन्न भिन्न वस्तुओं से तथा भिन्न भिन्न आकार के बनाए जाते हैं। मैंने अपने लिए एक मुखौटा नारियल की जटा द्वारा बनवाया था। छोटे से छोटा मुखौटा यदि लें तो वह चाबी के छल्ले के रूप में होता है।

नेट्टिपट्टम

केरल हाथियों अथवा गजों का प्रदेश है। प्राचीन काल में मानव एवं गज आपस में शांतिपूर्वक जीवन जीते थे। ये गज मंदिरों के अभिन्न अंग होते थे। मंदिरों के उत्सवों में इन्हे विस्तृत रूप से अलंकृत किया जाता था। उनके मस्तक पर जो विस्तृत अलंकरण होता था उसे नेट्टिपट्टम कहा जाता है। उसे सूक्ष्मता से उत्कीर्णित किया जाता था। संग्रहालय में आप इस प्रकार के प्राचीन नेट्टिपट्टम देख सकते हैं।

नेट्टीपट्टम - गज श्रृंगार
नेट्टीपट्टम – गज श्रृंगार

इन्ही नेट्टिपट्टम के लघु अवतार केरल भ्रमण पर आए पर्यटकों के प्रिय स्मारिकाएं हैं। आप प्रत्येक स्मारिका दुकान में सुव्यवस्थित प्रकार से प्रदर्शित इन नेट्टिपट्टम की अनेक पंक्तियाँ देखेंगे। पारंपरिक रूप से ये नेट्टिपट्टम सुनहरे रंग के होते हैं जिन्हे लाल रंग से बांधा जाता है। इनके निचले भाग पर घंटियाँ लटकती हैं।

कई पर्यटक यही नेट्टिपट्टम केरल की स्मृति के रूप में ले जाते हैं तथा अपने भवन एवं गाड़ियों को सजाते हैं। यदि आप इस समय केरल भ्रमण की योजना नहीं बना रहे हैं तो आप इन्हे अमेजॉन से भी ले सकते हैं।

नेट्टूर पेट्टी  

नेट्टूर पेट्टी एक पारंपरिक जवाहरात की पेटी है। लकड़ी की बनी इस पेटी पर पीतल द्वारा नक्काशी की जाती है। कुछ पेटियों पर चित्रकारी भी देखने को मिलती है। नेट्टूर पेट्टी अन्य जवाहरात पेटियों से अपने आकार के कारण भिन्न प्रतीत होती है। इसका आधार आयताकार होता है किन्तु इसका ऊपरी भाग लगभग शुंडाकार होता है। इस के ऊपर पीतल की एक कड़ी होती है। इसका सम्पूर्ण आकार मुझे किसी मंदिर के लघु प्रतिरूप के समान प्रतीत होता है।

मनमोहक नेत्तूर पेटी
मनमोहक नेत्तूर पेटी

नेट्टूर पेट्टी को अपने घर पर रखना हो तो इसके लिए विशेष स्थान का प्रयोजन करना होगा। मेरी इच्छा है कि मैं भी एक नेट्टूर पेट्टी अपने घर पर रखूँ जिसमें मैं अपने लधु कलाकृतियों को सहेज कर रखूँ तथा अपने परिजनों को दिखाऊँ।

नेट्टूर पेट्टी के कुछ सुंदर संग्रह इस वेबस्थल पर देखें।

भित्तिचित्र

केरल के मंदिरों में एक विशेष प्रकार की चित्रकला शैली दृष्टिगोचर होती है। उनमें नारंगी रंग के अनेक उतार-चढ़ाव होते हैं। इससे पूर्व मैंने इस प्रकार के भित्तिचित्र त्रिवेंद्रम के पद्मनाभस्वामी मंदिर तथा कलदी के मंदिरों में देखा था।

केरल शैली में सरस्वती का भित्तिचित्र - केरल के उपहार
केरल शैली में सरस्वती का भित्तिचित्र – केरल के उपहार

आप केरल की स्मारिका के रूप में इन भित्तिचित्रों के प्रतिरूप तथा उसी शैली में रचित अन्य आधुनिक चित्र ले सकते हैं। यहाँ एक प्रदर्शनी से मैंने लकड़ी के कुछ छोटे आभूषण खरीदे थे जिन पर इसी केरल भित्तिचित्र शैली में चित्रकारी की हुई थी। मैं जब भी उन्हे धारण करती हूँ, वे मुझे केरल के मंदिरों में पहुँचने का आभास प्रदान करते हैं। इसीलिए ये आभूषण मुझे अत्यंत प्रिय हैं। मुझे प्रसन्नता है कि केरल में अब भी अनेक कारीगर हैं जो इस कला शैली को जीवंत व सम्पन्न रखे हुए हैं।

लकड़ी की नौकाएं

काष्ठ की नौकाएं - केरल के उपहार
काष्ठ की नौकाएं – केरल के उपहार

संकरी लंबी सर्प नौकाएं केरल की विशेष पहचान हैं। प्रत्येक वर्ष अनेक सर्प नौकाएं वार्षिक सर्प-नौका दौड़ में भाग लेती हैं। शेष समय ये केरल के अप्रवाही जल में लंगर डाले रहती हैं। आप जब अप्रवाही जल में नौका विहार के लिए जाएंगे तब आप ऐसी कई नौकाओं को देख सकते हैं। अनेक उच्च-स्तरीय अतिथिगृह एवं रिज़ॉर्ट ऐसी नौकाओं को केरल की परंपरा प्रदर्शित करने के लिए प्रयोग करते हैं। हाँ, इतनी बड़ी नौका तो आप क्रय कर अपने घर पर नहीं रख सकते। किन्तु आप इनके लघु प्रतिरूप अवश्य ले जा सकते हैं।

मैंने भी नौका का एक प्रतिरूप यहाँ से लिया था जिसे मैंने अपने घर में प्रदर्शित कर रखा हुआ है। इसके भीतर मैंने केरल के ही खड़े मसाले रखे हैं। दोनों ही केरल की विशेष सौगात हैं।

नारियल के कवच से बनी कलाकृतियाँ

यूँ तो नारियल के कवच से बनी कलाकृतियाँ आप भारत के सभी तटीय क्षेत्रों में देखेंगे, किन्तु प्रत्येक क्षेत्र की कलाकृतियों तथा इन की कलाशैली में भिन्नता होती है। केरल से आप नारियल के कवच से बनी अनेक प्रकार की कलाकृतियाँ तथा पात्र स्मारिका के रूप में ले सकते हैं। पर्यावरण के अनुकूल यह एक उत्तम उपहार होगा।

सीपियों एवं शंखों से बनी कलाकृतियाँ

प्रत्येक छोटे-बड़े स्मारिका दुकानों में आप सीपियों एवं शंखों से बनी अनेक कलाकृतियाँ देखेंगे। कारीगर सीपियों तथा शंखों का प्रयोग कर अत्यंत सुंदर कलाकृतियाँ एवं पात्र बनाते हैं। एक ओर सीपियों एवं शंखों को समुद्र तटों से अन्यत्र ले जाना पर्यावरण के लिए हानिकारक है, वहीं दूसरी ओर उनसे निर्मित ये कलाकृतियाँ अनेक छोटे कलाकारों एवं व्यापारियों के जीवन-यापन का साधन भी हैं। अतः इन कलाकृतियों के क्रय का अंतिम निर्णय आपको ही लेना होगा।

पारंपरिक कसवू साड़ियाँ

यदि आप केरल के किसी माता एवं बहन का स्मरण करें तो आप मोतिया रंग की काठ वाली साड़ी धारण की हुई किसी भद्र स्त्री की छवि देखेंगे। ये साड़ियाँ केरल की पारंपरिक कसवू साड़ियाँ हैं। ये साड़ियाँ दो प्रकार की होती हैं। पहली सामान्य ५ गज की साड़ी होती है। कसवू साड़ी का दूसरा प्रकार है मुन्डु, जो तीन टुकड़ों में धारण किया जाता है। यहाँ आप कसवू साड़ियों के कुछ अप्रतिम नमूने देख सकते हैं।

मोहिनी अट्टम नृत्य में कसवू साडी
मोहिनी अट्टम नृत्य में कसवू साडी

अधिकतर कसवू साड़ियाँ हथकरघे पर बुनी जाती है। कुछ साड़ियों में शुद्ध सोने की काठ होती है। यदि क्षमता हो तो ये साड़ी एक अतुल्य उपहार सिद्ध हो सकती है। अन्य कसवू साड़ियाँ भिन्न भिन्न प्रकार की तथा विस्तृत मूल्य सीमा में उपलब्ध हैं। पत्नी, माता   एवं बहनों के लिए यह सर्वोत्तम उपहार है। आधुनिकता ने यहाँ भी प्रवेश करना आरंभ कर दिया है। अब आप इन साड़ियों में बूटियों तथा काठ व पल्लू में रंगों का समावेश भी देख सकते हैं। किन्तु प्राधान्यता सदैव सुनहरे एवं मोतिया रंग की ही होती है।

कसवू में पुरुषों के लिए भी मुन्डु उपलब्ध है जो दो भागों में होता है।

आरमल कन्नाडी

आपने कभी चिंतन किया है कि कांच के दर्पणों के आविष्कार से पूर्व लोग अपनी छवि कहाँ देखते थे? इसका उत्तर है धातुई दर्पण। हाथों से बने ये दर्पण ना केवल छवि देखने में सहायक होते थे, अपितु अप्रतिम कलाशैली के द्योतक भी होते थे। केरल में अरणमूल नामक एक नगर है जहाँ इस प्रकार के धातुई दर्पण बनाए जाते हैं। स्थानीय मान्यता है कि वैदिक काल से ऐसे धातुई दर्पणों का प्रयोग किया जा रहा है। कुछ किवदंतियों में इन्हे पार्वती का दर्पण भी कहा गया है।

आरमल कन्नाडी - धातु दर्पण
आरमल कन्नाडी – धातु दर्पण

यह उत्तम चमकदार दर्पण जिस धातु से निर्मित किया जाता है वह एक मिश्र धातु है। दर्पण को धातु के भिन्न भिन्न आकार के चौखट में मड़ा जाता है तथा उन्हे सुंदरता से उत्कीर्णित किया जाता है।

आरमल कन्नाडी केरल की अप्रतिम स्मारिका है किन्तु यह एक मितव्ययी वस्तु नहीं है। इसका मूल्य ३०००/- रुपयों से आरंभ होता है। इनके कुछ नमूने आप अमेजॉन में देख सकते हैं।

जूट के उत्पाद

नारियल के रेशे से रस्सी
नारियल के रेशे से रस्सी

जूट की वस्तुएं बनाना केरल का एक विशाल लघु-उद्योग है। इनमें नरियाल के ऊपर की जटाओं का प्रयोग किया जाता है। जब आप अप्रवाही जल में नौका विहार पर जाएंगे, तब आप अनेक लोगों को इस उद्योग में संलग्न पाएंगे। नारियल की जटाओं को अप्रवाही जल में कई दिनों तक भिगोकर सुखाया जाता है। इससे वे जूट तैयार करते हैं। इस जूट से वे रस्सी, चटायी, टोकरी, थैली, गृहसज्जा की वस्तुएं तथा कलाकृतियाँ बनाते हैं। ये केरल की अप्रतिम स्मारिकाएं हैं।

केरल के उपहार अथवा स्मारिकाओं की सूची तैयार करते समय यदि मुझसे कोई वस्तु छूट गई हो तो इससे मुझे अवश्य अवगत कराएं। अपनी प्रतिक्रिया निम्न टिप्पणी खंड में लिखें। प्रतीक्षारत।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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जयपुर राजस्थान जाएँ तो क्या क्या खरीद कर लायें? https://inditales.com/hindi/jaipur-rajasthan-shopping-guide/ https://inditales.com/hindi/jaipur-rajasthan-shopping-guide/#comments Wed, 24 Feb 2021 02:30:47 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2208

खरीददारी हेतु मेरे प्रिय स्थलों की सूची में जहां एक ओर पुरानी दिल्ली के बाजार हैं तो दूसरी ओर जयपुर के बाजारों का भी प्रमुख स्थान है। विभिन्न रंगों से परिपूर्ण जयपुर के बाजार आपको अनायास ही अपनी ओर आकर्षित करते हैं। जयपुर के बाजार वस्त्रों, परिधानों, चादरों, रजाइयों, आभूषणों, कठपुतलियों इत्यादि से भरे हुए […]

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खरीददारी हेतु मेरे प्रिय स्थलों की सूची में जहां एक ओर पुरानी दिल्ली के बाजार हैं तो दूसरी ओर जयपुर के बाजारों का भी प्रमुख स्थान है। विभिन्न रंगों से परिपूर्ण जयपुर के बाजार आपको अनायास ही अपनी ओर आकर्षित करते हैं। जयपुर के बाजार वस्त्रों, परिधानों, चादरों, रजाइयों, आभूषणों, कठपुतलियों इत्यादि से भरे हुए हैं। अपनी जयपुर यात्रा के समय आप इनमें से इच्छित वस्तुएं स्मृति चिन्ह स्वरुप ले जा सकते हैं। चूंकि जयपुर एक अत्यंत सुनियोजित नगरी है, इसकी गुलाबी गलियों में घूमते, खरीददारी करने का आनंद कुछ और ही है।

जयपुर में क्या खरीदें जयपुर में पारंपरिक एवं आधुनिक संस्कृति का अद्भुत संगम है। जहां एक ओर पारंपरिक हाट बाजार हैं तो दूसरी ओर ‘अनोखी’ तथा ‘सोमा’ जैसे स्वयं के ब्रांड भी हैं जहां आधुनिकता की ओर परिवर्तित होती संस्कृति के भी दर्शन होते हैं।

संक्षेप में यह कहना उचित होगा कि यदि आप जयपुर से स्मृति चिन्ह  ले जाना चाहें तो आपकी झोली चटक रंगों में रंगी परंपरागत, साथ ही उपयोगी वस्तुओं से भर जायेगी।

जयपुर जाएँ तो क्या लायें खरीद कर

प्रस्तुत है जयपुर में खरीदने योग्य सर्वोत्कृष्ट वस्तुओं की मेरी सूची-

लहरिया साड़ी

राजस्थान की प्रसिद्द लहरिया साडी
राजस्थान की प्रसिद्द लहरिया साडी

लहरिया एक अभिकल्पना है जिसकी व्युत्पत्ति लहर शब्द से हुई है। लहरिया साड़ियों में इसी लहर के आकार की रूपरेखा है जिसमें कम से कम दो रंगों का उपयोग किया जाता है। एक साड़ी का मूल रंग होता है तथा दूसरे रंग द्वारा इस पर अनियमित तिरछी पट्टियां रंगी जाती हैं जो लहरों का आभास कराती हैं। यह रूपरेखा साड़ियों पर अत्यंत मनमोहक प्रतीत होती है। लहरिया साड़ियाँ हर संभव रंग संयोजन एवं हर संभव प्रकार के मूलवस्त्रों में उपलब्ध हैं। फलतः यह हर संभव मूल्य सीमाओं में उपलब्ध है। २००/- रुपये मल्य की सादी लहरिया साड़ियों से लेकर २०,०००/- रुपये मूल्य तक की जार्जेट अथवा क्रेप की लहरिया साड़ियाँ यहाँ उपलब्ध हैं।

 साड़ी लेने करने की इच्छा न हो तो आप लहरिया दुपट्टा भी ले सकती हैं।

पाश्चात्य परिधान धारण करने की इच्छा रखने वाले, इसे स्टोल की तरह ओढ़ कर अपने परिधान की शोभा बढ़ा सकते हैं।

लहरिया वस्त्र आप जयपुर के किसी भी बाजार से क्रय कर सकते हैं। जौहरी बाजार एवं बापू बाजार उनमें से दो प्रसिद्ध बाजारों के नाम हैं।

बांधनी कार्य से सजी वस्तुएं

बांधनी या पुलकबंद
बांधनी या पुलकबंद

बांधनी राजस्थान की प्रमुख कला शैलियों में से एक है। यह राजस्थान की पहचान है। बांधनी अथवा बन्देज एक थका देने वाली लंबी प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया के अंतर्गत, वस्त्र पर वांछित अभिकल्प प्राप्त करने हेतु योग्य स्थानों पर थोड़े थोड़े भागों को बांधा जाता है और मनचाहे रंग से रंगा जाता है। सूखने के पश्चात जब धागों को खोला जाता है तब बंधे स्थानों को छोड़, अन्य स्थान नवीन रंग में रंग जाते हैं। इसी तरह वस्त्रों पर मनचाही आकृति तैयार की जाती है। सरल तथापि मनमोहक छवि प्राप्त करने के पश्चात ही हमें इसके पीछे उठाये गए कष्ट का मूल्य ज्ञात होता है। बांधनी का एक प्राचीन नाम पुलकबंद भी है।

क्या आप जानते हैं कि यह बांधनी शैली अजंता के चित्रों में भी दृष्टिगोचर होते हैं।

बांधनी हर संभव रंग तथा हर संभव रूपरेखा में उपलब्ध हैं जो आप सब के भिन्न भिन्न रूचियों पर खरा उतरने में सक्षम है। मेरा सुझाव है कि बने बनाए परिधानों के स्थान पर, बांधनी वस्त्र खरीदें एवं अपनी इच्छानुसार उसे भिन्न भिन्न परिधानों में परिवर्तित करें।

बांधनी वस्त्रों एवं परिधानों के अंतर्गत पुरुषों हेतु बंधनी की पगड़ियां उत्तम स्मृतिचिन्ह हो सकते हैं।

बांधनी वस्त्र एवं परिधान आप जौहरी बाजार, बापू बाजार या इस तरह के किसी भी अन्य बाजार से खरीद सकते हैं।

जयपुर की मीनाकारी

बांधनी की तरह मीनाकारी भी जयपुर की प्रमुख कला शैलियों में से एक है जहां धातु पर रंगों से चित्रकारी की जाती है। जयपुर की मीनाकारी, झुमके एवं लोलक जैसे आभूषणों के साथ साथ विभिन्न कलाकृतियों की सुन्दरता को भी चार चाँद लगा देती है। परम्परागत रूप से मीनाकारी केवल लाल एवं हरे रंग में ही की जाती थी। यद्यपि वर्तमान में अन्य रंगों का भी प्रयोग किया जाता है। नीले एवं गुलाबी जैसे लुभावने रंगों में भी मीनाकारी वस्तुएं उपलब्ध हैं।

मीनाकारी से बने मोर
मीनाकारी से बने मोर

अतः ये भव्य एवं हलके वजन के आभूषण जयपुर के सर्वोत्कृष्ट स्मृतिचिन्ह हो सकते हैं।

जयपुर में उपलब्ध गुलाबी मीनाकारी की वस्तुओं के सम्बन्ध में उल्लेख करना चाहूंगी कि यह गुलाबी मीनाकारी मूलतः वाराणसी की देन है। वाराणसी में गुलाबी मीनाकारी पर व्यापक कार्य किया जाता है।

मीनाकारी वस्तुओं में मेरी व्यक्तिगत पसंद है छोटी छोटी चटक रंगों में रंगी धातु की कलाकृतियाँ। मीनाकारी में बनी मोर की प्रतिमा अत्यंत मनमोहक है। गणेश की एक प्रतिमा ने मेरा मन इतना मोह लिया कि मैंने जयपुर की मीनाकारी के स्मृतिचिन्ह के रूप में उसे ही चुन कर अपने साथ ले आयी।

कुंदनकारी

कुंदन बिना तराशी मणियों द्वारा निर्मित आभूषण है जो मूलतः राजस्थान के राजपरिवारों की स्त्रियों में अत्यंत प्रचलित थे। बिना तराशी एवं अनियमित आकार की मणियों को सोने में जड़कर आकर्षक आभूषण निर्मित किये जाते हैं। श्वेत पारदर्शी मणि एवं सोने के सुनहरे रंग का संयोजन प्रायः त्वचा की हर रंगत को निखारने में सक्षम है। बड़े आकार की इन मणियों से निर्मित कुंदन आभूषण सामान्य व्यक्ति को भी राजसी आभा प्रदान कर देती हैं।

कुंदन या पोलकी के गहने
कुंदन या पोलकी के गहने

मेरे व्यक्तिगत मतानुसार दैनिक उपयोग हेतु कुंदन आभूषणों का वजन अनुकूल नहीं है। यद्यपि विवाह समारोह जैसे सुअवसरों में धारण करने हेतु यह भव्य आभूषण है। भारतीय पारंपरिक परिधान, साड़ी एवं लहंगे के साथ इनका मेल सर्वोत्कृष्ट है।

जयपुर के कुंदन हारों की एक और विशेषता यह है कि इसके उलटी बाजू में मीनाकारी की जाती है। अतः आप इसे उल्टा भी धारण कर सकते हैं। अर्थात् आभूषण एक, रूप अनेक!

मुझे कुंदनकारी अत्यंत आकर्षित करती हैं किन्तु वजन अधिक होने के कारण इसे धारण करने में मुझे किंचित असुविधा होती है। मेरी तीव्र अभिलाषा है कि कोई हलके वजन के कुंदन आभूषणों की शीघ्र रचना करे।

आप इन्हें अमेज़न पर भी देख सकते हैं

रत्न जवाहरात

जमुनिया या जंबू मणि - उपरत्न
जमुनिया या जंबू मणि – उपरत्न

जयपुर अपने रत्नों के व्यापार हेतु जग प्रसिद्ध है। हवामहल के समीप स्थित जौहरी बाजार की गलियों में भ्रमण करते समय आपको जयपुर के रत्नों के खजाने के दर्शन होंगे। यहाँ कई दुकानें हैं जहां से आप भिन्न भिन्न प्रकार के रत्नों खरीद सकते हैं। मेरा सुझाव है कि यहाँ आप मोलभाव करने के पश्चात ही खरीदें। जयपुर एक पर्यटन नगरी है। अतः यहाँ वस्तुओं की विक्री उन्हें ध्यान में रख कर ही की जाती है। इसके फलस्वरूप दुर्भाग्य से रत्नों के मूल्य अपेक्षाकृत अधिक दर्शाए जाते हैं।

घेवर – जयपुर का सर्वोत्कृष्ट मिष्ठान

घेवर
घेवर

घेवर जयपुर का पारंपरिक मिष्ठान है जिसे परंपरा अनुसार वर्षा ऋतु में आने वाले तीज के त्यौहार के अवसर पर बनाया जाता था। इस अवसर पर उपवास करती पुत्रियाँ एवं पुत्रवधुओं हेतु यह मिठाई भिजवाई जाती थी। इसके स्वादिष्ट स्वाद के कारण वर्तमान में जयपुर में यह प्रत्येक ऋतु में बनाई एवं बेची जाती है।

यदि आप मीठी वस्तुएं कम खाते हों तब भी आप इसका स्वाद अवश्य चखिए। जयपुर में निर्मित घेवर का स्वाद सर्वोत्कृष्ट है। मीठा पसंद करने वाले आपके परिवारजनों, रिश्तेदारों एवं मित्रों हेतु यह एक स्वादिष्ट स्मृति चिन्ह हो सकते हैं।

चूरमा

आपने राजस्थान के प्रसिद्ध दाल बाटी और चूरमा के विषय में अवश्य सुना होगा। यही चूरमा अब जयपुर में सुन्दर एवं सुडौल डब्बों में बंद कर बेचे जाते हैं जिसे आप आसानी से अपने संग ले जा सकते हैं। इसके विषय में जितना मुझे ज्ञान है, उसके अनुसार यह कई दिनों तक ताजा बना रहता है। घेवर के विपरीत इसे कई दिनों तक रखा जा सकता है।

चूरमा को स्वादिष्ट एवं पाचक बनाने हेतु पर्याप्त मात्र में घी का उपयोग किया जाता है। जिव्हा को आनंदित करने वाल चूरमा कदाचित अधिक सेवन करने पर वजन संयम में घातक हो सकता है।

कठपुतलियां

राजस्थान में आप कहीं भी जाएँ, आपको कठपुतली का नृत्य देखने का अवसर अवश्य प्राप्त होगा। फिर वह बड़े बड़े सितारा होटलों में भव्य प्रदर्शन हो या रंगशाला का सार्वजनिक प्रदर्शन अथवा गली गली के छोटे छोटे प्रदर्शन। इसी कड़ी में जयपुर में भी कठपुतली के नृत्य का प्रदर्शन कई स्थानों में किया जाता है। जयपुर नगरी में आप कहीं भी भ्रमण करें, कठपुतली विक्रेता आपको कठपुतली बेचने आपके समक्ष प्रस्तुत हो जाते हैं।

मनभावन कठपुतलियाँ
मनभावन कठपुतलियाँ

मेरे मतानुसार ये कठपुतलियाँ गृहसज्जा में अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती हैं। घरों के प्रवेशद्वार पर रंगबिरंगी कठपुतलियाँ अतिथियों का स्वागत कर उनका मन प्रसन्न कर देती हैं। इसके अलावा आपके घर के नन्हे मुन्नों हेतु ये मनपसंद खिलौने हो सकते हैं। यहाँ तक कि आप उन्हें प्रेरित कर सकते हैं कि वे इन कठपुतलियों द्वारा स्वयं नृत्य नाटिका तैयार करें।

कठपुतलियों की एक जोड़ी का मूल्य १०० रुपये से आरम्भ होता है। अतः अत्यंत उपयोगी, मनोरंजक फिर भी कम मूल्य की ये कठपुतलियाँ आपके प्रियजनों हेतु उत्तम उपहार हो सकती हैं।

ठप्पा छपाई की चादरें

सांगानेर एवं बागरू की ठप्पा छपाई अपने उत्कृष्ट नमूनों एवं रूपरेखा के लिए प्रसिद्ध है। कई वर्षों पूर्व मैंने सांगानेर का दौरा किया था। उस समय मैंने वहां से ठप्पा छपाई से सजी चादरें खरीदी थीं जिसका उपयोग मैं आज भी करती हूँ। अतः सांगानेर की स्मृति मेरे मानसपटल में सदैव उपस्थित रहती है। जयपुर के अपने इस दौरे के समय जब मैंने आमेर किले के निकट ‘अनोखी संग्रहालय’ के दर्शन किये, वहां प्रदर्शित सांगानेर नगरी का नक्शा देख मन गदगद हो उठा।

ठप्पा छपाई का काम
ठप्पा छपाई का काम

आप जयपुर से, ठप्पा छपाई से अलंकृत चादरें अथवा कपड़े खरीद सकते हैं। इसकी खरीदी हेतु सर्वोत्तम स्थल सांगानेर ही है जहां आप खरीदी के साथ साथ छपाई का कार्य भी प्रत्यक्ष देख सकते हैं।

आप यह छपाई का कार्य स्वयं अपने घर पर भी कर सकते हैं। आपको केवल मनपसंद ठप्पे की आवश्यकता होगी। अतः आप स्वयं अथवा किसी कलाप्रेमी परिजन हेतु यह ठप्पे खरीदकर ले जा सकते हैं।

जयपुरी रजाईयाँ

जयपुरी रजाइयों के सम्बन्ध में सर्व विदित है कि यह रजाईयाँ हलके वजन के नर्म मुलायम कपास से बनी होती हैं। यह इतनी हलकी होती हैं कि इन्हें तह लगाकर एक छोटे बक्से में भी रखा जा सकता है। हमें जब भी किसी परिजन द्वारा जयपुर भ्रमण किये जाने की सूचना प्राप्त होती है, हमारे मन में जयपुरी रजाई की उम्मीद हिलोरे मारने लगती हैं। यद्यपि मेरे स्वस्थल गोवा में इसकी आवश्यकता नहीं होती, तथापि उत्तरी भारत में कई वर्षों के निवास के समय मैंने यहाँ की कड़ाके की ठण्ड का सामना इन्ही नर्म, गर्म एवं मुलायम रजाईयों की सहायता से किया था। वर्तमान में यह रजाईयां सूती के साथ साथ कई प्रकार के वस्त्रों के आवरण सहित उपलब्ध हैं। यद्यपि मेरी व्यक्तिगत रूचि मुलायम सूती आवरण सहित रजाईयों में है।

रंगों के सम्बन्ध में भी मेरी रूचि पारंपरिक श्वेत एवं नीलवर्ण अथवा श्वेत एवं गुलाबी रंग की छपाई में है। यह रजाईयां जयपुर के प्रत्येक बाजार में उपलब्ध हैं।

जयपुर की ‘ब्लू पॉटरी’

जयपुर में प्रसिद्ध चीनी मिटटी पर नीली चित्रकारी अर्थात् ‘ब्लू पॉटरी’ मूलतः जयपुर की कलाशैली नहीं है। गोवा की अजुलेजो टाइलों  की तरह ब्लू पॉटरी भी भारतीय कला ना होते हुए, शनैः शनैः जयपुर की मौलिक कला शैली में परिवर्तित हो गयी। जयपुर में इस कला से बर्तन इत्यादि बनाने के कई कार्यशालाएं हैं। इनमें से एक कार्यशाला के दर्शन का सौभाग्य मुझे भी प्राप्त हुआ। आमेर रास्ते पर, जैन मंदिर के निकट स्थित जयपुर ब्लू पॉटरी कला केंद्र में मैंने इस कला का प्रत्यक्ष नमूना देखा। यह केंद्र इस कला पर एक लघु प्रदर्शन पर्यटकों हेतु आयोजित करता है। तत्पश्चात वे अपनी दुमंजिले प्रदर्शन कक्ष में भ्रमण की अनुमति प्रदान करते हैं।

मैंने देखा कि यह केंद्र रंगबिरंगे पात्रों से भरा पड़ा था। नीले एवं पीले रंगों का प्रयोग अधिक किया गया था। बर्तन, कढ़ाई, साबुनदानी, आभूषण, और यहाँ तक कि शतरंज की तरह खेलों के मंच भी यहाँ उपलब्ध हैं।

मेरे मित्रों ने मुझे पहले ही अनेक ब्लू पॉटरी की वस्तुएं भेट स्वरुप दी हैं। अतः मैंने केवल ब्लू पॉटरी में बने झुमके ही खरीदे।

लाख की चूड़ियाँ

भारत के प्रत्येक क्षेत्र में भिन्न भिन्न परंपरागत शैलियों में चूड़ियाँ बनायी जाती हैं। फिरोजाबाद में कांच की चूड़ियाँ, हैदराबाद में चमचमाते कांच के टुकड़ों से सज्ज लाख की चूड़ियाँ ऐसे ही कुछ उदाहरण हैं। जयपुर में भी लाख की चूड़ियाँ बनायी जाती हैं। यद्यपि उन्हें कुन्दनकारी से सजाया जाता है। पारंपरिक लाख की चूड़ियाँ लाल एवं हरे जैसे शुभ रंगों में उपलब्ध हैं।

भिन्न भिन्न रंगों एवं मापों में उपलब्ध ये चूड़ियाँ आपको चुनाव का सम्पूर्ण अवसर देती हैं। पतली चूड़ियों से लेकर भारी मोटे कड़ों से जयपुर के बाजार अलंकृत हैं जो प्रत्येक स्त्री अथवा कन्या की रूचि पर खरी उतरती हैं। आप ये चूड़ियाँ ऐसे ही किसी भी बाजार से ले सकती हैं।

लाख की चूड़ियाँ अमेज़न पर भी खरीद सकते हैं

जयपुरी गलीचे

जयपुर में ऊन एवं रेशमी धागों से आकर्षक गलीचे अथवा कालीन हाथ से बुने जाते हैं। भारत से हाथ से निर्मित सर्वाधिक निर्यातित वस्तुओं में जयपुर के यह प्रसिद्ध गलीचे भी सम्मिलित हैं। इन गलीचों की गुणवत्ता प्रति सेन्टीमीटर गाठों की संख्या से आंकी जाती है। अधिक गाठें अपेक्षाकृत श्रेष्ठ गुणवत्ता दर्शाती हैं तथा गलीचों को अपेक्षाकृत अधिक मूल्यवान बनाती हैं।

जयपुर के गलीचे
जयपुर के गलीचे

ऊष्ण प्रदेशों में रेशमी गलीचे तथा शीत प्रदेशों हेतु ऊनी गलीचे उपयुक्त हैं। गलीचे खरीदते समय इसका ध्यान रखना आवश्यक है।

गलीचे भी आपको जयपुर के किसी भी बाजार में प्राप्त हो जायेंगे। यद्यपि प्रमाणिक गुणवत्ता एवं सही मूल्य के गलीचों हेतु राष्ट्रीय हथकरघा भण्डार सर्वोत्तम स्थान है।

राजस्थानी लघु चित्रकारी

सम्पूर्ण राजस्थान अपनी लघु चित्रकारी हेतु प्रसिद्ध है। यहाँ कई संस्थान हैं जहां लघुचित्रकारी का ज्ञान प्रदान किया जाता है। इन लघु चित्रों की मूल प्रति अत्यंत मूल्यवान होते हुए हम में से कुछ की पहुँच से परे हो सकते हैं। यद्यपि पुराने सरकारी कागज़ पर बने लघु चित्र सस्ते दामों में उपलब्ध हैं। इन चित्रों के अन्य विकल्प हैं, संगमरमर के पट्ट पर की गयी लघु चित्रकारी अथवा रत्नों की धूलि से बने चित्र।

यदि आप देखना चाहें कि यह लघु चित्रकारी कैसे की जाती है, तो यह देखें।

रंगबिरंगी चमड़े की चप्पलें

रंग बिरंगी चमड़े की चप्पलें
रंग बिरंगी चमड़े की चप्पलें

रंगबिरंगे राजस्थान के रंग केवल वस्त्रों, रजाईयों अथवा गलीचों तक ही सीमित नहीं हैं। राजस्थान में निर्मित चप्पलें भी भिन्न भिन्न चटक रंगों में उपलब्ध हैं। आप चाहें तो रंगबिरंगी परन्तु सादी चप्पलें ले सकती हैं अथवा इच्छानुसार अलंकृत चप्पलें भी खरीद सकती हैं। एक समय में मैंने भी अपने प्रत्येक जयपुर दौरे पर ऐसी रंगबिरंगी चप्पलों की खूब खरीददारी की थी।

अंततः, आप जयपुर के बाजारों से चाहे जो खरीदें, इन रंगबिरंगी गलियों में भ्रमण का आनंद अवश्य प्राप्त करेंगे।

जयपुर की इन प्रसिद्ध वस्तुओं में से आपकी रूचि किसमें है, यह जानने की उत्सुकता मुझे निरंतर रहेगी।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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वाराणसी में क्या खरीदें – उपहार या स्मृति चिन्ह https://inditales.com/hindi/best-varanasi-souvenirs-pick/ https://inditales.com/hindi/best-varanasi-souvenirs-pick/#comments Wed, 23 Aug 2017 02:30:08 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=394

जैसा कि आप जानते हैं, हर वर्ष लोग भारी मात्रा में वाराणसी की यात्रा करतें हैं। उनकी यात्रा का हेतु चाहे धार्मिक हो, या सार्वजनिक, या कुछ और, वे वाराणसी व यहाँ की विशेषताओं से अछूते नहीं रह सकते। कशी यात्रा से हर कोई कुछ ना कुछ यादगार भेंट वस्तु अवश्य अपने साथ लाना चाहता […]

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वाराणसी के उपहार जैसा कि आप जानते हैं, हर वर्ष लोग भारी मात्रा में वाराणसी की यात्रा करतें हैं। उनकी यात्रा का हेतु चाहे धार्मिक हो, या सार्वजनिक, या कुछ और, वे वाराणसी व यहाँ की विशेषताओं से अछूते नहीं रह सकते। कशी यात्रा से हर कोई कुछ ना कुछ यादगार भेंट वस्तु अवश्य अपने साथ लाना चाहता है। मैं इस संस्मरण में वाराणसी की उन विशेष कलाओं व उनसे बनी वस्तुओं का उल्लेख करना चाहूंगी जो वाराणसी को सम्पूर्ण विश्व में प्रसिद्धि दिलाते हैं। मेरा विशवास है कि इसे पढ़ने के उपरांत आप वाराणसी यात्रा से इनमें से कुछ भेंट वस्तुएं अवश्य अपने साथ लायेंगे।

वाराणसी के प्रसिद्द उपहार

वाराणसी की पसंदीदा बनारसी रेशमी साड़ियाँ

बनारसी साडी
बनारसी साडी – कौन न मोहित हो जाये इन पे

आप वाराणसी जाएँ और प्रतिष्ठित बनारसी सिल्क साड़ी ना खरीदें, यह वाराणसी के साथ और आपके आस पास की महिलाओं के साथ नाइंसाफी होगी। बनारसी सिल्क या रेशमी साड़ी हर स्त्री का सपना होती है। मेरे जैसी भी, जो क्वचित ही साड़ी पहनती हो, अपने पास कम से कम एक बनारसी साड़ी अवश्य रखती है। इसलिए आप जब भी वाराणसी जाएँ, यह रेशमी साड़ियाँ अपने या अपने प्रियजनों हेतु उपहार स्वरुप अवश्य खरीदें।

आप इन रेशमी साड़ियों की खरीददारी वाराणसी में कहीं भी कर सकतें हैं। गंगा घाट पर तो बिचोलियों का तांतां लगा रहता है जो आपको विश्वसनीय साड़ी की दुकानों पर ले जाने का दावा करतें हैं। परन्तु मेरा सुझाव है कि आप स्वयं बुनकरों द्वारा इन साड़ियों को बुनते देखें और प्रत्यक्ष उन बुनकरों से यह साड़ियाँ खरीदें। इसके लिए आपको वाराणसी के पीली कोठी इलाके में जाना पड़ेगा। यहाँ भले ही सडकों पर चलना थोड़ा असुविधाजनक हो परन्तु आप बुनकरों की कुशल कारीगरी व कड़ी मेहनत देख गदगद हो उठेंगे।

आप बढ़िया बनारसी साड़ियाँ वाराणसी के घासी टोला में ठठेरी बाज़ार से भी खरीद सकतें हैं। थोक बाज़ार होने के कारण यहाँ बनारसी साड़ियों का उत्तम संग्रह बेहतर दामों पर उपलब्ध हैं। यहाँ भी आप को संकरी गलियों की थोड़ी तकलीफ उठानी पड़ सकती है। गलियाँ रिक्शा के हिसाब से भी बेहद संकरीं हैं। कई दुकानें पुरानी कोठियों में होने के कारण आपको साड़ियों के विभिन्न प्रकार देखने हेतु सीड़ियाँ चढ़नी उतरनी पड़ेंगी। फिर भी ज्यादा साड़ियों की खरीददारी हेतु यह एक उत्तम स्थान है।

बनारसी साड़ियों को ‘बनारसी जरी व साड़ियाँ‘ पंजीकरण के तहत जी.आई. अर्थात् भौगोलिक संकेत अधिकार प्राप्त है। इसके तहत बनारसी साड़ियाँ केवल वाराणसी में ही बुनी जा सकतीं हैं।

गंगाजल

गंगाजल
गंगाजल

यह अविश्वसनीय किन्तु सत्य है, कि गंगाजल वाराणसी से सर्वाधिक निर्यातित वस्तु है। आपके लिए भी यह एक उत्तम निशानी हो सकती है। घाट की तरफ जाते मार्ग पर दुकानदार हर आकार के प्लास्टिक डिब्बों व लोटों का अम्बार लगा कर बैठतें हैं। श्रद्धालु इन्ही डिब्बों में गंगाजल भर कर अपने साथ ले जातें हैं। आप तांबे के लोटों में सीलबंद किये गंगाजल भी ले सकतें हैं। छोटे छोटे यह तांबे के लोटे धर्मभीरु प्रियजनों के लिए एक उत्तम निशानी हो सकतीं हैं।

गंगा के घाट पर पानी की स्वच्छता देख शंका जरूर उत्पन्न होती है। इसी शंका के तहत मैंने भी डब्बा खोल कर पानी की स्वच्छता का अनुमान लगाने की कोशिश की। परन्तु दुकानदार ने मुझे विशवास दिलाया कि गंगाजल, नदी के घाट से दूर, मध्य बहाव में बेहद स्वच्छ है और वे वहीं से इन डब्बों को गंगाजल से भरतें हैं। अंततः यह अपनी अपनी श्रद्धा पर निर्भर है।

गुलाब मीनाकारी

गुलाबी मीनाकारी
गुलाबी मीनाकारी

आपने मीनाकारी कला के बारे में अवश्य सुना होगा। यह राजस्थान व गुजरात की बहुप्रचलित कला है, जहां सोने व ज्यादातर चाँदी पर रंगीन मीनाकारी की जाती है। परन्तु बहुत कम लोग इस तथ्य से अवगत होंगे कि वाराणसी में भी मीनाकारी की कला फल फूल रही है। अंतर सिर्फ इतना है कि वाराणसी में गुलाबी मीनाकारी अर्थात् गुलाबी रंग में मीनाकारी की जाती है। वाराणसी के कारीगरों का यह कौशल आप प्रत्यक्ष देख सकतें हैं गऊ घाट की संकरी गलियों में।

इससे पहले कि आप मीनाकारी की गईं वस्तुओं पर मोहित हों, मैं आपको इनकी कीमतों का अंदाज़ देना चाहूंगी। गुलाबी मीनाकारी से सज्जित एक गले के हार की कीमत १० लाख रुपयों से शुरू होती है। यदि आप पैसे खर्च करने के लिए तैयार हैं तो मीनाकारी किये गए जेवरों की खरीदी का गौरव प्राप्त कर सकतें हैं। और यदि आप मेरी तरह हलके खरीददार हैं तो आप मीनाकारी की गयी छोटी छोटी डिबिया यादगार स्वरुप खरीद सकतें हैं। छोटे छोटे पशुओ व पक्षियों के भी शिल्प उपलब्ध है जिन पर सुन्दर मीनाकारी की गयी है। खासतौर पर मीनाकारी व महीन नक्काशी से बने मोर व हाथी बेहद खूबसूरत हैं।

वाराणसी के ख़ास लकड़ी के खिलौने

खोजवा के लकड़ी के खिलोने
खोजवा के लकड़ी के खिलोने

वाराणसी की एक और खासियत है लकड़ी के खिलौने। वाराणसी में कई ऐसी गलियाँ हैं जहां लकड़ी के खिलौने बनाए जाते हैं। खोजवा भी ऐसी ही जगह है जहां आप ऐसे खिलौने बनाने वाले कारीगरों से मिल सकते हैं। वे ज्यादातर चटक रंगों में पशु पक्षियों के समूह बनाते हैं। आपको यहाँ लकड़ी के गुड्डे गुड़िया भी मिल जायेंगे। छोटे उपहार हेतु लकड़ी की कुंजी, पेंसिल इत्यादि भी उपलब्ध हैं।

मैंने जो खिलौना खरीदा उसकी संकल्पना कुछ हद तक रूसी गुड़िया अथवा मातृशका गुड़िया से साम्य रखती है। परन्तु यह भगवान् शिव व उनके परिवार से सम्बंधित है। इसमें पहले एक लकड़ी की अंडाकार डिबिया है जिस पर चटक रंगों में शिव का चित्र बना हुआ है। इस डिबिया को खोलने पर इसके अन्दर उसी आकार की परन्तु छोटी डिबिया है जिस पर पार्वती का चित्र बना हुआ है. इसी तरह तीसरी डिबिया पर कार्तिक व चौथी डिबिया पर गणेश के चित्र बने हैं।

वाराणसी के यह लकड़ी खिलौने सम्पूर्ण वाराणसी में हर जगह पर उपलब्ध हैं। मुझे वाराणसी विमानतल में भी कुछ सुन्दर लकड़ी के खिलौने मिले।

वाराणसी की रोगन लगी लकड़ी की कलाकारी के बारे में और जानिये ‘यहाँ’।

रोगन लगे लकड़ी के खिलौने व फर्नीचर भारत में और भी कई जगह उपलब्ध है, जैसे कर्नाटक में चन्नापट्टना, आन्ध्र प्रदेश में एतिकोप्पका और गुजरात में सानखेडा।

लाल पेडा

संकट मोचन मंदिर के पास लाल पेडा
संकट मोचन मंदिर के पास लाल पेडा

आप ने अब तक दो प्रकार के पेड़ों के बारे में जरूर सुना होगा और स्वाद भी चखा होगा। एक उत्तर भारत का मथुरा पेडा व दूसरा दक्षिण भारत का धारवाड़ पेडा। परन्तु बनारस के हर क्षेत्र में अपना अलग ही अंदाज होता है। इसलिए यहाँ का पेडा भी अपना अलग अंदाज व स्वाद लिए हुए है। इन पेड़ों को लाल पेडा कहा जाता है। यह इन दोनों पेड़ों का और ज्यादा भुना रूप होता है। इसलिए इसका रंग लाल व प्रकृति कुरकुरी होती है। घी से भरे पेड़ों में कई बार सूखे मेवे भी डाले जाते हैं।

इन पेड़ों  को आप प्रसिद्ध संकट मोचन हनुमान मंदिर के आसपास की दुकानों से खरीद सकतें हैं। यह गेदौलिया की कचौरी गली में स्थित मिठाई की दुकानों में भी उपलब्ध हैं।

मीठा खाने के शौकीन परिजनों व मित्रों के लिए यह एक उपयुक्त उपहार हो सकता है।

स्फटिक व पत्थर के शिवलिंग

स्फटिक एवं पत्थर में शिवलिंग
स्फटिक एवं पत्थर में शिवलिंग

मैं जब भी वाराणसी की यात्रा पर आती हूँ मेरे परिवारजन व मित्र मुझसे स्फटिक के शिवलिंग की फरमाइश करतें हैं। स्फटिक के शिवलिंग पूर्णतः पारदर्शी होते हैं। इन्हें घरों में पूजा जाता है। कई लोग इसे सौभाग्य के प्रतीक रूप मान हमेशा अपने पास रखते हैं।

यदि आप इन स्फटिक के शिवलिंगों को खरीदना चाहें तो आप प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर की ओर जाती विश्वनाथ गली में स्थित दुकानों से खरीद सकतें हैं। इन शिवलिंगों की ऊंचाई कुछ मिलीमीटर से कुछ इंचों तक हो सकती है। इनकी कीमत इनकी ऊंचाई पर निर्भर होती है। सबसे छोटा शिवलिंग करीब १०० रुपये में उपलब्ध है।

यहाँ पत्थरों के शिवलिंग भी बनाए व बेचे जातें हैं।

चूंकि काशी अर्थात् वाराणसी भगवान् शिव की नगरी है, स्फटिक या पत्थर के शिवलिंग वाराणसी की सर्वोत्कृष्ट निशानी या यादगार होतें हैं।

रुद्राक्ष माला

रुद्राक्ष माला
रुद्राक्ष माला

रुद्राक्ष एक फल का खुरदुरी सतह वाला बीज होता है। रुद्राक्ष यानी रूद्र के आंसू। रुद्राक्ष की उत्पत्ति रूद्र अर्थात् भगवान् शिव के आँखों के जलबिंदु से हुई है। रुद्राक्ष की माला सबसे प्राकृतिक व जैविक गहना है। हमारे साधु संत इसे सकारात्मक ऊर्जा हेतु अनंतकाल से धारण करते आ रहें हैं। सांसारिक जीवन में रह रहे हिन्दू भी इस पवित्र बीज को बड़ी श्रद्धा से धारण करतें हैं। किसी भी अस्वच्छ या अपवित्र स्थान पर इन्हें ले जाना वर्ज्य माना जाता है।

हालांकि वाराणसी के आसपास रुद्राक्ष के वृक्ष नहीं पाए जाते, परन्तु रुद्राक्ष की खरीदी हेतु वाराणसी सर्वोत्तम शहर है। इन रुद्राक्ष के बीजों को धागे में पिरो कर माला बनायी जाती है। वाराणसी में रुद्राक्ष की मालायें विभिन्न प्रकार व अनेक लम्बाईयों में उपलब्ध हैं। परन्तु १०८ पंचमुखी रुद्राक्ष की माला सर्वप्रसिद्ध है।

रुद्राक्ष कई प्रकार के होते है और इनका महत्त्व भी अलग अलग होता है। यह १ मुखी से १४ मुखी तक पाए जातें हैं। उदाहरणार्थ एक मुखी रुद्राक्ष भगवान् शिव का रूप, द्विमुखी रुद्राक्ष श्री गौरी-शंकर, पंचमुखी रुद्राक्ष सुख प्रदान करने वाला, इत्यादि माने जाते हैं। इनमें से कुछ प्रकार अत्यंत दुर्लभ हैं। यह रुद्राक्ष की माला वाराणसी की सर्वोपयोगी यादगार वस्तु हो सकती है। ले जाने में आसान, पहनने में आसान!

अटपटे आकार के रुद्राक्ष और विश्वनाथ मुद्राएँ
अटपटे आकार के रुद्राक्ष और विश्वनाथ मुद्राएँ

कुछ ऐसी भी मालाये होतीं हैं जिनका इस्तेमाल तांत्रिक कालाजादू में करतें हैं, जैसे मुंडमाला। गंगा घाट पर बिकने वाले मुंडमालाएं नकली हैं। असली मुंडमाला मुझे अपनी भूटान यात्रा के दौरान देखने मिली।

यहाँ धातु के सिक्के भी उपलब्ध है जिनके एक तरफ काशी विश्वनाथ मंदिर व दूसरी तरफ माता अन्नपूर्णा मंदिर के नक्काशीदार चित्र बने हुए हैं। यह विश्वनाथ के शहर की बेहतरीन यादगार साबित हो सकतें हैं।

कांच के मोती

कांच के मोती
कांच के मोती

क्या आप जानते हैं कि कांच के मोती बनाने का विश्व का विशालतम कारखाना वाराणसी में ही है! मैंने अपनी पिछली वाराणसी यात्रा के दौरान ऐसे ही एक कारखाने के दर्शन किये थे। कारखाने के विभिन्न तलों में फैले रंग बिरंगे कांच के मोतियों को देख मैं दंग रह गयी थी। खासकर हाथ से बनाए मोती तो बेहद खूबसूरत थे। प्रधानमन्त्री की ‘भारत में बनाओ’ योजना का एक बेहतरीन उदाहरण है यह कांच के मोतियों के कारखाने। हालांकि भट्टी के पास, जहां यह मोती बनाए जाते हैं, पर्यटकों का प्रवेश निषेध है परन्तु आप यहाँ से ये मोतियाँ खरीद जरूर सकतें हैं।

इन कांच की मोतियों से बने गहने भी बेहद खूबसूरत दिखाते हैं। उपहार स्वरुप इन्हें आप किसी भी स्मारिका की दुकान से खरीद सकतें हैं।

बांसुरी

बांसुरी विक्रेता - गंगा घाट पे
बांसुरी विक्रेता – गंगा घाट पे

संगीत बनारस के रग रग में बसता है। बनारस ने पंडित रवि शंकर, उस्ताद बिस्मिल्ला खान और गिरिजा देवी जैसे बहुमूल्य हीरे शास्त्रीय संगीत की दुनिया को प्रदान किये। भारतीय शास्त्रीय संगीत में बनारस घराने का विशिष्ठ स्थान है। आज भी वाराणसी की गली गली में शास्त्रीय संगीत के पंडित गाते, बजाते व बैठक सजाते दिखाई पड़ते हैं। यही वजह है कि वाराणसी में आपको कई संगीत वाद्यों की दुकानें नजर आएँगी। दूर दूर से लोग इन वाद्यों की खरीददारी हेतु वाराणसी आते हैं। वाराणसी की निशानी के रूप में आप भी कोई वाद्य यहाँ से खरीद सकते हैं। हालांकि वीणा, सितार जैसे बड़े वाद्य ले जाना असुविधाजनक हो सकते हैं परन्तु हर आकार में उपलब्ध बांसुरियां आसानी से खरीदी व ले जाई जा सकतीं हैं। संगीत की प्रेरणा देती यह निशानी आपको हमेशा वाराणसी की याद दिलाती रहेगी।

रामनामी कपड़े

रामनामी वस्त्र
रामनामी वस्त्र

वाराणसी में गंगा घाट की सैर के दौरान आपको कई साधु व श्रद्धालु ऐसे दिखेंगे जिन्होंने राम का नाम लिखे सफ़ेद या पीले वस्त्र धारण किये हुए हों। इनमें कुछ पर श्लोक, मन्त्र तथा देवी देवताओं के चित्र बने होते हैं। इन्हें रामनामी कपड़े कहते हैं। ऐसे रामनामी कुरते, अंगवस्त्र तथा दुपट्टे यहाँ दुकानों में बिकते नजर आतें हैं। मैंने भी यहाँ से एक रामनामी कपड़े की खरीददारी की थी। बनारस की आध्यात्मिकता से ओतप्रोत होते हुए भी यह आज के आधुनिक पहनावे में आसानी से घुलमिल जातें हैं।

पत्थरों पर खुदी कलाकृतियाँ

पत्थर की कलाकृतियाँ
पत्थर की कलाकृतियाँ

वाराणसी के शिल्पकारों का एक बड़ा समूह ऐसा भी है जिसने वाराणसी की पत्थरों को तराशने की कला को जीवित रखा है। वे पत्थरों पर बारीकी से खुदाई कर पशु, पक्षी व अन्य आकारों की सुन्दर कलाकृति तैयार करतें हैं। अक्सर यह कलाकृतियाँ बिना जोड़ के, दो परतों में की जाती है। बनारस में पत्थर पर खुदाई का इतिहास रहा है। अशोक स्तंभों में लगे नक्काशीदार पत्थर वाराणसी के निकट चुनार से लाये गए थे।

आप भी यहाँ से इन पशु पक्षियों की सुन्दर कलाकृतियाँ खरीद सकते हैं। पत्थर की जालीदार डिबिया सुगन्धित धूप इत्यादि रखने हेतु उत्तम व खूबसूरत उपहार हो सकती है।

इन कलाकृतियों की दुकानें मुझे वाराणसी शहर से ज्यादा सारनाथ में नजर आयीं।

भारतीय साहित्य

पुस्तक भंडार
पुस्तक भंडार

सदियों से वाराणसी कई भारतीय पुस्तकों के प्रकाशन के लिए प्रसिद्ध रहा है। भारतीय संस्कृति पर आधारित पुस्तकें जैसे वेद, पूरण, उपनिषद इत्यादि आसानी से उपलब्ध हैं। हालाँकि हिंदी की पुस्तकें यहाँ की विशेषता है, पर आप इन्हें अन्य भाषाओँ जैसे अंग्रेजी में भी खरीद सकते हैं।

मैंने अपनी हर वाराणसी यात्रा के दौरान इन परम्परागत दुकानों में पुस्तकों के साथ भरपूर समय बिताया। यहाँ से कई पुस्तकों की खरीददारी भी की। अपने पसंदीदा पुस्तकों की खरीदी कर आप भी अपने पुस्तकों के संग्रह में चार चाँद लगा सकतें हैं।

तो आप अपनी वाराणसी यात्रा से कौन सी यादगार अपने साथ लाना चाहेंगे?

यदि आपके पास वाराणसी की विशेष वस्तुओं से सम्बंधित कुछ और जानकारी है, या आप इन वस्तुओं की सूची में कुछ और जोड़ना चाहते हैं तो आपका स्वागत है।

काशी सम्बंधित अन्य यात्रा वृतांत

तुलसी अखाडा – तुलसी घाट वाराणसी

प्राचीन पंचक्रोशी यात्रा

जंगमवाडी मठ – सहस्त्र शिवलिंगों का संग्रह

हिंदी अनुवाद : मधुमिता ताम्हणे

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