खारे जल के मगरमच्छों एवं रामचिरैयों की दुर्लभ प्रजातियां! मिलना चाहते हैं इनसे? तो आईए चलें ओडिशा के भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान में! गूगल नक्शे में भितरकनिका ढूंढ कर उसे पास से देखें तो ओडिशा के उत्तर-पूर्वी तट पर हरियाली भरा राष्ट्रीय उद्यान/ वन्यजीवन अभयारण्य क्षेत्र देख आपका हृदय भी बागबाग हो जाएगा।
पूर्व की ओर बहती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती ब्राह्मणी, वैतरणी, धामरा तथा पथसल नदियां वैश्विक रूप से महत्वपूर्ण इस आर्द्रभूमि का सृजन करती हैं तथा इसे पोसती हैं। ओडिशा के केंद्रपाड़ा जिले में स्थित भारत का दूसरा विशालतम मैंग्रोव पारितंत्र इसी आर्द्रभूमि के क्षेत्र में पोषित होता है। १४५ वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में पसरे इस राष्ट्रीय उद्यान को घेरता हुआ ६७० वर्ग किलोमीटर के वन्यजीवन अभयारण्य का अतिरिक्त क्षेत्र है।
भुवनेश्वर से सड़क-यात्रा द्वारा उदयगिरी, रत्नागिरी तथा ललितगिरी गुफाओं में स्थित बौद्ध धरोहरों के दर्शन करते समय हम एक संध्या ‘सैंड पेबल्स भितरकनिका जंगल रिज़ॉर्ट टेंट हाउस’ परिसर में पहुंचे।
भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान में नौका विहार
दूसरे दिवस प्रातः हम मुंह-अंधेरे ही उठ गए। खारे जल के मगरमच्छों से मिलने का उतावलापन जो हिलोरे मार रहा था। किन्तु वातावरण हमारा साथ निभाने हेतु तत्पर नहीं हुआ। चारों ओर गहन कोहरा छाया हुआ था। धुंध छँटने के लिए हमें दीर्घ काल तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। गाँव की पगडंडियों में पदयात्रा करते समय कुछ मीटर के परे हमें कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा था। हमें पूर्ण कल्पना थी कि खाड़ी के समीप धुंध इससे भी अत्यधिक गहन होगी। लगभग एक घंटे से भी अधिक समय प्रतीक्षा करने के पश्चात हमें वन विभाग के अधिकारियों ने हरी झंडी दिखायी।
तब आरंभ हुआ खाड़ियों एवं अप्रवाही जल-धाराओं के जाल में हमारा नौका विहार! हमारी नौका इंजन संचालित नौका थी। इस प्रकार की नौकाओं को इस राष्ट्रीय उद्यान में सवारी करने हेतु अनुमति प्राप्त है। प्रत्येक नौका में लगभग १२ से २० व्यक्ति बैठ सकते हैं। यह जल सतह पर धीमी गति से तैरते हैं ताकि हम आसपास का परिदृश्य देख सकें। इन नौकाओं में शौचालय भी हैं जो एक अत्यंत महत्वपूर्ण सुविधा है।
भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान की खाड़ियों का शांत जल वास्तव में लगभग २० से ३० फीट गहरा है। मानसून एवं ज्वार के समय इसकी गहराई में परिवर्तन हो सकता है। प्रमुख खाड़ी लगभग १०० मीटर चौड़ी हैं। खाड़ी के इस जाल के कुछ भाग सँकरे एवं अत्यंत उथले भी हैं।
भारत के अधिकतर राष्ट्रीय उद्यानों में सिंह, बाघ, जंगली हाथी, गेण्डे, हिरण इत्यादि अत्यंत लोकप्रिय हैं। इसके विपरीत भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान का प्रमुख आकर्षण है खारे जल के शक्तिशाली मगरमच्छ। प्रत्येक कुछ मीटर की दूरी पर आपको छोटे-बड़े मगरमच्छों के झुंड सूर्य स्नान करते दृष्टिगोचर होंगे। यही नहीं, खाड़ी, द्वीप, हरे-भरे अप्रवाही जलक्षेत्र, नभचर तथा घने जंगल, जिनके भीतर आप पदयात्रा कर सकते हैं, सभी आपका मन मोह लेने के लिए आतुर व तत्पर प्रतीत होते हैं।
खारे जल के मगरमच्छ
भारत के खारे जल के मगरमच्छों के लिए सर्वोत्तम प्राकृतिक वास की चर्चा की जाए तो कदाचित भितरकनिका से उपयुक्त स्थल नहीं हो सकता। पोषक अप्रवाही जलक्षेत्र, खाड़ी के जल मार्गों का पर्याप्त जाल, नदियां, बंगाल की खाड़ी, यह सभी उनके लिए प्रचुर संसाधन उपलब्ध कराते हैं। भितरकनिका का यदि कोई निकटतम प्रतियोगी है तो वह है सुंदरबन।
सन् १९७० तक ओडिशा की नदी प्रणाली में घड़ियाल, मगर एवं खारे पानी के मगरमच्छ, यह तीनों प्रजातियाँ लगभग विलुप्ति की कगार पर आ गए थे। खारे पानी के १०० से भी कम मगरमच्छों से आज १७०० से भी अधिक मगरमच्छों तक की लंबी यात्रा में डाँगमाल की नदी प्रणाली को चार दशकों का समय लग गया। इनमें से अधिकतर मगरमच्छ खोल-ब्राह्मणी नदी संगम से लेकर भितरकनिका-पथसल नदी संगम तक के क्षेत्र में पाए जाते हैं।
खारे पानी के इन विशाल मगरमच्छों के विषय में कुछ रोचक जानकारी:
- जन्म के समय उनका वजन १०० ग्राम से भी कम होता है। युवावस्था तक पहुंचते पहुंचते उनका वजन लगभग १००० किलोग्राम तक हो जाता है।
- जन्म से समय एक फुट से भी कम लंबे ये मगरमच्छ २० फीट से भी अधिक लंबे हो जाते हैं।
- प्रकृति में उनके प्रथम १० वर्ष उनके लिए कदाचित सर्वाधिक दुष्कर समयावधि होती है क्योंकि नवजात शिशुओं में से केवल १% ही परभक्षियों तथा प्राकृतिक आपदाओं से बचकर जीवित रह पाते हैं।
- वर्षा ऋतु के समय नर एवं मादा मगरमच्छ सहवास करते हैं। अतः यह राष्ट्रीय उद्यान प्रत्येक वर्ष १ मई से ३१ जुलाई तक पर्यटकों के लिए बंद रहता है।
- यद्यपि सम्पूर्ण वर्ष वयस्क मगरमच्छ अपने क्षेत्र हेतु अत्यंत संवेदनशील रहते हैं तथा मृत्युपर्यंत अपने क्षेत्र हेतु लड़ने के लिए तत्पर रहते हैं, तथापि वही मगरमच्छ वर्षा ऋतु में अत्यंत मिलनसार बन जाते हैं।
- किसी भी प्रकार का मांस उनका भोजन है तथा विशाल वयस्क मगरमच्छों की भूख केवल बड़े शिकार द्वारा ही शांत होती है।
- विशाल वयस्क मगरमच्छों के लिए मनुष्य भी उत्तम शिकार है।
- अत्यंत वेग एवं चपलता से खिसकते हुए वे जल एवं तट पर उपस्थित शिकार को तुरंत अपने जबड़े में पकड़ लेते हैं।
- उनके जबड़ों की पकड़-शक्ति अन्य स्तनपायियों से अपेक्षाकृत सर्वाधिक शक्तिशाली मानी जाती है। एक बार अपने जबड़े में उसने किसी शिकार को जकड़ लिया तो या तो शिकार को जीवन से हाथ धोना पड़ता है अथवा कम से कम वह भाग खोना पड़ता है जो जबड़े में फंसा है।
- वे ४ से ५ दर्जन अंडे देते हैं। अंडे देने के लिए वे बहुधा ज्वार के जल सतह से भी ऊपर तक जाते हैं ताकि उनके अंडे सुरक्षित रहें। नर तथा मादा, दोनों मगरमच्छ अंडों से नवजातों के बाहर निकालने तक उनकी सुरक्षा करते हैं। उनके अंडे गोह सरीसृपों का प्रिय भोजन है जो थल पर मगरमच्छों से अधिक चपल होते हैं।
- मगरमच्छ मछली, केकड़े, पक्षी से लेकर जंगली सूअर, हिरण जैसे स्तनपायियों का शिकार करते हैं।
- वहीं चील, बाज तथा कनकैयों जैसे गिद्ध मगरमच्छों के नवजात शिशुओं का शिकार करते हैं।
आलसी
सामान्यतः मगरमच्छ इस क्षेत्र के अन्य वन्य जीवों से अपेक्षाकृत सर्वाधिक आलसी प्राणी हैं। भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान में ५ घंटे की सैर में हमने अनेक मगरमच्छों को तट पर आलसियों के समान अनवरत पड़े हुए सूर्य की ऊष्मा का आनंद उठाते देखा। उन्हे देख ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वे हर प्रकार की चिंता से मुक्त हैं। केवल कुछ गिने-चुने मगरमच्छ जल में तैर रहे थे। कदाचित वे भूखे होंगे। इन मगरमच्छों में दो विशालतम नर मगरमच्छ ऐसे हैं जो इस क्षेत्र के प्रत्येक नौका सैर में दृष्टिगोचर होते हैं। स्थानीय गाइड इन्हे कालिया तथा बालिया के नाम से पुकारते हैं।
खारे जल के मगरमच्छों का प्रजनन केंद्र
हमारे द्वारा अभ्यागमन किए गए द्वीपों में से एक द्वीप पर मगरमच्छ प्रजनन केंद्र है। यहाँ मगरमच्छ के नवजात शिशुओं की देखरेख की जाती है। प्रत्येक वर्ष वय के अनुसार उन्हे पृथक कर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है। उनके जीवन के प्रथम १० वर्ष यहाँ उनकी प्रत्येक आवश्यकता का ध्यान रखा जाता है, जैसे उनकी सुरक्षा, भोजन, चिकित्सकीय ध्यान, वन्य क्षेत्र के अन्य प्राकृतिक आपदाएं इत्यादि। यह क्षेत्र पशु चिकित्सकों के लिए एक अध्ययन केंद्र भी है। १० वर्ष की आयु के पश्चात मगरमच्छों को सावधानी से वन्य क्षेत्र में छोड़ा जाता है। उस समय इस तथ्य का ध्यान रखा जाता है कि किसी आक्रामक वयस्क मगरमच्छ के अधिकृत क्षेत्र का उल्लंघन ना हो।
प्रजनन केंद्र के दर्शन के लिए १० से १५ मिनटों का अतिरिक्त समय लगता है। आप यहाँ विभिन्न वय समूहों के शिशुओं का विकास देख सकते हैं।
समीप ही एक जल कुंड में हमें एक वर्णहीन मगरमच्छ दिखाई दिया जिसे गोरी कहा जाता है। उसकी त्वचा का रंग अत्यंत हल्का, किंचित पीले रंग की आभा लिए हुए था। इसी रंग के कुछ शावक हमें वन्य क्षेत्र में भी दृष्टिगोचर हुए थे।
संग्रहालय
इस द्वीप पर एक छोटा शिक्षाप्रद संग्रहालय है जहां १९.८ फीट का कंकाल रखा है। यह इस राष्ट्रीय उद्यान में प्राकृतिक मृत्यु प्राप्त खारे जल के एक मगरमच्छ का कंकाल है। इसके समीप खड़े होने पर इसके विशाल आकार का आभास होता है। आप इसकी शरीर रचना समीप से जांच सकते हैं। प्रथम दृष्टि में यह एक सटीक यांत्रिक नमूना प्रतीत होता है। सूक्ष्मता से जाँचने पर आप प्रकृति की इस उत्तम रचना की प्रशंसा किए बिना नहीं रहेंगे।
किसी जीवित मगरमच्छ के समीप खड़े होने का साहस तो हममें से किसी में भी नहीं है। वैसे भी, ऐसा साहस करना साक्षात मृत्यु को आमंत्रित करने के समान है। अतः ऐसा करने का विचार भी मस्तिष्क में ना लाएं। अन्यथा कुछ क्षणों का रोमांच जीवन को मृत्यु में परिवर्तित कर सकता है। इस राष्ट्रीय उद्यान के अवलोकन के समय उद्यान अधिकारी इस विषय पर अत्यंत भार देते हैं तथा नौका से उतर कर जल के अत्यंत समीप जाने की अनुमति कदापि नहीं देते। किन्तु किसी मगरमच्छ के समीप खड़े होने की अभिलाषा आप संग्रहालय के इस कंकाल के समीप खड़े होकर अवश्य पूर्ण कर सकते हैं।
इस संग्रहालय में मगर, हिरण, डॉल्फिन इत्यादि के कंकालों के कपाल भी रखे हैं। इनके आकारों की विशालता की उपेक्षा करना संभव नहीं। इसने अतिरिक्त भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान में पाए जाने वाले जीव-जन्तु, पक्षी तथा वनस्पतियों के भी चित्र यहाँ आप देख सकते हैं। संग्रहालय के अवलोकन हेतु औसतन १० से २० मिनटों का समय पर्याप्त है। केवल एक वस्तु की कमतरता का आभास हुआ। उद्यान की सर्व जानकारी प्रदान करते किसी विवरणिका की जिसे पर्यटक अपने साथ ले जा सकें।
जलपान
उद्यान में नौका विहार करते हुए हम जिस समय इस द्वीप पर पहुंचे, हम बहुत थक गए थे। द्वीप पर उपलब्ध पेयजल, शौचालय तथा बैटरी-चालित रिक्शा की सुविधाएं देख मन प्रसन्न हो गया। इनसे भी अधिक मन प्रफुल्लित हुआ ताजे कोमल नारियलों की बिक्री करते ठेलों को देख कर। हमने ताजे नारियल का जल पीकर अपनी क्षुधा शांत की। देह में एक बार फिर स्फूर्ति आ गई। वैसे भी हमारे दोपहर के भोजन को अब भी एक घंटा शेष था।
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जंगल में पदयात्रा
हम द्वीप के जंगल में स्थित घने मैन्ग्रोव में ३ से ४ किलोमीटर तक पैदल चले। हमारी सुविधा के लिए वन विभाग ने स्पष्ट पद-मार्ग निश्चित किए हैं। साथ ही वन विभाग ने गाइड अथवा पथ-प्रदर्शक भी नियुक्त किए हैं जिनके बिना इस जंगल में पद-यात्रा करना लगभग असंभव है। मेरा सुझाव है कि आप इन पगडंडियों में बिना गाइड के जाने की चेष्टा भी ना करें। ये पगडंडियाँ पर्यटकों के लिए अत्यंत भ्रामक सिद्ध हो सकते हैं तथा वे सहज ही उनमें खो सकते हैं।
इन जंगलों में नाग, अजगर, जंगली सूअर, गोह, चितकबरे हिरण तथा कई अन्य जंगली पशुपक्षी हैं। अतः सावधानी बरतें तथा निर्धारित पद-मार्गों पर ही चलें। सर्पों के लिए आँखें खुली रखें। हमें यात्रा के समय सर्प नहीं दिखे, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि आप उनकी उपेक्षा करें।
घने वृक्षों के हरे-भरे छत्र के बीच से छन छन कर आती सूर्य की किरणें, वृक्षों के तनों पर लिपटी लताएं, मार्ग में अनेक छोटे छोटे तालाब तथा तालाब के जल पर थिरकती वृक्षों की परछाई, यह सब अत्यंत स्वप्निल था। इन्हे निहारना स्वयं में एक भावविभोर करने देने वाला अनुभव था। हरे-भरे जंगलों से घिरे तालाब अत्यंत ही अद्भुत दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे। हमने इनमें से अधिकतर तालाबों के समीप रुककर प्रकृति के प्रत्येक तत्व को शांति से आत्मसात किया। प्रकृति के इन अप्रतिम तत्वों के उत्तम सामंजस्य एवं उनके द्वारा बिखेरी माया ने हमारे मन-मस्तिष्क में अमिट छाप छोड़ दी थी। तालाब के जल में अनेक जल-पक्षी थे। उनके अत्यंत समीप पहुंचना संभव नहीं था तथा सूर्य प्रकाश भी पर्याप्त नहीं था। अतः हम उन पक्षियों के छायाचित्र नहीं ले पाए।
गोह
जंगल में सैर करते समय हमें एक गोह अवश्य दिखाई दी थी। मार्ग के किनारे, आलस्य में अविचल पड़ी थी। हमने जैसे ही छायाचित्र लेने की चेष्टा की, वह वहाँ से सरपट भागते हुए घनी झाड़ियों में कहीं लुप्त हो गई।
वर्षा ऋतु में इस मैंग्रोव जंगल के वृक्षों के शीर्ष पर अनेक पक्षी सैकड़ों घोंसले बना देते हैं। किन्तु तब यहाँ पर्यटकों के आने पर मनाही होती है। यही समय है जब इन पक्षियों के विषय में शोध किया जा सकता है तथा उनके अच्छे छायाचित्र लिए जा सकते हैं। इस तथ्य से अनुमान लगाया जा सकता है कि यह उद्यान प्रवासी पक्षियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
शिव मंदिर
जंगल के भीतर विचरण करते हुए, एक नौका घाट से दूसरे घाट पर जाते समय हमें ऊंचे मचान दिखे जिसके ऊपर से जंगल का निरीक्षण किया जाता है। यहाँ से प्रवासी पक्षियों पर भी दृष्टि रखी जाती है।
हमें कान्क्रीट में निर्मित दो तलों की एक विचित्र सी संरचना दृष्टिगोचर हुई जिसमें अनेक चौकोर छिद्र थे। पूछने पर हमारे गाइड ने मुसकुराते हुए उत्तर दिया कि यह प्राचीन काल के राजाओं का शिकार स्थल था। संरचना के भीतर खड़े होकर तथा इन छिद्रों में बंदूक रखकर जानवरों का शिकार किया जाता था। यह संरचना मुझे एक छिद्रयुक्त ठोस पिंजरे के समान प्रतीत हुई। इसी संरचना के पीछे छुपकर राजाओं ने वापिस लौटते अनेक प्रवासी पक्षियों का शिकार किया होगा।
एक उजला चटक हरे रंग का शिव मंदिर अपने रंग के कारण पृथक दृष्टिगोचर हो रहा था। यह एक छोटा मंदिर है तथा इसकी शैली विशाल अमलका लिए अन्य ओडिशा मंदिरों के समान है। उस समय मंदिर बंद था। एक छोटा नंदी बाहर बैठा मानो मंदिर की रखवाली कर रहा था। पिरामिड के आकार के एक गमले में तुलसी का पौधा था।
समीप ही पत्थर का एक और छोटा मंदिर था जो वन दुर्गा को समर्पित था। इस छोटे एवं जीर्ण मंदिर के भीतर अनेक मूर्तियाँ थीं तथा कुछ मूर्तियाँ बाहर भी थीं। यहाँ नियमित पूजा अर्चना के चिन्ह दिखाई पड़ रहे थे। किन्तु दोपहर होने के कारण उस समय वहाँ कोई भी उपस्थित नहीं था।
दुर्लभ रामचिरैया पक्षी
रामचिरैया भारत में सामान्यतः पाए जाने वाले पक्षियों में से एक है। हमने इन्हे सभी स्थानों में देखा है। भितरकनिका के इस घने मैंग्रोव में रामचिरैया की ६ भिन्न प्रजातियाँ पायी जाती हैं। उनमें से ३ प्रजातियों को देखने का हमारा यह प्रथम अवसर था। इस राष्ट्रीय उद्यान के दर्शन का उद्देश्य भी तो यही था। हमें ज्ञात था कि इस उद्यान में इन प्रजातियों के दर्शन हो ही जाते हैं। जब हम हमारी नौका के आरंभ होने की प्रतीक्षा कर रहे थे, तब हमारे गाइड ने हमें इन पक्षियों के कुछ छायाचित्र दिखाए थे जिन्हे उसने अपने मोबाईल द्वारा खींचे थे। उसने हमारी उत्सुकता और भी बढ़ा दी थी।
भूरे पंखों वाली रामचिरैया, काले टोपी वाली रामचिरैया तथा गले की पट्टी वाली रामचिरैया, इन सब के दर्शन कर पाना हमारे लिए सोने पर सुहागा जैसा था। हमने सुना था कि गोवा में जुआरी नदी के मुहाने पर भी इन पक्षियों के दर्शन होते हैं। किन्तु वहाँ किसी संयोजित नियमित नौका सेवा एवं गाइड की आवश्यकता है।
हमारे गाइड की अनुभवी आँखें पक्षियों को दूर से ही ढूंढने में सफल हो रही थीं। जैसे ही हमारे नौकाचालक को वन्य प्राणियों में हमारी रुचि का आभास हुआ, उसने प्रसन्नतापूर्वक नौका को घुमा ली तथा हमें ऐसे स्थान पर ले गया जहां से हमें बेहतर दृश्य प्राप्त हुआ। हमें पक्षियों के उत्तम छायाचित्र लेने में भी सहायता मिली। नौका मोटर-यंत्र चालित होने के कारण कभी भी पूर्णतः शांत नहीं होती। अतः पक्षियों के छायाचित्र लेने के लिए शक्तिशाली लेंस तथा अत्यंत गतिमान कैमरे की आवश्यकता होती है।
पक्षियों के दर्शन का सर्वोत्तम स्थल है खाड़ी के समीप उगे मैंग्रोव की निचली शाखाएं। प्रार्थना करते रहिए कि ये पक्षी पत्तियों के पीछे ना छुप जाएँ अथवा उड़कर कहीं और ना चले जाएँ।
रामचिरैया की अन्य ३ प्रजातियाँ वे थीं जिन्हे हम देश भर में किसी भी जल स्त्रोत के समीप देख सकते हैं, जैसे सामान्य रामचिरैया, श्वेतकंठी रामचिरैया तथा चितकबरी रामचिरैया।
अन्य पक्षी
खाड़ी के साथ साथ नौका विहार करते समय तथा जंगल में पद-यात्रा के समय आप हेरोन व इग्रेट जैसे बगुले, गिद्ध, कनकैया, बाज इत्यादि अनेक पक्षी देख सकते हैं। मैंग्रोव के घने जंगल में सैर करते समय हमें कुछ कठफोड़वों की कूजिका सुनाई दी। वे बौने कठफोड़वे थे। मैंग्रोव वृक्षों के आच्छादन से उत्पन्न छाँव के कारण हम उनके स्वच्छ छायाचित्र नहीं ले पाए।
भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान में सैर का एक विडिओ
आईए आपको हमारे भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान में भ्रमण का एक छोटा सा विडिओ दिखाती हूँ जिसे मैंने मेरे यूट्यूब चैनल में रोपित किया है। यदि आप इस उद्यान का भ्रमण करना चाहते हैं तो वहाँ क्या एवं कैसे देखना है, आप इस विडिओ से जान पाएंगे।
नौका विहार
यहाँ नौका सवारी सुविधाएं उपलब्ध हैं जिसके द्वारा आप बंगाल की खाड़ी से लगे तटों पर पहुँच सकते हैं, बड़े द्वीपों पर जा सकते हैं, यहाँ तक कि उस पार स्थित गांवों तक भी पहुँच सकते हैं। आप की रुचि के अनुसार आप नौका निश्चित कर मन पसंद स्थल के दर्शन कर सकते हैं। समुद्र तथा अप्रतिम समुद्र तटों से भरे गोवा की निवासी होने के कारण हमें तट दर्शन में कदापि रुचि नहीं थी।
इस राष्ट्रीय उद्यान के दर्शन तथा नौका की सवारी करने से पूर्व आपको इन तथ्यों की पूर्व जानकारी होना आवश्यक है:
- नौका पर चढ़ने से पूर्व पंजीकरण करने के लिए प्रत्येक पर्यटक के पास छायाचित्र सहित पहचान पत्र होना आवश्यक है।
- राष्ट्रीय उद्यान में भ्रमण करने के लिए वन विभाग को नाममात्र का शुल्क देना पड़ता है।
- नौका में भ्रमण करने के लिए भिन्न भिन्न शुल्क हैं जो आपके सुनिश्चित स्थल तथा वहाँ तक पहुँचने के लिए लगने वाले समय पर निर्भर है।
- नौकाओं पर शौचालय की अत्यंत मौलिक सुविधाएं उपलब्ध हैं।
- आप नौका पर खाद्य सामग्री ले जा सकते हैं किन्तु प्लास्टिक थैली/बोतल जैसा किसी भी प्रकार का गैर-जैविक कचरा जल में अथवा वन में ना डालें।
- वनीय पशु-पक्षियों को किसी भी प्रकार की खाद्य सामग्री ना दें।
- यदि आपकी नौका सवारी लंबी है तो अपने साथ पर्याप्त पेयजल तथा सिर पर टोपी अवश्य ले लें।
- वनीय पशु-पक्षियों के अवलोकन के लिए दूरबीन सहायक होते हैं।
- नवीनतम शुल्क की जानकारी के लिए यह वेबस्थल देखें।
भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान में कहाँ ठहरें?
हम ‘सैंड एण्ड पेबल्स भितरकनिका जंगल रेसॉर्टस’ में ठहरे थे। राष्ट्रीय उद्यान में भ्रमण करने के लिए यह हमें सर्वोत्तम प्रतीत हुआ। अतः मैं आपको भी इसे ही चुनने की सलाह दूँगी।
यहाँ नौका अवतरण तट के अत्यंत समीप तंबू सदृश आवास सुविधाएं हैं। यहाँ रहते हुए इस वनीय क्षेत्र का भ्रमण अत्यंत आसान हो जाता है। यह एक ग्रामीण क्षेत्र के अंतर्गत आता है जिसके कारण आपको ओडिशा के ग्रामीण जीवन को जानने के लिए गाँव के भीतर भ्रमण का भी अत्यंत ही उत्तम अवसर प्राप्त हो जाता है। हम ने रिज़ॉर्ट के समीप स्थित गाँव के भीतर भ्रमण कर यहाँ के मिट्टी के घरों की भित्तियों पर किये अप्रतिम भित्तिचित्रों को देखा। पशु तथा मानव किस प्रकार एक दूसरे साथ शांतिपूर्वक सहवास करते हैं इसका जीवंत उदाहरण आप यहाँ देख सकते हैं।
पास ही बहती नदी पर बना सेतु प्रातःकाल व संध्याकाल पक्षियों को देखने का सर्वोत्तम स्थल है। हमारे तंबू के समक्ष, अत्यंत समीप एक छोटा सा तालाब था। हमें ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो हम तालाब के किनारे की रह रहे हैं।
प्रत्येक तंबू अत्यंत सुविधाजनक है जिसके भीतर ही शौचालय सुविधा उपलब्ध है। यहाँ के कर्मचारी अत्यंत नम्र तथा पेशा-अनुरूप अनुभवी हैं। स्थानीय होने के कारण अधिकतर कर्मचारी जंगल के भीतर-बाहर से पूर्ण रूप से अवगत हैं। रिज़ॉर्ट के भीतर ही उन्होंने हमें अनेक पक्षी दिखा दिए। भोजन रिज़ॉर्ट में ही पकाया जाता है, वह भी अधिकतर स्थानीय सामग्रियों का प्रयोग कर। प्रकृति के सानिध्य में बैठकर भोजन करना स्वयं में एक आनंदपूर्ण अनुभव है। हमने ‘सैंड एण्ड पेबल्स भितरकनिका जंगल रेसॉर्टस’ में रहते समय पक्षियों की चचहाहट के बीच ताजे भोजन का भरपूर आस्वाद लिया।
हमें बताया गया कि झींगे एवं केकड़े यहाँ के लोकप्रिय स्थानीय व्यंजन हैं। यदि आप मांसाहारी हैं तो इस पर विचार कर सकते हैं।
गाँव में भ्रमण करने के लिए तथा समीप स्थित जगन्नाथ मंदिर के दर्शन करने के लिए आप रिज़ॉर्ट के कर्मचारियों की सहायता ले सकते हैं। मंदिर में आप शिलाओं पर की गई सुंदर कलाकृतियाँ देख सकते हैं।
भितरकनिका एक जैव-विविधता हॉट-स्पॉट क्षेत्र है जिसे आप पूर्ण उत्तरदायित्व के साथ अवलोकन करें एवं जानने का प्रयत्न करें।
हमने ललितगिरी – रत्नागिरी – उदयागिरी बौद्ध त्रिकोण, जाजपुर, पुरी, कोणार्क, भुवनेश्वर, उदयगिरी खँडगिरी गुफ़ाएं, मंगलजोड़ी, रघुराजपुर इत्यादि की भी यात्रा की। इनके संदर्भ में मेरे आगामी संस्करण अवश्य पढ़ें।
प्रकृति के समीप रहना तो हर कोई चाहता है लेकिन नष्ट करने में भी मानव ही सबसे आगे रहता है। आपने इस राष्ट्रीय उद्यान का बहुत ही मनभावक वर्णन किया है। अब तो हमारे घरों के आसपास जो कुछ सालों पहले तक सहज दर्शनीय पक्षी गौरैया, कबूतर, कौवा, तोता…इत्यादि देखने को व इनका कर्णप्रिय चहचहाना सुनने को मिलता था अब शहरों में तो नदारद हो गया है तो पढ़कर, चित्रों में व वीडियो में देखकर ही संतोष करना पड़ेगा. ????????
संजय जी – थोड़े फूल पौधे लगा दीजिये, पक्षी स्वतः ही आ जायेंगे
अनुराधा जी,
ओडिशा के भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान का सुंदर शब्द चित्रण ! आलेख पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि खारे पानी के विशालकाय मगरमच्छो और नाना प्रकार के दुर्लभ पक्षीयों को निहारने का यह एक बहुत ही सुंदर स्थल है । विशालकाय मगर मच्छों का जीवन चक्र भी अचंभित करता हैं । यह भी विडम्बना ही हैं कि इनके पहले दस वर्ष दुष्कर होते हैं और केवल एक प्रतिशत नवजात ही जिवित रह पाते है ! यह अच्छी बात है कि वन विभाग द्वारा इनके देखरेख की समुचित व्यवस्था की जाती हैं ।
सुंदर पठनीय आलेख हेतू साधुवाद !
धन्यवाद प्रदीप जी