यात्रा साहित्य Archives - Inditales https://inditales.com/hindi/category/यात्रा-साहित्य/ श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Sat, 27 Jul 2024 14:08:37 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.7.5 महाभारत कथाओं में क्रोध एवं क्षमा के प्रसंग https://inditales.com/hindi/mahabharat-kab-krodh-karen-kab-kshama/ https://inditales.com/hindi/mahabharat-kab-krodh-karen-kab-kshama/#respond Wed, 04 Dec 2024 02:30:15 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3727

यदि आप मुझसे प्रश्न करें कि क्रोध एवं क्षमा में श्रेष्ठ क्या है, मुझे विश्वास है कि आप भी अधिकांश प्रसंगों में क्षमा का ही चुनाव करेंगे। हमें शिक्षा भी ऐसी ही दी गयी है। चूक करना मानवी स्वभाव है लेकिन क्षमा कर पाना एक दैवी उपलब्धि है। क्रोध एवं क्षमा – श्रेष्ठ क्या है? […]

The post महाभारत कथाओं में क्रोध एवं क्षमा के प्रसंग appeared first on Inditales.

]]>

यदि आप मुझसे प्रश्न करें कि क्रोध एवं क्षमा में श्रेष्ठ क्या है, मुझे विश्वास है कि आप भी अधिकांश प्रसंगों में क्षमा का ही चुनाव करेंगे। हमें शिक्षा भी ऐसी ही दी गयी है। चूक करना मानवी स्वभाव है लेकिन क्षमा कर पाना एक दैवी उपलब्धि है।

क्रोध एवं क्षमा – श्रेष्ठ क्या है?

महाभारत के तीसरे भाग में, अर्थात वन पर्व में कौरवों ने पांडवों को द्यूत क्रीडा में परास्त किया था तथा उन्हे पूर्वनिश्चित नियमों के अनुसार १२ वर्षों तक वन गमन का दंड दिया गया था।

वन तक उनके साथ सहगमन करते तथा वन में उनसे भेंट के लिए आए कृष्ण व दृष्टद्युम्न जैसे परिजनों, मित्रों एवं नागरिकों को वापिस नगर में लौटने की विनती कर सभी पांडव भ्राता एक सरोवर के निकट स्थाई हो गए। द्वैतवन नामक इस सुंदर सरोवर के चारों ओर पुष्पों एवं फलों के वृक्ष थे।

सरोवर के निकट बसेरा स्थापित करने के पश्चात द्रौपदी के ध्यान में आया कि इतने दुर्भाग्यपूर्ण प्रसंग के पश्चात भी युधिष्ठिर अत्यंत शांत हैं। उन्हे ऐसा प्रतीत हुआ कि युधिष्ठिर अपने साथ हुए अन्याय को विस्मृत कर चुके हैं तथा दोषियों को क्षमा कर दिए हैं।

द्रौपदी युधिष्ठिर के निकट बैठकर उन्हे अपने साथ हुए अन्यायपूर्ण व्यवहार का स्मरण कराती हैं। उनका ध्यान इस ओर आकर्षित करती हैं कि किस प्रकार कौरवों ने उनका एवं उनके चारों भ्राताओं का अपमान किया था। उन्होंने एक सुंदर कविता की रचना की जिसमें वे प्रत्येक पांडव के निरादर का उल्लेख करती हैं तथा उनके वर्तमान परिस्थिति का वर्णन करती हुई युधिष्ठिर से प्रश्न करती हैं कि इस सम्पूर्ण परिस्थिति में उन्हे क्रोध क्यों नहीं आ रहा है?

अंत में वे युधिष्ठिर को कौरवों द्वारा उनके स्वयं के मानमर्दन का स्मरण करती हैं तथा पुनः उनसे प्रश्न करती हैं कि यह सब उन्हे क्रोधित क्यों नहीं कर रहा है?

द्रौपदी युधिष्ठिर का ध्यान इस ओर भी आकर्षित करती हैं कि हस्तिनापुर से उनके निष्कासन के समय सभी परिजनों, मित्रों एवं नागरिकों के नयन अश्रुपूर्ण थे, लेकिन दुर्योधन, कर्ण, शकुनि एवं दुशासन, इन चारों के नयन अश्रुरहित थे।

तत्पश्चात, अपना पक्ष स्पष्ट करने के लिए द्रौपदी प्रह्लाद एवं उनके पोते बलि के मध्य हुए संवाद का वर्णन करती हैं।

प्रह्लाद एवं बलि के मध्य क्रोध एवं क्षमा विषय पर संवाद

एक समय असुरों के राजा बलि ने अपने दादा प्रह्लाद से प्रश्न किया कि कठोरता एवं क्षमा में श्रेष्ठ क्या है?

प्रह्लाद ने उत्तर दिया कि इनमें से कोई भी दूसरे से श्रेष्ठ नहीं है। एक ज्ञानी व्यक्ति ने काल एवं परिस्थिति के अनुसार उनका प्रयोग करना चाहिए।

यदि कोई दोषी सुगमता से क्षमा प्राप्त कर लेता है तो उसके सुधार की संभावना कम हो जाती है। यदि आपने किसी दोषी को आसानी से क्षमा कर दिया तो वह ना आपका, ना ही उस विषय का महत्व जान पाएगा। किसी को अतिशीघ्र क्षमा करने का स्वभाव होने पर एक भय यह भी होता है कि आपके अपने परिजन, आपके शत्रु एवं सामान्य जन आपका महत्व ना समझें तथा आपका यथोचित सम्मान ना करें।

जिन  व्यक्तियों का स्वभाव सदा ही क्षमाशील होता है, लोग उनके प्रति विनयी नहीं होते। अतः एक ज्ञानी व्यक्ति वही है जो सदा ही क्षमाशील नहीं होता। काल एवं परिस्थिति के अनुसार दोषी को दंड भी देना चाहिए।

आपका सेवक, कर्मचारी अथवा अधीनस्थ, प्रदत्त नियमों का पालन ना कर अपनी मनमानी कर सकता है क्योंकि वह जानता है कि आप अत्यंत क्षमाशील हैं। उसे तुरंत क्षमा कर देंगे। आगे जाकर वे अपराध कर सकते हैं। स्वयं के लाभ के लिए आपकी वस्तुओं का दुरुपयोग कर सकते हैं। आपकी अवमानना एवं अपमान कर सकते हैं।

अपने सेवक के द्वारा अपमानित होना मृत्यु से भी अधिक निकृष्ट माना जाता है।

आपकी क्षमाशीलता एवं मृदु स्वभाव देखकर आपके स्वयं के परिजन आपकी संपत्ति हथियाने का प्रयास कर सकते हैं। आपके सेवक, आपके पुत्र, आप पर निर्भर व्यक्ति, यहाँ तक कि असंबद्ध लोग भी कटु वचनों द्वारा आपकी आलोचना कर सकते हैं। आपकी अपनी ग्रहस्थी आपके नियंत्रण से बाहर जा सकती है।

दूसरी ओर, यदि आप प्रत्येक परिस्थिति का सामना क्रोध से करते हैं तो उसका प्रतिप्रभाव यह हो सकता है कि आप अविचारी होकर किसी निर्दोष व्यक्ति को दंड दे दें।

एक क्रोधी व्यक्ति के अनेक शत्रु होते हैं। उसका क्रोधपूर्ण स्वभाव उसके अपने भीतर तथा सामने वाले के भीतर शीघ्र ही शत्रुत्व उत्पन्न कर देता है। उसके अपने परिजनों के मन में तथा सर्व सामान्य लोग, जिनसे उसका निरंतर सामना होता है, उनके मन में भी उसके प्रति कुंठा अथवा कुढ़न उत्पन्न हो सकती है।

एक क्रोधी व्यक्ति, अपने स्वभाव के कारण, जाने-अनजाने दूसरों का अपमान कर बैठता है। इस प्रक्रिया में अपना सम्मान खो देता है। किसी अपमानित व्यक्ति की अवांछित प्रतिक्रिया के चलते उसकी संपत्ति भी नष्ट हो सकती है।

किसी पर अत्यधिक क्रोध करने तथा उसे अविचारपूर्ण दंडित करने के स्वभाव के कारण आपकी समृद्धि, आपका स्वास्थ्य तथा आपका परिवार आपसे रुष्ट हो सकते हैं।

और पढ़ें – रामचरितमानस के अनुसार राम राज्य की परिभाषा क्या है?

अतः एक संतुलित व्यवहार सदा ही उत्तम होता है। सदा क्रोध करना तथा सदा क्षमा कर देना, दोनों की अनुशंसा नहीं की जा सकती। दोनों ही आपको समान रूप से संकट में डाल सकते हैं। किसी भी प्रसंग में आप अपनी प्रतिक्रिया परिस्थिति, काल एवं स्थान के अनुसार विचारपूर्वक निश्चित करें। जो व्यक्ति माँग के अनुरूप अपना व्यवहार अतिमृदु से अतिकठोर के मध्य सुगमता से दोलित कर सकता है, वही विश्व विजेता होता है।

कब क्षमा करें?

  • यदि किसी व्यक्ति ने भूतकाल में आपके प्रति दयालुता से व्यवहार किया हो तो उसके दोष को क्षमा किया जा सकता है। यह उसकी भद्रता की ओर आपकी मृदु प्रतिक्रिया होगी।
  • यदि कोई व्यक्ति अनजाने में भूल करता है तो उसे क्षमा कर देना चाहिए। कोई भी व्यक्ति सभी परिस्थितियों में बुद्धि का सदुपयोग नहीं कर पाता है। भूल करना मानवी स्वभाव है। किन्तु उसने यह भूल अथवा अपराध अनजाने में की है, यह निश्चित हो जाना चाहिए। इसके लिए आप पर्याप्त संशोधन करें तथा विवेकपूर्ण निर्णय लें।
  • यदि कोई व्यक्ति अभिप्रायपूर्वक अपराध करता है तथा ढोंग करता है कि उससे अजनाने में अपराध हो गया है तो ऐसे व्यक्ति को दंड अवश्य देना चाहिए। ऐसी परिस्थिति में छोटे से छोटा अपराध भी अक्षम्य है।
  • किसी भी व्यक्ति की प्रथम भूल को क्षमा करना उचित होगा। किन्तु, यदि वह अपनी भूल की पुनः पुनः पुनरावृत्ति करता है तो वह कदापि क्षमाप्रार्थी नहीं हो सकता।
  • मृदु व्यवहार साधारणतया शत्रुत्व पर विजय प्राप्त करता है। अतः जब तक संभव हो, मृदु व्यवहार करें।
  • दंड दें अथवा क्षमा करें, यह निर्णय लेने से पूर्व अवस्थिति, काल एवं पारस्परिक सापेक्ष शक्ति का स्पष्ट आकलन कर लें। यदा-कदा समक्ष स्थित व्यक्ति की शत्रुता को निमंत्रण ना देने के लिए तथा उसको प्रसन्न करने के लिए उसे क्षमा करना पड़ता है।

ऐसे अनेक अवसर होते हैं जहाँ क्षमा करना उत्तम सिद्ध होता है। अन्य सभी परिस्थितियों में कठोर व्यवहार उचित होता है।

अंत में द्रौपदी युधिष्ठिर से कहती हैं कि कौरवों ने लालच एवं असम्मानजनक व्यवहार की सीमा पार कर दी है। अब समय आ गया है कि उन्हे उनके व्यवहार के लिए कठोर दंड दिया जाना चाहिए। उन्हे क्षमा करने का कोई भी कारण नहीं है।

इस विषय पर द्रौपदी एवं युधिष्ठिर के मध्य हुए संवादों में क्षमा के गुण-धर्म, कर्म की आवश्यकता आदि पर अनेक चर्चाएँ हुईं। उनके विषय में हम किसी अन्य अवसर पर चर्चा करेंगे।

स्रोत – अध्याय २८, वन पर्व, महाभारत। (गीत प्रेस द्वारा प्रकाशित)

यह वेबस्थल अमेजॉन का सहयोगी है। अतः आप जब भी इस लिंक से कुछ क्रय करेंगे, उसका एक लघु भाग यह वेबस्थल के खाते में निष्पन्न होगा। किन्तु इससे आपके व्यय में कोई अंतर नहीं आएगा।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post महाभारत कथाओं में क्रोध एवं क्षमा के प्रसंग appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/mahabharat-kab-krodh-karen-kab-kshama/feed/ 0 3727
महाभारत काल में वित्त व वाणिज्य की कथा https://inditales.com/hindi/mahabharat-mein-vitt-aur-vanijya/ https://inditales.com/hindi/mahabharat-mein-vitt-aur-vanijya/#respond Wed, 07 Aug 2024 02:30:41 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3659

महाभारत काल में एक द्यूतक्रीडा में कौरवों के हाथों पराजित होने के पश्चात पांडवों को १३ वर्ष वनवास भोगना पड़ा था। उनके हाथों से सम्पूर्ण वैभव, धन-संपत्ति तथा राजपाट छिन गया था। इससे पांडव खिन्न थे। द्रौपदी एवं भीम अपनी इस दशा के लिए युधिष्ठिर को दोषी मान रहे थे। युधिष्ठिर को अपराध बोध अवश्य […]

The post महाभारत काल में वित्त व वाणिज्य की कथा appeared first on Inditales.

]]>

महाभारत काल में एक द्यूतक्रीडा में कौरवों के हाथों पराजित होने के पश्चात पांडवों को १३ वर्ष वनवास भोगना पड़ा था। उनके हाथों से सम्पूर्ण वैभव, धन-संपत्ति तथा राजपाट छिन गया था। इससे पांडव खिन्न थे। द्रौपदी एवं भीम अपनी इस दशा के लिए युधिष्ठिर को दोषी मान रहे थे। युधिष्ठिर को अपराध बोध अवश्य था लेकिन वे धर्मपालन के प्रति भी पूर्णतः समर्पित थे। इसीलिए उन्होंने वनवास का दंड सहर्ष स्वीकार कर लिया था।

मिथिला के राजा जनक द्वारा दिए गए जीवन ज्ञान के संदर्भ से, शौनक मुनि अरण्यकाल में युधिष्ठिर को जीवन के विविध आयामों पर ज्ञानोपदेश करते हैं। उसके अंतर्गत वे वित्त एवं वाणिज्य से संबंधित विषयों में भी उपदेश करते हैं। उस काल में प्रदान किया गया वित्त एवं वाणिज्य से संबंधित प्रज्ञान वर्तमान में भी उतना ही प्रासंगिक है। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं:

जिस प्रकार मानव मृत्यु से भयभीत रहता है, एक समृद्ध व्यक्ति भी सदा राजा, जल, अग्नि, चोर-डाकुओं एवं अपने परिजनों से भयभीत रहता है।

वित्तीय विषयों की चर्चा करें तो क्या यह वक्तव्य आज भी उतना ही सटीक नहीं है? एक व्यापारी, चाहे वह उच्चतम स्तर का हो अथवा निम्नतम स्तर का हो, वह सदा सरकार से भयभीत रहता है। कौन जाने किस समय कौन सा अतिरिक्त कर लगा दे! अथवा कौन से नियम में परिवर्तन कर दे जिससे क्षण भर में उनका व्यापार धाराशायी हो जाए! इसके अतिरिक्त दो देशों के मध्य युद्ध अथवा दो राजनैतिक गुटों के मध्य नित परिवर्तित होते समीकरण का भी अंतर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय व्यापार पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इसका ज्वलंत उदाहरण है, रशिया-यूक्रेन युद्ध, जिसका अनेक अंतर्राष्ट्रीय व्यापारों पर विपरीत प्रभाव पड़ा है।

जब जल एवं अग्नि के प्रभाव का उल्लेख किया जाता है, तब इसका संकेत प्राकृतिक एवं मानव-निर्मित आपदाओं की ओर होता है। व्यापार के परिप्रेक्ष्य में भी दोनों जोखिम भरे संकट हैं। इनके कारण उत्पादों को भारी क्षति पहुँच सकती है। माल के सुगम आवागमन में बाधाएं उत्पन्न हो सकती हैं। प्रौद्योगिकी के विभिन्न स्तरों के कारण एक साधारण ग्राहक इन जटिलताओं से अनभिज्ञ रहता है। किन्तु सत्य यही है कि व्यवसाय एवं व्यापार सुदृढ़ धरातल पर किये जाते हैं जिनमें जन एवं माल की आवाजाही एक महत्वपूर्ण भाग है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में डिजिटल आधारभूत संरचनाओं पर भी असामाजिक तत्वों द्वारा आक्रमण का संकट मंडरा रहा है।

डिजिटल अथवा अंकीय प्रौद्योगिकी के उद्भव से पूर्व, हमें हमारी संपत्ति, मालमत्ते, नकद एवं परिजनों की भौतिक सुरक्षा की ही चिंता रहती थी। किन्तु अंकीय प्रोद्योगिकी के आगमन का प्रभाव सुरक्षा व्यवस्था पर भी पड़ा है। जहाँ एक ओर नितनवीन तकनीकों द्वारा हम हमारी संपत्ति की रक्षा का प्रबंध कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उसी अंकीय प्रौद्योगिकी में दक्ष कुछ असामाजिक तत्व उसी तकनीक का प्रयोग दुगुनी गति से कर रहे हैं। हम सब इसी भय में निमग्न रहते हैं कि कब कौन इस तकनीक का अभिनव प्रयोग कर हमारी संपत्ति को लूट ले। इसी कारण व्यवसायियों के लिए अपनी सुरक्षा व्यवस्था को अनवरत सुदृढ़ बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।

ऐसा कहा जाता है कि ठग-लुटेरे नवीन तकनीकों के सर्वप्रथम एवं सर्वोत्तम उपभोक्ता होते हैं। यह एक प्रकार का चोर-पुलिस का खेल है जो ठगों एवं व्यापारियों के मध्य जारी रहता है। अथवा सरकारी इकाईयों एवं भ्रष्टाचारियों के मध्य जारी रहता है।

अनोखा तथ्य यह है कि समृद्ध व्यक्ति को अपने परिवारजनों से भी भय लगा रहता है। एक सफल व्यवसाय को स्थापित करने के लिए विश्वासपात्र सहयोगियों के समूह की आवश्यकता होती है। किन्तु कभी कभी इन्ही सहयोगियों में से कोई विश्वासघात कर बैठता है तथा परम शत्रु बन जाता है। आपको देवी माहात्म्य में समाधि वैश्य की कथा स्मरण होगी जिसके साथ उसके परिवारजनों ने ही विश्वासघात किया था। वहीं रामायण में विभीषण को रावण के पतन का कारण माना जाता है। इस प्रसंग से ही लोकप्रिय कहावत का जन्म हुआ था, घर का भेदी लंका ढाए।

जो परिवारजन अथवा मित्र हमारे अत्यंत समीप होते हैं, उन्हे हमारे अथवा हमारे व्यवसाय संबंधी सभी गोपनीय तथ्यों की जानकारी होती है। यह जानकारी उन्हे वह शक्ति प्रदान करती है जिसके द्वारा वे चाहें तो हमें सर्वाधिक आघात पहुँचा सकते हैं।

जिस प्रकार एक पक्षी आकाश में, एक पशु भूमि में तथा एक मछली जल में माँस के एक टुकड़े को झपटकर पकड़ लेती है, उसी प्रकार एक समृद्ध व्यक्ति की संपत्ति में से कुछ भाग हथियाने के लिए सभी तत्पर रहते हैं।

एक समृद्ध व्यक्ति के रूप में आप ना केवल लोगों की ईर्ष्या का पात्र बनते हैं, अपितु कई लोग आपकी संपत्ति में से कुछ भाग झपटने के लिए भी तत्पर रहते हैं। किसी को आपसे दान-दक्षिणा की अपेक्षा रहती है तो किसी को रोजगार की। वहीं कुछ लोग आपको अपने उत्पाद अथवा सेवाएं विक्री करने के लिए तत्पर रहते हैं। इन सब को प्राप्त करने के लिए वे मधुर वचनों का प्रयोग कर सकते हैं अथवा चापलूसी कर सकते हैं। अन्यथा आपसे दुष्टता भी कर सकते हैं। एक समृद्ध व्यक्ति के लिए ऐसे लोगों को जानना, पहचानना तथा उनसे सावधान रहना अत्यंत आवश्यक है।

आपके जीवन में आपको आकाश, भूमि एवं जल जैसे सभी संभव वर्गीकरणों का अनुभव प्राप्त होगा, चाहे वे परिवारजन हों अथवा मित्र, चाहे वे कर्मचारी हों अथवा व्यावसायिक संबंधी, चाहे वह सरकार हो अथवा दान मांगने वाले। जहाँ भी वित्त अथवा धन संबंधी विषय हो, हमें इस सभी वर्गों से सावधान रहने की आवश्यकता है।

मेरे अनुमान से यही कारण होगा कि वैश्य समाज के अधिकांश परिवार अपनी समृद्धि का दिखावा करने से कतराते हैं क्योंकि ऐसा करके वे अवांछित तत्वों को अपनी ओर आकर्षित कर सकते हैं। इसी कारण से वे सादगी पूर्ण जीवन उत्तम समझते हैं। ना कि क्षत्रिय समाज के परिवार के अनुरूप, जो अपना प्रभाव प्रदर्शित करने के लिए अपनी समृद्धि का दिखावा करते हैं। इस विषय में आपकी क्या राय है?

संपत्ति प्राप्त करने के ३ उपाय

महाभारत में आपने पढ़ा होगा कि अपनी सम्पूर्ण संपत्ति एवं राज्य को चौपड़ के दांव में हार जाने के पश्चात पांडवों ने वन की शरण ली थी। वे वन में कंदमूल एवं फल खा कर दिवस व्यतीत कर रहे थे। द्रौपदी को यह सब अत्यंत अरुचिकर प्रतीत हो रहा था। वो नहीं चाहती थी कि युधिष्ठिर एवं अन्य पांडव भ्राता ऐसे  जीवन से आत्मसंतुष्टि प्राप्त करते रहें। वो चाहती थी कि युधिष्ठिर एवं अन्य पांडव भ्राता अपने खोए हुए राज्य एवं संपत्ति को पुनः प्राप्त करने के लिए तत्पर हों। इसलिए वे युधिष्ठिर को उकसाती हैं कि इस ओर प्रयत्न शीघ्र आरंभ करें। वे सतत उनसे कहती कि कर्म के बिना जीवन में कुछ भी प्राप्त नहीं हो सकता। द्रौपदी ने युधिष्ठिर को कर्म की बृहस्पति नीति से भी अवगत कराया था।

संपत्ति प्राप्त करने के तीन साधन हैं: कर्म, भाग्य एवं प्रकृति।

महाभारत में वित्त और वाणिज्य
महाभारत में वित्त और वाणिज्य

हम सब कर्म के विषय में जानते हैं, संपत्ति अर्जित करने के लिए कार्य करना। यह हमारे नियंत्रण में होता है।

भाग्य वह तत्व है जो जन्म से हमारे साथ जुड़ जाता है। वह हमारे पूर्व जन्मों के कर्मों पर आधारित होता है। अतः यदि आपके भाग्य से आपका जन्म किसी संपन्न परिवार में होता है तो आप धनवान हो सकते हैं। आपके भाग्य से आप कोई लॉटरी जीत सकते हैं। उसे भगवान का आशीर्वाद अवश्य मानिए किन्तु संपत्ति प्राप्त करने के पश्चात निष्क्रिय होकर ना बैठें। यह संपत्ति आपको बिना किसी परिश्रम के प्राप्त हुई है लेकिन उसे बनाए रखने के लिए परिश्रम अवश्य करना पड़ेगा। यदि पूर्व सत्कर्मों की कृपा से यह धन आपको अनायास ही प्राप्त हुआ है तो पुनः इसी प्रकार से धन प्राप्त करने के लिए आपको वैसे ही सत्कर्म पुनः करने पड़ेंगे।

आप कैसे कर्म करते हैं, यह आपके जन्मजात स्वभाव पर निर्भर करता है। यदि आपके कर्म आपके स्वभाव से साम्य रखते हैं तो आपको आपके कर्म में आनंद प्राप्त होगा तथा वह कर्म तदनुसार फल देगा। सद्धर्म एवं सत्कर्म आपको आनंददायी फल प्रदान करेंगे। सम्पूर्ण समर्पण से सद्धर्म निभाएं तथा सत्कर्म करें अन्यथा वही कर्म एक बोझ प्रतीत होगा।

एक बुद्धिमान व्यक्ति सर्वप्रथम यह ज्ञान प्राप्त करता है कि बीज के भीतर वसा होती है, गौ के भीतर दूध होता है तथा लकड़ी के भीतर अग्नि होती है। तत्पश्चात वह उन्हे दुहने के साधनों की खोज करता है।

द्रौपदी मनु के कथन का उद्धरण देती हैं – संभव है कि कर्म करने के पश्चात भी आपको मनचाहा फल प्राप्त ना हो। ऐसी परिस्थिति में हमें अपने कर्मों का विश्लेषण करना चाहिए कि हमसे क्या चूक हो गई, कहाँ कमी रह गयी तथा उस चूक को सुधारने का प्रयत्न करना चाहिए। यदि आपको वारंवार वांछित फल प्राप्त ना हो तब भी निराश ना हों। कर्मों का फल प्राप्त होने में हमारे भाग्य एवं भगवान की कृपा की भी विशेष भूमिका होती है। अतः अपना अखंड प्रयास जारी रखें।

यदि आप कर्म ही नहीं करेंगे तो फल प्राप्त करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता है।

वित्त एवं वाणिज्य संबंधी विषयों में आपके प्रयास की दिशा इस ओर होनी चाहिए – अर्जन, सुवर्धन एवं संरक्षण। यदि आप अर्जन से अधिक व्यय करेंगे तो हिमालय जैसी संपत्ति भी एक ना एक दिवस समाप्त हो जाएगी। जो केवल भाग्य के आश्रय में जीवन व्यतीत करता है वह उसी प्रकार समाप्त हो जाएगा जिस प्रकार कच्ची मिट्टी के घड़े में जल भरने से घड़ा नष्ट हो जाता है। अर्थात क्षण भर में उसका नाश हो जाएगा।

यह वेबस्थल अमेजॉन का सहयोगी है। अतः आप जब भी इस लिंक से कुछ क्रय करेंगे, उसका एक लघु भाग यह वेबस्थल के खाते में निष्पन्न होगा। किन्तु इससे आपके व्यय में कोई अंतर नहीं आएगा।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post महाभारत काल में वित्त व वाणिज्य की कथा appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/mahabharat-mein-vitt-aur-vanijya/feed/ 0 3659
गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस पठन के ५ मुख्य उद्देश्य https://inditales.com/hindi/tulsidas-ramcharitmanas-kyun-padhen/ https://inditales.com/hindi/tulsidas-ramcharitmanas-kyun-padhen/#comments Wed, 02 Nov 2022 02:30:08 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2850

मेरा ध्येय है कि मैं सदा मूल भारतीय ग्रंथों का ही पठन करूँ। इसी कड़ी में मैंने गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के पठन का निश्चय किया। हम सब जानते हैं कि भारत के दो प्रमुख महाकाव्य, रामायण एवं महाभारत पर असंख्य व्याख्याएं, टिप्पणियाँ तथा व्युत्पन्न रचनाएँ प्रकाशित की गयी हैं। इसी कारण मैंने सर्वप्रथम […]

The post गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस पठन के ५ मुख्य उद्देश्य appeared first on Inditales.

]]>

मेरा ध्येय है कि मैं सदा मूल भारतीय ग्रंथों का ही पठन करूँ। इसी कड़ी में मैंने गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के पठन का निश्चय किया। हम सब जानते हैं कि भारत के दो प्रमुख महाकाव्य, रामायण एवं महाभारत पर असंख्य व्याख्याएं, टिप्पणियाँ तथा व्युत्पन्न रचनाएँ प्रकाशित की गयी हैं। इसी कारण मैंने सर्वप्रथम कालिदास की रघुवंशम् से मेरा पठन आरम्भ किया। इसके पश्चात मैंने गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के पठन का निश्चय किया। इसका मुख्य कारण था कि भले ही यह अत्यंत विस्तृत ग्रन्थ है, मैंने अनुमान लगाया कि इसका पठन अपेक्षाकृत सरल होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रामचरितमानस पठन के ५ मुख्य उद्देश्य
गोस्वामी तुलसीदास रामचरितमानस पठन के ५ मुख्य उद्देश्य

रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने अवधी भाषा का प्रयोग किया है। अवधी भाषा से स्वयं को अभ्यस्त करने में मुझे कुछ समय लगा। ११०० पृष्ठों के रामचरितमानस के पठन के आरंभिक चरण में मेरी पठन की गति अत्यंत धीमी थी। जैसे आरम्भ में मैं एक दिवस में केवल एक अथवा दो पृष्ठ ही पठन कर पाती थी। किन्तु मैंने रामचरितमानस पठन में विराम लगने नहीं दिया। शनैः शनैः मैं अवधी भाषा से अभ्यस्त होने लगी तथा मेरी पठन गति में भी वृद्धि होने लगी। कुछ दिवसों पश्चात् मैं औसतन १० पृष्ठ प्रतिदिन पठन करने लगी थी। एक यात्रा संस्करण लेखिका होने के कारण यात्राओं एवं संस्करण लेखन के लिए भी मुझे समय निर्दिष्ट करना पड़ता है। अन्य सामाजिक गतिविधियों में भी योगदान देने का मेरा सतत प्रयास रहता है। अतः, प्रायः अपनी सभी गतिविधियों को यथावत रखते हुए मुझे ११०० पृष्ठों के रामचरितमानस के पठन में लगभग ६ मास का समय लगा।

मूल रामचरितमानस ग्रन्थ के पठन के पश्चात मैंने जो अनुभव प्राप्त किया, वह आपसे साझा कर रही हूँ।

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित मूल रामचरितमानस पठन

यदि मेरे लिए संभव है तो आपके लिए भी संभव है।

मेरे पास गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित रामचरितमानस ग्रन्थ है जिसमें ११०० पृष्ठ हैं। इसमें अवधी भाषा का प्रयोग किया गया है। साथ ही कुछ स्थानों पर संस्कृत भाषा में श्लोक इत्यादि हैं। उन सभी का क्रमशः हिन्दी में अनुवाद किया गया है। आरम्भ में मुझे यह एक कठिन कार्य प्रतीत हुआ।

ग्रन्थ आरम्भ करने से पूर्व मैंने इसे पूर्ण करने के लिए ३ वर्षों से अधिक समय का अनुमान लगाया था। किन्तु जैसे ही अवधी भाषा में मेरी प्रवीणता में वृद्धि होने लगी, उसका पठन शनैः शनैः सरल प्रतीत होने लगा। पठन गति में वृद्धि होने लगी। मैं प्रतिदिन प्रातः शीघ्र उठती, स्नानादि के पश्चात पृष्ठों की नियत संख्या का पठन करती, उसके पश्चात ही अपने दैनिक व्यवसायिक कार्यों का आरम्भ करती थी।

जो पाठक हिन्दी भाषा में धाराप्रवाह पठन करते हैं, उन्हें अवधी कदापि कठिन प्रतीत नहीं होगी। अवधी भाषा में कुछ शब्दों के अर्थ समझ में आ जाएँ तथा उनके समान्तर शब्दों का प्रयोग भी जान जाएँ तो आपको पुनः पुनः शब्दकोष के पृष्ठ पलटने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

अपने अनेक व्यवसायिक क्रियाकलापों के साथ यदि मैं इसका पठन कर सकती हूँ तो आप भी कर सकते हैं। यदि आपकी इच्छाशक्ति दृढ़ है तो आप इसके लिए समय अवश्य निकाल सकते हैं।

और पढ़ें: मीनाक्षी जैन द्वारा लिखित राम एवं अयोध्या

यह केवल श्रीराम की एक कथा नहीं है

यद्यपि रामचरितमानस में श्री राम की कथा का प्रमुखता से उल्लेख किया गया है, तथापि यह ग्रन्थ कथा के विभिन्न आयामों को विस्तार से दर्शाता है। भगवान राम के जन्म से पूर्व भगवान शिव एवं माता पार्वती के विवाह का विस्तृत वर्णन किया गया है। ऐसी अनेक घटनाओं  का उल्लेख है जिनका श्रीराम की कथा से सीधा सम्बन्ध नहीं है। जैसे भगवान विष्णु द्वारा अयोध्या में भगवान राम के रूप में जन्म लेने की पृष्ठभूमि में स्थित विभिन्न कारण।

राम-जानकी विवाह की कथा में राम एवं लक्ष्मण के संबंधों पर प्रमुखता से ध्यान केन्द्रित किया गया है। राम-भरत मिलाप की कथा भरत के चरित्र को उजागर करती है तथा उसी पर ध्यान केन्द्रित करती है। सुन्दर काण्ड में गोस्वामीजी ने हनुमान जी एवं भगवान राम के प्रति उनके प्रेम से हमें अवगत कराया है। लंका नरेश रावण की स्वर्ण नगरी की भव्यता का विस्तृत रूप से उल्लेख किया है।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के विभिन्न पात्रों के चरित्र को इतनी विलक्षणता से चित्रित किया है कि हम सहज रूप से उनके संबंध हमारे आसपास के व्यक्तिमत्वों से जोड़ने लगते हैं।

जब भगवान राम लंका पर विजय प्राप्त कर सीता माता के साथ अयोध्या वापिस आते हैं तथा राम राज्य की स्थापना करते हैं, वहीं रामचरितमानस की कथा समाप्त होती है। मेरे लिए सम्पूर्ण रामचरितमानस का सर्वाधिक मनमोहक भाग है, राम राज्य का उल्लेख। यह उस आदर्श राज्य की कल्पना है जब सृष्टि के प्रत्येक तत्व का अन्य तत्वों से पूर्ण सामंजस्य होता है। अपने सुन्दर दोहों व छंदों द्वारा उन्होंने राम राज्य की अप्रतिम संकल्पना दी जिसके अनुसार – यदि प्रत्येक मनुष्य अपने धर्म एवं वर्ण के अनुसार कृति करे तब यह सम्पूर्ण विश्व भय, रोगों एवं दुखों से मुक्त हो जाएगा। मेरे अनुमान से राम राज्य की संकल्पना पर एक स्वतन्त्र एवं विस्तृत संस्करण लिखा जाना चाहिए।

और पढ़ें: अयोध्या की तस्वीरें – शारदा दुबे

रामचरितमानस में मिथकों का खंडन

हमने अनेक सूत्रों द्वारा रामायण की कथाओं को सुना तथा देखा है। जिसे रामायण के पात्रों का जैसा चरित्र उचित जान पडा, उसने उसका वैसा वर्णन किया है। इसके कारण पाठकों एवं दर्शकों के मन-मस्तिष्क में अनेक मिथकों ने जन्म लिया है। मैं भी उनसे अछूती नहीं थी। किन्तु जब मैंने रामचरितमानस का मूल ग्रन्थ पढ़ा, मेरे मस्तिष्क में घर कर बैठे अनेक मिथकों का खंडन हो गया। जैसे रामचरितमानस के अरण्य काण्ड में, जहां से सीता माता का अपहरण किया गया था, वहाँ लक्ष्मण रेखा का कोई उल्लेख नहीं किया गया है। लक्ष्मण केवल आसपास के वृक्षों से निवेदन करते हैं कि वे उनकी अनुपस्थिति में सीता माता का ध्यान रखें।

लक्षमण रेखा के विषय में लंका काण्ड में मंदोदरी ने केवल सरसरी रूप से उल्लेख किया है जब वे रावण को उलाहना देते हुए कहती हैं कि आपने लक्षमण द्वारा खींची गयी रेखा का उल्लंघन किया है तो अब राम का सामना कैसे करोगे? लक्ष्मण रेखा शत्रुओं अथवा अवांछित तत्वों द्वारा ना लांघने के लिए खींची गयी थी, ना कि सीता के लिए।

रामचरित मानस के इस संस्करण में सीता माता के अयोध्या से निष्कासन की कोई कथा नहीं है। यहाँ तक कि लव व कुश के जन्म का उल्लेख भी एक-चौथाई दोहे में कर दिया गया है। राम द्वारा सरयू नदी में समाधि लेने का भी कहीं उल्लेख नहीं है।

जब राजा दशरथ की तीनों रानियाँ राम से भेंट करने वन में जाती हैं तब उन्हें देखकर राम को यह कदापि ज्ञात नहीं होता है कि पिता राजा दशरथ का निधन हो गया है। विधवा, इस शब्द का कहीं उल्लेख नहीं है। उन्हें सदा रानी अथवा माता से संबोधित किया गया है।

और पढ़ें: बिठूर – गंगा किनारे ब्रह्मा एवं वाल्मीकि की भूमि

संवादों द्वारा कथाकथन

भारतीय ग्रंथों को संवादों तथा वार्तालाप के रूप में लिखा गया है। रामचरितमानस में भी श्री राम की कथा शिव एवं पार्वती के मध्य तथा काक भुशुण्डी एवं गरुड़ के मध्य संवादों के रूप में रचित है। गोस्वामी तुलसीदास स्वयं भी यदा-कदा अपनी उपस्थिति दर्शा देते हैं। इनके अतिरिक्त विभिन्न आश्रमों में ऋषियों एवं उनके शिष्यों के मध्य हुए संवाद भी हैं।

राम, लक्ष्मण एवं सीता के पंचवटी आश्रय काल में राम एवं लक्षमण के मध्य दार्शनिक विषयों पर भी संवाद होते थे। जैसे, माया क्या है? जब राम एवं लक्षमण किष्किन्धा में वर्षाऋतू के समाप्त होने की प्रतीक्षा कर रहे थे तब राम को स्वयं से संवाद साधते हुए, ऋतुओं की तुलना शासनकला से करते दर्शाया गया है।

रामचरितमानस के अंतिम चरण में काक भुशुण्डी का एक दीर्घ प्रवचन है जिसमें वे कथा को समाप्त करते हुए पाठकों को शिक्षाप्रद सन्देश देते हैं।

और पढ़ें: Actors, Pilgrims, Kings and Gods – The Ramlila of Ramnagar by Anuradha Kapur

भारतीय संस्कृति की सूक्ष्मताएँ

रामचरितमानस की भाषा में भारतीय संस्कृति का सत्व समाया हुआ है। उसमें भारतीय संस्कृति की सूक्ष्मताएँ सन्निहित हैं। जैसे, जब नाविक केवट भगवान राम, सीता माता एवं लक्षमण को अपनी नौका में बिठाकर गंगा पार कराते हैं, तब सीता माता केवट को अपनी अंगूठी देकर उसके श्रम का भुगतान करने का प्रयास करती हैं। केवट यह कहकर अंगूठी लेने से मना कर देते हैं, “मैं भी केवट, तुम भी केवट, कैसे लूं तेरी उतराई”।

केवट कहते हैं कि हे राम जिस प्रकार मैं गंगा पार कराता हूँ, आप भवसागर पार कराते हैं। एक केवट दूसरे केवट से भुगतान कैसे ले सकता है? वैसे भी शुल्क गंतव्य पर पहुंचाने का होता है। हमसे सामान्यतः नौका पर चढ़ने से पूर्व ही शुल्क लिया जाया है, भले ही हम वहाँ पहुंचे अथवा नहीं।

और पढ़ें: In search of Sita by Malashri Lal & Namita Gokhale

सदैव मूल रामचरितमानस का ही पठन क्यों करें?

विश्व में रामायण के अनेक संस्करण हैं तथा असंख्य पुनःकथन किये गए हैं। वस्तुतः, गोस्वामी तुलसीदास का रामचरितमानस भी प्राचीन वाल्मीकि रामायण का १७वी शताब्दी का पुनःकथन है। आशा है कि प्राचीन वाल्मीकि रामायण के पठन का मुहूर्त भी मुझे शीघ्र प्राप्त होगा।

रामायण की कथा की अनेक परतें हैं। राम अवतार की कथा एक मुखावरण है जिसके द्वारा मानव चरित्र के गहन समझ को पाठक तक पहुँचाया गया है। प्रत्येक पाठक इसे अपने दृष्टिकोण से पठन करता है। यही भारतीय ग्रंथों का वैशिष्ठ्य है। आप उन्हें अनेक दृष्टिकोणों से पठन कर सकते हैं तथा समझ सकते हैं। एक दृष्टिकोण ऐसा है जो उस पर कदापि लागू नहीं होता है, वह है ओछापन।

रामायण को जिस प्रकार लिखा गया है अथवा कहा गया है, उसे वैसे ही पठन करना तथा अपने स्वयं के निष्कर्ष निकालना महत्वपूर्ण है। इसीलिए मूल ग्रन्थ का पठन अत्यावश्यक होता है जो बिना किसी पक्षपात एवं निर्णय के घटनाओं को अपने मूल रूप में आपके समक्ष प्रस्तुत करता है.

आईये गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस का पठन करें।

गोस्वामी तुलसीदास का रामचरितमानस आप Amazon.In से ले सकते हैं अथवा Kindle Book में पढ़ सकते हैं।

यह स्थल Amazon का सहायक है। उपरोक्त संकेत द्वारा आप जो भी पुस्तकें क्रय करेंगे, उसका कुछ प्रतिशत धनार्जन इस स्थल को प्राप्त होने की संभावना है। किन्तु इससे आपके क्रय मूल्य में कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस पठन के ५ मुख्य उद्देश्य appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/tulsidas-ramcharitmanas-kyun-padhen/feed/ 1 2850
राहुल सांकृत्यायन रचित घुमक्कड़ स्वामी – यात्रा साहित्य https://inditales.com/hindi/ghumakkad-swami-rahul-sankrityayan-samiksha/ https://inditales.com/hindi/ghumakkad-swami-rahul-sankrityayan-samiksha/#comments Wed, 23 Dec 2020 02:30:41 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2099

श्री राहुल सांकृत्यायन द्वारा लिखित पुस्तक “घुमक्कड़ स्वामी” एक भ्रमणप्रिय साधू की कथा है जिसने उत्तरी भारत की लम्बाई तथा चौड़ाई नापी है। यह उस घुमक्कड़ी साधक की आत्मकथा है जिसने भारत के धार्मिक भूगोल को खंगाला है। जहां एक ओर कैलाश मानसरोवर की यात्रा की, वहीं कई पंथों को जानने हेतु समय समय पर […]

The post राहुल सांकृत्यायन रचित घुमक्कड़ स्वामी – यात्रा साहित्य appeared first on Inditales.

]]>

श्री राहुल सांकृत्यायन द्वारा लिखित पुस्तक “घुमक्कड़ स्वामी” एक भ्रमणप्रिय साधू की कथा है जिसने उत्तरी भारत की लम्बाई तथा चौड़ाई नापी है। यह उस घुमक्कड़ी साधक की आत्मकथा है जिसने भारत के धार्मिक भूगोल को खंगाला है। जहां एक ओर कैलाश मानसरोवर की यात्रा की, वहीं कई पंथों को जानने हेतु समय समय पर उन धर्मों का पालन भी किया। वास्तव में वह भारत के अध्यात्मिक नक़्शे में स्वयं हेतु उपयुक्त स्थान की खोज कर रहा है। घुमक्कड़ योगीयों के समुदायों में स्वयं को सम्मिलित करते हुए उसने योग का मार्ग अपनाया है। उसे आयुर्वेद में भी महारथ प्राप्त है तथा वह प्रायः औषधिक वनस्पतियों की खोज में भ्रमण करता रहता है। वनस्पतियों पर शोध करने के लिए कई प्रयोगशालाएं भी स्थापित की हैं। अंततः उसने आयुर्वेद औषधियां बनाने हेतु एक निजी उद्योगिक इकाई भी स्थापित की है। निजी जीवन में सांसारिक दायित्वों का पालन करते हुए उसने विवाह भी किया तथा पत्नी संग सुखी जीवन व्यतीत किया।

राहुल सांकृत्यायन रचित घुमक्कड़ स्वामी
राहुल सांकृत्यायन रचित घुमक्कड़ स्वामी

उपरोक्त तथ्य जो मैंने आपके समक्ष प्रस्तुत किया वह इस पुस्तक में घुमक्कड़ स्वामी द्वारा कही गयी कहानी की रूपरेखा है। घुमक्कड़ स्वामी एक महाकथा है जो स्वामी द्वारा दर्शन किये गए स्थलों पर आधारित कथाओं से निर्मित है। इस पुस्तक का कथानक १९वी. से २०वी. शताब्दी के मध्य काल से सम्बन्ध रखता है। चूंकि कथाएं लगभग १०० वर्ष पूर्व के सामाजिक परिवेश से सम्बन्ध रखती हैं, यह हमारे लिए समकालीन समाज का सुन्दर चित्रण है। हमारे भारतवर्ष ने पिछले १०० वर्षों में बहुत कुछ देखा व भोगा है। वह चाहे स्वतंत्रता प्राप्ति हो अथवा देश का बंटवारा। यह घटनाएँ आज भी हमारे देश तथा देशवासियों हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। कदाचित इसीलिये यह पुस्तक जनमानस को भावनात्मक स्तर पर झकझोरती है। राहुल सांकृत्यायन एक अनुभवी यात्रा संस्मरण लेखक हैं। अतः कथा के नायक स्वामी को वे जहां जहां भी भ्रमण हेतु ले जाते हैं, वहां के इतिहास को पूर्णतया जानने का प्रयत्न करते हैं। उनके संस्मरणों द्वारा हमें भी उन स्थलों के नामों की व्युत्पत्ति, नगर से सम्बंधित रोचक पहलुओं, वहां के परिदृश्य तथा विभिन्न आयामों को सूक्ष्मता से जानने का अवसर मिलता है।

राहुल सांकृत्यायन की ‘घुमक्कड़ स्वामी’ खरीदें अमेज़न पे

राहुल सांकृत्यायन की इस पुस्तक की एक उपलब्धि यह भी है कि यह साधु-सन्यासियों के जनजीवन से हमारा परिचय कराती है। ये साधु-सन्यासी मोह-माया तथा समाज का त्याग करने के पश्चात भी मौलिक आवश्यकताओं के लिए इस समाज पर ही निर्भर रहते हैं। भले ही उनकी इच्छा वनों में जाकर ध्यान लगाने की हो, किन्तु उदर-भरण हेतु भिक्षा माँगने उन्हें किसी के घर जाना ही पड़ता है। अतः बस्ती से विरक्त रहकर भी उन्हें बस्ती के समीप ही बसेरा करना पड़ता है ताकि आसानी से भोजन प्राप्त कर सकें। मिथ्याएं किस प्रकार से उत्पन्न होती हैं, इस पुस्तक से हमें यह भी जानकारी प्राप्त होती है। कुछ साधु-सन्यासी समूहों में एकत्र होकर किस प्रकार सांकेतिक भाषाओं का उपयोग करते हुए अपना गुट बनाते हैं, लेखक ने इसकी भलीभांति व्याख्या की है। हरिदास स्वामी की जीवनी द्वारा लेखक हमें भिन्न भिन्न प्रकार के साधु तथा उनके कार्यप्रणालियों के विषय में बताते हैं। पर्याप्त समय कई साधुओं के सानिध्य में व्यतीत करते हुए स्वामी इन साधू-सन्यासियों के विषय में अतरंग जानकारी प्राप्त करता है।

इस पुस्तक को पढ़ते समय मुझे २१वी. सदी के उन भव्य आश्रमों का भी स्मरण हो आया जो कुछ समय पूर्व सर्वत्र चर्चा का विषय थे। प्राप्त जानकारी के अनुसार इन आश्रमों की विलासिता तुलना से परे है।

और पढ़ें – राहुल सांकृत्यायन द्वारा लिखित अन्य पुस्तक – वोल्गा से गंगा

साधू-सन्यासियों का विषय पुस्तक के पूर्वार्ध तक ही सीमित है। कथा के उत्तरार्ध में लेखक ने अधिकांशतः आयुर्वेद तथा औषधियों के विषय में चर्चा की है क्योंकि कथानक का नायक, स्वामी आयुर्वेद का एक व्यवसाय स्थापित कर रहा है। इस उपक्रम हेतु उसे निवेशकों को खोजने में अधिक असुविधा नहीं होती। इससे मुझे आयुर्वेद के क्षेत्र में आये कई आधुनिक उपक्रमों का स्मरण हो आया।

उपरोक्त सर्व आध्यात्मिक अनुभवों का आनंद उठाने के पश्चात स्वामी को एक साथी की चाह उत्पन्न होती है जो प्रत्येक सुख-दुःख में उनका साथ दे तथा जिसके संग वे अपना अनुभव साझा कर सकें। यह मुझे अत्यंत रोचक प्रतीत हुआ। आयु के उत्तरार्ध में स्वामी ने विवाह करने का निश्चय किया। राहुल सांकृत्यायन ने यह पुस्तक उस समय लिखी थी जब देश में राष्ट्रवादी आन्दोलन चल रहा था। अतः उन्होंने कथा में स्वामी का विवाह एक युवा विधवा से कराया जो स्वामी की आदर्श पत्नी बनकर उनका साथ देती है। अब इसे उल्टा जीवन जीना कहा जाय अथवा आध्यात्मिक खोज की निरर्थकता। इसका उत्तर खोजने का उत्तरदायित्व मैं आप पर ही छोड़ती हूँ।

और पढ़ें – रसिकप्रिया- कवि केशवदास कृत बुंदेली गीत गोविन्द

राहुल सांकृत्यायन ने जिस प्रकार प्रत्येक क्षेत्र की स्थानीय जानकारी को अपनी कथा में बुना है, यह मुझे अचंभित कर देता है। फिर वह प्रत्येक क्षेत्र के पेड़-पौधे तथा जीव-जंतु हों अथवा उस क्षेत्र में उगने वाली वनस्पतियाँ व वनौषधियाँ। प्रत्येक क्षेत्र का जनजीवन हो अथवा उनका व्यवसाय। यही अनेक तथ्य एकत्र होकर किसी भी स्थान को परिभाषित करते हैं। इस पुस्तक ने ना केवल प्रत्येक स्थान का भौगोलिक चित्रण किया है, अपितु वहां के जीवन को सूक्षमता से जिया है।

लेखक का मानना है कि प्रत्येक मनुष्य के भीतर एक पर्यटक होता है। उनकी यह पुस्तक हमारी इसी घुमक्कड़ी को बाहर लाती है। उन्होंने एक घुमक्कड़ के जीवन को सफलतापूर्वक सजीव किया है। ठीक मीराबाई के इस भजन की तरह, ‘करना फकीरी फिर क्या दिलगीरी’। किसी दिन आवश्यकता से अधिक भोजन प्राप्त हो जाता है, वहीं किसी दिन अल्पाहार पर ही संतोष करना पड़ता है। चूंकि मैं भी यात्रा संस्मरण लिखती हूँ, इस संस्मरण में वर्णित कई घटनाओं को मैंने स्वयं जिया है।

और पढ़ें – भारत दर्शन करना चाहते हैं? लीजिये ये १२ अनोखे अनूठे अनुभव

‘घुमक्कड़ स्वामी’, हिंदी में लिखित,१०० पन्नों की यह एक छोटी सी पुस्तक है। लिखावट अपेक्षाकृत अत्यंत सूक्ष्म है तथा भाषा क्लिष्ट। वैसे भी राहुल सांकृत्यायन की भाषा सदैव उच्च स्तर की होती है। अतः इस पुस्तक को पढ़ना बाएं हाथ का खेल कदापि नहीं है। मैंने इस पुस्तक के अंग्रेजी संस्करण को खोजने का अनेक प्रयत्न किया किन्तु सफलता हाथ नहीं लगी। यदि आप इस पुस्तक के अंग्रेजी संस्करण के विषय में कोई भी जानकारी रखते हैं तो कृपया मुझे अवश्य बताएं।

शुद्ध हिंदी वाचन में रूचि रखने वाले पाठक यह पुस्तक अवश्य पढ़ें।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post राहुल सांकृत्यायन रचित घुमक्कड़ स्वामी – यात्रा साहित्य appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/ghumakkad-swami-rahul-sankrityayan-samiksha/feed/ 5 2099
संत कबीर का काव्य, भक्ति, दर्शन और जीवन परिचय https://inditales.com/hindi/sant-kabir-ek-parichay/ https://inditales.com/hindi/sant-kabir-ek-parichay/#comments Wed, 19 Aug 2020 02:30:46 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1972

संत कबीर १५ वीं. शताब्दी के अंत से १६ वीं. शताब्दी के आरंभ तक की समयावधि में एक जुलाहा होने के साथ साथ एक प्रसिद्ध संत कवि थे। यह भारत में भक्ति आंदोलन का काल था। राजनैतिक दृष्टि से इस काल अवधि में इस्लामी शासक सम्पूर्ण भारत में अपना आधिपत्य स्थापित करने का प्रयत्न कर […]

The post संत कबीर का काव्य, भक्ति, दर्शन और जीवन परिचय appeared first on Inditales.

]]>

संत कबीर १५ वीं. शताब्दी के अंत से १६ वीं. शताब्दी के आरंभ तक की समयावधि में एक जुलाहा होने के साथ साथ एक प्रसिद्ध संत कवि थे। यह भारत में भक्ति आंदोलन का काल था। राजनैतिक दृष्टि से इस काल अवधि में इस्लामी शासक सम्पूर्ण भारत में अपना आधिपत्य स्थापित करने का प्रयत्न कर रहे थे। वे हिंदुओं को नाना प्रकार से प्रताड़ित कर रहे थे। उस समय सभी हिन्दूओं ने भक्ति मार्ग का आसरा लिया । उन्होंने देवी-देवताओं की शरण ली, उनकी स्तुति गाने लगे तथा उनमें आसरा ढूंढने लगे।

संत कबीरकबीर हिन्दू थे अथवा मुसलमान, इस विवाद का समाधान कदाचित हमें कभी प्राप्त नहीं हो पाएगा। नीरू व नीमा, इस मुसलमान जोड़े ने कबीर का पालन-पोषण किया तथा स्वामी रामानन्द उनके गुरु थे। नीरू एवं नीमा की समाधियाँ बनारस के कबीर मठ में स्थित हैं। कबीर की रचनाएं विभिन्न भारतीय शास्त्रों में उनके ज्ञान एवं पकड़ का प्रमाण हैं। उनकी रचनाओं में वैदिक साहित्य, शरीर-रचना, प्राणी व वनस्पति शास्त्र, दर्शन-शास्त्र तथा बुनाई सम्मिलित है।

कबीर की रचनाओं के अनेक रूप मिलते हैं, जैसे साखी, शबद, रमैनी, उलटभाषी तथा वसंत। साखी का मूल शब्द है, साक्षी अर्थात देखा हुआ। कबीर की रचनाओं में कई दोहे हैं जिनके विषय में कहा जाता है कि उनकी रचना उन्होंने तब की जब उन्होंने ऐसा कुछ देखा जिसने उनके मन-मस्तिष्क में अनेक विचार उत्पन्न किये। उनके अधिकतर साखी हमारे समक्ष एक सम्पूर्ण दृश्य एक विचार लिए हुए ज्ञान के मोती का बोध कराते हैं।

और पढ़ें – देख कबीर रोया, भगवतीशरण मिश्र

कबीर की अधिकतर रचनाएं मौखिक रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित हुई हैं। यही कारण है कि इनके विभिन्न संस्करणों में हम शब्दों का हेर-फेर पाते हैं। उदाहर के लिए उनकी एक रचना है, ‘पानी में मीन प्यासी’। इसकी दूसरी पंक्ति कुछ लोग ‘मोहे सुन सुन आवे हासी’ गाते हैं तो कुछ इसे ‘मोहे देखत आवे हासी’ गाते हैं। यद्यपि दो संस्करणों का अर्थ तथा ध्येय एक ही होता है, किन्तु शब्द कभी कभी परिवर्तित हो जाते हैं। कबीर अपनी रचनाओं में स्वयं को दास कबीर के नाम से संबोधित करते हैं। किन्तु वर्तमान में उनकी रचनाओं को गाते समय उन्हे कभी कभी दास कबीर के स्थान पर संत कबीर कहकर भी संबोधित किया जाता है।

यदि आप मालवा अथवा राजस्थानी गायकों के मुख से कबीर के दोहे सुनेंगे तब आप पाएंगे कि वे कई आम शब्दों को स्थानीय भाषा में परिवर्तित कर देते हैं। उसी प्रकार आधुनिक गायक शब्दों को संस्कृत युक्त हिन्दी में परिवर्तित कर देते हैं।

और पढ़ें – कबीर बीजक 

कबीर एक व्यक्तिमत्व ना होते हुए बहती नदी की धारा थे। उन्होंने एक विचारधारा आरंभ की थी। तत्पश्चात अनेक विचारधाराएं आकर उनसे जुड़ने लगीं। आज हम निश्चित रूप से यह नहीं बता सकते कि उन्होंने क्या रचा तथा कालांतर में उनकी रचना में क्या जुड़ा। यद्यपि उनकी रचनाएं गहन हैं तथापि वे पारंपरिक ना होते हुए लोकशैली में है।

बूंद जो पड़ी समुद्र में, सो जाने सब कोई, समुद्र समाना बूंद में, बूझै बिरला कोई।।

कबीर- एक फकीर

मेरे लिए कबीर सर्वप्रथम एक फकीर थे। बोलचाल की भाषा में फकीर का अर्थ भिखारी हो जाता है। किन्तु फकीर का सही अर्थ है, वह व्यक्ति जो सभी सांसारिक मोह व बंधनों से मुक्त है। फकीर वह है जो सभी सुख-संपत्ति प्राप्त करने में सक्षम है किन्तु स्वेच्छा से न्यूनतम सुविधाओं में जीवन यापन करता है। वह किसी भी प्रकार के सामाजिक दबाव से प्रभावित नहीं होता तथा इसी कारण वह विचारों से स्वच्छंद होता है।

चाह गई चिंता मिटी, मानुवा बे-परवाह,

जिनको कुछ ना चाहिए, वो शाहन के शाह।।  

मन लाग्यो मेरो यार फकीरी में

कबीर निर्गुण भक्ति में विश्वास करते थे। उनकी यही विशेषता उन्हे अन्य समकालीन कवियों से भिन्न बनाती है। अन्य समकालीन कवि सगुण भक्ति में विश्वास रखते थे। सगुण भक्ति का अर्थ है भगवान को किसी ना किसी रूप में देखना। मीरा बाई तथा सूरदास भगवान को कृष्ण के रूप में कल्पना करते थे वहीं तुलसीदास के लिए भगवान का अर्थ श्री रामचन्द्र था। संभवतः कबीर इकलौते कवि थे जिनके लिए भगवान का कोई रूप नहीं था। उनकी पुकार उस भगवान के लिए थी जिनका कोई रूप नहीं है, अपितु जो प्रत्येक मनुष्य में सर्वविद्यमान है।

कबीर सदैव लोगों से स्वयं के भीतर झाँकने के लिए कहते थे। वे कहते थे कि ईश्वर को कहीं बाहर ना ढूँढे, अपितु वे नित्य लोगों का उनके भीतर विद्यमान ईश्वरीय तत्व  से परिचय कराते थे। यह कुछ अन्य नहीं, अपितु अद्वैत दर्शन ही है जिसके अनुसार ब्रह्म आपके भीतर है तथा आप स्वयं ही ब्रह्म हैं। वे सदा लोगों को आगाह कराते थे कि परम सत्य की खोज में बाहर ना भटकें। उसे अपने भीतर ही खोजें।

और पढ़ें  – हज़ारी प्रसाद द्विवेदी रचित कबीर

अपनी सम्पूर्ण रचनाओं में कबीर लोगों को सीधे संबोधित करते थे। वे अन्य कवियों के समान नहीं थे जो लोगों से भगवान के माध्यम से संबोधित होते थे। कबीर मनुष्यों से प्रत्यक्ष एवं अपरोक्ष रूप से संवाद करते थे। अपनी कविताओं में वे स्वयं को साधो अर्थात सद्पुरुष कहते थे। वहीं मानवी संबंधों के विषय में कहते समय वे उन्हे बंदे अर्थात मनुष्य, एक मित्र तथा भाई, इन शब्दों से संबोधित करते थे। उन्होंने लोगों को ना तो अपने से निम्न समझा ना ही उच्च। उन्होंने केवल अपने गुरु को ही उच्च स्थान दिया था। इसका अर्थ है कि वे सब को समान मानते थे। उनकी रचनाओं में सदैव समानता का संदेश निहित होता था।

वे गौण वस्तुओं पर भी पूर्ण ध्यान केंद्रित करते थे। उनसे भी समानता का संबंध स्थापित करते थे। उदाहरणतः अपनी कविता, ‘माटी कहे कुम्हार से’ के द्वारा वे कहते हैं कि जीवन एक चक्र है। आज आप माटी को रौंदेंगे, कल माटी आपको रौंदेगी तथा जीवन चक्र यूं ही चलता रहेगा। कदाचित आज आप स्वयं को शक्तिशाली समझ रहे होंगे। सब समय का फेर है। कल हमारी स्थिति पूर्णतः विपरीत हो सकती है। वस्तुस्थिति परिवर्तित होने में समय नहीं लगता। ब्रह्मांड के सर्व जीवों एवं वस्तुओं में समतुल्यता कबीर की रचनाओं के अभिन्न अंग होते हैं। वे संबंधों के चक्रीय प्रवृत्ति पर विश्वास करते थे। जो कल था, वह आज ना हो तथा जो आज है वो कदाचित कल ना रहे। मानव सदैव इस चक्र से अनभिज्ञ रहता है तथा जीवन चक्र में उलझ कर रह जाता है।

माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोहे;

इक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूँगी तोहे।।

कबीर गर्व ना कीजिए, ऊंचा देख निवास;

काल परों भुईं लेटना, ऊपर जमेगी घास।।

तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय;

 कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय। ।

देव हमारे भीतर ही विराजमान हैं

उनकी रचनाओं द्वारा जो परम ज्ञान हमें प्राप्त होता है वह यह है कि देव हम सब के भीतर ही विद्यमान हैं तथा प्रत्येक समस्या का समाधान भी हमारे भीतर ही उपस्थित रहता है। वे सतत हमें हमारे भीतर झाँकने के लिए प्रेरित करते रहते हैं। भगवान तक पहुँचने के लिए आपके द्वारा किये गए सर्व प्रयत्नों का वे खंडन करते हैं। वे कहते हैं कि यदि आपको परमात्मा में विश्वास है तो वह आपके भीतर ही विद्यमान है।

जैसे तिल में तेल है, ज्यों चकमक में आग;

तेरा साईं तुझ में है, तू जाग सके तो जाग।

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय;

जो मन खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

कस्तुरी कुंडल बसै, मृग ढूढ़ै वन माहि;

ऐसे घट घट राम हैं, दुनिया देखे नाहि।

मोको कहाँ ढूंढें रे बन्दे, मैं तो तेरे पास में।

पानी में मीन प्यासी…।

वे सदा कहते थे कि जिस प्रकार गंगा स्वयं को निर्मल करती है, उसी प्रकार हम मानवों को भी स्वयं को स्वच्छ करना चाहिए।

कबीरा मन निर्मल भया, जैसे गंगा नीर;

पाछे पाछे हर फिरे, कहत कबीर कबीर।

कबीर की रचनाएं उनके स्वयं के अनुभवों पर आधारित थीं। यद्यपि वे वेद एवं पुराण, इनका प्रयोग करते थे, तथापि वे अपने अनुभवों पर आधारित दृष्टांत ही देते थे। वे अपने समय के दैनंदिनी जीवन से ही दृष्टांत प्रस्तुत करते थे। उन्होंने सदैव एक सांसारिक पुरुष के रूप में जीवन व्यतीत किया, कर्म किया तथा परिवार के लिए जीविका उत्पन्न की। इन सब के साथ साथ वे एक साधक भी थे। उन्होंने कभी दूसरों द्वारा दी गई भिक्षा पर जीवन यापन नहीं किया। अतः उन्हे अपनी जीविका स्वयं अर्जित करने के आनंद एवं कष्टों का पूर्ण आभास था। यही उन्हे अपने मन के विचार स्वच्छंदता से व्यक्त करने की स्वतंत्रता भी प्रदान करती थी। वे सदा समाज में रहे ताकि वे उस समाज को भीतर से देख सकें तथा समझ सकें। साथ ही वे समाज से विरक्त भी थे ताकि वे एक प्रेक्षक बन सकें।

मैं कहता हूँ आखिन देखी,

तू कहता कागद की लेखी।

कबीरा खड़ा बजार  में, मांगे सबकी खैर;

ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।

साई इतना दीजिए, जा में कुटुंब समाय;

मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु ना भूखा जाय।

चलती चाकी देख कर, दिया कबीरा रोय;

दो पाटन के बीच में, साबुत बचा ना कोय।

कबीरा तेरी झोंपड़ी, गलकटियन के पास;

जो करेगा सो भरेगा, तू क्यों भया उदास।

कबीरा खड़ा बजार में, लिए लकुटिया हाथ;

जे घर फूँकिया आपनों, चले हमारे साथ।

गुरु पर आधारित कबीर की रचनाएं

अपनी अनेक साखियों एवं शब्दों द्वारा कबीर हमसे कहते हैं कि अपने स्वयं के अनुभवों के आधार पर अपनी राय निर्मित करें, दूसरों की कथनी को सजगता से जाँचें तथा सुने हुए तथ्यों पर आँख बंद कर विश्वास ना करें, भले ही गुरु ने कहा हो। यद्यपि वे कहते हैं कि गुरु ज्ञान प्राप्ति का एक आवश्यक साधन हैं।

गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूँ  पाय;

बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो दिखाए।

सतगुरु मिला तो सब मिले, ना तो मिला न कोय;

मात पिता सूत बान्धवा, यह तो घर घर होय।

कबीरा ते नर अन्ध है, गुरु को कहते और;

हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर।

भेस देख ना पूजिये, पूछ लीजिए ज्ञान;

बिना कसौटी होत नाही, कंचन की पहचान।

जात ना पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान;

मोल करो तलवार का, पड़ी रहन दो म्यान।

स्वयं की सहज खोज

वे हमें सहजता से जीने की प्रेरणा देते हैं। चूंकि वे इस तथ्य पर विश्वास करते हैं कि सब हमारे भीतर ही है, प्रत्येक बल व प्रत्येक संभव ऊर्जा स्त्रोत को बाहर खोजने का कष्ट उठाने की आवश्यकता नहीं है। उनकी रचनाओं में सहजता, यह विषय बारंबार प्रकट होता है। इससे यह विदित होता है कि उनके काल में भी लोग इस प्रकार का अनावश्यक कष्ट उठाते थे। यह सिद्धांत आज भी उतना ही प्रासंगिक है। हम कष्ट उठाने में सदा मग्न रहते हैं किन्तु यह नहीं समझते कि वह कष्ट हम क्यों उठा रहे हैं। एक ही स्थान पर खड़े होने के लिए भी दौड़ते रहते हैं। हमें अपनी प्रवृत्ति में सहजता की आवश्यकता है। यह हमारे मन को स्वच्छ तथा जीवन को आसान बनाती है।

पोथी पढ़ी पढ़ी जग मुवा, पंडित भया ना कोय;

ढाई आखर प्रेम के, पढ़े सो पंडित होय।

माला कहे काठ की, तू क्यों फेरे मोहे;

मन का मनका फेर दे, तुरत मिला दूँ तोहे।

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं तो मैं नाहिं;

प्रेम गली अति साँकरी, तामें दो न समाहिं।

संयोजित धर्म को चुनौती

कबीर ने सदैव किसी भी प्रकार के संयोजित धर्म का त्याग किया था। वे इतने साहसी थे कि उन्होंने इस्लाम शासित क्षेत्रों में इस्लाम के विरुद्ध तथा हिंदुओं के अपने गढ़ वाराणसी में हिन्दू कुरीतियों के विरुद्ध अपने विचार व्यक्त किये तथा उनसे प्रश्न किये। कभी वे एक स्नेहमय पिता के समान आसान दृष्टांत द्वारा लोगों को समझाते थे तो कभी अपने प्रश्नों की मार द्वारा अंध-भक्तों को सही मार्ग पर लाने का प्रयत्न करते थे। उन्होंने सदैव पंडितों, मौलवियों तथा स्वघोषित ज्ञानियों की आलोचना की थी। उनकी रचनाओं में उनके स्वर सदा अक्खड़ होते थे मानो वे प्रेक्षकों को चुनौती दे रहे हों कि वे आयें एवं उनके विचारों को अनुचित सिद्ध करें।

काशी काबा एक हैं, एक हैं राम रहीम;

मैदा इक पकवान बहुत बैठ कबीरा जीम।

साधू भूखा भाव का, धन का भूखा नाहिं;

धन का जो भूखा फिरै, सो तो साधू नाहिं।

पनि पियावे क्या फिरो, घर घर में है व्यारी;

तृष्णावंत तो होयेगा, आएगा झक मारी।

पत्थर पूजे हरी मिले, तो मैं पूजूं पहाड़;

इससे तो चाकी भली, पीस खाये संसार।

कंकर पत्थर जोड़ि के, मस्जिद लयी बनाय;

ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय।

कबीर बारंबार मानवी देह को घट अर्थात घड़ा कहकर संबोधित करते थे। इसकी हम अनेक स्तरों पर विवेचना कर सकते हैं। भौतिक रूप से यह माटी से निर्मित है तथा अंततः माटी में ही जाकर विलीन हो जाती है। लाक्षणिक रूप से यह एक रिक्त घट है तथा यह मनुष्य पर निर्भर है कि वह इस घट में क्या भरता है। मनुष्य क्या है यह इस तथ्य पर आधारित है कि हम इस घट रूपी देह में किसे समाते हैं। वे कहते हैं कि मानवी देह में ही सब कुछ समाया हुआ है, अच्छा, बुरा, कुरूप, यहाँ तक कि ईश्वर भी।

जोगी गोरख गोरख करें,

हिन्दू नाम उचारें;

मुसलमान कहें एक खुदाई,

कबीर को स्वामी घट घट बसई।

कबीर सोई पीर है, जो जाने पर पीड़;

जो पर पीड़ ना जाने, सो काफिर बेपीर।

चन्दा झलके यही घट माही..

कबीर एवं माया

कबीर सांसारिक माया को सभी बुराइयों की जड़ मानते हैं। उनके अनुसार माया वह डाकिनी है जो ऐसा मायाजाल बुनती है जिसमें मानव तो क्या, भगवान भी खो सकते हैं। वे कहते हैं कि यह संसार माया द्वारा निर्मित एक मायाजाल है तथा सत्य का अनुभव पाने के लिए हमें इसी मायाजाल की शिकंजे से मुक्त होना पड़ेगा। माया के साथ साथ वे यह भी कहते हैं, हमें यह भली-भांति समझना होगा कि हम में से प्रत्येक मनुष्य पूर्णतः अकेला है।

अवधू, माया तजी ना जाये..

उड़ जाएगा हंस अकेला.. 

मृत्यु और कबीर

अंत में, मृत्यु भी उनकी रचनाओं का एक अभिन्न अंग है। वे मृत्यु को अंत नहीं, अपितु मानव जीवन का एकमात्र सत्य मानते हैं। वस्तुतः, वाराणसी तो मृत्यु की नगरी मानी जाती है जहां मृत्यु का उत्सव मनाया जाता है। यही भाव कबीर की रचनाओं में भी प्रकट होता है। वे बारंबार मानवजीवन की क्षण-भंगुरता के विषय में कहते हैं जैसे उलटी मटकी पर जल। अतः मानव को अपने जीवन से मोह नहीं करना चाहिए। मृत्यु के परिप्रेक्ष्य में वे मानव प्रकृति के विषय में चर्चा करते हैं कि मनुष्य अनेक बार ऐसे निरर्थक कार्य करता है मानो वह अनंत काल तक जीवित रहने वाला हो। वे चाहते हैं कि हम यह स्मरण रखें, अंततः वह मृत्यु ही है जिसका हमें आलिंगन करना है, हमारी इच्छा हो या ना हो। मृत्यु को ध्यान में रखकर ही हमें जीवन यापन करना चाहिए।

माली आवत देख कर, कलियाँ कहे पुकार;

फुले फुले चुन लिए, काल हमारी बार।

साधो ये मुर्दों का गाँव..।    

आईए मेरे साथ, कबीर को ढूंढें – यह विचार एक ओर जितना आसान है, दूसरी ओर यह उतना ही गहन भी है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post संत कबीर का काव्य, भक्ति, दर्शन और जीवन परिचय appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/sant-kabir-ek-parichay/feed/ 5 1972
राहुल सांकृत्यायन रचित वोल्गा से गंगा – एक पुस्तक समीक्षा https://inditales.com/hindi/pustak-sameeksha-rahul-sankrityayan-volga-se-ganga/ https://inditales.com/hindi/pustak-sameeksha-rahul-sankrityayan-volga-se-ganga/#respond Wed, 01 Apr 2020 02:30:24 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1757

श्री राहुल सांकृत्यायन द्वारा लिखित पुस्तक “वोल्गा से गंगा” एक महाकाव्य है। यह ६००० ई.पू. से लेकर १९४२ ई. तक की समयावधि में हुए मानव विकास का, सामान्य जनमानस की दृष्टी से अनुरेखण करता है। इस पुस्तक में लेखक ने मानव जाति के विकास का चित्रण, वोल्गा नदी के तीर से, उस काल से किया […]

The post राहुल सांकृत्यायन रचित वोल्गा से गंगा – एक पुस्तक समीक्षा appeared first on Inditales.

]]>

श्री राहुल सांकृत्यायन द्वारा लिखित पुस्तक “वोल्गा से गंगा” एक महाकाव्य है। यह ६००० ई.पू. से लेकर १९४२ ई. तक की समयावधि में हुए मानव विकास का, सामान्य जनमानस की दृष्टी से अनुरेखण करता है। इस पुस्तक में लेखक ने मानव जाति के विकास का चित्रण, वोल्गा नदी के तीर से, उस काल से किया है जब मानव एक शिकारी था। लेखक ने विभिन्न युगों में हुए मानव विकास को उस युग से सम्बंधित लघु कथाओं के माध्यम से अत्यंत क्रमवार पद्धति से वर्णित किया है। यद्यपि पुस्तक का उत्तरार्ध अधिकांशतः भारतीय उपमहाद्वीप पर केन्द्रित है, उन्होंने सम्पूर्ण विश्व की विषयवस्तु को ओझल नहीं होने दिया। सम्पूर्ण पुस्तक पढ़ने के पश्चात मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे आदिकाल से भारत के साथ साथ सम्पूर्ण विश्व उतना ही सार्वभौमिक था जितना वर्तमान में है।

राहुल सांकृत्यायन रचित वोल्गा से गंगा
राहुल सांकृत्यायन रचित वोल्गा से गंगा

लेखक राहुल सांकृत्यायन ने विषय वस्तु को प्रत्येक स्तर पर छुआ है। सामान्य जनमानस के संवादों के सहारे वे प्रत्येक काल के जनजीवन का ब्यौरा प्रस्तुत कर रहे हैं। पुस्तक के अनुसार समयावधि के आरंभिक काल में स्त्रीप्रधान समाज हुआ करता था जिसका जीवन मांस तथा जल पर निर्भर था। उस मातृप्रधान समाज में वंश का उत्तरदायित्व माता से पुत्री को प्राप्त होता था। मध्यकालीन युग में राजाओं का जैसा सम्बन्ध उनके पुत्रों से था, ठीक वैसा ही सम्बन्ध इस समाज में माताओं का उनके पुत्रियों से होता था। इस काल में उत्तराधिकार हेतु पुत्रियों के बीच मनमुटाव तथा झगड़े भी होते थे। शनैः शनैः खेतीबाड़ी ने मानव के जीवन में पदार्पण किया।

राहुल सांकृत्यायन रचित वोल्गा से गंगा यहाँ अमेज़न पर लें

इस पुस्तक के जिस विषय ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया, वह था धातु का आगमन। प्रथम लौह, तत्पश्चात स्वर्ण। उसके साथ आयी भेदभाव नीति। राहुल सांकृत्यायन ने अत्यंत विस्तारपूर्वक उल्लेख किया है कि किस प्रकार से धातु समाज को भिन्न भिन्न वर्गों में बांटने लगी थी। समाज का वर्गीकरण आरम्भ होने लगा था कि किस वर्ग का अधिकार किस धातु पर व कितनी मात्रा पर होगा। मध्यकालीन युग की कथाओं के पात्रों को जिस प्रकार से स्वामित्व हेतु वादविवाद करते दर्शाया गया है, ऐसा प्रतीत होता है मानो यह वर्तमान के समाज का दृश्य हो। फिर वह किसी भी नवीन आविष्कार के पश्चात उस पर आर्थिक आधार पर अधिपत्य की होड़ हो अथवा उस आविष्कार का समाज पर नकारात्मक प्रभाव की चर्चा हो।

इसका ज्वलंत उदाहरण हम सबने कई बार देखा अपने ही जीवन काल में, जैसे दूरदर्शन, कंप्यूटर अथवा संगणक, मोबाइल फ़ोन इत्यादि। शनैः शनैः ये सर्व आविष्कार हमारे जीवन का अभिन्न अंग बनने लगते हैं। कुछ समय पश्चात हमें यह स्मरण भी नहीं रहता कि कभी इन अविष्कारों ने भरपूर हलचल मचायी थी। यह पुस्तक आदि काल से उपस्थित समाज के इस आयाम को अत्यंत सूक्ष्मता से चित्रित करती है। कदाचित समाज का प्रत्येक महत्वपूर्ण युग इन अवरोधों का संग्रह ही है।

राहुल संकृत्यायन का घुम्मकड़ शास्त्र

वोल्गा से गंगा, इस पुस्तक के आरंभिक कुछ अध्याय पूर्व-ऐतिहासिक इतिहास का वर्णन करते हैं। इन अध्यायों की रचना हेतु लेखक राहुल सांकृत्यायन को अपनी कल्पना शक्ति का भरपूर उपयोग करने की आवश्यकता पड़ी होगी। बाद के अध्याय मुझे उपलब्ध साहित्यों पर आधारित प्रतीत हुए। पुस्तक का अंतिम अध्याय कदाचित लेखक के प्रत्यक्ष अनुभव द्वारा रचित है।

पुस्तक में विषयवस्तु का समाजवाद की ओर झुकाव स्पष्ट झलकता है। समाजवाद प्रत्येक युग की विशिष्टता थी। समाज में प्रायः गाँधी तथा आंबेडकर को आधुनिक समाज के रचयिता माना जाता है। परन्तु इस पुस्तक में गाँधी तथा अम्बेडर के विषय में लोगों के विपरीत दृष्टिकोण भी प्रस्तुत किये गये हैं। आप जनता के इस विपरीत दृष्टिकोण पर संशय इसलिए नहीं कर सकते क्योंकि यह पुस्तक स्वंत्रता पूर्व लिखी गयी थी। यहाँ तक कि पटना का एक सामान्य मनुष्य स्वयं को हरिजन गाँधी कहने में लज्जा अनुभव करता था। उस काल में कई लोग आंबेडकर के सिद्धांतों से भी सहमत नहीं थे। उनकी भावनाएं इतनी तीव्र थीं कि यह वर्तमान के पंडितों हेतु भी आश्चर्य का विषय हो सकता है।

यूँ तो मुझे वोल्गा से गंगा, यह पुस्तक सम्पूर्ण रूप से रुचिकर प्रतीत हुई, यद्यपि इसका एक अध्याय मुझे विशेषतः प्रिय लगा। यह अध्याय राजा हर्षवर्धन द्वारा शासित उज्जैन नगर पर आधारित है। इस अध्याय में उस काल का वर्णन राजा, राज-कवि तथा एक सामान्य मनुष्य तीनों के दृष्टिकोणों से किया गया है। इसमें राज-कवि के उत्तरदायित्व का चित्रण किया गया है। राज-कवि राजा की छवि एक आदर्श शासक के रूप में गढते थे, आकर्षक व्यक्तित्व, वीर, दयालु तथा न्यायप्रिय इत्यादि। राजा की छवि तथा उनके महल का चित्रण वास्तविक ना होते हुए काल्पनिक स्तुति गायन अधिक होते थे। इस अध्याय को पढ़कर आप सोच में पड़ जाते हैं कि कवि की प्रशंसा की जाए, या राजा व उनके राजपाट की सराहना अथवा किसी पर भी विश्वास ना किया जाय।

लेखक ने इस पुस्तक में समय के साथ आये मानवी संबंधों का भी पर्याप्त उल्लेख किया है। आरम्भ में बंजारों अर्थात् खानाबदोश जाति के विषय में उल्लेख है। मानवी संबंधों के नाम पर ये घुमंतू बंजारे केवल स्त्री पुरुष के मध्य यौन सम्बन्ध तथा एक माता के अपनी संतान के साथ ममता तक ही सीमित थे। जब मानव घुमक्कड़ी त्याग कर खेतीबाड़ी से जीवन यापन करने लगा तब उनके आपसी सम्बन्ध भी पशु प्रकृति छोड़कर पारिवारिक संबंधों में विकसित होने लगे। प्रेम जैसे कोमल भावनाओं ने जन्म लेना प्रारम्भ किया। इन्ही परिवर्तनों को लेखक ने अपनी कथाओं के सहारे मनमोहकता से प्रतिपादित किया है। प्रेम उनकी कहानियों का अभिन्न अंग हैं। रिश्तों में छलकपट तथा धोखे को उन्होंने अपनी कहानियों में सम्मिलित नहीं किया है। मानवी संबंधों में एक पड़ाव आगे जाते हुए उन्होंने विभिन्न समुदायों तथा विरोधियों के मध्य संबंधों की भी सुन्दर व्याख्या की है। इसी प्रकार परिवारों तथा मित्रों के मध्य संबंधों को भी खोजने का प्रयत्न किया है।

इस पुस्तक की एक विशेषता है कि इसमें उन सभी महत्वपूर्ण घटनाओं का कदापि उल्लेख नहीं है जिनके विषय में हम इतिहास की पुस्तकों में पहले ही पढ़ चुके हैं। अतः आप सहज अनुमान लगा सकते हैं कि इस पुस्तक में बुद्ध तथा बौध धर्म के उदय का किंचित भी वर्णन नहीं है। उसी प्रकार से मानवी सभ्यताओं पर शत्रुओं द्वारा किये गए आक्रमणों पर भी उन्होंने किसी भी प्रकार से चर्चा नहीं की है। केवल इन आक्रमणों का जनसामान्य पर हुए प्रभावों पर अपने विचार प्रस्तुत किये हैं। यहाँ तक कि गाँधी तथा आंबेडकर के व्यक्तित्व तथा उनकी उपलब्धियों का भी उन्होंने कहीं उल्लेख नहीं किया है। कथाओं के पात्रों के मध्य साधे गए संवादों में ही कहीं कहीं इन व्यक्तित्वों के नाम उभर कर आते हैं। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि कथायें महत्वपूर्ण चरित्रों तथा घटनाओं के बोझ तले दबी नहीं। आप भिन्न भिन्न कालों में स्वयं को अनुभव करते हुए उनका सजीव चित्रण स्पर्श कर सकते हैं।

यद्यपि इस पुस्तक के कई भाषाओं में अनुवाद उपलब्ध हैं, मुझे इसके हिंदी अनुवाद को पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ। इसी विषय में मैं आपसे यह कहना चाहती हूँ कि इस पुस्तक के हिंदी संस्करण को समझने के लिए हिंदी भाषा में मजबूत पकड़ की अपेक्षा है। कथाओं में आपका सामना स्थानीय हिंदी भाषा के कुछ शब्दों से भी होगा जिनको समझने हेतु किंचित कल्पना शक्ति की आवश्यकता होगी। लेखन में कहीं कहीं अंग्रेजी भाषा के शब्दों का भी प्रयोग किया गया है।

यदि आप मेरे सामान यात्रा संस्मरण लेखन में रूचि रखते हैं तो मेरे मतानुसार इस पुस्तक में हमारी लेखनी को और अधिक धनी बनाने की क्षमता है। इतिहास के उबाऊ अध्याय को एक मनोरंजक कथा में परिवर्तित कर पाठक के मानसपटल पर अमिट छाप छोड़ना, इसका अप्रतिम उदाहरण है यह पुस्तक। इस पुस्तक में ज्ञानवर्धन हेतु भरपूर तत्व उपलब्ध है जिसे पाठक अत्यंत सहजता से ग्रहण करता है। भाषा अत्यंत लुभावनी है तथा कथानक पर लेखक की पकड़ भी पूर्णतः नियंत्रित है।

इस पुस्तक को पढ़कर मुझे अनायास ही खुशवंत सिंह की लिखी पुस्तक दिल्ली का स्मरण हो आया। उन्होंने भी उनके पुस्तक में उपरोक्त प्रारूप का उपयोग कर एक सामान्य मानव की दृष्टी से दिल्ली की कहानी कही है।

वोल्गा से गंगा, यह पुस्तक मुझे इतनी पसंद आयी कि मैं लेखक राहुल सांकृत्यायन द्वारा लिखी अन्य पुस्तकें भी पढ़ने हेतु आतुर हो रही हूँ। इस समय मेरे निजी पुस्तकालय में उनकी दो पुस्तकें उपलब्ध हैं। प्रथम उन्हें ही पढ़ने जाती हूँ।

आप भी वोल्गा से गंगा, यह पुस्तक अवश्य पढ़े। मेरा विशवास है यह आपको भी अत्यंत मनोरंजक तथा ज्ञानवर्धक प्रतीत होगी। साथ ही आप लेखक राहुल सांकृत्यायन की अन्य पुस्तकों को पढ़ने हेतु प्रेरित होंगे।

राहुल सांकृत्यायन द्वारा लिखित यह पुस्तक, वोल्गा से गंगा आप अमेज़ोन से खरीद सकते हैं।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

The post राहुल सांकृत्यायन रचित वोल्गा से गंगा – एक पुस्तक समीक्षा appeared first on Inditales.

]]>
https://inditales.com/hindi/pustak-sameeksha-rahul-sankrityayan-volga-se-ganga/feed/ 0 1757