नामची सिक्किम प्रदेश में सोलोफोक पहाड़ी पर स्थित चारधाम भारत के प्रमुख तीर्थ स्थलों की एक ही जगह समेट कर पर बनायी गयी प्रतिकृति है। यहां पर भारत के चारों कोनों में स्थित चार धाम, जैसे रामेश्वरम, सोमनाथ, पुरी और बद्रीनाथ और पूरे भारतखंड में स्थित 12 ज्योतिर्लिंग शामिल हैं। सिद्धेश्वर धाम के नाम से जाने इस स्थल के आकर्षण का शिखर बिन्दु भगवान शिव की ऊँची-लंबी प्रतिमा है।
दक्षिण सिक्किम में बसा हुआ, सिक्किम के दक्षिण जिले का जिला मुख्यालय होने के बावजूद नामची एक छोटा सा शहर है। रंगीत नदी के किनारे बसे बाईगुने में कुछ सुंदर दिन बिताने के बाद हम नामची की ओर बढ़े। हमारे लिए नामची के दौरे का सबसे बड़ा आकर्षण यहां की सोलोफोक पहाड़ी पर स्थित चारधाम या सिद्धेश्वर धाम था। हमसे एक दिन पहले जो लोग पहाड़ी का दौरा कर आए थे उनसे हमने इस तीर्थ स्थल के बारे में बहुत सुना था। हम वहाँ के नवनिर्मित परिसर, जो सिक्किम पर्यटन का पसंदीदा गंतव्य बन चुका था, को देखने के लिए सबसे ज्यादा उत्साहित थे।
चारधाम या सिद्धेश्वर धाम
नामची सिक्किम के सोलोफोक पहाड़ी का इतिहास
महाकाव्य महाभारत में एक ऐसा अध्याय है जहां पर अर्जुन शिव भगवान से पशुपतिअस्त्र प्राप्त करने के लिए कड़ी तपस्या करते हैं। जब शिवजी उनके समर्पित धीरज से प्रसन्न हुए, तो उन्होंने अर्जुन के समुख प्रकट होकर उन्हें पशुपतिअस्त्र का वरदान दे दिया। कहा जाता है कि यह प्रकरण नामची की सोलोफोक पहाड़ी पर घटित हुआ था। मैंने धार्मिक सिक्किम पर एक किताब पढ़ी थी जिसके अनुसार, अर्जुन को पशुपतिअस्त्र का आशीर्वाद देने के लिए इस पहाड़ी पर शिव भगवान के अवतरण की खुशी मनाने के प्रतीक स्वरूप चारधाम का परिसर बनवाया गया था। इस परिसर का उद्घाटन नवंबर 2011 में श्री जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती महाराज और अनेकों धार्मिक गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में प्राण प्रतिष्ठान के साथ हुआ।
ऊंची पहाड़ी पर स्थित होने के कारण मेघ हमेशा इस अद्वितीय तीर्थ यात्रा का हिस्सा बनते हैं। इन बादलों के बीच से गुजरते हुए आप मंदिरों और भगवान शिव की मूर्ति को बादलों के बीच से उभरते हुए देख सकते हैं, जो आपको एक झलक देकर वापस बादलों के बीच खो जाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है, मानो भगवान आपको दूसरे कामों के लिए आगे बढ़ने से पहले दर्शन दे रहे हैं। अगर बादल इस जगह को थोडा फीका बनाते हैं, तो यहाँ के फूल अपने रंगों की जीवंतता से पूरे वातावरण में खुशी भर देते हैं। चारों ओर इतने सुंदर पहाड़ी फूल हैं कि हम रास्ते में रुक-रुक कर उनकी तस्वीरें खिचते रहे।
नामची सिक्किम में चारधाम का परिसर
नामची के चारधाम परिसर का केंद्रीय आकर्षण 87 फीट ऊँची शिव मूर्ति है जो पहाड़ी के शिखर पर स्थित है। यहां से शिव भगवान पूरे चारधाम परिसर और उसके चारों ओर की घाटियों की निगरानी करते हैं। यह मूर्ति पहाड़ी के पश्चिमी छोर पर पूर्वी दिशा की ओर मुख किए स्थित है। यह मूर्ति 12 ज्योतिर्लिंगों से घिरी है।यह 12 प्रसिद्ध शिव मंदिर पूरे भारत के धार्मिक भूगोल पर फैले हैं। यहां का हर एक शिवलिंग अपने मूल जगह पर स्थापित शिवलिंग की सटीक प्रतिकृति है।
किरतेश्वर
आप जैसे ही चारधाम के परिसर में प्रवेश करते हैं, हात में धनुष्य पकड़े किरतेश्वर की मूर्ति को सामने खड़ा पाते हैं। सिक्किम में यह शिव भगवान का स्थानीय अवतार माना जाता है। पूरे सिक्किम में हमे किरतेश्वर को समर्पित बहुत से पुराने मंदिर देखने को मिले। किरतेश्वर का अर्थ है पशुओं का रक्षक।
चारधाम परिसर के बीचोबीच एक फव्वारा बहता है, जहां अपने-अपने वाहन पर खड़ी गंगा और यमुना की मूर्तियां स्थित हैं। गंगा का वाहन मगरमच्छ है और यमुना का वाहन कछुआ। यह प्रयाग में, गंगा और यमुना नदी के संगम की अभिव्यक्ति है।
नामची सिक्किम में चारधाम के मंदिर
भारत के तीर्थस्थलों में से ये चार प्रमुख मंदिर, समूहिक रूप से चारधाम के नाम से प्रसिद्ध है, जो भारत के चारों कोनों में स्थित है। उत्तराखंड में बद्रीनाथ, गुजरात में द्वारका में सोमनाथ, ओड़ीसा में पूरी में जगन्नाथ और तमिलनाडु में रामेश्वरम। इन प्रत्येक धामों की प्रतिकृति यहां, सिक्किम के नामची शहर में है। हिंदु मान्यताओं के अनुसार, हर व्यक्ति को अपने जीवनकाल में एक बार तो इन चारों मंदिरों के दर्शन करने ही चाहिए। जब मैं भौगोलिक दृष्टि से संवितरित इन मंदिरों को देखती हूँ, तो ये मंदिर अपने आप में हमारी संस्कृति और परंपराओं की प्रचुरता की बहुत सारी बातें बयां करते हैं। ये बताते हैं कि यात्रा करना हमारे जीवन का अंतःनिर्मित भाग है।
अर्थात हमे अपने जीवनकाल में भारत के चारों कोनों की यात्रा करनी है। तथ्य बताते हैं कि तीर्थयात्रा पर जानेवाले ज़्यादातर लोग पदयात्रा ही करते हैं, और अंततः चलते-चलते, राह में मिलने वाले अनेक समुदायों के साथ तथा वहां की प्रकृति के साथ घुलते-मिलते हुए पूरे देश की यात्रा कर लेते हैं। इससे यह पता चलता है कि हमारे देश का धार्मिक भूगौल हमे धार्मिकता के पक्के धागों से एक अद्वितीय बंधन में बांधता है।
हमने एक सुंदर प्रवेश द्वार से चारधाम के परिसर में प्रवेश किया और रंगबिरंगी फूलों से घिरे मंदिरों ने हमारा स्वागत किया। हमने सफर की शुरुआत बाईं तरफ से की, ताकि हम पूरे परिसर में परंपरागत दक्षिणावर्त तरीके से घूम सके। ऐसा करने से पूरे परिसर की परिक्रमा भी हो जाएगी।
रामेश्वरम मंदिर
हमारा पहला पड़ाव रामेश्वरम मंदिर था, जो द्रविडी मंदिरों की शैली में निर्मित है। वह अन्य मंदिरों से थोड़ा अलग भी था। हमने रंगबिरंगी ऊंचे गोपुरम के द्वारा मंदिर में प्रवेश किया। वहां जाकर हमने शिवलिंग की पुजा-प्रार्थना की। ऐसा माना जाता है की यह शिवलिंग भगवान राम ने श्रीलंका से वापसी के दौरान रामेश्वरम में स्थापित किया था, ब्राह्मण हत्या के दोष से मुक्ति पाने के लिए।
सोमनाथ मंदिर
हमारा अगला पड़ाव सोमनाथ मंदिर था जो भारत के पश्चिमी तट पर द्वारका में स्थित है। यह मंदिर ठेठ गुजराती शैली में बनवाया गया है, जिसकी छत पिरामिड जैसी है।
ये मंदिर भीतर से अपेक्षाकृत साधारण हैं और मूल मंदिरों की तुलना में आकार में भी बहुत छोटे हैं। इसके बावजूद भी ये प्रतिकृतित मंदिर आपको मूल मंदिर के दर्शन लेने का एहसास जरूर दिलाते हैं। आगे जाकर यह रास्ता साई मंदिर से होकर गुजरते हुए आपको शिव जी की मूर्ति तक ले जाता है। साई मंदिर के बाहरी भाग में जाली काम की दिलचस्प संरचना है, जिसके चारों ओर मन्नतों के लाल धागे बंधे हैं, जो आपको अजमेर शरीफ या चिश्ती दरगाह की याद दिलाते हैं जो फ़तेहपुर सीकरी में है।
शिव मूर्ति और 12 ज्योतिर्लिंग
शिवजी की मूर्ति के पास ही हमने सारे 12 ज्योतिर्लिंग देखे। क्यूंकि हमने ये सारे ज्योतिर्लिंग एक के बाद एक देखे, हम उनके बीच के सूक्ष्म अंतर को जान और समझ पाए। उदाहरण के लिए, जो शिवलिंग केदारनाथ में है वह सिर्फ पत्थर का कूबड़ है, लेकिन जो शिवलिंग रामेश्वरम में है वह दक्षिण भारत की शैली में वर्ग योनि में बनवाया गया है। वहां पर लगा हुआ एक छोटा सा सूचना पट्ट प्रत्येक शिवलिंग की कथा को दर्शाता है। एक संस्कृत श्लोक इन 12 ज्योतिर्लिंगों के भूगोल को एक छोटी सी कविता के जरिये संक्षेप में बताता है।
शिवजी की मूर्ति के नजदीक से दर्शन लेने का समय आ गया था। जिस बड़े से मंच पर शिवजी विराजमान थे उसके चारों ओर देवियों के अवतारों की खुदाई की गयी थी। शिवजी के समुख खड़े होकर आप अचानक से स्वयं को छोटा महसूस करने लगते हैं और आप सहज रूप से उनकी शक्ति के आगे झुक जाते हैं। इस मूर्ति के नीचे शिवमंदिर है, जहां पर शिव पुराण के अध्यायों को दर्शाया गया है। इसमें शिव भगवान के विवाह से लेकर, प्रजापति दक्ष के यज्ञ के बाद शिवजी द्वारा माता सती के मृत शरीर को लेकर घूमने से, शिवजी को पाने के लिए माता पार्वती द्वारा की गयी तपस्या तक सब कुछ समाहित है। यहां पर पुजारियों की एक टोली है जो अपने वाद्य-यंत्रों के साथ रोज मंदिर में सत्संग और कीर्तन करते हैं।
जगन्नाथ पूरी मंदिर
अगला मंदिर जगन्नाथ पूरी का मंदिर था, जहां पर कृष्ण बलराम और सुभद्रा के साथ रहते थे। यहां की मूर्तियाँ भी अपने मूल स्थान के मूर्तियों की प्रभावशाली प्रतिकृति है।
बद्रीनाथ मंदिर
जो सबसे अच्छा है उसे अंतिम दर्शन के लिए संरक्षित रखा गया था, अर्थात रंगबिरंगा बद्रीनाथ मंदिर। मैं अभी तक बद्रीनाथ नहीं गयी हूँ पर इस मंदिर की वास्तुकला और उसके रंगबिरंगी असबाब ने मुझे बद्रीनाथ जाने का एक और कारण दे दिया । मैं और मेरा कैमरा हम दोनों पूर्ण रूप से चारधाम के बद्रीनाथ मंदिर के उज्जवलित रंगों में पूरे के पूरे डूब चुके थे।
चारधाम में बिताया गया हर एक पल सबसे सुंदर पल था। चारधाम की यह यात्रा हमारी अपेक्षाओं से कई ज्यादा सुंदर और परे थी। चारधाम गुणवत्ता, आकार और रखरखाव की दृष्टि से बहुत सराहनीय है।
चारधाम या सिद्धेश्वर धाम, जैसा कि उसे आधिकारिक तौर पर कहा जाता है, की यात्रा करना सम्पूर्ण भारत की यात्रा करने जैसा है। ये तीर्थस्थल पूरे भारत को एक ऐसे बंधन में बांधते हैं कि, जहाँ राजनीतिक सीमाओं का उनके लिए कोई मतलब नहीं रहता। श्रद्धा और विश्वास का यह गंतव्य भारत की सीमाओं को परिभाषित करता है।
नामची सिक्किम के चारधाम की यात्रा के लिए कुछ सुझाव
- चारधाम के अच्छी तरह से दर्शन लेने के लिए आपको कम से कम 2 घंटे चाहिए।परिसर में प्रवेश करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति पर 50/- रु. का प्रवेश शुल्क है।चारधाम के परिसर में यात्री निवास है, जहां पर यात्री रह भी सकते हैं।आप गेंगटोक से भी चारधाम जा सकते हैं, जो वहां से 2 घंटे की ड्राइविंग दूरी पर है। या फिर आप दक्षिण सिक्किम के पेल्लिंग या जोरेथंग जैसे शहरों से भी जा सकते हैं।वहां ठंड बहुत ज्यादा होती है, इसलिए अपने साथ गरम कपड़े लेना मत भूलिए।
Sikkim in Hindi temple