संगीत यात्रा Archives - Inditales श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Tue, 30 Jul 2024 13:54:25 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.7.5 रेलगाड़ी पर फिल्माए लोकप्रिय बॉलीवुड गीतों की यात्रा – एक झलक https://inditales.com/hindi/rail-gadi-par-filmaaye-geet/ https://inditales.com/hindi/rail-gadi-par-filmaaye-geet/#respond Wed, 18 Dec 2024 02:30:10 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3735

बॉलीवुड के चित्रपट सामान्यतः अपने निर्मिती कालखंड व उस समय की परिस्थिति के प्रतिबिम्ब होते हैं। उनमें कुछ काल्पनिक तथा कुछ वास्तविक कथानकों द्वारा समय के साथ परिवर्तित होते समाज एवं व्यवस्थाओं का सुन्दर चित्रण किया जाता रहा है। यात्रायें समाज का अभिन्न अंग हैं। तो स्वाभाविक ही है कि हमारे बॉलीवुड चित्रपटों के पटकथाओं […]

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बॉलीवुड के चित्रपट सामान्यतः अपने निर्मिती कालखंड व उस समय की परिस्थिति के प्रतिबिम्ब होते हैं। उनमें कुछ काल्पनिक तथा कुछ वास्तविक कथानकों द्वारा समय के साथ परिवर्तित होते समाज एवं व्यवस्थाओं का सुन्दर चित्रण किया जाता रहा है। यात्रायें समाज का अभिन्न अंग हैं। तो स्वाभाविक ही है कि हमारे बॉलीवुड चित्रपटों के पटकथाओं में भी यात्राओं एवं उससे जुडी यंत्रणाओं का कभी उद्देश्यपूर्ण रीति से तो कभी सौन्दर्यवृद्धि की दृष्टी से उल्लेख किया जाता रहा है।

इसी कारण आप बॉलीवुड चित्रपटों में अनेक गीत देखेंगे जिनका परोक्ष या अपरोक्ष रूप से यात्राओं से सम्बन्ध रहा है। यात्रा चाहे तांगे से हो या, रिक्शा से, साइकिल से हो या बस से, विमान से हो या रेलगाड़ी से। समय से साथ टाँगे, रिक्शा आदि का स्थान दुपहिये वाहनों ने ले लिया है। बस स्थानकों के दृश्यों के स्थान पर अब विमानतल के दृश्य अधिक दिखाई देते हैं। किन्तु एक दृश्य ऐसा है जो अब तक वैसा कि वैसा ही है, तटस्थ। वह है रेलगाड़ी या ट्रेन का दृश्य।

रेलयात्रा में जो लुभावनापन है, आकर्षण है, प्रेमी-प्रेमिकाओं का प्रेम व्यक्त करना है, यहाँ तक कि अपरोक्ष रूप से कोई सन्देश देना है, उसे यात्रा का अन्य कोई भी माध्यम मात नहीं दे सकता। स्वाभाविक है कि अनेक दशकों से बॉलीवुड के कुछ अत्यंत लोकप्रिय, भावुक तथा कल्पनाशील गीत ट्रेन पर ही चित्रित हैं। भारतीय रेल पर। आप यदि ध्यान से सोचें तो बॉलीवुड के अनेक भावनाशील तथा दार्शनिक गीतों की पार्श्वभूमी में भी आप ट्रेन का सम्बन्ध अवश्य देखेंगे, विशेषतः आरंभिक दशकों के गीतों में।

रेल पर चित्रित बॉलीवुड के २० सर्वोत्तम गीत

दशकों से बॉलीवुड के चित्रपटों में जो गीत रेलगाड़ी पर फिल्माए जा रहे हैं, उनसे हमें भारतीय रेल की अब तक की यात्रा के विषय में भी जानकारी मिलती है। अंग्रेजों के लिए बने अतिविलासी डब्बों से दूसरे दर्जे के आम डब्बों तक, धरोहर रेलों से स्थानिक रेलों तक, यहाँ तक कि मालवाहक रेलों की भी यात्रा समझ में आती है। तो आईये मेरे साथ भारतीय रेलों पर फिल्माए बॉलीवुड संगीत की संगीतमय यात्रा पर जो आपको कल्पना के जग में ले जायेगी।

तूफान मेल – जवाब (१९४२)

१९४२, वह वर्ष जब भारत में “भारत छोडो” आन्दोलन चल रहा था। यह वही वर्ष था जब कमल दासगुप्ता के संगीत पर पंडित मधुर द्वारा लिखे इस अमर गीत को कानन देवी सिंह ने गया था।

तूफान मेल – उस काल में रेलों के नाम भी अनोखे होते थे। आजकल रेलों के कितने नीरस नाम होते हैं। कल्पना कीजिये कि आप तूफान मेल नाम के ट्रेन में यात्रा करने वाले हैं।

आओ बच्चों तुम्हे दिखाएँ – जागृति (१९५४)

इस अमर गीत में ट्रेन की यात्रा दिखाई गयी है जो वास्तव में आपको भारत के विभिन्न क्षेत्रों एवं विविधताओं की सैर कराती है। भारत में हम गर्व से कहते हैं कि भारतीय रेल भारत के कोने कोने में जाती है। देश के एक छोर को दूसरे छोर से जोड़ती है। यह गीत ठीक उसी भावना का प्रदर्शन करता है। इस गीत से मुझे अपने शालेय दिवसों का स्मरण हो आता है। किसी ना किसी रूप में इस गीत ने मुझे यात्राएं करने के लिए प्रेरित किया है। आज मैं जितनी यात्राएं करती हूँ, यहाँ तक कि उसे मैंने अपना व्यवसाय ही बना लिया है, मेरे अनुमान से उसमें इस गीत की बड़ी भूमिका है। कवि प्रदीप द्वारा गाये गए इस गीत को हेमंत कुमार ने संगीतबद्ध किया है।

देख तेरे संसार की हालत – नास्तिक (१९५४)

भारत विभाजन के समय भी रेलों ने बड़ी भूमिका निभाई थी। एक ओर से दूसरी ओर लोगों को ले जाना। रेलें लोगों से खचाखच भरी होती थीं। खिडकियों, दरवाजों से लटकते लोग। छत पर बैठे लोगों की भीड़। ऐसा प्रतीत होता है कि इस गीत ने इस दृश्य व भावना को आत्मसात करने का प्रयास किया है। प्रदीप द्वारा गाया गया यह गीत आपको आपके आज की सुख-सुविधाओं भरे जीवन के विषय में अवश्य कृतज्ञ कर देगा।

बस्ती बस्ती पर्बत पर्बत – रेलवे प्लेटफोर्म (१९५५)

इस दृश्य में पटरी को पीछे छोड़कर रेलगाड़ी आगे बढ़ रही है, सा

थ ही चित्रपट के कलाकारों एवं सहायकों के नाम पटल पर आते जा रहे हैं। यह एक यात्री की गाथा प्रतीत होती है।

इस गीत को साहिर लुधियानवी ने लिखा, मदन मोहन ने संगीतबद्ध किया तथा मोहम्मद रफ़ी ने अपने मधुर आवाज में गाया है।

है अपना दिल तो आवारा – सोलवां सावन (१९५८)

यह मेरा सदा-प्रिय, एक अल्हड़ गीत है जिसे देव आनंद एवं वहीदा रहमान की सुन्दर जोड़ी पर फिल्माया गया है। यह गीत रेलगाड़ी के भीतर फिल्माया गया है, इसे समझने में मुझे कुछ समय लगा था। क्योंकि मैंने तब तक ऐसी रेलगाड़ी नहीं देखी थी। मजरूह सुल्तानपुरी के शब्दों को एस. डी. बर्मन ने संगीतबद्ध किया है। इस मस्ती भरे गीत को हेमंत कुमार ने अपनी गायकी से अमर कर दिया है।

 मेरे अनुमान से यह गीत कोलकाता के स्थानीय इलेक्ट्रिकल मल्टीपल यूनिट (EMU) में फिल्माया गया है।

औरतों के डब्बे में – मुड़ मुड़ के ना देख (१९६०)

यह एक मस्ती भरा गीत है जिसमें स्त्री-पुरुष के मध्य सदाबहार नोकझोंक को प्रदर्शित किया है। इस दृश्य में एक पुरुष महिलाओं के डिब्बे में प्रवेश कर जाता है।

इस दृश्य में भारत भूषण, जो बहुधा गंभीर भूमिका निभाते थे, चंचलता भरी भूमिका कर रहे हैं। इस गीत को मोहम्मद रफ़ी एवं सुमन कल्याणपुर ने गाया है, हंसराज बहल ने संगीतबद्ध किया है तथा इसके बोल प्रेम धवन ने लिखे हैं।

मैं हूँ झुम झुम झुमरू – झुमरू (१९६१)

दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे पर फिल्माया यह अमर गीत झुमरू चित्रपट का शीर्षक गीत भी है। इस गीत को गायक व नायक किशोर कुमार ने अत्यंत अल्हड़ शैली में गाया है। इस चित्रपट में मुख्य भूमिका में स्वयं किशोर कुमार तथा मधुबाला हैं। रेलगाड़ी से सम्बंधित मस्तीभरे गीत चुने जाएँ तो सूची में ये गीत सर्वोच्च स्थान पर हो सकता है। इस गीत को संगीतबद्ध भी किशोर कुमार ने ही किया है। इसके शब्द मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखे हैं।

मुझे अपना यार बना लो – बॉय फ्रेंड (१९६१)

इस गीत में नायक शम्मी कपूर हिमालय की शिवालिक पर्वत श्रंखला से जाती हुई शिमला-कालका रेलगाड़ी की छत पर कूदते-फांदते दिख रहे हैं। यह उनकी सर्वधिक लोकप्रिय शैली है। श्वेत-श्याम चित्रपट होते हुए भी हिमाच्छादित पर्वत शिखर अत्यंत सुन्दर दिख रहे हैं।

गायक – मोहम्मद रफ़ी, संगीत – शंकर जयकिशन, गीत – हसरत जयपुरी

मैं चली मैं चली – प्रोफेसर (१९६२)

यह गीत भी दार्जीलिंग हिमालयन रेल पर फिल्माया गया है जिसमें शम्मी कपूर व कल्पना आपस में प्रेम व्यक्त कर रहे हैं।

गायक – मोहम्मद रफ़ी व लता मंगेशकर, संगीत – शंकर जयकिशन, गीत – हसरत जयपुरी

रुख से जरा नकाब हटा दो – मेरे हजूर (१९६८)

रेलगाड़ी में बैठी नायिका पर फिल्माया गया एक सुन्दर गीत जिसे मोहम्मद रफ़ी ने अपना मधुर स्वर प्रदान किया है। इस मधुर गीत को संगीतबद्ध किया शंकर जयकिशन ने।

मेरे सपनों की रानी – आराधना (१९६९)

इस गीत में दार्जीलिंग हिमालयन रेल का सुन्दर दृश्य दिखाया गया है। यह ऐसा गीत है जिसे छोटे बड़े सभी ने मस्ती में गया होगा।

इस गीत के इतने लोकप्रिय होने के पीछे किशोर कुमार की मदमस्त आवाज, आनंद बक्शी के बोल, सुप्रसिद्ध संगीतकार आर. डी. बर्मन का मस्ती भरा संगीत व लोकप्रिय नायक राजेश खन्ना, इस सब का मधुर संगम है।

हम दोनों दो प्रेमी – अजनबी (१९७४)

चित्रपट के नायक व नायिका, राजेश खन्ना व जीनत अमान एक मालगाड़ी के डिब्बे पर सवार दिखाए गए हैं। पहले दृश्य में ही रेल क्रमांक १९२२८ भी दिखाई देता है। उस काल में रेलगाड़ी में भाप का इंजिन लगता था। एक मालगाड़ी का इतना सुन्दर रूप किसी ने कभी नहीं देखा होगा। किशोर कुमार व लता मंगेशकर ने आर. डी. बर्मन के संगीत पर आनंद बक्शी के इस गीत को पूर्ण न्याय किया है।

गाड़ी बुला रही है – दोस्त (१९७४)

इस गीत में ट्रेन या रेलगाड़ी को एक रूपक के रूप में प्रयोग किया गया है। इस गीत में केवल दो ही तत्व दर्शाए गए हैं, नायक धर्मेन्द्र एवं रेलगाड़ी। गाड़ी के माध्यम से जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी गयी है। इस गीत में कालका-शिमला पर्वतीय रेल दिखाया गया है। इस स्फूर्तिदायक गीत को किशोर कुमार ने गया है, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने संगीत दिया है तथा गीतकार हैं आनंद बक्शी।

होगा तुमसे प्यारा कौन – जमाने को दिखाना है (१९७७)

एक बार फिर दार्जीलिंग हिमालयन रेल। केवल नायक व नायिका भिन्न हैं। यहाँ ऋषि कपूर पद्मिनी कोल्हापुरे के समक्ष अपना प्रेम व्यक्त कर रहे हैं। रेलगाड़ी का ऊपर से अप्रतिम दृश्य लिया गया है। संगीत की तान से मेल खाती रेलगाड़ी की आवाज एवं भाप इंजिन से निकलते धुंए का सुन्दर ढंग से प्रयोग किया गया है। आर. डी. बर्मन द्वारा संगीतबद्ध इस गीत को शैलेन्द्र सिंग ने अपने स्वर प्रदान किये हैं जो ऋषि कपूर पर अच्छे लगते हैं।

पर दो पल का साथ हमारा – द बर्निंग ट्रेन (१९८०)

पल दो पल का साथ हमारा, पल दो पल का याराना है। ये शब्द रेल यात्रा को सुन्दर शैली में व्यक्त करते हैं। रेलयात्रा का यही सत्य है। रेलगाड़ी के भीतर फिल्माए गए इस गीत को मोहम्मद रफी एवं आशा भोंसले ने गाया है। आर.डी. बर्मन द्वारा संगीतबद्ध इस गीत के बोल साहिर लुधियानवी ने लिखे हैं।

हाथों की चंद लकीरों का – विधाता (१९८२)

यह एक दार्शनिक गीत है जिसमें दो वयस्क नायकों, दिलीप कुमार व शम्मी कपूर को दिखाया गया है। इस गीत के माध्यम से वे नियति एवं कर्म पर आपस में तर्क कर रहे हैं। इस गीत में दोनों रेल के डब्बे के भीतर नहीं, इंजिन के भीतर हैं तथा रेलगाड़ी चला रहे हैं। सुरेश वाडकर एवं अनवर हुसैन द्वारा गाये गए इस गीत को कल्याणजी आनंदजी ने संगीतबद्ध किया तथा इसके बोल लिखे हैं, आनंद बक्शी ने।

सारी दुनिया का बोझ हम उठाते हैं – कुली (१९८३)

इस चित्रपट के नाम से ही यह समझ में आ जाता है कि यह एक कुली की कथा है। यह गीत बंगलुरु सिटी स्टेशन पर फिल्माया गया है जो इस गीत का वास्तविक नायक है।

गायक – शब्बीर कुमार, संगीतकार – लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, गीतकार – आनंद बक्शी

साजन मेरे उस पार – गंगा जमुना सरस्वती  (१९८८)

इस गीत में भारतीय रेल की विभिन्न श्रेणियां दिखाई गयी हैं जिनके माध्यम से उनके मध्य सामाजिक व आर्थिक विभाजन दर्शाया गया है।

गायिका – लता मंगेशकर, संगीतकार – अनु मालिक, गीतकार – इन्दीवर

कब से करे है तेरा इंतजार – कभी हाँ कभी ना (१९९४)

यह मधुर गीत कोंकण रेलवे का उत्सव मनाता है। भारत के सर्वाधिक हरियाली भरे क्षेत्रों से जाते हुए कोंकण क्षेत्र का अप्रतिम परिदृश्य दिखाया गया है। इसमें वास्को द गामा रेल स्टेशन भी दिखाया गया है।

अमित कुमार की मस्ती भरी गायकी को शाहरुख खान ने उतनी ही रोमांचक प्रस्तुति से अलंकृत किया है। जतिन-ललित के उत्कृष्ट संगीत व मजरूह सुल्तानपुरी के बोल, दोनों ने इस गीत को अत्यधिक लोकप्रिय बना दिया है।

और पढ़ें: मानसून में कोंकण रेलवे की यात्रा

छैंया छैंया – दिल से ( १९९८)

शाहरुख खान एवं मलाइका अरोरा ने नीलगिरी धरोहर रेलगाड़ी की छत पर फिल्माए इस रोमांचक गीत से चित्रपट प्रेमियों में धूम मचा दी थी। मेरे लिए इस गीत की विशेषता है, सुखविंदर सिंग एवं सपना अवस्थी के सशक्त स्वर जिसे लोक शैली में संगीतबद्ध किया ए. आर. रहमान ने। गीत लिखा गुलजार ने। ट्रेन पर फिल्माये बॉलीवुड गीतों में सर्वाधिक लोकप्रिय गीत।

कस्तो मज्जा है रेलैमा – परिणीता (२००५)

नायिका विद्या बालन का स्मरण करते नायक सैफ अली खान एक बार फिर दार्जीलिंग हिमालयन रेल में सवार हो गए हैं। यह गीत आपको अतीत काल में ले जाता है तथा रेलों का स्वर्णिम युग आपके समक्ष प्रस्तुत करता है। यह एक सुन्दर गीत है जिसे उतनी ही सुन्दर शैली में चित्रित किया है। इस मधुर गीत को मधुर स्वर प्रदान किये हैं गायक सोनू निगम ने। शांतनु मोइत्रा ने स्वानंद किरकिरे द्वारा लिखित इस गीत को सुन्दर संगीत प्रदान किया है।

मनु भैय्या क्या करेंगे – तनु वेड्स मनु (२०११)

दूसरे दर्जे के रेल डिब्बे में यात्रा कर रहा एक भरा पूरा परिवार इस लोकगीत के द्वारा अचानक उर्जा से भर जाता है तथा आनंद मनाने लगता है। रेलगाड़ी जैसे जैसे आगे बढ़ रही है, परिवार के सदस्य नाचते गाते हैं तथा डिब्बे में ही विवाह उत्सव की विभिन्न विधियां एवं संस्कार करते हैं। मोहित चौहान के संगीत पर सुनिधी चौहान, उज्जैनी मुखर्जी एवं निलाद्री देबनाथ ने इस लोकगीत की सुन्दर प्रस्तुति की है।

फूलिश्क – की एंड का (२०१६)

यह गीत रेवाड़ी धरोहर रेल पर फिल्माया गया है। यह धरोहर रेलगाड़ी दिल्ली व रेवाड़ी के मध्य चलती है। इन दिनों यह चित्रपटों में अधिक दिखाई देती है। इस गीत का कोई औचित्य नहीं है। मेरे लिए यह गीत रेल संग्रहालय का भ्रमण है।

इनमें से आपके प्रिय गीत कौन से हैं? यदि मुझसे रेल पर फिल्माया कोई बॉलीवुड गीत छूट गया हो, जो आपको प्रिय हो, टिप्पणी खंड द्वारा मुझे अवश्य सूचित करें।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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बॉलीवुड से २० सर्वोत्तम वर्षा गीत https://inditales.com/hindi/varsha-geet-bollywood/ https://inditales.com/hindi/varsha-geet-bollywood/#respond Wed, 31 Aug 2022 02:30:04 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2778

गोवा में मानसून के मौसम में जब वर्षा होती है, तब वर्षा के गीत सहज ही अधरों पर आ जाते हैं। गोवा में वर्षा ऋतू में रिमझिम वर्षा नहीं, अपितु झमाझम वर्षा होती है, वह भी चार मास से अधिक समयावधि के लिए। तात्पर्य यह है कि मानसून के मौसम में गोवा में देश के […]

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गोवा में मानसून के मौसम में जब वर्षा होती है, तब वर्षा के गीत सहज ही अधरों पर आ जाते हैं। गोवा में वर्षा ऋतू में रिमझिम वर्षा नहीं, अपितु झमाझम वर्षा होती है, वह भी चार मास से अधिक समयावधि के लिए। तात्पर्य यह है कि मानसून के मौसम में गोवा में देश के अधिकतर राज्यों से अपेक्षाकृत अधिक वर्षा होती है। गोवा के चौमासी वर्षा को देख मुझे अनायास ही संतों का चातुर्मास स्मरण हो आता है, जब भ्रमण करते साधु-संत वर्षा ऋतु में चार मास की अवधि के लिए किसी एक स्थान पर ठहर जाते थे तथा सत्संग करते थे। अनेक अवसरों पर कदाचित उन्हें गुफाओं में भी विश्राम करना पड़ा होगा, जैसे अजंता तथा बराबर गुफाएं। गोवा में कभी कभी वर्षा का उन्माद इतना अधिक होता है कि उसके अतिरिक्त अन्य कुछ सुनाई नहीं पड़ता है। हम बाहरी विश्व से लगभग पृथक से होने लगते हैं। उस समय केवल हम होते हैं तथा हमारे हृदय से उमड़कर अधरों पर आते वर्षा के गीत होते हैं। हृदय उल्साह से भर जाता है तथा हम अनायास ही वर्षा के गीत गुनगुनाने लगते हैं।

वर्षा गीत ऐसे ही वर्षा के मनभावन गीतों एवं उसके उल्हास व उन्माद को कुछ हिन्दी चित्रपटों ने सुन्दर शैली में प्रदर्शित किया है। उनमें प्रदर्शित भावनाएं हमारे हृदय को छूने में सफल हो जाती हैं। बालपन में वर्षा के जल में छप-छप कूदने से लेकर प्रेम से ओतप्रोत प्रेमी-प्रेमिकाओं की एक दूसरे से मिलने की तड़प तक, अथवा वर्षा की प्रतीक्षा करते किसानों की व्यथा का वर्षा की बूंदे देखते ही उल्हास में परिवर्तित होना, इन सभी भावनाओं का बॉलीवुड के गीतों में सुदर चित्रण किया गया है।

बॉलीवुड के विश्व से चुने हुए कुछ वर्षा गीत

वर्षों से जिन वर्षा गीतों का मैंने आनंद लिया, उन्हें आपके साथ बाँटना चाहती हूँ। आशा है आपको भी ये गीत आनंद विभोर कर देंगे।

इक लड़की भीगी भागी – चलती का नाम गाडी (१९५८)

किशोर कुमार द्वारा गाये गए इस गीत में उच्छृंखलता भरी हुई है। यद्यपि इस गीत में वर्षा का दृश्य नहीं है, तथापि मधुबाला, जो इस गीत की प्रेरणा है, वो वर्षा के जल में भीगी हुई है तथा सुनसान रात में अकेली अपनी गाड़ी की मरम्मत कराने वहां पहुँचती है। इस गीत में नायक, नायिका मधुबाला की परिस्थिति का अत्यंत मस्ती भरी शैली में उल्लेख कर रहा है। अप्रतिम सौंदर्य से युक्त मधुबाला के भीगे मुखड़े की झलकों के मध्य किशोर कुमार के चंचल हाव-भाव इस गीत को अधिक मनोहर बना देते हैं। किशोर कुमार, जो एक गाड़ी मरम्मत करने वाले मिस्त्री हैं, वे औजारों द्वारा संगीत उत्पन्न करते हैं। इस गीत को दिग्गज पार्श्वगायक किशोर कुमार ने गाया है तथा इसे उन्ही पर फिल्माया भी गया है। आप आधुनिक पार्श्वसंगीत के महान संगीतकार आर. डी. बर्मन के संगीत को सराहे बिना नहीं रह पायेंगे।

डम डम डिगा डिगा – छलिया (१९६०)

वर्षा ऋतु के आनंद का उत्सव मनाते इस गीत को कल्याणजी आनंदजी से सुरों में पिरोया है तथा इसे स्वर प्रदान किया है मुकेश ने। वर्षा के आते ही स्त्रियाँ सूखे वस्त्रों को रस्सी पर से उतार रही है, लोग वर्षा से बचने के लिए यहाँ-वहां भाग रहे हैं तथा छतरियां खोल रहे हैं, वहीं चित्रपट के नायक राज कपूर अपनी लोकप्रिय शैली में कूदते-फांदते गीत गा रहे हैं। इस श्वेत-श्याम चित्रपट में वर्षा की प्रथम फुहार का उल्हास दर्शाया गया है।

ओ सजना बरखा बहार आयी – परख (१९६०)

यह गीत आपको वास्तव में वर्षा ऋतु के दिवसों का स्मरण करा देगा। इस गीत में नायिका साधना छज्जे पर खड़े होकर वर्षा की फुहारों को निहार रही है एवं अपने प्रियतम की स्मृतियों में खो गयी है। वो उससे कह रही है कि वर्षा ऋतु आ गयी है तथा उसके हृदय में प्रेम का संचार कर रही है। गीत के इस चित्रीकरण में पत्तों, धरती, छत आदि पर बरसती फुहारों द्वारा वर्षा का अद्भुत दृश्य प्रस्तुत किया है।

सलिल चौधरी के संगीत पर लता मंगेशकर ने इस गीत को अपने अद्भुत स्वर से सजाया है।

जिंदगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात – (१९६०)

इस चित्रीकरण में केवल दो दृश्य हैं तथा वर्षा का एक भी दृश्य नहीं है। इसके पश्चात भी इस काव्य के प्रत्येक शब्द को इतनी सुन्दरता से रचा गया है कि नेत्रों के समक्ष सम्पूर्ण दृश्य सजीव हो उठता है। वर्षा की एक रात्रि के समय नायक का नायिका से भेंट होना, वर्षा की बूंदों का नायिका के मुखड़े पर सरकना, बिजली गिरते ही नायिका का नायक से टकराना तथा लजाना, ऐसे अनेक सुंदर क्षणों का इस गीत में उल्लेख है। नायक एवं नायिका के मध्य केवल रेडियो के माध्यम से भावनाओं का प्रवाह हो रहा है। मोहम्मद रफ़ी द्वारा गाये गए गीत को भारत भूषण पर फिल्माया गया है। इस गीत को पूर्ण न्याय किया है नायिका मधुबाला की अप्रतिम भाव भंगिमाओं एवं अभिव्यक्तियों ने, जो वर्षा की उस रात्रि का दृश्य हमारे समक्ष अक्षरशः सजीव कर देते हैं।

लाखों का सावन जाए  – रोटी, कपड़ा और मकान (१९७४)

इस गीत में युगल जोड़ों का मर्म प्रस्तुत किया है जिन्हें वर्षा ऋतु के आनंदित वातावरण में विरह की स्थिति का सामना करना पड़ता है। इस गीत में विरह का मर्म दर्शाया गया है। यूँ तो लता मंगेशकर द्वारा सुमधुर स्वर में गाये गए इस गीत को नायिका जीनत अमान ने ठेठ देहाती शैली में प्रस्तुत किया है, किन्तु मुझे इसका ‘अम्बर पे रचा स्वयंवर’, यह भाग अत्यंत प्रिय है।

रिम झिम गिरे सावन – मंजिल (१९७९)

इस गीत में अमिताभ बच्चन एवं मौसमी चटर्जी मुंबई की सडकों एवं समुद्र तटों पर वर्षा का आनंद लेते दिख रहे हैं। इसमें मुंबई के लगभग ४० वर्षों पूर्व का दृश्य दर्शाया गया है जब मुंबई के लोग वर्षा का आनंद उठा सकते थे। चित्रपट में इस गीत के दो संस्करण हैं। एक संस्करण केवल किशोर कुमार के स्वर में है जिसे घर के भीतर फिल्माया गया है जबकि दूसरा संस्करण लता मंगेशकर के स्वर में है जिसमें मुंबई, वहां की वर्षा एवं वर्षा की फुहारों में भीगते प्रेमी जोड़े को दिखाया गया है।

रिम झिम गिरे सावन, यह गीत मुझे ऐसा आभास करता है मानों वर्षा की फुहारों में मेरा तन-मन भीग गया है। मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व वर्षा से एकाकार हो गया है। आर. डी. बर्मन का संगीत इस उल्हास को अनेक गुना बढ़ा देता है।

मेघा रे मेघा रे – प्यासा सावन (१९८१)

इस गीत में मेघों से कहा जा रहा है कि वे परदेश ना जाएँ, अपितु वहीं बरसें तथा उन्हें प्रेम की फुहारों में भिगो दे। उनके अनुनय को स्वीकारते हुए मेघ वहीं बरस जाते हैं। याचना की भावना उल्हास में परिवर्तित हो जाती है। वर्षा होते ही हृदय मोर के समान नाचने लगता है। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के संगीत पर लता मंगेशकर एवं सुरेश वाडकर के सुमधुर स्वरों ने इस गीत को नई ऊँचाइयों तक पहुंचा दिया है।

आज रपट जाएँ तो – नमक हलाल (१९८२)

यह सम्पूर्ण गीत अमिताभ बच्चन एवं स्मिता पाटिल पर फिल्माया गया है जो झमझम वर्षा में भीगते हुए नाच रहे हैं। यद्यपि गीत के मुखड़े में वर्षा उल्लेख नहीं है, तथापि इसके अंतरे में वर्षा का वर्णन किया है।

लगी आज सावन की फिर वो झड़ी – चांदनी (१९८९)

यह एक ऐसा वर्षा गीत है जो उदासी से भरा हुआ है। इसमें वर्षा से सम्बंधित कुछ भावुक स्मृतियों को झकझोरा गया है। ऐसी मधुर स्मृतियाँ जिन्हें चाह कर भी पुनः जिया नहीं जा सकता। इस गीत में नायक के जीवन के अतीत एवं वर्तमान की तुलना की गयी है। यह गीत नायक का अतीत से वर्तमान की ओर यात्रा का संकेत देता है। मैं जब भी यह गीत सुनती हूँ, किंचित उदास हो जाती हूँ। किन्तु मैं यह नहीं जान पाती कि इस गीत का कौन सा तत्व मुझे उदास करता है।

इस गीत को संगीतबद्ध किया है शिव-हरी ने तथा इसे स्वर प्रदान किया है, सुरेश वाडकर ने।

सुन सुन सुन बरसात की धुन – सर (१९९३)

इस गीत में नायक नसीरुद्दीन शाह एक शिक्षक हैं जो अपने विद्यार्थियों से वर्षा के संगीत को सुनने के लिए कह रहे हैं। मुझे यह गीत अत्यंत भाता है तथा प्रासंगिक प्रतीत होता है क्योंकि हम सब ने आज के व्यस्त दिनचर्या में वर्षा एवं उसके संगीत को सुनना तथा उसका आनंद लेना लगभग समाप्त कर दिया है।

रिम झिम रुन झुम –  १९४२ अ लव स्टोरी (१९९४)

१९४२ के काल को प्रदर्शित करते, ‘१९४२ अ लव स्टोरी’ चित्रपट का यह गीत एक सादा तथा अत्यंत मधुर गीत है जो पावन प्रेम को दर्शाता है। ऐसा प्रेम जो अब के चित्रपटों में क्वचित ही दृष्टिगोचर होता है। इसे अत्यंत मधुर बनाने का पूर्ण श्रेय कुमार सानु एवं कविता कृष्णमूर्ति को जाता है जिन्होंने बर्मन दा के संगीत को पूर्ण न्याय किया है।

टिप टिप बरसा पानी – मोहरा (१९९४)

यद्यपि मुझे स्वयं यह गीत अधिक प्रिय नहीं है तथापि वर्षा गीत का उल्लेख करते ही अधिकाँश लोगों को इसी गीत का स्मरण होता है। अतः उन सभी के लिए अलका याग्निक एवं उदित नारायण द्वारा गाया गया यह गीत प्रस्तुत है।

कोई लड़की है – दिल तो पागल है (१९९७)

इस गीत को सुनते ही हम सब के भीतर की बालसुलभ चंचलता हिलोरे मारने लगती है जो वर्षा के जल में क्रीड़ा करने को लालायित है। हम सब में एक नन्हा बालक रहता है जो वर्षा में भीगने को सदा उत्सुक रहता है। जल से भरे पोखरों में नाचना, कूदना तथा खेलना चाहता है। इससे मुझे गोवा में वर्षा ऋतु में मनाये जाने वाले उत्सव, चिखल कालो का स्मरण होता है। इस गीत के बोलों में बालपन के उसी उल्हास का उल्लेख मिलता है। इसका चित्रण भी एक बालगीत के समान उतना ही सादगी एवं चंचलता से भरा हुआ है। यहाँ तक कि इस नृत्य में पार्श्व नर्तक भी बच्चें ही हैं। उत्तम सिंग के संगीत पर इस गीत को लता मंगेशकर एवं उदित नारायण ने गाया है।

अब के सावन – शुभा मुद्गल (१९९९)

यह गीत किसी चित्रपट का नहीं है। किन्तु इस गीत में वर्षा का उत्सव मनाया गया है। इस उत्सव की भव्यता को चार चाँद लगाने का सम्पूर्ण श्रेय शुभा मुद्गल के सशक्त स्वर एवं अप्रतिम गायन शैली को जाता है।

घनन घनन – लगान (२००१)

वर्षा की प्रतीक्षा करते जनसमुदाय, विशेषतः किसान के मन के भाव को यदि किसी गीत ने पूर्ण न्याय किया है तो वह चित्रपट लगान का यही गीत है। कदाचित यह इकलौता गीत है जो वर्षा से हमारे जीवन के सांस्कृतिक एवं सामाजिक-आर्थिक संबंधों को पूर्ण सत्यता से परदे पर उतरता है। विशेष रूप से ग्रामीण भागों के किसानों, एवं अन्य गांववासियों के जीवन में वर्षा के महत्त्व को दर्शाता है। यदि आप गीत के बोल पर ध्यान केन्द्रित करें तो आप अपने समक्ष वे सभी खुशियों की कल्पना कर सकते हैं जिन्हें वर्षा अपने संग ले कर आती है। गीत के अंत में उदासी है जो मेघों के बिना बरसे ही चले जाने के कारण उत्पन्न हुई है। मुझे लोकगीतों से लगाव होने के कारण लगान का यह गीत अत्यंत भाता है।

बरसों रे मेघा – गुरु (२००७)

बरसो रे मेघा, इस गीत में दक्षिण भारतीय परिवेश में वर्षा के आनंद को सुन्दरता से चित्रित किया है। वर्षा के जल में धुले-भीगे शैल मंदिर, जल से लबालब भरे झरने तथा हरियाली से परिपूर्ण परिदृश्य मन को मोह लेते हैं। गुजरात के परिवेश में बने चित्रपट गुरु के लिए यह गीत किंचित अनुपयुक्त प्रतीत होता है। इसके पश्चात भी यह गीत मन मोह लेता है। भावनात्मक स्तर पर देखा जाए तो इस गीत में वर्षा के आते ही प्रथम प्रेम के उन्माद में सराबोर नायिका के पैर थिरकने लगते हैं। वह बेसुध नृत्य कर रही है। वह प्रेम के लिए कुछ भी करने के लिए तत्पर है।

ए. आर. रहमान के जादुई संगीत के आनंद को श्रेया घोषाल के मधुर स्वर द्विगुण कर रहे हैं।

गिव मी सम सनशाइन – ३ इडियट्स (२००९)

मुझे इस गीत के भाव अत्यंत प्रिय हैं। हमारे जीवन में सर्वाधिक आवश्यक तत्व हैं, सूर्य की किरणें एवं वर्षा। अन्य सब महत्वहीन हैं। यह गीत इस सूची के लिए भले ही उपयुक्त ना हो, किन्तु यह गीत इन सभी से कम प्रेरणादायक भी नहीं है।

अन्य लोकप्रिय वर्षा गीत कुछ इस प्रकार हैं:

रिम झिम के गीत सावन गाये – अंजाना १९६९

भीगी भीगी रातों में – अजनबी  १९७४

देखो जरा देखो बरखा की लड़ी – ये दिल्लगी १९९४

सावन बरसे तरसे दिल – दहक १९९९

मैंने इन वर्षा गीतों का चयन किस आधार पर किया?

यूँ तो बॉलीवुड के चित्रपटों में वर्षा पर आधारित ढेरों गीत हैं। उनमें अनेक ऐसे गीत हैं जिनमें वर्षा का उल्लेख है तथा दूसरी ओर कई ऐसे हैं जिन्हें वर्षा के परिवेश में तो फिल्माया गया है, किन्तु उनमें वर्षा का कहीं उल्लेख नहीं है। मैंने विशेष रूप से उन गीतों का चयन किया है जिनमें वर्षा का भावनात्मक उल्लेख किया गया है, भले ही वह एक प्रेमी की प्रेम से सराबोर भावनाएं हों अथवा वर्षा की प्रतीक्षा करते एक किसान की तरसती आँखों की भावनाएं। मैंने उन गीतों को अधिक महत्त्व दिया है जहां गीत के बोलों द्वारा दर्शाए गए भाव में वर्षा की महत्वपूर्ण भूमिका है। इनमें मेरी निजी रूचि भी सम्मिलित है।

और पढ़ें: बॉलीवुड के प्रसिद्ध हिन्दी गीतों में भारतीय स्मारकों का उल्लेख

बॉलीवुड में अनेक लोकप्रिय गीत ऐसे हैं जो वर्षा के परिवेश में चित्रित हैं तथा बॉलीवुड के इतिहास में अमर हो गए हैं। जैसे श्री ४२० का ‘प्यार हुआ इकरार हुआ’, तथा चालबाज का ‘ना जाने कहाँ से आई है’ इत्यादि। किन्तु उनमें वर्षा का उल्लेख नहीं है। अतः मैंने उन्हें इस सूची में सम्मिलित नहीं किया है।

इंडीटेल के पाठकों द्वारा प्रस्तावित

लपक झपक तु आ रे बदरवा – बूट पॉलिश (१९५३)

इनके अतिरिक्त यदि आपका कोई प्रिय बॉलीवुड गीत है, जिसमें वर्षा का सुन्दर उल्लेख किया गया है, तो टिप्पणी खंड में लिखकर हमें अवश्य सूचित करें।

अमेज़न के सहयोगी होने के कारण इंडीटेल उनके चयनित क्रय से अर्जित मूल्य में भागीदार है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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२० उत्कृष्ट कृष्ण भजन – जन्माष्टमी के लिए बॉलीवुड की सदाबहार सौगात https://inditales.com/hindi/krishna-bhajan-hindi-films/ https://inditales.com/hindi/krishna-bhajan-hindi-films/#respond Wed, 10 Aug 2022 02:30:14 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2520

कृष्ण भजन अनेक रसों एवं भावनाओं से ओतप्रोत होते हैं। किसी में गोकुल में बाल गोपाल की चंचल क्रीड़ाओं का आनंद है तो किसी में उनकी युवावस्था में ब्रज भूमि की गोपियों संग की रासलीलाओं का बखान है। किसी में राधा का निश्छल प्रेम है तो किसी में मीरा की भक्ति है। कृष्ण के भजन […]

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कृष्ण भजन अनेक रसों एवं भावनाओं से ओतप्रोत होते हैं। किसी में गोकुल में बाल गोपाल की चंचल क्रीड़ाओं का आनंद है तो किसी में उनकी युवावस्था में ब्रज भूमि की गोपियों संग की रासलीलाओं का बखान है। किसी में राधा का निश्छल प्रेम है तो किसी में मीरा की भक्ति है। कृष्ण के भजन हर प्रकार के भक्तों की भक्ति से सराबोर होते हैं। कृष्ण के लिए लिखे गीतों में श्रृंगार रस एवं भक्ति रस की प्राधान्यता होती है। कृष्ण की भक्ति एवं प्रेम के अनेक रंगों को बॉलीवुड ने सुन्दरता से सजीव किया है। उनमें से कुछ भजन जो मुझे अत्यंत प्रिय है, मैं आपके लिए ले कर आयी हूँ।

बॉलीवुड के चित्रपटों से कृष्ण के कुछ भजन

कृष्ण भजन यह कालक्रम के अनुसार संग्रहीत सूची है।

मोहे पनघट पे – मुगल-ए-आजम (१९६०)

एक ख्यातिप्राप्त चित्रपट का एक सुमधुर गीत! इस गीत के आरम्भ में जन्माष्टमी उत्सव का दृश्य प्रदर्शित किया है। यह गीत स्वयं भी चंचल व मनोहर चेष्टाओं द्वारा कृष्ण एवं गोपियों के मध्य के प्रेम को उजागर करता है। सुन्दर परिधान एवं आभूषण धारण कर मधुबाला ने अपने सुकोमल हावभाव द्वारा उत्कृष्ट नृत्य प्रस्तुत किया है। यह गीत व नृत्य मंत्र मुग्ध कर देता है। यहाँ सुनिए.

मधुबन में राधिका नाचे रे – कोहिनूर (१९६०)

यह उन कुछ गीतों में से है जिसमें कृष्ण की अपेक्षा राधा के विषय में कहा गया है। ऐसा प्रतीत होता है मानो कृष्ण स्वयं अपनी सर्वप्रिय गोपिका, अपनी मनभावन सखी राधा का हमसे परिचय करा रहे हैं।

गोविंदा आला रे – ब्लफमास्टर (१९६३)

दही हाँडी उत्सव का किसी भी चित्रपट में कदाचित यह सर्वप्रथम प्रदर्शन था। कृष्ण अथवा गोविंदा के पात्र को अल्हड़ शम्मी कपूर एवं उनकी चंचलता के अतिरिक्त कौन पूर्ण न्याय दे सकता था? मोहम्मद रफी के मंत्रमुग्ध करते मधुर स्वर इस गीत का आनंद दुगुना कर देते हैं। इस गीत का श्वेत-श्याम चित्रीकरण हमें प्राचीन युग में ले जाता है तथा सोचने को बाध्य करता है कि उस समय सभी उत्सव शालीनता से मनाये जाते थे। इस गीत के अंत का चरमोत्कर्ष मुझे अत्यंत भाता है जिसमें अंततः दही की मटकी फोड़ी जाती है। इस चित्रीकरण में पुराने रुपयों पर अवश्य ध्यान दीजिये। निम्न विडियो में इसी गीत पर आज के महानगरों की दही हाँडी दिखाई गयी है। यदि ब्लफमास्टर चित्रपट में चित्रित गीत देखना चाहें तो यूट्यूब पर यहाँ देखें।

कृष्णा ओ काले कृष्णा – मैं भी लड़की हूँ (१९६४)

जब मैं इस संस्करण के लिए शोध कार्य कर रही थी तब मुझे इस गीत के विषय में अनायास ही ज्ञात हुआ। इस चित्रपट में मीनाकुमारी एक सांवली कन्या का पात्र निभा रही है। इस गीत में वह कृष्ण को उलाहना दे रही है कि कैसे कृष्ण का श्याम रंग उसके लिए अभिशाप बन गया है। यह गीत हमारे समाज की संकुचित मानसिकता को दर्शाता है। हमारे देश में प्राचीन काल से ही गौर वर्ण की त्वचा को प्राधान्यता दी जाती है। हमारे सभी प्रमुख देव श्याम वर्ण होने के पश्चात भी हमारे देश में गौर त्वचा की कामना की जाती है तथा श्यामवर्ण के व्यक्तियों की अवहेलना की जाती है। भगवान कृष्ण की तो ना केवल त्वचा, अपितु उनका नाम भी श्याम है।

बड़ी देर भई नंदलाला – खानदान (१९६५)

इस कृष्ण भजन में ब्रज की गोपिकाओं का नंदलाला के प्रति ललक एवं उत्कंठा को दर्शाया गया है। इसमें वे कृष्ण को पुकार रही हैं कि वे पुनः आयें एवं इस जगत की रक्षा करें।

कान्हा आन पड़ी मैं तेरे द्वार – शागिर्द (१९६७)

श्री कृष्ण की भक्ति से ओतप्रोत यह कृष्ण भजन मुझे उस समय की कल्पना करने पर बाध्य कर देता है जब भारतीय घरों में प्रतिदिन प्रातः भजन गाना कदाचित उनकी दैनिक जीवन शैली का एक अभिन्न भाग होता था।

ओ कन्हैया – राजा और रंक (१९६८)

यह एक कम प्रचलित किन्तु लम्बा गीत है जिसमें श्री कृष्ण की दो पत्नियां, रुक्मिणी एवं सत्यभामा कृष्ण का साथ पाने के लिए आपस में स्पर्धा कर रही हैं। वे कृष्ण के प्रति अपना प्रेम व्यक्त कर रही हैं तथा उनसे आग्रह कर रही हैं कि वे उनके संग चलें। कृष्ण अपनी दोनों पत्नियों की भक्ति एवं समर्पण देख निश्चय नहीं कर पा रहे हैं कि वे किसके संग जाएँ। संयोग से, कृष्ण की पत्नियों का उल्लेख करते गीत एवं भजन अधिक नहीं हैं। यह गीत एक नृत्य नाटिका के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिसमें कविता एवं गायन के कथावाचन रूप को भी सम्मिलित किया है।

शोर मच गया शोर – बदला (१९७४)

इस गीत में कृष्ण जन्माष्टमी के उपलक्ष्य में आयोजित दही हाँडी के उल्ल्हास को प्रदर्शित करने का सफलतापूर्ण प्रयास किया है। गोपियों द्वारा ऊँचाई पर लटकाई दही की हाँडी तक पहुँचने के लिए गोपाल रूपी नवयुवकों का उत्साह दर्शनीय होता है। इसका संगीत शम्मी कपूर के ‘गोविंदा आला रे’ का स्मरण करता है।

श्याम तेरी बंसी पुकारे – गीत गाता चल (१९७५)

इस कृष्ण भजन में प्रत्येक व्यक्ति का श्री कृष्ण से सम्बन्ध दर्शाया गया है। इसमें यह बताया गया है कि भगवान हम सभी से समान रूप से प्रेम करते हैं। वे हम सब के हैं।

यशोमती मैय्या से – सत्यम शिवम् सुन्दरम (१९७८)

इस गीत से मेरी अनेक स्मृतियाँ जुड़ी हुई हैं। मैंने अपने बालपन में अनेक समारोहों पर इस गीत की प्रस्तुति की थी। हमारे पास इसका एल पी रिकॉर्ड था जिसमें यह गीत दो बार बजता था, एक जो यहाँ प्रस्तुत किया गया है तथा दूसरा वयस्क स्वर में गाया गया है। यह मेरा सर्वप्रिय कृष्ण भजन है। मैं प्रत्येक जन्माष्टमी के अवसर पर इसे अवश्य सुनती तथा गुनगुनाती हूँ।

मेरे तो गिरिधर गोपाल – मीरा (१९७९)

वाणी जयराम के भक्ति से ओतप्रोत स्वर में मीरा का यह भजन, ‘मेरे तो गिरिधर गोपाल’, चित्रपटों में प्रदर्शित, मीरा द्वारा रचित भजनों पर आधारित एकमात्र भजन है। इसे संगीत बद्ध किया था, पंडित रवि शंकर ने।

और पढ़ें: चित्तौडगढ़ में मीरा का मंदिर

तू मन की अति भोरी – गोपाल कृष्ण (१९७९)

सूरदास द्वारा रचित कृष्ण भजनों में से ‘मैय्या मोरी मैं नहीं माखन खायो’ यह मेरा सर्वप्रिय भजन है। किसी भी चित्रपट निर्माता ने अब तक इस गीत का प्रयोग किसी भी चित्रपट में नहीं किया है। इस गीत में बाल कृष्ण माता यशोदा से गुहार कर रहे हैं कि उन्होंने माखन चोरी कर नहीं खाया है। उनके बाल मित्रों ने उनके मुख पर माखन यूँ ही लगा दिया है। गोपियाँ व्यर्थ ही उनकी शिकायत कर रही हैं। इन भावनाओं को यदि किसी गीत ने उतना ही न्याय प्रदान किया है तो वह है, ‘तू मन की अति भोरी’। जिस बाल कलाकार ने कृष्ण की भूमिका की है, वह बाल कृष्ण के समान मनमोहक एवं चंचल है।

मच गया शोर सारी नगरी में – खुद्दार (१९८२)

दही हाँडी के उल्लासपूर्ण उत्सव को अमिताभ बच्चन एवं परवीन बाबी पर चित्रित किया गया है। गीत व नृत्य के आवरण में कुछ अनकही को भी कहा गया है। रोशन के संगीत निर्देशन में किशोर कुमार एवं लता मंगेशकर ने इस गीत को स्वर प्रदान किये हैं।

करना फकीरी फिर क्या –  बड़े घर की बेटी (१९८९)

मीरा द्वारा रचित भजनों में यह मेरा सर्वाधिक प्रिय भजन है। मूल भजन की इस प्रस्तुति में कुछ फ़िल्मी परिवर्तन हैं किन्तु इसके पश्चात भी यह एक सुन्दर भजन प्रस्तुति है।

मीरा चित्रपट में भी इस भजन को प्रदर्शित किया है। यहाँ उसका आनंद लीजिये।

आला रे गोविंदा – काला बाजार (१९८९)

 ‘गोविंदा आला रे’ का ही एक अन्य रूप! कदाचित इस गीत के नवीनतम संस्करण आते ही रहेंगे।

मोहे छेड़ो ना नन्द के लाला – लम्हे (१९९१)

इस चित्रपट में कई मधुर व लोकप्रिय गीत हैं किन्तु मुझे उस सब में यह गीत सदा स्मरण रहता है। इस गीत का अविस्मरणीय तत्व है, भगवान एवं भक्त के मध्य मैत्री सम्बन्ध। इस गीत में नायिका स्वयं की कल्पना ब्रज की एक सर्वसामान्य ब्रजबाला के रूप में कर रही है, ऐसी ब्रजभूमि जहां सभी ब्रजवासी कृष्ण से असीम प्रेम करते हैं। इस चित्रपट में नायिका श्री देवी अत्यंत सुन्दर दिखाई दी है। उनके मुखड़े के भाव भी अनमोल प्रतीत हो रहे हैं।

मोरे कान्हा जो आये पलट के – सरदारी बेगम (१९९६)

यह ठुमरी ब्रज की होली का चित्रण करती है जहां राधा एवं गोपिकाएं कान्हा संग होली खेलने हेतु सज्ज हो रही हैं। कान्हा की प्रतीक्षा करते हुए वे अपने काल्पनिक विश्व में ही कान्हा के संग होली खेल रही हैं। एक ओर कान्हा उन्हें रंगों में सराबोर कर रहे हैं तो दूसरी ओर राधा एवं गोपिकाएं उन्हें गारी सुना रही हैं।

राधा कैसे ना जले – लगान (२००१)

‘राधा कैसे ना जले’ यह गीत ब्रज में श्री कृष्ण की राधा एवं गोपिकाओं संग रासलीला के क्षणों को सजीव करता है। राधा की जो मनःस्थिति है, वही मनःस्थिति ब्रज की सभी गोपिकाओं की है। आशा भोंसले के स्वरों ने राधा की ईर्ष्या को पूर्ण सत्यता से उजागर किया है। वहीं उदित नारायण ने श्री कृष्ण के चंचल शांत स्वभाव का सुन्दर चित्रण किया है। यद्यपि यह कृष्ण भजन नहीं है, तथापि यह उन क्वचित गीतों में से है जिनमें कृष्ण की रासलीला के क्षणों को प्रदर्शित किया गया है।

वो किस्ना है –  किस्ना द वारियर पोएट (२००४)

यह कृष्ण की स्तुति का एक आधुनिक रूप है। मूल संगीत वाद्य के रूप में बांसुरी की तान का प्रयोग कर इस गीत को नयी उंचाईयों तक पहुँचाया है। सुखविंदर सिंग का प्रबल स्वर सोने पर सुहागा के समान है। मुझे सुखविंदर सिंग का स्वर अत्यंत भाता है।

मोहे रंग दो लाल – बाजीराव मस्तानी (२०१५)

यह हमारे चित्रपटों में प्रदर्शित उन क्वचित भजनों में से एक भजन है जिसमें शास्त्रीय संगीत एवं नृत्य दोनों का प्रयोग किया है। इसी कारण मैंने इस गीत को इस सूची में सम्मिलित किया है।

मैंने यह कृष्ण भजन सूची कैसे चुनी?

इस सूची के लिए भजनों एवं गीतों का चयन करते समय मैंने सर्वप्रथम उन भजनों तथा गीतों को चुना जो मुझे ज्ञात थे। जैसे ‘यशोमती मैय्या से’, ‘मच गया शोर’ इत्यादि। यूट्यूब ने मुझे इस कार्य में सहायता की जब उसने मुझे कुछ दुर्लभ भजनों का सुझाव दिया, जैसे ‘ओ काले कृष्णा’। ऐसे अनेक गीत प्रचलित हैं जिनमें कृष्ण, गोविंद अथवा राधा शब्दों का प्रयोग किया गया है किन्तु उनका श्री कृष्ण से कोई सम्बन्ध नहीं है । अतः मैंने उन्हें अपनी सूची में सम्मिलित नहीं किया है। कुछ गीत चित्रपट के कारण लोकप्रिय हैं, ना कि एक भजन के रूप में। मैंने उनका चयन भी नहीं किया। मैंने उन भजनों/गीतों को अधिक प्राधान्यता दी है जो श्री कृष्ण एवं उनके जीवन का गुणगान करते हैं तथा उनका उत्सव मनाते हैं।

यदि आप अन्य भजनों /गीतों के विषय में जानते हैं जो इस मापदंड के अनुरूप है, तो उनके विषय में टिपण्णी खंड में अवश्य लिखें। जय श्री कृष्ण!

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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गणपति भजन – शास्त्रीय और लोक स्तुतियाँ अनेक भाषाओँ में https://inditales.com/hindi/ganapati-bhajan-ganesh-chaturthi/ https://inditales.com/hindi/ganapati-bhajan-ganesh-chaturthi/#respond Wed, 27 Jul 2022 02:30:22 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2746

यह वर्ष का वह समय है जब चारों ओर का वातावरण गणेश चतुर्थी त्यौहार के उल्हास से ओतप्रोत होता है और गणपति भजन गुंजायमान होते हैं। यद्यपि गणेश चतुर्थी का पर्व विश्व के उन सभी क्षेत्रों में मनाया जाता है जहां भारतीय मूल के हिन्दू नागरिक निवास करते हैं, तथापि भारत में प्रमुखतः महाराष्ट्र, कर्णाटक, […]

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यह वर्ष का वह समय है जब चारों ओर का वातावरण गणेश चतुर्थी त्यौहार के उल्हास से ओतप्रोत होता है और गणपति भजन गुंजायमान होते हैं। यद्यपि गणेश चतुर्थी का पर्व विश्व के उन सभी क्षेत्रों में मनाया जाता है जहां भारतीय मूल के हिन्दू नागरिक निवास करते हैं, तथापि भारत में प्रमुखतः महाराष्ट्र, कर्णाटक, गोवा तथा तेलंगाना में गणेश चतुर्थी पर्व की भव्यता व गरिमा अद्वितीय है। किसी भी पावन अथवा महत्वपूर्ण आयोजन का आरम्भ गणेश भगवान् की आराधना से ही किया जाता है। गणेश भगवान् को प्रथम वंदनीय, सुखकर्ता एवं विघ्नहर्ता माना जाता है। वे भारत भर में सभी हिन्दुओं के सर्वप्रिय देवता माने जाते हैं।

गणपति भजन
गणपति भजन

यद्यपि गणेश भगवान् की स्तुति में अनेक भजन एवं गीत हैं, तथापि उनमें से कुछ भजन एवं गीत विशेषतः गणेश चतुर्थी के उत्सव में सर्वाधिक गाये एवं बजाये जाते हैं। आपके इस गणेश चतुर्थी पर्व के उल्हास को द्विगुणित करने के लिए यहाँ मैं उन्ही में से कुछ चुने भजन एवं गीत आपके लिए पुनः लेकर आयी हूँ।

भारत के अतिरिक्त, गणेश भगवान का प्रभाव पूर्वी एशिया के भी अनेक देशों में देखा जाता है। जैसे जापान(जापान में हिन्दू देवी देवता और भारतीय संस्कृति), थाईलैंड(राचाप्रसॉन्ग भ्रमण – बैंकॉक में हिन्दू देवी देवताओं के दर्शन), इंडोनेशिया इत्यादि।

श्लोकों में निहित सार्थक अर्थ, संतों व कवियों द्वारा रचित अप्रतिम काव्य, सभी भारतीय भाषाओं के सुप्रसिद्ध गायकों द्वारा गाई गयीं भक्तिपूर्ण रचनाएँ, पारंपरिक सुमधुर संगीत तथा भक्ति भाव से सराबोर गणेश के चिरकालीन भजन एवं गीत आपके समक्ष प्रस्तुत हैं।

पंचमुखी गणेश
पंचमुखी गणेश

बंगाल के बिश्नुपुर में भ्रमण करते समय मुझे पंचमुखी गणेश की यह अद्वितीय शैल प्रतिमा दृष्टिगोचर हुई थी जो कई सौ वर्ष पुरातन है ।

और पढ़ें: बिश्नुपुर का टेराकोटा मंदिर – बंगाल का दर्शनीय स्थल

मेरे इस संस्मरण में प्रस्तुत सभी भजनों एवं गीतों को पूर्ण भक्तिभाव से सुनने के लिए पर्याप्त समय की आवश्यकता होगी। आप इन्हें पुनः पुनः सुनना चाहेंगे। अतः मेरे इस संस्मरण को चिन्हित करना न भूलें।

संस्कृत भाषा में गणपति भजन

मैंने यहाँ कुछ भारतीय भाषाओं में गणेश भजनों का संकलन किया है। आपने अब तक राष्ट्रीय भाषा के अतिरिक्त अपनी मातृभाषा में इन भजनों को सुना होगा। कदाचित संस्कृत भजन भी सुने होंगे। अब कुछ अन्य भाषाओं में भी इन भजनों को अवश्य सुनिए। मेरा विश्वास है कि आपको उतने ही आनंद का अनुभव होगा। मैंने यहाँ गणपति के मुख्यतः संस्कृत, हिन्दी, मराठी, कन्नड़ इत्यादि भाषाओं के भजनों का संग्रह प्रकाशित किया है। इस संग्रह में कुछ भजन केवल संगीत वाद्यों द्वारा भी प्रस्तुत किये गए हैं। मैंने इस संग्रह में चित्रपटों में गाये गए भजनों को सम्मिलित नहीं किया है। उसी प्रकार आधुनिक प्रस्तुतियों को भी वर्ज्य किया है। अन्यथा सूची अत्यधिक लम्बी हो जाती जिसे एक संस्करण में समाहित करना असंभव होता।

मथुरा संग्रहालय में दशभुजा गणेश
मथुरा संग्रहालय में दशभुजा गणेश

और पढ़ें: मथुरा संग्रहालय के अद्भुत मणि – मथुरा स्कूल ऑफ आर्ट

वातापि गणपतिं भजे – येसुदास

‘वातापि गणपतिं भजे’ एक संस्कृत कीर्ति गीत है जिसके रचनाकार दक्षिण भारत के कवि मुथुस्वामी दिक्षितर हैं। यह मुथुस्वामी दिक्षितर की रचनाओं में से सर्वश्रेष्ठ ज्ञात काव्य है तथा कर्नाटक संगीत में सर्वाधिक लोकप्रिय रचना है। पारंपरिक रूप से इस स्तोत्र का स्तवन किसी भी कर्नाटक संगीत कार्यक्रम के आरम्भ में किया जाता है। इस काव्य की रचना तमिल नाडू में २-३ शताब्दी से भी पूर्व की गयी थी जिसे यहाँ येसुदास जी ने अपनी प्रभावशाली स्वर में प्रस्तुत किया है। यह कदाचित संगीत के विश्व को अब तक का सर्वोत्तम योगदान है।

यहाँ सुनिए

के. जे. येसुदास जी भारतीय शास्त्रीय संगीत, भक्ति संगीत एवं चित्रपट गीतों के सुप्रसिद्ध गायक हैं। उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री, पद्म भूषण व पद्म विभूषण की उपाधियों से विभूषित किया है।

येसुदास जी द्वारा प्रस्तुत ‘वातापि गणपतिं भजे’ की एक घंटे लम्बी प्रस्तुति यहाँ सुनिए

भारतीय शास्त्रीय संगीत के विभिन्न गणमान्य संगीतज्ञों द्वारा प्रस्तुत ‘वातापि गणपतिं भजे’ के अन्य संस्करण

  • एम. एस. सुब्बलक्ष्मी – कर्नाटक संगीत की महान शास्त्रीय गायिका एम. एस. सुब्बलक्ष्मी जी द्वारा प्रस्तुत ‘वातापि गणपतिं भजे’ यहाँ सुनिए। एम. एस. सुब्बलक्ष्मी जी प्रथम संगीतज्ञ हैं जिन्हें भारत का सर्वोच्च सम्मान, भारत रत्न से विभूषित किया गया है। कर्नाटक संगीत में उनका योगदान अविस्मरणीय है।
  • डॉ. एम्. बालमुरलीकृष्ण – इनके द्वारा प्रस्तुत ‘वातापि गणपतिं भजे’ यहाँ सुनें। पद्म विभूषण से विभूषित डॉ. बालमुरलीकृष्ण कर्नाटक संगीक के महान गायक हैं।
  • घंटसाला वेंकटेश्वर राव – इनके द्वारा प्रस्तुत ‘वातापि गणपतिं भजे’ यहाँ सुनें। पद्म श्री से विभूषित घंटसाला वेंकटेश्वर राव जी महान संगीतज्ञ एवं पार्श्वगायक हैं। इन्हें गान गन्धर्व भी कहा जाता है।
  • एस. जानकी – इनके द्वारा प्रस्तुत ‘वातापि गणपतिं भजे’ यहाँ सुनें। डॉ. जानकी दक्षिण भारत की सर्वाधिक लोकप्रिय बहुमुखी पार्श्वगायिका हैं। उन्होंने अनेक भाषाओं में कई लोकप्रिय गीत गाये हैं। २०१३ में उन्हें पद्म विभूषण की उपाधि प्रदान की गयी थी किन्तु कुछ कारणों से उन्होंने उसे नकार दिया था।
  • पंडित अजोय चक्रबोर्ती – राग हंसध्वनी में पंडित अजोय चक्रबोर्ती द्वारा गाया ‘वातापि गणपतिं भजेहं’ यहाँ सुनें। पंडित अजोय चक्रबोर्ती हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के सुप्रसिद्ध गायक हैं।

संगीत वाद्य पर बजाया गया ‘वतपि गणपतिं भजे’

  • मैन्डोलिन पर यू. श्रीनिवास – इनके द्वारा बजाया गया ‘वातापि गणपतिं भजे’ यहाँ सुनें। पद्म श्री से विभूषित श्रीनिवास जी एक खाति-प्राप्त मैन्डोलिन वादक थे तथा कर्नाटक शास्त्रीय संगीत के प्रख्यात संगीतकार थे।
  • डॉ. कादरी गोपालनाथ – डॉ. कादरी गोपालनाथ द्वारा सैक्सोफोन पर बजाया गया ‘वातापि गणपतिं भजे’ यहाँ सुनें। पद्म श्री से विभूषित डॉ. कादरी गोपालनाथ सैक्सोफोन पर कर्नाटक संगीत बजाने वाले अग्रदूतों में से एक हैं।

श्री विघ्नेश्वर सुप्रभातं

यहाँ सुनें।

गणेश मंत्र – ॐ गण गणपतये नमो नमः – १०८ आवर्तन

जय गणेश जय गणेश – सूर्य गायत्री एवं कुलदीप एम. पै. द्वारा गाया गणेश पंचरत्नं

गणेश पंचरत्नं सदियों पूर्व आदि शंकराचार्य द्वारा रचित श्लोक है।

सुश्री सूर्य गायत्री एक विलक्षण बाल प्रतिभा है जिसने अपने कर्नाटक शास्त्रीय संगीत गायन के द्वारा यू-ट्यूब पर धूम मचाई हुई है। कुलदीप जी कर्नाटक शास्त्रीय संगीत के प्रसिद्ध गायक, संगीतज्ञ, संगीतकार एवं निर्माता हैं।

गणेश श्लोक – गजाननं भूतगणादि सेवितं

महा गणपतिं मनसा स्मरामि – येसुदास

येसुदास जी के स्वरों से अलंकृत कवि मुथुस्वामी दिक्षितर द्वारा रचित एक अन्य प्रसिद्ध रचना

मराठी भाषा में गणपति की आरतियाँ

भारत में गणेश पूजन का सार्वजनिक समारोह मूलतः भारत स्वतंत्रता आन्दोलन से आरम्भ हुआ था। बाल गंगाधर तिलक जैसे राष्ट्रवादी नेताओं ने गणपति पूजन के सार्वजनिक आयोजनों का आरम्भ किया था जिसके द्वारा उन्होंने जनमानस में राष्ट्रवाद जगाने का प्रयास किया था। लोकमान्य तिलक एक भारतीय राष्ट्रवादी नेता, अध्यापक, समाज सुधारक एवं वकील थे जिन्होंने भारत स्वतंत्रता आन्दोलन के प्रारंभिक काल में सक्रिय भाग लिया था। ‘स्वराज्य मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है। मैं इसे लेकर ही रहूँगा’ यह उनके द्वारा दिया नारा था जो भारतीय इतिहास में अमर हो गया है। कुछ वर्षों पूर्व मैं उनके गृहनगर रत्नागिरी गयी थी जो कोंकण समुद्रतट का एक दमकता मणि है। रत्नागिरी के साथ मैंने निकटवर्ती गणपतिफुले नामक स्थान का भी भ्रमण किया था। गणपतिफुले में लम्बोदर गणपति मंदिर अत्यंत लोकप्रिय है जो समुद्र तट पर स्थित है।

महाराष्ट्र में गणपति उत्सव एक प्रमुख उत्सव है जिसे सार्वजनिक एवं घरेलु, दोनों स्तर पर धूमधाम से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में मुख्यतः मुंबई एवं पुणे के गणेश उत्सव एवं उनकी धूम जगप्रसिद्ध है। अनेक कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन कर भव्य एवं आकर्षक पंडाल निर्मित करते हैं। गणेश उत्सव के समय महाराष्ट्र के इन प्रमुख नगरों का भ्रमण करें तथा उसके उल्हास में सम्मिलित होइए।

सम्पूर्ण भारत में महाराष्ट्र राज्य का गणेश उत्सव सर्वाधिक भव्य एवं उल्हासपूर्ण होता है। इसीलिए गणेश भगवान का स्मरण होते ही मराठी भाषा के भजन एवं आरतियाँ मस्तिष्क में उभरकर आती हैं। उन्ही में से कुछ लोकप्रिय भजन एवं आरतियाँ यहाँ प्रस्तुत हैं।

और पढ़ें: पुणे का शनिवार वाड़ा एवं पेठ

प्रथम तुला वंदितो – वसंतराव देशपांडे एवं अनुराधा पोडवाल

वसंतराव देशपांडे जी एक सुप्रसिद्ध हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायक थे। वे नाट्य संगीत के एक महान कलाकार थे। पद्मश्री से अलंकृत सुश्री अनुराधा पोडवाल एक लोकप्रिय पार्श्वगायिका हैं। उन्होंने अनेक लोकप्रिय भजन भी गाये हैं।

सुखकर्ता दुःखहर्ता – गणपति की आरती

इस आरती की रचना समर्थ रामदास स्वामी ने की थी। गणेश भगवान के मयूरेश्वर रूप से प्रभावित होकर रामदास स्वामी ने इस आरती की रचना की थी।

भारत रत्न विभूषित सुश्री लता मंगेशकर एवं अनेक अन्य प्रसिद्ध गायकों ने इन मराठी भजनों एवं आरतियों को अपने सुमधुर स्वर में गया है।

तुज मागतो मी आता

गजानना श्री गणराया

उठा उठा हो सकळीक

गणराज रंगी नाचतो

जयदेव जयदेव जय मंगल मूर्ती – आरती

सुश्री साधना सरगम द्वारा गाया जयदेव जयदेव का एक अन्य संस्करण यहाँ सुनें। साधना सरगम एक लोकप्रिय भारतीय पार्श्वगायिका हैं। वे भक्ति गीत, शास्त्रीय गायन, गजल एवं लोकप्रिय आधुनिक गीतों की सुप्रसिद्ध गायिका हैं।

हिन्दी भाषा में गणपति भजन एवं गीत

गणपति बाप्पा मोरया

वक्रतुंड महाकाय श्लोक – पंडित जसराज

पद्म भूषण एवं पद्म विभूषण की उपाधि से सम्मानित पंडित जसराज एक लोकप्रिय भारतीय शास्त्रीय गायक हैं।

कन्नड़ भाषा में गणपति भजन

कन्नड़ भाषा में गाये गणपति के कुछ लोकप्रिय भजन यहाँ प्रस्तुत हैं। वे अत्यंत मधुर हैं। महाराष्ट्र के पश्चात कदाचित कर्णाटक वह राज्य है जहां गणेश उत्सव की भव्यता एवं उल्हास उल्लेखनीय है।

गजमुखने गणपथिये निनगे वन्दने

भजन के इस संस्करण को सारदा भगवतुला ने स्वर प्रदान किया है। इस भजन के बोल श्री विजयनरसिम्हा ने लिखे हैं। इस भजन की मूल गायिका सुश्री एस. जानकी हैं।

शरणु शरणय्या बेनका – पी. बी. श्रीनिवास

डॉ. पी. बी. श्रीनिवास दक्षिण भारतीय भाषा के एक अनुभवी पार्श्वगायक हैं।

भाद्रपद शुक्लदा चवथिअन्दु – पी. बी. श्रीनिवास एवं एस. जानकी

तेलंगाना का हैदराबाद भी अब गणेश चतुर्थी आयोजन की होड़ में सम्मिलित होने लगा है। मुझे भी हैदराबाद में गणेश उत्सव मनाने का एक अवसर प्राप्त हुआ था। मेरे उस अनुभव पर मेरा संस्मरण, ‘गणेश एवं उसके लड्डू – हैदराबाद में गणेश उत्सव’ पढ़ना ना भूलें।

गणपति उपहार
गणपति उपहार

इन भाषाओं के अतिरिक्त अन्य भारतीय भाषाओं के लोकप्रिय गणेश भजनों के विषय में निम्न दर्शित टिप्पणी खंड के द्वारा मुझे अवश्य अवगत कराएं। मैं इस संकलन में उन्हें सम्मिलित करने का प्रयास करूंगी।

गणेश चतुर्थी की अनेक शुभकामनाएं

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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नवरात्रि उत्सव में सर्वोत्तम डांडिया रास एवं गरबा गीत https://inditales.com/hindi/navratri-garba-daandiya-raas-ke-prasiddh-geet/ https://inditales.com/hindi/navratri-garba-daandiya-raas-ke-prasiddh-geet/#comments Wed, 22 Sep 2021 02:30:14 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2422

नवरात्रि अपने साथ में गरबा व डांडिया रास ले कर आती है। यूँ तो नवरात्रि देश भर में भिन्न भिन्न रीति से मनायी जाती है, किन्तु उनमें सर्वाधिक लोकप्रिय है पारंपरिक गुजराती नवरात्रि। अपने घर में देवी माँ की पूजा-अर्चना कर हम संध्या की प्रतीक्षा करते हैं जब हमारे पग अनायास ही पारंपरिक गुजराती उत्सव […]

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नवरात्रि अपने साथ में गरबा व डांडिया रास ले कर आती है। यूँ तो नवरात्रि देश भर में भिन्न भिन्न रीति से मनायी जाती है, किन्तु उनमें सर्वाधिक लोकप्रिय है पारंपरिक गुजराती नवरात्रि। अपने घर में देवी माँ की पूजा-अर्चना कर हम संध्या की प्रतीक्षा करते हैं जब हमारे पग अनायास ही पारंपरिक गुजराती उत्सव पंडालों की ओर चल पड़ते हैं, जहां गरबा एवं डांडिया रास आयोजित किए जाते हैं। आरंभ में नवरात्रि के गरबे एवं डांडिया केवल गुजरात तक ही सीमित थे। गुजरात के बाहर भी केवल गुजराती समाज के लोग ही इस आयोजन में भाग लेते थे। किन्तु अब गरबा एवं डांडिया इस स्तर तक लोकप्रिय हो गए हैं कि ये केवल गुजरात अथवा भारत ही नहीं, अपितु विदेशों के अप्रवासी भारतीयों में भी प्रमुख आकर्षण बन गए हैं।

गरबा डांडिया रास गीत - नवरात्रि
गरबा डांडिया रास गीत के साथ नवरात्रि

रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधान धारण कर जब नर्तक व नर्तकियाँ, लोकप्रिय गरबा तथा डांडिया गीतों पर लहराते हुए नृत्य करते हैं तो वह दृश्य देखते ही बनाता है। इन गीतों में अनेक गीत ठेठ गुजराती भाषा में गाए गए पारंपरिक गीत होते हैं। इसमें मुंबई चित्रपट उद्योग कैसे पीछे रह सकता है? अनेक चित्रपटों में गरबा व डांडिया के दृश्य चित्रित किए गए हैं व उनके गीत अत्यंत लोकप्रिय भी हो गए हैं।

गरबा एवं डांडिया रास क्या हैं?

जैसा कि नाम से ही ज्ञात होता है, नवरात्रि देवी के नौ रात्रियों से संबंधित है। सम्पूर्ण भारत में नवरात्रि के नौ दिवस एवं रात्रि अपनी अपनी रीति से मनाए जाते हैं। बंगाल में दुर्गा पूजा मनाई जाती है तो तेलंगाना में बतुकम्मा, तमिलनाडु में गोलू सजाया जाता है तो उत्तर भारत शाकाहारी होकर उपवास करने लगता है। किन्तु इन सब में गुजरात का उत्सव सर्वाधिक रंगबिरंगा एवं जोशपूर्ण होता है जिसमें प्रमुख आकर्षण गरबा एवं डांडिया होते हैं।

गरबा गर्भ का द्योतक है जो प्रजनन क्षमता का प्रतीक है। मिट्टी के घट के भीतर दीप प्रज्ज्वलित कर, उसमें  देवी का आह्वान किया जाता है। इसे गरबा कहते हैं। घट के भीतर दीप प्रज्ज्वलित कर उनके भीतर देवी को आमंत्रित करने के लिए भक्तगण उसके चारों ओर नृत्य करते हैं। इस नृत्य को गरबा कहा जाने लगा। गरबा आरती से पूर्व किया जाता है। गरबा के चारों ओर नृत्य करते हुए भक्तगण लय में गोलाकार घूमते हैं जो हम  जैसे जीवों के लिए जीवन व मृत्यु के अनवरत चक्र का प्रतीक है। वहीं घट में विराजमान दीप, देवी सदृश, परम तत्व का द्योतक हैं। अतः गरबा की प्रकृति भक्तिभाव से परिपूर्ण है। इसमें गाए जाने वाले गीतों में देवी की स्तुति की जाती है।

अवश्य पढ़ें:  देवी के नामों पर आधारित ५० भारतीय नगरों के नाम

नवरात्रि समारोह

डांडिया रास साधारणतः आरती के पश्चात किया जाता है। कुछ सूत्रों के अनुसार आरंभ में डांडिया केवल पुरुषों द्वारा किया जाता था। किन्तु अब इसे स्त्री व पुरुष दोनों ही करते हैं। इस नृत्य में रंबबिरंगी डंडियों का प्रयोग किया जाता है तथा यह नृत्य जोड़े में किया जाता है।

डांडिया नृत्य की डंडियाँ वास्तव में देवी के शस्त्रों का प्रतीक हैं जिनका प्रयोग कर देवी ने असुरों का वध किया था। डांडिया करते समय विभिन्न मुद्राओं में इन डंडियों को शस्त्रों जैसा मान दिया जाता है। इस नृत्य में प्रचुर मात्रा में उत्साह व ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

डांडिया का सर्वोत्तम आकर्षण है नर्तकों का परिधान। पुरुषों का पारंपरिक परिधान है, केडियु, कफ़नी पैजमा तथा पगड़ी। केडियु को कांच के टुकड़ों एवं बेल-बूटियों की कढ़ाई द्वारा सजाया जाता है। स्त्रियाँ कसीदाकारी युक्त रंगबिरंगे भव्य लहंगे, चोली एवं उससे भी अधिक चटक व अलंकृत ओढ़नियाँ धारण करती हैं। उन्हे देख ऐसा प्रतीत होता है मानो साक्षात देवी धरती पर अवतरित हुई हैं।

गुजरात में डांडिया पंडाल के दर्शन, रंगों के सर्वोत्तम सम्मिश्रण में घुल जाने जैसा होता है। क्यों ना हो? यह विश्व का विशालतम नृत्योत्सव जो है।

डांडिया रास के गरबा गीत

नवरात्रि के पारंपरिक गुजराती डांडिया व गरबा गीत

फाल्गुनी पाठक द्वारा – केसरियो रंग तने लाग्योल्या गरबा

यह विडिओ लोकप्रिय गायिका/कलाकार फाल्गुनी पाठक का है जो १८ अक्टोबर २०१२ के दिन, मुंबई के गोरेगांव स्पोर्ट्स क्लब में मंगल एंटरटेनमेंट द्वारा आयोजित मंगल नवरात्रि में सादर कर रही थी। देखिए उनके गाये दो लोकप्रिय गुजराती गीत, केसरियो रंग तने लाग्योल्या गरबा एवं हामु काका बाबा न पोरिया

के ओढनी ओढू ओढू ने उड़ी जाए   

गायिका अलका याग्निक एवं गायक प्रफुल देव द्वारा सादर किया गया ये गीत, के ओढनी ओढू ओढू ने उड़ी जाए सुनिए जो, सारेगामा इंडिया लिमिटेड के मेरु मालन अल्बम से लिया गया है। इसके गीतकार हैं, कान्ति अशोक तथा संगीतकार हैं, महेश-नरेश।

मेहंदी ते वावी – रंग गयो गुजरात

आईए सुनें यह नवरात्रि का विशेष डांडिया गरबा गीत जिसे अपने सुमधुर स्वरों में प्रस्तुत किया है, गरबा गीतों की महाराज्ञी व लोकप्रिय गायिका फाल्गुनी पाठक ने।

गुजराती भाषा में सर्वोत्तम डांडिया गरबा गीतों का अद्भुत सम्मिश्रण

गुजराती भाषा में गाये गए १० नवरात्रि-विशेष गरबा गीत, जिन्हे आप अवश्य देखिये। इनका आनंद उठाईये एवं उनके सुरों पर झूमकर नृत्य करिये।

  • नवरात्र नवेली बड़ी अलबेली
  • पडवेथि पेलु मानु नोरतु जीवे
  • रमतो भमतो जाय माँ नो गरबो रमतो जाय
  • हिचको अम्बा तानो संभालये
  • सोनानों गरबो रुपानो गरबो
  • अम्बे माँ नो घम्मर घड़ोलिओ
  • तरने तरने अमे मेले ज्ञाता
  • माँ तारो गरबो झाकमझोल
  • झूले खुले छे गबरनी माँ आंबा झूले छे
  • पत्णनि शहरणि नार पदमणि

ये सभी गीत राघव म्यूजिक कंपनी द्वारा प्रकाशित गरबा गीत झंकारो एलबम से लिए गए हैं। इन गीतों के गीतकार हैं, मनुभाई रबारी धनुदास ने तथा इन्हे अपने स्वरों से सजाया है, कविता, जयदीप एवं दीपक ने।

बॉलीवुड के गरबा गीत

अब हिन्दी भाषा में कुछ चुने हुए गरबा गीतों की सूची प्रस्तुत है जिनमें कुछ पारंपरिक गीत हैं तथा कुछ बॉलीवुड चित्रपटों में प्रदर्शित किए गए गीत हैं।

सबसे बड़ा तेरा नाम रे

हे नाम रे सबसे बड़ा तेरा नाम ओ शेरोवाली, ऊँचे डेरों वाली, बिगड़े बना दे मेरे काम, माँ शेरावाली की स्तुति में प्रस्तुत इस भक्तिगीत का विडिओ सुनें व देखें। इसके लिए निम्न वेब स्थल पर जाएँ।

He Naam Re Sabse Bada Tera Naam – Sherawali Mata, Devotional Song

ओ शेरोंवाली गीत – चित्रपट-सुहाग

सुहाग चित्रपट का यह गीत, ओ शेरोंवाली सुनिए। इस चित्रपट के नायक-नायिका अमिताभ बच्चन एवं रेखा हैं। इस गीत के रचयिता आनंद बक्शी हैं तथा लक्ष्मीकांत प्यारेलाल इसके संगीतकार हैं। इसे गाया है, आशा भोसले एवं मोहम्मद रफी ने। इस गीत का विडिओ देखने के लिए निम्न वेबस्थल पर जाएँ।

O Sheronwali | Amitabh Bachchan | Rekha | Suhaag 1979 Songs | Asha Bhosle | Mohd Rafi

मैं तो भूल चली बाबुल का देश – चित्रपट-सरस्वतीचंद्र

१९६८ में निर्मित चित्रपट, सरस्वतीचंद्र में मुख्य भूमिका नूतन, मनीष, विजय चौधरी एवं डॉ रमेश देव ने निभायी है। इस चित्रपट को गोविंद सरैया ने निर्देशित किया है। मैं तो भूल चली बाबुल का देश, पिया का घर प्यारा लगे, इस गीत को सुरों से सजाया है, कल्याणजी आनंदजी ने व इस गीत को अपने स्वर प्रदान किए, लता मंगेशकर ने। इस गीत का आनंद उठाने के लिए निम्न वेबस्थल पर जाएँ।

Main To Bhool Chali Babul Ka Des

ढोली तारो ढोल बाजे – चित्रपट-हम दिल दे चुके सनम

चित्रपट हम दिल दे चुके सनम का एक लोकप्रिय गीत है, ढोली तारो ढोल बाजे। इसके संगीतकार हैं, इस्माइल मर्चेन्ट एवं इसे हरिहरण एवं कविता कृष्णमूर्ति ने गाया है। इस चित्रपट के निर्माता व निर्देशक संजय लीला भंसाली हैं एवं इसके कलाकार सलमान खान, ऐश्वर्या राय एवं अजय देवगन हैं।

अवश्य पढ़ें: बॉलीवुड के २० सर्वोत्तम वर्षा गीत – वर्षा ऋतु का संगीत

राधा कैसे ना जले – चित्रपट-लगान

लगान चित्रपट में चित्रित इस मधुर गीत में कृष्ण राधा को छेड़ रहे हैं। आमिर खान एवं ग्रेसी सिंग पर चित्रित इस गीत के बोल जावेद अख्तर ने लिखे हैं तथा उसे संगीतबद्ध किया है, ए. आर. रहमान ने। सोनी म्यूजिक एंटेरटैनमेंट प्राइवेट लिमिटेड के अंतर्गत इस गीत को आशा भोसले एवं उदित ने गाया है।

नगाड़ा संग ढोल बाजे – चित्रपट-गलियों की रासलीला राम-लीला

नगाड़ा संग ढोल बाजे, गलियों की रासलीला राम-लीला चित्रपट में चित्रित इस गीत के साथ नवरात्रि का आनंद उठाइए। इस चित्रपट में मुख्य भूमिका दीपिका पादुकोण एवं रणवीर सिंग की है। श्रेया घोषाल एवं ओसमान मीर द्वारा गाए गए इस गीत के रचयिता सिद्धार्थ-गरिमा एवं संगीतकार संजय लीला भंसाली हैं।

छोगाड़ा तारा – चित्रपट-लवयात्री

बॉलीवुड चित्रपट लवयात्री का यह गीत, छोगाड़ा तारा, गरबा नृत्य करने के लिए नवीन एवं लोकप्रिय गीत है। इस चित्रपट में आयुष शर्मा एवं वारीना हुसैन मुख्य भूमिका में हैं तथा इसका निर्देशन अभिराज मिनावाला ने किया है। इस लोकप्रिय गीत को दर्शन रावल एवं असीस कौर ने गाया है। इस गीत के बोल दर्शन रावल ने लिखे हैं जिसमें शब्बीर अहमद ने भी सहयोग किया है। इसके संगीतकार लीलो जॉर्ज तथा डीजे चेतस हैं। यह गीत अविनाश व्यास द्वारा रचित व संगीतबद्ध गीत, ‘हे रंगालो’ पर आधारित है।

अवश्य पढ़ें: रेलगाड़ी पर चित्रित बॉलीवुड के २० सर्वोत्तम गीतों के विडिओ देखें।

कमरिया – चित्रपट-मित्रों

मित्रों चित्रपट का यह ऊर्जा भर गीत प्रस्तुत है। इस चित्रपट में जॅकी भगनानी एवं कृतिका कामरा ने मुख्य भूमिका निभाई है। कमरिया, यह गीत नृत्य समारोहों का प्रिय गीत है। दर्शन रावल द्वारा गाये इस गीत को संगीतबद्ध किया है, लीलो जॉर्ज तथा डीजे चेतस ने तथा इसके बोल लिखे हैं, कुमार गायकों ने।

अवश्य पढ़ें: बॉलीवुड गीत – लोकप्रिय भारतीय पर्यटन गंतव्य एवं स्मारकें

तो, इनमें से आपके प्रिय गरबा डांडिया गीत कौन से हैं?

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे  

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चिरकालीन उर्जा से ओतप्रोत भारत के देशभक्ति गीत https://inditales.com/hindi/bharat-ke-deshbhakti-geet/ https://inditales.com/hindi/bharat-ke-deshbhakti-geet/#comments Wed, 11 Aug 2021 02:30:56 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2391

१५ अगस्त का स्वतंत्रता दिवस हो अथवा २६ जनवरी का गणतंत्र दिवस, हमारा देश देशभक्ति गीतों से गूंजने लगता है। सार्वजनिक सभा हो या निजी उत्सव, घर हो या बस्ती, रेडियो हो या दूरदर्शन, भारत के कोने कोने में देशभक्ति गीत बजने लगते हैं। यहाँ तक कि मोबाईल फोन पर भी वही गीत सुनाई देते […]

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१५ अगस्त का स्वतंत्रता दिवस हो अथवा २६ जनवरी का गणतंत्र दिवस, हमारा देश देशभक्ति गीतों से गूंजने लगता है। सार्वजनिक सभा हो या निजी उत्सव, घर हो या बस्ती, रेडियो हो या दूरदर्शन, भारत के कोने कोने में देशभक्ति गीत बजने लगते हैं। यहाँ तक कि मोबाईल फोन पर भी वही गीत सुनाई देते हैं। भारत ही नहीं, अपितु विश्व भर के अप्रवासी भारतीय नागरिकों में भी वही स्फूर्ति एवं उर्जा दृष्टिगोचर होती है।

भारत के देशभक्ति गीत
भारत का तिरंगा झंडा

भारत की प्राचीन व पावन भूमि का उत्सव मनाते ये भारत के देशभक्ति गीत हमारे भीतर आनंद भर देते हैं। ये गीत सांझेपन एवं अपनत्व द्वारा हम सब को जोड़कर रखते हैं। ये गीत हमारे भीतर देश व देशवासियों के प्रति हमारे उत्तरदायित्व को भी जगाते हैं।

भारत के देशभक्ति गीत

हम सब उन भारतीयों का अत्यंत सम्मान करते हैं जिन्होंने प्रत्येक विपरीत परिस्थिति में देश की अस्मिता की रक्षा की है, वे चाहे सम्माननीय जनसेवक हों अथवा सशस्त्र बल के आदरणीय व प्रशंसनीय जवान, जिन्होंने हमारे एवं हमारे देश के उज्जवल भविष्य के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। उनकी अविस्मरणीय स्मृतियाँ सदा हमारे हृदय में श्रद्धा एवं हमारे मन मस्तिष्क में सुरक्षा का अनुभव कराती रहेंगीं। देशभक्ति से ओतप्रोत ये गीत हमें हमारे सुनहरे अतीत, हमारी समृद्ध विरासत एवं हमारे पूर्वजों के सर्वोच्च बलिदान का स्मरण कराते हैं। यहाँ देशभक्ति से परिपूर्ण कुछ सर्वोत्तम गीतों का संकलन आपके समक्ष प्रस्तुत कर रही हूँ। सूची के अंतिम भाग में सर्वोत्तम गीत हैं। प्रत्येक गीत को सुनकर आनंद उठाइये तथा हमें बताइये इनमें आपके सर्वाधिक प्रिय गीत कौन से हैं।

बॉलीवुड से कुछ देशभक्ति के गीत

भारतीय हिन्दी चित्रपट उद्योग अथवा बॉलीवुड ने देशभक्ति से ओतप्रोत अनेक चित्रपटों का निर्माण किया है, अनेक देशभक्ति के गीत रचे एवं चित्रित किये हैं। देशभक्ति के गीतों की निम्न सूची किसी विशेष नियम के अनुसार नहीं हैं। अतः आप इन सभी को सुनकर आनंद लीजिये तथा अपनी स्मृतियों को पुनः जीवंत करिये।

१. ये देश है वीर जवानों का – नया दौर

भांगड़ा के जोश से भरा यह गीत मेरा सर्वाधिक प्रिय देशभक्ति गीत है जिसे सुनकर अंग अंग नृत्य करने के लिए आतुर हो जाता है। यह गीत सुनकर हमें भारतीय होने का गर्व होने लगता है। रोम रोम अपने देश के लिए कुछ करने के लिए प्रेरित होने लगता है। यह एक अत्यंत सकारात्मक व प्रेरणादायी गीत है।

इस गीत में मुख्य भूमिका निभायी है दिलीप कुमार व वैजयंतीमाला ने। इस गीत के संगीत निर्देशक हैं ओ. पी. नैय्यर, गीतकार हैं साहिर लुधियानवी तथा इस गीत को गाया है मोहम्मद रफ़ी एवं बलबीर ने।

२. जहां डाल डाल पर सोने की चिड़िया – सिकंदर ए आज़म (१९६५)

यह गीत भारत के स्वर्णिम काल का उल्लेख करती है जिसके विषय में हमने केवल सुना व पढ़ा ही है। मैं अपने यात्रा संस्करणों के लिए जब इन प्राचीन स्थलों की यात्रा करती हूँ तब उसी स्वर्णिम युग के खंडित अवशेषों को बिखरे पड़े देखती हूँ। यह गीत मुझे भारत के उसी स्वर्णिम युग को पुनः जीवित करने के कार्य के लिए प्रेरित करती है।

इस गीत के संगीत निर्देशक हैं हंसराज बहल, गीतकार हैं राजेंद्र कृष्ण तथा इस गीत को स्वर प्रदान किया है मोहम्मद रफ़ी ने। इस गीत में मुख्य भूमिका निभायी है, दारा सिंग, मुमताज, पृथ्वीराज कपूर, वीना, प्रेम चोप्रा, विजयलक्ष्मी, हेलेन तथा प्रेम नाथ ने। इस चित्रपट के निर्देशक केदार कपूर थे।

अवश्य पढ़ें : नवरात्रि उत्सव में डांडिया रास- सर्वोत्तम गरबा गीत

३. भारत का रहने वाला हूँ – पूरब और पश्चिम (१९७०)

मुझे स्मरण है, मैंने यह गीत दूरदर्शन के चित्रहार कार्यक्रम में लगभग प्रत्येक राष्ट्रीय अवकाशों पर सुना है। मेरे लिए यह गीत सम्पूर्ण भारत का निचोड़ है। यह उन दुर्मिल गीतों में से एक है जो भारत के सभी आयामों का उल्लेख करता है। एक ओर भारत के वैज्ञानिकों एवं गणितज्ञों की विलक्षण बुद्धि का बखान करता है तो दूसरी ओर नदियों की आराधना जैसे संस्कारों की गाथा कहता है। जहां सभ्यता एवं कला ने सर्वप्रथम जन्म लिया, ऐसा भारत सम्पूर्ण विश्व का मार्गदर्शक है, भारत के मार्गदर्शन में सम्पूर्ण विश्व ने प्रगति की है तथा सम्पन्नता अर्जित की है, इस देश की धरती पर जन्म लेकर मैं गौरान्वित हुआ हूँ, कुछ इस प्रकार के भाव हैं इस गीत में।

इस गीत के संगीत निर्देशक हैं कल्याणजी-आनंदजी, गीतकार हैं इन्दीवर तथा स्वर प्रदान किया है महेंद्र कपूर ने। ७० के दशक में निर्मित चलचित्र पूरब-पश्चिम के इस गीत में मुख्य भूमिका निभायी है, मनोज कुमार, सायरा बानो, अशोक कुमार, प्राण, प्रेम चोप्रा, निरूपा रॉय, विनोद खन्ना, भारती, मनमोहन तथा कामिनी कौशल ने। इस चित्रपट का निर्देशन किया स्वयं मनोज कुमार ने।

४. आइ लव माय इंडिया – परदेस (१९९७)

यह एक ऐसा गीत है जो प्रत्येक भारत प्रेमी प्रसन्नता से गुनगुनाता है। हम में से अधिकाँश लोग किसी भी गीत के शब्दों पर अधिक ध्यान नहीं देते हैं। किन्तु इस गीत के शब्द अत्यंत अर्थपूर्ण हैं। उन्हें जानकार आप भी आनंदित हो जायेंगे।

इस चित्रपट में मुख्य भूमिका निभायी है शाहरुख़ खान, अमरीश पुरी, महिमा चौधरी, अपूर्व अग्निहोत्री, अलोक नाथ, हिमानी शिवपुरी तथा आदित्य नारायण ने। इस गीत को मधुर स्वर प्रदान किया है कविता कृष्णमूर्ति ने। इस गीत के संगीत निर्देशक हैं नदीम-श्रवण। सुभाष घई इस चित्रपट के निर्माता/निर्देशक हैं।

५. फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी (२०००)  

मुझे यह गीत इसलिए प्रिय है क्योंकि यह हम भारतीयों की दुहरी क्षमता को दर्शाता है। एक ओर हम भलाई एवं भलों के साथ गर्व से चलते हैं, वहीं बुराई एवं बुरों को भी उठाने में उतने ही सक्षम हैं। जहां अन्य देशभक्ति के गीत अत्यंत गंभीर हैं, वहीं यह गीत उल्हास एवं व्यंग से भरा है। इसे सुनकर हम विचार करने के लिए बाध्य हो जाते हैं।

इस गीत को उदित नारायण ने गाया है, इसके बोल जावेद अख्तर ने लिखे हैं तथा इसे संगीतबद्ध किया है जतिन-ललित ने। इस चित्रपट में जूही चावला एवं शाहरुख़ खान ने मुख्य भूमिका निभाई है।

अवश्य पढ़ें: भक्ति संगीत एवं शास्त्रीय संगीत से अलंकृत गणपति की चिरस्थाई आरतियाँ

६. मेरे देश की धरती – उपकार (१९६७)  

भारत एक कृषी प्रधान देश रहा है। इसका सामाजिक ताना-बाना भी कृषि उद्योग के चारों ओर ही केन्द्रित रहा है। यह गीत इसी भावना से ओतप्रोत है। इसमें किसानों एवं सैनिकों की गौरवगाथा गाई गयी है जो उस काल में देश के सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटक थे।

इस गीत को गुलशन बावरा ने लिखा है, महेंद्र कपूर ने सुर प्रदान किये हैं तथा कल्यानजी-आनंदजी ने संगीतबद्ध किया। इस चित्रपट में आशा पारेख एवं मनोज कुमार ने मुख्य भूमिका निभाई है। इस चित्रपट के निर्माता एवं निर्देशक स्वयं मनोज कुमार हैं।

७. आओ बच्चों तुम्हे दिखाएँ – जागृति (१९५४)

यह नन्हे-मुन्हे बालक-बालिकाओं का गीत है जिसके संगीत पर हम में से अनेकों ने विद्यालयों के उत्सवों में नृत्य किया होगा तथा इस गीत को गया होगा। अतः यह एक अत्यंत विशेष गीत है। यह एक प्रकार से यात्रा गीत भी है। एक यात्री होने के कारण मेरी भी अभिलाषा है कि किसी दिन मैं भी अपने भारत देश के गौरव का उल्लेख करता एक गीत लिखूं।

१९५४ में निर्मित चित्रपट, जागृति में अभि भट्टाचार्य, प्रणोती घोष, बिपिन गुप्ता एवं रतन कुमार ने मुख्य भूमिका निभायी है तथा इसका निर्देशन सत्येन बोसे ने किया है। इस गीत के बोल लिखे हैं, कवि प्रदीप ने, संगीतबद्ध किया है हेमंत कुमार ने तथा गाया है स्वयं कवि प्रदीप ने।

८. नन्हा मुन्ना राही हूँ – सन ऑफ़ इंडिया (१९६२)

यह भी बालपन का एक गीत है जिसे हम सब ने शालाओं व विद्यालयों में गाया होगा तथा गाते समय स्वयं एक सैनिक बनकर देशसेवा करने के स्वप्न भी देखे होंगे। समय के साथ हम बड़े हुए तथा हमारी प्राथमिकताएँ भी परिवर्तित होती गयीं। किन्तु यह गीत हमें सदा उसी निष्कपट बालपन के स्वप्न का स्मरण कराता रहता है।

इस गीत की गायिका शान्ति माथुर है।

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९. ऐ वतन तेरे लिए – कर्मा (१९८६)

मेरे बालपन का एक अन्य गीत जो अब भी रोंगटे खड़े कर देता है।

चित्रपट कर्मा के लोकप्रिय गीतों में से एक, इस गीत को स्वर प्रदान किया है मोहम्मद अजीज एवं कविता कृष्णमूर्ति ने। इस गीत को स्वरबद्ध किया है लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने। इस चित्रपट के निर्माता-निर्देशक सुभाष घई हैं।

१०. तेरी मिट्टी – केसरी (२०१९)

यह भावपूर्ण गीत देशभक्ति गीतों की सूची में नवीन अनुवृद्धि है। इस गीत के शब्द अत्यंत भावपूर्ण हैं। इसका सादरीकरण भी अत्यंत सुन्दर है। इसमें निहित पंजाबी भावना मुझे उस धरती का स्मरण करती है जिसने हमारे देश को अनेकों पराक्रमी एवं साहसी सुपुत्र प्रदान किये हैं।

बी प्राक द्वारा गाये इस गीत को संगीत बद्ध किया आर्को ने तथा इसके बोल मुन्तशिर ने लिखे हैं। अक्षय कुमार एवं परिणिति चोप्रा द्वारा अभिनीत इस चित्रपट को अनुराग सिंग ने निर्देशित किया है।

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११. संदेसे आते हैं – बॉर्डर (१९९७)

हमारे देश की सीमाओं में सेवारत हमारे बहादुर सैनिक देश की सीमाओं के रक्षण को सर्वोपरि ध्येय मानते हैं। अपने परिवारजनों एवं बंधू-बांधवों से दूर रहते हुए वे देश की सेवा करते हैं। हृदय के एक कोने में अपने घर एवं गाँव की स्मृति संजोये वे आतुरता से उनके लिखे पत्रों की प्रतीक्षा करते हैं जो एक समय उन्हें अपने परिवारजनों से जोड़ने का एकमात्र साधन हुआ करता था। यह गीत हमें उनके सर्वोच्च बलिदान की अनुभूति कराता है तथा उन्हें सम्मान देने व उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के हमारे कर्त्तव्य का आभास कराता है।

सोनू निगम एवं रूप कुमार राठोर द्वारा गाये तथा जावेद अख्तर द्वारा रचित इस गीत को स्वरबद्ध किया है अनु मालिक ने। इस चित्रपट का निर्देशन ज्योति प्रकाश दत्ता ने किया है।

१२. मेरा रंग दे बसंती चोला–द लीजेंड ऑफ़ भगत सिंह (२००२)

यह गीत हमें भारत के स्वतंत्रता संग्राम के युग में ले जाता है जब भगत सिंह जैसे अनेक साहसी स्वतंत्रता सेनानियों ने हमारे देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। अपने देश को स्वतन्त्र देखने की इन युवकों की तीव्र इच्छा, लगन एवं दृड़ निश्चय इस गीत में स्पष्ट झलकते हैं। यह गीत हमें यह चिंतन करने के लिए बाध्य कर देता है कि क्या हम हमारे इन साहसी वीरों के बलिदानों के साथ न्याय कर रहे हैं? विशेषतः स्वतंत्रता के पश्चात जन्मे हम भारतवासियों के लिए यह एक महत्वपूर्ण सूचना प्रस्तुत करता है कि जिस स्वतन्त्र भारत में हम स्वच्छंद विचरण करते हैं वह स्वतंत्रता अनमोल है।

समीर द्वारा रचित एवं ए. आर. रहमान द्वारा संगीतबद्ध इस गीत को सोनू निगम एवं मनमोहन वारिस ने सुमधुर स्वर प्रदान किया है। इस चित्रपट को निर्देशित किया है, राजकुमार संतोषी ने।

१३. देस मेरे देस – द लीजेंड ऑफ़ भगत सिंह (२००२)

स्वतन्त्रतापूर्व युग का, देशप्रेम से ओतप्रोत एक अन्य गीत।

इसे सुखविंदर सिंह एवं ए. आर. रहमान ने गाया है।

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१४. ऐ मेरे प्यारे वतन – काबुलीवाला (१९६१)

महान गायक मन्ना डे द्वारा गाये गए इस गीत को प्रेम धवन ने लिखे है।

चिरकालिक देशभक्ति गीत

१. मिले सुर मेरा तुम्हारा – भीमसेन जोशी

यह संगीत की एक ऐसी पराकाष्ठा है जो भारत के सभी क्षेत्रों तथा भाषाओं को एक गीत में पिरो देता है। यह मेरे युग का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत है। कदाचित अब भी है।

यह दर्शाता है कि कैसे अनेक धाराएं एक होकर भारत का निर्माण करती हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे संगीत के अनेक स्वर मिलकर एक गीत की रचना करते हैं। इस गीत में संगीत, खेलजगत तथा चित्रपटों से सम्बंधित महान दिग्गजों ने भाग लिया है। कुछ दशक पश्चात इसी गीत की नकल करते हुए इसकी पुनर्रचना की गयी किन्तु वह मूल गीत की तुलना में स्वयं को सिद्ध नहीं कर पायी।

२. ऐ मेरे वतन के लोगों – लता मंगेशकर

इस गीत ने हम में से अनेकों को रुलाया है। यह हमें उन सभी वीरों का स्मरण कराता है जिन्होंने हमारे देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए,  हमारी एवं हमारे परिवाजनों की सुरक्षा करने के लिए अपने परिवारजनों को छोड़ दिया। यह एक अत्यंत ही भावुक देशभक्ति गीत है।

एक सामान्य ज्ञान – प्रारंभ में यह गीत आशा भोंसले गाने वाली थीं। किन्तु अंतिम समय में इसमें परिवर्तन करते हुए इस गीत को लता मंगेशकर ने गाया। यह एक अमर व चिरस्थाई गीत है।

कवि प्रदीप द्वारा रचित तथा सी. रामचंद्र द्वारा संगीतबद्ध यह गीत उन भारतीय सैनिकों को एक श्रद्धांजलि है जिन्होंने १९६२ के भारत-चीन युद्ध में अपने प्राण गँवाए थे।

इस गीत को सर्वाधिक लोकप्रिय व प्रख्यात देशभक्ति गीतों में से एक माना जाता है जिसे हमारे राष्ट्रगान “जन गण मन” , राष्ट्रगीत “वन्दे मातरम” तथा “सारे जहां से अच्छा” के समान मान प्राप्त है।

इस गीत की निम्न प्रस्तुति में सेक्सोफोन नामक संगीत वाद्य सेना का एक जवान बजा रहा है। गीत के इस रूप को सुनकर आप का आनंद दुगुना हो जाएगा।

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३. माँ तुझे सलाम –  ए. आर. रहमान

हम अपने भारत देश को माँ का मान देते हैं। इसे भारत माता कहते हैं। यह गीत उसी भारत माता के सम्मान में झुकता है।

४. कदम कदम बढाए जा

‘कदम कदम बढाए जा, कदम कदम बढाए जा, खुशी के गीत गाये जा’। यह प्रेरणादायी गीत वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस के भारतीय राष्ट्रीय सेना का सैन्य-दल कदम-ताल (regimental quick march) गीत है। इस गीत की रचना पंडित वंशीधर शुक्ल ने की थी तथा इसे राम सिंह ठकुरी ने सुरबद्ध किया था।

द्वितीय युद्ध के पश्चात ‘राजद्रोह’ के आरोप में यह गीत भारत में निषिद्ध कर दिया गया था। अगस्त १९४७ में इस पर लगे निषेधाज्ञा को उठा लिया गया। तब से यह भारत में एक देशभक्ति का गीत बन गया है। वर्त्तमान में यह भारतीय सेना का सैन्य कदम-ताल गीत बन गया है।

५. वन्दे मातरम – संगीता कट्टी कुलकर्णी द्वारा गाया सम्पूर्ण संस्करण

मातृभूमि को समर्पित, वन्दे मातरम का सम्पूर्ण संस्करण सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका संगीता कट्टी कुलकर्णी ने गाया है। इस गीत की रचना बंकिम चन्द्र चटर्जी ने की है।

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६. सारे जहां से अच्छा

लता मंगेशकर द्वारा गाया गीत ‘सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा’ कवि मोहम्मद इकबाल द्वारा रचा तथा पंडित रवि शंकर द्वारा संगीतबद्ध किया गया है।

७. जन गण मन (सम्पूर्ण गीत)

हमारे राष्ट्रगान के विषय में सभी जानते हैं। इसके विषय में मैं कुछ कहूं, यह ‘छोटा मुंह बड़ी बात’ होगी।

भारतीयता का उत्सव मनाता यह एक संगीतमय विडियो है। इसका संगीत सुखदा भावे-दबके ने दिया है। भक्ति आठवले-भावे, अनुराधा गंगल-केलकर, सुधांशु घारपुरे तथा निखिल निजसुरे ने इस गीत को गाया है।

८. बंगाली भाषा में जन गण मन – रविन्द्र नाथ ठाकुर का सम्पूर्ण गीत

रविन्द्र नाथ ठाकुर द्वारा रचित जन गण मन के सम्पूर्ण गीत में पांच अंतरे हैं। यहाँ इस गान को स्वागतलक्ष्मी दासगुप्ता ने अपने स्वर से चार चाँद लगाए हैं। बंगाली भाषा में लिखा गया यह गान वास्तव में इस गीत का मूल स्वरूप है। इसे सुनकर आपको अवश्य आनंद आएगा।

यहाँ मैंने अपनी स्मृति से व व्यक्तिगत चुनाव के आधार पर २२ उत्कृष्ट भारत के देशभक्ति गीत आपके लिए चुने हैं। यदि आप इस सूची में कुछ अन्य देशभक्ति के गीत सम्मिलित करना चाहते हैं तो टिपण्णी खंड में उनका उल्लेख अवश्य करें। यहाँ मैंने अधिकांशतः हिन्दी भाषा में लिखे गीत चुने हैं। आप अन्य भारतीय भाषाओं में रचित देशभक्ति के गीतों का भी सुझाव दे सकते हैं।

कारगिल के समीप द्रास में लहराता भारत का ध्वज
कारगिल के समीप द्रास में लहराता भारत का ध्वज

इनमें से आपका सर्वाधिक प्रिय कौन भारत के देशभक्ति गीत है?

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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“चैती” एक ऋतु की लोक गायन शैली से परिचय https://inditales.com/hindi/chaiti-lok-gayan-shaili/ https://inditales.com/hindi/chaiti-lok-gayan-shaili/#respond Wed, 03 Mar 2021 02:30:09 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2222

हिन्दुस्तानी संगीत के तीन मुख्य स्वरूप है –लोक संगीत, शास्त्रीय संगीत और उपशास्त्रीय संगीत। ‘लोक’ शब्द संस्कृत के ‘लोकदर्शने’ धातु में ‘घञ् प्रत्यय लगाकर बना है, जिसका अर्थ है – देखने वाला। साधारण जनता के अर्थ में इस शब्द का प्रयोग ऋग्वेद में अनेक स्थानों पर हुआ है। डॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल के शब्दों में, “लोक […]

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हिन्दुस्तानी संगीत के तीन मुख्य स्वरूप है –लोक संगीत, शास्त्रीय संगीत और उपशास्त्रीय संगीत।

‘लोक’ शब्द संस्कृत के ‘लोकदर्शने’ धातु में ‘घञ् प्रत्यय लगाकर बना है, जिसका अर्थ है – देखने वाला। साधारण जनता के अर्थ में इस शब्द का प्रयोग ऋग्वेद में अनेक स्थानों पर हुआ है।

डॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल के शब्दों में, “लोक हमारे जीवन का महासमुद्र हैं, जिसमें भूत, भविष्य और वर्तमान संचित हैं। अर्वाचीन मानव के लिये लोक सर्वोच्च प्रजापति है।

डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ‘लोक’ शब्द का अर्थ जनपद या ग्राम से न लेकर नगरों व गाँवों में फैली उस समूची जनता से लिया है जो परिष्कृत, रुचिसंपन्न तथा सुसंस्कृत समझे जाने वाले लोगों की अपेक्षा अधिक सरल और अकृत्रिम जीवन की अभ्यस्त होती है।

डॉ० कुंजबिहारी दास ने लोकगीतों की परिभाषा देते हुए कहा है, “लोकसंगीत उन लोगों के जीवन की अनायास प्रवाहात्मक अभिव्यक्ति है, जो सुसंस्कृत तथा सुसभ्य प्रभावों से बाहर कम या अधिक आदिम अवस्था में निवास करते हैं। यह साहित्य प्रायः मौखिक होता है और परम्परागत रूप से चला आ रहा है।”

यह मान्यता है की प्रकृतिजनित, नैसर्गिक रूप से लोक कलाएँ पहले उपजीं, परम्परागत रूप में उनका क्रमिक विकास हुआ और अपनी उच्चतम गुणबत्ता के कारण शास्त्रीय रूप में ढल गईं।

लोकगीत काव्य रस से ओत-प्रोत, स्वर-सने, लय-लसे, हृदय तल से उभरे, सर्वथा मनोहारी। विविधता में एकता के साक्षात् प्रतीक। भाषाएँ भिन्न, बोलियाँ विभिन्न, किन्तु विषयवस्तु, स्वर-संयोजन तथा लय-प्रवाह में लगभग समानता। इनकी लघुकाय धुनों को सुनकर ‘बिहारी सतसई विषयक यह उक्ति सहज ही मानस में गूंज उठती है

सतसैया के दोहरे, ज्यों नावक के तीर, देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर।”

सच पूछा जाय तो ये लोकगीत हमारे साहित्य की अमूल्य निधि हैं। उनके भीतर से हमारा इतिहास झाँकता है। वे सही अर्थों में हमारे सामाजिक जीवन के दर्पण हैं। इतिहास शोधक, यदि इन लोकगीतों में निहित सामग्री की छान-बीनकर, समुचित विश्लेषण चयन कर उनका अपेक्षित उपयोग करें तो हमारा इतिहास कहीं अधिक सजीव, संतुलित और सर्वांगीण बन जाएगा।

पंडित छन्नूलाल मिश्र जी
पंडित छन्नूलाल मिश्र जी – विकिपीडिया

भारतीय संस्कृति की अनूठी धरोहर-लोकगीत। काव्य रस वसंत का अवसान काल चैत की रातों के साथ होता है, इसलिए शृंगार का सम्मोहन बढ़ जाता है। यही कारण है कि चैत मास को ‘मधुमास’ की सार्थक संज्ञा दी गई है। संयोगियों के लिए चैत मास जितना सुखद है उतना ही दुखद है विरह-व्याकुल प्राणियों के लिए।

चैत की सुहानी संध्या, शुभ्र चाँदनी और कोकिला के मादक स्वर का वर्णन करते हुए महाकवि कालिदास ‘ऋतुसंहार’ में कहते हैं, ‘चैत्र मास की वासंतिक सुषमा से परिपूर्ण लुभावनी शामें, छिटकी चाँदनी, कोयल की कूक, सुगंधित पवन, मतवाले भौरों का गुंजार और रात में आसवपान- ये शृंगार भाव को जगाए रखनेवाले रसायन ही हैं।’

चैत माह का महत्व देखते हुए ही इस माह के लिए भारतीय लोक में एक विशेष संगीत रचना हुई है जिसे चैती कहते हैं। चैती में शृंगारिक रचनाओं को गाया जाता है। चैती के गीतों में संयोग एवं विप्रलंभ दोनों भावों की सुंदर योजना मिलती हैं।

यह तो स्पष्ट है कि वसंत में शृंगार भाव का प्राबल्य होने के कारण चैत का महीना विरहिणियों के लिए बड़ा कठिन होता है। ऐसे में अगर प्रिय की पाती भी आ जाए तो उसे थोड़ा चैन मिले, क्योंकि चैत ऐसा उत्पाती महीना है जो प्रिय-वियोग की पीड़ा को और भी बढ़ा देता है-” आयल चैत उतपतिया हो रामा, ना भेजे पतिया।”

कोई किशोरी वधू देखते-देखते युवावस्था में प्रवेश कर जाती है, किंतु चैत के महीने में उसका प्रिय नहीं लौटता, यह उसे बड़ा क्लेश देता है-” चइत मास जोवना फुलायल हो रामा, कि सैंयाँ नहिं आयल।” प्रेमी जनों के लिए उपद्रवी चैत के मादक महीने में प्रियतम नहीं आए तो बाद में आना किस काम का? वस्तुतः यह मधुमास ही तो मिलन का महीना है- “चैत बीति जयतइ हो रामा, तब पिया की करे अयतई।” विरहिणी अपने प्रियतम को संदेश भेजती है- चैत मास में वन में टेसू फूल गए हैं। भौंरें उसका रस ले रहे हैं। तुम मुझे यह दुःख क्यों दे रहे हो. क्योंकि तुम्हारी प्रतीक्षा करते-करते वियोगजनित दुःख से रोते हुए मैंने अपनी आँखें गँवा दी हैं।

भारतीय शास्त्रीय गायिका-गिरिजा देवी चैती गाते हुए
भारतीय शास्त्रीय गायिका-गिरिजा देवी

चैती गीतों में प्रेम के विविध रूपों की व्यंजना हुई है। इनमें संयोग शृंगार की कहानी भी रागों में लिखी हुई है। कहीं सिर पर मटका रखकर दही बेचने वाली ग्वालिनों से कृष्ण के द्वारा गोरस माँगने का वर्णन है। कहीं कृष्ण-राधा के प्रेम-प्रसंग हैं तो कहीं राम-सीता का आदर्श दांपत्य प्रेम है। कहीं दशरथनंदन के जन्म का आनंदोत्सव है तो कही इन गीतों में दैनिक जीवन के शाश्वत क्रियाकलापों का चित्रण है। साथ ही इनमें चित्र-विचित्र कथा-प्रसंगों एवं भावों के अतिरिक्त सामाजिक जीवन की कुरीतियाँ भी चित्रित हुई हैं। एक चैती गीत में बाल-विवाह की विडंबना चित्रित है-

राम छोटका बलमुआ बड़ा नीक लागे हो रामा

अँचरा ओढ़ाई सुलाइबि भरि कोरवा हो रामा

अँचरा ओढ़ाई।

रामा करवा फेरत पछुअवा गड़ि गइले हो रामा

सुसुकि-सुसुकि रोवे सिरहनवा हो रामा।”

तो कही चैत की चाँदनी का जो उल्लेख अनेक कवियों ने किया है। चैती गीत भी इसके अपवाद नहीं हैं-

चाँदनी चितवा चुरावे हो रामा, चैत के रतिया

मधु ऋतु मधुर-मधुर रस घोलै, मधुर पवन अलसावे हो रामा, चैत के रतिया।”

एक चैती गीत में भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप चित्रित हुआ है- कान्हा चरावे धेनु गइया हो रामा, जमुना किनरवा

तात्पर्य यह कि चैती गीतों में विभिन्न कथानकों का समावेश पाया जाता है। इन गीतों में वसंत की मस्ती एवं इंद्रधनुषी भावनाओं का अनोखा सौंदर्य है। इनके भावों से छलकती रसमयता लोगों को मंत्रमुग्ध कर देती है।

चैती : लोक संगीत की एक ऐसी विधा जो लोक और शास्त्रीय दोनों शैलियों में अत्यन्त लोकप्रिय है।

लोक के अपने अलग रंग हैं और इन्हें पसन्द करने वालों के भी अपने अलग वर्ग हैं लोक संगीत, वह चाहे किसी भी क्षेत्र का हो, उनमें ऋतु के अनुकूल गीतों का समृद्ध खज़ाना होता है यह बात तो आंख मूंद के मान लेने वाली है। लोक संगीत की एक ऐसी ही विधा है ये ‘चैती’ जिसे उत्तर भारत के पूरे अवधी-भोजपुरी क्षेत्र तथा बिहार के भोजपुरी-मिथिला क्षेत्र की सर्वाधिक लोकप्रियता प्राप्त है। भारतीय या हिन्दू कैलेण्डर के चैत्र मास से गाँव के चौपाल में महफिल सजती है और एक विशेष परम्परागत धुन में श्रृंगार और भक्ति रस में पगे ‘चैती’ गीतों का देर रात तक गायन जारी रहता है ।

जब महिला या पुरुष इसे एकल रूप में गाते हैं तो इसे ‘चैती‘ कहा जाता है परन्तु जब समूह या दल बना कर गाया जाता है तो इसे ‘चैता‘ कहा जाता है । इस गायकी का एक और प्रकार है जिसे ‘घाटो‘ कहते हैं । ‘घाटो’ की धुन ‘चैती’ से थोड़ी बदल जाती है । इसकी उठान बहुत ऊँची होती है और केवल पुरुष वर्ग ही समूह में गाते हैं । कभी-कभी इसे दो दलों में बँट कर सवाल-जवाब कर या प्रतियोगिता के रूप में भी प्रस्तुत किया जाता है । इसे ‘चैता दंगल‘ कहा जाता है।

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ग्रीष्म ऋतु में गाये जाने वाले ‘चैती’ गीतों का विषय मुख्यतः भक्ति और श्रृंगार प्रधान होता है ।

भारतीय पञ्चांग के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नया वर्ष शुरू होता है। नई फसल के घर आने का भी यही समय होता है जिसका उल्लास ‘चैती’ में प्रकट होता है। चैत्र नवरात्र प्रतिपदा के दिन से शुरू होता है और नौमी के दिन राम-जन्मोत्सव का पर्व मनाया जाता है । ‘चैती’ में राम-जन्म का प्रसंग लौकिक रूप में होता है ।

इसके आलावा जिस नायिका का पति इस मधुमास में परदेस में है, उस नायिका की विरह व्यथा का चित्रण भी इन गीतों में स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।

कुछ चैती गीतों का साहित्य पक्ष इतना सबल होता है कि श्रोता संगीत और साहित्य के सम्मोहन में बँध कर रह जाता है ।

लोक संगीत विदुषी विंध्यवासिनी देवी की एक चैती में अलंकारों का प्रयोग देखें – ‘चाँदनी चितवा चुरावे हो रामा, चईत के रतिया ….‘ इस गीत की अगली पंक्ति का श्रृंगार पक्ष तो अनूठा है, – ‘मधु ऋतु मधुर-मधुर रस घोले, मधुर पवन अलसावे हो रामा……‘। चैती गीतों की रसमयता ने संत कवियों को भी लुभाया है। इसीलिए कबीरदास जैसे संतों ने भी चैती शैली में निर्गुण पदों की रचना की- “पिया से मिलन हम जाएब हो रामा, अतलस लहंगा कुसुम रंग सारी पहिर-पहिर गुन गाएब हो रामा।”

कबीर की एक और ऐसी ही निर्गुण चैती कुछ इस प्रकार है -‘कैसे सजन घर जैबे हो रामा….‘ (कबीर)

प्रदर्शनकारी कलाओं पर भरतमुनि का ग्रन्थ- ‘नाट्यशास्त्र’ पंचम वेद माना जाता है । नाट्यशास्त्र प्रथम भाग, पंचम अध्याय के श्लोक 57 में ग्रन्थकार ने स्वीकार किया है कि लोक जीवन में उपस्थित तत्वों को नियमों में बाँध कर ही शास्त्र प्रवर्तित होता है । श्लोक का अर्थ है- ‘इस चर-अचर और दृश्य-अदृश्य जगत की जो विधाएँ, शिल्प, गतियाँ और चेष्टाएँ हैं, वह सब शास्त्र रचना के मूल तत्त्व हैं ।’

चैती गीत के लोक स्वरुप में ताल पक्ष के चुम्बकीय गुण के कारण ही उप शास्त्रीय संगीत में यह स्थान पा सका । लोक परम्परा में चैती 14 मात्र के चाँचर ताल में गायी जाती है, जिसके बीच-बीच में कहरवा का प्रयोग होता है। पूरब अंग की बोल बनाव की ठुमरी भी 14 मात्रा के दीपचन्दी ताल में निबद्ध होती है और गीत के अन्तिम हिस्से में कहरवा की लग्गी का प्रयोग होता है । सम्भवतः चैती के इस गुण ने ही उपशास्त्रीय गायकों को आकर्षित किया होगा ।

अब रही इन लोकगीतों के संगीत पक्ष की बात। वह भी कम रोचक नहीं। लोकगीतों की धुनों की, उनकी स्वर संरचना की तथा उनके लयप्रवाह की अपनी विशिष्टताएँ हैं। प्रथम, इनकी बंदिश प्रायः मध्यसप्तक में ही सीमित होती है, वह भी पूर्वार्ध में ही, उत्तरार्ध का स्पर्श यदा-कदा ही होता है। तार एवं मन्द्रसप्तक इनकी परिधि से बाहर ही रहते हैं, कुछ अपवादों को छोड़कर। इसलिये इनका गायन श्रमसाध्य भी नहीं होता। यों तो इन बंदिशों से सभी बारह स्वरों का प्रयोग होता है, किन्तु बहुलता शुद्ध स्वरों की ही होती है।

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लोक जब शास्त्रीय स्वरुप ग्रहण करता है तो उसमें गुणात्मक वृद्धि होती है | चैती गीत इसका एक ग्राह्य उदाहरण है | चैती के लोक और उपशास्त्रीय स्वरुप का समग्र अनुभव करने के लिए आप उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के शहनाई वादन का को रिकार्ड मेरी सलाह मान कर अवश्य सुनें |

ऐसा अनुमान है कि राग रचना की प्रेरणा भी इन्हीं रंजक लोकगीतों के स्वरगुच्छों से मिली होगी। मतंग मुनि ने राग की जो व्याख्या की है, उससे इस अनुमान की पुष्टि होती है

योऽयं ध्वनिविशेषस्तु स्वरवर्ण विभूषितः रंजको जनचित्तानां स रागः कथितो बुधैः

इसका अभिप्राय है कि लोकगीतों की विशिष्ट धुनों ने कलाकार की कल्पना को कुरेदा होगा और उसने ‘स्वर’ (आरोह-अवरोह), तथा वर्ण (रोचक गायन प्रक्रिया) से विभूषित कर उन्हें जनचित्तरंजक बनाकर ‘राग’ का जामा पहना दिया होगा। कुछ रागों के नाम जैसे भूपाली, जौनपुरी, पहाड़ी आदि इस तथ्य के स्पष्ट परिचायक हैं कि ये राग उन स्थानों की लोकप्रिय लोकधुनों से ही निर्मित और विकसित हुए होंगे।

चैती की एक और विशेषता भी उल्लेखनीय है | यदि चैती गीत में प्रयोग किये गए स्वरों और राग ‘यमनी बिलावल’ के स्वरों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो आपको अद्भुत समानता मिलेगी | अनेक प्राचीन चैती में ‘बिलावल’ के स्वर मिलते हैं किन्तु आजकल अधिकतर चैती में ‘तीव्र मध्यम’ का प्रयोग होने से राग ‘यमनी बिलावल’ का अनुभव होता है | यह उदाहरण भरतमुनि के इस कथन की पुष्टि करता है कि लोक कलाओं कि बुनियाद पर शास्त्रीय कलाओं का भव्य महल खड़ा है | सुप्रसिद्ध गायिका निर्मला देवी के स्वरों में कभी आप खोते हैं तो उनकी गायकी में इस चैती ( ‘एही ठैयां मोतिया हेराय….’ : निर्मला देवी) से

परिचित होंगे यहां ठुमरी अंग में एक श्रृंगार प्रधान चैती है | इसमें चैती का लोक स्वरुप, राग ‘यमनी बिलावल’ के मादक स्वर, दीपचन्दी और कहरवा ताल का जादू तथा निर्मला देवी की भावपूर्ण आवाज़ आपको परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ होंगे |

अब अन्त में चर्चा- ‘फिल्म संगीत में चैती’ की | कुछ फिल्मों में चैती का प्रयोग किया गया है | 1964 में बनी फिल्म ‘गोदान’ में पण्डित रविशंकर के संगीत निर्देशन में मुकेश ने चैती- ‘हिया जरत रहत दिन रैन हो रामा….’ गाया है | यह लोक शैली में गाया गीत है |

ठुमरी अंग में आशा भोसले ने फिल्म ‘नमकीन’ में चैती गाया है जिसके बोल हैं- ‘बड़ी देर से मेघा…’ | इस गीत में आपको राग तिलक कामोद का आनन्द भी मिलेगा |’हीया जरत रहत दिन रैन…’ फिल्म : गोदान – गायक : मुकेश ‘बड़ी देर से मेघा बरसे हो रामा…’ फिल्म : नमकीन – गायिका : आशा जी

श्री देवेन्द्र सत्यार्थी का कहना है कि लोकगीत का मूल जातीय संगीत में है। लोकगीत हमारे जीवन विकास की गाथा हैं। उनमें जीवन के सुख-दुःख मिलन-विरह, उतार-चढ़ाव की भावनाएँ व्यक्त हुई हैं। सामाजिक रीति एवं कुरीतियों के भाव इन लोकगीतों में निहित हैं। इनमें जीवन की सरल अनुभूतियों एवं भावों की गहराई है इनका विस्तार कहाँ तक है, इसे कोई नहीं बता सकता। किन्तु इनमें सदियों से चले आ रहे धार्मिक विश्वास एवं परम्पराएँ जीवित हैं। ये हृदय की गहराइयों से जन्मे हैं और श्रुति परम्परा से ये अपने विकास का मार्ग बनाते रहे हैं। अतः इनमें तर्क कम, भावना अधिक है। न इनमें छन्दशास्त्र की लौहश्रृंखला है, न अलंकारों की बोझिलता। इनमें तो लोकमानस का स्वच्छ और पावन गंगा-यमुना जैसा प्रवाह है। लोकगीतों का सबसे बड़ा गुण यह है कि इनमें सहज स्वाभाविकता एवं सरलता है।

शेरिल शर्मा लेखिका -शैरिल शर्मा भारतीय लोक इतिहास एवं साहित्य की छात्रा।  ब्रज भाषा साहित्य की ओर विषेश रूप से प्रयासरत।

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होरी ठुमरी – रंगों में सराबोर करते होली के चंचल गीत https://inditales.com/hindi/holi-ke-rang-hori-ke-sang/ https://inditales.com/hindi/holi-ke-rang-hori-ke-sang/#respond Wed, 06 Mar 2019 02:30:22 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1228

होली! जी हाँ रंगों, अठखेलियों तथा उत्साह से भरपूर वसंत का पर्व जो सबके अन्तरंग तथा बहिरंग को रंगों भरी खुशियों से भर देता है। यह पर्व हमारे जीवन के विभिन्न आयामों जैसे संस्कार,धर्म, परंपरा, प्राचीनता तथा साथ ही प्रफुल्लता का मनमोहक सम्मिश्रण है। रंगों के इस पर्व को विभिन्न कलाकारों ने अनेक वैभवशाली कलाकृतियों […]

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होली! जी हाँ रंगों, अठखेलियों तथा उत्साह से भरपूर वसंत का पर्व जो सबके अन्तरंग तथा बहिरंग को रंगों भरी खुशियों से भर देता है। यह पर्व हमारे जीवन के विभिन्न आयामों जैसे संस्कार,धर्म, परंपरा, प्राचीनता तथा साथ ही प्रफुल्लता का मनमोहक सम्मिश्रण है। रंगों के इस पर्व को विभिन्न कलाकारों ने अनेक वैभवशाली कलाकृतियों द्वारा अभिव्यक्त किया है। इन्ही में से एक अप्रतीम कलाकृति है ठुमरी।

होरी ठुमरी यूँ तो होली भारत के हर क्षेत्र में विभिन्न स्तर पर मनाई जाती है। तथापि भारत के उत्तरी भागों में यह अत्यधिक धूमधाम से मनाई जाती है। रंगों का मानो सैलाब सा छा जाता है। परिजनों, मित्रों तथा पड़ोसियों संग बैठकर नमकीन, मिष्टान तथा ठंडाई का स्वाद लिया जाता है। कुछ लोग ठंडाई को भांग से भी लैस कर  लेते हैं। और फिर आरम्भ होती है, ढोलक की थाप पर, रंगों में डूबे होली के गीतों की श्रंखला।

उपरोक्त उल्लेख को पढ़कर आप के समक्ष कई चित्रपटों में चित्रित होली के गीतों की कड़ी उभर कर आ गयी होगी। चित्रपटों में इन गीतों की आवश्यकता हो या न हो, ये गीत चित्रपटों को चार चाँद अवश्य लगा देते हैं। डॉन, सिलसिला, कटी पतंग, शोले, ऐसे कई चित्रपट हैं जिनमें होली के रंगों में सराबोर गीतों को अत्यंत सुन्दरता से चित्रित किया गया है। इन गीतों से आप भलीभांति परिचित होंगे। अतः मैं इस संस्मरण में चित्रपटों में चित्रित होली के गीतों का उल्लेख नहीं करना चाहती। अपितु मैं होली के गीतों के उस भण्डार की यहाँ चर्चा करना चाहूंगी जिनसे आप में से कई अनभिज्ञ होंगे। ठुमरी!
जी हाँ ठुमरी!

इस अर्ध-शास्त्रीय गायन शैली में भी कई रचनाएँ हैं जो होली के विभिन्न आयामों को सुन्दरता से प्रस्तुत करती है। ठुमरी एक ऐसी गायन शैली है जो प्रेम के भिन्न भिन्न अभिव्यक्तियों से सम्बंधित है, जैसे प्रणय, छेड़छाड़, श्रृंगार, कामुकता, रूठना, मनाना, ईर्ष्या, तड़प, विछोह इत्यादि।

ख़याल जैसे शुद्ध शास्त्रीय गायन शैली से विपरीत, ठुमरी शैली में प्रस्तुति की काव्यात्मकता पर अधिक महत्त्व दिया जाता है। अधिकतर ब्रज अथवा अवधी भाषा में छंदबद्ध ठुमरी में काव्य तथा उसकी अलंकृति को गायक चार चाँद लगा देते हैं जब वे छंदों के भागों की विभिन्न भावनाओं तथा सुरों द्वारा पुनरावृत्त करतें हैं। शब्दों के अर्थ तथा पृष्ठभागीय भावनाओं को अलंकारों द्वारा पिरोते हैं तथा एक भिन्न परिवेश से हमारा परिचय कराते हैं।

होरी के रंग - ठुमरी के संग
होरी के रंग – ठुमरी के संग

ठुमरी गायकी में अधिकतर सरल रागों का प्रयोग किया जाता है। उदाहरणतः मेरा प्रिय राग खमाज, काफी, सर्वप्रिय राग देस, पीलू, गारा, पहाड़ी, भैरवी इत्यादि। अधिकांशतः ठुमरी शैली पूर्णतः किसी एक राग पर आधारित नहीं रहती। अतः इसे मिश्र राग भी कहा जाता है। इसे मध्यम तथा द्रुत लय में अभिव्यक्त किया जा सकता है। गायक प्रस्तुति के समय सुरों से अठखेलियाँ करते तत्काल नवीन रचनाएँ भी प्रस्तुत कर देते हैं। रूपक, दीपचंडी, दादरा इत्यादि अधिकतर उपयोग में लाये जाने वाले ताल हैं।

होली अथवा होरी ठुमरी अधिकांशतः राधा एवं कृष्ण की रासलीलाओं पर आधारित हैं। किस प्रकार कृष्ण राधा तथा गोपियों के संग रास रचाते, अठखेलियाँ करते थे तथा बालक्रीडाओं द्वारा उन्हें सताते भी थे। सम्पूर्ण ठुमरी में प्रेम के प्रत्येक आयाम को सुन्दरता से छुआ जाता है। कभी प्रेम की अभिव्यक्ति तो कभी लज्जा, कभी रूठना मनाना तो कभी ईर्ष्या, प्रेम में कभी विछोह तो कभी मिलन!

होरी ठुमरी – होली पर आधारित कुछ उत्तम शास्त्रीय प्रस्तुति

१. होली की ठुमरियों में होली के रंग

आईये होली पर आधारित इन ठुमरियों का आरम्भ हम बनारस घराने की पंडिता सिद्धेश्वरी देवी द्वारा राग काफी में प्रस्तुत एवं दीपचंडी ताल में निबद्ध ठुमरी से करते हैं। उड़त अबीर गुलाल, लाली छाई रे…

इस ठुमरी में होली का परिदृश्य प्रस्तुत किया गया है। चारों ओर उड़ाए लाल रंग के अबीर/गुलाल ने सर्व परिवेश को लालिमा से ढँक दिया है। विशाल अम्बर, यमुना का जल, श्याम वर्ण कृष्ण, उनके आभूषण, यहाँ तक की उनके श्वेत मोतियों का हार भी लालिमा में सराबोर हैं।

उड़त अबीर गुलाल, यही ठुमरी पंडिता सिद्धेश्वरी देवी की सुपुत्री एवं शिष्या सविता देवीजी ने भी गायी है। उनकी गायकी की शैली सिद्धेश्वरीजी की शैली से मेल खाते हुए भी तात्कालिक आशुरचनाओं में भिन्नता लिए हुए होती है।

ठुमरी की चर्चा हो तो पंडिता गिरिजा देवी का नाम सहज ही मानसपटल पर उभर कर आ जाता है। समकालीन शास्त्रीय गायन में ठुमरी शैली की वरिष्ठ तथा सर्वप्रतिष्ठित गायिका हैं गिरिजा देवीजी। उन्होंने इसी ठुमरी उड़त अबीर गुलाल को राग गारा में अत्यंत सुमधुर प्रकार से प्रस्तुत किया। उन्ही की गाई इस ठुमरी का अभूतपूर्व आनंद प्रदान करने हेतु प्रस्तुत है यह विडियो.

साथ ही आनंद उठाईये पंडिता गिरिजा देवी की प्रसिद्ध एवं पांडित्य-प्राप्त शिष्या मालिनी अवस्थी द्वारा ठुमरी प्रस्तुति।

होली एक सर्वप्रिय बहुआयामी विषय होने के कारण इस पर आधारित कई ठुमरियां हैं। प्रस्तुत उन्ही में से एक और अतिप्रसिद्ध ठुमरी जिसे प्रस्तुत किया है बनारस घराने की महारथी पंडिता शोभा गुर्टूजी। होली के रंगों की छटा बिखेरती इस ठुमरी का मुखड़ा है आज बिरज में होली रे रसिया..

२. होली पर्व में आनंदोत्सव मनाते कृष्ण पर ठुमरी

कैसी ये धूम मचायी कन्हैय्या, इस ठुमरी में कृष्ण राधा एवं गोपियों संग होली खेलते धूम मचा रहे हैं। गोपी राधा के मुख से कृष्ण के गुणगान थम नहीं रहें हैं। इस सुन्दर दृश्य को राग जिला काफी में सुन्दरता से प्रस्तुत किया है सुरों की देवी सुश्री बेगम अख्तर ने।

इसी ठुमरी की विस्तृत एवं जीवंत प्रस्तुति पंडित जसराजजी के सुमधुर सुरों में यहाँ प्रस्तुत है। यह प्रस्तुति उन्होंने सुश्री बेगम अख्तर जी के सम्मान में की थी।

आईये अब आनंद उठाते हैं एक अत्यंत मनोहारी जुगलबंदी की। राग जिला काफी में इसी होरी ठुमरी की जुगलबंदी प्रस्तुति की है जहां पंडिता गिरिजा देवीजी की गायकी को उस्ताद अमजद अली खान अपने सरोद द्वारा चार चाँद लगा रहे हैं।

३.राधा संग होली खेलने आगे आते कृष्ण

यह मेरे प्रिय होरी ठुमरियों में से एक है जिसे राग खमाज में जयपुर-अत्रौली घराने की सुरश्री उपाधि प्राप्त केसरबाई केरकर ने अपने सुरों से अलंकृत किया है। आये श्याम मोसे खेलन होली, इस ठुमरी में राधा बखान कर रही है कि किस प्रकार कृष्ण अपनी पिचकारी को रंगों से भरकर उनकी ओर आ रहे हैं। वे राधा को रंगों में सराबोर करने हेतु आतुर हैं।

४.कृष्ण संग होली खेलने आतुर राधा

सुश्री बेगम अख्तर की होरी खेलन कैसे जाऊं, यह राग पीलू पर आधारित एक सुमधुर प्रस्तुति है जहां राधा कृष्ण संग होली खेलने हेतु आतुर हैं। किन्तु लज्जा वश वे आगे नहीं बढ़ पा रही हैं। वे अपनी यह व्यथा सखी सम्मुख रखती उससे पूछ रही हैं कि..

प्रस्तुत है इसी होली ठुमरी का एक और रूप पंडिता शोभा गुर्टू के स्वरों में-

पंडिता शुभा मुद्गल की इस होरी ठुमरी कन्हैय्या घर चलो मोरी में राधा, कृष्ण संग होली खेलने की इच्छा के कारण अपनी सखियों की मनुहार कर रही हैं कि वे उनके संग कृष्ण के घर चलें।

५. कृष्ण संग होली खेलती राधा

रंग डारूंगी डारूंगी नन्द के लालने पे, राधा अत्यधिक उत्साहित है अपने पिया संग होली खेलने हेतु। वे कृष्ण को चुनौती पूर्ण आमंत्रण दे रही हैं। इसी भाव प्रस्तुत कर रहे हैं बनारस घराने के पंडित छन्नूलाल मिश्राजी

यहाँ मालिनी अवस्थीजी ने भी इसकी अत्यंत मनोहारी प्रस्तुति की है।

६.रंग में सराबोर राधा

राग पहाड़ी में पंडिता शोभा गुर्टूजी का गाया सुमधुर होली गीत, रंगी सारी गुलाबी चुनरिया रे, राधा की चिंता दर्शाता है। उन्हें कृष्ण ने पहले ही गुलाबी रंग से भिगो दिया है तथा उनका जी अब भी भरा नहीं है। वे और अधिक रंग लिए उनकी ओर बढ़ रहे हैं।

अद्भुत प्रतिभा की धनी सुश्री कौशिकी चक्रबर्ती ने भी इस ठुमरी की अत्यंत मनोहारी प्रस्तुति की है। यद्यपि राग वही है, तथापि अत्यंत भिन्न रस लिए हुए है यह ठुमरी।

मालिनी अवस्थी द्वारा प्रस्तुत यही ठुमरी लोकगीत की शैली में है।

इस जीवंत चित्रीकरण में पंडित शुजात खान ने ठुमरी गाते हुए अपना ही साथ सितार पर दिया है।

७.होली खेलते राधा कृष्ण

सारी डार गए मो पे रंग की गागर, इस ठुमरी में राधा कृष्णा के अन्तरंग होली के दृश्य को सुन्दरता से प्रस्तुत किया गया है। पंडित ज्ञान प्रकाश घोष द्वारा रचित इस द्विभाषी ठुमरी को राग खमाज में उन्ही के शिष्य पंडित अजय चक्रबर्ती अत्यंत मधुरता से गाया है। दुर्भाग्य से यह प्रस्तुति अकस्मात् ही अंत हो गयी है।

तत्पश्चात इसी ठुमरी की दूसरी आवृत्ति अर्थात् इसका बंगाली संस्करण, केनो भिजाले रोंगों, भी एक होरी ठुमरी है।

८.त्रस्त राधा कृष्ण से और ना रंगने की प्रार्थना करती है।

कृष्णा द्वारा ओजपूर्ण होली खेलने के पश्चात राधा थक चुकी है तथा कृष्ण से प्रार्थना कर रही है कि वे उन्हें और अधिक ना रंगें।

इन्ही भावों को दर्शाती ठुमरी का एक मधुर ध्वन्यालेखन किया गया है सोलापुर की मेहबूबजान के मधुर स्वरों में। ना मारो पिचकारी गोपाल, राग खमाज पर आधारित है। यह ध्वन्यालेखन सन १९३६ में किया गया था जहां राधा कृष्णा को और रंग खेलने से रोक रही है।

इन्ही भावों को पंडिता सिद्धेश्वरी देवी ने भी इस ठुमरी में मधुरता से प्रस्तुत किया है, जी ना मारो पिचकारी रंग की.

उसी प्रकार से पंडित कुमार गन्धर्वजी ने भी राग भैरवी में एक अत्यंत भिन्न रचना अपने सुमधुर सुरों में सजा कर यहाँ प्रस्तुत किया है, ना मारो भर पिचकारी.

९.होली में दंग मोहन

होली खेलने में दंग मोहन की लीलाओं की राग अदाना में सुन्दरता से व्याख्या करती ग्वालियर घराने की स्व. पंडिता वीणा सहस्रबुद्धे का अनुभव लेने हेतु सुनें, होरी होरी खेलत नंदलाल

मेवाती घराने के पंडित संजीव अभ्यंकर के विषय में तो आपने अवश्य ही सुना होगा। वे कदाचित सुर महारथी पंडित जसराज जी के सर्वप्रिय शिष्य है । आईये उन्ही के सुमधुर स्वरों का आनंद उठायें राग तिलंग पर आधारित इस होरी ठुमरी का, मोहन खेलत होरी

१०.विशुद्ध शास्त्रीय होरी ठुमरी

पटियाला घराने के एक वरिष्ठ एवं प्रतिष्ठित गायक हैं उस्ताद बड़े गुलाम अली खान साहिब। जितनी मजबूत पकड़ उनकी ख़याल गायकी में है उतनी ही महारथ उन्हें होरी ठुमरियों में भी हासिल है। अपनी अद्भुत घुमावदार तानों द्वारा उन्होंने इस होरी को सर्वोच्च स्तर पर पहुंचा दिया है। आईये सुनते हैं राग देस पर आधारित उनकी गाई ठुमरी, होरी खेलन जाऊं

किराना घराने के पंडित भीमसेन जोशीजी से कोई हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत प्रेमी अनभिज्ञ नहीं है। हमारा सौभाग्य है कि अपने जीवन में उनकी गायकी का आनंद उठाने का अवसर हम सब को प्राप्त हुआ है। आईये प्रस्तुत है राग काफी पर उनकी ठुमरी, होरी खेलत नंदकुमार

पारितोषिक: होरी गायकी के विभिन्न प्रकार

निम्न विडियो में पंडित छन्नूलाल मिश्र होरी गायकी के भिन्न भिन्न प्रकारों की व्याख्या कर रहे हैं।

यूँ तो सुमधुर होरी ठुमरियों की सूची अनंत है। तथापि कुछ ही ठुमरियां जिव्हा पर सहज उपलब्ध हैं। कईयों के विडियो भी उपलब्ध नहीं हैं।

आईये यहाँ आनंद उठाते हैं एक अनोखी होरी की। पंडित छन्नूलाल मिश्राजी प्रस्तुति, खेले मशाने में होली दिगंबर – शिव की होरी।

तो पाठकों, कैसे रही होली! इन सर्व ठुमरियों में से कौन कौन सी ठुमरियां आपकी प्रिय होरी है? निम्न टिप्पणी खंड में अवश्य लिखें।

यदि यह ठुमरियों का संग्रह आपके ह्रदय को छूने में सक्षम हो जाय तो इसे अन्य रसिकों, मित्रों व परिजनों तक पहुंचाने में अवश्य किंचित कष्ट करें।

होली की शुभकामनाएं!!


यह आदित्य सेनगुप्ता द्वारा प्रदत्त अथिति संस्करण है। मेरे मित्र आदित्य की वाचन, संगीत, पाकशास्त्र, इतिहास तथा विरासती धरोहरों में विशेष रूचि है। इन रुचियों की आपूर्ति हेतु वे विभिन्न स्थलों की यात्रा करते रहते हैं। व्यावसायिक रूप से वे एक बंगलुरु निवासी वैज्ञानिक हैं।


अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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सुप्रसिद्ध राम भजन जो राम नाम में ओत-प्रोत कर दें https://inditales.com/hindi/most-popular-ram-bhajans/ https://inditales.com/hindi/most-popular-ram-bhajans/#comments Wed, 21 Mar 2018 02:30:39 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=752

भारत के सर्वाधिक महत्वपूर्ण पर्वों में एक पर्व है दीपावली। दीपावली अर्थात् घरों का रंग रोगन व सजावट, नवीन वस्त्रों की खरीदी, व्यापारियों का नवीन वित्तीय वर्षारंभ, भिन्न भिन्न मिष्टान्न व पक्वान्न, पटाखे, गुलाबी ठंड की शुरुआत तथा आनंद व उत्साह की पराकाष्ठा। दीपावली का उत्सव मनाने के पीछे हेतु क्या है? जी हाँ! हम […]

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सुप्रसिद्ध राम भजनभारत के सर्वाधिक महत्वपूर्ण पर्वों में एक पर्व है दीपावली। दीपावली अर्थात् घरों का रंग रोगन व सजावट, नवीन वस्त्रों की खरीदी, व्यापारियों का नवीन वित्तीय वर्षारंभ, भिन्न भिन्न मिष्टान्न व पक्वान्न, पटाखे, गुलाबी ठंड की शुरुआत तथा आनंद व उत्साह की पराकाष्ठा। दीपावली का उत्सव मनाने के पीछे हेतु क्या है? जी हाँ! हम यह त्यौहार मनाते हैं भगवान् राम द्वारा श्रीलंका में रावण का वध कर, सीता सहित अयोध्या वापिस लौटने की प्रसन्नता व्यक्त करने हेतु। अतः दीपावली में हम भगवान् राम का उत्सव मनाते हैं।

इसी तरह राम नवमी पर भी हम श्री राम का जन्मोत्सव मानते हैं।

तो भगवान् राम का उत्सव मनाने की सर्वोत्तम रीति क्या है? ऐसा माना जाता है कि हिन्दु पञ्चांग के चौथे युग, कलयुग में केवल राम का नाम लेने भर से ही हमारी सर्व समस्याओं का समाधान हो जाता है। तो चलिए सबसे पहले सुनते हैं अयोध्या के मंदिरों की राम धुन:

राम नाम तथा राम धुन हिन्दू संस्कृति का अभिन्न अंग है। यूं तो राम नाम के जप हेतु आपको किसी सहायता की आवश्यकता नहीं है अपितु राम धुन हेतु राम के १० सर्वाधिक लोकप्रिय भजनों का संकलन आपको आनंदित करने के लिए  प्रस्तुत है।

राम भजन

दीपावली के अवसर पर प्रस्तुत है १० सर्वोत्तम राम भजन:-

रघुपति राघव राजा राम – राम भजनों में सर्वाधिक गया जाने वाला भजन

रघुपति राघव राजा राम – यह राम धुन नम नारायण नामक ग्रन्थ से आंशिक रूप से व्युत्पन्न है। आप कदाचित नम नारायण ग्रन्थ से अवगत ना हों तथापि वाल्मीकि रामायण के विषय में जानकारी सर्व विदित है। २४००० छंदों में रचित वाल्मीकि रामायण प्रतिदिन जपना कठिन है। अतः २४००० छंदों के वाल्मीकि रामायण का सार १०८ छंदों द्वारा संक्षिप्त में गठित किया गया है। इसे ही नम नारायण कहा जाता है। प्रतिदिन जप करने हेतु यह नम नारायण अतिउपयुक्त है।

रघुपति राघव राजा राम, भक्तों के बीच इस भजन की प्रसिद्धि तब चरम सीमा पर पहुँची जब गांधीजी ने स्वतंत्रता संघर्ष हेतु इस राम भजन को अपनाया था। यद्यपि मूल भजन तथा गांधीजी के संस्करण में भिन्नता है क्योंकि उन्होंने मूल भजन में स्वतंत्रता संघर्ष के सन्दर्भ में परिवर्तन किये थे। मूल भजन तथा गांधीजी के संस्करण के बोल इस प्रकार हैं-

रघुपति राघव राजा राम भजन के बोल
रघुपति राघव राजा राम भजन के बोल

यूँ तो इस भजन को कई गायकों ने गाया व वादकों ने बजाया है तथापि मेरी व्यक्तिगत प्रिय प्रस्तुति है उस्ताद बिस्मिल्लाह खान द्वारा शहनाई पर बजाई गयी रघुपति राघव राजा राम की धुन। वही सुमधुर धुन आपके लिए यहाँ प्रस्तुत है-

इनके अतिरिक्त पंडित डी. वी. पलुस्कर, हरी ओम शरण तथा स्व. एम्. एस. सुब्बलक्ष्मी ने भी इस भजन को उत्कृष्ट रूप में प्रस्तुत किया है।

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित- श्री राम चन्द्र कृपालु भज मन

श्री राम चन्द्र कृपालु भज मन , यह गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा संस्कृत में रचित राम भजन है। संगीत की दुनिया के लगभग सभी प्रसिद्ध गायकों द्वारा इस भजन की प्रस्तुतीकरण उपलब्ध है। मैंने आप सब के लिए एक मनमोहक प्रस्तुतीकरण का चुनाव किया है जिसमें एक नन्ही बालिका, सूर्यगायत्री ने अपने मधुर स्वरों द्वारा इस भजन को चार चाँद लगा दिए हैं।

यदि आप अधिक परिपक्व स्वर में प्रसिद्ध प्रस्तुतीकरण सुनना चाहें तो इन दो गायकी की चर्चा अवश्य की जायेगी। एक है दिव्यात्मा एम्.एस. सुब्बलक्ष्मी जिन्होंने राग सिन्धु भैरवी में अत्यंत सहजता से यह भजन प्रस्तुत किया है। दूसरा है राग यमन कल्याण में प्रसिद्ध गायक बंधुओं, राजन मिश्रा व साजन मिश्रा द्वारा गाया गया यह भजन।

श्री राम चन्द्र कृपालु भज मन बोल
श्री राम चन्द्र कृपालु भज मन बोल

यदि आप स्वयं भी यह भजन इन गायकों के स्वरों के साथ दुहराना चाहें तो आपकी सहायता हेतु इसके बोल प्रस्तुत हैं। श्री राम चन्द्र कृपालु भज मन, इस भजन में भगवान् श्री राम के महात्मय का वर्णन किया गया है।

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित- ठुमक चलत राम चन्द्र

ठुमक चलत राम चन्द्र, इस भजन के रचयिता गोस्वामी तुलसीदासजी ने भगवान् राम की बाल लीलाओं का वर्णन किया है। तुलसीदासजी कहते हैं कि रामचन्द्रजी अपनी बाल्यावस्था में चलने का प्रयत्न करते हुए बार बार गिर रहे हैं। महाराज दशरथ की तीनों रानियाँ अत्यंत प्रेम से उनका ध्यान बंटाती हुई उन्हें फिर खड़े होकर चलने हेतु प्रोत्साहित कर रही हैं। तुलसीदासजी ने बाल राम की मनमोहक सूरत एवं उनके हावभाव का इतनी सुन्दरता से वर्णन किया है कि उनकी मनोहारी छवि आँखों के समक्ष साकार होने लगती है। तुलसीदासजी यह भी कहते हैं कि भगवान् राम की मनोरम छवि एवं इस सम्पूर्ण दृश्य को देख वे आत्मविभोर हो रहे हैं तथा स्वयं को उनके रंग में रंगता अनुभव कर रहे हैं।

ठुमक चलत राम चन्द्र भी एक प्रसिद्ध भजन है जिसे कई जाने माने गायकों ने अपने सुरों से सजाया है। मेरी प्रिय प्रस्तुति, पंडित पुरुषोत्तम दास जलोटाजी द्वारा गाया यह भजन आपके हेतु प्रस्तुत है।

इस भजन को पंडित पुरुषोत्तम दास जलोटाजी के सुपुत्र अनूप जलोटा जी ने भी गया है। यहाँ वे गायकी के साथ साथ सम्पूर्ण दृश्य की व्याख्या भी कर रहे हैं।

पंडित रोनू मजूमदार जी ने इसी भजन को अपनी बांसुरी द्वारा बजाकर उसकी मधुरता को चरम सीमा तक पहुंचा दिया है।
आप सब भी इस भजन के निम्नलिखित बोल पढ़ कर सम्पूर्ण दृश्य को अपने सम्मुख सजीव कर सकते हैं।

ठुमक चालत राम चन्द्र बोल
ठुमक चालत राम चन्द्र बोल

इसके अलावा, स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर जी ने इस भजन को वात्सल्य रस में गा कर एक माता एवं उसके रामलल्ला के मध्य प्रेम को सुन्दरता से प्रस्तुत किया है। पंडित डी. वी. पलुस्करजी ने इसे शास्त्रीय संगीत में बांधकर इसे नयी ऊंचाईयां प्रदान की हैं।

मीरा बाई द्वारा रचित – पायो जी मैंने राम रतन धन पायो

मीराबाई को आप सब परम कृष्ण भक्त के रूप में जानते हैं। भगवान् कृष्ण हेतु उन्होंने अनगिनत भजन रचे एवं गाये हैं। उपरोक्त भजन उन्होंने भगवान् राम हेतु रचा था। वे कहती हैं कि राम को पाकर उन्होंने बहुमूल्य खजाना प्राप्त कर लिया है। यह ऐसा खजाना है जिसकी प्रत्येक दिवस वृद्धि होती जाती है तथा इसे कोई छीन भी नहीं सकता।

पंडित डी. वी. पलुस्कर द्वारा गाये गए इस भावपूर्ण भजन को सुन आपका रोम रोम आनंदित हो उठेगा।

प्रस्तुत है इस भजन की दो और प्रस्तुतियाँ। पहली, स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर द्वारा गायी गयी तथा दूसरी, पंडित रोनू मजूमदार द्वारा बांसुरी पर बजायी गयी मनमोहक प्रस्तुति।

आप साथ गुनगुनाना चाहें तो आपके हेतु इस भजन के बोल भी प्रस्तुत हैं।

पायो जी मैंने राम रतन धन पायो बोल
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो बोल

राम सिमर राम – गुरु नानकजी का शबद

गुरु नानकजी ने भी भगवान् राम की स्तुति में शबद गाये हैं। प्रस्तुत है गजल सम्राट जगजीत सिंग द्वारा गाई गयी यह भावपूर्ण शबद।

आप यह जानकर अचम्भित रह जायेंगे कि इस शबद को दक्षिण भारतीय संगीत साम्राज्ञी एम्.एस. सुब्बलक्ष्मीजी ने भी गाया है।

जब जानकी नाथ सहाय करे – गोस्वामी तुलसीदासजी

जब जानकी नाथ सहाय करे, यह गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित एक और भजन है जो भगवान् पर विश्वास का पाठ पढ़ाता है। इस भजन में गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं कि जब जानकी नाथ भगवान् राम आपका रक्षण कर रहे हैं तो कौन आपको हानि पहुंचा सकता है। आपके समक्ष चाहे जितनी बुरी शक्तियां आकर खड़ी हो जाएँ, चाहे वह राहू या केतु हो या दुष्ट दुश्शासन का चरित्र धारण किये मनुष्य, भगवान् राम आपकी सदैव रक्षा करेंगे।
यही भजन आपके लिए प्रस्तुत है पंडित छानुलाल मिश्राजी के मधुर स्वरों में-

साथ गुनगुनाने हेतु इस भजन के बोल इस प्रकार हैं-

जब जानकी नाथ सहाय करें भजन बोल
जब जानकी नाथ सहाय करें भजन बोल

इस भजन को कई अन्य प्रसिद्ध गायकों ने भी स्वरबद्ध किया है जैसे संगीत सम्राट पंडित डी. वी. पलुस्कर, पंडित अजय चक्रवर्ती तथा रुचिरा केदारपंडित रोनू मजूमदार द्वारा बांसुरी में बजाया गया यह भजन भी अत्यंत मधुर है।

राम रंग रंगले मन – एक मराठी भजन

यह भजन मैंने अपने पतिदेव के पंडित भीमसेन जोशीजी के गाये भजनों के संग्रह में से ढूंड निकाला था। यह एक छोटा सा भजन है जो हमें राम रंग, आत्म रंग एवं विश्व रंग में सराबोर होने के लिए कहता है। राम रंग रंगले मन इस भजन का मेरा विवेचन है कि कवि हमें अस्तित्व के प्रत्येक स्तर पर राम रस में डूब जाने हेतु प्रेरित कर रहा है, फिर चाहे वह सांसारिक स्तर पर हो या भावनात्मक स्तर पर।

प्रस्तुत है पंडित भीमसेन जोशीजी द्वारा राग मिश्र पहाड़ी में गाया गया यह भजन-

श्री राम कहे समझाई

श्री राम कहे समझाई, इस रचना में उस समय का दृश्य दर्शाया गया है जब महारानी कैकेयी ने अपने दो वरदानों के आधार पर महाराज दशरथ को विवश कर दिया था कि वे पुत्र राम को १४ वर्षों के वनवास पर जाने का आदेश दें। महाराज दशरथ के शब्दों ने राम के अनुज लक्ष्मण को अत्यंत आहत एवं क्रोधित कर दिया है। तब भगवान् राम उन्हें समझते हैं कि उन्होंने स्वयं पिताश्री के आदेश को पूर्ण श्रद्धा से स्वीकार कर लिया है। वे इस सजा हेतु माता कैकेयी को भी दोष नहीं दे रहे हैं। वे समझा रहे हैं कि यह हमारे भाग्य की देन है, ना कि किसी मनुष्य की करनी। भगवान् राम लक्ष्मण को यह भी कहते हैं कि वे स्वयं वस्तुस्थिति से आहत नहीं हैं। वे उन्हें भी दुखी ना होने का आग्रह कर रहे हैं। इसी दृश्य को समक्ष प्रस्तुत करते हुए, इस भजन द्वारा रचयिता हमसे कहने का प्रयत्न कर रहे हैं कि हम भाग्य का लिखा स्वीकार करें एवं स्वयं को किसी भी स्थिति में आहत ना होने दें।

राग जौनपुरी में पंडित भीमसेन जोशी द्वारा गाया यह राम भजन आपके समक्ष प्रस्तुत है-

श्री राम चरणं समस्त जगतं – राम स्तुति

यह राम भजन एक राम स्तुति है जो हमें यह बताती है कि भगवान् के चरणों में ही समस्त विश्व समाहित है। भक्ति रस में ओतप्रोत इस राम भजन को यहाँ पंडित जसराज जी ने उतनी ही श्रद्धा एवं मधुरता से प्रस्तुत किया है-

रणजीति राम राऊ आये

रणजीति राम राऊ आये, यह उन भजनों में से एक है जो खरे अर्थ में दीपावली के पर्व से सम्बन्ध रखता है। लंका युद्ध पर विजय प्राप्त कर भगवान् राम जब सीता सहित अयोध्या पधारते हैं, सम्पूर्ण अयोध्या हर्ष एवं उल्हास से उनका स्वागत करती है। इसी आनंद को प्रदर्शित करता यह राम भजन प्रस्तुत है जिसे ध्रुपद गायकी में गुंदेचा बंधुओं ने मधुर स्वरों में बाँधा है-

रामचरित मानस -पंडित छन्नूलाल मिश्र

अंत में सुनिए यह राम चरितमानस गायन जिसमे राम कथा का निचोड़ है अलग अलग गायन शैलियों में

आदित्य सेनगुप्ता जी, इंडीटेल्स के लिए अप्रतिम राम भजनों की सूची के संकलन हेतु आपका अनेक धन्यवाद! इंडीटेल्स के इस संस्करण में इन भजनों को एक कड़ी में पिरोने का मेरा प्रयास अत्यंत आनंददायी तथा आत्मसंतुष्टी प्रदान करने वाला था। अनेक रूपों में राम के विभिन्न चरित्रों को सजीव करते इन भजनों को आत्मसात करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

भगवान् राम एवं उनकी भक्ति ने मेरे रोम रोम को भक्तिरस में सराबोर कर दिया। पहली बार ऐसा अनुभव हुआ जैसे राम भक्ति से ओतप्रोत संगीतमय दीपावली का पर्व मना लिया हो।

पाठकों के निवेदन है कि यदि आपका प्रिय राम भजन इस सूची में सम्मिलित नहीं है तो उसका उल्लेख निम्न दर्शित टिप्पणी खंड में अवश्य करें।

भगवान् राम से प्रार्थना है कि वह आपके जीवन में सुख, ऐश्वर्य एवं हर्षोल्हास की रोशनी भर दे!

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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गंगुबाई हंगल – हुबली धारवाड़ से निकली एक संगीत धारा https://inditales.com/hindi/dr-gangubai-hangal-hubballi-dharwad/ https://inditales.com/hindi/dr-gangubai-hangal-hubballi-dharwad/#comments Wed, 05 Jul 2017 02:30:57 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=307

धारवाड़ – हुबली जाने के पीछे मेरा बस एक ही कारण रहा है और वह है, प्रख्यात गायिका डॉ. गंगुबाई हंगल के बारे में थोड़ा और जानने की मेरी इच्छा। उनका देहांत होने के कुछ ही दिनों बाद मैंने किसी अखबार में उनसे संबंधित एक लेख पढ़ा जिसमें बताया गया था कि धारवाड़ में स्थित […]

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डॉ गंगुबाई हंगलधारवाड़ – हुबली जाने के पीछे मेरा बस एक ही कारण रहा है और वह है, प्रख्यात गायिका डॉ. गंगुबाई हंगल के बारे में थोड़ा और जानने की मेरी इच्छा। उनका देहांत होने के कुछ ही दिनों बाद मैंने किसी अखबार में उनसे संबंधित एक लेख पढ़ा जिसमें बताया गया था कि धारवाड़ में स्थित उनका घर अब संग्रहालय में रूपांतरित किया गया है। तथा हुबली में उनकी स्मृति में एक गुरुकुल भी बनवाया जा रहा है। तब से मेरे मन में इन जगहों पर जाकर गंगुबाई हंगल को करीब से जानने की इच्छा ने जन्म लिया। वहां पर जाकर मैं देखना चाहती थी कि डॉ. गंगुबाई हंगल जैसे संगीतकारों को पैदा करने वाली और उन्हें निखारने वाली जगह और वहां का वातावरण कैसा होता होगा। क्या वहां के वातावरण में ही ऐसा कुछ खास है या फिर यह इन महान व्यक्तियों का ही सौभाग्य है।

धारवाड़ से जुड़े उपाख्यान

धारवाड़ के बारे में थोड़ा और पढ़ने के बाद मुझे मालूम हुआ कि, गंगुबाई हंगल इस शहर द्वारा जनित इकलौती उस्ताद नहीं है, बल्कि उनके अलावा यह शहर मल्लिकार्जुन मंसूर, भीमसेन जोशी, रमाकांत जोशी, सवाई गंधर्व, बसवराज राजगुरु जैसे उस्तादों का भी जनक रहा है। वास्तव में कुमार गंधर्व बेलगाम के भी रहिवासी है जो यहां से बहुत दूर नहीं है। ‘स्पीकिंग ट्री’ द्वारा पोस्ट किया गया एक लेख इस बात पर प्रकाश डालता है कि, किस प्रकार से संगीत के उस्ताद और श्रोता संगीतमय वातावरण का निर्माण कर उभरते हुए संगीतकारों को खिलने और अपनी महक चारों ओर बिखेरने के लिए उचित मंच प्रदान करते है। संगीत में डूबे इस धारवाड़ शहर ने मुझे जर्मनी में स्थित लेपजिग शहर की याद दिला दी जो वर्षों से संगीत की विरासत को संभालते आ रहा है।

धारवाड़ में होसयल्लापुर नामक एक इलाका है जहां के चौक पर एक छोटा सा मंदिर बसा हुआ है। इस मंदिर से बाहर निकलती हुई, विराट रूप ग्रहण करती हनुमान जी की अप्रतिम मूर्ति को देखकर लगता है, जैसे शक्षात हनुमान जी ही वहां पर खड़े हैं। इस चौक से चलते हुए मैं लाइन बाज़ार की ओर गयी, जो बाबू सिंह ठाकुर का पेढ़ा के लिए मशहूर है। यहां पर मैंने आस-पास के लोगों से गंगुबाई हंगल के घर का पता पूछा, जिन्होंने मुझे गांधी चौक तक जाकर, वहां पर किसी से भी उनके घर का पता पूछने के लिए कहा। इसके अनुसार गांधी चौक पहुँचकर मैंने वहीं के कुछ बच्चों से गंगुबाई के घर के बारे में पूछा। तो उनसे मुझे यह जवाब मिला कि उन्होंने गंगुबाई के बारे में पहले कभी नहीं सुना था। लेकिन पीछे से आती हुई एक महिला ने रुकर मुझे उनके घर तक जाने का रास्ता बता दिया। यहां पर आपको अपनी मंजिल तक ले जाने वाले कोई भी दिशा निर्देशक पट्ट नहीं मिलते। लेकिन शुक्र है कि भारत में कम से कम लोग तो आपको सही जगह तक पहुंचा ही देते हैं। बहुत सी छोटी-छोटी गलियों से गुजरते हुए, छोटे-बड़े मंदिरों को पार करते हुए आखिर मैं उनके घर तक पहुँच ही गयी।

गंगोत्री – डॉ. गंगुबाई हंगल की जन्मभूमि

गंगोत्री - डॉ गंगुबाई हंगल का जन्मस्थान
गंगोत्री – डॉ गंगुबाई हंगल का जन्मस्थान

डॉ. गंगुबाई हंगल के घर के बाहर ही लगे नामपट्ट पर लिखा था – ‘गंगोत्री – डॉ. गंगुबाई हंगल की जन्मभूमि’। घर के छोटे से बरामदे में कोकम सुखाने के लिए रखा गया था। घर के प्रवेश द्वार की ओर बढ़कर मैंने देर तक दरवाजा खटखटाया और कुछ समय बाद एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति ने दरवाजा खोलते हुए मुझे शाम के 5 बजे फिर से आने के लिए कहा। लेकिन थोड़ा सा अनुरोध और कुछ मीठी बातें करने पर उन्होंने मुझे अंदर आने की अनुमति दे ही दी। भीतर प्रवेश करते ही उन्होंने घर की सारी बत्तियाँ जला दी, जिससे पूरा घर प्रकाशमय हो उठा। एक पतले से दलान, जिसमें डॉ. गंगुबाई हंगल की बड़ी-बड़ी तस्वीरें लगाई गयी थीं, से गुजरते हुए वे मुझे मुख्य घर तक ले गए। जो शायद कभी घर का बैठक कक्ष हुआ करता था अब संग्रहालय में परिवर्तित किया गया था। यह पूरा संग्रहालय परिवार की सबसे प्रख्यात बालिका को समर्पित किया गया था।

तस्वीरें – कुछ कैद की हुई यादें

५० सालों के अंतर पे - डॉ गंगुबाई हंगल
५० सालों के अंतर पे – डॉ गंगुबाई हंगल

इस संग्रहालय के बीचोबीच एक तस्वीर है जिसमें गंगुबाई हंगल अपने संगीत वाद्यों के साथ गाते हुए नज़र आती हैं। यहां पर चारों ओर आपको उन्हीं की तस्वीरें दिखाई देती हैं। इस कक्ष के एक दीवार पर उनकी दादी से लेकर उनके माता-पिता तथा उनके पति और बच्चों तक पूरे परिवार की तस्वीरे हैं। यहीं पर मैंने जाना कि उन्हें अपना ‘हंगल’ उपनाम ना ही अपने पति से मिला है और ना अपने पिता से, बल्कि यह उपनाम उन्हें अपनी नानी से मिला है, जो कि मातृप्रधान वंशावली को दर्शाता है। लेकिन इसके पीछे के कारणों की मुझे ठीक जानकारी नहीं मिल पायी। शायद, जिस समाज से गंगुबाई हंगल आई है वहां पर यही परंपरा रही होगी या फिर हंगल परिवार के संबंध में यह बात एक अपवाद का रूप भी हो सकती है।

यहां पर दो बड़े-बड़े सूचना पट्ट लगाए गए हैं, जिनमें से एक अंग्रेजी और दूसरा कन्नड में है। ये दोनों पट्ट गंगुबाई हंगल के जीवन से जुड़ी प्रमुख घटनाओं द्वारा उनके जीवन को रेखांकित करते हैं। उनके जीवन की उपलब्धियों पर गौर करें तो आपके रोंगटे खड़े हो जाते हैं, खास कर तब जब आपको एहसास होता है कि आप उन्हीं कि जन्मभूमि पर खड़े हैं।

मंच प्रदर्शन की तस्वीरें

बाकी 2-3 कमरों में उनके विविध जगहों पर आयोजित गायन कार्यक्रमों की तस्वीरें लगाई गयी हैं। यहां पर उनकी और भी तस्वीरें हैं जिनमें गंगुबाई हंगल अन्य जाने-माने संगीतकारों तथा फिल्मी हस्तियों के साथ नज़र आती है। उनके परिवार की भी कुछ तस्वीरें आपको यहां पर नज़र आती हैं। इसके अलावा यहां पर उनके जीवन के विविध चरणों की तस्वीरें भी मिलती हैं, जो एक नन्ही सी लड़की से एक महान संगीतकार बनने तक के उनके सफर को दिखाती हैं। इन सभी तस्वीरों में से उनकी दो तस्वीरें मुझे सबसे ज्यादा पसंद आयी जो एक साथ लगाई गयी हैं। इन दोनों तस्वीरों में वे सितार पकड़े एक जैसे खड़ी हैं, फर्क सिर्फ इतना है कि दोनों तस्वीरों के बीच 50 सालों का अंतर है। इसके बाद मैं उस जगह पर गयी जहां गंगुबाई हंगल ने अपना बचपन बिताया था। वहां पर कुछ पल बिताने के बाद उनके घर को चुप-चाप अलविदा कहकर मैं वहां से निकल गयी।

डॉ. गंगुबाई हंगल गुरुकुल, हुबली

डॉ गंगुबाई हंगल गुरुकुल
डॉ गंगुबाई हंगल गुरुकुल

दूसरे दिन मैं हुबली गयी जहां पर डॉ. गंगुबाई हंगल ने अपनी अंतिम सांसे ली थीं। इस स्थान पर अब उनके नाम से गुरुकुल बनवाया गया है। नृपटुंगा पहाड़ी के चक्कर काटते हुए आखिर मैंने इस गुरुकुल के व्यापक परिसर में प्रवेश किया। यहां पर प्रवेश करते ही मुझे आस-पास सिर्फ हरियाली ही हरियाली दिखाई दी जिसके बीच में गुरुकुल की इमारतें खड़ी थीं। मैंने वहां के प्रशासकीय भवन में जाकर इस गुरुकुल के पूरे परिसर की यात्रा करने की इच्छा प्रकट की। पद्मश्री नामक एक युवा महिला, जो इस गुरुकुल की करता-धरता है, ने मुझे गुरुकुल का पूरा परिसर घुमाया। उन्होंने मुझे गुरुकुल के वर्ग तथा यहां के शिक्षकों के निवास स्थान भी दिखाये। उन्होंने मुझे बताया कि गुरुकुल में कुल 6 गुरु हैं और प्रत्येक गुरु के 6 शिष्य हैं। इन शिष्यों को गुरुकुल में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित किया जाता है, ताकि वे अपने प्रेक्षकों के सामने अपनी काला का उत्तम प्रदर्शन कर सके।

शिष्य – गुरुकुल का भविष्य

गंगुबाई हंगल गुरुकुल - कक्षा
गंगुबाई हंगल गुरुकुल – कक्षा

यह गुरुकुल कर्नाटक की सरकार द्वारा चलाया जाता है और शिष्यत्व के अंतर्गत लिए गए शिष्यों के लिए यहां पर निशुल्क प्रवेश होता है। यहां के गुरु और शिष्य दोनों गुरुकुल द्वारा दिये गए निशुल्क निवासों में ही रहते हैं। शिष्यत्व रहित शिष्य भी इस गुरुकुल में प्रवेश पा सकते हैं। इस गुरुकुल में प्रवेश पाने के लिए एक शिष्य के पास 10वी उत्तीर्ण करने का प्रमाणपत्र तथा संगीत का मूल ज्ञान होना आवश्यक है। एक बार शिष्यों का चुनाव होने पर उन्हें 2-4 सालों के लिए संगीत में पूर्ण रूप से प्रशिक्षित किया जाता है। इन शिष्यों को रोज़ संगीत के वर्गों में उपस्थित रहना पड़ता है और नियमित रूप से अपनी शिक्षा भी करनी पड़ती है। इसके अलावा उन्हें रोज़ मंच प्रदर्शन भी करना पड़ता है। जिसके लिए गुरुकुल के उद्यान में एक खुला मंच बनाया गया है, जहां पर ये शिष्य अपना मंच प्रदर्शन करते हैं। मेरे खयाल से इन उभरते हुए कलाकारों को निखारने का यह बहुत ही बढ़िया तरीका है।

गुरुकुल के वर्ग

भिन्न भिन्न प्रकार के वाद्य यन्त्र
भिन्न भिन्न प्रकार के वाद्य यन्त्र

इस गुरुकुल के वर्ग बहुत ही भिन्न रूप से बनाए गए हैं। रोशनी का स्वागत करती इनकी त्रिकोणी खिड़कियाँ वास्तुकला की दृष्टि से बहुत ही सुंदर लगती हैं। इसकी छत भी एक ओर से थोड़ी ढलती हुई सी बनाई गयी है जैसे कि वह वर्ग में उपस्थित सकारात्मक शक्तियों को गुरु के आसान पर केन्द्रित करती हो।

गुरुकुल में संगीत वाद्यों के लिए भी एक खास कक्ष बनवाया गया है जिसमें सारे वाद्ययंत्र रखे गए हैं। और यही नहीं, यहां पर उपस्थित सभी वाद्ययंत्रों के चित्रों द्वारा उनके विविध भागों के विस्तृत विवरण भी दिये गए हैं।

पूरा गुरुकुल घूमने के बाद जब में अपनी गाड़ी की ओर जा रही थी, तो मेरे दिमाग में एक विचार आया कि कितनी अजीब बात है कि, कोई महान व्यक्ति अपने पीछे कितनी अनमोल विरासत और बहुत सारी अच्छी बातें छोड़ जाते हैं। वे सिर्फ अपनी कला द्वारा प्राप्त की गयी अपनी उपलब्धियों को ही अपने पीछे नहीं छोड़ जाते बल्कि वे अनेवाली पीढ़ी के लिए एक परंपरा छोड़ जाते हैं, जो उत्तम रूप से उसका अनुसरण कर उसे और आगे ले जाएंगे।

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