विश्व धरोहर Archives - Inditales श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Wed, 13 Dec 2023 10:33:37 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.7.4 बुद्ध के अवशेष संरक्षित करता साँची का भव्य स्तूप https://inditales.com/hindi/sanchi-stupa-vishwa-dharohar-madhya-pradesh/ https://inditales.com/hindi/sanchi-stupa-vishwa-dharohar-madhya-pradesh/#respond Wed, 17 Apr 2024 02:30:25 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3508

साँची! मध्यप्रदेश प्रदेश के विदिशा जिले में, भोपाल के निकट स्थित एक छोटी सी नगरी। वर्तमान में जहाँ विदिशा नगर स्थित है, वहाँ से लगभग ३ किलोमीटर दूर बेसनगर नामक एक गाँव है जहाँ प्राचीन विदिशा बसी हुई थी। प्राचीन काल में यह एक लोकप्रिय व्यावसायिक केंद्र था। इसके समीप स्थित साँची नगरी बौद्ध स्तूपों […]

The post बुद्ध के अवशेष संरक्षित करता साँची का भव्य स्तूप appeared first on Inditales.

]]>

साँची! मध्यप्रदेश प्रदेश के विदिशा जिले में, भोपाल के निकट स्थित एक छोटी सी नगरी। वर्तमान में जहाँ विदिशा नगर स्थित है, वहाँ से लगभग ३ किलोमीटर दूर बेसनगर नामक एक गाँव है जहाँ प्राचीन विदिशा बसी हुई थी। प्राचीन काल में यह एक लोकप्रिय व्यावसायिक केंद्र था। इसके समीप स्थित साँची नगरी बौद्ध स्तूपों के लिए प्रसिद्ध है। एक पहाड़ी के शीर्ष पर स्थित इन स्तूपों में से विशालतम स्तूप को साँची स्तूप कहते हैं।

साँची स्तूप
साँची स्तूप

साँची स्तूप को महान स्तूप भी कहते हैं।

साँची स्तूप का निर्माण किसने कराया?

राजा अशोक ने सम्पूर्ण भारत में अनेक स्थानों पर स्तूपों का निर्माण कराया था जिनके भीतर बुद्ध के अवशेषों को संरक्षित किया था। उन सभी बौद्ध स्तूपों में साँची स्तूप को सर्वोत्तम संरक्षित स्तूपों में से एक माना जा सकता है। तीसरी शताब्दी में अशोक ने इस स्तूप की नींव रखी थी। अशोक के पश्चात अनेक राजाओं ने इस स्तूप पर संवृद्धिकरण का कार्य अनवरत जारी रखा। नवीन कटघरों एवं विविध शिल्पों का संयोग करते हुए इसके आकार में वृद्धि करते रहे।

साँची का महा स्तूप
साँची का महा स्तूप

सम्राट अशोक का विवाह देवी से हुआ था जो विदिशा के एक व्यापारी की पुत्री थी। अशोक से विवाह के पश्चात भी देवी ने अनवरत विदिशा में ही निवास किया।

ऐसा कहा जाता है कि अशोक ने यहाँ के शैल स्तंभों में से एक स्तंभ को स्थापित किया था जो दुर्भाग्य से अब यहाँ उपस्थित नहीं है। इस स्तूप के अशोक से संबंध की पुष्टिकरण चुनार के बलुआ शिलाओं की यहाँ उपस्थिति एवं मौर्य शैली की चमक से भी होती है। ये तत्व हम बराबर गुफाओं में देख चुके हैं।

यह अत्यंत अचरज का विषय है कि ७वीं सदी के चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने इस स्तूप का उल्लेख कहीं नहीं किया है। क्या वह साँची कभी आ नहीं पाया या उस काल तक इस स्तूप की आध्यात्मिक महत्ता समाप्त हो गयी थी?

साँची में स्थित अन्य लघु स्तूपों के भीतर बुद्ध के शिष्यों, अन्य बौद्ध भिक्षुओं तथा बौद्ध गुरुओं के अवशेष हैं। स्तूप के चारों ओर आराधना स्थल एवं मठ हैं। इससे यह संकेत प्राप्त होता है कि लगभग २००० वर्षों पूर्व यह बौद्ध धर्म के पालन एवं अध्ययन का केंद्र था। विडम्बना यह है कि बुद्ध ने स्वयं कभी इस स्तूप का अथवा इस क्षेत्र का भ्रमण नहीं किया है।

मथुरा के संग्रहालय में प्रदर्शित चित्र यह दर्शाते हैं कि इस क्षेत्र को भी गुप्त राजाओं का संरक्षण प्राप्त था। किन्तु गांधार, मथुरा एवं सारनाथ जैसे क्षेत्रों में प्रफुल्लित स्वशैली के विपरीत साँची अपनी स्वयं की शैली विकसित करने में असफल रही।

१४वीं से १९वीं शताब्दी के मध्य साँची का यह स्तूप हमारे इतिहास में कहीं लुप्त हो गया था। सन् १८१८ में जनरल टेलर ने स्तूप क्रमांक १,२ एवं ३ के अवशेषों का अन्वेषण किया था। आगामी १०० वर्षों तक इस स्थान पर विविध उत्खनन एवं जीर्णोद्धार के कार्य किया गए। अनेक बौद्ध मंदिरों, मठों, मन्नत के स्तूपों, भित्तियों एवं आवास गृहों को उत्खनित किया गया एवं उनका पुनरुद्धार किया गया। उत्खनन स्थल से बड़ी मात्रा में मिट्टी के पात्रों के अवशेष, सिक्के, पात्र इत्यादि प्राप्त हुए।

साँची पहाड़ी के स्मारक

साँची पहाड़ी पर स्थित स्मारकों को दो विभागों में बाँटा जा सकता है। प्रथम विभाग जिसके स्तूप पहाड़ी के शीर्ष पर स्थित हैं, जैसे मुख्य स्तूप। दूसरा विभाग जिसके स्तूप पहाड़ी की पश्चिमी ढलान पर स्थित हैं।

पहाड़ी के शीर्ष पर आयताकार पठार है जो लगभग ४०० मीटर लम्बा एवं २०० मीटर चौड़ा है। यह पठार गोलाकार भित्तियों द्वारा सीमाबंध है। अधिकतर स्मारक इसी भित्ति के भीतर स्थित है। चिकनी घाटी से एक प्राचीन पथ हमें पहाड़ी के शीर्ष तक ले जाता है।

अंग्रेज अधिकारियों ने पहाड़ी के शीर्ष तक पहुँचने के लिए एक शैल पदपथ का निर्माण किया था। उसके स्थान पर अब एक चौड़ा मार्ग है जिसके द्वारा वाहन भी पहाड़ी के शीर्ष तक पहुँच सकते हैं।

पहाड़ी की पश्चिमी ढलान पर स्थित दूसरे भाग के स्मारकों तक पहुँचने के लिए भी सुगम मार्ग है। स्तूप क्रमांक १ से नीचे उतरते हुए हम इन स्मारकों तक पहुँच सकते हैं।

साँची का मुख्य स्तूप अथवा स्तूप क्रमांक १

साँची का स्तूप क्रमांक १ अथवा मुख्य स्तूप एक विशाल अर्ध गोलाकार गुम्बद है। इस स्तूप की विशेषता इसका विशाल आकार है। अपने आकार के कारण यह अन्य स्तूपों में विशेष जान पड़ता है। इसके दक्षिणी भाग पर सोपान हैं जिसके द्वारा आप परिक्रमा पथ तक चढ़ सकते हैं तथा परिक्रमा कर सकते हैं। इसकी चार दिशाओं में चार तोरण युक्त द्वार हैं जो परिक्रमा पथ से साथ मिलकर स्तूप के चारों ओर एक वृत्ताकार सीमा की रचना करते हैं।

साँची स्तूप की तोरणों पर जातक कथाएं
साँची स्तूप की तोरणों पर जातक कथाएं

स्तूप के शीर्ष पर मुकुट सदृश एक छत्रावली है। छत्रावली के ऊपर एक के ऊपर एक तीन छत्र हैं। ये तीन छत्र बौद्ध धर्म के तीन सिद्धांतों को दर्शाते हैं –

बुद्धं शरणं गच्छामि,

धम्मम शरणं गच्छामि,

संघम शरणं गच्छामि।

इस मुख्य स्तूप अथवा स्तूप क्रमांक १ का व्यास ३६.६ मीटर है तथा उसकी ऊँचाई १६.४६ मीटर है। इसमें छत्रावली की ऊँचाई सम्मिलित नहीं है।

तोरण पर उत्कीर्णित शालभंजिका
तोरण पर उत्कीर्णित शालभंजिका

स्तूप के चारों ओर स्थित परिक्रमा पथ का कटघरा शिलाखंडों द्वारा निर्मित है जिन्हें देश के विभिन्न भागों से अनेक श्रद्धालुओं ने दान में प्रदान किये हैं। शिलाखंडों पर अंकित दाताओं के नाम प्राचीन काल के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करती हैं।

मूल मंदिर टेराकोटा नामक पदार्थ से निर्मित किया गया था। टेराकोटा में निर्मित यह मंदिर वर्तमान मंदिर के भीतर अब भी स्थित है। पुरातन स्तूप के नवीनीकरण के समय उस पर ईंटों एवं चूने की एक परत बिछाई गयी है। अब चूने की परत कहीं कहीं से उखड़ रही है जो इस सम्पूर्ण संरचना को दृष्टिगत रूप से रोचक बना रही है।

शिलाओं का आवरण, छत, कटघरा, हर्मिका अथवा ग्रीष्म भवन, छत्रावली के चारों ओर की बाड़, ये सब पुरातन स्तूप पर कालांतर में नवीनीकरण के समय जोड़े गए हैं।

साँची के मुख्य स्तूप का तोरण

साँची के मुख्य स्तूप की चार दिशाओं में चार तोरण हैं जो इस स्तूप के विशेष तत्व हैं। इसका निर्माण प्रथम शताब्दी में सातवाहन वंश के राजाओं के किया था। दक्षिणी तोरण पर लगे शिलालेख द्वारा इसकी पुष्टि की जा सकती है।

साँची स्तूप की तोरण
साँची स्तूप की तोरण

स्तूप के प्रत्येक तोरण में तीन क्षैतिज फलक हैं जो दो स्तंभों पर जुड़े हुए हैं। इन तीनों फलकों को आपस में भी छोटे लम्बवत शिलाखंडों द्वारा जोड़ा गया है। सभी तोरणों एवं उनके स्तंभों पर चारों दिशाओं में सघन उत्कीर्णन किया गया है। तोरण का ऊपरी भाग ऐसा दर्शाया गया है मानो उसे हाथी, सिंह अथवा गन्धर्व अपने ऊपर ढो रहे हों। पश्चिमी तोरण पर निर्मित गन्धर्व की प्रतिमाओं के मुख पर अभिव्यक्त हाव-भाव दर्शनीय हैं। भार उठाते हुए उनके मुखड़े पर अभिव्यक्त भावनाओं को शिल्पकार ने पूर्ण सत्यता से प्रदर्शित किया है। तीनों क्षैतिज फलकों के दोनों छोरों पर कुण्डलियाँ अंकित हैं।

तोरणों के कथा कहते पट्ट
तोरणों के कथा कहते पट्ट

तीनों फलकों को आपस में जोड़ते तीन तीन लम्बवत शैलखंड रिक्त स्थान को ८ भागों में विभाजित करते हैं। इन खण्डों में अश्व तथा गज पर आरूढ़ सवारों की प्रतिमाएं हैं। जहाँ आड़ी पट्टिकाएं स्तंभों से जुड़ती हैं, उसके बाह्य भागों के ऊपर शालभंजिकाओं की प्रतिमाएं हैं। शालभंजिका स्त्री के उस रूप का चित्रण है जो साल वृक्ष के नीचे उसकी एक शाखा पकड़ कर भिन्न भिन्न मुद्राओं में खड़ी है। तोरण के शीर्ष पर धर्म चक्र है जिसके दोनों ओर चामरधारी एवं बुद्ध, धम्म एवं संघ, ये त्रिरत्न हैं।

माया का गजस्वपन - बुद्ध के जन्म का संकेत
माया का गजस्वपन – बुद्ध के जन्म का संकेत

तोरण की रचना करने वाले कारीगर हस्तदन्त कारीगर थे। उनके हाथों की कला इन उत्कीर्णनों की सूक्ष्मता एवं जटिलता में स्पष्ट विदित होती है।

तोरणों के शिल्प एवं उत्कीर्णन

सम्पूर्ण तोरण पर विविध प्रकार की मूर्तियाँ एवं उत्कीर्णन हैं। उनमें हैं-

  • बौद्ध चिन्ह जैसे, कमल, चक्र एवं स्तूप
  • बुद्ध के जीवन के दृश्य जैसे, माया के स्वप्न के द्वारा बुद्ध का जन्म, बोधि वृक्ष द्वारा प्रदर्शित परम ज्ञान की प्राप्ति का दृश्य, उनका प्रथम धर्मोपदेश जिसे चक्र द्वारा प्रदर्शित किया गया है, स्तूप द्वारा प्रदर्शित उनकी मृत्यु। जी हाँ, बुद्ध को उनके मानवी रूप द्वारा नहीं अपितु उनके चिन्हों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।
  • अन्य दृश्यों में कपिलवस्तु से उनका प्रस्थान, सुजाता द्वारा अर्पित नैवेद्य, मार के साथ उनका युद्ध आदि सम्मिलित हैं।
  • जातक कथाएं जो हमें बोधिसत्त्व की कथाएं कहती हैं। जैसे –
    • दक्षिणी, पश्चिमी व उत्तरी तोरण पर उत्कीर्णित छद्दन्त जातक
    • पश्चिमी तोरण के स्तम्भ पर अंकित साम जातक
    • पश्चिमी द्वार के स्तम्भ पर उत्कीर्णित महाकपि जातक
    • उत्तरी द्वार के दोनों ओर अंकित वेस्सन्तर जातक
    • उत्तरी द्वार पर उत्कीर्णित अलम्बस जातक
  • बौद्ध धर्म के इतिहास से सम्बंधित घटनाएँ
  • एक बौद्ध भिक्षुक के जीवन के दृश्य
  • अशोक चक्र एवं सिंह चतुर्भुज
  • सज्जा आकृतियाँ एवं रूपांकन

स्तूप के दक्षिणी भाग का तोरण स्तूप का मुख्य तोरण है। सर्वप्रथम इसी तोरण की स्थापना की गयी थी। यहीं से आगे जाकर सोपान हैं जो आपको स्तूप के शीर्ष तक ले जाती हैं। इस तोरण पर अशोक चिन्ह है जिसमें चार सिंह हैं। इस तोरण के निकट अशोक स्तंभ है। इसका केवल निचला भाग ही यथास्थान है। यह तोरण सर्वाधिक भंजित भी है। उत्तरी दिशा में स्थित तोरण का संरक्षण सर्वोत्तम रूप से किया गया है।

साँची स्तूप में बुद्ध की प्रतिमाएं

आप किसी भी तोरण के द्वारा स्तूप के भीतर जा सकते हैं। भीतर प्रवेश करते ही आपको बुद्ध की एक बड़ी प्रतिमा दृष्टिगोचर होगी। एक छत्र के नीचे विराजमान बुद्ध के मुख पर परम शान्ति का भाव है। ये गुप्त वंश के राजकाल में निर्मित प्रतिमाएं हैं। मुख्य स्तूप में इन्हें सन् ४५० में जोड़ा गया था।

बुद्ध की पाषण प्रतिमा - साँची
बुद्ध की पाषण प्रतिमा – साँची

प्रत्येक छवि में स्तूप की भित्ति का टेका लगाकर बुद्ध ध्यान मुद्रा में बैठे हैं। प्रत्येक बुद्ध प्रतिमा के पृष्ठभाग पर विस्तृत रूप से उत्कीर्णित प्रभामंडल है।

साँची के बौद्ध धरोहर में किये गए संवर्धन

साँची के मुख्य स्तूप के चारों ओर भिन्न भिन्न कालावधि में अनेक बौद्ध मंदिर बनाए गए अथवा उनमें संवर्धन किये गए। यह इस ओर संकेत करता है कि लगभग ७-८ वीं शताब्दी तक यह धरोहर एक जीवंत बौद्ध स्थल था। इसके पश्चात यह सघन वन में लुप्त हो गया। लोगों ने इसे अनेक प्रकार से भंजित किया। वे जो भी उपयोगी भाग देखते, उसे निकालकर ले जाते थे। अशोक स्तंभ को भंजित कर गन्ने का रस निकालने में उसका प्रयोग करने लगे।

धरोहरी स्मारक का परिवेश

स्तूप की भूमि पर स्थित शिलाखंडों एवं उसके गोलाकार कटघरे की भित्ति पर ब्राह्मी अथवा पाली लिपि में अनेक शिलालेख हैं। उन पर उन व्यक्तियों के नाम उकेरे हैं जिन्होंने उनका दान किया था। छोटे से दान द्वारा शिलाखंडों पर अपना नाम अमर कर लेने की यह प्रथा कितनी प्राचीन है!

साँची में अन्य स्तूप

मुख्य स्तूप के चारों ओर कई लघु स्तूप सदृश संरचनाएं हैं। ये मन्नत के स्तूप हैं जिनकी स्थापना उन व्यक्तियों ने की थी जिनकी मनोकामनाएं स्तूप के दर्शन के पश्चात पूर्णत्व को प्राप्त हुई थीं।

स्तूप क्रमांक ३

मुख्य स्तूप के पश्चात स्तूप क्रमांक ३ ही ऐसा स्तूप है जिसका उत्तम रूप से संवर्धन किया गया है। यह मुख्य स्तूप का लघु प्रतिरूप है। इसकी उंचाई एवं व्यास मुख्य स्तूप से न्यून हैं किन्तु रचना मुख्य स्तूप सदृश ही है। स्तूप के चारों ओर स्थित कटघरा अपेक्षाकृत छोटा है। शिलालेखों के अनुसार इन दोनों कटघरों का प्रायोजक एक ही व्यक्ति है।

स्तूप क्रमांक ३ में एक ही तोरण अथवा द्वार है। ऐसी मान्यता है कि इस स्तूप के भीतर सारिपुत्र एवं मौद्गल्यायन के अस्थि अवशेष समाहित हैं। ये दोनों गौतम बुद्ध के शिष्य थे।

इस स्तूप का दिनांकन २री शताब्दी अनुमानित किया गया है।

मठ

मुख्य स्तूप अथवा स्तूप क्रमांक १ के पश्चिमी ओर नीचे जाते हुए कुछ सोपान है जो आपको एक समतल क्षेत्र की ओर ले जाते हैं। वहाँ एक विशाल जलकुंड एवं कुछ मठों के भग्नावशेष हैं। मठ ५१ चौकोर आकार का है। इसके चारों ओर अनेक कक्ष हैं तथा मध्य में एक प्रांगण है।

४६ एवं ४७ क्रमांक के मठों का अन्वेषण हाल ही में किये गए उत्खनन में किया गया था।

इन मठों के भग्नावशेषों के आसपास मंदिरों समेत कई अनेक संरचनाओं के अवशेष देखे जा सकते हैं।

स्तूप क्रमांक २

यहाँ से कुछ सोपान उतारकर आप स्तूप क्रमांक २ पहुँचते हैं। यह एक सीमा तक स्तूप क्रमांक ३ के ही समान है। यहाँ भी ४ प्रवेश द्वार हैं किन्तु उन पर अलंकारिक तोरण नहीं है। इसका गोलाकार कठघरा उत्तम रूप से संरक्षित है।

मार्ग में आपको एक बड़ा भिक्षा पात्र भी दिखाई देगा।

मुख्य स्तूप के दक्षिणी एवं पूर्वी दिशा में कई लघु स्तूप हैं। उन स्तूपों में बुद्ध के शिष्यों के अवशेष हैं। उनमें से कुछ स्तूपों के आधार चौकोर आकार के भी हैं। उनकी स्थापत्य शैली यह संकेत करती है कि वे सब गुप्त काल से सम्बंधित हैं।

स्तूप क्रमांक ५ में बुद्ध की एक छवि है जिसमें बुद्ध ध्यान मुद्रा में बैठे हैं।

परिसर में स्थित पूर्वकाल के कुछ मंदिर

इस धरोहर संकुल के भीतर कुछ ऐसे भी मंदिर हैं जो प्राचीनतम ज्ञात मंदिर संरचनाएँ हैं। ये संरचनाएं गुप्त एवं मौर्य काल की हैं। इन्हें उत्तर भारतीय मंदिर स्थापत्य शैली की पूर्वतर कोपलें कहा जा सकता है।

मंदिर क्रमांक १८  एक गजपृष्ठाकार मंदिर है। ७वीं सदी में निर्मित यह मंदिर एक ऊँचे जगती एवं १२ स्तंभों पर स्थापित रहा होगा। अजंता एल्लोरा गुफाओं के भीतर आपने जो चैत्य गृह देखे थे, उसकी क्षणिक झांकी आप यहाँ भी देख सकते हैं।

मंदिर क्रमांक १७ में गर्भगृह का आकार चौकोर है। उसकी छत सपाट है तथा समक्ष एक द्वारमंडप है। द्वारमंडप के स्तंभों पर सिंह चतुर्भुज अथवा Lion Capital हैं। द्वार के चौखटों पर पुष्पाकृतियाँ उत्कीर्णित हैं। मैंने इस प्रकार के उत्कीर्णन इसी कालावधि में निर्मित महाराष्ट्र के नागपुर में स्थित रामटेक मंदिर में भी देखा था। इसमें गुप्त काल की स्थापत्य शैली का आभास होता है।

मंदिर क्रमांक ६ मंदिर क्रमांक १७ के ही समान है।

३१ क्रमांक का मंदिर आयताकार है। स्तंभों से सज्ज इस मंदिर की छत सपाट है। इसके भीतर जो बुद्ध की प्रतिमा है, वह इस मंदिर की प्रतीत नहीं होती है।

मंदिर क्रमांक ४० में ३री सदी से ८वीं सदी के मध्यकाल में पल्लवित तीन विविध राजवंशों की स्थापत्य शैली दृष्टिगोचर होती है।

यात्रा सुझाव

यह यूनेस्को द्वारा घोषित एक विश्व धरोहर स्थल है। अतः स्वाभिक रूप से इसका उत्तम रखरखाव किया गया है। चारों ओर उत्तम रूप से अनुरक्षित घास के अप्रतिम मैदान हैं। सभी स्तूपों एवं मंदिरों पर सुनियोजित रूप से संख्यांकन किया गया है।

स्तूपों एवं मंदिरों की जानकारी प्रदान करने के लिए परिदर्शकों अथवा गाइड की सुविधाएँ उपलब्ध हैं। हमारा सौभाग्य था कि हमें ऐसा परिदर्शक प्राप्त हुआ जो पुरातत्व विज्ञान का छात्र था। उसने हमें इस स्थल की अनेक सूक्ष्मताओं के विषय में विस्तार से बताया। साँची के इस विश्व धरोहर स्थल के विषय में विस्तृत रूप से जानने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संचालित विश्व धरोहर श्रंखला सर्वोत्तम साधन है।

मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग का गेटवे रिट्रीट नामक विश्राम गृह इस धरोहर स्थल के निकट स्थित है। आप इस होटल से धरोहर स्थल तक पदभ्रमण द्वारा आसानी से पहुँच सकते हैं। प्रातःकालीन पदभ्रमण के लिए भी आप होटल से स्तूपों तक जा सकते हैं।

सभी स्तूप खुले आकाश में स्थित है। भारत के मैदानी क्षेत्रों की कड़कती धूप से आप भलीभांति अवगत होंगे। अतः प्रातःकाल उनका अवलोकन करना सर्वोत्तम है। उसी प्रकार सूर्यास्त का समय भी स्तूपों के अवलोकन के लिए उत्तम है। इससे आप दिवस भर की चिलचिलाती धूप से बच सकते हैं।

आप चाहें तो इन स्तूपों को सूर्य की किरणों के नीचे भी देख सकते हैं। सूर्य की किरणों में यह स्तूप चन्दन के काष्ठ से निर्मित प्रतीत होता है।

स्तूपों के तथा उनके साथ अपने छायाचित्र लेने के लिए भी सूर्योदय एवं सूर्यास्त काल सर्वोत्तम होता है। इस कालावधि में चारों ओर छायी निस्तब्धता चित्तभेदक प्रतीत होती है। प्रातःकाल के समय सौभाग्य से आपको बड़ी संख्या में मोर के दर्शन भी प्राप्त हो सकते हैं।

पहाड़ी पर खड़े होकर आपको नीचे से जाती रेलगाड़ी की ध्वनि सुनाई देगी एवं वह दिखाई भी देगी। यदि आप रेलगाड़ी द्वारा दिल्ली से भोपाल की ओर जा रहे हैं तो आपको अपनी बायीं ओर ये स्तूप दृष्टिगोचर होंगे। विदिशा रेल स्थानक पार करते ही आप अपनी बायीं ओर की खिड़की से बाहर की ओर देखते रहें।

साँची स्तूप का भ्रमण व अवलोकन करने के लिए यदि आप वायु मार्ग द्वारा पहुँचना चाहते हैं अथवा रेल यात्रा करना चाहते हैं तो निकटतम विमानतल तथा रेल स्थानक, दोनों भोपाल में है। भोपाल देश के अन्य स्थानों से रेल मार्ग तथा सड़क मार्ग द्वारा सुगम रूप से सम्बद्ध है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post बुद्ध के अवशेष संरक्षित करता साँची का भव्य स्तूप appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/sanchi-stupa-vishwa-dharohar-madhya-pradesh/feed/ 0 3508
चित्तौड़गढ़ दुर्ग के मंदिर – मीरा बाई की भक्ति स्थली https://inditales.com/hindi/chittorgarh-durg-prachin-mandir/ https://inditales.com/hindi/chittorgarh-durg-prachin-mandir/#comments Wed, 12 Jul 2023 02:30:06 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3102

चित्तौड़गढ़ दुर्ग के भीतर अनेक मंदिर हैं जो दुर्ग में चारों ओर बिखरे हुए हैं। दुर्ग के भीतर ऐसा कोई स्थान नहीं है जहाँ मंदिर नहीं है। मुझे स्मरण नहीं कि मैं चित्तौड़गढ़ दुर्ग में कहीं खड़ी हूँ तथा मुझे चित्तौड़गढ़ दुर्ग के मंदिर दृष्टिगोचर नहीं हो रहे हैं। हमें सदा ऐसा ही प्रतीत होता […]

The post चित्तौड़गढ़ दुर्ग के मंदिर – मीरा बाई की भक्ति स्थली appeared first on Inditales.

]]>

चित्तौड़गढ़ दुर्ग के भीतर अनेक मंदिर हैं जो दुर्ग में चारों ओर बिखरे हुए हैं। दुर्ग के भीतर ऐसा कोई स्थान नहीं है जहाँ मंदिर नहीं है। मुझे स्मरण नहीं कि मैं चित्तौड़गढ़ दुर्ग में कहीं खड़ी हूँ तथा मुझे चित्तौड़गढ़ दुर्ग के मंदिर दृष्टिगोचर नहीं हो रहे हैं। हमें सदा ऐसा ही प्रतीत होता रहता है कि चित्तौड़गढ़ के मंदिर यहाँ के जनजीवन का अभिन्न अंग रहे होंगे।

चित्तौड़गढ़ दुर्ग के मंदिर
चित्तौड़गढ़ दुर्ग के मंदिर

मेरे चित्तौड़गढ़ पहुँचने से पूर्व मीरा बाई का मंदिर देखने की मेरी तीव्र अभिलाषा थी क्योंकि मैंने कृष्ण के प्रति उनकी भक्ति एवं समर्पण की अनेक गाथाएँ पढ़ी थीं। वह स्थान कितना अद्भुत होगा जहाँ उन्होंने कृष्ण के अनेक भजन रचे, गाये तथा उन पर नृत्य किये थे। इसके अतिरिक्त मैंने चित्तौड़गढ़ में किसी अन्य मंदिर की कल्पना भी नहीं की थी। किन्तु यहाँ आने के पश्चात मुझे ज्ञात हुआ कि मीरा बाई का मंदिर चित्तौड़गढ़ के अनेक अप्रतिम मंदिरों में से एक मंदिर है तथा यहाँ स्थित सभी मंदिरों की अपनी अपनी अद्भुत गाथाएँ हैं।

चित्तौड़गढ़ में जितने जैन मंदिर हैं, उतने ही हिन्दू मंदिर भी हैं। चित्तौड़गढ़ में राजसी धरोहर के अतिरिक्त अनेक ऐसे जीवंत मंदिर हैं जहाँ आपको उनके पुरातन आविर्भाव के साथ साथ विभिन्न समयकाल से होते हुए उनकी यात्रा का प्रतिबिम्ब दिखाई देगा।

चित्तौड़गढ़ दुर्ग के मंदिर

समाधिश्वर शिव मंदिर

भगवान शिव को समर्पित ११वीं सदी के इस मंदिर में शिव अपने त्रिमूर्ती अवतार में विराजमान हैं। यह मंदिर अनुमानतः इस संकुल के प्राचीनतम मंदिरों में से एक है। गोमुख कुण्ड से लगे हुए इस मंदिर का शिखर शुण्डाकार है जो हम सामान्यतः जैन मंदिरों में देखते हैं।

गौमुख कुंड
गौमुख कुंड

मंदिर का आधार उलटे कमल के आकार का है। उसके ऊपर स्थित एक पटल पर मानव जीवन की कथा उत्कीर्णित है। मंदिर की शिलाओं पर उनकी आयु तथा सदियों से होते हुए जलवायु के प्रभाव के चिन्ह स्पष्ट दृष्टिगोचर होते हैं। इसके पश्चात भी शिलाओं पर उत्कीर्णित कथाओं के माध्यम से शिल्पकार के हाथों की कला आश्चर्यचकित कर देती है।

समाधीश्वर मंदिर की शिव मूर्ति
समाधीश्वर मंदिर की शिव मूर्ति

इस मंदिर की विशेषता है, त्रिमूर्ति रूप में भगवान शिव की विशाल प्रतिमा। मंदिर के भीतर इस प्रतिमा का चित्र लेना प्रतिबंधित नहीं है। जब आप इस छोटे से मंदिर के भीतर खड़े होंगे तो आपको सदियों की भक्ति से परिपूर्ण इसकी भित्तियों में इसकी पुरातनता का अनुभव होगा। आप मंदिर की भीतरी भित्तियों पर यंत्र एवं अभिलेख देख सकते हैं। किन्तु उनके विषय में जानकारी प्रदान करने वाला तथा उन अभिलेखों को पढ़कर बताने वाला वहाँ कोई नहीं था। मुझे विश्वास है कि उन अभिलेखों में मंदिर के इतिहास की घटनाओं से परिपूर्ण गाथाओं का उल्लेख होगा।

समाधीश्वर मंदिर के भित्ति शिल्प
समाधीश्वर मंदिर के भित्ति शिल्प

किसी भी शिव मंदिर के समान यहाँ भी मंदिर के समक्ष एक मुक्त प्रांगण में एक छोटा सा नंदी मंदिर है।

इस मंदिर के चारों ओर अनेक छोटे-बड़े मंदिर बिखरे हुए हैं किन्तु उनमें से अधिकाँश जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं।

कुम्भास्वामी वराह मंदिर

कुम्भास्वामी मंदिर चित्तौड़गढ़ दुर्ग परिसर के भीतर स्थित सर्वोत्तम रीति से संरक्षित मंदिरों में से एक है। यह विलक्षण मंदिर भगवान विष्णु के वराह अवतार को समर्पित है। इस मंदिर का निर्माण लगभग १६वीं सदी में किया गया था। ठेठ उत्तर भारतीय नागर शैली स्थापत्य कला में निर्मित इस मंदिर में चारों ओर अद्भुत शिल्पकारी की गयी है। मंदिर के मंडप के ऊपर शुण्डाकार छत है, वहीं गर्भगृह के ऊपर उंचा शिखर है। गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ है। इनकी भित्तियों पर भी सूक्षमता से भव्य शिल्पकारी की गयी है।

चित्तोड़गढ़ दुर्ग का कुम्भास्वामी मंदिर
चित्तोड़गढ़ दुर्ग का कुम्भास्वामी मंदिर

गर्भगृह के पिछवाड़े में वराह अवतार की प्रतिमा है। मुख्य गर्भगृह में कृष्ण एवं बलराम की नवीन प्रतिमाएं स्थापित की गयी हैं। इन प्रतिमाओं को रंगबिरंगे वस्त्रों द्वारा समकालीन रीति से सज्जित किया है।

कुम्भास्वामी मंदिर में वराह मूर्ति
कुम्भास्वामी मंदिर में वराह मूर्ति

इस मंदिर की एक रोचक विशेषता है, मंदिर के समक्ष स्थित गरुड़ मंडप। सामान्यतः शिव मंदिर में भगवान शिव के समक्ष नंदी मंडप अवश्य होता है।

कुम्भास्वामी मंदिर का गर्भगृह
कुम्भास्वामी मंदिर का गर्भगृह

विष्णु मंदिरों के समक्ष हम गरुड़ ध्वज अवश्य देखते हैं किन्तु मुझे स्मरण नहीं कि इससे पूर्व मैंने किसी मंदिर में इस प्रकार का समर्पित गरुड़ मंडप देखा होगा।

मीरा बाई मंदिर

मीरा बाई का मंदिर एक छोटा सा मंदिर है जो कुम्भास्वामी मंदिर परिसर के एक कोने में स्थित है। इसके भीतर मीरा बाई की विशाल समकालीन प्रतिमा है जिसमें उन्होंने केसरिया साड़ी धारण की हुई है। एक हाथ से इकतारा बजाते हुए कृष्ण भक्ति में तल्लीन। हमने बालपन से मीरा बाई एवं उनकी कृष्ण भक्ति की अनेक कथाएं पढ़ी हैं।

मीरा बाई का मंदिर
मीरा बाई का मंदिर

भक्ति में तल्लीन होकर वे नृत्य करती हुई कृष्ण भजन गाती थीं। किन्तु मंदिर को देख कर किंचित निराशा होती है क्योंकि इसके लिए मंदिर अत्यंत छोटा प्रतीत होता है। कदाचित यह मंदिर केवल मीराबाई एवं उनकी भक्ति के लिए ही निर्मित किया गया होगा। कदाचित वे स्वयं एकांत में ही भजन गाया करती थीं तथा उसके संगीत में झूमती थीं।

कृष्ण और मीरा
कृष्ण और मीरा

मंदिर में बैठकर मैं भोंपू में बज रहे मीराबाई के भजनों को सुनने लगी। पुजारीजी दर्शनार्थियों से वार्तालाप कर रहे थे। मंदिर के सम्पूर्ण वातावरण में मैं मीराबाई एवं उनकी भक्ति को ढूँढने लगी, उन्हें अनुभव करने का प्रयास करने लगी, किन्तु व्यर्थ। मुझे मंदिर के भीतर मीराबाई की उपस्थिति का अनुभव नहीं हुआ। सम्पूर्ण मंदिर में भक्ति की छवि मुझे केवल एक वृद्धा में दृष्टिगोचर हुई जो मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर दान की आस में भजन गा रही थी।

मंदिर के समक्ष उनके गुरु को समर्पित एक स्मारक है। किन्तु उनके गुरु कौन थे, इस विषय में वहाँ कोई जानकारी प्रदर्शित नहीं थी।

सात-बीस जैन मंदिर

सात बीस जैन मंदिर
सात बीस जैन मंदिर

कुम्भास्वामी मंदिर के ठीक समक्ष सात-बीस जैन मंदिर स्थित है। आप सोच रहे होंगे कि यह सात-बीस क्या है! सात-बीस का अर्थ है, २७। इस एक भव्य मंदिर के भीतर २७ छोटे मंदिर हैं। यह मंदिर दिखने में रणकपुर के जैन मंदिर के समान प्रतीत होता है किन्तु यह उससे २०० वर्ष प्राचीन है। यह मंदिर सभी जैन तीर्थंकरों को समर्पित है।

सात बीस मंदिर के द्वार
सात बीस मंदिर के द्वार

एक मंदिर मध्य में है जिसके तीन ओर अन्य २६ मंदिर स्थित हैं। प्रत्येक मंदिर के द्वार चाँदी के हैं जिन पर भव्य उत्कीर्णन किया गया है। मैंने कुछ द्वारों पर किये गए उत्कीर्णनों को सूक्ष्मता से देखने का प्रयास किया। उन पर मुख्य रूप से शुभ चिन्ह उत्कीर्णित हैं। साथ ही उस तीर्थंकर की छवि उत्कीर्णित है जिनको यह मंदिर समर्पित है।

मंदिर के भीतर केवल उस तीर्थंकर की छोटी अथवा मध्यम आकार की प्रतिमा स्थापित है। इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं। मुख्य मंदिर की भीतरी छत पर सूक्ष्मता से इतना सुन्दर व जटिल उत्कीर्णन किया गया है कि आप उसमें खो से जाते हैं। गोलाकार छत पर चारों ओर नृत्य करती नृत्यांगनाओं के शिल्प हैं जो शीर्ष तक जाते हैं।

सात बीस जैन मंदिर की छत
सात बीस जैन मंदिर की छत

किसी भी ठेठ मंदिर शैली में एक एकल शिखर होता है। इसके विपरीत इस मंदिर में शिखरों की एक पूर्ण पंक्ति है। मेरे अब तक के देखे असंख्य मंदिरों में मैं इस मंदिर को सर्वाधिक स्वच्छ मंदिरों में से एक कह सकती हूँ। मुझे धूल का एक कण भी दृष्टिगोचर नहीं हुआ। इस मंदिर में नंगे पाँव घूमना मुझे अत्यंत आनंददायी प्रतीत हुआ।

इस मंदिर में छायाचित्रीकरण पर पाबंदी नहीं है, केवल भगवान के विग्रह का चित्र लेने की अनुमति नहीं है।

मुख्य मंदिर के पीछे दो लघु मंदिर हैं।

गाँव

इस धरोहरी क्षेत्र से आगे जाकर मैंने गाँव की ओर चलना आरम्भ किया। मैंने नगीना बाजार एवं मोती बाजार पार किये जो बाजार ना होते हुए छोटी दुकानें हैं। जब मैं इस क्षेत्र से जा रही थी तो मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि यह क्षेत्र कदाचित प्रजा के गाँव एवं राजघराने के महलों के मध्य एक अवरोध क्षेत्र रहा हो। यह बाजार क्षेत्र कदाचित दोनों क्षेत्रों का मध्यवर्ती क्षेत्र होते हुए उनका संगम बिंदु रहा हो तथा राज परिवार एवं उनकी प्रजा के दैनन्दिनी आवश्यकताओं की आपूर्ती में सहायक रहा हो।

चितौडगढ़ दुर्ग के गाँव
चितौडगढ़ दुर्ग के गाँव

मैं गाँव की संकरी गलियों में पद भ्रमण करने लगी। वहाँ कुछ मंदिरों के दर्शन किये जिनका सभी प्रबंधन ब्राह्मण परिवार कर रहे थे। इन लघु मंदिरों में अनवरत जीवन के लक्षण स्पष्ट दृष्टिगोचर होते हैं। यद्यपि कुछ मंदिरों में मैंने शिखरों के स्थान पर गुम्बजों को देखा। किसी के पास इस प्रश्न का उत्तर नहीं था कि यह कैसे हुआ।

जानकी मंदिर
जानकी मंदिर

मेरा अनुमान है कि यह परिवर्तन मंदिर के रखरखाव अथवा जीर्णोद्धार के समय किया गया होगा। अथवा यह परिवर्तन उस काल में किया गया होगा जब यह दुर्ग इस्लामी शासकों के अधीन आ गया था।

उत्कृष्ट कला समेटे हुए चित्तौडगढ दुर्ग के मंदिर
उत्कृष्ट कला समेटे हुए चित्तौडगढ दुर्ग के मंदिर

मंदिर को उनके आक्रमणों से बचाने के लिए कदाचित भक्तों ने शिखर के स्थान पर गोलाकार छत बना दी होगी। मंदिर एवं आवासों की बाह्य भित्तियों पर मुझे नवीन रंगरोगन दिखाई दिए।

सास-बहू मंदिर

एक अन्य स्थान पर दो मंदिर एक दूसरे के ठीक समक्ष स्थित हैं। उन्हें सास-बहू मंदिर कहते हैं। इनकी विशेषता यह है कि किसी भी मंदिर के भीतर से दोनों मंदिर दिखाई देते हैं। मंदिरों का एक अन्य जोड़ा भी है जो दुर्गा एवं अन्नपूर्णा देवी को समर्पित है। मंदिर के दैनन्दिनी रखरखाव का कार्यभार संभालती कुछ स्त्रियों से मैंने वार्तालाप किया। उन्हें इन मंदिरों की पुरातनता एवं निर्माण काल आदि के विषय में कोई रूचि नहीं थी। वे केवल यह मानती हैं कि ये मंदिर सदा से यहीं स्थित हैं।

वे केवल एक ही तथ्य पर लक्ष्य केन्द्रित कर रही थीं कि मंदिर की सभी संस्कारों एवं अनुष्ठानों का परंपरानुसार पालन हो रहा है कि नहीं हो रहा है। वे भगवान को माँ कहकर पुकार रही थीं। उनका दृढ़ विश्वास था कि देवी माँ उनके जीवन की रक्षा करेंगी तथा उन्हें जीवन में मार्ग दिखाएंगी। अन्नपूर्ण माँ सदा उनकी भोजन की थाली भरी रखेंगी तथा दुर्गा माँ सभी प्रकार के संकटों से उनका रक्षण करेंगी। उनके शब्द सुनकर मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि जो मैं मंदिरों में विभिन्न चिन्हों के अर्थ ढूंढती घूम रही थी तथा मंदिर की पुरातनता को जानने का प्रयास कर रही थी, वह सब कितना अर्थहीन है। यह तो भक्तों की मंदिरों व भगवान पर अपार श्रद्धा एवं अटूट विश्वास है जो मंदिर एवं भगवान को इतना शक्तिशाली व प्रभावशाली बनाता है।

रत्नेश्वर महादेव मंदिर

रतनसिंह महल के समीप मैंने एक छोटा सा किन्तु अत्यंत सुन्दर रत्नेश्वर महादेव मंदिर देखा। एक जलकुंड के निकट स्थित इस मंदिर को अप्रतिम रूप से उत्कीर्णित किया गया है। राम पोल के समीप मैंने जैसे ही जानकी मंदिर को देखा, मैं तुरंत ही गिनने लगी कि मैंने अब तक कितने मंदिर देखे जो देवी सीता को समर्पित हों। मेरी स्मृतियों में केवल नासिक का पंचवटी ही उभर कर आया।

रत्नेश्वर महादेव मंदिर - चित्तौडगढ दुर्ग
रत्नेश्वर महादेव मंदिर – चित्तौडगढ दुर्ग

कुम्भा महल के समक्ष स्थित एक उद्यान में मैंने कई लघु मंदिर देखे जिन पर गोलाकार छत थे। इन सभी मंदिरों के द्वारों पर ताले लगे हुए थे। इसलिए मैं केवल इनकी बाह्य भित्तियों पर की गयी सुन्दर शिल्पकारी की ही सराहना कर सकी।

अन्नपूर्णा मंदिर
अन्नपूर्णा मंदिर

इन मंदिरों के भ्रमण के समय मुझसे कालिका देवी मंदिर का दर्शन छूट गया। किसी काल में वह सूर्य मंदिर था जो कालांतर में देवी मंदिर में परिवर्तित हो गया है।

चित्तौड़गढ़ दुर्ग वास्तव में एक छोटी सी मंदिर नगरी ही है। इसके भीतर लगभग सभी प्रमुख हिन्दू देवी-देवताओं के मंदिर हैं। भारत में अचंभों की कोई कमी नहीं है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post चित्तौड़गढ़ दुर्ग के मंदिर – मीरा बाई की भक्ति स्थली appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/chittorgarh-durg-prachin-mandir/feed/ 1 3102
पेट्रा जॉर्डन – विश्व का अनोखा अचम्भा यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल https://inditales.com/hindi/petra-prachin-nagari-jordan/ https://inditales.com/hindi/petra-prachin-nagari-jordan/#comments Wed, 24 Aug 2022 02:30:39 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2771

पेट्रा जॉर्डन अथवा पेत्रा जॉर्डन – जब जॉर्डन देश के पर्यटन विभाग ने मुझे अपने देश में भ्रमण करने का आमंत्रण दिया था तब मैं इस धरोहर स्थल के विषय में जो जानती थी, वह था केवल उसका नाम। किन्तु एक विश्व धरोहर स्थल होने के कारण मेरी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं था। कुछ छायाचित्र […]

The post पेट्रा जॉर्डन – विश्व का अनोखा अचम्भा यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल appeared first on Inditales.

]]>

पेट्रा जॉर्डन अथवा पेत्रा जॉर्डन – जब जॉर्डन देश के पर्यटन विभाग ने मुझे अपने देश में भ्रमण करने का आमंत्रण दिया था तब मैं इस धरोहर स्थल के विषय में जो जानती थी, वह था केवल उसका नाम। किन्तु एक विश्व धरोहर स्थल होने के कारण मेरी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं था। कुछ छायाचित्र देखने के पश्चात गुलाबी रंग के स्तंभों की मनमोहक छवि ने मन-मस्तिष्क में कौतूहल उत्पन्न कर दिया था. मैं जान गयी थी कि क्यों पर्यटक पेट्रा जॉर्डन की यात्रा के लिए लालायित रहते हैं।

पेट्रा - जॉर्डन का प्राचीन नगर
पेट्रा – जॉर्डन का प्राचीन नगर

हम इस स्थान का अवलोकन करने के लिए इतने उत्सुक थे कि हमने हमारे गाइड से प्रातः अति शीघ्र प्रस्थान करने का प्रस्ताव दिया, ताकि हमें उस गुलाबी बलुआ पाषणों की नगरी को निहारने के लिए कुछ अतिरिक्त घंटे मिलें, जो दीर्घ काल तक एक लुप्त नगरी थी।

पेट्रा जॉर्डन का भ्रमण

हमारा गाइड कदाचित हमारे जैसे अति उत्साही पर्यटकों से अभ्यस्त था। उसने हमें बातों व कथाओं में उलझाकर यह सुनिश्चित कर लिया कि हम उसके द्वारा नियोजित समय पर ही अम्मान से निकलें। तकनीकी रूप से पेट्रा म’आन प्रांत के शोबक गाँव के अंतर्गत आता है। यह जॉर्डन के दक्षिणी भाग में स्थित है। राजधानी अम्मान से यहाँ तक पहुँचने के लिए लगभग ३-४ घंटों की सड़क यात्रा करनी पड़ती है।

पेट्रा की प्रथम झलक – नाबातियन की खोई नगरी

चौकोर कटे हुए मकबरे
चौकोर कटे हुए मकबरे

पेट्रा पहुँचते पहुँचते दोपहर होने को थी। हमने प्रवेश टिकट क्रय किया जिसका मूल्य ९० जॉर्डन दीनार प्रतिव्यक्ति था। उस समय १ जॉर्डन दीनार का भारतीय मूल्य १०० रुपये था। हम स्तब्ध थे क्योंकि यह मेरे द्वारा  अवलोकित यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों के प्रवेश शुल्कों में अब तक का सर्वाधिक शुल्क था। धरोहर स्थल के प्रवेश द्वार पर पहुँचने का रोमांच अपनी चरम सीमा पर था। प्रवेश द्वार से भीतर जाते हुए हमें आशा थी कि हमें कुछ अद्भुत स्मारकों के दर्शन होंगे। यद्यपि, पूर्व में यहाँ का भ्रमण किये हुए मेरे कुछ मित्रों ने मुझे सावधान कर दिया था कि मुझे लम्बी दूरी तक पैदल चलने के लिए मानसिक व शारीरिक रूप से सज्ज रहना पड़ेगा। किन्तु मेरे समक्ष तो एक विशाल विस्तृत नगर था। हम उबड़-खाबड़ मार्ग पर चलते हुए आगे बढ़े। हमारे दोनों ओर उत्कीर्णित पहाड़ थे। वास्तव में वे चौकोर मकबरे थे जिन्हें पहाड़ियों को काटकर बनाया गया था। उन पर शुभ शकुन एवं चिन्ह उत्कीर्णित व चित्रित थे। उत्कीर्णन अब भी शेष हैं किन्तु चित्र अब धुंधले पड़ चुके हैं।

पेट्रा के चट्टानी पहाड़
पेट्रा के चट्टानी पहाड़

यहाँ-वहाँ जाते रंगबिरंगे तांगे उस नीरस परिवेश को रंगों से सजा रहे थे। वे उन लोगों को ले जा रहे थे जो पैदल चलना टालना चाहते थे। हम लगभग १ किलोमीटर तक संकीर्ण घाटी के मध्य से चलकर सिक नामक स्थान पर पहुंचे। यह गुलाबी-लाल रंग की नगरी है। हमारे गाइड ने इस विश्व धरोहर स्थल के इतिहास की जानकारी देना आरम्भ किया। उसने यह भी बताया कि इसका बाइबल में भी उल्लेख किया गया है, जिसका अर्थ है कि यह उस काल में एक जीवंत नगर था। पेट्रा एक यूनानी शब्द पेट्रोस से लिया गया है जिसका अर्थ है चट्टानें। इस नगरी के दर्शनोपरांत आप भी यह मानेंगे कि इस नगरी का पेट्रा से अधिक उपयुक्त नाम नहीं हो सकता।

पेट्रा मुख्य रूप से नाबातियन नामक प्राचीन लोगों द्वारा बसाई गयी थी जिस पर कालान्तर में रोमन साम्राज्य ने आधिपत्य स्थापित कर लिया था। ७वीं शताब्दी में रोमन साम्राज्य द्वारा त्याग देने के पश्चात यह एक लुप्त नगर बन गया था। सन् १८१२ में एक स्विस खोजकर्ता जोहान्न लुडविग ने इसकी पुनः खोज की थी। गुलाबी रंग की चट्टानों के कारण इसे “रोज़ सिटी” अर्थात् गुलाबी नगरी कहा जाता है। इसे “लॉस्ट सिटी” अर्थात् खोई नगरी भी कहा जाता है क्योंकि अनेक सदियों तक यह नगरी विश्व की दृष्टी से लुप्त थी।

नाबातियन सभ्यता की राजधानी

पेट्रा नाबातियन सभ्यता की राजधानी थी। उस समय इसकी शोभा अपनी चरम सीमा पर थी। इतिहासकारों का मानना है कि इस धरोहर नगरी का इतिहास लगभग ३१२ ईसा पूर्व में आरम्भ हुआ था। यहाँ नाबातियन की व्यापारिक जनजाति निवास करती थी। दक्षिण के अरब, मृत सागर के किनारे स्थित मिस्त्र के अरब एवं प्राचीन रोमवासियों से उनके व्यापारिक सम्बन्ध थे। ऐतिहासिक साहित्यों में यहाँ से भारत तक के व्यापारिक मार्गों का भी उल्लेख में किया गया है। नाबातियन जनजाति मूलतः अरबी मूल के निवासी हैं। वे दुशरा नामक भगवान की आराधना करते थे जो ग्रीको-रोमन पौराणिकी के जूस अथवा जुपिटर के समकक्ष है। वे ग्रीस की प्रेम की देवी एफ्रोडाईट की समकक्ष एक देवी की भी आराधना करते थे। जूस के समान दुशरा भी समीप स्थित पर्वत पर निवास करते थे। मुझे अनायास ही स्मरण हो आया कि हमारे देवी-देवताओं को भी पर्वतों पर निवास करना भाता है, जैसे भगवान शिव कैलाश पर्वत पर निवास करते हैं।

चट्टानों को काट कर बनाये मकबरे
चट्टानों को काट कर बनाये मकबरे

नाबातियन जनजाति के लोग यहाँ १०६ ईसवी तक निवास करते रहे। तदनंतर रोमन साम्राज्य ने यहाँ अधिपत्य स्थापित कर लिया। यहाँ किये गए उत्खननों में नाबातियन चिन्हों के साथ साथ रोमन वसाहत के अंश भी प्राप्त हुए हैं। इस संकुल में गिरिजाघरों की उपस्थिति यह दर्शाती है कि नाबातियन जनजाति के निवासियों ने ईसाई धर्म अपनाया था जो संभवतः प्रथम ईसवी के आरम्भ में हुआ था।

सिक

पेट्रा का सिक
पेट्रा का सिक

कच्चे मार्ग पर पैदल चलते हुए लगभग एक किलोमीटर की दूरी पार करने के पश्चात आप पहाड़ी का ग्रैंड कैनयन सदृश द्विभाजन देखेंगे। ऐसा प्रतीत होता है मानो हमारा मार्ग प्रशस्त करने के लिए पहाड़ी दो भागों में विभक्त हो गयी हो। वास्तव में एक भयंकर भूकंप के फलस्वरूप यह पहाड़ी प्राकृतिक रूप से विभाजित हो गयी है। इसे ध्यानपूर्वक देखने पर आपको आभास होगा कि यदि आप पहाड़ी के दोनों भागों को जोड़ने का प्रयास करें तो ये दोनों मिलकर एक पूर्ण पहाड़ी का रूप ले लेंगे, मानो वे किसी पहेली के दो टुकडें हों।

सिक - चट्टानों के बीच से जाता मार्ग
सिक – चट्टानों के बीच से जाता मार्ग

पहाड़ी के दोनों भागों के मध्य स्थित गली लगभग ८०० मीटर लम्बी है। इस गली की एक अनूठी विशेषता है। पहाड़ी के दोनों भागों के मध्य गली अत्यंत संकरी है तथा पहाड़ी ऊंची है। अतः सूर्य का प्रकाश ऊपर से इस गली में एक संकरी पट्टी के रूप में प्रवेश करता है तथा चट्टानों को प्रकाशित करता है। इसके कारण, भूमि पर खड़े होकर हमें सूर्य तो दृष्टिगोचर होता है किन्तु उसकी उष्मा का आभास नहीं होता। अतः यह प्राकृतिक गलियारा इस धरोहर नगरी का सर्वाधिक शीतल भाग है।

मत्सयाकर में चट्टान
मत्सयाकर में चट्टान

इस क्षेत्र में अनेक प्राकृतिक संरचनाएं हैं जो आश्चर्यचकित कर देती हैं। जैसे एक स्थान पर चट्टान का प्राकृतिक आकार मछली के मुख के समान प्रतीत होता है। यहाँ अनेक मानव-निर्मित शिल्प हैं जिन्हें देखने के पश्चात आप उन्हें अवश्य सराहेंगे। जैसे यहाँ एक वेदिका है जिसकी भित्तियों पर आकृतियाँ उत्कीर्णित हैं। मेरे अनुमान से वे आकृतियाँ उन देवी-देवताओं की हैं जिनकी यहाँ वंदना की जाती थी। यदि मैं उन सभी आकृतियों की पृष्ठभागीय कथाएँ व जानकारियाँ जान पाती तो मुझे संतुष्टि होती। किन्तु सीमित समयावधि के कारण प्रत्येक शिल्प से सम्बंधित जानकारी एकत्र करना संभव नहीं था। मुझे आश्चर्य हुआ कि इतना लोकप्रिय पर्यटन स्थल होते हुए भी इसके विषय में इन्टरनेट में अत्यंत सीमित प्रलेखन उपलब्ध है।

ऐसी मान्यता है कि नाबातियन निवासी इस संकरी प्राकृतिक गली का प्रयोग अपनी सुरक्षा हेतु करते थे। यह संकरी गली नगरी में प्रवेश हेतु एकमात्र मार्ग होने के कारण वे अपनी सुरक्षा की ओर आश्वस्त रहते थे। आक्रमणकारियों के लिए संकरी लम्बी गली के द्वारा नगरी में प्रवेश करना एवं आक्रमण करना आसान नहीं होता था।

पेट्रा जॉर्डन का जल प्रबंधन

जल प्रवाह के साधन
जल प्रवाह के साधन

सिक में विचरण करते समय वहां के एक तत्व पर अवश्य ध्यान दीजिये। आप उन्हें देख आश्चर्यचकित रह जायेंगे। भित्तियों के दोनों ओर जलवाहिकाएं बनी हुई हैं। एक लाल पकी मिट्टी अर्थात् टेराकोटा में निर्मित है जो पेयजल प्राप्त करने के लिए छलनी का कार्य करती है। दूसरी चूना मिट्टी द्वारा निर्मित है। एक मरुस्थल का भाग होते हुए भी यहाँ दीर्घकाल तक मानवी वसाहत की उपस्थिति का श्रेय इस जल प्रबंधन प्रणाली को ही जाता है। इस स्थान के जल प्रबंधन प्रणाली का एक विस्तृत अवलोकन किसी वैज्ञानिक खोज से कम नहीं है। ऐसा कहा जाता है कि वर्ष भर में यहाँ केवल ६ इंच वर्षा होती थी जिसके जल का प्रबंधन इतनी कुशलता से किया था कि यहाँ के निवासियों को वर्ष भर जल की आपूर्ति हो जाती थी। इससे मुझे प्राचीन भारत के जल प्रबंधन प्रणालियों का स्मरण हो आया, जैसे रानी की वाव तथा सहस्त्रलिंग तलाव

पेट्रा राजकोष

पेट्रा का विश्व प्रसिद्द राजकोष
पेट्रा का विश्व प्रसिद्द राजकोष

राजकोष स्मारक इस भव्य पेट्रा की वास्तविक पहचान है। सिक के दूसरी ओर यह प्रथम स्मारक है। संकरी गली से जाते समय ही आपके समक्ष गुलाबी रंग के कुछ स्तम्भ प्रकट होने लगते हैं। जैसे आप उसके निकट जायेंगे, आप स्वयं को एक भव्य अग्रभाग आपके समक्ष पायेंगे। मेरे लिए यह एक स्वप्न के पूर्ण होने का आभास था। गुलाबी रंग के बलुआ पत्थर में उत्कीर्णित वह संरचना ग्रीक-रोमन शैली के मंदिर सदृश प्रतीत हो रही थी। किन्तु वह केवल अग्रभाग था। स्थानीय बदू अथवा बदूईन अरब जनजाति ने अनुमान लगाया कि उस भव्य अग्रभाग के पीछे अवश्य ही अपार संपत्ति संचित कर रखी गयी होगी। अतः उन्होंने उसे राजकोष कहना आरम्भ कर दिया। वास्तव में वह राजकोष ना होते हुए किसी प्रमुख नाबातियन राजा का मकबरा है। उसी प्रकार अन्य उत्कीर्णित अग्रभाग भी किसी महत्वपूर्ण व्यक्तियों के मकबरे हैं। राजकोष के निकट जाकर आप नीचे अनेक मकबरे देख सकते हैं।

अधिकांश प्राचीन सभ्यताएं मृत्यु पश्चात पुनर्जन्म में विश्वास रखती हैं तथा आत्माओं को आगामी जीवन में स्थानांतरित करने के अनेक अनुष्ठान करती हैं। इस के विपरीत, नाबातियन जनजाति मृत्यु पश्चात स्वर्ग अथवा नर्क की प्राप्ति में आस्था रखती है। प्रत्येक मकबरे के ऊपर काक पंजो के चिन्ह उत्कीर्णित हैं जो नाबातियन आस्थाओं के अनुसार स्वर्ग अथवा नरक ले जाने का साधन हैं। राजकोष समेत अन्य प्राकृतिक संरचनाओं के अग्रभागों को एलोरा की कैलाश गुफा के समान ऊपर से नीचे की ओर उकेरा गया है। जिस प्रकार हमें अजंता की गुफाओं की निर्माण पद्धति के विषय में आवश्यक जानकारी अपूर्ण गुफाओं से प्राप्त हुई थी, पुरातत्वविदों ने खोज की कि इन अग्रभागों का उत्कीर्णन भी ऊपर से नीचे की ओर किया गया था। इसी कारण उन सभी की दूसरी कथाएं लोकप्रिय हैं, ना कि प्रथम।

वास्तुशिल्पिय विवरण

राजकोष स्मारक के अग्रभाग पर जो उभरे हुए शिल्प हैं उन पर यहाँ निवास किये ५ विभिन्न सभ्यताओं का प्रभाव है।

राजकोष के प्रथम तल के समक्ष ६ ऊंचे स्तम्भ हैं। अग्रभाग के दोनों छोरों में से प्रत्येक छोर पर, दो स्तंभों के मध्य घोड़े की सवारी करते वीर योद्धा का शिल्प है। वे रोम पौराणिकी की देन है। उन दोनों योद्धाओं को कास्त्रो तथा पोलिक्स कहा जाता है जो रोम पौराणिकी पात्र जूस एवं मानवी कन्या के पुत्र हैं। स्तंभों के शीर्ष कोरिंथियन हैं जो इस अग्रभाग पर यूनानी प्रभाव है। दूसरे तल पर मिस्र की देवी एजेस की छवि है।

कोरिंथियन शीर्ष के ऊपर आप ६ पात्र देख सकते हैं जिनके ऊपर ३० गुलाब पुष्प हैं। प्रत्येक तल में ६ स्तम्भ हैं। जिसका अर्थ है कि अग्रभाग में कुल १२ स्तम्भ हैं। दांतों के समान चिन्ह उत्कीर्णित हैं जिनकी कुल संख्या ३६५ है। इन संखाओं को देख क्या ऐसा प्रतीत नहीं होता कि पूर्ण अंग्रेजी वार्षिक पञ्चांग उकेर दिया हो?

१० वर्ष पूर्व तक पर्यटकों को इस संरचना के भीतर जाने की अनुमति थी। किन्तु जब से इस अग्रभाग के नीचे समाधियाँ मिली हैं पर्यटकों का भीतर जाना निषिद्ध कर दिया गया है।

राजकोष की एक अनूठी विशेषता है कि इस सम्पूर्ण धरोहर स्थल के विभिन्न स्मारकों के अग्रभागों में राजकोष का अग्रभाग सर्वोत्तम रूप से संरक्षित है। इसके पृष्ठभाग में एक साधारण वैज्ञानिक कारण है। सिक से आती हुई तेज गति की वायु राजकोष के आसपास की भित्तियों पर आघात करती है किन्तु अग्रभाग पर नहीं। इसके कारण वातावरण की तीव्र परिस्थितियों से अग्रभाग का प्राकृतिक रूप से संरक्षण होता रहता है।

गुफाएं

पेट्रा की गुफाएं
पेट्रा की गुफाएं

यह विडम्बना है कि अप्रतिम रूप से अलंकृत सभी अग्रभाग वास्तव में मृत व्यक्तियों की समाधियों के अग्रभाग हैं। वहीं पहाड़ियों के अग्रभाग पर दृष्टिगोचर छोटे छोटे छिद्र वास्तव में गुफाएं है जहां किसी काल में लोग रहते थे। यह किसी व्यंग से कम नहीं कि विशाल अलंकृत व सज्जित स्थल मृत व्यक्तियों के लिए है जबकि पहाड़ियों पर स्थित केवल छिद्र-मात्र उन्ही लोगों के निवासस्थान थे जब वे जीवित थे।

मकबरे और रहने के लिए गुफाएं
मकबरे और रहने के लिए गुफाएं

१९८५ तक यहाँ बदू अथवा बदूईन जैसे स्थानीय जनजातियों की वसाहत थी। इसके पश्चात यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल की श्रेणी में स्थान प्राप्त करने के लिए उन्हें यहाँ से बाहर निकाल दिया गया था। आज भी आपको यहाँ ऐसे लोग मिल जायेंगे जो प्रतिपादित करते हैं कि वे किसी समय इन गुफाओं में रहते थे। कुछ पर्यटन गाइड आपको इन गुफाओं में रहने का अवसर प्रदान कर सकते हैं किन्तु अधिकारिक स्तर पर इसकी अनुमति नहीं है।

बदू अथवा बदूईन

बेदूइन लोगों के तम्बू
बेदूइन लोगों के तम्बू

यहाँ निवास करती बदूईन जनजाति को जब यहाँ से अन्यत्र स्थानांतरित किया गया था तब उन्होंने एक चतुराई दिखाई। तब उन्होंने अधिकारियों से समझौता करवा लिया कि इस धरोहर स्थल के भीतर पर्यटकों को केवल वे ही पर्यटन गाइड सेवा मुहैया करवाएंगे। इसी कारण आपको इस जनजाति के लोग सर्वत्र दृष्टिगोचर होंगे, कुछ ताँगा हाँकते हुए तो कुछ ऊँट अथवा खच्चर पर सवारी उपलब्ध कराते हुए। वहीं इस जनजाति के कुछ सदस्य तम्बू गाड़कर, उनके भीतर जॉर्डन की स्मारिकायें बिक्री करते हैं। दक्षिणी भाग में एक अच्छा जलपानगृह भी है। इसके अतिरिक्त भी कुछ छोटी छोटी दुकानें यहाँ-वहाँ बिखरी हुई हैं किन्तु पर्यटकों की सुविधाओं के नाम पर उनमें अधिक कुछ उपलब्ध नहीं है। यहाँ तक कि हमारे गाइड ने हमें सावधान किया कि चूंकि यहाँ पर्यटन सुविधाएं उपलब्ध कराने में बदू जनजाति के सदस्यों का एकाधिकार है, अतः उनके द्वारा मुहैया कराई गयी सेवा का स्तर अत्यंत साधारण तथा महँगा है।

आप ही कल्पना कीजिए, प्रवेश शुल्क के नाम पर एक भारी मूल्य चुकाने के पश्चात इस भुतहा नगरी में विभिन्न साधनों पर सवारी की सुविधा प्राप्त करने के लिए भी उतना ही भारी मूल्य देना पड़ता है। मुझे वे अत्यंत अशिष्ट भी प्रतीत हुए। एक खच्चर का मालिक मुझसे इसलिए कुपित हो गया क्योंकि मैंने पैदल चलने का निश्चय किया, ना कि उसके खच्चर को भाड़े पर लेकर उसकी सवारी करना। उसने अपने सहयोगियों को एकत्र कर मुझे धमकाने का भी प्रयत्न किया। यह सब लगभग संध्या के समय हुआ जब वहां अधिक पर्यटक उपस्थित नहीं थे।

नाट्यगृह

रोमन नाट्यगृह
रोमन नाट्यगृह

यहाँ एक नाट्यगृह के अवशेष हैं। लोकप्रिय रोमन नाट्यगृहों से समानता के कारण सामान्यतः इसे भी रोमन नाट्यगृह कहा जाता है। यह एक मिथ्या है। यह नाट्यगृह भी नाबातियक काल से सम्बन्ध रखता है। इस नाट्यगृह का सर्वाधिक विशेष तत्व यह है कि इसे भी चट्टान को काटकर निर्मित किया गया है। क्या आप ऐसे ही किसी अन्य नाट्यगृह के विषय में जानते हैं?

दुर्भाग्य से यह नाट्यगृह अत्यंत भंगित अवस्था में है। उसे देख यह कल्पना करना कठिन है कि किसी काल में यह ६०० दर्शकों की क्षमता का एक उत्कृष्ट नाट्यगृह था।

दुशरा का मंदिर

दुशारा का मंदिर
दुशारा का मंदिर

यह यदि भंगित अवस्था में नहीं होता तो इस धरोहर स्थल का विशालतम अग्रभाग अथवा संरचना होता। दुर्भाग्यवश अब जो हम देखते हैं वह पूर्णतः भग्नावशेष हैं। पुरातत्ववेत्ता इसकी तुलना जेराश के आर्टेमिस मंदिर अथवा अम्मान गढ़ के हरक्युलिस मंदिर से करते हैं। यहाँ तक कि वे इसे उनसे भी विशाल आंकते हैं।

राजाओं की समाधि/छत्री

पेट्रा के राजसी मकबरे
पेट्रा के राजसी मकबरे

इस धरोहर नगरी में, अल खजानेह अर्थात राजकोष से आगे जाते हुए दाहिनी ओर देखें तो पहाड़ी की चोटी पर अनेक राजसी समाधियाँ हैं जिनके अग्रभाग भी राजकोष के अग्रभाग के समान हैं। इस पहाड़ी के आधार तक पहुँचने के लिए सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। मुझे आगे इसी प्रकार की सीढ़ियाँ मठ पहुँचने के लिए भी चढ़नी थीं। मुझमें एक स्थान पर ही इस अभियान की पूर्ति करने की क्षमता एवं इच्छा शेष थी। अतः मैंने यहाँ की सीढ़ियाँ ना चढ़ते हुए मठ की सीढ़ियाँ चढ़ने का निश्चय किया। दूर से यह संरचना भव्य प्रतीत हो रही थी। इस समाधि संरचना के भीतर स्थित अभिलेख इन समाधियों की कालावधि दर्शाते हैं। साथ ही उन राजाओं का उल्लेख है जिन्हें यहाँ समाधिस्त किया गया था। उनमें से अधिकाँश नाबातियन राजा थे।

यहाँ स्थित अनेक संरचनाओं ने अपने आकार अथवा रंग पर आधारित नामों को प्राप्त किया है। उदहारण के लिए, रेशम के रंग की इमारत को रेशम समाधी अथवा छत्री कहते हैं। कोरिंथियन स्तंभों से युक्त संरचना को कोरिंथियन कहते हैं। महल के समान प्रतीत होती संरचना को महल कहा जाता है। किन्तु इन नामों का इन संरचनाओं के मूल नाम अथवा इनके उद्देश्य से नाममात्र भी सम्बन्ध नहीं है।

पेट्रा मठ की सैर

पेट्रा का प्रसिद्द मठ
पेट्रा का प्रसिद्द मठ

मठ भी एक उत्कीर्णित अग्रभाग है। किसी काल में यह एक श्रद्धा स्थल रहा होगा। किन्तु वह वर्तमान में जिस स्थिति में विद्यमान है, इसका भीतरी भाग अत्यंत साधारण है तथा अग्रभाग सुन्दरता से उत्कीर्णित है। इस मठ तक पहुँचने के लिए पहाड़ी की तलहटी से लगभग ८०० सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती है। मार्ग में आपकी भेंट कुछ तम्बुओं के भीतर बैठे बदूईन जनजाति के स्थानिकों से होगी। उनमें से कुछ संगीत वाद्य बजाते दृष्टिगोचर होंगे तो कुछ चाय परोसते, किन्तु उनमें से अधिकतर लोग आभूषण एवं लाल व काले वस्त्र बिक्री करते दिखेंगे। मैंने देखा, अधिकतर तम्बुओं में स्त्रियाँ ही सभी कार्यकलापों का प्रबंधन कर रही थीं जबकि पुरुष पर्यटकों को खच्चर की सवारी करा रहे थे।

शैल आकृतियों की जटिलता के अतिरिक्त उनके रंग भी आपको आकर्षित करेंगे। चट्टानों के चटक पीले एवं गुलाबी रंग आपको स्तब्ध कर देंगे। इन्हें देख मेरी प्रथम प्रतिक्रिया थी कि ये रंग शिल्पकारों ने प्रदान किये हैं। किन्तु मैंने जाना कि यहाँ की बलुआ चट्टानों के विभिन्न परतों के भिन्न भिन्न रंग हैं। मैंने अनेकों गुफाओं के भीतर झांककर देखा। सभी के भीतर इन परतों के भिन्न भिन्न रंगों ने सुन्दर आकृतियाँ बनाई हुई थीं। इसके विषय में सही वैज्ञानिक जानकारी प्राप्त करने की मेरी तीव्र अभिलाषा थी। एक प्रशिक्षित भूवैज्ञानिक की कमी मुझे अत्यंत खल रही थी।

मठ के शीर्ष पर कलश
मठ के शीर्ष पर कलश

मठ के ठीक समक्ष एक बदूईन द्वारा चालित जलपान गृह है। पैदल चलने की थकान मिटाने के लिए यहाँ छोटा सा विश्राम एवं थोड़ी चाय अथवा कॉफी आपको पुनः उर्जा से भर देगी। यहाँ से आप मठ की सममितीय संरचना एवं सुन्दरता का आनंद भी उठा सकते हैं। यहां मून नामक एक बदूईन युवक मठ के एक भाग से दूसरे भाग तक छलांग लगा रहा था। उसे देख हम सब अचम्भे में पड़ गए थे। उसके साहस को सराह रहे थे। वह हमारी स्मृति में एक साहसी नायक के रूप में अमर हो सकता था किन्तु हमारी वापिसी के समय उसके खच्चर को भाड़े पर ना लेने के लिए उसने हमें बहुत उत्पीड़ित किया। हमारे मस्तिष्क पर पड़ी उसकी साहसी छाप पर उसकी अशिष्टता भारी पड़ गयी।

लघु पेट्रा

लघु पेट्रा
लघु पेट्रा

लघु पेट्रा इस पेट्रा की उत्तरी दिशा में, लगभग ८ किलोमीटर दूर स्थित है। यह एक लघु उपनगर प्रतीत होता है। जैसा कि इसका नाम है, संरचना की दृष्टी से लघु पेट्रा मूल पेट्रा के ही समान है किन्तु आकार में अपेक्षाकृत अधिक लघु है। मेरे लिए इस लघु पेट्रा के मायने अधिक सिद्ध हुए। कदाचित पेट्रा के विषय में इतना कुछ लिखा व कहा गया है कि कुछ पर्यटकों के लिए यह “नाम बड़े पर दर्शन छोटे” की कहावत सिद्ध करे। किन्तु मैं इसे देख प्रसन्नता से उछल पड़ी। इसका अग्रभाग भी उसी प्रकार उकेरा गया है जैसा कि समाधि अथवा छत्री। यहाँ भी अजंता की गुफाओं के समान गुफाएं हैं। शिलाओं के शीर्ष को पीठिका के रूप में उकेरा गया है। इसे देख ऐसा आभास होता है कि किसी काल में यहाँ प्राचीन सभ्यता जीवित थी। पुरातत्ववेत्ताओं का अनुमान है कि यहाँ व्यापारी गण ठहरते थे क्योंकि यह सिल्क रूट व्यापारिक मार्ग पर स्थित है। हम जानते ही हैं कि नाबातियन व्यवसाय से व्यापारी थे।

लघु पेट्रा की सिक
लघु पेट्रा की सिक

लघु पेट्रा को सिक अल- बरीद भी कहा जाता है। यहाँ भी घाटी के समान शिलाओं के मध्य विभाजन है। किन्तु यह उतना ऊंचा तथा संकरा नहीं हैं जितना पेट्रा का सिक था। दोनों ओर की चट्टानों को उकेरा गया है। जहाँ-तहाँ आपके समक्ष उत्कीर्णित अग्रभाग प्रकट हो जायेंगे। कालांतर में मुझे ज्ञात हुआ कि यहाँ कुछ गुफाओं में भित्तिचित्र भी हैं, किन्तु उस समय कदाचित हमारे गाइड को, इस विषय में हमें जानकारी देना स्मरण नहीं रहा। इस प्रकार मैंने नाबातियन काल के कुछ अप्रतिम भित्तिचित्रों के अवलोकन का सुअवसर खो दिया। लघु पेट्रा भी एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है।

बैठने के लिए बनी गुफाएं
बैठने के लिए बनी गुफाएं

लघु पेट्रा दर्शन के लिए प्रवेश शुल्क नहीं है। यह पर्यटकों के लिए दिन के समय खुला रहता है। यहाँ तक आप पहाड़ी पर पर्वतारोहण करते हुए भी पहुँच सकते हैं किन्तु गाइड की अनुपस्थिति में ऐसा करना उचित नहीं है।

यदि मुझे जॉर्डन भ्रमण का अवसर पुनः प्राप्त हो तो पेट्रा में कुछ अधिक समय व्यतीत करने में अत्यंत आनंद होगा। आप जब भी पेट्रा भ्रमण पर आयें तो लघु पेट्रा अवश्य देखें।

पेट्रा जॉर्डन के भ्रमण हेतु कुछ व्यवहारिक सुझाव

  • अपने साथ पेयजल अवश्य रखें।
  • पैदल चलने के लिए उपयुक्त जूते पहनें
  • आप अपनी शौचालय सम्बन्धी आवश्यकताओं के लिए टिकट खिड़की के समीप स्थित शौचालय का प्रयोग अवश्य करें क्योंकि दूसरा शौचालय अत्यंत दूरी पर प्राप्त होगा।
  • प्रातः शीघ्रतिशीघ्र यहाँ आने का प्रयास करें। वातावरण की उष्णता कम रहती है तथा छायाचित्र लेने के लिए भी पर्याप्त प्रकाश उपलब्ध रहता है।
  • दोपहर के पश्चात यहाँ पर्यटकों की संख्या कम होती है। उस समय यहाँ के स्थानीय लोग आपसे अशिष्ट व्यवहार कर सकते हैं।
  • संभव हो तो यहाँ समूह में आने का प्रयास करें।
  • यहाँ आने से पूर्व, विश्व धरोहर स्थल के भीतर अधिक महत्वपूर्ण स्थानों की जानकारी प्राप्त कर अपनी प्राथमिकता पूर्वनियोजित कर लें, जैसे किन स्थलों का अवलोकन अति आवश्यक है, किन स्थलों को देखने की आवश्यकता नहीं है तथा कौन से स्थल, उर्जा शेष रहने पर देखे जा सकते हैं।
  • अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार पैदल, खच्चर की सवारी तथा घोड़ागाड़ी की सवारी का चुनाव करें। सम्पूर्ण मार्ग में आप इनका सम्मिश्रण भी कर सकते हैं।
  • स्थानिक बदूईन आपको वस्तुएं क्रय करने के लिए अथवा खच्चर व घोड़ागाड़ी सवारी करने के लिए बाध्य करते हुए असभ्य व्यवहार कर सकते हैं। आप उन्हें नम्रता से नकार दें।
  • मैं यहाँ आने से पूर्व इस धरोहर स्थल के विषय में विश्वसनीय सूत्रों से विस्तृत जानकारी प्राप्त नहीं कर पायी थी। उस स्थिति में आप गाइड की सेवायें लें जो आपको इन संरचनाओं की वास्तु के विषय में सूक्ष्मता से जानकारी प्रदान करेंगे। साथ ही वे इसके विभिन्न युगों से सम्बंधित कथाएं भी सुनायेंगे।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post पेट्रा जॉर्डन – विश्व का अनोखा अचम्भा यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/petra-prachin-nagari-jordan/feed/ 2 2771
श्री लंका का दांबुला गुफा मंदिर में अप्रतिम बौद्ध प्रतिमाएं एवं भित्तिचित्र https://inditales.com/hindi/dambula-gufa-mandir-sri-lanka/ https://inditales.com/hindi/dambula-gufa-mandir-sri-lanka/#respond Wed, 19 Jan 2022 02:30:23 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2566

मैंने यह सुन रखा था कि मध्य श्रीलंका में स्थित दांबुला गुफा मंदिर में सर्वोत्तम रूप से परिरक्षित भित्ति चित्र हैं। इसके अतिरिक्त इस स्थल को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल भी घोषित किया गया है। ये कारण मेरे लिए पर्याप्त थे कि मैं इन शैल गुफाओं तक पहुँचने के लिए आरोहण की योजना बनाऊँ। किन्तु, […]

The post श्री लंका का दांबुला गुफा मंदिर में अप्रतिम बौद्ध प्रतिमाएं एवं भित्तिचित्र appeared first on Inditales.

]]>

मैंने यह सुन रखा था कि मध्य श्रीलंका में स्थित दांबुला गुफा मंदिर में सर्वोत्तम रूप से परिरक्षित भित्ति चित्र हैं। इसके अतिरिक्त इस स्थल को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल भी घोषित किया गया है। ये कारण मेरे लिए पर्याप्त थे कि मैं इन शैल गुफाओं तक पहुँचने के लिए आरोहण की योजना बनाऊँ। किन्तु, जून मास की तपती दुपहरी में अनुराधापुरा एवं पोलोनरूवा में पैदल भ्रमण के पश्चात मेरी उर्जा अपने निम्नतम स्तर पर थी।

 दांबुला गुफा में महापरिनिर्वाण मुद्रा में बुद्द
दांबुला गुफा में महापरिनिर्वाण मुद्रा में बुद्द

मिहिंतले में प्राप्त अनुभव मुझे चेता रहा था कि इस पर्वतीय स्थल का आरोहण प्रातःकाल अथवा संध्याकाल में ही करना चाहिए। अतः परिस्थिति का विश्लेषण कर मैंने निश्चय किया कि मैं दोपहर ढलने के पश्चात, लगभग शाम ४ बजे चट्टान का आरोहण आरम्भ करूंगी।

दांबुला गुफा से सिगिरिया का दृश्य
दांबुला गुफा से सिगिरिया का दृश्य

आप इस चट्टान का आरोहण, दो विपरीत दिशा में स्थित आरम्भ बिन्दुओं से कर सकते हैं। एक, जहां हम टिकट क्रय करते हैं, दूसरा जहां एक विशाल स्वर्ण मंदिर स्थित है। मैंने टिकट खिड़की से टिकट क्रय किया तथा स्वर्ण मंदिर की दिशा में आ गई, क्योंकि मुझे बताया गया कि इस बिंदु से आरोहण अपेक्षाकृत सुगम है। प्रवेशद्वार पर स्थित एक विशाल स्वर्ण प्रतिमा तथा एक स्वर्णिम पगोडा के दर्शन कर मैं आगे बढ़ी।

सीढ़ियाँ चौड़ी एवं आसान थीं। कुछ स्थानों पर सीढ़ियाँ सुव्यवस्थित प्रकार से उकेरी नहीं गयी थीं। वहां चट्टानी सतह पर चढ़ना पड़ा। एक बिंदु पर आकर हमारा पथ दो भागों में बंट गया। एक मार्ग तीव्र ढलान युक्त सपाट पथ है किन्तु अपेक्षाकृत किंचित छोटा पथ है। वहीं दूसरे पथ पर आसान सीढ़ियाँ हैं। मैंने चढ़ने के लिए सीढ़ियाँ युक्त पथ का प्रयोग किया तथा उतरने के लिए सपाट ढलुआँ पथ का। मेरा सुझाव है कि आप भी इस प्रकार दोनों मार्गों का प्रयोग करें क्योंकि ये दो मार्ग चट्टान के दो ओर से जाते हैं तथा दोनों ओर के परिदृश्य अत्यंत भिन्न हैं। सीढ़ियों वाले मार्ग से आप अपने समक्ष प्रभावशाली सिगिरिया चट्टान देखेंगे जो अपने जुड़वा चट्टान के साथ गर्व से खड़ा है। ढलुआँ मार्ग की ओर से आप सुन्दर पहाड़ियों की पृष्ठभूमि में अनेक रंगों की छटा बिखेरती हरियाली देखेंगे।

दांबुला गुफा मंदिर का इतिहास

दांबुला शैल मंदिर स्थित स्वर्णिम स्तूप
दांबुला शैल मंदिर स्थित स्वर्णिम स्तूप

दांबुला दो शब्दों की संधि से बना है, दाम्बा तथा उला, जिनके अर्थ हैं चट्टान एवं झरने।  झरने? जी हाँ, यहाँ स्थित विशालतम गुफाओं में से एक गुफा के भीतर से जल अनवरत टपकता रहता है। ये सभी गुफाएं प्राकृतिक हैं, इस तथ्य ने मुझे अचंभित कर दिया। गुफा के भीतर जाते ही आपकी दृष्टी शिलाओं की प्राकृतिक आकृतियों पर पड़ेंगी। इन आकृतियों के अनुसार ही चित्रकारों ने इन शिलाओं को कुशलता से चित्रित किया है। ये गुफाएं अजंता, एलोरा अथवा बराबर गुफाओं के अनुरूप नहीं हैं क्योंकि वे गुफाएं मानवों द्वारा उत्खनित हैं।

अभिलेखों के अनुसार, प्राचीन काल में, लगभग प्रथम ईसा पूर्व, राजा वट्टगामिनी अभय ने इन गुफाओं में शरण ली थी। कालांतर में उन्होंने इन गुफाओं को मंदिरों में परिवर्तित दिया।

और पढ़ें – पोलोनरुवा- श्रीलंका का सर्वोत्कृष्ठ प्राचीन नगर

राजा निषंकमल्ला, जिनके विषय में हमने पोलोनरूवा में जानकारी प्राप्त की थी, उन्होंने इन पर स्वर्ण पत्रों का आवरण चढ़ाया। इसी कारण इनका नाम रनगिरी पड़ा। स्वर्ण को श्री लंका की सिंहली भाषा में रन कहते हैं।

कहानियां कहते शैल चित्र
कहानियां कहते शैल चित्र

इन गुफाओं में बुद्ध की १५०  से भी अधिक प्रतिमाएं हैं। इनके अतिरिक्त हिन्दू देवी-देवताओं एवं राज परिवार के सदस्यों की भी छवियाँ हैं।

श्रीलंका के आधुनिक इतिहास के अनुसार, ये वे गुफाएं हैं जहां से बौद्ध भिक्षुओं ने सन् १८४८ में ब्रिटिश अधिपत्य के विरुद्ध राष्ट्रीय आन्दोलन आरम्भ किया था।

दांबुला गुफा मंदिर

५ प्रमुख गुफाएं

इस क्षेत्र में कुल ८० गुफाएं हैं। उनमें ५ गुफाएं प्रमुख हैं जिनके सामान्यतः पर्यटक दर्शन करते हैं। प्राकृतिक होने के कारण इन गुफाओं के आकार एवं आकृतियाँ भिन्न हैं।

विशाल शैल में दांबुला गुफाएं
विशाल शैल में दांबुला गुफाएं

गुफाओं से जब आपका प्रथम साक्षात्कार होगा तब आपके समक्ष एक विशाल चट्टान के नीचे पंक्तियों में लगे अनेक शुभ्र श्वेत द्वार होंगे। इस की वास्तुशैली औपनिवेशिक प्रतीत होती है, मुख्यतः प्रथम द्वार जो आपसे निकटतम स्थान पर स्थित है। मुझे बताया गया कि इन द्वारों को कालांतर में, लगभग २०वीं शताब्दी में बिठाया गया था। इसी कारण इनमें उस काल में प्रचलित वास्तुशैली की छाप है।

गुफाओं के समक्ष एक संकरा गलियारा है। प्रवेशद्वारों को मंदिर के द्वारों के समान निर्मित किया गया है जिन पर द्वारपाल, रक्षक तथा देवदूतों की आकृतियाँ उत्कीर्णित हैं।

और पढ़ें – अनुराधापुरा – श्रीलंका की प्राचीन राजधानी की एक झलक

गुफाओं के भीतर लाल एवं पीले रंगों की प्राधान्यता है। प्रतिमाओं के ऊपर छत पर, छपे वस्त्रों के समान चित्रण किया गया है। उन पर प्रमुखता से श्वेत, श्याम एवं लाल रंग के चौकोर खंड हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रतिमाओं के ऊपर कपडे का तम्बू लगाया गया है।

१. देवराज लेणा अथवा दिव्य राजा की गुफा

यह गुफा अपेक्षाकृत छोटी है। इस गुफा में प्रमुखता से महापरिनिर्वाण स्थिति में बुद्ध की प्रतिमा है। प्रमुखता इसीलिए कहा क्योंकि गुफा के भीतर लगभग सम्पूर्ण स्थान इस प्रतिमा ने ग्रहण किया हुआ है। चूंकि सर्वप्रथम मैंने इसी प्रतिमा के दर्शन किये थे, इसकी विशालता देख मैं स्तब्ध रह गयी थी। भित्तिचित्रों एवं विग्रहों के चटक रंग अत्यंत आकर्षित हैं।

बुद्ध के चित्रित चरण
बुद्ध के चित्रित चरण

यहाँ की सर्वाधिक रोचक व आकर्षक रचना है, बुद्ध की आत्मा का चित्रण जिसमें धर्मचक्र एवं पद्म पुष्प की आकृतियों के संयोजन से सुन्दर चित्रण किया गया है।

दाहिनी ओर आसीनस्थ बुद्ध की छवि है जिनके पीछे अप्रतिम प्रभामण्डल है। उनके चरणों में आनंद बैठे हुए हैं। भित्तियों पर हाथ जोड़कर खड़े राजा एवं मंत्रियों की छवियाँ हैं। छत पर दो भागों में अनोखा चित्रण किया गया है जिसमें एक भाग में ज्यामितीय आकृतियाँ हैं तो दूसरे भाग में पुष्पाकृतियाँ हैं।

बुद्ध, अनुयायी और बेल बूटे
बुद्ध, अनुयायी और बेल बूटे

प्रथम गुफा के निकट एक लघु मंदिर है जिसके भीतर विष्णु एवं कार्तिकेय के विग्रह हैं।

२. महाराजा लेणा – दांबुला का प्रमुख गुफा मंदिर

विशालतम गुफा में स्तूप
विशालतम गुफा में स्तूप

यह यहाँ की विशालतम गुफा है। इसके भीतर खड़े होकर अपनी सूक्ष्मता का तीव्र आभास होता है। चारों ओर स्थित बुद्ध की आसीनस्थ एवं खड़ी प्रतिमाएं अभिभूत कर देती हैं। अधिकांश प्रतिमाओं के वस्त्र सुनहरे पीले रंग में रंगे हैं। गुफा के दो द्वार हैं जिनमें एक के समीप एक स्तूप है। गुफा के छत की विस्तृत सतह को पूर्ण रूप से चित्रित किया गया है। छत के सतह पर छोटे से छोटा स्थान भी चित्रण विहीन नहीं है। बुद्ध के चारों ओर उनका ध्यान भंग करने का प्रयास करते माराओं के चित्र हैं।

पंक्तिबद्ध बुद्ध प्रतिमाएं
पंक्तिबद्ध बुद्ध प्रतिमाएं

गुफा की छत पर एक चित्र है जिसमें सहस्त्र बुद्ध ध्यान मग्न बैठे हैं। इसी छवि अजंता गुफाओं की भित्तियों पर भी हैं।

भूमि स्पर्श मुद्रा में बुद्ध का भित्तिचित्र
भूमि स्पर्श मुद्रा में बुद्ध का भित्तिचित्र

इस गुफा में राजा वट्टगामिनी अभय एवं राजा निषंकमल्ला के भी चित्र हैं।

३. गुफा ३

आसनस्थ बुद्ध प्रतिमाएं
आसनस्थ बुद्ध प्रतिमाएं

यह गुफा प्रमुख गुफा का लघु प्रतिरूप है। प्रवेश करते ही एक विशाल प्रतिमा से आपका सामना होता है। चारों ओर ध्यानमग्न बुद्ध की प्रतिमाएं हैं।

४. गुफा ४

यहाँ तक पहुँचते पहुँचते आप को अनुमान लगने लगता है कि गुफा के भीतर आप क्या देखने वाले हैं। यह भी एक लघु गुफा है जिसके भीतर निद्रामग्न बुद्ध की मूर्ति है।

५. गुफा ५

बुद्ध के चित्रों और प्रतिमाओं से घिरा स्तूप
बुद्ध के चित्रों और प्रतिमाओं से घिरा स्तूप

इस गुफा में भी एक लघु स्तूप है जिसके चारों ओर बुद्ध के विग्रह हैं तथा भित्तियों पर कथाएं चित्रित हैं।

इन सभी पाँच गुफाओं के अवलोकन के पश्चात, मुक्त आकाश ने नीचे खड़े होकर आप आसपास के अप्रतिम परिदृश्यों का आनंद उठायें। आपको यहाँ आते श्रद्धालुओं को देख कर एवं उनकी श्रद्धा को अनुभव कर भी अत्यंत आनंद आएगा। आपको पर्यटकों एवं श्रद्धालुओं में भेद तुरंत दृष्टिगोचर होगा। अनेक पर्यटक यहाँ आकर इस स्थान का कौतूहलपूर्वक अवलोकन करते हैं, प्रशंसा करते हैं किन्तु उनका इस स्थान से जुड़ाव नहीं दिखता। इसके विपरीत, श्रद्धालुओं को यहाँ की कला एवं विरासत से सरोकार नहीं होता, वे यहाँ केवल उस परम भगवान को अनुभव करने एवं उनसे एकाकार होने की अभिलाषा लिए आते हैं।

और पढ़ें – श्रीलंका स्थित रामायण सम्बंधित स्थल – एक रोमांचक यात्रा कथा

मैंने यहाँ अनेक शालेय विद्यार्थियों को देखा जो प्रार्थना करने तथा क्रीड़ा करने आये थे।

दांबुला गुफा मंदिर के ऊपर बुद्ध की एक विशाल स्वर्ण प्रतिमा है तथा चट्टान की तलहटी पर एक संग्रहालय है। यहाँ से मैदानी क्षेत्रों एवं सिगिरिया चट्टान का सुन्दर दृश्य दिखाई देता है।

यात्रा सुझाव

दांबुला गुफा में बुद्ध
दांबुला गुफा में बुद्ध
  • दांबुला गुफा मंदिर के दर्शन के लिए प्रातःकाल अथवा संध्याकाल के समय ही आरोहण करें। दोपहर की तपती धूप कष्टदायी होती है।
  • पेयजल साथ रखें।
  • यूँ तो दर्शन स्थल पर गाइड उपलब्ध होते हैं। किन्तु यह विशाल अथवा जटिल स्थल नहीं है। अतः इनके विषय में अध्ययन कर अथवा पूर्व जानकारी प्राप्त कर जाएँ तो आप आसानी से स्वयं भी इनका अवलोकन कर सकते हैं।
  • चट्टान के एक ओर से आरोहण करें तथा दूसरी ओर से अवरोहण। इससे आप चट्टान के दोनों ओर के परिदृश्यों का आनंद उठा सकते हैं।
  • श्री लंका के नागरिकों के लिए प्रवेश शुल्क नहीं है। विदेशी पर्यटकों के लिए प्रवेश शुल्क उस समय १५०० श्री लंका रुपये थी।
  • गुफाएं अत्यंत आर्द्र एवं उष्ण हैं। गुफाओं के बाहर वातावरण आनंदमय होता है। गुफाओं का अवलोकन करते समय मुझे अनेकों बार बाहर आना पड़ा एवं स्वच्छ वायु में श्वास लेना पड़ा।
  • इन गुफाओं का अवलोकन करने के लिए डेढ़ से दो घंटों का समय लग सकता है।

इन गुफाओं के भ्रमण के लिए निकटतम विश्राम स्थल कैंडी है जो यहाँ से अधिक दूर नहीं है। अन्यथा आप मेरे समान हब्बरना के Cinnamon Lodge में  ठहर सकते हैं । वहाँ से आप ३० मिनट गाड़ी चलाकर गुफाओं तक पहुँच सकते हैं।

श्री लंका में करने योग्य २५ रोचक क्रियाकलाप – मेरे यूट्यूब चैनल पर यह विडियो देखें।

आप यह विडियो HD में देखें तथा अपनी यात्रा नियोजित करें।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post श्री लंका का दांबुला गुफा मंदिर में अप्रतिम बौद्ध प्रतिमाएं एवं भित्तिचित्र appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/dambula-gufa-mandir-sri-lanka/feed/ 0 2566
भीमबेटका शैलाश्रय एवं प्रागैतिहासिक गुफा चित्र https://inditales.com/hindi/bhimbetka-prachin-shail-chitra/ https://inditales.com/hindi/bhimbetka-prachin-shail-chitra/#comments Wed, 24 Mar 2021 02:30:08 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2235

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से ४५ किलोमीटर दक्षिण की ओर, भोपाल-होशंगाबाद राजमार्ग पर भीमबेटका नामक विश्व धरोहर स्थल है। जब आप भोपाल से होशंगाबाद की ओर जा रहे हों तब आप अपने दाहिनी ओर एक छोटी पहाड़ी पर विशेष शैल समूह देखेंगे। प्रथम दर्शन में ये शैल समूह अत्यंत अनोखे प्रतीत होते हैं। यही भीमबेटका […]

The post भीमबेटका शैलाश्रय एवं प्रागैतिहासिक गुफा चित्र appeared first on Inditales.

]]>

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से ४५ किलोमीटर दक्षिण की ओर, भोपाल-होशंगाबाद राजमार्ग पर भीमबेटका नामक विश्व धरोहर स्थल है। जब आप भोपाल से होशंगाबाद की ओर जा रहे हों तब आप अपने दाहिनी ओर एक छोटी पहाड़ी पर विशेष शैल समूह देखेंगे। प्रथम दर्शन में ये शैल समूह अत्यंत अनोखे प्रतीत होते हैं। यही भीमबेटका के सुप्रसिद्ध शैलचित्रों का स्थल है। जब आप मुख्य मार्ग से इन गुफाओं की ओर जाते मार्ग पर मुड़ेंगे, तब मार्ग में एक रेलगाड़ी का फाटक आएगा जो अधिकतर समय बंद ही रहता है। यहाँ कुछ क्षण प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है। जैसी ही पर्याप्त गाड़ियां एकत्र हो जाएँ तथा रेलगाड़ी के आने का समय ना हुआ हो तो यह फाटक कुछ क्षण के लिए खोला जाता है।

भीमबेटका के प्राचीन शैलचित्र
भीमबेटका के प्राचीन शैलचित्र

इस स्थान पर, फाटक के खुलने की प्रतीक्षा करते हुए आप कुछ समय मध्यप्रदेश पर्यटन के जलपान गृह में तरोताजा हो सकते हैं क्योंकि इसके पश्चात आपको कुछ भी खाने-पीने का सामान उपलब्ध नहीं होगा। पेयजल भी नहीं। छायाचित्रकारों के लिए यह स्थान दूर से भीमबेटका शैलाश्रय का चित्र लेने का उपयुक्त स्थल है।

भीमबेटका – सर्वाधिक पुरातन मानवी धरोहर

भीमबेटका गुफ़ाएं भारत की सर्वाधिक पुरातन मानवी धरोहर है जो लगभग १०,००० वर्ष प्राचीन हैं। ये शिलाएं अनुमानतः उस काल की हैं जब यह क्षेत्र कदाचित एक महासागर था। शिलाओं की चिकनी व गोलाकार आकृतियाँ सागर की लहरों के थपेड़ों द्वारा निर्मित मानी जाती हैं।

भीमबेटका के चित्रों में घुड़सवार
भीमबेटका के चित्रों में घुड़सवार

यहाँ के वनों में ७५० से भी अधिक शैलाश्रयों की खोज हो चुकी है। उनमें से ४०० से भी अधिक शैलाश्रयों में गुफाचित्र हैं जिनमें से केवल २० गुफाएं जनता द्वारा दर्शन के लिए उपलब्ध हैं। इन गुफाओं में जो चित्र हैं वे भिन्न भिन्न काल के हैं जब उनमें उस काल की प्रागैतिहासिक धरोहर रही होगी।

और पढ़ें: इंदौर के समीप बाघ गुफाचित्र

भीमबेटका के गुफाचित्रों में मूलतः लाल व श्वेत रंगों का प्रयोग किया गया है। कुछ स्थानों पर हरा व पीला रंग भी दृष्टिगोचर होता है। इन रंगों में लाल रंग सर्वोत्तम रूप से संरक्षित है। इसका कारण कदाचित लाल रंग की सघनता है। श्वेत रंगों में सर्वाधिक धुंधलापन प्रतीत होता है। हो सकता है, वे सर्वाधिक प्राचीन हों।

भीमबेटका गुफाचित्र – प्रागैतिहासिक शैलचित्र

अनेक स्थानों पर एक चित्र पर अनेक चित्र चित्रित किए गए हैं। यह इस ओर संकेत करता है कि विभिन्न काल के चित्रकारों ने उसी स्थान पर पुनः पुनः चित्रकारी की है। इसका अर्थ यह भी होता सकता है कि यह अनुष्ठानिक चित्रकारी हो जिसकी नियमित पुनरावृत्ति की जाती थी।

यहाँ की चित्रकारी की शैली वार्ली चित्रकारी एवं मधुबनी चित्रकारी से साम्य रखती प्रतीत होती हैं। मानवी आकृतियों को दर्शाने के लिए ज्यामितीय रेखाचित्रों का प्राधान्यता से प्रयोग किया गया है। केवल एक स्थान पर मानवी आकृति को प्रदर्शित करने के लिए ज्यामितीय रेखांकन की अनुपस्थिति दिखी। वह कदाचित शिव की अथवा कोई ध्यानमग्न ऋषि की छवि थी। कुछ चित्र इतने चटक थे मानो कुछ दिवस पूर्व ही चित्रित किए गए हों। यह विश्वास करना कठिन हो जाता है कि वे प्रागैतिहासिक चित्र हैं। ऐसी इच्छा होती है कि उन्हे छूकर शंका का निवारण कर लें। कुछ चित्र अपने आसपास पसरे धूल के कणों से भी अछूते प्रतीत होते हैं।

प्रागैतिहासिक कला की विषय-वस्तुएं

मानवी आकृतियाँ, पशु-पक्षी, पुष्प, वृक्ष इत्यादि

भीमबेटका की गुफाचित्रों में पशु-आकृतियों की प्राधान्यता है। इसके पश्चात क्रमशः मानवी आकृतियाँ तथा यदा-कदा वृक्षों व पुष्पों की आकृतियाँ दृष्टिगोचर हो जाती हैं। यहाँ की सर्वाधिक लोकप्रिय शिलाओं में से एक है, पशु वाटिका शिला। इस शिला पर मूलतः लाल एवं श्वेत रंगों का प्रयोग कर सभी प्रकार के पशुओं को चित्रित किया गया है। उन चित्रों में विभिन्न पशुओं को खोजना युवा पर्यटकों के लिए एक रोमांचक अभ्यास हो सकता है।

युद्ध के दृश्य

भीमबेटका के शैलचित्रों में युद्ध के अनेक दृश्य हैं जिनमें घोड़ों पर सवार राजाओं एवं सैनिकों को दर्शाया गया है। इन चित्रों में राजाओं को उनके अलंकृत अश्वों एवं यदा-कदा उनके ऊपर चित्रित छत्रों द्वारा पहचाना जा सकता है। इन चित्रों में आप तलवार एवं उस काल के अन्य शस्त्रों को भी पहचान सकते हैं। इन चित्रों में किसी युद्ध में अर्जित विजय का उल्हास व्यक्त किया गया था अथवा किसी युद्ध का चित्रित आलेखन किया गया था, यह कहना कठिन है।

और पढ़ें: छत्तीसगढ़ के प्रागैतिहासिक गुफाचित्र

सामुदायिक जीवनशैली

इन चित्रों में अनेक दृश्य ऐसे हैं जिनमें उस काल के मानवों की सामुदायिक जीवनशैली चित्रित है। इन चित्रों में आप लोगों के समूहों को साथ में खाते-पीते, नृत्य करते, संगीत वाद्य बजाते, विभिन्न अनुष्ठान करते एवं जीवन का आनंद उठाते देख सकते हैं। अनेक स्थानों पर युगल जोड़ों को भी दिखाया गया है। इनमें से अधिकतर चित्र गुफा की छत पर चित्रित हैं।

जीव जंतु शैलचित्र
जीव जंतु शैलचित्र

हमारे पर्यटन परिदर्शक ने हमें बताया कि इन चित्रों के चित्रिकरण के लिए, चित्रकारों ने विशेषतः, उन स्थानों का चयन किया था जहाँ वर्षा का जल नहीं पहुंचता था। मेरा अंतर्मन मुझसे यह कह रहा था कि किसी काल में, गुफाओं की सम्पूर्ण सतहों पर चित्रकारी की गई होगी, किन्तु वही चित्र सुरक्षित बचे हैं जहाँ वर्षा का जल नहीं पहुंचा है। आप देख सकते हैं कि गुफाओं के बाह्य भागों के चित्र भीतरी भागों के चित्रों से अपेक्षाकृत धुंधले हैं।

प्रांगण

भीमबेटका का प्रांगण
भीमबेटका का प्रांगण

शैलाश्रयों के अतिरिक्त, एक प्रांगण के समान संरचना है। हमारे परिदर्शक के अनुसार यह एक मुक्तांगन हो सकता है। यहाँ कदाचित सामुदायिक सभाएं आयोजित की गई होंगी। प्रांगण के मध्य स्थित शिलाखंड कदाचित समुदाय के प्रमुख अथवा राजा का आसन हो सकता है। किन्तु ये सब हमारे विवेचन हैं। इन्हे प्रमाणित करने के लिए कोई संदर्भ उपलब्ध नहीं हैं।

गुफा मंदिर

गुफा के मुख से लगभग १०० मीटर दूर एक गुफा मंदिर है जो अब भी एक जीवंत मंदिर है। हमें बताया गया कि इस मंदिर की स्थापना पांडवों ने उस समय की थी जब वे अपने अज्ञात वास में यहाँ आए थे। वस्तुतः, भीमबेटका नाम का संदर्भ भी भीम से है जिसका अर्थ है भीम की बैठक।

मध्यप्रदेश के भीमबेटका की खोज

यूँ तो भारत के अनेक महत्वपूर्ण गुफाओं एवं विस्मृत प्राचीन संरचनाओं की खोज घुमक्कड़ ब्रिटिश अफसरों ने की थी। किन्तु, इसके ठीक विपरीत, भीमबेटका गुफाओं की खोज एक भारतीय ने की थी। भीमबेटका गुफाओं की खोज सन् १९५८ में डॉ विष्णु श्रीधर वाकणकर ने की थी। उन्होंने उज्जैन के विक्रम विश्वविद्यालय के लिए इस स्थल का विस्तृत अध्ययन किया था।

और पढ़ें: बिहार के गया के निकट बराबर गुफाएं

उन्होंने भिन्न भिन्न प्रकार की शिलाओं एवं शैलाश्रयों को वर्गीकृत किया था। तत्पश्चात भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण विभाग ने इस स्थल का उत्खनन किया। इस स्थान पर प्रागैतिहासिक गुफाओं की खोज से पूर्व इस क्षेत्र को स्तूपों से भरा बौद्ध क्षेत्र माना जाता था। किन्तु ये गुफाएं प्रागैतिहासिक काल से मध्यकाल तक, अर्थात् युगों युगों से मानव जीवन की अनवरत उपस्थिति की ओर संकेत करती हैं।

भीमबेटका गुफाओं के दर्शन

यहाँ आने से पूर्व मैंने इस स्थान के विषय में अनेक समीक्षाएं पढ़ी थीं। पूर्व में यहाँ के दर्शन किए अनेक पर्यटकों ने भी वही समीक्षा दी थी कि आप यहाँ २ घंटों से अधिक समय व्यतीत नहीं कर सकते। अधिकतर पर्यटक यहाँ औसतन लगभग आधा घंटा व्यतीत करते हैं। किन्तु मुझे यहाँ आकर ऐसा प्रतीत हुआ कि मैं इस स्थान को अधिकाधिक सूक्ष्मता से अवलोकन करूं। अधिक से अधिक समय यहाँ व्यतीत करूं। इसके अतिरिक्त, मेरी इच्छा थी कि मुझे उन गुफाओं के दर्शन की भी अनुमति मिले जिन्हे पर्यटकों के लिए बंद कर रखा है। मुझे यहाँ केवल एक ही परिदर्शक अर्थात् गाइड दिखाई दिया जो सम्पूर्ण दर्शन को १० से १२ मिनटों में समेटने का प्रयत्न कर रहा था। यदि आप भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण विभाग द्वारा जारी गाइड पुस्तिका भी साथ लें तो उचित होगा। इससे आप क्रमवार गुफाओं के दर्शन कर सकते हैं तथा चित्रों के विषय में विस्तृत जानकारी भी प्राप्त कर सकते हैं।

पढ़ें: अजंता भित्तिचित्रों को कैसे समझें?

इन गुफाओं को देख मेरे मस्तिष्क में एक विचार उत्पन्न होता है कि क्या उस काल के चित्रकारों को लेश मात्र भी आशा रही होगी कि उनकी यह कला एक दिवस उनकी जीवनशैली एवं रहन-सहन को समझने का एक उत्तम मार्ग सिद्ध होगी? इन गुफाओं को देख एक विचार यह भी उत्पन्न होता है कि एक आनंदित जीवन व्यतीत करने के लिए एक छत एवं दो समय की रोटी के सिवाय क्या अन्य किसी वस्तु की आवश्यकता है?

भीमबेटका की गुफाओं के दर्शन के उपरांत मैं यही कहूँगी कि यह स्थान मानव इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए एक उत्तम एवं अनिवार्य पर्यटन स्थल है।

भोपाल के निकट स्थित भीमबेटका गुफाओं के दर्शन के लिए आप जब यहाँ आयें तब इसके समीप स्थित भोजपुर शिव मंदिर(भोजेश्वर मंदिर) के भी दर्शन करें। सांची के स्तूप भी यहाँ से अधिक दूरी पर नहीं हैं।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post भीमबेटका शैलाश्रय एवं प्रागैतिहासिक गुफा चित्र appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/bhimbetka-prachin-shail-chitra/feed/ 4 2235
जंतर मंतर जयपुर की अद्भुत सवाई जयसिंह वेधशाला https://inditales.com/hindi/jantar-mantar-jaipur-world-heritage/ https://inditales.com/hindi/jantar-mantar-jaipur-world-heritage/#comments Wed, 16 Jan 2019 02:30:28 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1165

क्या आपकी गणित एवं आकलन इत्यादि विषयों में रूचि है? क्या विज्ञान एवं खगोलशास्त्र आपको प्रेरित करते हैं? तो मेरे पास आपके लिए एक अति उत्तम दर्शनीय स्थल का सुझाव है। जंतर मंतर। जी हाँ! जंतर मंतर जयपुर ऐसा स्थान है जो आपको अपने विद्यार्थी जीवन का स्मरण करा देता है। यहाँ आते ही ऐसा […]

The post जंतर मंतर जयपुर की अद्भुत सवाई जयसिंह वेधशाला appeared first on Inditales.

]]>

क्या आपकी गणित एवं आकलन इत्यादि विषयों में रूचि है? क्या विज्ञान एवं खगोलशास्त्र आपको प्रेरित करते हैं? तो मेरे पास आपके लिए एक अति उत्तम दर्शनीय स्थल का सुझाव है। जंतर मंतर। जी हाँ! जंतर मंतर जयपुर ऐसा स्थान है जो आपको अपने विद्यार्थी जीवन का स्मरण करा देता है।

यहाँ आते ही ऐसा प्रतीत होता है मानो आपके ज्यामिति मंजूषा के छोटे छोटे यंत्र, विशाल अवतार ग्रहण कर आपके समक्ष उपस्थित हो गए हैं। एक ओर यहाँ की अर्धवृत्त संरचनायें चांद का स्मरण कराती हैं, तो दूसरी ओर त्रिकोणीय संरचनाएं गुनिया सदृश प्रतीत होती हैं। यंत्रों के ऊपर स्थिन चिन्हांकन मापक-पट्टी का स्मरण कराते हैं तो कुछ यंत्र घूमती पृथ्वी प्रतीत होते हैं। हो सकता है कि विद्यालय की ज्यामिति मंजूषा में उपस्थित यंत्र, जंतर मंतर के यंत्रों का ही लघु रूप हों! आखिरकार जंतर अर्थात् यंत्र तथा मंतर अर्थात् मंत्रणा या गणना, इन्ही के द्वारा ही तो ज्यामिति मंजूषा, अध्ययन में हमारी सहायता करती थी।

जंतर मंतर क्या है?

लघु सम्राट यन्त्र - जंतर मंतर जयपुर
लघु सम्राट यन्त्र – जंतर मंतर जयपुर

जयपुर का जंतर मंतर, राजा सवाई जयसिंह द्वारा निर्मित कराये गए ५ वेधशालाओं में से एक है। अन्य वेधशालाएं दिल्ली, वाराणसी, उज्जैन एवं मथुरा में स्थापित हैं। जयपुर की वेधशाला इस कड़ी की अंतिम, अतः कदाचित सर्वोत्तम वेधशाला है। इसका निर्माण सन १७२८ के आरंभिक कालावधि में किया गया था एवं २० वीं सदी के अंत में इसका पुनरुद्धार किया गया था। वेधशाला की सूचना पटलों पर इसके निर्माण एवं पुनरुद्धार का सम्पूर्ण विवरण अंकित है। साथ ही उन ज्योतिषाचार्यों के नाम भी अंकित हैं जिन्होंने इन यंत्रों के चिन्हित संख्याओं को प्रमाणित किया था।

जंतर मंतर के यंत्रों के निर्माण में पत्थर, संगमरमर एवं पीतल का उपयोग किया गया है।

जयपुर का जंतर मंतर यहाँ के प्रसिद्ध सिटी पैलेस के निकट एवं हवा महल के पृष्ठ स्थान में स्थापित है। सिटी पैलेस अर्थात् जयपुर के मुख्य राजनिवास के ऊपर गर्व से फहराते, राजा सवाई जयसिंह के ध्वज को आप जंतर मंतर में कहीं भी खड़े होकर निहार सकते हैं। सम्पूर्ण ध्वज के साथ साथ एक चौथाई ध्वज भी फहराया जाता है यदि राजा राजमहल में उपस्थित हों।

जंतर मंतर देखने क्यों जाएँ?

• यह भारत में उपस्थित कुछ ही वेधशालाओं में से एक है।
• इसके निरिक्षण द्वारा खगोलशास्त्र के सम्बन्ध में प्रत्यक्ष रूप से जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
• यह आपको वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सम्पूर्ण पृथ्वी के दर्शन कराता है। यहाँ यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यह जंतर मंतर कवियों को वैज्ञानिक एवं वैज्ञानिकों को कवि प्रतीत कराने में सक्षम है।
• आप सम्पूर्ण ब्रम्हांड के परिप्रेक्ष्य में अपनी स्थिति का आंकलन कर सकते हैं।
• जंतर मंतर विज्ञान एवं खगोलशास्त्र के आधारभूत सिद्धांतों को इतनी सरलता से आपके समक्ष प्रस्तुत करता है कि आप अपने घर में इसे स्वयं निर्मित करने हेतु प्रेरित हो जाते हैं।

जयपुर के स्थानीय ज्योतिषविद, आषाढ़ मास की पूर्णिमा के दिन, सूर्यास्त के समय जंतर मंतर के दर्शन अवश्य करते हैं। वे यहाँ आकर आगामी वर्षा ऋतू के आगमन बेला का आकलन करते हैं।

जयपुर जंतर मंतर के यंत्रों के मूलभूत सिद्धांत

आईये इस जंतर मंतर में भ्रमण करते हुए यहाँ स्थापित विभिन्न यंत्रों के मूलभूत सिद्धांतों एवं उनकी कार्यप्रणालियों को समझने का प्रयत्न करें।

सम्राट यंत्र

वृहत सम्राट यन्त्र - जंतर मंतर जयपुर
वृहत सम्राट यन्त्र – जंतर मंतर जयपुर

सम्राट यंत्र अर्थात् यंत्रों के सम्राट! जंतर मंतर में दो सम्राट यंत्र अथवा धूप-घड़ियाँ हैं, एक लघु एवं एक विशाल अर्थात् वृहत्। जंतर मंतर में प्रवेश करते ही आपकी दृष्टि लघु सम्राट यंत्र पर जा टिकती है, जबकि वृहत् सम्राट यंत्र यहाँ से समक्ष स्थित विकीर्ण कोने में स्थापित है। वृहत सम्राट यंत्र की विशेषता यह है कि वह इस परिसर का सर्वाधिक विशाल यंत्र होते हुए सूक्ष्मता एवं उत्कृष्टता का बेजोड़ उदाहरण है।

लघु सम्राट यंत्र एवं वृहत सम्राट यंत्र, ये दोनों धूप घड़ियाँ हैं जिनकी कार्यप्रणाली सामान है। इन यंत्रों में एक त्रिकोणीय भित्त की परछाई इसके पूर्वी तथा पश्चिमी दिशाओं में स्थित चतुर्थांश चापों पर पड़ती है जिससे जयपुर के स्थानीय समय की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। इस भित्त का भीतरी कोण २७ अक्षांश उत्तर में होने के कारण यह भित्त उत्तर-दक्षिण दिशा के समानांतर स्थित है। पश्चिम एवं पूर्व चतुर्थांश क्रमशः प्रातः एवं अपरान्ह के समय की जानकारी देते हैं। सही समय की जानकारी हेतु चतुर्थांश चापों को घंटा, मिनट एवं सेकण्ड दर्शाने हेतु योग्य खण्डों में विभाजित किया गया है। लघु सम्राट यंत्र २० सेकंड की सूक्ष्मता एवं वृहत सम्राट यंत्र २ सेकंड की सूक्ष्मता से समय बता सकती है।

कुछ परिदर्शकों का कहना है कि वृहत् सम्राट यंत्र के निर्माण पूर्व, लघु सम्राट यंत्र का प्रायोगिक निर्माण किया गया था।किसी भी धुप भरे उजले दिन, इन यंत्रों पर गिरती सूर्य की परछाई को चतुर्थांश चापों के खण्डों पर निर्विघ्न रूप से सरकते देखने का आनंद अतुलनीय है।

और पढ़ें – आमेर दुर्ग विश्व की तीसरी विशालतम प्राचीर – एक विश्व धरोहर

सम्राट यंत्र का नामकरण पंडित जगन्नाथ सम्राट को समर्पित है जिन्होंने महाराजा सवाई जय सिंह को खगोलशास्त्र के अध्ययन हेतु सहायता की थी। इस कार्य में पंडित केवल रामजी का भी योगदान माना जाता है। खगोलशास्त्र में पांडित्य प्राप्त करने हेतु इन पंडितों ने प्राचीन संस्कृत ग्रंथों एवं वेदांगों के अध्ययन के साथ साथ यूनान, अरब, पुर्तगाल, ब्रिटेन इत्यादि देशों का भी भ्रमण किया था।

ध्रुवदर्शक पट्टिका

ध्रुवदर्शक पट्टिका - जंतर मंतर जयपुर
ध्रुवदर्शक पट्टिका – जंतर मंतर जयपुर

जयपुर के जंतर मंतर में स्थापित सर्व यंत्रों में सर्वाधिक सरल यंत्र है, ध्रुवदर्शक पट्टिका। जैसा की इसका नाम दर्शाता है, यह यंत्र ध्रुव तारे की स्थिति की जानकारी प्रदान करता है। समलम्ब संरचना के इस यंत्र के ऊपर एक पट्टिका है जो समतल के साथ वेधशाला के अक्षांश, २७ अंश उत्तर, का कोण बनाती है। पट्टिका का ऊपरी तल उत्तर ध्रुव की ओर इंगित करता है जहां ध्रुव तारा स्थित है। रात्रि के समय, नीचे के तल में आँख लगा कर यंत्र की ऊपरी सतह की सीध में देखने पर ध्रुव तारा आसानी से देखा जा सकता है। ध्रुवदर्शक चक्र को प्राचीनकाल का दिशा सूचक यंत्र भी कहा जाता था।

जय प्रकाश यंत्र

जय प्रकाश यन्त्र - जंतर मंतर जयपुर
जय प्रकाश यन्त्र – जंतर मंतर जयपुर

यह जयपुर जंतर मंतर का सर्वाधिक विचित्र एवं पहेली सदृश यंत्र है। इस यंत्र में संगमरमर के गोलार्धों की एक जोड़ी धंसी हुई है। श्वेत संगमरमर में बने ये गोलार्ध एक दूसरे के पूरक हैं। यदि इन्हें जोड़ दिया जाय तो ये सम्पूर्ण अर्धगोला बना लेंगे। संगमरमर में कटी प्रत्येक पट्टी एक घंटे को दर्शाती है। अर्थात् प्रत्येक घंटे के पश्चात आप बारी बारी से अर्धगोला बदल कर खड़े हो जाते हैं एवं माप लेते हैं।

और पढ़ें – एलोरा गुफाएँ – कैलाश मंदिर और गुफा – यूनेस्को विश्व धरोहर का स्थल

इस विलक्षण यंत्र का केंद्र एक लघु धातु का टुकड़ा है जिसके मध्य एक छिद्र है। इस छिद्र के द्वारा इसे अर्धगोले के मध्य में लटकाया हुआ है। इस टुकड़े के द्वारा अर्धगोले पर बनायी गयी परछाई ही इसके सर्व मापों का आधार है। किनारे को क्षितिज मानकर यह अर्धखगोल का परिदर्शन कराता है।

जय प्रकाश यन्त्र - जयपुर
जय प्रकाश यन्त्र – जयपुर

मुझे यह यंत्र इस जंतर मंतर का सर्वाधिक आकर्षक यंत्र प्रतीत हुआ। लाल पत्थर की पृष्ठभूमि में अर्धगोलाकार बनाती श्वेत संगमरमर की कटी पट्टियां अत्यंत मनमोहक प्रतीत होती हैं। परिदर्शक द्वारा आसान शब्दों में दिए गए व्याख्या को सुन खगोलशास्त्र अत्यंत मनोरंजक एवं रोचक प्रतीत होता है।

कपाली यंत्र

यह जय प्रकाश यंत्र के ही समान यंत्र है। इसमें किनारे को क्षितिज मानकर प्रकाशगोले का परिदर्शन प्राप्त किया जाता है।

नाड़ी वलय यंत्र

नाड़ी वलय यन्त्र - जयपुर
नाड़ी वलय यन्त्र – जयपुर

इस विशेष यंत्र में दो वृत्ताकार सतहें हैं। एक का मुख उत्तर दिशा की ओर तथा दूसरे का मुख दक्षिण दिशा की ओर है। यह सतहें इस यंत्र की अंकपट्टिकाएं हैं। यह सतहें दक्षिण की ओर इस अंश में झुकी हैं कि वे भूमध्य रेखा की सतह के समान्तर हो जाती हैं। अतः इसके केंद्र से निकलती एक छोटी कील सदृश छड़ी पृथ्वी की धुरी के समान्तर हो जाती है। इसी छड़ी की परछाई हमें समय की जानकारी देती है। प्रत्येक सतह तीन वृत्ताकार अंकपट्टिकाओं में विभाजित है, जिनमे दो अंकपट्टिकाएं पाश्चात्य पद्धति से घंटा व मिनट बताती हैं तथा तीसरी हिन्दू समयानुसार घटी एवं पल दर्शाती है।

इस यंत्र की दक्षिणी सतह सूर्य द्वारा शरद ऋतु के विषुव से बसंत ऋतु के विषुव तक प्रकाशित रहती है तथा उत्तरी सतह बसंत ऋतू के विषुव से शरद ऋतू के विषुव तक प्रकाशित होती है। अर्थात् प्रत्येक सतह की कार्यक्षमता वर्ष के छः महीने तक उपयोग में लाई जाती है।

नाड़ी वलय यन्त्र पर संस्कृत अभिलेख - जंतर मंतर जयपुर
नाड़ी वलय यन्त्र पर संस्कृत अभिलेख – जंतर मंतर जयपुर

यंत्र की दक्षिणी सतह पर लिखे संस्कृत के अभिलेख इस नाड़ीवलय यंत्र के संरक्षण एवं नवीनीकरण की कथा कहती हैं। इतने व्यवस्थित तरीके से लिखे इस अभिलेख को पढ़कर अत्यंत प्रसन्नता हुई। आरम्भ में भगवान् गणेश का नमन किया गया है, तत्पश्चात इस यंत्र के उद्देश्य की व्याख्या की गयी है। इसके उपरांत इसके निर्माता पूर्वज की यंत्र सम्बंधित जिज्ञासा का उल्लेख किया गया है। अंत में इसके नवीनीकरण का विवरण अंकित है। इसे देखकर मेरी तीव्र अभिलाषा हुई कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग सरल भाषा में इसका अनुवाद दर्शनार्थियों हेतु उपलब्ध कराये।

राज यंत्र

यहाँ अष्टधातु से बनी एक विशाल लटकती चकती है जिस पर नभमंडल के सर्व नक्षत्र अंकित है। यह एक सम्पूर्ण तारेक्ष अथवा तारक्षवेधयंत्र है।

राज यन्त्र और उसपे लिखा मेरा नाम - अनुराधा
राज यन्त्र और उसपे लिखा मेरा नाम – अनुराधा

हम सब ने राज यंत्र के समीप बहुत आनंद उठाया। हम सब इस यन्त्र पर अंकित नक्षत्रों को ढूँढने का आखेट करने लगे। ज्यों ही मेरी दृष्टी इस यंत्र पर पड़ी, मुझे देवनागरी में लिखा हुआ रोहिणी नक्षत्र दृष्टिगोचर हुआ। कुछ क्षणों के शोध के उपरांत मैंने कई और नक्षत्रों के नाम ढूंढ निकाले। चूंकि मेरा नाम, अनुराधा, भी एक नक्षत्र का नाम है, मैंने इस यंत्र पर उसकी खोज आरम्भ की। गूगल से किंचित सहायता लेने के पश्चात मैंने उसे इस चकती के ऊपरी दायें भाग में खोज निकाला। अपना नाम इस राज यंत्र पर खुदा देख मेरी प्रसन्नता की सीमा न रही। मैं खुशी से झूम उठी।

हमारी जिज्ञासा से हमारे परिदर्शक श्री दिनेशजी अत्यधिक प्रभावित हो गए एवं उन्होंने हमारी जिज्ञासा शांत करने का मानो बीड़ा उठा लिया। इसके पश्चात उन्होंने तीन घंटे लगाकर सम्पूर्ण जंतर मंतर के विषय में हमें समझाने की कड़ी मेहनत की।

और पढ़ें – चाँद बावड़ी – आभानेरी की मनमोहक कहानी

राजयंत्र में उपरोक्त चकती के अलावा लोहे में बनी एक और चकती लटकी हुई है जो संभवतः मुख्य यंत्र का प्रारूप है।
भारतीय तिथिपत्र के आंकलन हेतु प्रत्येक मास में एक बार राजयंत्र का अवलोकन किया जाता है।

राशि वलय यंत्र

राशी वलय यन्त्र का वृश्चिक यन्त्र - जंतर मंतर जयपुर
राशी वलय यन्त्र का वृश्चिक यन्त्र – जंतर मंतर जयपुर

राशिवलय यंत्र द्वारा खगोलीय अक्षांश व देशांतर रेखाओं को मापा जाता है। इसमें उपस्थित १२ यंत्र, १२ राशियों को प्रदर्शित करते हैं। प्रत्येक यंत्र का उपयोग उस समय किया जाता है जब उससे सम्बंधित राशि मध्यान्ह रेखा से पार होती है। यद्यपि प्रत्येक यंत्र की रचना सम्राट यंत्र के सामान है, तथापि ये १२ यंत्र शंकु के आकार एवं कोण के आधार पर भिन्न हैं। राशिवलय यंत्र जयपुर वेधशाला के अतिरिक्त अन्य किसी वेधशाला में उपलब्ध नहीं है।

और पढ़ें – चित्तौड़गढ़ किला – साहस, भक्ति और त्याग की कथाएँ

इस यंत्र के दर्शन के समय मैं किंचित स्वार्थी हो गयी और केवल स्वयं की जन्म राशि वृश्चिक के यंत्र को ही विस्तार से समझने का प्रयत्न किया।

राम यंत्र

राम यंत्र अत्यंत आकर्षक यंत्र है। दिल्ली के जंतर मंतर में देखा राम यंत्र मुझे अब भी स्मरण है। वहां यह यंत्र चटक लाल रंग में निर्मित है।

राम यन्त्र - जंतर मंतर जयपुर
राम यन्त्र – जंतर मंतर जयपुर

इस यंत्र का उपयोग किसी खगोलीय पिंड की ऊंचाई (उन्नतांश) एवं दिगंश के स्थानीय निर्देशांकों को मापने में किया जाता है। क्षितिज से किसी पिंड की कोणीय ऊंचाई को उन्नतांश कहा जाता है तथा उत्तरी दिशा से पूर्वी दिशा में उस पिंड की कोणीय स्थिति को दिगंश कहा जाता है।
• दिगंश यंत्र – खगोलीय पिंड के दिगंश को मापने वाला यह बेलनाकार यंत्र है।
• क्रान्ति वृत्त यंत्र – यह यंत्र खगोलीय पिंडों के अक्षांश एवं देशांतर मापने में उपयोग में आता है।

षष्ठांश यंत्र

वृहत सम्राट यंत्र के समीप एक ६० अंश का वृत्तखंड है। यदि आप इस वृत्तखंड के भीतर प्रवेश करें, आप देखेंगे कि सूर्य प्रकाश इस अन्धकोष्ठ के भीतर एक छिद्र के द्वारा प्रवेश करता है। इसी का उपयोग कर सूर्य से दूरी नापी जाती है।

और पढ़ें – भानगढ़ दुर्ग – भारत का सर्वाधिक भुतहा एवं डरावना स्थल

इस यंत्र के भीतर खड़े होकर, उस छिद्र को निहारते, इस जंतर मंतर के वास्तुकार व निर्माता के समक्ष नतमस्तक होने की अभिलाषा होती है।

चक्र यंत्र

चक्र यन्त्र - जंतर मंतर जयपुर
चक्र यन्त्र – जंतर मंतर जयपुर

चक्र यंत्र एक विशाल धातुई चक्र है। इसकी कार्यप्रणाली एवं उद्देश्य की जानकारी मुझे नहीं मिल पायी।

यंत्रों के प्रारूप

जयपुर जंतर मंतर के भ्रमण में मुझे अवश्य अत्यंत आनंद आया था। यद्यपि जिसने मेरा ध्यानाकर्षित किया वे थे यंत्रों के प्रारूप, अर्थात् आरंभिक अवस्था। इन प्रारूपों को देखकर हम जान सकते हैं कि यहाँ उपस्थित सर्व अचूक एवं सटीक यंत्रों पर, उनकी अंतिम अवस्था प्राप्त होने से पूर्व, अविष्कारक द्वारा कितने ही प्रयोग किये गए थे। प्रत्येक यंत्र का कम से कम एक लघु प्रारूप यहाँ उपलब्ध है। उदाहरणतः धातु में बने सर्व यंत्रों के प्रारूपों में भिन्न भिन्न धातुओं का उपयोग प्रायोगिक तौर पर किया गया था। तत्पश्चात सर्वोपयुक्त धातु सुनिश्चित किया गया था। यहाँ खड़े होकर ऐसा प्रतीत होता है मानो हम किसी प्रयोगशाला में आ गए हों।

कपाली यन्त्र - जंतर मंतर जयपुर
कपाली यन्त्र – जंतर मंतर जयपुर

प्रत्येक यंत्र के सूक्ष्मता से मापन हेतु सीड़ियाँ बनायी गयी हैं जिन पर चढ़कर शोध-अधिकारी चिन्हित संख्या का निरिक्षण करते हैं। यद्यपि यंत्रों की सुरक्षा एवं संसाधन हेतु दर्शनार्थियों एवं पर्यटकों को इन सीड़ियों पर चढ़ने की अनुमति नहीं है।

जयपुर जंतर मंतर के यंत्रों के दर्शन एवं जानकारी प्राप्त करते समय मुझे स्मरण हुआ कि मैंने भौतिक शास्त्र में ही अध्ययन कर स्नातक की उपाधि प्राप्त की है। मैं सोच में पड़ गयी कि भौतिक शास्त्र पर आधारित व्यवसाय का चुनाव मेरे हेतु अत्यंत रोचक होता!

जंतर मंतर की सर्व विशाल भित्तियों पर चापाकार झरोखे कटे हुए थे। ये भित्तियों का भार तो उठा ही रहे थे, तथापि सपाट सादी भित्तियों को सुन्दरता प्रदान कर रहे थे। अन्यथा यंत्रों हेतु आवश्यक ये ऊंची भित्तियाँ किंचित उबाऊ हो सकती थीं।

अंततः मैं यह कहना चाहूंगी कि जयपुर के जंतर मंतर ने मेरा मन मोह लिया था। मेरे मष्तिष्क की दबी परतों को झाड़ पोछ कर सचेत कर दिया था। सर्व यंत्रों की कार्यप्रणाली अत्यंत सरल होते हुए भी सुचारू रूप से सटीक खगोलीय मापन करने में सक्षम थी। प्राचीन काल से हमारे देश के वैज्ञानिक इतने बुद्धिमान एवं निपुण थे । तभी तो इतने जटिल मापन को सरल यंत्रों द्वारा कितनी आसानी से प्राप्त करते थे। जंतर मंतर इसी तथ्य का जीता जागता उदाहरण है।

जयपुर जंतर मंतर के भ्रमण हेतु कुछ सुझाव

ज्यामितीय संरचनाएं - जंतर मंतर जयपुर
ज्यामितीय संरचनाएं – जंतर मंतर जयपुर

• जयपुर का जंतर मंतर यूनेस्को द्वारा घोषित विश्व विरासत स्थल है। यह सूर्योदय से सूर्यास्त तक दर्शनार्थ खुला रहता है। वेधशाला के यन्त्र भी इसी समयावधि में कार्यशील रहते हैं।
• इस वेधशाला में प्रवेश शुल्क ५० रुपये भारतवासियों के लिए तथा २०० रुपये विदेशी पर्यटकों के लिए निश्चित है।
• यह वेधशाला जयपुर के मधोमध स्थित है। अतः किसी भी साधन द्वारा यहाँ तक सरलता से पहुंचा जा सकता है।
• साधारणतः पर्यटक जंतर मंतर के यंत्रों के दर्शन ४५ मिनट से १ घंटे के समयावधि में पूर्ण कर लेते हैं। यद्यपि मुझे इनके निरिक्षण हेतु ३ घंटों का समय लगा। वह भी अनुमानतः मेरे द्वारा कुछ यंत्रों के दर्शन चूकने के पश्चात! अतः अपनी इच्छा एवं विज्ञान के प्रति आपकी रूचि के अनुरूप आप स्वयं अपनी समयावधि निश्चित करें।
• जिस तरह मैं उत्तेजित होकर अपना नाम, अनुराधा, राज यंत्र में खोज रही थी, आप भी अपना पसंदीदा नक्षत्र इस यंत्र में ढूंढ सकते हैं। आपकी सुविधा हेतु मैं यहाँ नक्षत्रों की सूची प्रदान कर रही हूँ।
• जंतर मंतर के सर्वोत्तम दर्शन हेतु तेज धूप आवश्यक है। अतः खुले आकाश में सूर्य की चमक तेज हो तभी इसके दर्शनों का अनुभव अविस्मरणीय होगा।
• इन यंत्रों को जानने एवं समझाने हेतु परिदर्शक आवश्यक है। श्री दिनेश शर्मा (८५५९८ ९३३९९), हमारे परिदर्शक अत्यंत निपुण थे। उन्होंने इन यंत्रों की कार्यप्रणाली को सरल शब्दों में हम तक पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोडी थी।
• जंतर मंतर के सम्बन्ध में और जानकारी इस वेबसाईट से पायें।
• बच्चों के ज्ञानवर्धन एवं मनोरंजन हेतु यह स्थल अत्यंत उपयुक्त है।

स्वर्णिम त्रिकोण पर्यटन समूह में उपस्थित एवं यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत स्थल घोषित अन्य पर्यटन स्थल हैं-
• ताजमहल – विश्व का सर्वाधिक छायाचित्रण योग्य स्मारक
• फतहपुर सीकरी
• दिल्ली का लाल किला
• दिल्ली का हुमायूं दरगाह

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post जंतर मंतर जयपुर की अद्भुत सवाई जयसिंह वेधशाला appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/jantar-mantar-jaipur-world-heritage/feed/ 8 1165
पोलोनरुवा- श्रीलंका का सर्वोत्कृष्ठ प्राचीन नगर https://inditales.com/hindi/polonnaruwa-sri-lanka-world-heritage/ https://inditales.com/hindi/polonnaruwa-sri-lanka-world-heritage/#respond Wed, 31 Oct 2018 02:30:26 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1043

मुझे कुछ ही समय पूर्व पोलोनरुवा के विषय में ज्ञात हुआ था कि यह एक विश्व विरासत स्थल है। अतः अपनी श्रीलंका की यात्रा के समय मैंने पोलोनरुवा के दर्शन का भी निश्चय किया। एक विरासती धरोहर होने के अतिरिक्त इस सम्बन्ध में मुझे और कुछ ज्ञात नहीं था। यहाँ तक कि सम्पूर्ण रास्ते, मैं […]

The post पोलोनरुवा- श्रीलंका का सर्वोत्कृष्ठ प्राचीन नगर appeared first on Inditales.

]]>

मुझे कुछ ही समय पूर्व पोलोनरुवा के विषय में ज्ञात हुआ था कि यह एक विश्व विरासत स्थल है। अतः अपनी श्रीलंका की यात्रा के समय मैंने पोलोनरुवा के दर्शन का भी निश्चय किया। एक विरासती धरोहर होने के अतिरिक्त इस सम्बन्ध में मुझे और कुछ ज्ञात नहीं था। यहाँ तक कि सम्पूर्ण रास्ते, मैं इसके नाम का उच्चारण भी सही तरह से नहीं कर पा रही थी।

पोलोनरुवा के सम्बन्ध में प्राथमिक जानकारी मुझे प्राप्त हुई कोलम्बो के राष्ट्रीय संग्रहालय द्वारा। यहाँ का एक सम्पूर्ण विभाग श्रीलंका के पोलोनरुवा काल को समर्पित है। यहीं से मुझे शक्तिशाली राजा पराक्रमबाहु एवं पोलोनरुवा की ओर उनके योगदान के सम्बन्ध में भी जानकारी प्राप्त हुई।

अनुराधापुरा के दर्शन से तृप्त होकर अगले दिन मैंने पोलोनरुवा की ओर प्रस्थान किया। मेरे परिदर्शक ने मुझे अनुराधापुरा एवं पोलोनरुवा के दर्शन एक ही दिन में पूर्ण करने का परामर्श दिया था। लेकिन अनुराधापुरा दर्शन, तत्पश्चात पोलोनरुवा के दर्शनोपरांत मैं इस परिणाम तक पहुंची कि परिदर्शक के परामर्श का पालन ना कर मैंने अत्यंत सूझबूझ का काम किया था। एक दिन में इन दोनों नगरों का गहराई से व पर्याप्त समय दे करअध्ययन मेरे लिए अत्यंत कष्टकर सिद्ध होता। इन दोनों आकर्षक नगरों के दर्शनोपरांत मैंने निष्कर्ष निकाला कि दोनों प्राचीन नगरों में मुझे पोलोनरुवा किंचित अधिक भाया था।

पोलोनरुवा का इतिहास

पोलोनरुवा - श्री लंका की प्राचीन नगरी
पोलोनरुवा – श्री लंका की प्राचीन नगरी

पोलोनरुवा श्रीलंका की द्वितीय प्राचीन राजधानी रही है। इसकी स्थापना सन् १०७० में राजा विजयबाहु ने की थी। तत्पश्चात १२ वीं शताब्दी के राजा पराक्रमबाहु प्रथम के राज्यकाल में पोलोनरुवा ने दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति की थी। अतः राजा पराक्रमबाहु के सुशासन की छाप यहाँ सर्वत्र दृष्टिगोचर होती है। इनमें प्रमुख है, उनकी सुप्रसिद्ध, पत्थर की आदमकद प्रतिमा जहां उन्हें हल पकड़े दिखाया गया है।

राजा पराक्रमबाहु के कीर्ति की छाप का एक और उदाहरण है पोलोनरुवा नगर के समीप स्थित विशाल मानवनिर्मित तालाब जिसे पराक्रम समुद्र कहा जाता है। सड़क से इस विशाल तालाब का कुछ ही भाग दृष्य है क्योंकि इसका प्रमुख भाग एक पहाड़ी के पीछे स्थित है। कहा जाता है कि पोलोनरुवा अपने उत्कृष्ट कृषि अर्थव्यवस्था के लिए प्रसिद्ध था। साथ ही इसकी प्रगत जल प्रबंधन प्रणाली शोध हेतु श्रेष्ठ विषय हो सकती है। लोक-साहित्यों में लिखा गया है कि पोलोनरुवा में वर्षा की एक बूँद भी नष्ट नहीं होने दी जाती थी। पराक्रमबाहु ने अन्य राज्यों के साथ भी उत्तम व्यापार सम्बन्ध स्थापित किये थे। संक्षेप में, प्राचीन नगर पोलोनरुवा में दृष्य सर्वाधिक संरचनाएं पराक्रमबाहु द्वारा ही निर्मित है। पराक्रमबाहु के सम्बन्ध में और अधिक जानकारी उनके विकिपीडिया पृष्ठ द्वारा प्राप्त कर सकते हैं।

राजा पराक्रमबाहु के पश्चात पोलोनरुवा पर भारत के उड़ीसा से आये राजा निषंकमल्ला ने राज किया। निषंकमल्ला को पराक्रमबाहु शासन के उपरांत, पोलोनरुवा मातृवंशीय विरासत में मिला था। परन्तु निषंकमल्ला एक कुशल एवं अनुभवी शासक नहीं था। उसने स्थानीय सामंतों एवं जमीनदारों को उचित सम्मान प्रदान नहीं किया। फलतः उसके शासन के ९वें वर्ष, विष देकर उसकी हत्या कर दी गयी थी। उसके पुत्र की भी उसी दिन राजतिलक के उपरांत हत्या कर दी गयी थी। तत्पश्चात राजा निषंकमल्ला के भ्राता, उड़ीसा के राजा माघ ने पोलोनरुवा पर धावा बोल दिया। अपने भ्राता एवं भतीजे की हत्या का प्रतिशोध लेने हेतु उसने पोलोनरुवा नगर को तहस-नहस कर दिया था।

राजा निषंकमल्ला के पश्चात पोलोनरुवा पर किसी भी शक्तिशाली राजा का शासन नहीं रहा। आतंरिक मतभेदों एवं झगड़ों के फलस्वरुप शनैः शनैः इस भव्य एवं शक्तिशाली साम्राज्य का पतन हो गया।

पोलोनरुवा – एक प्राचीन नगर

पोलोनरुवा के प्राचीन मिट्टी के कुँए
पोलोनरुवा के प्राचीन मिट्टी के कुँए

पोलोनरुवा एक अत्यंत सुनियोजित नगर था। वर्तमान के प्राचीन अवशेषों को देख सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि प्राचीन काल के नगरों की योजना अत्यंत व्यवस्थित प्रकार से की जाती थी। पोलोनरुवा नगर स्पष्ट रूप से तीन भागों में बंटा हुआ था।

  • आतंरिक भाग – नगर का यह भाग विशेषतः राजपरिवार एवं राज्य के उच्चतम अधिकारियों हेतु निहित किया गया था। यहाँ एक भव्य महल एवं एक सभागृह स्थापित थे।
  • बाहरी भाग – नगर का यह भाग मुझे पोलोनरुवा का अत्यंत सुन्दर भाग प्रतीत हुआ। यहीं भगवान् बुध के पूजनीय दन्त अवशेष रखे गए थे।
  • बाह्यतम अथवा उत्तरी भाग – पोलोनरुवा के इस भाग में बौध भिक्षुओं एवं सामान्य प्रजा का निवास था। अर्थात् बौध भिक्षु राजसी ठाठ-बाट एवं राजनैतिक शक्तियों से दूर एवं सामान्य प्रजा के समीप स्थित थे। प्रजा भिक्षुओं के भरण पोषण का कर्त्तव्य निभाते थे एवं उनसे ज्ञानार्जन करते थे।

पोलोनरुवा के दक्षिणोत्तम सीमा पर एक पुस्तकालय व राजा पराक्रमबाहु की प्रसिद्ध प्रतिमा की स्थापना की गयी थी।

तालाब के बीचोंबीच राजा का ग्रीष्म ऋतू अवकाश महल स्थापित किया गया था। इस महल में प्रवेश हेतु तालाब के एक छोर पर विशेष प्रवेशद्वार बनाया गया था।

पोलोनरुवा के यह तीन भाग भंगित होने के बावजूद स्पष्ट देखे जा सकते हैं।

पोलोनरुवा एक सुगठित नगर है। वातावरण सुखकर हो तो इसे पैदल चलकर आसानी से देखा जा सकता है। नगर की योजना को समझने के लिए पैदल भ्रमण सर्वोपयुक्त है।

पुरातत्व संग्रहालय

नटराज - पोलोनरुवा के पुरातत्व संग्रहालय में
नटराज – पोलोनरुवा के पुरातत्व संग्रहालय में

मेरा यह सुझाव है कि टिकट खरीदकर आप इस संग्रहालय का जल्द दर्शन अवश्य करें। पोलोनरुवा के खंडहरों का १२ वीं शताब्दी में मूल स्वरूप कैसा था, यह इस संग्रहालय में सुन्दर प्रतिरूपों द्वारा दर्शाया गया है। जिन स्मारकों का पुनरुद्धार किया गया है, उनके पुनरुद्धार पूर्व एवं बाद के चित्र भी यहाँ रखे गए हैं।

यहाँ रखे तांबे के सिक्कों के एक तरफ राजा की एवं दूसरी तरफ धन के देवता कुबेर का चित्र उत्कीर्णित हैं। कुछ सिक्कों पर देवी लक्ष्मी का भी चित्र उत्कीर्णित है। यहाँ कुछ तांबे की दमड़ियाँ भी रखी हैं।

युद्ध में वीरगति प्राप्त किये योद्धाओं के स्मरण में स्मारिका शिलाखंड भी स्थापित किये गए हैं। एक ओर इन योद्धाओं को अपने आयुधों के साथ एवं दूसरी ओर इन्हें स्वर्ग में देवों के साथ दर्शाया गया है।

राजा निषंक मल्ला का वह घोषणा पत्र, जो इस इस नगर के पतन का कारण सिद्ध हुआ, इस संग्रहालय में आप देख सकते हैं। इस घोषणा पत्र के अनुसार राजा अजेय है एवं प्रजा उसे उसे चुनौती नहीं दे सकती। इसके अनुसार एक किसान केवल खेती करे एवं राजा बनने का प्रयत्न ना करे। अन्य शब्दों में कौआ हंस की चाल ना चले। इस पत्र के अनुसार राजा मानव रूप में देव सदृश है।

इस संग्रहालय द्वारा यह भी ज्ञात होता है कि श्रीलंका से जवाहरात, हाथी एवं चावल का निर्यात होता था

इस संग्रहालय की एक और ध्यानाकर्षण करने वाली वस्तु थी। वह थी १२ वीं शताब्दी में उपयोग में लाए गए शल्य चिकित्सा के उपकरण। यह उपकरण अत्यंत सुपरिचित एवं आधुनिक प्रतीत हो रहे थे।

पोलोनरुवा का आतंरिक भाग

पोलोनरुवा का आतंरिक भाग, जहां राजपरिवार एवं उच्चतम अधिकारी निवास करते थे, एक सर्वोत्तम सुरक्षित भाग है। इसके चारों ओर खड़ी की गयी ईंटों की ऊंची भित्तियाँ अभी भी देखी जा सकती हैं।

राजमहल – सतमहल प्रसाद

राजसी सतमहल प्रासाद - पोलोनरुवा आंतरिक नगरी में
राजसी सतमहल प्रासाद – पोलोनरुवा आंतरिक नगरी में

पोलोनरुवा का राजमहल अपने स्वर्णिम युग में देखने लायक महल रहा होगा। प्रायः भंगित अवस्था में भी यहाँ दुमंजिली ईंटों की दीवारें देखी जा सकती हैं। इसके ऊपर के पांच मंजिल लकड़ी से बनाए गए थे। दीवारों पर उपस्थित छिद्र संभवतः छत को आधार देते धरणी हेतु बने थे। इन सात मंजिलों के कारण ही इस महल को सतमहल प्रसाद कहा जाता है। इस महल से तालाब एवं पहाड़ों का मनोहारी दृश्य दिखाई पड़ता रहा होगा। यद्यपि महल अतिविशाल नहीं है, तथापि इसकी योजना अत्यंत व्यवस्थित प्रतीत होती है। महल के चारों ओर महल के सेवक एवं दास-दासियों हेतु बने निवास कक्षों के अवशेष अब भी देखे जा सकते हैं।

शत्रुओं ने जब नगर पर आक्रमण किया था तब उन्होंने इस महल को आग में भस्म कर दिया था। जलने के धब्बे अब भी कुछ ईंटों पर उपस्थित हैं।

मैं इस भंगित महल एवं चारदीवारों के दोनों ओर पगभ्रमण कर इसके स्वर्णिम युग में रही इसकी सुन्दरता को कल्पना में जीवित करने का प्रयास करने लगी। वर्तमान की इस अवस्था को यदि स्वयं राजा पराक्रमबाहु देखते तो अवश्य उनकी आत्मा चीत्कार कर उठती।

सभागृह

पोलोनरुवा का सभा गृह
पोलोनरुवा का सभा गृह

यह एक ऊंचे मंच पर बनी आयताकार भवन है। वर्तमान की शेष भवन में सर्वाधिक मनोहारी भाग है सभामंडप की ओर जाती सीड़ियाँ। इसके प्रवेशद्वार पर अर्ध चंद्रकार मंडल एवं सीड़ियों के दोनों ओर रक्षक सिंहों की प्रतिमाएं बनी हुई हैं। मंच की दीवारों पर हाथियों की नक्काशी की गयी है। प्रत्येक हाथी अलग रीति से उत्कीर्णित है।

मंच पर कई स्तम्भ खड़े हैं जो कभी सभामंडप का भार उठाया करते थे। मंच के अंत पर राजा का आसन है जिस पर कभी राजा का सिंहासन रखा जाता था। मंत्रिमंडल के सदस्य मंच के दोनों ओर बैठते थे। इसी सभागृह में राजा एवं मंत्रियों ने कई योजनाएँ बनायी होंगी, कई समस्याएँ सुलझायीं होंगी।

राजसी स्नानगृह – कुमार पोकुना

राजसी स्नानगृह – कुमार पोकुना
राजसी स्नानगृह – कुमार पोकुना

राजसी स्नानगृह के अंतर्गत एक स्नान कुंड एवं समीप ही श्रृंगार गृह होते थे। सीड़ियाँ युक्त यह स्नान कुंड अनुराधापुरा के जुड़वा स्नान कुंडों की तरह ही है। कभी राजपरिवार के सदस्यों ने पुष्प एवं सुगंधी युक्त जल में यहाँ स्नान किया होगा। मुझे विश्वास नहीं होता परन्तु मेरे परिदर्शक का मानना है कि उस काल में यहाँ स्नानार्थ फुहारों की भी व्यवस्था थी।

इस कुंड के अवलोकन हेतु कुछ सीड़ियाँ उतरनी पड़ती हैं। सीड़ियाँ उतरते समय मैंने यहाँ लाल पक्की मिटटी की ईंटों से जड़े दो कुँए देखे। संभवतः यह पोलोनरुवा के जल निथारन एवं भंडारण का भाग थे।

पोलोनरुवा का बाहरी भाग

इस भाग को ज्यादातर प्रांगण के रूप में जाना जाता है। श्रीलंका के पोलोनरुवा युग में यहाँ भगवान् बुध के पवित्र दन्त अवशेष रखे गए हैं।

थुपराम मंदिर

थुपराम मंदिर
थुपराम मंदिर

जब मैंने थुपराम मंदिर के दर्शन किये तब वहां महत्वपूर्ण पुनरुद्धार का कार्य प्रगति पर था। एक संकरी ड्योढ़ी से मैंने अन्दर प्रवेश किया। वहां भगवान् बुध की एक बैठी एवं कई खड़ी प्रतिमाएं हैं जिनकी आराधना अभी भी की जाती है। निरंतर बजते संगीत के सुर श्रद्धालुओं को आनंद का अनुभव कराते रहते हैं।

वतादागे

वतादागे - पोलोनरुवा
वतादागे – पोलोनरुवा

वतादागे अर्थात् गोलाकार संरचना श्रीलंका का सर्वाधिक मनोहारी स्थल है। एक गोलाकार ऊंचे मंच के चारों ओर बनी दीवार के चार प्रवेशद्वार चार मुख्य दिशाओं में खुलते हैं। प्रवेशद्वार के ऊपर एक खुले प्रांगन में बुध की प्रतिमा स्थापित है। यहाँ भी सीड़ियों पर सिंहमुख की आकृतियाँ उत्कीर्णित हैं। अन्य स्मारकों की तरह प्रवेशद्वार पर अर्ध चंद्रकार मंडल एवं दोनों ओर रक्षक प्रतिमाएं स्थापित हैं।

मैंने सर्वप्रथम इस गोलाकार स्मारक की बाह्य परिक्रमा की। तत्पश्चात ऊपर चढ़कर भीतर का भ्रमण किया। सौभाग्यवश उसी समय कुछ भिक्षुक वहां प्रार्थनार्थ उपस्थित हो गए। उनके मंत्रोच्चारणों से सारा वातावरण एवं भंगित भवन भी मानो जागृत हो गए। इस वातावरण ने मेरे एक विचार को और दृडता प्रदान की कि वातावरण भक्तों एवं उनकी भक्ति द्वारा ही भक्तिमय होता है।

अपने स्वर्णिम युग में इस मंदिर की भव्यता का अनुमान संग्रहालय में रखे इसके प्रतिरूप द्वारा लगाया जा सकता है।

निषंक लता मंडप

निषंक लता मंडप
निषंक लता मंडप

यहाँ एक छोटे मंच पर कई स्तंभ खड़े है जो सपाट न होकर लता की तरह उत्कीर्णित हैं एवं कमल के डंठल की तरह दिखाई पड़ते हैं। ऐसे अद्भुत स्तंभ मैंने इसके पूर्व कहीं नहीं देखे। अभूतपूर्ण लालित्य का अद्भुत उदाहरण है यह स्तंभ।

जैसा कि इसके नाम से विदित है, इसका निर्माण राजा निषंक मल्ला ने करवाया था। संभवतः उन्होंने इसकी स्थापना अपने निजी ध्यानकक्ष के रूप में करवाई थी। इस पवित्र कक्ष के मध्य एक दगाबा अर्थात् स्तूप स्थापित है। कमल के डंठल सदृश स्तंभों एवं स्तूप को श्वेत एवं गुलाबी रंग में रंग कर अपनी कल्पना के विश्व में खो गयी। ऐसा प्रतीत होने लगा मानो राजा कमल के तालाब में बैठकर ध्यान कर रहे हों।

मैं सोच में पड़ गयी कि इस अद्भुत लालित्य भरी वास्तु को हम आधुनिक शिल्पकला में क्यों आत्मसात नहीं करते।

हतादागे

हतादागे - बुद्ध की जर्जर प्रतिमा
हतादागे – बुद्ध की जर्जर प्रतिमा

वतादागे के ठीक सामने हतादागे निर्मित है जहां पवित्र दन्त अवशेष रखे बुद्ध का मंदिर स्थापित है। इसकी स्थापना पोलोनरुवा के प्रथम राजा विजयबाहु ने करवाई थी। परन्तु वर्तमान में यहाँ केवल कुछ स्तंभ, आधार एवं एक बुद्ध की प्रतिमा शेष है।

गाल पोथा अथवा पाषाणी पुस्तक

यह पोलोनरुवा के पवित्र प्रांगण का सर्वाधिक अचरजकारी भाग है। एक पत्थर की बनी पुस्तक! असल में यह पत्थर के फलक पर लिखा एक लम्बा अभिलेख है। तथापि दूर से यह एक विशाल पुस्तक प्रतीत होती है।

गाल पोथा अथवा पाषाणी पुस्तक
गाल पोथा अथवा पाषाणी पुस्तक

इस पाषाणी पुस्तक के समीप रखे सूचना फलक पर इस अभिलेख की व्याख्या की गयी है। कहा जाता है कि इस पाषाणी फलक को पोलोनरुवा से लगभग १००कि.मी. दूरी पर स्थित मिहिन्तले से लायी गयी थी। इस अभिलेख में कलिंग मूल के राजा विजयबाहु एवं उनके राजा बनने की गाथा कही गयी है। इस अभिलेख में यह भी उल्लेखनीय है कि किस तरह राजा विजयबाहु ने करों व कर की दरों को भी कम करवाया था। खेत की जल टंकी से दूरी के अनुपात में कर को कम किया जाता था। अद्भुत!

इस अभिलेख में राजा के गुणों का गान किया है। वे प्रत्येक दिवस अपने, अपनी पत्नियों एवं पुत्र-पुत्रियों के वजन के बराबर दान करते थे। उन्होंने कई स्तूपों का जीर्णोधार करवाया एवं कई नवीन संरचनाएं भी निर्मित करवायीं। उन्होंने रामेश्वरम में भी देउल अथवा मंदिर का निर्माण करवाया था। इस अभिलेख में यह भी लिखा है कि राजा के कई राज्यों से मित्रवत संधी थी।

अंत में यह लिखा है कि श्रीलंका के सिंहासन के खरे उत्तराधिकारी कलिंग ही थे। इसी कारण गैर-बौद्ध राजा चोल एवं पंड्या कभी भी श्रीलंका में प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं कर सके।

संभवतः यह राजा निषंक मल्ला की ओर से पोलोनरुवा के भावी राजाओं को सलाह थी। लगता है इस सलाह को शीघ्र ही भुला दिया गया।

सतमहल प्रासाद

सतमहल प्रासाद - पोलोनरुवा
सतमहल प्रासाद – पोलोनरुवा

प्रांगण के एक कोने में एक सुन्दर शुण्डाकार संरचना थी। साहित्यों के अनुसार किसी काल यह एक सुशोभित प्रासाद था। सातमंजिली भंगित संरचना के सातों घटते-क्षेत्रफल की मंजिलें अभी भी स्पष्ट देखी जा सकती हैं।

कई सदियों पूर्व निर्मित यह संरचना संभवतः श्रीलंका के प्राचीनतम संरचनाओं में से एक है। यह सीड़ी युक्त अनोखा स्तूप है जो संभवतः कलिंग को ज्ञात मिस्र के पिरामिड अथवा ऐसी ही किसी संरचना से प्रेरित प्रतीत होते हैं।

पोलोनरुवा का उत्तरी भाग

पोलोनरुवा के इस भाग में हाट, अस्पताल, समाधिस्थल, बौद्ध मठ एवं सामान्य प्रजा द्वारा निर्मित संरचनाओं के अवशेष हैं। पोलोनरुवा नगर को घेरे कई गाँव थे जहां सामान्य प्रजा निवास करती थी। विशालतम मठों में से एक मठ समाधिस्थल की धरती पर ही बनायी गयी है।

रण कोट विहार

रण कोट विहार - पोलोनरुवा
रण कोट विहार – पोलोनरुवा

ईंटों द्वारा बनाया गया सुनहरे शीर्ष का यह दगाबा अर्थात् स्तूप, निषंक मल्ला द्वारा पोलोनरुवा में बनवाये गए स्तूपों में से विशालतम स्तूप है। अभिलेखों के अनुसार इसे रुवंवेली कहा जाता है। सिंहली भाषा में रण शब्द का अर्थ है सुनहरा।

गाल विहार

गाल विहार में विशाल पत्थर की पहाड़ी काटकर बुद्ध की कई प्रतिमाएं नक्काशी गयी हैं। यह प्रतिमाएं अफगानिस्तान में नष्ट की गयी बहमनी बुद्ध की प्रतिमाओं से समानता रखती हैं।

इनमें से तीन प्रतिमाएं पहाड़ी की बाहरी सतह पर हैं व एक को सुरक्षित प्रतिष्ठापित किया गया है।

ध्यान मुद्रा में बुद्ध - गाल विहार पोलोनरुवा
ध्यान मुद्रा में बुद्ध – गाल विहार पोलोनरुवा

पहली प्रतिमा है एक मंच पर पद्मासन में बैठे ध्यान मुद्रा में बुद्ध।

विद्याधर गुहा - पोलोनरुवा
विद्याधर गुहा – पोलोनरुवा

दूसरी प्रतिमा भी इसी मुद्रा में है परन्तु यह सुरक्षित प्रतिष्ठापित की गयी है। अर्थात् इस प्रतिमा के ऊपर पहाड़ काटकर एक छत्र उत्कीर्णित किया गया है। पृष्ठ भाग पर प्रभामंडल भी नक्काशा गया है। प्रतिमा के दोनों ओर दो छोटी प्रतिमाएं हैं। यह प्रतिमा परम ज्ञान प्राप्त बुद्ध की है। संभवतः इसीलिए उन्हें मंदिर के भीतर प्रतिष्ठापित किया गया है। इस मंदिर की दीवारों पर रंगे कुछ चित्रों के अवशेष अब भी शेष हैं। मेरा अनुमान है कि पोलोनरुवा युग में इन सारी प्रतिमाओं पर चटक रंग लगाया गया हो। इस मंदिर को विद्याधर गुहा भी कहा जाता है।

बुद्ध या उनके शिष्य आनंद - गाल विहार - पोलोनरुवा - श्री लंका
बुद्ध या उनके शिष्य आनंद – आपको क्या लगता है?

बुद्ध की तीसरी प्रतिमा खड़ी अवस्था में विचारमग्न मुद्रा में बनायी गयी है। उलटे कमल पर खड़ी इस प्रतिमा के विषय में कुछ लोगों का मानना है कि यह बुद्ध की प्रतिमा ना होकर आनंद नामक एक बौद्ध भिक्षु की प्रतिमा है। वहीं कुछ लोग इसे, बोधिवृक्ष की ओर कृतज्ञता से निहारते भगवान् बुद्ध की प्रतिमा मानते हैं।

महापरिनिर्वाण अवस्था में बुद्ध प्रतिमा
महापरिनिर्वाण अवस्था में बुद्ध प्रतिमा

अंतिम प्रतिमा ४५ फीट लम्बी विशालतम प्रतिमा है। यह लेटी हुई अवस्था में महापरिनिर्वाण स्थिति में पहाड़ काटकर नक्काशी गयी है। इसी मुद्रा में भगवान् बुद्ध ने अपने शरीर का त्याग किया था। इस प्रतिमा की यह विशेषता है कि यह पत्थर में बनी एशिया की विशालतम प्रतिमा है।

अचम्भा होता है कैसे नगर से दूर, पहाड़ों को काटकर इतनी अप्रतिम प्रतिमाएं बनायी गयी होंगी! इतनी ही प्रतिमाएं बनायी होंगी या कुछ प्रतिमाएं सम्पूर्ण नष्ट हो गयी हैं।

कुल मिलाकर इन्हें उत्तर रामा अर्थात् उत्तरी मठ कहा जाता है।

पोलोनरुवा का दक्षिणी भाग

राजा महापराक्रमबाहु प्रथम की प्रतिमा

राजा महापराक्रमबाहु प्रथम की प्रतिमा
राजा महापराक्रमबाहु प्रथम की प्रतिमा

राजसी नगर के ३ कि मी दक्षिण में पोथ्गल विहार है। यहाँ कच्चे रास्ते से होते हुए आप राजा महापराक्रमबाहु प्रथम की प्रतिमा पर पहुँचते हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह आदमकद की पाषाणी प्रतिमा राजा की है, जिसमे राजा के हाथ में हल है। हालाँकि, इस तथ्य की पुष्टि के लिए कोई शिलालेख या अन्य प्रमाण नहीं हैं। ऐसा प्रतीत होता ही राजा किसी खेती से जुड़े संस्कार की अगवाई कर रहे हैं।

पोथ्गल विहार

पोथ्गल विहार या पुस्तकालय या कथा कहानी कहने का स्थान - पोलोनरुवा
पोथ्गल विहार या पुस्तकालय या कथा कहानी कहने का स्थान – पोलोनरुवा

महापराक्रमबाहु की प्रतिमा से कुछ ही मीटर दक्षिण की ओर एक मनोहारी भवन है। इसके मध्य में एक गोलाकार कक्ष है। यह एक प्राचीन पुस्तकालय था। मुझे स्वयं पुस्तकों से अत्यंत प्रेम है। जैसे ही मुझे इसके  एक प्राचीन पुस्तकालय होने का पता चला है, मैं अपने चारों ओर हस्तलिखित पांडुलिपियों की कल्पना करने लगी। मैं ह्रदय से यह कामना करने लगी कि सर्व पांडुलिपियाँ आग में राख ना हुई हों और कुछ अब भी कहीं सुरक्षित रखी गयी हों।

लोगों का मानना है कि यह स्थान प्रेक्षागृह था जहां बैठकर प्रेक्षक कथाएं सुनते थे। चूंकि गोलाकार कक्ष बौद्ध मठों में नवीन नहीं है, तथापि यह इसके प्रेक्षागृह होने के अनुमान को दृढ़ता प्रदान करता है।

इस विहार के चारों ओर कई मठ सदृश भवन थे जिनमें अधिकाँश के केवल नींव ही शेष हैं।

एक पुस्तक प्रेमी होने के नाते यहाँ भी मुझे वही घबराहट की अनुभूति हुई जो मुझे नालंदा में हुई थी जहां की पुस्तकें भी कई दिनों तक जलती रही थीं।

पोलोनरुवा के हिन्दू मंदिर

पोलोनरुवा का शिव मंदिर
पोलोनरुवा का शिव मंदिर

सम्पूर्ण पोलोनरुवा में आपको हर ओर हिन्दू मंदिरों के दर्शन प्राप्त होते हैं। विशेष रूप से इनमें कई मंदिर भगवान् शिव को समर्पित हैं, जिनमें शिवलिंग स्थापित हैं। यहाँ इन्हें शिव देउल कहा जाता है। इन मंदिरों के मूल नाम लुप्त हो गए हैं। अतः इन्हें संख्याओं से जाना जाता है। इनमे कुछ हैं-

शिव देवालय - पोलोनरुवा, श्री लंका
शिव देवालय – पोलोनरुवा, श्री लंका
  • शिव देउल क्र. १– पोलोनरुवा के आतंरिक भाग की सीमा पर स्थित इस देउल में कई पीतल की प्रतिमाएं थीं जिन्हें अब कोलम्बो संग्रहालय एवं पोलोनरुवा के ही पुरातत्व संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है।
  • शिव देउल क्र. २ – पवित्र प्रांगण की सीमा पर कई हिन्दू मंदिरों के अवशेष हैं। यहाँ केवल गर्भगृह एवं उसके मध्य शिवलिंग, केवल यही शेष है।
  • विष्णु देउल – पोलोनरुवा में मुझे केवल यही विष्णु का मंदिर दृष्टिगोचर हुआ जो शिव देउल क्र. २ के एक पास स्थित है। शिव मंदिर के सामान निर्मित इस मंदिर के भीतर शिवलिंग के स्थान पर भगवान् विष्णु की आदमकद प्रतिमा स्थापित है।
पोलोनरुवा के भिन्न भिन्न हिन्दू मंदिर
पोलोनरुवा के भिन्न भिन्न हिन्दू मंदिर

इसी मार्ग पर आगे जाकर मुझे एक और शिव मंदिर के दर्शन हुए, किन्तु इसका क्रमांक मुझे ज्ञात नहीं हो सका.

मेरे अनुमान से यहाँ और भी कई देउल हैं, जिनके दर्शन हेतु कदाचित मुझे एक और यात्रा का संजोग प्राप्त करना पड़ेगा।

पोलोनरुवा यात्रा हेतु कुछ सुझाव

  • पोलोनरुवा के स्मारकों के दर्शन हेतु टिकट केवल पुरातत्व संग्रहालय में ही उपलब्ध हैं। अतः आपका पहला पड़ाव यहीं रहेगा। इस संस्मरण को लिखते समय विदेशी पर्यटकों के लिए शुल्क २५ डॉलर था।
  • पोतगल विहार एवं पराक्रमबाहु प्रतिमा के दर्शनों हेतु प्रवेश शुल्क नहीं है।
  • पोलोनरुवा के स्मारक चूंकि पाषाणी हैं, यह पत्थर प्रातः ११ बजे तक अत्यंत गर्म हो जाते हैं। अतः इनके दर्शन प्रातः ११ बजे से पूर्व अथवा दोपहर के पश्चात ही करें। पांवों में मोटी जुराबें कदाचित आपकी असुविधा कुछ कम कर सकें।
  • संग्रहालय के सिवाय अन्य स्मारकों पर छायाचित्रिकरण की अनुमति है।
  • पोलोनरुवा के दर्शनों हेतु सर्वोत्तम साधन सायकल है। अपितु आप पैदल एवं टुकटुक के मिलेजुले साधन द्वारा भी इसके दर्शन कर सकते हैं।

श्रीलंका में अन्य पर्यटन स्थलों की जानकारी हेतु इन संस्मरणों को अवश्य पढ़ें –

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post पोलोनरुवा- श्रीलंका का सर्वोत्कृष्ठ प्राचीन नगर appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/polonnaruwa-sri-lanka-world-heritage/feed/ 0 1043
आमेर दुर्ग विश्व की तीसरी विशालतम प्राचीर – एक विश्व धरोहर https://inditales.com/hindi/amer-durg-jaipur-rajasthan/ https://inditales.com/hindi/amer-durg-jaipur-rajasthan/#respond Wed, 17 Oct 2018 02:30:36 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1031

आमेर दुर्ग, जयपुर नगर की बाह्य सीमा पर स्थित एक विशिष्ठ दुर्ग है। प्राचीनकाल में यह मात्र एक दुर्ग ना होते हुए, एक प्रमुख संरक्षित नगरी थी। कालान्तर में जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह ने इसके पड़ोस में एक नए सुनियोजित नगर का निर्माण एवं विकास किया था। अतः आमेर दुर्ग को तात्कालिक जयपुर नगर […]

The post आमेर दुर्ग विश्व की तीसरी विशालतम प्राचीर – एक विश्व धरोहर appeared first on Inditales.

]]>

आमेर दुर्ग, जयपुर नगर की बाह्य सीमा पर स्थित एक विशिष्ठ दुर्ग है। प्राचीनकाल में यह मात्र एक दुर्ग ना होते हुए, एक प्रमुख संरक्षित नगरी थी। कालान्तर में जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह ने इसके पड़ोस में एक नए सुनियोजित नगर का निर्माण एवं विकास किया था। अतः आमेर दुर्ग को तात्कालिक जयपुर नगर का पूर्वज कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी।

आमेर दुर्ग के भित्तिचित्र
आमेर दुर्ग के भित्तिचित्र

यूनेस्को द्वारा राजस्थान के छः दुर्गों को विश्व विरासत स्थल का गौरव प्राप्त है। आमेर दुर्ग उन्ही में से एक दुर्ग है। इस सूची के अन्य दुर्ग हैं, कुम्भलगढ़ दुर्ग, चित्तौड़गढ़ दुर्ग, जैसलमेर दुर्ग, रणथम्बोर दुर्ग तथा गागरोन दुर्ग।

आमेर दुर्ग का संक्षिप्त इतिहास

पहाड़ियों से घिरा आमेर दुर्ग - राजस्थान
पहाड़ियों से घिरा आमेर दुर्ग – राजस्थान

जैसा कि आप सब ने भी अनुभव किया होगा, दुर्ग बहुधा पहाड़ी की चोटी पर निर्मित किये जाते थे। आमेर दुर्ग भी एक पहाड़ी पर स्थित है। इस पहाड़ी को चील का टीला कहा जाता है, अर्थात् पहाड़ी जिस पर चीलों का वास हो। इस पहाड़ी पर सर्वप्रथम एक दुर्ग का निर्माण मीणा नामक आदिवासी जनजाति ने सन् १०वीं ई. में की थी। कालान्तर में इस दुर्ग का भाग्य परिवर्तन हुआ जब राजा मानसिंह ने इस पर अधिपत्य प्राप्त किया तथा १७वीं ई. में इस पर एक भव्य दुर्जेय दुर्ग का निर्माण करवाया था। इसी कार्य को सम्पूर्ण करते हुए राजा सवाई जय सिंह ने कालान्तर में समीप ही एक नवीन नगर की स्थापना की थी। यही नियोजित नगर आज राजस्थान की राजधानी जयपुर है।

आमेर दुर्ग को घेरती बस्ती को आमेर कहा जाता है। मुझे बताया गया कि आमेर में ही कुल ३६५ छोटे बड़े मंदिर हैं। इनमें से कई मंदिरों के शिखर स्तंभ आप आमेर दुर्ग की प्राचीर से देख सकते हैं। इन मंदिरों के प्रत्यक्ष दर्शन करने के लिए आमेर की पदयात्रा करणी होगी।

चीन की प्रसिद्ध भित्त एवं कुम्भलगढ़ दुर्ग के पश्चात आमेर दुर्ग का स्थान है जिसकी सीमा भित्त सर्वाधिक लंबी है।

आमेर शब्द की व्युत्पत्ति अम्बिका मंदिर अथवा अम्बिकेश्वर नामक एक शिव मंदिर से हुई है।

आमेर दुर्ग के १० प्रमुख अवलोकनीय स्थल

आमेर एक प्राचीन दुर्ग नगरी होने के कारण यह पर्यटकों के लिए आकर्षण का भण्डार है। विशेष रूप से ऐतिहासिक स्थलों में रूचि रखते पर्यटकों हेतु यह स्वर्ग सदृश है। प्रस्तुत है कुछ महत्वपूर्ण स्थलों की सूची जिनके आप आमेर यात्रा पर अवश्य दर्शन करें:-

जलेब चौक

जलेब चौक - आमेर दुर्ग
जलेब चौक – आमेर दुर्ग

आमेर दुर्ग की प्रसिद्ध भित्त को पार करते ही हम दुर्ग के विशाल प्रवेश द्वार पर पहुंचे जिसे सूरज पोल अथवा सूरज द्वार कहा जाता है। इस प्रवेशद्वार से भीतर प्रवेश करते ही आप स्वयं को एक खुले प्रांगण में पायेंगे जो तीन ओर से पीली संरचनाओं से घिरा है। चौथी ओर भित्त है जो ताल के समक्ष स्थित है। इस ताल के मध्य एक केसर क्यारी है। यह राजस्थान के गर्म एवं शुष्क जलवायु में ठण्ड में उगने वाला केसर उगाने का एक प्रयास था। यह प्रयास सही मायनों में सराहनीय है।

शिला देवी मंदिर

शिला देवी मंदिर, शक्ति अर्थात् काली को समर्पित मंदिर है। कहा जाता है कि मंदिर में स्थापित शिला अथवा पाषाणी प्रतिमा बंगाल से लाई गयी है जहां देवी काली की आराधना की जाती है। युद्ध पर प्रस्थान करने से पूर्व क्षत्रिय योद्धा देवी काली का आव्हान करते हैं। इसीलिए प्रत्येक दुर्ग के भीतर एक शक्ति अथवा काली का मंदिर आप अवश्य देखेंगे। मैंने तो नेपाल के कपिलवस्तु के ६वीं ईसा पूर्व के खंडहरों में भी देवी मंदिर के अवशेष देखे थे।

शिला देवी मंदिर के चांदी के आकर्षक उत्कीर्णित द्वार आपका मन मोह लेंगे।

दीवान-ए-आम

दीवान-ए-आम - आमेर किला
दीवान-ए-आम – आमेर किला

दीवान-ए-आम, अर्थात् जनसाधारण की सभा। यह वही स्थान है जहां राजा प्रजा की समस्याओं को सुनते थे, उनका हल निकालते थे तथा सार्वजनिक घोषणायें करते थे। इस सभाग्रह के स्तंभों ने मेरा विशेष ध्यान आकर्षित किया। ये स्तंभ इस सभाग्रह को विशेष आयाम प्रदान कर रहे थे। सभाग्रह की छत के किनारे बने वृत्ताकार तोरण ऐसा आभास दिला रहे थे मानो मैं सभाग्रह के भीतर खड़ी हूँ। वहीं चारों ओर स्थित खुले प्रांगण एक मुक्त वातावरण का आनंद प्रदान कर रहे थे।

इस सभाग्रह की एक ओर विशेषता जो मुझे भायी वह थे स्तंभों पर बने गज रुपी स्तंभशीर्ष।

गणेश पोल

गणेश पोल - आमेर दुर्ग राजस्थान
गणेश पोल – आमेर दुर्ग

यह पोल आमेर दुर्ग के भीतर स्थित निजी क्षेत्र अर्थात् आमेर राजमहल का प्रवेशद्वार है। इस प्रवेशद्वार पर बने भित्तिचित्र जगप्रसिद्ध हैं। महीन, जटिल तथा सूक्ष्म, वहीं मनमोहक रंगों भरी ये भित्तिचित्र छायाचित्रकारों हेतु अतिप्रिय तथा प्रेरणा स्त्रोत हैं। गणेशजी के जैसे चित्र आप अन्य मंदिरों, दुर्गों एवं महलों में देखते हैं, वैसे ही एक भित्तिचित्र यहाँ मध्य भाग में चित्रित है। शेष भित्त एवं छत पर फूल-पत्तियों की चित्रकारी की गयी है। ये भित्तिचित्र विभिन्न कला-संस्कृतियों का मनमोहक मिश्रण है। गणेश का चित्र हिन्दू कला-संस्कृति का , फूल-पत्तियाँ मुग़ल कला-संस्कृति का तथा हलके रंगों का चुनाव अंग्रेजी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं। अर्थात् आमेर दुर्ग उस काल का प्रतीक है जब भारत में हिन्दू, मुग़ल तथा अंग्रेजी संस्कृति का प्रभाव भारतीय संस्कृति को नयी दिशा दे रहे थे।

छत एवं दीवार की निचली झालर पर बने भित्तिचित्र देखना ना भूलें।

हमाम

गणेश पोल के बाईं ओर एक हमाम है। कदाचित आमेर दुर्ग के निर्माण के समय हमाम निर्माण का प्रचालन रहा होगा। यह हमाम तो छोटा है पर इसकी यंत्रप्रणाली अत्यधिक रोचक है। इसके छोटे से झरोखे से बाह्य दृश्य दिखाई देता होगा, किन्तु सुरक्षा की दृष्टी से इसे अभी अवरुद्ध किया गया है।

शीश महल – आमेर दुर्ग का सर्वाधिक सुन्दर भाग

शीश महल - आमेर किला जयपुर
शीश महल – आमेर किला जयपुर

शीश महल वास्तव में दीवान-ए-ख़ास अर्थात् राज-काज से सम्बंधित विशिष्ठ एवं प्रतिष्ठित व्यक्तियों का परामर्श कक्ष था। यहाँ राजा अपने मंत्रियों तथा राजपरिवार के अतिथियों से भेंट करते थे। इस सभाग्रह की सम्पूर्ण भित्तियाँ तथा छत छोटे छोटे दर्पण अर्थात् शीशे के टुकड़ों से मढ़ी हुई हैं। इसी कारण इस सभाग्रह को शीश महल कहा जाता है। ऐसा मानना है कि मुग़ल-ए-आज़म चलचित्र में दर्शाए गए शीश महल की कल्पना इसी शीश महल से प्राप्त की गयी थी। चूंकि यह दर्पण के टुकड़े स्वच्छ श्वेत भित्तियों पर मढ़े हुए है, अतः रात्रि में जले दीपों के प्रकाश में इनकी चमक की कल्पना करने में मैं असमर्थ थी।

शीश महल की कारीगरी - आमेर
शीश महल की कारीगरी – आमेर

मेरे मतानुसार दर्पण के टुकड़ों से भित्तियों को मढ़ना इनकी सुन्दरता में वृद्धि तो करता ही है, साथ ही रोशनी के कुछ ही साधनों से प्रकाश कई गुना बढ़ाया जा सकता है।

आमेर दुर्ग के शीश महल के समक्ष एक व्यवस्थित बाग़ शोभायमान है।

शीश महल के स्तम्भ पर जादुई फूल
शीश महल के स्तम्भ पर जादुई फूल

सुझाव – शीश महल के एक स्तंभ के आधार पर एक जादुई पुष्प उत्कीर्णित है जो उड़ते तितली के जोड़े को दर्शाते हैं। उस पर सही स्थानों पर हथेली को सही प्रकार से रख कर आप इसमें एक मछली की पूंछ, एक नाग का फण, एक गज की सूंड, सिंह की पूंछ, एक बिच्छु तथा एक भुट्टा खोज सकते हैं। इस स्तंभ को देखना ना भूलें। इन जंतुओं को खोजने में असमर्थ हों तो किसी परिदर्शक की सहायता आवश्यक लें।

सुख महल

सुख महल का हाथीदांत युक्त द्वार
सुख महल का हाथीदांत युक्त द्वार

सुख महल सही मायनों में सुख सुविधाओं से युक्त महल था। इसके भीतर जल की संकरी नालियाँ चारों ओर बनी हुई हैं जिनसे बहता जल महल को शीतल रखता है। यह उस काल का वातानुकूलित महल था। रेगिस्तानी ऊष्ण जलवायु के रहते यह ठंडक ही असली सुख है। भित्तियों पर बनी आकृतियों को नीले रंग के अनेक छटाओं से रंग गया है। नीला रंग महल के परिवेश को अतिरिक्त शीतलता प्रदान कर रहा था।

सुझाव – चन्दन की लकड़ी द्वारा निर्मित द्वार पर हाथी दन्त की जडाऊ कारीगरी देखने योग्य है। यद्यपि अधिकतर जड़ाई वर्तमान में भंगित है, तथापि शेष जड़ाई द्वारा इसके यशस्वी अतीत की कल्पना की जा सकती है।

सुहाग मंदिर

सुख मंदिर - आमेर दुर्ग
सुख मंदिर – आमेर दुर्ग

यह एक आकर्षक मंडप है जिसके ऊपर अर्धगोलाकार गुम्बद बना हुआ है। गुंबद पर हलके हरे व लाल रंग की पट्टियां रंगी गयी हैं। भित्तियों पर भी चटक रंगों में फूल-पत्तियों की आकृतियाँ बनायी गयी हैं। वहां लगे एक संगमरमर पट्टिका पर इसका नाम सुहाग मंदिर लिखा हुआ है। संभवतः यह मंडप सुहागनों द्वारा धार्मिक संस्कार तथा उत्सव मनाने के उपयोग में लाया जाता होगा।

मैंने इस मंडप के भीतर प्रवेश कर जालीदार नक्काशी के छिद्रों से चारों ओर दृष्टी दौड़ाई। उस ऊंचाई से चारों ओर की पहाड़ियां तथा महल के दीवान-ए-आम तथा अन्य निचले भागों का मनभावन दृश्य मुझे प्राप्त हो रहा था।

मानसिंह महल की बारादरी

आमेर के मान सिंघ महल की बारादरी
आमेर के मान सिंघ महल की बारादरी

बारादरी एक छोटा मंडप है जो एक खुले प्रांगण के मध्य बनाया गया है। यह महल का प्राचीनतम भाग भी है। अतः मेरे अनुमान से दीवान-ए-आम से पूर्व, यही स्थान जनता से भेंट हेतु प्रयोग में लाया जाता रहा होगा। कदाचित यह राजा का आमोद-प्रमोद स्थल भी रहा हो।

यह प्रांगण भित्तियों से घिरा हुआ है तथा इसके चारों ओर निवासकक्ष बने हुए हैं।

जनाना

आमेर के रानीवास की कलाकृतियाँ
आमेर के रानीवास की कलाकृतियाँ

जनाना का अर्थ है महल में स्त्रियों के कक्ष। महल का यह भाग स्वयं में एक सम्पूर्ण विश्व होता था। जनाना अथवा अन्तःपुर पर कई पुस्तकें एवं कथाएं लिखी गयी हैं। पर-पुरुषों का उस ओर जाना निषेध था। परिवार के पुरुष सदस्यों को भी यहाँ प्रवेश की सीमित अनुमति होती थी। यही कारण है कि महल का जनाना तथा अन्तःपुर जनसाधारण हेतु सदैव पहेली का विषय रहा है।

आमेर दुर्ग में मुझे यह भाग अत्यंत अव्यवस्थित प्रकार से निर्मित प्रतीत हुआ। बहुत विचार करने के पश्चात मैंने यह निष्कर्ष निकाला कि कदाचित इसकी भूलभुलैय्या संरचना आक्रमणकारियों को भ्रमित कर उनसे रानियों एवं दासियों की रक्षा करने के लक्ष्य से बनाया गया हो। अथवा कालान्तर में आवश्यकतानुसार अतिरिक्त कक्षों को उपलब्ध स्थानों पर निर्मित किया गया हो। मेरे मष्तिष्क का नटखट भाग यह अनुमान लगा रहा था कि कदाचित इसकी अव्यवस्थित संरचना जानबूझ कर की गयी थी ताकि राजा स्वेच्छानुसार किसी भी रानी के कक्ष में जा सकें तथा अन्य रानियों को इसकी भनक भी ना लगे। यह और बात है कि राजा किसी रानी के कक्ष में जाएँ तथा अन्य रानियों को इसकी जानकारी ना मिले, यह इतना आसान नहीं। अंततः मैं इतना अवश्य कहना चाहूंगी कि इस भूलभुलैय्या जनाने में आप आसानी से राह भटक सकते हैं।

जनाने के कक्षों को स्त्रीसुलभ प्रकार से सजाया गया है। इनमें से कुछ कक्षों के छतों तथा भित्तियों पर की गयी नक्काशी आपका मन मोह लेगी। यहाँ उगाया गया तुलसी का एक पौधा उसी प्रकार से रखा गया है जैसा उस काल में यहाँ निवास करती रानियाँ इसकी पूजा अर्चना करती थीं।

आमेर दुर्ग पर ध्वनी एवं प्रकाश प्रदर्शन

आमेर का ध्वनि एवं प्रकाश कार्यक्रम
आमेर का ध्वनि एवं प्रकाश कार्यक्रम

आमेर दुर्ग पर प्रदर्शित ध्वनी एवं प्रकाश प्रदर्शन बहुत अच्छा था परन्तु यह भारत के सर्वोत्तम ध्वनी एवं प्रकाश प्रदर्शन की टक्कर में किंचित पीछे था। चित्तोड़गढ़ का ध्वनी एवं प्रकाश प्रदर्शन निश्चित रूप से इससे श्रेष्ठ था। तथापि आमेर दुर्ग के इतिहास को समझने का श्रेष्ठतम उपाय यही है। समक्ष दुर्ग का प्राचीर, अग्रभाग में जल श्रोत तथा उन पर खेलती रंग बिरंगी प्रकाश की किरणें! इस आकर्षक परिवेश में गूंजते स्वर आमेर का इतिहास वर्णन कर रहे थे।

इतिहास की गाथाएँ कहते स्वरों के मध्य बजते राजस्थानी लोक संगीत इसमें अपना रंग घोल रहे थे। कुछ स्थानों पर कहानियों को अनावश्यक रूप से खींचा गया प्रतीत हुआ। कुल मिलाकर वहां विश्रांति लेते, बड़े परदे पर आमेर दुर्ग पर संगीत नाटक देखना अच्छा था।

आमेर का अनोखी संग्रहालय

अनोखी संग्रहालय - आमेर
अनोखी संग्रहालय – आमेर

यह अनोखी संग्रहालय भारतीय, विशेषतः राजस्थानी वस्त्रों को समर्पित है। यह संग्रहालय तथा इनमें प्रदर्शित वस्तुएं देखने योग्य हैं। साथ ही संग्रहालय की हवेली में हुए जीर्णोद्धार की गाथाएँ भी अनोखी हैं। इसे चंवर पालखीवालों की हवेली भी कहा जाता है। इसके नाम से मैंने अनुमान लगाया कि यह हवेली उन पालखी तथा चावडी धारकों की थी जो राजपरिवार की पालखी कन्धों पर उठाते थे। वर्तमान में यह प्रथा विलुप्त हो गयी है परन्तु उनका नाम धरे यह हवेली अभी भी उनकी गाथाएं कह रही है। इस हवेली में पुनरुद्धार का कार्य इतनी कुशलता से किया गया है कि मैं इसके अतीत को जीवंत अनुभव कर पा रही थी।

अनोखी संग्रहालय में पर्दर्शित परिधान
अनोखी संग्रहालय में पर्दर्शित परिधान

इस संग्रहालय में प्रदर्शित वस्त्र  तथा परिधान भारतवर्ष की संस्कृति की विविधता को सजीव प्रदर्शित कर रही थे। वस्त्रों पर रंगे नमूने, धारकों के सामाजिक ओहदे दर्शा रहे थे। छपाई में उपयोग में लाए जाने वाले  लकड़ी के ठप्पे किस प्रकार बनाए जाते हैं यह आप यहाँ देख सकते हैं। इसी प्रकार वस्त्रों पर छपाई का कार्य भी आप यहाँ देख सकते हैं। इस संग्रहालय के अवलोकन हेतु १ से २ घंटों का समय पर्याप्त है। स्मारिका खरेदी हेतु यहाँ एक विक्री खिड़की है, किन्तु यहाँ वस्तुओं का सीमित संग्रह है। अनोखी संग्रहालय के स्मारिकाओं की एक दुकान शहर में भी है जहां से आप हर प्रकार की स्मारिका खरेदी कर सकते हैं।

और पढ़ें:- अहमदाबाद का कैलिको संग्रहालय

आमेर दुर्ग के समीप विश्रामगृह

गणेश पोल - आमेर किला
गणेश पोल – आमेर किला

अपनी आमेर तथा जयपुर की इस यात्रा के समय में जयपुर के लेबुआ रेसॉर्ट में ठहरी थी। इस रेसॉर्ट का एक  लेबुआ लॉज आमेर में भी है जो आमेर दुर्ग की भित्त के बाजू स्थित है। यहाँ सर्व सुख सुविधाओं युक्त कई विशेष तम्बू हैं। मैंने निश्चय किया कि मेरी अगली जयपुर यात्रा के समय मैं इन्ही तम्बुओं में ठहरूंगी ताकि उन मंदिरों के भी दर्शन कर सकूं जिन्हें इस यात्रा में नहीं देख पायी. साथ ही सूर्योदय के समय इस क्षेत्र के पक्षियों का भी अवलोकन कर सकूं।

आमेर दुर्ग के अवलोकन के लिए कुछ सुझाव

  • आमेर दुर्ग के दर्शन के लिए १ से २ घंटों का समय पर्याप्त है।
  • अनोखी संग्रहालय के लिए कम से कम २ घंटो का समय लगता है।
  • आमेर दुर्ग के भीतर चलने तथा चढ़ने-उतरने की आवश्यकता रहती है। अतः पैरों में आरामदायक जूते पहनें।
  • आमेर दुर्ग को समझने हेतु एक जानकार परिदर्शक की सेवायें अवश्य लें। टिकट खिड़की पर श्रव्य परिदर्शक की सुविधा भी उपलब्ध है।

जयपुर के अन्य पर्यटन स्थलों की जानकारी प्राप्त करने हेतु निम्न संस्मरणों को पढ़ें:-

  1. आभानेरी की चाँद बावड़ी – भारत की सर्वोत्कृष्ट बावड़ी
  2. खाटू श्याम – महाभारत के पराजितों के देव
  3. जयपुर के १५ सर्वोत्कृष्ट स्मारिकायें – जयपुर में खरेदी
  4. जयपुर का जंतर-मंतर – सवाई जयसिंह की दर्शनीय वेधशाला
  5. भानगढ़ दुर्ग – भारत का सर्वाधिक भुतहा स्थान

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post आमेर दुर्ग विश्व की तीसरी विशालतम प्राचीर – एक विश्व धरोहर appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/amer-durg-jaipur-rajasthan/feed/ 0 1031
कास पठार – महाराष्ट्र के सातारा में फूलों की घाटी https://inditales.com/hindi/kaas-pathar-valley-of-flowers/ https://inditales.com/hindi/kaas-pathar-valley-of-flowers/#comments Wed, 10 Oct 2018 02:30:11 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=662

कास पठार – फूलों की घाटी   महाराष्ट्र के सातारा नगर के कास पठार को फूलों की घाटी भी कहा जाता जाता है। यह उत्तराखंड की प्रसिद्ध फूलों की घाटी को महाराष्ट्र का प्रत्युत्तर है। दोनों ही घाटियों में लगभग एक ही समय, यानी वर्षा ऋतु के आखरी दो महीनों में अर्थात अगस्त और सितंबर के […]

The post कास पठार – महाराष्ट्र के सातारा में फूलों की घाटी appeared first on Inditales.

]]>

कास पठार – फूलों की घाटी  

कास पठार - फूलों की घाटी
कास पठार – फूलों की घाटी

महाराष्ट्र के सातारा नगर के कास पठार को फूलों की घाटी भी कहा जाता जाता है। यह उत्तराखंड की प्रसिद्ध फूलों की घाटी को महाराष्ट्र का प्रत्युत्तर है। दोनों ही घाटियों में लगभग एक ही समय, यानी वर्षा ऋतु के आखरी दो महीनों में अर्थात अगस्त और सितंबर के महीनों में फूलों की बहार छा जाती है। लेकिन उत्तराखंड में जहाँ, आपको पहाड़ी की तलहटी तक पहुँचने के बाद हिमालय के कठोर भूभाग से पदयात्रा करते हुए फूलों की घाटी तक जाना पड़ता है; वहीं सातारा शहर की अनेक पहाड़ियों में से एक पर बसे हुए कास पठार तक आप गाड़ी लेकर भी जा सकते हैं।

कास पठार के रंग भरे फूल
कास पठार के रंग भरे फूल

कास पठार तक जाते समय रास्ते में हमारा सामना लगभग दो मी. की लंबाई के एक साँप से हुआ जो अचानक से सड़क के बीचोबीच आ गया और अपना ही समय लेते हुए सड़क पार करते हुए चला गया। अगली सुबह जब हम महाराष्ट्र पर्यटन विकास निगम (MTDC) के गमन स्थान, जहाँ पर हम ठहरे हुए थे, से पदयात्रा करते हुए कास पठार तक जा रहे थे, तो हमे वहाँ पर बहुत सारे साँप दिखे जो मदमस्त यहाँ-वहाँ घूम रहे थे। दुर्भाग्य से वहाँ पर बहुत सारे साँप मृत भी पड़े हुए थे, जो शायद आती-जाती गाड़ियों के पहियों के नीचे कुचलकर मर गए थे। हमे वहाँ पर कुछ नेवले भी दिखे थे, तो शायद हो सकता है कि इसमें इन नेवलों का भी थोड़ा-बहुत योगदान रहा होगा। इसके अतिरिक्त यहाँ पर आपको बहुत सारी रंगबिरंगी तितलियाँ भी नज़र आती हैं। यहाँ के व्यापक परिदृश्यों के कारण इन तितलियों की एक तस्वीर लेने के लिए आपको बहुत धीरज रखना पड़ता है।

फूलों के बदलते रंग  
कास पठार के सूक्ष्म पुष्प
कास पठार के सूक्ष्म पुष्प

हमे बताया गया कि कास पठार पर खिलने वाले फूलों के रंग लगभग हर सप्ताह बदलते रहते हैं। अगस्त के तीसरे सप्ताह में जब हम वहाँ पर गए थे तो यह पूरा पठार धवल फूलों से भरा हुआ था। यद्यपि इन में से कुछ फूलों पर हल्का सा गुलाबी रंग भी झलक रहा था। वहाँ पर बहुत सारे सूक्ष्म आकार के फूल हैं जिन्हें देखने के लिए आपको गरुड जैसी तीक्ष्ण दृष्टि की आवश्यकता होती है और उनकी तस्वीरें लेने के लिए एक उत्तम कैमरे की जरूरत होती है।

यहाँ पर एक सरोवर भी है जिसे कास सरोवर कहा जाता है और जिसकी फुलवारी में नीले रंग के सुंदर फूल खिले थे। यहाँ पर आपको खाने की कुछ चीजें भी मिल सकती हैं।

यूनेस्को द्वारा जैवविविधता को धरोहर का मान     

धवल गुलाबी छोटे बड़े फूल
धवल गुलाबी छोटे बड़े फूल

भारत के पश्चिमी घाट का भाग होने के नाते कास पठार को यूनेस्को विश्व धरोहर के स्थलों में गिना जाता है। यूनेस्को ने इस मुख्य पठार की सुरक्षा हेतु वहाँ पर बाड़ लगाने का निर्णय लिया है, ताकि यहाँ के फूलों को कोई हानि ना पहुंचे और आगंतुक भी उनसे सुरक्षित दूरी बनाए रखे। हमे बताया गया कि यह सब करने से पहले यहाँ पर आनेवाले पर्यटक इन मैदानों में फूटबाल खेला करते थे, जिसके कारण यहाँ के छोटे-छोटे फूल और फुलवारियाँ उजड़ जाती थी। दुर्भाग्यवश हमे यहाँ पर लगाई गयी बाड़ में काफी छेद दिखे, जिसके द्वारा लोग इन फुलवारियों में प्रवेश करते थे। इस पठार पर यहाँ-वहाँ कुछ मार्ग बनवाए गए हैं, जिससे की लोगों को इस पूरे पठार की सैर करने में आसानी हो।

कास पठार की यात्रा हेतु कुछ सूचनाएँ     

कास पठार के बीच से जाती सड़क
कास पठार के बीच से जाती सड़क
  • यहाँ पर बहुत ठंड पड़ती है और ज़ोर की हवाएँ भी चलती हैं, इसलिए जरूरत के अनुसार चीजें ले जाएं।
  • यहाँ पर बहुत सारे मच्छर और मक्खियाँ भिनभिनाती रहती हैं, इसलिए जितना हो सके अपने आपको स्कार्फ या जैकेट से ढक लीजिये और पूरे बदन को ढकने योग्य कपड़े पहनिए। ये मक्खियाँ आपकी आँखों में भी जा सकती हैं। जब हम वहाँ गए थे तो हम में से एक इन मक्खियों को दूर भगा रहा था और दूसरा वहाँ की तस्वीरें खींच रहा था।
  • हो सके तो पूरी तरह से बंद जूते ही पहनिए, क्योंकि यहाँ पर साँप और अन्य रेंगनेवाले जीव बहुत मात्रा में पाए जाते हैं।
  • अपने साथ एक आवर्धक काँच (magnifying glass) जरूर रखिए, क्योंकि यहाँ पर सूक्ष्म आकार के बहुत सारे फूल हैं, जिन्हें सामान्य रूप से देख पाना मुश्किल है।
  • इस पठार की तलहटी में महाराष्ट्र पर्यटन विकास निगम का, पाँच कमरों वाला एक छोटा सा गमन स्थान है, जहाँ से चलते हुए आप इन फुलवारियों तक पहुँच सकते हैं। यह एक छोटी सी पदयात्रा जैसी है जिसके दौरान आप सड़क के किनारे खिले विविध फूल और पठार के दोनों तरफ बसी घाटी के सुंदर दृश्य देख सकते हैं।
  • कास पठार पर लिखी गयी एक किताब के अनुसार यहाँ पर लगभग 80 प्रकार के फूल खिलते हैं, जिनका उल्लेख इस किताब में किया गया है। जब हमने इन फूलों को नजदीक से देखा तो हमे एहसास हुआ कि इनमें से अधिकतर फूल तो भारत में अन्यत्र भी पाए जाते हैं। इसलिए इन बातों पर जरूर ध्यान दीजिए।
  • यहाँ पर सामूहिक पुष्पन बहुत ही कम समय के लिए होता है और इस दौरान यहाँ पर लोगों की बहुत सारी भीड़ होती है। वैसे शेष मौसम में भी आप कुछ फूल और फुलवारियाँ जरूर देख सकते हैं। जिस समय हम वहाँ गए थे उस वक्त वहाँ पर पर्याप्त सफेद फूल और अन्य स्थानीय फूल भी खिले थे। तो इस बात को ध्यान में रखते हुए अपनी यात्रा का आयोजन कीजिये।
  • हमे सातारा की अन्य पहाड़ियों पर भी ऐसे बहुत सारे फूल दिखे। तो कास पठार के आस-पास के इलाकों की सैर जरूर कीजिये, जहाँ पर आप सुंदर-सुंदर फूल देख सकते हैं।
  • यहाँ पर सातारा से आने-जाने वाले सार्वजनिक परिवाहन बहुत ही सीमित और अप्रत्याशित हैं। शाम के 5 बजने के बाद आपको यहाँ कोई बस नहीं मिलती।
  • कास पठार पर जाने से पहले वहाँ के पुष्पन समय के बारे में जरूर पता करे, यद्यपि सामान्य रूप से वहाँ पर जाने का उत्तम समय मध्य अगस्त से सितंबर के अंत तक होता है।

महाराष्ट्र के अन्य दर्शनीय स्थल

बांद्रा की गली चित्रकारी के दर्शन, मुंबई के शहरी परिदृश्य

बाणगंगा सरोवर – मुंबई शहर की प्राचीन धरोहर

एलिफेंटा गुफाएं – शिव के अवतार – एक विश्व धरोहर

पुणे की पेशवाई धरोहर – शनिवार वाड़ा , मंदिर और बाज़ार

अजंता गुफा क्रमांक 1 की चित्रकारी – यूनेस्को की विश्व धरोहर

The post कास पठार – महाराष्ट्र के सातारा में फूलों की घाटी appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/kaas-pathar-valley-of-flowers/feed/ 2 662
एलोरा गुफाएँ – कैलाश मंदिर और गुफा – यूनेस्को विश्व धरोहर का स्थल https://inditales.com/hindi/kailash-mandir-ellora-cave-no-16/ https://inditales.com/hindi/kailash-mandir-ellora-cave-no-16/#respond Wed, 15 Aug 2018 02:30:20 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=657

जब भी कभी भारत के अतुल्य और अद्भुत वास्तुकला-संबंधी स्थलों की बात आती है तो उन में कैलाश गुफा अर्थात एलोरा गुफाओं की गुफा क्रमांक 16 का उल्लेख अवश्य आता है। महाराष्ट्र में बसे पर्यटन स्थलों में से औरंगाबाद की अजंता और एलोरा गुफाएँ वास्तव में एक दर्शनीय धरोहर का स्थल है। इन गुफाओं से […]

The post एलोरा गुफाएँ – कैलाश मंदिर और गुफा – यूनेस्को विश्व धरोहर का स्थल appeared first on Inditales.

]]>

जब भी कभी भारत के अतुल्य और अद्भुत वास्तुकला-संबंधी स्थलों की बात आती है तो उन में कैलाश गुफा अर्थात एलोरा गुफाओं की गुफा क्रमांक 16 का उल्लेख अवश्य आता है। महाराष्ट्र में बसे पर्यटन स्थलों में से औरंगाबाद की अजंता और एलोरा गुफाएँ वास्तव में एक दर्शनीय धरोहर का स्थल है। इन गुफाओं से संबंधित सभी तकनीकी और ऐतिहासिक विवरणों को जानने का सबसे अच्छा माध्यम है भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की वेबसाइट। इस यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल की विस्तृत जानकारी प्राप्त करने का यह सबसे विश्वसनीय स्त्रोत है।

कैलाश मंदिर - एलोरा गुफाएं - विश्व धरोहर
कैलाश मंदिर – एलोरा गुफाएं – विश्व धरोहर

तो चलिये अब मैं आपको एलोरा गुफाओं से संबंधित अपने कुछ अनुभवों के बारे में बताती हूँ। मैंने अपनी जिंदगी में दो बार इन गुफाओं के दर्शन किए हैं। इन दोनों मुलाकातों के बीच दो दशकों के लंबे समय का फासला रहा है और दोनों ही बार मेरे अनुभव एक-दूसरे से बहुत अलग रहे हैं।

एलोरा गुफाएँ – कैलाश मंदिर, गुफा क्रमांक 16  

एलोरा गुफा में रामायण कथा
एलोरा गुफा में रामायण कथा

90 के दशक के शुरुआती दौर में मेरे पिताजी को औरंगाबाद में तैनात किया गया था। यानी वह शहर जो एलोरा गुफाओं के सबसे नजदीक बसा हुआ है। हमारा घर भी इन गुफाओं से बस कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर स्थित था। घर पर आए हुए मेहमानों को सैर पर ले जाने की यही सबसे बढ़िया जगह बन गयी थी और इसका मतलब था, इन गुफाओं के अनेकों बार दर्शन। उस समय मैं सिर्फ एक विद्यार्थी थी और वह भी संगणक जैसे नए-नए उभर रहे क्षेत्र की।

तब मुझे इतिहास जैसे विषय में जरा सी भी रुचि नहीं थी और भारत में स्थित ऐसी गुफाओं के बारे में तो मैं बहुत ही कम जानती थी। इसका मुख्य कारण यह था कि मैं उत्तर भारत में पली-बड़ी थी। लेकिन आज जब मैं इन सारी बातों को याद करती हूँ तो मुझे इस बात का एहसास होता है कि शायद मैं कभी भी कला और इतिहास से एक विषय के रूप अवगत नहीं थी, जिन पर अध्ययन किया जा सके। लेकिन कई सालों बाद मैंने संयोगवश एवं रुचिपूर्वक इन विषयों पर अध्ययन करना शुरू किया, जो हो न हो मेरी भारत यात्राओं का प्रभाव था।

एलोरा गुफाओं से जुड़ी कुछ यादें  

गजलक्ष्मी - एलोरा गुफाएं
गजलक्ष्मी – एलोरा गुफाएं

इस पृष्ठभूमि के साथ-साथ मुझे आज भी वे सारे पल साफ-साफ याद हैं जब हम पहली बार कैलाश गुफा के दर्शन करने गए थे। तब हमारे साथ एक वयोवृद्ध व्यक्ति थे, जो मेरे पिताजी के स्थानीय सहकर्मी थे। उन्होंने हमे विस्तार से समझाया कि ये गुफा किस प्रकार खोदी गयी थी। जब उन्होंने हमे बताया कि यह गुफा ऊपर से नीचे खोदी गयी थी तो हम सब चकित रह गए थे। आगे उन्होंने हमे बताया कि यहाँ पर जो मंदिर है वह पूरा का पूरा केवल एक ही बड़े पत्थर से उत्कीर्णित किया गया है। जब मैंने ऊपर देखा तो वह पूरा मंदिर जैसे मेरी चारों ओर घूम रहा था।

यह सब देखकर मैं इसी सोच में पड़ गयी कि इस गुफा के कारीगरों ने ना जाने यह सब कितनी सूक्ष्मता और स्पष्टता से किया होगा। खासकर जब आप स्तंभों से बने गलियारे से गुजरते हैं, तो ऊपर से बाहर निकलती हुई विशाल चट्टानें आपको हैरान कर देती हैं। कला के क्षेत्र से संबंधित अत्यंत सीमित जानकारी रखनेवाला, वैज्ञानिक रूप से प्रशिक्षित मेरा दिमाग इसे अभियांत्रिकी के चमत्कार के रूप में देख रहा था। ऊपर से मेरी आँखों को सफ़ेद संगमरमर से बने मंदिर देखने की आदत थी जिनके ऊपर ऊंचे-ऊंचे शिखर होते हैं और चालुक्य शैली में निर्मित यह मंदिर मेरे इस सीमित ज्ञान के चौखट से बिलकुल अनोखा और परे था।

एलोरा गुफाओं के उत्कीर्णन    

कैलाश मंदिर की दीवारों पर बचा हुआ रंग
कैलाश मंदिर की दीवारों पर बचा हुआ रंग

मेरे पिताजी के दोस्त, जो हमारे लिए गाइड की भूमिका निभा रहे थे, ने हमे पत्थरों पर बने इन उत्कीर्णनों के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने हमे महाभारत और रामायण जैसे महाकाव्यों की घटनाओं पर आधारित कुछ उत्कीर्णन दृश्य दिखाये। इन में से मुझे रावण द्वारा कैलाश पर्वत को हिलाने वाला वह उत्कीर्णित दृश्य आज भी स्पष्ट याद है। उस में उत्कीर्णित मौखिक हाव-भाव और दृश्यों के बीच की एकबद्धता इस पूरी घटना को उत्तम रूप से प्रदर्शित कर रही थी।

मैंने पत्थर से उत्कीर्णित इतने विशाल हाथी पहले कभी नहीं देखे थे। इसके अतिरिक्त उन्होंने हमे यहाँ स्थित और भी कई आकृतियों के बारे में बताया, जैसे कि गंगा, यमुना आदि। पर सच कहूँ, तो उस वक्त मैं इसी सोच में पड़ी थी कि उन्हें इन सब के बारे में इतना सबकुछ कैसे पता, यह तो कुछ भी हो सकता है; क्योंकि तब तक मुझे प्रतिमा विज्ञान जैसे किसी विषय के बारे में जरा भी अंदाज़ा नहीं था। बाद में वे हमे मंदिर की छत के ऊपर ले गए और हमे थोड़ी दूर से यह मंदिर दिखाया, जहाँ से आप उसके विराट आकार की जी भर के प्रशंसा कर सकते हैं। उस वक्त मैं सहज रूप से उसकी प्रशंसा में खो चुकी थी। पता नहीं वह कौन सी बात थी जो मुझे उस वक्त उस वास्तुकला के प्रति आकर्षित कर रही थी।

2013 के शुरुआती दौर में मुझे फिर से एलोरा गुफाओं के दर्शन करने का मौका मिला। जब मैं वहाँ गयी तो मैंने देखा कि वे गुफाएँ वैसे की वैसे थीं। दो दशकों का यह समय गुफाओं के जीवन काल का बहुत ही कम समय होगा लेकिन मेरे लिए ये 20 वर्ष काफी लंबा समय था। मैं बहुत बदल चुकी थी, इन 20 सालों के दौरान मैं बहुत प्रवास कर चुकी थी। इस दौरान मुझ में इतिहास के प्रति एक प्रकार की तृष्णा सी पैदा हो गयी थी और अब मैं पहले से कई ज्यादा कला की कद्र करने लगी थी। मेरी आँखों में आज भी वही विस्मय था, लेकिन इस बार वह गुफाओं की अभियांत्रिकी से कई अधिक उसकी अद्वितीय कारीगरी के लिए था।

एलोरा गुफाओं के हाल ही में किए गए दर्शन – कैलाश गुफा   

कैलाश मंदिर - एलोरा गुफाएं
कैलाश मंदिर – एलोरा गुफाएं

इस बार बिना किसी के दिखाये मैंने मंदिर की दीवारों पर यहाँ-वहाँ उखड़े हुए रंगों के निशान देखे। मैंने अनुमान लगाने की कोशिश की, कि जब यह मंदिर अपने संपूर्ण वैभव में था तब कितना सुंदर दिखता होगा। मैं जानना चाहती थी, अगर इस मंदिर को फिर से रंगवाने का कोई तरीका है, ताकि उसे फिर से उसके मूल वैभव में लाया जा सके। इस बार मैंने इस गुफा के कुछ अपूर्ण भागों को भी ध्यान से देखा।

मैं यहाँ-वहाँ देखते हुए आगे बढ़ने लगी, और प्रतिमा विज्ञान की थोड़ी-बहुत जानकारी के आधार पर, तथा मंदिर के सांस्कृतिक और आर्थिक मूल्यों की समझ के साथ, वहाँ के उत्कीर्णनों को समझने का प्रयास करने लगी। मैं नक्काशीकाम से परिपूर्ण इन गलियारों के प्रत्येक उत्कीर्णनों की प्रशंसा करते हुए आगे बढ़ती गयी। मैं सीढ़ियाँ चढ़ते-उतरते हुए यहाँ की हर वस्तु का सभी संभव कोणों से अवलोकन करने की कोशिश कर रही थी। इस बार मैं गाइड द्वारा बताई जा रही बातों को परखने की कोशिश करने के बजाय, उनसे और भी जानकारी प्राप्त करने का प्रयास कर रही थी।

मैं वहाँ पर बैठकर एक चित्रकार को देखने लगी जो अपनी आस-पास की दुनिया से बेखबर, कुछ दूर बैठकर, कागज पर इस मंदिर का चित्र बना रहा था, जैसे कि वह अपने मन में इस मंदिर का पुनर्निर्माण कर रहा हो।

एलोरा गुफाएँ – जैन और बौद्धों की गुफाएँ    

मैंने एलोरा की जैन और बौद्ध गुफाओं के भी दर्शन किए, लेकिन कैलाश गुफा की खूबसूरती ने जैसे मेरे आँखों पर पट्टी बांध रखी थी। मैं उस गुफा के प्रति इतनी आकर्षित हो गयी थी कि उसके अलावा मैं दूसरी चमकदार गुफाओं की प्रशंसा भी नहीं कर पा रही थी। जो शायद मुझे किसी और दिन देखनी चाहिए थीं।

8वी शताब्दी के दौरान निर्मित ये गुफाएँ, भारतीय इतिहास की 8वी-9वी शताब्दी के आस-पास के काल में ठीक रूप से बैठती हैं। उस समय भारत में यहाँ-वहाँ उत्कीर्णित मंदिरों का उल्लेख मिलता है, जो उस दौरान अपने पूर्ण वैभव में थे, जहाँ पर भगवान को पूजा जा रहा था और उनमें से एक भी पत्थर नहीं उखड़ा था। अगर उस जमाने की आबादी को ध्यान में रखे तो शायद उस समय यह सबकुछ किसी स्वर्ग से कम नहीं लगता होगा।

जैसे कि जेन की कहावत है, कि ‘यह समय भी गुजर जाएगा’, वह युग भी गुजर गया, लेकिन शुक्र है कि वह हमारे लिए अपनी कुछ झलकियाँ छोड़ गया जो आगे चलकर हमे ऐसे ही प्रेरित करती रहेंगी।

मेरा आप से अनुग्रह है कि आप अजंता और एलोरा गुफाओं के दर्शन जरूर करें। यह महाराष्ट्र की प्रसिद्ध और दर्शनीय जगहों में से एक है।

भारत के अन्य विश्व धरिहार स्थल

अजंता की गुफाएं

एलेफंटा गुफाएं

चित्तौरगढ़ दुर्ग

नालंदा विश्वविद्यालय

रानी की वाव – पाटन गुजरात

 

The post एलोरा गुफाएँ – कैलाश मंदिर और गुफा – यूनेस्को विश्व धरोहर का स्थल appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/kailash-mandir-ellora-cave-no-16/feed/ 0 657