यात्रा वार्ता Archives - Inditales श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Mon, 24 Jan 2022 14:30:39 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.7.5 पूर्व-पुर्तगाली गोवा पर श्री प्रजल साखरदांडे से एक चर्चा https://inditales.com/hindi/poorva-purtagali-goa-prajal-sakhardande/ https://inditales.com/hindi/poorva-purtagali-goa-prajal-sakhardande/#respond Wed, 04 May 2022 02:30:04 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2668

अनुराधा – डीटूर्स में आज हमारे साथ चर्चा कर रहे हैं, प्रा. प्रजल साखरदांडे। प्रा. प्रजल साखरदांडे गोवा के धेम्पे कला एवं विज्ञान विद्यालय में इतिहास के प्राध्यापक हैं। वे “Goa Heritage Action Group” के उपाध्यक्ष भी हैं। “Goa Heritage Action Group” गोवा की विरासतों के संरक्षण एवं परिरक्षण कार्य की ओर अग्रसर है। प्रा. […]

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अनुराधा – डीटूर्स में आज हमारे साथ चर्चा कर रहे हैं, प्रा. प्रजल साखरदांडे। प्रा. प्रजल साखरदांडे गोवा के धेम्पे कला एवं विज्ञान विद्यालय में इतिहास के प्राध्यापक हैं। वे “Goa Heritage Action Group” के उपाध्यक्ष भी हैं। “Goa Heritage Action Group” गोवा की विरासतों के संरक्षण एवं परिरक्षण कार्य की ओर अग्रसर है। प्रा. प्रजल गोवा पर सर्वाधिक प्रामाणिक रूप से लिखे गए साहित्यों में से एक के लेखक भी हैं जो एक पुस्तक के रूप में है। Goa Gold Goa Silver नामक इस पुस्तक में गोवा पर उनके दो दशकों के शोध कार्य का संकलन है। आईये पूर्व-पुर्तगाली गोवा तथा गोवा से सम्बंधित अन्य महत्वपूर्ण तथ्यों पर उनके शोध के विषय में जानने का प्रयास करते हैं।

प्रा. प्रजल – नमस्कार अनुराधाजी। मेरा परिचय देने के लिए धन्यवाद। जी हाँ, “Goa Gold Goa Silver Her History Her Heritage from Earliest times to 2019” नामक मेरी पुस्तक का कुछ दिनों पूर्व ही विमोचन हुआ है। यह पुस्तक तीन भागों में विभाजित है, पुर्तगाली गोवा, पूर्व-पुर्तगाली गोवा तथा मुक्ति पश्चात गोवा।

पूर्व-पुर्तगाली गोवा के अज्ञात तथ्य

अनुराधा – पुर्तगालियों द्वारा अधिग्रहण के पश्चात के गोवा के विषय में हम बहुत कुछ जानते हैं। किन्तु प्राचीन गोवा अथवा पूर्व-पुर्तगाली गोवा के विषय में हमारी जानकारी न्यूनतम है। स्कन्द पुराण के सह्याद्री खंड एवं महाभारत में गोवा का उल्लेख प्राप्त होता है। महालसा नारायणी का उल्लेख भी अनेक शास्त्रों में किया गया है किन्तु अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। मैं जानना चाहती हूँ कि गोवा का कितने समय पूर्व का इतिहास उपलब्ध है?

प्रा. प्रजल –  जब हम पूर्व-पुर्तगाली गोवा के इतिहास की चर्चा करें तो हमें भूवैज्ञानिक समय-मापक्रम की सहायता लेनी पड़ेगी। हमें उस काल में जाना पडेगा जब गोवा का निर्माण हुआ था, जिससे परशुराम की दंतकथा भी जुड़ी हुई है। है। अर्थात् हम ट्रांजेमाईट नाईस(Trondjemeitic Gneiss) शिस्ट(Schist ) शैलसमूहों की चर्चा कर रहे हैं। परशुराम, जिन्हें भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है, वे अपने साथ ९६ सारस्वत परिवारों को लेकर सह्याद्री आये थे तथा उन्हें वहां बसाना चाहते थे। उस समय गोवा नामक कोई स्थान नहीं था। सह्याद्री की तलहटी तक समुद्र का जल था। अतः उन्होंने अरम्बोल से समुद्र की ओर तीर भेद कर समुद्र को पीछे जाने की आज्ञा दी। वह तीर जहां गिरा उसे बाण-हल्ली कहा गया जो कालांतर में बाणावली हो गया। परशुराम की आज्ञा पाकर समुद्र पीछे हटा जिससे गोमान्तक की भूमि या गोवा की उत्पत्ति हुई। यह हुई चर्चा गोवा की उत्पत्ति से सम्बंधित पौराणिक दंतकथा की।

गोवा के आदिवासी समुदाय

सारस्वत समुदाय ने सदा इस तथ्य की वैद्यता सिद्ध करने का प्रयत्न किया कि उन्होंने ही गोवा की रचना की है। यहाँ हम एक सत्य भूल रहे हैं कि सारस्वत समुदाय के आने से पूर्व यहाँ अनेक आदिवासी समुदाय निवास करते थे, जैसे गौडा, कुनबी, वेलिप, खारवी इत्यादि, जिन्होंने गाँवकरी पद्धति अर्थात् ग्राम समुदाय की स्थापना की थी। इसके लिए हमें इतिहास में सहस्त्रों वर्ष पूर्व जाने की आवश्यकता है। कुशावती नदी के तट पर प्राप्त पन्सोइमल शैलचित्र इस तथ्य का प्रमाण हैं। इन शिलाओं पर उत्कीर्णन ऐसे ही किसी आदिवासी समुदाय ने किया होगा। अतः गोवा अत्यंत प्राचीन है। पर्यटन विभाग द्वारा प्रसारित सीमित तथ्यों से गोवा की काल्पनिक छवि यह निर्मित होती है कि गोवा अब भी पुर्तगाली एवं इसाई है, यहाँ कोई भी हिन्दू नहीं है इत्यादि।

आपके संस्करण के माध्यम से मैं यह कहना चाहता हूँ कि गोवा पूर्णतः भारतीय है। भौगोलिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक, सभी रूपों से गोवा प्राचीन काल से भारत का भाग है। पुर्तागाली गोवा में सन १५१० से १९६१ तक थे। अधिकारिक रूप से उन्होंने सम्पूर्ण गोवा पर राज भी नहीं किया था। गोवा से बाहर के लोगों की कल्पना है कि गोवा पूर्णतः इसाई है। यह सत्य नहीं है। लोगों ने ऐसी असत्य धरणा बना ली है।

पन्सोइमल शैलचित्र – पूर्व-पुर्तगाली गोवा

अनुराधा – आपने पन्सोइमल शैलचित्र का उल्लेख किया। यहाँ पर एक विशाल लेबिरिन्थ अथवा भ्रमिका उत्कीर्णित है। मैंने कहीं पढ़ा था कि यह विश्व की प्राचीनतम ज्ञात भ्रमिका है। इस विषय में आपका तर्क क्या है?

प्रा. प्रजल – मैं नहीं जानता कि यह विश्व की प्राचीनतम भ्रमिका है अथवा नहीं, किन्तु यह भ्रमिका अत्यंत रोचक है। इसके संबध में अनेक मत व्यक्त किये गए हैं। एक मत के अनुसार शामानी धर्म अथवा जीववादी धर्म के आदिवासियों द्वारा बनाए गए सकेंद्रित वृत्त ब्रह्माण्ड को दर्शाते हैं। वे इसका सम्बन्ध खगोलीय स्थितियों से जोड़ते थे। इसका सम्बन्ध विज्ञान, कुण्डलिनी तथा पंचांग इत्यादि से भी जोड़ते थे। मेरे मतानुसार इसे समझना आसान नहीं है। मैंने कनाडा तथा वाशिंगटन के संग्रहालयों में भी इसी प्रकार की भ्रमिकाएं देखी हैं। सम्पूर्ण विश्व भर में ऐसी भ्रमिकाएं हैं। पन्सोइमल का यह शैलचित्र गोवा के प्राचीनतम शैलचित्रों में से एक हो सकता है।

गुफाएं एवं तलघर

पूर्व-पुर्तगाली गोवा
पूर्व-पुर्तगाली गोवा

अनुराधा – कदाचित आकाशीय अध्ययन के लिए यह एक प्राचीन वेधशाला हो सकती है। यदि हम कालक्रम में कुछ आगे बढ़ें तो गोवा में क्या देखेंगे?

प्रा. प्रजल – हम गोवा में अनेक गुफाएं देखेंगे, जैसे चिखली में तीन भूमिगत तलघर हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के सदस्यों के साथ हमने भी उनका सर्वेक्षण किया था। १९६५ में जर्मनी की एक महिला, ग्रीट्ली मिट्टर वार्नर, ने इन गुफाओं की खोज की थी। उन्हें वहां मिट्टी के पात्रों के अंश मिले थे जो उन गुफाओं में मानव जीवन की ओर संकेत करते हैं। यह जुआरी नदी के किनारे स्थित है। जुआरी, मांडवी, कुशावती इत्यादि गोवा की नदियों के तीर आप इस प्रकार के शैलचित्र तथा गुफाएं देख सकते हैं। यहाँ समुद्री जीवाश्म भी दिख जाते हैं। इसका सीधा अर्थ है कि गोवा अत्यंत प्राचीन स्थल है।

नदी घाटी सभ्यता

अनुराधा –  जी हाँ गोवा की धरोहर अत्यंत प्राचीन है। समय चक्र में कुछ और आगे बढ़ते हैं। मैं जानना चाहती हूँ कि गोवा में कौन सी ज्ञात सभ्यता सर्वप्रथम अस्तित्व में आयी।

प्रा. प्रजल – जब इस क्षेत्र में मानवी वसाहत का आरम्भ हुआ तब यहाँ म्हादेई नदी घाटी सभ्यता, कुशावती नदी घाटी सभ्यता तथा जुआरी नदी घाटी सभ्यता अस्तित्व में आयीं। लोग नदी के किनारे बसने लगे। इसके पश्चात गाँवकरी प्रणाली की स्थापना हुई। तत्पश्चात राजवंश चरण का आगमन हुआ। गोवा के इतिहास में राजवंश का सर्वप्रथम ऐतिहासिक प्रमाण राजा देवराज भोज हैं। ऐतिहासिक सूत्रों के अनुसार राजा देवराज भोज गोवा के प्रथम राजा थे जिन्होंने ४ई. से ७ई. के मध्य गोवा पर राज किया था। अतः ४थी से ६वीं शताब्दी तक भोज राजवंश ने राज किया। तत्पश्चात ७वीं शताब्दी में कोंकण मौर्य तथा बादामी चालुक्य राजाओं ने शासन किया था।

गोवा की प्रथम महारानी कर्णाटक की विजय भट्टारिका थीं जो पुलकेशिन द्वितीय की पुत्रवधू थीं। पुलकेशिन द्वितीय दक्षिण के सम्राट थे जिन्होंने उत्तरी भारत के राजा हर्षवर्धन को परास्त किया था। उसके पश्चात गोवा पर महाराष्ट्र के शिलाहार वंश, कर्णाटक के कदंब वंश, बाहमानियों, आदिल शाह, तत्पश्चात पुर्तगालियों ने अधिपत्य स्थापित किया।

गोवा के शासक – पूर्व-पुर्तगाली गोवा

अनुराधा –  इन शासकों में से सबसे लम्बे काल तक किसने शासन किया था?

प्रा. प्रजल – ९०६ ई. से १३५६ ई. तक का कदंब काल दीर्घतम काल था। इस काल को संस्कृति का स्वर्णिम काल कहा जाता है। ताम्बडी सुर्ला में महादेव का शैल मंदिर एक अप्रतिम मंदिर है जो कदंब काल में निर्मित अनेक शैल मंदिरों में से इकलौता जीवित मंदिर है। गोवा के पर्यटकों को इस मंदिर के दर्शन अवश्य करना चाहिए। गोवा में कदंब काल के अन्य मंदिर भी हैं। जैसे कुर्डी गाँव में कदंब वंश के संस्थापक राजा सष्टदेव प्रथम द्वारा निर्मित एक महादेव मंदिर था जिसे अब सालावाली बाँध के समीप स्थानांतरित किया गया है। राजा नारायणदेव ने भी अनेक मंदिरों का निर्माण करवाया था। सप्तकोटेश्वर उनके कुलदेवता थे।

कदंब शासकों ने, विशेषरूप से महारानी कमला देवी ने, शिक्षण को बढ़ावा दिया था। उन्होंने ब्रह्मपुरी एवं अग्रहार जैसे शिक्षण संस्थानों को अपने निरिक्षण में लिया था। अनेक मंदिरों को संरक्षण दिया था। अतः, गोवा में कदंब काल की अनेक विरासतें हैं।

अनुराधा –  कदंब काल की विरासतें अब भी जीवित हैं। यहाँ तक कि गोवा राज्य परिवहन का नाम भी उसी वंश से सम्बंधित है।

प्रा. प्रजल – जी हाँ। हमारे राज्य परिवहन का नाम भी कदंब परिवहन निगम है जिसका आरम्भ १९८० में हुआ था। इसे कदंबा बस कहा जाता है तथा कदंब वंश का राजचिन्ह, सिंह ही निगम के चिन्ह के रूप में बसों पर चित्रित है।

सप्तकोटेश्वर मंदिर – पूर्व-पुर्तगाली गोवा

अनुराधा –  मैंने कुछ समय पूर्व ही दीवार द्वीप पर सप्तकोटेश्वर मंदिर के अवशेषों के दर्शन किये थे। उसके कुण्ड तथा १०८ लघु मंदिरों के अवशेषों को भी देखा था। वहां स्थित रिक्त आलों को देख ऐसा प्रतीत होता है कि किसी समय उनके भीतर मूर्तियाँ रही होंगी। उनके भीतर कौन सी मूर्तियाँ थीं? अब वह मूर्तियाँ कहाँ है?

प्रा. प्रजल – दीवार द्वीप पर स्थित सप्तकोटेश्वर मंदिर का जलकुंड अत्यंत सुन्दर है। दीवार द्वीप को दीपों का द्वीप अथवा द्वीप वाटिका या दीपावाटी कहा जाता था। इसे देववाडी भी कहा जाता था जिसका अर्थ है देवों का वाड़ा। यहाँ सप्तकोटेश्वर मंदिर का निर्माण १२वीं सदी में कदंब राजाओं ने करवाया था। कालांतर में इस मंदिर ने अनेक अत्याचार सहे। बाहमानियों ने इसे नष्ट किया, जिसके पश्चात विजयनगर सम्राटों ने इसका पुनर्निर्माण कराया। १५४१ में इसे पुनः पुर्तगालियों ने ध्वस्त किया। इसके शिवलिंग को सुरक्षित नदी के उस पार, नार्वें में ले जाया गया। तत्पश्चात १६६८ में शिवाजी महाराज ने नार्वें में ही मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया। यह मंदिर अब भी गर्व से अपनी विजय-गाथा कह रहा है। इसे एक तीर्थ माना जाता है। अतः कदंब शासकों द्वारा गोवा में स्थापित सप्तकोटेश्वर मंदिर गोवावासियों को अत्यंत प्रिय है।

मूर्तियाँ

अनुराधा –  मंदिर के जलकुंड के रिक्त आलों के भीतर कौन सी मूर्तियाँ थीं? अब वे मूर्तियाँ कहाँ हैं? क्या आपके पास इस विषय में कोई जानकारी है?

प्रा. प्रजल – उन मूर्तियों के विषय में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। केवल लिंग के विषय में ज्ञात है। पुर्तगाली उस लिंग का प्रयोग कपड़े धोने के लिए करते थे। इसके पश्चात इस लिंग को एक लघु गुफा मंदिर में स्थानांतरित कर दिया गया। किन्तु आलों के भीतर की मूर्तियों के सम्बन्ध में कोई जानकारी नहीं है। कदाचित उस क्षेत्र के अधिक उत्खनन से हमें यह जानकारी प्राप्त हो सकती है।

अनुराधा –  इस प्रकार की घटनाओं के पश्चात भारत की अनेक मूर्तियाँ किसी ना किसी संग्रहालय पहुँच जाती हैं। जब मैं इस मंदिर के विषय में संस्करण लिख रही थी तब मैंने अनेक गोवावासियों से इस विषय में जानने का प्रयास भी किया था, किन्तु किसी को भी इसकी जानकारी नहीं है। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।

प्रा. प्रजल – जी, यह दुर्भाग्यपूर्ण है। सप्तकोटेश्वर मंदिर के विषय में एक तथ्य आपको बताना चाहता हूँ. इसे दक्षिण कोंकण काशी भी कहा जाता है। स्थानीय लोग इसे एक तीर्थ मानते हैं। पुर्तगालियों से पूर्व, लोगों का मानना था कि यदि आप किसी कारणवश काशी नहीं जा सकते तो आप सप्तकोटेश्वर के ही दर्शन कीजिये। आज भी इसे पोन्ने तीर्थ कहते हैं जिसका अर्थ है, प्राचीन तीर्थ।

गोवा के मंदिर – पूर्व-पुर्तगाली गोवा

अनुराधा –  प्रजल जी, हमें गोवा के अन्य प्राचीन मंदिरों के विषय में भी बताएं।

प्रा. प्रजल –  जी। विचुन्द्रें में नारायणदेव की एक सुन्दर प्रतिमा है। यह प्रतिमा कदंब शिलाहार काल की है तथा उनका मंदिर प्राचीनतम मंदिरों में से एक है। इनके अतिरिक्त कुर्डी महादेव मंदिर, ताम्बडी सुर्ला महादेव मंदिर तथा ओपा खांडेपार सप्तकोटेश्वर मंदिर भी हैं। इस प्रकार गोवा के गाँवों में अनेक पुरातन मंदिर हैं जिनमें अनेक मंदिर पूर्व में गुफा मंदिर थे। हमने शिगाओ में, दूधसागर प्रपात की तल में, एक गुफा मंदिर देखा जहाँ बाघ की आराधना की जाती थी। शिगाओं में ही, दूधसागर नदी के तल में, एक शिला पर आदि गणपति की छाप भी देखी।

इनके अतिरिक्त, चंद्रेश्वर मंदिर है जहां भोज राजा पूजा-अर्चना करते थे। उन्होंने परोड़ा पर्वत पर चंद्रेश्वर को समर्पित एक गुफा मंदिर भी बनाया जिसे चंद्रेश्वर भूतनाथ मंदिर कहते हैं। भूतनाथ आदिवासियों के मूल तांत्रिक आराध्य थे। इस प्रकार के अनेक मंदिर आप गोवा में देख सकते हैं। इसीलिए मैं पुनः यह कहना चाहता हूँ कि गोवा के विषय में लोगों की जो समझ है कि यहाँ कोई हिन्दू नहीं है, कोई मंदिर नहीं है, यह कदापि सत्य नहीं है। इस साक्षात्कार के माध्यम से मैं भारत की जनता को यह सूचना देना चाहता हूँ कि गोवा का एक दूसरा आयाम भी है जो लोगों की समझ से पूर्णतः विपरीत है।

पुस्तक का मुखपृष्ठ

अनुराधा –  प्रजलजी, आपकी पुस्तक के बाह्य मुखपृष्ठ पर एक सुन्दर चित्र है। इसे देखकर यह कोई पहेली प्रतीत होती है। क्या आप बताएँगे कि वह क्या है?

प्रा. प्रजल – जी। २९ मई २००८ का दिन था जब मैं नार्वें गया था। मुझे वहां गाँव में कई अनूठी वस्तुएं प्राप्त हुईं। हम एक पहाड़ी पर गए जहां मुझे एक स्वस्तिक मिला। दो पट्टिकाएं थीं, एक स्वस्तिक पट्टिका तथा एक चौकोर खणों की पट्टिका जिसके मध्य में स्वस्तिक था।मैं नहीं जानता कि यह किसी भ्रमिका का भाग हैं अथवा किसी प्रकार की कुण्डलिनी इत्यादि का यन्त्र है। किन्तु मुझे चौकोर खणों की पट्टिका अत्यंत रोचक प्रतीत हुई। मैं उस पर मोहित हो गया। इसीलिए मैंने अपने पुस्तक के मुखपृष्ठ पर लगाने के लिए इसका चुनाव किया। वहां खंडहरों में एक छोटा मंदिर भी था जो स्लेटी शिला में निर्मित था। उस पर अधिक शोध की आवश्यकता है।

अनुराधा –  यह गोवा के बाहर से आया होगा क्योंकि गोवा में तो स्लेटी शिलाएं नहीं हैं।

प्रा. प्रजल – ये शिलाएं अनमोड़ घाट क्षेत्र से आयी हो सकती हैं अन्यथा यह कदंब काल की भी हो सकती हैं क्योंकि कदंब काल के मंदिरों में उन्होंने इसी प्रकार की शैलखटी शिलाओं का प्रयोग किया था जिन पर शिल्पकारी आसान होती है।

अनुराधा –  ये अपूर्ण प्रतीत होती हैं। इन्हें देख कर ऐसा आभास होता है मानो इन पर शिल्पकारी का कार्य अब भी जारी है।

प्रा. प्रजल – हो सकता है। इसके एक ओर स्वस्तिक भी है किन्तु मैंने उसे अपनी पुस्तक के मुखपृष्ठ का भाग नहीं बनाया ताकि मेरी पुस्तक को लोग हिन्दू विशेष पुस्तक ना माने। मेरी पुस्तक के मुखपृष्ठ पर अब धर्मनिरपेक्ष चित्र है।

गुफाएं एवं सुरंग

अनुराधा –  यह अत्यंत रोचक है क्योंकि इस चित्र को देखते ही मस्तिष्क में अनेक प्रश्न उभरते हैं तथा उनके उत्तर पाने की अभिलाषा प्रबल हो जाती है। प्रजल जी, आगे बढ़ते हुए मैं आपसे गोवा की गुफाओं के विषय में जानना चाहती हूँ। मैंने हर्वले गाँव में कुछ प्राचीन गुफाएं तथा दक्षिण गोवा में रिवोणा की गुफाएं देखीं थी। सप्तकोटेश्वर मंदिर के समीप भी कुछ जैन गुफाएं हैं जहाँ मैंने बाघ आराधना के चिन्ह देखे थे। ये सभी किस काल की हैं? इनका प्रयोग किसने किया था?

प्रा. प्रजल –  गोवा में हमने अनेक गुफाओं एवं सुरंगों को खोजा है। वेरणा में हमने एक भूमिगत सुरंग देखी है। यह सुरंग अत्यंत लम्बी थी जिसे हमने पूर्ण रूप से पार की है। चिखली में हमने अनेक गुफाएं एवं सुरंगे ढूँढी। इजोर्शी नामक गाँव में हमें एक भूमिगत गुफा भी मिली। एक ओर हमने गोवा के सर्वोच्च पर्वत शिखर पर प्राकृतिक गुफाएं देखी जहां हमने कुछ समय व्यतीत किया था, वहीं पर कुछ पुरापाषाण युग एवं उससे पूर्व काल की मानवी वसाहत की गुफाएं भी देखीं। कुछ गुफाएं जैन एवं बौद्ध भिक्षुओं की हैं। वहीं कुछ गुफाएं हिन्दू काल की हैं। इस प्रकार गोवा में अनेक प्रकार की गुफाएं हैं।

हर्वलें की गुफाएं

हिन्दू धर्म बौद्ध धर्म आने से पूर्व से ही अस्तित्व में था। किन्तु जहां तक हर्वलें गुफाओं का प्रश्न है, ये गुफाएं बौद्ध गुफाएं हो सकती हैं जिनके भीतर कालान्तर में शिवलिंग स्थापित किये गए हैं। किन्तु इनका कोई प्रमाण नहीं है। इन शिवलिंगों को भोज राजा कपालिवर्मन के युग का माना जाता है। एक शिलालेख में समीप स्थित उदकपाद जलप्रपात का उल्लेख किया गया है। इन शिवलिंगों को ६ठी शताब्दी में स्थापित किया गया है। इसका अर्थ है कि ये गुफाएं इससे पूर्व अस्तित्व में थीं।

गोवा की विभिन्न गुफाओं का भिन्न भिन्न प्रकार से प्रयोग किया जाता था। रिवोणा की गुफाओं में एक गुप्त कक्ष के भीतर एक मुनि आकर ध्यान में बैठते हैं। इस स्थान को ऋषिवन भी कहते हैं। थीवी में हमने एक गुफा को खोजकर उसका संरक्षण किया था। ये आवासीय गुफा थी। कालांतर में इसके भीतर शिवलिंग स्थापित किया गया था। बिचोली के लामगाँव में भी गुफाएं हैं। अतः आवास, ध्यान तथा अनेक अन्य प्रयोजनों के लिए इन गुफाओं का प्रयोग किया जाता था। ये सभी गुफाएं पुर्तगालियों से पूर्व की हैं।

गुफाओं के विषय में मुझे यह अत्यंत रोचक प्रतीत होता है कि आप किसी भी बुजुर्ग से किसी गुफा के सम्बन्ध में प्रश्न पूछें तो उनका एक आम उत्तर होता है कि ये गुफायें पांडवों ने बनाई हैं। लोक मान्यताओं के अनुसार गोवा की सभी गुफाएं भी पांडव गुफाएं हैं। वे तो यह भी कहते हैं कि ताम्बडी सुर्ला का निर्माण कदंब वंश ने नहीं, अपितु पांडवों ने किया है। यह अनुभव आपने भी किया होगा।

अनुराधा –  जी। एक यात्री के रूप में मेरा यह अनुमान है कि ये प्राचीन गुफाएं यात्रियों के लिए बनाई जाती थीं ताकि वे विश्राम कर सकें, रात्रि व्यतीत कर सकें। यह शोध करना आवश्यक है कि क्या इन गुफाओं के मध्य की दूरी एक दिवस में पदयात्रा द्वारा पूर्ण की जा सकती है?

प्रा. प्रजल – जी।

मंदिरों के उत्सव

अनुराधा – भारत के मंदिरों के अत्यंत अनोखे उत्सव होते हैं। मुझे भिन्न भिन्न मंदिरों में जाना तथा उनके विषय में जानना अत्यंत भाता है। मैंने गोवा के अनेक मंदिरों के उत्सवों में भी भाग लिया है, जैसे त्रिपुरारी पूर्णिमा का मध्यरात्री नौका उत्सव, चिखल कालो का विश्व-स्तर का माटी उत्सव, अनूठा शीशा रन्नी इत्यादि। इन उत्सवों का भारत के अन्य भागों से क्या सम्बन्ध है? ये देव एवं इन उत्सवों की पृष्ठभागीय कथाएं सभी स्थलों पर समान ही है किन्तु इन उत्सवों के आयोजनों में भिन्नता आ जाती है। जैसे चिखल कालो उत्सव का सम्बन्ध कृष्ण से है। यह उत्सव देवकी-कृष्ण मंदिर के समक्ष मनाया जाता है जिसमें वे खेल खेले जाते हैं जो कृष्ण स्वयं खेलते थे।

गोवा के उत्सव अत्यंत विशेष होते हुए भी विश्व के अन्य क्षेत्रों के हिन्दू उत्सवों से किसी ना किसी प्रकार से जुड़े हुए हैं। आपका इस विषय में क्या मत है?

प्रा. प्रजल – गोवा के उत्सवों में कुछ दीपावली जैसे देशव्यापी उत्सव हैं तो कुछ गणेश उत्सव जैसे राज्य विशेष उत्सव हैं। इनके अतिरिक्त कुछ स्थानिक उत्सव हैं, कुछ लोक उत्सव हैं तथा कुछ ऐसे उत्सव हैं जिनमें जादू-टोना तथा झाड-फूंक की क्रियाएं भी सम्मिलित होती हैं।

जात्रा

दृष्टांत के लिए नार्वें में एक जात्रा होती है जिसे भूतांची जात्रा कहते हैं। यह स्त्रियों के भूतों का उत्सव है। ऐसी मान्यता है कि जब कोई गर्भवती हिन्दू स्त्री मातृत्व का आनंद प्राप्त करने से पूर्व ही प्रसव के समय मृत्यु को प्राप्त होती है, वे भूत बन जाती हैं। ऐसा कहा जाता है कि उनकी अतृप्त आत्माएँ नार्वें के इस उत्सव की रात्रि में सक्रिय हो जाती हैं। इस उत्सव में मशना देवी (मशना, स्मशान शब्द का अपभ्रंश है) की आराधना की जाती है। ये सभी अतृप्त आत्माएँ यहीं आती हैं। मैं अपने विद्यार्थियों से साथ यह उत्सव देखने गया था। वहां के स्थानिकों ने हमें सूर्यास्त के पश्चात वहां से जाने के लिए कहा अन्यथा आईवान्तिन अर्थात् अतृप्त स्त्रियों की आत्माएँ हम पर आक्रमण करेंगी। उन्होंने एक व्यक्ति का उदाहरण दिया जिसने उन आत्माओं को चुनौती दी थी। दूसरे दिन उसकी मृत देह एक वृक्ष से लटकती पायी गयी। कथाएं एवं मान्यताएं जो भी हों, यह उत्सव नार्वें में अब भी मनाया जाता है।

दसरो

पेडने में एक उत्सव मनाया जाता है जिसका नाम है दसरो। ऐसा कहा जाता है कि यहाँ देह में से भूतकाढा अर्थात भूत निकालने की प्रक्रिया की जाती है। इनके अतिरिक्त, एक उत्सव है, शीशारन्नी जहां चार व्यक्ति शयनावस्था में अपने सिरों को जोड़कर चूल्हा बनाते हैं तथा उस चूल्हे में भात पकाया जाता है। वे उस भात में रक्त की बूँदें भी मिलाते हैं। तत्पश्चात वह भात प्रसाद के रूप में लोगों में बांटा जाता है। चोरोत्सव अर्थात् चोरों का उत्सव नामक भी एक उत्सव है जो सत्तरी तालुका के जर्मे तथा करंजोल में आयोजित किया जाता है। इसमें लोगों को कंठ तक धरती में गाड़ा जाता है। ऐसा माना जाता है कि जिसने भी प्राचीनकाल में चोरी की हो, कोई पाप किया हो अथवा हत्या की हो, वे इस प्रकार का अनुष्ठान कर पश्चाताप करते हैं। इससे उनका पाप समाप्त हो जाता है।

अनुराधा – यह एक प्रकार से प्राचीन घटनाओं एवं स्मृतियों को पुनः सजीव करने की प्रथा प्रतीत होती है। शीशारन्नी एवं चोरोत्सव के विषय में भी मेरा अनुमान है कि प्राचीन काल में हुई किसी घटना को इन अनुष्ठानों के माध्यम से स्मरण किया जाता है। बाहर से आकर गोवा में छह वर्ष व्यतीत करने के पश्चात मैं यह कह सकती हूँ कि अपने गाँवों में गोवा एक प्राचीन भारत की सभ्यता को जी रहा है। अपनी स्मृतियों को पुनर्जीवित कर रहा है। यह प्राचीन काल की हिन्दू संस्कृति है। यह शहरी हिन्दू सभ्यता अथवा तीर्थ स्थलों की हिन्दू मान्यताओं से भिन्न हैं। यह कठिन है किन्तु फिर भी पूर्ण रूप से हिन्दू उत्सव हैं क्योंकि ये सभी उत्सव मंदिरों में देवों के समक्ष मनाये जाते हैं।

अब आप हमें बताएं कि कदंब शासकों के पश्चात गोवा पर किन महत्वपूर्ण शासकों ने शासन किया था?

शासक राजवंश – पूर्व-पुर्तगाली गोवा

प्रा. प्रजल –  कदंब शासकों के पश्चात गोवा पर विजयनगर साम्राज्य का अधिपत्य स्थापित हुआ। विजयनगर कर्णाटक का अत्यंत शक्तिशाली साम्राज्य था। उनकी सदा बाहमानियों से शत्रुता रही। सम्पूर्ण १४वीं एवं १५वीं शताब्दी में गोवा पर कभी विजयनगर तो कभी बाहमानियों का आधिपत्य रहा। घोड़ों के व्यापार पर सम्पूर्ण अधिकार प्राप्त करने के प्रयोजन से वे गोवा पर आधिपत्य स्थापित करने के लिए आपस में युद्ध करते रहे। उस काल में अरब के व्यापारी पुराने गोवा में घोड़ों का अत्यंत लाभप्रद व्यापार कर रहे थे। जिसे “ए-एला” कहा जाता था। इसी कारण गोवा का आधिपत्य इन दो शक्तियों के मध्य डोलता रहा।

विजयनगर साम्राज्य

अनुराधा – क्या गोवा में विजयनगर साम्राज्य को कोई चिन्ह शेष है?

प्रा. प्रजल – जी हाँ। कुडने गाँव में स्थित जैन मंदिर १५वीं शताब्दी के विजयनगर साम्राज्य की देन है। बांदोड़ा की जैन बसदी, नेमिनाथ बसदी भी विजयनगर काल की है। अतः विजयनगर साम्राज्य के प्रत्यक्ष अवशेष तो हैं ही, साथ ही सप्तकोटेश्वर जैसे मंदिर के रूप में भी उनकी छाप है जिसे सर्वप्रथम कदंब साम्राज्य ने निर्मित किया, तत्पश्चात विजयनगर साम्राज्य ने उनका नवीनीकरण किया। बांदोड़ा के नागेशी मंदिर में प्रदर्शित एक शिलालेख में विजयनगर राजा, देवराया प्रथम का नाम एवं समय वर्ष १४१३ उल्लेखित है। गोवा में विजयनगर साम्राज्य की अमिट छाप है।

अनुराधा – विजयनगर साम्राज्य के पश्चात बहमानियों का शासन था कि आदिलशाह का?

प्रा. प्रजल – १४९८ में आदिलशाह का साम्राज्य था। उसके पश्चात पुर्तगालियों ने १५१० में गोवा को अधिकृत किया।

अनुराधा – इसके पश्चात की ऐतिहासिक घटनाएं जनता भलीभांति जानती है।

पुर्तगाली काल

प्रा. प्रजल –  पुर्तगाली काल का इतिहास लोग भलीभांति इसलिए जानते हैं क्योंकि पुर्तगाली उत्तम इतिहासकार थे तथा उन्होंने सभी घटनाक्रमों का क्रमवार आलेखन किया है। पणजी अभिलेखागार में आपको सभी पुर्तगाली संलेख मिल जायेंगे। मैंने स्वयं भी उनसे ही जानकारी एकत्र की है।

अनुराधा – १५वीं व १६वीं सदी के पश्चात से हमारे पास सम्पूर्ण भारत में उत्तम ऐतिहासिक प्रलेखन उपलब्ध हैं। हमारे पास मुगल काल के भी ऐतिहासिक प्रलेखन उपलब्ध हैं क्योंकि वे घटनाएँ समयचक्र में अधिक प्राचीन नहीं हैं, साथ ही तब तक ऐतिहासिक घटनाओं के प्रलेखन की प्रथा आरम्भ हो गयी थी। किन्तु आश्चर्य होता है कि ३५० वर्षों का कदंब शासन मुगल काल से अधिक होने के पश्चात भी अधिक ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

प्रा. प्रजल – जी। मुगलों ने ३३२ वर्षों तक राज किया था। कदंब साम्राज्य उससे अधिक था।

अनुराधा – कुछ समय पूर्व मेरे कुछ जानकार गिनती कर रहे थे कि किन किन शासकों ने भारत में मुगलों से अधिक समय तक राज किया था, क्योंकि लोगों में यह भ्रान्ति है कि मुगलों का साम्राज्य सर्वाधिक समय तक था।

प्रा. प्रजल –  वस्तुतः, गोवा पर चोल, अहोम, पंड्या इत्यादि राजवंशों का भी अनेक वर्षों तक साम्राज्य था। किन्तु इनके विषय में अधिक सिखाया नहीं जाता तथा इनके विषय में जनता के ज्ञानकोष में भी अधिक कुछ उपलब्ध नहीं है।

अनुराधा – सही इतिहास पढ़ाना अत्यंत आवश्यक है। विद्यालयों में इतिहास को भी वही मान व महत्ता दी जानी चाहिए जो विज्ञान अथवा गणित को प्राप्त है। जितना प्रगाड़ सम्बन्ध हमारा  विज्ञान से है, उतना ही विशेष सम्बन्ध हमारा इतिहास से है। भूतकाल के बिना भविष्य काल गढ़ना संभव नहीं है।

प्रा. प्रजल –  गोवा ही नहीं, भारत के सभी भागों का अपना इतिहास है जिसे जानना व समझना आवश्यक है। कश्मीर का भी एक महान इतिहास है। सुगंधा एवं दिद्दा जैसी रानियों ने वहाँ राज किया था। उल्लाल की रानी अब्बक्का चौता ने पुर्तगालियों से युद्ध किया था।  कित्तूर की रानी चेन्नम्मा ने अंग्रेजों से युद्ध किया था।

गोवा के महत्वपूर्ण दर्शनीय ऐतिहासिक स्थल

अनुराधा – आज के इस साक्षात्कार के अंत में मैं चाहती हूँ कि आप श्रोताओं को गोवा के कुछ सर्वाधिक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दर्शनीय स्थलों के विषय में बताएं जिससे उन्हें गोवा को जानने व समझने में आसानी होगी।

प्रा. प्रजल –  इसके लिए उन्हें कुशावती नदी के तीर स्थित पन्सोइमल शैलचित्र के स्थल पर जाना चाहिये। पुराना गोवा देखना चाहिए। गोवा की प्रथम राजधानी चांदोर, तम्बडी सुर्ला मंदिर, ओपा का सप्तकोटेश्वर मंदिर, दिवे द्वीप का सप्तकोटेश्वर मंदिर या पोर्ने तीर्थ, मर्दोल का महालसा मंदिर, सालावली बाँध के निकट कुर्डी का महादेव मंदिर इत्यादि के दर्शन करना व समझना चाहिए। पर्यटक सालावली बाँध देखने तो आते हैं किन्तु महादेव मंदिर नहीं देखते जिसे कुर्डी से लाकर पुनः संरचित किया है। इसे मूलतः कदंब राजा शिष्टदेव प्रथम ने बनवाया था।

गोवा पर्यटन

अनुराधा – मैं हृदय से आशा करती हूँ कि गोवा पर्यटन इसका संज्ञान ले तथा आपका सहयोग लेकर पूर्व-पुर्तगाली गोवा पर्यटन स्थलों को प्रकाश में लेकर आये। मैं जानती हूँ कि आपसे जानने के लिए अब भी बहुत कुछ शेष है, किन्तु हमें आज का साक्षात्कार यहीं समाप्त करना पड़ेगा। आशा है कि आपसे शीघ्र ही पुनः भेंट होगी।

डीटूर्स में आने के लिए आपका धन्यवाद। यह हमारा सौभाग्य था कि हमें आपसे इतना कुछ जानने एवं समझने का अवसर प्राप्त हुआ।

प्रा. प्रजल –  गोवा की संस्कृति के अनुसार, इन शब्दों से मैं आपसे आज्ञा लेता हूँ, देव बरे करों

पूर्व-पुर्तगाली गोवा पर प्रजल साखरदांडे से हुई चर्चा की लिखित प्रतिलिपि IndiTales Internship Program के अंतर्गत हर्षिल गुप्ता ने तैयार की।  ऑनलाइन प्रकाशन के लिए संकलित।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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प्राचीन बंगाल में व्यापार- एक चर्चा अनीता बोस जी से https://inditales.com/hindi/prachin-bengal-ka-itihasa-anita-bose/ https://inditales.com/hindi/prachin-bengal-ka-itihasa-anita-bose/#respond Wed, 20 Oct 2021 02:30:48 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2448

अनुराधा गोयल: नमस्ते! डीटूर्स में आपका मनःपूर्वक स्वागत है। आज डीटूर्स के इस संस्करण में हमारे साथ चर्चा करने के लिए उपस्थित हैं, कोलकाता से श्रीमती अनीता बोस जी। अनीताजी एक लेखिका हैं, एक कलाकार हैं, एक स्वतन्त्र शोधकर्ता हैं, बैंकाक के राष्ट्रीय संग्रहालय में परिदर्शिका रह चुकी हैं तथा ग्लोबल रामायण इंसाइक्लोपीडिया प्रकल्प की […]

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अनुराधा गोयल: नमस्ते! डीटूर्स में आपका मनःपूर्वक स्वागत है। आज डीटूर्स के इस संस्करण में हमारे साथ चर्चा करने के लिए उपस्थित हैं, कोलकाता से श्रीमती अनीता बोस जी। अनीताजी एक लेखिका हैं, एक कलाकार हैं, एक स्वतन्त्र शोधकर्ता हैं, बैंकाक के राष्ट्रीय संग्रहालय में परिदर्शिका रह चुकी हैं तथा ग्लोबल रामायण इंसाइक्लोपीडिया प्रकल्प की संयोजक हैं। उनके द्वारा लिखित दो पुस्तकें हैं, “Ramayana: Footprints in South-East Asian Culture and Heritage” तथा “Patachitra of Odisha and Jagannath Culture”। आज हम अनीताजी से बंगाल के प्राचीन ऐतिहासिक तथ्यों पर चर्चा करेंगे।

नमस्ते अनीताजी! डीटूर्स में आपका हृदयपूर्वक स्वागत है।

अनीता बोस: नमस्ते अनुराधाजी! डीटूर्स में मुझे आमंत्रित करने के लिए धन्यवाद।

पॉडकास्ट

प्राचीन बंगाल की यात्रा कराती इस चर्चा को यहाँ सुनिए।

प्राचीन बंगाल- डीटूर्स में अनीता बोस से एक चर्चा

अनुराधा: अनीताजी, आईये इस चर्चा का आरंभ हम उस स्थान से करते हैं, जहां बंगाल की प्राचीनतम जीवंत धरोहर उपस्थित है। बंगाल का प्राचीनतम ज्ञात स्वरूप क्या है?

अनीता: प्राचीन बंगाल को हम साधारणतः औपनिवेशिक बंगाल, ब्रिटिश बंगाल अथवा मुगल बंगाल के रूप में जानते हैं, किन्तु बंगाल का इतिहास इन कालखण्डों से कहीं अधिक प्राचीन है। यूनानी यात्री मेगस्थनीज ने अपनी यात्रा संस्मरण पुस्तक इंडिका में प्राचीन बंगाल का उल्लेख किया है। इसके अतिरिक्त दक्षिण-पूर्वी एशिया के अनेक समुद्री यात्रा संस्मरणों में भी इसका निरंतर उल्लेख मिलता है। अतः बंगाल का इतिहास हमारी जानकारी से भी कहीं अधिक पूर्व आरम्भ हुआ था। ऐतिहासिक आलेखों के अनुसार इसका आरम्भ ईसापूर्व हुआ था। यह अत्यंत प्राचीन तथा अतिसंपन्न धरोहर स्थल है। पूर्व में इसे बंगहृदय कहते थे जिसका अर्थ बंगाल हृदय है, अर्थात भारत के सम्पूर्ण पूर्वी भाग का हृदय। मुगल एवं ब्रिटिश इसकी संपन्न धरोहर से आकर्षित होकर यहाँ खिंचे चले आये थे।

मेगस्थनीज पुस्तक इंडिका

मेगस्थनीज की इंडिका के अनुसार, एक समय सिकंदर की भेंट एक नागा सन्यासी से हुई थी। वह उस सन्यासी के जीवन एवं उसके दार्शनिक विचारों से अत्यंत प्रभावित हुआ था। जब सिकंदर को यमुना नदी पार कर भारत के इस भाग में आने की चाह उत्पन्न हुई तब उसने एक दूत भेजकर सन्यासी को अपने निर्णय से अवगत कराया। सन्यासी ने सिकंदर को रोकते हुए कहा कि क्या तुम इस भाग पर आधिपत्य जमाकर प्रसन्न नहीं हो जो उस पार जाना चाहते हो? वहां मत जाओ क्योंकि वहां बंग नामक एक स्थान है, जहां के निवासी अत्यंत शक्रिशाली एवं पराक्रमी हैं। तुम उन्हें हरा नहीं सकोगे।

बिश्नुपुर के टेराकोटा मंदिर
बिश्नुपुर के टेराकोटा मंदिर

मेगस्थानीज द्वारा दिया यह उल्लेख बंगो का सर्वप्रथम प्रलेखित इतिहास है। पेरिप्लस तथा क्लाडियस टॉलमी ने भी बंग का उल्लेख किया है। टॉलमी के मानचित्र में भी दो संपन्न क्षेत्रों का उल्लेख है, बंग तथा प्रासी अथवा प्रास्वयी।

अनुराधा: क्या बंग में वर्तमान का पश्चिम बंगाल, बांग्लादेश, त्रिपुरा तथा आसाम के क्षेत्र भी सम्मिलित थे?

अनीता: जी हाँ।

घोड़ों का व्यापार

अनीता: बंगाल में समुद्री व्यापार के अंतर्गत घोड़ों का व्यापार प्रमुख था। बंगाल से घोड़ों को ना केवल भारत के अन्य स्थानों तक पहुँचाया जाता था, अपितु इन घोड़ों को यूनान, प्राचीन चीन, तत्पश्चात कम्बुजा, मलय, सुमात्रा तथा फिलिपीन तक भेजा जाता था। बंगाल की भौगोलिक अवस्थिति समुद्र तथा नदी, दोनों के अत्यंत निकट होने के कारण समुद्री व्यापार नदी परिवहन पर आश्रित था।

इस प्रकार, बौंगो हृदय अथवा गंगा हृदय बंगाल का प्राचीनतम कबीला था। आप उनके विषय में History of early southeast Asia by Kenneth R Hall में पढ़ सकते हैं। पुरातात्विक साक्ष्य प्रस्तुत करते हुए वे कहते हैं कि गंगा के तट पर स्थित बंगाल के मैदानी क्षेत्र २री एवं ३री सदी में अत्यंत लोकप्रिय थे। बंगाल की खाड़ी से चीन के दक्षिणी भाग के मध्य समुद्री मार्ग द्वारा माल का परिवहन एवं व्यापार होता था।

अनुराधा: बंगाल के प्राचीन बंदरगाहों के विषय में कुछ बताएं।

बंगाल के प्राचीन बंदरगाह

प्राचीन बंगाल में व्यापर
प्राचीन बंगाल में व्यापर

अनीता: गंगाहृदय बंगाल का प्रथम बंदरगाह था। उसके पश्चात चंद्रकेतुगढ़ तथा सप्तगाँव या सातगाँव बंदरगाह अस्तित्व में आये। सातगाँव बंदरगाह एक प्रसिद्ध बंदरगाह था जहां विशाल जहाज लंगर डालते थे। प्राचीन होने के कारण इसे अब आदिसप्तग्राम कहते हैं। इसे देवानंदपुर भी कहा जाता है। सन् १५६० में फ्रांसीसी यात्री सीजर फ्रेड्रिसेह ने सप्तगाँव की समृद्धि की तुलना श्री लंका से की थी। उसने गांववासियों के स्वर्ण आभूषणों एवं स्वर्णजड़ित वास्तुशैली का भी उल्लेख किया था। एक अन्य ब्रिटिश यात्री ने भी १५८३ में सप्तगाँव की यात्रा की थी तथा यहाँ की समृद्धि के विषय में लिखा था। सातगाँव अत्यंत लोकप्रिय था। सातों गाँवों के तट पर विशाल सभ्यता पनप रही थी। यह कोलकाता से अधिक दूर नहीं है।

अनुराधा: सप्तगाँव एवं चंद्रकेतुगढ़ में कौन सा बंदरगाह अधिक प्राचीन है?

अनीता: चंद्रकेतुगढ़ अधिक प्राचीन है क्योंकि कुछ सूत्र इसे १२वीं ईसा पूर्व बताते हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अनुसार यह कम से कम ४ ईसापूर्व प्राचीन है।

गंगासागर

अनुराधा: अनीताजी, पौराणिक कथाओं में गंगानगर का उल्लेख किया गया है। गंगानगर हमारे महाकाव्यों का एक महत्वपूर्ण अंग है। आज बंगाल के निवासियों के लिए गंगानगर का क्या महत्त्व है?

अनीता: गंगानगर का सम्बन्ध कपिल मुनि से है। यहाँ कपिल मुनि का आश्रम था। आज मूल आश्रम का स्थान भिन्न है क्योंकि गंगा नदी निरंतर अपना मार्ग परिवर्तित करती रहती है। हम सब भागीरथ एवं राजा सगर के १०० पुत्रों की कथा जानते ही हैं। ऋषि भागीरथ के नाम पर गंगा को भागीरथी कहा जाता है। बंगाल में इसे आज भी भागीरथी कहा जाता है। यह मुर्शीबाद से सातगाँव की ओर आती है। तत्पश्चात त्रिवेणी तक आती है। एक त्रिवेणी प्रयागराज में है तथा एक त्रिवेणी सप्तग्राम में है। गंगा, यमुना, सरस्वती का त्रिवेणी संगम सप्तग्राम के समीप होने के कारण यह एक महत्त्वपूर्ण बंदरगाह था।

अनुराधा: वही तीन नदियाँ?

अनीता: उस काल में सातगाँव में प्रमुख बंदरगाह तथा व्यापार सरस्वती नदी पर निर्भर थे।

अनुराधा: समुद्री व्यापार पर चर्चा से पूर्व मैं यह जानना चाहती हूँ कि क्या गंगासागर में आज भी किसी प्रकार के वार्षिक अथवा नियमित उत्सव मनाये जाते हैं? क्या वे प्रत्येक वर्ष आयोजित होते हैं?

अनीता: जी हाँ। गंगानगर में पौष संक्रांति के दिन विशाल पौष मेले का आयोजन किया जाता है। भारत के कोने कोने से लोग इस उत्सव में भाग लेने, ध्यान करने तथा पवित्र स्नान करने के लिए आते हैं। यह एक प्रकार से कुम्भ मेले के ही समान है। यह प्रत्येक वर्ष आयोजित किया जाता है।

अनुराधा: प्राचीन सभ्यता की एक डोर अनेक सदियों पश्चात भी जीवंत है, यह देख अत्यंत आनंद हुआ।

अनीता: गंगासागर एवं कपिल मुनि के आश्रम का रामायण साधुओं से एक प्राचीन सम्बन्ध है। रामायण गाने वाले तथा रामायण की कथा सुनाने वाले साधुओं को बंगाल में रामायण साधू कहते हैं जो मूलतः प्राचीन कपिल मुनि आश्रम से सम्बंधित हैं। यद्यपि वर्तमान में ऐसे साधुओं की संख्या अल्प है, तथापि रामायण साधुओं एवं कपिल मुनि आश्रम के मध्य सम्बन्ध अब भी जीवित है।

व्यापार

अनुराधा: इस संस्करण के पाठकों को यह जानकार अत्यंत प्रसन्नता होगी कि प्राचीन सभ्यता के अंश अब भी जीवित हैं। आपके तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि अंग्रेजों के कोलकाता में प्रवेश से पूर्व ही बंगाल एक महत्वपूर्ण व्यापारिक बंदरगाह था। इस बंदरगाह से किन वस्तुओं का व्यापार होता था? कौन सी वस्तुओं का प्रमुखता से आयात एवं निर्यात होता था? कृपया इस विषय में कुछ बताएं।

अनीता: उस समय बंग अविभाजित था। उसका बांग्लादेश एवं बंगाल में विभाजन नहीं हुआ था। सम्पूर्ण दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र में, बंग उच्च स्तर के कपास एवं मलमल के लिए प्रसिद्ध था। ये वस्त्र इतने मुलायम एवं महीन होते थे कि उन्हें एक अंगूठी के मध्य से निकाला जा सकता था। बंगाल से इन वस्त्रों का दक्षिण-पूर्वी क्षेत्रों में निर्यात किया जाता था, विशेषतः सुमात्रा, फिलिपिन्स, मलक्का, मलय, जावा इत्यादि। इसके अतिरिक्त इन व्यापार मार्गों द्वारा अन्य अनेक वस्तुओं का आयात-निर्यात होता था, जैसे चावल, सूखे मेवे, फल, तेजपत्ता, सुपारी इत्यादि। इब्न बतूता ने भी अपने यात्रा संस्करणों में लिखा है कि भारत के पूर्वी भागों, बंगभूमि का तेजपत्ता ना केवल मसाले के रूप में प्रसिद्ध है, अपितु अपनी सुगंध के लिए भी लोकप्रिय है।

सुपारी   

अनीता: एक बार हम थाईलैंड के प्राचीन बंदरगाह में गए थे। वहां एक छोटा सा संग्रहालय था। वहां के संग्रहाध्यक्ष ने मुझे प्राचीनकाल में संग्रहीत बंगाल की सुपारी एवं कुम्हारी की कलाकृतियाँ दिखाई। इससे सिद्ध होता है कि मुगल एवं ब्रिटिश के आगमन से पूर्व ही बंगाल के बंदरगाहों की व्यापार में महत्वपूर्ण भूमिका थी। बंगाल का विश्व के अन्य भागों से अत्यंत प्राचीन सम्बन्ध है।

अनुराधा: प्राचीनकाल में हम बंगाल से कपास, सूखे मेवे, तेजपत्ता, सुपारी इत्यादि का निर्यात करते थे। विनिमय के रूप में हम वहां से क्या आयात करते थे?

अनीता: कुछ समाजशास्त्रियों एवं पुरातत्वविदों का मानना है कि विनिमय के रूप में हम स्वर्ण मुद्राओं तथा हस्तिदंत का आयात करते थे। हम धन अर्जित करने में सक्षम थे क्योंकि हमारा देश पूर्णतः आत्मनिर्भर था। मेरे पिता एक नौसैनिक थे। देश-विदेश की जलयात्रा करने के पश्चात उनका अनुभव कहता था कि सम्पूर्ण विश्व में भारत जैसा देश नहीं है। इसीलिए हमारे व्यापारी अपनी इच्छित वस्तुओं का आयात करने में पूर्णतः सक्षम थे। उन्हें इंडोनेशिया एवं जापान की अप्रतिम कलाकृतियों में विशेष रूचि होती थी। इनके अतिरिक्त, वे विनिमय के रूप में बर्मा से माणिक एवं आभूषणों का भी आयात करते थे।

बहुमूल्य धातु एवं माणिक

अनुराधा: क्या हम सभी प्रकार के बहुमूल्य धातु एवं माणिक आयात कर रहे थे? कदाचित स्वर्ण भी ऐसे ही एकत्र किया था?

अनीता: कुछ बहुमूल्य धातु एवं माणिक अवश्य आयात किये थे। जहां तक स्वर्ण का प्रश्न है, रोम एवं यूनान में तो कहावत ही थी कि भारत उन्हें कपास निर्यात करने की एवज में उनका स्वर्ण ले जाता है।

प्राचीन मंदिर

अनुराधा: इसका अर्थ है कि हमारे कपास का महत्त्व उनके स्वर्ण के समान था। अनीताजी, आपने हमें पौराणिक से प्राचीन, तत्पश्चात मध्ययुगीन बंगाल के विषय में बताया। क्या उस काल के कुछ अवशेष हैं जिन्हें हम देख सकते हैं? क्या कोई प्राचीन मंदिर अथवा प्राचीन बंदरगाह अब भी शेष हैं?

अनीता: पूर्वकालीन बंगाल अब पश्चिम बंगाल एवं बंगला देश में विभाजित हो चुका है। विभाजन के समय अनेक बहुमूल्य धरोहरों को नष्ट किया गया था। फिर भी, महास्थानगढ़ विश्वविद्यालय अब भी है। हम सब नालंदा के विषय में जानते हैं किन्तु महास्थानगढ़ के विषय में अधिक लोगों को जानकारी नहीं है। यह ७०० ईसा पूर्व का अत्यंत प्राचीन स्तूप विश्वविद्यालय है। अब यह बांग्लादेश में स्थित है।

कोलकता से लगभग १०० किलोमीटर दूर, बर्धमान एवं बांकुरा जिलों में ७वीं – ८वीं सदी के कई प्राचीन मंदिर अब भी शेष हैं, जैसे सोनातपल (शोनातपल) मंदिर, देउलघाटा पुरुलिया, बांकुरा मंदिर, जौटारदेउल, बहुलारा मंदिर, सातदेउल, पाकुरिया इत्यादि।

अनुराधा: बंगाल के कुछ प्राचीनतम मंदिरों की वास्तुशैली एवं निर्माण सामग्री के विषय में कुछ बताएं।

अनीता: यदि आप ८वीं – ९वीं सदी के मंदिर देखेंगे तो उनमें प्रमुख रूप से टेराकोटा (लालमिट्टी) के मंदिर हैं। कुछ मंदिरों में शिलाओं का प्रयोग किया गया है। एक अत्यंत प्राचीन एवं विशाल टीला भी है जिसे पांडू राजार धिबी कहते हैं। यह बर्धमान में है। लोग महाभारत के पांडू राजा से इसका सम्बन्ध मानते हैं। इसका उत्खनन बी. बी. लाल के निर्देशन में किया गया था। उनके अनुसार यह १६००-१७०० ईसा पूर्व का अवशेष है। उन्हें वहां ताम्रयुग के ताम्बे के एवं मिट्टी के पात्र प्राप्त हुए थे। हमारी संस्कृति पर अधिक शोध करने की आवश्यकता है।

प्राचीन मंदिरों की धरोहर

अनुराधा: यदि किसी को प्राचीन धरोहरों के अवलोकन में रुची जो तो उन्हें कौन से मंदिर देखने चाहिए?

अनीता: ८वीं सदी का गोकुल मठ मंदिर पाल वास्तुशैली का मंदिर है। यह बांग्लादेश के बोगुरा जिले में स्थित है। कोलकाता के समीप, दक्षिण २४ परगना में १०वीं सदी का जौटारदेउल मंदिर है। यह डायमंड बंदरगाह के समीप है। बांकुरा जिले में भी ८वीं सदी का एक अत्यंत सुन्दर बहुलारा मंदिर है।

अनुराधा: मैंने पाल युग की अनेक कलाकृतियाँ भारत के कई संग्रहालयों में देखी हैं। उनमें से अधिकतर पटना संग्रहालय में तथा कुछ दिल्ली संग्रहालय में भी हैं। वे सभी अत्यंत आकर्षक, सूक्ष्मता से उत्कीर्णित काली शिलाओं की कलाकृतियाँ थीं। काली शिलाएं बंगाल में नहीं पायी जाती हैं। उन्हें अवश्य बाहर से लाया गया होगा। क्या पाल युग के मंदिर अथवा अन्य संरचनाएं अब भी शेष हैं?

अनीता: यदि आप भारतीय संग्रहालय में जाएँ तो आप उस युग की अनेक कलाकृतियाँ देख सकते हैं। पाल युग के अप्रतिम रूप से उत्कीर्णित शैल प्रतिमाएं, विशेषतः बोधिसत्व तथा बौद्ध तारा की प्रतिमाएं अत्यंत आकर्षक हैं। यदि आप बिश्नुपुर अथवा बांकुरा जाएँ तो उस ओर मल्ल वंश का राज था।

अनुराधा: मल्ल राजवंश १६०० ईसवी लगभग में अस्तित्व में था। मुझे उससे पूर्व की जानकारी चाहिए।

अनीता: जब आप सोनातपल मंदिर या बहुलारा मंदिर देखेंगे तो आपको उनकी उत्कृष्ट संरचना की झलक प्राप्त होगी। अब ऐसे मंदिरों की संख्या अत्यंत अल्प हो गयी है। बिश्नुपुर में एक छोटा संग्रहालय है जहां आप पाल युग की कुछ प्राचीन कलाकृतियाँ देख सकते हैं। अधिकतर कलाकृतियाँ अब भारत के बाहर हैं।

मैं जब प्राचीन सुरबाया में थी तब मैंने  मजापहित तथा मोजोकेरतो देखे। उनकी संरचना, वास्तुशैली तथा आसपास की संरचनाएं एवं परिदृश्य ठीक वैसे ही थे जैसे मैंने देउलघाटा एवं सोनातपल में देखे थे। उनमें से अधिकतर सूर्य मंदिर तथा विष्णु मंदिर थे। ११वीं शताब्दी में दोनों की समरूप स्थिति थी।

अनुराधा: क्योंकि उन दोनों में एक प्रगाढ़ सम्बन्ध था।

सूर्य की आराधना

अनुराधा: क्या बंगाल में सूर्य की आराधना का भी प्रचलन है? हम बंगाल को साधारणतः चंडी पूजा अथवा देवी पूजा से जोड़ते हैं।

अनीता: जी हाँ। बंगाल में माँ शक्ति की आराधना अवश्य की जाती है, किन्तु बंगाल में सूर्य की आराधना भी प्रचलित है। यदि आप बंगाल से दक्षिण-पूर्वी एशिया की ओर जाएँ तो समुद्र किनारे के सभी स्थानिक माता की आराधना करते हैं।

अनुराधा: इसके लिए आप कौन सा मार्ग अपनाती है? क्या आप बंगाल से ओडिशा की ओर जाती हैं?

अनीता: जी नहीं। मैं बंगाल से बर्मा, तत्पश्चात कम्बोज थाईलैंड की ओर जाती हूँ। इसे पूर्व में शैम कम्बोज कहते थे। वे उमादेवी की भक्ति करते थे।

बैंकाक में उमा देवी की प्रतिमा
बैंकाक में उमा देवी की प्रतिमा

अनुराधा: जी, मैंने उमादेवी की प्रतिमा देखी है।

अनीता: उमादेवी माँ दुर्गा का ही रूप हैं। इंडोनेशिया में आप महिषासुरमर्दिनी की अनेकों प्रतिमाएं देख सकते हैं। बाली में देवी लक्ष्मी की आराधना की जाती है। उनका सम्बन्ध भी बंगाल से है। प्रत्येक बंगाली घर में हर बहस्पतिवार को लक्ष्मी की पूजा की जाती है। उनका सम्बन्ध धान की खेती से है, इसलिए उन्हें धनलक्ष्मी कहा जाता है। बाली में भी लक्ष्मी को धनलक्ष्मी कहा जाता है। बाली में देवी सरस्वती की भी वर्ष में दो बार पूजा आयोजित की जाती है।

अनुराधा: बंगाल में अप्रतिम सरस्वती मंदिर भी हैं ना?

अनीता: जी, बंगाल में अत्यंत सुन्दर सरस्वती मंदिर भी हैं।

बंगाल में पोइला बैसाख अर्थात् वैशाख मास का प्रथम दिवस का उत्सव मनाया जाता है। आसाम में इसे बीहू कहा जाता है। पंजाब में इसे ही बैसाखी कहते हैं। सम्पूर्ण दक्षिण-पूर्वी एशिया में बैसाखी का उत्सव भिन्न भिन्न नामों से जाना एवं मनाया जाता है। संक्रांति को बर्मा में थिनग्युमिन कहते हैं।

बंगाल, आसाम तथा पंजाब के कुछ भाग बंगाल बंदरगाह द्वारा ही अपना व्यापारिक आदान-प्रदान करते थे। ऐंगो-बौंगो कलिंगो बंदरगाह को कलिंगन तथा बंगन भी कहते हैं। फुकट में एक स्थान है जिसका नाम बांग्ली है। बांग्ली लोग बंग से तथा क्लिंग लोग कलिंगा से आये हैं। दक्षिणपूर्वी एशिया के अनेक क्षेत्रों में क्लिंग एवं बांग्ली लोग रहते हैं।

बंगाल से श्री लंका तक समुद्री मार्ग

अनुराधा: मैंने कुछ दिवसों पूर्व ही चंडीमंगल पढ़ा था जो बंगाल का १५वीं-१६वीं सदी का भाष्य है। इसमें बंगाल से श्रीलंका तक के समुद्री मार्ग का विस्तृत वर्णन है। उसमें मध्य स्थित प्रयेक बंदरगाह का उल्लेख किया गया है।

अनीता: यदि आप श्रीलंका का इतिहास देखेंगे तो उसका सिंघल नामकरण राजकुमार विजयसिंघा ने किया था जो बंगाल का था। इस प्रकार दक्षिणपूर्वी एशिया के अनेक ऐसे आश्चर्यजनक सत्य एवं ऐतिहासिक तथ्य हैं जो उन्हें बंगाल से जोड़ते हैं।

अनुराधा: हमें इस विषय में अधिक विस्तृत चर्चाएँ करनी चाहिए ताकि हम सब जान सकें कि भारत एक वैश्विक देश है।

अनीता: जी हाँ, भारत ने सदैव वसुधैव कुटुम्बकम के सिद्धांत का पालन किया है।

अनुराधा: अनीताजी, बंग की इस अप्रतिम यात्रा पर हमें ले चलने के लिए आपका बहुत धन्यवाद। आशा है कि विभिन्न क्षेत्रों में आपके द्वारा किये विस्तृत कार्यों के विषय में हमें और अधिक जानने का पुनः अवसर प्राप्त होगा। रामकृष्ण मिशन के साथ किये सामाजिक कार्यों के विषय में जानने की भी उत्सुकता है। मैं आपके कार्यों को सोशल मीडिया पर देखती रहती हूँ। हम रामायण प्रकल्प द्वारा भी जुड़े हुए हैं।

अनीता: मुझे यहाँ आमंत्रित करने के लिए आपका भी हार्दिक आभार।

अनुराधा: बंगाल के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करने के लिए आपका हृदयपूर्वक आभार व्यक्त करती हूँ। आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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प्राचीन भारत में यात्राएं कैसे करते थे लोग? -सुमेधा वर्मा ओझा https://inditales.com/hindi/prachin-bharat-mein-yatrayen-varta/ https://inditales.com/hindi/prachin-bharat-mein-yatrayen-varta/#comments Wed, 14 Jul 2021 02:30:50 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2348

अनुराधा: नमस्ते। आज हमसे चर्चा करने के लिए हमारे साथ है, सुश्री सुमेधा वर्मा ओझा जी । सुमेधा जी एक भूतपूर्व भारतीय राजस्व सेवा अधिकारी हैं। अतः उन्हें अर्थव्यवस्था, कर इत्यादि में तो निपुणता प्राप्त है ही, साथ ही भारतीय साहित्य में भी उनकी विशेष रूचि है। उन्होंने वाल्मीकि रामायण का अनुवाद किया है। ‘उर्नभी’ […]

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अनुराधा: नमस्ते। आज हमसे चर्चा करने के लिए हमारे साथ है, सुश्री सुमेधा वर्मा ओझा जी । सुमेधा जी एक भूतपूर्व भारतीय राजस्व सेवा अधिकारी हैं। अतः उन्हें अर्थव्यवस्था, कर इत्यादि में तो निपुणता प्राप्त है ही, साथ ही भारतीय साहित्य में भी उनकी विशेष रूचि है। उन्होंने वाल्मीकि रामायण का अनुवाद किया है। ‘उर्नभी’ नामक एक रोमांचकारी जासूसी उपस्यास भी लिखा है जो मौर्य काल पर आधारित है। यह उपन्यास हमें उस काल का स्मरण करता है जब आचार्य चाणक्य मौर्य साम्राज्य की स्थापना कर रहे थे। मुझे यह उपन्यास इतना भाया है कि मैं इसके आगामी संस्करण की आतुरता से प्रतीक्षा कर रही हूँ। हमारी आज की चर्चा भी कुछ इसी विषय से जुड़ी हुई है। हमारी चर्चा का विषय है- प्राचीन भारत में यात्राएं। आज हम यह जानने का प्रयास करेंगे कि प्राचीन काल में भारत में यात्राएं किस प्रकार से की जाती थीं।

प्राचीन भारत में यात्राएं

अनुराधा: सुमेधाजी, प्राचीन इतिहास में आपकी विशेष रूचि है, वहीं मेरी रूचि भ्रमण करने में है। स्पष्ट है कि हमारे मार्गों का संगम वहां होता है जहां इन दोनों विषयों का संगम होता है। अर्थात् जब हम प्राचीन भारत में भ्रमण के विषय में चर्चा करते हैं। प्राचीन भारत में लोग किस प्रकार यात्राएं करते थे? वर्तमान में हमारे पास एक सम्पूर्ण पर्यटन एवं आतिथ्य उद्योग है जो अवकाश एवं आनंद यात्राओं पर आधारित है। अनेक यात्री अपने व्यवसाय एवं व्यापार संबंधी कारणों से भी यात्राएं करते हैं। कुछ अन्य कारणों से यात्राएं करते हैं। किन्तु सम्पूर्ण पर्यटन एवं आतिथ्य उद्योग अंततः अवकाश एवं आनंद यात्राओं पर ही फलता-फूलता है।

मैं यह जानना चाहती हूँ कि प्राचीन भारत में लोग किन प्रमुख कारणों से यात्राएं करते थे?

सुमेधा: अनुराधाजी, मुझे चर्चा के इस सत्र में आमंत्रित करने के लिए आपको ह्रदय पूर्वक धन्यवाद। मैं विश्वास दिलाती हूँ कि यह चर्चा अत्यंत रोचक रहेगी। आपने पूछा है कि प्राचीन भारत में लोग किन प्रमुख कारणों से यात्राएं करते थे?  मानवों ने यात्राएं आरम्भ की क्योंकि अस्तित्व के लिए यात्रा को सहचरी बनाना आवश्यक था। स्थानान्तर्गमन प्राचीन काल में यात्रा करने का प्रथम कारण था। लोग भिन्न भिन्न स्थानों में स्थानांतरण करते थे ताकि उन्हें वास करने के लिए श्रेष्ठतर स्थान प्राप्त हो सके अथवा श्रेष्ठतर संसाधनों की प्राप्ति हो सके। प्रश्न यह उठता है कि जब मानवजाति ने स्वयं को स्थापित कर लिया, तब उन्हें यात्रा करने की क्या आवश्यकता प्रतीत हुई? इसका प्रथम कारण था, व्यापार। आरम्भ में व्यापार केवल आसपास के लोगों से किया जाता था। कालान्तर में वही व्यापार दूर-सुदूर स्थित लोगों के साथ भी किया जाने लगा। समय के साथ परिवहन के साधनों, सड़क तंत्र तथा आश्रय स्थलों इत्यादि के आगमन से सम्पूर्ण प्रणाली अत्यंत जटिल होती गयी।

यात्रा करने का एक अन्य कारण था, अतिक्रमण, युद्ध, प्रभुता स्थापित करने जैसी मूल मानवी प्रकृति। प्राचीन काल में यह भावना अधिक प्रबल होती थी। अतः नवीन मार्गों के तंत्र स्थापित किया जाते थे ताकि सेना के मार्ग में कोई रूकावट ना आये, अन्य प्रदेशों पर विजय प्राप्त करने जा रहे सैनिकों का मार्ग प्रशस्त हो अथवा नवीन संसाधनों को प्राप्त करने के मार्ग खुल सकें। कभी उनके प्रयोजन हितकारी होते थे तो कभी उसके विपरीत। किन्तु सत्य यही है कि इसी प्रकार विशाल देश एवं राष्ट्रीय प्रणालियाँ अस्तित्व में आयीं।

तीर्थ यात्राएं

प्राचीन काल में यात्राएं करने का एक अन्य कारण था, तीर्थ यात्राएं। लोग भिन्न भिन्न तीर्थ स्थलों के दर्शन करने हेतु यात्राएं करते थे। तीर्थ यात्राओं की पृष्ठभूमि में अत्यंत जटिल तथा बहुआयामी मान्यताएं होती हैं। एक ओर तीर्थस्थल धार्मिक मान्यताओं के धरातल पर अत्यंत महत्वपूर्ण होते थे। दूसरी ओर लोग ज्ञान अर्जित करने की आकांशा से भी इस स्थलों की यात्राएं करते थे। लोग एक आश्रम से दूसरे आश्रम तक, एक ऋषि से दूसरे ऋषि तक भ्रमण करते रहते थे ताकि ज्ञान अर्जित कर सकें, साथ ही अपने ज्ञान की पुष्टि कर सकें अथवा स्वयं द्वारा रचित ग्रंथों पर समकक्षों के विचार जान सकें। ये आश्रम अधिकांशतः अत्यंत दुर्गम स्थानों पर होते थे। नगरों की चहल-पहल से दूर, आश्रम बहुधा वनों में अथवा किसी नदी के तट पर स्थित होते थे।

मेरे उपरोक्त उल्लेख का यह तात्पर्य नहीं है कि प्राचीन भारत एक अत्यंत गंभीर स्थान था। प्राचीन भारत में आनंद एवं मनोरंजन का भी भरपूर समावेश था। अतः लोग इस उद्देश्य से भी यात्राएं करते थे, जैसे नाट्य मंडली इत्यादि। नाट्य मंडलियों पर अनेक रोचक कथाएं प्रचलित हैं, जैसे, किस प्रकार लोग उनके द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान तक सन्देश पहुँचाया करते थे  अथवा खोये हुए व्यक्तियों को ढूँढने का प्रयास करते थे। उस समय अवकाश एवं आनंद पर आधारित यात्राओं की संख्या नगण्य होती थी किन्तु अभिलेखों में ऐसी यात्राओं का भी उल्लेख प्राप्त होता है। यदि आप समुद्री यात्राओं को आनंद यात्राओं के अंतर्गत मानेंगे तो अर्थशास्त्र में उनका प्राधान्यता से उल्लेख किया गया है।

अनुराधा: एक आश्रम से दूसरे आश्रम तक, इस उक्ति से ऐसा प्रतीत होता है मानो वे सामान्य जीवन से मुक्ति पाने के लिए यात्राएं करते थे।

सुमेधा: मेरा अभिप्राय अध्ययन सम्मेलनों एवं परिसंवादों से है। उस काल में प्रभावशाली व गणमान्य व्यक्ति इन विद्वानों एवं सिद्धपुरुषों को संरक्षण देते थे। दृष्टांत के लिए, राजा जनक एक अत्यंत प्रभावशाली व विद्वान राजा थे। उनके द्वारा आयोजित शास्त्रार्थ अत्यंत प्रसिद्ध थे। प्राचीन काल में विद्यार्थी गुरुकुलों एवं विश्वविद्यालयों में जाने के लिए भी यात्राएं करते थे। अतः ज्ञान अर्जन हेतु अनेक यात्राएं की जाती थीं। किन्तु, व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो यात्राओं का सबसे प्रमुख कारण व्यापार ही था। प्राचीन काल में व्यापार एवं व्यापार मार्ग एक प्रकार से राज-निकाय के धमनी एवं शिराएँ थे।

नाट्य मंडलियाँ

अनुराधा: आपने अभी नाट्य मंडलियों द्वारा की जाने वाली यात्राओं का उल्लेख किया। इसे संयोग ही कहिये कि मैंने अपने संस्करण ‘१० सर्वोत्तम व्यवसाय जो देश विदेश घुमाएं’ में प्रदर्शन कला को भी एक यात्रा संबंधी व्यवसाय के रूप में सम्मिलित किया है। प्रदर्शन कलाकारों को विश्व के दूर-सुदूर भागों में यात्रा करने का संयोग प्राप्त होता है। वे विश्व भर में यात्राएं कर अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं तथा अपनी संस्कृति के संवाहक बनते हैं। इस कल्पना मात्र से रोमांच होता है कि हम २००० वर्षों प्राचीन विरासत को आगे ले जा रहे हैं।

सुमेधा: नाट्य कलाकार, कलाबाज एवं सभी प्रकार के प्रदर्शन कलाकार ना केवल शहरी क्षेत्रों में यात्राएं करते थे, अपितु लघु अथवा ग्रामीण क्षेत्रों में भी जाते थे।

अनुराधा: प्राचीन भारत में लोग कैसे यात्राएं करते थे, यह जानकारी आपको कहाँ से प्राप्त हुई? ऐसे कौन कौन से साहित्य हैं जिनमें ऐसी जानकारी उपलब्ध है?

सुमेधा: अच्छा प्रश्न है। इस जानकारी के प्रमुख स्त्रोतों में से एक है पुरातात्विक अवशेष। प्राचीन भारत के व्यापार मार्गों पर अनेक लोगों ने गहन शोधकार्य किया है। जिन वस्तुओं का व्यापार किया जाता था, उनके अवशेषों का उन्होंने अध्ययन किया है। जिन मार्गों को व्यापार मार्ग में परिवर्तित किया था, उनका विश्लेषण किया है। अपने शोधकार्यों के आधार पर उन्होंने प्राचीन व्यापार मार्गों के जाल की एक संकल्पना प्रस्तुत की है। उसमें उन्होंने उस काल के नगरों एवं बस्तियों को दर्शाया है तथा वस्तु-विनिमय अर्थात् आदान-प्रदान की गयी वस्तुओं का भी उल्लेख किया है।

जानकारी का एक प्रमुख स्त्रोत मुद्रा शास्त्र भी है। विभिन्न पुरातात्विक स्थलों से प्राप्त मुद्राओं का शोधकर्ताओं ने गहन अध्ययन किया है। उनसे भी प्राचीन काल में प्रचलित यात्राओं एवं व्यापारों से सम्बंधित महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त हुई हैं।

अभिलेख/शिलालेख

जानकारी का तीसरा महत्वपूर्ण स्त्रोत है, अभिलेख अथवा शिलालेख। इसका एक उदहारण देना चाहती हूँ। एक समय मकरध्वज योगी नामक एक प्रसिद्ध धार्मिक एवं अध्यात्मिक गुरु थे। उनका जीवन-काल प्रथम सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व में था। उनके साथ यात्रियों एवं अनुयायियों का एक विशाल समूह था जो यात्राओं में उनके साथ चलता था। वे जहां जहां जाते, अपने एवं अपनी यात्रा के विषय में अभिलेख अवश्य छोड़ जाते थे। आज वही अभिलेख हमें भारत के कोने कोने एवं सीमावर्ती देशों के संग्रहालयों में देखने मिलते हैं। उनके अनुयायियों में अनेक स्त्रियाँ भी थीं जो उनके साथ आध्यात्मिक यात्राओं में भाग लेती थीं।

रामगढ गुफाओं से प्राप्त एक शिलालेख अत्यंत रोचक है क्योंकि लोगों ने दो प्रकार से इसकी व्याख्या की है। कुछ लोगों का मानना है कि वह विश्व का सर्वप्रथम प्रेम शिलालेख है। वहीं अन्य कुछ शोधकर्ताओं ने उसका विवेचन स्त्री यात्रियों के लिए विश्रामगृह के रूप में किया है। छत्तीसगढ़ के जोगीमारा गुफाओं से प्राप्त शिलालेख भी ऐसे ही हैं। प्रारंभ में इनका विवेचन एक नाटकशाला के रूप में किया गया था किन्तु नवयुगीन विवेचनकर्ता इसे यात्रियों का विश्रामगृह मानते हैं। इन अभिलेखों से प्राप्त सूक्ष्मतम जानकारी भी हमें प्राचीन काल के जनजीवन में झांकने का अवसर प्रदान करती है। हमें ऐसा प्रतीत होता है मानो हम प्राचीन काल के जनमानस को जानते हैं। एक इतिहासकार के लिए यह एक अत्यंत आनंद की भावना है।

हमें इस विषय में जानकारियाँ मुख्यतः संस्कृत, प्राकृत, तमिल इत्यादि भाषाओं में रचित रचनाओं से प्राप्त होती हैं। हमारे तीन प्रमुख महाकाव्य एवं महारचनाएं रामायण, महाभारत एवं बड़कहा या बडकथा हैं। राजा सातवाहन के मंत्री ‘गुणाढ्य’ द्वारा रचित ‘बड़कहा’ को संस्कृत में बृहत्कथा कहा जाता है। ईसा पूर्व ४९५ में   रची गयी बड़कहा में उस काल के समाज पर आधारित कथाएं हैं। बड़कहा से ही अधिकतर जातक कथाएं भी ली गयी हैं। अनेक जातक कथाएं जैन मुनियों एवं बौद्ध भिक्षुओं ने भी लिखी हैं। अतः जातक कथाएं भी हमारे लिए जानकारियों का महत्वपूर्ण स्त्रोत हैं।

परिवहन के साधन

अनुराधा:  मेरी दूसरी जिज्ञासा परिवहन के साधनों के विषय में है। आधुनिक काल के द्रुतमार्गों एवं महामार्गों के समान क्या प्राचीन काल में भी परिवहन के लिए उत्तम मार्ग थे? वे किस प्रकार के वाहनों का प्रयोग करते थे? वे किस प्रकार यात्राएं करते थे? मुझे उस काल में उपलब्ध, यात्रा के मूलभूत ढाँचे के विषय में जानने की उत्सुकता है।

सुमेधा: परिवहन का आरम्भ सडकों से नहीं हुआ था। सड़कें कालांतर में अस्तित्व में आयीं। हमारे पास जल सदैव से था। अतः परिवहन के साधन के रूप में सर्वप्रथम जलमार्गों का आरम्भ हुआ क्योंकि मानव ने नौकाओं का आविष्कार अत्यंत आरम्भ में कर लिया था। सिन्धु घाटी सभ्यता के कुछ अभिलेखों में नौकाओं के प्रकार एवं उनके निर्माण कार्य के विषय में बताया गया है। जहाज़ों, नौका संचालकों, संचालन उपकरणों इत्यादि जैसे मूलभूत आवश्यक तत्वों से लैस जल परिवहन प्रणाली के विषय में ना केवल ऋग्वेद में लिखा है, अपितु जातक कथाओं में भी इनका उल्लेख प्राप्त होता है। ऋग्वेद में ना केवल १०० पतवारों से युक्त पोतों के विषय में लिखा गया है, अपितु इसके विभिन्न तत्वों के सटीक तकनीकी नामों का भी उल्लेख है। जैसे, पतवार को अर्त, नाविक को अरित्री तथा छोटे जहाज़ों के बेड़े को अद्युम्न कहा गया है। अतः जल मार्गों पर नौचालन से सम्बंधित अनेक तकनीकी शब्दों का उल्लेख प्राप्त होता है। यहाँ तक कि अंग्रेजी के ‘navigation’ शब्द की व्यत्पत्ति संस्कृत शब्द, नाविक से ही हुई है।

जल मार्ग  

अनुराधा: मैं सदैव यह जानने के लिए उत्सुक रहती थी कि आदि शंकराचार्य ने २४ वर्षों में सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किस प्रकार किया था। मेरे अनुमान से केरल के कलदी से लेकर मध्य प्रदेश के ओंकारेश्वर तक, भारत के कोने कोने में उन्होंने जल मार्गों द्वारा ही यात्रा की होगी।

सुमेधा: जी हाँ। मैं आपको थोलकपियार के विषय में बताना चाहती हूँ जो आज से २३०० वर्ष पूर्व कांचीपुरम में रहते थे। महान संतों से शिक्षा प्राप्त करने के लिए उन्होंने सालाटुरा तक की यात्रा की थी जो महान संस्कृत व्याकरण-विद् पाणिनि की जन्मस्थली भी है। सर्वप्रथम उन्होंने जलमार्गों का प्रयोग किया। तत्पश्चात उन्होंने सड़क मार्गों से यात्रा की। उन्होंने सर्वप्रथम दक्षिण पथ का अनुगमन किया, तत्पश्चात उत्तर पथ का पालन करते हुए उत्तरागमन किया।

इस मानचित्र में अनेक नदियाँ देख सकते हैं। ये सभी नदियाँ नौगम्य हैं, अर्थात इन सभी नदियों पर जल परिवहन किया जा सकता है। सभी सड़क मार्गों पर जोड़-मार्ग हैं जो इन सड़क मार्गों को पूर्वी व पश्चिमी तट पर स्थित बंदरगाहों से जोड़ती हैं।

प्राचीन काल में वे उत्तम विहार नौकाओं का भी निर्माण करते थे। अर्थशास्त्र में भी उनके नौका विहारों के आनंद के विषय में उल्लेख है। बहुधा यह राजाओं द्वारा उपहार स्वरूप उन्हें दिया जाता था जो सौंपे गए कार्य उत्तम रीति से पूर्ण करते थे।

प्राचीन भारत में यात्रायें
प्राचीन भारत में यात्रायें

यात्रा के साधन

अनुराधा: वे सड़क मार्गों पर किस प्रकार के वाहनों का प्रयोग करते थे?

सुमेधा: निसंदेह, अपने दो पैर। इनके अतिरिक्त वे अश्वों, बैलों, ऊंटों जैसे पशुओं का भी प्रयोग करते थे। आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि अत्यधिक कठिन एवं पथरीले मार्गों पर हलके बोझे ढोने के लिए वे बकरियों का भी प्रयोग करते थे। यद्यपि उनका प्रयोग मार्गों के छोटे भागों पर ही किया जाता था। सिन्धु घाटी सभ्यता में बैलगाड़ियां का प्रयोग सामान्य रूप से किया जाता था। इनके अतिरिक्त, राजसी सवारियों के लिए तथा युद्ध इत्यादि में रथों का प्रयोग किया जाता था। किन्तु व्यापारिक गतिविधियों के लिए पशुओं एवं बैलगाड़ियों का प्रयोग ही प्रचलित था।

हमें भव्य पालकियों एवं डोलियों को नहीं भूलना चाहिए। रेशमी वस्त्रों एवं अन्य अलंकरणों से सज्ज पालकियों को कहार अपने कन्धों पर उठाकर चलते थे। इनका प्रयोग संपन्न घराने के पुरुष एवं स्त्रियाँ ही करती थीं। वह एक प्रकार से सम्पन्नता का प्रदर्शन करने का एक मार्ग था। किन्तु लम्बी दूरी के लिए वे भी बैलगाड़ियों का ही प्रयोग करते थे तथा बड़े काफिलों के रूप में सहयात्रा करते थे।

विश्राम गृह

अनुराधा: आज हम जहां भी यात्रा करते हैं, वहां विविध सुविधाओं से लैस विश्राम गृहों, होटलों, रिसॉर्ट्स इत्यादि की भरमार है। प्राचीन काल में एक यात्रा संपन्न करने में अनेक दिवस व्यतीत हो जाते थे। वे मार्ग में तथा अपने गंतव्य में कहाँ विश्राम करते थे?

सुमेधा: प्राचीन काल में भूतल पर सड़क मार्गों द्वारा यात्राएं की जाती थीं। सिन्धु घाटी सभ्यता, वैदिक सभ्यता तथा अन्य ऐतिहासिक समयावधियाँ अपने विशेष सड़क मार्गों के लिए प्रसिद्ध थीं। ऋग्वेद के विभिन्न सन्दर्भों से यह ज्ञात होता है कि बैलगाड़ियों के लिए विशेष रूप से उठे हुए मार्ग बनाए जाते थे। उनके दोनों ओर वृक्ष लगाए जाते थे। महान व्याकरण विद् पाणिनि ने भी लोगों के सामाजिक जीवन पर अनेक टिप्पणियाँ की हैं।  जैसे, विशेष प्रयोग के लिए निर्मित मार्गों के विशेष नाम भी रखे जाते थे। बकरियों के मार्ग को अजपथिका कहा जाता था। उसी प्रकार उन्होंने देवपथिका, हंसपथिका, करिपथ, राजपथ, संखपथ इत्यादि के विषय में भी उल्लेख किया है। अतः, उस काल में सड़क मार्गों का निर्माण एवं मरम्मत का कार्य उत्तम रीति से तथा सजगता से किया जाता था। मार्गों के निर्माण एवं दुरुस्ती के लिए विशेष रूप से अधिकारियों एवं कामगारों के संगठनों की तैनाती की जाती थी।

रामायण – एक उदहारण

मैं रामायण के एक प्रसंग की ओर आपका ध्यान खींचना चाहती हूँ। श्री राम के १४ वर्षों के लिए वनवास प्रस्थान के पश्चात भरत ननिहाल से अयोध्या वापिस लौटे। राम के वनवास की सूचना प्राप्त होते ही वे अत्यंत विचलित हो गए तथा उन्हें वापिस अयोध्या लेकर आने के लिए सम्पूर्ण सेना साथ वन की ओर चले पड़े। अयोध्या से वन तक सम्पूर्ण सेना को लेकर जाने के लिए उन्होंने उत्तम सड़कों का निर्माण करवाया। उन्होंने कामगारों के विशाल समूह को इस कार्य में नियुक्त किया था। वाल्मीकि रामायण में इन सडकों एवं उनके निर्माण का विस्तृत वर्णन किया गया है।

इन सडकों के निर्माण में उनकी सहायता करने के लिए विशेषज्ञों की टोली भी थी, जैसे स्थल निरीक्षक, सर्वेक्षक, वास्तुविद, अभियंता, मिस्त्री, बढ़ई, पौधे लगाने के लिए माली इत्यादि।

प्राचीन भारत में यात्रा सहायक – पथप्रदर्शक

उनके साथ एक पथप्रदर्शक अथवा मार्गदर्शक भी सदैव रहता था। उसे सम्पूर्ण क्षेत्र की पूर्व जानकारी होती थी तथा वह अज्ञात क्षेत्रों में यात्रियों का मार्गदर्शन करता था। अन्यथा सघन वनीय प्रदेशों में अज्ञात परिस्थितियाँ संकट में डाल सकती थीं। मार्गदर्शक का कार्य बहुधा यात्रा समूह का मुखिया करता था जिसे सात्वाहक कहा जाता था। सात्वाहक अपने कार्य में अत्यंत निपुण होता था। आप जब भी वाल्मीकि रामायण पढ़ें तो इस प्रसंग को ध्यानपूर्वक पढ़ें। प्राचीन काल में कैसे सडकों का निर्माण किया जाता था तथा कैसे विशाल सेनायें इन मार्गों पर चलती थीं, इनके विषय में आपको विस्तृत जानकारी प्राप्त होगी।

अतिथिगृह

मार्गों के किनारे सराय एवं अतिथिगृह होते थे। इन अतिथिगृहों के विषय में ऋग्वेद, अर्थशास्त्र एवं जातक कथाओं में भी उल्लेख प्राप्त होता है। पाणिनि ने भी इनके विषय में उल्लेख किया है। वेदों में भी इन अतिथिगृहों के विषय में लिखा गया है। अथर्व वेद में अतिथिगृहों को अवसत कहा गया है तो ऋग्वेद में उन्हें प्रपत अथवा प्रथमा कहा गया है। इतिहास में मौर्यवंशियों का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है जिन्होंने प्रवासियों की यात्राओं को सुखकर बनाने के लिए बड़ी संख्या में अतिथिगृहों का निर्माण करवाया था। अतिथिगृहों में खाद्य एवं पेय पदार्थों की उत्तम सुविधाएं होती थीं। इन सब के रखरखाव का उत्तरदायित्व राज्य पर ही होता था।

इनके अतिरिक्त आश्रम होते थे जो यात्रियों का स्वागत सत्कार करने के लिए तत्पर रहते थे। पौराणिक कथाओं में हमने ऋषि-मुनियों के विषय में पढ़ा है जो यात्राएं करते थे तथा मार्ग में अन्य ऋषियों के आश्रम में विश्राम करते थे। आप सब को शकुंतला की कथा तो स्मरण ही होगी। यात्रा करते दुर्वासा ऋषि विश्राम की इच्छा से ऋषि कणव के आश्रम में पहुंचे तथा शकुंतला द्वारा उपेक्षित होने पर उसे श्राप दे दिया था।

अतिथि देवो भवः, इस मूलमंत्र का पालन करने वाले प्राचीन भारत के प्रत्येक व्यक्ति का निवासस्थान किसी भी यात्री के लिए अतिथिगृह ही होता था। किसी विश्रामगृह की अनुपस्थिति में गांववासी ही परिवार के सदस्य की भांति यात्रियों की सेवा करते थे। अतिथि सत्कार के चलते किसी भी यात्री को रात्रि में आसरा पाने में कठिनाई नहीं होती थी।

सहप्रवास

प्राचीन काल में लोग अनेक बैलगाड़ियों के समूह में एक साथ सहप्रवास करते थे। अतिथिगृह के अभाव में खुले में डेरा डाल देते थे। वे अपने बैलगाड़ियों में अथवा वृक्षों के नीचे ही सो जाते थे। किन्तु यह सुरक्षित व्यवस्था नहीं थी। चोर-डाकुओं अथवा जंगली पशुओं का संकट सदैव बना रहता था।

अनुराधा: मेरा अगला प्रश्न है कि क्या प्राचीन काल में स्त्रियाँ भी यात्राएं करती थीं?

सुमेधा: जी हाँ। प्राचीन काल में स्त्रियाँ विभिन्न परिस्थितियों में यात्राएं करती थीं। अनेक व्यापारी अपने सम्पूर्ण परिवार के साथ व्यापार-यात्रायें करते थे क्योंकि उनकी यात्राएं एक अथवा दो दिवसों की नहीं होती थीं। एक व्यापार संबंधी यात्रा सम्पूर्ण करने में अनेक दिवस व्यतीत हो जाते थे। इनके अतिरिक्त, प्राचीन काल में भी अनेक विदुषी स्त्रियाँ होती थीं जो ज्ञान अर्जन हेतु यात्राएं करती थीं। नाट्य मंडलियों में भी स्त्रियों का समावेश होता था जो नाट्य प्रदर्शन के लिए अपनी मंडलियों के साथ यात्राएं करती थीं।

प्राचीन भारत में एकल स्त्री यात्री

प्राचीन काल में स्त्रियों का एक ऐसा भी समूह था जो ज्ञान अर्जन के लिए एकल यात्राएं करता था। वे पूर्णतः स्वतन्त्र यात्रिक होती थीं। ऐसी ही एक यात्री थी, सुलभा। महाभारत में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को प्राचीन काल की एक सन्यासिनी सुलभा के विषय में जानकारी दी थी जो योगधर्म के अनुष्ठान द्वारा सिद्धि प्राप्त कर अकेली ही पृथ्वी पर विचरण करती थी। मोक्षतत्व के जानकार, मिथिलापुरी के राजा जनक एवं सिद्धि प्राप्त सन्यासिनी सुलभा के मध्य हुए संवादों के रूप में भीष्म इस प्रसंग का सुन्दर वर्णन करते हैं। एक अन्य उदहारण है, ययाति पुत्री माधवी का, जिसने लम्बे समय के शोषित जीवनकाल के पश्चात स्वतन्त्र यात्री के रूप में तपोवन का मार्ग ग्रहण किया था। अतः प्राचीन काल में ऐसे अनेक उदहारण हैं जहां स्त्रियों ने आत्मबोध एवं ज्ञान अर्जन के लिए अकेले ही भूलोक की यात्राएं की थीं। तपोवन को आत्मसात किया था।

एकल स्त्री यात्रियों का एक वर्ग ऐसा भी था जो मोक्ष प्राप्ति के लिए अत्यंत गंभीर था। वे किसी स्थान विशेष से सम्बन्ध नहीं जोड़ती थीं तथा किसी स्थान पर एक रात्रि से अधिक ठहरती भी नहीं थीं। सर्व सामाजिक बंधनों से सम्बन्ध विच्छेद कर केवल ज्ञान एवं मोक्ष प्राप्ति के लिए अग्रसर रहती थीं।

प्राचीन भारत की यात्रा पुस्तकें

अनुराधा: हमारे शास्त्रों में भी तीर्थ यात्राओं एवं तीर्थस्थलों के विषय में विस्तृत जानकारी दी गयी है। तीर्थ यात्राएं किस प्रकार की जानी चाहिए, इस विषय में भी लिखा गया है। इसी लिए यह देखा गया है कि हमारे अधिकतर तीर्थस्थल दूर-सुदूर के दुर्गम स्थानों  में होते हैं जहां तक पहुँचने के लिए साधक को विशेष जतन करने पड़ते हैं।

मैं आपसे एक प्रश्न पूछना चाहती हूँ कि प्राचीन भारत में की जाने वाले यात्राओं के विषय में जानने के लिए कौन कौन सी पुस्तकें पढ़नी चाहिए?

सुमेधा: मेरा सुझाव है कि आप Moti Chandras’s Trade and Trade Routes पढ़ें। इस पुस्तक में सटीक तिथियों सहित आर्य प्रवास सिद्धांत पर विस्तृत रूप से विश्लेषण एवं प्रमाण प्रस्तुत किये गए हैं। यद्यपि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह किंचित नकारात्मक प्रतीत हो सकता है तथापि इसमें प्राचीन भारत में यात्राएं अवन उनसे सम्बंधित  सर्व आयामों पर उत्तम जानकारी दी गयी है।

Upinder Singh की भी पुस्तक पढ़ें। प्राचीन भारत पर लिखित उनके इस पुस्तक में उन्होंने यात्राओं का भी उल्लेख किया है। Nayanjot Lahiri द्वारा व्यापार मार्गों पर लिखित पुस्तक मेरे अनुमान से भारत की सर्वोत्तम पुस्तक है।

अनुराधा:  सुमेधा जी, आज की चर्चा में भाग लेने एवं हमें ज्ञानवर्धक जानकारी प्रदान करने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद।

सुमेधा: मुझे इस चर्चा में आमंत्रित करने के लिए आपका भी धन्यवाद। हमारी चर्चा अत्यंत रोचक रही।

प्राचीन भारत में यात्राएं पर सुमेधाजी से हुई चर्चा की लिखित प्रतिलिपि IndiTales Internship Program के अंतर्गत हर्षिल गुप्ता ने तैयार की।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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