वन्य जीवन Archives - Inditales श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Fri, 02 Aug 2024 05:44:30 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.7.5 नेपाल के चितवन राष्ट्रीय उद्यान में पदभ्रमण https://inditales.com/hindi/chitwan-rashtriya-udyan-nepal-pad-bhraman/ https://inditales.com/hindi/chitwan-rashtriya-udyan-nepal-pad-bhraman/#respond Wed, 08 Jan 2025 02:30:21 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3745

हम प्रातः मुँहअँधेरे ही उठ गए थे। अथवा यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि चितवन राष्ट्रीय उद्यान में गूँजते कोलाहल ने हमें प्रातः शीघ्र जागने के लिए बाध्य कर दिया था। हमें चितवन राष्ट्रीय उद्यान में पदभ्रमण या पैदल सफारी करने के लिए जाना था। हम जिस ‘बरही वन अतिथिगृह’ (जंगल लॉज) में ठहरे थे, […]

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हम प्रातः मुँहअँधेरे ही उठ गए थे। अथवा यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि चितवन राष्ट्रीय उद्यान में गूँजते कोलाहल ने हमें प्रातः शीघ्र जागने के लिए बाध्य कर दिया था। हमें चितवन राष्ट्रीय उद्यान में पदभ्रमण या पैदल सफारी करने के लिए जाना था। हम जिस ‘बरही वन अतिथिगृह’ (जंगल लॉज) में ठहरे थे, उसके एक ओर से राप्ती नदी बहती है। उस राप्ती नदी के दूसरी ओर चितवन राष्ट्रीय उद्यान स्थित है। राप्ती नदी पार करने के लिए हम एक नौका में बैठ गए। नदी पर कोहरे की एक मोटी चादर बिछी थी जो शनैः शनैः ऊपर उठ रही थी। इस कोहरे से भरे वातावरण में चारों ओर का परिदृश्य ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो अपनी परतों में अनेक रहस्य छुपाये हुए है। हमारी नौका धीरे धीरे दूसरे तट की ओर बढ़ रही थी। कुछ अन्य पर्यटक नौकाएं भी हमारे साथ हो लिये। अकस्मात सभी नौकाओं के नाविकों ने सावधान होकर नौकाओं की गति धीमी कर दी। हमने देखा कि वे एक गेंडे को नदी पार करने में प्राथमिकता दे रहे थे। नदी पार कर वह गेंडा वन में प्रवेश कर गया।

चितवन राष्ट्रीय उद्यान नेपाल
चितवन राष्ट्रीय उद्यान नेपाल

जिस स्थान से गेंडे ने वन में प्रवेश किया था, हमारे नाविक ने नौका को उस बिन्दु के समीप ही अँकोड़े से बांध दी। गेंडे का स्मरण कर हम नौका से उतरने के लिए भय से हिचकिचाने लगे। किन्तु हमारे सफारी परिदर्शक ने हमें धीर बंधाया, तब जाकर हमने नौका से उतरकर वन में प्रवेश किया।

चितवन राष्ट्रीय उद्यान में पदभ्रमण

हम जंगल सफारी कर रहे थे किन्तु पदभ्रमण करते हुए। इससे पूर्व हमने जीप तथा नौका में बैठकर वन का सुरक्षित अवलोकन किया था। अब हम वन के भीतर पैदल भ्रमण करने जा रहे थे।

चितवन राष्ट्रीय उद्यान की भोर
चितवन राष्ट्रीय उद्यान की भोर

हमें अब भी स्मरण था कि वह गेंडा यहीं से वन के भीतर गया था। यह तथ्य हमें उत्सुकता के साथ भयभीत भी कर रहा था। हमारा परिदर्शक हमें अनवरत स्मरण कर रहा था कि चितवन राष्ट्रीय उद्यान में एक नहीं, अपितु ६०० से अधिक गेंडे हैं। वे हमारे चारों ओर उपस्थित हैं, चाहे हम उन्हे देख पायें अथवा नहीं। उन्होंने हमें आश्वस्त कराया कि गेंडों को मानवों में रुचि नहीं होती। वे तब तक आक्रमण नहीं करते जब तक कि उन्हे हमारी ओर से संकट का आभास ना हो। मैं विचार करने लगी कि गेंडों को यह कैसे ज्ञात होगा कि यहाँ हमें उनसे भय प्रतीत हो रहा है तथा उन्हे हमसे भयभीत होने की कोई आवश्यकता नहीं है, जबकि उन्हे यह स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा है कि मैं उसी प्रजाति का भाग हूँ जो उनका अप्राकृतिक व उनकी प्रजाति के उन्मूलन की सीमा तक वध करने के लिए जाना जाता है।

चितवन का प्राकृतिक सौन्दर्य

जैसे ही हमने पदभ्रमण आरंभ किया। हमारा भय शनैः शनैः लुप्त होने लगा। प्रकृति की सुंदरता नयनों में बसने लगी थी। प्राकृतिक सौन्दर्य का आनंद हृदय में भय का स्थान ग्रहण करने लगा था। वन में छाया कोहरा अब विरल होने लगा था। वन में अनेक छोटे-बड़े सरोवर दृष्टिगोचर होने लगे थे जिनके जल पर ऊँचे ऊँचे वृक्षों का प्रतिबिंब पड़ रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो कोहरे की परत हटाकर सरोवर शनैः शनैः स्वयं को प्रकट करने का प्रयास कर रहा है।

भूमि पर बिखरे सूखे पत्तों पर चलने के कारण सरसराहट हो रही थी। हमारे मस्तिष्क में शंका उठ रही थी, यदि आसपास स्थित गेंडों अथवा उनके अन्य वन्य प्राणी मित्रों ने यह ध्वनि सुनकर कोई अवांछित प्रतिक्रिया व्यक्त कर दी तो क्या होगा!

चारों ओर अनुपम परिदृश्य था। ऊँचे ऊँचे वृक्ष थे जिनके नीचे सूखी पत्तियों की भूरी चादर बिछी हुई थी। अनेक स्थानों पर ऊँचे वृक्षों की शाखाएं आपस में मिलकर मंडप बना रही थीं, मानो हमारा स्वागत कर रही हों।

वन भ्रमण में हमारा नेतृत्व करने वाला साथी, साकेत लघु वन प्राणियों की ओर हमारा लक्ष्य केंद्रित कर रहा था। मुझे किंचित क्षोभ हुआ कि ये लघु प्राणी बिना किसी संकेत के उसे इतनी सुगमता से कैसे दृष्टिगोचर हो रहे थे! मुझे तो उसके द्वारा संकेतिक दिशा में गहनता से देखने के पश्चात भी प्राणियों को ढूँढने में समय लग रहा था। किन्तु जब हमने वृक्षों की शाखाओं पर बैठे हमारे पंख वाले मित्रों को देखना आरंभ किया तब मैं भी साकेत को चुनौती देने में सक्षम हो गयी थी। हमने अनेक प्रकार के रंगबिरंगे वन्य पक्षियों को देखा।

चितवन राष्ट्रीय उद्यान में हमारे द्वारा देखे वन्य पक्षियों पर मैंने एक विस्तृत संस्करण प्रकाशित किया है। आप इसे अवश्य पढ़ें: चितवन राष्ट्रीय उद्यान के वन्य पक्षी

वृक्षों की शाखाओं पर विराजमान पक्षी पत्तियों के पीछे छुप कर बैठे थे। हम उन्हे ढूंढ तो पा रहे थे किन्तु उनका स्पष्ट छायाचित्र ले पाना असंभव हो रहा था। मैंने छायाचित्र लेने का प्रयत्न करना ही छोड़ दिया। उसके स्थान पर मैंने पक्षियों के विविध रंगों एवं उनके हाव-भाव का आनंद उठाना आरंभ किया। पक्षियों को चहचहाते तथा एक शाखा से दूसरी शाखा पर उड़ते देखने में मैं रम गयी थी। एक क्षण ऐसा आया जब मुझे चटक लाल रंग का एक पक्षी दृष्टिगोचर हुआ। उसे देख मेरे हाथों ने सहज ही कैमरा उठा लिया। हमने कुछ क्षण लुका-छिपी का खेल खेला। अंततः मैं उसका चित्र लेने में सफल हो पायी तथा अपने दल में पुनः सम्मिलित हो गयी।

चितवन राष्ट्रीय उद्यान में वन्यजीवन के विविध चिन्ह

साकेत ने हमें भूमि पर चींटियों के घर, सांप की बाँबी आदि दिखाई। उन्होंने हमें अनेक वन्य प्राणियों के पदचिन्ह दिखाए। वे ना केवल यह जानते थे कि वो किस प्राणी के पदचिन्ह हैं, अपितु वे यह भी जानते थे कि वो प्राणी किस आयुवर्ग का हो सकता है। अद्भुत!

हमने अनेक प्रकार व आकार की मकड़ियाँ अपने जालों में लटकती देखीं। उनके जाले ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो वे शाखाओं को जोड़ने की चेष्टा कर रही हों। कई कई स्थानों पर वे वृक्षों को जोड़ने का प्रयास करती प्रतीत हुईं।

प्रातः लगभग ८ बजे हम जलपान के लिए रुके। हमारा वन मार्गदर्शक हमें एक खुले स्थान पर ले गया जहाँ एक वृक्ष आड़ा पड़ा हुआ था। उस पर बैठकर हमने साथ लिया हुआ जलपान किया। सम्पूर्ण परिस्थिति हमें गदगद कर रही थी। ऊँचे ऊँचे वृक्षों से परिपूर्ण सघन वन के मध्य एक मुक्ताकाश स्थल, बैठक के रूप में गिरा हुआ विशाल वृक्ष, वन का प्राकृतिक वातावरण तथा प्रातःकालीन शीतल वातावरण में बैठकर जलपान करना, सब कुछ अत्यंत अद्भुत था।

जलपान कर हम जैसे ही उठे, एक मादा गेंडा अपने शावक के साथ हमारे समक्ष उपस्थित हो गयी, केवल  लगभग १०० मीटर दूर!

हम सब एक वृक्ष के पीछे छुप गए तथा मन ही मन प्रार्थना करने लगे कि हम उसकी दृष्टि में ना आयें, ना ही उसके मार्ग में। एक ही धरातल पर, इतने समीप से इस विशाल प्राणी को देखना अत्यंत रोमांचकारी था, भले ही हम छुपकर देख रहे थे। इससे पूर्व मैंने जीप अथवा हाथी की पीठ पर बैठ कर ही गेंडों के दर्शन किये थे।

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कांचीरूवा के दर्शन

चितवन के वन में पदभ्रमण का सर्वाधिक रोमांचकारी वह क्षण था जब हमने अकस्मात ही कांचीरूवा नामक एक गेंडे का कंकाल देखा। एक कान कटा होने के कारण उसे इस नाम से बुलाया जाता था।

कंकाल के विभिन्न भाग यहाँ-वहाँ बिखरे हुए थे। जब हम उसके शीष के निकट गए तब हमें आभास हुआ कि गेंडा वास्तव में कितना विशालकाय प्राणी है। उसकी लंबी लंबी पसलियाँ शाखाओं सी प्रतीत हो रही थीं। उसके दाँत का आकार मानवी चरण का लगभग चौथाई भाग जितना था।

यदि यहाँ जन्तु विज्ञान का कोई विद्यार्थी आ जाता तो इस कंकाल का अध्ययन करते घंटों व्यतीत कर सकता था। चमड़ी व माँसपेशियाँ विहीन होने के पश्चात भी उस कंकाल का विशालकाय आकार मुझे स्तंभित कर रहा था।

वापिस आकार जब मैं उस कंकाल के छायाचित्र देख रही थी तब मुझे वन के अनकहित नियम का साक्षात्कार हुआ। जब तक वह गेंडा जीवित था, उसने कदाचित इस वन में राज किया होगा। मृत्यु के पश्चात वही गेंडा अपने साथी पशुओं का भोजन बना होगा तथा हम जैसे पर्यटकों के लिए प्रदर्शनीय वस्तु। हमें बताया गया कि वन में प्राणियों की मृत्यु होती रहती है किन्तु हमें अन्य कोई कंकाल नहीं दिखा।

ध्यान से देखें

पदभ्रमण करते हुए हम आगे बढ़े। हमने अनेक बहुरंगी तितलियाँ एवं कीट देखे। किन्तु उन्हे देखने के लिए सम्पूर्ण ध्यान की आवश्यकता होती है। गहरे हरे रंग के पत्ते पर बैठे हरे रंग के टिड्डे को देखना, सूखी पत्तियों के बीच छोटे छोटे सुंदर कीटों को देखना, पत्तों के झुरमुट में बैठी तितली को ढूँढना, सब अत्यंत मनोरंजक था। मार्ग में एक सरोवर के पास भ्रमण करते हुए हमने जल के ऊपर लटकती शाखा पर बैठे एक नीलकंठ को देखा।

हमने मोटी बेलें देखी जिन पर बड़े बड़े त्रिकोणाकार कांटे थे। उनका आकार लगभग हमारे हाथों जितना था। कदाचित प्रकृति ने ही उन्हे इन काँटों के द्वारा सक्षम बनाया है कि वे स्वयं का संरक्षण कर सकें।

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यहाँ-वहाँ पड़े मृत वृक्ष के तनों पर भिन्न भिन्न प्रकार के कुकुरमुत्ते उगे हुए थे। क्या वे सभी प्रजातियाँ मानवी उपभोग के लिए सुरक्षित हैं? क्या गेंडे जैसे वन के शाकाहारी प्राणी भी उन्हे खाते होंगे? ऐसे अनेक विचार मस्तिष्क में उभरने लगे। अपने चारों ओर के वनीय प्रदेश के जटिल पारिस्थितिकी तंत्र को जानने व समझने के प्रयास में मस्तिष्क में उभरते प्रश्न श्रंखला में से ये भी कुछ प्रश्न थे।

सेमल के लाल पुष्प

भूमि पर गिरे सेमल के लाल पुष्प बेरंग बालुई भूमि पर रंग भर रहे थे। किन्तु आज का सर्वोत्तम शोध था, छोटे छोटे नारंगी रंग के गोले। उन्हे स्पर्श करते ही हमारे हाथ नारंगी हो रहे थे। गोले हाथों में नारंगी रंग का चूर्ण छोड़ रहे थे। हमें यह स्पष्ट आभास हो रहा था कि ये साधारण गोले नहीं हैं। इसका कुछ ना कुछ महत्वपूर्ण उपयोग अवश्य ही होगा। किन्तु क्या? तभी हमारे वन परिदर्शक ने हमें जानकारी दी कि स्थानीय भाषा में इसे सिंधुरे कहा जाता है। हमारे मस्तिष्क में बिजली कौंधी। इसे नेपाली, हिन्दी एवं संस्कृत भाषा में भी तो यही कहा जाता है!

वन में पर्याप्त पदभ्रमण करने के पश्चात हम अपने बरही जंगल लॉज में पहुँचे। हमने उनके पुस्तकालय में इस नारंगी रंग के फल के विषय में जानकारी ढूँढी। हमें एक रोचक जानकारी प्राप्त हुई कि प्राचीन काल में इस फल से प्राप्त प्राकृतिक रंग से रेशम को रंगा जाता था।

चितवन वन में लगभग ४-५ घंटे पदभ्रमण कर तथा वन के विविध रंगों व गंधों में सराबोर होने के पश्चात हम वापिस राप्ती नदी के तट पर पहुँचे। वहाँ वृक्ष के एकल तने से निर्मित एक संकरी नौका हमारी प्रतीक्षा कर रही थी। नौका पर चढ़ने से पूर्व मैंने पीछे मुड़कर इस वन को पुनः निहारा। तत्पश्चात नदी के तट को देखा। मैंने देखा कि नदी के भीतर भी उसका एक स्वयं का वन है। इसके जल के ऊपर तथा भीतर अनेक प्रकार के जलीय पौधे तैर रहे थे मानो एक भिन्न वन बना रहे हों।

मुझे चितवन वन के भीतर किया इस पदभ्रमण का दीर्घ काल तक स्मरण रहेगा। एक ओर शांत व शीतल प्राकृतिक वातावरण था, तो दूसरी ओर अधीरता थी। मन में अनेक प्रकार के भाव उठ रहे थे। कभी विस्मय तो कभी शांति, कभी आनंद तो कभी भय। साथ ही भरपूर्ण शारीरिक व्यायाम।

नेपाल की यात्रा नियोजित करने से पूर्ण मेरे इन यात्रा संस्करणों को अवश्य पढ़ें जो आपको नेपाल, विशेषतः काठमांडू के आसपास के रोचक व अछूते दर्शनीय स्थलों के विषय में विस्तृत जानकारी प्रदान करेगा।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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कॉलरवाली बाघिन – पेंच राष्ट्रीय उद्यान की रानी https://inditales.com/hindi/collarwali-baghin-pench-rashtriya-udyan/ https://inditales.com/hindi/collarwali-baghin-pench-rashtriya-udyan/#comments Wed, 27 Nov 2024 02:30:29 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3723

मध्य भारत के सघन वनों में बाघों का साम्राज्य है। वे अपने मनोहारी रूप द्वारा पर्यटकों का मन मोह लेते हैं। यूँ तो पर्यटकों को उनके साम्राज्य में उन्मुक्त विचरण करने की स्वतंत्रता नहीं है, किन्तु वे पर्यटकों के लिए निर्दिष्ट मार्गों पर स्वयं आकर उन्हें अनुग्रहित करते हैं। उनका चित्ताकर्षक मनमोहक रूप हमें इस […]

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मध्य भारत के सघन वनों में बाघों का साम्राज्य है। वे अपने मनोहारी रूप द्वारा पर्यटकों का मन मोह लेते हैं। यूँ तो पर्यटकों को उनके साम्राज्य में उन्मुक्त विचरण करने की स्वतंत्रता नहीं है, किन्तु वे पर्यटकों के लिए निर्दिष्ट मार्गों पर स्वयं आकर उन्हें अनुग्रहित करते हैं। उनका चित्ताकर्षक मनमोहक रूप हमें इस प्रकार सम्मोहित कर देता है कि हम उनके पुनः पुनः दर्शन करने के लिए आतुर हो जाते हैं। जैसे कान्हा का लोकप्रिय मुन्ना बाघ। बांधवगढ़ में भी बाघों के दर्शन की पक्की संभावना रहती है।

बाघ एक स्वच्छंद वन्यप्राणी है। वह हमें दर्शन दे अथवा नहीं, यह पूर्णतः उसकी इच्छा पर निर्भर करता है। कुछ सफारी भ्रमणों में हमें इनके दर्शन नहीं हो पाते हैं। बांधवगढ़ में मेरा ऐसा ही अनुभव रहा था। बाघ मुझसे लुका-छिपी का खेल खेलते रहे। किन्तु निराश होने के स्थान पर मैंने जंगल को निहारने का निश्चय किया तथा उसके अन्य आयामों को अनुभव किया। विविध प्रकार के वृक्षों एवं वन्य प्राणियों के दर्शनों का आनंद उठाया। जंगल के भीतर स्थित बांधवगढ़ का दुर्ग भी मेरे लिए एक आश्चर्यजनक खोज थी। मेरा सुझाव है कि आप जंगल में एक से अधिक सफारी भ्रमण करने का प्रयास करें जिससे बाघों के दर्शन की संभावना बढ़ जाती है तथा आप जंगल के अन्य आकर्षणों का भी अनुभव प्राप्त कर सकते हैं।

पेंच राष्ट्रीय उद्यान में बाघ दर्शन की तीव्र अभिलाषा होते हुए भी मैंने अपने मन की पूर्व तैयारी कर रखी थी कि कदाचित यहाँ भी बाघ मुझ से लुका-छिपी खेलें। किन्तु संभवतः वे मेरी व्याकुलता को भांप गए तथा उन्होंने मुझे मन भर कर दर्शन देने का निश्चय किया। सोने पर सुहागा! मेरे समक्ष पेंच राष्ट्रीय उद्यान की सर्वाधिक लोकप्रिय कॉलरवाली बाघिन अपने शावकों के साथ गर्व से विचरण कर रही थी।

कॉलरवाली बाघिन - पेंच राष्ट्रीय उद्यान
कॉलरवाली बाघिन – पेंच राष्ट्रीय उद्यान

कॉलरवाली बाघिन एवं उसके शावकों ने हमारे सफारी भ्रमण मार्ग को अनेक बार पार किया। प्रचुर दर्शनों से उन्होंने मुझे अभिभूत कर दिया था। मुझमें साहस होता व उसकी अनुमति होती तो मैं उनके समीप जाकर उन्हें गले से लगा लेती तथा अपनी कृतज्ञता व्यक्त करती। किन्तु उन्हें दूर से ही धन्यवाद कहना उचित है तथा मैंने वही किया।

कॉलरवाली बाघिन की वंशावली

कॉलरवाली बाघिन का नाम ऐसा इसलिए पड़ा क्योंकि सन् २००८ में उसके गले में रेडियो कॉलर या अनुवर्तन पट्टा डाला हुआ है। बाघिन के गले में यह पट्टा तब डाला गया था जब वह स्वयं एक शावक थी। इस पट्टे के द्वारा उसके अनुगमन पर दृष्टि रखी जाती थी। अब यह पट्टा दीर्घकाल से निर्जीव हो चुका है किन्तु वह अब भी बाघिन के गले में लटका हुआ है। यहाँ तक कि यह पट्टा उसकी पहचान बन चुका है।

कालरवाली बाघिन अपने शिशुओं के साथ
कालरवाली बाघिन अपने शिशुओं के साथ

कॉलरवाली बाघिन जन्म सन् २००५ में हुआ था। वह एक काल में लोकप्रिय बाघिन, ‘बड़ी माता’ की पुत्री है। उसके पिता को टी-१ तथा पेंच का चार्जर कहा जाता था। कॉलरवाली बाघिन ने अपनी माता के क्षेत्र के एक बड़े भाग पर अपना अधिपत्य स्थापित किया था। बी बी सी के प्रसिद्ध वृत्तचित्र “Spy in the Jungle’ में इसी बाघिन की जीवनी को प्रदर्शित किया गया है। यह वृत्तचित्र सम्पूर्ण विश्व में अत्यंत लोकप्रिय भी हुआ था।

कॉलरवाली बाघिन को माताराम के नाम से भी जाना जाता है। वनीय नामकरण पद्धति के अनुसार उसे टी-१५ कहते हैं।

मैं कॉलरवाली बाघिन को पेंच के जंगलों की रानी माँ कहती हूँ क्योंकि उसने अब तक २९ बाघ शावकों को सफलतापूर्वक जन्म दिया है। सन् २००८ में उसके प्रथम शावक का जन्म हुआ था। इस संस्करण के विडियो में प्रदर्शित शावकों का जन्म सन् २०१५ में हुआ था जिसके एक वर्ष पश्चात मैंने पेंच राष्ट्रीय उद्यान में उनके दर्शन किये थे। ये उसके छठें प्रसव की संतानें हैं। तब तक उसकी २२ संतानें हो चुकी थीं।

भारत में बाघों की संख्या में वृद्धि करने के लिए अनेक संस्थाएं एवं स्वयंसेवक अनवरत कार्य कर रहे हैं। उनके लिए कॉलरवाली बाघिन एक वरदान सिद्ध हुई है। वन संरक्षक अधिकारियों के अनुसार २९ शावकों को जन्म देना स्वयं में एक कीर्तिमान है। शीघ्र ही पेंच के जंगलों में उसके शावकों का राज होगा। तो अब आप बताइये, क्या कॉलरवाली बाघिन को पेंच राष्ट्रीय उद्यान की ‘रानी माँ’ कहना अतिशयोक्ति है?

पेंच की कॉलरवाली बाघिन से भेंट

पेंच का सर्वोत्तम आकर्षण कॉलरवाली बाघिन का दर्शन है। वो अपने शावकों के साथ आनंद से पर्यटकों को अपने दर्शन देती है। राष्ट्रीय उद्यान में प्रवेश करते ही वहाँ के अधिकृत गाइड अथवा परिदर्शक हमें उस समय की उसकी गतिविधियों की जानकारी देने लगते हैं। मैंने अनेक राष्ट्रीय उद्यानों में भ्रमण किया है तथा वहाँ अनेक सफारी भी की है। सामान्यतः सभी परिदर्शकों की यही शैली होती है। कदाचित वे पर्यटकों की उत्सुकता व अपेक्षाओं को चरम सीमा तक ले जाना चाहते हैं ताकि बाघिन दर्शन ना दे, तब भी हमें उसकी उपस्थिति का रोमांचक अनुभव प्राप्त होता रहे।

हमारे लॉज से आये सभी पर्यटक आश्वस्त थे कि कॉलरवाली बाघिन के दर्शन की संभावना अत्यधिक है। जून का मास चल रहा था। तपती गर्मी में तृष्णा उन्हें जल स्त्रोत तक खींच ही लायेगी, इसलिए हमने सर्वप्रथम उसे जल स्त्रोतों के समीप ही ढूँढना आरम्भ किया।

प्रसिद्ध बाघिन माँ की पुत्री के दर्शन

पेंच राष्ट्रीय उद्यान में उस दिन हमारा भाग्य उन्नत था। हमारी सभी आकांक्षाएँ पूर्ण होने को थीं। कुछ ही क्षणों में हमने देखा कि एक बाघिन एक छोटे से जलाशय की ओर चली जा रही थी। झाड़ियों के झुरमुट के पीछे से पीली पट्टियाँ आगे बढ़ती हुई हमसे आँख मिचौली खेलने लगी। ऊँची-नीची भूमि पर मार्ग खोजती हुई वह जलाशय तक पहुँची। उसने जल में प्रवेश किया तथा वहीं बैठ गयी। वह जल की शीतलता का आनंद उठा रही थी।

जून की तपती सूखी उष्णता में मुझे भी उसके साथ शीतल जल का आनंद उठाने की इच्छा होने लगी थी। वह बाघिन माँ नहीं थी, अपितु उसकी एक वर्ष की आयु की पुत्री थी। जल में कुछ क्षण शीतल होने के पश्चात उसने वन में भ्रमण करने का निश्चय किया। जाते हुए उसने हम पर्यटकों की जीपों के सामने से हमारे मार्ग को पार किया। श्वास रोक कर, स्तब्ध होकर हम उसे देखते रहे। मार्ग के एक ओर से वन से बाहर आकर उसने हमारा मार्ग पार किया तथा मार्ग के दूसरी ओर वन के भीतर प्रवेश कर गयी।

कॉलरवाली बाघिन माँ के प्रथम दर्शन

कुछ क्षणों पश्चात बाघिन माँ हमारे समक्ष प्रकट हो गयी। वह भी उसी मार्ग पर चल रही थी जिस पर कुछ क्षणों पूर्ण उसकी बिटिया गयी थी। ठीक उसी प्रकार जैसे अपने बच्चों के पीछे माँएं दौड़ती हैं। वह भी जलाशय की ओर गयी, जल पिया तथा जल के समीप कुछ क्षण बैठ गयी मानो जल में स्वयं को निहारते कुछ क्षण व्यतीत करना चाहती हो। मैं जल में उसका प्रतिबिम्ब देखना चाहती थी तथा उसके प्रतिबिम्ब के साथ उसका चित्र लेना चाहती थी। किन्तु उसके व हमारे बीच की दूरी तथा प्रतिकूल दिशा होने के कारण वह संभव नहीं हो पाया। कुछ क्षण शान्ति से बैठी माँ को निहारना अत्यंत सुखद था। अचानक जैसे उस माँ को अपनी बिटिया का ध्यान आ गया हो, वह उठी तथा बिटिया की दिशा में आगे बढ़ गयी। कुछ समय के उपरांत माँ व बेटी दोनों साथ साथ चलने लगे।

बाघिन माँ का आकार उस मुन्ना बाघ की तुलना में छोटा था जिसे मैंने गत वर्ष कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में देखा था। मेरे परिदर्शक ने बताया कि बाघ व बाघिन के आकारों में भिन्नता अत्यंत सामान्य है।

हम सब के मुखड़ों पर प्रसन्नता व संतोष का भाव स्पष्ट उमड़ रहा था, मानो पेंच यात्रा का समूचा उद्देश्य पूर्ण हो गया हो।

दूसरी भेंट

दूसरे दिवस प्रातः शीघ्र ही हमने राष्ट्रीय उद्यान में प्रवेश किया। हमने वन के अन्य विभिन्न आकर्षणों का अवलोकन करने का निश्चय किया। मुझे विशेषतः विविध पक्षियों को देखने की अभिलाषा थी। वन में सफारी भ्रमण करते समय मार्ग में हमने हिरणों को अठखेलियाँ करते देखा। सांभर के झुण्ड को घास चरते देखा। विभिन्न पक्षियों के दर्शन एवं उनकी चहचहाहट के स्वरों ने हमें आनंद से भर दिया। उन पक्षियों की कथा किसी अन्य दिवस सुनाऊँगी।

हम जैसे ही एक चौरस्ते पर पहुंचे, हमने देखा कि पर्यटकों की ५-६ जीपें एक पंक्ति में शांत खड़ी हैं। एक दिशा में मुड़े उन सबके कैमरों ने हमें भी उस दिशा में देखने के लिए बाध्य कर दिया। बाघिन माँ अपने दो शावकों के साथ शान से जा रही थी। शावकों में एक वही बिटिया थी जिसे हमने गत संध्या को देखा था। दूसरा शावक उसी आयु का उसका पुत्र था।

लजीला पुत्र

हमारे सफारी गाइड ने हमें बताया कि कॉलरवाली बाघिन का पुत्र किंचित संकोची है। वह मानवों से दूर ही रहना चाहता है। वहीं माँ एवं पुत्री वन में पर्यटकों की उपस्थिति से सहज हैं। वे पर्यटकों एवं उनके सफारी वाहनों को देखकर अपना मार्ग परिवर्तित नहीं करतीं। उनकी यह सहजता राष्ट्रीय उद्यान पर्यटन अर्थव्यवस्था के लिए वरदान है। मानो वे इस तथ्य को समझती हैं तथा हमारी सहायता कर रही हैं। वे अत्यंत सहजता से मार्ग पर प्रकट हो जाती हैं, आपस में क्रीड़ा करती हैं ताकि उनके प्रकट होने पर जितने लोग भी निर्भर हैं, उनकी जीविका चलती रहे। जी हाँ, एक ओर जहाँ बाघ पुत्र सफारी जीपों से दूर रहकर लंबा मार्ग अपना रहा था, वहीं बाघिन माँ एवं उसकी पुत्री निडर होकर जीपों के मध्य से शान से जा रही थीं।

बाघिन एवं उसके दोनों शावक मार्ग के एक ओर वन में विचरण करते रहे तथा हमारी दृष्टि व हमारी जीपें वन की शान्ति भंग किये बिना उनका पीछा करती रहीं। वन में शांतता पालना अत्यावश्यक होता है तथा हम उसका पालन भी कर रहे थे। वन के भीतर हमें सदा वन्य प्राणियों एवं उनकी आवश्यकताओं का आदर करना चाहिए। मार्ग में अनेक स्थानों पर हमारा उनसे सामना हुआ। अंततः वे पेंच नदी को पार कर एक शिला पर बैठ गए। जून मास की गर्मी में नदी में जल की मात्रा कम थी। नदी के तल पर स्थित शिलाखंडों के मध्य से मार्ग निकालते हुए वे अपने प्रिय शिलाखंड पर पहुंचे तथा उस पर चढ़कर बैठ गए। अब उनसे विदा लेने का भी समय आ गया था।

बाघिन माँ एवं उसके दोनों शावकों ने हमें उदार दर्शन दिए थे जिसने हमें अभिभूत कर दिया था। लॉज पहुँचने तक रोमांच से हम सब स्तब्ध थे।

पेंच में किया गया रानी बाघिन एवं उसके दोनों शावकों के अद्भुत रूप का दर्शन मेरे स्मृतियों में सदा के लिए रच-बस गया है। मैं जानती हूँ कि पेंच का यह बाघ सफारी मेरे लिए दीर्घ काल तक एक सर्वोत्तम सफारी रहेगा।

कॉलरवाली बाघिन का विडियो देखें

प्रसिद्ध बाघिन माँ को अपने शावकों के साथ स्वच्छंद विचरण करते हुए इस विडियो में देखें।

कॉलरवाली बाघिन का दूसरा विडियो

कॉलरवाली बाघिन की मृत्यु

मैं अत्यंत दुःख के साथ आपको यह जानकारी दे रही हूँ कि पेंच की रानी, माताराम, कॉलरवाली बाघिन आदि नामों से सुप्रसिद्ध टी-१५ बाघिन ने १५ जनवरी २०२२ को संध्या ६.१५ बजे अपना अंतिम श्वास लिया। लगभग साढ़े सोलह वर्ष की आयु पूर्ण कर चुकी बाघिन माँ की मृत्यु वृद्धावस्था के कारण हुई। २९ शावकों को जन्म देने का कीर्तिमान स्थापित करने वाली बाघिन माँ की मृत्यु वन विभाग एवं वन्य प्राणी प्रेमियों के लिए अपूर्णीय क्षति है। सुपर टाईग्रेस मॉम के नाम से भी लोकप्रिय कॉलरवाली बाघिन ने पेंच राष्ट्रीय उद्यान का नाम सम्पूर्ण विश्व में प्रसिद्ध कर दिया है।

रविवार १६ जनवरी को पेंच राष्ट्रीय उद्यान में ही उसका अंतिम संस्कार किया गया. पेंच की रानी को हम सब की ओर से भावपूर्ण श्रद्धांजलि!

भारत के विभिन्न राष्ट्रीय उद्यानों एवं वन्यजीव अभयारण्यों में भ्रमण पर मेरे ये यात्रा संस्मरण अवश्य पढ़ें

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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पोबितोरा वन्यप्राणी अभयारण्य: अनछुए रहस्यों से भरे असम के घास के मैदान https://inditales.com/hindi/pobitra-vanya-prani-abhyaranya-assam/ https://inditales.com/hindi/pobitra-vanya-prani-abhyaranya-assam/#comments Wed, 04 Sep 2024 02:30:38 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3676

जब चंचल वर्षा विनाश करने पर उद्धत हो जाती है, जिसके कारण जब असम जलमग्न हो जाता है, मैं असहाय सी, यहाँ के स्थानिकों की स्थिति पर विचार करने पर विवश हो जाती हूँ। वहीं शीत ऋतु का वातावरण अत्यंत अनुकूल रहता है। शीत ऋतु में यहाँ साधारणतः किसी भी प्रकार के प्राकृतिक विपदा की […]

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जब चंचल वर्षा विनाश करने पर उद्धत हो जाती है, जिसके कारण जब असम जलमग्न हो जाता है, मैं असहाय सी, यहाँ के स्थानिकों की स्थिति पर विचार करने पर विवश हो जाती हूँ। वहीं शीत ऋतु का वातावरण अत्यंत अनुकूल रहता है। शीत ऋतु में यहाँ साधारणतः किसी भी प्रकार के प्राकृतिक विपदा की आशंका लगभग नगण्य रहती है। इस लेख की रचना करते समय मेरी स्मृतियाँ मुझे मेरे भूतकाल की ओर ले जा रही हैं जब मुझे असम के इस मनोरम पोबितोरा वन्यप्राणी अभयारण्य में विचरण करने का अवसर प्राप्त हुआ था, जो मध्य से बहती तेजस्वी ब्रह्मपुत्र नदी द्वारा पोषित होती है।

पोबितोरा वन्यप्राणी अभयारण्य – भारतीय गेंडों का प्राकृतिक आवास

गुवाहाटी विमानतल पर उतरने के पश्चात पोबितोरा वन्यप्राणी अभयारण्य पहुँचने के लिए हमने एक वाहन का प्रबंध किया। वहाँ पहुँचने के लिए हमें लगभग तीन घंटों का समय लगा। असम के मोरीगांव जिले में स्थित यह अभयारण्य ब्रह्मपुत्र नदी के दक्षिणी तट पर स्थित है। यद्यपि सम्पूर्ण असम को भारतीय गेंडों का प्राकृतिक आवास माना जाता है, तथापि पोबितोरा उन कुछ क्षेत्रों में से एक है जहाँ गेंडों की संख्या सर्वाधिक है।

पोबितोरा वन्यप्राणी अभयारण्य – भारतीय गेंडों का आवास
पोबितोरा वन्यप्राणी अभयारण्य – भारतीय गेंडों का आवास

पोबितोरा पहुँचकर हमने गाँव में स्थित एक सर्वानुकूल विश्रामगृह में अपना पड़ाव डाला जो अभयारण्य के प्रवेशद्वार के निकट स्थित था। साधारणतः पर्यटक पोबितोरा अभयारण्य का त्वरित अवलोकन कर उसी दिवस काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान की ओर कूच कर जाते हैं। किन्तु हम इस अभयारण्य का पूर्ण आनंद उठाते हुए मंद गति से विस्तृत अवलोकन करना चाहते थे। केवल अभयारण्य ही नहीं, अपितु देहाती परिवेश में निसंकोच रहते हुए विशाल वृक्षों एवं सरसों के खेतों से घिरे इस ग्रामीण रिसोर्ट का भी भरपूर्ण आनंद उठाना चाहते थे। इसी कारण हमने यहाँ कुछ दिवस व्यतीत करने का निश्चय किया।

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असम के पोबितोरा राष्ट्रीय उद्यान का अवलोकन

यदि आप किसी अन्य राज्य से असम यात्रा पर आ रहे हैं तो मेरा सुझाव है कि आप पोबितारा वन्यप्राणी अभयारण्य का अवलोकन सप्ताहांत में ना करें, अपितु मध्य सप्ताह के दिवसों में ही करें। सप्ताहांत में यह अभयारण्य बहुधा स्थानीय दर्शनार्थियों से भरा रहता है।

जब तक हम अपने रिसोर्ट पहुँचे, मध्यान्ह हो चुका था। हमने असम के भिन्न भिन्न व्यंजनों से भरी थाली का भरपूर्ण आस्वाद लिया तथा छज्जे पर दो कुर्सियाँ डालकर बैठ गए। वहाँ से समक्ष स्थित अप्रतिम उद्यान के उत्तम परिदृश्यों का आनंद उठाने लगे।

देखते देखते सूर्यास्त का समय आ गया था। कच्चे पथ पर धूल उड़ाती कुछ गौमाताएं एवं बकरियां अपने अपने आवासों की ओर प्रस्थान कर रही थीं। अन्धकार छाते ही चारों ओर का परिदृश्य पूर्णतः परिवर्तित हो गया था। प्रकृति का एक अनोखा रूप समक्ष उभर रहा था। सूर्य के तेजस्वी प्रकाश का स्थान अब दूर टिमटिमाते प्रकाश ने ले लिया था। चारों ओर से उठती अपरिष्कृत ध्वनी कानों में गुंजायमान हो रही थी। चारों ओर झींगुरों का कोलाहल था। एक ओर कहीं दूर किसी एकांत खलिहान में बैठा उल्लू चीख चीख कर अपनी उपस्थिति दर्शा रहा था। मैं पूर्ण एकाग्रता से एक ऐसे वातावरण का आनंद उठा रही थी जो नगरी परिवेश में दुर्लभ होता है।

हमारे विश्राम गृह के बाहर संकरी गली के अंत में एक दुकान थी। हमने निश्चय किया कि उस दुकान में कुछ क्षण व्यतीत किया जाए। लेकिन जैसे ही हम वहाँ जाने के लिए विश्राम गृह से बाहर निकले, विश्राम गृह का एक कर्मचारी पूर्ण आवेग से हमारी ओर दौड़ा। वह आवेशपूर्ण कुछ संकेत भी कर रहा था। हमारे निकट पहुँचते ही उसने हमें विश्राम गृह से बाहर जाने से रोका तथा अन्धकार में बाहर विचरण करने पर उत्पन्न संकटों के विषय में आगाह किया। उन्होंने हमें बताया कि रात्रि में जंगली भैंसें तथा गेंडे विचरण करते हुए वन के बाहर तक आ जाते हैं। ताजी हरी दूब को ढूँढते हुए वे मानवी आवासों तक पहुँच जाते हैं। गेंडे यदि आक्रामक हो जाएँ तो हमारे लिए संकट उत्पन्न कर सकते हैं। जंगली भैसों ने तो अब तक अनेक गाँववासियों पर आक्रमण कर उनके प्राण ले लिए हैं। इसलिए वह हमें अरक्षित रूप से बाहर जाने नहीं देना चाहता था। वह लालटेन के प्रकाश में हमें दुकान तक ले गया तथा हमारे लिए दुकान भी खोल दी।

अवश्य पढ़ें: असम का नामेरी राष्ट्रीय उद्यान एवं बाघ संरक्षण अभयारण्य

गाँव में पदभ्रमण

दूसरे दिवस हम प्रातः शीघ्र उठ गए थे। आसपास के परिदृश्यों का अनुभव जो लेना था। हमारा प्रयास सफल भी हुआ। चित्ताकर्षक परिदृश्यों का अनुभव हमें भावविभोर कर रहा था। निर्मल वायु, प्रातःकालीन सूर्य, सरसों के विस्तृत खेत आदि सब ग्रामीण परिवेश में हमारे पदभ्रमण को अद्वितीय बना रहे थे।

घुमक्कड़ी करते करते हम दूर तक आ गए थे। थकान एवं भूख अपने रंग दिखा रहे थे। अंततः हम अपने विश्राम गृह की ओर वापिस मुड़े। पहुँच कर जलपान किया। कुछ घंटे विश्राम कर, दोपहर के पश्चात सफारी के लिए प्रस्थान किया। सप्ताहांत नहीं होने के कारण पर्यटकों की संख्या सीमित थी।

हमारा सौभाग्य था कि हमारा जीप चालक ना केवल एक प्रशिक्षित वाहन चालक था, अपितु उसे अभयारण्य एवं वन्यप्राणियों के विषय में गहन ज्ञान भी था। अवसर पाते ही मैंने उससे पर्याप्त जानकारी एकत्र की। यह अभयारण्य ब्रह्मपुत्र नदी के दक्षिणी तट पर स्थित है। इस अभयारण्य की पारिस्थितिकी मूलतः घास के मैदानों, आर्द्रभूमि के क्षेत्रों तथा भिन्न भिन्न प्रकार के पशु-पक्षियों द्वारा निर्मित है।

भारतीय गेंडे

यह अभयारण्य पर्यटकों के लिए सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुला रहता है। प्रवेश के लिए टिकट वहाँ पहुँचकर लिया जा सकता है। इन्टरनेट द्वारा पूर्व आरक्षण की आवश्यकता नहीं है। किन्तु उच्च पर्यटन काल में समय से पूर्व टिकट क्रय कर अपना स्थान आरक्षित करना उचित होगा।

गेंडों को निकट से देखने का अनुभव प्राप्त करना हो तो आप हाथी पर बैठकर सफारी कर सकते हैं। एक ओर जहाँ सफारी की जीपें सड़क पर ही रहती हैं, हाथी सड़क से नीचे उतरकर ऊँचे ऊँचे घास को रोंदते हुए वन के भीतरी क्षेत्रों तक पहुँच जाते हैं। इससे पर्यटकों को भीतरी क्षेत्रों में विचरण करते गेंडों को समीप से निहारने का अवसर प्राप्त हो जाता है।

हमने जीप द्वारा सफारी करने का निश्चय किया। असम के अन्य राष्ट्रीय उद्यानों के विपरीत यहाँ हमें सशस्त्र परिदर्शक प्रदान नहीं किया गया था। इसलिए हमें किंचित भय प्रतीत हो रहा था क्योंकि गेंडों द्वारा सफारी जीपों पर आक्रमण की अनेक घटनाएँ यहाँ भी देखी गयी हैं। ऐसी परिस्थिति में सफारी परिदर्शक अपनी बन्दूक से आकाश में गोली दागते हैं जिससे वन्यप्राणी भयभीत होकर दूर भाग जाते हैं।

इन सभी विचारों को मस्तिष्क से दूर करते हुए हमने सफारी पर अपना ध्यान केन्द्रित किया। उबड़-खाबड़, कच्चे व संकरे मार्गों पर वाहन चलाते हुए हमारा वाहन चालक हमें वन के भीतरी क्षेत्र में ले गया।

जीप सफारी

इससे पूर्व हम भारत के अनेक राष्ट्रीय उद्यानों में विस्तृत रूप से भ्रमण कर चुके थे। इसलिए हमें वन के भीतर पाले जाने वाले सभी नियमों की पूर्ण जानकारी थी। उन सभी नियमों का पालन करते हुए हमने केवल अपने नेत्र एवं कान सक्रिय रखे तथा वन में वन्य प्राणियों को ढूँढने लगे।

एक वृक्ष के शीर्ष पर एक कलगीदार परभक्षी चील(Crested Serpant Eagle) बैठी हुई थी। वह सक्रिय मुद्रा में बैठी अपनी भेदक दृष्टि किसी शिकार पर गड़ाये हुए थी। कदाचित आक्रमण की योजना बना रही थी। अतिदक्षता का पालन करते हुए मैंने चुपके से अपना कैमरा उठाया। किन्तु उसे मेरी चाल का पूर्वाभास हो गया तथा त्वरित गति से मेरे नेत्रों से ओझल हो गयी।

कुछ क्षणों पश्चात हमारी जीप सुन्दर घास के मैदान के मध्य से जाने लगी। आगे जाकर यह मैदानी क्षेत्र संकुचित होते हुए संकरे मार्ग में परिवर्तित हो गया। इस मार्ग द्वारा हमने सघन वन के भीतर प्रवेश किया। मार्ग में हमने अनेक हिरणों को यहाँ-वहाँ कुलाँचे मारते देखा।

इस अभयारण्य के भीतर अनेक जल-स्त्रोत हैं जहाँ पशु-पक्षी अपनी तृष्णा शांत करने के लिए आते हैं। कुछ सरोवरों पर जंगली भैंसों ने अपना पूर्ण अधिपत्य स्थापित कर रखा था। उनके आक्रामक रौद्र रूप से भयभीत होकर वन के अन्य प्राणी उनसे दूरी बनाए रखते हैं।

हम अभयारण्य की सुन्दरता एवं वन्य प्राणियों को ढूँढने में मग्न हो गए थे। अकस्मात् ही हमारे वाहन चालक ने वाहन को रोका। समीप ही कोई वन्य प्राणी उपस्थित था। हमने अपनी दृष्टि चारों ओर दौड़ाई। हमारे समक्ष विशालकाय शक्तिशाली एकल श्रृंगी गेंडा आकर खड़ा हो गया।

वन्यप्राणी

पोबितोरा वन्यप्राणी अभयारण्य में गेंडों के अतिरिक्त जंगली सूअर, जंगली भैंसे, कांकड़(Barking Deer), भारतीय तेंदुए, सुनहरा गीदड़ जैसे अनेक वन्य प्राणी भी निवास करते हैं। भोजन एवं प्राकृतिक आवास द्वारा घास के ये विस्तृत मैदानी क्षेत्र उनका पोषण करते हैं। हमें जानकारी दी गयी कि पोबितोरा राष्ट्रीय उद्यान में गेंडों की संख्या अत्यधिक हो जाने के कारण कुछ गेंडों को असम के ही मानस राष्ट्रीय उद्यान में स्थानांतरित किया गया है।

विस्तृत घास के मैदानों, असंख्य जलस्त्रोतों तथा ऊँचे ऊँचे वृक्षों से अलंकृत पोबितोरा राष्ट्रीय उद्यान हमारे नेत्रों एवं हृदय को सुख प्रदान कर रहा था। किंचित दूर से ही सही, गेंडों के दर्शन करने के पश्चात हमारी अतृप्ति बढ़ने लगी थी। पोबितोरा राष्ट्रीय उद्यान में साम्राज्य तो गेंडों का ही है। अतः इन्हें निकट से देखने की अभिलाषा बलवत्तर होती जा रही थी।

अकस्मात् ही हमारे समक्ष एक विशालकाय गेंडा प्रकट हो गया। वह नम भूमि को सींग से खोदते हुए कुछ ढूंढ रहा था। हमारी जीप उसके निकट जाने लगी। चूँकि वह अपने क्रियाकलाप में व्यस्त था, कदाचित उसे हमारी उपस्थिति का भान नहीं था। हमने उसके अनेक चित्र लिये। हमारा वाहन चालाक सावधान था। उसने वाहन को गेंडे से किंचित दूर ही रोका हुआ था। उसे पूर्ण बोध था कि किसी भी समय वह हम पर आक्रमण कर सकता था।

पोबितोरा वन्यप्राणी अभयारण्य में पक्षी दर्शन

पोबितोरा वन्यप्राणी अभयारण्य इस तथ्य पर गौरवान्वित होता है कि उसमें सर्वाधिक संख्या में गेंडे निर्बाध विचरण करते हैं। इस अभयारण्य में पक्षियों की भी अनेक प्रजातियाँ पायी जाती हैं। हम भी भिन्न भिन्न प्रकार के पक्षियों का दर्शन कर आत्मविभोर हो रहे थे। भूरी सिल्ही (Whisteling Duck) से लेकर जलकाक (Cormorant), हरियल(Green Pigeon), ढेलहरा तोता(Parakeet) आदि तक हमने अनेक पक्षियों के दर्शन किये। आप नाम लीजिये, वह पक्षी वहाँ दृष्टिगोचर हो रहा था। वह भी बड़ी संख्या में!

संध्या होते ही हम अपने विश्राम गृह पहुंचे तथा विश्राम करने लगे। हमारे विश्राम गृह में एक पक्षी वेधशाला भी थी जहाँ हमने भरपूर समय व्यतीत किया। भिन्न भिन्न पक्षियों के चित्र लिए। उन्हें आकर्षित करने के लिए वृक्षों की शाखाओं पर फल एवं अन्य खाद्य वस्तुएँ राखी हुई थीं। पके केले पर चोंच मारते तीन आकर्षक धनेश(Hornbill) देखे।

आज पोबितोरा में हमारी अंतिम रात्रि थी। रात्रि अत्यंत शीतल थी। हमने अपना अपना सामान बंधा तथा शीघ्र ही निद्रा की गोद में समा गए। जैसे ही मध्य रात्रि हुई, विश्राम गृह के पृष्ठभाग से एक उग्र तथा विचित्र स्वर सुनाई पड़ा। मैं हड़बड़ाकर कर उठी। उस उग्र स्वर से मेरा रोम रोम काँप उठा था। अंततः यह स्वर किसका थी, हम निश्चित नहीं कर पा रहे थे। खिड़की के बाहर झाँककर देखा तो बाहर घुप्प अन्धकार था। केवल एक व्यक्ति ऊँचे स्वर में चिल्ला रहा था। कुछ क्षणों पश्चात यह आभास हुआ कि वह कोलाहल करते हुए किसी प्राणी को परिसर से दूर भगाने का प्रयत्न कर रहा था जो अन्धकार में परिसर के निकट आ गया था। वह व्यक्ति उस प्राणी पर कंदील का प्रकाश डालते हुए उसे डराने का भी प्रयत्न कर रहा था।

गेंडे का रात्रि भ्रमण

दूसरे दिवस प्रातः हमारी भेंट विश्राम गृह के स्वामी से हुई। हमारे भय पर स्मित हास्य करते हुए उसने हमें जानकारी दी कि गत रात्रि एक गेंडा विश्राम गृह के निकट आ गया था। कदाचित उसे यहाँ के स्वादिष्ट घास ने आकर्षित किया था। उन्होंने हमें बताया कि वे उनके नियमित भेंटकर्ता हैं। इसलिए रिसोर्ट के कर्मचारी सदा सावधान रहते हैं, विशेषतः रात्रि के समय। विश्राम गृह परिसर में दो श्वान भी हैं जो अनवरत रखवाली करते रहते हैं। वन्य प्राणियों के परिसर के निकट आते ही वे कर्मचारियों को आगाह कर देते हैं।

साधारणतः जंगली भैसे कोलाहल एवं कंदील का प्रकाश डालने पर भयभीत होकर भाग जाते हैं। किन्तु गेंडों पर इन उपायों का तनिक भी प्रभाव नहीं पड़ता है। वह तृप्ति होने तक घास चरते रहता है तथा स्वेच्छा से ही वापिस जाता है। किसी भी प्रकार का शोर अथवा प्रकाश उसे भयभीत नहीं करता है।

इस रोचक घटना के पश्चात हमने विश्राम गृह के कर्मचारियों को उनकी सेवा के लिए धन्यवाद दिया तथा उनसे विदा ली। इसके पश्चात पुनः एक नवीन अभियान के लिए काजीरंगा की ओर कूच कर गए।

यह कोयल बर्मन द्वारा रचिर एक अतिथि संस्करण है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान – बाघ दर्शन के परे वन्य-जीवन https://inditales.com/hindi/bandhavgarh-rashtriya-udyaan-safari/ https://inditales.com/hindi/bandhavgarh-rashtriya-udyaan-safari/#respond Wed, 09 Aug 2023 02:30:36 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3136

बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान बाघों के दर्शन के लिए अत्यंत लोकप्रिय है। अन्य राष्ट्रीय उद्यानों की तुलना में यह एक छोटा राष्ट्रीय उद्यान है जहां बाघों की संख्या प्रशंसनीय है। इस कारण सफारी के समय यहाँ बाघों के दर्शन सामान्य है। इन परिस्थितियों में बाघों के दर्शन ना हो पाना दुर्भाग्य ही कह सकते हैं। जब […]

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बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान बाघों के दर्शन के लिए अत्यंत लोकप्रिय है। अन्य राष्ट्रीय उद्यानों की तुलना में यह एक छोटा राष्ट्रीय उद्यान है जहां बाघों की संख्या प्रशंसनीय है। इस कारण सफारी के समय यहाँ बाघों के दर्शन सामान्य है। इन परिस्थितियों में बाघों के दर्शन ना हो पाना दुर्भाग्य ही कह सकते हैं।

बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान सफारी
बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान सफारी

जब हम यहाँ सफारी के लिए आये, हमारा भी कुछ ऐसा ही भाग्य रहा। उद्यान के ताला एवं मगधी क्षेत्र में हमने तीन सफारियाँ की किन्तु हमें एक भी बाघ नहीं दिखा। हमारे साथ आये कुछ अन्य पर्यटकों को बाघ ने अवश्य दर्शन दिए। सत्य ही है, उनके दर्शन कर पाना अथवा ना करना नियति का ही खेल है।

जब हम बाघ दर्शन की आस में जंगल में घूम रहे थे, तब बाघ तो हमसे छुपे रहे किन्तु वन के अन्य वैशिष्ट्य एवं उसके परितंत्र हमारा ध्यान आकर्षित करने में सफल हो रहे थे। हमने बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान के विविध आयामों को सूक्ष्मता से देखा व जाना।

बाघ दर्शन के परे बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान का वन्य-जीवन

वृक्ष

बांधवगढ़ के वनों में मुख्य रूप से चटक हरे पत्तों से आच्छादित साल वृक्ष बहुसंख्य में उपस्थित हैं। इसके पश्चात, बांस वृक्षों की संख्या है। इस क्षेत्र की रेतीली भूमि, जिनमें ये वृक्ष प्रस्फुटित होते हैं, उस काल का स्मरण कराते हैं, जब यह क्षेत्र कदाचित सागर का एक भाग रहा होगा। सागर ने इस भूमि पर बालू से अपने चिन्ह छोड़ दिए हैं।

वृक्षों को जकड़े हुए लताएँ
वृक्षों को जकड़े हुए लताएँ

इस क्षेत्र की एक अन्य विशिष्ठता है, साल वृक्षों का संबल लेते हुए उगती मोटी मोटी लताएँ, जो वृक्ष के तने को ढँक लेती है। यह एक परजीवी बेल होती हैं जो जिस वृक्ष का संबल लेते हुए उगती है, उसी वृक्ष को खा जाती है। वृक्ष के मरते ही शनैः शनैः वह स्वयं भी मृत हो जाती है। दार्शनिक रूप से इसका विश्लेषण करें तो क्या अधिकतर मानवों का व्यवहार ऐसा नहीं होता है? जिन वृक्षों पर उनका जीवन निर्भर होता है, क्या वे उन्ही वृक्षों की कटाई नहीं कर देते? वे यह भूल जाते हैं कि इन वृक्षों के अस्तित्वहीन होने पर उनका स्वयं का अस्तित्व भी शेष नहीं रहेगा।

हमारे गाइड ने वन में उगते अनेक औषधीय पौधों एवं वृक्षों से हमारा परिचय कराया। वनों के आसपास रहते जनजाति के लोग अनेक रोगों के निवारण के लिए इनका प्रयोग करते हैं। उदहारण के लिए, Chloroxylon Swietania नामक पौधे का प्रयोग मलेरिया से छुटकारा पाने के लिए किया जाता है जिसे स्थानिक भीरा का पौधा भी कहते हैं।

यहाँ वृक्ष की एक अन्य प्रजाति है, साजा, जिसका तना राख के रंग का होता है। इसकी सतह पर मगरमच्छ की त्वचा के समान आकृतियाँ होती है। स्थानिक इसे शिव रूप मानते हुए इसकी आराधना करते हैं क्योंकि इसके तने का रंग भस्म निरुपित शिव की त्वचा के रंग के अनुरूप दृष्टिगोचर होती है। वे इस वृक्ष की कटाई कभी नहीं  करते हैं। इसके पास से जाते समय वे इसे झुक कर प्रणाम करते हैं।

जामुन के भी अनेक वृक्ष हैं जिनसे टपके हुए जामुनों से निकले रंग पगडंडियों की मिट्टी को लाल व जमुनी कर देते हैं।

बांधवगढ़ के पक्षी

मेरे कैमरे के लिए सर्वाधिक प्रिय दृश्य थे, अपने स्वयं के परिवेश में स्वच्छंद उड़ते रंगबिरंगे पक्षी। नौरंगा (Pitta) एवं नीलकंठ(Indian Roller) अपने पंखों के रंगों का प्रदर्शन करते आकाश में उड़ रहे थे।

नीलकंठ
नीलकंठ

शांत बैठे नौरंगा के पंखों के उजले किन्तु सौम्य रंग अत्यंत मनमोहक प्रतीत होते हैं। वही जब आकाश में उड़ान भरता है, उसके पंख मानों विभिन्न रंगों की होली खेलते प्रतीत होते हैं। इसी कारण इसे नौरंगा कहते हैं।

नौरंगा
नौरंगा

वहीं जब नीलकंठ उड़ान भरता है तब अपना चटक नीला रंग प्रकट करता है तथा जब बैठता है तब उसके नीले पंख राखाड़ी रंग के पंखों के साथ आंखमिचौली खेलने लगते हैं।

कठफोड़वा (Woodpecker) एवं भारतीय सुनहरे पीलक (Oriole) पक्षियों ने मेरे कमरे के संग खूब आंखमिचौली खेली। वे मेरे कमरे में बंद होने के लिए कदापि तत्पर नहीं थे। मानो यह कह रहे हों कि कमरे छोड़िये एवं आँखों से हमें देखकर आनंद उठाइये। आप सब भी यह ध्यान में रखिये।

पक्षियों की विभिन्न प्रजातियाँ

शिकारी अथवा परभक्षी पक्षी, जैसे मधुबाज (Oriental Honey Buzzard), कलगीदार सर्प चील (Crested Serpent Eagle) आदि, वृक्षों की शाखाओं पर आत्मविश्वास से बैठे, अपनी पैनी दृष्टी से शिकार ढूंढ रहे थे। वे उन पर्यटकों से तनिक भी विचलित नहीं थे जो अपने कैमरे के लम्बे लम्बे लेंस उनकी ओर ताने हुए थे।

मधुबाज़
मधुबाज़

दूर स्थित घास के मैदानों में बैठे जांघिल सारस (Painted Storks) घास में छुपे कीट-भोज ढूंढ रहे थे। यूँ तो Jungle Babblers अथवा सात भाई पक्षियों के समूह छद्मावरण के कारण मिट्टी के परिवेश में अदृश्य से प्रतीत होते हैं किन्तु निरंतर आंदोलित होते अंगों के कारण वे हमारी दृष्टी को खींच रहे थे। वे सदा समूह में ही रहते हैं।

कलगीदार सर्प चील
कलगीदार सर्प चील

श्वेत श्याम दहियर (Magpie) भी मेरे कैमरे व मेरे साथ लुका-छुपी का खेल खेल रही थी। उस खेल में अंततः उसकी ही विजय हुई तथा मेरा कैमरा उसके छायाचित्र से वंचित रह गया।

चितरोखा (Spotted dove) जंगल में शांत बैठे रहते हैं। काला बाजा (Black Ibis), भीमराज / बुजंगा (Drongo), जलकाक (Cormorant) तथा  टिटहरी (Lap wing) अधिकतर आकाश में ही उड़ते हुए दिखाई पड़ रहे थे। जंगल में मंगल करते व विविध रंग बिखेरते मोर यहाँ-वहाँ दौड़ रहे थे।

वन्यजीव

एक भालू भूमि टटोलता हुआ भोजन ढूंढ रहा था जिसने अनेक क्षणों तक हमारा मनोरंजन किया। उसने उग्रता से दीमकों की एक बाम्बी पर आक्रमण कर दिया। उसके चारों ओर घूमते हुए वह उस पर अनेक दिशाओं से टूट पडा।

बांधवगढ़ में भालू
बांधवगढ़ में भालू

विडियो एवं छायाचित्र लेते हम छायाचित्रकारों को उसने निमिष मात्र के लिए अपना मुखड़ा दिखाया, तत्पश्चात बाम्बी को तोड़कर वह दीमकों को ढूंढ ढूंढ कर चट करने लगा।

जंगले में अठखेलियाँ करते हिरण
जंगले में अठखेलियाँ करते हिरण

यत्र-तत्र हमें जंगली सूअर दिख जाते थे। सर्वाधिक अधिक संख्या थी चितकबरे हिरणों की, जो सदा समूहों में दृष्टिगोचर हो रहे थे। कदाचित समूहों में वे स्वयं को परभक्षी पशुओं से सुरक्षित अनुभव करते होंगे। सांभर भी जोड़ों में सतर्क कानों के साथ यहाँ-वहाँ विचरण कर रहे थे।

बन्दर एवं हनुमान लंगूर भी दिखे जिनमें कुछ अपने शिशुओं को सीने से चिपटाए कूद-फांद रहे थे तो कुछ वृक्षों पर लटके हुए थे। अनेक बन्दर एक विशाल समूह में समीप स्थित एक जलाशय से जल ग्रहण कर रहे थे तथा जल में अपना प्रतिबिम्ब देख इतरा रहे थे।

बांधवगढ़ में रीछ का एक चलचित्र

राष्ट्रीय उद्यान में रीछ का एक सुन्दर विडियो लेने में मैं सफल हुई। आप इसे अवश्य देखें।

रीछ का एक जोड़ा हमने सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान में हमारे रात्रि सफारी में भी देखा था। सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान में रात्रि सफारी के विषय में अवश्य पढ़ें।

तितलियाँ एवं अन्य कीट

छोटे छोटे श्वेत पुष्पों से लदे एक विशेष वृक्ष को मैंने गूंजता हुआ वृक्ष, यह नाम प्रदान कर दिया क्योंकि उस पर तितलियों एवं कीटों की अनेक प्रजातियाँ गुंजन कर रही थीं।

मनमोहक तितलियाँ
मनमोहक तितलियाँ

हमने प्रातः एवं संध्या, दो सफारियों में उस वृक्ष के नीचे अनेक क्षण व्यतीत किये। प्रातःकालीन एवं संध्याकालीन सफारियों में तितलियों एवं कीटों की प्रजातियों की भिन्नता देख हम दंग रह गए।

बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान के ३ क्षेत्र अथवा जोन

राष्ट्रीय उद्यान को ३ प्रमुख क्षेत्रों में बाँटा गया है, खतौली, मगधी एवं ताला।

जल की होड़ में बंदरों के झुण्ड
जल की होड़ में बंदरों के झुण्ड

उनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण क्षेत्र ताला है, तत्पश्चात मगधी है। ये दोनों जोन विशाल चट्टानी पहाड़ी के ऊपर स्थित प्राचीन बांधवगढ़ दुर्ग के दोनों ओर स्थित हैं। एक दूसरे से सटे होने के पश्चात भी उन दोनों क्षेत्रों में तीव्र भिन्नता है।

पंख फैलाये पक्षी
पंख फैलाये पक्षी

ताला क्षेत्र अत्यंत सघन क्षेत्र है जिसमें मगधी जोन की तुलना में अधिक घने वृक्ष तथा मनमोहक परिदृश्य हैं। मैंने मगधी जोन में दो तथा ताला क्षेत्र में एक सफारी की। यद्यपि मगधी क्षेत्र में बाघों के दर्शन की संभावना अधिक रहती है, तथापि मैं मगधी क्षेत्र की तुलना में ताला क्षेत्र की अधिक अनुशंसा करूंगी।

हाथियों के लिए विशेष रोटियाँ

वन विभाग के पास कुछ हाथी हैं जिन पर बैठकर वन रक्षक वन के भीतर विचरण करते हैं। वे बाघों की उपस्थिति एवं उनके क्रियाकलापों की जानकारी रखते हैं तथा उन पर किसी संकट के अंदेशा का अनुमान लगाते हैं। बाघों की उपस्थिति ज्ञात होते ही वे सफारी के जीपों को सूचना देते हैं ताकि जीपें पर्यटकों को वहां ले जा सकें। यदि बाघ वन में भीतर हों जहाँ जीप ना पहुँच सके तब वे पर्यटकों जो हाथी पर बिठाकर उनके समीप तक ले जाते हैं।

हाथी के लिए बनती रोटियां
हाथी के लिए बनती रोटियां

हमने देखा, विभाग के कर्मी उन हाथियों के लिए मोटी व बड़ी बड़ी रोटियाँ बना रहे थे। प्रत्येक रोटी में लगभग एक किलो आटे का प्रयोग किया जा रहा था। उसके पश्चात भी, हाथी के समक्ष रोटियाँ कितनी लघु प्रतीत हो रही थीं। कर्मियों ने हमें बताया कि एक हाथी को प्रतिदिन दो ऐसी रोटियां प्रातः जलपान के लिए दी जाती हैं। तत्पश्चात भोजन में आठ ऐसी रोटियाँ दी जाती हैं। उसके पश्चात भी वह वन में चरने के लिए स्वतन्त्र होता है।

यहाँ-वहाँ वृक्षों के तने पर से आर्किड प्रस्फुटित हो रहे थे। मुझे बैगा जनजाति का एक व्यक्ति दिखा जो भूमि पर पड़ी कुछ वस्तुएं चुन रहा था। उसे देख मुझे अत्यंत आनंद हुआ कि कैसे वनों के आसपास जीवन व्यतीत करती जनजातियाँ वनों के प्रति श्रद्धा रखती हैं तथा आदर पूर्वक वही स्वीकारती हैं जो वन उन्हें स्वयं देते हैं।

हमें वन में बाघ भले ही नहीं दिखे किन्तु हमारी सफारी व्यर्थ नहीं थी। बाघों के ना दिखने पर हम निराश हुए बिना वन को अधिक सूक्ष्मता से निहार पाए। बाघों का ना दिखना एक प्रकार से वरदान ही सिद्ध हुआ जिसके कारण हमें इस वन की अन्य विशेषताओं की भी जानकारी प्राप्त हुई। इसके पश्चात भी इस वन के विषय में जानना अभी शेष है क्योंकि अनेक वन्य जीव एवं पक्षी वन के भीतर छुप कर बैठे थे जिनमें बाघ भी सम्मिलित हैं। कदाचित उन्हें देखने का अवसर मुझे पुनः शीघ्र ही प्राप्त होगा।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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नंदनकानन प्राणी उद्यान -भुवनेश्वर एक प्राकृतिक चिड़ियाघर https://inditales.com/hindi/nandankanan-prani-udyan-bhubaneshwar/ https://inditales.com/hindi/nandankanan-prani-udyan-bhubaneshwar/#comments Wed, 29 Jun 2022 02:30:40 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2723

नंदनकानन जूलॉजिकल पार्क अथवा नंदनकानन प्राणी उद्यान, ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में भ्रमण करने आए पर्यटकों का एक लोकप्रिय गंतव्य! यह उद्यान भुवनेश्वर के लोगों का भी अत्यंत प्रिय भ्रमण स्थल है। स्थानीय भाषा, ओडिया में नंदनकानन के शाब्दिक अर्थ कुछ इस प्रकार हैं, ‘स्वर्ग का बगीचा’ या ‘स्वर्गिक आनंद’ अथवा ‘सुख का बाग’ या […]

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नंदनकानन जूलॉजिकल पार्क अथवा नंदनकानन प्राणी उद्यान, ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में भ्रमण करने आए पर्यटकों का एक लोकप्रिय गंतव्य! यह उद्यान भुवनेश्वर के लोगों का भी अत्यंत प्रिय भ्रमण स्थल है। स्थानीय भाषा, ओडिया में नंदनकानन के शाब्दिक अर्थ कुछ इस प्रकार हैं, ‘स्वर्ग का बगीचा’ या ‘स्वर्गिक आनंद’ अथवा ‘सुख का बाग’ या ‘देवों का दिव्य उद्यान’।

सुनहरी तीतर
सुनहरी तीतर

भुवनेश्वर से लगभग १५ किलोमीटर दूर स्थित यह उद्यान खोर्धा जिले के जुझगढ़ वनीय क्षेत्र में स्थित है। यह लगभग १००० एकड़ से कुछ अधिक क्षेत्रफल में फैला हुआ है। यह सम्पूर्ण हराभरा क्षेत्र इतना विशाल है कि १३० एकड़ में फैली कंजिया सरोवर की विशाल व महत्वपूर्ण आर्द्रभूमि को अपने भीतर समाया हुआ है। नंदनकानन प्राणी उद्यान की स्थापना सन् १९६० में हुई थी जिसके एक दशक पश्चात इसे जनसामान्य के लिए खोला गया था।

नंदनकानन में भालू
नंदनकानन में भालू

नंदनकानन प्राणी उद्यान, वनीय क्षेत्र के भीतर, प्राकृतिक परिवेश के मध्य में बनाया गया है। इस उद्यान में प्राणियों को विशाल बाड़ों में रखा गया है जिन्हे विशेष रूप से उनके मूल प्राकृतिक आवासों के रूप प्रदान किए गए हैं ताकि वे उनमें स्वाभाविक रूप से बस सकें तथा स्वस्थ जीवन जी सकें।

जंगल की रानी शेरनी
जंगल की रानी शेरनी

नंदनकानन प्राणी उद्यान भारत के विशालतम प्राणी उद्यानों  में से एक है। इस उद्यान ने, अनेक मापदण्डों में, वैश्विक स्तर पर प्रथम पद अर्जित किया है। इस प्राणी उद्यान  को अनेक विशिष्टताओं से विभूषित किया गया है। भारतीय रेल ने एक एक्सप्रेस रेल का नामकरण, इस प्राणी उद्यान  के नाम पर, नंदनकानन एक्सप्रेस किया है।

नंदनकानन जूलॉजिकल पार्क अथवा नंदनकानन प्राणी उद्यान

नंदनकानन प्राणी उद्यान को सुव्यवस्थित खाके के अंतर्गत उत्तम रीति से निर्मित किया गया है। इस उद्यान के मुख्य आकर्षण हैं-

  • प्राणियों की लगभग १५०० विभिन्न प्रजातियों से युक्त एक विशाल प्राणी उद्यान
  • वनस्पति उद्यान एवं तितली उद्यान
  • सिंहों, बाघों, हिरणों एवं भालुओं के बाड़ों मे भीतर सफारी भ्रमण
  • कंजिया सरोवर में नौका विहार – यंत्रचलित नौकाओं एवं पैडल स्वचालित नौकाओं में जलविहार
  • उभयचरों या जलथलचरों के घेरे
  • मछलीघर
  • बच्चों की छोटी रेलगाड़ी
  • पुस्तकालय
  • निशाचर प्राणियों एवं पक्षियों की बाड़
  • सरीसृप अथवा रेंगने वाले प्राणियों का केंद्र
  • संग्रहालय
  • चिड़ियाघर
  • लगभग ७०० प्रजातियों के विभिन्न स्थानिक वृक्षों से भरा वनीय क्षेत्र
  • इस उद्यान का प्राकृतिक वनीय क्षेत्र, स्तनपायियों की १३ विभिन्न प्रजातियों, सरीसृपों की १५ प्रजातियों, पक्षियों की लगभग १७९ प्रजातियों, उभयचरों या जलथलचरों की २० विभिन्न प्रजातियों, तितलियों की ९६ भिन्न भिन्न प्रजातियों तथा मकड़ियों की भी ५१ विभिन्न प्रजातियों का आवासक्षेत्र है।
कांकड़ या भौंकने वाला हिरण
कांकड़ या भौंकने वाला हिरण
  • नंदनकानन प्राणी उद्यान के आधिकारिक वेबस्थल पर नंदनकानन वन्यजीव अभयारण्य में उपस्थित पक्षियों की विस्तृत सूची है। उन्हे ‘Arial feeding bird’, ‘Arboreal bird’, ‘Birds of prey’, ‘Ground feeding bird’ तथा ‘Wetland birds’, इन उपनामों के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया है। यदि आप पक्षी प्रेमी अथवा नभचर प्रेमी हैं तो यह जानकारी अवश्य देखें।

प्राणी उद्यान  एवं वनस्पति उद्यान से संबंधित जानकारी

ढ़ोल या जंगली कुत्ता
ढ़ोल या जंगली कुत्ता
  • नंदनकानन प्राणी उद्यान में जनसाधारण के लिए भ्रमण समयावधि, अप्रैल से सितंबर मास तक प्रातः ७:३० बजे से सायं ५:३० बजे तक तथा अक्टूबर से मार्च मास तक प्रातः ८ बजे से सायं ५ बजे तक है।
  • नंदनकानन प्राणी उद्यान प्रत्येक सोमवार के दिन बंद रहता है।
  • नंदनकानन प्राणी उद्यान में प्रवेश के लिए ५० रुपये का नाममात्र प्रवेश शुल्क निर्धारित है।
  • पशु सफारी एवं नौका विहार हेतु अतिरिक्त शुल्क लिया जाता है।
  • केवल उच्च स्तर के चलचित्र कैमरे एवं चित्रपट छायाचित्रण हेतु अतिरिक्त शुल्क निर्धारित हैं।
  • नंदनकानन प्राणी उद्यान में पर्यटकों के लिए अनेक सुविधाएं हैं। इनमें प्रमुख हैं, पेयजल गुमटियाँ, शौचालय संकुल, वाहन प्रतीक्षा स्थल, पर्यटक विश्राम कक्ष, जलपानगृह, समान-कक्ष, विकलांगों हेतु पहियेदार कुर्सियाँ, प्रथम उपचार सुविधाएं, बैटरी चलित वाहन, मार्गदर्शक नक्शे, स्मारिका दुकानें, शिशु देखरेख सुविधाएं इत्यादि।

नंदनकानन प्राणी उद्यान  में भ्रमण का मेरा अनुभव

धूसर भेड़िया
धूसर भेड़िया

नंदनकानन प्राणी उद्यान एक अत्यंत लोकप्रिय एवं प्रसिद्ध गंतव्य है। अतः उसका प्रभाव भी अवश्य दृष्टिगोचर होगा। हम वर्ष २०२० के जनवरी मास में नंदनकानन प्राणी उद्यान में भ्रमण करने गए थे। प्राणी उद्यान के प्रवेशद्वार पर प्रवेशपत्र प्राप्त करने के लिए शालेय विद्यार्थियों की लंबी पंक्ति थी। सौभाग्य से शालेय विद्यार्थियों एवं अन्य पर्यटकों के लिए पृथक पंक्तियाँ थीं। प्राणी उद्यान के कर्मचारियों द्वारा पर्यटकों की भीड़ को सुचारु रूप संचालित किया जा रहा था। उद्यान में प्रवेश करने के लिए हमें १० मिनट से भी कम समय लगा। आपको यह जानकर अचरज होगा कि गत कुछ वर्षों से नंदनकानन प्राणी उद्यान में, प्रतिवर्ष ३० लाख से भी अधिक पर्यटक आते रहे हैं। इसका तात्पर्य है कि इस उद्यान में भ्रमण हेतु लगभग १०,००० पर्यटक प्रतिदिन आते हैं।

मेरा परामर्श है कि यदि आप इन प्राणियों के दर्शन करना चाहते हैं तो भ्रमण से पूर्व ही उनके विषय में आवश्यक विवरण प्राप्त करें। तत्पश्चात उनका अवलोकन करें। पर्यटन-परिदर्शक अथवा गाइड की सेवाएं ना लें। सामान्यतः ये परिदर्शक अत्यंत संक्षिप्त में आपको इन प्राणियों की जानकारी देकर शीघ्रता से आपका भ्रमण सम्पूर्ण कर देते हैं ताकि आपके पश्चात वे अन्य ग्राहक ले सकें। अतः परिदर्शक की सेवाएँ तभी लें जब आप भी शीघ्रता से उद्यान का भ्रमण पूर्ण करना चाहते हों। अन्यथा नहीं।

मांसभक्षी प्राणी

प्राणी उद्यान के भीतर भ्रमण करना हमारे अनुमान से अपेक्षाकृत कहीं अधिक आसान था। प्राणी उद्यान के भीतर पूर्वनिर्धारित पगडंडियाँ सुव्यवस्थित प्रकार से बनायी गई हैं जिन पर सभी संबंधित सूचनाएं एवं मार्गदर्शन अंकित हैं। प्राणी उद्यान के सभी बड़े प्राणियों के लिए पृथक विशाल बाड़ बनाए गए हैं। बाड़ों के भीतर पर्याप्त मात्रा में वृक्ष एवं झाड़ियाँ उगाए गए हैं जो उन्हे प्राकृतिक आवास प्रदान करते हैं। उनका परिवेश इतना प्राकृतिक वन सदृश बनाया गया है, कि आप जब भी सिंह, बाघ, तेंदुआ, सियार, जंगली कुत्ते इत्यादि के बाड़ों के समीप जाएं, तो आपको उनके दर्शन सहज ही प्राप्त नहीं होंगे। उनके दर्शन करने के लिए धीरज रखते हुए प्रतीक्षा करनी पड़ती है। वे जब भी विचरण करते हुए बाड़ की सीमा पर आते हैं तब ही आप उन्हे देख सकते हैं। अन्यथा झाड़ियों के मध्य उनकी एक झलक से ही आपको संतुष्ट होना पड़ेगा। अतः धीमी चाल तथा धीरज अत्यंत सहायक सिद्ध होगी।

जब हम रीछ के बाड़ के समीप पहुंचे, वह अपने समान दर्शकों को देख कर चंचल हो उठा था। बाड़ के उस पार एक सिंहनी दहाड़ मार रही थी। उपस्थित दर्शक रीछ को अधिक करतब दिखने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे। साथ ही वे शांत भी थे ताकि दहाड़ मारती सिंहनी अधिक उत्तेजित ना हो जाए।

बाघ एवं तेंदुए अपनी प्रकृति के अनुसार एकांतप्रिय प्राणी प्रतीत हो रहे थे। वे दर्शकों से कुछ दूर बैठकर विश्राम कर रहे थे। बाघ वृक्षों की छाँव में, तो तेंदुए वृक्षों की शाखाओं पर चढ़कर बैठे थे। वृक्षों एवं पर्णसमूहों के मध्य उन्हे खोजने में कुछ समय लगा। जो भी पर्यटक उन्हे पहले खोज लेते थे वे दूसरों की सहायता के लिए उस ओर संकेत कर रहे थे।

हिरण

नीलगाय
नीलगाय

हिरणों के लिए भी एक विशाल बाड़ बनायी गई है ताकि वे उसके भीतर स्वच्छंद विचरण कर सकें। इस प्राणी उद्यान में बड़ी संख्या में हिरण विद्यमान हैं। ना तो दर्शकों को उन्हे देखने के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ती है, ना ही उन हिरणों को दर्शकों की उपस्थिति व्याकुल करती है।

बौने से चूहा हिरण
बौने से चूहा हिरण

माउस डीयर अथवा छोटा हिरण हमारे लिए एक आश्चर्य से कम नहीं था। हमने इससे पूर्व ना तो उन्हे देखा था, ना ही उनके विषय में कभी पढ़ा था। इस दुर्लभ तथा संकोची प्राणी की लंबाई लगभग १५ इंच होती हैं। इसे इंडियन चेर्वोटैन के नाम से भी जाना जाता हैं। इस उद्यान में इनकी पर्याप्त संख्या है।

साम्भर
साम्भर

नंदनकानन प्राणी उद्यान में हिरणों की अनेक प्रजातियाँ बड़ी संख्या में विद्यमान हैं। सभी प्रकार के हिरण यहाँ दर्शकों की उपस्थिति में भी स्वच्छंद व सुरक्षित अनुभव करते प्रतीत हो रहे थे।

निशाचर प्राणी

निशाचर श्वेत उल्लू
निशाचर श्वेत उल्लू

निशाचर पशु-पक्षियों का भाग अत्यंत अंधकार भरा है। प्रकाश अत्यंत मंद होता है। इसके भीतर से जाते समय कुछ दर्शकों को किंचित असुविधा हो सकती है। किन्तु इस प्रकार के प्राणियों की सुविधा के लिए मंद प्रकाश अथवा अंधकार आवश्यक है। संकरी पगडंडी तथा पर्यटकों की अधिक संख्या के कारण हमें मंद प्रकाश छायाचित्र लेने में असुविधा हो रही थी। वहाँ एक बार्न उल्लू या श्वेत उल्लू को देखना मेरा प्रथम अनुभव था।

सरीसृप

नंदनकानन में नाग देवता
नंदनकानन में नाग देवता

इस उद्यान में सर्पों की अनेक प्रजातियाँ हैं। नाग से लेकर अजगर तक, रैट-स्नेक अर्थात् धामिन तथा अनेक अन्य प्रजातियाँ यहाँ देखी जा सकती हैं। गोह, गिरगिट तथा अनेक अन्य सरीसृप इस भाग में देखे जा सकते हैं।

गोह
गोह
भारतीय गिरगिट
भारतीय गिरगिट

मगरमच्छ

भारत में उपस्थित तीनों प्रकार के मगरमच्छ आप यहाँ देख सकते हैं। खारे जल के मगरमच्छ, मीठे जल के मगर तथा घड़ियाल, तीनों प्रजातियों का इस उद्यान में प्रजनन किया जाता है। उनकी प्रजनन प्रक्रिया के प्रत्येक चरण में आप इन दीर्घजीवी प्रजातियों को देख सकते हैं। आप देख सकते हैं कि किस प्रकार ये शक्तिशाली व खूंखार प्राणी छोटे छोटे शिशुओं से विशालकाय प्राणियों में परिवर्तित होते हैं।

खारे पानी के मगर नंदनकानन में
खारे पानी के मगर नंदनकानन में

खारे जल के मगर मूलतः नदी के मुहाने तथा समुद्री जल के समीप पनपते हैं। मगर की ये प्रजाति सर्वाधिक विशालकाय तथा सर्वाधिक दीर्घजीवी होती है। ऐसा कहा जाता है कि वे सम्पूर्ण समुद्र को तैर कर पार कर लेते हैं। ओडिशा का भितर्कनिका वन उनके सर्वोत्तम प्राकृतिक आवास तथा प्रजनन स्थलों में से एक है।

मेरी भितर्कनिका यात्रा के अविस्मरणीय अनुभव यहाँ पढ़ें।

घड़ियाल
घड़ियाल

घड़ियाल अर्थात् नदी के जलचर, मीठे जल के प्राणी हैं। भारत में सामान्यतः ये गंगा नदी में पाए जाते हैं। इन्हे इनके मुख से पहचाना जा सकता है। इनका मुख, अन्य प्रजातियों में सर्वाधिक लंबा, संकरा तथा सुडौल होता है जो तेज दांतों से भरा होता है। मगर भी मीठे जल के प्राणी हैं जो साधारणतः नदियों, उथली आर्द्र-भूमि तथा अप्रवाही जल में पाए जाते हैं। मुझे स्मरण है, मैंने उन्हे चम्बल नदी में भी देखा था।

कछुए

नंदनकानन प्राणी उद्यान में जलीय एवं थलीय कछुओं की अनेक प्रजातियाँ हैं। उन्हे उनके वयानुसार वर्गीकृत कर रखा हुआ है।

भारत का स्टार या तारा कछुए
भारत का स्टार या तारा कछुए

इन कछुओं में लुप्तप्राय भारतीय स्टार कछुए भी सम्मिलित हैं। आप यहाँ स्थित कछुओं की विविधता देख अचरज में पड़ जाएंगे।

नभचर

मंदारिन बत्तख
मंदारिन बत्तख

इस प्राणी उद्यान  में दुर्लभ पक्षियों की अनेक प्रजातियाँ हैं जिन्हे उनकी प्रजाति के अनुसार भिन्न भिन्न बाड़ों में रखा गया है। इनमें सारस, सुनहरा तीतर, श्वेत मोर, रजत तीतर इत्यादि सम्मिलित हैं।

जंगली मुर्गा
जंगली मुर्गा

उद्यान में विशाल जलक्षेत्र हैं जहां अनेक जलपक्षियों ने बसेरा किया हुआ है।

श्वेत मोर
श्वेत मोर

इन जलपक्षियों में बगुले, सुरखिया, पेलिकन अथवा हवासील, सारस इत्यादि सम्मिलित हैं।

सारस पक्षी नंदनकानन में
सारस पक्षी नंदनकानन में

यहाँ आप इन पक्षियों को देख सकते हैं:

  • कबूद/अंजन अथवा धूसर बगुला (grey heron)
  • जामुनी बगुला (purple heron)
  • कोकराइ (night heron)
  • अंधा बगुला (pond heron)
  • काली चोंच वाले किलचिया बगुले (little egret)
  • पीली चोंच वाले लघु श्वेत बगुले (intermediate egret)
  • पीली चोंच व काली टांगों वाले श्वेत (सुर्खिया) बगुले (great egret)
  • चमकीला बुज्जा (glossy ibis)
  • काला बुज्जा (black-headed ibis)
  • चकवा/सुर्खाब (ruddy shelducks)
  • नारंगी बतख (mandarin duck)
  • एशियाई घुँगिल (Asian open bill stork)
  • जाँघिल (painted stork)
  • हवासील (pelicans)
  • बाज (eagles)
  • चील (kites)
  • चहचहाते रंगबिरंगे छोटे तोते (Love Birds)

और पढ़ें: ओडिशा की मंगलाजोड़ी आद्रभूमि-जलपक्षियों के स्वर्ग में नौकाविहार

नंदनकानन का  कंजिया सरोवर

मुझे यह देख अत्यंत प्रसन्नता हुई कि कंजिया सरोवर इस प्राणी उद्यान का ही एक भाग है तथा इस सरोवर में पर्यटकों के लिए मनोरंजक नौका सवारी भी आयोजित की जाती है।

नंदनकानन के कंजिया सरोवर में नौका विहार
नंदनकानन के कंजिया सरोवर में नौका विहार

कई पर्यटक सरोवर के जल में नौका सवारी का आनंद उठा रहे थे तथा अनेक पर्यटक नौका सवारी का अनुभव लेने के लिए पंक्ति में खड़े प्रतीक्षा कर रहे थे।

सरोवर के शांत जल में पैडल स्वचालित नौकाएँ तथा यंत्रचलित नौकाएँ लोगों को अत्यंत सुखकर एवं अद्वितीय अनुभव प्रदान कर रहे थे। देश-विदेश के अन्य आधुनिक स्थानों पर नौकाविहार कर आए लोगों को यहाँ की सेवाएं कुछ कमतर प्रतीत हो सकती हैं किन्तु सामान्य पर्यटकों के लिए यह एक रोमांचक अनुभव है।

जलहस्ती अथवा दरियाई घोडा

जलक्रीडा करता जलहस्ती
जलक्रीडा करता जलहस्ती

जलहस्ती अथवा दरियाई घोड़ा इतना विशालकाय प्राणी होता है कि आप इसे अनदेखा कर ही नहीं सकते। नंदनकानन प्राणी उद्यान में इन विशालकाय प्राणियों के लिए कंजिया सरोवर का विशेष भाग निहित किया गया है। जब तक हम प्राणी उद्यान के इस भाग तक पहुंचे, वातावरण अत्यंत उष्ण हो चुका था तथा सूर्यदेव पूर्ण ऊर्जा से दमक रहे थे। दर्जन भर जलहस्ती अपनी देह को शीतलता प्रदान करने के लिए सरोवर के जल में शांतता से तैर रहे थे। जलहस्तियों को शीतल जल में विचरण करना अत्यंत भाता है।

हमने नंदनकानन प्राणी उद्यान में भ्रमण के लिए केवल २-३ घंटों का समय निश्चित किया था। अतः हमें उद्यान के अनेक रोचक क्रियाकलापों से अछूते ही रहना पड़ा था, जैसे सफारी, वनस्पति उद्यान, कंजिया सरोवर में नौकायन तथा कुछ अन्य वन्यप्राणियों के बाड़े।

नंदनकानन प्राणी उद्यान संबंधित यात्रा सुझाव

जंगली बिल्ली
जंगली बिल्ली
  • इस क्षेत्र की ग्रीष्म ऋतु अत्यंत ऊष्णता भरी होती है। अतः यदि आपने ग्रीष्म ऋतु में नंदनकानन प्राणी उद्यान का भ्रमण नियोजित किया है तो प्रातःकाल का समय निश्चित करें।
  • यदि आप मर्यादित समय सीमा में सम्पूर्ण उद्यान की झलक पाना चाहते हों तो पर्यटन परिदर्शक अथवा गाइड की सेवाएं ले सकते हैं।
  • यदि आपके पास भुवनेश्वर में आधा दिन या उससे अधिक का समय है तथा आप प्रकृति व वन्यजीवन में रुचि रखते हैं तो वह समय नंदनकानन प्राणी उद्यान में व्यतीत करें। पर्याप्त समय का पूर्ण आनंद उठाने के लिए, पर्यटन परिदर्शक अथवा गाइड की सेवाएं ना लेते हुए, स्वयं ही अपनी गति से सभी प्राणियों को निहारें तथा उनके विषय में जानें।
  • उद्यान में सभी पगडंडियाँ पक्की व सुव्यवस्थित हैं जिन पर सभी आवश्यक संकेत एवं सूचनाएं इंगित हैं। सम्पूर्ण मार्ग में, नियमित अंतराल पर, पेयजल, छाँव तथा विश्राम/बैठने की व्यवस्था की गई है। सम्पूर्ण उद्यान में, विभिन्न स्थानों पर, “उद्यान मानचित्र पर आप यहाँ हैं” सूचना पट्टिका लगायी गई है। अतः निश्चिंत रहिए, इस विस्तृत उद्यान में आप मार्ग से नहीं भटकेंगे।
  • उद्यान के प्रवेशद्वार पर अनेक जलपानगृह हैं जहां आपको कई स्थानीय व्यंजन प्राप्त हो जाएंगे। यदि आप इस विशाल एवं विस्तृत उद्यान में पर्याप्त समय व्यतीत करना चाहते हैं तो उद्यान में प्रवेश से पूर्व ही पर्याप्त जलपान कर लें। अन्यथा पेट की क्षुधा उद्यान के भ्रमण को असुविधाजनक बना सकती है।
  • उद्यान में सैकड़ों पर्यटक भ्रमण करने के लिए आते हैं। सम्पूर्ण उद्यान में उद्यान के कर्मचारी एवं गाइड उपस्थित रहते हैं। अतः किसी भी स्थान पर स्वयं को एकाकी समझ कर व्यथित ना हो। निश्चिंत होकर उद्यान एवं वन्यजीवों का अवलोकन करिए।
  • प्राणी उद्यान एवं उसकी समयसारिणी/विशेष आयोजनों से संबंधित, समय समय पर उभरते किसी भी प्रश्न/स्पष्टता/अद्यतनीकरण में प्राणी उद्यान का वेबस्थल अवश्य सहायक होगा।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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होलोंग – जलदापारा राष्ट्रीय उद्यान का जैव विविधता अतिक्षेत्र https://inditales.com/hindi/hollong-jaldapara-rashtriya-udyaan-pashchim-bengal/ https://inditales.com/hindi/hollong-jaldapara-rashtriya-udyaan-pashchim-bengal/#comments Wed, 18 May 2022 02:30:35 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2681

जलदापारा राष्ट्रीय उद्यान को स्थानीय भाषा में दुआर कहते हैं। इस दुआर का एक छोटा सा कोना है, होलोंग। यह भारत के उत्तर-पूर्वी भाग में उस स्थान पर स्थित है जिसे मुर्गी का गला कहते हैं। तकनीकी रूप से यह जैव विविधता अतिक्षेत्र पश्चिम बंगाल राज्य में स्थित है। किन्तु यह भूटान, बांग्लादेश एवं असम […]

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जलदापारा राष्ट्रीय उद्यान को स्थानीय भाषा में दुआर कहते हैं। इस दुआर का एक छोटा सा कोना है, होलोंग। यह भारत के उत्तर-पूर्वी भाग में उस स्थान पर स्थित है जिसे मुर्गी का गला कहते हैं। तकनीकी रूप से यह जैव विविधता अतिक्षेत्र पश्चिम बंगाल राज्य में स्थित है। किन्तु यह भूटान, बांग्लादेश एवं असम से घिरा हुआ है। आप किसी भी दिशा में कुछ किलोमीटर जाएँ तो आप कदाचित अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा पार कर लेंगे। किन्तु पशु क्या करते होंगे? वे कैसे मानवों द्वारा बनाई गई सीमारेखा का सम्मान कर पाते हैं?

जलदापारा राष्ट्रीय उद्यान – जैव विविधता अतिक्षेत्र

जलदापारा राष्ट्रीय उद्यान का सफारी मार्ग
जलदापारा राष्ट्रीय उद्यान का सफारी मार्ग

जोरेथाँग, पेलिङ्ग, गंगटोक तथा कुछ दिन सिलिगुड़ी में, इस प्रकार सिक्किम में कुछ ७ दिवस व्यतीत करने के पश्चात हम जलदापारा राष्ट्रीय उद्यान पहुंचे। हम आगामी कुछ दिवस होलोंग वन विश्रामगृह में रहना चाहते थे। किन्तु इस विश्रामगृह की मांग अत्यधिक होने के कारण हमें यहाँ केवल एक ही रात्रि ठहरने की सुविधा प्राप्त हो पायी। अन्य रात्रियों के लिये हम ने अपनी व्यवस्था जलदापारा विश्रामगृह में की। यह विश्रामगृह ठीक उस मुख्य मार्ग पर स्थित है जो जलदापारा के मध्य से होकर जाती है।

दुआर का वन्य जीवन व्याख्या केंद्र
दुआर का वन्य जीवन व्याख्या केंद्र

दुआर से हमारा साक्षात्कार एक व्याख्या केंद्र से आरंभ हुआ जहाँ हमें वन के विषय में श्रेष्ठ जानकारी प्रदान की गई। हमें यहाँ कैसा व्ययहार करना चाहिए तथा हमें यहाँ क्या क्या देखने की आस रखनी चाहिए इत्यादि। दुआर हाथियों का एक निकास गलियारा है। अतः हमें हाथियों को देख पाने की आस थी। हमें यह भी बताया गया कि दुआर में गेंडे, गौर तथा हिरण भी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। इस व्याख्या केंद्र की दीर्घा में घूमते हुए हमें इस वन के विषय में पर्याप्त दिशानिर्देश प्राप्त हुए।

जलदापारा राष्ट्रीय उद्यान के मदारीहाट प्रवेशद्वार से जीप सफारी

जलदापारा विश्रामगृह से हमने वन में दो बार जीप सफारी की। उन सफ़ारियों में हमने केवल कुछ गेंडों को देखा, वह भी दूर से। वे ऊंचे ऊंचे घास के बीच में लगभग छुपे हुए थे। उन्हे देखने के लिए हमें पर्यवेक्षण अटारी पर चढ़ना पड़ा था। किन्तु दोनों सफ़ारियों में जंगली हाथी हमसे लुक-छुपी का खेल खेलते रहे। हमारी भेंट वन विभाग के एक पालतू हाथी से अवश्य हुई किन्तु वह भी हमारी ओर ध्यान केंद्रित करने का इच्छुक नहीं था। सफारी करते समय हमने चारों ओर अनेक प्रकार के पक्षी देखे। उनके छायाचित्र लेने की हमारी तीव्र इच्छा थी। हमने हमारे गाइड से कहा भी, किन्तु हमारी प्रार्थनाएँ भैंस के आगे बीन बजाने जैसी व्यर्थ हो रही थीं। सजीले हावभाव वाला एक मनमोहक मोर मुझे आज भी स्मरण है। अत्यंत सामान्य घटना बता कर गाइड तब भी नहीं रुका था। जैसा कि बहुधा देखा गया है, उसका लक्ष्य केवल हमें विशाल वनीय पशु दिखाने की ओर केंद्रित था। शेष वन तथा छोटे पशु व पक्षी दिखाने में उसकी अधिक रुचि नहीं थी।

दुआर का चिलापाटा वन

अगले दिन हमने कूच बिहार का भ्रमण करने का निश्चय किया। वहाँ से वापिस आते समय हम चिलापाटा वन के मध्य से आए। वह वन कुछ ही किलोमीटर लंबा था किन्तु उसके मध्य से गाड़ी की सवारी करना किसी जादुई अनुभव से कम नहीं था। हमें पूर्व निर्देश दिए गए थे कि हमें ना तो कहीं रुकना है, ना ही कहीं गाड़ी से उतरना है क्योंकि कहीं से भी जंगली पशु के आने की संभावना सदैव रहती है तथा समीप कोई सहायता केंद्र भी उपस्थित नहीं है। हम धीमी गति से चलती गाड़ी से बाहर देखते हुए मनोरम वनीय परिदृश्यों को आँखों में भर रहे थे। हरेभरे वन ने हमें तीन ओर से घेर रखा था। जी हाँ, ऊंचे ऊंचे बांस के वृक्ष मार्ग के ऊपर मंडप सा बना रहे थे। सूर्यास्त का समय था। वन से अनेक प्रकार के स्वर सुनायी दे रहे थे। मार्ग में अन्य कोई वाहन भी नहीं था। अर्थात् वहाँ मानवी शोर नाममात्र भी नहीं था।

चिलापाटा वन्य मार्ग
चिलापाटा वन्य मार्ग

वन के सर्वाधिक सघन भाग को पार करने के पश्चात हम एक पुलिया के समीप कुछ क्षण रुके। पुलिये के नीचे से एक छोटी जलधारा बह रही थी। जैसे ही हमने अपने पाँव धरती पर रखे, हमें ऐसा आभास हुआ मानो हम भी इसी वन का एक अभिन्न अंग हों। हमें ऐसा लग रहा था मानो हम भी वन के भीतर विचरण कर सकते हैं, वृक्षों की शाखाओं पर रह सकते हैं। मदमस्त चाल से चलते जंगली हाथी एवं इधर उधर कूदते-फाँदते हिरणों के बीच रह सकते हैं। अचानक मन से सम्पूर्ण भय लुप्त हो गया था।

जैसे ही अंधकार छाने लगा, हमने चिलापाटा वन से विदा ली। एक आस लिए यहाँ से निकले कि हम पुनः कभी इस वन के दर्शन करने आ पाएं।

होलोंग वन विश्राम गृह – वन्यजीव उत्साहियों के लिए एक अविस्मरणीय स्थल

तीसरे दिन हम होलोंग वन विश्राम गृह में स्थानांतरित हो गए। यहाँ तक पहुँचने के लिए कुछ बाधाओं को पार करना पड़ता है। सर्वप्रथम एक किराये की गाड़ी द्वारा वन के प्रवेश द्वार तक पहुंचना पड़ता है। यहाँ आपके पहचान पत्र की जांच की जाती है। तत्पश्चात आपके पहचान पत्र के साथ आपका छायाचित्र लिया जाता है। इसके पश्चात वन विभाग की गाड़ी आपको विश्रामगृह तक ले जाती है।

होल्लोंग जलदापारा का वन विश्राम गृह
होल्लोंग जलदापारा का वन विश्राम गृह

होलोंग वन विश्राम गृह को देख ऐसा आभास होता है मानो किसी शिकारी के प्राचीन बंगले को परिवर्तित कर इस विश्रामगृह की रचना की गई है। इस विश्रामगृह में गिने-चुने ही कक्ष हैं। उनमें से कक्ष क्रमांक ५ की मांग सर्वाधिक है क्योंकि यहाँ से सीधे वन का दृश्य प्राप्त होता है। यदि आपको इस कक्ष में ठहरने का अवसर प्राप्त हुआ तो आप अपने कक्ष में बैठकर भी वन एवं वहाँ की गतिविधियों को ऐसे देख सकते हैं मानो आप एक वन्यजीव चलचित्र देख रहे हों। अन्य पर्यटकों को भी इसी प्रकार का अनुभव प्राप्त कराने के लिए विश्रामगृह में एक सामूहिक क्षेत्र है जहाँ से आप भी सीधे वन के परिदृश्यों का अवलोकन कर सकते हैं। हमारा भाग्य अच्छा था जो हमें इस कक्ष क्रमांक ५ में ठहरने का अवसर प्राप्त हुआ। इसका कारण यह था कि उस दिन इस विश्रामगृह में पहुँचने वाले प्रथम पर्यटक हम थे। जी हाँ। आपने सही अनुमान लगाया। जो सर्वप्रथम यहाँ पहुँचकर उस कक्ष की मांग करे, उसे ही यह कक्ष दिया जाता है।

होलोंग वन विश्राम गृह भी अन्य वन्यजीव अभयारण्य के भीतर स्थित अतिथिगृहों के समान विशेष है जहाँ सूर्यास्त के पश्चात आपको अतिथिगृह के भीतर ही सुरक्षित कर दिया जाता है। रात्रि के समय गौर तथा गेंडों जैसे जंगली पशु विश्रामगृह के परिसर में स्वच्छंद विचरण करने आ सकते हैं। अतः आपको कड़े निर्देश दिए जाएंगे कि आप सूर्यास्त के पश्चात विश्रामगृह की चारदीवारी के भीतर ही रहें। चिड़ियाघर में तो पशु-पक्षी पिंजड़े में रखे जाते हैं तथा आप उन्हे बाहर से देखते हैं। इसके विपरीत, यहाँ जैसे ही अंधकार छाता है, आप पिंजड़े में बंद तथा जंगली पशु आपको देखने दूर से आते हैं।

होलोंग वन विश्राम गृह में भोजन की अत्यंत मूलभूत सुविधा है तथा भोजन निर्धारित समय पर ही परोसा जाता है।

होलोंग के जलदापारा राष्ट्रीय उद्यान के वन्यजीव

एकल सींग वाला गैंडा - जलदापारा राष्ट्रीय उद्यान
एकल सींग वाला गैंडा

होलोंग वन विश्राम गृह के कर्मचारी अत्यंत जागरूक हैं तथा रात्रि में भी आपको जंगली पशु दिखाने से नहीं चूकते। हम जब रात्रि का भोजन कर रहे थे, हमें सूचना दी गई कि सामने के बगीचे में कई गौर आ गए हैं। हम सब अपना भोजन छोड़कर उन्हे देखने के लिए दौड़ पड़े। विश्रामगृह में इस प्रकार रात्रि में आये जीवों को न्यूनतम प्रकाश में दिखाने की अत्यंत रोचक व्यवस्था है। रात्रि के भोजन के पश्चात निद्रा के अतिरिक्त अधिक कुछ गतिविधि नहीं रहती। जैसे ही हम निद्रामग्न हुए, किसी कर्मचारी ने हमारे द्वार पर आघात कर हमें जगा दिया क्योंकि वह हमें पिछवाड़े बगीचे में आए कुछ गेंडे दिखाना चाहता था। घूमते घूमते गेंडे भोजन कक्ष के समीप तक आ गए थे। १० से १२ फीट की दूरी से, अर्थात् अत्यंत निकट से हमने उन्हे देखा, वह भी बिना किसी भय के क्योंकि हम भीतर थे तथा वे बाहर। हमारी उपस्थिति से उन्हे किसी भी प्रकार की बाधा उत्पन्न होती प्रतीत नहीं हो रही थी। मैंने अनुमान लगाया कि वे अचंभित पर्यटकों  की उपस्थिति से अभ्यस्त होंगे। अततः यह विश्रामगृह सदैव भरा जो रहता है।

हिरण
हिरण

विश्रामगृह के बगीचे एवं वन के मध्य से एक छोटी जलधारा बहती है। जलधारा के उस ओर एक छोटा सा खुला क्षेत्र है। प्रत्येक दिवस प्रातःकाल में विश्रामगृह के कर्मचारी यहाँ नमक के ढेर रखते हैं। पशु एवं पक्षी इस नमक को खाने के लिए आते हैं। मैंने इससे पूर्व अनेक वन्यजीव अभयारण्यों का भ्रमण किया है किन्तु इस प्रकार नमक रखने की प्रथा सर्वप्रथम देख रही थी। सम्पूर्ण दिवस एक-दो गेंडे विश्रामगृह के आसपास विचरण करते रहे। थोड़े अंतराल में हमें गौर तथा जंगली सूअर भी दिख जाते थे। किन्तु हाथी अब भी हमसे दूर ही थे।

होलोंग के वन्यजीवों का विडिओ

होलोंग वन विश्राम गृह में हमें एकल-सींग गेंडे, गौर तथा अनेक प्रकार के पक्षी दृष्टिगोचर हुए जिनका एक छोटा सा विडिओ चलचित्र आपके समक्ष प्रस्तुत कर रही हूँ। मेरा सुझाव है कि उत्तम दर्शन हेतु आप यह विडिओ HD पद्धति में देखें। आप हमारा यात्रा विडिओ इंडिटेल के यूट्यूब चैनल में भी देख सकते हैं।

एकल-सींग गेंडे का विडिओ

इस विडिओ में आप एकल-सींग गेंडों को स्वच्छंद विचरण करते एवं घास खाते देख सकते हैं। जंगली जीव किस प्रकार अपनी सुरक्षा के प्रति सजग रहते हैं, इसका अनुमान आप उनके कानों की हलचल देख कर लगा सकते हैं।

भारतीय गौर का विडिओ

इस विडिओ में देखिए कि किस प्रकार एक जंगली भारतीय गौर लवणों की आपूर्ति हेतु नमक के ढेर की ओर आया, तत्पश्चात नमक खाकर जल पीने के लिए जलधारा की ओर चला गया। अपने मार्ग पर आगे बढ़ने से पूर्व किस प्रकार उसने अपने आसपास की स्थिति का सर्वेक्षण किया, यह भी आपके ध्यान में आएगा।

जलदापारा राष्ट्रीय उद्यान के पक्षी

जलदापारा राष्ट्रीय उद्यान में हमें कुछ पक्षी देखने की आशा अवश्य थी किन्तु जो हमने देखा उसके लिए भी हम कदापि तैयार नहीं थे। हमने हजारों की संख्या में पीले पैरों वाले हरे कबूतर अर्थात् हरियाल पक्षी नाचते व फुदकते देखे। वे नमक के ढेरों पर बैठते थे, तत्पश्चात एक साथ आकाश में उड़ जाते थे जिसके पश्चात फिर से नमक के ढेरों पर आकर किंचित सुस्ताते थे। हरियाल के विशाल झुंड में अनेक प्रकार के जंगली हरियाल पक्षी थे, जैसे सादा हरियाल, मोटी चोंच वाला हरियाल, पीले पाँव वाला हरियाल, नारंगी गले वाला हरियाल इत्यादि।

नमक का आनंद लेते रंग बिरंगे पक्षी
नमक का आनंद लेते रंग बिरंगे पक्षी

तोते भी हरियालों के समान व्यवहार कर रहे थे। तोतों की भी अनेक प्रजातियाँ हमें यहाँ देखने मिली। उनमें ढेलहरा तोते, लाल गले के तोते, टुइयाँ सुग्गा, हीरामन तोते, मदना तोते, लाल चोंच का साधारण तोता, कुसुमशीर्ष सुग्गा इत्यादि सम्मिलित थे।

नदी के आसपास मोर छलांग लगा रहे थे। उन्हे देख अत्यंत आनंद आ रहा था। वे नदी तक चलकर जाते थे, जल के घूंट भरते थे तथा उड़कर नदी के उस पार पहुँच जाते थे। उनकी प्रत्येक क्रिया में उल्हास कूट कूट कर भरा हुआ था। उन्हे देख हमें भी उनके साथ प्रफुल्लित होने की इच्छा होने लगी थी।

होलोंग के पक्षियों का विडिओ

हजारों की संख्या में नमक चुगते अनोखे जंगली पक्षी आहट होते ही उड़ जाते थे तथा सब शांत होते ही उड़कर वापिस आ जाते थे। इन्ही सुंदर क्षणों को इस विडिओ के माध्यम से आपके समक्ष प्रस्तुत कर रही हूँ। मेरा सुझाव है कि उत्तम दर्शन हेतु आप यह विडिओ HD पद्धति में देखें।

एक नीलकंठ पक्षी बड़े ही ठाठ से एक शाखा पर बैठ था। शहरी नीलकंठों के विपरीत उसमें किसी भी प्रकार की आकुलता नहीं थी। वृक्षों के अनावृत शाखाओं पर अनेक रंगबिरंगे पक्षी बैठे थे। उनके एवं हमारे मध्य के अंतराल से अबाधित, हमारा कैमरा प्रफुल्लित होकर उनके छायाचित्र ले रहा था। जंगल के विषय में हमने जो भी पढ़ा था अथवा दूरदर्शन में देखा था वह सब जीवंत होकर हमारे समक्ष उपस्थित हो गया था।

नीलकंठ
नीलकंठ
चील
चील

चूंकि पशु एवं पक्षी अपने स्थानों पर ही क्रीड़ा कर रहे थे, हमें उनके छायाचित्र एवं चलचित्र लेने में कठिनाई नहीं हुई।

हाथी की सफारी

दूसरे दिवस हमने हाथी की प्रातःकालीन सफारी की। हाथी की पीठ पर बैठकर, उस ऊंचाई से हमने एक घंटे में जो जंगल का दृश्य देखा, उससे जंगल का एक भिन्न स्वरूप हमारे समक्ष प्रस्तुत हुआ। उथले जल एवं ऊंचे ऊंचे घास को चीरते हुए हाथी आगे बढ़ रहा था। कई बार हमें वृक्षों की शाखाओं को हाथों से पकड़ कर उनसे स्वयं को बचाना पड़ रहा था। जब हाथी तालाब के उथले जल में चल रहा था तब उसके प्रत्येक पग पर मेरी हृदयगति बढ़ जाती थी। जब वह ऊंची-नीची सतह पर चल रहा था तो प्रत्येक क्षण मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मैं उसकी पीठ पर से नीचे गिर जाऊँगी। महावत मुझे सांत्वना दे रहा था कि हाथी की पीठ पर से साधारणतः कोई नीचे नहीं गिरता है।

हाथी की सवारी
हाथी की सवारी

हाथी की सफारी में हमें केवल पक्षी ही दृष्टिगोचर हुए। स्वाभाविक ही है, हाथी की पीठ पर बैठकर हम वृक्षों की ऊपरी शाखाओं के सम्मुख थे। उस ऊंचाई पर, जंगल के ऊपरी परत का भाग बनकर ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो हम वृक्षों से आमने-सामने चर्चा कर रहे हों।

जलदापारा जंगल से मिलाते रास्ते
जलदापारा जंगल से मिलाते रास्ते

उस समय हम जंगल के जीवन को सर्वाधिक समीप से अनुभव कर रहे थे। जंगल के जीवन से हमारा पूर्ण सामंजस्य स्थापित हो रहा था। वन्यजीवन का यह अप्रतिम अनुभव मेरे मस्तिष्क में सर्वाधिक प्रगाड़ स्मृति के रूप में सदा के लिए अंकित हो गया है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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अचानकमार वन्यजीव अभयारण्य से जुड़े उपाख्यान और मिथक, छत्तीसगढ़  https://inditales.com/hindi/achanakmar-vanya-jeevan-abhyaranya-chhattisagrh/ https://inditales.com/hindi/achanakmar-vanya-jeevan-abhyaranya-chhattisagrh/#respond Wed, 29 Dec 2021 02:30:52 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=833

छत्तीसगढ़ के उत्तरी भाग में बसे इस अचानकमार वन्यजीव अभयारण्य में हम देर रात को पहुंचे। यद्यपि उस अंधेरी रात में हम आस-पास के ऊंचे-ऊंचे पेड़ देख सकते थे, लेकिन इसके अलावा हमे वहाँ पर और कुछ नहीं दिखाई दे रहा था। हम जंगल के विभिन्न भागों के प्रवेश स्थलों पर स्थित नाकों को पार […]

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छत्तीसगढ़ के उत्तरी भाग में बसे इस अचानकमार वन्यजीव अभयारण्य में हम देर रात को पहुंचे। यद्यपि उस अंधेरी रात में हम आस-पास के ऊंचे-ऊंचे पेड़ देख सकते थे, लेकिन इसके अलावा हमे वहाँ पर और कुछ नहीं दिखाई दे रहा था। हम जंगल के विभिन्न भागों के प्रवेश स्थलों पर स्थित नाकों को पार करते हुए आगे बढ़ते गए और अंत में अमाडोब आश्रय घर के पास जाकर रुके, जहाँ पर हम ठहरे हुए थे। वहाँ पहुँचते ही आश्रय घर के कर्मचारियों ने बड़ी ही प्रसन्नता से हमारा स्वागत किया। उसके बाद अपने कमरे की ओर जाने से पहले मैंने आश्रय घर के प्रबंधक के साथ थोड़ी बातचीत की।

अचानकमार वन्य प्राणी अभ्यारण्य छत्तीसगढ़
अचानकमार वन्य प्राणी अभ्यारण्य छत्तीसगढ़

उन्होंने मुझे अचानकमार वन्यजीव अभयारण्य में स्थित तथा उसके आस-पास स्थित कुछ महत्वपूर्ण स्थलों के बारे में बताया। यह अभयारण्य एक टाईगर रिजर्व भी है जो बाघ परियोजना का एक भाग है। इस अभयारण्य से जुड़े एक उपाख्यान के अनुसार कहा जाता है कि बहुत साल पहले यहाँ पर एक बाघ द्वारा हुए अचानक आक्रमण के कारण एक अंग्रेज़ व्यक्ति की मौत हुई थी और इसी वजह से इस अभयारण्य को अचानकमार के नाम से जाना जाने लगा।

अचानकमार वन्यजीव अभयारण्य – उपाख्यान और कथाएं

दूसरे दिन सुबह जल्दी उठकर जब मैं बाहर टहलने गयी तो वहाँ का नज़ारा देखकर मुझे एक गहन शांति का आभास हुआ। इस आश्रय घर का पूरा आँगन सागौन, साल और महुए के पेड़ों से गिरे सूखे पत्तों से भरा पड़ा था, जैसे कि अभी-अभी पतझड़ गुजरा हो। वहाँ पर सब कुछ इतना शांत था कि पवन के मंद-मंद झोकों की वह मधुर धुन स्पष्ट सुनाई दे रही थी। इन सूखे पत्तों पर चलते हुए मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे पैरों तले बीता हुआ कल बिछा हुआ है और ऊपर पेड़ों की शाखों पर अंकुरित होते नए पत्ते जैसे आने वाले भविष्य की ओर संकेत कर रहें हो।

विश्राम गृह
विश्राम गृह

इन सूखे पत्तों के बीच महुआ के छोटे-छोटे पीले फूल भी गिरे हुए थे। हमे बताया गया कि यह महुआ का पुष्पणकाल है और इस दौरान यहाँ के सभी स्थानीय लोग पूरे दिन इन फूलों को एकत्रित करने में जुटे हुए दिखाई देते हैं। साल वृक्ष पर भी उज्ज्वलित हरे रंगे के पत्ते अंकुरित हो रहे थे। इनका यह उज्ज्वलित हरा रंग आस-पास खड़े पलाश के पेड़ों के उज्ज्वलित केसरी रंग तथा अन्य पेड़ों के लाल, गुलाबी और पीले रंगों से बहुत विषम सा लग रहा था। कुछ साल के वृक्षों पर तो सफ़ेद फूल भी खिल आए थे। पूरे अभयारण्य में फैले इन ऊंचे-ऊंचे सुंदर से पेड़ों का वह नज़ारा सच में बहुत ही सुखदायक अनुभव था। इनकी छाव में सूर्य की तपती हुई धूप भी जैसे बहुत ही नरम महसूस हो रही थी।

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वन्यजीव अभयारण्य

अचानकमार के घने जंगले
अचानकमार के घने जंगले

अचानकमार वन्यजीव अभयारण्य छत्तीसगढ़ में स्थित 11 वन्यजीव अभयारण्यों में से एक है। 555 वर्ग कि.मी. की जमीन पर फैला हुआ यह वन एक पहाड़ी क्षेत्र है जो सतपुड़ा पर्वतश्रेणी की मैकल पर्वतमाला से घिरा हुआ है। इसे उत्तरीय उष्णकटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वन के रूप में वर्गीकृत किया जाता है यह पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश में स्थित कान्हा राष्ट्रीय उद्यान से जुड़ा हुआ है। कहते हैं कि यहाँ पर बाघ, तेंदुआ, लकड़बग्धा, सियार, सांभर, नीलगाय, गौर और जंगली सांड जैसे अनेक पशु हैं, लेकिन जब हम वहाँ पर गए थे तो हमे वहाँ पर इनमें से एक भी जानवर नहीं दिखा। पर हमे वहाँ बहुत सारे लंगूर और बंदर जरूर दिखे जो एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर छलांग मरते हुए यहाँ-वहाँ खेल रहे थे। वहाँ पर पशुओं के बहुत से झुंड थे जो जंगल में यहाँ-वहाँ चर रहे थे।

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अगर वृक्षों की बात करें तो इस अभयारण्य में आप साल, साजा, तेंदू, बांस, धावड़ा, हल्दू, करौंदा, जामुन, बेल और कतीरा जैसे अनेक पेड़ देख सकते हैं। जिन में साल वृक्षों की संख्या सबसे अधिक है, तो करौंदे के पेड़ों की तरह बांस भी कहीं-कहीं नज़र आ रहे थे। इस जंगल के आंतरिक क्षेत्रों में बसे बहुत से गांवों को जंगल के बाह्यांचल में स्थानांतरित किया जा रहा था। इन गांव वालों द्वारा पीछे छोड़े हुए उनके जीवन की कुछ झलकियाँ अभी भी वहाँ पर थीं, जैसे कि उनके मिट्टी के घर और छोटे-छोटे तालाब।

श्रद्धेय साल वृक्ष

अचानकमार जंगल की सफारी के दौरान हमे उससे जुड़े एक और उपाख्यान के बारे में जानने का मौका मिला। वहाँ पर एक बहुत ही पुराना साल का वृक्ष है, जिस पर साल 1955 और 1990 में बिजली गिरी थी। कहा जाता है कि पहले उसकी ऊंचाई लगभग 155 फीट की थी और चौढ़ाइ 6 फीट की। लेकिन उस दुर्घटना के बाद अब उसकी ऊंचाई सिर्फ 25-30 फीट ही रह गयी है और उसका तना भीतर से बिलकुल खोखला हो गया है। यहाँ के स्थानीय लोग आज भी इस पेड़ की पूजा करते हैं। इस पेड़ के नजदीक जाते समय आपको अपने जूते उतारकर जाना पड़ता है। जो भी स्थानीय व्यक्ति यहाँ से गुजरता है वह इस पेड़ को अपना प्रणाम अवश्य अर्पित करता है। यहाँ तक कि यात्रियों या आगंतुकों को उसका परिचय देने से पहले भी ये लोग इस पेड़ को प्रणाम करते हैं। इन लोगों का मानना है कि उनके आराध्य भगवान बुद्ध देव इसी पेड़ में बसते हैं। उनकी इसी आस्था ने इस पेड़ को एक जीता जागता मंदिर बना दिया है।

साल का विशाल, प्राचीन एवं वन्दनीय वृक्ष
साल का विशाल, प्राचीन एवं वन्दनीय वृक्ष

जैसे कि अधिकतर आदिवासी इलाकों में होता है, यहाँ पर भी आदिवासी लोग इस जंगल के संरक्षक के रूप में यहाँ निवास करते हैं। वे यहाँ पर स्थानांतरणीय खेती भी करते हैं, जिसमें एक सीमित अवधि के लिए वे जमीन के छोटे से टुकड़े पर अपनी खेती करते हैं। और फिर खेती का काम पूर्ण होने के पश्चात उस जमीन को फिर से उपजाऊ बनने के लिए वैसी ही छोड़कर दूसरे स्थान पर चले जाते हैं। कुछ आदिवासी जातियाँ तो खेती करते समय हल का भी उपयोग नहीं करते क्योंकि वे धरती को अपनी माँ के समान मानते हैं।

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इस अभयारण्य की सफारी करने का सबसे अच्छा तरीका है, कि आप बिलासपुर में ठहरे और फिर इस वन के दर्शन करने जाइए। यहाँ की अन्य सुविधाओं की तरह इस अभयारण्य में निवास की योजना भी बहुत सीमित है।

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भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान – खारे जल के मगरमच्छों व रामचिरैयों का बसेरा https://inditales.com/hindi/bhitarkanika-rashtriya-udyaan-odisha/ https://inditales.com/hindi/bhitarkanika-rashtriya-udyaan-odisha/#comments Wed, 21 Oct 2020 02:30:37 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2032

खारे जल के मगरमच्छों एवं रामचिरैयों की दुर्लभ प्रजातियां! मिलना चाहते हैं इनसे? तो आईए चलें ओडिशा के भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान में! गूगल नक्शे में भितरकनिका ढूंढ कर उसे पास से देखें तो ओडिशा के उत्तर-पूर्वी तट पर हरियाली भरा राष्ट्रीय उद्यान/ वन्यजीवन अभयारण्य क्षेत्र देख आपका हृदय भी बागबाग हो जाएगा। पूर्व की ओर […]

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खारे जल के मगरमच्छों एवं रामचिरैयों की दुर्लभ प्रजातियां! मिलना चाहते हैं इनसे? तो आईए चलें ओडिशा के भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान में! गूगल नक्शे में भितरकनिका ढूंढ कर उसे पास से देखें तो ओडिशा के उत्तर-पूर्वी तट पर हरियाली भरा राष्ट्रीय उद्यान/ वन्यजीवन अभयारण्य क्षेत्र देख आपका हृदय भी बागबाग हो जाएगा।

अप्रवाही जल पर नौका विहार - भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान
अप्रवाही जल पर नौका विहार – भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान

पूर्व की ओर बहती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती ब्राह्मणी, वैतरणी, धामरा तथा पथसल नदियां वैश्विक रूप से महत्वपूर्ण इस आर्द्रभूमि का सृजन करती हैं तथा इसे पोसती हैं। ओडिशा के केंद्रपाड़ा जिले में स्थित भारत का दूसरा विशालतम मैंग्रोव पारितंत्र इसी आर्द्रभूमि के क्षेत्र में पोषित होता है। १४५ वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में पसरे इस राष्ट्रीय उद्यान को घेरता हुआ ६७० वर्ग किलोमीटर के वन्यजीवन अभयारण्य का अतिरिक्त क्षेत्र है।

भुवनेश्वर से सड़क-यात्रा द्वारा उदयगिरी, रत्नागिरी तथा ललितगिरी गुफाओं में स्थित बौद्ध धरोहरों के दर्शन करते समय हम एक संध्या ‘सैंड पेबल्स भितरकनिका जंगल रिज़ॉर्ट टेंट हाउस’ परिसर में पहुंचे।

भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान में नौका विहार

दूसरे दिवस प्रातः हम मुंह-अंधेरे ही उठ गए। खारे जल के मगरमच्छों से मिलने का उतावलापन जो हिलोरे मार रहा था। किन्तु वातावरण हमारा साथ निभाने हेतु तत्पर नहीं हुआ। चारों ओर गहन कोहरा छाया हुआ था। धुंध छँटने के लिए हमें दीर्घ काल तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। गाँव की पगडंडियों में पदयात्रा करते समय कुछ मीटर के परे हमें कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा था। हमें पूर्ण कल्पना थी कि खाड़ी के समीप धुंध इससे भी अत्यधिक गहन होगी। लगभग एक घंटे से भी अधिक समय प्रतीक्षा करने के पश्चात हमें वन विभाग के अधिकारियों ने हरी झंडी दिखायी।

भितरकनिका के परिदृश्य
भितरकनिका के परिदृश्य

तब आरंभ हुआ खाड़ियों एवं अप्रवाही जल-धाराओं के जाल में हमारा नौका विहार! हमारी नौका इंजन संचालित नौका थी। इस प्रकार की नौकाओं को इस राष्ट्रीय उद्यान में सवारी करने हेतु अनुमति प्राप्त है। प्रत्येक नौका में लगभग १२ से २० व्यक्ति बैठ सकते हैं। यह जल सतह पर धीमी गति से तैरते हैं ताकि हम आसपास का परिदृश्य देख सकें। इन नौकाओं में शौचालय भी हैं जो एक अत्यंत महत्वपूर्ण सुविधा है।

भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान की खाड़ियों का शांत जल वास्तव में लगभग २० से ३० फीट गहरा है। मानसून एवं ज्वार के समय इसकी गहराई में परिवर्तन हो सकता है। प्रमुख खाड़ी लगभग १०० मीटर चौड़ी हैं। खाड़ी के इस जाल के कुछ भाग सँकरे एवं अत्यंत उथले भी हैं।

भारत के अधिकतर राष्ट्रीय उद्यानों में सिंह, बाघ, जंगली हाथी, गेण्डे, हिरण इत्यादि अत्यंत लोकप्रिय हैं। इसके विपरीत भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान का प्रमुख आकर्षण है खारे जल के शक्तिशाली मगरमच्छ। प्रत्येक कुछ मीटर की दूरी पर आपको छोटे-बड़े मगरमच्छों के झुंड सूर्य स्नान करते दृष्टिगोचर होंगे। यही नहीं, खाड़ी, द्वीप, हरे-भरे अप्रवाही जलक्षेत्र, नभचर तथा घने जंगल, जिनके भीतर आप पदयात्रा कर सकते हैं, सभी आपका मन मोह लेने के लिए आतुर व तत्पर प्रतीत होते हैं।

खारे जल के मगरमच्छ

भारत के खारे जल के मगरमच्छों के लिए सर्वोत्तम प्राकृतिक वास की चर्चा की जाए तो कदाचित भितरकनिका से उपयुक्त स्थल नहीं हो सकता। पोषक अप्रवाही जलक्षेत्र, खाड़ी के जल मार्गों का पर्याप्त जाल, नदियां, बंगाल की खाड़ी, यह सभी उनके लिए प्रचुर संसाधन उपलब्ध कराते हैं। भितरकनिका का यदि कोई निकटतम प्रतियोगी है तो वह है सुंदरबन।

कालिया - खारे जल के मगरमच्छों का एक वयोवृद्ध
कालिया – खारे जल के मगरमच्छों का एक वयोवृद्ध

सन् १९७० तक ओडिशा की नदी प्रणाली में घड़ियाल, मगर एवं खारे पानी के मगरमच्छ, यह तीनों प्रजातियाँ लगभग विलुप्ति की कगार पर आ गए थे। खारे पानी के १०० से भी कम मगरमच्छों से आज १७०० से भी अधिक मगरमच्छों तक की लंबी यात्रा में डाँगमाल की नदी प्रणाली को चार दशकों का समय लग गया। इनमें से अधिकतर मगरमच्छ खोल-ब्राह्मणी नदी संगम से लेकर भितरकनिका-पथसल नदी संगम तक के क्षेत्र में पाए जाते हैं।

सूर्य स्नान करते मगर
सूर्य स्नान करते मगर

खारे पानी के इन विशाल मगरमच्छों के विषय में कुछ रोचक जानकारी:

  • जन्म के समय उनका वजन १०० ग्राम से भी कम होता है। युवावस्था तक पहुंचते पहुंचते उनका वजन लगभग १००० किलोग्राम तक हो जाता है।
  • जन्म से समय एक फुट से भी कम लंबे ये मगरमच्छ २० फीट से भी अधिक लंबे हो जाते हैं।
  • प्रकृति में उनके प्रथम १० वर्ष उनके लिए कदाचित सर्वाधिक दुष्कर समयावधि होती है क्योंकि नवजात शिशुओं में से केवल १% ही परभक्षियों तथा प्राकृतिक आपदाओं से बचकर जीवित रह पाते हैं।
  • वर्षा ऋतु के समय नर एवं मादा मगरमच्छ सहवास करते हैं। अतः यह राष्ट्रीय उद्यान प्रत्येक वर्ष १ मई से ३१ जुलाई तक पर्यटकों के लिए बंद रहता है।
  • यद्यपि सम्पूर्ण वर्ष वयस्क मगरमच्छ अपने क्षेत्र हेतु अत्यंत संवेदनशील रहते हैं तथा मृत्युपर्यंत अपने क्षेत्र हेतु लड़ने के लिए तत्पर रहते हैं, तथापि वही मगरमच्छ वर्षा ऋतु में अत्यंत मिलनसार बन जाते हैं।
  • किसी भी प्रकार का मांस उनका भोजन है तथा विशाल वयस्क मगरमच्छों की भूख केवल बड़े शिकार द्वारा ही शांत होती है।
  • विशाल वयस्क मगरमच्छों के लिए मनुष्य भी उत्तम शिकार है।
  • अत्यंत वेग एवं चपलता से खिसकते हुए वे जल एवं तट पर उपस्थित शिकार को तुरंत अपने जबड़े में पकड़ लेते हैं।
  • उनके जबड़ों की पकड़-शक्ति अन्य स्तनपायियों से अपेक्षाकृत सर्वाधिक शक्तिशाली मानी जाती है। एक बार अपने जबड़े में उसने किसी शिकार को जकड़ लिया तो या तो शिकार को जीवन से हाथ धोना पड़ता है अथवा कम से कम वह भाग खोना पड़ता है जो जबड़े में फंसा है।
  • वे ४ से ५ दर्जन अंडे देते हैं। अंडे देने के लिए वे बहुधा ज्वार के जल सतह से भी ऊपर तक जाते हैं ताकि उनके अंडे सुरक्षित रहें। नर तथा मादा, दोनों मगरमच्छ अंडों से नवजातों के बाहर निकालने तक उनकी सुरक्षा करते हैं। उनके अंडे गोह सरीसृपों का प्रिय भोजन है जो थल पर मगरमच्छों से अधिक चपल होते हैं।
  • मगरमच्छ मछली, केकड़े, पक्षी से लेकर जंगली सूअर, हिरण जैसे स्तनपायियों का शिकार करते हैं।
  • वहीं चील, बाज तथा कनकैयों जैसे गिद्ध मगरमच्छों के नवजात शिशुओं का शिकार करते हैं।

आलसी

सामान्यतः मगरमच्छ इस क्षेत्र के अन्य वन्य जीवों से अपेक्षाकृत सर्वाधिक आलसी प्राणी हैं। भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान में ५ घंटे की सैर में हमने अनेक मगरमच्छों को तट पर आलसियों के समान अनवरत पड़े हुए सूर्य की ऊष्मा का आनंद उठाते देखा। उन्हे देख ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वे हर प्रकार की चिंता से मुक्त हैं। केवल कुछ गिने-चुने मगरमच्छ जल में तैर रहे थे। कदाचित वे भूखे होंगे। इन मगरमच्छों में दो विशालतम नर मगरमच्छ ऐसे हैं जो इस क्षेत्र के प्रत्येक नौका सैर में दृष्टिगोचर होते हैं। स्थानीय गाइड इन्हे कालिया तथा बालिया के नाम से पुकारते हैं।

खारे जल के मगरमच्छों का प्रजनन केंद्र

मगर प्रजनन केंद्र में बढ़ते मगरमच्छ
मगर प्रजनन केंद्र में बढ़ते मगरमच्छ

हमारे द्वारा अभ्यागमन किए गए द्वीपों में से एक द्वीप पर मगरमच्छ प्रजनन केंद्र है। यहाँ मगरमच्छ के नवजात शिशुओं की देखरेख की जाती है। प्रत्येक वर्ष वय के अनुसार उन्हे पृथक कर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है। उनके जीवन के प्रथम १० वर्ष यहाँ उनकी प्रत्येक आवश्यकता का ध्यान रखा जाता है, जैसे उनकी सुरक्षा, भोजन, चिकित्सकीय ध्यान, वन्य क्षेत्र के अन्य प्राकृतिक आपदाएं इत्यादि। यह क्षेत्र पशु चिकित्सकों के लिए एक अध्ययन केंद्र भी है। १० वर्ष की आयु के पश्चात मगरमच्छों को सावधानी से वन्य क्षेत्र में छोड़ा जाता है। उस समय इस तथ्य का ध्यान रखा जाता है कि किसी आक्रामक वयस्क मगरमच्छ के अधिकृत क्षेत्र का उल्लंघन ना हो।

प्रजनन केंद्र के दर्शन के लिए १० से १५ मिनटों का अतिरिक्त समय लगता है। आप यहाँ विभिन्न वय समूहों के शिशुओं का विकास देख सकते हैं।

गौरवर्ण गोरी मगरमच्छ
गौरवर्ण गोरी मगरमच्छ

समीप ही एक जल कुंड में हमें एक वर्णहीन मगरमच्छ दिखाई दिया जिसे गोरी कहा जाता है। उसकी त्वचा का रंग अत्यंत हल्का, किंचित पीले रंग की आभा लिए हुए था। इसी रंग के कुछ शावक हमें वन्य क्षेत्र में भी दृष्टिगोचर हुए थे।

संग्रहालय

इस द्वीप पर एक छोटा शिक्षाप्रद संग्रहालय है जहां १९.८ फीट का कंकाल रखा है। यह इस राष्ट्रीय उद्यान में प्राकृतिक मृत्यु प्राप्त खारे जल के एक मगरमच्छ का कंकाल है। इसके समीप खड़े होने पर इसके विशाल आकार का आभास होता है। आप इसकी शरीर रचना समीप से जांच सकते हैं। प्रथम दृष्टि में यह एक सटीक यांत्रिक नमूना प्रतीत होता है। सूक्ष्मता से जाँचने पर आप प्रकृति की इस उत्तम रचना की प्रशंसा किए बिना नहीं रहेंगे।

मृत मगरमच्छों के कंकाल
मृत मगरमच्छों के कंकाल

किसी जीवित मगरमच्छ के समीप खड़े होने का साहस तो हममें से किसी में भी नहीं है। वैसे भी, ऐसा साहस करना साक्षात मृत्यु को आमंत्रित करने के समान है। अतः ऐसा करने का विचार भी मस्तिष्क में ना लाएं। अन्यथा कुछ क्षणों का रोमांच जीवन को मृत्यु में परिवर्तित कर सकता है। इस राष्ट्रीय उद्यान के अवलोकन के समय उद्यान अधिकारी इस विषय पर अत्यंत भार देते हैं तथा नौका से उतर कर जल के अत्यंत समीप जाने की अनुमति कदापि नहीं देते। किन्तु किसी मगरमच्छ के समीप खड़े होने की अभिलाषा आप संग्रहालय के इस कंकाल के समीप खड़े होकर अवश्य पूर्ण कर सकते हैं।

मगरमच्छ का खुला मुख
मगरमच्छ का खुला मुख

इस संग्रहालय में मगर, हिरण, डॉल्फिन इत्यादि के कंकालों के कपाल भी रखे हैं। इनके आकारों की विशालता की उपेक्षा करना संभव नहीं। इसने अतिरिक्त भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान में पाए जाने वाले जीव-जन्तु, पक्षी तथा वनस्पतियों के भी चित्र यहाँ आप देख सकते हैं। संग्रहालय के अवलोकन हेतु औसतन १० से २० मिनटों का समय पर्याप्त है। केवल एक वस्तु की कमतरता का आभास हुआ। उद्यान की सर्व जानकारी प्रदान करते किसी विवरणिका की जिसे पर्यटक अपने साथ ले जा सकें।

जलपान

उद्यान में नौका विहार करते हुए हम जिस समय इस द्वीप पर पहुंचे, हम बहुत थक गए थे। द्वीप पर उपलब्ध पेयजल, शौचालय तथा बैटरी-चालित रिक्शा की सुविधाएं देख मन प्रसन्न हो गया। इनसे भी अधिक मन प्रफुल्लित हुआ ताजे कोमल नारियलों की बिक्री करते ठेलों को देख कर। हमने ताजे नारियल का जल पीकर अपनी क्षुधा शांत की। देह में एक बार फिर स्फूर्ति आ गई। वैसे भी हमारे दोपहर के भोजन को अब भी एक घंटा शेष था।

अवश्य पढ़ें: भारत में जंगल सफारी – कब, कहाँ, क्या और कैसे देखें?

जंगल में पदयात्रा

हम द्वीप के जंगल में स्थित घने मैन्ग्रोव में ३ से ४ किलोमीटर तक पैदल चले। हमारी सुविधा के लिए  वन विभाग ने स्पष्ट पद-मार्ग निश्चित किए हैं। साथ ही वन विभाग ने गाइड अथवा पथ-प्रदर्शक भी नियुक्त किए हैं जिनके बिना इस जंगल में पद-यात्रा करना लगभग असंभव है। मेरा सुझाव है कि आप इन पगडंडियों में बिना गाइड के जाने की चेष्टा भी ना करें। ये पगडंडियाँ पर्यटकों के लिए अत्यंत भ्रामक सिद्ध हो सकते हैं तथा वे सहज ही उनमें खो सकते हैं।

भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान के जंगल
भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान के जंगल

इन जंगलों में नाग, अजगर, जंगली सूअर, गोह, चितकबरे हिरण तथा कई अन्य जंगली पशुपक्षी हैं। अतः सावधानी बरतें तथा निर्धारित पद-मार्गों पर ही चलें। सर्पों के लिए आँखें खुली रखें। हमें यात्रा के समय सर्प नहीं दिखे, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि आप उनकी उपेक्षा करें।

जंगल में विचरण करते हिरण
जंगल में विचरण करते हिरण

घने वृक्षों के हरे-भरे छत्र के बीच से छन छन कर आती सूर्य की किरणें, वृक्षों के तनों पर लिपटी लताएं, मार्ग में अनेक छोटे छोटे तालाब तथा तालाब के जल पर थिरकती वृक्षों की परछाई, यह सब अत्यंत स्वप्निल था। इन्हे निहारना स्वयं में एक भावविभोर करने देने वाला अनुभव था। हरे-भरे जंगलों से घिरे तालाब अत्यंत ही अद्भुत दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे। हमने इनमें से अधिकतर तालाबों के समीप रुककर प्रकृति के प्रत्येक तत्व को शांति से आत्मसात किया। प्रकृति के इन अप्रतिम तत्वों के उत्तम सामंजस्य एवं उनके द्वारा बिखेरी माया ने हमारे मन-मस्तिष्क में अमिट छाप छोड़ दी थी। तालाब के जल में अनेक जल-पक्षी थे। उनके अत्यंत समीप पहुंचना संभव नहीं था तथा सूर्य प्रकाश भी पर्याप्त नहीं था। अतः हम उन पक्षियों के छायाचित्र नहीं ले पाए।

गोह

जंगल में सैर करते समय हमें एक गोह अवश्य दिखाई दी थी। मार्ग के किनारे, आलस्य में अविचल पड़ी थी। हमने जैसे ही छायाचित्र लेने की चेष्टा की, वह वहाँ से सरपट भागते हुए घनी झाड़ियों में कहीं लुप्त हो गई।

भितरकनिका के जंगल में गोह
भितरकनिका के जंगल में गोह

वर्षा ऋतु में इस मैंग्रोव जंगल के वृक्षों के शीर्ष पर अनेक पक्षी सैकड़ों घोंसले बना देते हैं। किन्तु तब यहाँ पर्यटकों के आने पर मनाही होती है। यही समय है जब इन पक्षियों के विषय में शोध किया जा सकता है तथा उनके अच्छे छायाचित्र लिए जा सकते हैं। इस तथ्य से अनुमान लगाया जा सकता है कि यह उद्यान प्रवासी पक्षियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

शिव मंदिर

जंगल के भीतर विचरण करते हुए, एक नौका घाट से दूसरे घाट पर जाते समय हमें ऊंचे मचान दिखे जिसके ऊपर से जंगल का निरीक्षण किया जाता है। यहाँ से प्रवासी पक्षियों पर भी दृष्टि रखी जाती है।

हमें कान्क्रीट में निर्मित दो तलों की एक विचित्र सी संरचना दृष्टिगोचर हुई जिसमें अनेक चौकोर छिद्र थे। पूछने पर हमारे गाइड ने मुसकुराते हुए उत्तर दिया कि यह प्राचीन काल के राजाओं का शिकार स्थल था। संरचना के भीतर खड़े होकर तथा इन छिद्रों में बंदूक रखकर जानवरों का शिकार किया जाता था। यह संरचना मुझे एक छिद्रयुक्त ठोस पिंजरे के समान प्रतीत हुई। इसी संरचना के पीछे छुपकर राजाओं ने वापिस लौटते अनेक प्रवासी पक्षियों का शिकार किया होगा।

प्राचीन शिव एवं वन दुर्गा मंदिर - भितरकनिका
प्राचीन शिव एवं वन दुर्गा मंदिर – भितरकनिका

एक उजला चटक हरे रंग का शिव मंदिर अपने रंग के कारण पृथक दृष्टिगोचर हो रहा था। यह एक छोटा मंदिर है तथा इसकी शैली विशाल अमलका लिए अन्य ओडिशा मंदिरों के समान है। उस समय मंदिर बंद था। एक छोटा नंदी बाहर बैठा मानो मंदिर की रखवाली कर रहा था। पिरामिड के आकार के एक गमले में तुलसी का पौधा था।

समीप ही पत्थर का एक और छोटा मंदिर था जो वन दुर्गा को समर्पित था। इस छोटे एवं जीर्ण मंदिर के भीतर अनेक मूर्तियाँ थीं तथा कुछ मूर्तियाँ बाहर भी थीं। यहाँ नियमित पूजा अर्चना के चिन्ह दिखाई पड़ रहे थे। किन्तु दोपहर होने के कारण उस समय वहाँ कोई भी उपस्थित नहीं था।

दुर्लभ रामचिरैया पक्षी

रामचिरैया भारत में सामान्यतः पाए जाने वाले पक्षियों में से एक है। हमने इन्हे सभी स्थानों में देखा है। भितरकनिका के इस घने मैंग्रोव में रामचिरैया की ६ भिन्न प्रजातियाँ  पायी जाती हैं। उनमें से ३ प्रजातियों को देखने का हमारा यह प्रथम अवसर था। इस राष्ट्रीय उद्यान के दर्शन का उद्देश्य भी तो यही था। हमें ज्ञात था कि इस उद्यान में इन प्रजातियों के दर्शन हो ही जाते हैं। जब हम हमारी नौका के आरंभ होने की प्रतीक्षा कर रहे थे, तब हमारे गाइड ने हमें इन पक्षियों के कुछ छायाचित्र दिखाए थे जिन्हे उसने अपने मोबाईल द्वारा खींचे थे। उसने हमारी उत्सुकता और भी बढ़ा दी थी।

भूरे पंख वाली रामचिरैय्या
दुर्लभ भूरे पंख वाली रामचिरैय्या

भूरे पंखों वाली रामचिरैया, काले टोपी वाली रामचिरैया तथा गले की पट्टी वाली रामचिरैया, इन सब के दर्शन कर पाना हमारे लिए सोने पर सुहागा जैसा था। हमने सुना था कि गोवा में जुआरी नदी के मुहाने पर भी इन पक्षियों के दर्शन होते हैं। किन्तु वहाँ किसी संयोजित नियमित नौका सेवा एवं गाइड की आवश्यकता है।

काली टोपी वाली राम चिरैय्या
काली टोपी वाली राम चिरैय्या

हमारे गाइड की अनुभवी आँखें पक्षियों को दूर से ही ढूंढने में सफल हो रही थीं। जैसे ही हमारे नौकाचालक को वन्य प्राणियों में हमारी रुचि का आभास हुआ, उसने प्रसन्नतापूर्वक नौका को घुमा ली तथा हमें ऐसे स्थान पर ले गया जहां से हमें बेहतर दृश्य प्राप्त हुआ। हमें पक्षियों के उत्तम छायाचित्र लेने में भी सहायता मिली। नौका मोटर-यंत्र चालित होने के कारण कभी भी पूर्णतः शांत नहीं होती। अतः पक्षियों के छायाचित्र लेने के लिए शक्तिशाली लेंस तथा अत्यंत गतिमान कैमरे की आवश्यकता होती है।

पक्षियों के दर्शन का सर्वोत्तम स्थल है खाड़ी के समीप उगे मैंग्रोव की निचली शाखाएं। प्रार्थना करते रहिए कि ये पक्षी पत्तियों के पीछे ना छुप जाएँ अथवा उड़कर कहीं और ना चले जाएँ।

रामचिरैया की अन्य ३ प्रजातियाँ वे थीं जिन्हे हम देश भर में किसी भी जल स्त्रोत के समीप देख सकते हैं, जैसे सामान्य रामचिरैया, श्वेतकंठी रामचिरैया तथा चितकबरी रामचिरैया।

अन्य पक्षी

खाड़ी के साथ साथ नौका विहार करते समय तथा जंगल में पद-यात्रा के समय आप हेरोन व इग्रेट जैसे बगुले, गिद्ध, कनकैया, बाज इत्यादि अनेक पक्षी देख सकते हैं। मैंग्रोव के घने जंगल में सैर करते समय हमें कुछ कठफोड़वों की कूजिका सुनाई दी। वे बौने कठफोड़वे थे। मैंग्रोव वृक्षों के आच्छादन से उत्पन्न छाँव के कारण हम उनके स्वच्छ छायाचित्र नहीं ले पाए।

भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान में सैर का एक विडिओ

आईए आपको हमारे भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान में भ्रमण का एक छोटा सा विडिओ दिखाती हूँ जिसे मैंने मेरे यूट्यूब चैनल में रोपित किया है। यदि आप इस उद्यान का भ्रमण करना चाहते हैं तो वहाँ क्या एवं कैसे देखना है, आप इस विडिओ से जान पाएंगे।

नौका विहार

यहाँ नौका सवारी सुविधाएं उपलब्ध हैं जिसके द्वारा आप बंगाल की खाड़ी से लगे तटों पर पहुँच सकते हैं, बड़े द्वीपों पर जा सकते हैं, यहाँ तक कि उस पार स्थित गांवों तक भी पहुँच सकते हैं। आप की रुचि के अनुसार आप नौका निश्चित कर मन पसंद स्थल के दर्शन कर सकते हैं। समुद्र तथा अप्रतिम समुद्र तटों से भरे गोवा की निवासी होने के कारण हमें तट दर्शन में कदापि रुचि नहीं थी।

इस राष्ट्रीय उद्यान के दर्शन तथा नौका की सवारी करने से पूर्व आपको इन तथ्यों की पूर्व जानकारी होना आवश्यक है:

  • नौका पर चढ़ने से पूर्व पंजीकरण करने के लिए प्रत्येक पर्यटक के पास छायाचित्र सहित पहचान पत्र होना आवश्यक है।
  • राष्ट्रीय उद्यान में भ्रमण करने के लिए वन विभाग को नाममात्र का शुल्क देना पड़ता है।
  • नौका में भ्रमण करने के लिए भिन्न भिन्न शुल्क हैं जो आपके सुनिश्चित स्थल तथा वहाँ तक पहुँचने के लिए लगने वाले समय पर निर्भर है।
  • नौकाओं पर शौचालय की अत्यंत मौलिक सुविधाएं उपलब्ध हैं।
  • आप नौका पर खाद्य सामग्री ले जा सकते हैं किन्तु प्लास्टिक थैली/बोतल जैसा किसी भी प्रकार का गैर-जैविक कचरा जल में अथवा वन में ना डालें।
  • वनीय पशु-पक्षियों को किसी भी प्रकार की खाद्य सामग्री ना दें।
  • यदि आपकी नौका सवारी लंबी है तो अपने साथ पर्याप्त पेयजल तथा सिर पर टोपी अवश्य ले लें।
  • वनीय पशु-पक्षियों के अवलोकन के लिए दूरबीन सहायक होते हैं।
  • नवीनतम शुल्क की जानकारी के लिए यह वेबस्थल देखें।

भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान में कहाँ ठहरें?

हम ‘सैंड एण्ड पेबल्स भितरकनिका जंगल रेसॉर्टस’ में ठहरे थे। राष्ट्रीय उद्यान में भ्रमण करने के लिए यह हमें सर्वोत्तम प्रतीत हुआ। अतः मैं आपको भी इसे ही चुनने की सलाह दूँगी।

ताल किनारे तम्बू में रहना का आनंद
ताल किनारे तम्बू में रहना का आनंद

यहाँ नौका अवतरण तट के अत्यंत समीप तंबू सदृश आवास सुविधाएं हैं। यहाँ रहते हुए इस वनीय क्षेत्र का भ्रमण अत्यंत आसान हो जाता है। यह एक ग्रामीण क्षेत्र के अंतर्गत आता है जिसके कारण आपको ओडिशा के ग्रामीण जीवन को जानने के लिए गाँव के भीतर भ्रमण का भी अत्यंत ही उत्तम अवसर प्राप्त हो जाता है। हम ने रिज़ॉर्ट के समीप स्थित गाँव के भीतर भ्रमण कर यहाँ के मिट्टी के घरों की भित्तियों पर किये अप्रतिम भित्तिचित्रों को देखा। पशु तथा मानव किस प्रकार एक दूसरे साथ शांतिपूर्वक सहवास करते हैं इसका जीवंत उदाहरण आप यहाँ देख सकते हैं।

पास ही बहती नदी पर बना सेतु प्रातःकाल व संध्याकाल पक्षियों को देखने का सर्वोत्तम स्थल है। हमारे तंबू के समक्ष, अत्यंत समीप एक छोटा सा तालाब था। हमें ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो हम तालाब के किनारे की रह रहे हैं।

प्रत्येक तंबू अत्यंत सुविधाजनक है जिसके भीतर ही शौचालय सुविधा उपलब्ध है। यहाँ के कर्मचारी अत्यंत नम्र तथा पेशा-अनुरूप अनुभवी हैं। स्थानीय होने के कारण अधिकतर कर्मचारी जंगल के भीतर-बाहर से पूर्ण रूप से अवगत हैं। रिज़ॉर्ट के भीतर ही उन्होंने हमें अनेक पक्षी दिखा दिए। भोजन रिज़ॉर्ट में ही पकाया जाता है, वह भी अधिकतर स्थानीय सामग्रियों का प्रयोग कर। प्रकृति के सानिध्य में बैठकर भोजन करना स्वयं में एक आनंदपूर्ण अनुभव है। हमने ‘सैंड एण्ड पेबल्स भितरकनिका जंगल रेसॉर्टस’ में रहते समय पक्षियों की चचहाहट के बीच ताजे भोजन का भरपूर आस्वाद लिया।

हमें बताया गया कि झींगे एवं केकड़े यहाँ के लोकप्रिय स्थानीय व्यंजन हैं। यदि आप मांसाहारी हैं तो इस पर विचार कर सकते हैं।

गाँव में भ्रमण करने के लिए तथा समीप स्थित जगन्नाथ मंदिर के दर्शन करने के लिए आप रिज़ॉर्ट के कर्मचारियों की सहायता ले सकते हैं। मंदिर में आप शिलाओं पर की गई सुंदर कलाकृतियाँ देख सकते हैं।

भितरकनिका एक जैव-विविधता हॉट-स्पॉट क्षेत्र है जिसे आप पूर्ण उत्तरदायित्व के साथ अवलोकन करें एवं जानने का प्रयत्न करें।

हमने ललितगिरी – रत्नागिरी – उदयागिरी बौद्ध त्रिकोण, जाजपुर, पुरी, कोणार्क, भुवनेश्वर, उदयगिरी खँडगिरी गुफ़ाएं, मंगलजोड़ी, रघुराजपुर इत्यादि की भी यात्रा की। इनके संदर्भ में मेरे आगामी संस्करण अवश्य पढ़ें।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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राजाजी राष्ट्रीय उद्यान – चीला आरक्षित वन के वन्यजीवन का आनंद उठायें https://inditales.com/hindi/rajaji-rashtriya-udyan-garhwal-uttarakhand/ https://inditales.com/hindi/rajaji-rashtriya-udyan-garhwal-uttarakhand/#respond Wed, 12 Dec 2018 02:30:13 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1090

मैंने अपने जीवन में अनेकों बार ऋषिकेश की यात्रा की है। हर बार राजाजी राष्ट्रीय उद्यान का दर्शन किसी ना किसी कारणवश छूट जाता था। इस बार जब में हरिद्वार गयी, मुझे गढ़वाल मंडल विकास निगम(GMVN) के चीला अतिथी गृह में ठहरने का निमंत्रण मिला। मैंने मन ही मन विचार किया कि एक बार जंगल […]

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मैंने अपने जीवन में अनेकों बार ऋषिकेश की यात्रा की है। हर बार राजाजी राष्ट्रीय उद्यान का दर्शन किसी ना किसी कारणवश छूट जाता था। इस बार जब में हरिद्वार गयी, मुझे गढ़वाल मंडल विकास निगम(GMVN) के चीला अतिथी गृह में ठहरने का निमंत्रण मिला। मैंने मन ही मन विचार किया कि एक बार जंगल सफारी करूंगी, एक रात्री इस अतिथी गृह में बिताउंगी और शेष दिन हरिद्वार में ठहरूंगी। किन्तु मुझे चीला का वातावरण इतना भा गया कि अंततः मैं इस अतिथी गृह में चारों दिन ठहर गयी। केवल दिन के समय हरिद्वार नगरी के दर्शन के लिए चली जाती थी।

राजाजी राष्ट्रीय उद्यान के पास गंगा जी
राजाजी राष्ट्रीय उद्यान के पास गंगा जी

मैं दोपहर के भोजन के समय गढ़वाल मंडल विकास निगम के चीला अतिथी गृह में पहुँची। अधिक समय शेष नहीं था। जल्दी जल्दी थोड़ा कुछ खाया और सफारी के लिए निकल पड़ी। राजाजी राष्ट्रीय उद्यान का मुख्यद्वार हमारे अतिथी गृह से सटा हुआ ही था। आवश्यक औपचारिकता पूर्ण कर राजाजी राष्ट्रीय उद्यान का अनुभव लेने आगे बढ़ गयी। वाहन चालक एवं परिदर्शक दोनों की भूमिका निभाते, कुन्दन जी हमारे साथ थे।

राजाजी राष्ट्रीय उद्यान का इतिहास

८०० वर्ग की.मी. से भी अधिक क्षेत्रफल में फैला यह अपेक्षाकृत बड़ा उद्यान है। हरिद्वार एवं ऋषिकेश की पवित्र नगरियों को चारों ओर से घेरा यह उद्यान सहारनपुर, पौड़ी गढ़वाल एवं देहरादून जिलों तक फैला हुआ है। इससे आप अनुमान लगा सकते हैं कि इन नगरों के विस्तृत होने से पूर्व यहाँ के अधिकतर क्षेत्र वन ही रहे होंगे। उद्यान भीड़भाड़ भरे नगरों के इतने समीप है, फिर भी इसकी जैव-विविधता आज भी अछूती है। आप कई प्रकार के वन्य प्राणी एवं पक्षी यहाँ देख सकते हैं।

राजाजी राष्ट्रीय उद्यान - उत्तराखण्ड
राजाजी राष्ट्रीय उद्यान – उत्तराखण्ड

आरम्भ में यहाँ ३ वन्यजीव अभयारण्य थे। १९७७ में स्थापित चीला अभयारण्य, १९६४ में स्थापित मोतीचूर अभयारण्य एवं १९४८ में स्थापित राजाजी अभयारण्य। १९८३ में इन तीनों अभयारण्यों को मिलाकर राजाजी वन्यजीव अभयारण्य बना दिया गया। २०१५ में इसे टाइगर रिज़र्व का ओहदा प्रदान किया गया। वास्तव में इसका नामकरण स्वतन्त्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल श्री सी राजगोपालाचारी के नाम पर किया था।

राजाजी राष्ट्रीय उद्यान हाथियों के लिए अधिक जाना जाता है। मैंने कई बार सुना था कि इन वनों से जाते हुए आप हाथियों के झुण्ड देख सकते हैं। भारत में हाथियों की उपस्थिति का यह उत्तर-पश्चिमी छोर है। यहाँ से यदि आप कुछ और दूरी उत्तर अथवा पश्चिम की ओर चले जाएँ, आप वहां इन जंगली हाथियों को नहीं पायेंगे।

चीला आरक्षित वन – राजाजी राष्ट्रीय उद्यान

चीला आरक्षित वन जल-विद्युत् घर के समीप है। इस बिजली घर में जल आपूर्ति करती, गंगा की एक सहायक नदी यहाँ दिखाई देती है। इस सहायक नदी में कई मौसमी नदियों का भी समागम होता है। गढ़वाल मंडल विकास निगम का अतिथी गृह ऐसे ही एक संगम पर, धरती की एक संकरी पट्टी पर निर्मित है।

गंगा इस उद्यान में लगभग २४ की.मी. की दूरी तक बहती है। इस दौरान कई मौसमी नदियाँ इसमें आकर समाती हैं। यह नदियाँ अन्यथा सूखी एवं लुप्त रहती हैं।

मुंडल देव की कथा

राजाजी राष्ट्रीय उद्यान - मुंडल देव मंदिर
राजाजी राष्ट्रीय उद्यान – मुंडल देव मंदिर

हमने शनैः शनैः  राष्ट्रीय उद्यान के भीतर प्रवेश किया। कच्चा रास्ता था। केवल वनों के लिए उपयुक्त  शक्तिशाली गाड़ियां ही उस पर चल सकती थीं। हमारा पहला पड़ाव था एक छोटा सा मंदिर। जंगल के भीतर एक छोटा सा मंदिर हो एवं उसकी कोई कथा ना हो, यह कैसे हो सकता है। कुंदन जी ने मुझे बताया कि यह मंदिर मुंडल देव को समर्पित है। मुंडल देव एक स्थानीय संरक्षक माने जाते हैं जो शिकारियों से जंगल एवं जंगल के प्राणियों की रक्षा करते हैं। उनके सम्मान में आज भी सारे गांववासी फसल निजी उपयोग में लाने अथवा बेचने से पूर्व उन्हें अर्पित करते हैं।

संयोग से मुंडल एक मौसमी नदी का भी नाम है। कुंदनजी ने मुझे बताया कि स्थानीय लोग इसे मंगेतर भी कहते हैं। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। यह नदी किसकी मंगेतर हो सकती है! यहाँ भी कुन्दनजी ने मेरी जिज्ञासा शांत की। उन्होंने यह कथा सुनायी:

राजाजी राष्ट्रीय उद्यान में सूर्यास्त का मनोरन दृश्य
राजाजी राष्ट्रीय उद्यान में सूर्यास्त का मनोरन दृश्य

एक बार मुंडल नदी, अपितु मैं नद कहूँगी , को गंगा नदी से प्रेम हो गया। वह उससे विवाह करना चाहता था। उसने भगवान् शिव एवं अन्य देवों से गंगा का हाथ माँगा। देवतागण असमंजस में पड़ गए। सामान्यतः सूखा रहता मुंडल, मौसम में अत्यंत आकर्षक दिखाई पड़ता था। अंततः देवताओं ने अपनी ओर से सम्मति देते हुए अंतिम निर्णय गंगा पर छोड़ दिया। गंगा मुंडल से विवाह हेतु इच्छुक नहीं थी। किन्तु वह जानती थी कि मुंडल आसानी से उनका निर्णय स्वीकार नहीं करेगा। इसलिए जब मुंडल ने गंगा के समक्ष विवाह की मांग रखी तब गंगा ने उसकी मांग सशर्त स्वीकार की। शर्त यह थी कि मुंडल ग्रीष्म ऋतु में बारात लेकर उनके पास आये। आप जानते ही हैं कि मुंडल ग्रीष्म ऋतू में अस्तित्वहीन हो जाता है जबकि गंगा शाश्वत है।

खोती उभरती मौसमी नदी एवं अविनाशी गंगा नदी के अस्तित्वों की गाथा कहती इस किवदंती ने मुझे रोमांचित कर दिया था।

राजाजी राष्ट्रीय उद्यान के चीला वन में जीप सफारी

राजाजी राष्ट्रीय उद्यान में भ्रमण करते मृग
राजाजी राष्ट्रीय उद्यान में भ्रमण करते मृग

मुंडल देव मंदिर से हमारी जीप आगे बढ़ी। राह में हमें हिरणों के कई झुण्ड दिखाई दिए। उछलते कूदते वे कभी जंगल में भटकते तो कभी नदी के पास पहुँच कर पानी पीते। कभी अचानक हमारी गाड़ी के सामने से दौड़कर सड़क पार करते तो कभी उन्हें देख हम स्वयं ही गाड़ी रोक देते ताकि वे उस पार जा सकें।

साम्बर अपने कान ऊंचे किये चौकन्ना खड़ा था। आशा जागी कि अब हमें बाघ या तेंदुआ दिखेगा। किन्तु हमारी इच्छाओं पर पानी फिर गया। हमें हंसी भी आयी। ऐसा साम्बर  हमें सड़क के हर मोड़ पर खड़ा दिखाई दिया।

लम्बी घास के बीच गजराज
लम्बी घास के बीच गजराज

हाथी छोटे छोटे झुण्ड में दिखाई पड़ रहे थे। कई बार हर हाथी के साथ एक बच्चा भी होता था । ये झुण्ड हाथियों का परिवार प्रतीत हो रहे थे। दूर पर एक हाथियों का जोड़ा अपने बछड़े के संग घास चर रहा था। घास की ऊंचाई मुझे तब समझ में आयी। अपनी ऊंची पतली डंठलों में वे इन हाथियों को लगभग पूर्णतया छुपा रहे थे।

गोह - राजाजी राष्ट्रीय उद्यान
गोह – राजाजी राष्ट्रीय उद्यान

गोह अर्थात् मॉनिटर लिज़र्ड यहाँ वहां दौड़ रहे थे। कभी सड़क की मिट्टी पर शांत लेटे रहते और अचानक ही घास में अदृश्य हो जाते। उनका छद्म आवरण उन्हें घास से एकाकार कर रहा था। ढूंढ पाना कठिन हो रहा था।

राजाजी राष्ट्रीय उद्यान के पक्षी

मई माह का अंत था। उस पर दोपहर की सफारी थी। इस गर्मी में किसी भी पक्षी दर्शन की उम्मीद नहीं थी। कहते हैं ना! जब उम्मीद ना हो तभी घटनाएँ आश्चर्यचकित कर देती हैं। इस गर्मी में भी हमने कई पक्षी ढूंढें। अब मैं शीत ऋतू में एक बार फिर यहाँ आना चाहती हूँ जब यह उद्यान पक्षियों से भरा रहेगा।

आँखें तो देखिये इस बाज़ की
आँखें तो देखिये इस बाज़ की

सबसे पहले मैंने बाज अर्थात हॉक ईगल देखा। उसकी गोल बड़ी बड़ी पीली आँखें थी। इसकी एक विशेषता है। पास जाने पर भी यह डर कर उड़ता नहीं। शांत बैठकर दर्शन करने देता है। आप जितनी चाहें इसके चित्र खींच सकते हैं। मुझे स्मरण है, बांधवगड राष्ट्रीय उद्यान में भी मैंने इसके अच्छे छायाचित्र खींचे थे।

जल स्त्रोतों के पास हमें नद कुरारी एवं टिटहरी यहाँ वहाँ चलते व पानी पीते दिखाई दिए। पानी की सतह पर पड़ते उनके प्रतिबिम्ब अत्यंत मनमोहक प्रतीत हो रहे थे। चाह हुई कि पास जाकर उनके चित्र खींचूँ। किन्तु इसके लिए मुझे जीप से उतरना पड़ता। राष्ट्रीय उद्यान के भीतर इसकी अनुमति नहीं होती है।

छुपता निकलता तोता
छुपता निकलता तोता

पतरिंगा, नीलकंठ, ढेलहरे तोते, रामचिरैया, हरियल जैसे कई रंगबिरंगे पक्षी चारों ओर फुदक रहे थे। अपने चटक रंगों के कारण वे सहसा उठकर दिख रहे थे। अकस्मात् मेरी दृष्टी पेड़ के तने पर स्थित एक छोटे छिद्र से झांकते एक तोते पर पड़ी। तने के अन्दर बाहर होता वह तोता मानो मुझसे आँख-मिचौली खेल रहा था। उसने मेरा मन प्रफुल्लित कर दिया था।

राष्ट्रीय पक्षी मोर - है कोई इस से रंग बिरंगा
राष्ट्रीय पक्षी मोर – है कोई इस से रंग बिरंगा

इन सबमें सर्वाधिक विशाल एवं रंगीन पक्षी थे मोर। अपने बहुमूल्य पंखों के साथ वे राजसी ठाठ से यहाँ वहां घूम रहे थे। इस उद्यान में वे आपको हर ओर दिखाई देंगे।

बन कुक्कुट अर्थसत जंगली मुर्गे  भी कीट भोजन चुगते इधर उधर दौड़ रहे थे। बन कुक्कुट के पंखों के भीतर इतने रंग होते हैं कि आप गिनते गिनते थक जायेंगे। इनके चित्र खींच पाना भी अपने आप में एक चुनौती है। इनको कैमरे में कैद करने के लिए इनके समक्ष झुकना ही पड़ता है।

पतेना पक्षी
पतेना पक्षी

श्वेत श्याम दैया अथवा रोबिन एवं जंगली मैना झाड़ों पर फुदक रहे थे।

फ़ाकता या चितकबरे कबूतर पेड़ों की शाखाओं पर बैठे आलस निकाल रहे थे।

भारतीय धनेश
भारतीय धनेश

कई धनेश भी उड़ते दिखाई दिए। समस्या यह थी कि वे सदैव सड़क से दूर स्थित पेड़ों की डंगाल पर ही जाकर छुप रहे थे। चित्र खींचना मुश्किल हो रहा था। अंततः घनेश के एक  बच्चे का चित्र खींचने में सफलता मिल ही गयी।

हमेशा की तरह सात भाई आपस में बड़बड़ा रहे थे। इनके सिवाय भी कई पक्षी थे जिन्हें मैं पहचान नहीं पायी। फिर भी उन्हें ताकते रहना अत्यंत आनंददायक था। काश इतनी स्वतंत्रता से जीना सबके बस में होता।

हम राजाजी राष्ट्रीय उद्यान में जीप सफारी के अंतिम चरण पर पहुँच रहे थे। सूर्यास्त हो रहा था। परिदृश्य अन्यंत ही मनोरम हो गया था। डूबते सूर्य की किरणें पेड़ों की शाखाओं से आँख मिचौली खेल रही थीं। सम्पूर्ण परिदृश्य सूर्य की सुनहरी आभा में मदमस्त था। बड़ी कठिनाई से मैंने अपने आप को समझाया कि यह सफारी के अंत होने का संकेत भी है।

और पढ़ें:- गोवा में पक्षी दर्शन के १५ सर्वोत्तम स्थान

राजाजी राष्ट्रीय उद्यान के होटल

गढ़वाल विकास मंडल निगम का विश्राम गृह
गढ़वाल विकास मंडल निगम का विश्राम गृह

राजाजी राष्ट्रीय उद्यान के किस भाग में आप रहना चाहते हैं, सर्वप्रथम आपको यह निश्चित करना होगा। तत्पश्चात होटल का चुनाव करें। यदि आप मेरी तरह चीला आरक्षित वन का अवलोकन करना चाहते हैं तो ठहरने के लिए सर्वोत्तन स्थान है – गढ़वाल मंडल विकास निगम(GMVN) का चीला अतिथी गृह। यहाँ लठ्ठों की कई सुन्दर कुटीयाँ हैं जहां से गंगा का अप्रतिम दृश्य दिखाई पड़ता है। यहाँ से आप आसानी से गंगा किनारे तक पहुँच सकते हैं। गंगा किनारे सैर कर सकते हैं अथवा शांत बैठ कर उसे घंटों निहार सकते हैं।

राजाजी राष्ट्रीय उद्यान दर्शन के लिए कुछ सुझाव

  • राजाजी राष्ट्रीय उद्यान का चीला आरक्षित वन ऋषिकेश एवं हरिद्वार के मध्य सुगम्य स्थान पर स्थित है। स्थानीय रहवासियों के लिए यह एक अत्यंत इष्ट सैर स्थल है।
  • यह उद्यान वर्षा ऋतू अर्थात् जून मध्य से नवम्बर मध्य तक बंद रहता है।
  • आप प्रातःकालीन सफारी सुबह ६ बजे से ९ बजे तक कर सकते हैं। दोपहर की सफारी ३ से ५ बजे तक की जाती है। यदि संभव हो तो आप एक प्रातःकालीन सफारी अवश्य कीजिये।
  • राजाजी राष्ट्रीय उद्यान दर्शन का सर्वोत्तम समय है अक्टूबर से मार्च महीने के बीच कभी भी।
  • चीला वन के मुख्य द्वार के ठीक बाहर एक स्मारिका दूकान है। वन्य प्राणियों से सम्बंधित कई यादगार स्मारिकाएं आपको यहाँ मिल जायेंगी।
  • वन्य प्राणी व्याकुल ना हों, इसलिए हमें चटक रंग के कपड़ों से बचाना चाहिए। जहां तक हो सके, स्वयं को ढँक कर रखें। धूल एवं धूप से बच सकते हैं।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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अरुणाचल प्रदेश की मंत्रमुग्ध करने वाली टेंगा घाटी की यात्रा https://inditales.com/hindi/arunachal-pradesh-tenga-valley/ https://inditales.com/hindi/arunachal-pradesh-tenga-valley/#comments Wed, 29 Mar 2017 02:30:32 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=191

टेंगा घाटी – परिदृश्य, झरने, ओर्किड फूल और कीवी फल पूर्वोत्तर क्षेत्रों में यात्रा करते समय एक बात जरूर ध्यान में रखनी चाहिए कि, आपकी यात्रा कभी भी योजनानुसार पूरी नहीं होती। आपको न चाहते हुए भी परिस्थिति के आगे झुककर अंतिम समय पर अपनी योजनाओं में बदलाव करने पड़ते हैं। यहां पर या तो […]

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टेंगा घाटी अरुणाचल प्रदेश
टेंगा घाटी अरुणाचल प्रदेश

टेंगा घाटी – परिदृश्य, झरने, ओर्किड फूल और कीवी फल

पूर्वोत्तर क्षेत्रों में यात्रा करते समय एक बात जरूर ध्यान में रखनी चाहिए कि, आपकी यात्रा कभी भी योजनानुसार पूरी नहीं होती। आपको न चाहते हुए भी परिस्थिति के आगे झुककर अंतिम समय पर अपनी योजनाओं में बदलाव करने पड़ते हैं। यहां पर या तो कोई बन्द होता है या फिर राहबंदी होती है जिसके कारण आपको मजबूरन अपनी पूर्व नियोजित यात्रा स्थितिनुसार बदलनी पड़ती है। ऐसी घटनाओं की ना ही कोई पूर्व सूचना दी जाती है और ना ही उनसे संबंधित कोई भी समाचार आपको आसानी से उपलब्ध होता है। इंटरनेट के जरिये तो, इन घटनाओं से जुड़ी खबरों की अपेक्षा करना व्यर्थ है। इसलिए आपको स्थानीय समाचारों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। ऐसी ही एक घटना हमारे साथ भी घटी। अरुणाचल प्रदेश की टेंगा घाटी पर जाते हुए रास्ते में अरुणाचल – असम की सीमा पर बन्द था और किसी भी वाहन को सीमा पार करने की अनुमति नहीं थी। इस वजह से हमे वहीं पर रुकना पड़ा और अंत में तेज़पुर के चाय बागान में रात गुजारनी पड़ी, जिसके बारे में मैं बाद में लिखूँगी।

अरुणाचल प्रदेश में घूमने के लिए अनुमति की आवश्यकता

आर्किड का खिला हुस फूल
आर्किड का खिला हुस फूल

अरुणाचल प्रदेश में जाने के लिए आपको पहले राज्य से अनुमति प्राप्त करनी पड़ती है। इसके लिए आपको अनुमति पत्र भरकर उसके साथ अपना फोटो और पहचान पत्र की प्रति देनी पड़ती है। इससे संबंधित सारी प्रक्रिया आप दिल्ली, गुवाहाटी और शिलांग में स्थित अरुणाचल प्रदेश के केंद्र से पूरी कर सकते हैं। मैं अपना अनुमति पत्र प्राप्त करने के लिए शिलांग में स्थित अरुणाचल केंद्र में गयी। मैंने जरूरत के सारे कागजात दे दिये और शुल्क भी भर दिया। लेकिन मुझे अनुमति पत्र लेने के लिए तीन दिन बाद आने के लिए कहा गया। मैंने उन्हें समझाया कि मुझे यह अनुमति पत्र आज ही चाहिए, क्योंकि, हम दूसरे दिन ही अरुणाचल प्रदेश जानेवाले थे। तब वहीं की एक औरत और आदमी ने सिर्फ आधे घंटे में ही मेरा अनुमति पत्र मुझे दे दिया। अब मुझे अनुमति पत्र तो मिल गया लेकिन उसके अनुसार आप राज्य में ऐसे ही कहीं पर भी नहीं घूम सकते। इसके लिए आपको पहले से ही स्पष्ट करना पड़ता है कि, उपलब्ध तीनों रस्तों में से आप कौन से प्रवेश मार्ग से जाना चाहेंगे तथा कौन-कौन सी जगहों पर घूमना चाहेंगे और किस दिन जाना पसंद करेंगे। मैंने भी वही किया। आम तौर पर यह अनुमति पत्र 15 दिनों के लिए जारी किया जाता है।

अनुमति पत्र की जाँच पद्धति की आवश्यकता

अरुणाचल के छलछलाते झरने
अरुणाचल के छलछलाते झरने

मैंने भालुकपोंग, बोमड़ीला और तवांग क्षेत्रों में जाने के लिए अनुमति पत्र लिया। अनुमति पत्र प्राप्त करने की अनिवार्यता को मद्दे नज़र रखते हुए मुझे लगा कि शायद हमे राज्य की सीमा पर पहुँचने के बाद अपने आपको सत्यापित करने के लिए इस अनुमति पत्र को पेश करना पड़ेगा। लेकिन जब हमने राज्य की सीमा में प्रवेश किया तो वहां पर मौजूद किसी भी व्यक्ति को ना ही हमसे कोई मतलब था और ना ही हमारी गाड़ी से। सीमा पर हमारे अनुमति पत्रों की जाँच करने लिए कोई भी व्यक्ति नहीं आया। यह देखकर हम थोड़े हैरान से हो गए, कि इतनी लापरवाही कोई कैसे का सकता है। ऐसा भी हो सकता था कि 2 व्यक्तियों के पास ही अनुमति पत्र हो और बाकी दोनों के पास शायद अनुमति पत्र ना हो। लेकिन इसपर कोई कार्यवाही नहीं होती। हमारे ड्राईवर ने अपना ड्राइविंग लाइसेंस और हमारे पास चेक पोस्ट पर ले जाकर दिखाये और अनिवार्यता के तौर पर कुछ पैसे देकर हम वहां से आगे बढ़े। कुछ ही पलों में हम अरुणाचल प्रदेश में पहुँच गए थे।

इन सारी बातों पर विचार करते हुए मुझे लगा कि, अनुमति पत्र प्राप्त करने की आवश्यकता ही क्या थी। पहले तो, इस देश की नागरिक होने के रूप में मुझे इसी देश के एक पूरे राज्य में घूमने के लिए किसी खास अनुमति की जरूरत ही क्या है? मैं समझ सकती हूँ कि अरुणाचल प्रदेश काफी बड़ा राज्य होने के नाते उसमें कुछ संवेदनशील इलाके भी हो सकते हैं। और अगर किसी कारणवश ऐसे क्षेत्रों में जाने के लिए अनुमति पत्र की आवश्यकता है, तो मुझे लगता है कि अनुमति पत्र जारी करने के पीछे का पूरा उद्देश्य ही कहीं ना कहीं कार्यान्वयन के स्तर पर असफल रह गया है।

टेंगा घाटी के मार्ग में उल्लसित झरने

इन झरनों का विडियो देखिये।

भालुकपोंग की सड़कें

भालुकपोंग से आने जाने वाली सड़कों को देखकर ऐसा लगता है, जैसे किसी समय में शायद ही यहां पर ठीक-ठाक मार्ग हुआ करते थे। इन सड़कों की हालत बहुत ही खराब है। लेकिन आस-पास का वातावरण देखकर लगता है जैसे उनके सुधारणीकर का काम जल्द ही शुरू होने वाला है। यहां की कटी हुई पहाड़ियाँ भी इसी बात की ओर संकेत करती हैं कि यहां पर बहुत जल्द पक्की सड़क बनने वाली है। लेकिन कभी-कभी आँखों देखा झूठ भी होता है। हमारे ड्राईवर और वहां के स्थानीय लोग ने हमे बताया कि वहां पर रखे हुए मलबे सालों से वहीं पर पड़े हुए हैं। और आज तक वहां पर सड़क का कोई काम नहीं हुआ है। लेकिन अगर किसी दिन इस सड़क का काम शुरू हो गया और नयी सड़क बन गयी तो उन्हें बहुत आश्चर्य होगा। इस पूरे क्षेत्र की सड़कें देखे तो, सिर्फ सेना बस्तियों के आस-पास की सड़कें ही सुव्यवस्थित हैं। वास्तव में भालुकपोंग की सड़कें देखकर आपको अपने गाँव-शहर की सड़कें याद आती हैं।

अरुणाचल प्रदेश का प्रकृतिक सौंदर्य

अरुणाचल के पर्वत और नदियाँ
अरुणाचल के पर्वत और नदियाँ

जैसा कि कहा जाता है, स्वर्ग का मार्ग नर्क से होकर गुजरता है। भालुकपोंग से जैसे ही आप 20 कि.मी. की दूरी, जो कि 200 कि.मी. जैसी लगती है, पार करते हैं, आप अरुणाचल प्रदेश की पहाड़ियों और घाटियों में पहुँचते हैं, जिनकी खाड़ियों से नदियां बहती हैं। स्वर्ग जैसा दिखनेवाला यह अद्भुत दृश्य आपको मंत्रमुग्ध कर देता है। मैंने इससे पहले देवदार के इतने हरे भरे घने जंगलों से आवृत्त पहाड़ियाँ कभी नहीं देखी थी। इन पहाड़ियों पर यहां-वहां से बहते हुए झरने नीचे बह रही नदियों से मिलने के लिए चंचलता से दौड़ते रहते हैं। यहां कदम कदम पर आपको जंगली फूल मिलते हैं, जो पत्थरों से, पेड़ों के तने से और झड़ियों से बाहर झाकते हुए नज़र आते हैं। ये फूल कहीं भी और कभी भी खिलते हैं।

ओर्किड के फूल और उनकी सरकारी फुलवाड़ी

ऑर्किड फूल
ऑर्किड फूल

अरुणाचल प्रदेश ओर्किड फूलों के विभिन्न प्रकारों का घर है। भालुकपोंग की सीमा से लगभग 5 कि.मी. की दूरी पर बसे हुए टिपि शहर में ओर्किड की सरकारी फुलवाड़ी है। यहां ओर्किड के फूलों पर अनुसंधान किया जाता है और उनके 750 से भी अधिक प्रकार उगाये और उत्पन्न किए जाते हैं। लेकिन जब हम वहां गए तो हमे वहां पर सिर्फ तीन प्रकार के ही ओर्किड देखने को मिले। शायद हमारे वहां जाने का समय ही ठीक नहीं था। हम इन फूलों को प्रत्यक्ष रूप से तो नहीं देख पाये लेकिन उनके विभिन्न प्रकारों को हमने जरूर देखा। वहां पर एक छोटा सा संग्रहालय है जहां पर ओर्किड के विभिन्न प्रकारों को तस्वीरों और चित्रों के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है।

ओर्किड के इन विविध प्रकारों को देखने के लिए हमे सेस्सा के ओर्किड अभयारण्य में जाने के लिए कहा गया। ये अभयारण्य भालुकपोंग और टेंगा घाटी के बीच रास्ते पर ही पड़ता है। टेंगा घाटी पर जाते समय हम वहां पर नहीं जा पाये लेकिन, घाटी से वापस आते समय हम या अभयारण्य देखने जरूर गए। जहां पर हमने तरह-तरह के ओर्किड देखे, जो एक से बढ़कर एक थे।

सेस्सा का ओर्किड अभयारण्य

इस जगह का प्रवेश द्वार देखते ही आप जान जाते हैं, कि आप ओर्किड के अभयारण्य में प्रवेश कर रहे हैं। इसके आगे आपको ओर्किड के जंगल ही जंगल दिखाई देते हैं। अगर आप इन जंगलों में घूमना चाहते हैं तो अपने बलबूते पे जा सकते हैं। हम लगभग 150 फीट कि दूरी तक इन जंगलों में घूमते रहे, जिसके दौरान हमने ओर्किड के काफी सारे प्रकार देखे। सेस्सा का यह ओर्किड अभयारण्य टीपी के सुव्यवस्थित ओर्किड फुलवाड़ी से ज्यादा अच्छा था।

आर्किड फूल
आर्किड फूल

वहां के एक स्थानीय व्यक्ति जो विनम्रतापूर्वक अरुणाचल की यात्रा के समय हमारे साथ आए थे, हमे एक किसान के पास ले गए जो ओर्किड की खेती करते हैं। वह किसान हमे अपने खेत में ले गए, जहां पर उन्होंने हमे ओर्किड के कुछ दिलचस्प प्रकार दिखाये तथा उनके बारे में थोड़ी-बहुत जानकारी भी दी और ओर्किड से जुड़ी अर्थव्यवस्था को भी समझाया। जैसे-जैसे आप पहाड़ी के ऊपर जाते हैं, वहां का वातावरण ओर्किड के फूलों के लिए और भी बढ़िया होता जाता है।

आर्किड अभ्यारण
आर्किड अभ्यारण

यहां पर रास्ते के किनारे आपको ओर्किड के बहुत सारे जंगली प्रकार भी देखने को मिलते हैं। जिन्हें देखने के लिए आपको बार-बार गाड़ी रोकनी पड़ती है, जो यहां के घुमावदार और संकीर्ण रास्तों के लिए बहुत ही खतरनाक और चुनौती भरा कार्य है। यह सब देखते हुए मुझे लगा कि, हम इस रास्ते से पैदल क्यों नहीं जा सकते? क्योंकि अगर ऐसा होता तो हम आराम से इन फूलों को देख पाते तथा उनकी तस्वीरें खिचने का इससे बढ़िया मौका आपको नहीं मिलता।

अरुणाचल से जुड़े उपाख्यान

अरुणाचल प्रदेश भारत का एक ऐसा भाग है, जहां तक अंग्रेजों की सत्ता कभी पहुँच नहीं पायी। जिसकी वजह से यह जगह अंग्रेजों के प्रभावों से मुक्त है और यहां पर आपको अंग्रेज़ कालीन कोई भी संरचना नहीं दिखाई देती। लेकिन, आज अगर इस बात पर विचार किया जाए तो यह बात बहुत असामान्य सी लगती है। अरुणाचल से जुड़े उपाख्यान के अनुसार माना जाता है कि, जब पहले पहल अंग्रेज अधिकारियों ने अरुणाचल में प्रवेश करने की कोशिश की थी तब, उस क्षेत्र की स्थानीय आदिवासी जमातीयों ने, जो वहां पर अपना शासन चला रही थीं, अंग्रेजों के सिर धड़ से अलग कर उन्हें वापस असम भेज दिया था। इस घटना से आस-पास के गांवों में यह मिथक फैल गया कि उस क्षेत्र के आदिवासी लोग मनुष्यों का भक्षण करते हैं। इसके बाद घने जंगलों से आवृत्त इस क्षेत्र में प्रवेश करने का साहस किसी ने नहीं किया। अंग्रेजों की सत्ता असम की परिधि पर बसे बालिपारा गाँव तक ही सीमित थी। इसके आगे के क्षेत्रों को अंग्रेजों द्वारा बालिपारा सीमा-प्रदेश कहा जाता था।

अरुणाचल प्रदेश पहले असम का ही एक भाग हुआ करता था, लेकिन बाद में 1971 में उसे केंद्र शासित प्रदेश घोषित किया गया। उसके बाद 1987 में अरुणाचल प्रदेश एक स्वतंत्र राज्य बन गया। क्षेत्रीय रूप से देखे तो आज यह उत्तर पूर्वीय भारत का सबसे बड़ा राज्य है जो 16 जिलों में विभाजित है।

अरुणाचल की भाषा

भाषा के संदर्भ में बात करें तो अरुणाचल प्रदेश की सबसे अनपेक्षित बात यह थी कि, हिन्दी भाषा के साथ अंग्रेजी भाषा भी यहां की राजभाषा है। यहां के लोग बहुत अच्छी हिन्दी बोलते हैं। लेकिन उनकी यही शिकायत रहती है कि, जब भी वे भारत के अन्य भागों में घूमने जाते हैं, तब उन्हें चीनी कहकर पुकारा जाता है। जबकि वे स्पष्ट हिन्दी बोलते हैं और इसके साथ दिल्ली की भाषा भी ठीक-ठाक बोल लेते हैं। मुझे बताया गया कि हिन्दी यहां की प्रमुख संपर्क भाषा है, क्योंकि, यहां पर प्रत्येक आदिवासी प्रजाति की अपनी बोली होती है। इन बोलियों की संख्या 50 से भी अधिक है। अरुणाचल की इन आदिवासी प्रजातियों के प्राचीन जड़ों की ज्यादा जानकारी तो नहीं मिलती, यद्यपि महाभारत में इस जगह का संदर्भ जरूर मिलता है।

अरुणाचल में कृष्ण – रुक्मिणी

अरुणाचल प्रदेश के पूर्वीय भाग में स्थित मालिनीथान में हाल ही में हुए उत्खनन के दौरान कुछ प्राचीन हिन्दू मंदिरों का उद्घाटन हुआ है, जो कृष्ण-रुक्मिणी के उपाख्यानों से जुड़े हैं। यहां के अधिकतर आदिवासी लोग डोनियो पोलो को अपने धर्म के रूप में अपनाते हैं, जिसमें वस्तुतः सूर्य और चंद्रमा को पूजा जाता है। या फिर सामान्य तौर पर प्रकृति के तत्वों को पूजा जाता है। दीर्घ काल तक उनके पास धर्म का कोई भी सुव्यवस्थित रूप नहीं था। लेकिन अब वे आधिकारिक धर्म की ओर बढ़ते जा रहे हैं, जिनमें से अधिकतर व्यक्ति हिन्दू धर्म या बौद्ध धर्म का चुनाव करते हैं। अरुणाचल प्रदेश के उत्तर पश्चिमी भाग में, जहां पर तवांग मठ स्थित है, मूलतः बौद्ध धर्म के लोग रहते है। यहां पर ईसाई धर्म के भी कुछ लोग मानते हैं।

अरुणाचल के व्यवसाय

कीवी के बाग़
कीवी के बाग़

अरुणाचल प्रदेश के लोग आज भी खेती का व्यवसाय करते हैं, जो यहां का मूल व्यवसाय है। ऐसा लगता है जैसे बड़े लंबे समय तक लकड़ी बेचना यहां का प्रमुख व्यवसाय रहा है। इसके चलते बहुत से पहाड़ अपने पेड़ों की कुर्बानी देते-देते नंगे होते जा रहे थे। लेकिन पिछले कुछ सालों में सरकार ने पेड़ों की कटाई पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा दिया है। जिसके कारण अब ये पहाड़ फिर से हरे-भरे होते जा रहे हैं। यहां का पहाड़ी वातावरण विभिन्न प्रकार के फूलों और फलों की खेती के लिए बहुत अच्छा है। टमाटर यहां की प्रमुख नकदी फ़सल है। हमने यहां पर कीवी और सेब के बड़े-बड़े बागान भी देखे। तथा टेंगा घाटी में गुलाब और ओर्किड के बाग भी देखे। टेंगा घाटी अरुणाचल प्रदेश की एक छोटी सी नगरी है। यहां पर सेना की विशाल बस्तियाँ हैं, जिनमें से ज़्यादातर घर इस घाटी से बहती हुई नदी के किनारे पर ही बसे हुए हैं। यहां के हमारे मेज़बान मित्र का घर भी बहुत सुंदर है जो इसी नदी के मोड पर बसा हुआ है। ईगलनेस्ट वन्यजीव अभयारण्य भी टेंगा घाटी के नजदीक ही स्थित है, लेकिन वहां पर घूमने के लिए आपको सही मौसम का इंतेजर करना पड़ता है।

श्रीमान और श्रीमती ग्लोव की मैं बहुत आभारी हूँ कि उन्होंने टेंगा घाटी में हमारे मेज़बान के रूप में हमारी बहुत अच्छी आव-भगत की।

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