शिव Archives - Inditales श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Mon, 12 Feb 2024 07:45:34 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.7.5 उडुपी के प्राचीन शिव मंदिर https://inditales.com/hindi/udupi-ke-prachin-shiv-mandir/ https://inditales.com/hindi/udupi-ke-prachin-shiv-mandir/#respond Wed, 12 Jun 2024 02:30:46 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3625

कर्णाटक के तटीय क्षेत्र में बसा उडुपी नगर अनेक प्राचीन मंदिरों तथा स्वादिष्ट उडुपी व्यंजनों के लिए अत्यंत लोकप्रिय है। उडुपी नगर के हृदयस्थल पर श्री कृष्ण मठ स्थित है जो एक मंदिर भी है। १३वीं सदी में निर्मित इस मंदिर की स्थापना श्री माधवाचार्य जी ने की थी। इस मंदिर के चारों ओर ८ […]

The post उडुपी के प्राचीन शिव मंदिर appeared first on Inditales.

]]>

कर्णाटक के तटीय क्षेत्र में बसा उडुपी नगर अनेक प्राचीन मंदिरों तथा स्वादिष्ट उडुपी व्यंजनों के लिए अत्यंत लोकप्रिय है। उडुपी नगर के हृदयस्थल पर श्री कृष्ण मठ स्थित है जो एक मंदिर भी है। १३वीं सदी में निर्मित इस मंदिर की स्थापना श्री माधवाचार्य जी ने की थी। इस मंदिर के चारों ओर ८ मठों की स्थापना की गयी है। वर्ष भर असंख्य भक्तगण, दर्शनार्थी एवं श्रद्धालू अत्यंत उत्साह से इस मंदिर के दर्शन करते हैं। मंदिर परिसर के भीतर भगवान शिव के दो प्राचीन मंदिर भी स्थित हैं।

शैव धर्म को समर्पित इन प्राचीन मंदिरों के नाम हैं, अनंतेश्वर मंदिर एवं चन्द्रमौलीश्वर मंदिर। इन दो प्राचीन मंदिरों की उपस्थिति ने श्री कृष्ण मंदिर की स्थापना के पूर्व से ही उडुपी को एक पावन भूमि का स्तर प्रदान कर दिया था। प्रचलित प्रथाओं के अनुसार श्री कृष्ण मंदिर के दर्शन से पूर्व इन दो मंदिरों के दर्शन करना आवश्यक है।

उडुपी के प्राचीन शिव मंदिर

चन्द्रमौलीश्वर मंदिर

उडुपी नगर का इतिहास उडुपी नाम में ही सन्निहित है। उडुपी नाम की व्युत्पत्ति संस्कृत शब्द उडुपा से हुई है जिसका शाब्दिक अर्थ है, नक्षत्रों के स्वामी चन्द्र। प्रचलित किवदंतियों के अनुसार चन्द्र का विवाह दक्ष प्रजापति की २७ पुत्रियों से हुआ था। दक्ष प्रजापति की २७ पुत्रियाँ २७ नक्षत्रों का प्रतीक हैं। उन २७ पत्नियों में से चन्द्र को रोहिणी से विशेष स्नेह था जिसके कारण उनसे अपनी अन्य २६ पत्नियों की उपेक्षा हो गयी। जब चन्द्र की २६ पत्नियों ने अपने पिता दक्ष से अपनी व्यथा कही, तब दक्ष ने चन्द्र के इस व्यवहार से क्रोधित होकर उन्हे श्राप दे दिया कि उनकी कान्ति शनैः शनैः क्षीण हो जायेगी तथा एक दिवस वे कांतिहीन हो कर विस्मृत हो जायेंगे। इस श्राप से मुक्ति पाने के लिए चन्द्र ने भगवान शिव की आराधना की तथा कठोर तप किया।

चन्द्रमौलीश्वर मंदिर उडुपी
चन्द्रमौलीश्वर मंदिर उडुपी

चन्द्र की घोर तपस्या से प्रभावित होकर भगवान शिव ने श्राप के ताप को दुर्बल करते हुए इन्हें पूर्णतः क्षय हो जाने के स्थान पर क्रमवार क्षय एवं वृद्धि होने की क्षमता प्रदान की। जिस स्थान पर चन्द्र ने भगवान शिव की घोर तपस्या की थी, उस स्थान को अब्जारण्य कहा गया जो अब उडुपी है। समीप स्थित सरोवर चन्द्रपुष्करणी कहलाया। इस घटना के पश्चात भक्तों ने भगवान शिव को चन्द्रमौलीश्वर की उपाधि से अलंकृत किया।

मंदिर का परिसर

चन्द्रमौलीश्वर मंदिर का निर्माण ८वीं सदी में किया गया था। यह मंदिर स्थापत्य कला की उडुपी शैली में निर्मित है। इसकी छत ढलवाँ है तथा भूमि पर शीतल ग्रेनाईट शिलाओं की परत है। यह मंदिर श्री कृष्ण मठ के समक्ष स्थित है। इसके एक ओर इस क्षेत्र का सर्वाधिक लोकप्रिय जलपानगृह मित्र समाज स्थित है।

मंदिर में स्थित नंदी का विग्रह एक ओर झुका हुआ है जिसके कारण शिवलिंग के दर्शन प्राप्त करने के लिए हमें भी अपना शीष उसी प्रकार झुकाना पड़ता है। यह मंदिर भूतल से लगभग ६ फीट नीचे स्थित है। मंदिर में प्रवेश करने के लिए हमें कुछ सोपान नीचे उतरना पड़ता है। भूतल से नीचे स्थित होने के पश्चात भी इस मंदिर में कभी भी बाढ़ के जल ने प्रवेश नहीं किया है।

ऐसी मान्यता है कि मंदिर में स्थापित स्फटिक के शिवलिंग का रंग एक दिवस में तीन बार परिवर्तित होता है। प्रातःकाल शिवलिंग श्याम वर्ण का प्रतीत होता है, दूसरे प्रहर में नीलवर्ण तथा रात्रि काल में श्वेत प्रतीत होता है। शिवलिंग पर चाँदी का मुख अथवा मुखौटा चढ़ाया जाता है। पर्याय स्वामीजी पर्याय सिंहासन पर विराजमान होने से पूर्व चन्द्रमौलीश्वर मंदिर में भगवान के दर्शन करते हैं। इसके पश्चात वे भगवान अनंतेश्वर एवं श्री कृष्ण के दर्शन करते हैं। यह प्रथा अब भी अनवरत अखंडित चली आ रही है।

अनंतेश्वर मंदिर

उडुपी को तुलु भाषा में ओडिपू कहते हैं। ओडिपू शब्द संस्कृत शब्द रजतपीठपुर से प्रेरित है जिसका अर्थ है, चाँदी के पीठासन का नगर। अनंतेश्वर मंदिर के भीतर अनंतेश्वर लिंग चाँदी द्वारा निर्मित एक प्राचीन पीठासन पर प्रतिष्ठापित है। इस परशुराम क्षेत्र पर राजा रामभोज का आधिपत्य था।

अनंतेश्वर मंदिर उडुपी
अनंतेश्वर मंदिर उडुपी

एक समय राजा रामभोज ने स्वयं को चक्रवर्ती सम्राट अर्थात् सम्पूर्ण धरती का निर्बाध सम्राट सिद्ध करने के लिए अश्वमेध यज्ञ करने का निश्चय किया। अश्वमेध यज्ञ की यज्ञ भूमि चन्द्रमौलीश्वर मंदिर के पश्चिमी पार्श्वभाग पर स्थित थी। यज्ञ वेदी के निर्माण के लिए जब भूमि की जुताई की जा रही थी तब एक सर्प हल से आहत हो गया तथा उसकी मृत्यु हो गयी। सर्पहत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए राजा ने पूर्ण श्रद्धा से भगवान शिव की आराधना की। भगवान् शिव राजा की घोर तपस्या से प्रसन्न हुए। राजा को पापमुक्त करने के लिए भगवान ने उसे यज्ञ भूमि पर चाँदी के पीठासन का निर्माण कराकर उस पर लिंग की स्थापना कराने का आदेश दिया। कालान्तर में यही लिंग अनंतेश्वर लिंग कहलाया तथा उस पर निर्मित मंदिर को अनंतेश्वर मंदिर कहा गया।

तुलुनाडू का प्राचीनतम मंदिर होने के नाते यह मंदिर शिवल्ली ब्राह्मण समुदाय का आध्यात्मिक केंद्र है। ऐसी मान्यता है कि माधवाचार्य के माता-पिता ने संतान प्राप्ति के लिए १२ वर्षों तक अनंतेश्वर मंदिर में अनंतेश्वर स्वामी की आराधना की थी।

मंदिर का परिसर

अनंतेश्वर मंदिर को लगभग २री. सदी में निर्मित माना जाता है। भित्तियों का निर्माण करने के लिए ग्रेनाईट के फलकों को चूने के पलस्तर से जोड़ा गया है। यह एक अनूठा मंदिर है। इस मंदिर में भगवान शिव के साथ शेषनाग विराजमान हैं। इसी कारण इस मंदिर में शैव एवं वैष्णव, दोनों मान्यताओं के भक्तगण आते हैं।

इस मंदिर के गर्भगृह के दो भाग हैं। जहाँ एक भाग भक्तों को दृश्यमान है, वहीं दूसरा भाग मूलस्थान के पृष्ठभाग में होने के कारण भक्तों के लिए अदृश्यमान है। प्रवेश द्वार पर शंख एवं चक्र की आकृतियाँ देखी जा सकती हैं। मंदिर के विशेष आकर्षणों में मंदिर परिसर में विराजमान ४० फीट उंचा दीपस्तंभ भी सम्मिलित है। भक्तगण तेल का आर्पण करते हुए दीपों को प्रज्ज्वलित करते हैं।

मंदिर की परिक्रमा करते हुए आप भित्तियों पर गणपति एवं पार्वती की छवियाँ देख सकते हैं। मंदिर के एक कोने में शेषनाग एवं ऐयप्पा स्वामी की लघु आकृतियाँ हैं जो शक्तिशाली देवों का प्रतिनिधित्व करते हैं। शेषनाग की प्रतिमा शुद्ध स्वर्ण धातु में निर्मित है।

उडुपी के शिव मंदिरों में शिवरात्रि पर्व का उत्सव

हम सब इस तथ्य से परिचित हैं कि भगवान शिव की सर्वाधिक पावन आराधना बिल्व पत्र अर्चना मानी जाती है। उडुपी के इन दोनों प्राचीन मंदिरों में विशेष रुद्राभिषेक एवं बिल्वपत्र अर्चना द्वारा भगवान शिव की आराधना की जाती है। माधवाचार्य जी के अनुयायी अथवा माधव ब्राह्मण समुदाय के विष्णु आराधक शिवरात्रि के दिवस उपवास अथवा अल्पभोजन करने के स्थान पर भरपेट भोजन करते हैं। वैष्णव प्रथाओं को मानने के पश्चात भी शिव की आराधना करने में उन्हें तनिक भी संकोच नहीं होता है। वे शिवपंचाक्षर मंत्र का जप करते हुए भिन्न भिन्न उपचारों व सेवाओं द्वारा भगवान शिव की पूजा-अर्चना करते हैं।

अनंतेश्वर मंदिर की शिल्प कला
अनंतेश्वर मंदिर की शिल्प कला

महाशिवरात्रि पर्व के अवसर पर सूर्यास्त के पश्चात दोनों मंदिरों में रथोत्सव का आयोजन किया जाता है। महाशिवरात्रि उत्सव के अंतिम दिवस अनंतेश्वर महादेव के लिए विशेष रथोत्सव का आयोजन किया जाता है। शिवरात्रि के उत्सव में भाग लेने के लिए अनेक भक्तगण यहाँ आते हैं। मैंने शिवरात्रि उत्सव से एक दिवस पश्चात मंदिर के दर्शन किये थे। चारों ओर निर्मल एवं शांत वातावरण था। मंदिर में भक्तों की संख्या नगण्य थी। मुझे अपने चारों ओर सकारात्मक उर्जा का दिव्य अनुभव प्राप्त हो रहा था।

हमने मथुरा में भी देखा था कि कृष्ण की नगरी का संरक्षण करते चार प्राचीन शिव मंदिर हैं। ऐसी मान्यता है कि उडुपी के शिव मंदिरों के समान ये मंदिर भी कृष्ण के काल से भी अधिक पुरातन हैं।

संस्कृति एवं पाकशैली

उडुपी तुलुनाडू एवं प्राचीन परशुराम क्षेत्र का एक अभिन्न अंग है। उडुपी में तीन भिन्न भिन्न संस्कृतियों का सम्मिश्रण दृष्टिगोचर होता है, कन्नड़, तुलु एवं कोंकणी। इसी कारण यहाँ की पाकशैली एवं यहाँ के व्यंजन तीनों संस्कृतियों के विभिन्न मसालों एवं स्वादों का अद्भुत समागम है।

उडुपी का पर्यटन मानचित्र
उडुपी का पर्यटन मानचित्र

सज्जिगे बाजिल, मैंगलोर बंस, गोली भाजे, बिस्कुट अम्बाडे, बोंडा सूप, मीठे अवलक्की, सन्ना पोला, मेंथे दोसे आदि उन स्वादिष्ट व्यंजनों में से हैं जो इन तीनों संस्कृतियों के अभिन्न अंग हैं। ये सभी व्यंजन मंदिर परिसर के भीतर स्थित अनेक जलपानगृहों में भी उपलब्ध हैं। इन स्वादिष्ट व्यंजनों के लिए १०० वर्ष प्राचीन जलपानगृह, ‘मित्र समाज’ विशेषरूप से प्रसिद्ध है। कुरकुरा मसाला डोसा एवं मूदे इडली के साथ गर्म फिल्टर कॉफी हमारी जिव्हा एवं मन दोनों को तृप्त कर देती है।

और पढ़ें: मुंह में पानी लाने वाले २५ स्वादिष्ट भारतीय गलियों के व्यंजन (स्ट्रीट फूड)

दोपहर के भोजन के लिए शुद्ध शाकाहारी कोंकणी थाली एक स्वादिष्ट विकल्प है जो यहाँ के अनेक भोजनालयों में उपलब्ध है। इस थाली की विशेषता है, भिन्न भिन्न प्रकार के उपकारी, दाल तोय एवं विभिन्न प्रकार के पोड़ी। बसवेश्वर खानावल्ली में आपकी जिव्हा एवं मन को तृप्त करने के लिए स्वादिष्ट उत्तर कर्णाटक व्यंजनों से सज्ज थाली उपलब्ध है। इस थाली के प्रमुख व्यंजन हैं, जोलदा रोटी, एन्ग्गई पाल्या, होलिगे आदि।

उडुपी भिन्न भिन्न प्रकार के आइसक्रीमों के लिए भी लोकप्रिय है। सर्वप्रसिद्ध एवं लोकप्रिय गड़बड़ आइसक्रीम का आविष्कार यहाँ के होटल डायना में ही हुआ था। यहाँ के प्रत्येक जलपानगृहों एवं भोजनालयों में भिन्न भिन्न प्रकार के आइसक्रीम एवं उनके निराले सम्मिश्रण परोसे जाते हैं। उडुपी के उष्ण एवं आर्द्र वातावरण में ये स्फूर्ति के स्त्रोत होते हैं। उडुपी के मंदिरों में सदियों से दूर-सुदूर से तीर्थयात्री भगवान के दर्शनार्थ आते रहे हैं। उडुपी ने सदा स्वादिष्ट एवं सात्विक व्यंजनों से उनकी सेवा की है। इसी कारण यहाँ उत्तम स्तर के उत्तर भारतीय व्यंजन भी उपलब्ध हैं।

उडुपी के शिव मंदिरों के दर्शन का सर्वोत्तम काल

सितम्बर मास से फरवरी मास का समयकाल उडुपी भ्रमण के लिए सर्वोत्तम काल है। ग्रीष्म ऋतु में यहाँ की ऊष्णता एवं आर्द्रता अत्यंत कष्टकारी होती हैं। जून मास से सितम्बर मास तक यहाँ घनघोर वर्षा होती है। यद्यपि वर्षा काल में उडुपी भ्रमण किंचित असुविधाजनक हो, तथापि इस काल में उडुपी भ्रमण आपको मनोरम प्राकृतिक दृश्यों से सराबोर भी कर देगा। वर्षा काल में उडुपी एवं आसपास के क्षेत्र अत्यंत मनोरम प्रतीत होते हैं।

सोमवार भगवान शिव के लिए एक विशेष दिवस होता है। इसलिए सोमवार के दिन मंदिरों में भक्तों का तांता लगा रहता है।

परिवहन एवं आवास सुविधाएं

उडुपी पहुँचने के लिए निकटतम विमानतल मंगलुरु में है जो उडुपी से लगभग ५५ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। मंगलुरु से आप सड़कमार्ग द्वारा उडुपी पहुँच सकते हैं।

यदि आपको रेल यात्राएं प्रिय हैं तो आप रेल मार्ग द्वारा भी मंगलुरु पहुँच सकते हैं। यदि आप बंगलुरु की ओर से आ रहे हैं तो मेरा सुझाव है कि आप बंगलुरु से करवार एक्सप्रेस अथवा विस्टाडोम से यात्रा करें। ८ घंटों की यह रेल यात्रा आपको पश्चिमी घाटों के अप्रतिम परिदृश्यों के दर्शन का सुअवसर प्रदान करेगी। बंगलुरु, मुंबई, पुणे, मंगलुरु आदि नगरों से यहाँ तक की सुविधाजनक बस सेवायें भी सुगमता से उपलब्ध हैं।

चूँकि उडुपी नगर अनेक वर्षों से तीर्थयात्रा का केंद्र रहा है, आवास हेतु यहाँ अनेक सुविधाजनक विश्राम गृह उपलब्ध हैं। आपकी व्यय क्षमता के अनुसार यहाँ अनेक अतिथिगृह, धर्मशालाएं, होटल एवं होमस्टे आदि की उत्तम सुविधाएं हैं। आपको भिन्न भिन्न प्रकार के स्वादिष्ट शाकाहारी भोजन का आनंद प्रदान करने के लिए अनेक भोजनालय आपकी सेवा के लिए तत्पर हैं।

यह संस्करण इंडीटेल्स प्रशिक्षण योजना के अंतर्गत अक्षया विजय द्वारा लिखित एवं प्रदत्त है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post उडुपी के प्राचीन शिव मंदिर appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/udupi-ke-prachin-shiv-mandir/feed/ 0 3625
बिसरख – रावण का जन्मस्थान ग्रेटर नोएडा का प्राचीन गाँव https://inditales.com/hindi/ravan-janamsthan-bisrakh-gaon-noida/ https://inditales.com/hindi/ravan-janamsthan-bisrakh-gaon-noida/#respond Wed, 10 Apr 2024 02:30:30 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3429

बिसरख, यह नाम ऋषि विश्रवा के नाम से व्युत्पत्त है। काल के साथ अपभ्रंशित होते हुए यह नाम बिसरख में परिवर्तित हो गया। ऋषि विश्रवा दशमुख रावण के पिता थे। कुछ सूत्रों के अनुसार रावण का जन्म बिसरख हुआ था, वहीं कुछ का मानना है कि रावण ने अपने बाल्यावस्था का कुछ काल यहाँ व्यतीत […]

The post बिसरख – रावण का जन्मस्थान ग्रेटर नोएडा का प्राचीन गाँव appeared first on Inditales.

]]>

बिसरख, यह नाम ऋषि विश्रवा के नाम से व्युत्पत्त है। काल के साथ अपभ्रंशित होते हुए यह नाम बिसरख में परिवर्तित हो गया। ऋषि विश्रवा दशमुख रावण के पिता थे। कुछ सूत्रों के अनुसार रावण का जन्म बिसरख हुआ था, वहीं कुछ का मानना है कि रावण ने अपने बाल्यावस्था का कुछ काल यहाँ व्यतीत किया था।

बिसरख एक प्राचीन गाँव है जो नोएडा महानगरी में स्थित है। वस्तुतः यह ग्रेटर नोएडा का सेक्टर १ है। दिल्ली में आप कहाँ से जा रहे हैं, उसके आधार पर यह गाँव दिल्ली से लगभग २० से ३० किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

बिसरख भ्रमण

नोएडा एवं ग्रेटर नोएडा के चौड़े द्रुतगामी महामार्गों के माध्यम से वाहन द्वारा बिसरख पहुँचने में हमें १५-२० मिनट का समय लगा।

यहाँ पहुँचकर हमारी दृष्टि सर्वप्रथम किराने की एक दुकान पर पड़ी जिसका नाम रावण किराना स्टोर था। इसके पार्श्व में एक गैरेज के भीतर रावण डीजे अपनी उपस्थिति दर्शा रहा था। यह बिसरख गाँव में रावण से संबंधित जीवंत दंतकथा से मेरा प्रथम परिचय था। इस दुकान के समक्ष अनामी धाम नामक एक बड़ा आश्रम है।

रावण के नाम पे दुकानें
रावण के नाम पे दुकानें

हमने किराने की दुकान के स्वामी से कुछ संवाद साधे तथा उनसे रावण के मंदिर का मार्ग पूछा। हमें गाँव के भीतर से जाते एक मार्ग पर चलने का परामर्श दिया गया। वह एक संकरा मार्ग था किन्तु उसके दोनों ओर कई सुंदर व विशाल भवन थे।

सँकरे मार्ग पर चलते हुए हम एक निर्जन स्थान पर जा पहुँचे। यहीं पर हमें एक मंदिर दृष्टिगोचर हुआ जिस पर एक ऊंचा शिखर था। हमें ज्ञात हुआ कि यह वो मंदिर नहीं था जिसके शोध में हम यहाँ तक पहुँचे थे। हमारा उद्देशित मंदिर बाईं दिशा में कुछ आगे जाकर था।

बिसरख का प्राचीन शिव मंदिर

एक तोरण के मध्य से हम मंदिर परिसर में पहुँचे। मंदिर के अलंकृत प्रवेशद्वार एवं हमारे मध्य एक इकलौता वृक्ष था। मंदिर के चारों ओर नवीन प्राकार का निर्माण किया जा रहा था। उस पर रावण के जीवनकाल से संबंधित कथाओं एवं घटनाओं के दृश्यों को अप्रतिम शिल्पकला द्वारा प्रदर्शित किया जा रहा था।

बिसरख का प्राचीन शिव मंदिर
बिसरख का प्राचीन शिव मंदिर

इन अप्रतिम शिल्पावलियों का अवलोकन करते हुए हमने परिसर में भ्रमण किया। कुछ शिल्पकारों से चर्चा भी की जो पार्श्व भाग में स्थित एक भित्ति पर रावण के अनुज भ्राता विभीषण का एक चित्र गढ़ रहे थे। इन शिल्पकार्यों को करने के लिए वे ओडिशा से विशेषरूप से यहाँ पधारे थे। इससे पूर्व मैंने जाजपुर में भी ओडिशा के शैल शिल्पकारों से भेंट की थी। इन शिल्पकारों से चर्चा करते हुए मुझे उनका स्मरण हो आया।

बिसरख मंदिर में रावण
बिसरख मंदिर में रावण

द्वार के दाहिने ओर आप दशमुख रावण का शिल्प स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। बायीं ओर ब्रह्मा की आराधना करते विश्रवा ऋषि का शिल्प है। एक दृश्य में ऋषि विश्रवा एवं उनकी धर्मपत्नी साथ में पूजा कर रहे हैं। एक अन्य दृश्य में भगवान शिव को अपना शीष अर्पण करते रावण को दर्शाया गया है। हमारे समक्ष शिल्पकार रावण के दो भ्राताओं, विभीषण एवं कुंभकर्ण से संबंधित दृश्यों पर शिल्पकारी कर रहे थे।

मुख्य प्रवेशद्वार के ऊपर गणेश की आसनस्थ मुद्रा में विशाल प्रतिमा है। उनके एक ओर वाहन उल्लू पर आरूढ़ देवी लक्ष्मी हैं तो दूसरी ओर हंस पर विराजमान देवी सरस्वती हैं। शंखनाद करते ऋषियों के शिल्प हैं। यहाँ कुछ नाग शिल्प भी हैं।

शिव मंदिर
शिव मंदिर

हमने मंदिर के विस्तृत परिसर में प्रवेश किया। परिसर के आकार की तुलना में मंदिर अत्यंत लघु प्रतीत होता है। मंदिर के रूप में एक छोटा सा कक्ष है जिसके भीतर एक शिवलिंग है। शिवलिंग के समक्ष मुक्ताकाश प्रांगण में नंदी की एक छोटी प्रतिमा है। इस मुख्य लिंग के ऊपर गुलाबी रंग में रंगी बाह्य संरचना है।

देवी मूर्ति
देवी मूर्ति

ऐसी मान्यता है कि यहाँ के वनीय प्रदेश में ऋषि विश्रवा को यह शिवलिंग प्राप्त हुआ था। उन्होंने ही यहाँ इस शिवलिंग की स्थापना की तथा उसकी आराधना की। इसीलिए इस शिवलिंग को स्वयंभू शिवलिंग कहा जाता है।

श्रावण

श्रावण मास चल रहा था। यह मास शिव भक्तों के लिए अत्यंत विशेष माना जाता है। हमने देखा कि अनेक भक्तगण मंदिर में दर्शन कर रहे थे तथा शिवलिंग का जलाभिषेक कर रहे थे। शिवलिंग के समीप एक स्त्री अपने मुख को दुपट्टे से ढँककर बैठी थी तथा ध्यान कर रही थी। उसकी उपस्थिति मंदिर की दिव्यता को एक नवीन आयाम प्रदान कर रही थी।

मंदिर में स्थापित लिंग प्राचीन प्रतीत होता है। धातु में निर्मित नाग शिवलिंग का अलंकरण करता हुआ विराजमान है। हमने शिवलिंग का अष्टभुजाकार आधार तत्व भी देखा। शिवलिंग को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि किसी काल में यह योनि पर स्थापित रहा होगा किन्तु अब ग्रेनाइट के टाइल पर स्वतंत्र रूप से विराजमान है।

भित्ति के आले पर देवी पार्वती की लघु किन्तु अप्रतिम विग्रह स्थापित है। उनके साथ उनके दोनों पुत्र गणेश एवं कार्तिकेय भी विराजमान हैं।

नवग्रह मंदिर

शिव मंदिर के निकट एक लघु मुक्ताकाश मंदिर है जो नवग्रह को समर्पित है। सूर्य का विग्रह अत्यंत विशेष है। यहाँ सूर्य को एक विलक्षण एक-चक्री रथ पर विराजमान दर्शाया गया है। इस रथ को दो अश्व हाँक रहे हैं। रथ पर आरूढ़ सूर्य का विग्रह नवग्रह मंडल के मध्य में स्थापित है।

यम की प्रतिमा इस प्रकार स्थापित है कि उनकी दृष्टि नवग्रह विग्रहों पर स्थिर है। ये विग्रह प्राचीन प्रतीत होते हैं। उनमें से एक विग्रह भंगित है।

विश्रवा मंदिर

नवग्रह मंदिर के समीप एक विशाल कक्ष है जिसके भीतर सभी देवी-देवताओं की पूर्णकाय मूर्तियाँ हैं। उन सभी मूर्तियों में ऋषि विश्रवा की प्रतिमा विशेष है। यह मूर्ति एक शिवलिंग के समक्ष स्थित है।

ऋषि विश्रवा की प्रतिमा के निकट मुझे सूर्य देव की एक सुंदर प्रतिमा दिखी जिसमें वे अपने सात अश्वों के साथ विराजमान हैं। यह शिल्प काली शिला पर उकेरी हुई है। सूर्य देव के इस विग्रह ने मुझे सूरजकुंड का स्मरण करा दिया जो यहाँ से निकट ही स्थित है।

इस कक्ष के कुछ अन्य विग्रहों में निम्न विग्रह भी अनूठे हैं-

  • गणेश एवं कार्तिकेय संग गौरी शंकर
  • श्वेत अश्व पर आरूढ़ कलकी देव
  • लक्ष्मी नारायण
  • रावण का चचेरा भ्राता कुबेर
  • राधा कृष्ण
  • अपने अश्व को हाँकते बाबा मोहन राम जी
  • हनुमान जी
  • माँ काली

उपरोक्त विग्रहों के नामों को पढ़ते हुए आप बाबा मोहन राम जी के विषय में जानने के लिए अवश्य उत्सुक हुए होंगे। बाबा मोहन राम जी एक संत हैं जिन्होंने इस मंदिर एवं बिसरख धाम के नवीनीकरण का बीड़ा उठाया है। मंदिर एवं गाँव में उपस्थित निवासियों से वार्तालाप करते हुए मुझे ज्ञात हुआ कि गाँव में बाबा मोहन राम जी के अनेक भक्त हैं।

शिव पार्वती मंदिर

मुख्य मंदिर के दर्शन के उपरांत हम उजले गुलाबी रंग में रंगे एक ऊँचे शिखर से अलंकृत मंदिर पहुँचे। यह भी एक लघु मंदिर है जिसके भीतर देवी की प्रतिमा है।

इस मंदिर के चारों ओर बैठकर कुछ भक्तगण मंत्रों का जप कर रहे थे।

इसके पार्श्व भाग पर कुछ मूर्तियाँ थीं जिनके समक्ष उन्हे समर्पित प्रसाद के ढेर थे।

मंदिर के उत्सव

उत्तर भरत में दशहरा के पावन पर्व पर चहुँ ओर रावण, भ्राता कुंभकर्ण एवं रावण-पुत्र मेघनाथ के पुतलों को जलाने की प्रथा है। रामलीला के विविध प्रदर्शन किये जाते हैं। किन्तु बिसरख में प्रथा विपरीत है।

चूंकि बिसरख गाँव रावण का जन्मस्थान  है, यहाँ रावण की आराधना करते हुए दशहरा पर्व मनाया जाता है। यहाँ रामलीला का प्रदर्शन भी नहीं किया जाता। दीवाली का उत्सव भी न्यूनतम एवं मंद स्तर पर किया जाता है।

एक ओर जहाँ भारतीय उपमहाद्वीप को रामायण की भूमि माना जाता है, वहीं रावण को पूजते इस छोटे से गाँव को एक अनूठा द्वीप कहा जा सकता है।

यात्रा सुझाव

  • बिसरख गाँव राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र NCR का एक भाग है। अतः यहाँ तक पहुँचना अत्यंत सुलभ है।
  • यह मंदिर सम्पूर्ण दिवस खुला रहता है।
  • यह मंदिर मूलतः स्थानीय लोगों में लोकप्रिय है। सामान्यतः सभी अनुष्ठान स्थानीय निवासी ही आयोजित करते हैं। कदाचित इसलिए ही मुझे यहाँ पर्यटकों से संबंधित सुविधाओं का नितांत अभाव प्रतीत हुआ।
  • मंदिर के दर्शन करने के साथ साथ आप बिसरख गाँव में भी पद-भ्रमण करें। आधुनिक प्रतीत होते हुए भी इस गाँव में आपका अनुभव सामान्य नहीं होगा, अपितु आपका अनुभव अवश्य अनूठा होगा।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post बिसरख – रावण का जन्मस्थान ग्रेटर नोएडा का प्राचीन गाँव appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/ravan-janamsthan-bisrakh-gaon-noida/feed/ 0 3429
कंदरिया महादेव मंदिर- खजुराहो का विश्व धरोहर स्थल https://inditales.com/hindi/kandariya-mahadev-mandir-khajuraho-vishwa-dharohar/ https://inditales.com/hindi/kandariya-mahadev-mandir-khajuraho-vishwa-dharohar/#respond Wed, 07 Feb 2024 02:30:01 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3380

खजुराहो स्थित कंदरिया महादेव मंदिर उत्तर भारतीय मंदिर स्थापत्य शैली का एक उत्कृष्ट प्रतीक है। १०-११वीं सदी में निर्मित यह मणि चंदेल वंश के राजाओं की देन है। चंदेल साम्राज्य को जेजाकभुक्ति कहा जाता था तथा खजुराहो अथवा खर्जुरवाहक उसकी राजधानी थी। १०- ११वीं सदी में सम्पूर्ण भारत ने उस काल में प्रचलित भारतीय मंदिर […]

The post कंदरिया महादेव मंदिर- खजुराहो का विश्व धरोहर स्थल appeared first on Inditales.

]]>

खजुराहो स्थित कंदरिया महादेव मंदिर उत्तर भारतीय मंदिर स्थापत्य शैली का एक उत्कृष्ट प्रतीक है। १०-११वीं सदी में निर्मित यह मणि चंदेल वंश के राजाओं की देन है। चंदेल साम्राज्य को जेजाकभुक्ति कहा जाता था तथा खजुराहो अथवा खर्जुरवाहक उसकी राजधानी थी।

कंदरिया महादेव और जगदम्बी मंदिर - खजुराहो
कंदरिया महादेव और जगदम्बी मंदिर – खजुराहो

१०- ११वीं सदी में सम्पूर्ण भारत ने उस काल में प्रचलित भारतीय मंदिर स्थापत्य की सभी शैलियों के कुछ सर्वोत्कृष्ट रचनाओं के दर्शन किये हैं। उनके कुछ सर्वोत्तम उदहारण हैं, तंजावुर का बृहदीश्वर मंदिर, कर्नाटक के होयसल मंदिर, मोढेरा का सूर्य मंदिर, भुवनेश्वर का लिंगराज मंदिर आदि।

कंदरिया महादेव मंदिर का इतिहास

मंदिर के मंडप पर लगे शिलालेखों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण राजा विद्याधर ने करवाया था। उन्होंने ११वीं सदी के उत्तरार्ध में इस क्षेत्र में अपना अधिपत्य स्थापित किया था। उनकी सर्वोत्तम उपलब्धियों में से एक है, महमूद गजनवी के प्रथम आक्रमण को सफलता पूर्वक कुचल देना। महमूद गजनवी कुछ वर्षों उपरांत पुनः लौटा था। उसका यह आक्रमण भी अनिर्णायक सिद्ध हुआ था। कुछ सूत्रों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण महमूद गजनवी की पराजय का उत्सव मनाने के लिए ही किया गया था।

इस मंदिर का निर्माण सन् १०२५-५०ई. के मध्य हुआ था।

कंदरिया महादेव के शिखर
कंदरिया महादेव के शिखर

संभव है कि इस मंदिर की संकल्पना विश्वनाथ द्वारा की गयी थी जो विद्याधर के पूर्वज थे। यह चंदेल वंश के कुलदेव भगवान शिव का मंदिर है। जिस कालावधि में इस मंदिर का निर्माण हुआ था, वह कालावधि निसंदेह भारतीय मंदिर स्थापत्य कला शैली का स्वर्णिम युग था।

सन् १९८६ से खजुराहो के इस कंदरिया महादेव मंदिर को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का मान प्राप्त हुआ है।

कंदरिया शब्द की व्युत्पत्ति

कंदरिया शब्द की व्युत्पत्ति कन्दरा शब्द से हुई है। कन्दरा का अर्थ है, पर्वत अथवा धरती पर स्थित मानव निर्मित अथवा प्राकृतिक गुफा। अतः कंदरिया महादेव का सरल अर्थ है, कन्दराओं के महादेव।

ऐसा कहा जाता है कि मातंगेश्वर मंदिर एवं विश्वनाथ मंदिर के संग कंदरिया महादेव मंदिर खजुराहो के तीन प्रमुख शिव मंदिरों के त्रयी की रचना करता है। इनके अतिरक्त तीन देवी मंदिर भी हैं जो चौसठ योगिनियाँ, छत्री देवी एवं जगदम्बी के लिए हैं। ये तीन मंदिर भी एक अन्य प्रतिच्छेदन त्रिभुज की रचना करते हैं। ये छः मंदिर एकत्र रूप में एक यंत्र की रचना करते हैं। यह यंत्र एक पावन आकृति है जिसका विस्तृत विवरण यहाँ इस शोध पत्र में किया गया है।

कंदरिया महादेव मंदिर का दर्शन

शीत ऋतु की वह शीतल प्रभात मुझे अब भी स्मरण है। मैं मंदिर के समक्ष खड़ी मंदिर को निहार रही थी। सूर्य की किरणें मंदिर की परिरेखा से अठखेलियाँ खेल रहीं थी। उनके प्रातःकालीन वार्तालापों को हम लगभग सुन व समझ पा रहे थे।

दमकता हुआ कंदरिया महादेव
दमकता हुआ कंदरिया महादेव

सूर्य की प्रथम किरणों के प्रकाश में मंदिर चमचमा रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो यह मंदिर उत्कीर्णित शिलाखंडों द्वारा नहीं, अपितु चन्दन के उत्कीर्णित काष्ठों द्वारा निर्मित हो। उनकी सौम्य गुलाबी रंग की विविध छटाएं सूर्य की किरणों के संग लुका-छिपी का खेल खेल रहीं थी।

मंदिर के गठन में मुझे एक लय का अनुभव हो रहा था। वह लय जगती, मंडप एवं शिखर के सही अनुपात में निहित था अथवा कदाचित स्थापत्य विदों ने महादेव के कैलाश पर्वत की यहाँ पुनरावृत्ति करने के लिए सर्वोत्तम सूत्रों का प्रयोग किया है, मुझे ज्ञात नहीं। मुझे केवल इतना स्मरण है कि मेरे नेत्र अश्रु जल से भर गए थे। मुझे अपने एवं मंदिर के मध्य एक अद्भुत संस्पंदन का अनुभव हो रहा था। इस अनुभव ने मेरे एवं मंदिर के मध्य सम्बन्ध को एक नवीन परिभाषा प्रदान कर दी थी।

कंदरिया महादेव मंदिर का स्थापत्य
कंदरिया महादेव मंदिर का स्थापत्य

मैंने इस अद्वितीय अद्भुत अनुभव का उल्लेख अपनी पुस्तक, ‘Lotus In The stone – Sacred Journeys in Eternal India’ में भी किया है।

गत संध्या के समय मैंने एक दृश्य एवं श्रव्य प्रदर्शन में इस मंदिर को जीवंत होते देखा था। मैंने इसकी बाह्य सुन्दरता को नेत्र भर कर निहारा था। किन्तु प्रातः काल मंदिर एवं मेरे मध्य जिस लय की रचना हुई, उसने मेरे अंतर्मन को भेध दिया था। उसने मुझे अंतर्बाह्य मोह लिया था।

मंदिर की स्थापत्य कला

खजुराहो के अन्य मंदिरों के अनुरूप इस मंदिर की संरचना भी बलुआ शिलाओं द्वारा की गयी है। गुलाबी एवं पीतवर्ण की भिन्न भिन्न छटाओं में रंगी बलुआ शिलाएं केन नदी के तट पर स्थित पन्ना की खदानों से लायी गयी हैं।

कंदरिया मंदिर खजुराहो मंदिर संकुल के पश्चिमी भाग पर स्थित मंदिरों में से एक है। यह मंदिर एक उच्च जगती पर स्वतन्त्र रूप से स्थापित है। इसके चारों ओर किसी भी प्रकार का प्राकार उपस्थित नहीं है। इसी कारण मंदिर की परिक्रमा करते हुए आप चारों ओर से इसकी सुन्दरता का अवलोकन कर सकते हैं। दो अन्य मंदिर भी इसी जगती पर स्थापित हैं। उनमें से एक लघु मंदिर भगवान शिव का है तथा एक मंदिर देवी जगदम्बी का है।

खजुराहो का विशालतम मंदिर

कंदरिया महादेव मंदिर इस संकुल का विशालतम मंदिर होते हुए भी एक सघन व सुगठित मंदिर है। पूर्व-पश्चिम अक्षांश पर स्थित इस मंदिर की लम्बाई ३०.५ मीटर व चौड़ाई २० मीटर है। ३१ मीटर ऊँचा मंदिर ४ मीटर ऊँचे जगती पर स्थापित है। इस मंदिर में एक ठेठ हिन्दू मंदिर के सभी तत्व उपस्थित हैं।

एक अर्ध मंडप के मध्य से आप मंदिर में प्रवेश करते हैं। यह प्रवेश द्वार आपको मंदिर के मुख्य मंडप तक ले जाता है। मंडप एवं गर्भगृह के मध्य सम्बन्ध स्थापित करता एक अंतराल है। गर्भगृह के चारों ओर परिक्रमा पथ है।

शिखर का लय

मंदिर का संग्रथित शिखर समूह एक ऐसा तत्व है जो इस मंदिर को एक लय प्रदान करता है। मंदिर का संयुक्त शिखर ८४ स्वतन्त्र शिखरों द्वारा संरचित है। प्रत्येक शिखर दूसरे की प्रतिकृति है। जैसे जैसे ऊपर जाते हैं, समरूप शिखरों के आकार में संवृद्धि होती जाती है। ऐसा प्रतीत होता है मानो शिखरों का उंचा ढेर हो। एक प्रकार से यह कैलाश पर्वत की प्रतिकृति प्रतीत होता है जो भगवान शिव का प्रिय निवास स्थान है। इस संरचना का चुनाव कदाचित इसीलिए किया गया हो ताकि भगवान शिव को यह स्वयं का भवन प्रतीत हो।

मंडप को महामंडप कहा जाता है क्योंकि इसमें अनेक गलियारे हैं जिनके झरोखे बाहर की ओर खुलते हैं। मंदिर के दोनों पार्श्वभागों पर एवं पृष्ठभाग पर प्रलंबन हैं जिन पर ये झरोखे निर्मित हैं। इन झरोखों के आतंरिक भागों पर बैठकों की सुविधाएं प्रदान की गयी हैं। ये बैठकें इतनी विशाल हैं कि हम असमंजस में पड़ जाते हैं कि ये ध्यान साधना के लिए हैं अथवा किसी अनुष्ठान के लिए हैं।

बाह्य भित्तियाँ

बाह्य भित्तियों पर अप्रतिम आकृतियाँ उत्कीर्णित हैं जिनमें प्रमुख हैं, गजाकृतियाँ, अश्वाकृतियाँ, संगीतज्ञ, नर्तक, वाद्य यंत्र, दैनन्दिनी जीवन के विभिन्न आयाम जिनमें प्रेमशास्त्र भी सम्मिलित है।

मैथुन - गर्भगृह और मंडप के मिलन बिंदु पर
मैथुन – गर्भगृह और मंडप के मिलन बिंदु पर

झरोखों के स्तर पर स्थित तीन पट्टिकाओं पर अधिक विस्तृत एवं सुस्पष्ट शिल्प हैं। इन पट्टिकाओं पर देवी-देवताओं के शिल्प हैं। एक शिव मंदिर होने के नाते उन शिल्पों में प्रमुख रूप से शिव की प्रतिमाएं हैं। कहीं कहीं वे अपनी शक्ति के संग भी विराजमान हैं। उन शिल्पों में सप्तमातृकाओं की भी प्रतिमाएं हैं। अन्य शिल्प हैं, सुर सुंदरियाँ, प्रेमशास्त्र संबंधी शिल्प जो विशेषतः गर्भगृह एवं मंडप के संगम पर प्रदर्शित हैं, नाग एवं व्याल आकृतियाँ आदि।

सुर सुंदरियाँ
सुर सुंदरियाँ

मंदिर की बाह्य भित्तियों पर रचित स्त्रियों के शिल्प सभी मापदंडों में सर्वोत्तम हैं। उनके शरीर के विभिन्न अंगों को सही अनुपात में उकेरा गया है। उनके शरीर के उभारों को विभिन्न मुद्राओं की सहायता से विशिष्टता प्रदान की गयी है। जैसे खड़े होने की त्रिभंगी मुद्रा जिसमें उनकी शारीरिक मुद्रा तीन स्थानों पर वक्र होती है। उनके आभूषणों एवं उनके उत्तम महीन वस्त्रों की परतों के शिल्प आपको मंत्रमुग्ध कर देंगे।

मंदिर के भीतर प्रवेश

मंदिर के प्रवेश द्वार पर एक आकर्षक मकर तोरण है जिसके छोरों पर मगर के मुख की आकृतियाँ हैं। यह तोरण एकल शिलाखंड को उत्कीर्णित कर निर्मित किया गया है। कंदरिया महादेव मंदिर खजुराहो का इकलौता मंदिर है जिसमें दो मकर तोरण हैं।

मंदिर की भीतरी छत
मंदिर की भीतरी छत

मंदिर की छत शिलाखंड द्वारा निर्मित है जिस पर संकेन्द्रीय वृत्त के आकार में प्रचुर मात्रा में उत्कीर्णन किया गया है। अद्भुत, असाधारण, विलक्षण, अद्वितीय, आश्चर्य चकित कर देने वाले, सूक्षमता एवं सौंदर्य का अद्भुत सम्मिश्रण! मैं इस स्तर तक सम्मोहित हो गयी थी कि उनके लिए जितने विशेषणों का प्रयोग करूँ, मेरे लिए वे कम ही होंगे।

स्तंभों पर पुष्प की बेलें उत्कीर्णित हैं।

प्रसिद्ध इतिहासकार एवं भारतीय मंदिर वास्तुकला के विशेषज्ञ जॉर्ज मिचेल के अनुसार मंदिर की बाह्य भित्तियों पर ६४६ प्रतिमाएं उत्कीर्णित हैं। वहीं आतंरिक भित्तियों पर २२६ प्रतिमाएं उत्कीर्णित हैं।

क्या कंदरिया महादेव मंदिर को अनुष्ठानिक मंदिर बनाया जा सकता है?

जैसा कि नाम से विदित होता है, कंदरिया मंदिर एक शिव मंदिर है। वर्तमान में यह अनुष्ठानिक मंदिर नहीं है, अर्थात् यहाँ किसी भी प्रकार की पूजा-अर्चना अथवा अनुष्ठान का आयोजन नहीं किया जाता है। मेरी हार्दिक अभिलाषा है कि इस मंदिर में भगवान की प्राण प्रतिष्ठा की जाए तथा यह मंदिर पुनः एक जीवंत अनुष्ठानिक शिव मंदिर बने।

यह मंदिर इतना मनमोहक व अप्रतिम है कि इसकी अविस्मरणीय सुन्दरता पर अनेक साहित्य लिखे जा सकते हैं। इसके चित्र एवं चलचित्र हमें मंत्रमुग्ध कर देते हैं। इसके विलक्षण सौंदर्य पर यदि दिव्य उर्जा का तिलक लग जाए तो इसे आध्यात्मिक रूप से भी जीवंत किया जा सकता है। इससे सभी प्रकार के दर्शनार्थियों को लाभ प्राप्त हो सकेगा।

जैसा कि स्थापति पोन्नी सेल्वनाथ ने बताया, हमारे शास्त्रों में भी परित्यक्त मंदिरों के जीर्णोद्धार के विषय में विस्तृत रूप से उल्लेख किया गया है।

यह मंदिर हमारे लिए ना केवल वास्तुकला के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, अपितु खजुराहो के पवित्र भौगोलिक महत्ता के संरक्षण के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह भारतीय मंदिर वास्तुशैली व स्थापत्यकला के स्वर्णिम युग से प्राप्त एक विलक्षण मणि है। इसे जीवंत रखना ना केवल हमारा उत्तरदायित्व है, अपितु हमारे लिए आवश्यक भी है।

यात्रा सुझाव

यह मंदिर दर्शनार्थियों के लिए सूर्योदय से सूर्यास्त तक सप्ताह के सातों दिवस खुला रहता है।

खजुराहो में स्वयं का विमानतल है। यह रेल मार्ग द्वारा भी देश के अन्य नगरों से सुगम रूप से सम्बद्ध है। झांसी से खजुराहो तक उत्तम सड़क मार्ग उपलब्ध है।

कंदरिया महादेव मंदिर खजुराहो के मंदिरों के पश्चिमी समूह का एक भाग है। खजुराहो पहुँचते ही, लगभग सभी मार्ग आपको इस मंदिर तक ले जायेंगे।

खजुराहो में सभी स्तर के अनेक विश्रामगृह उपलब्ध हैं। हम मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग द्वारा संचालित विश्रामगृह में ठहरे थे जो इन मंदिरों के अत्यंत निकट स्थित है। यहाँ से आप पदभ्रमण करते हुए सुगमता से मंदिर तक जा सकते हैं। प्रातः शीघ्र दर्शन करना उत्तम होगा।

यह एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है। यहाँ देशी पर्यटकों के साथ साथ बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक भी आते हैं। अतः खजुराहो की गलियों में विविध प्रकार के स्वादिष्ट देशी एवं विदेशी व्यंजन उपलब्ध होते हैं।

खजुराहो के मंदिर समूह का दर्शन करने के लिए १-२ दिवसों का समय पर्याप्त है। मेरा सुझाव है कि इस मंदिर के दर्शन के लिए कम से कम एक घंटे का समय अवश्य रखें।

यह यूनेस्को द्वारा घोषित एक विश्व धरोहर स्थल है। यहाँ पर्यटन परिदर्शक या गाइड तथा श्रव्य परिदर्शन की सुविधाएं आसानी से उपलब्ध हैं। मेरा सुझाव है कि आप भारतीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा अनुमोदित परिदर्शकों की ही सेवायें लें। आपको जिस गति से भ्रमण करना हो, उसकी सूचना देते हुए सुगमता से मंदिरों का अवलोकन करें।

अधिकाँश मंदिरों में छायाचित्रीकरण निषिद्ध नहीं है।

संध्या के समय दृश्य एवं श्रव्य प्रदर्शन किया जाता है जिसे देखना ना भूलें।

खजुराहो भ्रमण के साथ आप पन्ना राष्ट्रीय उद्यान, ओरछा एवं झांसी के दर्शनीय स्थलों का भ्रमण भी नियोजित कर सकते हैं।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post कंदरिया महादेव मंदिर- खजुराहो का विश्व धरोहर स्थल appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/kandariya-mahadev-mandir-khajuraho-vishwa-dharohar/feed/ 0 3380
ऐरावतेश्वर मंदिर के संगीतमय सोपान – दारासुरम https://inditales.com/hindi/darasuram-airateshwar-mandir-tamil-nadu/ https://inditales.com/hindi/darasuram-airateshwar-mandir-tamil-nadu/#respond Wed, 03 Jan 2024 02:30:47 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3355

एक गोधूलि बेला में कच्चे मार्ग से होते हुए तिपहिया वाहन द्वारा मैं दारासुरम पहुँची। गंतव्य पर अग्रसर होते हुए मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि यह मार्ग मुझे कहीं नहीं पहुँचायेगा। अकस्मात् ही एक विशाल मंदिर मेरे नेत्रों के समक्ष प्रकट हो गया। वह ऐरावतेश्वर मंदिर था। इस मंदिर का एक अन्य लोक-व्यापी […]

The post ऐरावतेश्वर मंदिर के संगीतमय सोपान – दारासुरम appeared first on Inditales.

]]>

एक गोधूलि बेला में कच्चे मार्ग से होते हुए तिपहिया वाहन द्वारा मैं दारासुरम पहुँची। गंतव्य पर अग्रसर होते हुए मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि यह मार्ग मुझे कहीं नहीं पहुँचायेगा। अकस्मात् ही एक विशाल मंदिर मेरे नेत्रों के समक्ष प्रकट हो गया। वह ऐरावतेश्वर मंदिर था। इस मंदिर का एक अन्य लोक-व्यापी नाम है, दारासुरम मंदिर।

मंदिर पहुँचते ही मेरी प्रथम दृष्टि मंदिर के खंडित गोपुरम एवं उसकी भंजित बाह्य भित्तियों पर पड़ी। तदनंतर मंदिर के प्रवेश द्वार पर मुझे एक छोटा जलमग्न मंदिर दृष्टिगोचर हुआ। मेरी इस यात्रा से कुछ ही दिवस पूर्व नीलम चक्रवात ने इस मंदिर में भेंट दी थी जिसके कारण मंदिर के चारों ओर जल एकत्र हो गया था।

दारासुरम ऐरावतेश्वर मंदिर
दारासुरम ऐरावतेश्वर मंदिर

कुछ क्षणों पश्चात मुझे ज्ञात हुआ कि सामान्यतः वर्षा के पश्चात मंदिर के चारों ओर की भूमि जलमग्न हो ही जाती है। काल के साथ मंदिर के आसपास की भूमि ऊँची हो गयी है जिसके कारण मंदिर का भूतल अपेक्षाकृत नीचे हो गया है। इसके कारण वर्षा का जल चारों ओर से मंदिर की ओर आता है तथा मंदिर को चहुँ ओर से घेर लेता है।

दारासुरम ऐरावतेश्वर मंदिर के आकर्षण

जल के मध्य स्थित मंदिर को देख मन में कुतूहल जन्म ले रहा था। हृदय में सम्मिश्रित भावनाएं उत्पन्न होने लगी थीं। मुझे इस तथ्य का पूर्ण रुप से भान था कि यह एकत्रित जल मंदिर की संरचना के लिए अहितकारी सिद्ध हो सकता है। इस आभास के पश्चात भी मैं जल से घिरे मंदिर की सुन्दरता को देख मंत्रमुग्ध सी हो रही थी। सूर्य की किरणें जल की सतह पर मंदिर के प्रत्येक अवयव का प्रतिबिम्ब चित्रित कर रही थीं। जैसे जैसे सूर्य अस्त की ओर उन्मुख हो रहा था, मंदिर का प्रतिबिम्ब सूर्य की किरणों के संग आँख-मिचौली खेल रहा था।

दारासुरम ऐरावतेश्वर मंदिर के संगीतमय सोपान
दारासुरम ऐरावतेश्वर मंदिर के संगीतमय सोपान

एक गाँववासी ने मुझे कहा कि मंदिर के भीतर जाने के लिए मुझे इस जल का सामना करना पड़ेगा। मैं सोच में पड़ गयी कि किस प्रकार सामना करना पड़ेगा! मुझे विश्वास था कि ऊँची जगती अथवा चबूतरे पर निर्मित स्तंभ युक्त गलियारे से घिरे इस मंदिर तक पहुँचने का कोई मार्ग अवश्य होगा जिसके लिए मुझे जल में प्रवेश नहीं करना पड़ेगा। लेकिन वहाँ ऐसा कोई मार्ग नहीं था। मुझे जल में प्रवेश करना ही पड़ा। किन्तु जैसे ही मैंने जल में प्रवेश किया, मुझमें चारों ओर के जल का कोई आभास शेष नहीं रहा। मुझे जल की उपस्थिति का भी भान नहीं था। मैं व मेरा कैमरा, हम दोनों प्रसन्नता से मंदिर के चारों ओर परिक्रमा करते हुए अपने अपने कार्य में मग्न हो गए थे।

चोल मंदिर की स्थापत्य शैली

ऐरावतेश्वर मंदिर का निर्माण सन् ११६६ में चोल वंश के राजा राजराजा चोल द्वितीय ने करवाया था।

यह एक वर्गाकार संरचना है। अन्य चोल मंदिरों के विपरीत इस मंदिर का परिक्रमा पथ मुख्य मंदिर के भीतर ना होकर मंदिर के बाह्य क्षेत्र में है।

मुख मंडप एवं अर्ध मंडप पार कर हम गर्भगृह पहुँचते हैं। प्रवेश द्वार के दोनों ओर दो विशालकाय द्वारपालों के शिल्प हैं। महामंडप स्तंभों से भरा हुआ है। मंदिर के लिंग की स्थापना महाराज राजराजा ने स्वयं करवाई थी। इसलिए इस लिंग को राज-राजेश्वर उदयनार भी कहते हैं।

मुख्य मंदिर के पार्श्वभाग में स्थित मंडप को अग्र-मंडप कहते हैं। इस मंडप का नामकरण चोल राजा के नाम पर किया गया है। इस मंडप की संरचना एक विशाल रथ के समान है। इसके प्रवेश पर स्थित सोपानों की यह विशेषता बताई जाती है कि ये संगीतमय सोपान हैं। इन पर चढ़ते ही भिन्न भिन्न सोपानों से संगीत के भिन्न भिन्न सुर निकलते हैं। यह जानकारी मुझे हमारे परिदर्शक ने प्रदान की थी। किन्तु मैं इसका अनुभव नहीं ले पायी क्योंकि वह स्थल जलमग्न था।

मंदिर की भित्तियों पर कई शिल्प पट्टिकाएं एवं शिलालेख हैं जिन पर शैव नयनार संतों की कथाएं प्रदर्शित हैं। अनेक पौराणिक गाथाओं का भी चित्रण है।

मंदिर परिसर में कुछ छोटे देवालय भी है। जैसे गणेश मंदिर, यम मंदिर, सप्तमातृका मंदिर आदि।

मंदिर परिसर अत्यंत विस्तृत है। इसे सप्त-वीथी भी कहते हैं। इसका अर्थ है, मंदिर जिसमें सात वीथिकाएँ अथवा गलियारे एवं सात मार्ग हैं। ठीक उसी प्रकार जैसा तिरुचिरापल्ली के श्रीरंगम मंदिर में है। वर्तमान में उन सातों में से केवल एक ही शेष है। मंदिर के गोपुरम एवं स्वयं मंदिर के भंगित अवशेष परिसर में चारों ओर बिखरे हुए हैं।  मेरे अनुमान से १४वीं शताब्दी में इस मंदिर पर आततायियों ने आक्रमण किया था एवं मंदिर को इस स्थिति में पहुँचाया था।

मंदिर से सम्बंधित लोककथा

किवदंतियों एवं मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर का निर्माण उस चरवाहिन की अभिलाषा को पूर्ण करने के लिए किया गया था जिसने तंजावुर के बृहदीश्वर मंदिर के शिखर के लिए शिला का दान किया था। उसकी अभिलाषा थी कि ऐसा ही एक विशाल मंदिर का निर्माण उसके ग्राम में भी किया जाए।

मुझे इस विनिमय ने अचंभित कर दिया। एक सामान्य स्त्री राजा के प्रिय मंदिर के निर्माण के लिए शिला का दान कर रही है। इसके प्रतिफल के रूप में वह स्वयं के लिए किसी भी वस्तु की माँग रख सकती थी। लेकिन उसने क्या माँगा! उसने माँग रखी कि ऐसा ही एक मंदिर उसके ग्राम में भी हो। क्या इससे प्राचीन काल के भारतीयों के नैतिक मूल्यों एवं उनकी प्राथमिकताओं की छवि नहीं प्राप्त होती? उस काल में कला एवं संस्कृति का महत्त्व सर्वोपरि था।

ऐरावतेश्वर मंदिर के गज शिल्प

ऐरावतेश्वर मंदिर का नामकरण इंद्र के गज ऐरावत के नाम पर किया गया है। ऐसी मान्यता है कि इंद्र के गज ऐरावत ने पवित्र कावेरी नदी से पोषित इस मंदिर के जलकुण्ड में स्नान किया था। इसके पश्चात उसकी त्वचा दैदीप्यमान हो गयी थी। यह दंतकथा मंदिर की शिला पर भी उत्कीर्णित है।

सोपानों के दोनों ओर गज प्रतिमाएं उत्कीर्णित हैं। उन्हें देख ऐसा प्रतीत होता है मानो ये गज मंदिर को अपनी पीठ पर उठाये हुए हैं। समीप ही जगती की भित्ति पर दो पैरों पर खड़े दौड़ती हुई मुद्रा में अश्व उत्कीर्णित हैं। उनके पृष्ठ भाग में रथ के चक्र उत्कीर्णित हैं। भित्तियों पर भी रथ के चक्र इस प्रकार उत्कीर्णित हैं कि वे इस मंदिर को एक रथ की छवि प्रदान करते हैं।

ऐसी मान्यता है कि रथ के ये चक्र वास्तव में सौर घड़ियाँ हैं। इनका प्रयोग प्रातःकाल एवं संध्याकाल में समय आंकने के लिए किया जाता है। रथ के आकार के ऐसे मंदिरों को करक्कोइल कहा जाता है। इनकी प्रेरणा मंदिर में देवों की शोभायात्रा में प्रयुक्त विशाल रथों से प्राप्त की गयी है। एक तत्व जो मुझे भ्रामक प्रतीत हुई वह यह कि गज एवं अश्व एक दिशा में ना जाते हुए एक दूसरे से लम्बवत दिशा में जाते दर्शाए गए हैं।

अन्य दो मंदिर जो चक्र युक्त रथ के आकार के प्रतीत होते हैं, वे हैं, ओडिशा का कोणार्क सूर्य मंदिर एवं हम्पी का विट्ठल मंदिर

मुख्य मंदिर के चारों ओर नंदी की अनेक लघु प्रतिमाएं हैं। दो प्रतिमाओं के मध्य कमल पुष्प उत्कीर्णित है। साहित्यों के अनुसार कदाचित ये कम ऊँचाई की भित्तियाँ थीं जिनका उद्देश्य मंदिर के चारों ओर कुण्ड का आभास प्रदान करना था। उसके अनुसार कदाचित यह मेरा सौभाग्य था कि मैंने मंदिर को उसी रूप में देखा जैसा की यह पूर्व में नियोजित था।

भगवान शिव एवं चोल मंदिर

सभी चोल मंदिरों की विशेषता है कि उनके पृष्ठ भाग की बाह्य भित्ति पर शिवलिंग होता है जिसके मध्य से भगवान शिव प्रकट होते दर्शाए जाते हैं। इस मंदिर में भी ऐसा ही एक लिंग है। इसे लिंगोद्भव कहते हैं। इसका अर्थ है, लिंग से शिव का उद्भव। मंदिर के स्तंभों पर विस्तृत उत्कीर्णन हैं। उन पर इतिहास पुराण की कथाएं एवं विभिन्न नृत्य मुद्राएँ उत्कीर्णित हैं। मंदिर स्थापत्य शैली एवं वास्तुकला के विद्यार्थियों के लिए यह मंदिर ज्ञान अर्जन का स्वर्णिम अवसर प्रदान करता है।

लिंगोद्भव मूर्ति
लिंगोद्भव मूर्ति

मुख्य मंदिर से अभिषेक के जल को बाह्य दिशा की ओर संचालित करते व्याल मुखों पर भी विस्तृत उत्कीर्णन है। उन पर सिंह मुख की आकृति बनाई गयी है।

मेरी इस यात्रा में अवलोकित मंदिरों में से यह इकलौता ऐसा मंदिर है जिनके जाली युक्त झरोखों पर विलोम स्वस्तिक आकृतियाँ एवं वर्गाकार आकृतियाँ क्रम से उकेरी गयी हैं। कुछ स्थानों पर लाल एवं हरित रंग पुते हुए हैं। उन्हें देख ऐसा प्रतीत होता है कि कदाचित अनुत्कीर्णित भागों पर रंगाई की गयी थी। मेरी तीव्र अभिलाषा है कि ऐसे मंदिरों को इनके पूर्ववत भव्य अवस्था में लाने का प्रयास किया जाना चाहिए। मंदिरों का नवीनीकरण इसी दिशा में होना चाहिए।

नंदी मंडप

इस मंदिर का नंदी मंडप मुख्य गोपुरम के बाह्य भाग में है। यह एक लघु मंडप है। जिस जगती पर शिवलिंग स्थापित है, उस जगती के तल से यह मंडप कहीं अधिक निचले तल पर है। मुझे बताया गया कि पूर्वकाल में वर्तमान गोपुरम के स्थान पर यहाँ उससे अधिक विशाल गोपुरम था। अब उनके केवल अवशेष ही शेष रह गए हैं।

इस मंदिर का एक अन्य विशेष तत्व है, स्तंभों के आधार याली के आकार में उत्कीर्णित हैं। इस प्रकार के स्तम्भ हमें महाबलीपुरम एवं कांचीपुरम के मंदिरों में भी दृष्टिगोचर होते हैं। याली एक पौराणिक पशु है जिसका शरीर विभिन्न पशुओं का सम्मिश्रित रूप होता है। उसका मुख गज का, धड़ सिंह का, कर्ण सूकर का, सींग बकरी के एवं पूँछ गौमाता का होता है।

देवी मंदिर

मुख्य मंदिर के एक ओर देवी मंदिर है जो ऐरावतेश्वर मंदिर के समकालीन है। यह पेरिया नायकी अम्मा का मंदिर है। दुर्भाग्य से यहाँ जल संचयन मुख्य मंदिर से भी अधिक था जिसके कारण मैं मंदिर के भीतर नहीं जा सकी।

दारासुरम मंदिर के स्तम्भ
दारासुरम मंदिर के स्तम्भ

हो सकता है कि किसी काल में यह मुख्य मंदिर संकुल का अभिन्न अंग रहा होगा किन्तु अब यह मुख्य मंदिर से असंलग्न है।

दारासुरम

दरासुरम, यह नाम कदाचित दारुका-वन, इस शब्द से व्युत्पन्न है। कनकल एवं ऋषि पत्नी के अनेक चित्र हैं जो इस ओर संकेत करते हैं।

यह कोल्लीडम नदी के निकट स्थित है जो कावेरी नदी के मुहाने का भाग है।

उत्सव

यह एक शिव मंदिर होने के नाते यहाँ का प्रमुख उत्सव शिवरात्रि है।

मंदिर का वार्षिक उत्सव माघ मास में आयोजित किया जाता है। अंग्रेजी पंचांग के अनुसार यह काल लगभग जनवरी मास में पड़ता है।

दारासुरम ऐरावतेश्वर मंदिर – यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल

यह मंदिर भारत के दक्षिणी राज्य तमिल नाडु में स्थित है। कुम्भकोणम के निकट दारासुरम नामक नगर में स्थित होने के कारण इस मंदिर को दारासुरम मंदिर भी कहते हैं। इसका निर्माण लगभग १२वीं सदी में चोल वंश के राजा राजराजा चोल द्वितीय ने करवाया था। इस मंदिर में भगवान शिव के ऐरावतेश्वर रूप की आराधना की जाती है।

ऐरावतेश्वर मंदिर यूनेस्को द्वारा घोषित एक विश्व धरोहर स्थल है। सन् २००४ में इस मंदिर को यूनेस्को द्वारा घोषित विश्व धरोहर स्थलों की सूची में सम्मिलित किया गया था। उस सूची में इस मंदिर को महान जीवंत चोल मंदिरों के उप-वर्ग के अंतर्गत सम्मिलित किया गया है।

दारासुरम यात्रा से सम्बंधित कुछ सुझाव

दारासुरम तंजावुर से लगभग ४० किलोमीटर दूर है। आप तंजावुर में अपना पड़ाव रखते हुए बृहदीश्वर का बड़ा मंदिर, गंगईकोंडा चोलपुरम तथा आसपास के अन्य आकर्षणों का अवलोकन कर सकते हैं।

मंदिर नगरी चिदंबरम से तंजावुर की मंदिर नगरी जाते हुए भी आप मध्य में विमार्ग लेते हुए ऐरावतेश्वर मंदिर जा सकते हैं।

सार्वजनिक परिवहन की सुविधाएं आसानी से उपलब्ध हैं।

ऐरावतेश्वर मंदिर पहुँचने के लिए निकटतम विमानतल तिरुचिरापल्ली है जो लगभग ९० किलोमीटर दूर स्थित है। यदि आप तिरुचिरापल्ली की ओर से यहाँ आ रहे हैं तो आप श्रीरंगम के भी दर्शन कर सकते हैं।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post ऐरावतेश्वर मंदिर के संगीतमय सोपान – दारासुरम appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/darasuram-airateshwar-mandir-tamil-nadu/feed/ 0 3355
राजा भोज का भोजेश्वर मंदिर – भोजपुर का प्रसिद्ध शिवलिंग https://inditales.com/hindi/bhojeshwar-mandir-bhojpur-madhya-pradesh/ https://inditales.com/hindi/bhojeshwar-mandir-bhojpur-madhya-pradesh/#comments Wed, 08 Nov 2023 02:30:52 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3318

मैंने जब सर्वप्रथम भोजपुर का नाम सुना था तब मुझे इस लोकप्रिय हिन्दी मुहावरे का स्मरण हो आया था, “कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली”। इस मुहावरे का प्रयोग साधारणतः दो विपरीत स्थितियों को दर्शाने के लिए किया जाता है। कदाचित यह मुहावरा राजा भोज की छवि एवं उनके राज्य की समृद्धि को दर्शाने के […]

The post राजा भोज का भोजेश्वर मंदिर – भोजपुर का प्रसिद्ध शिवलिंग appeared first on Inditales.

]]>

मैंने जब सर्वप्रथम भोजपुर का नाम सुना था तब मुझे इस लोकप्रिय हिन्दी मुहावरे का स्मरण हो आया था, “कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली”। इस मुहावरे का प्रयोग साधारणतः दो विपरीत स्थितियों को दर्शाने के लिए किया जाता है। कदाचित यह मुहावरा राजा भोज की छवि एवं उनके राज्य की समृद्धि को दर्शाने के लिए भी सर्वोपयुक्त है। राजा भोज के राज्य की भव्यता एवं सम्पन्नता निसंदेह असाधारण व अतुलनीय थी।

भोजपुर का यह भोजेश्वर मंदिर उसी समृद्ध एवं भव्य राज्य का एकमात्र जीवंत प्रमाण है।

राजा भोज कौन थे?

राजा भोज परमार वंश के राजा थे। वे उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के वंशज माने जाते हैं। उन्होंने सन् १०१० से १०५५ तक मालवा क्षेत्र में राज्य किया था। उनकी राजधानी धार नगरी थी जो अब धार नाम से जानी जाती है। ऐसा कहा जाता है कि यह क्षेत्र तलवारों की धार के कारण प्रसिद्ध थी। इसीलिए इसे धार नगरी कहा जाता था।

भोजेश्वर मंदिर के स्तम्भ, चौखटें और लिंग
भोजेश्वर मंदिर के स्तम्भ, चौखटें और लिंग

राजा भोज एक शक्तिशाली राजा थे। उन्होंने दूर दूर के क्षेत्रों तक अपने सैन्य अभियान क्रियान्वित थे। भोज राजा ने अनेक मंदिरों का निर्माण कराया था तथा अनेक भव्य मंदिरों के निर्माण का नियोजन भी किया था। भोपाल एवं उसके आसपास स्थित तालाबों के निर्माण का श्रेय भी उन्ही को जाता है। वास्तव में भोजेश्वर मंदिर भीमताल नामक एक विशाल सरोवर के निकट बनाया गया था। बेतवा नदी पर बाँध निर्मित कर इस विशाल सरोवर की रचना हुई थी।

राजा भोज की एक अन्य उपलब्धि भी है जिसके विषय में अधिक लोगों को जानकारी नहीं है। वे शिक्षा एवं साहित्य के अनन्य उपासक थे। उन्होंने स्थापत्य कला से लेकर दर्शन शास्त्र, औषधि शास्त्र तथा संगीत जैसे विषयों पर लगभग ८४ पुस्तकें लिखी थीं। वे बहुमुखी प्रतिभा से संपन्न एक विद्वान राजा थे जिनके विषय में यह प्रसिद्ध धारणा बन गयी थी कि वे साक्षात् ज्ञान की देवी सरस्वती को ही धरती पर ले आये थे। धार में उनके द्वारा स्थापित महाविद्यालय, कालान्तर में जिसे भोजशाला कहा गया, उनकी इसी बहुआयामी व्यक्तित्व का साक्ष्य है। उदयपुर प्रशस्ति शिलालेख से संकेत प्राप्त होता है कि उन्होंने धार में लगभग १०४ मंदिरों का निर्माण कराया था। दुर्भाग्य से वे सभी अब अस्तित्वहीन हो चुके हैं।

भोपाल नगर का यह नामकरण राजा भोज की ही देन है। आरम्भ में इसे भोजपाल कहा जाता था जो कालांतर में अपभ्रंशित होते हुए भोपाल कहलाया।

विजयनगर साम्राज्य के राजा कृष्णदेवराय ने भोज राजा से प्रभावित होकर स्वयं को अभिनव-भोज तथा सकल-काल-भोज की उपाधि से अलंकृत किया था।

भोजेश्वर मंदिर – भोजपुर का अभिनव शिव मंदिर

भोजपुर शिव मंदिर की विशाल योनि
भोजपुर शिव मंदिर की विशाल योनि

भोजेश्वर मंदिर, राजा भोज के भव्य भोजपुर नगर से सम्बंधित केवल यही रचना शेष है। काली शिला में निर्मित एक विशाल शिव मंदिर, जो अपूर्ण होते हुए भी जीवंत है। यहाँ भगवान शिव की नियमित पूजा-अर्चना की जाती है। ११वीं सदी के मध्यकाल में निर्मित इस मंदिर की संरचना कभी पूर्ण नहीं हुई। अपने इस अपूर्ण रूप में यह मंदिर अपनी निर्माण प्रक्रिया के विषय में विस्तृत जानकारी प्रदान करता है।

विशाल शिवलिंग

भोजपुर का भोजेश्वर मंदिर विशेषतः अपने विशाल शिवलिंग के लिए अत्यंत लोकप्रिय है। जैसा कि हम जानते हैं, शिवलिंग के दो भाग होते हैं, लिंग एवं योनि। शिवलिंग की निचली पीठिका भाग योनि कहलाता है। इस मंदिर के शिवलिंग की योनि अतिविशाल एवं सुन्दर है। कदाचित, इससे अधिक विशाल योनि आपने कहीं नहीं देखी होगी। जहाँ तक लिंग का प्रश्न है, वह भी विशाल है किन्तु मैं उसे विशालतम नहीं कहूंगी। खजुराहो के मतंगेश्वर मंदिर का लिंग इससे भी अधिक विशाल है।

भोजपुर शिव मंदिर की छत
भोजपुर शिव मंदिर की छत

यह शिवलिंग चूना पत्थर के अनेक आवरणों द्वारा निर्मित है। सम्पूर्ण शिवलिंग की ऊँचाई लगभग ४० फीट है।

मंदिर की भीतरी छत संकेंद्रित वृत्तों की आकृति से उत्कीर्णित है जिसे देख खजुराहो के मंदिरों का स्मरण हो आता है।

मंदिर में चार अष्टकोणीय स्तम्भ हैं। भित्तियों को देख ऐसा प्रतीत होता है मानो उन्हें कालांतर में निर्मित किया गया है। अथवा कालांतर में उनका नवीनीकरण किया गया होगा क्योंकि शेष मंदिर के अलंकरण की तुलना में भित्तियाँ साधारण प्रतीत होती हैं। स्तम्भों के ऊपरी कोष्ठकों पर शिव-पार्वती, ब्रह्म-ब्रह्मणी, लक्ष्मी-नारायण एवं राम-सीता की छवियाँ उत्कीर्णित हैं।

मेरे अनुमान से आरम्भ में यह मंदिर चार स्तम्भों पर आधारित एक खुला मंदिर रहा होगा, जैसे कि बहुधा शिव मंदिरों की संरचना होती है। किन्तु मेरे इस प्रस्थापित सिद्धांत का कोई प्रमाण नहीं है।

भोजेश्वर मंदिर की स्थापत्य शैली

यह मंदिर एक विशाल चबूतरे पर निर्मित है जिसे जगती कहते हैं। यह उस काल की प्रचलित शैली थी।

अपूर्ण भोजेश्वर महादेव मंदिर
अपूर्ण भोजेश्वर महादेव मंदिर

मंदिर में सभा मंडप नहीं है। जगती पर स्थापित यह एक स्वतन्त्र मंदिर है।

गर्भगृह का शिखर, मंदिर निर्माण की नागर शैली में प्रचलित वक्रीय आकार में ना होकर सरलरेखीय है। मंदिर के केवल अग्र भाग में अप्सराओं, गणों तथा अन्य देवी-देवताओं के शिल्प उत्कीर्णित हैं। मंदिर की अन्य भित्तियों पर शिल्पकारी नहीं है, मानो वे शिव की कथाओं पर आधारित शिल्पों के उत्कीर्णन की प्रतीक्षा कर रही हों।

मकरनाल
मकरनाल

शिखर के आकार के कारण कुछ विद्वानों का मानना है कि यह एक स्वर्गारोहण प्रासाद है। अर्थात् वह मंदिर जिसे स्वर्गवासी पूर्वजों की स्मृति में निर्मित किया जाता है।

शिला ढोने के लिए ढालू मार्ग

मंदिर के दाहिनी ओर एक विशाल ढालू मार्ग है। मेरा अनुमान है कि इसकी रचना मंदिर के निर्माण के लिए विशाल शिलाओं को जगती तक ले जाने के लिए की गयी होगी। यदि हम इस ढालू मार्ग का दर्शन नहीं करते तो हमारी यह मनन श्रंखला अखंड जारी रहती कि विशाल शिलाओं एवं शैलशिल्पों को इस विशालकाय जगती के ऊपर किस प्रकार ले जाया गया होगा! अथवा इस जगती के निर्माण के लिए भी विशालकाय शिलाओं को यहाँ तक कैसे लाया होगा!

आपको स्मरण होगा कि तंजावुर के बृहदीश्वर मंदिर के विशाल शिलाखंड को ले जाने के लिए भी ढालू मार्ग का प्रयोग किया गया था।

मंदिर की अवधारणा शिला पर
मंदिर की अवधारणा शिला पर

मंदिर के समीप एक खदान है जहाँ भिन्न भिन्न चरणों में अनेक उत्कीर्णित शैलशिल्प रखे हुए हैं। अब ये भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा अधिगृहीत हैं। मंदिर के चारों ओर चट्टानों पर मंदिर के वास्तु चित्र रेखांकित हैं। उन्हें देख यह अनुमान लगा सकते हैं कि प्रारंभ में एक विशाल मंदिर परिसर की संरचना नियोजित थी। इस प्रकल्प के चरणागत निर्माणकार्य के प्रबंधन के लिए किये गए चिन्ह भी इन चट्टानों पर दृष्टिगोचर होते हैं।

मुख्य मंदिर के बाह्य भाग में दो लघु मंदिर हैं। यहाँ भी नियमित पूजा-अर्चना होती है। दाहिनी ओर स्थित लघु मंदिर की बाह्य भित्तियों पर कुछ अपूर्ण कलाकृतियाँ दृष्टिगोचर होती हैं। इन कलाकृतियों से मंदिर निर्माण अवधि में निर्माण कार्य की प्रगति का प्रत्यक्षीकरण होता है।

उत्खनन

इस स्थान पर किये गए उत्खनन से यह जानकारी प्राप्त होती है कि यहाँ इससे अधिक मंदिरों के निर्माण की योजना बनाई गयी थी। कदाचित खजुराहो के पदचिन्हों पर विस्तृत मंदिर संकुल के निर्माण की योजना थी। किन्ही अप्रत्याशित कारणों से उस योजना को बीच में ही स्थगित कर देना पड़ा होगा।

भोजपुर में एक और शिवलिंग
भोजपुर में एक और शिवलिंग

भोजेश्वर मंदिर का पर्याप्त निर्माण कार्य पूर्ण किया गया ताकि शिवलिंग की स्थापना कर उसकी पूजा-अर्चना आरम्भ हो सके। आज भी पूजा-अर्चना की प्रथा अनवरत अखंडित है।

प्रत्येक वर्ष महाशिवरात्रि के दिवस यहाँ विशाल महाशिवरात्रि मेला लगता है।

भोजपुर के अन्य दर्शनीय स्थल

भोजेश्वर मंदिर के निकट एक भोजेश्वर मंदिर संग्रहालय है। यह संग्रहालय आपको मंदिर की दृष्टि से इस क्षेत्र के इतिहास का परिचय देता है।

यदि आप मंदिर के ऊँचे विशाल जगती पर खड़े होकर चारों ओर दृष्टि दौड़ायेंगे तो आपको इस क्षेत्र के अंधाधुंध आधुनिकरण के चिन्ह दृष्टिगोचर होंगे। हमारे समक्ष विशाल औद्योगिक इकाइयाँ थीं जो अपने भीमकाय चिमनियों से आकाश में काले घने धुंए की धार उत्सर्जित कर रही थीं। समीप स्थित मंडीदीप नामक औद्योगिक नगरी आकाश को प्रदूषित करने में अपना योगदान दे रही थी।

मंडीदीप के समीप एक अपूर्ण जैन मंदिर है जो शांतिनाथ जी को समर्पित है।

बेतवा की संकरी घाटी में पार्वती गुफा है जहाँ अनेक संतों ने साधना की है।

मंदिर के समीप राजा भोज के प्राचीन राजमहल के अवशेष देखे जा सकते हैं। राजा भोज ने भारतीय वास्तुशास्त्र पर एक पुस्तक लिखी थी, समरांगणसूत्रधार। इस पुस्तक में उन्होंने इस महल के विषय में विस्तृत जानकारी दी है। इन अवशेषों में आप उस महल की कल्पना कर सकते हैं जिसका उल्लेख इस पुस्तक में किया गया है।

यह सब देख मुझे तीव्र पीड़ा होती है कि मैंने भारत के उस स्वर्णिम काल में जन्म क्यों नहीं लिया! एक स्थान से दूसरे स्थान जाकर उस स्वर्णिम इतिहास के अवशेषों को ढूँढने के स्थान पर मैंने भारत की सम्पन्नता एवं सौंदर्य की चरमसीमा का अनुभव प्राप्त किया होता।

यात्रा सुझाव

भोजपुर भोपाल से लगभग ३२ किलोमीटर दूर स्थित है। आप भोपाल से एक दिवसीय यात्रा के रूप में भोजेश्वर मंदिर एवं आसपास के स्थलों का आसानी से दर्शन कर सकते हैं।

भोपाल देश के सभी भागों से वायु, रेल तथा सड़क मार्गों द्वारा सुगमता से संयुक्त है।

मंदिर दर्शन के लिए एक घंटे का समय पर्याप्त है।

भोजपुर भ्रमण को सांची भ्रमण एवं भीमबेटका भ्रमण के साथ भी किया जा सकता है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post राजा भोज का भोजेश्वर मंदिर – भोजपुर का प्रसिद्ध शिवलिंग appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/bhojeshwar-mandir-bhojpur-madhya-pradesh/feed/ 1 3318
भुवनेश्वर का लिंगराज मंदिर- कलिंग स्थापत्यशैली की उत्कृष्ट कृति https://inditales.com/hindi/lingaraj-mandir-bhubaneswar-odisha/ https://inditales.com/hindi/lingaraj-mandir-bhubaneswar-odisha/#respond Wed, 16 Aug 2023 02:30:08 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3142

भुवनेश्वर के लिंगराज मंदिर से मेरा सर्वप्रथम परिचय राष्ट्रीय संग्रहालय में आयोजित ‘भारतीय कला’, इस विषय के अध्ययनकाल में हुआ था। इस पाठ्यक्रम के अंतर्गत, मंदिर निर्माण की उत्तर भारतीय नागर स्थापत्यशैली पर दिए गए व्याख्यान में जिस मंदिर को इस शैली में निर्मित सर्वोत्तम कृति के रूप में प्रस्तुत किया गया था, वह था […]

The post भुवनेश्वर का लिंगराज मंदिर- कलिंग स्थापत्यशैली की उत्कृष्ट कृति appeared first on Inditales.

]]>

भुवनेश्वर के लिंगराज मंदिर से मेरा सर्वप्रथम परिचय राष्ट्रीय संग्रहालय में आयोजित ‘भारतीय कला’, इस विषय के अध्ययनकाल में हुआ था। इस पाठ्यक्रम के अंतर्गत, मंदिर निर्माण की उत्तर भारतीय नागर स्थापत्यशैली पर दिए गए व्याख्यान में जिस मंदिर को इस शैली में निर्मित सर्वोत्तम कृति के रूप में प्रस्तुत किया गया था, वह था भुवनेश्वर का लिंगराज मंदिर। जब व्याख्याता इस भव्य मंदिर के सभी आयामों एवं तत्वों का विस्तृत विवरण दे रहे थे, मेरे भीतर इस मंदिर के दर्शन करने की अभिलाषा जन्म ले रही थी। कुछ ही वर्षों में मेरी यह अभिलाषा पूर्ण भी हुई।

लिंगराज मंदिर भुवनेश्वर
लिंगराज मंदिर भुवनेश्वर

प्रथम दर्शन में भुवनेश्वर के भव्य लिंगराज मंदिर एवं उसके विस्तृत संकुल के आकार अचंभित कर देते हैं। हमारे परिदर्शक हमें सर्वप्रथम उस ऊँचे चबूतरे पर ले गए जहाँ से मंदिर का सम्पूर्ण परिदृश्य दृष्टिगोचर होता है। यह चबूतरा ब्रिटिश शासकों के लिए निर्मित किया गया था जिन्हें मंदिर के भीतर जाने की अनुमति नहीं थी। जी हाँ, यह उन कुछ मंदिरों में से एक है जहाँ केवल हिन्दू धर्म के अनुयायियों को ही भीतर जाने की अनुमति दी जाती है। इस चबूतरे से सम्पूर्ण मंदिर संकुल का विहंगम दृश्य दिखाई देता है जो संकुल के भीतर प्रवेश करने के पश्चात संभव नहीं होता है।

यहाँ से जो दृश्य दिखाई देता है, उसके केंद्र में एक विशाल मंदिर स्थित है जिसके चारों ओर अनेक छोटे मंदिर हैं। बड़ी संख्या में भक्तगण परिसर में एक मंदिर से दूसरे मंदिर में आते-जाते दिखाई पड़ते हैं।

लिंगराज मंदिर का इतिहास

ओडिशा में चार प्रमुख पवित्र क्षेत्र हैं। उनके नाम शंख, चक्र, गदा एवं पद्म हैं जो महाविष्णु के चार आयुधों द्वारा प्रेरित हैं। भुवनेश्वर चक्र क्षेत्र में स्थित है। इसे एकाम्र क्षेत्र भी कहा जाता है जो आम के वृक्ष की ओर संकेत करता है। इसका अर्थ कदाचित यह है कि मूल मंदिर आम के एक वृक्ष के नीचे स्थित था। आपको स्मरण होगा कि कांचीपुरम में भी एकाम्बरेश्वर नामक एक शिव मंदिर है।

लिंगराज मंदिर का निर्माण किसने किया?

प्रारंभिक साक्ष्यों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण ७वीं सदी के आरम्भ में केशरी राजाओं ने करवाया था। वहीं मंदिर के प्रमुख भागों का दिनांकन ११वीं शताब्दी किया गया है जिन्हें सोमवंशी राजा ययाति केशरी ने तब बनवाया था जब उन्होंने अपनी राजधानी जाजपुर से भुवनेश्वर स्थानांतरित की थी।

दर्शक दीर्घा से लिंगराज मंदिर का दृश्य
दर्शक दीर्घा से लिंगराज मंदिर का दृश्य

यह मंदिर स्थापत्य शैली का वह स्वर्णिम काल था जब खजुराहो के कंदरिया महादेव मंदिर एवं तंजावुर के बृहदीश्वर मंदिर जैसे सर्वोत्कृष्ट मंदिरों का निर्माण किया गया था।

लिंगराज मंदिर – नागर स्थापत्य शैली

भुवनेश्वर का लिंगराज मंदिर विश्व के विशालतम हिन्दू मंदिरों में से एक है। इसका परिसर ५२० फीट लम्बा तथा ४६५ फीट चौड़ा है। यह एक पूर्वाभिमुख मंदिर है जिसके निर्माण में बलुआ पत्थरों एवं लेटराइट पत्थरों का प्रयोग किया गया है।

लिंगराज मंदिर का शिखर
लिंगराज मंदिर का शिखर

विशिष्ट कलिंग नागर स्थापत्य शैली अथवा देउल शैली में निर्मित इस मंदिर में इस शैली के सभी तत्व उपस्थित हैं। इस मंदिर की सर्वोच्च संरचना है, इसका गर्भगृह अथवा विमान। ऊँचाई के मापदंड में दूसरे क्रमांक पर इसका मंडप अथवा जगमोहन है तथा तीसरे क्रमांक पर नाट्यमंडप है। चौथे क्रमांक पर भोग मंडप है। इन सभी संरचनाओं की छतें इसी घटते क्रमांकानुसार हैं।

मंदिर के चारों ओर ऊँची भित्तियाँ हैं जिन्हें प्राकार कहा जाता है। मंदिर परिसर के भीतर लगभग १५० छोटे मंदिर भी हैं। स्थानीय तीर्थ के अनुसार यहाँ सभी तीर्थों की परंपराओं का पालन किया जाता है। इसका अर्थ है कि यह एक राजसी मंदिर होने के साथ साथ एक पवित्र तीर्थ भी है। भगवती का मंदिर परिसर के उत्तर-पश्चिमी कोने में स्थित है। मैंने यहाँ अनेक प्राचीन शिवलिंग भी देखे थे। परिसर में कई मुक्तांगन हैं जहाँ बैठकर भक्तगण कुछ क्षण विश्राम कर सकते हैं।

मंदिर का शिखर अथवा अधिरचना १८० फीट ऊँचा है जिसे १२ शार्दुल उठाये हुए हैं। शिखर पर किया गया जटिल एवं सघन उत्कीर्णन मंदिर इतिहासकारों को भी अचंभित कर देता है। शिखर के सभी शिलाखंडों का एक एक बिंदु उत्कीर्णित है। प्रत्येक शिलाखंड अनेक कथाएं प्रस्तुत करता है।

मंदिर प्रवेशद्वार के दोनों ओर सिन्हाकृतियाँ उत्कीर्णित है जिसके कारण इस द्वार का नामकरण सिंहद्वार किया गया है।

देवी पदहरा कुण्ड

मंदिर के समक्ष देवी पदहरा कुण्ड है जहाँ तक पहुँचने के लिए कुछ सीढ़ियाँ उतरनी पड़ती हैं। इसके चारों ओर अनेक छोटे मंदिर एवं कई अति-लघु मंदिर हैं।

देवी पदहरा कुण्ड
देवी पदहरा कुण्ड

कुण्ड के उस पार एक सार्वजनिक उद्यान है जहाँ एक उंचा चबूतरा है। आप जब भी इस मंदिर में आयें, इस चबूतरे पर अवश्य चढ़ें। यहाँ से सम्पूर्ण मंदिर एवं कुण्ड का अप्रतिम विहंगम दृश्य दिखाई पड़ता है।

देवी पदहरा कुंड का सूचना पट्ट
देवी पदहरा कुंड का सूचना पट्ट

यह मंदिर से केवल १००-१५० मीटर की दूरी पर ही है। इसलिए यहाँ आना ना भूलें। अन्यथा आप एक अद्भुत दृश्य से वंचित रह जायेंगे।

अवश्य पढ़ें: भुवनेश्वर के प्राचीन मंदिर – ओडिशा की धरोहर

लिंगराज

लिंगराज का शाब्दिक अर्थ है लिंगों के राजा। यह एक शिव मंदिर है किन्तु यहाँ भगवान शिव के हरिहर रूप की आराधना की जाती है। हरिहर भगवान शिव एवं भगवान विष्णु का संयुक्त रूप है। मंदिर के लिंग पर एक रेखा खिंची हुई है जो यह दर्शाती है कि यह दो देवताओं का संयुक्त रूप है। इस तत्व का संकेत मंदिर के शीर्ष पर फहराते ध्वज पर भी दिखाई देता है जो त्रिशूल अथवा चक्र के ऊपर स्थित ना होकर एक पिनाकी धनुष के ऊपर स्थित है। उसी प्रकार, इस मंदिर में भगवान को बिल्व पत्र एवं तुलसी दोनों चढ़ाए जाते हैं।

ग्रेनाइट पत्थर द्वारा निर्मित लिंग का व्यास लगभग ८ फीट है जिस पर कोई भी उत्कीर्णन नहीं किया गया है। यह भूमि से लगभग ८ इंच उंचा है। इसके चारों ओर काले क्लोराइट पत्थर की योनी है। इसे त्रिभुवनेश्वर भी कहा जाता है। अर्थात् तीन विश्वों के ईश्वर। इसका एक अन्य नाम है, क्रितिबासा।

कुण्ड से लिंगराज मंदिर का दृश्य
कुण्ड से लिंगराज मंदिर का दृश्य

मंदिर के लिंग को स्वयंभू लिंग माना जाता है। यह भारत के ६४ प्रमुख शिव क्षेत्रों में से एक है। कहा जाता है कि यह लिंग द्वापर एवं कलियुग में ही प्रकट हुआ है। ऐसा भी माना जाता है कि समीप स्थित बिन्दुसागर जलाशय में उस नदी का जल भरता है जिसका उद्गम इस मंदिर के नीचे से हुआ है।

परंपराओं के अनुसार जगन्नाथ पुरी की यात्रा इस एकाम्र क्षेत्र के दर्शन के अभाव में अपूर्ण मानी जाती है। यहाँ तक कि चैतन्य महाप्रभु ने भी पुरी के दर्शन से पूर्व इस परंपरा का पालन किया था।

एकाम्र कानन

पौराणिक कथाओं के अनुसार एकाम्र कानन अथवा आम का उद्यान भगवान शिव को अत्यंत प्रिय था। एकाम्र कानन उन्हें काशी से भी अधिक भाता था। यह सत्य उन्होंने देवी पार्वती के साथ साझा की। तब देवी के मन में भी इस स्थान के दर्शन की अभिलाषा उत्पन्न हुई। उन्होंने एक गोपिका के रूप में इस क्षेत्र में प्रवेश किया। जब वे इस एकाम्र क्षेत्र में विचरण कर रही थीं, तब कृति व बासा नाम के दो दैत्यों ने उनका पीछा किया। देवी के अप्रतिम रूप पर मोहित होकर उन्होंने देवी से विवाह करने की इच्छा जताई। देवी ने लजाते हुए सर्वप्रथम उनसे उन्हें अपने कन्धों पर उठाने का आग्रह किया। देवी के मूल रूप से अज्ञान दोनों दैत्य सहर्ष तत्पर हो गए। देवी को उठाते ही उनके भार के नीचे दबकर दोनों दैत्यों के प्राणपखेरू उड़ गए।

इस घटना के पश्चात पार्वती देवी को हुई तृष्णा को शांत करने के लिए भगवान शिव ने बिन्दुसागर जलाशय की रचना की तथा उसके जल से देवी की तृष्णा शांत की। ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव ने सभी पवित्र नदियों एवं जलाशयों के जल से अनुरोध किया था कि वे बिन्दुसागर जलाशय में आयें। कहा जाता है कि गोदावरी नदी को छोड़ सभी अन्य नदियों ने भगवान शिव के अनुरोध को स्वीकार किया। इसके कारण गोदावरी नदी शापित हो गयी। उन्हें इस श्राप से तभी मुक्ति मिली जब उन्होंने भगवान शिव एवं देवी पार्वती की आराधना की।

बिन्दुसागर जलाशय

भुवनेश्वर में तीर्थ यात्रा बिन्दुसागर जलाशय के जल में स्नान कर के आरम्भ की जाती है। संक्रांत अथवा ग्रहण के दिवसों में इसके जल में स्नान करने का विशेष महत्त्व है। उसके पश्चात ही भक्तगण अनंत वासुदेव के दर्शन करते हैं जो इस क्षेत्र के अधिष्ठात्र देव हैं। उनके परिवार के सभी सदस्यों के दर्शन करने के पश्चात वे परमपूज्य त्रिभुवनेश्वर भगवान के लिंगराज मंदिर में प्रवेश करते हैं। इस मंदिर के विभिन्न अनुष्ठानों का विस्तृत विवरण ब्रह्म पुराण में दर्शाया गया है।

बिंदु सागर सरोवर
बिंदु सागर सरोवर

जगन्नाथ पुरी मंदिर के ही समान इस मंदिर का प्रसाद भी बेंत की छोटी टोकरियों में दिया जाता है। सामान्यतः शिव मंदिरों में प्रसाद देने की प्रथा नहीं होती है। चूँकि इस मंदिर में भगवान विष्णु भी विराजमान है, उन्हें प्रसाद अर्पित किया जाता है।

मंदिर के नियमों के अनुसार यहाँ सम्पूर्ण दिवस में २२ विभिन्न अनुष्ठान किये जाते हैं जिनमें जल, दुग्ध तथा भांग आदि से अभिषेक, आरती तथा भोग सम्मिलित हैं। ये अभिषेक प्रातः उन्हें निद्रा से उठाने से आरम्भ होकर उनके शयन पर समाप्त होते हैं।

लिंगराज मंदिर के विभिन्न उत्सव

शिव मंदिर होने के कारण महाशिवरात्रि इस मंदिर का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उत्सव है। यह उत्सव इस मंदिर में सर्वाधिक धूमधाम से मनाया जाता है। भक्तगण भगवान लिंगराज की भक्ति में व्रत रखते हैं, उन्हें बेल पत्तियाँ अर्पित करते हैं तथा उनका अभिषेक करते हैं। इस दिन एक महादीप प्रज्ज्वलित किया जाता है।

श्रावण का पावन मास भगवान शिव के भक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। इस मास में बोल बम नाम के भक्त महानदी से जल लाकर भगवान शिव को अर्पित करते हैं। वे उत्तर भारत के कांवड़ियों से समानता रखते हैं।

प्राकार से लिंगराज मंदिर
प्राकार से लिंगराज मंदिर

अशोक अष्टमी अथवा चैत्र शुक्ल अष्टमी के दिन रथ यात्रा या रथोत्सव का आयोजन किया जाता है। इस दिन मंदिर से लिंगराज एवं रुक्मिणी की मूर्तियाँ भुवनेश्वर के ही प्राचीन रामेश्वर मंदिर के दर्शन के लिए जाती हैं। यह उस परंपरा का पालन है जिसके अंतर्गत नगर के प्राचीनतम देव प्रतिमा के दर्शन करने के लिए वे मूर्तियाँ आती हैं जो अपेक्षाकृत नवीन हैं तथा अब अधिक महत्वपूर्ण हो गयी हैं।

चन्दन यात्रा २२ दिवसों का उत्सव होता है जहाँ भक्तों को चन्दन दिया जाता है। भगवान के विग्रह, पुरोहितजी एवं मंदिर के सभी कर्मचारी अपने शरीर पर चन्दन का लेप लगाकर बिन्दुसागर के जल में स्नान करते हैं।

सुन्यान दिवस का आयोजन भाद्रपद मास में किया जाता है। इस उत्सव में मंदिर से सम्बंधित सभी व्यक्ति मंदिर के प्रति अपनी निष्ठा का प्रण लेते हैं। मेरे अनुमान से इतिहास के किसी कालखंड में यह राजसी प्रथा प्रचलित रही होगी।

यात्रा सुझाव

  • इस मंदिर में केवल हिन्दू धर्म के अनुयायियों को ही प्रवेश करने की अनुमति दी जाती है। अन्य दर्शनार्थी अथवा पर्यटक दर्शक दीर्घा से मंदिर के दर्शन कर सकते हैं।
  • आदर्श स्वरूप भक्तगणों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे मंदिर में दर्शन के लिए आने से पूर्व स्नान आदि से स्वच्छ होकर आयें। वे धार्मिक अथवा किसी भी अन्य प्रकार से मंदिर को अपवित्र ना करें।
  • मंदिर में दर्शन का समय प्रातः ६ बजे से दोपहर १२ बजे तक तथा संध्या ३:३० बजे से रात्रि ९ बजे तक का है।
  • मंदिर के भीतर छायाचित्रीकरण की अनुमति नहीं है। मंदिर के भीतर मोबाइल फोन ले जाने की भी अनुमति नहीं है।
  • यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधिकार क्षेत्र में आता है किन्तु इसका प्रबंधन मंदिर न्यास समिति करती है।
  • सामान्यतः सम्पूर्ण मंदिर परिसर के दर्शन के लिए २ घंटों का समय पर्याप्त है। यह अवधि भक्तगणों की संख्या के आधार पर परिवर्तित हो सकती है।
  • यह मंदिर नगर के मध्य स्थित है। यहाँ आने के लिए बस, ऑटो अथवा टैक्सी जैसे सार्वजनिक परिवहन के साधनों की पर्याप्त व्यवस्था है।
  • भुवनेश्वर ओडिशा राज्य की राजधानी होने के कारण देश के अन्य भागों से वायुमार्ग, रेलमार्ग अथवा सड़क मार्ग द्वारा सुव्यवस्थित रीति से जुड़ा हुआ है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post भुवनेश्वर का लिंगराज मंदिर- कलिंग स्थापत्यशैली की उत्कृष्ट कृति appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/lingaraj-mandir-bhubaneswar-odisha/feed/ 0 3142
गंगईकोंड चोलपुरम का भव्य बृहदीश्वर मंदिर https://inditales.com/hindi/gangaikonda-cholapuram-brihdeeswara-temple/ https://inditales.com/hindi/gangaikonda-cholapuram-brihdeeswara-temple/#respond Wed, 02 Aug 2023 02:30:54 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3128

तमिलनाडु के तंजावूर से लगभग ८० किलोमीटर की दूरी पर एक छोटी नगरी है – गंगईकोंड चोलपुरम। यह गाँव, अरियलूर जिले में जयनकोंडम नगरी के समीप स्थित है। चोल सम्राट राजेंद्र प्रथम ने सन् १०२५ में इसे अपनी राजधानी बनाई थी। यह लगभग २५० वर्षों तक चोल राजवंश की राजधानी थी। मैं दक्षिण भारत के […]

The post गंगईकोंड चोलपुरम का भव्य बृहदीश्वर मंदिर appeared first on Inditales.

]]>

तमिलनाडु के तंजावूर से लगभग ८० किलोमीटर की दूरी पर एक छोटी नगरी है – गंगईकोंड चोलपुरम। यह गाँव, अरियलूर जिले में जयनकोंडम नगरी के समीप स्थित है। चोल सम्राट राजेंद्र प्रथम ने सन् १०२५ में इसे अपनी राजधानी बनाई थी। यह लगभग २५० वर्षों तक चोल राजवंश की राजधानी थी।

मैं दक्षिण भारत के मंदिरों की यात्रा के अंतर्गत चोल मंदिरों का भ्रमण रही थी। इसके अंतर्गत मैं चिदंबरम, तंजावुर, गंगईकोंड चोलपुरम, दारासुरम तथा तिरुचिरापल्ली के मंदिरों के दर्शन कर रही थी। एक ओर तमिलनाडु की सड़कों पर एक मंदिर से दूसरे मंदिर जाते हुए चारों ओर के हरियाली से समृद्ध परिवेश मेरे नेत्रों द्वारा मेरे मनमस्तिष्क को सुख पहुँचा रहे थे तो दूसरी ओर तमिलनाडु की लोकप्रिय एवं मेरी प्रिय फिल्टर कॉफी मेरी जिव्हा के द्वारा मेरे शरीर को स्फूर्ति प्रदान कर रही थी।

गंगईकोंड राजेंद्र चोल (प्रथम)

गंगईकोंड नगरी की स्थापना चोल सम्राट राजेंद्र (प्रथम) ने की थी जो सुप्रसिद्ध चोल सम्राट राजराजा (प्रथम) के पुत्र थे। उनकी माता चेर राजकुमारी त्रिभुवन महादेवी थी। चोल साम्राज्य की वंशावली रेखांकित की जाए तो चोल सम्राट सूर्य वंश के वंशज हैं। ठीक उसी प्रकार जैसे अयोध्या के श्री राम।

राजेंद्र चोल प्रथम को आशीष देते शिव एवं पार्वती
राजेंद्र चोल प्रथम को आशीष देते शिव एवं पार्वती

चोल सम्राट राजेंद्र (प्रथम) का राजतिलक सन् १०१६ में हुआ था। वर्तमान भौगोलिक अवस्थिति के अनुसार तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, कर्णाटक के कुछ क्षेत्र एवं श्री लंका उनके साम्राज्य के भाग थे। उन्होंने सन् १०५४ तक अर्थात् अपने मृत्युकाल तक शासन किया था।

अपने राज्यकाल में उन्होंने अपने साम्राज्य का विस्तार करते हुए तुंगभद्र, केरल, मालदीव व सुमात्रा को अपने साम्राज्य में सम्मिलित किया तथा अनेक गौरवशाली उपाधियाँ अर्जित कीं। अपनी शक्तिशाली नौसेना की सहायता से महासागरों को पार करते हुए दूर-सुदूर के अनेक राज्यों से सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध स्थापित किए। उन्होंने अपने साम्राज्य को दक्षिण भारत का सर्व शक्तिशाली साम्राज्य बना दिया था।

गंगईकोंड चोलपुरम

गंगईकोंड चोलपुरम, इस नाम की पृष्ठभूमि में एक रोचक कथा है। एक समय राजेन्द्र चोल की विजय यात्रा पवित्र नदी गंगा तक पहुँची। उन्होंने बंगाल राजाओं को परास्त किया तथा अपनी मातृभूमि को पवित्र करने के लिए वहाँ से गंगा का पावन जल लेकर वापिस आये। उनके इस पराक्रम के उपरांत उन्होंने ‘गंगईकोंड चोल’ की उपाधि अर्जित की तथा इसी नाम से एक नवीन नगरी की स्थापना की। उसका नाम पड़ा, गंगईकोंड चोलपुरम।

अपने पराक्रमी विजयों के पश्चात् उनके द्वारा अर्जित अन्य उपाधियाँ हैं, मधुरान्तक, उत्तम चोल, वीर चोल, मुदिगोंडा चोल, पंडित चोल तथा कदरम कोंडन।

गंगईकोंड चोलपुरम का भव्य बृहदीश्वर मंदिर
गंगईकोंड चोलपुरम का भव्य बृहदीश्वर मंदिर

सन् १०२५ से लगभग २५० वर्षों तक गंगईकोंड चोलवंश की राजधानी रही। इस सम्राज्यकाल में तुंगभद्र के तटों से लेकर श्री लंका तक, सम्पूर्ण दक्षिण भारत चोल सम्राटों के अधिपत्य में था। सम्राट राजेन्द्र चोल के पश्चात भी अधिकाँश चोल राजाओं का राजतिलक इसी धरती पर हुआ तथा यहीं से उन्होंने राज्य किया। १३वीं शताब्दी में इस क्षेत्र पर पांड्य साम्राज्य ने अधिपत्य स्थापित कर लिया।

गंगईकोंड नगरी की स्थापना एक राजधानी के रूप में हुई थी। इसी कारण दो सुदृढ़ भित्तियों द्वारा इसकी किलेबंदी की गयी थी। तमिल साहित्यों के अनुसार सम्पूर्ण नगरी में सड़कों व मार्गों की उत्तम व्यवस्था थी। राजा का भव्य बहुतलीय आवास स्वयं में एक उत्कर्ष स्थापत्य का उदहारण था। इसके निर्माण में पकी हुई ईंटों का प्रयोग किया गया था। इसमें काष्ठ के उत्कीर्णित स्तंभ थे तथा तलों पर ग्रेनाईट की शिलाएं बिछाई गयी थीं।

सम्राट राजेन्द्र ने यहाँ चोल गंगम नामक एक सरोवर का भी निर्माण कराया था। इस सरोवर को अब पोंन्नेरी सरोवर कहते हैं। यह सरोवर कावेरी नदी द्वारा पोषित था। सम्राट राजेन्द्र ने इस सरोवर में गंगा नदी का जल भी मिलाया था।

वर्तमान में गंगईकोंड नगरी में केवल गंगईकोंड चोलपुरम बृहदीश्वरमंदिर ही शेष है। इसके अतिरिक्त अन्य सभी संरचनाओं के ध्वंसावशेष ही रह गए हैं।

गंगईकोंड चोलपुरम का बृहदीश्वर मंदिर

ऐसा कहा जाता है कि किसी समय गंगईकोंड चोलपुरम का बृहदीश्वर मंदिर तंजावुर के बड़े मंदिर अथवा तंजावुर के बृहदीश्वर मंदिर की तुलना में अधिक विशाल था। गंगईकोंड चोलपुरम का बृहदीश्वर मंदिर गंगईकोंड नगरी के उत्तर-पूर्वी भाग में स्थित था, वहीं राजा का शाही निवास नगर के मधोमध स्थित था। ऐसा माना जाता है कि नगर के पश्चिमी भाग में एक विष्णु मंदिर था किन्तु अब वह अस्तित्वहीन है।

गंगईकोंड चोलपुरम के बृहदीश्वर मंदिर का प्रांगन
गंगईकोंड चोलपुरम के बृहदीश्वर मंदिर का प्रांगन

जैसे ही आप गंगईकोंड चोलपुरम के बृहदीश्वर मंदिर पहुँचेंगे, वहाँ से दूर दूर तक दृष्टि दौड़ाने पर आप पायेंगे कि यह मंदिर वहाँ स्थित लगभग इकलौती संरचना शेष है।

उत्तर दिशा में स्थित एक संकरे मार्ग से हम इस क्षेत्र में प्रवेश करते हैं। तत्क्षण आपकी दृष्टि मंदिर के विशाल विमान पर पड़ेगी जिसे शिखर भी कहते हैं। इसका आकार लगभग शुण्डाकार है। इसकी ऊँचाई १६० फीट है जो तंजावुर के बड़े मंदिर के विमान से अपेक्षाकृत किंचित लघु है।

गोपुरम

मंदिर के गोपुरम एवं प्राकार भित्तियाँ अब अस्तित्व में नहीं हैं। सन् १८३६ में, जब यह क्षेत्र ब्रिटिश साम्राज्य के अधिपत्य में था, तब अंग्रेजों ने मंदिर की भित्तियों एवं गोपुरम को गिरा कर उसके शिलाखंडों से कुछ किलोमीटर की दूरी पर एक बाँध का निर्माण किया था। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर का गोपुरम ठीक वैसा ही था जैसा तंजावुर के बड़े मंदिर का है। यहाँ के गोपुरम का आधारभाग साधारण था जिसके समीप केवल द्वारपाल की प्रतिमाएं रखीं थी। जहाँ अन्य चोल मंदिरों में दो गोपुरम होते थे, इस मंदिर में केवल एक गोपुरम था जो परिसर के पूर्व दिशा में स्थित था।

प्रवेश द्वार पर द्वारपाल
प्रवेश द्वार पर द्वारपाल

प्रवेश द्वार के दोनों ओर दो द्वारपालों की छवियाँ उत्कीर्णित हैं। उन्हें देख पूर्वकाल के प्रवेश द्वार का अनुमान लगाया जा सकता है। गर्भगृह के पार्श्वद्वारों के दोनों ओर भी द्वारपालों के विशाल शिल्प हैं। इन पार्श्वद्वारों के समक्ष कुछ सोपान हैं जो चोल शैली के मंदिरों की विशिष्टता है।

मुख्य मंदिर के चारों ओर कुछ लघु मंदिर हैं। ये मंदिर देवी, सिंह सहित दुर्गा, चंडिकेश्वर, गणेश तथा नंदी के हैं। परिसर में आप एक क्षतिग्रस्त मंडप देखेंगे जिसका नाम अलंकार मंडप है।

मंदिर के आलों में दक्षिणमूर्ति, लिंगोद्भव, गणेश, नटराज, भिक्षान्तक, कार्तिकेय, दुर्गा, अर्धनारीश्वर तथा भैरवों के शिल्प हैं।

श्री विमान

मुख्य मंदिर के तीन भाग हैं, श्री विमान, मंडप तथा मुखमंडप अथवा ड्योढ़ी।

विशेषज्ञों ने इस विमान के ९ भाग स्पष्ट रूप से दर्शायें हैं। वे इस प्रकार हैं:

  • उप पीठ अथवा भू-गृह
  • अधिष्ठान अथवा आधार
  • भित्ति
  • प्रस्तर
  • हर अथवा देवकुलिका
  • तल
  • ग्रीवा
  • शिखर
  • स्तुपिका अथवा कलश

उप पीठ पर सिंह तथा पौराणिक जीव-जंतुओं की छवियाँ उत्कीर्णित हैं। अधिष्ठान कमल के आकार में निर्मित है। मुख्य भित्ति दो अनुप्रस्थ भागों में विभाजित है। इसके तीन पार्श्व भागों में आले निर्मित हैं। लम्बवत खांचों द्वारा भित्तियों की सतहों को चौकोर भागों में विभाजित किया गया है। इस प्रकार भित्तियों की सतहों पर अनेक देवकुलिकाएं अथवा अतिलघु मंदिर बन गए हैं जिनके भीतर देवी-देवताओं की प्रतिमाएं रखी हैं।

मंदिर के पृष्ठ भाग में लिंगोद्वभ मूर्ति
मंदिर के पृष्ठ भाग में लिंगोद्वभ मूर्ति

भित्ति के निचले अनुप्रस्थ पर स्थित देवकुलिकाओं में भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों को दर्शाती प्रतिमाएं हैं। साथ ही गणेश, विष्णु, सुब्रमन्य, ब्रह्मा, भैरव, लक्ष्मी, सरस्वती तथा दुर्गा की प्रतिमाएं भी हैं। ऊपरी अनुप्रस्थ पर स्थित देवकुलिकाओं में भी शिव की प्रतिमाओं की प्राधान्यता है। शिव अपने ११ रुद्रों तथा अष्टदिशाओं के अधिष्ठात्र दिकपालों के साथ विराजमान हैं। सभी रूद्र अपने चतुर्भुज रूप में विराजमान हैं जिनके ऊपरी दो हाथों में परशु तथा मृग हैं। वहीं निचले दो हाथ अभय एवं वरद मुद्रा में हैं।

मुक्तांगन में नंदी
मुक्तांगन में नंदी

इनके ऊपर शिखर के ९ तल हैं। शिखर का आकर एवं उस पर की गयी शिल्पकारी उसे शुण्डाकार रूप प्रदान करते हैं। ग्रीवा के चारों दिशाओं में आले हैं जिनके भीतर वृषभ की आकृतियाँ उत्कीर्णित हैं। शिखर के शीर्ष पर एक विशाल शिलाखंड है जिसके ऊपर कमल की कली के आकार का सुनहरा कलश स्थापित है। यह कलश कदाचित स्वर्णकलश रहा होगा।

गर्भगृह

मंदिर के भीतर गर्भगृह की परिक्रमा करने के लिए दो पथ हैं, एक प्रथम तल पर तथा एक दूसरे तल पर। तंजावुर के बृहदीश्वर मंदिर के विपरीत इस मंदिर में परिक्रमा पथ की भित्तियों पर किसी भी प्रकार के चित्र नहीं हैं।

गर्भगृह के भीतर १३ फीट ऊँचा एक विशाल शिवलिंग स्थापित है। ऐसा माना जाता है कि यह शिवलिंग दक्षिण भारत का विशालतम शिवलिंग है। गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर संरक्षण करते दो द्वारपाल हैं।

मुखमंडप

मुखमंडप के भीतर शिव पुराण में उल्लेखित इन प्रसंगों के दृश्य चित्रित हैं।

  • कैलाश पर्वत को हिलाता रावण (यह दृश्य एल्लोरा की गुफाओं में भी चित्रित है।)
  • १००८ पुष्पों द्वारा शिव की आराधना करते विष्णु जब एक पुष्प की कमी रह गयी थी।
  • शिव-पार्वती विवाह
  • किरात – अर्जुन संवाद जब भगवान शिव ने अर्जुन को पशुपति अस्त्र प्रदान किया था।
  • मार्कंडेय ऋषि की कथा
  • चंडिकेश्वर की कथा

महामंडप क्षतिग्रस्त है। उसे देख ऐसा प्रतीत होता है कि अपने उन्नत काल में यह एक दो-तलीय मंडप रहा होगा। यह एक ऊँचे चबूतरे पर स्थित है जिस पर पहुँचने के लिए उत्तर एवं दक्षिण दिशा में सोपान हैं। ऐसी मान्यता है कि इस मंडप के भूतल के नीचे एक गुप्त मार्ग है। कुछ मान्यताओं के अनुसार यह मार्ग राजमहल की ओर जाता है तो कुछ का मानना है कि यह मार्ग नदी की ओर जाता है, तो कुछ मानते हैं कि यह मार्ग मंदिर के कोषागार तक जाता है जहाँ कदाचित मंदिर की मूल्यवान वस्तुएँ रखी जाती थीं।

यहाँ नंदी की एक अतिविशाल प्रतिमा स्थापित है। तंजावुर के मंदिर के विपरीत नंदी की यह प्रतिमा मोनोलिथिक अथवा एकल शिला की नहीं है। किसी मंडप के भीतर अथवा किसी पीठ पर विराजमान होने के स्थान पर यह एक मुक्ताकाश भूमि पर स्थित है। समीप ही बलि पीठ है।

सिंहकेनी

सिंहकेनी
सिंहकेनी

इस मंदिर की एक अनूठी विशेषता है, सिंह की एक विशाल प्रतिमा जिसके भीतर स्थित सोपान हमें एक गोलाकार कुँए तक ले जाते हैं। इस कुँए को सिंहकेनी कहते हैं। इस कुँए के जल को गंगा के जल द्वारा पवित्र किया गया था। मंदिर के देवों के अभिषेक हेतु इसी कुँए के जल का प्रयोग किया जाता था।

मंदिर की काँस्य वस्तुएँ

बृहदीश्वर मंदिर में चोलकाल की कुछ दुर्लभ वस्तुओं का अनुपम संग्रह है। उनमें से कुछ राजा राजेन्द्र (प्रथम) के शासनकाल से भी संबंधित हैं। इसका अर्थ है कि वे उतने ही पुरातन हैं जितना कि यह मंदिर! उन चोल काँस्य वस्तुओं में निम्न मूर्तियाँ प्रमुख हैं।

  • भोगशक्ति
  • दुर्गा
  • अधिकारनंदी
  • सोमस्कन्द
  • सुब्रमन्य
  • वृषवाहन

चोल काल का विशालतम मंदिर

गंगईकोंड चोलपुरम मंदिर को चोल वंश द्वारा निर्मित विशालतम मंदिरों में से एक माना जाता है। यह तंजावुर के बृहदीश्वर मंदिर से साम्य रखता है। इसकी आयु तंजावुर के मंदिर से एक पीढ़ी कम है। मेरे अनुमान से एक पीढ़ी पश्चात उनका विचार अवश्य तंजावुर मंदिर की तुलना में अधिक विशाल एवं अधिक शक्तिशाली मंदिर के निर्माण का रहा होगा। बहुधा यह विचार नवीन राजा की भव्यता एवं शक्ति को गत पीढ़ी की तुलना में श्रेष्ठ दर्शाने की मंशा से उत्पन्न होता है।

तंजावुर के बृहदीश्वर मंदिर में जो उर्जा एवं भाव अनुभव में आते हैं, वो कहीं ना कहीं इस मंदिर में अनुभव में नहीं आते हैं। संग्रहालयविद्, कला इतिहासकार एवं पुरालेखविद् श्री शिवराममूर्ती लिखते हैं, यह मंदिर अत्यंत पुरुषप्रधान है वहीं तंजावुर का मंदिर अपने उत्तम अनुपातों के चलते स्त्रीसुलभ प्रतीत होता है।

गगईकोंड चोलपुरम मंदिर परिसर के भीतर अन्य मंदिरों के स्थान भी वही हैं जैसे कि तंजावुर मंदिर परिसर के भीतर हैं। मंदिर का परिसर अत्यंत विशाल व विस्तृत है जिससे ना केवल संरक्षणदाता सम्राट के मान-प्रतिष्ठा का अनुमान लगाया जा सकता है अपितु यह भी जाना जा सकता है कि प्राचीन काल में सामान्य जन-जीवन भी मंदिर के चारों ओर ही केन्द्रित रहता था।

मंदिर प्रांगन में पाषाण मूर्तियाँ
मंदिर प्रांगन में पाषाण मूर्तियाँ

भित्तियों पर उत्कीर्णित छवियों में भगवान शिव के अनेक अवतार हैं जिन्हें भिन्न भिन्न नामों से जाना जाता है। भित्तियों के रिक्त भाग अपूर्ण कार्य की ओर संकेत करते हैं तथा अन्य चोल मंदिरों की तुलना में उत्कीर्णित शिल्पों की सूक्षमता को किंचित निम्न स्तर पर लाते हैं। एक मंडप की भीतरी छत पर खाँचें हैं जिनमें कुछ खांचों में चित्रकारी के अवशेष दृष्टिगोचर होते हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो अन्य खाँचों के चित्रों को काल ने निगल लिया है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अंतर्गत आने के कारण यहाँ के पुरोहितों की नियुक्ति भी उन्होंने ही की है। इन पुरोहितों ने यह पद पारंपरिक वंशानुगत रीति से नहीं प्राप्त किया है।

मंदिर परिसर में सुन्दर उद्यान एवं घास के मैदान हैं।

यह मंदिर दैन्दिनी पूजा-अनुष्ठानों के साथ एक जीवंत मंदिर है। किन्तु मंदिर के आसपास सामान्य जन-जीवन का अभाव खटकता है। जैसी उर्जा एवं भक्ति की तरंगें तंजावुर के बृहदीश्वर मंदिर में अनुभव में आती हैं, वैसा अनुभव यहाँ प्राप्त नहीं होता है। इससे मेरे मन में यह विचार आया कि मंदिर को कौन सजीव बनाता है? मंदिर के भीतर विराजमान भगवान अथवा भक्ति एवं श्रद्धा से ओतप्रोत भक्तगण?

शिलालेख

इस मंदिर से १२ सम्पूर्ण एवं अनेक भंगित शिलालेख प्राप्त हुए हैं। एक शिलालेख में उन गाँवों से प्राप्त वित्तीय अनुदानों का उल्लेख है जिन पर इस मंदिर के कार्यभार का उत्तरदायित्व था। इन शिलालेखों से चोलवंश के शासनकाल में पालित प्रशासनिक एवं राजस्व प्रणाली का भी अनुमान प्राप्त होता है।

शिलालेखों के अनुसार इस मंदिर का नाम गंगईकोंड चोलेश्वरम था। इन शिलालेखों के विषय में अधिक जानकारी के लिए डॉ. आर. नागस्वमी द्वारा लिखित यह पुस्तक पढ़ें।

यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल

गंगईकोंड चोलपुरम का बृहदीश्वर मंदिर यूनेस्को द्वारा घोषित एक विश्व धरोहर स्थल है। यह चोल वंश के राजाओं द्वारा निर्मित महान जीवंत चोल मंदिरों में से एक है। इसी कारण यह मंदिर तमिलनाडु के प्रमुख पर्यटन आकर्षणों में सम्मिलित है। चोल वंश के राजाओं द्वारा निर्मित महान जीवंत चोल मंदिरों में अन्य प्रमुख मंदिर हैं, तंजावुर का बड़ा मंदिर अर्थात् तंजावुर का बृहदीश्वर मंदिर तथा दारासुरम का ऐरावतेश्वर मंदिर

गंगईकोंड चोलपुरम के लिए यात्रा सुझाव

  • गंगईकोंड चोलपुरम का बृहदीश्वर मंदिर तंजावुर से लगभग ७५ किलोमीटर तथा पुदुचेरी से लगभग १०० किलोमीटर की दूरी पर है।
  • तंजावुर अथवा पुदुचेरी में ठहरने एवं भोजन की सुविधाएं अधिक सुलभ व उत्तम हैं। अतः आप तंजावुर अथवा पुदुचेरी से एक दिवसीय यात्रा के रूप में यहाँ आ सकते हैं।
  • पत्तदकल के मंदिर के पश्चात् यह भारत का दूसरा ऐसा विश्व धरोहर स्थल है जहाँ मंदिर स्थल के आसपास कोई भी जीवन संबंधी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। आप अपने साथ भोजन एवं पेयजल अवश्य ले जाएँ।
  • आप यहाँ मंदिर एवं आसपास के परिदृश्यों का अवलोकन करते हुए कुछ घंटों का समय आसानी से व्यतीत कर सकते हैं।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post गंगईकोंड चोलपुरम का भव्य बृहदीश्वर मंदिर appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/gangaikonda-cholapuram-brihdeeswara-temple/feed/ 0 3128
देवबलोदा का रहस्यमयी शिव मंदिर – रायपुर छत्तीसगढ़ https://inditales.com/hindi/deobaloda-shiv-mandir-raipur-chhattisgarh/ https://inditales.com/hindi/deobaloda-shiv-mandir-raipur-chhattisgarh/#respond Wed, 01 Mar 2023 02:30:55 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2987

भगवान शिव का यह प्राचीन मंदिर छत्तीसगढ़ राज्य के देवबलोदा नामक गाँव की गोद में बसा हुआ है जो राजधानी रायपुर से लगभग २२ किमी दूर स्थित है। रायपुर-दुर्ग महामार्ग पर, भिलाई-३ चरोदा की रेल पटरी के किनारे बसे इस सुन्दर गाँव में स्थित यह ऐतिहासिक मंदिर अपनी पुरातनता, इतिहास एवं उत्कृष्ट कारीगरी के साथ […]

The post देवबलोदा का रहस्यमयी शिव मंदिर – रायपुर छत्तीसगढ़ appeared first on Inditales.

]]>

भगवान शिव का यह प्राचीन मंदिर छत्तीसगढ़ राज्य के देवबलोदा नामक गाँव की गोद में बसा हुआ है जो राजधानी रायपुर से लगभग २२ किमी दूर स्थित है। रायपुर-दुर्ग महामार्ग पर, भिलाई-३ चरोदा की रेल पटरी के किनारे बसे इस सुन्दर गाँव में स्थित यह ऐतिहासिक मंदिर अपनी पुरातनता, इतिहास एवं उत्कृष्ट कारीगरी के साथ साथ रहस्यमयी किवदंतियों के लिए भी अत्यंत लोकप्रिय है। अब यह भारतीय पुरातत्व संरक्षण विभाग के अंतर्गत एक संरक्षित क्षेत्र भी है।

कुछ दिनों पूर्व मैं अपने एक पारिवारिक आयोजन में भाग लेने के लिए भिलाई गयी थी। रायपुर के स्वामी विवेकानंद विमानतल से भिलाई की ओर प्रस्थान करते समय मेरी बहिन ने मुझे रायपुर-भिलाई महामार्ग पर स्थित इस प्राचीन मंदिर के विषय में बताया। मुझे यह एक स्वर्णिम अवसर प्रतीत हुआ। हम तुरंत सहमत हो गए कि घर पहुँचने से पूर्व, मार्ग में स्थित इस मंदिर के दर्शन करते हुए चलें। वह एक अत्यंत ही फलदायी निर्णय सिद्ध हुआ।

रायपुर विमानतल से भिलाई की ओर लगभग ३०किमी वाहन चलाकर हमने देवबलोदा गाँव की ओर एक छोटा सा विमार्ग लिया। वर्षा ऋतु होने के कारण हमारे चारों ओर स्थित विशाल वृक्षों की पंक्तियों के मध्य धान के कोमल पौधे हरिवाली की भिन्न भिन्न छटा बिखेर रहे थे। घुमावदार, कच्चे किन्तु स्वच्छ मार्ग से होते हुए हम मंदिर प्रांगण के प्रवेश द्वार पर पहुंचे।

देवबलोदा छत्तीसगढ़ का शिव मंदिर
देवबलोदा छत्तीसगढ़ का शिव मंदिर

वाहन से बाहर आते ही हमारे चारों ओर के परिदृश्यों ने हमारा मन मोह लिया। यह एक स्वच्छ व सुन्दर गाँव है जो छोटे छोटे घरों, विशाल वृक्षों व जलाशयों से भरा हुआ है। प्रांगण के भीतर, प्रवेश द्वार पर ही एक अतिविशाल पीपल का वृक्ष है। पवन के झोंके उसके पत्तों से अठखेलियाँ खेल रहे थे जिससे निकलते मधुर स्वर मन को मोह रहे थे। पीपल के वृक्ष से आगे दृष्टि गई तो इस अप्रतिम प्राचीन मंदिर पर टिक गयी। लाल बलुआ शिलाखंड द्वारा निर्मित यह सुन्दर मंदिर अपूर्ण प्रतीत हो रहा था। इसका रहस्य भी कुछ क्षणों पश्चात खुलने वाला था!

देवबलोदा शिव मंदिर का इतिहास

भारतीय पुरातत्व संरक्षण विभाग द्वारा स्थापित सूचना पटल के अनुसार नागर शैली में निर्मित इस शिव मंदिर का निर्माण १३-१४ सदी में कलचुरी राजवंश के राजाओं ने करवाया था। इस मंदिर को छमासी मंदिर भी कहते हैं।

देवबलोदा शिव मंदिर से जुड़ी किवदंतियां

देवबलोदा के इस प्राचीन व ऐतिहासिक मंदिर से कुछ अत्यंत ही रोचक लोककथाएं जुड़ी हुई हैं। एक किवदंती के अनुसार मंदिर का निर्माण करने वाला शिल्पकार इसे अपूर्ण ही छोड़कर कहीं चला गया। इसी कारण मंदिर के ऊपर शिखर नहीं है।

एक अन्य लोककथा यह कहती है कि जब इस मंदिर का निर्माण किया जा रहा था तब छः मास के लिए अखंड रात्रि छाई हुई थी। इसी कारण इसे छमासी मंदिर अथवा छः मास का मंदिर भी कहा जाता है। किन्तु इस घटना का किसी भी खगोलशास्त्र अथवा इतिहास में कहीं भी उल्लेख नहीं है। मेरे अनुमान से कदाचित इस मंदिर के निर्माण में अत्यधिक समयावधि व्यतीत हुई होगी अथवा शिल्पकार कदाचित केवल रात्रिकाल में ही मंदिर का निर्माण कार्य करता होगा। इसी कारण ऐसा कहा गया होगा।

जगती पर खड़ा लाल बलुआ से बना मंदिर
जगती पर खड़ा लाल बलुआ से बना मंदिर

इस मंदिर से संबंधित एक अन्य रोचक कथा भी अत्यंत लोकप्रिय है। ऐसा माना जाता है कि शिल्पकार मंदिर निर्माण कार्य में इतना तल्लीन था कि उसे किसी की भी सुध नहीं रहती थी। दिवस-रात्रि अनवरत कार्य करते हुए वह इतना लीन हो गया था कि उसे स्वयं का भी भान नहीं रहा। उसके वस्त्र घिस कर नष्ट हो चुके थे तथा वह पूर्णतः निर्वस्त्र हो चुका था। उसकी पत्नी प्रतिदिन उसके लिए भोजन लाती थी।

एक दिवस पत्नी की व्यस्तता के कारण शिल्पकार की बहिन उसके लिए भोजन व कलश में जल लेकर आयी। अपनी बहिन को आते देख उसे अपनी निर्वस्त्र स्थिति का आभास हुआ तथा वह अत्यंत शर्मिंदा हुआ। स्वयं को व बहिन को लज्जित होने से बचाने के लिए वह मंदिर की छत पर चढ़ गया तथा मंदिर के एक ओर स्थित जलकुंड में छलांग लगा दी। अपने भाई को जल समाधि लेते देख बहिन को इतना पश्चाताप हुआ कि उसने मंदिर परिसर के बाहर स्थित तालाब में कलश समेत कूद कर अपनी जान दे दी। हमें बताया गया कि तालाब का जल स्तर नीचे आने पर हम वह कलश देख सकते हैं।

इसी कथा को आगे ले जाते हुए ऐसा कहा जाता है कि मंदिर के जल कुण्ड के नीचे दो कुँए हैं जिनमें से एक वास्तव में एक सुरंग है जो आगे जाकर आरंग नामक गाँव में खुलती है। शिल्पकार को जल में छलांग लगाते से ही यह सुरंग दिखाई दी जिसके द्वारा वह आरंग पहुँच गया। वहाँ जाकर वह एक शैल प्रतिमा में परिवर्तित हो गया। ऐसा कहा जाता है कि आरंग मंदिर में उसकी प्रतिमा अब भी है।

देवबलोदा के गांववासी

 हमें देवबलोदा के गांववासी अत्यंत आत्मीय प्रतीत हुए। वे सभी अत्यंत प्रेम व निच्छल भाव से हमारा स्वागत कर रहे थे। वे हमें अत्यंत सरल प्रतीत हुए। जिनकी भी दृष्टि हम पर पड़ रही थी वे आत्मीयता से हमारा अभिवादन कर रहे थे। हम बहुधा देखते हैं कि किसी भी ऐतिहासिक व पुरातन स्थल पर अधिकाँश सामान्य नागरिकों को मंदिर के विषय में अधिक जानकारी नहीं होती है। किन्तु यहाँ हमने देखा कि उन्हें ना केवल मंदिर, उसके इतिहास व उनसे संबंधित दन्त कथाओं की जानकारी थी, वे उत्साह से हमें बता भी रहे थे। कुछ स्त्रियों ने हमें तालाब में कलश का स्थान भी बताया।

मंदिर की वास्तुकला एवं स्थापत्य

यह पूर्वाभिमुख मंदिर लाल बलुआ पत्थर में बना हुआ है। यह पत्थर स्थानीय प्रतीत नहीं होता। ये शिलाखंड कहाँ से लाये गए, इसकी जानकारी हमें प्राप्त नहीं हुई। मंदिर नागर शैली में निर्मित है। इसमें एक गर्भगृह एवं एक नवरंग मंडप है। मंदिर एक ऊँचे चबूतरे अथना जगती पर स्थित है जिसकी छत चार मुख्य स्तंभों पर टिकी हुई है।

देवबलोदा शिव मंदिर की भित्तियों पर उत्कीर्णित देवी देवता
देवबलोदा शिव मंदिर की भित्तियों पर उत्कीर्णित देवी देवता

मंदिर का शिखर नहीं है जो कदाचित नागर शैली रहा होगा अथवा नियोजित होगा। मंदिर के समक्ष एक मंडप है जिसमें नंदी विराजमान हैं। नंदी के समक्ष मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार है। मंदिर का एक अन्य द्वार भी है जो मंदिर से लगे हुए जलकुंड की ओर खुलता है।

हंसों की पंक्ति, देवता और मानुष
हंसों की पंक्ति, देवता और मानुष

मुख्य द्वार पर स्थित सीढ़ियाँ चढ़ते ही आप उत्कृष्ट रूप से उत्कीर्णित चार मुख्य स्तंभ तथा नवरंग के अन्य स्तंभ देखेंगे। उन पर आप भैरव, विष्णु, महिषासुरमर्दिनी, शिव, कीर्तिमुख तथा अनेक नर्तक व संगीतज्ञ देख सकते हैं। गर्भगृह के प्रवेश द्वार के दोनों ओर अप्रतिम प्रतिमाएं गढ़ी हुई हैं जिनमें आप द्वारपाल, गणेश, भगवान शिव का सम्पूर्ण परिवार तथा अन्य देवी-देवताओं के साथ साथ पुष्प, बेल, लताएँ एवं सर्पाकृतियाँ देख सकते हैं। गर्भगृह के द्वार का अलंकृत चौखट छोटा है जिसके कारण आपको किंचित झुककर प्रवेश करना पड़ता है। वैसे भी कहते हैं ना कि भगवान के समक्ष शीष झुकाकर जाना चाहिए।

गर्भगृह मंडप से लगभग ३ फीट नीचे है। वहाँ उतरने के लिए कुछ सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। गर्भगृह के मध्य में एक ऊँचा शिवलिंग है जिसके दोनों ओर फन फैलाए दो नाग हैं। शिवलिंग के पृष्ठभाग में देवी पार्वती की सुन्दर प्रतिमा है। इनके अतिरिक्त गर्भगृह के भीतर गणेश, हनुमान, जगन्नाथ तथा अन्य देवताओं की भी प्रतिमाएं हैं।

देवबलोदा शिव मंदिर की मनोहर कलाकृतियाँ
देवबलोदा शिव मंदिर की मनोहर कलाकृतियाँ

मंदिर की बाहरी भित्तियों पर शिलाखंडों की कुछ पंक्तियों पर नक्काशी नहीं है क्योंकि मंदिर निर्माण अपूर्ण है। अन्य पंक्तियों पर, कुछ भंगित फलकों को छोड़कर अधिकतर शिलाखंडों पर उत्कृष्ट शिल्पकारी है। उत्कीर्णित शिल्पकारी की विविधता आपको अचरज में डाल देगी। हाथी, घोड़े एवं मानवी आकृतियाँ सहसा ध्यान आकर्षित करते हैं। ढोलक एवं अन्य संगीत वाद्य बजाते स्त्री-पुरुष, तलवार, भालों आदि के साथ युद्ध करते योद्धा, वृक्षों व प्राणियों को दर्शाते दृश्य, शिव-विवाह दृश्य आदि के शिल्प अचरज में डाल देते हैं। एक फलक पर उत्कीर्णित दृश्य में माताएं अपने शिशुओं को उठाये वृक्ष के नीचे खड़ी हैं। अनेक फलकों पर रामायण तथा महाभारत के दृश्य उत्कीर्णित हैं। मंदिर पर की गयी कलाकृतियों के विभिन्न प्रकार देखकर उस काल के राजाओं के कलाप्रेम का आभास होता है।

बैल और हाथी का एक सिर
बैल और हाथी का एक सिर

मंदिर की बाह्य भित्तियों पर अनेक देवी-देवताओं के चित्र उत्कीर्णित हैं। हम ने हिरण्यककश्यप को जांघ पर लिटाकर उसका पेट चीरते विष्णु का नरसिंह अवतार, गणेश, वराह, त्रिशूल धारी भगवान शिव, वैजयंतीमाल धारण किये भगवान विष्णु एवं देवी लक्ष्मी को देखा। वहाँ हमें एक शिल्प अत्यंत रोचक प्रतीत हुआ जिसमें एक बैल एवं एक हाथी का समुच्चय चित्र था। उससे शिल्पकार की कल्पना शक्ति का आभास होता है। वहाँ कुछ कामुक चित्र भी उत्कीर्णित थे। शिलाखंडों की अनेक पंक्तियों पर अब भी शिल्पकारी नहीं की गयी है।

और पढ़ें – ताला की अद्वितीय रुद्रशिव की मूर्ति

नंदी मंडप के एक ओर एक काला उंचा शिलाखंड है जिस पर कुछ शिल्पकारी की गयी है। वह किसका प्रतिरूप है, हम नहीं पहचान पाए।

मंदिर का जलकुण्ड एवं तालाब

मंदिर के निकट दो प्रमुख जल स्त्रोत हैं। मंदिर से लगा हुआ एक विशाल चौकोर जलकुण्ड है जो मंदिर के प्रवेश द्वार के दाहिनी ओर स्थित है। मंदिर परिसर के पीछे एक बड़ा तालाब है। दोनों के जल स्वच्छ प्रतीत हो रहे थे। मंदिर के जलकुण्ड में कई मछलियाँ एवं कछुए हैं। ऐसा कहा जाता है कि इस कुण्ड का जल कभी नहीं सूखता।

जलकुण्ड में २३ सीढ़ियाँ हैं तथा इसके भीतर दो कुँए हैं। ऐसा कहा जाता है कि उनमें से एक कुआँ कुण्ड को अनवरत रूप से जल की आपूर्ति करता रहता है। दूसरा कुआँ वास्तव में एक सुरंग है। लोगों का मानना है कि यह सुरंग आरंग नामक एक गाँव में जाकर खुलता है। किन्तु किसी के पास इसका ठोस संज्ञान नहीं है। ना ही इसका कोई वैज्ञानिक अथवा पुरातात्विक प्रमाण है।

और पढ़ें – पुरखौती मुक्तांगन – पूर्वजों को समर्पित भावपूर्ण श्रद्धांजलि, नया रायपुर 

तालाब मंदिर के जलकुण्ड के पीछे स्थित है। इसे करसा तालब या कलश तालाब भी कहते हैं। वहाँ गाँव की कुछ स्त्रियाँ तालाब से जल भर रही थीं। हमने उनसे शिल्पकार की बहिन के कलश के विषय में पूछा क्योंकि जल सतह के ऊपर हमें कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं हो रहा था। उन्होंने कहा कि तालाब के मध्य एक शैल स्तंभ के ऊपर शिलाखंड की ही गोल संरचना है। किन्तु वर्षा के कारण जल स्तर ऊपर आ गया था जिसके कारण वह संरचना उस समय जल के भीतर थी।

मंदिर के उत्सव

प्रत्येक वर्ष शिवरात्रि के समय इस मंदिर में दो-दिवसीय उत्सव आयोजित किया जाता है। यह जनवरी-फरवरी के समय होता है। इस विशाल मेले में भाग लेने के लिए आसपास के गाँवों एवं नगरों से बड़ी संख्या में भक्तगण यहाँ आते हैं तथा श्रद्धा से पूजा अर्चना करते हैं। बड़े उत्साह से मेले के विभिन्न क्रियाकलापों में भाग लेते हैं। इस उत्सव को देवबलोदा उत्सव कहते हैं।

और पढ़ें – कालिदास की नाट्यशाला – रामगढ छत्तीसगढ़ की एक प्राचीन धरोहर

इस मंदिर में दर्शनार्थी वर्ष भर, सप्ताह के सातों दिवस आते हैं। लोगों को भगवान शिव, मंदिर तथा जलकुंड के जल पर अपार श्रद्धा है। वे जलकुंड के जल को अपने साथ ले जाते हैं तथा घरों में छिड़काव करते हैं। वे इसे अत्यंत शुभ मानते हैं। उनका मानना है कि इस जल में विभिन्न रोगों एवं भूत बाधा जैसे अवांछित तत्वों से मानवों को मुक्ति दिलाने की क्षमता है। जब हम इस मंदिर में आये थे, हिन्दू पंचांग का श्रावण मास चल रहा था। शिव भक्तों के लिए इस मास में भगवान शिव के दर्शन करना व शिवलिंग पर जल चढ़ाना बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। हमने देखा गाँव की अनेक स्त्रियाँ व पुरुष सज-धज कर भगवान के दर्शन करने के लिए आये थे। वे बड़ी श्रद्धा एवं उत्साह से सभी अनुष्ठान कर रहे थे।

अन्य मंदिर

देवबलोदा गाँव में शिव मंदिर की ओर मुड़ने से पूर्व देवी महामाया का एक मंदिर है। जहां भगवान शिव हैं वहाँ उनकी शक्ति भी अवश्य होगी।

कैसे पहुंचें

देवबलोदा के शिव मंदिर रायपुर में कहीं से भी आसानी से पहुंचा जा सकता है। यह रायपुर-दुर्ग महामार्ग पर भिलाई-३, चरोदा से एक छोटे से विमार्ग पर स्थित है। यह रायपुर विमानतल से लगभग ३५ किमी तथा रायपुर रेल स्थानक से लगभग २० किमी दूर है।

The post देवबलोदा का रहस्यमयी शिव मंदिर – रायपुर छत्तीसगढ़ appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/deobaloda-shiv-mandir-raipur-chhattisgarh/feed/ 0 2987
काशी विश्वनाथ मंदिर काशी यात्रा का केंद्र बिंदु https://inditales.com/hindi/kashi-vishwanath-mandir-varanasi/ https://inditales.com/hindi/kashi-vishwanath-mandir-varanasi/#comments Wed, 08 Feb 2023 02:30:05 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2955

काशी विश्वनाथ मंदिर अनेक तीर्थ यात्राओं का केंद्र बिंदु है। हृदय है। भारत में स्थित भगवान शिव के १२ ज्योतिर्लिंगों में से एक, काशी विश्वनाथ मंदिर को सर्वाधिक महत्वपूर्ण ज्योतिर्लिंग माना जाता है। वाराणसी की गलियों में स्थित यह प्रमुख मंदिर चारों ओर से अनेक छोटे-बड़े मंदिरों से घिरा हुआ है, आप उनमें खो से […]

The post काशी विश्वनाथ मंदिर काशी यात्रा का केंद्र बिंदु appeared first on Inditales.

]]>

काशी विश्वनाथ मंदिर अनेक तीर्थ यात्राओं का केंद्र बिंदु है। हृदय है। भारत में स्थित भगवान शिव के १२ ज्योतिर्लिंगों में से एक, काशी विश्वनाथ मंदिर को सर्वाधिक महत्वपूर्ण ज्योतिर्लिंग माना जाता है। वाराणसी की गलियों में स्थित यह प्रमुख मंदिर चारों ओर से अनेक छोटे-बड़े मंदिरों से घिरा हुआ है, आप उनमें खो से जाते हो। गत सहस्त्र वर्षों में इस मंदिर ने एवं इसके भक्तों ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं, अनेक स्थालांतरण किये। यह मेरा सौभाग्य है कि मैं यहाँ आपको अप्रत्यक्ष रूप से काशी विश्वनाथ मंदिर की तीर्थयात्रा करा रहा हूँ। आईये काशी विश्वनाथ मंदिर के वैभव एवं वैशिष्ट्य को जाने एवं समझें।

काशी विश्वनाथ की कथाएं

बाबा विश्वनाथ, विश्वेश्वर, काशी विश्वनाथ, ये कुछ नाम हैं भगवान शिव के, जो ब्रह्माण्ड के स्वामी हैं। वे काशी पुरी एवं काशी क्षेत्र के अधिष्ठात्र देव हैं।

काशी भगवान शिव की नगरी है। ऐसा माना जाता है कि यह नगरी भगवान शिव के त्रिशूल पर स्थित है। नगरी में स्थित तीन शिव मंदिर इस त्रिशूल के तीन नोकों के द्योतक हैं। मध्य तीर पर विश्वनाथ मंदिर है। अन्य दो मंदिर हैं, केदारेश्वर मंदिर तथा ओंकारेश्वर मंदिर।

स्कन्द पुराण

स्कन्द पुराण के काशी खंड में दिवोदास नामक एक राजा का उल्लेख है जो काशी का राजा था। वह एक सद्धर्मी व सदाचारी राजा था जो अत्यंत न्यायसंगत राजपाट संभालता था।  उसने ब्रह्मा से वरदान प्राप्त किया था कि कोई भी देवता उसकी धरती पर अपने चरण भी स्पर्श नहीं करें। ब्रह्मा ने उसे यह वरदान दिया किन्तु साथ ही एक प्रतिबन्ध भी लगाया कि उसके राज्य का प्रत्येक व्यक्ति सुखी व आनंदी हो।

काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग
काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग

इस बीच भगवान शिव ने अपनी नगरी में वापिस आना चाहा किन्तु इस प्रतिबन्ध के कारण नहीं आ पा रहे थे। उन्होंने भिन्न भिन्न देवताओं को वहाँ भेजा, जैसे ६४ योगिनियाँ, १२ आदित्य, उनके गण, यहाँ तक कि भगवान गणेश भी। किन्तु वे परिस्थिति को अपने अनुसार ढाल नहीं पाए। अंततः भगवान विष्णु राजा दिवोदास को मनाने में सफल हुए कि वह भगवान शिव को उनकी नगरी में प्रवेश कर वहाँ का अधिष्ठात्र देव बनने दे।

ज्ञानवापी कुआँ

मंदिर में स्थित ज्ञान-वापी अर्थात कुआँ, काशी में गंगा जी के अवतरण से भी पूर्व स्थित है। इस कुँए की खुदाई स्वयं भगवान शिव ने अपने त्रिशूल द्वारा की थी ताकि इसके जल से अविमुक्तेश्वर लिंग का अभिषेक किया जा सके।

ज्ञानवापी कूप के प्राचीन छवि
ज्ञानवापी कूप के प्राचीन छवि

लगभग सभी ऋषि मुनि एवं साधु काशी एवं विश्वनाथ की तीर्थयात्रा अवश्य करते हैं। अनेक ऋषि मुनियों ने यहाँ तपस्या की है तथा भगवान विश्वनाथ का गुणगान किया है। आपको सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका श्रीमती एम एस सुब्बुलक्ष्मी द्वारा गाया काशी विश्वनाथ सुप्रभातम स्मरण ही होगा। आदि शंकराचार्य, गोस्वामी तुलसीदास, गुरु नानक देव जी तथा स्वामी विवेकानंद ने अपने यात्रा संस्मरण में काशी नगरी एवं भगवान विश्वनाथ का उल्लेख किया है।

अवश्य पढ़ें: वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर गंगा आरती

काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास

काशी विश्वनाथ मंदिर का उल्लेख स्कन्द पुराण के काशी खंड में किया गया है जिसमें काशी अथवा वाराणसी नगरी के सभी तीर्थों के विषय में लिखा गया है।

काशी विश्वनाथ मंदिर की संरचना
काशी विश्वनाथ मंदिर की संरचना

ज्ञात ऐतिहासिक सूत्रों के अनुसार प्राचीनकाल के लगभग सभी यात्रियों ने, जिन्होंने काशी नगरी की यात्रा की थी, इस मंदिर का उल्लेख किया है तथा इस नगरी को भगवान शिव की नगरी कहा है। भारत की पावन नगरी में स्थित, सर्वाधिक पूजनीय मंदिरों में से एक होने के कारण यह सदा आक्रमणकारियों की आँखों का काँटा था। प्रलेखित ऐतिहासिक सूत्रों के अनुसार इस मंदिर पर सर्वप्रथम आक्रमण सन् ११९४ में मुहम्मद घोरी ने किया था जिसने इस नगरी को बड़ी भारी क्षति पहुंचाई थी। इसके पश्चात दिल्ली की रानी रजिया सुलतान ने मंदिर के स्थान पर मस्जिद का निर्माण कराया था। इसके कारण मूल मंदिर को अविमुक्तेश्वर मंदिर के समीप स्थानांतरित किया गया था।

इसके पश्चात १६वीं सदी के आसपास सिकंदर लोधी ने इस पर आक्रमण किया था। जब जब आक्रमणकारियों ने मंदिर का विनाश किया, तब तब स्थानीय हिन्दू राजाओं एवं असंख्य तीर्थ यात्रियों ने इसका पुनर्निर्माण कराया। अंतिम विनाशकारी आक्रमण औरंगजेब द्वारा किया गया था जिसने मंदिर को नष्ट कर दिया तथा उसके खंडहरों पर ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण कराया। आक्रमणकारियों से शिवलिंग की रक्षा करने के लिए मंदिर के पुजारी ने शिवलिंग के साथ कुँए में छलांग लगा दी थी।

रानी अहिल्या बाई होलकर द्वारा पुनर्निर्माण

वर्तमान में हम जिस विश्वनाथ मंदिर को देखते हैं, उसका निर्माण सन् १७८० में मालवा की रानी अहिल्या बाई होलकर ने करवाया था। उससे पूर्व अनेक राजपुताना एवं मराठा राजाओं ने मंदिर के पुनर्निर्माण का प्रयास किया था किन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली थी। सन् १८३५ में महाराजा रंजीत सिंह ने मंदिर के शिखर के लिए एक टन सोना अनुदान में दिया था। अन्य अनेक राजाओं ने भी चाँदी, मूर्तियाँ एवं अन्य प्रकार से अनुदान देकर मंदिर संकुल के निर्माण में सहयोग किया था।

काशी विश्वनाथ मंदिर का स्वर्णिम शिखर
काशी विश्वनाथ मंदिर का स्वर्णिम शिखर

पंडित मदन मोहन मालवीय ने बिरला परिवार के सहयोग से बनारस हिन्दू विश्विद्यालय में एक नवीन काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण कराया था। इस निर्माण कार्य का आरम्भ सन् १९३० में हुआ था। इस मंदिर का शिखर विश्व भर के सभी हिन्दू मंदिरों के शिखरों से ऊँचा है।

सन् २०२१ में वर्तमान सरकार ने काशी विश्वनाथ गलियारे(Corridor) का निर्माण किया है जो मंदिर को सीधे गंगा के घाट से जोड़ता है। इससे पूर्व मंदिर से घाट तक पहुँचने के लिए संकरे घुमावदार मार्ग से जाना पड़ता था। अब हम इस चौड़े गलियारे के द्वारा सीधे ही मंदिर से घाट तक जा सकते हैं।

काशी विश्वनाथ मंदिर

काशी विश्वनाथ मंदिर पहुँचने से पूर्व हम काशी विश्वनाथ गली से जाते हैं जो एक संकरी गली है। इसके दोनों ओर अनेक विक्रेता अपनी छोटी छोटी दुकानों में रंगबिरंगी पूजा सामग्री तथा वाराणसी के लोकप्रिय स्मारिकाओं की विक्री करते हैं। इस गली से आगे जाते हुए हम सर्वप्रथम माँ अन्नपूर्णा मंदिर पहुँचते हैं। इसके पश्चात काशी विश्वनाथ मंदिर पहुँचते हैं। जैसा कि आपने कथाओं में पढ़ा है, यह मंदिर अपेक्षाकृत छोटा है। यह मंदिर अपने मूल स्थान पर अपनी पूर्ण भव्यता से पुनर्निर्मित होने की प्रतीक्षा में रत है।

प्रसिद्द विश्वनाथ गली
प्रसिद्द विश्वनाथ गली

चाँदी से अलंकृत द्वार से आप मंदिर परिसर के भीतर प्रवेश करते हैं। परिसर में अनेक मंदिर हैं। भक्तों की भीड़ एवं सुनहरे शिखर से आप काशी विश्वनाथ मंदिर को आसानी से पहचान सकते हैं। मंदिर के गर्भगृह के भीतर चाँदी की योनि पर शिवलिंग विराजमान हैं। इस मंदिर की संरचना वास्तु शिल्प के उत्तर भारतीय नागर शैली में की गयी है। मंदिर का शिखर इस शैली की विशेष छाप प्रस्तुत करता है।

विश्वनाथ गली में एक दूकान
विश्वनाथ गली में एक दूकान

गर्भगृह के समक्ष एक छोटा खुला मंडप है जहाँ से आप भगवान के दर्शन करते हैं।

मुख्य मंदिर के चारों ओर अनेक छोटे मंदिर हैं। काशी विश्वनाथ गलियारे के लिए मंदिर परिसर के विस्तार कार्य के समय इनमें से अनेक मंदिरों को अन्यत्र स्थानांतरित किया गया है।

अवश्य पढ़ें: शिल्प संग्रहालय – ट्रैड फैसिलिटेशन सेंटर (पंडित दीनदयाल हस्तकला संकुल), वाराणसी

काशी विश्वनाथ मंदिर में आरती

मंदिर में पाँच प्रमुख आरतियाँ की जाती हैं।

मंगल आरती

यह आरती प्रातः मुंह अँधेरे लगभग ३ बजे की जाती है। यह दिवस की प्रथम आरती होती है। यह बाबा विश्वनाथ को जगाने का अनुष्ठान होता है। इस आरती के पश्चात ही मंदिर के पट बाबा के दर्शनों के लिए खोले जाते हैं। इस समय बाबा विश्वनाथजी का षोडशोपचार, उनकी आरती, उनकी स्तुति तथा ब्रह्माण्ड की भलाई के लिए प्रार्थना की जाती है।

यह अनुष्ठान दर्शनार्थियों, तीर्थयात्रियों एवं काशी के स्थानिकों में अत्यंत लोकप्रिय है। अधिकाँश पर्यटन परिदर्शक भी निर्देशित पर्यटन के अंतर्गत सब को प्रातः इसी आरती के लिए लेकर आते हैं। मंदिर के अधिकारिक वेबस्थल पर आप यह आरती ऑनलाइन भी देख सकते हैं।

काशी विश्वनाथ परिसर का नया स्वरुप
काशी विश्वनाथ परिसर का नया स्वरुप

मंदिर दर्शन के लिए वैसे भी प्रातः काल का समय सर्वोत्तम माना जाता है। जब आप मुख्य मंदिर के चारों ओर भ्रमण करें तो इसके चारों ओर स्थित अनेक छोटे-बड़े मंदिरों में आपको मंत्रस्तुति दिखाई व सुनाई देगी।

भोग आरती

यह आरती लगभग दोपहर के समय की जाती है जब बाबा विश्वनाथ को भोग अथवा प्रसाद अर्पित किया जाता है। इस समय श्रृंगार, स्तुति एवं आरती के साथ रुद्राभिषेक भी किया जाता है। यह भोग सप्ताह के विभिन्न वारों अथवा तिथि के अनुसार निर्धारित किया गया है। जैसे, एकादशी के दिन बाबा को फल, दूध एवं दूध से निर्मित प्रसाद अर्पित किया जाता है। अन्य दिवसों में सूखे मेवे, पूरी, हलवा अथवा सम्पूर्ण भोजन अर्पित किया जाता है। तदनंतर यह प्रसाद आरती के लिए उपस्थित सभी भक्तगणों को दिया जाता है। भोग आरती के पश्चात दंडी स्वामियों को भोजन खिलाया जाता है।

सप्तऋषि आरती

मंदिर में सूर्यास्त के पश्चात की जाने वाली यह आरती एक अत्यंत अनूठी आरती है। यह आरती सप्तऋषियों द्वारा किये जाने का द्योतक है। ये सप्तऋषि हैं, कश्यप, अत्री, वसिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि तथा भारद्वाज। इस आरती का मूल सामवेद में प्राप्त होता है जिसे गाया जाता है। पुरातन काल में राजा-महाराजा इस आरती के लिए ब्राह्मणों की सेवायें लेते थे जो उनके लिए यह आरती करते थे।

अवश्य पढ़ें: वाराणसी की सर्वोत्तम स्मारिकाएं – बनारस में से क्या खरीदें?

रात्रि श्रृंगार आरती

यह आरती संध्याकाल के पश्चात लगभग ९ बजे की जाती है। इस आरती के लिए भगवान शिव का काशी के राजा के रूप में अलंकरण किया जाता है। उनके इस रूप को काशीपुराधीश्वर कहा जाता है। यह आरती प्राचीन वैदिक संस्कारों द्वारा की जाती है जिनमें श्रृंगार, रुद्राभिषेक, स्तुति एवं भोग सम्मिलित हैं।

शयन आरती

यह दिवस की अंतिम आरती होती है जिसके पश्चात बाबा शयन करते हैं। इस आरती के पश्चात मंदिर के पट बंद कर दिए जाते हैं। यह आरती काशीवासी अर्थात काशी के निवासी करते हैं। रात्रि ११ बजे के पश्चात काशी नगरी के लगभग ४०-५० निवासी मंडप में एकत्र होते हैं तथा आरती गाते हैं। जब यह आरती अपनी चरम सीमा पर पहुँचती है तब उसका अनुभव अत्यंत ही रोमांचित कर देता है। इस समय दर्शनार्थियों की संख्या अधिक नहीं होती है। इस समय भीड़ रहित मंदिर में भक्ति से सराबोर होने का आनंद प्राप्त होता है। साथ ही काशी वासियों की श्रद्धा व समर्पण के दर्शन भी होते हैं।

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में मदन मोहन मालवीय द्वारा निर्मित काशी विश्वनाथ मंदिर
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में मदन मोहन मालवीय द्वारा निर्मित काशी विश्वनाथ मंदिर

पद्म पुराण के पातालखंड में यह उल्लेख किया गया है कि एक भक्त को प्रातः काल में गंगा में स्नान करना चाहिए अथवा दोपहर के समय मणिकर्णिका कुण्ड में डुबकी लगानी चाहिए, तत्पश्चात, क्रम में, इन प्रमुख मंदिरों के दर्शन करना चाहिए, विश्वनाथ, भवानी या अन्नपूर्णा मंदिर, दूँडीराज मंदिर, दण्डपाणी तथा काल भैरव मंदिर।

काशी खंड में किंचित लम्बी तीर्थयात्रा का उल्लेख किया गया है जिसमें पूर्वजों के प्रति तर्पण तथा सभी मंदिरों के दर्शन सम्मिलित हैं, जैसे विष्णु, गणेश।

अवश्य पढ़ें: वाराणसी का जंगमवाड़ी मठ १० लाख से अधिक शिवलिंगों का संग्रह

बाबा विश्वनाथ मंदिर के उत्सव

महाशिवरात्रि

यूँ तो प्रत्येक मास में कृष्ण पक्ष के चौदहवें दिवस, अर्थात अमावस से एक दिवस पूर्व शिवरात्रि होती है। फाल्गुन मास में वही दिवस महाशिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है। इस दिन भक्तगण मंदिर में भगवान के दर्शन एवं अभिषेक करने के लिए आते हैं। काशी विश्वनाथ मंदिर के द्वार महाशिवरात्रि के उत्सव के लिए सम्पूर्ण रात्रि खुले रहते हैं। इसी कारण उस रात्रि में शयन आरती नहीं की जाती। इस दिन आरती की दिनचर्या भिन्न होती है ताकि अधिक से अधिक श्रद्धालु भगवान के दर्शन कर सकें।

खौगोलिक दृष्टी से देखा जाए तो महाशिवरात्रि वसंत विषुव(spring equinox) के आसपास होती है।

अवश्य पढ़ें: काशी की पंचक्रोशी यात्रा – वाराणसी का प्राचीन तीर्थयात्रा पथ

रंगभरी एकादशी

फाल्गुन शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन मनाया जाने वाला यह रंगों का उत्सव मंदिर एवं भक्तगणों को रंगों की विभिन्न छटा से सराबोर कर देता है। भगवान शिव एवं देवी पार्वती की उत्सव मूर्तियों पर उजले गुलाबी रंग का अबीर-गुलाल अर्पित किया जाता है। इसके पश्चात भक्तगण आपस में रंगों से खेलते हैं। नृत्य एवं संगीत इस उत्सव के उल्हास को चरम सीमा तक पहुंचा देते हैं।

श्रावण सोमवार

वाराणसी का काशी विश्वनाथ मंदिर
वाराणसी का काशी विश्वनाथ मंदिर

श्रावण मास को भगवान शिव की भक्ति का मास माना जाता है। सम्पूर्ण भारत में इस मास के प्रत्येक सोमवार के दिन भगवान शिव के दर्शन करना, उनकी आराधना करना अत्यंत शुभ माना जाता है। अतः भगवान शिव का यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण मंदिर श्रावण के उत्सवों से कैसे वंचित रह सकता है? श्रावण सोमवार के दिन यह मंदिर भक्तों से भरा रहता है जो भगवान को जल, दूध, दही, बिल्व पत्र आदि अर्पित करने आते हैं।

श्रावण मास के चारों सोमवार को भगवान शिव का भिन्न भिन्न रूप से अत्यंत भव्य श्रृंगार किया जाता है।

अक्षय तृतीया

हिन्दू पंचांग में सर्वाधिक महत्वपूर्ण दिवस होता है, अक्षय तृतीया। इस दिन बाबा विश्वनाथ पर गंगाजल छिड़का जाता है।

अन्नकूट

यह उत्सव हिन्दू पंचांग के कार्तिक मास में, दीपावली के दूसरे दिवस मनाया जाता है। भिन्न भिन्न प्रकार के ५६ भोग बनाए जाते हैं तथा भगवान शिव एवं उनके परिवार को भोग आरती के समय अर्पित किये जाते हैं।

कार्तिक पूर्णिमा के दिन देव दीपावली का उत्सव गंगा घाट पर मनाया जाता है जहाँ लाखों की संख्या में मिट्टी के दिए जलाए जाते हैं। मंदिर को भी विशेष रूप से प्रकाशित किया जाता है।

मैंने अनेक बार इस मंदिर के दर्शन किये हैं। मेरा अनुभव कहता है कि इस मंदिर में प्रत्येक दिवस एक उत्सव होता है।

अवश्य पढ़ें:  वाराणसी के विभिन्न स्वादिष्ट व्यंजन जो मुंह में पानी ले आयें

यात्रा सुझाव

  • वाराणसी सम्पूर्ण भारत के विभिन्न क्षेत्रों से वायु मार्ग, रेल मार्ग तथा सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है।
  • वाराणसी में आप किसी से भी पूछिये, वे आपको काशी विश्वनाथ मंदिर का मार्ग बता देंगे। दर्शन के लिए आवश्यक समय मंदिर में उपस्थित भक्तों की भीड़ पर निर्भर करता है।
  • मंदिर के भीतर किसी भी प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक उपकरण ले जाने पर प्रतिबन्ध है। यहाँ तक कि आप मोबाइल फोन भी नहीं ले जा सकते।
  • मंदिर जाने के लिए अनेक मार्ग हैं। सर्वाधिक लोकप्रिय मार्ग है, विश्वनाथ गली। चौक की ओर से भी मंदिर पहुँचा जा सकता है। अब तो काशी विश्वनाथ गलियारे के द्वारा गंगा घाट से भी मंदिर की ओर आ सकते हैं।
  • भगवान काशी विश्वनाथ मंदिर की यात्रा में आप कम से कम एक आरती तो अवश्य देखें व उसका आनंद लें।
  • काशी विश्वनाथ मंदिर के वेबस्थल द्वारा आप अपना दर्शन, रहने का स्थान तथा पूजा की पूर्व बुकिंग कर सकते हैं।

अवश्य पढ़ें: भारत कला भवन – वाराणसी में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय का संग्रहालय

यदि आपकी वाराणसी यात्रा में बाबा विश्वनाथ मंदिर के दर्शनों के पश्चात आपके पास समय हो तो आप गंगा के उस पार रामनगर दुर्ग के दर्शन कर सकते हैं। श्री लाल बहादुर शास्त्री के गृह नगर में उनका स्मारक भी देख सकते हैं।

सन्दर्भ

स्कन्द पुराण का काशी खंड

भज विश्वनाथं – नितिन रमेश गोकर्ण(लेखक) एवं मनीष खत्री(छायाचित्रकार)

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post काशी विश्वनाथ मंदिर काशी यात्रा का केंद्र बिंदु appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/kashi-vishwanath-mandir-varanasi/feed/ 1 2955
चंद्रेश्वर भूतनाथ मंदिर गोवा की पहाड़ी पर एक प्राचीन मंदिर https://inditales.com/hindi/prachin-chandreshwar-bhutnath-mandir-goa/ https://inditales.com/hindi/prachin-chandreshwar-bhutnath-mandir-goa/#respond Wed, 20 Jul 2022 02:30:43 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2741

चंद्रेश्वर भूतनाथ मंदिर गोवा के प्राचीनतम मंदिरों में से एक है। इस मंदिर ने गोवा की प्राचीन राजधानी को अपना नाम प्रदान किया था, चंद्रपुर, जिसे अब चांदोर कहा जाता है। यह मंदिर गोवा के पारोड़ा नामक स्थान पर स्थित है। चंद्रेश्वर भूतनाथ की कथा चंद्रेश्वर का अर्थ है चन्द्रमा का ईश्वर। यह भगवान शिव […]

The post चंद्रेश्वर भूतनाथ मंदिर गोवा की पहाड़ी पर एक प्राचीन मंदिर appeared first on Inditales.

]]>

चंद्रेश्वर भूतनाथ मंदिर गोवा के प्राचीनतम मंदिरों में से एक है। इस मंदिर ने गोवा की प्राचीन राजधानी को अपना नाम प्रदान किया था, चंद्रपुर, जिसे अब चांदोर कहा जाता है। यह मंदिर गोवा के पारोड़ा नामक स्थान पर स्थित है।

चंद्रेश्वर भूतनाथ की कथा

चंद्रेश्वर का अर्थ है चन्द्रमा का ईश्वर। यह भगवान शिव का ही एक नाम है। यह सर्व विदित है कि भगवान शिव अपने मस्तक पर अर्धचंद्र धारण करते हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार पर सागर मंथन का भित्तिचित्र है जो चन्द्रमा के उद्भव की कथा कहता है। सागर मंथन द्वारा प्राप्त अनेक बहुमूल्य वस्तुओं में चन्द्रमा भी है जो अमृत प्राप्ति से पूर्व प्राप्त हुआ था।

गोवा का प्राचीन चंद्रेश्वर भूतनाथ मंदिर
गोवा का प्राचीन चंद्रेश्वर भूतनाथ मंदिर

गोवा से चन्द्रमा का एक अन्य सम्बन्ध भी है। ऐसी मान्यता है कि गोमान्तक के पर्वतों पर ही कृष्ण एवं बलराम ने जरासंध से युद्ध किया था। ऐसा माना जाता है कि कृष्ण का शंख भी इसी क्षेत्र से प्राप्त हुआ था। हम सब जानते हैं कि कृष्ण एक चंद्रवंशी हैं।

संयोग से, गोवा के अनेक शासकों का नाम चन्द्र से सम्बंधित है, जैसे चन्द्रगुप्त मौर्य एवं चंद्रादित्य। इस मंदिर का श्रेय भोज सम्राट चंद्रवर्मन को जाता है। इस मंदिर का उल्लेख इस क्षेत्र के ५वीं-६वीं शताब्दी के प्राचीनतम ताम्रपत्रों में मिलता है। इसका अर्थ है कि इस मंदिर का निर्माण ४थी शताब्दी या उससे पूर्व किया गया था।

मुझे ज्ञात हुआ कि स्कन्द पुराण के सह्याद्री खंड में भी इसका उल्लेख है। स्कन्द पुराण के इस खंड का मेरा अध्ययन  अभी शेष है।

चंद्रेश्वर भूतनाथ मंदिर

यह मंदिर मडगांव से लगभग २६ किलोमीटर दूर, दक्षिण गोवा के केपें तालुका में स्थित है। मुख्य मार्ग से ही मंदिर का महाद्वार दृष्टिगोचर होता है। यहीं से हमें मंदिर के लिए विमार्ग लेना पड़ता है। महाद्वार को भैरवों, स्कंदों तथा स्वयं भगवान शिव की सुन्दर मूर्तियों से अलंकृत किया गया है। सूर्य अस्त होते ही इस महाद्वार को विद्युत् प्रकाश से जगमगाया किया जाता है जिसके कारण यह दूर से ही दिखाई देने लगता है।

शंख भैरव मंदिर

महाद्वार पार करते ही जिस मंदिर पर आपकी प्रथम दृष्टी पड़ती है, वह है शंख भैरव मंदिर। शंख भैरव का यह मंदिर ठेठ गोवा शैली में निर्मित है। शंख भैरव की लिंग रूप में उपासना की जाती है।

यह मंदिर पूर्णिमा के दिन बंद रहता है। अन्य दिनों में यह केवल प्रातः आरती एवं संध्या आरती के लिए ही खोला जाता है।

यहाँ से पहाड़ी की चोटी तक पहुँचने के लिए सौम्य चढ़ाई आरम्भ हो जाती है।

अवश्य पढ़ें: गोवा के प्राचीन सारस्वत मंदिर – अपनी विशिष्ट वास्तुकला के साथ

सिद्ध भैरव, काल भैरव तथा कमण्डलु तीर्थ

पहाड़ी पर आधी दूरी तक चढ़ने के उपरान्त आप एक बड़ी इमारत के समीप पहुंचेंगे जहां वाहन खड़ी करने के लिए नियत स्थान हैं। यह चंद्रेश्वर भूतनाथ मंदिर संकुल का एक भाग है। भक्तगण यहाँ विश्राम तथा जलपान  आदि कर सकते हैं। दो प्राचीन लघु मंदिर हैं जिनके समीप आप एक प्राचीन तीर्थ अथवा जलकुंड देखेंगे। दोनों भैरव मंदिर हैं जिनमें एक काल भैरव मंदिर है तथा दूसरा सिद्ध भैरव। जलकुंड को कमण्डलु तीर्थ कहा जाता है। इस तीर्थ के जल से चन्द्रनाथ का अभिषेक किया जाता है।

सिद्ध भैरव, काल भैरव और कमण्डलु तीर्थ
सिद्ध भैरव, काल भैरव और कमण्डलु तीर्थ

कमण्डलु तीर्थ के अतिरिक्त मंदिर के दो अन्य तीर्थ भी हैं जिनके नाम हैं, कपिल तीर्थ तथा गणेश तीर्थ। पुरोहित जी ने मुझे बताया कि दोनों तीर्थ घने वन के भीतर स्थित हैं तथा उन तक पहुंचना सुगम्य नहीं है।

मुख्य मंदिर तक पहुँचने के लिए बनी सीढ़ियों का आरम्भ इसी स्थान से होता है। सीढ़ियाँ अत्यंत सुगम हैं। इसके दोनों ओर सहारे एवं सुरक्षा के लिए बाड़ भी हैं। इसके अतिरिक्त पक्की सड़क भी है जहां से आप वाहन द्वारा अगले बिंदु तक पहुँच सकते हैं। यहां भी एक भैरव मंदिर है। यहाँ बंदरों से सावधान रहें तथा खाने-पीने की वस्तुओं को सुरक्षित रखें।

सीढ़ियों के आरम्भ में कुछ प्राचीन शैल शिल्प हैं। यद्यपि मैं उनमें से अधिकतर शिल्पों की पहचान करने में असमर्थ थी तथापि वे एक प्राचीन मंदिर की ओर संकेत करते हैं।

अवश्य पढ़ें: चोर्ला घाट – गोवा के हरे भरे क्षेत्रों में भ्रमण

भैरव मंदिर एवं चाय की दुकान

सीढ़ियाँ चढ़ते हुए लगभग आधी दूरी पार करते ही आप पुनः एक लघु भैरव मंदिर देखेंगे जिसमें लिंग के रूप में एक शिला स्थापित है। यह एक खुला मंदिर है जिसमें लिंग के ऊपर केवल एक मंडप है। लिंग के ऊपर अर्पित किये ताजे पुष्प, प्रज्ज्वलित दीप एवं धूपबत्ती से निकलती सुगंध यह दर्शा रही थी कि यहाँ नियमित रूप से पूजा अर्चना की जाती है।

मंदिर के समक्ष एक पम्प हाउस है।

मंदिर के समीप एक चाय की दुकान है जो थकावट दूर करने के लिए एक लोकप्रिय स्थान है। महामारी के चलते भक्तों की घटती संख्या के कारण यह दुकान बंद थी।

इस बिंदु पर भी आपके समक्ष विकल्प है कि आप वाहन से ही अगले पड़ाव तक जाएँ अथवा सीढ़ियाँ चढ़ें।

मुख्य मंदिर

आप एक उच्चतम बिंदु तक ही वाहन ले जा सकते हैं। यहाँ से आपको भी लगभग १०० सीढ़ियाँ चढ़नी ही पड़ेंगी। यूँ तो सीढ़ियाँ अत्यंत सुगम हैं, आपको इसकी पूर्व जानकारी हो तो आप मानसिक रूप से सज्ज रहेंगे।

सीढ़ियाँ समाप्त होते ही आप चटक पीले रंग के तोरण से युक्त द्वार पर पहुंचेंगे। इस तोरण द्वार के आधार को देखना ना भूलें। यह एक प्राचीन शैल द्वार का आधार है। भीतर प्रवेश करते ही दाहिनी ओर आप ठेठ गोवा शैली का एक मंदिर देखेंगे।

चंद्रेश्वर भूतनाथ मंदिर पर सागर मंथन का दृश्य
चंद्रेश्वर भूतनाथ मंदिर पर सागर मंथन का दृश्य

बाईं ओर दो विशाल टिन शेड हैं। मुझे बताया गया कि मंदिर के रथों को यहाँ रखा जाता है। यह मंदिर अश्वों एवं हाथियों की प्रतिकृतियों से युक्त रथों के लिए लोकप्रिय है जिनमें एक अश्व चाँदी का है। मंदिर के एक ओर एक प्राचीन बरगद का वृक्ष है जिसके समीप एक दीपस्तंभ है। मंदिर के निकट कुछ शैल प्रतिमाएं थीं जो नवीन प्रतीत हो रही थीं। कदाचित ये प्रतिमाएं किसी नवीन प्रकल्प के लिए सज्ज हो रही थीं। समीप ही एक यज्ञशाला है जिसके द्वार उस समय बंद थे जब हम वहां दर्शन के लिए पहुंचे थे।

मंदिर के प्रवेश द्वार के ऊपर सागर मंथन का विशाल शिल्प इस मंदिर का सर्वोत्तम वैशिष्ट्य है। सागर मंथन से निकली प्रत्येक वस्तु को यहाँ चित्रित किया गया है। मंदिर के भीतर प्रवेश करते ही आप एक विशाल सभा मंडप में पहुंचेंगे जहाँ से आगे आप मंदिर के मुख्य मंडप में जा सकते हैं।

चंद्रेश्वर मंदिर

चंद्रेश्वर मंदिर एक अत्यंत आकर्षक मंदिर है। मंडप के चारों ओर लकड़ी पर विभिन्न रंगों में नक्काशी की गयी है। मुख्य मंदिर के भीतर स्थापित स्वयंभू शिवलिंग पर एक आवरण चढ़ाया हुआ है। शिवलिंग के पीछे चंद्रेश्वर की प्रतिमा है। मुख्य मंदिर के चारों ओर नवदुर्गा, गणपति, विष्णु तथा महालक्ष्मी की शैल प्रतिमाएं हैं।

चंद्रेश्वर भगवान्
चंद्रेश्वर भगवान्

ऐसी मान्यता है कि पूर्णिमा की रात्रि में चन्द्रमा का प्रकाश शिवलिंग पर पड़ता है। मुझे यह भी बताया गया कि लेटराइट के लिंग से जल रिसता है। इस अद्भुत दृश्य के दर्शन करने के लिए मैंने पूर्णिमा की संध्या पर ही मंदिर के दर्शन का नियोजन किया था। किन्तु पुरोजित जी ने मुझे जानकारी दी कि जब से इस मूल लघु मंदिर के ऊपर मंडप स्थापित किया गया है तथा इसके समक्ष सभा मंडप का निर्माण किया गया है, तब से इस अद्भुत दृश्य के दर्शन दुर्लभ हो गए हैं। केवल चैत्र पूर्णिमा की रात्रि को यह दृश्य दिखाई पड़ता है।

महालक्ष्मी एवं महाविष्णु की प्राचीन प्रतिमाएं
महालक्ष्मी एवं महाविष्णु की प्राचीन प्रतिमाएं

मैं सोच में पड़ गयी कि कैसे बिना सोचे समझे किये गए विस्तार से हम हमारी प्राचीन अभियांत्रिकी अचंभों को यूँ ही खो रहे हैं।

मंदिर के भीतर रामायण कथा और पालकी
मंदिर के भीतर रामायण कथा और पालकी

भीतर स्थित मूल लघु मंदिर शिलाओं द्वारा निर्मित है। इसके चारों ओर की गयी संरचनाओं के कारण अब इस मूल शैल मंदिर का द्वार चौखट ही दृश्य है।

मंडप के भीतर चाँदी की एक सुन्दर पालकी है जिसे प्रत्येक सोमवार को बाहर निकाला जाता है। मंडप की भित्तियों पर रामायण, विष्णु के अवतारों एवं देवी के महिषासुरमर्दिनी जैसे अवतारों से सम्बंधित दृश्यों के शिल्प हैं। भूमि को श्वेत-श्याम रंगों के चौकोर खण्डों से सज्जित किया गया है जो ऊपर स्थित शिल्पों की रंगबिरंगी छटा के विरुद्ध एक सुन्दर विरोधाभास उत्पन्न करते हैं। षटकोणीय बेलनाकार शिखर के शीर्ष पर एक स्वर्ण कलश स्थापित है। शीर्ष पर एक केसरिया ध्वज भी फहराया गया है। शिखर पर भगवान शिव के मानवी मुख सहित शिवलिंग एवं भूतनाथ के शिल्प उत्कीर्णित हैं।

अवश्य पढ़ें:  अयोध्या – राम एवं रामायण की नगरी में भ्रमण के सुझाव

भूतनाथ मंदिर

भूतनाथ मंदिर
भूतनाथ मंदिर

भूतनाथ मंदिर चंद्रेश्वर मंदिर के समीप स्थित एक भिन्न कक्ष के भीतर है। यह मंदिर मूल मंदिर के समीप स्थित है जहां एक त्रिकोणीय शिला को भूतनाथ के रूप में पूजा जाता है। इसके चारों ओर लकड़ी का कटघरा है जिस पर सुन्दर आकृतियाँ उत्कीर्णित की गयी हैं। भूतनाथ भगवान शिव के एक गण हैं। भूतनाथ के समीप एक हुक्का रखा हुआ था। शिला के दोनों ओर सुन्दर नंदादीप प्रज्ज्वलित कर लटकाए हुए थे। शिला के पृष्ठभाग में शिव का त्रिशूल खड़ा था।

प्राचीन काल में भगवान शिव एवं भूतनाथ के मूल मंदिर इस प्रकार निर्मित थे कि वे दोनों एक दूसरे को देख पाते थे।

तुलसी वृन्दावन एवं प्राचीन शैल प्रतिमाएं

मंदिर की परिक्रमा के समय आप इसके पृष्ठ भाग में स्थित एक बड़ा तुलसी वृन्दावन देखेंगे। इसके समीप आप एक प्राचीन शिवलिंग एवं प्राचीन शैल मंदिर के कुछ अवशेष देखेंगे। हनुमान की एक प्राचीन शैल प्रतिमा तुलसी वृन्दावन की भित्ति पर गढ़ी हुई है।

परिसर के कोने में, एक वृक्ष के नीचे नंदी की एक भंगित प्राचीन मूर्ति थी जिसके दो भाग हो चुके थे।

इस मंदिर में शिवरात्रि, नवरात्रि, श्रावण सोमवार तथा दशहरा जैसे उत्सव धूमधाम से मनाये जाते हैं।

चैत्र शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा, इन पांच दिवसों तक रथ उत्सव मनाया जाता है। प्रत्येक दिवस एक नवीन रथ शोभायात्रा के लिए बाहर निकाला जाता है। अंतिम दिवस महारथ की शोभायात्रा निकाली जाती है।

चन्द्रनाथ पर्वत की चोटी से अप्रतिम परिदृश्यों के अद्भुत दृश्य

देवदर्शन एवं मंदिर की आतंरिक सुन्दरता का मन भर के आनंद लेने के पश्चात हम मंदिर से बाहर आये तथा मंदिर के चारों ओर परिक्रमा करने लगे। हमें आभास हुआ कि हम गोवा की सर्वाधिक ऊँचाई पर विचरण कर रहे थे। यहाँ से चारों ओर के परिदृश्यों का अप्रतिम दृश्य दिखाई देता है। गोवा को प्रकृति ने खुले हाथों से जो संपदा प्रदान की है, उसका हमने शांति से मनपूर्वक आनंद उठाया। चन्द्रनाथ पर्वत चारों ओर हरियाली से ओतप्रोत तराई से घिरा हुआ है जिसके उस पार हरी-भरी घाटियों की पंक्तियाँ हैं। उन्हें निहारते आप घंटों बिता सकते हैं। ऊंचाई पर होने के कारण यहाँ सदा वायु बहती रहती है।

चन्द्रनाथ पर्वत अत्यंत विशाल है। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीन काल में भक्तगण इसकी परिक्रमा करते रहे होंगे। तराई एवं घाटियों पर सघन वन हैं। मुझे बताया गया कि इन वनों में अनेक प्रकार के औषधीय पौधे एवं वृक्ष हैं। गाँव के वरिष्ठ निवासियों को इन औषधीय सम्पदाओं की जानकारी है तथा वे इसका उपयोग भी करते हैं। आशा है नयी पीढी इस धरोहर को सहेज कर रखने में सक्षम एवं सफल हो सके तथा अधिक से अधिक लोगों की इसकी जानकारी मुहैय्या कराये। वनों में वनीय पशु-पक्षी भी अवश्य होंगे किन्तु हमें इधर-उधर कूदते-फांदते वानर ही दृष्टिगोचर हुए।

मुझे जानकारी मिली कि चन्द्रनाथ पर्वत पर रोहण करने के लिए एक प्राचीन मार्ग भी है जहां वाहन नहीं जा सकते। वहां पैदल ही चढ़ना पड़ता है। अच्छे स्वास्थ्य के लोगों अथवा रोहण में प्रशिक्षित यात्रियों के लिए ही वह सुगम्य है।

पर्वत के समीप से कुशावती नदी बहती है।

अवश्य पढ़ें: नैमिषारण्य – वेदों, पुराणों, सत्यनारायण कथा एवं ८८,००० ऋषियों की तपोभूमि

चंद्रेश्वर भूतनाथ मंदिर का भ्रमण – एक विडियो

चंद्रेश्वर भूतनाथ मंदिर में हमारे भ्रमण का विडियो मैंने IndiTales YouTube channel पर प्रेषित किया है। इसे देखकर आप को इस स्थान के विषय में पूर्व जानकारी प्राप्त होगी जिससे आपको अपनी यात्रा नियोजित करने में आसानी होगी।

चामुंडेश्वरी शांतादुर्गा मंदिर

जुडवाँ देवियाँ, चामुंडेश्वरी एवं शांतादुर्गा को समर्पित यह मंदिर चंद्रेश्वर भूतनाथ मंदिर के महाद्वार से लगभग २ किलोमीटर दूर स्थित है। कुशावती नदी के ऊपर स्थित पुल को पार कर हम घुडोआवडे गाँव पहुंचे जहां यह मंदिर स्थित है।

चामुंडेश्वरी शांतादुर्गा मंदिर
चामुंडेश्वरी शांतादुर्गा मंदिर

हम बिना पूर्वनियोजन किये अनायास ही इस मंदिर तक पहुँच गए थे। उस समय यहाँ जत्रा अर्थात् मंदिर का वार्षिक उत्सव चल रहा था। यह अपेक्षाकृत एक विशाल मंदिर है जिसके भीतर दोनों देवियाँ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हैं। दोनों मूर्तियाँ अत्यंत सुन्दर हैं जिनके ऊपर से दृष्टी हटाये नहीं हटती हैं।

श्री उद्दंगी प्रसन्न
श्री उद्दंगी प्रसन्न

उसी परिसर में मैंने एक अनोखा मंदिर देखा जिसका नाम था, श्री उद्दंगी प्रसन्न। यहाँ दीमकों का एक बड़ा टीला था जिसके समक्ष एक बड़ी नागा मूर्ति स्थापित थी। मुझे यह जानकारी थी कि शांतादुर्गा अथवा सातेरी का मूल स्थान दीमक का टीला होता है किन्तु यह प्रथम मंदिर है जहां मैंने वास्तव में दीमक के टीले को देवी के रूप में पूजे जाते देखा है।

इस मंदिर का सम्बन्ध चंद्रेश्वर भूतनाथ मंदिर से है क्योंकि वार्षिक उत्सवों के समय दोनों मंदिरों के देव एवं देवियाँ एक दूसरे से भेंट करते हैं।

सातेरी मंदिर

महाद्वार के निकट एक नवीन सातेरी मंदिर निर्माणाधीन है। बंद होने के कारण हमने बाहर से मंदिर के दर्शन किये एवं वापिस घर के लिए निकल पड़े।

अवश्य पढ़ें: हरिद्वार के दर्शनीय देवी मंदिर – शक्तिपीठ एवं सिद्धपीठ

चंद्रेश्वर भूतनाथ मंदिर के दर्शन के लिए कुछ यात्रा सुझाव

  • चन्द्रनाथ पर्वत एवं मंदिर के अवलोकन के लिए कम से कम २ घंटों का समय लग सकता है। यदि आप सीढ़ियों से जाना चाहते हैं तो कुछ समक अधिक लगेगा।
  • यदि आप मंदिर के देव की शोभायात्रा अर्थात् पालकी के दर्शन करना चाहते हैं तो सोमवार के दिन यहाँ आईये। अन्यथा चैत्र मास में पधारें जो लगभग मार्च/अप्रैल के महीने में पड़ता है।
  • सार्वजनिक परिवहन सेवा केवल पर्वत की तलहटी पर स्थित मुख्य मार्ग तक पहुँचाती है। पर्वत शिखर तक पहुँचाने के लिए यह सेवा उपलब्ध नहीं है। मंदिर तक आप पैदल चढ़ सकते हैं अथवा निजी वाहन द्वारा पहुँच सकते हैं।
  • खाद्य एवं पेय पदार्थों की सुविधाएँ न्यूनतम हैं। इसका ध्यान रखकर अपनी यात्रा नियोजित करें।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post चंद्रेश्वर भूतनाथ मंदिर गोवा की पहाड़ी पर एक प्राचीन मंदिर appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/prachin-chandreshwar-bhutnath-mandir-goa/feed/ 0 2741