आन्ध्र प्रदेश Archives - Inditales https://inditales.com/hindi/category/भारत/आन्ध्र-प्रदेश/ श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Wed, 22 May 2024 05:43:21 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.7.5 अरकु घाटी विशाखापटनम के आकर्षक पर्यटन स्थल https://inditales.com/hindi/araku-ghati-purvi-ghat-andhra-pradesh/ https://inditales.com/hindi/araku-ghati-purvi-ghat-andhra-pradesh/#respond Wed, 22 May 2024 02:30:54 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3612

आंध्र प्रदेश की अरकु घाटी, जिसे ‘पर्वतों की रानी’ भी कहा जाता है, एक आकर्षक पर्वतीय गंतव्य है जो अपने प्राकृतिक सौन्दर्य, हरे-भरे परिदृश्यों, कॉफी के उद्यानों एवं सुखद जलवायु के लिए प्रसिद्ध है। अरकु घाटी भारत की पूर्वी पर्वतीय श्रंखला में स्थित घाटियों का एक भाग है। यह पर्यटकों में अत्यंत लोकप्रिय है, विशेषतः […]

The post अरकु घाटी विशाखापटनम के आकर्षक पर्यटन स्थल appeared first on Inditales.

]]>

आंध्र प्रदेश की अरकु घाटी, जिसे ‘पर्वतों की रानी’ भी कहा जाता है, एक आकर्षक पर्वतीय गंतव्य है जो अपने प्राकृतिक सौन्दर्य, हरे-भरे परिदृश्यों, कॉफी के उद्यानों एवं सुखद जलवायु के लिए प्रसिद्ध है। अरकु घाटी भारत की पूर्वी पर्वतीय श्रंखला में स्थित घाटियों का एक भाग है। यह पर्यटकों में अत्यंत लोकप्रिय है, विशेषतः वे पर्यटक जो विशाखापटनम जैसे निकटवर्ती तटीय नगरों से उष्ण व आर्द्र जलवायु से कुछ काल  मुक्ति पाने के लिए तथा शांतिपूर्ण वातावरण में आनंद के दिवस व्यतीत करने यहाँ आते हैं।

पूर्वी घाटों के आकर्षक परिदृश्य

अरकु एक आकर्षक पर्वतीय गंतव्य है जो अपनी सघन हरियाली, आदिवासी धरोहरों तथा कॉफी के उद्यानों के लिए अत्यंत लोकप्रिय है। इसकी सुंदरता पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है जो नगरीय जीवन की भाग-दौड़ से पलायन करने के लिए तथा कुछ काल  प्रकृति का आनंद उठाने के लिए यहाँ आते हैं।

अरकु घाटी का मनोरम दृश्य
अरकु घाटी का मनोरम दृश्य

अरकु घाटी समुद्र की सतह से लगभग ९१० मीटर(२९८५ फीट) की ऊंचाई पर स्थित है। इसकी ऊंचाई ही यहाँ के सुखद वातावरण एवं मनमोहक परिदृश्यों की कारक है।

अरकु घाटी को घेरते पर्वत एवं पहाड़ियाँ

आंध्र प्रदेश के पूर्वी घाट की पर्वत श्रंखलाओं के मध्य स्थित है अरकु घाटी। इसके चारों ओर स्थित पर्वतों एवं पहाड़ों में प्रमुख हैं:

अनंतगिरी पहाड़ियां
अनंतगिरी पहाड़ियां
  • अनंतगिरी पहाड़ियाँ : अनंतगिरी पहाड़ियाँ अपनी सघन हरियाली, रोमांचक पर्वतारोहण मार्गों एवं विहंगम दृश्य प्रदान करते अवलोकन बिंदुओं के लिए लोकप्रिय है।
  • गालिकोंडा पर्वत : पूर्वी घाट की पर्वत श्रंखलाओं का उच्चतम शिखर गालिकोंडा पर्वत शिखर है। यह पर्वत अरकु घाटी के निकट स्थित है। यहाँ से चारों ओर के अत्यंत लुभावने व विहंगम दृश्य दिखाई पड़ते हैं। रोमांचक पर्वतारोहियों के लिए यह उत्तम पर्वतारोहण का अवसर प्रदान करता है।
  • चापराई पर्वत : यह पर्वत चापराई जलप्रपात के लिए जाना जाता है। यहाँ उपस्थित शांतिपूर्ण वातावरण के चलते यह वनभोजन एवं विश्राम के लिए एक प्रचलित स्थान है।
  • सुन्करिमेट्टा आरक्षित वन : अरकु घाटी के चारों ओर सुन्करिमेट्टा आरक्षित वन है जो विविध वनस्पतियों एवं वनीय प्राणियों से समृद्ध है।
  • बोर्रा गुफाओं की पहाड़ियाँ : जगप्रसिद्ध बोर्रा गुफाएँ जिन पहाड़ियों के भीतर हैं, वे भी अरकु घाटी के समीप ही स्थित हैं।
चापराई झरने
चापराई झरने

अरकु घाटी के आकर्षक पर्यटन स्थल

अरकु घाटी आपको अप्रतिम प्राकृतिक सौन्दर्य, समृद्ध आदिवासी संस्कृति, विविध जल प्रपात तथा स्वादिष्ट स्थानीय व्यंजनों का आस्वाद लेने का सुअवसर प्रदान करती है। यह क्षेत्र विभिन्न स्वदेशीय जनजातीय समूहों द्वारा निवासित है तथा यह उनकी पारंपरिक जीवनशैली एवं हस्तकला को विस्तार से जानने व समझने का अद्वितीय अवसर प्रदान करता है।

चापराई का एक और परिदृश्य
चापराई का एक और परिदृश्य

प्रकृति प्रेमियों, रोमांच व साहसी अभियान प्रेमियों तथा शांत व निर्मल वातावरण का आनंद उठाने के इच्छुकों के लिए यह एक अद्भुत गंतव्य है।

विविध रुचियों के पर्यटकों के लिए अरकु घाटी के आकर्षण :

  • बोर्रा गुफाएं : चूने द्वारा निर्मित ये प्राचीन गुफाएं अप्रतिम आरोही निक्षेपों एवं निलम्बी निक्षेपों (stalactites and stalagmites) द्वारा अलंकृत हैं। गुफाओं के भीतर के भूमिगत अनुभव आपको सम्मोहित कर देंगे।
  • रेलगाड़ी यात्रा : विशाखापटनम से अरकु घाटी तक की अद्भुत सौन्दर्य से परिपूर्ण रेल यात्रा का आनंद उठाइये। अनेक सुरंगों, सेतुओं तथा अप्रतिम परिदृश्यों का दर्शन कराती यह रेलयात्रा स्वयं में एक अद्वितीय अनुभव है।
  • कटिकी जलप्रपात : शिलाखंडों पर से बहती हुई गोस्थानी नदी सुंदर कटिकी झरने का रूप धर कर हमारा मन मोह लेती है। चारों ओर स्थित हरे-भरे वन इसके सौन्दर्य को द्विगुणीत कर देते हैं। प्रकृति प्रेमियों तथा छायाचित्रकारों के लिए यह एक अद्भुत स्थान है।
  • कॉफी उद्यान : अरकु घाटी कॉफी उद्यानों के लिए प्रसिद्ध है। पर्यटक यहाँ स्थित कॉफी उद्यानों में भ्रमण कर सकते हैं तथा कॉफी निर्मिती के विविध चरणों से अवगत हो सकते हैं। स्वाभाविक है कि वे ताजे भुने व पिसे कॉफी के बीजों से निर्मित कॉफी का अद्वितीय आनंद भी उठा सकते हैं।
  • अरकु कॉफी संग्रहालय : अरकु कॉफी संग्रहालय स्वयं में एक अनोखा संग्रहालय है। यह संग्रहालय आदिवासी संग्रहालय के समक्ष स्थित है। आप यहाँ विभिन्न प्रकार के कॉफी चॉकलेटों का आस्वाद ले सकते हैं तथा उन्हे यहाँ की स्मृति के रूप में अपने साथ ले जा सकते हैं।
  • आदिवासी संग्रहालय : यदि जनजातीय संस्कृति को जानने एवं समझने में आपकी रुचि हो तो आप इस आदिवासी संग्रहालय का अवलोकन कर सकते हैं जो इस क्षेत्र के स्वदेशीय जनजातियों की पारंपरिक जीवनशैली, उनकी भिन्न भिन्न प्रथाओं तथा कलाओं के विषय में विस्तृत जानकारी प्रदान करता है।
  • पद्मापुरम उद्यान : यह एक सुंदर उद्यान है जहाँ आप विविध प्रकार के दुर्लभ तथा असाधारण पौधे देख सकते हैं। यह स्थान पारिवारिक सैर अथवा शांतिपूर्ण परिभ्रमण के लिए उत्तम स्थल है। यह उद्यान वृक्षों के ऊपर निर्मित विश्राम कुटियाओं के लिए भी लोकप्रिय है।
  • अनंतगिरी पहाड़ियाँ : अरकु घाटी के निकट स्थित अनंतगिरी पहाड़ियाँ विहंगम परिदृश्य एवं शांत वातावरण प्रदान करते हैं। ये पहाड़ियाँ रोमांचक पर्वतारोहण के लिए भी प्रसिद्ध हैं।
  • अनंतगिरी झरना : अरकु से लगभग ३० किलोमीटर के अंतराल पर स्थित यह एक सुंदर झरना है। विशाल शिलाखंडों के मध्य से बहते इस झरने की सुंदरता में मानसून में कई गुना वृद्धि हो जाती है।
  • चापराई : अरकु से लगभग १५ किलोमीटर के अंतर पर स्थित चापराई नदी एक बारहमासी जलधारा है जो शिलाखंडों के मध्य स्थित प्राकृतिक मार्गों से उमड़ती हुई अप्रतिम दृश्य प्रस्तुत करती है।
  • मत्स्यगुंडम : अरकु से लगभग ५० किलोमीटर के अंतर पर स्थित यह जलधारा विशाल शिलाखंडों के मध्य से बहती है। समीप स्थित शिव मंदिर की पृष्ठभूमि में इस नदी का सौन्दर्य प्रफुल्लित हो उठता है।
  • मधु उत्पादन : स्थानीय निवासियों ने मधु अथवा शहद उत्पादन के आधुनिक तकनीकों को सफलता पूर्वक किस प्रकार अपनाया है, आप इसकी जानकारी यहाँ प्राप्त कर सकते हैं।
  • शिमिलिगुडा रेलवे स्थानक : अरकु से १५ किलोमीटर के अंतर पर स्थित यह रेलवे स्थानक भारत का सर्वोच्च ऊंचाई पर स्थित ब्रॉड गेज अथवा बड़ी लाइन का रेलवे स्थानक है। समुद्र तल से इसकी ऊंचाई लगभग ९९६ मीटर है। यह स्थानक अरकु से विशाखापटनम के मध्य स्थित रेल पथ पर स्थित है।
  • मसाले : इस क्षेत्र में कुछ मसालों की खेती की जाती है। आप उन मसाला उद्यानों में भ्रमण कर सकते हैं, उनका स्वाद चख सकते हैं तथा चाहें तो खरीद सकते हैं।
  • बांस में पकाया हुआ मुर्गा : बांस में पकाया हुआ मुर्गा अथवा bamboo chicken यहाँ का स्थानीय व्यंजन है। वैध रूप से इसे केवल यहाँ से स्थानीय आदिवासी ही पका सकते हैं। यदि आप मांसाहारी हैं तो आप इसका आस्वाद ले सकते हैं।
  • डुम्ब्रीगुडा झरना : यह इस घाटी का सर्वाधिक भ्रमणित एवं लोकप्रिय जलप्रपात है। १५ किलोमीटर के अंतराल पर स्थित यह झरना पडेरु जाने के मार्ग पर स्थित है। इस झरने की विशेषता है वे असंख्य जलधाराएँ, जो विशाल शिलाखंडों पर से झर झर बहती हुई मन मोह लेती हैं। इसे चापराई जलप्रपात भी कहते हैं।
  • गाँव : अरकु में अनेक ऐसे गाँव हैं जो अपने विविध कलाक्षेत्रों के लिए प्रसिद्ध हैं। उनमें प्रमुख हैं, कुम्हारी के लिए मडागाडा (८ कि. मि.), लाख के आभूषणों के लिए चौम्पि (५ कि. मि.) तथा बांस की कलाकृतियों के लिए मुशीरीगुडा(१० कि. मि.)।
  • मोदमंबा मंदिर : अरकु से लगभग ४५ किलोमीटर के अंतर पर स्थित हुकूमपेट में यह मंदिर स्थित है जो स्थानीय जनजातियों का प्रार्थना स्थल है।

बोर्रा गुफाएं

बोर्रा गुफाएं प्राकृतिक अचंभा हैं जो लाखों वर्षों के भूगर्भीय गतिविधियों के कारण निर्मित हुए हैं। अपनी जटिल संरचनाओं से इन गुफाओं ने पर्यटकों को सम्मोहित कर रखा है। ये गुफाएं अप्रतिम आरोही निक्षेपों, निलम्बी निक्षेपों (stalactites and stalagmites) तथा अन्य अनोखी संरचनाओं द्वारा अलंकृत हैं। गुफा के भीतर अनेक कक्ष एवं गलियारे हैं जहाँ आप प्रकृति द्वारा रचित कलाकृतियों के अवलोकन का आनंद उठा सकते हैं। कक्षों के भीतर का मंद प्रकाश सम्पूर्ण परिदृश्य को अधिक रहस्यमयी तथा आपके अनुभव को अधिक कुतूहलमय बना देता है। सम्पूर्ण वातावरण एक दृश्य आनंद हो जाता है। ये सब इस स्थान को वैज्ञानिक शोधकारों एवं छायाचित्रकारों के लिए एक उत्तम गंतव्य बना देते हैं।

मैंने इससे पूर्व बोर्रा गुफाओं पर एक स्वतंत्र यात्रा संस्मरण प्रकाशित किया है। बोर्रा गुफाएँ – अरकू घाटी की छेद वाली गुफा – आन्ध्र प्रदेश का पर्यटन. आप यह संस्मरण अवश्य पढ़िये।

बोर्रा गुफाएं आदिवासी संग्रहालय से लगभग २५ किलोमीटर के अंतर पर स्थित हैं। ये विशाखापटनम से लगभग ९२ किलोमीटर के अंतर पर हैं।

अरकु घाटी तक रेल यात्रा

अरकु पहुँचने के लिए विशाखापटनम से निकलती एक प्रातःकालीन रेलगाड़ी सर्वोत्तम साधन है जो आपको अनेक भूमिगत मार्गों से ले जाती है। इस मार्ग के एक ओर घाटियाँ हैं तथा दूसरी ओर पर्वत। इस पूर्वी तटीय रेलवे मार्ग का निर्माण सन् १९५८ में भारत-जापान सहकार्यता के अंतर्गत हिंदुस्तान कन्स्ट्रक्शन कंपनी ने किया था।

मैंने इससे पूर्व अरकु घाटी तक रेल यात्रा पर एक स्वतंत्र यात्रा संस्मरण प्रकाशित किया है। Train ride to Araku Valley in Eastern Ghats आप यह संस्मरण अवश्य पढ़िये।

कटिकी जलप्रपात

सघन वनीय प्रदेश की गोद में छुपा हुआ कटिकी जलप्रपात एक शांत स्थल है जो हमारे रोम रोम को जीवंत कर देता है। सघन हरियाली के मध्य ऊँचे शिलाखंडों पर से बहती हुई गोस्थानी नदी कटिकी जलप्रपात का रूप धर कर हमारा मन मोह लेने को तत्पर रहती है। सम्पूर्ण वातावरण सुखद हो जाता है जो मानसिक विश्रांती एवं चिंतन-मनन के लिए सर्वोत्तम सुअवसर होता है। जलप्रपात तक पहुँचने के लिए वन के मध्य से पर्वतारोहण करना पड़ता है जो सम्पूर्ण अनुभव को एक रोमांच प्रदान करता है। कटिकी जलप्रपात का प्राकृतिक परिदृश्य एवं शांत वातावरण प्रकृति प्रेमियों के लिए उसे एक उत्तम पर्यटन गंतव्य बनाता है।

मैंने अपनी कटिकी जलप्रपात भ्रमण का एक विडिओ बनाया था जिसे आपके साथ साझा कर रही हूँ। अवश्य देखिए, Araku Valley Waterfalls – Katiki Waterfall & Dumbriguda Waterfall

पडेरु कॉफी उद्यान

समुद्र तल से ३००० फीट की ऊंचाई पर स्थित पडेरु अपने कॉफी उद्यानों के लिए लोकप्रिय है। पडेरु अरकु घाटी से किंचित दूर, एक भिन्न दिशा में स्थित है। कॉफी जैसे सुगंधित पेय पदार्थों में रुचि रखने वाले पर्यटकों के लिए यह एक उत्तम गंतव्य है। यहाँ आप कॉफी के बीजों की खेती से लेकर बीजों को भूनने तक, कॉफी उत्पादन के सभी चरणों का विस्तृत अवलोकन कर सकते हैं। कॉफी के हरेभरे उद्यानों में निर्देशित भ्रमण आयोजित किये जाते हैं जहाँ आप भिन्न भिन्न प्रकार के कॉफी बीजों के विषय में विस्तृत ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। कॉफी के बीजों के उत्पादन के विविध चरणों एवं कॉफी बनाने की विभिन्न पद्धतियों के विषय में भी जानकारी ले सकते हैं। कॉफी के हरेभरे उद्यान के मध्य बैठकर ताजे भुने बीजों से निर्मित कॉफी का आनंद स्वयं में एक अद्भुत अनुभव होता है जो हमारी स्वाद कलिकाओं एवं रसेंद्रियों को प्रस्फुरित करता है।

अरकु घाटी में स्थित सभी सड़क मार्गों पर भी आप कॉफी के उद्यान देख सकते हैं।

पडेरु आदिवासी संग्रहालय से लगभग ४५ किलोमीटर तथा विशाखापटनम से लगभग १२० किलोमीटर के अंतर पर स्थित है किन्तु यह विशाखापटनम-अरकु मार्ग पर स्थित नहीं है।

अरकु कॉफी संग्रहालय

अरकु के आदिवासी संग्रहालय के समक्ष आदिवासी कलाकृतियों से अलंकृत एक लौह द्वार के ऊपर ‘अरकु घाटी कॉफी हाउस’ लिखा है। उसके नीचे लिखे उपशीर्षक हैं, कॉफी पेय, कॉफी पाउडर, चॉकलेट इत्यादि। सम्पूर्णा दीर्घा एक लघु संग्रहालय है जहाँ इथियोपिया में हुए जन्म से लेकर इस घाटी तक की कॉफी की यात्रा का प्रदर्शन किया गया है।

मैंने इससे पूर्व अरकु घाटी के कॉफी संग्रहालय एवं विक्री केंद्र की मेरी यात्रा पर एक स्वतंत्र यात्रा संस्मरण प्रकाशित किया है। Cherish the Coffee Chocolates at Araku आप यह संस्मरण अवश्य पढ़िये।

अरकु घाटी आदिवासी संग्रहालय

अरकु आदिवासी संग्रहालय अरकु के उन स्थानीय निवासियों की समृद्ध संस्कृति, परंपराओं तथा कलाशैलियों के विषय में सूक्ष्म अंतर्दृष्टि प्रदान करता है जो इस क्षेत्र को अपनी भूमि मानते हैं। इस संग्रहालय में आदिवासी कलाकृतियाँ, वस्त्र एवं परिधान, आभूषण, औजार आदि प्रदर्शित हैं जो उनके जनजातीय जीवनशैली का चित्रण करते हैं। इस संग्रहालय से आपको उनकी परंपराओं, अनुष्ठानों, मान्यताओं तथा प्रथाओं के विषय में ज्ञान प्राप्त करने का सुअवसर प्राप्त होगा। यह संग्रहालय आपको इस क्षेत्र के विविध सांस्कृतिक धरोहरों को सम्मान देने एवं प्रशंसित करने के लिए बाध्य कर देगा।

अरकु आदिवासी संग्रहालय मेरे हरिथा हिल रेसॉर्ट (मयूरी) से केवल ५०० मीटर के अंतर पर स्थित था। यह विश्रामगृह आंध्र प्रदेश पर्यटन विकास निगम द्वारा संचालित है।

मैंने Araku Tribal Museum की मेरी यात्रा पर एक स्वतंत्र यात्रा संस्मरण प्रकाशित किया है। आप यह संस्मरण अवश्य पढ़िये।

पद्मापुरम उद्यान

पद्मापुरम वनस्पति उद्यान हमें नगरी परिवेश की भागदौड़ से मुक्त कर रंगबिरंगे पेड़-पौधे एवं शांत हरियाली के विश्व में ले जाता है। इस उद्यान में विविध प्रकार के पुष्पों, पौधों एवं वृक्षों के दर्शन का अवसर प्राप्त होता है जिनमें अनेक दुर्लभ प्रजातियाँ भी सम्मिलित हैं।

पद्मपुर उद्यान की पर्यटक क्रियाएं
पद्मपुर उद्यान की पर्यटक क्रियाएं

उद्यान के भीतर छोटी रेलगाड़ी चलती है जो नन्हे-मुन्ने पर्यटकों के साथ साथ सम्पूर्ण परिवार के लिए अत्यंत आनंददायक अनुभव है। उद्यान के भीतर उत्तम रखरखाव किया गया है। सभी पगडंडियाँ सुव्यवस्थित एवं स्वच्छ हैं। चारों ओर से आती पक्षियों की चहचहाहट चित्त को शांतता प्रदान करती है।

अनंतगिरी पहाड़ियाँ

पर्वतों पर स्थित रेसॉर्टस अथवा विश्रामगृह सुखद जलवायु, शीतल वायु, अप्रतिम परिदृश्य तथा चित्त में शांति प्रदान करते हैं जो हमारे नगरी परिवेश में अब दुर्लभ हो चुके हैं। पर्वतारोहण में रुचि रखने वालों के लिए भी अनंतगिरी पहाड़ियाँ अप्रतिम परिदृश्य एवं हरेभरे वनों के दर्शन का अवसर प्रदान करती हैं। पर्वतीय मार्गों पर अवलोकन बिन्दु हैं जहाँ से चारों ओर के पर्वतों एवं घाटियों से अलंकृत मनभावन परिदृश्यों के विहंगम दृश्य दिखाई देते हैं। यहाँ का शांतिपूर्ण वातावरण तथा नवजीवन प्रदान करने वाली वायु अनंतगिरी पहाड़ियों को प्रकृति प्रेमियों, पक्षी अवलोकन प्रेमियों तथा ध्यान-साधन करने वालों के लिए उत्तम गंतव्य बनाती हैं।

मधु उत्पादन

अरकु घाटी के मार्ग के दोनों ओर स्थित खेतों में आप नीले रंग के अनेक बक्से देखेंगे। ये बक्से वास्तव में मधु उत्पादन की लघु जैव इकाईयाँ हैं। ये स्थानीय कृषकों का अतिरिक्त व्यवसाय है जो अतिरिक्त आय प्रदान करने में सहायक होता है। साथ ही मधु उत्पादन के महत्वपूर्ण कार्य को स्थानीय स्तर पर निष्पन्न करने में भी सहायक होता है। हमने वहाँ से मधु की एक बोतल क्रय की जो अन्य केंद्रों से अपेक्षाकृत निम्न दर पर उपलब्ध थी। यहाँ मुझे इस सुगम लघु उद्योग के विषय में जानकारी प्राप्त हुई जिसे पर्यावरण के अनुकूल रीति से कम लागत में किया जा सकता है।

मैंने Honey Making at Araku Valley – Small scale business पर एक स्वतंत्र शिक्षाप्रद संस्करण प्रकाशित किया। उसे अवश्य पढ़ें।

मसाले

अरकु घाटी के मार्गों के दोनों ओर आप खेत देख सकते है जहाँ काली मिर्च, इलायची तथा दालचीनी जैसे मसालों की खेती की जाती है। इस क्षेत्र की जलवायु ऐसे मसलों की खेती के लिए अत्यंत अनुकूल होते हैं। यदि आपको मसाले उद्यानों में भ्रमण करने में रुचि हो तो आप कम से कम एक उद्यान में अपना भ्रमण पूर्वनियोजित कर सकते हैं।

बांस में पकाया हुआ माँस (बाम्बू चिकन)

बाम्बू चिकन अथवा बांस के भीतर पकाया हुआ चिकन अरकु घाटी का एक आदिवासी व्यंजन है। स्थानीय व्यंजनों में इसे अत्यंत स्वादिष्ट माना जाता है। ध्यान रखे कि इस व्यंजन के लिए लगने वाले बांस को काटने की तथा इस पारंपरिक व्यंजन में उसका प्रयोग करने की अनुमति केवल यहाँ के आदिवासी जनजाति को ही है। आप यहाँ के स्थानीय निवासियों को ठेला गाड़ी में यह व्यंजन बनाकर विक्री करते देख सकते हैं। इस व्यंजन को धीमी आंच में लंबे समय तक पकाया जाता है। इसलिए आपको प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है। आप चाहे तो किसी पर्यटन आकर्षण के अवलोकन से पूर्व इस व्यंजन का आदेश दे दें। भ्रमण पूर्ण होने तक यह व्यंजन आपके लिए सज्ज हो जाएगा। यदि आप मांसाहारी हैं तो आप इसका आस्वाद ले सकते हैं।

मैंने बांस के भीतर इस प्रकार चिकन पकाने की अनोखी प्रक्रिया पर एक स्वतंत्र संस्करण लिखा है, Araku Valley Bamboo Chicken Unique Tribal Delicacy.

डुम्ब्रीगुडा झरना/ चापराई झरना

बोर्रा गुहा और डुम्ब्रीगुडा झरना/ चापराई झरना
बोर्रा गुहा और डुम्ब्रीगुडा झरना/ चापराई झरना

यह जलप्रपात सर्वाधिक भ्रमण किये गए जलप्रपातों में से एक है। अरकु नगरी से लगभग १५ किलोमीटर के अंतर पर स्थित यह जलप्रपात पडेरु के मार्ग पर स्थित है। इस जलप्रपात में जलधारा विशाल शैल संरचनाओं के मध्य से बहती है। इसे चापराई झरना भी कहते हैं। बारहमासी जलधारा प्राकृतिक शैलखंडों के मध्य से बहती हुई अत्यंत सुंदर दृश्य प्रस्तुत करती है। चारों ओर का परिदृश्य इसकी सुंदरता में अनेक गुना वृद्धि कर देता है। उथला जल होने के कारण जल में प्रवेश करने की अभिलाषा उमड़ पड़ती है किन्तु ध्यान रखें, काई के कारण शैलखंड फिलसाऊ हो सकते हैं।

परिवहन के साधन

  • सड़क मार्ग : अरकु घाटी पहुँचने के लिए विशाखापटनम तथा विजयनगरम से सुगम सड़क मार्ग उपलब्ध हैं। इन मार्गों का एक अन्य आकर्षण है, पूर्वी घाटों के अप्रतिम परिदृश्य।
  • रेल मार्ग : अरकु घाटी एक्स्प्रेस विशाखापटनम को अरकु से जोड़ती है। यह रेल मार्ग सुंदर परिदृश्यों से परिपूर्ण यात्रा के लिए अत्यंत लोकप्रिय है। इस रेल मार्ग पर रेलगाड़ी अनेक सुरंगों, सेतुओं तथा अप्रतिम परिदृश्यों का दर्शन कराती हुई हमें जीवन भर का सुंदर अनुभव प्रदान करती है।
  • वायु मार्ग : अरकु घाटी पहुँचने के लिए निकटतम विमानतल विशाखापटनम अंतर्राष्ट्रीय विमानतल है। यहाँ से यात्री सड़क मार्ग द्वारा अरकु घाटी पहुँच सकते हैं।

सुरक्षा संबंधी सावधानियाँ :

यद्यपि अरकु एक सुरक्षित पर्यटन स्थल है, तथापि कुछ सावधानियों पर लक्ष्य केंद्रित करना उचित होगा, जैसे

  • ऋतु के अनुसार पूर्व तैयारी
  • स्थानीय प्रथाएं : स्थानीय आदिवासी जनजातियों से व्यवहार करते समय उनकी परंपराओं एवं मान्यताओं को सम्मान प्रदान करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
  • वन्यजीवन एवं प्रकृति : स्थानीय वन्य प्राणियों से सतर्क रहें। उनसे सुरक्षित अंतर बनाए रखना आवश्यक है।
  • स्वास्थ्य सेवा : आप अपनी सभी आवश्यक व मूलभूत औषधियाँ तथा प्रथमोपचार के साधन अपने साथ रखें। अरकु में सीमित चिकित्सीय सुविधाएं उपलब्ध हैं।

पाककला संबंधी अनुभव

स्थानीय परंपराओं तथा स्थानीय सामग्रियों को गौरवान्वित करते हुए अरकु में अनेक ऐसे व्यंजन बनाए जाते हैं जिनका आस्वाद आपके लिए नवीन अनुभव हो सकता है। सामान्यतः अरकु के स्थानीय व्यंजन अपेक्षाकृत अधिक तीखे होते हैं। इनके अतिरिक्त बाम्बू चिकन, कॉफी, चॉकलेट आदि के विषय में मैंने पूर्व में ही बताया है। आप अपनी रुचि के अनुसार इन व्यंजनों का आस्वाद ले सकते हैं। आपके लिए कुछ अनोखे स्थानीय व्यंजन इस प्रकार हैं:

  • पच्चि पुलुसु : यह एक खट्टा, मसाले युक्त रसम है जिसकी मुख्य सामग्री में इमली, हरी मिर्च, विभिन्न मसाले आदि सम्मिलित हैं। भाप निकलते भात के साथ इसका स्वाद अप्रतिम होता है। यह एक लोकप्रिय व्यंजन है जिसका प्रयोग सांभर से पूर्व किया जाता है।
  • रागी संगती : रागी एक पौष्टिक अनाज है जिसे इस क्षेत्र में मुख्य आहार के रूप में खाया जाता है। इससे रागी संगती अथवा रागी मुद्दे बनाया जाता है जिसे भात के स्थान पर रसम अथवा सांभर के साथ खाया जाता है। यह अत्यंत स्वास्थ्य वर्धक होता है तथा स्थानीय निवासियों में अत्यंत लोकप्रिय है।
  • बोन्गुलो चिकन : भिन्न भिन्न मसालों, प्याज एवं टमाटरों के साथ एक विशेष प्रकार से चिकन पकाया जाता है। इसे भात अथवा चपाती/ भाकरी के साथ खाया जाता है।

अरकु घाटी के कुछ विश्रामगृहों एवं जलपानगृहों में विशेष अनुरोध पर यहाँ के पारंपरिक आदिवासी व्यंजन बनाए जाते हैं जिसे स्थानीय निवासी ही बनाते हैं।

अरकु घाटी भ्रमण के लिए सर्वोत्तम काल

यूँ तो अरकु घाटी की जलवायु वर्ष भर अत्यंत सुखद रहती है। इसलिए वर्ष भर में कभी भी आप अरकु घाटी का भ्रमण कर सकते हैं। फिर भी, अरकु घाटी भ्रमण के लिए सर्वोत्तम कालावधि ऑक्टोबर से मार्च मास होता है जब यहाँ का वातावरण सर्वाधिक सुखद एवं शीतल हो जाता है।

अरकु घाटी में उपोष्णकटिबंधीय उच्चभूमि जलवायु (Subtropical highland climate) रहती है जिसका कारण है पूर्वी घाटों की ऊंचाई। इस कारण यहाँ का तापमान माध्यम रहता है तथा यहाँ की वायु निर्मल एवं ऊर्जा प्रदायक रहती है।

ऋतुएँ

शीत ऋतु (ऑक्टोबर से फरवरी तक)

यह ऋतुकाल अरकु घाटी के भ्रमण के लिए सर्वोत्तम काल होता है। इस काल में यहाँ की जलवायु शीतल एवं सुखद होती है। यहाँ का तापमान १० डिग्री सेंटीग्रेड से २० डिग्री सेंटीग्रेड तक रहता है। यह वातावरण पर्यटन स्थलों के भ्रमण तथा बाह्य क्रियाकलापों के लिए सर्वोत्तम होता है जब आप उष्णता की असुविधाओं से मुक्त होकर भ्रमण कर सकते हैं।

वसंत ऋतु (मार्च से मई तक)

भले ही वसंत ऋतु में अरकु घाटी का तापमान शीत ऋतु से अपेक्षाकृत अधिक रहता है, फिर भी इस ऋतु में यहाँ की जलवायु सुखद ही रहती है। इस ऋतु में यहाँ का तापमान १५ डिग्री सेंटीग्रेड से २५ डिग्री सेंटीग्रेड तक रहता है। यह ऋतु उन पर्यटकों के लिए उत्तम है जिन्हे किंचित उष्ण जलवायु में भ्रमण करना भाता है तथा जो इस ऋतु में प्रफुल्लित होते पर्णसमूह व पुष्पों का आनंद उठाना चाहते हैं।

वर्षा ऋतु ( जून से सितंबर तक)  

अरकु घाटी में मानसून काल में मध्यम वर्षा होती है। चारों ओर का परिदृश्य हराभरा हो जाता है। मानसून काल में यदा-कदा अत्यधिक वर्षा यात्रा नियोजनों एवं बाह्य क्रियाकलापों को बाधित कर सकती है। इस ऋतु में यहाँ का तापमान १८ डिग्री सेंटीग्रेड से २८ डिग्री सेंटीग्रेड तक रहता है।

अरकु घाटी में लोकप्रिय एवं बजट के अनुकूल विश्रामगृह सुविधाएं

अरकु घाटी में विभिन्न स्तर के विश्रामगृह हैं जिनका चयन पर्यटक अपनी रुचि तथा बजट के अनुसार कर सकते हैं। अति-विलासी रेसॉर्ट से लेकर बजट के अनुकूल होटल व विश्रामगृह तक, पर्यटकों के लिए एक आनंदप्रद प्रवास हेतु प्रत्येक स्तर के विकल्प उपलब्ध हैं। ये सभी विकल्प पर्यटकों को सभी आधुनिक सुविधाएँ प्रदान करने के साथ साथ प्रकृति के सानिध्य में कुछ क्षण शांतिपूर्वक व्यतीत करने के सुअवसर प्रदान करते हैं।

काष्ठ के पुल
काष्ठ के पुल

यात्रा एवं प्रवास नियोजित करने से पूर्व आप इन विश्रामगृह सुविधाओं की उपलब्धता, शुल्क एवं आवास की गुणवत्ता जांच लें क्योंकि काल के साथ इनमें परिवर्तन आ सकता है।

हरिथा वैली रेसॉर्ट : यह आंध्र प्रदेश पर्यटन विकास निगम द्वारा संचालित एक अतिथिगृह है जहाँ अरकु घाटी के प्राकृतिक सौन्दर्य की पृष्ठभूमि में सुविधापूर्ण अतिथिकक्ष उपलब्ध हैं। यह अतिथिगृह अप्रतिम परिदृश्यों एवं लगभग सभी पर्यटन आकर्षणों से निकटता के लिए पर्यटकों में अत्यंत लोकप्रिय है। इसके परिसर में  आदिवासी सांस्कृतिक कलाओं का प्रदर्शन भी आयोजित किया जाता है। इन प्रदर्शनों  के विषय में पूर्व जानकारी अवश्य प्राप्त कर लें। अरकु घाटी भ्रमणकाल में हम यहीं ठहरे थे।

हरिथा मयूरी हिल रेसॉर्ट : आंध्र प्रदेश पर्यटन विकास निगम द्वारा संचालित हरिथा श्रंखला से एक अन्य विकल्प है हरिथा मयूरी हिल रेसॉर्ट। यह अतिथिगृह एक पहाड़ी के शीर्ष पर स्थित है जिसके चलते यहाँ से घाटी का अप्रतिम विहंगम दृश्य दिखाई पड़ता है। यहाँ के अतिथिकक्षों में मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हैं किन्तु सभी कक्ष सुखकर हैं।

इनके अतिरिक्त, अतिथिगृहों के कुछ अन्य विकल्प हैं, रुद्र फार्म्स, ऊषोदय रेसॉर्ट, वेदिका ऑरचर्ड्स, दि हिडन वैली रेसॉर्ट, साई प्रिया रेसॉर्ट, समन्वी इंटरनेशनल होटल, कॉफी विहार रेसॉर्ट, हिल्स एण्ड वैली रेसॉर्ट आदि।

यात्रा नियोजन से पूर्व इन विकल्पों के विषय में पूर्व जानकारी प्राप्त कर लें। अब तक कदाचित कुछ अन्य नवीन विकल्प भी उपलब्ध हो गए होंगे।

स्थानीय परिवहन के सामान्य साधन

ऑटोरिक्शा तथा टैक्सी : निकट स्थित पर्यटन आकर्षणों के अवलोकन के लिए सर्वाधिक सुगम साधन हैं, ऑटोरिक्शा तथा टैक्सी। इन साधनों द्वारा भ्रमण आरंभ करने से पूर्व भाड़े का मोल-भाव कर लें। अन्यथा चालक से मीटर द्वारा भाड़ा लेने के लिए कहें। टैक्सी सेवाएं किंचित महंगी हैं किन्तु ये सुगम तथा निजी विकल्प हैं।

स्थानीय बस सेवाएं : अरकु घाटी में स्थानीय बस सेवा का सुलभ जाल है जो घाटी के सभी पर्यटन गंतव्यों से सुगमता से जुड़ा हुआ है। भले ही बसों की पुनरावृत्तियाँ सीमित हैं, यह भ्रमण का एक सस्ता साधन है। अपने अतिथिगृह से अथवा स्थानीय सूचनाकेंद्रों से इन बसों की समयसारिणी तथा मार्गों की पूर्व जानकारी प्राप्त कर लें।

स्थानीय परिदर्शक : अरकु घाटी के भ्रमण के लिए किसी स्थानीय परिदर्शक की सहायता लें जिसे घाटी के विषय में पर्याप्त जानकारी हो तथा जो आपको घाटी के पर्यटन आकर्षणों, स्थानीय प्रथाओं तथा वहाँ के इतिहास की जानकारी प्रदान कर सके।

निजी पर्यटन : अरकु घाटी भ्रमण के लिए निजी पर्यटन का नियोजन किया जा सकता है। इसमें परिवहन, परिदर्शक आदि सभी समाहित होते हैं। भ्रमण संबंधी सभी आवश्यकताओं का उत्तरदायित्व उन पर सौंपते हुए आप निश्चिंत होकर भ्रमण कर सकते हैं।

आदिवासी सांस्कृतिक आयोजन एवं प्रदर्शन

अरकु घाटी अपने समृद्ध आदिवासी संस्कृतियों एवं परंपराओं के लिए जाना जाता है। विविध सांस्कृतिक आयोजनों तथा प्रदर्शनों के द्वारा वे अपनी संस्कृति, प्रथाएं, मान्यताएं तथा आदिवासी कलाएँ हमारे समक्ष प्रस्तुत करते हैं। इनके द्वारा पर्यटकों को मनोरंजन के साथ साथ यहाँ की सभ्यता को जानने व समझने का अवसर प्राप्त होता है। यहाँ आयोजित कुछ सांस्कृतिक आयोजन हैं:

  • आदिवासी नृत्य प्रदर्शन : अरकु घाटी के अधिकतर आदिवासी समुदायों की विशेष नृत्य शैलियाँ होती हैं जिन्हे उनकी संस्कृति का अभिन्न अंग माना जाता है। वे पारंपरिक वेशभूषा धारण कर पारंपरिक संगीत की थाप पर लयबद्ध नृत्यों द्वारा अपनी संस्कृति व परंपराओं का प्रदर्शन करते हैं।
  • आदिवासी कलाकृतियों की प्रदर्शनी : इस क्षेत्र के आदिवासी जनजाति कलाकार विविध हस्तकलाओं में निपुण होते हैं, जैसे कुम्हारी, बुनाई, बांस की कलाकृतियाँ इत्यादि। आप सीधे इन कारीगरों से ही उनके द्वारा बनाए गए अनोखे हस्तकलाकृतियों को क्रय कर सकते हैं।
  • स्थानीय हाट एवं मेले
  • उत्सव : यहाँ विविध उत्सव आयोजित किए जाते हैं जिनमें विभिन्न अनुष्ठान, नृत्य, संगीत तथा सामूहिक भोज सम्मिलित होते हैं। यहाँ वे अपने समुदाय के सांस्कृतिक धरोहर को प्रदर्शित करते हैं।

अरकु घाटी के प्रमुख आदिवासी समुदाय

  • गोंड : गोंड समुदाय इस क्षेत्र का सबसे बड़ा तथा सबसे प्रमुख समुदाय है। यह समुदाय अपने कलात्मक कौशल के लिए प्रसिद्ध है, जैसे चित्रकारी, संगीत तथा नृत्य। गोंड कला शैली जटिल व सूक्ष्म आकृतियों तथा चटक रंगों के लिए जानी जाती है। उनकी कलाशैली में प्रकृति से उनका अटूट संबंध स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।
  • कोंडाडोरा : कोंडाडोरा भी इस क्षेत्र का एक प्रमुख आदिवासी समुदाय है। यह समुदाय कृषि उद्योग के लिए जाना जाता है। यह समुदाय ज्वार-बाजरा जैसे अनाज, दालें तथा भिन्न भिन्न भाजियों की खेती करता है। भूमि से उनका प्रगाढ़ नाता है। इस समुदाय के सदस्य स्थानीय भूभाग के अनुरूप कृषि तकनीकी में निपुण हैं।
  • वाल्मीकि : वाल्मीकि समुदाय के सदस्य कुम्हारी, बाँस कलाकृतियाँ तथा बुनाई जैसी हस्तकला में निपुण होते हैं। उनके द्वारा निर्मित टोकरियों व चटाइयों की बुनाई अत्यंत जटिल होती है। उनके द्वारा कृत वस्त्र व परिधान आदि अत्यंत पारंपरिक होते हैं।
  • डोरा : डोरा समुदाय मूलतः कृषि उद्योग पर निर्भर होता है जो सामान्यतः धान, ज्वार-बाजरा तथा दालें जैसे अनाजों की खेती करते हैं। इस समुदाय की स्वयं की विशेष सामाजिक संरचना तथा एक विशिष्ट पारंपरिक शासन व्यवस्था है। वे अपनी सांस्कृतिक परंपराओं को सँजोये हुए हैं जो उनके परिधानों एवं विशिष्ट उत्सवों के माध्यम से स्पष्ट परिलक्षित होता है।
  • बगाटा : बगाटा जनजाति अपने पारंपरिक नृत्य शैलियों के लिए जाना जाता है। नृत्य उनके सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का एक अभिन्न अंग है। इस समुदाय के सदस्य कुम्हारी, बुनाई तथा अन्य आदिवासी कलाक्षेत्रों में निपुण होते हैं। वनों से उनका प्रगाढ़ नाता है तथा अपनी जीविका के लिए वे उन पर निर्भर रहते हैं।
  • सवारा : सवारा जनजाति अपनी विशेष भाषाशैली तथा सांस्कृतिक प्रथाओं के लिए जाने जाते हैं। प्रकृति से उनका घनिष्ठ संबंध है। वे स्थानांतरणीय कृषि शैली के अनुसार खेती करते हैं।

अरकु घाटी के प्रत्येक जनजाति की स्वयं की विशिष्ट शैलियाँ तथा सांस्कृतिक प्रथाएं होती हैं। अरकु घाटी क्षेत्र की सांस्कृतिक विविधता में प्रत्येक जनजाति का महत्वपूर्ण सहयोग है।

विशेष जनजाति उत्सव एवं पर्व

  • जतरा आदिवासी उत्सव : अरकु क्षेत्र के निवासी अपनी विशेष परंपराओं, प्रथाओं तथा प्रकृति के संग उनके प्रगाढ़ संबंध का उत्सव मनाते हैं। विविध रंगों से परिपूर्ण परिधानों से सज्ज हुए नर्तकों का पारंपरिक नृत्य प्रदर्शन, पारंपरिक संगीत, अनुष्ठान, सामूहिक सहभोज आदि इस उत्सव के विविध अंग होते हैं।
  • बीजों की बुआई तथा कटाई का उत्सव : ये यहाँ के आदिवासी जनजाति समुदायों के अत्यंत रोचक उत्सव हैं जहाँ वे अपने पारंपरिक अनुष्ठानों तथा नृत्यों के माध्यम से प्रकृति के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं तथा भरपूर फसल उत्पादन के लिए आशीष मांगते हैं।
  • कोलाटम नृत्य उत्सव : डंडियों को टकराते हुए तथा लयबद्ध चाल करते हुए यह नृत्य किया जाता है। इस नृत्य द्वारा वे अपने नृत्य कौशल का प्रदर्शन करते हैं तथा मैत्रीपूर्ण प्रतियोगिताएं आयोजित करते हैं।
  • आदिवासी नूतन वर्ष उत्सव : अरकु घाटी क्षेत्र के विभिन्न जनजाति समुदायों के स्वयं के नूतन वर्ष उत्सव होते हैं जहाँ वे अपने समुदाय विशेष अनुष्ठान, नृत्य तथा उत्सव सभाएं आयोजित करते हैं।

सभी आदिवासी उत्सव सामान्यतः उनके स्वयं के तिथि पंचांग तथा विशेष परंपराओं के अनुसार आयोजित किए जाते हैं। इन उत्सवों के दर्शन करते समय हमें इन प्रथाओं व परंपराओं का सम्मान करना चाहिए। उदार चित्त एवं उनसे सीखने की अभिलाषा रखते हुए हमें इन उत्सवों में भाग लेना चाहिए।

अरकु नगरी

अरकु घाटी का मूल नागरी केंद्र यहाँ के प्राकृतिक सौन्दर्य एवं सांस्कृतिक समृद्धि का द्वार है। कोत्तवलसा-किरंदुल रेल मार्ग पर अरकु रेल स्थानक एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। पूर्वी घाटों से होकर जाती हुई यह रेल यात्रा अप्रतिम दृश्यों से परिपूर्ण है। अरकु घाटी के सौन्दर्य का अनुभव प्राप्त करने का यह प्रथम सोपान है।

अरकु नगर में अनेक स्थानीय हाट हैं जहाँ से आप ताजे उपज, आदिवासी हस्तकलाकृतियाँ तथा अनेक ऐसी स्मारिकाएं क्रय कर सकते हैं। स्थानीय व्यंजनों का अनुभव लेने तथा पारंपरिक वस्तुएं क्रय करने के लिए ये उत्तम स्थान हैं।

अरकु घाटी के पर्वतारोहण उपयुक्त पर्वत शिखर

अरकु घाटी तथा इसके आसपास के क्षेत्र पर्वतारोहण प्रेमियों को उत्तम पर्वतारोहण अनुभव प्रदान करते हैं। रोमांचक पर्वतारोहण अनुभव के साथ साथ पर्यटक यहाँ के प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण पर्वतों तथा घाटी के अप्रतिम परिदृश्यों के सौन्दर्य का आनंद उठा सकते हैं। अरकु घाटी के कुछ पर्वत शिखर तथा आसपास की कुछ पहाड़ियाँ, पर्यटक जिन पर पर्वतारोहण का विचार कर सकते हैं, वे हैं:

गलिकोंडा पर्वत

गलिकोंडा पूर्वी घाटों का सर्वोच्च शिखर है। इन पर पर्वतारोहण करना चुनौतियों से परिपूर्ण अनुभव है। यह रोहण मार्ग सघन वनों तथा तीव्र आरोहणों से होकर जाता है जिसके पश्चात शिखर से आपको अप्रतिम दृश्यलाभ प्राप्त होता है।

अनंतगिरी पर्वत

अनंतगिरी पर्वत पर अनेक पर्वतारोहण पगडंडियाँ हैं जो अनुभवहीन तथा अनुभावशाली, दोनों प्रकार के रोहणकर्ताओं के लिए उपयुक्त हैं। ये मार्ग कॉफी के उद्यानों तथा सघन हरियाली से होकर जाते हैं तथा घाटी के मनभावन परिदृश्यों का आनंद प्रदान करते हैं।

चापराई जलप्रपात की पहाड़ी

चापराई पर्वतारोहण मार्ग अपेक्षाकृत एक सुगम मार्ग है जो अप्रतिम परिदृश्यों से परिपूर्ण है। यह मार्ग अंततः एक जलप्रपात तक ले जाता है। इस पर्वतारोहण का पारितोषिक है, झरने के आसपास का शांत वातावरण तथा प्राकृतिक तरणपुष्कर में शीतलता का अनुभव।

बोर्रा गुफाओं की पहाड़ी

बोर्रा गुफाओं के आसपास भी पर्वतारोहण मार्ग हैं जो हमें सघन वनों एवं चट्टानी भूभागों से ले जाते हैं। ये मार्ग हमें अनोखे भूवैज्ञानिक संरचनाओं को निकट से निहारने का अवसर देते हैं। साथ ही चारों ओर के परिदृश्यों के अवलोकन का सौभाग्य भी प्रदान करते हैं।

मत्स्यगुंडम

अरकु घाटी से लगभग ५० किलोमीटर दूर स्थित मत्स्यगुंडम पर्वतों से घिरा एक सुंदर सरोवर है। पदभ्रमण करते हुए इस सरोवर तक पहुँचा जा सकता है। यह मार्ग हमें वनों तथा विस्तृत तृणभूमि से ले जाता है जो एक शांतिपूर्ण वातावरण तथा असामान्य मार्गों में भ्रमण करने का रोमांचक अनुभव देता है।

पद्मापुरम उद्यान की पहाड़ी

इस पहाड़ी पर सुगम व आसान पर्वतारोहण आयोजित किए जाए हैं। मार्ग पर अनेक अवलोकन बिन्दु हैं जहाँ से घाटी के अप्रतिम दृश्य दिखाई पड़ते हैं। रोहण आरंभ करने से पूर्व अथवा पर्वतारोहण के पश्चात आप रमणीय पद्मपुरम उद्यान में भ्रमण का भी आनंद उठा सकते हैं।

पर्वतारोहण शारीरिक व मानसिक रूप से एक चुनौतीपूर्ण उद्यम है। पर्वतारोहण की योजना बनाने से पूर्व स्वयं के शारीरिक व मानसिक परिस्थिति एवं अनेक अन्य कारकों का पूर्व आकलन आवश्यक है, जैसे हमारी शारीरिक योग्यता, पर्वतारोहण मार्ग की परिस्थिति व कठिनाई का स्तर, जलवायु की परिस्थिति, सुरक्षा सावधानियाँ आदि। पर्वतारोहण से पूर्ण किसी स्थानीय आधिकारिक केंद्र से उत्तम रोहण मार्गों, आवश्यक अनुमति पत्रों तथा अन्य सुरक्षा आवश्यकताओं के विषय में पूर्व जानकारी लेना उत्तम होगा।

पर्वतारोहण उपयुक्त परिधान व जूते पहनें। पर्वतारोहण के लिए आवश्यक उपकरण साथ ले जाएँ। पेयजल, नाश्ते तथा प्राथमिक चिकित्सा योग्य औषधियाँ आदि साथ ले जाना ना भूलें। प्रकृति के संरक्षण के लिए यह आवश्यक है कि पर्वतारोहण करते हुए आप अपना कोई भी चिन्ह पीछे ना छोड़ें।

अरकु घाटी क्षेत्र में पर्वतारोहण करना एक फलदायक अनुभव है जो हमें प्रकृति को समझने व उससे संलग्न होने में सहायता करता है। पूर्वी घाटों के अप्रतिम सौन्दर्य का आनंद उठाने का अद्वितीय अवसर प्रदान करता है।

प्रमुख भारतीय नगरों से अरकु घाटी तक पहुँचने के सर्वोत्तम साधन

अरकु नगर में विमानतल नहीं है। अतः यहाँ तक पहुँचने के लिए रेल मार्ग तथा सड़क मार्ग का संयोग आवश्यक है। भारत के प्रमुख नगरों से यहाँ तक पहुँचने के लिए कुछ विकल्प इस प्रकार हैं:

अरकु घाटी से निकटतम प्रमुख नगर विशाखापटनम अथवा वैजाग है। अतः इसे अरकु घाटी के लिए आरंभिक बिन्दु माना जाता है। विशाखापटनम से रेलमार्ग अथवा सड़क मार्ग द्वारा अरकु तक पहुँचा जा सकता है।

रेलमार्ग : विशाखापटनम से अरकु तक का रेल मार्ग मनमोहक परिदृश्यों के लिए लोकप्रिय है। विशाखापटनम एवं अरकु घाटी के मध्य दो लोकप्रिय रेलवे विकल्प हैं, अरकु एक्स्प्रेस तथा किरंदुल पैसेंजर। यह यात्रा ४ से ५ घंटों में पूर्ण होती है तथा हमें पूर्वी घाटों के चित्ताकर्षक परिदृश्यों का दर्शन कराती है।

सड़क मार्ग : आप सड़क मार्ग द्वारा भी विशाखापटनम से अरकु नगर तक पहुँच सकते हैं। विशाखापटनम से अरकु नगर की दूरी लगभग १२० किलोमीटर है। सड़क मार्ग द्वारा विशाखापटनम से अरकु नगर पहुँचने के लिए ३ से ४ घंटों का समय व्यतीत होता है जो सड़क एवं यातायात की परिस्थिति पर निर्भर करता है।

अरकु घाटी के कृषि उत्पाद

कॉफी : अरकु घाटी कॉफी उद्यानों के लिए लोकप्रिय है। इस क्षेत्र की विशेष जलवायु तथा समुद्र स्तर से इसकी ऊंचाई उन मापदंडों में से हैं जो इस क्षेत्र को कॉफी उत्पादन के लिए उत्तम बनाती हैं। यहाँ उच्च गुणवत्ता युक्त अरबिका एवं रोबस्टा कॉफी के बीजों की उपज होती है।

चाय : अरकु घाटी में चाय के उद्यान भी बहुतायत में उपस्थित हैं। यहाँ की शीतल एवं आर्द्र जलवायु चाय के पौधों के लिए सर्वोत्तम होती है। अरकु घाटी में भिन्न भिन्न प्रकार के चाय पत्तियों की उपज होती है।

मसाले : अरकु घाटी में विविध प्रकार के मसालों की खेती की जाती है। उनमें काली मिर्च, इलायची, दालचीनी आदि प्रमुख हैं। ये ऐसे मसाले हैं जो यहाँ की जलवायु में उत्तम उपज देते हैं।

अरकु घाटी की यात्रा के स्मृति चिन्ह

अरकु घाटी की यात्रा की स्मृति में यदि आप कुछ स्मृति चिन्ह अथवा स्मारिकाएं क्रय करना चाहते हैं तो आप इनमें से कुछ अवश्य अपने संग ले जा सकते हैं:

कॉफी, चाय, कॉफी चॉकलेट

अरकु घाटी कॉफी एवं चाय के उद्यानों के लिए लोकप्रिय है। आप यहाँ के उद्यानों में उगे तथा स्थानीय रूप से संसाधित कॉफी के बीज एवं चाय की पत्तियां क्रय कर सकते हैं। कॉफी एवं चाय के प्रेमियों के लिए ये उत्तम उपहार हो सकते हैं।

आदिवासी हस्तकलाकृतियाँ   

अरकु क्षेत्र अनेक आदिवासी समुदायों की भूमि है। यहाँ के भिन्न भिन्न जनजातीय समुदाय अपनी विशेष समृद्ध कला शैलियों एवं परंपराओं के लिए प्रसिद्ध हैं। आप उनके द्वारा निर्मित हस्तकला की विविध वस्तुएं ले जा सकते हैं, जैसे पारंपरिक आभूषण, कुम्हारी की वस्तुएं, बुनी हुई टोकरियाँ, बाँस द्वारा निर्मित कलाकृतियाँ आदि।

मसाले

अरकु घाटी में काली मिर्च, इलायची, दालचीनी जैसे मसाले उगाए जाते हैं। स्थानीय उद्यानों में उगे तथा स्थानीय रूप से संसाधित मसालों के स्वाद तथा सुगंध अतुलनीय होते हैं।

स्थानीय वस्त्र

अरकु घाटी के निवासियों के पारंपरिक आदिवासी वस्त्र एवं परिधान विशेष होते हैं। भिन्न भिन्न समुदायों की  विशेष सज्जा शैलियाँ होती हैं। आप उनमें से कुछ क्रय कर अपने साथ स्मारिका के रूप में ले जा सकते हैं। इससे स्थानीय कारीगरों को भी लाभ पहुँचेगा।

मधु

अरकु घाटी प्राकृतिक रूप से प्राप्त मधु के लिए लोकप्रिय है। यह मधु स्वाद में उत्तम तथा स्वास्थ्य के लिए पौष्टिक होता है। यह आपके मित्रों व परिजनों के लिए एक उत्तम उपहार हो सकता है।

स्थानीय कलाकृतियाँ

स्थानीय कारीगरों द्वारा कृत चित्र, मूर्तियाँ तथा अन्य कलाकृतियाँ भी उत्तम स्मृतियों के रूप में क्रय की जा सकती हैं। ये इस क्षेत्र के कला कौशल को बाह्य विश्व तक ले जाने में सहायक होंगे।

इन वस्तुओं को क्रय करने से पूर्व इनकी प्रामाणिकता अवश्य निश्चित कर लें कि ये वास्तव में अरकु घाटी क्षेत्र में स्थानीय रूप से निर्मित हैं, इनकी विक्री स्थानीय वित्तीय व्यवस्था में सहायक होंगे तथा इन्हे क्रय करने से स्थानीय कारीगरों को इसका लाभ पहुँचेगा। स्थानीय रूप से निर्मित स्मारिकाएं आपकी यात्रा की उत्तम स्मृतियों को चिरकालीन रखती हैं, साथ ही स्थानीय कारीगरों को रोजगार भी उपलब्ध कराती हैं।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post अरकु घाटी विशाखापटनम के आकर्षक पर्यटन स्थल appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/araku-ghati-purvi-ghat-andhra-pradesh/feed/ 0 3612
रंगबिरंगे कोंडापल्ली खिलौने एवं कोंडापल्ली दुर्ग https://inditales.com/hindi/kondapalli-gram-khilaune-durg-andhra-pradesh/ https://inditales.com/hindi/kondapalli-gram-khilaune-durg-andhra-pradesh/#respond Wed, 18 Oct 2023 02:30:17 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3288

आन्ध्र प्रदेश के विजयवाड़ा से कुछ किलोमीटर दूर स्थित एक छोटा सा गाँव – कोंडापल्ली। कृष्णा नदी के तट पर बसा यह ऐतिहासिक स्थल एक ओर अपने प्राचीन कोंडापल्ली दुर्ग के लिए प्रसिद्ध है तो दूसरी ओर लकड़ी के रंगबिरंगे पारंपरिक खिलौनों, गुड्डे-गुड़ियों एवं देवी-देवताओं की काष्ठ प्रतिमाओं के लिए जाना जाता है। एक पहाड़ी […]

The post रंगबिरंगे कोंडापल्ली खिलौने एवं कोंडापल्ली दुर्ग appeared first on Inditales.

]]>

आन्ध्र प्रदेश के विजयवाड़ा से कुछ किलोमीटर दूर स्थित एक छोटा सा गाँव – कोंडापल्ली। कृष्णा नदी के तट पर बसा यह ऐतिहासिक स्थल एक ओर अपने प्राचीन कोंडापल्ली दुर्ग के लिए प्रसिद्ध है तो दूसरी ओर लकड़ी के रंगबिरंगे पारंपरिक खिलौनों, गुड्डे-गुड़ियों एवं देवी-देवताओं की काष्ठ प्रतिमाओं के लिए जाना जाता है।

एक पहाड़ी के शीर्ष पर स्थित विशाल कोंडापल्ली दुर्ग इस क्षेत्र का संरक्षण करता प्रतीत होता है। अपने चरम काल में यह एक विशाल भव्य दुर्ग रहा होगा। काल के साथ कोंडापल्ली क्षेत्र में अनेक परिवर्तन हुए। यद्यपि यह दुर्ग अब भी भव्यता से परिपूर्ण है, तथापि गाँव पूर्णतः परिवर्तित हो चुका है। किन्तु कोंडापल्ली की एक परम्परा अब भी अखंड अनवरत रूप से जीवंत है। वह है, पारंपरिक कारीगरों द्वारा निर्मित कोंडापल्ली खिलौने।

कोंडापल्ली खिलौने

आपने अपने जीवन में कभी ना कभी लकड़ी की वह गुड़िया अवश्य देखी होगी जो अपना सर, वक्ष एवं कमर हिलाते हुए नृत्य करती है। जी हाँ, वह गुड़िया आंध्र प्रदेश के इस छोटे से गाँव, कोंडापल्ली की विशेष कलाशैली की एक अद्भुत देन है। जब आप कोंडापल्ली भ्रमण के लिए आयेंगे तो आप यहाँ के सभी कारीगरों को अपने घरों के भीतर अनेक प्रकार के काष्ठ खिलौने बनाते देखेंगे। मैंने इसलिए ऐसा कहा क्योंकि वे सभी साधारणतः अपने द्वार खुले रखकर अपने कार्य में तल्लीन हो जाते हैं।

कोंडापल्ली गुडिया खिलौने
कोंडापल्ली गुडिया खिलौने

किसी भी कारीगर के घर को ढूँढना अत्यंत आसान है। वे अपने घरों की भित्तियों पर सुन्दर आकृतियाँ चित्रित करते हैं। साधारणतः लाल रंग की भित्तियों पर श्वेत कोलम अथवा रंगोली द्वारा सुन्दर आकृतियाँ बनाते हैं। द्वारों एवं झरोखों की सीमाओं को विशेष बनाते हुए सुन्दर किनारियाँ चित्रित करते हैं। घरों एवं दुकानों के समक्ष लकड़ी की बैलगाड़ी जैसे पारंपरिक खिलौने प्रदर्शित करते हैं। कुछ बैलगाड़ियों पर अनाज के बोरे रखकर उन्हें परिवहन के साधन के रूप में भी प्रदर्शित करते हैं। उन्हें देख मुझे दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में प्रदर्शित सिन्धु घाटी सभ्यता स्थलों से प्राप्त मिट्टी की बैलगाड़ियों का स्मरण हो आया।

कोंडापल्ली गाँव के दृश्य
कोंडापल्ली गाँव के दृश्य

जब हम कोंडापल्ली गाँव में भ्रमण कर रहे थे तब हमने शुभ्र श्वेत रंग के कई उत्कीर्णित चौखट देखे जिन्हें सूर्य की धूप में सुखाने के लिए फैलाया हुआ था। यह उन्हें विविध चटक रंगों में रंगने से पूर्व की प्रक्रिया थी।

घरों के समक्ष स्थित आँगन में बैठकर घर के स्त्री एवं पुरुष पूर्ण एकाग्रता एवं धैर्यता से एक एक खिलौनों को विविध रंगों से रंगते हैं। मार्ग पर चलते लोगों से अनभिज्ञ, यहाँ तक कि ठहर कर उनके कार्यकौशल को निहारते लोगों से भी अबाधित, वे अपने कार्य में मग्न रहते हैं। उनकी एकाग्रता एवं तन्मयता देख हृदय उनके प्रति आदर भाव से भर जाता है।

नवरात्रि के लिए विशेष खिलौने

कोंडापल्ली गाँव के कारीगर नवरात्रि पर्व के लिए विशेष खिलौनों की रचना करते हैं। दक्षिण भारत में प्रचलित प्रथा के अनुसार नवरात्रि के नौ दिवस घर घर में एक संकल्पना के अंतर्गत विविध प्रकार के खिलौने रीतसर प्रदर्शित किये जाते हैं। बहुधा विशेष रूप से निर्मित बहुतलीय आलों पर ये खिलौने रखे जाते हैं। इस प्रदर्शनी को गोलू अथवा बोम्माला कोलुवु कहते हैं। आन्ध्र प्रदेश में ये खिलौने मकर संक्रांति के पर्व का भी महत्वपूर्ण भाग होते हैं। मेरे अनुमान से, इन कारीगरों द्वारा निर्मित कलाकृतियों का प्रयोग किसी ना किसी रूप में भारत के लगभग सभी उत्सवों में किया जाता है।

रंग बिरंगे खिलौने
रंग बिरंगे खिलौने

हमने इन कारीगरों द्वारा गढ़ी गयी गणेश, कृष्ण, दशावतार तथा कई अन्य देवी-देवताओं की कलाकृतियाँ देखीं। यहाँ निर्मित नर्तनशीला गुड़िया कोंडापल्ली की विशेष देन है। इन गुड़ियों को तंजावुर गुड़ियाँ भी कहते हैं। ये कारीगर विविध पक्षियों एवं पशुओं के आकार के खिलौने भी बनाते हैं। हमने एक ग्रामीण जनजीवन में प्रयुक्त लगभग सभी वस्तुओं की प्रतिकृतियाँ यहाँ खिलौनों के रूप में देखीं। ग्रामीण व्यवसायों से सम्बंधित खिलौने देखे, जैसे कुंभार, लुहार, किसान, भाजी विक्रेता आदि। कार, जीप जैसे आधुनिक खिलौने भी देखे। हमने भारत के राष्ट्रीय चिन्ह की प्रतिकृति भी देखी जिसे काष्ठ को उत्कीर्णित कर बनाया गया था। आपने इस कलाकृति को किसी ना किसी सरकारी कार्यालय में अवश्य देखा होगा। यदि आपको कोई विशेष खिलौना अथवा लकड़ी की भेंट वस्तु बनवानी हो तो आप उनसे निवेदन कर सकते हैं।

कोंडापल्ली ग्राम एवं कोंडापल्ली खिलौनों को सन् २००६ में भौगोलिक संकेत (GI अथवा Geographical Indicator Tag) प्रदान किया गया है। इसका अर्थ है कि ये कोंडापल्ली विशेष खिलौने केवल इसी गाँव में निर्मित किये जा सकते हैं। भौगोलिक संकेत एक प्रतीक है जो किसी उत्पाद को मुख्य रूप से उसके मूल स्थान से जोड़ता है। यह संकेत उत्पाद की विशेषता भी दर्शाता है।

कोंडापल्ली खिलौनों का इतिहास

ऐसा माना जाता है कि ये कारीगर कुछ सदियों पूर्व राजस्थान से यहाँ आये तथा यहीं बस गए। आपको स्मरण होगा, मैंने राजस्थान की सैकड़ों वर्ष प्राचीन कावड़ कलाकृतियों पर एक संस्करण लिखा था। विभिन्न धार्मिक एवं ऐतिहासिक लोककथाओं का चित्रण करते ये कावड़ भी लकड़ी द्वारा निर्मित किये जाते हैं तथा इन पर भी विविध चटक रंगों का प्रयोग किया जाता है।

काष्ठ में बने गणपति
काष्ठ में बने गणपति

कोंडापल्ली के ये दक्ष कारीगर स्वयं को ऋषि मुक्तर्षी के वंशज मानते हैं। मुक्तर्षी को भगवान शिव ने कला एवं शिल्प कौशल प्रदान किया था। इस प्रकार मुक्तर्षी कारीगर समुदायों के मार्गदर्शक ऋषि माने जाते हैं। स्थानीय भाषा में इन कारीगरों को नाकरशालु कहते हैं। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार इन्हें आर्यक्षत्रिय कहा जाता है। इनका उल्लेख ब्रह्माण्ड पुराण में किया गया है। ये कुशल कारीगर खिलौने के अतिरिक्त मंदिरों एवं देवी-देवताओं के लिए रथों एवं वाहनों की भी रचना करते हैं।

तंजौर गुडिया
तंजौर गुडिया

मैं कारीगरों के निकट बैठकर उन्हें खिलौने गढ़ते देखने लगी। उन्होंने मुझे बताया कि इन खिलौने में प्रयुक्त मृदु लकड़ी अथवा काष्ठ स्थानीय पहाड़ी क्षेत्रों से ही उपलब्ध हो जाती हैं। इस काष्ठ को तेल्ला पोनिकी अथवा पोनुकू कहते हैं। ये कम भार के काष्ठ होते हैं जिसके कारण उनसे निर्मित खिलौने चाहे जितने भी बड़े हों, उनका भार भी कम ही रहता है।

इन काष्ठ के लट्ठों को सर्वप्रथम सुखाया जाता है। इसके पश्चात उनसे खिलौनों के भिन्न भिन्न अंश गढ़े जाते हैं। तत्पश्चात इन अंशों को पारंपरिक गोंद का प्रयोग कर एक दूसरे से जोड़ा जाता है। यह गोंद इमली के बीजों का चूरा एवं लकड़ी का बुरादा मिलाकर तैयार किया जाता है। इन खिलौनों को रंगने से पूर्व उन पर श्वेत चूने की परत चढ़ाई जाती है। पुरातन काल में इन खिलौनों को रंगने के लिए वनस्पति जन्य रंगों का प्रयोग किया जाता था। किन्तु अब बाजारों में व्यवसायिक रूप से उपलब्ध जल-रंगों (Water Colour), तैल-रंगों अथवा एनामेल रंगों का प्रयोग किया जा रहा है।

इस समुदाय का पुरुष वर्ग सामान्यतः लकड़ी काटने, उन्हें आकार देने तथा उन्हें उत्कीर्णित करने का कार्य करते हैं, वहीं स्त्रियाँ उन्हें रंगने का दायित्व बड़ी सुन्दरता से निभाती हैं। इसी प्रकार का कार्य विभाजन इससे पूर्व मैंने छत्तीसगढ़ के कला एवं शिल्प ग्राम एकताल में भी देखा था जो धातु शिल्प कला के कारीगरों का गाँव है।

यदि आप इन खिलौनों को क्रय करना चाहे तो आप इन्हें लेपाक्षी जैसे राज्य हस्तकला विक्रय भण्डार से ले सकते हैं। आप इन्हें इन्टरनेट द्वारा भी ले सकते हैं।

कोंडापल्ली दुर्ग

कोंडापल्ली अपने वैभवशाली दुर्ग के लिये भी लोकप्रिय है। कोंडापल्ली खिलौनों एवं कारीगरों के हस्तकौशल के अवलोकन के साथ आप इस दुर्ग का भी दर्शन कर सकते हैं जो समीप ही स्थित है। पूर्व में यह क्षेत्र पश्चिमी चालुक्य वंश एवं वारंगल के काकतिया वंश के आधीन था।

कोंडापल्ली दुर्ग
कोंडापल्ली दुर्ग

१४वीं शताब्दी के इस दुर्ग का निर्माण मसुनुरी नायक ने करवाया था। मसुनुरी नायक के पतन के पश्चात रेड्डी राजाओं, अनवेमा रेड्डी एवं पेद्दा कोमाटी वेमा रेड्डी ने दुर्ग पर अधिपत्य स्थापित किया। कालांतर में यह दुर्ग क्रमशः ओडिशा के गजपति राजाओं, विजयनगर के कृष्णदेवराय, तत्पश्चात गोलकोंडा के कुतुब शाही के अधिकार क्षेत्र में आया।

कोंडापल्ली दुर्ग का मानचित्र
कोंडापल्ली दुर्ग का मानचित्र

फ्रांसीसियों ने भी क्षणिक काल के लिए इस पर अधिपत्य स्थापित किया था जिसके पश्चात यह दुर्ग अंततः अंग्रेजों के अधिकार क्षेत्र में आया। अंग्रेजों ने इस दुर्ग में अपने सैनिकों के लिए एक प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना की।

यह दुर्ग अब खंडित स्थिति में है। किन्तु यह अब भी अपने वैभवशाली भूतकाल की गौरव गाथा कहने में पूर्णतः सक्षम है। यह दुर्ग युक्तिपूर्ण रूप से, विशेषतः गोलकोंडा से आते एवं पूर्वी समुद्र तट की ओर जाते प्राचीन व्यापार मार्ग पर स्थित था। इसी कारण इसमें कदापि अचरज नहीं है कि इस क्षेत्र के आसपास कारीगरों के अनेक गाँव बसे एवं फले-फूले हैं। इस मार्ग द्वारा वे आसानी से अपनी कलाकृतियों का व्यापार करते थे।

आमसभा की दीवारों पर पुराने चित्र
आमसभा की दीवारों पर पुराने चित्र

इस दुर्ग के भीतर एक आमसभा कक्ष, गजशाला, हाट क्षेत्र, अस्त्र-शस्त्र शाला, कारागृह तथा कुछ धार्मिक स्थल हैं। इस दुर्ग का तोरण युक्त कक्ष पर्यटकों में अत्यंत लोकप्रिय है। इस कक्ष की भित्तियों पर पुरातन छायाचित्रों को प्रदर्शित किया गया है।

जहाँ तक उत्कीर्णन का प्रश्न है, मैंने केवल कुछ ही स्थानों पर उत्तम उत्कीर्णनों के अवशेष देखे। कोंडापल्ली दुर्ग की खंडित होती भित्तियों पर अब पौधे एवं वृक्ष उगने लग गए हैं।

अपनी कोंडापल्ली यात्रा के समय आप कनकदुर्गा मंदिर, उन्दावल्ली की अखंडित शैल गुफाओं, नृत्य में तल्लीन नर्तकों का कुचिपुड़ी ग्राम आदि के भी दर्शन कर सकते हैं। अथवा कृष्ण नदी के तट पर पदभ्रमण कर सकते हैं।

कोंडापल्ली ग्राम के भ्रमण के लिए कुछ यात्रा सुझाव

कोंडापल्ली ग्राम विजयवाड़ा से उत्तर-पश्चिमी दिशा में लगभग २० किलोमीटर दूर स्थित है। आप यहाँ सड़क मार्ग द्वारा सुगमता से पहुँच सकते हैं। विजयवाड़ा देश के सभी क्षेत्रों से वायुमार्ग, रेलमार्ग तथा सड़कमार्ग द्वारा सुचारू रूप से संलग्न है।

मैंने कोंडापल्ली ग्राम तथा कोंडापल्ली दुर्ग, दोनों स्थलों पर किसी भी प्रकार का जलपानगृह अथवा भोजनालय नहीं देखा। अतः आप अपने साथ आवश्यक खाद्य पदार्थ एवं पेय सामग्री अवश्य रखें।

दुर्ग के अवलोकन के लिए लगभग ४५ मिनट का समय पर्याप्त है।

जहाँ तक कोंडापल्ली ग्राम का प्रश्न है, अवलोकन समयावधि आपकी रूचि पर निर्भर करती है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post रंगबिरंगे कोंडापल्ली खिलौने एवं कोंडापल्ली दुर्ग appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/kondapalli-gram-khilaune-durg-andhra-pradesh/feed/ 0 3288
आईएनएस कुर्सुरा पनडुब्बी – विशाखपट्नम् के रामकृष्ण समुद्रतट पर https://inditales.com/hindi/ins-kurusara-pandubbi-vishakhapatnam/ https://inditales.com/hindi/ins-kurusara-pandubbi-vishakhapatnam/#respond Wed, 21 Sep 2022 02:30:52 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2802

आईएनएस कुर्सुरा, भारतीय नौसेना की एक सेवामुक्त पनडुब्बी है, जिसने सन् १९७१ में भारत-पाकिस्तान युद्ध में भाग लिया था। यह आज एक विशाल व्हेल मछली के समान विशाखपट्नम् के रामकृष्ण समुद्रतट पर गर्व से खड़ी है। आर. के. समुद्रतट अथवा रामकृष्ण समुद्रतट पर खड़ी काले रंग की यह पनडुब्बी अब एक जीवंत संग्रहालय है। सेवामुक्ति […]

The post आईएनएस कुर्सुरा पनडुब्बी – विशाखपट्नम् के रामकृष्ण समुद्रतट पर appeared first on Inditales.

]]>

आईएनएस कुर्सुरा, भारतीय नौसेना की एक सेवामुक्त पनडुब्बी है, जिसने सन् १९७१ में भारत-पाकिस्तान युद्ध में भाग लिया था। यह आज एक विशाल व्हेल मछली के समान विशाखपट्नम् के रामकृष्ण समुद्रतट पर गर्व से खड़ी है। आर. के. समुद्रतट अथवा रामकृष्ण समुद्रतट पर खड़ी काले रंग की यह पनडुब्बी अब एक जीवंत संग्रहालय है। सेवामुक्ति के बाद इसे सार्वजनिक अवलोकन के लिए एक संग्रहालय के रूप में संरक्षित किया है। ऊपर से देखने पर यह पनडुब्बी ऐसी प्रतीत होती है मानो समुद्र से एक विशाल मछली को बाहर निकाल कर तट पर रख दिया हो।

आईएनएस कुर्सुरा पनडुब्बी विशाखापत्तनम
आईएनएस कुर्सुरा पनडुब्बी विशाखापत्तनम

यह सम्पूर्ण एशिया का एक विशेष प्रकार का मौलिक पनडुब्बी संग्रहालय है। सम्पूर्ण विश्व में यह दूसरा ऐसा संग्रहालय है जिसमें आप एक जीवित पनडुब्बी के भीतर जाकर उसके विभिन्न भागों को देख सकते हैं, उसकी तकनीकी एवं क्रियाकलापों को समझ सकते हैं तथा गहरे समुद्र में बहती इस पनडुब्बी में हमारे नौसैनिकों के जीवन को समझ सकते हैं तथा स्वयं अनुभव कर सकते हैं। हो सकता है कि उनकी मनःस्थिति आप अपने भीतर शब्दशः अनुभव  न कर सकें क्योंकि जब वे इस पनडुब्बी में जाते थे तब वे शत्रुओं से अपने देश का रक्षण करते हुए अपने प्राण भी न्योछावर कर देने की मनस्थिति से जाते थे, वहीं आप एक दर्शक के रूप में उनके जीवन की कुछ झलकियाँ एवं इस पनडुब्बी का अवलोकन कर रहे हैं।

और पढ़ें – विशाल उंदावल्ली गुफाएं – आंध्र प्रदेश के गुंटूर से

सोवियत संघ में निर्मित कुर्सुरा का निर्माण कार्य सन् १९६९ में पूर्ण हुआ तथा उसे विशाखपट्नम् लाकर भारतीय नौसेना में जोड़ा गया। सन् १९७० में भारतीय नौसेना की सेवा में उसने अपनी प्रथम यात्रा की। ३१ वर्ष भारतीय नौसेना में सेवा प्रदान करने के पश्चात २७ फरवरी २००१ में उसे नौसेना से सेवामुक्त किया गया। आज यह पर्यटन उद्योग को अपनी सेवायें प्रदान कर रही है। एक पनडुब्बी की संरचना, उसकी तकनीकी तथा उसके भीतर एक संकुचित स्थान में  अनेक दिवसों, सप्ताहों व महीनों तक हमारे नौसेनिक कैसे रहते हैं, इस विषय में सामान्य जनमानस को जानकारी प्रदान कर रही है।

पनडुब्बी संग्रहालय – विशाखापत्तनम का एक महत्वपूर्ण दर्शनीय स्थल

यह पनडुब्बी संग्रहालय भारत के उन विरले संग्रहालयों में से एक है जिसमें प्रचुर मात्रा में प्रलेखीकरण उपलब्ध हैं। उत्तम रीति से संरक्षित प्रदर्शनी है। इस पनडुब्बी का संचालित पर्यटन कराया जाता है। बाहर लगे एक विशाल फलक पर पनडुब्बी की कार्यप्रणाली विस्तृत रूप में दर्शाई गयी है। एक तैरती पनडुब्बी को कैसे समुद्र तल तक ले जाया जाता है, कैसे एक पनडुब्बी समुद्र के गहरे जल के भीतर, यहाँ तक कि समुद्र के तल पर ६० दिवसों जैसे लम्बे काल तक रह पाती है तथा आवश्यकतानुसार उसे वापिस जल सतह पर कैसे लाया जाता है, इनकी जानकारी दी गयी है।

पनडुब्बी के भीतर का वाताबरण
पनडुब्बी के भीतर का वाताबरण

पनडुब्बी के भीतर कार्यरत हमारे नौसैनिक बाह्य विश्व से पृथक होकर कई दिवसों तक एक संकुचित वातावरण में कार्य करते रहते हैं। स्थान की कमी के कारण अत्यंत सीमित संसाधनों से संतुष्ट रहना पड़ता है। इसके लिए उन्हें कितनी शारीरिक एवं मानसिक प्रशिक्षण व बल की आवश्यकता होती है, इसका हम अनुमान भी नहीं लगा सकते हैं।

सिकुड़े हुए प्रसाधन कक्ष
सिकुड़े हुए प्रसाधन कक्ष

इस फलक पर भारतीय में पनडुब्बियों के इतिहास की जानकारी दी गयी है। साथ ही इस विशेष प्रकार की ‘Foxtrot’ पनडुब्बी के इतिहास एवं महत्वपूर्ण आयामों के विषय में भी बताया गया है। इस पनडुब्बी रूपी संग्रहालय की भीतरी संरचना को दर्शाते रेखाचित्र हैं। पनडुब्बी को जल से बाहर लाकर एक संग्रहालय के रूप में प्रदर्शित करने के लिए किये गए प्रयासों को भी दर्शाया गया है। संग्रहालय के चारों ओर पनडुब्बी के विभिन्न महत्वपूर्ण भागों को प्रदर्शित किया गया है, समुद्री तोपगोला – टारपीडो(Torpedo), संकेतक प्लव (Indicator buoy), एक विशाल बैटरी, तैलशीतक(oil cooler), जल निकास टोटी(valve), वायुशीतक(air coolers) आदि। इन सभी के साथ इनकी कार्यप्रणालियाँ विस्तृत रूप में दर्शाई गयी हैं।

और पढ़ें – कुचिपुड़ी गाँव – आंध्र प्रदेश का प्राचीन नृत्य ग्राम

आईएनएस कुर्सुरा पनडुब्बी का भीतरी दृश्य

एक परिदर्शक आपको छोटे छोटे समूहों में पनडुब्बी के भीतर ले जाता है तथा पनडुब्बी की कार्यप्रणाली समझाता है। आप असली टारपीडो देख सकते हैं तथा उसे कैसे दागते हैं, यह भी समझ सकते हैं। आपको ऐसा आभास होगा मानो आप स्वयं एक विशाल यंत्र के भीतर पहुँच गए हैं। अत्यंत लघु शयन कक्ष, प्रसाधन कक्ष, रसोईघर व भोजन कक्ष दृष्टिगोचर होते हैं जिन्हें  नौसैनिक बारी बारी से प्रयोग करते हैं।

पनडुब्बी के भीतर इतनी बड़ी संख्या में नियंत्रक खटके या स्विच हैं कि हम यह चिंतन करने पर बाध्य हो जाते हैं कि हमारे नौसैनिक उनका स्मरण कैसे रखते हैं! किस नियंत्रण का कैसे व कब प्रयोग करना है, यह निश्चित ही एक जटिल कार्य है। एक फलक पर उन सभी अधिकारियों के नाम लिखे हैं जो इस पनडुब्बी में कार्यरत थे। साथ ही उनके द्वारा अर्जित पुरस्कार, उपाधियाँ एवं उनके गोताखोरी के उपकरणों का भी गौरवपूर्ण प्रदर्शन किया गया है।

चार व्यक्तियों के सोने का स्थान
चार व्यक्तियों के सोने का स्थान

रसोईघर में भाप निकलती इडलियाँ भी प्रदर्शित की गयी है जो अत्यंत रोचक हैं। इस संकुचित स्थान पर एक छोटा व अत्यंत औपचारिक भोजन कक्ष भी है। पनडुब्बी के अंतिम छोर पर एक सीढ़ी के द्वारा एक बचाव द्वार तक पहुंचा जा सकता है जिसका प्रयोग आपातकालीन स्थिति में किया जाता होगा।

आईएनएस कुर्सुरा पनडुब्बी का अवलोकन आपको अत्यंत भावविभोर कर देगा। आप शत्रुओं से हमारी समुद्री सीमाओं का रक्षण करते इन नौसैनिकों का जीवन, परिश्रम एवं समर्पण देख कर उनके प्रति कृतज्ञ हुए बिना नहीं रह पायेंगे।

समुद्र के तट पर उत्तम रूप से संरक्षित पनडुब्बी को उतने की मनमोहक परिवेश में इतनी कुशलता से प्रदर्शित किया है कि आप उसकी प्रशंसा करते नहीं थकेंगे। समुद्र में उठती लहरों को देख कर भी ऐसा प्रतीत होता है मानो वे इस पनडुब्बी को पुनः अपनी गोद में समेटने को व्याकुल हैं।

और पढ़ें –बोर्रा गुफाएँ – अरकू घाटी की छेद वाली गुफा

यदि आप विशाखपट्नम् की यात्रा कर रहे हैं तो इस संग्रहालय के अवलोकन के लिए समय अवश्य निकालें। हमारे नौसैनिकों के जीवन तथा देश के प्रति उनके समर्पण को समीप से जानने का यह एक स्वर्णिम अवसर है। साथ ही एक पनडुब्बी को भीतर-बाहर से देखने व समझने का भी उत्तम अवसर है। ऐसा अवसर हमें सहज ही प्राप्त नहीं होता है। इस अवसर का लाभ अवश्य उठायें।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post आईएनएस कुर्सुरा पनडुब्बी – विशाखपट्नम् के रामकृष्ण समुद्रतट पर appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/ins-kurusara-pandubbi-vishakhapatnam/feed/ 0 2802
विशाल उंदावल्ली गुफाएं – आंध्र प्रदेश के गुंटूर से https://inditales.com/hindi/monolithic-undavalli-caves-andhra/ https://inditales.com/hindi/monolithic-undavalli-caves-andhra/#comments Wed, 13 Jun 2018 02:30:29 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=819

भारत के कई स्थानों पर विशाल अखंड चट्टानों को काटकर बनायी गयी कई गुफाएं हैं। आंध्र प्रदेश के गुंटूर नगर में स्थित उंदावल्ली गुफाएं उन्ही में से एक है। इसी प्रकार बनायी गयी कई प्रसिद्ध गुफाओं की जानकारी हमें पहले से ही है, जैसे महाराष्ट्र में स्थित अजंता, एलोरा तथा एलिफेंटा गुफाएं। कुछ अन्य गुफाएं, […]

The post विशाल उंदावल्ली गुफाएं – आंध्र प्रदेश के गुंटूर से appeared first on Inditales.

]]>
अखंड उंदावल्ली गुफाएं - आंध्र प्रदेश
अखंड उंदावल्ली गुफाएं – आंध्र प्रदेश

भारत के कई स्थानों पर विशाल अखंड चट्टानों को काटकर बनायी गयी कई गुफाएं हैं। आंध्र प्रदेश के गुंटूर नगर में स्थित उंदावल्ली गुफाएं उन्ही में से एक है। इसी प्रकार बनायी गयी कई प्रसिद्ध गुफाओं की जानकारी हमें पहले से ही है, जैसे महाराष्ट्र में स्थित अजंता, एलोरा तथा एलिफेंटा गुफाएं। कुछ अन्य गुफाएं, जिनके विषय में कम लोग जानते हैं, वे हैं मध्यप्रदेश के धार जिले में स्थित बाघ गुफाएं, मुंबई की कान्हेरी गुफाएं, उड़ीसा के उदयगिरी तथा खंडगिरी गुफाएं, कर्नाटक स्थित बदामी गुफाएं तथा मध्य प्रदेश के विदिशा में स्थित उदयगिरी गुफाएं। मध्य प्रदेश के भोपाल स्थित भीमबेटिका गुफाएं, जहां चट्टानों पर प्राचीन चित्रकारियाँ हैं तथा छतीसगढ़ की कुछ अन्य गुफाएं प्रागैतिहासिक गुफाएं हैं।

कुछ समय पहले मैं एक विश्व नृत्य एवं संगीत उत्सव का आनंद उठाने आंध्र प्रदेश स्थित अमरावती गयी थी। साथ ही कुछ हवाई रोमांचक खेलों में भाग लेने का भी अवसर मिला, जैसे गुब्बारे द्वारा हवाई सैर, पैराग्लाइडिंग इत्यादि। परन्तु विरासती धरोहरों से जुड़े ह्रदय के संकेतों को अनदेखा ना कर सकी। अतः समयाभाव के होते हुए भी मैंने कुचिपुड़ी गाँव, कोंडपल्ली नगरी तथा उंदावल्ली गुफाओं के भी दर्शन करने के लिए समय निकाल ही लिया।

यद्यपि उंदावल्ली गुफाएं भारत में स्थित अन्य गुफाओं के सामान ही हैं, तथापि इसमें विशेष अनूठापन भी है। कृष्णा नदी के तीर पर स्थित यह कई लघु गुफाओं का एक समूह है। ये गुफाएं गुंटूर नगर के अंतर्गत होते हुए भी विजयवाड़ा नगर एवं आंध्र प्रदेश की नई नवेली राजधानी अमरावती के समीप स्थित है।

उंदावल्ली गुफाओं का उत्खनन युग

उंदावल्ली की छोटी गुफाएं
उंदावल्ली की छोटी गुफाएं

ऐसा अनुमान है कि उंदावल्ली गुफाओं का उत्खनन राजा विश्नुकुंदी के राज में ४वी से ५वी. शताब्दी के मध्य कभी हुआ था। इन गुफाओं को १६वीं. शताब्दी तक राजसी संरक्षण प्राप्त था। किन्तु इसके पश्चात ये अधिकतर अनुपयोगी ही रही। स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने इसे अपने संरक्षण में ले लिया और इसे राष्ट्रीय विरासत घोषित किया।

अखंड उंदावल्ली गुफाएं

उंदावल्ली पहुँचने से पूर्व मुझे जानकारी प्राप्त हुई कि उंदावल्ली गुफाओं को अखंड चट्टान से उत्खनित किया गया है जो चारों ओर हरियाली से घिरा हुआ है। इन गुफाओं के समूह में एक मुख्य गुफा है जो चार मंजिली है। इसके भीतर सुव्यवस्थित प्रकार से उत्खनित कई कक्ष तथा स्तंभ हैं। पर्यटक भी अधिकतर इसी गुफा पर अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं।

उंदावल्ली में ऋषि प्रतिमाएं
उंदावल्ली में ऋषि प्रतिमाएं

मैं जैसे ही उंदावल्ली पहुंची, मेरी दृष्टी सर्वप्रथम तीन छिद्रों युक्त एक छोटी गुफा पर पड़ी। इसके ऊपर आले बनाकर उस पर गज एवं सिंहों की आकृतियाँ उत्कीर्णित की गयी हैं। इसके ऊपर बनाए आलों के भीतर विष्णु की एक सम्पूर्ण प्रतिमा तथा एक अपूर्ण प्रतिमा उत्कीर्णित हैं। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि इन गुफा समूहों का कार्य प्रगति पर था तथा इसे कभी पूर्ण नहीं किया गया था।

उंदावल्ली गुफाओं के स्तम्भ
उंदावल्ली गुफाओं के स्तम्भ

कुछ सीड़ियाँ चढ़ने के पश्चात हमारे सम्मुख चार स्तरों की मुख्य गुफा प्रकट हुई। इस गुफा के ऊपरी गुफा को रंगा गया था। मुझे लगता है कि यह अपेक्षाकृत नवीन प्रयास है। इस गुफा में ध्यान देने योग्य हैं चार संतों की आदमकद प्रतिमाएं जो तीसरे स्तर की आलिन्द पर रखी हुई हैं। इनमें एक संत को तम्बूरा जैसा कोई वाद्य बजाते दर्शाया गया है। उनके दोनों ओर सिंहों की प्रतिमाएं हैं। मैंने अनुमान लगाने का प्रयास किया कि इन प्रतिमाओं का क्या अभिप्राय है। क्या ये किसी गुरु व उनके तीन शिष्यों की प्रतिमाएं हैं? ये प्रतिमाएं जैन मुनियों अथवा बौध भिक्षुओं की प्रतिमाओं से मेल नहीं खा रही थीं। मुझे ये ऋषियों की प्रतिमाएं ही प्रतीत हो रही थीं। तथ्यों की जानकारी प्राप्त करने का मार्ग भी नहीं था। आसपास कोई भी सूचना पट्टिका उपस्थित नहीं थी।

स्तरित उंदावल्ली गुफाएं

उंदावल्ली की स्तरित गुफाएं कुल मिलाकर अत्यंत आकर्षक प्रतीत हो रहे थे। प्रत्येक स्तर स्पष्ट रूप से दृश्यमान थे। निचला स्तर सम्पूर्ण नहीं है। इसकी अपूर्णता हमारे लिए सहायक सिद्ध होती है। इससे उत्खनन की तकनिकी जानकारी प्राप्त होती है। यह ज्ञात नहीं हो पाया कि स्तरित गुफाएं किसी वास्तुविद की पूर्व कल्पना थी अथवा स्तरों को क्रमशः भिन्न भिन्न काल में उत्खनित किया था। गुफाओं की छत पर कहीं कहीं रंगरोगन के चिन्ह थे। अर्थात् किसी काल में इन गुफाओं में रंगरोगन भी किया गया था।

गुफाओं में उपस्थित स्तंभ विजयनगर शैली का आभास कराते हैं। किन्तु कहा जाता है कि उंदावल्ली गुफाओं के उत्खनन के पश्चात ही महाबलीपुरम गुफाओं के उत्खनन की प्रेरणा प्राप्त हुई थी।

उंदावल्ली गुफाओं की प्रतिमाएं

शेषशायी विष्णु

शेषाशायी विष्णु - उंदावल्ली
शेषाशायी विष्णु – उंदावल्ली

शेषशायी विष्णु की प्रतिमा उंदावल्ली गुफाओं की मुख्य एवं मौलिक प्रतिमा है। इससे यह सिद्ध होता है कि यह वैष्णव गुफा मंदिर है। इस शेषशायी विष्णू की प्रतिमा के ऊपर एक गरुड़ की मनमोहक आकृति उत्कीर्णित है। इस शिल्प में गरुड़ भगवान् विष्णु को ऐसे निहार रहे हैं मानो भगवान् विष्णू की निद्रा भंग ना हो इसका ध्यान रख रहे हों। विशाल शेषनाग ने उनके शीश को आधार दिया है तथा फन उनके शीश के ऊपर फैला कर उन्हें छाँव प्रदान कर रहे हैं। वहीं अन्य देवी देवता आकाश से उन्हें निहार रहे हैं।

विष्णु को निहारते गरुड़ - उंदावल्ली गुफाएं
विष्णु को निहारते गरुड़ – उंदावल्ली गुफाएं

वृक्ष उन्मूलन करता गज

उंदावल्ली गुफाओं के कई शिल्पों में एक आकृति मुख्यतः दिखाई दी, वह थी गज की आकृतियाँ। उनमें मुख्यतः वृक्ष उन्मूलन करते गज को दर्शाया गया है।

विष्णू की खड़ी प्रतिमा

यह प्रतिमा एक आले के भीतर स्थापित है।

आसनस्थ गणेश की प्रतिमा

गणेश प्रतिमा -उंदावल्ली गुफाएं
गणेश प्रतिमा – उंदावल्ली गुफाएं

आसन ग्रहण किये गणेशजी की स्फटिक में बनी प्रतिमा पर हल्दी, सिंदूर व पुष्प अर्पित किये हुए थे। इसका अर्थ है कि इस प्रतिमा की पूजा अर्चना आज भी होती है।

नरसिंह अवतार

विष्णु का नरसिंह अवतार - उंदावल्ली गुफाएं
विष्णु का नरसिंह अवतार – उंदावल्ली गुफाएं

उंदावल्ली गुफा में नरसिंह अवतार की कई प्रतिमाएं हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं। आँध्रप्रदेश में नरसिंह उपासना की प्रथा है। उंदावल्ली गुफा में नरसिंह की एक प्रतिमा खड़ी अवस्था में है। स्तंभों पर कई गोलाकार पदकों पर नरसिंह की आकृतियाँ देखने को मिलती हैं। आँध्र प्रदेश में भगवान् विष्णु को नरसिंह अवतार में पूजने की प्रथा आपको यहाँ के कई बड़े मंदिरों में दिखाई देगी जैसे विशाखापट्टनम के निकट सिंहाचलम मंदिर। आँध्रप्रदेश के अलावा मुझे केवल हिमाचल प्रदेश के कुछ स्थानों पर नरसिंह आराधना की जानकारी है। उनमें से एक है सराहन।

और पढ़ें: यादागिरिगुट्टा का नरसिंह स्वामी मंदिर

हनुमान

उंदावल्ली गुफा में हनुमान की भी कई प्रतिमाएं हैं। यहाँ तक कि रामायण महाकाव्य के भी वही दृश्य चित्रित हैं जिसमें हनुमानजी की भूमिका है।

महाकाव्य रामायण के दृश्य

रामायण के दृश्य - उंदावल्ली गुफाएं
रामायण के दृश्य – उंदावल्ली गुफाएं

महाकाव्य रामायण के कई दृश्य गुफा के स्तंभों पर उत्कीर्णित हैं। उपरोक्त दृश्य में श्रीलंका के अशोक वाटिका में हनुमानजी देवी सीता से भेंट करते दर्शाए गए हैं।

और पढ़ें: श्रीलंका के रामायण मंदिर

द्वारपाल

जहां मंदिर होंगे, वहां मंदिर के द्वार के दोनों ओर गदाधारी द्वारपाल की मूर्तियाँ होनी आवश्यक है।

हरियाली से घिरी उंदावल्ली गुफाएं
हरियाली से घिरी उंदावल्ली गुफाएं

इन मूर्तियों के साथ साथ कमल के पुष्प की भी कई आकृतियाँ खुदी हैं। गुफा की धरती पर कई भ्रमिकाएं तथा चौपड़ मंच की आकृतियाँ गुदी हुई हैं। यह अवश्य ही एक सार्वजनिक स्थल रहा होगा जहां लोग एक दूसरे से भेंट करते थे तथा मनोरंजन खेल खेलते थे।

उंदावल्ली गुफाएं बलुआ पहाडी को उत्खनित कर बनायी गयी हैं वहीं इसके भीतर स्थित सर्व प्रतिमाएं काले स्फटिक पत्थर पर उत्कीर्णित हैं।

बौध, जैन तथा हिन्दू गुफा

गुफा से बाहर का दृश्य
गुफा से बाहर का दृश्य

उंदावल्ली गुफा के दूसरे तले की संरचना विशिष्ठ चैत्य पद्धति में की गयी है। इससे यह प्रमाणित होता है कि किसी काल में यह एक बौध गुफा थी। कुछ लोगों की मान्यता है कि यह मौलिक रूप से एक जैन गुफा थी जिसमें कालान्तर में बौध भिक्षुओं ने प्रवेश किया। उनके जाने के पश्चात, इन्हें हिन्दू वैष्णव गुफाओं में परिवर्तित कर दिया गया।

मेरे मतानुसार अंततः जैन धर्म तथा बौध धर्म हिन्दू धर्म के ही कई पंथों में से है।

उंदावल्ली गुफाओं के दर्शन मेरे हेतु क्रमशः प्रत्येक युग द्वारा चिन्हित छापों के दर्शन करना था।

अंत में मैंने पहाडी के चारों ओर परिक्रमा कर अन्य लघु गुफाओं के दर्शन किये। इनमें स्थित अधिकतर नक्काशियां एवं प्रतिमाएं समय तथा ऋतू की मार सहते सहते लगभग समाप्त हो गयी हैं। यद्यपि चारों ओर फैली हरियाली देखते एक गुफा से दूसरी गुफा तक की पदयात्रा अत्यंत आनंददायक थी।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post विशाल उंदावल्ली गुफाएं – आंध्र प्रदेश के गुंटूर से appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/monolithic-undavalli-caves-andhra/feed/ 2 819
कुचिपुड़ी गाँव – आंध्र प्रदेश का प्राचीन नृत्य ग्राम https://inditales.com/hindi/kuchipudi-nritya-gram-andhra-pradesh/ https://inditales.com/hindi/kuchipudi-nritya-gram-andhra-pradesh/#comments Wed, 19 Apr 2017 02:30:37 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=214

कुचिपुड़ी गाँव – आँध्रप्रदेश का एक ऐसा गाँव जिसने भारत के ७ प्रसिद्ध शास्त्रीय नृत्य शैलियों में से एक प्रसिद्ध नृत्य शैली को अपना नाम प्रदान किया। कुछ वर्ष पूर्व एक पत्रिका पढ़ने के दौरान मुझे यह ज्ञात हुआ कि यह आँध्रप्रदेश के कृष्णा जिले में स्थित एक गाँव का नाम है। हालांकि, मेरी हैदराबाद […]

The post कुचिपुड़ी गाँव – आंध्र प्रदेश का प्राचीन नृत्य ग्राम appeared first on Inditales.

]]>

कुचिपुड़ी नृत्य ग्राम - आन्ध्र प्रदेशकुचिपुड़ी गाँव – आँध्रप्रदेश का एक ऐसा गाँव जिसने भारत के ७ प्रसिद्ध शास्त्रीय नृत्य शैलियों में से एक प्रसिद्ध नृत्य शैली को अपना नाम प्रदान किया। कुछ वर्ष पूर्व एक पत्रिका पढ़ने के दौरान मुझे यह ज्ञात हुआ कि यह आँध्रप्रदेश के कृष्णा जिले में स्थित एक गाँव का नाम है। हालांकि, मेरी हैदराबाद यात्रा के दौरान मुझे कई कुचिपुड़ी नृत्य प्रदर्शन देखने का अवसर मिला था। खासकर हलीम खान द्वारा प्रदर्शित नृत्य प्रदर्शन ने मेरा मन मोह लिया था। कुचिपुड़ी गाँव के बारे में पढ़ते समय मुझे इन यादगार प्रदर्शनों का ध्यान हो आया और तभी से मुझे कुचिपुड़ी गाँव की यात्रा करने की तीव्र इच्छा जागृत हुई।

मुझे इस गाँव के दर्शन करने का अवसर जल्द ही प्राप्त हुआ। हुआ ऐसा कि मुझे आँध्रप्रदेश पर्यटन द्वारा अमरावती विश्व संगीत व नृत्य महोत्सव में भाग लेने का आमंत्रण प्राप्त हुआ। ज्ञात हुआ कि कुचिपुड़ी गाँव विजयवाडा से मात्र ६० की.मी. पर है। समारोह के उपरांत ही हम अपनी अनोखी नृत्य ग्राम यात्रा के लिए निकल पड़े।

श्री सिद्धेन्द्र योगी कुचिपुड़ी कला पीठम, कुचिपुड़ी

कुचिपुड़ी नृत्य के दिग्गज
कुचिपुड़ी नृत्य के दिग्गज

कुचिपुड़ी गाँव में हम श्री सिद्धेन्द्र योगी कुचिपुड़ी कला पीठम के द्वार पर उतरे। यह नृत्य संस्थान हैदराबाद के तेलुगु विश्वविद्यालय के अंतर्गत है। जैसे ही हम गाडी से उतरे, हमारे समक्ष, बगीचे के बीचोंबीच, काले पत्थर से बनी एक सुरुचिपूर्ण महिला की सुन्दर प्रतिमा पर हमारी दृष्टि पड़ी। इस प्रतिमा ने एक हाथ में कमल व दूसरे हाथ में चावडी, अर्थात् चामर धारण किया हुआ है। मुझे इस प्रतिमा व इन चिन्हों के पीछे के शास्त्र का ज्ञान नहीं था और उस पर मैंने यह निष्कर्ष निकालने की चेष्टा की, कि यह प्रतिमा भारत माता का स्वरुप है। तुरंत मेरे निष्कर्ष को सुधार कर मुझे यह बताया गया कि यह तेलुगु तल्ली अर्थात् तेलुगु माता की मूर्ति है। मैंने मन ही मन सोचा, कि भारत विस्मयकारी तथ्यों का खजाना है।

तेलुगु तेल्ली प्रतिमा
तेलुगु तेल्ली प्रतिमा

कला पीठम संसथान में प्रवेश करते ही हमारी दृष्टि, इस स्थल के लिए सर्वोपयुक्त, चोल पीतल में बनी नटराज की विशाल प्रतिमा पर पड़ी। साथ ही वर्तमान कुचिपुड़ी के जनक श्री सिद्धेन्द्र योगीजी की भी प्रतिमा थी। इस कला पीठम की स्थापना हेतु भूमि, कुली क़ुतुब शाह ने इस संस्थान को दान स्वरुप प्रदान की थी। कहा जाता है कि वह इस कुचिपुड़ी नृत्य शैली पर मोहित थे। इस संस्थान की वर्तमान इमारत अपेक्षाकृत नवीन है जिसमें विद्धार्थियों के लिए छात्रावास की भी सुविधा उपलब्ध है। १०० से भी ज्यादा वर्ष प्राचीन इमारत के स्थान पर इस नवीन इमारत की संरचना की है।

श्री सिद्धेन्द्र योगीजी व उनकी कुचिपुड़ी शैली

इस संस्थान के कार्यकर्ता व विद्यार्थियों से भेंट के पश्चात्, प्रदर्शन कला में स्नातकोत्तर छात्रा सुश्री अनुपमा ने हमें कुचिपुड़ी गाँव व इस नृत्यशैली के इतिहास की जानकारी दी।

भामा कलापम

कुचिपुड़ी नृत्य - श्री सिद्देन्द्र योगी कला पीठम के छात्रों द्वारा
कुचिपुड़ी नृत्य – श्री सिद्देन्द्र योगी कला पीठम के छात्रों द्वारा

अनुपमा ने हमें श्री सिद्धेन्द्र योगी द्वारा रचित नृत्य नाटिका भामा कलापम के बारे में बताया। भामा अर्थात् सत्यभामा, जो भगवान् कृष्ण की ८ पत्नियों में से एक है। यह नृत्य नाटिका सत्यभामा के कृष्ण में विलीन होने की कामना पर आधारित है। सत्यभामा के हृदय में आसक्ति, मोह, इच्छाओं आदि वासनाओं का वास था। इस कारण भगवान् कृष्ण में विलीन होना उनके लिए असंभव था। इन अवगुणों का परित्याग करने के पश्चात् ही वह कृष्ण में समाहित हो सकती थी। यह कथा लाक्षणिक रूप से आत्मा व परमात्मा पर आधारित है। यह, मानव की भगवान् में विलीन होने की अभिलाषा व इसके लिए आनेवाली बाधाओं पर विजय प्राप्त करने की कथा है।

भामा कलापम, कुचिपुड़ी नृत्य नाटिका की सबसे ज्यादा प्रदर्शित नृत्य नाटिका है। हमें बताया गया कि भामा कलापम कथा अत्यंत विस्तार से रची गयी है। इसका अंदाजा इस उदाहरण से लगाया जा सकता है कि एक पूर्ण रात्रि मात्र सत्यभामा की केशसज्जा बखान करती है। दरअसल पूर्ण कुचिपुड़ी नृत्य शैली, वैष्णव संस्कृति से सराबोर है। विष्णु के अवतारों में से कृष्ण भगवान्, भक्ति मार्ग के अनुगामियों में सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। यहाँ तक की इस जिले को ‘कृष्णा’ नाम दिया है। कृष्णा नदी भी यहीं से बहती हुई समुद्र में विलीन होती है।

श्री योगीजी का यहाँ १७ वीं शताब्दी में वास था जब भक्ति आन्दोलन व कृष्ण भक्ति भाव अपनी चरम सीमा पर था।

कुचिपुड़ी गाँव का इतिहास

श्री सिद्धेन्द्र योगी कुचिपुड़ी कला पीठम के अध्यापकगण
श्री सिद्धेन्द्र योगी कुचिपुड़ी कला पीठम के अध्यापकगण

कुचिपुड़ी गाँव, कुचेलापुरम या कुचिलापुरी के नाम से भी जाना जाता है। इसका प्राचीन संस्कृत नाम कुशिलावापुरम अर्थात् बंजारे संगीतज्ञ व नर्तकों का गाँव है। कुचिपुड़ी की शब्द व्युत्पत्ती भी इस प्राचीन नृत्य शैली की कथा कहती है।

कुचिपुड़ी के वर्तमान इतिहास के सर्व साहित्य मध्य कालीन युग से उपलब्ध हैं। परन्तु हमें बताया गया कि पुरातत्ववेत्ताओं ने कई प्राचीन बुद्ध प्रतिमाएं खोज निकालीं जिन पर नृत्य मुद्राएं प्रत्यक्ष दिखाई देतीं हैं। हालांकि, नृत्य मुद्राएं दर्शाती बुद्ध की प्रतिमाएं सामान्यतः दिखती नहीं है, पर शायद इस भूमि की महिमा इतनी अपरंपार है कि बौद्ध भिक्षु भी यहां नृत्य करने में सक्षम थे।

कुचिपुड़ी के भावी नर्तक - श्री सिद्धेन्द्र योगी कुचिपुड़ी कला पीठम में अध्ययनरत
कुचिपुड़ी के भावी नर्तक – श्री सिद्धेन्द्र योगी कुचिपुड़ी कला पीठम में अध्ययनरत

ऐसा कहा जाता है कि इस गाँव के हर एक परिवार में कुचिपुड़ी नृत्य कलाकार हैं। हर एक गांववासी इस नृत्य शैली में निपुण है। ज्यादातर नर्तकों ने अपने पिता से इस नृत्य की शिक्षा हासिल की। जी हाँ! कुचिपुड़ी नृत्य का प्रसार पितृप्रधान वंशानुगत रीति द्वारा हुआ था। परन्तु वर्तमान काल में इस रीत में बदलाव देखा गया है। अनुपमा ने हमें बताया कि कुचिपुड़ी गाँव कुल १३ ब्राम्हण परिवारों से बना है जिसका प्रत्येक सदस्य इस नृत्य शैली की दीक्षा हासिल करता है।

पारंपरिक रीति अनुसार केवल पुरुष नर्तक ही इस नृत्य शैली का अभ्यास करते थे। वे अकसर स्त्री वेष धर कर स्फूर्ति और उत्साह से नृत्य करते थे। ऐसे ही अनेक वरिष्ठ कुचिपुड़ी पुरुष नर्तकों के चित्र यहाँ श्री सिद्धेन्द्र योगी कुचिपुड़ी कला पीठम में देखे जा सकते हैं, जिन्होंने स्त्री वेष धर कर नृत्य का प्रदर्शन किया था।

श्री वेदांत लक्ष्मी नारायण शास्त्रीजी २० वीं सदी में पारंपरिक कुचिपुड़ी नृत्य शैली में हुए कई बदलाव के उत्तरदायी हैं।उन्होंने ही स्त्रियों में इस नृत्य शैली को प्रवर्तित किया। साथ ही उन्होंने इस नृत्य शैली को ब्राम्हणों के दायरे से बाहर निकला और इसे हर उस व्यक्ति को उपलब्ध कराया जो इसमें प्रशिक्षित होना चाहता था।

कुचिपुड़ी नृत्य

कुचिपुड़ी नृत्य के ४ प्रमुख अंग इस प्रकार हैं –
• वाचिका अर्थात् मौखिक
• आहार्या अर्थात् वेशभूषा
• अंगिका अर्थात् मुद्राएँ व भंगिमाएं
• सात्विका अर्थात् अभिनय व अभिव्यक्ति

कुचिपुड़ी नृत्य शैली के अंतर्गत, नर्तक गाते हैं व दर्शकों से संवाद करते हैं। यह पूर्ण नृत्य शैली कथाकथन पर आधारित है जिसमें कुछ भाग संवाद रूप में, कुछ भाग नाटक रूप में व कुछ मुख मुद्राओं से अभिव्यक्त किया जाता है। इसमें सूत्रधार का भी समावेश रहता है जो नृत्य नाटिका के दौरान समय समय पर कथाकथन प्रस्तुत करता है। अन्य नृत्य शैलियों की तुलना में, इस कुचिपुड़ी नृत्य में अभिनय व मुख मुद्राओं को अधिक महत्त्व दिया जाता है।

नर्तकों का साथ देते संगीतवादक मृदंग, वायोलिन, हारमोनियम इत्यादि बजाते हैं व एक गायक और एक गायिका उनके लिए गायन प्रस्तुत करते हैं। मौलिक रूप से कुचिपुड़ी एक सामूहिक नृत्य प्रदर्शन है जिसमें भिन्न भिन्न कलाकार विभिन्न भाग प्रस्तुत करते हैं।

वेशभूषा इस नृत्य का एक अहम् अंग है। कुचिपुड़ी कलाकार लकड़ी से बने हल्के वजन के आभूषण धारण करते हैं। ज्यादातर कलाकार व उनका परिवार अपने गहने स्वयं गढ़तें हैं। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि कुचिपुड़ी का उनकी जीवन में कितना महत्वपूर्ण स्थान है। वर्तमान में कई कुचिपुड़ी नर्तक, पारंपरिक जौहरियों द्वारा निर्मित धातु के आभूषण धारण करने लगे हैं।

विद्यार्थियों द्वारा प्रदर्शित कुचिपुड़ी नृत्य दर्शन

श्री सिद्धेन्द्र योगी को समर्पित मंदिर - कुचिपुड़ी गाँव
श्री सिद्धेन्द्र योगी को समर्पित मंदिर – कुचिपुड़ी गाँव

श्री सिद्धेन्द्र योगी कुचिपुड़ी कला पीठम के प्रधानाचार्य श्री वेदांतम रामलिंग शास्त्रीजी ने हमारे लिए विद्यार्थियों द्वारा २ नृत्य प्रदर्शनों का आयोजन कराया। पहले प्रदर्शन में २ छात्रों ने प्रधानाचार्य व उनकी धर्मपत्नी द्वारा गाये गए गीत पर नृत्य किया।दूसरे प्रदर्शन में नर्तक ने शिव अष्टकम पर नृत्य प्रस्तुत किया। हम नर्तकों के स्फूर्तिपूर्ण व फुर्तीले नृत्य में खो से गए। चूंकि यह विद्यार्थी अल्प अवधि सूचना के तहत नृत्य प्रदर्शन कर रहे थे, वे दैनंदिक वस्त्रों में थे। इसलिए इनकी भव्य वेशभूषा के दर्शन का अवसर हमें नहीं मिला। मैं सिर्फ इन नर्तकों को, उनकी वेशभूषा धारण किये, उचित प्रकाश में नृत्य करते, अपनी कल्पना में ही देख सकती थी।

यह अत्यंत दुःख की बात है कि हमारे देश में बहुत कम लोग इस कला समृद्ध, कुचिपुड़ी गाँव के बारे में जानते हैं। जबकि हमें गर्व के साथ हमारी इस धरोहर को विश्व सम्मुख प्रस्तुत करना चाहिए। ऐसी कितनी जगहें होंगी जिन्हें इतने लम्बे अरसे से पूर्ण नृत्य ग्राम होने का गर्व होगा? आशा करती हूँ कि इस नृत्य ग्राम से पूर्ण प्रशिक्षित छात्र अपने इस गाँव की जानकारी अपनी कला द्वारा सम्पूर्ण विश्व को प्रदान करेंगे।

श्री सिद्धेन्द्र योगी कुचिपुड़ी कला पीठम के सभी शिक्षकगण व विद्यार्थी अत्यंत विनम्र और सरल स्वभाव के थे। उन्होंने हमें केले के पत्तों पर सादा दक्षिण भारतीय भोजन कराया। आप विश्वास नहीं करेंगे पर कई दिनों बाद मैंने इतना स्वादिष्ट भोजन का आस्वाद लिया था।

कुचिपुड़ी गाँव

कुचिपुड़ी की ग्राम देवी - बाल त्रिपुर सुंदरी
कुचिपुड़ी की ग्राम देवी – बाल त्रिपुर सुंदरी

श्री सिद्धेन्द्र योगी कला पीठम के दर्शन उपरांत हम कुचिपुड़ी की ग्राम देवी, बाला त्रिपुरा सुंदरी मंदिर के दर्शन हेतु निकल पड़े। रास्ते में श्री सिद्धेन्द्र योगीजी को समर्पित एक छोटे से मंदिर के भी दर्शन किये। इस मंदिर के मुख्य द्वार के ऊपर एक वीणा की प्रतिकृति रखी हुई है।

बाल त्रिपुरा सुंदरी मंदिर भी एक छोटा पीले रंग का मंदिर है जिसमें गोपुरम व शिखर का आकार समान है। यह शिव व पार्वती के बाल सुंदरी रूप को अर्पित है। शिखर के एक तरफ नटराज की सुन्दर प्रतिमा विभूषित है। मंदिर के पिस्ता हरे रंग के स्तंभों पर विभिन्न नृत्य मुद्राएँ धारण की हुईं छोटी छोटी प्रतिमाएं गड़ी हुई हैं। कुचिपुड़ी गाँव के सभी कलाकार नृत्य से पूर्व यहाँ आकर भगवान् के चरणों में प्रार्थना अर्पित करते हैं।

बाल त्रिपुर सुंदरी मंदिर के शिखर पर नटराज का वास
बाल त्रिपुर सुंदरी मंदिर के शिखर पर नटराज का वास

मंदिर के एक ओर नाट्य पुष्करणी नामक नवीन चेरुवु अर्थात् झील निर्माणाधीन है। इस झील के मध्य श्री सिद्धेन्द्र योगीजी की प्रतिमा स्थापित करने की भी योजना है।

नाटय पुष्करणी - कुचिपुड़ी ग्राम
नाटय पुष्करणी – कुचिपुड़ी ग्राम

मुझे ज्ञात हुआ कि कुचिपुड़ी गाँव के आसपास कई दूसरे मंदिर भी हैं। आशा है इनके दर्शन हेतु पुनः आने का अवसर मुझे जल्द ही मिलेगा।

कुचिपुड़ी दर्शन हेतु कुछ सुझाव

• कुचिपुड़ी गाँव में रहने के लिए धर्मशाला इत्यादि की कोई व्यवस्था नहीं है। निकटतम स्थान विजयवाड़ा है जहाँ यात्रियों के लिए हर स्तर की आवास सुविधाएँ उपलब्ध हैं।
• निकटतम विमानतल व रेल सुविधाएँ भी विजयवाड़ा में उपलब्ध हैं।
• हमने संस्थान में सादा शाकाहारी भोजन ग्रहण किया था। पूर्व सूचना देने पर वे आपके भोजन की भी व्यवस्था कर सकते हैं।
• इस गाँव व इसकी संस्कृति का अहसास करने हेतु, इस गाँव का दर्शन पैदल चल कर ही किया जा सकता है।

आँध्रप्रदेश के अन्य पर्यटन स्थलों के दर्शन पूर्व आपके लिए मेरी कुछ यात्रा संस्मरण प्रस्तुत है-
1. विशाखा पट्टनम का प्रसिद्ध रामकृष्ण समुद्रतट
2. अरकू आदिवासी संग्रहालय
3. अरकू घाटी की छिद्रयुक्त अरकू गुफाएं
4. रामकृष्ण समुद्रतट पर स्थित आईएनएस कुर्सुरा पनडुब्बी संग्रहालय
5. अरकू घाटी तक रेल यात्रा

हिंदी अनुवाद : मधुमिता ताम्हणे

The post कुचिपुड़ी गाँव – आंध्र प्रदेश का प्राचीन नृत्य ग्राम appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/kuchipudi-nritya-gram-andhra-pradesh/feed/ 2 214
बोर्रा गुफाएँ – अरकू घाटी की छेद वाली गुफा – आन्ध्र प्रदेश का पर्यटन स्थल https://inditales.com/hindi/araku-valley-borra-caves-andhra/ https://inditales.com/hindi/araku-valley-borra-caves-andhra/#comments Wed, 22 Feb 2017 02:30:03 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=153

बोर्रा गुफाएँ भारत के पूर्वी घाटों में अरकू घाटी के अनंथगिरी पहाड़ियों में, विशाखापटनम के तटीय शहर से लगभग 90 की.मी. की दूरी पर बसी हुई हैं। बोर्रा गुफाएँ भारत का अद्वितीय प्रकृतिक अजूबा है। भारत में, प्रकृतिक स्टैलैग्माइट और स्टैलैक्टाइट की यह सबसे बड़ी गुफा है। इस प्रकार की गुफाएँ आप विश्व के अलग-अलग […]

The post बोर्रा गुफाएँ – अरकू घाटी की छेद वाली गुफा – आन्ध्र प्रदेश का पर्यटन स्थल appeared first on Inditales.

]]>
बोर्रा गुफाएं – अरकू घटी – आंध्र प्रदेश
बोर्रा गुफाएं – अरकू घटी – आंध्र प्रदेश

बोर्रा गुफाएँ भारत के पूर्वी घाटों में अरकू घाटी के अनंथगिरी पहाड़ियों में, विशाखापटनम के तटीय शहर से लगभग 90 की.मी. की दूरी पर बसी हुई हैं। बोर्रा गुफाएँ भारत का अद्वितीय प्रकृतिक अजूबा है। भारत में, प्रकृतिक स्टैलैग्माइट और स्टैलैक्टाइट की यह सबसे बड़ी गुफा है। इस प्रकार की गुफाएँ आप विश्व के अलग-अलग भागों में देख सकते हैं। जैसे कि, मैंने ऐसी ही गुफाएँ अमरीका में टेक्सास में, यूरोप में स्लोवाकिया में और हमारे अपने मेघालय में भी देखी हैं जो एक-दूसरे के काफी समान हैं। ये गुफाएँ सैकड़ों लाखों साल पुरानी मानी जाती हैं।

इन गुफाओं की छत और फर्श से प्रकृतिक निक्षेप उपजते हैं, जिन्हें स्टैलैग्माइट और स्टैलैक्टाइट कहा जाता है। इनकी बेतरतीब सी संरचनाएं आपकी कल्पनाओं को दिशाहीन बना देती हैं। लेकिन कभी-कभी जब ये निक्षेप आपस में घुल जाते हैं तो एक स्तंभ जैसी दिखने वाली संरचना निर्मित होती है।

ये गुफाएँ आम तौर पर किसी नदी के मार्ग पर बसी होती हैं, जिसके कारण नदी का पानी इन गुफाओं में से गुजरते हुए बहता है। गुफाओं के भीतर घूमते हुए आप इस बहती हुई नदी को देख सकते हैं। बोर्रा गुफाएँ गोस्थानी नदी का उद्गम स्थल है। यह नदी इन गुफाओं से बहते हुए विशाखापटनम तक जाती है।

भारत के प्रकृतिक अजूबे – बोर्रा गुफाएँ – अरकू घाटी

बोर्रा गुहालू
बोर्रा गुहालू

भारत संस्कृति में डूबा हुआ देश है। हमारी संस्कृति में प्रत्येक वस्तु में दिव्यता देखने की परंपरा रही है। इन गुफाओं में जमीन से उपजे हुए निक्षेपों को अक्सर शिवलिंगों के रूप में देखा जाता है। इस गुफा में आपको ऐसे बहुत सारे शिव लिंग देखने को मिलेंगे। इन्हीं में से एक शिवलिंग को छोटे से मंदिर में परिवर्तित किया गया है, जहां तक पहुँचने के लिए आपको पतली सी सीढ़ियों से होते हुए उपर तक जाना पड़ता है। इसी प्रकार इन निक्षेपों से बनी बाकी की संरचनाओं को अन्य देवताओं के अवतारों के रूप में या फिर उनके वाहन या शुभ प्रतिकों के रूप में देखा जाता है। कभी-कभी तो इन्हें ऐतिहासिक किताबों के उपाख्यानों से भी जोड़ा जाता है।

ऐसे विश्वासों के चलते, भारत में इन गुफाओं का अच्छी तरह से अनुरक्षण नहीं हो पाया है। मानवीय स्पर्श के कारण इन प्रकृतिक निक्षेपों की संख्या कम होती जा रही है। इसके बावजूद भी उन्हें स्पर्श करने पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाए गए हैं। यहां के लोगों का मानना है कि ये गुफाएँ किसी भी वैज्ञानिक या पुरातात्विक खोज का परिणाम न होकर यहां के सांस्कृतिक जीवन का एक अभिन्न अंग हैं।

गिरते जल से बनी संरचनाएं

मानव मस्तिष्क के आकर की शिला
मानव मस्तिष्क के आकर की शिला

बोर्रा गुफाओं में गिरते हुए जल से बनी इन संरचनाओं को स्थानीय भाषा में जलशीला कहा जाता है। यहां पर आपको साई बाबा तथा अन्य मंदिर भी देखने को मिलेंगे। यहां पर सीता का शयनकक्ष और स्नानकक्ष भी है, जहां से पीला जल बहता है। ऐसा माना जाता है की माता सीता हल्दी से स्नान कर रही हैं, और यह जल उनके स्नानकक्ष से आता है। लेकिन वैज्ञानिक रूप से देखे, तो यह सिर्फ सल्फर धातु है जिसके कारण यह जल पीला दिखाई देता है। यहां पर मनुष्य का दिमाग, भुट्टा, बंदर, बैठा हुआ हाथी, भागता हुआ घोड़ा, मनुष्य का पैर और उसकी गदा आदि आकारों की संरचनाएं देखने को मिलती हैं। इन में से मानव दिमाग वाली संरचना बहुत ही निराली है, क्योंकि वह बाकी के स्टैलैग्माइट और स्टैलैक्टाइट की संरचनाओं से बिलकुल अलग है।

यहां पर एक बड़ी सी चट्टान है जिसके दोनों सिरों को एक लंबी सी संधि से जोड़ा गया है। स्थानीय लोग, इस संधि द्वारा विभाजित इन दोनों भागों को लव और कुश यानि माता सीता के दोनों बेटों के नाम से पुकारते हैं। यह अप्रतिम दृश्य देखने लायक है।  इस गुफा की छत पर एक छेद है, जहां से भीतर आती हुई रोशनी गुफाओं को खूबसूरती से अनेक प्रकारों में प्रकाशित करती है। गुफा में अलग-अलग स्थानों पर खड़े होकर आप इस रोशनी के विभिन्न रंग-रूप देख सकते हैं।

कुछ जगहों पर गुफाओं की दीवारें मैग्नीशियम और सिलिका जैसे खनिज पदार्थों की उपस्थिती के कारण चमकती हुई नज़र आती हैं। गुफा के अंतिम छोर की तरफ, पानी में गुफा का प्रतिबिंब दिखाई देता है, जो गुफा की आकृति को अचानक से दुगुना बनाता हुआ उसे अद्भुत रूप से प्रकाशित करता है।

बोर्रा गुफाएँ – तीन पड़ाव

बोर्रा गुहालू से निकलती गोस्थनी नदी
बोर्रा गुहालू से निकलती गोस्थनी नदी

बोर्रा गुफाएँ तीन पड़ावों में विभाजित हैं, जिनमें से सिर्फ बीच वाला पड़ाव ही लोगों को घूमने के लिए खुला है। नीचे का पड़ाव और ऊपर का पड़ाव सामान्य यात्रियों के लिए सुरक्षित नहीं है, जिसके कारण वहां पर जाने की अनुमति नहीं है। निम्न पड़ाव नीचे बहती हुई नदी से जुड़ा होने के कारण खतरनाक हो सकता है। लेकिन ऊपर से देखने पर नदी का यह नज़ारा बहुत ही सुंदर दिखता है। इस क्षेत्र में आम तौर पर पाए जाने वाले सफ़ेद संगमरमर के पत्थरों के बीच से बहती हुई यह नदी किसी चंचल युवती सी लगती है।

बोर्रा गुफ़ा का भीतरी दृश्य
बोर्रा गुफ़ा का भीतरी दृश्य

हमारे गाइड ने हमे बताया कि शिवरात्रि के दिन इन गुफाओं में जाने के लिए कोई प्रवेश शुल्क नहीं लगता है। इस दिन आस-पास के सभी आदिवासी समुदाय यहां पर पुजा करने आते हैं। इस गुफा का प्रवेश द्वार बहुत बड़ा है। यहीं से आप गुफा के फैलाव को देख उसके विस्तार का अंदाज़ा लगा सकते हैं। यहां से गुफा के भीतर देखने पर आपको लोग भी बौने से नज़र आते हैं। इस प्रवेश द्वार पर नंदी की दो मूर्तियाँ स्थापित की गयी हैं, जो पूरी गुफा को शिव मंदिर का रूप प्रदान करती हैं। और क्यों न हो शिवजी स्वयं एक गुफा निवासी जो ठहरे।

बोर्रा का अर्थ

बोर्रा गुफाओं का मुख्य प्रवेश
बोर्रा गुफाओं का मुख्य प्रवेश

इस क्षेत्र की स्थानीय भाषा के अनुसार बोर्रा का अर्थ है छेद। बोर्रा गुफाओं के शीर्ष पर एक बड़ा सा छेद है जिसके कारण उसे यह नाम दिया गया है। उपाख्यान बताते हैं कि, एक बार एक गाय इस छेद में गिर गयी और इस प्रकार से स्थानीय आदिवासी लोगों को इस गुफा के बारे में पता चला। इसके साथ ही उन्हें नदी के उद्गम स्थान का भी पता चला। इसलिए इस घटना के आधार पर इस नदी को गोस्थानी ( गाय के थन ) नाम दिया गया। इस गुफा में आपको एक जगह पर गाय के थन जैसी संरचना दिखेगी जहां से जल टपकता रहता है, जो सीधे उसके नीचे स्थित शिवलिंग पर गिरता है।

आधुनिक इतिहास के अनुसार बोर्रा गुफाओं की खोज ब्रिटिश काल के दौरान बताई जाती है। कहा जाता है कि, राजा विलियम जॉर्ज ने लगभग 200 साल पहले भारतीय भूगर्भीय सर्वेक्षण के द्वरा इन गुफाओं की खोज की थी। तथा मानवविज्ञानियों का मानना है कि, इन गुफाओं से प्राप्त पत्थर से बने हथियारों की पुरातनता के हिसाब से लगभग 30,000 – 50,000 साल पहले इन गुफाओं में लोग रहा करते थे।

बोर्रा गुफाएँ और भारतीय रेल

बोर्रा गुफ़ा के भीतर
बोर्रा गुफ़ा के भीतर

अगर आप पूर्व तटीय रेल्वे की ट्रेन से बोर्रा गुहलू की यात्रा पर जा रहे हैं, तो वहां का गाइड आपको जरूर बताएगा कि स्टेशन तक पहुँचने से ठीक पहले यह ट्रेन वास्तव में बोर्रा गुफाओं के ऊपर से गुजरती हुई जाती है। और गुफाओं के भीतर भी आपको रेल्वे के सूचना पट्ट दिखेंगे जो आपको इस ट्रेन की पूरी जानकारी देते हैं। आंध्र प्रदेश पर्यटन ने इन गुफाओं में पक्के रास्ते बनाने का बहुत ही बढ़िया काम किया है। तथा गुफाओं के भीतर कुछ बत्तियाँ भी लगायी हैं, जिससे पर्यटकों को गुफाओं में घूमने की सुविधा मिलती है।

मेरे विचार से आपको बोर्रा गुफाएँ जरूर देखनी चाहिए। ये गुफाएँ सच में भारत का अद्वितीय प्रकृतिक अजूबा है। तथा इन गुफाओं तक जानेवाली ट्रेन, जो अनेकों सुरंगों से गुजरते हुए जाती है, की यात्रा का अनुभव भी अवश्य लेना चाहिए।

कार्तिकी झरना

कार्तिकी झरना – अरकू घाटी
कार्तिकी झरना – अरकू घाटी

बोर्रा गुफाओं के पास ही एक मौसमी झरना है, जिसे कातिकी झरना कहा जाता है। अगर आप तरुण और साहसी हैं तो यह झरना देखने जरूर जाइए। लेकिन ऐसे झरनों पर जाते समय समूह में जाइए और अपना तथा अपने आस-पास का ध्यान जरूर रखिए।

अन्य रोचक लेख

बराबर गुफाएं – बिहार

कुचिपुड़ी – एक नृत्य ग्राम

अजंता गुफाओं के भित्ति चित्र

The post बोर्रा गुफाएँ – अरकू घाटी की छेद वाली गुफा – आन्ध्र प्रदेश का पर्यटन स्थल appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/araku-valley-borra-caves-andhra/feed/ 1 153