कश्मीर यात्रा Archives - Inditales श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Wed, 01 Mar 2023 06:08:05 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.7.5 १०वीं सदी का प्राचीन कश्मीर – आशीष कौल से संवाद https://inditales.com/hindi/prachin-kashmir-ek-varta-ashish-kaul/ https://inditales.com/hindi/prachin-kashmir-ek-varta-ashish-kaul/#respond Wed, 14 Jun 2023 02:30:04 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3082

अनुराधा गोयल: इंडीटेल के अंतर्गत डीटुअर्स के इस संस्करण में हम संवाद करेंगे श्री आशीष कौल से, जो ‘दिद्दा: कश्मीर की योद्धा रानी’ नामक एक अप्रतिम पुस्तक के लेखक हैं। यह पुस्तक उनके ही द्वारा लिखित मूल अंग्रेजी पुस्तक ‘Didda- The Warrior Queen of Kashmir’ का हिन्दी रूपांतरण  है। मैं कई दिनों से प्राचीन कश्मीर […]

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अनुराधा गोयल: इंडीटेल के अंतर्गत डीटुअर्स के इस संस्करण में हम संवाद करेंगे श्री आशीष कौल से, जो ‘दिद्दा: कश्मीर की योद्धा रानी’ नामक एक अप्रतिम पुस्तक के लेखक हैं। यह पुस्तक उनके ही द्वारा लिखित मूल अंग्रेजी पुस्तक ‘Didda- The Warrior Queen of Kashmir’ का हिन्दी रूपांतरण  है। मैं कई दिनों से प्राचीन कश्मीर के विषय में पढ़ रही थी।

मैंने जाना कि दिद्दा नामक रानी ने कश्मीर में उस काल में शासन किया था जो मेरे अनुमान से भारत का सर्वोत्तम काल था। भारत का यह काल मुझे अत्यंत प्रिय है। इस काल तक भारत पर बाह्य शक्तियों के आक्रमण आरम्भ नहीं हुए थे। हमारी वास्तुकला, हमारी सैन्य शक्ति, हमारा व्यापार आदि अपनी चरम सीमा पर थे। किन्तु हम उस काल के प्राचीन कश्मीर के विषय में अधिक नहीं जानते हैं। इस पुस्तक के विषय में जानते ही श्री आशीष कौल से प्राचीन कश्मीर के विषय में जानकारी प्राप्त करने का विचार मेरे मस्तिष्क में कौंध गया। इस अवसर का लाभ उठाते हुए मैंने उन्हें डीटुअर्स में आमंत्रित कर उनसे प्राचीन कश्मीर के विषय में जानने का निश्चय किया। मेरे प्रिय पाठकों, आईये हम आशीष कौल जी से कश्मीर के प्राचीन काल के विषय में जानने के लिए पर्याप्त प्रश्न पूछने का प्रयास करते हैं।

आशीष कौल: डीटूर्स में मुझे आमंत्रित करने के लिए मैं आपका हृदयपूर्वक धन्यवाद करता हूँ। मैंने इस आयोजन के विषय में पूर्व में ही अनेक प्रशंसाएं सुन रखी थीं। आज आपके इस सम्माननीय आयोजन में भाग लेने का सुअवसर मुझे भी प्राप्त हुआ है। वह भी उस विषय पर जो मेरे एवं आपके लिए अत्यंत प्रिय विषय है। इसके लिए मैं आपका अत्यंत आभारी हूँ।

आशीष कौल से पुरातन कश्मीर पर चर्चा

अनुराधा: आशीषजी, हमारी पीढ़ी कश्मीर का सम्बन्ध वहां होते आये संघर्षों से ही लगाती आयी है क्योंकि कश्मीर के विषय में हम सभी ने अधिकतर उसी विषय में सुना है। हम में से कुछ इसका सम्बन्ध पर्यटन से भी लगाते हैं। इससे कुछ कालावधि पीछे जाएँ तो ६० एवं ७० के दशकों में निर्मित हुए बॉलीवुड के चित्रपटों ने अवश्य कश्मीर को लोकप्रियता प्रदान की थी। किन्तु हमें कश्मीर के प्राचीनकालीन इतिहास के विषय में आंशिक ज्ञान ही है। पढ़ने में मेरी रूचि है इसलिए मैं कश्मीर की परम्पराओं एवं संस्कृति के विषय में कुछ जानकारी प्राप्त कर पायी हूँ। प्राचीन काल के कश्मीरी संस्कृत-विद्वान् तथा कश्मीर शैवदर्शन के बहुमुखी प्रतिभाशाली आचार्य अभिनवगुप्त एवं शारदा पीठ के विषय में भी मैंने कुछ जानकारी प्राप्त की थी। मुझे १०वीं सदी के कश्मीर में अत्यधिक रूचि है। उसी से सम्बंधित कुछ प्रश्न आपसे पूछना चाहती हूँ, जैसे उसका इतिहास, उसकी भूमि व परिदृश्य, वहां के विभिन्न साम्राज्य, इत्यादि। आशा है आप हमें प्रत्यक्ष १०वीं सदी के कश्मीर में ले जायेंगे।

आशीष: आपने सही कहा है। आज हमने कश्मीर को केवल पर्यटन की सीमाओं में बांधकर रख दिया है। कश्मीर के साथ अनेक आयामों में अन्याय हुआ है। उसके पूर्व-वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल तक के इतिहास, राजनैतिक परिदृश्य तथा सामाजिक-सांस्कृतिक महत्त्व की उपेक्षा की जाती रही है।

हमारे लिए यह समझना अति आवश्यक है कि अविभाजित भारत की चर्चा में कश्मीर की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। यह इतिहास की भीषण विडम्बना है कि आध्यात्म, ज्ञान, विद्वत्ता, राजनीति आदि के क्षेत्र में कश्मीर वासियों, विशेषतः कश्मीरी स्त्रियों के जिस उत्कृष्ट पांडित्य का ना केवल भारत, अपितु सम्पूर्ण विश्व में महत्वपूर्ण व अविश्वसनीय योगदान था, उसे कालांतर में आधुनिक पाश्चात्य इतिहासकारों ने इतिहास के पृष्ठों से पूर्णतः लुप्त कर दिया है।

१०वीं सदी का कश्मीर

आशीष: कश्मीर का लगभग १०,००० वर्ष प्राचीन इतिहास है। यहाँ विशेष यह है कि कश्मीर का इतिहास वह इकलौता जीवंत इतिहास है जिसे अखंड रूप से प्रलेखित किया गया है। कश्मीर के इतिहास का आरम्भ तब से हुआ था जब मिस्र के फैरो ने पिरामिड बनाने का नियोजन भी नहीं किया था। यदि आप १०वीं सदी की कालावधि का विश्लेषण करें तो आप देखेंगे कि यह कालावधि ना केवल भारत के परिप्रेक्ष्य में, अपितु अविभाजित भारत एवं एशिया, यहाँ तक कि सम्पूर्ण विश्व को पुनः परिभाषित करने में अत्यंत महत्वपूर्ण कालावधि है। जब हम १०वीं सदी के कश्मीर की विवेचना करते हैं तो हम अविभाजित भारत के साथ उन सभी साम्राज्यों की चर्चा करते हैं जिनके साम्राज्य कभी इरान-इराक सीमा तक फैले हुए थे। अफगानिस्तान, पाकिस्तान के साथ अन्य सभी क्षेत्र इस राष्ट्र के भाग थे।

प्राचीन कश्मीर
दल सरोवर पर सूर्यास्त

१०वीं सदी में मध्य-पूर्वी क्षेत्र एवं यूरोपीय देशों के मध्य युद्ध छिड़ा हुआ था। चारों ओर धर्मयुद्ध छिड़ा हुआ था। एक ओर यरूशलम का युद्ध जारी था। दूसरी ओर इस्लाम स्वयं को स्थापित कर चुका था तथा मध्य एशिया में अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए इसाई धर्म से झगड़ रहा था। कश्मीर एक सीमावर्ती राज्य था जो भारत में प्रवेश के लिए द्वार था।

कश्मीर पर सदा से महान व शक्तिशाली साम्राज्यों का शासन था जिनकी गणना विश्व के सर्वोत्तम शासकों में की जाती थी। भारत के एक विशाल क्षेत्र पर कर्कोट राजवंश का शासन था जिसके शासक ललितादित्य को महानतम शासकों में एक माना जाता है। ललितादित्य की मृत्यु के पश्चात, लगभग २५० -३०० वर्षों के उपरांत १०वीं सदी में संग्रामराज का शासन हुआ जिन्होंने लोहार राजवंश की स्थापना की थी।

कश्मीर राज्य के बाईं ओर लोहार राजवंश का महान एवं शक्तिशाली साम्राज्य था। आज के लोगों को लोहार साम्राज्य ज्ञात नहीं होगा क्योंकि वह अब लोहार के नाम से नहीं जाना जाता है। यह इतिहास का उपहास ही है कि एक समय जो एक महान साम्राज्य था, लोरेन जिसकी शक्तिशाली राजधानी थी, आज वही क्षेत्र भारत-पाक नियंत्रण रेखा पर एक छोटे से गौण गाँव के रूप में सिमट कर रह गया है। लोगों को उसके वैभवशाली इतिहास की तनिक भी जानकारी नहीं है।

प्राचीन कश्मीर का लोहार साम्राज्य

लोहार राजवंश की राजधानी लोरेन थी। इसके अंतर्गत समूचा पश्चिमी पाकिस्तान एवं पूंछ राजौरी आते थे जो सीमा के दोनों ओर स्थित है। साथ ही इसमें आज का पंजाब एवं हरियाणा भी सम्मिलित थे। इससे आप अनुमान लगा सकते हैं कि १०वीं सदी में यह कितना समृद्ध राज्य था। वह कश्मीर साम्राज्य से सीमा साझा करता था। उत्तर की ओर मध्य-एशिया राज्य थे जिन पर शाही राजवंश का शासन था। इसके पश्चात शाही साम्राज्य ईरान के इस्लामी गणराज्य में परिवर्तित हो गया। शाही राज्य का राजा भीमशाह अंतिम हिन्दू शासक था जिसने मध्य एशिया पर शासन किया था।

१०वीं सदी के आरम्भ में अर्थात् लोहार राजवंश से पूर्व कश्मीर पर राजा संग्रामदेव का शासन था। उनके शासनकाल में राजनैतिक टकराव के कारण कश्मीर लगभग विभाजन की स्थिति तक पहुँच गया था। सम्पूर्ण राजनैतिक परिदृश्य गृहयुद्ध में लिप्त हो गया था।

जागीरदार

इस काल में राजाओं की सेना वैसी नहीं होती थी जैसी सैन्य परिकल्पना वर्तमान में दृष्टिगोचर होती है। उन दिनों सेना के नाम पर कुछ गिने-चुने सैनिक होते थे जो केवल राजा एवं उसके दुर्ग क्षेत्र का रक्षण करते था। यदि कोई राजा किसी अन्य राज्य पर विजय प्राप्त कर उसे अपने साम्राज्य के आधीन करना चाहे तो वह अपनी सेना नए सिरे से गठन करता था। प्राचीनकाल में जब एक राज्य की सेना दूसरे राज्य पर आक्रमण कर विजय प्राप्त करती थे तब उसकी सेना उस राज्य को लूट कर संपत्ति एकत्र करती थी। उनका मेहनताना भी उसी लूट की संपत्ति से आता था। कश्मीर की सैन्य शक्ति जागीरदारों के अधीन थी जो उनके क्षेत्र की उपजाऊ भूमि एवं सेना का नियंत्रण करते थे। संग्रामदेव की शासन संबंधी कार्यों में रूचि नहीं थी। कश्मीर घाटी में बाढ़ एवं अकाल की स्थिति रहती थी। घाटी में गृहयुद्ध छिड़ गया था।

कश्मीर की गढ़-राजनीति भारत के अन्य राज्यों की तुलना में कहीं अधिक जटिल थी। १०वीं सदी के आरम्भ में संग्रामदेव के कुछ दरबारियों ने एक अन्य दरबारी पर्वगुप्त को विश्वास दिलाया कि अब कश्मीर के शासन में परिवर्तन की आवश्यकता है क्योंकि राजा एक सार्थक व न्यायप्रिय शासन प्रदान करने में असमर्थ है।

पर्वगुप्त

पर्वगुप्त दरबार का एक निष्ठावान सदस्य था। राजा संग्रामदेव द्वारा कश्मीर की निर्बल प्रजा पर ढाये आत्याचारों का वह प्रत्यक्ष साक्षी था। प्रजा के पास धन, भोजन एवं अन्य सुविधाओं का अभाव था, वहीं राजा विलास भोग में व्यस्त था। पर्वगुप्त दुविधा में था। एक ओर दरबार के प्रति उसकी निष्ठा थी तो दूसरी ओर प्रजा का कष्ट। उसके समक्ष जटिल प्रश्न था कि क्या उसके जैसा निष्ठावान दरबारी निरीह प्रजा के समर्थन में क्रूर राजा के विरुद्ध विद्रोह करे?

अंततः पर्वगुप्त ने प्रजा के पक्ष में निर्णय लिया। एक रात्रि अपने सैनिकों के साथ उसने महल पर धावा बोल दिया तथा सम्पूर्ण कश्मीर गढ़ पर अधिपत्य जमा लिया। नशे में धुत संग्राम देव को इसकी भनक भी नहीं पड़ी। जब उसे सुध आयी, उसने स्वयं को वितस्ता अर्थात् झेलम नदी पर एक नौका में बंधा हुआ पाया।

जब उसने पर्वगुप्त से इसका विरोध कर उसे खरी खोटी सुनाई तब पर्वगुप्त ने उसे वितस्ता नदी की ही गोद में सुला दिया। इस प्रकार संग्रामदेव का अंत हुआ। यह प्रथम अवसर था जब कश्मीर में विद्रोह हुआ था।

कश्मीर का नवीन सम्राट

संग्रामदेव के वध के पश्चात पर्वगुप्त को कश्मीर के सम्राट के रूप में अभिषिक्त किया गया। पर्वगुप्त के साथ कश्मीर में एक नवीन राजवंश का आरम्भ हुआ। वह १०वीं सदी का कश्मीर था। अभिषेक के दिवस ही प्रातः पर्वगुप्त की पत्नी ने राज्य के उत्तराधिकारी को जन्म दिया जिसका नामकरण क्षेम गुप्त किया गया। उसी कालखंड में लोहार सम्राट सिंहराज की पत्नी ने एक पुत्री को जन्म दिया था। उसका नाम दिद्दा रखा गया। ऐसा कहा जाता है कि जन्म के उपरांत ही दिद्दा के माता-पिता उससे मुक्त होना चाहते थे। उन्होंने उसे एक टोकरी में रखकर जल में बहाने का प्रयास किया किन्तु राजा के वस्त्र टोकरी में उलझ गए थे।

वस्त्र छुड़ाने के लिए जैसे ही राजा ने पुत्री की ओर देखा, उनका हृदय पिघल गया तथा वे उसे वापिस महल ले आये। एक दाई ने उसका पालन-पोषण किया। राजा ने दिद्दा से ऐसा व्यवहार इसलिए किया क्योंकि दिद्दा जन्म से ही अपंग थी। उसके पैर विकृत थे। कदाचित वह पोलियो का शिकार हो गयी थी।

रोग

उस काल में कश्मीर में दो प्रकार के रोगों की महामारी थी। उनमें प्रमुख था पोलियो, जो कश्मीर में अनियंत्रित रूप से विद्यमान था। दूसरी महामारी हैजा थी। यहाँ तक कि कश्मीर में मृत्यु अधिकतर पोलियो अथवा हैजे के कारण ही होती थीं। भूमिगत जल के अभाव में प्राचीनकाल के कश्मीर को भीषण अकाल की स्थितियाँ भी झेलनी पड़ी थी। वहीं दूसरी ओर कश्मीर में बाढ़ की स्थिति भी असामान्य नहीं थी। यह सामान्य ज्ञान है कि बाढ़ के पश्चात अकाल की स्थिति उत्पन्न होती ही है क्योंकि बाढ़ के पश्चात भूमि अनुपजाऊ हो जाती है।

आज जिस कश्मीर का वातावरण इतना सुहावना है, आज जिस कश्मीर को भाजियों एवं फलों की टोकरी कहा जाता है तथा जिस कश्मीर को आज धरती का स्वर्ग कहा जाता है, उसी कश्मीर ने किसी काल में भीषण अकाल की स्थिति का वहन किया है, यह विचार करना भी हमारे लिए असंभव प्रतीत होता है। किन्तु यही सत्य है।

अनुराधा: मैं आपसे पूर्णतः सहमत हूँ। मैंने नौशेरा राजौरी पूंछ क्षेत्र में अपने जीवन के कुछ अनमोल वर्ष व्यतीत किये हैं। तब मुझे इसके ऐतिहासिक महत्ता की कोई विशेष जानकारी नहीं थी। कुछ वर्षों पूर्व ही मैंने इसके विषय में अध्ययन किया है। आपने अपनी पुस्तक में उल्लेख किया है कि यह वही समय था जब आचार्य अभिनवगुप्त उस काल के साम्राज्यों के राजगुरु के रूप में उनका मार्गदर्शन करते थे। आप ने यह भी उल्लेख किया है कि कश्मीर एक विशाल अध्ययन केंद्र था। हमें आज केवल यही ज्ञात है कि कश्मीर में विद्या की देवी शारदा माँ का शारदा पीठ है। अतः हमें कश्मीर की आध्यात्मिक धरोहर के विषय में कुछ बताएं।

कश्मीर की अध्यात्मिक धरोहर

आशीष: यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है। इतिहासकारों द्वारा कश्मीर के सम्पूर्ण इतिहास के साथ भयानक अन्याय किया गया है, कहीं अज्ञानता में किया गया है तथा कहीं किसी अध्यादेश के अंतर्गत किया गया है। अनेक वर्षों से कश्मीर को केवल एक पर्यटन स्थल के रूप में प्रदर्शित किया जा रहा है जिसके कारण आज कश्मीर की यह अवस्था हो गयी है। प्राचीनकाल से कश्मीर का रूप किसी पर्यटन स्थल का कदापि नहीं था। येरुशलम के प्रति जो भावना ईसाइयों की है अथवा मक्का के प्रति जो आदर मुसलामानों के हृदय में है, वही भावना एवं आदर सनातन धर्म तथा वैदिक हिन्दू धर्म के अनुयायियों का कश्मीर के प्रति था। कश्मीर अध्ययन एवं आध्यात्म का सर्वोच्च केंद्र था।

सम्पूर्ण विश्व में कश्मीर इकलौता स्थान है जिसका विश्व भर में सर्वाधिक लम्बा अखंड जीवंत इतिहास लिखा गया है। सर्वप्रथम विश्वविद्यालय अर्थात् प्रथम महान अध्ययन केंद्र शारदा विद्या पीठ कश्मीर में ही है। शारदा विद्या पीठ का विकास दो स्तरों में हुआ है। शारदा विद्या पीठ से सम्बंधित एक आध्यात्मिक आयाम यह है कि इसकी संकल्पना किस प्रकार हुई थी? इसकी स्थापना कश्मीर में ही क्यों हुई?

आरम्भ में कश्मीर क्षेत्र में मानवी वसाहत नहीं थी। यहाँ सतीसरा नामक एक सरोवर था। सम्पूर्ण कश्मीर क्षेत्र जलमग्न था। इसे सतसर भी कहते हैं, अर्थात सात सरोवर जो पर्वतों एवं घाटियों से घिरे हुए हैं। आज उस विशाल सरोवर के स्थान पर डल झील, वुलर झील तथा अन्य सरोवर अब भी शेष हैं। सतीसर सरोवर को रिक्त कर वहां वराहमुला नामक क्षेत्र का निर्माण किया गया। कालांतर में उसे बारामुला कहा जाने लगा। पुराणों के अनुसार सतीसर सरोवर को राक्षस के चंगुल से छुडाने के लिए भगवान विष्णु से वराह का रूप धर कर अपनी दाढ़ से सरोवर में छिद्र कर दिया था जिससे उसका जल रिसकर बाहर आ गया। इसी कारण इस क्षेत्र को वराहमुला कहा जाने लगा, वराह अर्थात् सूअर तथा मूल अर्थात् दाढ़।

सरोवर से जल बह जाने पर वहां सुन्दर कश्मीर प्रकट हो गया। वहां का प्रथम राजा था, राजा नील, जो कश्यप ऋषि का पुत्र था। कश्यप ऋषि को कैस्पियन सागर का ऋषि भी कहते हैं। इतिहासकारों के अनुसार कश्मीर नाम की व्युत्पत्ति कश्यप मीरा हुई है जिसका अर्थ है, ऋषि कश्यप का सरोवर। यह नाम एक कश्मीरी अथवा संस्कृत शब्द से आया है जिसका अर्थ जल का सूखना है। अथवा यह कश्यप मेरु शब्द से भी बना हो सकता है, जिसका अर्थ है कश्यप का पावन पर्वत।

निलमठपुराण – पुरातन कश्मीर

अनुराधा: क्या इसका सम्बन्ध निलमठपुराण से है?

आशीष: जी। निलमठपुराण का आरम्भ वहां से होता है जहां प्राचीन कश्मीर का जन्म हुआ था। जब जल को बहाकर भूमि प्रकट हुई थी। कश्मीर दो सभ्यताओं से निर्मित है। एक सभ्यता वह है जो कश्मीर के पर्वत शिखरों पर बसी थी जैसे तिब्बत, लद्दाख, गिलगित, बल्तिस्तान आदि जो एक काल में विहंगम जल स्त्रोत के चारों ओर स्थित थे। शीत ऋतु आते ही वे नीचे उतरकर घाटियों में आ जाते थे। कश्मीर में यह पुरातन संस्कृति अब भी जीवित है जिसमें सम्पूर्ण दरबार वातावरण के अनुसार स्थानांतरित हो जाता था। कश्मीर की शीतकालीन राजधानी जम्मू तथा ग्रीष्मकालीन राजधानी कश्मीर है।

शीतकाल में पर्वत शिखर हिमाच्छादित हो जाते थे जिसके कारण लोग नीचे उतरकर राजा नील के राज्य कश्मीर में आ जाते थे। राजा नील ने एक अध्यादेश निकला था कि पर्वत शिखर के वासी छः मास के लिए नीचे आ सकते हैं। वे छः मास के लिए उनका भरण-पोषण करेंगे। इसके अतिरिक्त वे उन्हें कष्ट ना दें। कश्मीर आज भी इसका पालन करता है।

कश्मीरी संस्कृति की अनोखी परम्पराएं

कश्मीरी संस्कृति की कुछ परम्पराएं अत्यंत अनोखी हैं। उनमें से एक है, खेत्सीमावस। मावस शब्द अमावस्या से उत्पन्न हुआ है तथा खेत्सी यक्ष से उत्पन्न एक अपभ्रंश शब्द है। अर्थात् यक्ष अमावस्या, जो शीत ऋतु के आरम्भ में आती है। कश्मीर में इस दिन से आरम्भ कर शीत ऋतु के अंत तक कुछ भोजन घर के बाहर रखने की प्रथा थी। पुराणों के अनुसार यह भोजन यक्षों के लिए रखा जाता था।

यक्ष किन्हें कहा जाता था? प्राचीन ग्रंथों के अनुसार यक्षों के बादाम के आकर के नेत्र होते थे। ठुड्डी पर थोड़े बाल लटके हुए दिखाए जाते हैं। यही विशेषताएं उन लोगों में भी देखी जा सकती हैं जो कश्मीर के आसपास पर्वत शिखरों पर निवास करते हैं, जैसे तिब्बती एवं लद्दाखी लोग। उनके शारीरिक लक्षण पुराणों में प्रदर्शित यक्षों के समान होते हैं। शीतकाल में पर्वत शिखरों में निवास करने वाले लोगों को खाद्यपदार्थ उपलब्ध नहीं हो पाते थे। अतः वे नीचे उतर कर घाटियों में आ जाते थे। घाटी के वासी उनका भरण-पोषण करते थे। इसके पृष्ठभाग में भावना यह थी कि अभावग्रस्त को भोजन खिलने से उन्हें समृद्धि प्राप्त होगी। शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को ध्यान में रखते हुए इस परंपरा का पालन किया जाता था। उस काल में तथा उसके पश्चात भी कश्मीर में शारदा का अस्तित्व था। शारदा के दो आयाम हैं। उन में एक आयाम आध्यात्मिक है। यहाँ शारदा के वास्तविक महत्त्व को समझना अत्यंत आवश्यक है।

सागर मंथन

हम सब सागर मंथन की कथा जानते हैं। सागर मंथन द्वारा अमृत सहित अनेक वस्तुएं प्राप्त हुई थीं। सभी देवताओं ने अमृत पान किया था। शेष अमृत कहाँ है? उस समय ब्रह्मा जी ने विष्णु जी से शेष अमृत के कलश को कश्मीर में स्थापित करने का आग्रह किया। भगवान विष्णु अमृत कलश लेकर कश्मीर पधारे तथा उस कलश को कृष्णगंगा या किशनगंगा एवं झेलम नदी के संगम पर स्थापित किया। आज मुजफ्फराबाद या पाक अधिकृत कश्मीर में उस क्षेत्र को नीलम घाटी कहते हैं। ब्रह्माजी ने संगम पर स्थापित अमृत कलश के ऊपर शारदा को प्रकट किया। काल के साथ वह क्षेत्र अध्यात्मिक अध्ययन का विशाल केंद्र बन गया।

माँ शारदा

सर्वप्रथम कश्मीरी पंडित माँ शारदा के सेवक व भक्त बने। वे इस भूभाग पर माँ शारदा का अधिपत्य मानते हैं। यहाँ तक कि १८वीं सदी में एक घटना हुई जिसमें उस क्षेत्र में माँ शारदा एक श्वेत हंस पर आरूढ़ देखी गयी थीं। जब तुर्क एवं मुस्लिम आक्रमण हुए तब एक मुस्लिम कमांडर ने बारूद का प्रयोग कर मंदिर को ध्वस्त कर दिया था। मंदिर का शिखर शारदा माँ के मंदिर स्थल से लगभग ३००-४०० मीटर दूर अब भी स्थित है जिस पर मूल श्रीयन्त्र उत्कीर्णित है।

गणेश घाट – प्राचीन कश्मीर

यहाँ गणेश घाट नामक एक स्थान है। यह एक विशाल पर्वत की सीधी सपाट खड़ी सतह है जिस पर स्वयंभू गणेश की प्रतिमा उत्कीर्णित प्रतीत होती है।

शारदा मंदिर के गर्भगृह के चार प्रवेश द्वार थे। अनेक राज परिवारों  के सदस्य शारदा के शिष्य थे जो यहाँ आकर आध्यात्म का अध्ययन करते थे। उनमें रानी दिद्दा एवं कोटा रानी भी सम्मिलित हैं। गोपादित्य एवं अन्य विद्वानों के लिखित संस्मरणों के अनुसार विश्व के अनेक भागों से विद्यार्थी यहाँ आते थे तथा शारदा के शिष्य बनकर विद्याध्ययन करते थे। अनेक विद्यार्थी माँ शारदा से आध्यात्म की शिक्षा प्राप्त कर पुनः अपने स्थानों पर चले गए तथा वहां जाकर सम्बंधित पंथों का शुभारम्भ किया। कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि ईसा मसीह भी इसी उद्देश्य से कश्मीर आये थे।

मध्य एशिया एवं मुख्य भारत के मध्य स्थित व्यापार मार्ग कश्मीर से होकर जाता था जिसके द्वारा कश्मीर आया जा सकता था। कश्मीर ने रेशम एवं मसलों के व्यापार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। ये वस्तुएं मध्य एशिया से भारत में प्राचीन कश्मीर मार्ग से ही प्रवेश करते थे।

अनुराधा: इस चर्चा के अंत में मैं आपने अंतिम प्रश्न करना चाहती हूँ। मैं आपसे उन व्यापारों के विषय में चर्चा करना चाहती हूँ जिनमें कश्मीर ने सहायक भूमिका निभाई थी। कश्मीर मैं किन किन वस्तुओं का आयात व निर्यात होता था?

प्राचीन कश्मीर की व्यापार व्यवस्था

आशीष: कश्मीर कभी बाजार नहीं था। ना ही उसकी एक बाजार के रूप में संकल्पना की गयी थी। तुर्क एवं अफगानी आक्रमणकारियों द्वारा कश्मीर पर आक्रमण से पूर्व कश्मीर एकमात्र मोक्ष धाम था। प्राचीन कश्मीर ऐसा राज्य कदापि नहीं था जहां व्यवसायिक गतिविधियाँ हों। वह केवल आध्यात्मिक क्रियाकलापों का केंद्र था।

रानी दिद्दा के काल में तथा उससे पूर्व एवं पश्चात भी, कश्मीर बृहत्तर भारत के लिए व्यापार सुविधाएं उपलब्ध कराता था। इसी व्यापार मार्ग का परिणाम है कि आज आप कश्मीर में रेशम एवं केसर का उत्पादन देखते हैं। कश्मीर विश्व का तीसरा विशालतम केसर उत्पादक है। विश्व में केसर के प्रमुख उत्पादक स्पेन, किश्तवार के कुछ स्थान एवं कश्मीर हैं। उनमें भी कश्मीर का केसर सर्वोत्तम माना जाता है। किन्तु इन सब का आरम्भ इस व्यापार मार्ग के कारण ही हुआ था। अन्यथा कश्मीर में किसी भी प्रकार का व्यापार नहीं होता था, ना उत्पादक के रूप में, ना ही उपभोक्ता के रूप में।

कश्मीर के लोग मूलतः मंदिर के संरक्षक थे। उदहारण के लिए, कौल संहिता को विश्व भर की शक्तिओं अथवा तंत्र का ग्रन्थ माना जाता है। कौल समाज को इस ज्ञान का संरक्षक माना जाता था। एक कौल होने के कारण तंत्र की परंपरा को बनाए रखना हमारे कार्यक्षेत्र में आता था। उसी प्रकार कश्मीर के सभी मूल कश्मीरी पंडित एवं अन्य मूल निवासी कश्मीर के विभिन्न ऐतिहासिक वैदिक श्रद्धा स्थलों के सेवक माने जाते थे। उन स्थानों में कुछ नाम हैं, तुलामुला, जिसे खीर भवानी भी कहा जाता है, अमरनाथ, शारदा विद्या पीठ आदि। इन स्थानों में सर्वाधिक संख्या में कश्मीरी पंडित कार्य करते थे। उनके जीवन का अस्तित्व ही वैदिक परम्पराओं एवं वैदिक धर्म के आध्यात्मिक आयामों को जीवित रखने में माना जाता था।

शारदा विश्वविद्यालय – पुरातन कश्मीर

शारदा विश्वविद्यालय विश्व का प्रथम विश्वविद्यालय था जहां विश्व भर से विद्यार्थी ज्ञान प्राप्त करने आते थे, जहां विभिन्न प्रकार के आध्यात्मिक संगोष्ठियाँ एवं कार्यशालाएं आयोजित की जाती थीं तथा जहां विद्यार्थियों को स्नातक/स्नातकोत्तर की उपाधियाँ एवं प्रमाणपत्र प्रदान किये जाते थे। यहाँ दूर-सुदूर यूरोप एवं विभिन्न मध्य एशिया के साम्राज्यों से अनेक विद्यार्थी आते थे। जैसे आदि शंकराचार्य एवं ह्वेन त्सांग भी कश्मीर आये थे। अशोक ने भी कश्मीर में दरबार स्थापित किया था।

बौद्ध धर्म पुरातन कश्मीर द्वारा ही प्रदत्त एक धरोहर है। बौद्ध धर्म का प्रसार भारत के बाह्य क्षेत्रों में कैसे हुआ? कश्मीर के द्वारा। बौद्ध धर्म के अनुयायी एवं कश्मीरी एक दूसरे पर अविश्वास करते थे। अतः बौद्ध धर्म के अनुयायी कश्मीर से बाहर चले गए।

कश्मीर के सृजनकर्ता

आशीष: मैं दो नामों का उल्लेख करना चाहता हूँ। सारंगदेव, जिन्होंने संगीत की रचना की तथा सुश्रुत, जिन्हें औषधियों का सृजनकर्ता माना जाता है। क्या लोग यह जानते हैं कि ये दोनों प्राचीन कश्मीर के निवासी थे।

अनुराधा: नहीं, मैं भी यह नहीं जानती थी। यह सब अत्यंत ही रोचक एवं ज्ञान वर्धक है। मुझे विश्वास है कि मेरे साथ मेरे पाठकों को अनेक नवीन जानकारी प्राप्त हुई है। हम सब के लिए भारत की धरोहरों के साथ साथ पुरातन कश्मीर की धरोहरों को जानना व समझना अत्यंत आवश्यक है, जिसे कुछ सीमा तक लोग विस्मृत कर चुके हैं तथा खोने की कगार पर हैं। अतः आशा करती हूँ कि कश्मीर की धरोहर एवं संस्कृति के सम्बन्ध में मुझे आपसे पुनः चर्चा करने का सौभाग्य प्राप्त होगा।

आशीष: जी अवश्य। आज की चर्चा के अंत में मैं आपसे अभिनवगुप्त के विषय में कुछ कहना चाहता हूँ। आज की पीढ़ी को यह समझना होगा कि अभिनवगुप्त किसी भी अन्य से अरबों गुना अधिक शक्तिशाली थे। उन्हें अजन्मा कहा जाता था, अर्थात् जिसका कभी जन्म नहीं हुआ हो। उनका जन्म भगवती की योनि से हुआ था। वे इतने शक्तिशाली थे कि वे सृष्टि के पाँचों तत्वों को केवल हाथों व मुख की भाव-भंगिमाओं द्वारा नियंत्रित कर लेते थे। उनके मुख के भाव परिवर्तित होते ही वातावरण में परिवर्तन आ जाता था।

अनुराधा: आपसे अनुरोध है कि किसी वार्तालाप में आप हमें अभिनवगुप्त के विषय में भी अधिक जानकारी दें। आज के इस अत्यंत ही ज्ञानवर्धक एवं संतोषजनक संवादों के लिए आपका हृदय से धन्यवाद करती हूँ।

आशीष: मुझे डीटुअर्स में आमंत्रित करने के लिए धन्यवाद। पुरातन कश्मीर मेरे हृदय का एक अभिन्न अंग है। उसके विषय में चर्चा करना मुझे सदा ही आनंदित करता है। मुझे यह अवसर पुनः प्रदान करने के लिए आपका अनेकानेक धन्यवाद।

IndiTales Internship Program के अंतर्गत श्रव्य संवाद का अंग्रेजी में लिखित प्रतिलिपि मेघा व्यास द्वारा तैयार किया गया है।

हिन्दी अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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श्रीनगर के हाउसबोट अर्थात् सरोवर पर तैरते घर! क्या इनका अनुभव प्राप्त किये बिना कश्मीर अथवा श्रीनगर की यात्रा पूर्ण मानी जा सकती है? कदाचित नहीं! वस्तुतः, कश्मीर यात्रा के लिए आये पर्यटकों का सम्पूर्ण पर्यटन हाउसबोट के इस अनोखे अनुभव के चारों ओर ही केन्द्रित रहता है। हमने गुलमर्ग में तीन दिवस अप्रतिम परिदृश्यों […]

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श्रीनगर के हाउसबोट अर्थात् सरोवर पर तैरते घर! क्या इनका अनुभव प्राप्त किये बिना कश्मीर अथवा श्रीनगर की यात्रा पूर्ण मानी जा सकती है? कदाचित नहीं! वस्तुतः, कश्मीर यात्रा के लिए आये पर्यटकों का सम्पूर्ण पर्यटन हाउसबोट के इस अनोखे अनुभव के चारों ओर ही केन्द्रित रहता है।

काश्मीर के नागिन सरोवर पर तैरते हाउसबोट
काश्मीर के नागिन सरोवर पर तैरते हाउसबोट

हमने गुलमर्ग में तीन दिवस अप्रतिम परिदृश्यों का आनंद उठाते व्यतीत किये जिसमें गुलमर्ग का प्रसिद्ध गोंडोला केबल कार भ्रमण भी सम्मिलित था। वहां से हम हाउसबोट में रहने का आनंद लेने श्रीनगर पहुंचे। आरम्भ में मुझे किंचित निराशा हुई क्योंकि हम प्रसिद्ध डल सरोवर पर नहीं, अपितु निगीन या नागिन सरोवर पर हाउसबोट में ठहरने जा रहे थे। मैंने कश्मीर में किसी नागिन सरोवर के विषय में कभी सुना नहीं था। श्रीनगर के नाम से सदा डल सरोवर का नाम ही जुड़ा होता है।

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श्रीनगर के आसपास, विशेषतः डल सरोवर के आसपास विचरण करने के पश्चात् मुझे प्रसन्नता हुई कि हम नागिन सरोवर पर ठहरे थे। नागिन सरोवर पर डल सरोवर जैसी भीड़भाड़ नहीं थी जिसके कारण हम अपने चारों ओर प्रचुर मात्रा में उपलब्ध प्रकृति का मनःपूर्वक आनंद उठा सके। हाउसबोट में एक सम्पूर्ण दिवस व्यतीत करना स्वयं में एक अद्वितीय अनुभव था। उसके द्वारा हम श्रीनगर के जीवन एवं वाणिज्य को तथा इसके चारों ओर केन्द्रित कश्मीर पर्यटन की मनोवृत्ति को जानने का प्रयास कर सके।

श्रीनगर के शिकारों का अनुभव

शिकारे और हाउसबोट
शिकारे और हाउसबोट

एक रंगबिरंगा शिकारा मुझे व मेरे सामान को हाउसबोट तक लेकर गया। हाउसबोट में प्रवेश करते ही मेरा चाय के साथ स्वागत किया गया। तभी मेरी दृष्टी मेरे सभी मित्रों पर पड़ी जो हाउसबोट के भीतर एक विक्रेता को घेरकर बैठे थे। वह विक्रेता उन्हें कागज की लीद से निर्मित रंगबिरंगी कलाकृतियाँ दिखा रहा था तथा उनसे क्रय करने का प्रलोभन दे रहा था। उसने रंगबिरंगे संदूक जिन पर हाथों से चित्रकारी की गयी थी, घंटियाँ, कंगन, चौकोर थाल तथा ऐसी ही अनेक छोटी छोटी वस्तुओं की लगभग प्रदर्शनी सजा रखी थी। हम उससे सही भाव के लिए तोल-मोल कर ही रहे थे कि वहां कश्मीरी आभूषणों की विक्री करने एक अन्य विक्रेता भी पहुँच गया। उसने भी अपनी पेटी खोलकर हमें चाँदी के आभूषण दिखाना आरम्भ कर दिया। एक प्रकार से संदूकों से बाजार बाहर आ गया था।

शिकारे की सवारी

डल सरोवर के मध्य शिकारा
डल सरोवर के मध्य शिकारा

समय हो चुका था कि हम एक शिकारे पर शांति से बैठकर नौका विहार करें तथा सरोवर में सूर्यास्त का आनंद लें। हम पुनः एक रंगबिरंगे शिकारे पर बैठ गए तथा हमारा नाविक शनैः शनैः उसे जल के भीतर ले जाने लगा। शिकारा अत्यंत संकरी नौका होती है। हम में से अधिकाँश लोग सरोवर की गहराई से भयभीत थे तथा इस संकरी नौका के उलटने के भय से आशंकित थे। वहीं मुझे सरोवर के शीत जल की चिंता अधिक थी। हमारा नाविक शिकारे को खेते हुए सरोवर के किनारे खड़ी हाउसबोटों को पार कर आगे ले गया। सभी हाउसबोटों के नाम अत्यंत निराले थे। उनमें से कई हाउसबोट ऐसे थे जिन पर आधुनिक होटल श्रंखलाओं के नाम थे। कुछ हाउसबोट धरोहर-होटलों की श्रंखला का स्वामित्व दर्शा रहे थे तो कुछ पर अंकित नामों से ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वे कश्मीर के स्थानीय होटलों के हाउसबोट हैं। सभी हाउसबोटों में एक समानता थी कि वे सभी काष्ठ की बनी थीं तथा उन पर काष्ठ का प्राकृतिक रंग था। बाह्य गलियारे अत्यंत उत्कीर्णित काष्ठ फलकों से निर्मित थे।

हमें एक दृश्य ने अत्यंत अचंभित किया कि प्रत्येक हाउसबोट का एक छोर भूमि से भलीभांति सम्बद्ध था। किन्तु बोट संचालक सभी पर्यटकों को शिकारे द्वारा बोट तक ऐसे ले जाते हैं मानो ये हाउसबोट सरोवर के मध्य खड़े हों।

शिकारों पर व्यापारी
शिकारों पर व्यापारी

बॉलीवुड के हिन्दी चित्रपटों ने शिकारों को अमर कर दिया है। अनेक चित्रपटों में नायक व नायिका को प्रेम में सराबोर शिकारे की सवारी करते दर्शाया गया है मानो प्रेम दर्शाने के लिए शिकारे सर्वोत्तम स्थान हैं। सरोवर में इतनी बड़ी संख्या में हाउसबोट हैं तथा उससे भी बड़ी संख्या में शिकारों में पर्यटक यहाँ से वहां सैर करते रहते हैं कि मुझे नहीं लगता प्रेमी जोड़े अथवा मधुचंद्र मनाते नवीन वर-वधु इन शिकारों में बैठकर एक दूसरे के प्रति प्रेम प्रदर्शित कर पाते होंगे। कुछ क्षणों के लिए आप यह अनुभव भी कर लें कि आप प्रकृति के मध्य उसकी सुन्दरता का आनंद ले रहे हैं कि अचानक एक अन्य शिकारा आपके समीप आकर रुक जाता है तथा उसमें बैठा नाविक अपनी विक्री क्षमता आप पर जांचने लगता है। सम्पूर्ण नौकाविहार में यह अनुभव अनवरत जारी रहता है। जैसे ही एक विक्रेता-शिकारा किसी पर्यटक तक पहुंचता है, अन्य विक्रेता भी अपने अपने शिकारे लेकर वहां आ जाते हैं। यह सरोवर पूर्णतः एक बाजार प्रतीत होता है। इन सब के पश्चात भी इन शिकारों में बैठकर जल में नौकाविहार करना एक स्वप्निल व भावना से ओतप्रोत करने वाला अनुभव है।

खरीददारी

आपकी स्मृतियाँ समेटते छाया चित्रकार
आपकी स्मृतियाँ समेटते छाया चित्रकार

आप इन शिकारे-विक्रेताओं से चाँदी के आभूषण, कागज की लीद से निर्मित वस्तुएं, कश्मीरी केसर, फिरन इत्यादि के साथ काहवा चाय का भी आनंद ले सकते हैं। यदि आप खरीददारी की इच्छा नहीं रखते हैं अथवा आप अपना बटुआ हाउसबोट में रख आये हैं तो कैमरे व कश्मीरी वेशभूषा लेकर छायाचित्र खींचने वाले आपको घेर लेंगे। आप अपने परिधान पर ही कश्मीरी वेशभूषा धारण कर सकते हैं तथा एक कश्मीरी के समान अपना छायाचित्र खिंचवा सकते हैं। जी हां, शीतल जल पर तैरती इस संकरी सी नौका पर ही आप सज्ज हो सकते हैं। आप ‘कश्मीर की कली’ अथवा ‘कश्मीर का पुष्प’ बनकर अपना छायाचित्र खिंचवा सकते हैं। यदि आप इतना परिश्रम ना करना चाहे तो आप जैसे हैं, वैसे ही वे आपके कैमरे से ही आपका छायाचित्र ले सकते हैं जिसके लिए वे छोटी रकम लेते हैं। यह एक उत्तम अवसर होता है क्योंकि जल के मध्य तैरते शिकारे में बैठकर आप स्वयं का छायाचित्र तो नहीं ले सकते हैं ना!

तैरता भाजी उद्यान

नागिन सरोवर में तैरते जल उद्यान
नागिन सरोवर में तैरते जल उद्यान

आपका शिकारा खिवैय्या आपको तैरते हुए भाजी उद्यान की ओर अवश्य संकेत करेगा। कश्मीरी लोग बड़ी मात्रा में कमल ककड़ी खाते हैं जो कमल के पौधे का तना होता है। वह जल में ही उगता है। इसके अतिरिक्त भी वे अनेक ऐसी भाजियां खाते हैं जो जल में ही उगते हैं। क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है? क्या आपने इससे पूर्व कहीं जल में तैरते भाजी के उद्यान देखे हैं? यदि हाँ, तो टिप्पणी खंड द्वारा मुझे अवश्य बताएं।

प्रातः का परिदृश्य - हाउसबोट से
प्रातः का परिदृश्य – हाउसबोट से

आप चाहे तट पर बैठे हों, हाउसबोट पर बैठे हों अथवा किसी शिकारे की सवारी कर रहे हों, आप जल पर तैरते अन्य शिकारों पर कहीं से भी दृष्टी डालें, वे अत्यंत ही मनभावन दृश्य प्रस्तुत करते हैं। वे ऐसे दृश्य होते हैं जिन्हें देखने तथा जिन्हें अपने कैमरे द्वारा अमर बनाने की इच्छा सभी पर्यटन छायाचित्रकारों में होती ही है।

श्रीनगर में हाउसबोटों का इतिहास

सदा से ऐसा माना जाता रहा है कि कश्मीर घाटी में हाउसबोटों की संकल्पना को अंग्रेज लेकर आये थे। किन्तु मुझे हमारे पर्यटन संयोजक Mascot Houseboats के आयोजक यासीन तुमन से ज्ञात हुआ कि १३वीं सदी के प्राचीन कश्मीरी साहित्यों में कश्मीर घाटियों के सरोवरों में तैरती नौकाओं का उल्लेख किया गया है। अतः कश्मीर के लिए नौकाओं का निर्माण नवीन कृति नहीं है। किन्तु उस काल में नौकाओं का प्रयोग पर्यटकों अथवा यात्रियों के लिए कम, स्थानीय लोगों की सुविधा के लिए अधिक किया जाता था।

हाउसबोट अथवा सरोवर पर तैरते घर
हाउसबोट अथवा सरोवर पर तैरते घर

यदि इन्टरनेट की मानें तो जब अंग्रेज कश्मीर घाटी में आये थे, उन्हें भूमि क्रय करने की अनुमति नहीं थी। इसके विकल्प के रूप में उन्होंने नौकाओं का निर्माण किया। उन नौकाओं को उन्होंने विस्तृत सरोवरों में उतारा तथा उनके भीतर ही निवास करने लगे। कालांतर में श्रीनगर के सरोवरों के तट पर खडीं ये भव्य नौकाएं कश्मीर पर्यटन का मुख्य आकर्षण बन गयीं।

आज यदि आप शंकराचार्य मंदिर से डल झील या सरोवर को देखें तो वह आपको नौकाओं से भरी एक नगरी के समान दिखाई देगी। इससे आप अनुमान लगा सकते हैं कि किस प्रकार कश्मीर का वाणिज्य इन्ही नौकाओं के चारों ओर केन्द्रित रहता है तथा किस प्रकार इन्ही नौकाओं के चारों ओर अनंत स्मृतियों की रचना होती है।

हाउसबोट क्या है?

रात्रिकाल में हाउसबोट
रात्रिकाल में हाउसबोट

डल सरोवर तथा नागिन सरोवर जैसे जलस्त्रोतों के तट पर एक पंक्ति में खडीं श्रीनगर की हाउसबोटें सरोवरों के चारों ओर स्थित किसी गाँव के समान प्रतीत होती हैं। साधारणतः प्रत्येक हाउसबोट के भीतर कुछ कक्ष होते हैं जिनमें प्रत्येक कक्ष के भीतर एक प्रसाधन गृह भी होता है। साथ ही एक भोजन कक्ष होता है तथा एक आमकक्ष होता है जहां सभी अतिथि साथ बैठकर वार्तालाप कर सकते हैं। सभी कक्षों में तापमान सुखद बनाने के लिए साधन होते हैं। झरोखों से आप सरोवर के शीतल जल को देख सकते हैं। नौका के बाहरी ओर खुला गलियारा होता है जहां बैठकर आप दृश्यों का आनंद ले सकते हैं। यह गलियारा नौका का सर्वोत्तम भाग होता है।

हाउसबोट के भीतर का ऐश्वर्य
हाउसबोट के भीतर का ऐश्वर्य

मेरे मानसपटल पर अब भी उस समय की सुखदाई स्मृतियाँ स्पष्ट हैं जब प्रातः शीघ्र उठकर मैं उस गलियारे में बैठ गयी थी। मेरे एक हाथ में गर्म चाय थी तथा दूसरे हाथ में किन्डल। मेरे समक्ष नागिन सरोवर में छाई धुंद की परतें छंटने लगी थीं तथा प्रातःकालीन दृश्य शनैः शनैः स्पष्ट होने लगा था। उगते हुए सूर्य की किरणें सरोवर के जल को सहलाते हुए उसे निद्रा से जगाने लगी थीं। कुछ ही समय में जल पर सुन्दर पुष्पों से लदे शिकारे दिखने लगे जो उन की विक्री करने के लिए जल में चक्कर काटने लगे थे। बाहरी दृश्यों का आनंद लेते हुए मैं गर्म चाय पी रही थी तथा साथ ही किंडल में पढ़ भी रही थी।

हाउसबोट का शयनकक्ष
हाउसबोट का शयनकक्ष

उत्कृष्ट उत्कीर्णित काष्ठ नौकाएं

हमारे हाउसबोट पास एक अतिभव्य नौका थी जिस पर उत्कृष्ट रूप से नक्काशी की हुई थी। हम उसे देखने उसके भीतर गए। नौका के भीतर की गयी नक्काशियों द्वारा कश्मीर का जीवन तथा उसकी संस्कृति को प्रदर्शित किया गया था। श्रीनगर के हाउसबोटों की लकड़ियों पर की गयी नक्काशी में प्रमुख रूप से चिनार के वृक्ष अवश्य होते हैं। कश्मीर के लिए चिनार केवल एक वृक्ष नहीं है, अपितु वह स्वयं में कश्मीर का इतिहास समेटे हुए है। वह कश्मीर के जीवन का अभिन्न अंग है।

इस भव्य नौका के भीतर स्थित सभी प्रसाधन गृह अतिआधुनिक थे। सभी कक्षों के भीतर वातानुकूलन सुविधाएं थीं जबकि वहां केवल जुलाई मास में वातावरण किंचित उष्ण होता है। कक्षों में रखीं सभी काष्ठ साज-सज्जा की वस्तुएं, मेज, बैठक आदि कश्मीरी कारीगरों की उत्कृष्ट कला प्रदर्शित कर रही थीं। मुझे यह जानकार अत्यंत दुःख हुआ कि अब ऐसे कारीगर कश्मीर में कम ही होते हैं। कश्मीर में लकड़ी पर उत्तम उत्कीर्णन करने वाले उत्कृष्ट कारीगर अब गिने-चुने ही रह गए हैं। कदाचित अब उन्हें इस क्षेत्र में पर्याप्त कार्य एवं पारिश्रमिक उपलब्ध नहीं हो पाता है। इस भव्य नौका के भीतर प्रत्येक सजावट उत्कीर्णित लकड़ी द्वारा की गयी थी।

कश्मीर की काष्ठ कला
कश्मीर की काष्ठ कला

हमने कुछ अन्य नौकाएं भी देखीं। हमें ऐसा प्रतीत हुआ कि उत्कीर्णन व सजावट की मात्रा एवं गुणवत्ता नौकाओं के स्तर पर निर्भर करती हैं। कुछ नौकाओं के भीतर लकड़ी के पटलों पर की गयी नक्काशी एक प्रकार से कश्मीर एवं उसके वनस्पति व जीवों पर की गयी विस्तृत वृत्तचित्र के समान थी।

हाउसबोट का निर्माण

मैं यात्रा संस्करण लिखने वाली एक ट्रेवल ब्लॉगर हूँ। कश्मीर के हाउसबोट में भी मैं एक ट्रेवल ब्लॉगर के रूप में ही आयी थी। इसका एक लाभ यह हुआ कि हाउसबोट के मालिक ने ना केवल हमें उसकी अन्य नौकाएं दिखाईं, अपितु उसने हमें हाउसबोट के निर्माण पर आधारित एक चलचित्र भी दिखाया। मुझे वह विडियो अत्यंत भाया। अन्यथा हम जैसे लोग, जिनका सामान्य जीवन में कभी नौकाओं से सामना नहीं होता है, नहीं समझ सकते कि कम से कम ५० से ६० वर्षों तक अखंड रूप से साथ निभाने वाली तथा असंख्य पर्यटकों को आनंदित करने वाली इन विशाल नौकाओं का निर्माण कितना कठिन कार्य है। कैसे लकड़ी के लम्बे फलकों से नौकाओं के ऐसे खोल बनाए जाते हैं जो आसानी से जल पर तैर सकें, कैसे प्रत्येक पट्टिका को हाथों से आकार दिया जाता है, कैसे उन्हें आपस में जोड़कर एक विशाल नौका बनाई जाती है तथा कैसे उन्हें अंतर्बाह्य सज्ज किया जाता है आदि।

शिकारे पे फूल की दूकान
शिकारे पे फूल की दूकान

गत कुछ वर्षों में कश्मीर में अस्थिरता व अशांति पूर्ण वातावरण के कारण वहां पर्यटकों की संख्या लगभग नगण्य हो गयी थी जिससे हाउसबोट मालिकों का व्यवसाय चौपट हो गया था। अब कश्मीर की स्थिति में कुछ सुधार आते ही सभी हाउसबोट मालिकों ने एकत्र आकर इस व्यवसाय को पुनर्जीवित करने का निश्चय किया है। उन्होंने इसमें ठहरने के लिए निर्धारित शुल्कों में भरी कमी की है तथा अब इन नौकाओं को आम पर्यटकों के लिए भी खोल दिया है। अन्यथा इससे पूर्व वे केवल संपन्न तथा धनाड्य पर्यटकों को ही हाउसबोट की सेवायें मुहैय्या कराते थे।

श्रीनगर में हम जहां भी गए, सब पिछले वर्ष आई विनाशकारी बाढ़ की ही चर्चा कर रहे थे। किन्तु उससे इन हाउसबोटों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा था। क्योंकि जलस्तर बढ़ने के पश्चात भी नौकाएं उन पर तैरती रहीं।

हाउसबोट के लिए व्यवहारिक सुझाव

  • जम्मू कश्मीर पर्यटन के वेबस्थल पर श्रीनगर के सभी सरोवरों पर तैरती हाउसबोटों का उनकी श्रेणियों के अनुसार सूचीबद्ध उल्लेख किया गया है। साथ ही उनके मालिकों के नाम तथा उन नौकाओं के स्थापना वर्षों का भी उल्लेख है। आप जब भी कश्मीर की यात्रा का नियोजन करें तथा हाउसबोट में ठहरना चाहें तो आप अपनी नौका के विषय में सभी आवश्यक जानकारी यहाँ से प्राप्त कर सकते हैं।
  • आप वहां कम से कम एक सूर्योदय एवं एक सूर्यास्त का दृश्य अवश्य देखें एवं उनका आनंद उठायें।
  • कम से कम एक बार शिकारे की सवारी अवश्य करें।
  • शिकारे पर विक्रेताओं से कुछ भी क्रय करने से पूर्व आवश्यक मोल-भाव अवश्य कर लें।

कश्मीर के हाउसबोट में ठहरना स्वयं में एक अनोखा अनुभव है जिसे आप जीवन भर विस्मृत नहीं कर सकते।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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गुलमर्ग के पर्यटन स्थल और विश्व के सबसे ऊँचे उड़न खटोला की सवारी https://inditales.com/hindi/gulmarg-ke-paryatan-sthal/ https://inditales.com/hindi/gulmarg-ke-paryatan-sthal/#comments Wed, 06 Nov 2019 02:30:41 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1566

गुलमर्ग – यह नाम सुनते ही मानसपटल पर बर्फीले पर्वत एवं उनकी ढलान पर स्की करते खिलाड़ियों की छवि उभर कर आ जाती है। पैर पर बंधी लम्बी डंडी से मार्ग सुगम करते हुए फिसलते खिलाड़ियों के चहरों पर रोमांच एवं खुशी, यही है गुलमर्ग का जादू। गुलमर्ग की रोमांचक कथाएं मैंने अपने पिता के […]

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गुलमर्ग – यह नाम सुनते ही मानसपटल पर बर्फीले पर्वत एवं उनकी ढलान पर स्की करते खिलाड़ियों की छवि उभर कर आ जाती है। पैर पर बंधी लम्बी डंडी से मार्ग सुगम करते हुए फिसलते खिलाड़ियों के चहरों पर रोमांच एवं खुशी, यही है गुलमर्ग का जादू। गुलमर्ग की रोमांचक कथाएं मैंने अपने पिता के मुख से अनेक बार सुनी थीं। कुछ ४० वर्षों पूर्व मेरे पिता की नियुक्ति गुलमर्ग में हुई थी।

गुलमर्ग के पर्यटन स्थल उन्होंने मेरे मष्तिष्क में गुलमर्ग एवं कश्मीर घाटी की अत्यंत मनमोहक काल्पनिक छवि निर्मित कर दी थी। मुझे भय था कि कहीं यही काल्पनिक छवि मेरे स्वयं के अनुभव के आड़े तो नहीं आयेगा? फिर भी, गुलमर्ग की अपनी अविस्मरणीय यात्रा द्वारा प्राप्त अनुभव से मैं आपको वहां के सर्वाधिक रोमांचक कार्यकलापों के विषय में बताना चाहती हूँ। मुकुट में मणी के समान, इनमें सर्वाधिक रोमांचक एवं आनंददायी है गुलमर्ग गोंडोला सवारी।

गुलमर्ग के पर्यटन स्थल

श्रीनगर से गुलमर्ग की सवारी

श्रीनगर से गुलमर्ग का मार्ग
श्रीनगर से गुलमर्ग का मार्ग

गुलमर्ग पहुँचने का एकमात्र साधन है सड़क मार्ग। अतः इस छोटे से गाँव तक आप गाड़ी द्वारा ही पहुँच सकते हैं। मैं इतना अवश्य बल देना चाहूंगी कि आप मार्ग के उत्तरार्ध में कदापि ना सोयें। जब श्रीनगर से आपकी यात्रा आरम्भ होगी, वह किसी भी सामान्य मध्यम् वर्गीय नगरी से बाहर जाने के समान होगा।

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वास्तव में मैं श्रीनगर एवं गुलमर्ग के मध्य के सम्पूर्ण मार्ग आबादी से परिपूर्ण देख अत्यंत आश्चर्यचकित थी। जब मार्ग चढ़ाई करने लगती है, तब आप स्वयं को ऊंचे ऊंचे वृक्षों से घिरा पायेंगे। इनको चीर कर जाते घुमावदार संकरे मार्ग को देख आपका मन प्रफुल्लित हो उठेगा।

सूर्य दर्शन स्थल

सूर्यकिरणों से खेलती हिमालय की चोटियाँ
सूर्यकिरणों से खेलती हिमालय की चोटियाँ

गुलमर्ग में प्रवेश करने से ठीक पूर्व एक नुकीले मोड़ पर एक दर्शन स्थल है। वहां लगे फलक द्वारा हमें इसकी सूचना पाप्त होती है। यहाँ गाड़ी से उतर कर एक ओर घाटी का तथा दूसरी ओर बर्फ से ढँके पर्वत पर चमकते सूर्य की किरणों का विहंगम दृश्य देख सकते हैं। यह और बात है कि पर्वत की यही चोटी मैं कुछ समय पश्चात अपने अतिथिगृह, खायबर हिमालयन रेसॉर्ट में अपने कक्ष से भी देखने वाली थी।

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यह अद्भुत दृश्य सर्वप्रथम गुलमर्ग में आपका स्वागत करता है तथा इस नगर की सुन्दरता से आपका पूर्व परिचय करता है। यदि आप वहां दिन के समय पहुंचें, तब आप सूर्य की सुनहरी किरणों को चंदेरी बर्फीली पर्वतों से एकसार होकर जादू उत्पन्न करते देख सकते हैं।

गुलमर्ग गोंडोला की सवारी

गुलमर्ग गोंडोला अथवा उड़न खटोला
गुलमर्ग गोंडोला अथवा उड़न खटोला

यदि आपने गुलमर्ग गोंडोला की सवारी नहीं की तो यूँ मानिए की आपने गुलमर्ग की यात्रा ही नहीं की। आप सोच रहे होंगे, ये गोंडोला क्या है। यह लोहे की मोटी तार पर लटक कर चलने वाला एक ऐसा वाहन है जिसे केबल कार कहते हैं। यह आपको कुछ ही क्षणों में पर्वत के ऊपर पहुंचा देते हैं।

गुलमर्यग गोंडोला विश्व की सर्वाधिक ऊंचाई पर स्थित केबल कार है। अतः कोई कारण नहीं बनता कि आप इस पर बैठने का सौभाग्य छोड़ दें। इस चढ़ाई के दो तल हैं। इन दोनों तलों को मिलाकर यह यात्रा आपको समुद्र तल से ८७०० फीट से १४००० फीट तक ले जाती है। तो विरली वायु एवं लम्बी श्वास लेने के लिए सज्ज हो जाएँ।

अपरवाट पर्वत गुलमर्ग गोंडोला

हिम शिखिर गुलमर्ग गोंडोला से
हिम शिखिर गुलमर्ग गोंडोला से

इस सवारी का प्रथम तल आपको अपरवाट पर्वत के सम्पूर्ण ऊंचाई के मध्य भाग तक ले जाता है। यहाँ कई प्रकार के पर्यटन संबंधी क्रियाकलापों का आयोजन किया जाता है। सर्वाधिक आसान एवं आनंददायी खेल है बर्फ से खेलना। खेलने के लिए चारों ओर बर्फ ही बर्फ है।

इसके साथ आप स्लेज एवं खच्चर की सवारी भी कर सकते हैं अथवा स्की करने का रोमांच भी प्राप्त कर सकते हैं। यदि इस प्रकार की किसी भी क्रिया में रूचि ना हो तो फिर पैदल ही चलें। चारों ओर बर्फीली चोटियों एवं बर्फ से झांकते वृक्षों का आनंद उठायें। बर्फ से खेलते एवं आनंद उठाते सहयात्रियों को देखना भी अत्यंत सुखद अनुभव होगा।

अपरवाट पर्वत की चोटी

हिम खण्डों से घिरा सैनिक शिविर
हिम खण्डों से घिरा सैनिक शिविर

अगली केबल कार अपरवाट पर्वत की लगभग चोटी तक पहुंचाती है। यह यात्रा तीव्र ढलान युक्त है किन्तु चारों ओर का अद्भुत दृश्य आपको इसका आभास नहीं होने देता। जैसे जैसे आप ऊपर चढ़ते जाते हैं, परिदृश्यों में परिवर्तन आता रहता है। आरम्भ में आप पर्वत को नीचे से ऊपर देखते हैं। १० मिनटों के पश्चात, आप वही परिदृश्य ऊपर से नीचे की ओर देखते हैं। एक ओर का परिदृश्य ऊपर चढ़ते समय तथा दूसरी ओर का दृश्य नीचे उतरते समय देखिये। आप अनवरत आनंद प्राप्त कर सकते हैं। समान्तर केबल द्वारा स्की करते खिलाड़ियों को ऊपर ले जाती कई खुली सवारियां आपको भी दिखाई देंगी। देखने में वे अत्यंत भयावह, साथ ही रोमांचक भी प्रतीत होती हैं।

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दूसरी गोंडोला सवारी के पश्चात आप बर्फ से घिरी चोटी पर पहुँच जाते हैं। एक किनारे पर खड़े होकर यदि आप चारों ओर के पर्वतों को निहारेंगे तो आपको ऐसा प्रतीत होगा मानो आप बर्फ की किनार वाली प्याली की किनार पर खड़े हैं। पहाड़ियों पर कई सेना शिविर दिखे जो दूर से कबूतर खाने से प्रतीत हो रहे थे। बर्फीली पहाड़ियों पर इतनी विपरीत परिस्थितियों में रहकर हमारी सीमाओं की रक्षा करते सैनिकों की कठिनाओं का हम अनुमान भी नहीं लगा सकते।

गुलमर्ग का मनोरम दृश्य
गुलमर्ग का मनोरम दृश्य

यदि आप स्की खेल में निपुण नहीं हैं तब भी आप स्की का आनंद ले सकते हैं। यहाँ आपको गाइड सेवा उपलब्ध हो जायेगी जो आपको स्की सवारी का आनंद दे सकते हैं। जी हाँ, स्की सवारी! क्योंकि यहाँ आप स्वयं स्की नहीं करते हैं। बल्कि गाइड स्वयं स्की करता हुआ आपको अपने साथ थोड़ी दूर ले जाता है तथा आपको स्की का आनंद देता है। यहाँ मैंने कई गाइड को भारत एवं पाकिस्तान के मध्य स्थित लाइन ऑफ़ कंट्रोल अर्थात नियंत्रण रेखा दिखाने का प्रलोभन देते हुए देखा। किन्तु मुझे शंका है कि वहां पर्यटकों को जाने की अनुमति होगी!

गुलमर्ग गोंडोला का विडियो

मेरी गोंडोला सवारी का विडियो देखिये। उत्तम दर्शन के लिए HD mode में देखें।

गोंडोला अवतरण बिंदु, जो गोंडोला सवारी का अंतिम बिंदु है, इसके समक्ष हरमुख पर्वत है। स्थानीय निवासियों के अनुसार यहाँ भगवान् शिव का वास है। अतः यह एक पावन पर्वत है। किंचित बाईं ओर नंगा पर्वत है जो पकिस्तान के गिलगित-बल्तिस्तान क्षेत्र में स्थित है। नंगा पर्वत सिन्धु नदी के कारण भी प्रसिद्ध है। सिन्धु नदी यहाँ से बहती है।

हिमाच्छादित गड़रियों की झोंपड़ियाँ
हिमाच्छादित गड़रियों की झोंपड़ियाँ

वापिस उतरते समय, गोंडोला के आरंभिक स्थल के समीप आप गड़रियों की झोपड़ियां देखेंगे जो शीत ऋतू में बर्फ से आच्छादित हो जाती हैं। प्रत्येक वर्ष ग्रीष्म ऋतू में गड़रिये जानवरों को ले कर यहाँ वापिस आते हैं जब यहाँ पशुओं के लिए घास बहुतायत में उपलब्ध रहती है।

गोंडोला अड्डे पर कई गाइड आपको टिकट दिलाने में सहायता करने का प्रलोभन देंगे। इसका कारण यह भी है कि गोंडोला सवारी की टिकट खरीदने के लिए लम्बी कतार होती है। इन दोनों से बचने के लिए मेरा सुझाव है कि आप सुबह ही अपनी टिकट खरीद लें। इससे आपको पर्वत के शिखर पर अधिक समय बिताने का भी अवसर प्राप्त होगा।

कश्मीरी व्यंजनों का आस्वाद लें

कश्मीरी वाज़वान
कश्मीरी वाज़वान

वाजवान अर्थात् विस्तृत कश्मीरी भोजन जिसे एक सामूहिक थाली में परोसा जाता है तथा कई लोग एक साथ एक ही थाली में से खाते हैं। आजकल आतिथ्य उद्योग अतिथि की व्यक्तिगत वरीयता के विषय में अवगत है। इसलिए वे वाजवान के समान ही थाली परोसते हैं किन्तु सब अपनी अपनी थाली में से ही खाते हैं। वाजवान मुख्यतः मांसाहारी भोजन होता है। मुझे इसी वाजवान के शाकाहारी संस्करण का आनंद खैबर हिमालयन रेसॉर्ट के रसोइये ने दिया। उसके विषय में कुछ लिखना चाहती हूँ।

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शाकाहारी वाजवान का आरम्भ मैंने अखरोट की चटनी से किया। इतनी स्वादिष्ट थी ये चटनी, कि इसके नाम के अनुरूप ही हमने इसे चाट चाट कर चट कर दिया। अगला व्यंजन था नदरू यख़नी, कमल डंडी से निर्मित व्यंजन जो कश्मीर में अत्यंत प्रसिद्ध है। यह भी अत्यंत स्वादिष्ट था तथा गरिष्ठ भी नहीं था। मैंने बाद में शहद की चटनी के साथ नदरू चिप्स भी खाए। यह भी अत्यंत रुचिकर थे। पनीर से निर्मित एक व्यंजन भी था जिसे मैंने न चखना उचित समझा। जी हाँ शाकाहारी के नाम से इतना पनीर परोसा जाता है की मन ऊब जाता है। मेरा वाजवान गरिष्ठ नहीं था। अतः मुझे हल्का प्रतीत हो रहा था। किन्तु मेरे साथ जिन्होंने असली वाजवान का आस्वाद लिया था, वे खाकर पस्त हो गए थे।

यदि आपका पेट अत्यंत भरा प्रतीत हो तो कश्मीरी चाय, काह्वा का आग्रह करें। इससे चैन मिलेगा।

महारानी शिव जी मंदिर

महारानी शंकर मंदिर - गुलमर्ग
महारानी शंकर मंदिर – गुलमर्ग

श्री मोहिनीश्वर शिवालय इस छोटे से शिव मंदिर का आधिकारिक नाम है। गुलमर्ग की प्याली सदृश घाटी के मध्य, एक छोटी सी पहाड़ी के ऊपर यह मंदिर स्थित है। महाराणा मोहन देव की सुपुत्री एवं कश्मीर के महाराजा हरी सिंग की पत्नी, रानी मोहिनी बाई सिसोदिया ने १०० वर्षों पूर्व, सन् १९१५ में इस मंदिर का निर्माण कराया था। पिता की ‘महाराणा’ पदवी इस तथ्य की ओर संकेत करती है कि उनका सम्बन्ध मेवाड़ घराने से था। इस मंदिर को महारानी मंदिर तथा रानी जी मंदिर इत्यादि नामों से भी प्रसिद्धी प्राप्त है। मुझे सहसा तेलंगाना के रामप्पा मंदिर का स्मरण हो आया। यह मंदिर भी पीठासीन देव के बजाय इसके निर्माता के नाम से अधिक लोकप्रिय है।

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इस साधारण से दिखते मंदिर तक पहुँचने के लिए कुछ सीड़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। यूँ तो मंदिर बंद था, फिर भी इसके भीतर स्थापित शिवलिंग दिखाई पड़ रहा था। शिवलिंग के ऊपर लाल रंग की तिरछी छत थी जिस पर ॐ तथा स्वास्तिक का चिन्ह बना हुआ था। देवालय के चारो ओर का विहंगम दृश्य सम्मोहित कर देता है। मंदिर के पृष्ठभाग पर हिम आच्छादित पर्वत श्रंखलायें है । जैसे जैसे आप आगे बढ़ते हैं, गुलमर्ग की प्याली एवं उसके मध्य स्थित प्रसिद्ध गोल्फ मैदान दृष्टिगोचर होने लगता है। कई छोटी हरे रंग की इमारतें दिखती हैं जिनमें अधिकतर अतिथिगृह अथवा होटल्स हैं।

रानी द्वारा निर्मित होते हुए भी यह मंदिर सादगी से परिपूर्ण है। इससे आप अनुमान लगा सकते हैं कि उस समय कश्मीर के लोगों का जीवन भी सादगी भरा था। या कहीं ऐसा तो नहीं कि यहाँ के प्रतिकूल वातावरण के कारण इसकी भव्यता सीमित रखी गई है?

इस मंदिर को आपने एक बॉलीवुड चलचित्र के गाने ‘जय जय शिव शंकर’ में अवश्य देखा होगा।

सेंट मेरी गिरिजाघर

सेंट मेरी गिरिजाघर - गुलमर्ग
सेंट मेरी गिरिजाघर – गुलमर्ग

महारानी मंदिर से आगे बढ़ते हुए, गोल्फ मैदान की बाहरी सीमा पार कर हम सेंट मेरी गिरिजाघर के प्रवेश द्वार पर पहुंचते हैं। यह १५० वर्ष प्राचीन गिरिजाघर है। मैदानी क्षेत्रों की तपती गर्मी से बचने के लिए जब अंग्रेजों ने इस स्थान की खोज की होगी, तब कदाचित इस गिरिजाघर का निर्माण कराया होगा। जिस दिन मैं यहाँ आयी थी, यह गिरिजाघर बंद था। इसके चारों ओर एक चक्कर लगाकर मैं वापिस आ गयी। प्रातःकाल किये गए इस पैदल सैर ने मन प्रफुल्लित कर दिया था।

रानी मंदिर के समान यह भी सादगी भरा किन्तु अपेक्षाकृत बड़ा गिरिजाघर था। यहाँ से चारों ओर दृष्टी घुमाने पर आपको कई छोटे तालाब दिखाई पड़ेंगे। ये तालाब गोल्फ मैदान के ही भाग हैं। श्वेत चमकते बर्फ के बीच एक सूखे वृक्ष की छवि ने हम सब का मन मोह लिया था।

होटल हाइलैंड गुलमर्ग
होटल हाइलैंड गुलमर्ग

सेंट मेरी गिरिजाघर की ओर जाते समय आप एक प्रसिद्ध होटल – होटल हाईलैंड्स पार्क देखेंगे जहां बॉबी चलचित्र के इस लोकप्रिय गाने ‘हम तुम इक कमरे में बंद हों’ को फिल्माया गया था।

हरी सिंह का महल

लकड़ी द्वारा निर्मित यह छोटा सा महल, कश्मीर के अंतिम महाराजा हरी सिंह का महल है। पहाड़ी के ऊपर स्थित इस महल से पूरा गुलमर्ग दृष्टिगोचर होता है। मैं नवम्बर २०१५ में जब गुलमर्ग आयी थी, तब इस महल के पुनर्निर्माण का कार्य आरम्भ था। राजा का परिवार जब इस महल को छोड़कर चला गया, तब इस महल का शनैः शनैः क्षय होने लगा। इसका कारण यहां के वातावरण के साथ साथ यहाँ की राजनैतिक परिस्थितियाँ भी हैं।

राजा हरी सिंह का महल
राजा हरी सिंह का महल

इस षटकोणीय महल के नवीनीकरण का कार्य आरम्भ है। आशा है आगामी मौसम तक यह पर्यटकों के लिए उपलब्ध हो जाएगा। मेरे पिता ने मुझे इस महल के एक अद्भुत गलीचे के विषय में बताया था। यह गलीचा महल के भीतर ही बुना गया था ताकि यह महल के प्रत्येक कोने में ठीक प्रकार से बिछाया जा सके। वहां निर्माण कार्य करते कर्मचारियों ने बताया कि महल की बचीखुची कलाकृतियों को श्रीनगर के राज्य संग्रहालय में स्थानांतरित किया गया है।

गुलमर्ग नगर में पद भ्रमण करिये

इस पहाड़ी पर्यटन स्थल का प्रमुख आकर्षण है यहाँ के पर्वत, वृक्ष, परिदृश्य, खुला आकाश तथा इन सब का अद्भुत सम्मिश्रण। इसका आनंद उठाने का सर्वोत्तम उपाय है पैदल सैर करते हुए चारों ओर निहारना। प्रत्येक दिवस, प्रत्येक क्षण यह सम्मिश्रण एक भिन्न रूप प्रस्तुत करता है, मानो इन प्राकृतिक तत्वों का प्रयोग कर कोई अनवरत चित्रकारी कर रहा हो। इस सौंदर्य में स्वयं को भी एक भाग बना कर इसके अस्तित्व में लीन हो जाएँ।

किसी भी अन्य पहाड़ी पर्यटन स्थलों के समान गुलमर्ग भी विभिन्न ऋतु में भिन्न होता है। मैंने इसे नवम्बर मास में देखा था। गुलमर्ग के चित्र बताते हैं कि ग्रीष्म ऋतु में यह अत्यंत हराभरा रहता है तथा शीत ऋतु में इससे भी श्वेत। शीत ऋतु का आरम्भ दिसंबर के मध्य से आरम्भ होता है। आप जब भी गुलमर्ग यात्रा की योजना बनाएं, वहां के मौसम का पूर्वानुमान अवश्य लगा लें। मौसम के अनुसार ही सामान साथ ले जाएँ।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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