आध्यात्मिक भारत Archives - Inditales श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Wed, 28 Jun 2023 17:42:10 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.7.5 सहस्रलिंग – सिरसी शाल्मला नदी के सहस्त्र शिवलिंग https://inditales.com/hindi/thousand-shivalingas-sahasralinga-sirsi/ https://inditales.com/hindi/thousand-shivalingas-sahasralinga-sirsi/#comments Wed, 19 Sep 2018 02:30:51 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=943

उत्तर कन्नड़ के हरे भरे घने वनों के हृदयस्थली में स्थित है विस्मयकारी स्थलों का नगर सिरसी। उत्तर कन्नड़ के प्रत्येक स्थान से सिरसी की ओर रास्ता जाता है। मेरे इस सिरसी यात्रा के समय मैंने निश्चय किया था कि सिरसी के आसपास के अद्भुत पर्यटन स्थलों का अवलोकन अवश्य करूंगी। इससे पूर्व मैंने आपसे […]

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सहस्रलिंग – सिरसी शाल्मला नदी
सहस्रलिंग – सिरसी शाल्मला नदी

उत्तर कन्नड़ के हरे भरे घने वनों के हृदयस्थली में स्थित है विस्मयकारी स्थलों का नगर सिरसी। उत्तर कन्नड़ के प्रत्येक स्थान से सिरसी की ओर रास्ता जाता है। मेरे इस सिरसी यात्रा के समय मैंने निश्चय किया था कि सिरसी के आसपास के अद्भुत पर्यटन स्थलों का अवलोकन अवश्य करूंगी। इससे पूर्व मैंने आपसे विभूति झरना, याना शिलाएं तथा मिर्जन दुर्ग की यात्रा के मेरे अनुभव बांटे थे। अपने इस संस्मरण द्वारा आपको सिरसी की शाल्मला नदी के तल पर स्थित प्राचीन शिवलिंगों के दर्शन कराती हूँ।

सोंदा के सहस्रलिंग शिवलिंग

शाल्मला नदी में सहस्रलिंग - कंकर कंकर शंकर है
शाल्मला नदी में सहस्रलिंग – कंकर कंकर शंकर है

सिरसी से लगभग १७ की.मी. दूर एक छोटा सा गाँव है सोंदा। इसी गाँव के समीप, घने वनों से होकर बहती है एक शांत सी नदी, जिसका नाम है शाल्मला। शाल्मला नदी ने अपने आँचल में एक आसाधारण ऐतिहासिक धरोहर छुपा रखी है।शाल्मला नदी के तल में बड़ी बड़ी शिलाएं है जिनमें कुछ इतनी विशाल हैं कि इन्हें चट्टानें कहा जा सकता है। गहरे धूसर रंग की ये शिलाएं कड़े स्फटिक से निर्मित प्रतीत होती हैं।

चारों ओर सर्व लघु एवं विशाल शिलाओं पर शिवलिंग तराशे हुए हैं। ऐसा माना जाता है कि यहाँ कुल मिला कर एक सहस्त्र (१०००) से भी अधिक शिवलिंग उत्कीर्णित हैं। इसी कारण यह स्थल सहस्त्रलिंग के नाम से से जाना जाता है। इनमें से कई शिवलिंग, शिव के वाहन नंदी सहित भी हैं। कई शिलाओं पर एक से अधिक शिवलिंग तक्ष हैं। कुछ शिवलिंग अर्धनिर्मित हैं जिनके खाके मैंने स्पष्ट देखे। घुटनों तक गहरे जल के भीतर प्रवेश कर मैंने देखा कि लगभग प्रत्येक शिला पर कम से कम एक शिवलिंग अवश्य तक्ष था।

जहाँ शिव वहां उनका वहां नंदी - सहस्रलिंग - शाल्मला नदी
जहाँ शिव वहां उनका वहां नंदी – सहस्रलिंग – शाल्मला नदी

कुछ शिलाओं पर नाग देवता भी उत्कीर्णित थे। मेरी दृष्टी एक शिला पर तक्षे नाग देवी की अत्यंत आकर्षित प्रतिमा पर जाकर थम सी गयी थी। भगवान् शिव के प्रतीक ये शिवलिंग, नंदी तथा नागदेव विहीन कैसे हो सकते हैं?

कुछ चट्टानों पर एक के ऊपर एक जमाये हुए पत्थरों को देख मुझे अपनी स्पीती घाटियों की यात्रा स्मरण हो आयी। वहां भी मैंने ऐसे ही पत्थरों को एक के ऊपर एक जमाये हुए देखा था। यहाँ तक कि ऐसा दृश्य मैने कनाडा के इनुक्षुक में भी देखा था। मैं दंग रह गयी कि कुछ प्रतीकात्मक चिन्ह कितने सार्वभौमिक हो जाते हैं!

सहस्त्रलिंग स्थापना की किवदंतियां

शाल्मला नदी के किनारे शिवलिंग
शाल्मला नदी के किनारे शिवलिंग

इन सहस्त्रलिंगों के समीप स्थित एक लघु सूचना पटल इन सहस्त्रलिंगों की कथाएं कह रहा था।

ऐसा कहा जाता है कि सोंदा के राजा सवादी अकसप्पा नायक को संतान सुख प्राप्त नहीं था। संतान प्राप्ति हेतु उन्हें एक ऋषि ने एक सहस्त्र शिवलिंगों के निर्माण करवाने की सलाह दी थी। देवों को प्रसन्न करने के लिए राजा ने शाल्माला नदी में उपलब्ध लगभग प्रत्येक शिला को शिवलिंग में परिवर्तित कर दिया था।

हर शिला एक शिवलिंग - सहस्रलिंग सिरसी
हर शिला एक शिवलिंग – सहस्रलिंग सिरसी

किवदंतियों के अनुसार शिवलिंगों के निर्माण के पश्चात अंततः राजा को संतान सुख प्राप्त हुआ। उसी काल से यह धारणा चली आ रही है कि यह शिवलिंग सबकी मनोकामनाएं सम्पूर्ण करती हैं। अर्थात् इच्छापूर्ति शिवलिंग हैं ये सिरसी के सहस्त्रलिंग।

हालांकि इन सहस्त्र लिंगों के इतिहास सम्बंधित अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।

शिवलिंग का एक और विहंगम दृश्य
शिवलिंग का एक और विहंगम दृश्य

निम्नदर्शित चित्र में दृष्ट नंदी की प्रतिमा यहाँ की विशालतम प्रतिमा है। मैंने अनुमान लगाया यह प्रतिमा लगभग ६ फीट ऊंची, १२ फीट लम्बी तथा ५ फीट चौड़ी है। यह विशालकाय पाषाणी मूर्ति कई मन भारी हो सकती है। इस विशालकाय प्रतिमाओं तथा शिवलिंगों को देख मैंने अनुमान लगाया कि इन्हें यहीं नदी के तल में स्थित चट्टानों तथा शिलाओं पर यथास्थान तराशा गया होगा।

विशाल चट्टान को नंदी का रूप दिया - सहस्रलिंग सिरसी
विशाल चट्टान को नंदी का रूप दिया – सहस्रलिंग सिरसी

कुछ विशाल चट्टानों पर पौराणिक कथाओं से सम्बंधित चित्र भी उत्कीर्णित थे। उदाहरणतः निम्न चित्र में दर्शित परिदृश्य में नंदी तथा शिवलिंग एकत्र तक्ष हैं।

सहस्रलिंग के दर्शन करने कब जाएँ

नंदी एवं नाग प्रतिमाएं - शाल्मला नदी के तट पर
नंदी एवं नाग प्रतिमाएं – शाल्मला नदी के तट पर

चूंकि ये सहस्त्रलिंग वर्षा ऋतु द्वारा पोषित शाल्माला नदी के तल पर स्थित हैं, इनके दर्शन हेतु समय का चयन अति आवश्यक है। वर्षा ऋतु में अधिकतर शिवलिंग जलमग्न अवस्था में आ जाते हैं। इस कारण इनके अवलोकन हेतु सर्वोपयुक्त समय अक्टूबर मास से मार्च के महीने तक है।

सार्वजनिक सड़क परिवहन द्वारा नदी तक नहीं पहुंचा जा सकता। अतः हमने इन शिवलिंगों तक पहुँचने के लिए किराए की गाड़ी का प्रबंध किया था। नदी के चारों ओर के घने वनों का आनंद लेते हुए नदी के आसपास पदयात्रा भी की थी। यह स्थल जीव-वनस्पतियों तथा पक्षियों से समृद्ध है।

नाग देवी की प्रतिमा - शाल्मला नदी
नाग देवी की प्रतिमा – शाल्मला नदी

समीप ही एक छोटी सी दुकान है जो पर्यटकों की कुछ मौलिक आवश्यकताओं जैसे पेयजल, जलपान इत्यादि की आपूर्ति करती है।

गूगल में सरसरी दृष्टी दौडाने पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि जितना इन सहस्त्रलिंगों के सम्बन्ध में सुना था, उससे अधिक कोई जानकारी वहां उपलब्ध नहीं है। पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग तथा सरकार से मेरी यह अवश्य अपेक्षा है कि वे नदी के तल पर आगे जाकर और अधिक शिवलिंगों की खोज करे। वर्तमान में उपलब्ध शिवलिंगों की सही संख्या की जानकारी उपलब्ध कराने का प्रयत्न करें।

झूलता सेतु

शाल्मला नदी पर झूलता सेतु
शाल्मला नदी पर झूलता सेतु

नदी के समीप एक झूलता सेतु निर्मित है जो नदी के उस पार गाँव तक पहुंचाता है। इस सेतु पर चढ़ कर ऊपर से इन शिवलिंगों का विहंगम दृश्य देखा जा सकता है। यहाँ से आसपास का परिदृश्य भी अत्यंत मनोहारी प्रतीत होता है।

साथ ही यह भी दृश्मान है कि पर्यटकों ने नदी तथा आसपास के क्षेत्र की क्या दुर्गति की है। नदी के दोनों तीर स्वच्छ नहीं थे तथा पर्यटकों ने नदी में कचरा डालने में किसी भी प्रकार का परहेज नहीं किया है। आशा है सरकार इस स्थल की स्वच्छता की ओर गंभीरता से विचार करे।

इन सहस्त्रलिंगों के पृष्ठभागीय किवदंतियों से परे जाकर एक विचार मष्तिष्क में उभरता है और इन लिंगों के इतनी बड़ी संख्या में एक ही स्थान पर होने के कारणों को खोजता है। कुछ तो कारण अवश्य होगा क्योंकि ऐसे ही समूह भारत में अन्य स्थलों पर भी प्राप्त हुए हैं। यहाँ तक कि विश्व की अन्य हिन्दुधर्म का पालन करते स्थलों पर भी ऐसे शिवलिंगों के समूह प्राप्त हुए हैं।

इनमें कुछ स्थल हैं:

कंबोडिया की सियाम रीप नदी

नेपाल का पशुपतिनाथ मंदिर

वाराणसी का जंगमवाड़ी मठ

पाटन, गुजरात का सहस्त्रलिंग तलाव

तेलंगाना स्थित वारंगल दुर्ग के अवशेष

मुझे विश्वास है कि कई अन्य स्थलों में भी इस प्रकार के शिवलिंग अवश्य उपलब्ध होंगे। कुछ स्थानों पर इच्छापूर्ति हेतु निर्मित होंगे तथा कुछ स्थानों पर यह इच्छाप्राप्ति पर भक्तों द्वारा चढ़ाए गए होंगे। अथवा ऐसे शिवलिंगों के समूह तक्ष करने की परंपरा रही होगी।

सिरसी, कर्नाटक के आसपास कुछ अन्य अद्भुत पर्यटन स्थल इस प्रकार हैं।

सिरसी मारिकम्बा मंदिर

लाल तथा श्वेत रंग में रंगा, १७ वी. शताब्दी का यह मंदिर श्री मारिकम्बा देवी को समर्पित है। इसे देवी को समर्पित शक्तिपीठ मंदिरों में से एक माना जाता है। इस मंदिर की भित्तियों पर स्थानीय कवी कला देख आप मंत्रमुग्ध हो जायेंगे।

बनवासी

बनवासी ग्रामीण पर्यटन विकास योजना के लिए प्रसिद्ध है। ऐतिहासिक दृष्टी से बनवासी कदम्ब शासकों की राजधानी थी। निर्मल ग्रामीण जीवन से समृद्ध बनवासी का मुख्य आकर्षण है ९ वी. सदी का भगवान् शिव को समर्पित मधुकेश्वर मंदिर। पाषाण द्वारा निर्मित यह मंदिर शिव की प्रतिमाओं से भरपूर है। देवी पार्वती तथा नंदी की भी कई प्रतिमाएं हैं।

बनवासी ताजे निर्मित गन्ने के गुड के लिए भी प्रसिद्ध है। यहाँ पर चखे गुड़ से अधिक ताजे गुड़ का स्वाद कदाचित आपने नहीं लिया होगा।

बनवासी सिरसी से लगभग २० की.मी. की दूरी पर स्थित है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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खाटू श्याम पराजितों के आश्रयदाता देव https://inditales.com/hindi/barbarik-khatu-shyam-mandir-rajasthan/ https://inditales.com/hindi/barbarik-khatu-shyam-mandir-rajasthan/#comments Wed, 27 Jun 2018 02:30:21 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=857

खाटू श्याम – यह मेरी इस जयपुर यात्रा की सबसे महत्वपूर्ण एवं रोचक खोज थी। खाटू श्याम मंदिर, यह नाम मैंने सुना अवश्य था पर इस पर कभी अधिक ध्यान नहीं दिया। अधिकतर लोगों की तरह मैंने भी इसे श्याम अर्थात् भगवान् कृष्ण को समर्पित मंदिर समझ लिया था। मैंने सोचा खाटू नामक किसी स्थानीय […]

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खाटू श्याम – यह मेरी इस जयपुर यात्रा की सबसे महत्वपूर्ण एवं रोचक खोज थी। खाटू श्याम मंदिर, यह नाम मैंने सुना अवश्य था पर इस पर कभी अधिक ध्यान नहीं दिया। अधिकतर लोगों की तरह मैंने भी इसे श्याम अर्थात् भगवान् कृष्ण को समर्पित मंदिर समझ लिया था। मैंने सोचा खाटू नामक किसी स्थानीय चरित्र के नाम पर इस मंदिर का नामकरण खाटू श्याम मंदिर किया गया हो। किन्तु इस मंदिर की पृष्ठभागीय किवदंती सुनने के उपरांत मेरी आँखें खुली रह गयी। भगवान् कृष्ण इस किवदंती का एक भाग अवश्य हैं, किन्तु वे खाटू श्याम नहीं हैं।

यदि आप हिन्दू धर्म के विषय में थोडा भी जानते हैं तो आप अवश्य मुझसे सहमत होंगे कि प्रत्येक छोटे बड़े तथ्य को हम किसी ना किसी देवी देवता से जोड़ ही देते हैं। हिन्दू धर्म में प्रत्येक प्राकृतिक देन, संयोग एवं प्रयोजन से सम्बंधित देवी देवताओं के अनेक नामों की जानकारी मुझे भी थी, किन्तु, खाटू श्याम, यह शब्द मैंने पहले कभी नहीं सुना था। पराजितों के आश्रयदाता देव माने जाने वाले खाटू श्याम के विषय में जानकारी मुझे यहीं आकर प्राप्त हुई। प्राप्त जानकारी के अनुसार बर्बरीक नाम से भी पुकारे जाने वाले खाटू श्याम सदैव पराजितों की सहायता करते हैं। अतः उन्हें ‘हारे का सहारा’ भी कहा जाता है।

बर्बरीक अथवा खाटू श्याम कौन है?

खाटू श्याम दर्शन
खाटू श्याम दर्शन

बर्बरीक, महाभारत काल के द्वितीय पांडवपुत्र, अतिबलशाली भीम के पौत्र थे। वे हिडिम्बा पुत्र घटोत्कच तथा नागकन्या मौरवी के पुत्र थे। आपको याद होगा की महाबली भीम ने अपने वनवास काल में भील राजकुमारी हिडिम्बा से विवाह किया था। घटोत्कच उन्ही का पुत्र था।

किवदंतियों के अनुसार बर्बरीक बाल्यकाल से ही वीर एवं महान योद्धा थे। उन्होंने भगवान् शिव की घोर तपस्या कर उनसे तीन अमोघ बाण वरदान स्वरुप प्राप्त किये थे। अग्निदेव ने प्रसन्न होकर उन्हें धनुष प्रदान किया था जो उन्हें तीनों लोकों में विजयी बनाने में समर्थ था। ऐसा मानना है कि एक बाण निस्सहाय एवं निर्बलों की रक्षा करता है, दूसरा शत्रु पक्ष को घेरता है तो तीसरा उनका विनाश करता है।

बर्बरीक ने युद्ध कला अपनी माँ से प्राप्त की थी। चूंकि बर्बरीक का पालन पोषण उनकी माता ने किया था, वे सदैव उनके द्वारा दर्शाए मार्ग पर चलते थे। बर्बरीक की माँ ने उन्हें सदैव पराजितों तथा बेसहारों की सहायता करने की प्रेरणा दी थी।

महाभारत में बर्बरीक का योगदान

हारे का सहारा, खाटू श्याम हमारा
हारे का सहारा, खाटू श्याम हमारा

कौरवों एवं पांडवों के मध्य घोषित महाभारत युद्ध का समाचार प्राप्त होते ही बर्बरीक की भी युद्ध में भाग लेने की तीव्र इच्छा जागृत हुई। माँ से आशीर्वाद प्राप्त कर उन्हें पराजितों का साथ देने का वचन दिया तथा कुरुक्षेत्र की रणभूमि की ओर चल पड़े। राह में ब्राम्हण वेष धर कर श्रीकृष्ण ने उनके बाणों के विषय में जानकारी प्राप्त करनी चाही। उत्तर में बर्बरीक ने कहा कि मात्र एक बाण सम्पूर्ण शत्रु सेना को परास्त कर उनके तक्षक में लौटने में समर्थ है। श्रीकृष्ण द्वारा ली गयी परीक्षा में खरा उतरने के पश्चात बर्बरीक ने माँ को दिया वचन भी दोहराया।

श्रीकृष्ण जानते थे कि यदि बर्बरीक ने तीनों बाणों का प्रयोग किया तो उनके अलावा सम्पूर्ण ब्रम्हांड का सर्वनाश हो जाएगा। उन्हें यह भी ज्ञात हो गया था कि पराजितों का साथ देने का अर्थ है वे प्रत्येक दिवस विपरीत सेना का चुनाव करेंगे जिससे युद्ध अनंत काल तक चलेगा। अतः बर्बरीक का इस युद्ध में सम्मिलित होना नियती के विपरीत सिद्ध होता। नियती के अनुसार युद्ध में कौरवों का विनाश तथा पांडवों की सजीव विजय निश्चित थी।

अतः ब्राम्हण रुपी श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से दान में उनके शीश की अभिलाषा की और कहा कि युद्ध प्रारम्भ होने से पूर्व युद्धभूमि पूजन हेतु तीनों लोकों में सर्वश्रेष्ठ क्षत्रिय के शीश की आहुति आवश्यक है। बर्बरीक ब्राम्हण को शीशदान देने पर विवश थे। श्रीकृष्ण के वास्तविक रूप को पहचान कर, अंतिम इच्छा स्वरुप उन्होंने अंत तक महाभारत युद्ध देखने की इच्छा व्यक्त की। बर्बरीक के बलिदान से प्रसन्न होकर कृष्ण ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ वीर की उपाधि से अलंकृत किया तथा उनके शीश को युद्धभूमि के समीप एक पहाडी की चोटी पर सुशोभित किया। यहीं से बर्बरीक के शीश ने सम्पूर्ण महाभारत के युद्ध को देखा।

युद्ध के अंत में बर्बरीक के शीश से पूछा गया कि विजय का श्रेय किसे जाता है। उनका उत्तर था, श्रीकृष्ण! श्रीकृष्ण की युद्धनीति ही निर्णायक थी। अन्य सर्व योद्धा केवल उनकी आज्ञा का पालन कर रहे थे। श्रीकृष्ण ने बर्बरीक के महान बलिदान से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया कि वे कलियुग में उनके, अर्थात् श्याम नाम से जाने जायेंगे।

खाटू श्याम की खोज

बाबा खाटू श्याम जी
बाबा खाटू श्याम जी

कहा जाता है कि स्वयं भगवान् कृष्ण ने बर्बरीक के शीश को रूपवती नदी को अर्पित किया था। कालान्तर में उनका शीश राजस्थान के सीकर जिले में स्थित खाटू गाँव की धरती में दबा पाया गया। इसीलिए उनका नाम खाटू श्याम पड़ा।

कहा जाता है कि एक गाय एक नियत स्थल पर स्वयं अपने दुग्ध की धारा बहाने लगी। उस स्थान पर खुदाई के पश्चात बर्बरीक का शीश प्रकट हुआ जिसे एक ब्राम्हण को सौंपा गया। ब्राम्हण ने इस शीश की पूजा अर्चना की तथा इसके इतिहास को जानने के लिए ध्यान एवं चिंतन किया।

खाटू गाँव के तात्कालीन राजा रूपसिंह चौहान को स्वप्न में मंदिर निर्माण तथा बर्बरीक के शीश को मंदिर में सुशोभित करने की आज्ञा प्राप्त हुई थी। तत्पश्चात राजा रूपसिंह चौहान एवं उनकी पत्नी नर्मदा कंवर ने १०२७ ई. में मंदिर का निर्माण कराया तथा कार्तिक मॉस की एकादशी को मंदिर में शीश सुशोभित किया। यह दिवस खाटू श्याम के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है।

कुछ किवदंतियों के अनुसार रानी नर्मदा कंवर ने खाटू श्याम को स्वप्न में देखा था। तत्पश्चात निर्धारित स्थल पर काले पत्थर में उनकी प्रतिमा प्राप्त हुई थी। वर्तमान में मूल मंदिर के भीतर इसी प्रतिमा की पूजा की जाती है।

मंदिर में खाटू श्याम की प्रतिमा एक क्षत्रीय योद्धा के रूप में है। उनकी बड़ी बड़ी मूंछें हैं तथा मुख पर वीर रस के भाव हैं। उनके चक्षु खुले हुए तथा चौकस प्रतीत होते हैं। उनके कानों में मछली के आकार की बालियाँ हैं। खाटू श्याम खाटू गाँव के ग्रामदेवता ही नहीं अपितु सीकर एवं आसपास के कई राजपूत चौहान कुटुम्बों के कुलदेवता भी हैं।

खाटू श्यामजी के दर्शन

खाटू गाँव का प्रवेश द्वार
खाटू गाँव का प्रवेश द्वार

मेरी जयपुर यात्रा के समय एक दिन हम खाटू श्यामजी के दर्शनार्थ प्रातःकाल निकल पड़े। अगस्त का महीना था। सूर्यमुखी के लहलहाते खेत अपने यौवन की चरम सीमा पर थे। खाटू गाँव पहुंचते ही एक मुक्त तोरण-द्वार हमारे स्वागतार्थ खडा था। उस पर ‘श्री श्याम शरणम’ खुदा हुआ था। इस द्वार के भीतर प्रवेश करने के पश्चात हमने गाड़ी द्वारा कुछ और दूरी पार की। मैं एक विशाल मंदिर के प्रकट होने का तीव्र आतुरता से प्रतीक्षा कर रही थी। किन्तु जब हमने मंदिर परिसर के पृष्ठभागीय द्वार से भीतर प्रवेश किया, हमारे समक्ष एक छोटा सा मंदिर खड़ा था।

उपयुक्त समय पहुँचने के फलस्वरूप हमें खाटू श्यामजी की मूर्ति के दर्शन प्राप्त हुए।

मंदिर परिसर के बाहर एक और मंदिर था। सिंह पोल हनुमान के रूप में हनुमानजी का यह मंदिर था।

खाटू श्याम मंदिर - सीकर राजस्थान
खाटू श्याम मंदिर – सीकर राजस्थान

इस मंदिर की एक विशेषता मेरे ध्यान में आयी, वह थे लटकते श्रीफल अर्थात् नारियल। मौली अथवा पवित्र लाल धागे से बंधे नारियल चारों ओर लटके हुए थे। यह इच्छापूर्ति के नारियल थे। भगवान् द्वारा विशेष इच्छापूर्ति की आकांशा हो तो भक्तगण यहाँ ऐसे नारियल लटकाते हैं। इच्छापूर्ति के पश्चात भक्त यहाँ आकर नारियल खोलकर निकाल देते हैं।

मंदिर के बाहर लगे सूचना फलक के अनुसार इस मंदिर में कोई भी पुजारी अथवा मंदिर प्रमुख नहीं है। चौहान राजपूत घराने के वंशज ही इस मंदिर की देखरेख करते हैं।

श्याम कुण्ड

खाटू का श्याम कुंड
खाटू का श्याम कुंड

जिस स्थल से बर्बरीक का शीश प्राप्त हुआ था, उसे श्याम कुण्ड कहा जाता है। यह दो आकर्षक कुण्डों का युग्म है। ऊपर छायाचित्र में दर्शाया गया कुण्ड पुरुषों के लिए है एवं ऐसा ही एक कुण्ड स्त्रियों के लिए भी निर्मित है। इस परिसर में गायत्री देवी का मंदिर भी है। यहाँ भी चारों ओर लटकते नारियल देखे जा सकते हैं।

यहाँ कृष्ण भगवान् की एक प्रतिमा है जिसके चरणों में रखा बर्बरीक का शीश इस स्थल की गाथा बखान करता है।

इस सुन्दर परिसर का एक खटकता कांटा है इसकी अस्वच्छता। आशा करती हूँ कि परिसर की स्वच्छता की ओर भी भक्तों का ध्यान जाए तथा परिसर स्वच्छ रखा जाए। अन्यथा असीम भक्ति ही आपको परिसर के भीतर ले जा सकती है।

खाटू श्याम की जीती जागती संस्कृति

खाटू श्याम के तीन बाण
खाटू श्याम के तीन बाण

खाटू गाँव में आप कहीं भी जाएँ, आप अपने चारों ओर किसी ना किसी रूप में खाटू श्याम अर्थात् बर्बरीक का धनुष तथा त्रिबाण पायेंगे। भक्तगण इन्हें अपनी गाड़ियों में प्रमुख रूप से लटकाते हैं। उस पर लिखा होता है, ‘हारे का सहारा, खाटू श्याम हमारा’। इसका अर्थ है, हमारा श्याम पराजितों का सहारा है।

खाटू गाँव के छोटे से बाजार में भी कई प्रकार की स्मारिकाएं उपलब्ध हैं जो मुख्यतः खाटू श्याम के धनुष तथा बाण पर आधारित होते हैं।

खाटू श्यामजी – यात्रा सुझाव

श्रीफल है या हमारी इच्छाएं!
श्रीफल है या हमारी इच्छाएं!

यूँ तो खाटू गाँव में भी ठहराने की सुविधाएं उपलब्ध हैं, तथापि आप जयपुर से प्रातः आकर दर्शनोपरांत वापिस जा सकते है।

आरती समयसूची हेतु मंदिर के वेबस्थल पर संपर्क करें।

मंदिर के भीतर छायाचित्रिकरण वर्जित है।

किसी भी साधारण दिवस में, जब मंदिर के भीतर श्रद्धालुओं की संख्या कम रहती है, मंदिर दर्शन हेतु १ से २ घंटों का समय पर्याप्त होता है। इसमें आप खाटू गाँव भी भ्रमण कर सकते हैं।

राजस्थान यात्रा में क्या क्या देखे, यह जानने हेतु इन संस्मरणों को पढ़े:

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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वाराणसी का जंगमवाड़ी मठ १० लाख से अधिक शिवलिंगों का संग्रह https://inditales.com/hindi/jangamwadi-mutt-shivalingas-varanasi/ https://inditales.com/hindi/jangamwadi-mutt-shivalingas-varanasi/#comments Wed, 18 Apr 2018 02:30:00 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=691

वाराणसी अथवा काशी एक ऐसा नगर है जहां भारत के प्रत्येक हिन्दू समुदाय हेतु निर्धारित स्थान है एवं वहाँ उनके मंदिर एवं मठ स्थापित हैं। इन समुदायों के सदस्य इन मंदिरों एवं मठों के दर्शन व पूजा अर्चना करने हेतु यहाँ पधारते हैं। कुछ आराधक यहाँ कुछ दिन ठहर कर अपने आराध्य के सानिध्य का […]

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जंगमवाडी मठ - काशी
जंगमवाडी मठ शिवलिंग – काशी

वाराणसी अथवा काशी एक ऐसा नगर है जहां भारत के प्रत्येक हिन्दू समुदाय हेतु निर्धारित स्थान है एवं वहाँ उनके मंदिर एवं मठ स्थापित हैं। इन समुदायों के सदस्य इन मंदिरों एवं मठों के दर्शन व पूजा अर्चना करने हेतु यहाँ पधारते हैं। कुछ आराधक यहाँ कुछ दिन ठहर कर अपने आराध्य के सानिध्य का आनंद उठाते हैं। मेरी पिछली वाराणसी यात्रा में मुझे ऐसे ही एक स्थल, जंगमवाड़ी मठ, के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। जंगम अर्थात शिव को जानने वाला तथा वाड़ी का अर्थ है रहने का स्थान। यह एक अतिविशिष्ट मठ है जिसके अनुयायी अधिकतर महाराष्ट्र एवं कर्नाटक से आते हैं। वीर शैव सिद्धांत का पालन करने वाले ये आराधक केवल शिवलिंग की ही आराधना करते हैं। शिवलिंग के प्रति इनकी आस्था एवं निष्ठा अपरंपार है। इसका अनुभव करने के लिए इस मठ का दर्शन करना आवश्यक है।

जंगमवाड़ी का इतिहास

जंगमवाड़ी मठ के रंग भरे द्वार
जंगमवाड़ी मठ के रंग भरे द्वार

जंगमवाड़ी मठ वाराणसी के प्राचीनतम मठों में से एक है। साहित्यों के अनुसार, हिन्दू कालसीमा के चार युगों में से पहले युग, सतयुग से इसका सम्बन्ध है। वहीं लिखित ऐतिहासिक आलेखों के अनुसार यह मठ ८ वीं. शताब्दी में निर्मित है। हालांकि इसके निर्माण की सटीक तिथि प्रमाणित करना कठिन है। कहा जाता है कि राजा जयचन्द ने इस मठ के निर्माण हेतु भूमि दान में दी थी। तत्पश्चात यह मठ ८६ जगत्गुरुओं की अटूट वंशावली का साक्षी है। इस मठ के वर्तमान गुरु, पीठाधिपति जगत्गुरू श्री चन्द्रशेखर शिवाचार्य महास्वामीजी हैं। इस मठ से सम्बंधित एक सुखद तथ्य यह भी है कि इस मठ में कई गुरुमाएँ भी थीं, जिन में धर्मगुरु शर्नम्मा प्रमुख थीं।

जंगमवाड़ी के दर्शन

जंगमवाड़ी मठ का मुख्य द्वार
जंगमवाड़ी मठ का मुख्य द्वार

मठ के प्रवेशद्वार पर पहुँच कर मैं कुछ क्षण इसके नाम पट्टिका को निहारती रही। इस पर बड़े बड़े अक्षरों में श्री १००८ जगद्गुरू विश्वासध्य ज्ञानसिंहासन जंगमवाड़ी मठ लिखा था। जंगमवाड़ी मठ हिंदी, कन्नड़ एवं अंग्रेजी तीन भाषाओं में लिखा हुआ था। यह मठ ज्ञान सिंहासन अथवा ज्ञानपीठ रूप में भी जाना जाता है। इसका अर्थ भी वही है, शिव को जानने वालों का आश्रम अथवा निवास।

जंगमवाड़ी मठ के वीर शैव

शिवलिंग - जंगमवाड़ी मठ - वाराणसी
शिवलिंग – जंगमवाड़ी मठ – वाराणसी

मैंने मठ के कार्यालय में वीर शैव समुदाय की एक कुलीन स्त्री से भेंट की जो मठ के विभिन्न क्रियाकलापों का निरिक्षण कर रही थी। मैंने उनसे वीर शैव उपासकों के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने हेतु प्रश्न किये। उन्होंने मुझे अवगत कराया कि इस समुदाय के सदस्य केवल शिवलिंग की आराधना करते हैं तथा अन्य किसी देव-दवियों अथवा पंथ की उपासना नहीं करते। वे जाति भेद में भी विश्वास नहीं करते।

स्फटिक एवं पत्थर के शिवलिंग
स्फटिक एवं पत्थर के शिवलिंग

उन्होंने मुझे यह भी बताया कि इस समुदाय की कोई भी स्त्री जब गर्भ धारण करती है तब वह एक लघु शिवलिंग अपने उदर पर बांधती है। उनकी मान्यता है कि यह श्याम वर्ण शिवलिंग गर्भ में पल रहे शिशु की रक्षा करता है। प्रसव उपरांत वही शिवलिंग नवजात शिशु के गले में लटकाया जाता है। शिशु के सर्व अहम् संस्कारों में उस लिंग का अत्यधिक महत्त्व होता है। उन्होंने मुझे काले पत्थर एवं स्फटिक के लघु शिवलिंग दिखाए जिन्हें इस समुदाय के सदस्य सदैव अपने समीप रखते हैं।

सिद्धांत शिखामणि

जंगमवाड़ी मठ के युवा स्वामी
जंगमवाड़ी मठ के युवा स्वामी

सिद्धांत शिखामणि उस तत्वज्ञान का नाम है जिसका वीर शैव समुदाय के सदस्य पालन करते हैं। भक्ति द्वारा मुक्ति, इसी ज्ञानसार की वे अनुशंसा करते हैं। यद्यपि भक्ति का प्रकार भक्त की अवस्था पर निर्भर करता है। इस सन्दर्भ में अधिक जानकारी प्राप्त करने हेतु ‘सिद्धांत शिखामणि’ पृष्ठ पढ़ें।

एक युवा स्वामीजी ने मुझे मठ का भ्रमण करवाया। उन्होंने मुझे मठ के प्रत्येक संभव कोनों में स्थापित शिवलिंगों के दर्शन कराये। अत्यंत मधुरता से उन्होंने मुझे अपने चित्र खींचने की भी अनुमति दी। मठ का भ्रमण एवं चित्रीकरण के उपरांत उन्होंने मुझे भोजन ग्रहण करने हेतु आमंत्रित किया। ज्ञात नहीं किन विचारों के आधीन होकर मैंने उनका आमंत्रण, नम्रता से ही सही, अस्वीकार कर दिया था। आज जब उन क्षणों का स्मरण होता है, तो विचारमग्न हो जाती हूँ कि मैंने मठ के भोजन का आस्वाद लेने का सुअवसर क्यों खो दिया था।

जंगमवाड़ी मठ के रंगीन द्वार
जंगमवाड़ी मठ के रंगीन द्वार

आज भी जब मैं इस मठ का स्मरण करती हूँ, मेरे मानसपटल पर मठ के रंगबिरंगी छटा से सज्ज प्रवेशद्वार छा जाते हैं। इनके हरे रंग की प्रभुत्वता को कहीं कहीं नीले रंग की छटा तोड़ती दिखाई पड़ती है। प्रत्येक प्रवेशद्वार के ऊपर एक शिवलिंग अवश्य दृष्टिगोचर होता है।

मठ में उपस्थित सर्व श्रद्धालु कन्नड़ अथवा मराठी भाषा में संवाद साध रहे थे। उनके हावभाव से यह स्पष्ट प्रतीत हो रहा था कि वे मठ के भीतर अत्यंत आश्वस्त एवं आनंदित अनुभव कर रहे थे। मठ के भीतर स्थित मंदिर के गर्भगृह में ऊंचे ऊंचे स्तंभों के मध्य एक शिवलिंग स्थापित है। मेरे अनुमान से मठ के प्रारम्भिक अवस्था में यही एक शिवलिंग यहाँ उपस्थित था। कालान्तर में अन्य शिवलिंगों को यहाँ स्थापित किया गया।

जंगमवाड़ी मठ के भीतर कई साधु एवं विद्यार्थी, वैदिक संस्कारों के अध्ययन हेतु निवास करते हैं।

यहाँ आयोजित किये जाने वाले भव्य उत्सवों में शिवरात्रि एवं दीपावली प्रमुख हैं।

जंगमवाड़ी मठ के शिवलिंग

जंगमवाड़ी मठ के छोटे बड़े शिवलिंग
जंगमवाड़ी मठ के छोटे बड़े शिवलिंग

जंगमवाड़ी मठ का सम्पूर्ण परिसर शिवलिंगों से अटा हुआ है। इनमें लघु शिवलिंगों की उपस्थिति प्राधान्यता से है। जैसे ही आप मठ के मुख भाग में पहुंचेंगे, आपकी दृष्टी शिवलिंगों की पंक्तियों को देखकर चौंधिया जायेंगी। चारों ओर सुव्यवस्थित ढंग से रखे शिवलिंगों की एक के बाद एक पंक्तियाँ हैं। यह पंक्तियाँ लम्बाई में भी एक के ऊपर एक आलों पर सजाई गयी हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो चारों ओर शिवलिंगों का अम्बार लगा हो। यहाँ कई कक्ष हैं जो शिवलिंगों से भरे हुए हैं।

मंदिर के भीतर भी प्रत्येक बड़ा शिवलिंग हजारों लघु शिवलिंगों से घिरा हुआ है।

जंगमवाड़ी मठ - लघु शिवलिंग
जंगमवाड़ी मठ – लघु शिवलिंग

आप अवश्य असमंजस में होंगे कि इतनी बड़ी संख्या में शिवलिंगों के संग्रह के पीछे क्या रहस्य है! इसके पीछे की कहानी यह है की कि इस मठ के अनुयायियों की आकस्मिक अथवा अकाल मृत्यु की स्थिति में उनकी आत्मा की शांति हेतु शिवलिंग दान किये जाते हैं। अर्थात् दिवंगत आत्मा की शान्ति हेतु पिंडदान के स्थान पर विधि-विधान से शिवलिंग दान किया जाता है। सैकड़ों वर्षों से चली आ रही इस विचित्र परंपरा के चलते एक ही छत के नीचे दस लाख से भी अधिक शिवलिंग स्थापित हो चुके हैं। इनमें से अधिकतर शिवलिंगों का दान श्रावण मास में किया जाता है जब वीर शैव अथवा लिंगायत भक्त दूर सुदूर शिवमंदिरों में पूजा अर्पित करने के लिए तीर्थयात्रा करते हैं।

मठ के भीतर अंततः कितने शिवलिंग?

शिवलिंग से भरे कमरे - जंगमवाड़ी मठ - काशी
शिवलिंग से भरे कमरे – जंगमवाड़ी मठ – काशी

प्रामाणिक रूप से यह आंका नहीं गया है कि ५०,००० वर्गमीटर में फैले इस मठ में अंततः कितने शिवलिंग हैं। यहाँ एक दो नहीं बल्कि कई लाख शिवलिंग विराजते हैं। जो शिवलिंग नष्ट होने लगते हैं उन्हें मठ में ही सुरक्षित स्थान पर रख दिया जाता है।

जंगमवाड़ी मठ लोकप्रिय दशाश्वमेध घाट के समीप स्थित है जहां प्रत्येक संध्या प्रसिद्ध पारंपरिक गंगा आरती की जाती है। इस मठ तक पहुँचना कठिन नहीं है। कोई भी रिक्शा चालक आपको मठ तक आसानी से पहुंचा देगा।

यह एक अत्यंत अनोखा मठ है। अतः अपनी आगामी वाराणसी यात्रा के समय इस मठ के दर्शन अवश्य करें।

वाराणसी पर मेरे अन्य यात्रा संस्मरण:-
वाराणसी में क्या खरीदें- उपहार या स्मृतिचिन्ह
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अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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ऐतिहासिक पावागढ़ पहाड़ी – गुजरात की यूनेस्को विश्व धरोहर https://inditales.com/hindi/pavagadh-hill-temples-gujarat/ https://inditales.com/hindi/pavagadh-hill-temples-gujarat/#comments Wed, 07 Feb 2018 02:30:47 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=629

चंपानेर एवं पावागढ़ पहाड़ी, ये दो शब्द मैंने सदैव एक साथ सुने थे। भारत में यूनेस्को द्वारा घोषित बहुत कम विश्व धरोहर स्थल बचे थे जिनके दर्शन मैंने अब तक नहीं किये थे। पावागढ़ उनमें से एक था। मुख्यतः इसी कारणवश मैंने गुजरात यात्रा की योजना बनायी और पावागढ़ एवं हाल ही में विश्व विरासती […]

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पावागढ़ पहाड़ी चढ़ने का पैदल मार्ग
पावागढ़ पहाड़ी चढ़ने का पैदल मार्ग

चंपानेर एवं पावागढ़ पहाड़ी, ये दो शब्द मैंने सदैव एक साथ सुने थे। भारत में यूनेस्को द्वारा घोषित बहुत कम विश्व धरोहर स्थल बचे थे जिनके दर्शन मैंने अब तक नहीं किये थे। पावागढ़ उनमें से एक था। मुख्यतः इसी कारणवश मैंने गुजरात यात्रा की योजना बनायी और पावागढ़ एवं हाल ही में विश्व विरासती स्थलों की सूची में समाविष्ट रानी की वाव के दर्शन करने का निश्चय किया। वड़ोदरा से ४५कि.मी. दूर स्थित पावागढ़ पहाड़ी पर पहुँचने के पश्चात मैंने जाना कि इस पहाड़ी की तलहटी में स्थित गाँव ही चंपानेर है। इस पहाड़ी के चारों ओर जगह जगह स्मारक बने हुए हैं। उसी तरह इसकी चोटी एवं तलहटी पर भी अनेक स्मारक बने हुए हैं। इस स्थान से सम्बंधित कई भ्रांतियां, किवदंतियां एवं कहानियां पढ़ने एवं सुनने में आती हैं। जितने स्त्रोत उतनी कहानियां!

पावागढ़ पहाड़ी

पावागढ़ पहाड़ी पे बिखरे समारक
पावागढ़ पहाड़ी पे बिखरे समारक

पावागढ़ पहाड़ी के निकट पहुँचने के पश्चात लगभग सभी लोगों ने हमें सलाह दी कि हम तलहटी स्थित गाँव के दर्शन से पूर्व, पावागढ़ पहाड़ी चढ़ें। हमने उनकी सलाह मानना उचित समझा। परन्तु पहाड़ी की तलहटी पर पहुँचने के पश्चात एक छोटा सा विघ्न उत्पन्न हो गया। नवरात्री उत्सव के चलते, मोटर गाड़ियों को आगे जाने की मनाही थी। इस कारण कई यात्री पैदल ही पहाड़ी चढ़ कर ऊपर स्थित मंदिर पहुँच रहे थे।

हालांकि वहां गुजरात राज्य परिवहन की कई बसें उपलब्ध थीं जो पहाड़ी पर माछी नामक स्थान तक यात्रियों को ले जा रही थी। माछी से पहाड़ी के ऊपर पहुँचने हेतु ‘रोप वे’ अर्थात् रस्सी पर उड़न खटोले की सुविधा भी उपलब्ध थी। रोप वे से उतरने के पश्चात, लगभग २५० सीढ़ियाँ और चढ़नी पड़ती हैं। तब जाकर मंदिर के मुख्य द्वार तक पहुँचते हैं।

पावागढ़ का उड़न खटोला

पावागढ़ पहाड़ी के ताल
पावागढ़ पहाड़ी के ताल

माछी पहुंचने के पश्चात, पहाड़ी की चोटी तक पहुँचने हेतु दो विकल्प हमारे समक्ष प्रस्तुत थे। एक विकल्प था रोप वे, अर्थात् उड़न खटोला जो ६ मिनट में ऊंची चढ़ाई पार कर लगभग चोटी तक पहुंचाती थी। दूसरा विकल्प था पहाड़ी चढ़ने का पुराना मार्ग जो पहाड़ी के चक्कर काटते हुए, कई मानव निर्मित स्मारकों के बीच से होते हुए, चोटी तक पहुंचाता था। मानव सभ्यता के विभिन्न युगों को दर्शाते इन स्मारकों के बीच से जाते हुए चोटी तक पहुँचने में १ से २ घंटों का समय लग सकता है। यह आपके चलने की क्षमता पर निर्भर है। जैसे जैसे आप पहाड़ी पर चढ़ेंगे, कई तालाबों एवं झीलों से भरी यह हरी भरी पहाड़ी आपके समक्ष अपनी सुन्दरता शनैः शनैः उजागर करती है।

हमने उड़न खटोले से ऊपर जाने का निर्णय किया।

पावागढ़ पहाड़ी की चढ़ाई

उड़न खटोले से उतर कर, २५० सीढ़ियाँ चढ़ कर पावागढ़ पहाड़ी की चोटी पर स्थित कालिका माता के मंदिर पहुंचा जाता है। जैसे जैसे सीढ़ियाँ चढ़ते हम मंदिर के समीप पहुँच रहे थे, पहाड़ी धीरे धीरे और संकरी होती जा रही थी। प्राचीन उत्कीर्णित शिलाखंडों से सीढ़ियों को अलंकृत किया गया था। कुछ शिलाखंडों पर लगे सिंदूर के चिन्ह इस तथ्य का द्योतक थे कि किसी काल में इन्हें पूजा जाता था। परन्तु सीढ़ियाँ अनियमितता से जड़ी होने के कारण चढ़ाई बहुत भयावह थी। पाँव जरा फिसला कि नीचे भगदड़ मचने की पूर्ण संभावना थी। परन्तु थोड़ी थोड़ी देर में जब हम रुक कर पीछे देखते तो वहां का दृश्य सारा भय भुला देता था। ऊपर से नीचे का दृश्य बहुत मनभावन दिखाई पढ़ रहा था। सीढ़ियों के प्रत्येक मोड़ पर नीचे का परिदृश्य बदल रहा था।

पावागढ़ पहाड़ी पर कालिका माता मंदिर

पावागढ़ पहाड़ी पे कालिका माता का मंदिर
पावागढ़ पहाड़ी पे कालिका माता का मंदिर

पावागढ़ पहाड़ी की चोटी पर स्थित कालिका माता मंदिर १००० वर्षों से भी अधिक प्राचीन है। इसे देश में स्थित ५१ शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। पुराणों के अनुसार पिता दक्ष के यज्ञ में अपमानित हुई देवी सती ने जब अपने प्राण त्याग दिए थे, तब भगवान् शिव ने उनके मृत देह को उठाकर तांडव नृत्य किया था। तब भगवान् विष्णु ने अपने चक्र से देवी के शारीर के टुकड़े किये थे। जहां जहां देवी सती के अंग गिरे, वहां वहां शक्तिपीठ बन गए। ऐसा माना जाता है कि पावागढ़ में देवी माँ का अंगूठा गिरा था।

पावागढ़ के छोटे से मंदिर में ३ देवियों की प्रतिमाएं थीं जिनके दर्शन हेतु भिन्न भिन्न पंथ के भक्तों का तांता लगा हुआ था। कुछ स्त्रियाँ हाथों में तलवार उठाये, शरीर में देवी के अवतरण का प्रदर्शन करती आ रही थीं। लोग अनायास ही उन्हें रास्ता दे रहे थे। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ मानो लम्बी कतार से बचने हेतु कुछ स्त्रियाँ देवी के अवतरण का स्वांग रच रही थीं। मैंने उनमें से एक स्त्री का हाथ पकड़ कर उनकी इस अवस्था के विषय में पूछा। इस पर वह अपनी बगलें झांकती आगे बढ़ गयी।

हालांकि मंदिर छोटा सा था, लोगों की श्रद्धा से इसकी महानता का अनुमान लगाया जा सकता था। मंदिर में बलिवेदी भी थी परन्तु वर्तमान में बलि प्रथा के विद्यमान होने के कोई संकेत मुझे दृष्टिगोचर नहीं हुए।

पावागढ़ के प्राचीन जैन मंदिर

पावागढ़ के प्राचीन मंदिर और ताल
पावागढ़ के प्राचीन मंदिर और ताल

कालिका माता मंदिर के चरणों में कई जैन मंदिर भी स्थापित हैं। ऊपरी स्तर पर देखने से ये ४०० से ५०० वर्ष प्राचीन प्रतीत होते हैं। इन्ही में से एक मंदिर के पंडित से हमने चर्चा की। उन्होंने हमें इस स्थान से सम्बंधित कुछ कथाएं सुनाई। परन्तु हम उन पर सहसा विश्वास नहीं कर पाए। अतः हमने स्वयं ही कुछ खोजबीन करने का निश्चय किया।

जैन भक्तों का मानना है कि पावागढ़ पहाड़ी किसी काल में जैन मंदिरों से परिपूर्ण था। परन्तु कालान्तर में मुसलमान शासकों ने इस स्थान पर कब्ज़ा कर चंपानेर में अपनी राजधानी बनायी। उन्होंने यहाँ कई मस्जिद भी बनवाये। कुछ अन्य आलेखों के अनुसार भील एवं राठवा जैसी जनजातियाँ यहाँ निवास करती थीं। ये जनजातियाँ शक्ति की उपासक थीं। माता का मंदिर भी इन्ही का था। ये सब प्राचीन कालीन तथ्य हैं एवं इनकी प्रामाणिकता का कोई सबूत हमें नहीं मिला। तथापि यह महत्वपूर्ण नहीं है। तत्व यह है कि यह एक प्राचीन प्रार्थना स्थल है एवं करोड़ों भक्त इसे एक जाग्रत प्रार्थना स्थल मानते हैं।

पावागढ़ पहाड़ी के तालाब

पावागढ़ पहाड़ी पे भक्तगण
पावागढ़ पहाड़ी पे भक्तगण

पावागढ़ पहाड़ी के दोनों तरफ स्थित तालाब, पहाड़ी की चोटी से अत्यंत मनमोहक प्रतीत होते हैं। परन्तु उनके समीप पहुँचने पर एक तथ्य मन को कचोटता है। वह यह कि हम अपने मंदिरों के कुंडों एवं तालाबों को स्वच्छ रखने हेतु अधिक कुछ नहीं कर रहे हैं। इन दो तालाबों की स्वच्छता में भी वृद्धि आवश्यक थी। यह हमारा एवं प्रशासन, दोनों का ही दायित्व है।

मंदिर की ओर जाते पथ के दोनों ओर कई दुकानें थीं जहां विक्रेता देवी को अर्पण हेतु पूजा सामग्री विक्री कर रहे थे। यहाँ कई दुकानों में यात्रियों एवं पर्यटकों द्वारा साथ ले जाने हेतु स्मारिकायें भी बिक रही थीं। चित्र खींचने हेतु सुविधाएं भी थीं जहां पहाड़ी के चित्र की पृष्ठभूमि में आप चित्र खिंचवा सकते हैं।

इस पावागढ़ पहाड़ी की सुन्दरता एवं आध्यात्मिकता का अनुभव लेने का सर्वोत्तम तरीका है इस पहाड़ी पर, तल से शीर्ष तक, पैदल चढ़ाई करना। तथापि इस हेतु प्रचुर धैर्य एवं सहनशीलता की आवश्यकता है। तथापि हम बस द्वारा पहाड़ी की तलहटी तक एवं उड़नखटोले द्वारा मंदिर के समीप पहुंचे थे। तत्पश्चात शेष यात्रा पैदल पूर्ण की थी। इन सुविधाओं के उपयोग के पश्चात भी हमारी यात्रा में अर्धांश दिवस व्यतीत हो गया।

गुजरात के अन्य पर्यटन स्थलों की यात्रा हेतु मेरे संस्मरण पढ़ें:-

1. मोढेरा सूर्य मंदिर – अद्वितीय वास्तुशिल्प

2. रानी की वाव – एक रानी की विरासत

3. अहमदाबाद के ६ देखने लायक संग्रहालय

4. दाभोई के उत्कीर्णित द्वार

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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जागेश्वर धाम – कुमाऊं घाटी में बसे शिवालय https://inditales.com/hindi/shiva-temple-jageshwar-dham-uttarakhand/ https://inditales.com/hindi/shiva-temple-jageshwar-dham-uttarakhand/#respond Wed, 19 Jul 2017 02:30:01 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=343

उत्तरांचल के जंगलों से भरपूर पहाड़ी पर जागेश्वर अथवा नागेश के रूप में शिवालय है जागेश्वर धाम। मैंने इससे पूर्व उत्तरांचल के कुमाऊं क्षेत्र में पत्थरों से निर्मित मंदिरों की तस्वीरें देखीं थीं। उनके प्रत्यक्ष दर्शन करने की तीव्र अभिलाषा हमेशा से थी। परन्तु इसके दर्शन के पूर्व मुझे यह कल्पना नहीं थी कि यह […]

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जागेश्वर मंदिर परिसर
जागेश्वर मंदिर परिसर

उत्तरांचल के जंगलों से भरपूर पहाड़ी पर जागेश्वर अथवा नागेश के रूप में शिवालय है जागेश्वर धाम। मैंने इससे पूर्व उत्तरांचल के कुमाऊं क्षेत्र में पत्थरों से निर्मित मंदिरों की तस्वीरें देखीं थीं। उनके प्रत्यक्ष दर्शन करने की तीव्र अभिलाषा हमेशा से थी। परन्तु इसके दर्शन के पूर्व मुझे यह कल्पना नहीं थी कि यह सम्पूर्ण मंदिरों की नगरी है और इस तरह शिव मंदिरों को समर्पित है। ऊंचे चीड़ के वृक्षों के बीच से जाते हुए हम अल्मोड़ा से ३५ की.मी. दूर जागेश्वर पहुंचे। हम जैसे जैसे जागेश्वर नगर के समीप पहुँच रहे थे, देवदार के वृक्ष चीड़ के वृक्षों का स्थान ले रहे थे और घाटी का रंग गहरा हरा हो रहा था।

जागेश्वर से कुछ किलोमीटर पूर्व हमें यहाँ के पत्थरों के मंदिरों की झलक प्राप्त होने लगी थी। पहाड़ व रास्ते के बीच बहती एक छोटी नदी के उस पार, पहाड़ों की तरफ, मंदिरों का एक छोटा समूह खड़ा था। करीब एक किलोमीटर की दूरी और तय करते ही हम एक घाटी में पहुंचे जहां ऊंचे और गहरे हरे रंग के देवदार वृक्षों के घने जंगल थे और हमने स्वयं को ऊँचे घने पेड़ों से घिरे पाया। रास्ते के एक तरफ कुमाऊं मंडल विकास निगम का यात्री निवास था व दूसरी तरफ जागेश्वर मंदिर समूह। और मध्य में एक खूबसूरत चौखट युक्त द्वार की छोटी इमारत थी। यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग का स्थानीय संग्रहालय था। एक खजाना जिसकी खोज मैं जल्द ही करने वाली थी।

जागेश्वर मंदिर समूह, नदी किनारे ऊंचे मोटे देवदार वृक्षों के बीच एक छोटे घोंसले की तरह लग रहा था।

जागेश्वर मंदिर परिसर की ओर मुख रखे कुछ घर पहाड़ी पर बिखरे हुए थे। हर घर के द्वार व खिड़कियों की चौखट पर बारीक नक्काशियां कीं हुईं थीं। मंदिर के सम्मुख स्थित गली में एक छोटा बाज़ार था। इनके अलावा वहां और कुछ नहीं था। एक संकरी घाटी में ही आपको सम्पूर्ण नगर के दर्शन हो जाते हैं- कुछ १३० मंदिर, एक गाँव, उसका बाज़ार , एक नदी और एक सुन्दर सा जंगल। सब एक चित्र की चौखट में समाये से नजर आते हैं। इन्हें देख हम सोच में पड़ जाते हैं कि यहाँ रहने का अनुभव कैसा होगा! उन यात्रियों की तरह जो घर से दूर कुछ समय यहाँ मंदिरों के बीच आ कर रहतें हैं या उन रखवालों की तरह जो इन प्राचीन मंदिरों की देखभाल करतें है क्योंकि यहाँ जीवन इन मंदिरों के आसपास ही केन्द्रित है। मन ही मन उस नज़ारे की कल्पना करने लगी जो बर्फ की एक परत में ढंकने के पश्चात यहाँ दिखाई पड़ती होगी। मेरा मन उच्छंद कल्पनाओ की दुनिया में खोने लगा था।

खैर! वास्तविकता में लौटते हुए, आईये में आपको उत्तर भारत की प्राचीनतम जीवित मंदिरों के प्रत्यक्ष दर्शन कराती हूँ।

जागेश्वर धाम

मुख्य मंदिर परिसर एक ऊंची, पत्थर की दीवार से चारों ओर से घिरा हुआ है। यह जागेश्वर धाम कहलाता है। इसकी सीमा के भीतर १२४ छोटे बड़े मंदिर स्थित हैं। दूर से ही मंदिरों के शिखर दिखाई पड़ रहे थे। वे मुझे अपनी ओर कुछ इस तरह आकर्षित कर रहे थे, कि जितना समय मैंने जागेश्वर में बिताया, मेरी नज़रें इन मंदिरों से नहीं हट रहीं थी।

जागेश्वर के शिव मंदिर

जागेश्वर मंदिरों के शिखर
जागेश्वर मंदिरों के शिखर

जैसा कि मैंने पहले बताया, जागेश्वर धाम मंदिर परिसर में १२४ मंदिर हैं जो भगवान् शिव को उनके लिंग रूप में समर्पित हैं। हालांकि प्रत्येक मन्दिर के भिन्न भिन्न नाम हैं। कुछ शिव के विभिन्न रूपों पर आधारित और कुछ समर्पित हैं नवग्रह जैसे ब्रह्मांडीय पिंडों पर। एक मंदिर शक्ति को समर्पित है जिसके भीतर देवी की सुन्दर मूर्ति है। एक मंदिर दक्षिणमुखी हनुमान तो एक मंदिर नवदुर्गा को भी समर्पित है।

अधिकतर मंदिरों के भीतर शिवलिंग स्थापित हैं। मंदिरों के नामों पर आधारित शिलाखंड पट्टिकाएं मंदिरों के प्रवेशद्वारों पर लगाए गए है। जैसे कुबेर मंदिर के ऊपर कुबेर पट्टिका, लाकुलिश मंदिर के ऊपर लाकुलिश पट्टिका। इसी तरह तान्डेश्वर मन्दिर के प्रवेशद्वार के ऊपर लगी पट्टिका पर नृत्य करते शिव का शिल्प है।

जागेश्वर मंदिर परिसर के अधिकाँश मंदिर उत्तर भारतीय नागर शैली में निर्मित हैं जिस में मंदिर संरचना में उसके ऊंचे शिखर को प्रधानता दी जाती है। इसके अलावा बड़े मंदिरों में शिखर के ऊपर लकड़ी की छत भी अलग से लगाई जाती है। यह यहाँ की विशेषता दिखाई पड़ती है। स्थानीय भाषा में इसे बिजौरा कहा जाता है। यह मंदिरों पर नेपाली अथवा तिब्बती प्रभाव प्रतीत होता है। कुछ मंदिर दक्षिण भारतीय शैली में भी बनें हैं। हम सोचने पर मजबूर हो जातें हैं कि परिवहन साधन की क्रांति से पूर्व देश के एक छोर से दूसरे छोर तक कला का मिश्रण किस तरह संभव हुआ होगा!

कहा जाता है कि जागेश्वर मंदिर कैलाश मानसरोवर यात्रा के प्राचीन मार्ग पर पड़ता है। जागेश्वर का जिक्र चीनी यात्री हुआन त्सांग ने भी अपनी यात्रा संस्मरण में किया है।

अधिकाँश मंदिरों का निर्माण कत्युरी राजवंश के शासकों ने करवाया था, जिन्होंने यहाँ ७ वीं.ई. से १४ वीं.ई. तक राज किया। तत्पश्चात इन मदिरों की देखभाल की चन्द्रवंशी शासकों ने जिन्होंने १५वी. से १८वी. शताब्दी तक यहाँ शासन किया। मंदिर के शिलालेखों में मल्ला राजाओं का भी उल्लेख है।

जागेश्वर धाम के उत्सव

जागेश्वर के शिव मंदिर - शिलालेख
जागेश्वर के शिव मंदिर – शिलालेख

जागेश्वर मंदिर में भगवान् शिव से सम्बंधित दो मुख्य उत्सव मनाये जातें हैं। निःसंदेह एक है शिवरात्रि और दूसरा है श्रावण मास जो जुलाई से अगस्त के बीच पड़ता है।

मुझे बताया गया कि इन दोनों उत्सवों में यहाँ भक्तगणों की भीड़ उमड़ती है।

जगेश्वरी मंदिर के इतिहास व दंतकथाएं

मंदिर की एक पुस्तिका में मैंने पढ़ा कि स्कन्द पुराण के मानस खण्ड में जागेश्वर ज्योतिर्लिंग की व्याख्या की गयी है। इस पुस्तिका के अनुसार ८वां. ज्योतिर्लिंग, नागेश, दरुक वन में स्थित है। यह नाम देवदार वृक्ष पर आधारित है जो इस मंदिर के चारों ओर फैले हुए हैं। इस मंदिर के आसपास से एक छोटी नदी बहती है – जटा गंगा अर्थात् शिव की जटाओं से निकलती गंगा।

जागेश्वर के अन्य पर्यायी नाम हैं जोगेश्वर, हटकेश्वर और नागेश्वर।

दंतकथाएं कहतीं हैं अपने श्वसुर दक्ष प्रजापति का वध करने के पश्चात, भगवान् शिव ने अपने शरीर पर पत्नी सती के भस्म से अलंकरण किया व यहाँ ध्यान हेतु समाधिस्थ हुए। कहानियों के अनुसार यहाँ निवास करने वाले ऋषियों की पत्नियां शिव के रूप पर मोहित हो गयीं थीं। इससे ऋषिगण बेहद क्रोधित हो गए थे और भगवान् शिव को लिंग विच्छेद का श्राप दिया था। इस कारण धरती पर अन्धकार छा गया था। इस समस्या के समाधान हेतु ऋषियों ने शिव सदृश लिंग की स्थापना की व उसकी आराधना की। उस समय से लिंग पूजन की परंपरा आरम्भ हुई। यह भी कहा जाता है कि भूल ना होते हुए भी श्राप देने के जुर्म में शिव ने उन सात ऋषियों को आकाश में स्थानांतरित होने का दण्ड दिया।

एक दंतकथा के अनुसार, भगवान् राम के पुत्र लव और कुश ने यहाँ यज्ञ आयोजित किया था जिसके लिए उन्होंने देवताओं को आमंत्रित किया था। कहा जाता है कि उन्होंने ही सर्वप्रथम इन मंदिरों की स्थापना की थी।

जागेश्वर धाम के मुख्य मंदिर

जागेश्वर मंदिर – ८वां. ज्योतिर्लिंग अथवा नागेश ज्योतिर्लिंग

नंदी एवं स्कंदी - नागेश ज्योतिर्लिंग के द्वारपाल
नंदी एवं स्कंदी – नागेश ज्योतिर्लिंग के द्वारपाल

भारत में भगवान् शिव के पवित्र १२ ज्योतिर्लिंग हैं। आदि शंकराचार्य द्वारा रचित यह संस्कृत श्लोक गद्य में उन १२ ज्योतिर्लिंगों की व्याख्या करता है-

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम् । उज्जयिन्यां महाकालमोकांरममलेश्वरम् ।
परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशंकरम् । सेतुबंधे तु रामेशं नागेशं दारूकावने ।
वाराणस्यां तु विश्वेशं त्रयंम्बकं गौतमीतटे । हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये ।
ऐतानि ज्योतिर्लिंगानि सायं प्रातः पठेन्नरः ।सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति ।

हिन्दू धर्म को मानने वाले अपने जीवनकाल में इन ज्योतिर्लिंगों के दर्शन की अभिलाषा रखतें हैं। भौगोलिक दृष्टीकोण से देखा जाय तो इन १२ ज्योतिर्लिंगों के दर्शन आपको भारत के चारों कोनों के भ्रमण करा देते हैं। यह १२ ज्योतिर्लिंग देश के विभिन्न क्षेत्रों व विभिन्न परिदृश्यों में स्थित हैं।

ज्योतिर्लिंग

गणेश एवं पार्वती की मूर्तियाँ
गणेश एवं पार्वती की मूर्तियाँ

जागेश्वर स्थित ज्योतिर्लिंग नागेश अर्थात् नागों के राजा के रूप में हैं। निश्चित रूप से शिवलिंग यहाँ नाग से अलंकृत है।

जागेश्वर मंदिर इस परिसर के एक छोर पर पश्चिम मुखी रूप में स्थित है। प्रवेशद्वार के दोनों तरफ द्वारपाल की आदमकद मूर्ति स्थापित है। इन्हें नंदी व स्कंदी कहा जाता है। मंदिर के भीतर, एक मंडप से होते हुए आप गर्भगृह पहुंचते हैं। मार्ग में गणेश, पार्वती जैसे शिव परिवार के सदस्यों की कई मूर्तियाँ स्थापित हैं। प्रत्येक मूर्ति के ऊपर दैनन्दिनी पूजार्चना के संकेत दिखाई पड़ते हैं। भूमि पर एक बड़ा शिवलिंग देखा जा सकता है। मंदिर के पुजारी से आप असली शिवलिंग के दर्शन कराने का अनुरोध कर सकतें हैं। असली शिवलिंग दो पत्थरों की जोड़ी है, एक शिव व दूसरा शक्ति का रूप।

कहा जाता है कि यहाँ का शिवलिंग स्वयंभू अर्थात् धरती के गर्भ से स्वयं प्रकट हुआ है। इस शिवलिंग के नीचे शायद पानी का कोई जीवित स्त्रोत मौजूद है क्योंकि यहाँ से पानी के बुलबुले निकलते दिखाई पड़ते हैं।

जागेश्वर मंदिर की आरती

सूर्यास्त के समय आप यहाँ होती आरती में भाग ले सकतें हैं। ४५ मिनट की इस आरती के दौरान यह पाषाणी मंदिर संगीत व श्लोकोच्चारण से जीवंत हो उठता है। भीड़ ना होने के कारण आप शिवलिंग के चारों ओर बैठ, पुजारी द्वारा किया गया शिवलिंग का स्नानाभिषेक व अलंकरण का आनंद ले सकते हैं। आप स्वयं यहाँ आरती भी कर सकते हैं। यह सब के लिए उपलब्ध दैनन्दिनी आरती है। इसके अलावा आप रुद्राभिषेक की तरह विशेष पूजा अर्चना भी करा सकते हैं। शिवलिंग के पृष्ट भाग पर दो चन्द्रवंशीय शासकों, दीपचंद व त्रिपालचंद, की धातु में बनी प्रतिकृति लगी हुई है। दीपचंद हाथों में दीप धारण किये हुए हैं। इस दिये की लौ कभी ना बुझने वाली शाश्वत लौ है। निरंतर जलते रहने हेतु प्रतिदिन १.२५ किलोग्राम देसी घी का इस्तेमाल होता है जो भक्तगण चढ़ावे के रूप में मंदिर को अर्पित करतें हैं। भारत के शिवमंदिरों की यह प्राचीन परंपरा प्रतीत होती है। मुझे स्मरण है कि मैंने तमिलनाडु के शिवमंदिरों में भी पाली जाने वाली इस प्रकार की परंपरा के विषय में अध्ययन किया था।

महामृत्युंजय महादेव मंदिर

महामृत्युंजय महादेव मंदिर - जागेश्वर
महामृत्युंजय महादेव मंदिर – जागेश्वर

जागेश्वर मंदिर परिसर का सबसे प्राचीन व विशालतम मंदिर है महामृत्युंजय महादेव मंदिर। यह परिसर के बीचोंबीच स्थित है। परिसर में प्रवेश के तुरंत बाद आप इस मंदिर को अपने दायीं तरफ देख सकते हैं।

कहा जाता है कि यह प्रथम मंदिर है जहां लिंग के रूप में शिवपूजन की परंपरा सर्वप्रथम आरम्भ हुई थी। यहाँ के पुजारी जी आपको पाषाणी लिंग के ऊपर खुदी शिव की तीसरी आँख अवश्य दिखाएँगे। इस महामृत्युंजय महादेव मंदिर का शिवलिंग अति विशाल है और इसकी दीवारों पर महामृत्युंजय मन्त्र बड़े बड़े अक्षरों में लिखा हुआ है। पुरातत्ववेत्ताओं ने दीवारों पर २५ अभिलेखों की खोज की जो ७ वीं. से १० वी. ई. की बतायी जाती है। अभिलेख संस्कृत व ब्राह्मी भाषा में लिखे गए हैं। मंदिर के शिखर पर लगी पाषाणी पट्टिका पर एक राजसी दम्पति द्वारा लाकुलीश की पूजा अर्चना प्रदर्शित है। इसके ऊपर भगवान् शिव के तीन मुखाकृतियों की शिल्पकारी की गयी है।

महामृत्युंजय महादेव मंदिर
महामृत्युंजय महादेव मंदिर

अन्य भारतीय प्राचीन मंदिरों की तरह यहाँ की पाषाणी दीवारों पर भी शुभमंगल व समृद्धि के संकेत खुदे हुए हैं। इन्हें देख अनुमान लगाया जा सकता है कि हमारे पुरातन मंदिरों की रचना कैसे होती थी। स्थानीय पंडित व भक्तगण और पर्यटक यहाँ आ कर मंदिरों के चारों ओर बैठते हैं। वे यहाँ आपस में चर्चा करते हैं, मंदिर में पूजा अर्चना करतें हैं व एक दूसरे की मदद करतें है। यह सर्वसाधारण हेतु सार्वजनिक भेंट स्थल है।

पुष्टि देवी मंदिर

पुष्टि देवी मंदिर - जागेश्वर
पुष्टि देवी मंदिर – जागेश्वर

यह मंदिर परिसर के दाहिनी ओर अंतिम छोर पर, महामृत्युंजय महादेव मंदिर के पीछे स्थित है। यह अपेक्षाकृत छोटा मंदिर है। इसमें एक छोटा गलियारा है जिस पर तिरछी स्लेट की पट्टियों की छत है। यह एक ठेठ हिमालयी छत है। इस मंदिर के भीतर पुष्टि भगवती माँ की मूर्ति स्थापित है।

दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर

इस मंदिर में हनुमान की आदमकद मूर्ति है। मुझे यह मूर्ति अपेक्षाकृत नवीन प्रतीत हुई क्योंकि यह मूर्ति बाकि मंदिर परिसर की शिल्पकला से मेल नहीं खाती है।

नवग्रह मंदिर

यह ९ मंदिरों का एक समूह है जो समर्पित है हिन्दू ब्रम्हांड शास्त्र के ९ ग्रहों को। इस मंदिर समूह में सूर्य भगवान्, शनि भगवान् आदि के मंदिर शामिल हैं।

केदारेश्वर मंदिर

केदारेश्वर शिवलिंग
केदारेश्वर शिवलिंग

जैसा कि हम सब जानते हैं, उत्तराखंड में, हिमालय की गोद में स्थित केदारनाथ मंदिर भी एक ज्योतिर्लिंग है। केदारनाथ मंदिर में शिवलिंग एक अनियमित पत्थर के आकार की है। उसी तरह का शिवलिंग जागेश्वर धाम के केदारेश्वर मंदिर में भी है।

लकुलीश मंदिर

लकुलीश - शिव के अवतार
लकुलीश – शिव के अवतार

लकुलीश भगवान् शिव के २८वें अवतार माने जाते हैं। कुछ लोग इन्हें एक स्वतंत्र पंथ भी मानते हैं। उत्तराखंड व गुजरात में भगवान् शिव के लकुलीश अवतार की अराधना की जाती है। इस अवतार में भगवान् शिव के हाथ में एक छड़ी दिखाई देती है। जागेश्वर धाम में भगवान् शिव के इस अवतार को दर्शाती शिलाखंडें कई मंदिरों के दीवारों पर लगीं हैं।

तान्डेश्वर मंदिर

नृत्य मुद्रा में शिव
नृत्य मुद्रा में शिव

लकुलीश मंदिर के बगल में एक और छोटा मंदिर है जिसके भीतर भी शिवलिंग स्थापित है। इसके अग्रभाग के शिलाखंडों पर तांडव नृत्य करते शिव की प्रतिमाएं हैं।

बटुक भैरव मंदिर

बटुक भैरव मंदिर - जागेश्वर
बटुक भैरव मंदिर – जागेश्वर

यह मंदिर परिसर के बांयी ओर स्थित पहला मंदिर है। मंदिर के प्रवेशद्वार से भीतर जाने से पूर्व, जहां आप अपनी चप्पलें उतारतें हैं, ठीक वहीँ यह मंदिर स्थित है। मेरे अनुमान से जो मूर्तियाँ इस मंदिर के भीतर स्थित हैं, वे भैरव का कोई रूप हैं। भक्तगण इस मंदिर के दर्शन सबसे अंत में करतें हैं।

कुबेर मंदिर परिसर

कुबेर मंदिर - जागेश्वर
कुबेर मंदिर – जागेश्वर

कुबेर मंदिर परिसर एक पहाड़ी के ऊपर उस नदी के पार स्थित है जो जागेश्वर मंदिर परिसर के चारों ओर बहती है। यहाँ से जागेश्वर मंदिर परिसर का शीर्ष दृश्य दिखाई पड़ता है। अन्य मंदिरों की तरह, कुबेर मंदिर के भीतर भी मुख्य देव के रूप में शिवलिंग स्थापित हैं। मंदिर के प्रवेशद्वार के ऊपर लगे शिलाखण्ड पर कुबेर की प्रतिमा गड़ी हुई है।

कुबेर
कुबेर

कुबेर मंदिर के पास एक छोटा सा चंडिका मंदिर है जिसके भीतर भी मुख्य देवता के रूप में शिवलिंग स्थापित है।

दंडेश्वर मंदिर परिसर

दंडेश्वर मंदिर
दंडेश्वर मंदिर

दंडेश्वर मंदिर परिसर मुख्य जागेश्वर मंदिर परिसर से करीब १ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ एक बड़ा मंदिर व १४ अधीनस्थ मंदिर हैं। वस्तुतः यही बड़ा मंदिर दंडेश्वर मंदिर है और इस क्षेत्र का सबसे ऊंचा और विशालतम मंदिर है। इन मंदिरों में कुछ, दंडेश्वर मंदिर के समीप ही एक चबूतरे पर स्थित हैं व कुछ इसके आसपास बिखरे हुए हैं। इनमें कुछ मंदिरों के भीतर सादे शिवलिंग, योनि पर स्थापित हैं वहीं कुछ मंदिरों के भीतर चतुर्मुखलिंग स्थापित है।

भगवान् शिव यहाँ लिंग रुपी ना होते हुए, शिला के रूप में हैं। पुजारीजी ने हमें इस मंदिर से जुडी दंतकथा के बारे में बताया की भगवान् शिव यहाँ के जंगल में ध्यानमग्न समाधिस्थ थे। उनके रूप व नीले अंग को देख इन जंगलों में रहने वाले ऋषियों की पत्नियां उन पर मोहित हो गयीं। इस पर क्रोधित हो कर ऋषियों ने शिव को शिला में परिवर्तित कर दिया। इसलिए शिव यहाँ शिला रूप में स्थापित हैं। पहले सुनी दंतकथा का यह दूसरा संस्करण पुजारीजी ने हमें बताया।

कहा जाता है मंदिर का नाम दंडेश्वर दण्ड शब्द से लिया गया है। हालांकि इस तथ्य का कोई प्रामाणिक अभिलेख मौजूद नहीं है।

पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के संग्रहालय में रखी गयी पौन राजा की धातु की मूर्ति कभी इन मंदिर का हिस्सा हुआ करती थी।जागेश्वर व दंडेश्वर के मध्य सड़क के दोनों तरफ आप कई छोटे मंदिर देख सकतें हैं।

पुरातात्विक संग्रहालय जागेश्वर

जागेश्वर संग्रहालय
जागेश्वर संग्रहालय

स्थानीय शिल्पकला प्रदर्शित करता यह छोटा परन्तु बेहतर रखरखावयुक्त संग्रहालय है। यहाँ प्रदर्शित अधिकाँश शिल्पकारी जागेश्वर अथवा आसपास के क्षेत्रों से लाई गयी है।

आप यहाँ शिलाओं पर तराशे भित्तिचित्र देख सकतें है जैसे नृत्य करते गणेश, इंद्र या विष्णु के रक्षक देव अष्ट वसु, खड़ी मुद्रा में सूर्य, विभिन्न मुद्राओं में उमा महेश्वर और विष्णु। शक्ति के भित्तिचित्र चामुंडा, कौमारी, कनकदुर्गा, महिषासुरमथिनी, लक्ष्मी, दुर्गा इत्यादि के रूप में हैं। यहाँ कुछ राजसी भित्तिचित्र भी देखने मिले जिन पर राजसी भक्त व राजसी सवारियां भी दिखाई गईं हैं। संग्रहालय के द्वारों के चौखट भी अत्यंत प्रशंसनीय हैं। यह चौखट शिलाओं के बड़े बड़े पट्टिकाओं से बने हैं जिन पर अभिलेख गुदे हुए हैं।

यहाँ के भित्तिचित्र व शिल्पकला भारत के सर्वोत्तम शिल्पकला में भले ही शामिल ना हो, पर निश्चित रूप से ये सर्वोत्तम रखरखाव वाली शिल्पकारी है। इन पर कभी आक्रमण नहीं हुआ, ना ही इन्हें कभी कोई क्षति पहुंचाई गयी। आप इनके मूल रंग व कुशल कारीगरी बखूबी देख सकतें हैं। हालांकि कुछ शिल्पकारियों पर अर्पित हल्दी और कुमकुम के अवशेष दिखाई पड़ते हैं परन्तु अधिकाँश शिल्पकारी स्वच्छ रखी हुईं है।

इस संग्रहालय की सर्वोत्तम कलाकृति है पौन राजा की आदमकद प्रतिकृति जो अष्टधातु में बनायी गयी है। इसे दंडेश्वर मंदिर से सड़क मार्ग द्वारा लाया गया है। यह कुमांऊ क्षेत्र की एक दुर्लभ प्रतिमा है।

हमें यहाँ छायाचित्र लेने की सख्त मनाही थी इसलिए मैं यहाँ कोई चित्रीकरण नहीं कर पायी। शुक्र है यहाँ से बाहर निकलते वक्त मुझे संग्रहालय की कलाकृतियों पर बनी एक स्मरणिका दी गयी। संग्रहालय के अधिकारियों से चर्चा के दौरान मुझे ज्ञात हुआ कि इन कलाकृतियों की चोरी का खतरा हमेशा बना रहता है। इन पर सुरक्षा के कड़े इंतजाम के तहत छायाचित्रीकरण की सख्त मनाही की गयी है।

जागेश्वर धाम की यात्रा हेतु कुछ सुझाव

देवी प्रतिमा - जागेश्वर मंदिर
देवी प्रतिमा – जागेश्वर मंदिर

• जागेश्वर धाम पहुँचाने हेतु निकटतम बड़ा शहर ३५ किलोमीटर दूर स्थित अल्मोड़ा है। हल्दवानी/काठगोदाम से जागेश्वर १२० किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। हवाई व रेल सुविधाओं के अभाव में सड़क मार्ग द्वारा ही यहाँ पहुंचा जा सकता है। तथापि मार्ग अत्यंत सुरम्य व प्राकृतिक है।
• सम्पूर्ण मंदिर परिसर व संग्रहालय के अवलोकन हेतु ३ से ४ घंटों का समय आवश्यक है। परन्तु पूजा अर्चना व संध्या आरती अर्पित करने की इच्छा रखने वाले पर्यटकों के लिए मेरा सुझाव रहेगा कि वे यहाँ एक सम्पूर्ण दिवस बिताने की योजना बनायें।
• मंदिर के विभिन्न अनुष्ठानों व धार्मिक कृत्यों के निर्धारित शुल्क बाहर सूचना पट्टिका पर लिखे हुए हैं।
• पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग संग्रहालय शुक्रवार को छोड़कर हर दिन प्रातः १० बजे से संध्या ५ बजे तक खुला रहता है। प्रवेश निशुल्क है।
• नदी के किनारे टहलते हुए घने देवदार के जंगल का आनंद लिया जा सकता है जो इस मंदिर के चारों ओर फैले हुए हैं।
• जागेश्वर से १४ किलोमीटर दूर वृद्ध जागेश्वर मंदिर के भी आप दर्शन कर सकतें हैं, परन्तु मैं आपको आगाह करा दूं कि इस हेतु आपको थोड़ी पैदल चढ़ाई चढ़नी पड़ेगी।
• मंदिर के समीप ही कुमांऊ मंडल विकास निगम का विश्रामगृह है जहां से मंदिर का सुन्दर दृश्य दिखाई पड़ता है। अन्य होटल व अथितिग्रह थोड़ी दूरी पर स्थित हैं।
• मंदिर के आसपास स्थित दुकानें आपको सादा भोजन उपलब्ध करा सकतें हैं। इनमें से अधिकाँश दुकानें रात ८ बजे ही बंद हो जातीं हैं।

हिंदी अनुवाद : मधुमिता ताम्हणे

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गोवा के प्राचीन सारस्वत मंदिर – अपनी विशिष्ट वास्तुकला के साथ https://inditales.com/hindi/ancient-saraswat-temples-goa/ https://inditales.com/hindi/ancient-saraswat-temples-goa/#respond Wed, 24 May 2017 02:30:14 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=255

पर्यटन स्तर पर गोवा की जो छवि प्रस्तुत की जाती है वह बहुत ही सीमित है। इसी गोवा में मंदिरों के अस्तित्व की बात सुनकर लोगों को हैरानी होती है। लेकिन ये मंदिर ही गोवा की सादगी, सुंदरता और संस्कृति का प्रतीक है और इन्ही में गोवा का इतिहास भी रचा बसा हुआ है। अगर […]

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महलासा नारायणी मंदिर, गोवापर्यटन स्तर पर गोवा की जो छवि प्रस्तुत की जाती है वह बहुत ही सीमित है। इसी गोवा में मंदिरों के अस्तित्व की बात सुनकर लोगों को हैरानी होती है। लेकिन ये मंदिर ही गोवा की सादगी, सुंदरता और संस्कृति का प्रतीक है और इन्ही में गोवा का इतिहास भी रचा बसा हुआ है। अगर आप गोवा के समुद्र तटों और वहां के वातावरण से अपनी नज़रें हटाकर उसकी ऐतिहासिक विरासत की ओर ध्यान देंगे तो शायद आपको यह एहसास होगा कि, गोवा का इतिहास बहुत ही समृद्ध है। वास्तव में यह विश्व के सबसे प्राचीन निवासित क्षेत्रों में से एक है।

आज मैं आपको गोवा के दक्षिण पूर्वीय क्षेत्रों की यात्रा करवाना चाहती हूँ जो गोवा के बहुत से प्राचीन मदिरों का आश्रय है।

गोवा में स्थित प्राचीन सारस्वत मंदिर

गोवा के मंदिरों को अगर उनके मौजूदा स्थान के हिसाब से देखा जाए तो शायद वे कुछ ही सदियों पुराने नज़र आएंगे। लेकिन सच तो यह है कि ये मंदिर बहुत ही प्राचीन हैं। गोवा के अधिकतर मंदिर स्थानांतरित हैं। अर्थात ये मंदिर अपने मूल निर्मित स्थान पर न होकर अपने पुनः निर्माण के स्थान पर स्थापित हैं। यानि जिस स्थान पर ये मंदिर बनवाए गए थे उन्हें वहां से अपने वर्तमान स्थान पर पुनः स्थापित किया गया है।

अगर आप गोवा के इतिहास के बारे में पढ़ेंगे तो आपको इन सारस्वत मंदिरों के इतिहास की थोड़ी बहुत जानकारी जरूर मिलेगी। ये मंदिर पहले गोवा राज्य या गोवापुरी, जैसा कि उसे पहले कहा जाता था, के विभिन्न क्षेत्रों में फैले हुए थे। लेकिन पुर्तुगाली शासन काल के दौरान जब पुर्तुगालियों द्वारा इन मंदिरों का विध्वंस होने लगा, तब ब्राह्मण परिवारों ने अपने देवी-देवताओं की रक्षा करने हेतु उन मंदिरों में स्थापित मूर्तियों को अपनी मूल जगह से विस्थापित कर, उन्हें फोंडा और उसके आस-पास के क्षेत्रों में पुनः स्थापित किया। और बाद में धीरे-धीरे यहां पर मंदिरों का निर्माण होने लगा। इन नवनिर्मित मंदिरों में पुर्तुगाली वास्तुकला की छाप स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

गोवा के देवस्थान

गोवा में मंदिरों को देवस्थान कहा जाता है।  यह आम तौर पर गाँव के बीचों-बीच बसे होते हैं और पूरे गाँव का जीवन इन्हीं देवस्थानों के इर्द-गिर्द घूमता है। यहां पर न सिर्फ धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, बल्कि सामाजिक कार्यक्रम भी होते रहते हैं। इन देवस्थानों की देख-रेख खास परिवारों द्वारा की जाती है, जिन्हें महाजन कहा जाता है। गोवा के अधिकतर देवस्थान यहां के सारस्वत ब्राह्मण परिवारों के कुलदेवताओं के मंदिर हैं। ये वे ब्राह्मण परिवार हैं जो पुर्तुगालियों के आने से पहले भी इस क्षेत्र पर राज्य करते थे।

गोवा के शिव-पार्वती मंदिर

गोवा के अधिकतम सारस्वत मंदिर भगवान शिव और उनकी पत्नी देवी पार्वती को समर्पित किए गए हैं। इन मंदिरों में आप भगवान शिव और देवी पार्वती के विविध स्वरूप देख सकते हैं। लेकिन इन मंदिरों की विशेष बात यह है कि, इनमें से किसी भी मंदिर में भगवान शिव और देवी पार्वती एक साथ निवास नहीं करते। अर्थात भगवान शिव के मंदिरों में आपको देवी पार्वती की कोई निशानी नहीं मिलती, उसी प्रकार देवी पार्वती के मंदिरों में भगवान शिव का कोई उल्लेख नहीं मिलता। लेकिन भक्तों में यह भिन्नता नहीं दिखती है, वे दोनों को समान रूप से पूजते हैं।

गोवा के मंदिरों की यह बात कुछ असामान्य सी है, क्योंकि, शिव और पार्वती को समर्पित भारत के अन्य मंदिरों में अगर किसी एक को प्रमुख देवी/देवता के रूप से पुजा जाता है तो दूसरे को परिवार देवता के रूप में पूजा जाता है। तथा भारत के अधिकतर शिव मंदिरों में पार्वती के साथ, कार्तिकेय और गणेश को भी पूजा जाता है।

लेकिन गोवा के मंदिरों की बात थोड़ी अलग है। यहां पर सारस्वत manमंदिर मंदिर के प्रमुख देवता के साथ उस क्षेत्र के ग्रामपुरुष को पूजा जाता है। जैसे मंगेशी के मंदिर में भगवान शिव के साथ मूलकेश्वर, जो वहां का ग्रामपुरुष या स्थानीय पुरुष है, को मान्यता दी जाती है। आम तौर पर ग्रामपुरुष वह व्यक्ति होता है, जिसने मंदिर बनवाने में लोगों की बहुत सहायता की हो।

गोवा के मंदिरों की वास्तुकला

पुर्तुगालियों ने गोवा पर 400 सालों से भी अधिक काल के लिए शासन किया था । इस काल के दौरान उनके द्वारा गोवा के अधिकांश मंदिरों का विध्वंस किया गया था। इसी से त्रस्त होकर लोगों ने इन मंदिरों की मूर्तियों को दूसरी जगहों पर ले जाकर उन्हें वहीं पर स्थापित कर नए मंदिरों का निर्माण किया। जिसके कारण आज उनका मूल स्वरूप या फिर उनकी मूल वास्तुकला का अंदाजा लगाना या उसकी जानकारी मिलना बहुत कठिन है।

लेकिन गोवा में एक मंदिर ऐसा है जो पुर्तुगालियों के विध्वंस से अछूता, आज भी सुरक्षित है। वह है ‘तांबड़ी सुर्ला का महादेव मंदिर’ जो पत्थरों से बनवाया गया था। आज यह मंदिर गोवा के खोये हुए इतिहास के प्रमाण के रूप में हमारे सामने खड़ा है। इससे यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि, उस काल के अन्य मंदिर भी इसी प्रकार पत्थरों से बनवाए गए होंगे और देखा जाए तो पूरे भारत में भी उस समय मंदिरों के निर्माण की यही परंपरा प्रचलन में थी।

17-18 वी शताब्दी के दौरान गोवा के आस-पास के क्षेत्रों के अनेकों राजाओं के प्रश्रय में बनवाए गए नवीन मंदिरों की वास्तुकला अप्रतिम है। इन मंदिरों की संरचना में आप इस्लामी वास्तुकला और पुर्तुगाली वास्तुकला की स्पष्ट झलक देख सकते हैं, जिसके साथ ही ये हिन्दू मंदिरों की सूक्ष्मताओं को बरकरार रखे हुए हैं।

गोवा के मंदिरों की विशेषताएँ

गोवा के प्रत्येक मंदिरों के उपर शिखर होती है, जो कभी गुबंद या फिर एक लंबे से गुबंद की तरह होती है। यह शिखर कभी ईंटों और गारे से बनी होती है, तो कभी पीतल की होती है। कुछ मंदोरों में यह शिखर पिरामिड की तरह होती है जो त्रिकोणीय आकार की होती है।

गोवा के मंदिरों को अक्सर उज्जवलित रंगों से रंगवाया जाता है, जैसे कि नीला, पीला, लाल आदि, जो उन्हें और भी आकर्षित बनाते हैं।

इन मंदिरों में प्रमुख प्रवेश द्वार के अलावा और भी द्वार होते हैं जो आपको सीधे मंदिर के गर्भ गृह तक ले जाते हैं। इन दरवाजों की चौखट चाँदी से उत्कीर्णित होती है, जो मंदिर की सुंदरता को और भी बढ़ाते हैं।

गोवा के मंदिरों में स्थापित देवी-देवताओं की मूर्तियाँ अक्सर काले ग्रेनाइट पत्थर की होती हैं। इन मूर्तियों को आभूषणों से इस प्रकार सुशोभित किया जाता है कि, उनके उत्कीर्णन की सूक्ष्मताओं को देख पाना मुश्किल है। इन मूर्तियों के सिर्फ मुख और मुकुट ही दृष्टिगोचर होते हैं, जिसके साथ उनकी थोड़ी-बहुत बारीकियाँ और विशेषताएँ भी झलकती हैं।

गोवा के कुछ मंदिरों में आप लकड़ी की कारीगरी भी देख सकते हैं, जो यहां की सदियों पुरानी परंपरा रही है। मुझे बताया गया कि लगभग एक शताब्दी पहले तक गोवा के सारे मंदिरों में ऐसी ही लकड़ी की कारीगरी हुआ करती थी, जो धीरे-धीरे ईंटों और गारे का स्वरूप लेने लगी है।

यहां के प्रत्येक मंदिरों के पास मंदिर का एक सरोवर होता है, जो चौकोर या आयताकार आकार का होता है, इसे स्थानीय भाषा में ‘तळी’ कहते हैं।

गोवा के हर सारस्वत मंदिर में वार्षिक उत्सव या मेला होता है, जिसे ‘जात्रा’ कहा जाता है। इस उत्सव के कुछ ही दिन पहले पूरे मंदिर को रंगवाकर उसे सजाया जाता है, तथा टिमटिमानेवाली बत्तियों से मंदिर को प्रकाशमय किया जाता है। इस समय मंदिर के प्रमुख देवी/देवता की यात्रा निकाली जाती है, जिसे देखने के लिए बहुत सारे भक्त आते हैं। इस यात्रा में मंदिर के देवता को उनकी सवारी या वाहन, जिसे ‘पालकी’ कहते हैं, में बिठाकर उन्हें पूरे मंदिर के गोल प्रदक्षिणा के रूप में ले जया जाता है। भगवान की यह पालकी लकड़ी की बनायी जाती है जिस पर बारीक और अप्रतिम नक्काशी का काम होता है। इस पालकी  को एक खास कक्ष में रखा जाता है, जिसे पालकी  घर या वाहनशाला कहते हैं।

यहां के मंदिरों में छतों के आंतरिक भाग से लंबे-लंबे झूमर लटकते हुए नज़र आते हैं, जो लगभग 18-19 वी शताब्दी के होंगे, क्योंकि, इसी काल के दौरान इन मंदिरों का निर्माण हुआ था और उस समय इस प्रकार के झूमर काफी प्रचलित थे।

इन मंदिरों के दर्शन लेने हेतु आए हुए भक्त यात्रियों को यहां पर ठहरने के लिए खास कमरों और भोजनालयों की भी व्यवस्था की गयी है।

तो आइए मैं आपको गोवा के कुछ प्रसिद्ध सारस्वत मंदिरों की सैर करवाती हूँ।

श्री शांतादुर्गा मंदिर, कवले (कवळे)

श्री शांतादुर्गा मंदिर - गोवा
श्री शांतादुर्गा मंदिर – गोवा

शांतादुर्गा एक विरोधालंकार शब्द है। शांता का अर्थ होता है शांत और नीरव, वहीं दुर्गा बहुत ही आक्रामक और उग्र स्वभाव की देवी मानी जाती है। इस संबंध में गोवा के लोगों का मानना है कि गोवा इतना अमनप्रिय स्थल है कि दुर्गा भी यहां आकर नीरवता का रूप धारण करती है।

शांतादुर्गा देवी से जुड़े कुछ उपाख्यान बताते हैं कि, एक बार जब भगवान शिव और विष्णु के बीच भयंकर युद्ध हुआ था तब इस युद्ध को रोकने के लिए माँ दुर्गा संधाता के रूप में आयी थी। कहते हैं कि, ब्रह्मा जी की प्रथना सुनकर माँ पार्वती ने दुर्गा का रूप धारण कर युद्ध में हस्तक्षेप किया और विष्णु को अपने दाईने हाथ और शिव जी को अपने बाएं हाथ पर ग्रहण किया था। उनके इसी स्वरूप को शांतादुर्गा देवी के नाम से जाना जाता है। अर्थात माँ दुर्गा जो शांति दूत बनी। उन्हें स्थानीय लोगों द्वारा श्री शांतेरी देवी के नाम से भी जाना जाता है। उनके मंदिर पूरे गोवा में फैले हुए हैं।

इसी प्रकार कुछ अन्य उपाख्यान के अनुसार माना जाता है कि, उन्होंने कलांतक राक्षस का वध किया था, जिसके कारण उन्हें विजयदुर्गा भी कहा जाता है। और देखा जाए तो अब यह मंदिर भी शांतादुर्गा विजयते के नाम से जाना जाता है। इसमें भी विरोधलंकार दिखाई देता है, यानि शांति से विजय प्राप्त करने वाली दुर्गा देवी। कुछ उपाख्यानों के अनुसार शांतादुर्गा देवी को जगदंबा देवी का अवतार भी माना जात है।

शांतादुर्गा देवी का मूल मंदिर

श्री शांतादुर्गा मंदिर गोवा की पुष्करणी या तल्ली
श्री शांतादुर्गा मंदिर गोवा की पुष्करणी या तल्ली

शांतादुर्गा देवी का मूल मंदिर केलोशी (केळोशी) गाँव में बसा हुआ था जिसे 1564 ई में पुर्तुगालियों से संरक्षण के लिए वहां से स्थानांतरित किया गया था। बाद में 1730 ई में कवले (कवळे) गाँव में उनके नवीन मंदिर का निर्माण किया गया। कवले उस समय हरिजनों का गाँव हुआ करता था। इन्हीं हरिजनों ने मंदिर के निर्माण कार्य में बहुत सहायता की थी, ताकि उनकी जमीन पर देवी माँ का नया मंदिर खड़ा हो सके। उनके इस परोपकारी स्वभाव से खुश होकर देवी माँ के भक्तों द्वारा उन्हें देवी के चढ़ावे की वस्तुओं से सम्मानित किया गया था, जो प्रथा आज भी चलती आ रही है। बाद में यह मंदिर सरदेसाई नामक व्यक्ति के संरक्षण में चला गया, जो गोवा में अदिल शाह के प्रतिनिधि हुआ करते थे। मंदिर से जुड़े सारे विधि-कार्य उन्हीं की निगरानी में होते थे। चाहे वह मंदिर का वार्षिक उत्सव हो या फिर देवी की पालकी यात्रा। इस प्रकार से धीरे-धीरे समय के साथ यह सरदेसाई परिवार की परंपरा बन गयी, जिसे आज तक उस परिवार के व्यक्तियों द्वारा पूरी निष्ठा से निभाया जाता है।

इस मंदिर की छत पिरामिड के आकार की है जिसे लाल रंग से रंगवाया गया है। इसके उपर मंदिर की शिखर है जो थोड़ी सी लंबी और कुछ गोलाकार सी है जिसके उपर एक छोटा सा गुबंद है। इस मंदिर की खिड़कियाँ थोड़ी लंबी और रोमानी मेहराबों की तरह हैं जिन्हें रंगीन काँच से सुशोभित किया गाय है। अगर इस मंदिर को सम्पूर्ण तौर पर देखा जाए तो इसकी वास्तुकला अप्रतिम है।

सूर्य की रोशनी का प्रतिबिंब

जब मैं इस मंदिर में गयी थी तो वहां पर सुबह की आरती चल रही थी। सुबह की इस आरती के समय मंदिर में स्थापित देवी की मूर्ति को सूर्य प्रकाश से ज्योतिर्मय किया जाता है। इसके लिए एक बड़े से आईने का प्रयोग किया जाता है, जिससे सूर्य के प्रकाश को देवी के चेहरे पर प्रतिबिंबित किया जाता है। यही इस मंदिर की प्रमुख विशेषता है। मैंने यह प्रकार इससे पहले किसी भी अन्य मंदिर में नहीं देखा था। यह सबकुछ सच में बहुत ही सुंदर और देखने लायक है। यह मंदिर बहुत ही लंबा है और उसके गर्भगृह में स्थापित देवी की मूर्ति और प्रवेश द्वार के बीच लगभग 100 मिटर का अंतर है। इतनी दूरी से सूर्य की रोशनी को आईने के द्वारा देवी के मुख पर केन्द्रित करना बहुत ही अनोखी बात थी। सूर्य की रोशनी पड़ते ही देवी की मूर्ति जैसे प्रफुल्लित सी हो उठती है, जो उसकी सुंदरता को और भी बढ़ाती है। मूर्ति की इस सुंदरता से आप इतने मोहित होते हैं कि, आपकी नज़रें मूर्ति से हट ही नहीं पाती।

जैसा कि उपर बताया गया था, गोवा के मंदिरों में प्रमुख देवी/देवता के साथ मूलपुरुष को भी समान महत्व दिया जाता है। यह मूलपुरुष वह व्यक्ति होता है जो मूर्ति कि स्थापना में या मंदिर के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस मूलपुरुष के नाम से मुख्य मंदिर के पास ही एक छोटा सा मंदिर बनवाया जाता है। शांतादुर्गा मंदिर के संदर्भ में यह कार्य लोमशर्मा, जो कौशिक गोत्र के हैं, द्वारा किया गया था और उनके नाम से यहां पर एक छोटा सा मंदिर भी है।

शांतादुर्गा मंदिर की अधिक जानकारी के लिए आप मंदिर से संबंधित वैबसाइट देख सकते हैं।

श्री रामनाथ प्रसन्न देवस्थान, रामनाथी

श्री रामनाथ प्रसन्न या रामनाथी मंदिर - गोवा
श्री रामनाथ प्रसन्न या रामनाथी मंदिर – गोवा

रामनाथ मंदिर अक्सर रामनाथी मंदिर के नाम से जाना जाता है। वास्तव में यह मंदिर भगवान शिव का है, लेकिन इसका नामकरण राम के नाम से किया गया है। कहा जाता है कि, लंका से वापसी के दौरान जब राम, सीता और लक्ष्मण रामेश्वरम में ठहरे थे तब भगवान राम ने वहां पर शिवलिंग की स्थापना करके शिव भगवान की आराधना की थी। इसी घटना के स्मरणोत्सव स्वरूप यह मंदिर बनवाया गया था।

यह मंदिर लगभग 450 साल पुराना है। यहां के परिसर को देखकर मंदिर की प्राचीनता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। यहां की प्रत्येक वस्तु अपनी प्राचीनता को बयां करती हुई नज़र आती है। इस मंदिर को देखकर ऐसा लगता है जैसे कि, उसके रख रखाव और नवीकरण पर ध्यान ही नहीं दिया गया हो।

श्री रामनाथ प्रसन्न मूर्ति
श्री रामनाथ प्रसन्न मूर्ति

भगवान रामनाथ के साथ ही यहां पर उनकी दोनों जीवन संगिनियों यानि देवी कामाक्षी और देवी शांतेरी के मंदिर भी स्थापित हैं।

रामनाथी मंदिर मूलतः लोटली गाँव में स्थित था, जहां पर आज बिगफूट संग्रहालय बसा हुआ है। वहां से इस मंदिर को पुर्तुगालियों से संरक्षित करने हेतु अपने वर्तमान स्थान यानि रामनाथी में स्थानांतरित किया गया था। शायद इसीलिए इस मंदिर को रामनाथी के नाम से भी जाना जाता है।

इस मंदिर की वैबसाइट के अनुसार श्री रामनाथ विष्णु और शिव जी की एकता का प्रतीक है। अर्थात हरी यानि विष्णु और हरा यानि शिव की एकरूपता से निर्मित हरी-हरा यानि रामनाथ जिसका अर्थ है राम के नाथ। अब रामनाथ मंदिर की वैबसाइट द्वारा अपने अनुयायियों के लिए ऑनलाइन दर्शन की भी व्यवस्था भी की गयी है।

श्री महालक्ष्मी मंदिर, बांदोड़ा

श्री महालक्ष्मी देवस्थान - बंदोड़ा, गोवा
गोवा श्री महालक्ष्मी देवस्थान

श्री महालक्ष्मी मंदिर दक्षिण गोवा में फोंडा तालुका के पास ही बसे बांदोड़ा गाँव में स्थित है। यह मंदिर उज्जवलित पीले रंग का है, जो कि गोवा के अधिकतम घरों से मिलता जुलता है। यह मंदिर अपनी बड़ी-बड़ी खिड़कियों और अपने विशाल आकार के कारण किसी राजसी भवन की भांति लगता है। लेकिन मंदिर के भीतर प्रवेश करते ही यह भ्रम दूर होता है और आपको मंदिर में होने का एहसास होता है।

इस मंदिर में स्थापित देवी महालक्ष्मी आदि-शक्ति, जो बहुत ही शक्तिशाली देवी है, का ही अवतार मानी जाती है। गोवा में स्थापित श्री महालक्ष्मी की विशिष्ट और अनोखी बात यह है कि उनके माथे पर लिंग बना हुआ है। इसके अलावा उनके हाथों में हँसुआ, गदा, कटार और प्रदास से भरा बर्तन भी है। कहा जाता है कि गोवा की देवी महालक्ष्मी की मूर्ति कोल्हापुर की महालक्ष्मी की मूर्ति के समरूप है।

गोवा के अनेक मंदिरों में से श्री महालक्ष्मी का यह मंदिर अपने सुंदर परिसर के कारण बहुत प्रसिद्ध है। इस मंदिर का परिसर सुंदर बाग-बगीचों से सुशोभित है। यहां पर आपको विविध प्रकार के फूलों के पेड़ देखने को मिलते हैं।

श्री महालक्ष्मी मंदिर की सुसज्जित पालकियां
श्री महालक्ष्मी मंदिर की सुसज्जित पालकियां

यहां पर देवी महालक्ष्मी की सुंदर सी पालकी मंदिर के पीछे स्थित कक्ष में रखी गयी है। जब आप मंदिर की परिक्रमा करने के लिए मंदिर के गोल घूमते हैं तो उस समय आप इस कमरे में रखी गयी देवी की पालखी देख सकते हैं।

श्री महालक्ष्मी मंदिर की वैबसाइट के अनुसार यह मंदिर प्राचीन काल से बांदोड़ा गाँव में ही स्थित है। और यही इस मंदिर का मूल स्थान है। कहा जाता है कि, यह मंदिर पुर्तुगालियों के अत्याचारों से अछूता ही रहा था जिसके कारण उसका स्थानांतरण न होकर वह अपनी मूल जगह पर ही स्थित है। लेकिन कोलवा में स्थित श्री महालक्ष्मी का मंदिर जिसे अक्सर मूल मंदिर समझा जाता है, वास्तव में बांदोड़ा के मूल मंदिर का ही सहायक भाग है। यह मंदिर कोलवा के लोगों द्वारा ही बनवाया गया था, क्योंकि, कोलवा से नदी पार करके बांदोड़ा आना वहां के लोगों के लिए काफी मुश्किल था।

श्री नागेशी महारूद्र देवस्थान, बांदोड़ा

श्री नागेश महारुद्र देवस्थान या नागेशी मंदिर - गोवा
श्री नागेश महारुद्र देवस्थान या नागेशी मंदिर – गोवा

बांदोड़ा गाँव में स्थित नागेशी महारूद्र मंदिर जिसे अक्सर नागेशी मंदिर के नाम से जाना जाता है, श्री महालक्ष्मी मंदिर के नजदीक ही स्थित है।

इस मंदिर के ठीक सामने ही देवस्थान का सुंदर सा सरोवर है, जिसमें आप मंदिर का खूबसूरत सा अप्रतिम प्रतिबिंब देख सकते हैं। यही इस मंदिर की प्रमुख विशेषता है, वरना इसकी सादगी ही इसका मुख्य आकर्षण है। इस मंदिर की एक और विशेष बात यह है कि यहां पर लकड़ी का एक बड़ा सा तख़्ता है, जिस पर हिन्दू महाकाव्यों की महत्वपूर्ण कथाएँ दर्शायी गयी हैं और उन्हें उज्जवलित रंगों से उत्कीर्णित किया गया है।

अष्ट दिगपाल - नागेशी मंदिर के दीपस्तंभ पर अंकित
अष्ट दिगपाल – नागेशी मंदिर के दीपस्तंभ पर अंकित

मंदिर के सामने ही एक दीपस्तंभ है, जिस पर 8 दिशाओं के 8 संरक्षक देवताओं को उत्कीर्णित किया गया है। जैसा कि आप मोधेरा के सूर्य मंदिर में भी देख सकते हैं।

इस मंदिर की छत के कोनों पर मयूर (मोर) की प्रतिमाएँ बनाई गयी हैं। तथा यहां के भोजनालय को भी मयूरशाला कहा जाता है। इस संदर्भ में एक बात तो मैं नहीं जान पायी कि, शिव भगवान के महारूद्र अवतार से मयूर का क्या संबंध है, क्योंकि, मयूर समान्य तौर पर उनके पुत्र कार्तिकेय या फिर विष्णु के कृष्ण अवतार जुड़ा हुआ है।

नागेशी मंदिर की एक और विशिष्ट बात यह है कि, वह पश्चिम की ओर मुख किए हुए है जो कुछ असामान्य सा लगता है। जबकि मंदिर आम तौर पर पूर्व की ओर मुख किए होते हैं और कुछ शिव मंदिर तो दक्षिण की ओर भी मुख किए हुए हैं।

नागनाथ

इस मंदिर में 1300 इसवी सदी का एक ताम्रलेख है, जो बताता है कि, यह नागों का मंदिर है। अगर इस बात को ध्यान में रखते हुए मंदिर के आस-पास के वातावरण को देखा जाए तो यह जगह वास्तव में बहुत सारे सापों का घर हो सकता है। लोककथाओं के अनुसार भी कहा जाता है कि, नागेशी मंदिर के सरोवर में भी साँप निवास करते हैं। लेकिन जहां तक मुझे याद है, उस सरोवर में छोटी-बड़ी मछलियों के अलावा मुझे कोई भी साँप नहीं दिखा था।

माना जाता है कि यह मंदिर स्वयंभू है, अर्थात वह जो अपने-आप ही निर्मित हुआ है, ना कि मनुष्यों द्वारा निर्मित किया गया है।

श्री महालक्ष्मी मंदिर की तरह यह मंदिर भी अपने मूलस्थान पर ही बसा हुआ है। यानि यह मंदिर भी स्थानांतरित नहीं है। इसका अर्थ यह है कि, फोंडा क्षेत्र पुर्तुगालियों के अत्याचारों से सर्वथा अछूता ही रहा, क्योंकि, यह क्षेत्र उनके शासन के अधीन कभी नहीं आया था।

श्री महालसा नारायणी मंदिर, मारदोल

श्री महालसा नारायणी देवस्थान - मर्दोल, गोवा
श्री महालसा नारायणी देवस्थान – मर्दोल, गोवा

महालसा मंदिर फोंडा क्षेत्र या गोवा का सबसे सुंदर और मंत्रमुग्ध कर देनेवाला मंदिर है। नीले रंग से सुशोभित इस मंदिर का आकार-प्रकार अद्वितीय है और उसके शिखर पर पीतल का चमचमाता हुआ गुबंद है। इस मंदिर का आंतरिक भाग लकड़ी का बनाया हुआ है, जिसे बहुत अच्छी तरह से संरक्षित किया गया है। मंदिर में प्रवेश करते ही आपको चारों ओर बड़े-बड़े उत्कीर्णित स्तंभ नज़र आते हैं। इस मंदिर के महाकक्ष में भक्तों को बैठने के लिए लकड़ी का तख़्ता बनवाया गया है। मंदिर की छत के आंतरिक भाग पर नाजुक नक्काशी काम देखा जा सकता है, जो विविध प्राणियों और पक्षियों को दर्शाता है। मंदिर के बाहरी दीवारों पर लकड़ी की सुंदर कारीगरी देखि जा सकती है।

अगर आप गोवा के प्राचीन मंदिरों की वास्तुकला को देखना चाहते हैं तो आपको महालसा मंदिर जरूर देखना चाहिए, जो गोवा की प्राचीन वास्तुकला का जीवंत उदाहरण है।

महालसा

श्री महालसा नारायणी मंदिर में काष्ठ का काम
श्री महालसा नारायणी मंदिर में काष्ठ का काम

महालसा भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार का नाम है। मोहिनी यानि अपने रूप से सामनेवाले को मोहित करनेवाली नारी। उनका यह अवतार समुद्र मंथन की कथा से संबंधित है, जब विष्णु ने असुरों का ध्यान विकेंद्रित करने के लिए मोहिनी का रूप धारण किया था। तो कुछ लोककथाओं के अनुसार यह भी माना जाता है कि, देवी पार्वती ने मोहिनी का रूप धारण किया था, अर्थात महालसा भी देवी पार्वती का ही अवतार है। लेकिन मारदोल में महालसा देवी को भगवान विष्णु के अवतार के रूप में ही पूजा जाता है। और शायद इसीलिए महालसा के साथ नारायणी शब्द भी जोड़ा जाता है।

मारदोल मंदिर की महालसा देवी की अनोखी बात यह है कि, उन्होंने यज्ञोपवित्र धागा यानि पवित्र धागा पहना हुआ है जो सामान्य तौर पर पुरुषों द्वारा ही पहना जाता है।

महालसा मंदिर मूलतः आज के वेर्णा गाँव में स्थित था, जो उस समय वरुणापुर के नाम से जाना जाता था। यह मंदिर 16 वी शताब्दी में मारदोल में स्थानांतरित किया गया था, यानि यह मंदिर भी लगभग 450 साल पुराना है।

इस मंदिर की वैबसाइट आपको मोहिनी या महालसा से जुड़े सारे मंदिरों की जानकारी देती है। जैसे कि नेपाल में पशुपतिनाथ मंदिर के पास बसा हुआ मंदिर या फिर महाराष्ट्र का मंदिर।

श्री मंगेशी मंदिर, प्रियोल (प्रियोळ)

श्री मंगेशी देवस्थान - गोवा
श्री मंगेशी देवस्थान – गोवा

शांतादुर्गा मंदिर के साथ ही मंगेशी मंदिर भी गोवा का महत्वपूर्ण और बहुत ही प्रसिद्ध मंदिर है। गोवा पर्यटन के द्वारा यह मंदिर गोवा के सभी मंदिरों के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। मंगेशी का यह नीले रंग का मंदिर गोवा पर्यटन के सभी पत्रकों पर देखा जा सकता है।

मंगेशी भगवान शिव का मंदिर है। यह मूलतः कोरताली में जुआरी नदी के किनारे पर स्थित था। उस समय कोरताली को खुशास्थली और जुआरी नदी को अगाशी के नाम से जाना जाता था। पुर्तुगाली काल के दौरान पुर्तुगालियों द्वारा हो रहे नाश से त्रस्त होकर यह मंदिर कोरताली से प्रियोल गाँव में स्थानांतरित किया गया। मंगेशी मंदिर के मूल स्थान पर अब एक नया मंदिर बनवाया गया है। लेकिन इसके सभी विधि-कार्य आज भी प्रियोल गाँव के मंदिर (स्थानांतरित मंदिर) में ही किए जाते हैं, जो फोंडा के पास है। यहां पर यह मंदिर पिछले 400 सालों से भी अधिक काल से बसा हुआ है।

श्री देवकी कृष्ण मंदिर, मार्सेल

श्री देवकी कृष्णा मंदिर - गोवा
श्री देवकी कृष्णा मंदिर – गोवा

मार्सेल या मार्शेल, जिसे पहले महाशैला के नाम से भी जाना जाता था, गाँव में बसा हुआ देवकी कृष्ण मंदिर बहुत ही अप्रतिम और सुंदर है। यह मंदिर मातृत्व की भावना का प्रतीक है, जहां देवकी माँ अपने पुत्र कृष्ण को अपनी बाहों में लिए हुए है।

यह मंदिर मूलतः शराव द्वीप पर बसा हुआ था, जिसे पहले चूडामणी के नाम से जाना जाता था। उपाख्यान के अनुसार कहा जाता है कि, जब वास्को द गामा पहली बार इस मंदिर में आए थे, तब देवकी माँ और कृष्ण की प्रतिमा को मदर मेरी समझकर उन्होंने उनके सामने घुटने टेक दिये थे। लेकिन जब उन्हें सच्चाई का पता चला तो वे बहुत गुस्सा हुए।

इस मंदिर की वैबसाइट के अनुसार देवकीकृष्ण शराव द्वीप के प्रमुख देवता थे। इस देवता का आह्वान करने के पश्चात ही यहां पर शिग्मोत्सव का प्रारंभ होता था।

यह मंदिर पहले शराव से मये, जो बीचोली के पास ही स्थित है, में स्थानांतरित किया गया था। इसके बाद वह मंदिर अपने वर्तमान स्थान यानि मार्शेल में स्थानांतरित किया गया। मार्शेल में यह मंदिर 1842 में स्थापित किया गया था।

श्री रावल्नाथ मंदिर - गोवा
श्री रावल्नाथ मंदिर – गोवा

श्री देवकीकृष्ण मंदिर की बाईं ओर ही रवलनाथ मंदिर है और इन दोनों मंदिरों को देवकीकृष्ण रवलनाथ मंदिर के नाम से जाना जाता है। रवलनाथ शिव जी का ही मंदिर है। और मेरे शोध के अनुसार रवलनाथ भैरव का रूप है और भैरव यानि शिव जी का उग्र स्वरूप।

गोवा के अधिकतम मंदिर शिव-शाक्त संप्रदाय के हैं, इसलिए देवकीकृष्ण मंदिर के इतिहास के बारे में जानने के लिए मैं काफी उत्सुक थी। मुझे लगता है कि यह मंदिर भक्ति काल के समय ही स्थापित किया गया था, जो मध्यकाल के दौरान अपने चरमोत्कर्ष पर था। इस काल के कवियों ने भक्ति काव्यों के द्वारा हिन्दू धर्म को जीवंत रखने का प्रयास किया था।

देवकीकृष्ण मंदिर से जुड़े उपाख्यान

देवकीकृष्ण मंदिर की कथा आपको महाभारत काल में ले जाती है। कहा जाता है कि जब कृष्ण और बलराम गोमांचल पर्वत पर जरासंध के साथ युद्ध कर रहे थे, तब व्याकुल देवकी माँ अपने पुत्र को देखने के लिए गोमांचल पर्वत तक चली गयी थी। लेकिन क्योंकि देवकी माँ कृष्ण को एक बच्चे के रूप में जानती थी तो वे कृष्ण को नहीं पहचान पायी। इसी कारण कृष्ण ने उनके लिए फिर से बच्चे का रूप धारण किया और देवकी माँ ने उन्हें अपनी गोद में उठा लिया। तब से यहां पर उनकी आराधना इसी रूप में की जाती है।

इस मंदिर की वैबसाइट पर उसका पूरा इतिहास उपलब्ध है तथा गोवा के सारस्वत ब्राह्मणों की भी जानकारी मिलती है।गोवा के इन मंदिरों के भीतर तस्वीरें खिचने की अनुमति नहीं है। यद्यपि कुछ मंदिरों में मुझे अपने ब्लॉग के लिए तस्वीरें खींचने की अनुमति अवश्य दी। तो कुछ मंदिरों में मुझे बाहर से ही तस्वीरें लेने के लिए कहा।

गोवा के मंदिरों की किसी वैबसाइट पर पढ़ी गयी यह पंक्ति गोवा के सारस्वत मंदिरों की संक्षिप्त जानकारी देती है –

“श्री मंगेश का स्तम्भ”, “श्री शांतादुर्गा का गुबन्द”, “श्री नागेश का सरोवर”, “श्री महालक्ष्मी का चौक”, “श्री महालसा का स्थल”, और “श्री कामाक्षी के गण”, जो गोवा के कुछ महत्वपूर्ण मंदिरों की विशेषताओं को स्पष्ट करती है।

गोवा के मंदिर-दर्शन लेने के लिए कुछ सुझाव

• अपने पहनावे पर ध्यान दीजिये।
• मंदिर में प्रवेश करने से पहले अपनी चप्पल उतारना मत भूलिए।
• इस ब्लॉग में उल्लिखित मंदिरों की यात्रा करने के लिए आपको लगभाग 4-5 घंटे लगते हैं। लेकिन अगर इन मंदिरों में कोई उत्सव हो तो थोड़ा और समय लग सकता है।
• गोवा के अधिकतम मंदिरों में भोजनालय होते हैं, जहां पर आप सादा शुद्ध शाकाहारी खाना खा सकते हैं और उनका मूल्य भी वाजिब होता है।

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बोधगया – जहाँ बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई https://inditales.com/hindi/bodhgaya-bihar-buddha-enlightenment/ https://inditales.com/hindi/bodhgaya-bihar-buddha-enlightenment/#comments Wed, 12 Apr 2017 02:30:46 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=209

बोधगया – बौद्धों का पूजनीय स्थल अंतरराष्ट्रीय पर्यटन की नज़र से देखे तो बोधगया बिहार का सबसे सुप्रसिद्ध स्थान है। बिहार में यह इकलौती ऐसी जगह है जो विश्व धरोहर के दो स्थलों में से एक है। बौद्धों के लिए यह जगह बहुत ही पूजनीय है क्योंकि, इसी स्थान पर बोधि वृक्ष के नीचे बुद्ध […]

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महाबोधि मंदिर - बोधगया
महाबोधि मंदिर – बोधगया

बोधगया – बौद्धों का पूजनीय स्थल

अंतरराष्ट्रीय पर्यटन की नज़र से देखे तो बोधगया बिहार का सबसे सुप्रसिद्ध स्थान है। बिहार में यह इकलौती ऐसी जगह है जो विश्व धरोहर के दो स्थलों में से एक है। बौद्धों के लिए यह जगह बहुत ही पूजनीय है क्योंकि, इसी स्थान पर बोधि वृक्ष के नीचे बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। यह बात 6 वीं शताब्दी की है, जिसके चलते आज भी अर्थात लगभग 2700 सालों से इस जगह को एक पूजनीय स्थान के रुप में देखा जाता है। बोधगया महाबोधि मंदिर के पास इर्द गिर्द बसा हुआ है। यहां के बौद्ध समुदाय, मूल रूप से विविध बौद्ध देशों से हैं, जो यहां पर आकर बस गए हैं। जिसके प्रभाव स्वरूप, बोधगया शहर में आपको अंतरराष्ट्रीयता की झलक मिलती है, जिसकी तुलना में बाकी का राज्य ठेठ देहाती है।

महाबोधि मंदिर – विश्व धरोहर का स्थल

महाबोधि मंदिर बोधगया का सबसे ऊंचा मंदिर है, जिसे आप शहर के किसी भी कोने से देख सकते हैं। इस ऊंची संरचना के चारों ओर बहुत सारी छोटी-छोटी संरचनाएँ भी हैं। जैसे ही आप मंदिर के परिसर में प्रवेश करते हैं, आपको वहां पर किताबों की दुकान और ऐसी ही बहुत सारी और दुकाने दिखेंगी जो विविध प्रकरा की कलाकृतियाँ बेचती हुई नज़र आती हैं। मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार से जाते समय आपको सेक्यूरिटी स्कैनर से होकर गुजरना पड़ता है और जैसे ही आप यहां से आगे बढ़ते हैं, आपके सामने महाबोधि मंदिर की भव्य और सुंदर संरचना खड़ी होती है। इस मंदिर की शिखर भूरे रंग की है तथा उसके आस-पास की अन्य छोटी-छोटी संरचनाओं की शिखरें गुलाबी और सुनहरे पीले रंग की हैं। यहां के मुख्य मंदिर में प्रवेश करते ही बुद्ध की शांत मुद्रा मूर्ति आपका स्वागत करती है। इस मूर्ति के ठीक ऊपर एक खास प्रकार की लकड़ी का टुकड़ा है जिसे बड़ी सुंदरता से उत्कीर्णित किया गया है। महाबोधि मंदिर की ऊपरी मंज़िल अब बंद ही रहती है, लेकिन कुछ सालों पहले तक आगंतुकों को यहां पर जाने की अनुमति दी जाती थी।

महाबोधि मंदिर के स्तूप

बोधगया के स्तूप
बोधगया के स्तूप

यहां के मुख्य मंदिर के बाहर आपको विविध आकार-प्रकार के हजारों स्तूप दिखेंगे जो पत्थर से बने हैं। वहां के लोगों से इन स्तूपों के बारे में पूछने पर हमे बताया गया कि, ये स्तूप उन लोगों द्वारा बनवाए गए हैं जो अपनी मन्नत पूरी होने के बाद वापस महाबोधि मंदिर में दर्शन करने आते हैं। लेकिन मुझे ऐसा लगता है, जैसे इनमें से कुछ स्तूप इसी स्थान से खोद कर निकले गए होंगे और उन्हें लगभग उसी स्थान पर खड़ा किया गया होगा। उन्हें देखकर लगता है जैसे वे बहुत प्राचीन हैं। प्रत्येक स्तूप के चारों ओर प्लास्टिक के सैकड़ों छोटे-छोटे कप हैं, जो पानी से भरे हुए हैं और प्रत्येक कप के पानी में तैरता हुआ एक गेंदे का फूल है। इस मंदिर की दीवारें बुद्ध तथा बोधिसत्वों की छोटी-छोटी मूर्तियों से सुसज्जित हैं। जिनमें से बुद्ध की अधिकतर मूर्तियाँ भूमि स्पर्श की मुद्रा में हैं, जिस मुद्रा में बुद्ध ज्ञान प्राप्ति के समय बैठे थे। इस मंदिर के परिसर में ऐसे बहुत से स्थल हैं, जो बुद्ध की ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया से जुड़े हुए हैं।

आज इस मंदिर के चारों ओर सुरक्षा के लिए जो जंगले लगाए हैं, वे अपने मूल स्वरूप की उतनी अच्छी प्रतिकृति नहीं है। इनका मूल स्वरूप यहां के स्थानीय संग्रहालय अनुरक्षित किया गया है। महाबोधि मंदिर रात के समय लेजर लाइट से जगमगा उठता है, जिससे उसकी सुंदरता में और भी निखार आता है।

महाबोधि वृक्ष – बोधगया

बोधि वृक्ष - बोधगया
बोधि वृक्ष – बोधगया

महाबोधि मंदिर के ठीक पीछे, यानि मंदिर के पृष्ठ भाग की दीवार के पास बोधि वृक्ष है, जिसके नीचे बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। लेकिन आज यहां पर जो वृक्ष मौजूद है वह अपने मूल वृक्ष की पाँचवी पीढ़ी है, जिसे श्रीलंका में स्थित अनुराधापुर से वापस बोधगया लाया गया था। इसी वृक्ष के पास वज्रासन का स्थान है, जहां पर बुद्ध ध्यान संलग्न बैठे थे। इस वृक्ष के आस-पास के परिसर में बैठकर आप आराम से यहां के वातावरण का आनंद उठा सकते हैं। यहां पर भगवान के दर्शन करने आए भक्त बड़ी श्रद्धा से इस पेड़ की पुजा-अर्चना करते हुए दिखाई देते हैं। भगवान की भक्ति में उनकी लीनता देखकर उनकी श्रद्धा की पवित्रता को महसूस किया जा सकता है।

वज्रासन का स्थान

बोधगया स्तिथ अशोक स्तम्भ
बोधगया स्तिथ अशोक स्तम्भ

बोधि के वृक्ष के नीचे स्थित वज्रासन के स्थान को बहुत ही अच्छे तरीके से संरक्षित किया गया है। उसकी सुरक्षा हेतु उसे पर्दों से आवृत्त किया गया है, जिसके कारण उसकी एक पूरी झलक पाना थोड़ा मुश्किल है। इसके अलावा यह स्थान मंदिर की दीवार और बोधि के वृक्ष के बीच स्थित है, जिसकी वजह से आपके दृश्य में और भी बाधा आती है। यह वृक्ष मंदिर की दीवार से इतना सटकर खड़ा है कि इसका विचार करना भी चिंताजकन सा लगता है। एक तरफ जहां यह वृक्ष मंदिर की दीवार से घिरा हुआ है, वहीं उसके दूसरी तरफ सुरक्षा के पर्दे लगे हुए हैं। न जाने इस तंग से वातावरण में यह वृक्ष कैसे सांस लेता होगा।

महाबोधि मंदिर के चारों ओर लगे जंगलों के पास याक के मक्खन से बनी बहुत सारी विविध प्रकार की चित्रकारी देखी जा सकती है। इन्हें देखकर मुझे लगा कि, काश मैं इन्हें बनाते हुए देख पाती। इस मंदिर के परिसर में बोधि वृक्ष के पास, मंदिर की सीढ़ियों पर और हर जगह श्रद्धा में लीन भक्त नज़र आते हैं। कुछ हाथों में माला लिए मंत्रों का उच्चारण करते हैं, कुछ भजन गीत गाते हैं, तो कुछ ध्यान में लीन होते हैं, और कुछ पांडुलिपियों को पढ़ते हुए नज़र आते हैं।

बोधगया से संबंधित उपाख्यान

चक्रमण - बोधगया
चक्रमण – बोधगया

महाबोधि मंदिर में प्रवेश करते समय दांई ओर अनिमेष लोचन चैत्य है, जहां पर ज्ञान प्राप्ति के बाद बुद्ध ने दूसरा सप्ताह गुजारा था। इस जगह पर खड़े होकर बुद्ध पूरे एक सप्ताह, बिना पलक झपकाए एकटक बोधि के वृक्ष को निहारते रहे थे। इस प्रकार से वे उस वृक्ष के प्रति, उन्हें छत्र-छाया और ज्ञान प्रदान करने के लिए अपना आभार व्यक्त कर रहे थे।

मंदिर की सीढ़ियों से उतरकर जब आप नीचे आते हैं, तो सबसे पहले आपको अजपाल निग्रोध का वृक्ष मिलता है, जहां पर बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद पांचवा सप्ताह गुजारा था। माना जाता है कि इसी जगह पर उन्होंने कहा था कि मनुष्य अपने कर्मों से ब्राह्मण होता है, अपने जन्म से नहीं।

मंदिर की दांयी दीवार के पास ही चक्रमण है जहां पर बुद्ध के पैर पड़ते ही कमल का फूल उग आया था। इसका प्रतीक स्वरूप आज यहां पर कमल का शिल्पनिर्मित फूल स्थापित किया गया है। इस जगह पर भक्त बहुत सारे फूल अर्पित कर अपनी पुजा करते हैं।

मुचलिंद सरोवर वह जगह है, जहां पर ज्ञान प्राप्ति के उपरांत बुद्ध ने छठा सप्ताह गुजारा था। इस दौरान यहां पर एक बड़ा तूफान आया था, जिससे उनकी रक्षा एक साँप ने की थी। इस सरोवर और मंदिर के बीच में 20 फुट की ऊंचाई का एक अध-टूटा अशोका स्तंभ है जिस पर कोई भी अभिलेख या उत्कीर्णन नहीं मिलते। माना जाता है कि अगर आप इस स्तंभ के ऊपर सिक्का फेकने में सफल हुए तो आपकी मनोकामना पूरी होती है। मुझे नहीं पता कि यहां पर मनोकामनाएँ सच में पूरी होती हैं या नहीं, पर स्तंभ के उपर सिक्का फेकने की कोशिश करते समय हमे मजा बहुत आया। मेरा सिक्का सिर्फ एक बार ही ऊपर स्पर्श करके वापस नीचे गिरा। मुझे इसका दुख तो नहीं था लेकिन मेरे अभिलाषी विचारों के अनुसार इसका अर्थ यही था कि, एक इच्छा (बोधगया देखना) तो पूरी हो गयी अब दूसरी इच्छा पूरी करने की कोशिश करो।

ध्यान उपवन

महाबोधि मंदिर के पास एक ध्यान उपवन बनवाया गया है, जहां पर छोटा सा शुल्क देने के बाद भक्त गण आराम से जाकर ध्यान करने बैठ सकते हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि यहां पर दिन की अपेक्षा रात के समय अधिक लोग ध्यान करते हुए दिखाई देते हैं। इस उपवन में एक विशाल घंटी उत्कीर्णित है, जिसे अच्छे रूपाकार की लकड़ी के तख्ते से जोड़ा गया है। यह इस उपवन की सबसे आकर्षक वस्तु है। यहां पर फव्वारे और झरोखे भी हैं जो इस उपवन की सुंदरता को और भी बढ़ाते हैं। अगर इस उपवन में ध्यान करने के लिए अनेवाले लोगों की संख्या देखे, तो उसके हिसाब से इस उपवन की बहुत ही अच्छी तरह से देख-रेख की गयी है। इतने सारे लोगों के आते-जाते रहने के बावजूद भी जिस प्रकार से इस परिसर का ध्यान रखा गया है, वह सच में बहुत सराहनीय है। यहां का शांति भरा वातावरण हमेशा ध्यान प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित करता है।

ध्यान मुद्रा में बैठे बुद्ध की विराट मूर्ति – बोधगया

ध्यान मुद्रा में विशाल बुद्ध प्रतिमा
ध्यान मुद्रा में विशाल बुद्ध प्रतिमा

बुद्ध की ध्यान मुद्रा में बैठी हुई 80 फीट ऊंचाई की विराट मूर्ति, जो जापानी संघठन डाइजोक्यो द्वरा कुछ सालों पहले बनवाई थी, बोधगया की सबसे सुंदर मूर्ति है। यह मूर्ति प्रसिद्ध मूर्तिकार गनपथी स्तापथी जी द्वारा बनाई गयी है। इस मूर्ति को गुलाबी रंग के भुरभुरे पत्थरों के खंडों को जोड़कर बनवाया गया है, तथा जिस कमल के फूल पर बुद्ध बैठे है उसे पीले रंग के पत्थरों से बनवाया गया है। इस कमल की ऊंचाई 6 फीट की है। इस मूर्ति के तीनों तरफ बुद्ध के 10 सुप्रसिद्ध शिष्यों की मूर्तियाँ हैं, जो विविध योगिक मुद्राओं में खड़ी हैं। बुद्ध की यह विराट मूर्ति आपको अभिभूत कर देती है।

बोधगया के विहार

बोधगया के नए बौद्ध विहार
बोधगया के नए बौद्ध विहार

विश्व के विविध बौद्ध देश, जैसे श्रीलंका, बर्मा, तिब्बत, वियतनाम, भूटान, जापान, थायलैंड और चीन में बौद्धों के मंदिर या विहार हैं, जो अपने देश की वास्तुकला की विशेषताओं को दर्शाते हैं। भारत में भी बौद्धों का नया-नया विशाल विहार बनवाया गया है, जो करमपा का निवास स्थान है। तथा भारत में दलाई लामा का भी ऐसा ही विशाल विहार है। करमपा के निवास स्थान की दीवारों पर आपको बहुत ही सुंदर चित्र देखने को मिलते हैं। इस विहार के एक-दूसरे में घुलनेवाले रंग इस जगह को निर्मलता के साथ जीवंत कर देते हैं। यहां के अधिकतर विहार बड़ी सुंदरता से बनवाए गए हैं, जिनकी बाहरी दीवारें रंगीन और उज्ज्वल दिखाई देती हैं, तो उनके आंतरिक भाग सुसंपन्न चित्रों से भरे नज़र आते हैं। ये चित्र बुद्ध के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं को दर्शाते हैं, या फिर विविध देशों में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार की यात्राओं की कहानियों का बखान करते हैं। काश मेरे पास थोड़ा और समय होता, तो मैं आराम से इन कथाओं को अच्छी तरह से जान पाती।

यहां का थाई विहार अक्सर नौलखा नाम से जाना जाता है क्योंकि, इसे बनवाने में 9 लाख का खर्च आया था। यह विहार काफी दिलचस्प और आकर्षक भी है, जिसकी दीवारों पर और खिडिकियों पर बड़े ही सुंदर चित्र बनवाए गए हैं। यहां के सारे मंदिरों और विहारों की बहुत ही अच्छी तरह से देख-रेख होती है, बावजूद इसके कि, यहां पर आगंतुकों की बहुत भीड़ रहती है। यहां की एक और विशेषता है, यहां के पेड़-पौधे, जिन्हें उनकी मूल जगह से लाकर इन विहारों में लगवाया गया है। ये पौधे यहां पर अच्छी तरह से फूलते-फलते भी हैं, तथा उनकी अच्छे से देखभाल भी की जाती है।

सुजातागढ़ – बोधगया

सुजाता के बुद्ध को खीर दीना - सुजातागढ़, बोधगया
सुजाता के बुद्ध को खीर दीना – सुजातागढ़, बोधगया

बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति होने के बाद जिस जगह पर सुजाता ने उन्हें खीर खिलाई थी उसी जगह पर एक स्तूप बनवाया गया है जिसे सुजातागढ़ कहा जाता है। यह स्तूप किसी टीले की भांति लागता है जो छोटे-छोटे ईटों को जोड़कर बनवाया गया है। उसका आकार भी बड़ा ही लुभावना है, जो पूर्ण रूप से गोलाकार नहीं है। अगर आप ध्यान से देखेंगे तो आपको इस स्तूप पर गिरते हुए चूने के निशान नज़र आएंगे, जो उसकी सुंदरता को भंग करता है। यह स्तूप गुप्त काल से लेकर पाल काल तक निर्माण की अनेकों अवस्थाओं से गुजर चुका है। उत्खनन की इस जगह पर पायी गयी बहुत सी प्राचीन वस्तुएं आज भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ए.एस.आय.) के संग्रहालय में प्रदर्शन के लिए रखी गयी हैं। यह स्तूप एक भरे-पूरे गाँव के बीचो-बीच स्थित है, जो आज वहां के लोगों के दैनिक जीवन का भाग बन गया है। लेकिन फिर भी इसके चारों ओर खड़ी दीवारें इसे संरक्षित करते हुए, गाँव से अलग करती हैं।

बोधगया का बाज़ार

बोधगया का बाज़ार भारत के किसी भी अन्य तीर्थ स्थल की भांति, छोटे-छोटे विक्रेताओं से भरा रहता है। ये दुकानदार मंदिर में अर्पित करने की वस्तुएं बेचते हैं, जैसे कि रंगीत चुनरी, मोमबत्तियाँ, दीपक आदि। इसके अलावा ये लोग हस्तकला की वस्तुएं, पीतल की कलाकृतियाँ, जो अधिकतर नेपाल में बनवायी जाती हैं, जैसे कि बुद्ध की मूर्तियाँ और ऐसी ही अनेकों वस्तुएं बेचते हैं। यहां पर तरह-तरह के गहने, बैग, स्वदेशी कपड़ों से बनाए गए विदेशी पहनावे और पवित्र धागे तथा अन्य कलाकृतियाँ भी बेची जाती हैं। यहां पर एक पत्थर का कारीगर भी है जो पत्थरों से विविध आकृतियाँ बनाता है। यहां की एक दुकान पर हमे स्थानीय तरीके से बुने हुए सूती कपड़े दिखे, जो उस दुकानदार के अनुसार वहां का बहुत ही प्रसिद्ध कपड़ा है। इन दुकानों के अलावा आपको यहां पर हर जगह लाल वस्त्र पहने हुए साधु-संत घूमते हुए नज़र आते हैं।

बाज़ार के भोजनालय

यहां के भोजनालयों में आपको सिर्फ अंतरराष्ट्रीय व्यंजन ही मिलते हैं। ये भोजनालय ज़्यादातर भक्तों के लिए या यात्रियों के लिए हैं। बोधगया में अच्छा खाना मिलना थोड़ा मुश्किल है क्योंकि यहां पर स्थानीय व्यंजनों से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय व्यंजन अधिक होते हैं। लेकिन अगर यहां पर साफ-सुथरे तरीके से सादे और अच्छे स्थानीय व्यंजन परोसनेवाले भोजनालय शुरू किए गए तो निश्चित ही उनके लिए बहुत माँग होगी।

कार्यक्रम

बोधगया को प्रज्वल्लित करते दीये
बोधगया को प्रज्वल्लित करते दीये

यहां पर बहुत सारी संस्थाएं हैं जो विविध कार्यक्रमों का आयोजन करती हैं जिनमें आप भी भाग ले सकते हैं। जब हम वहां पर थे, उस समय अनुराधापुर से बुद्ध के अवशेष यहां पर सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए लाये गए थे। अगर आप यहां पर थोड़े लंबे समय के लिए ठहरे हैं, तो आप यहां पर आयोजित ध्यान संबंधित कार्यक्रमों में, तथा यहां के कर्मकांडवादी समारोहों में भी भाग ले सकते हैं।

यहां की सड़कों पर पर्यटक बसों के अलावा आपको ज्यादा गाडियाँ नहीं दिखती, जिसके कारण आप यहां पर आराम से पैदल ही घूम सकते हैं और यहां के लोगों के साथ घुल-मिल भी सकते हैं। हमने यहां बहुत सारे विध्यार्थियों को अपनी पाठशाला की पोशाख में ही अनेक विहारों में जाते हुए देखा। रात के समय आप यहां पर छोटी-छोटी मोमबत्तियाँ जला सकते हैं, जिसके लिए आपको छोटा सा शुल्क भरना पड़ता है। ये सारी मोमबत्तियाँ जब एक साथ जलती हुई दिखाई देती हैं तो बहुत सुंदर दिखती हैं।

इस जगह के प्रमुख अधिकारी यहां के सरोवर के पास एक विशाल सा उपवन बनवा रहे हैं, जिसमें जरूरत के हिसाब से एक थिएटर बनवाया जा रहा है, जो खुले में होगा। और पास ही स्थित सरोवर में बोटिंग की सुविधाएं भी होगी।

बोधगया में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का संग्रहालय

बोधगया के नए सुसज्जित मंदिर
बोधगया के नए सुसज्जित मंदिर

यह संग्रहालय भले ही छोटा हो पर इसमें पत्थर की मूर्तियों का सुंदर संकलन है। लेकिन दुर्भाग्य वश यहां पर तस्वीरें खिचने की अनुमति नहीं है। जब हम वहां गए थे, तब यह संग्रहालय सुधारणिकरण और नवीकरण से गुजर रहा था। यहां पर एक मल्टी-मीडिया संग्रहालय भी है, जिसमें आराम से बैठकर आप इस जगह के इतिहास पर बनाया गया सुंदर सा मल्टी-मीडिया प्रस्तुतीकरण देख सकते हैं। इसके जरिये आप यहां की प्राचीन तस्वीरें देख सकते हैं, इस जगह से जुड़ी सच्ची कहानियाँ सुन सकते हैं और अगर आपके पास समय है और आपको इस प्रकार की चीजों में रुचि है तो आप यहां के तर्कशास्त्र में पूरी तरह से डूबकर उसको समझ भी सकते हैं।

बोधगया शहर, जहां पर बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी, की सारी वस्तुओं पे बुद्ध की छाप जरूर दिखाई देती है। यह ऐसे जगह है, जिसे देखने से ज्यादा महसूस करना ज्यादा जरूरी है, तभी आप उससे पूरी तरह जुड़ सकते हैं।

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अयोध्या – राम और रामायण की नगरी एक यात्रा परिदार्शिका https://inditales.com/hindi/ayodhya-yatra-ram-ramayan-city/ https://inditales.com/hindi/ayodhya-yatra-ram-ramayan-city/#comments Wed, 15 Feb 2017 02:30:42 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=145

अयोध्या नगरी की यात्रा करने की अभिलाषा मुझे कई वर्षों से थी। जहाँ भगवान् राम का जन्म हुआ, जहाँ महाकाव्य रामायण की शुरुवात हुई और जहाँ रामायण का समापन भी हुआ। जिसके बारे में भारत वर्ष में पैदा हुआ बच्चा बच्चा जानता है, भले ही उसे उस नगरी के यथार्थ भौगोलिक स्थिति का ज्ञान तक […]

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अयोध्या नगरी की यात्रा करने की अभिलाषा मुझे कई वर्षों से थी। जहाँ भगवान् राम का जन्म हुआ, जहाँ महाकाव्य रामायण की शुरुवात हुई और जहाँ रामायण का समापन भी हुआ। जिसके बारे में भारत वर्ष में पैदा हुआ बच्चा बच्चा जानता है, भले ही उसे उस नगरी के यथार्थ भौगोलिक स्थिति का ज्ञान तक ना हो। मैंने जबसे यात्रायें करनीं आरम्भ कीं हैं, तब से मैं अयोध्या पर लिखी गई यात्राविवरण अथवा संस्मरण की तलाश कर रही थी, परन्तु मुझे कुछ मिला नहीं। जो कुछ मिला वह अयोध्या नगरी के बारे में ना हो कर राम जन्मभूमि को लेकर चल रहे विवादों के बारे में था।

अयोध्या नगरी

अयोध्या नगरी हिन्दुओं के सात पवित्र नगरों, सप्तपुरी, में से एक है। इसलिए यह हिन्दुओं का तीर्थस्थान है। यह एक दर्शनीय स्थल है। पर आधुनिक काल में, इन सातों पवित्र स्थानों में से अयोध्या नगरी के दर्शन करने सबसे कम दर्शनार्थी पहुंचाते हैं। पिछले अक्टूबर में मैंने जब यात्रा की, तब वहां बहुत ही कम पर्यटक और दर्शनार्थी मौजूद थे। इसके अनेक कारण हो सकते हैं। उनमें से मुख्य है मूलभूत सुविधाओं की कमी। परन्तु लखनऊ से कुछ ही घंटों की दूरी पर स्थित होने के कारण इनकी कमी ज्यादा खलती नहीं।

सप्तपुरी अर्थात भारत के सात पवित्र शहर इस प्रकार हैं – अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, कांचीपुरम, उज्जैन और द्वारिका।

अयोध्या नगरी के दर्शनीय स्थल

मुख्य दर्शनीय स्थल कुछ इस प्रकार हैं –

अयोध्या नगरी के मंदिर

मंदिरों का शहर है। कुल कितने मंदिर हैं अयोध्या में, यह कहना तो असंभव है, पर चलिए इनमें से कुछ मुख्य मंदिरों से आपका साक्षात्कार कराती हूँ।

राम जन्मभूमि मंदिर

सीता राम, अयोध्या
सीता राम

यह मंदिर जिस जगह स्थित है उसे भगवान राम की जन्मभूमि माना जाता है। १६वीं शताब्दी के अंतिम चरण में इस मंदिर के ऊपर एक मस्जिद बना दी गयी थी। २०वीं शताब्दी के अंतिम चरण में यहाँ पर फिर मंदिर का निर्माण करने हेतु इस मस्जिद को तोड़ दिया गया था। भूतकाल में हुईं इन घटनाओं का लोगों की भावनाओं से जुड़ें होने के कारण राम जन्मभूमि मंदिर आज भी भारत का सबसे विवादित स्थल है। यहाँ सुरक्षा के किये गए इंतजाम इतने कड़े हैं जितनें मैंने इससे पहले कभी कहीं नहीं देखा।

इस मंदिर में प्रवेश से पहले हमें हमारे साथ की सारी वस्तुएं जमा करनीं पड़तीं हैं। सुरक्षा जांच की कई परतों से गुजरना पड़ता है। मंदिर तक पहुँचने के लिए एक संकरी गली पार करनी पड़ती है जहाँ से बाहर निकलने का सिर्फ एक ही रास्ता है। आप पर छापामार सैनिकों की तीखी नजर हर समय बनी रहती है। मोर्चाबंदी की छत पर नाचते बंदरों को देख मुझे हंसी आ गयी। स्वच्छंद घूमते बंदर मानों पिंजरे में बंद हमें देख कर उछल उछल कर आनंद ले रहें हों।

मंदिर पहुँचने के लिए जब मैं गली पार कर रही थी, मंदिर दर्शनार्थ उत्तेजना भी थी और उत्सुकता भी। पर वहां पहुँच कर मंदिर को देखते ही मेरी आँखों में आँसू आ गए। मंदिर के नाम पर वहां सिर्फ एक स्विस तम्बू का ढांचा था। तम्बू में बैठी रामलला की मूर्ति सैनिकों और बंदरों से घिरी हुई थी। दर्शनार्थियों को तम्बू में बैठे रामलला को करीब २० फीट की दूरी से देखकर ही संतुष्ट होना पड़ता है और वह भी सिर्फ एक-आध मिनट के लिए। इस एक मिनट में भी मुझे यह अहसास हो गया कि इस मंदिर का आकार बहुत छोटा है। मैं सोचने लगी कि क्या यह मंदिर कभी किसी भव्य मंदिर का हिस्सा हुआ करता था? यह तथ्य जानने का कोई मार्ग भी नहीं था। हमारे और मंदिर के बीच एक बाड़ बनी हुई थी जिसके ऊपर बैठे पुजारी जी ने हमें प्रसाद दिया और दक्षिणा ग्रहण की। बहुत भारी मन से मैं मंदिर के बाहर आई। श्रद्धा का कोई भी पवित्र स्थल ऐसे युद्ध भूमि नहीं हो सकता।

हनुमान गढ़ी मंदिर

हनुमान गढ़ी मंदिर का द्वार
हनुमान गढ़ी मंदिर का द्वार

हनुमान गढ़ी मंदिर अयोध्या का सबसे प्रसिद्ध मंदिर है। ऐसा कहा जाता है कि जब भगवान् राम ने जीवन त्याग कर सरयू नदी में समाधी लेने का निश्चय किया तब उन्होंने हनुमान को बुलावा भेजा और उन्हें अपनी अयोध्या की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी। अयोध्या पर नजर रखने के लिए हनुमान एक पहाड़ पर बैठ गए। ऐसा  माना जाता है कि उसी पहाड़ पर हनुमान गढ़ी मंदिर बनाया गया है।

यह एक छोटा सा सुन्दर मंदिर है। यहाँ पहुँचने के लिए बहुत सारी ऊंची ऊंची सीडियां चढ़नी पड़ती हैं। यहाँ की एक गुप्त जानकारी आपको बतादूँ कि मंदिर के पिछवाड़े से भी एक रास्ता है जिस पर चढ़ाई थोड़ी कम है। हनुमान गढ़ी मंदिर की सबसे स्पष्ट स्मृति है उसके चटक रंग और उसका भव्य नक्काशीदार चाँदी का द्वार।

हनुमान मूर्ति - हनुमान गढ़ी मंदिर, अयोध्या
हनुमान मूर्ति – हनुमान गढ़ी मंदिर

मंदिर में हनुमान मूर्ती के स्थान पर एक अनियमित आकर का पत्थर रखा हुआ है।

हनुमान गढ़ी मंदिर से अयोध्या का दृश्य
हनुमान गढ़ी मंदिर से अयोध्या का दृश्य

आप जब भी हनुमान मंदिर के दर्शन करने जाएँ, उसकी छत पर अवश्य जाएँ। यहाँ से सम्पूर्ण अयोध्या नगरी के दर्शन किये जा सकते हैं। यदि आपके पास परिदर्शक हो तो वह आपको अयोध्या के सारे मुख्य स्थल वहां से दिखा सकता है। काश समिति ने संकेत पट्टिका ही लगा दी होती जो पर्यटकों को इन स्थलों को पहचानने में सहायता करती।

कनक भवन

कनक भवन - माता सीता का महल
कनक भवन – माता सीता का महल

इसे मंदिर ना कह कर भवन कहा जाता है क्योंकि यह एक आवास ग्रह है। मेरे अनुमान से यह अयोध्या का सबसे सुन्दर मंदिर है। इसके मुख्य द्वार पर स्थित रंगीन नक्काशीदार कोटरिका युक्त मेहराब बेहद मनमोहक है। मंदिर के बीचोंबीच नक्काशीदार दीवारों और झरोखों से घिरा एक आँगन है। इस मंदिर की दंतकथा सुनने से पहले ही मुझे यहाँ एक तेजवान नारीसुलभ शक्ति की अनुभूति हुई।

कनक भवन में राम दरबार
कनक भवन में राम दरबार

ऐसा कहा जाता है कि राजा दशरथ की सबसे छोटी रानी और राम की सौतेली माता कैकेयी ने यह महल सीता को उनके विवाहोपरांत मुंह दिखाई में दिया था। कनक भवन उसी महल का वर्त्तमान रूप है। मेरे परिदर्शक के अनुसार इस स्थान पर अलग अलग समय पर अलग अलग मंदिरों का निर्माण किया गया। मंदिर के मुख्य दीवार पर लगी पट्टिका त्रेता युग, द्वापर युग और अब तक, समय समय पर किये गए नवीनीकरण व उनके उत्तरदायीयों के नामों का विस्तृत ब्यौरा देती है।

कनक भवन का इतिहास
कनक भवन का इतिहास

कनक भवन के मंदिर में राम और सीता की अप्रतिम मूर्तियाँ हैं। यहाँ प्रसाद के रूप में भी राम और सीता के प्रतिरूप दिए जाते हैं। हमने इस मंदिर के दर्शन संध्याकाल में किये थे जब भगवान् की संध्या आरती की जा रही थी। मूर्ती के समक्ष विराजमान भक्तागण भक्ति से ओतप्रोत भजन गा रहे थे।

अयोध्या के घाट

सरयू गाथा - गुप्तार घाट
सरयू गाथा – गुप्तार घाट

नगरी सरयू नदी के किनारे स्थित है। सरयू या सरजू रामायण का एक अभिन्न अंग है। घाट किनारे स्थित अन्य पवित्र शहरों की तरह सरयू नदी के घाटों के पीछे भी अनेक कथाएं प्रचलित हैं।

गुप्तार घाट

सरयू किनारे गुप्तार घाट
सरयू किनारे गुप्तार घाट

मेरी यात्रा गुप्तार घाट से ही आरम्भ हुई थी जो फैजाबाद में सरयू के दूसरे तट पर स्थित है। यह एक अनूठा शांत घाट है जिस पर हल्के पीले रंग का एक भव्य मंदिर है। यहाँ से चाट पकौड़ों की दुकानों के बाजू में कुछ रंगबिरंगी नावें भी दिखायी दे रहीं थीं। उन्ही में से एक नाव पर सवार होकर हमने अयोध्या की तरफ यात्रा की शुरुआत की। कुछ लोग वहां रेत के टापुओं पर अंतिम क्रिया सम्पन्न कर रहे थे।

गुप्तार घाट से जुडी दंतकथा कहती है कि भगवान् राम ने सरयू नदी में जलसमाधि लेने हेतु इसी घाट से प्रवेश किया था।

सरयू तट पर बक या अंजन
सरयू तट पर बक या अंजन

सरयू नदी का पाट अत्यंत चौड़ा है। उस पर लम्बी नौका सवारी का आनंद लिया जा सकता है। हमें नदी किनारे कई पक्षियों के भी दर्शन हुए। जैसे जैसे हम नगरी की तरफ बढ़ रहे थे, हमें नगरी की क्षितिजरेखा दिखाई पड़ने लगी।

झुनकी घाट

झुनकी घाट
झुनकी घाट

गुप्तार घाट से नाव द्वारा अयोध्या जिस घाट पर पहुंचे वह था झुनकी घाट। वाराणसी के घाटों से कहीं ज्यादा स्वच्छ और भव्य। इस पर ताज़ी सफेदी की हुई थी। मेरे गले में पड़ी चटक गेंदे की माला मुझे इस स्थान का एक अभिन्न अंग महसूस करा रही थी। यह इतना साफसुथरा और शांत घाट है कि इस पर सैर करने का एक अलग ही आनंद है।

लक्षमण घाट

अयोध्या के घाट
अयोध्या के घाट

झुनकी घाट से थोड़ा आगे जाने पर लक्षमण घाट पड़ता है। इस घाट से जुड़ी यह मान्यता है कि राम के भ्राता लक्षमण ने इसी घाट पर जलसमाधि ली थी।

सरयू आरती

शाम के समय हमने घाट पर सरयू आरती में भाग लिया। मैंने इससे पहले ऐसी आरती वाराणसी में गंगा की और बटेश्वर में यमुना की देखी थीं। मेरे अनुमान से यह एक नयी शुरुआत है। जैसे जैसे शहरों का विकास होता है, नए नए अनुष्ठान भी जुड़ते चले जाते हैं। नदियों के घाटों पर संध्या आरती भी २१वीं सदी का नवीन अनुष्ठान प्रतीत होता है। कुछ भी कहिये, हजारों की संख्या में नदी में तैरते, जलते हुए मिट्टी के दिए, यह एक अत्यंत ही मनोहार दृश्य होता है।

संध्या आरती सरयू नदी अयोध्या
संध्या आरती – सरयू नदी

आरती के दौरान जब सारे पंडित बड़े बड़े पीतल के दीयों के समूह को घुमाते है, हम एक अनोखे आध्यामिक भावना से ओतप्रोत हो जाते हैं। वहां बजते संगीत और भजन इस प्रभामंडल को चार चाँद लगा देते हैं। मुझे ऐसी आरती में बहुत आनंद आता है। वाराणसी में गंगा आरती मेरी अब तक की सबसे अधिक यादगार और आनंददायक आरती रही है।

अयोध्या में राम की खोज

हम में से अधिकांश के लिए अयोध्या प्रतीक है राम का, जिन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम भी कहा जाता है। अर्थात सर्वगुण सम्पन्न महापुरुष जिन्होंने अपना सारा जीवन सिद्धांतों और आदर्शों के दायरे में व्यतीत किया। मैं जानना चाहती थी कि अयोध्या में आज राम के क्या मायने हैं। मैंने यहाँ कुछ लोगों से चर्चा की और जाना की अयोध्या में राम को अलग अलग स्वरुप में मान्यता प्राप्त है। कुछ लोग उनके शिशु रूप अर्थात रामलला को पूजते हैं। माताओं के लिए राम एक पुत्र की तरह है, वहीँ युवाओं के लिए एक सखा। इसी तरह सीता की नगरी मिथिला में उन्हें वर रूप अर्थात जमाई की मान्यता प्राप्त है। उन्हें देखने का कोई एक नजरिया नहीं है।

हरिधाम के स्वामी दिनेशाचार्य ने मुझे श्रेष्ठ शब्दों में समझाया कि राम के क्या मायने हैं और क्यों दर्शनार्थियों को अयोध्या पधारना चाहिए। उनके अनुसार राम का आयुष्य हमें मर्यादी व सदाचारी जीवन जीने की प्रेरणा देता है। राम और उनकी नगरी हमें एक अच्छा इंसान बनाना सिखातें है। उनके साथ हुई मेरी चर्चा इस विडियो में आप सुन सकते हैं।

अयोध्या अनुसंधान केंद्र

मधुबनी शैली में राम कथा
मधुबनी शैली में राम कथा

नगरी के बीचों बीच स्थित, अपेक्षाकृत नवीन, अयोध्या अनुसंधान केंद्र का लक्ष्य है विभिन्न ललित कलाओं द्वारा दर्शाए गए रामायण का संकलन और प्रलेखन। भारत के कोने कोने में रामायण की गाथा सुनाई जाती है। इसके अलावा रामायण की गाथाएँ दक्षिणपूर्व एशिया – जैसे थाईलैंड, इंडोनेशिया में भी जानी जाती हैं। श्रीलंका तो रामायण का एक अभिन्न अंग है ही।

अयोध्या अनुसन्धान केंद्र में विभिन्न ललित कलाओं द्वारा दर्शाए गए रामायण का अनुभव लिया जा सकता है। एक सम्पूर्ण भित्ति पर रामायण को मधुबनी चित्रकारी द्वारा दर्शाया है। रंगीन ज्यामितीय आकृतियाँ द्वारा रामायण की जानी मानी गाथाओं को सुन्दर रूप से चित्रित किया गया है। उड़ीसा के पटचित्र शैली में भी रामायण अत्यंत लुभावना लग रहा था। विभिन्न शैलियों के रामलीला में इस्तेमाल होने वाले मुखौटों का भी यहाँ संग्रह है।

भगवान् राम का एक आधुनिक चित्र - अयोध्या
भगवान् राम का एक आधुनिक चित्र

इस अनुसंधान केंद्र के पहिले मंजिल पर रामायण के विभिन्न द्रश्यों को एक चित्र श्रंखला द्वारा दर्शाया है। यहाँ पर एक मानचित्र ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। उस नक़्शे पर वह सब स्थल अंकित हैं जहाँ जहाँ रामायण के विभिन्न प्रसंग घटित हुए थे। मेरे अनुभव से यह एक अद्भुत अनुसन्धान है।

रामायण यात्रा
रामायण यात्रा

मुझे यहाँ जानकारी दी गयी कि इस अनुसन्धान केंद्र में प्रत्येक दिवस रामायण अभिनीत होता है। मेरी इस यात्रा के दौरान मुझे यहाँ रामायण देखने का सौभाग्य नहीं मिला। संभवतः अगली अयोध्या यात्रा के दौरान मैं यह अभिनय देख पाऊँ ऐसी आशा लेकर मैं केंद्र से बाहर आ गयी।

अयोध्या नगरी

रंग बिरंगी अयोध्या नगरी
रंग बिरंगी नगरी

अयोध्या नगरी विभिन्न रंगों में रंगी नगरी है, मानो इस पर रंगों की बौछार हुई हो। हर घर, हर आश्रम चटक रंगों में रंगा, अयोध्या को सजीव और चमकदार रूप प्रदान करता है। यहाँ की संकरी गलियां सायकल, मोटर और इंसानों के क्रियाकलापों से गुंजायमान रहतीं हैं। सही मायनों में यह एक अनोखा और अद्भुत शहर है।

आवश्यक सूचनाएं

अयोध्या की दीवारों पे रामायण
दीवारों पे रामायण
  • आप जब रामजन्मभूमि मंदिर के दर्शन करने जाएँ, तो अपना पहचान पत्र अवश्य अपने साथ रखें। विदेशी नागरिकों के लिए पासपोर्ट आवश्यक है। सुरक्षाकर्मी आपसे आपकी पहचान और कुछ सवाल पूछ सकते हैं। मांगी गयी सारी जानकारी उन्हें सही सही दें। इससे आपको भी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा।
  • अयोध्या संकरी गलियों का छोटा शहर है। इसे सर्वोत्तम ढंग से पैदल चलते ही देखा जा सकता है। हालाँकि यहाँ आपकी सुविधा के लिए रिक्शेवाले भी मौजूद रहतें हैं।
  • अप्रैल माह में रामनवमी व नवम्बर माह में दिवाली, यह भगवान् राम से जुड़े दो प्रमुख त्यौहार हैं। यह धूमधाम से मनाईं जातीं हैं। यदि आप इनमें सम्मिलित होने की इच्छा रखते हैं तो उत्सवों की तारीखें पहले से पता कर अग्रिम योजना बनाने का प्रयत्न करें।
सादा सात्विक भोजन, अयोध्या
सादा सात्विक भोजन
  • रहने की व्यवस्था प्रचुर मात्रा में नहीं है। ज्यादातर व्यवस्था धर्मशाला के रूप में विभिन्न मंदिरों व समाजों में उपलब्ध है। यदि आप सुखसुविधायें युक्त होटल चाहें तो आपको लखनऊ में यह व्यवस्था मिल जायेगी। आशा करती हूँ कि जल्द ही रहने की बेहतर और प्रचुर व्यवस्थाएं उपलब्ध होंगीं।
  • भोजन यहाँ ज्यादातर सादा व शाकाहारी होता है। हमनें यहाँ जिस आश्रम में भोजन किया वहां सात्विक थाली परोसी गयी जो ना केवल शाकाहारी थी, बल्कि प्याज व लहसुन रहित भी थी।
  • कृपया ध्यान रखिये अयोध्या एक पवित्र नगरी है। उसकी संस्कृति व लोकाचार का सम्मान करें।
हनुमान गढ़ी मंदिर की दीवारें
हनुमान गढ़ी मंदिर की दीवारें

जैसा कि अयोध्या में कहा जाता है- “ जय सिया राम ”

भारत के अन्य मंदिर

शिवसागर या सिबसागर – असम में मंदिरों की नगरी

तंजौर उर्फ तंजावुर का विराट बृहदीश्वर मंदिर – एक विश्व धरोहर

गोवा के प्राचीन सारस्वत मंदिर – अपनी विशिष्ट वास्तुकला के साथ

जागेश्वर धाम – कुमाऊं घाटी में बसे शिवालय

मोढेरा सूर्य मंदिर – अद्वितीय वास्तुशिल्प का उदाहरण

करणी माता मंदिर — बीकानेर, राजस्थान में मूषकों का अनोखा साम्राज्य

हिंदी अनुवाद : मधुमिता ताम्हणे

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शिवसागर या सिबसागर – असम में मंदिरों की नगरी https://inditales.com/hindi/temple-town-shivsagar-assam/ https://inditales.com/hindi/temple-town-shivsagar-assam/#comments Wed, 25 Jan 2017 10:16:51 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=124

दिखो नदी के किनारे पर, लगभग 380 कि.मी. गुवाहाटी के पूर्व में और जोरहाट के 60 कि.मी. पूर्व में एक छोटा पर अनोखा नगर, शिवसागर बसा हुआ है। इसे सिबसागर के नाम से भी जाना जाता है। लेकिन अब इसका नाम बदलकर शिवसागर रखा गया है। एक समय पर सिबसागर वह क्षेत्र हुआ करता था […]

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दिखो नदी के किनारे पर, लगभग 380 कि.मी. गुवाहाटी के पूर्व में और जोरहाट के 60 कि.मी. पूर्व में एक छोटा पर अनोखा नगर, शिवसागर बसा हुआ है। इसे सिबसागर के नाम से भी जाना जाता है। लेकिन अब इसका नाम बदलकर शिवसागर रखा गया है। एक समय पर सिबसागर वह क्षेत्र हुआ करता था जहां से अहोम के महान राजाओं ने छः शताब्दियों से भी अधिक शासन किया।

शिवसागर – असम के पर्यटक स्थल

शिव दोल - शिवसागर, असम
शिव दोल

उन्होंने 19वी सदी के प्रारंभिक दौर तक राज्य किया, जिसके बाद वे बर्मियों के हाथों पराजित हुए। और अंत में इस क्षेत्र पर अंग्रेजों ने कब्जा कर लिया। उस समय इस क्षेत्र को रंगपुर के नाम से जाना जाता था। अब यह एक छोटा सा नगर बन गया है, जो अपने महान अतीत के अवशेषों का संरक्षण करता हुआ अपने आगंतुकों का स्वागत करता है। इस पूरे शहर में यहां-वहां स्मारकों के समूह बिखरे हुए हैं। इसका कारण यह है कि, एक के बाद एक राजाओं ने अपने अनुसार राज्य को विभिन्न स्थानों पर स्थानांतरित किया था। लेकिन आज उनमें से अधिकतर स्मारक सिबसागर का भाग बन चुके हैं। यह देखकर मुझे दिल्ली की याद आई, जहां पर ऐसे ही बहुत प्राचीन शहर हैं जो दिल्ली की वर्तमान सीमाओं में समा गए हैं।

नामदांग स्टोन ब्रिज

नाम्दांग पत्थर का पुल - असम
नाम्दांग पत्थर का पुल – असम

जोरहाट से शिवसागर की ओर जाते समय आपको रास्ते में एक 300 साल से भी अधिक पुराना एक छोटा सा पुल मिलता है, जिसे नामदांग स्टोन ब्रिज नाम से जाना जाता है। इस पूरे पुल को एक ही पत्थर से बनाया गया है। नामदांग नदी पर बना हुआ यह पुल अब राष्ट्रीय महामार्ग 37 का भाग है।

शिवसागर सरोवर

शिवसागर पहुँचते ही सबसे पहले आपको एक विशाल सरोवर दिखेगा जो शिवसागर सरोवर कहलाता है। इस पूरे सरोवर में कुमुद और कमल के फूल छितराये हुए नज़र आते हैं, जिसकी पृष्ठभूमि में शानदार लाल मंदिरों का दृश्य दिखाई देता है। इसी सरोवर के नाम के आधार पर इस नगर को शिवसागर नाम दिया गया है। इस सरोवर के पास ही 3 मंदिर हैं जिन्हें शिवडोल, विष्णुडोल और देवीडोल के नाम से जाना जाता है। रानी अंबिका ने ये मंदिर 18वी सदी के प्रारंभिक काल के दौरान बनवाए थे, जिसके अनुसार ये मंदिर लगभग 300 साल पुराने हैं।

शिवडोल, विष्णुडोल और देवीडोल मंदिर

विष्णु दोल - शिवसागर, असम
विष्णु दोल

ये तीनों मंदिर लाल रंग के हैं और प्रत्येक मंदिर की शिखर भिन्न और प्रभावशाली है। यह मान लेना शायद तर्कसंगत होगा कि तीनों मंदिरों में शिवडोल मंदिर सबसे महत्वपूर्ण है। वह बाकी दोनों मंदिरों के बीच में स्थित है और उन दोनों की तुलना में थोड़ा ऊंचा भी है। शिवडोल और देवीडोल मंदिर के शिखर नगर की विशिष्ट शैली में बनायी गए हैं और उनके मंडप बंगाल की छला शैली में बनाये गए हैं। विष्णुडोल और जॉयडोल की शिखर थोड़ी भिन्न है जो औंधे वक्रीय शंकु के आकार की है और इस पर चौकौर विचित्र खांचे बने है, जिसपर पुष्पों की खुदाई की गयी है. शिखर के शीर्ष पर ३-४ अमलका है। इन सारे मंदिरों के सामने एक और खुला मंडप बनवाया गया है, जिसकी छत त्रिकोणीय कलई की बनी हुई है।

ये तीनों ढांचे ,यानि शिखर, मंडप और बाहरी छत इन मंदिरों को सम्मिश्रित वास्तुकला का उत्तम उदाहरण बनाते हैं। इन मंदिरों की भूरे पत्थरों से बनी बाहरी दीवारों पर खुदाई की गयी है। भीतर से इन तराशे हुए पत्थरों को दीवारों से जोड़ा गया है। यद्यपि यह देश का सबसे अच्छा या देखने योग्य नक्काशी काम नहीं है, लेकिन पत्थर की खुदाई का काम यहां के सभी हिन्दू देवताओं के मंदिरों में पाया जाता है। भूरे और लाल रंग का यह परस्पर मेल बहुत ही अनोखा और दिलचस्प है, जो नीरसता को भंग करता हुआ रंगीन तो लगता है पर भड़कीला नहीं दिखता। इन मंदिरों का गर्भगृह आम तौर पर जमीनी स्तर से थोड़ा नीचे होता है। यहां का वातावरण इतना उष्ण और नम होता है कि कुछ मिनटों में ही वहां पर खड़ा होना बहुत मुश्किल हो जाता है।

जॉयडोल मंदिर और जॉयसागर सरोवर

जॉय सागर - शिवसागर - असम
जॉय सागर

जॉयडोल मंदिर एक और बड़े से सरोवर, जॉयसागर के पास ही स्थित है। इसे राजा रुद्र सिंह ने अपनी माता जॉयमोती के सम्मान में बनवाया था। यह सरोवर बहुत ही सुंदर है और फूलों और पक्षियों से भरा रहता है। जब हम वहां पहुंचे तब यह मंदिर एकदम खाली था। जिसके कारण यह जगह बहुत ही शांत लग रही थी, जहां पर बैठकर आप चिंतन-मनन कर सकते हैं। यहां का मौसम बहुत ही सुहाना है।

शिवसागर में अहोम का साम्राज्य

जॉय डोल - शिवसागर, असम
जॉय डोल

अहोम चीनी वंशज थे जो कुछ काल के उपरांत हिन्दू धर्म में परिवर्तित हुए थे। उन्होंने हिन्दू राजाओं के रूप में लंबे समय के लिए राज्य किया। अनुसंधान के मामले में यह बहुत ही दिलचस्प विषय बन सकता है, जहां पर शासक ही शासन करने के लिए शासितों का धर्म अपनाते हैं। शिवसागर सरोवर के पास ही स्थित संग्रहालय में अहोम के राजाओं द्वारा प्रयुक्त चीजों का संग्रह है। यहां पर अहोम वंश के प्रमुख शासक राजा रुद्र सिंह, जिन्होंने 18वी सदी के दौरान शासन किया था, की बड़ी सी मूर्ति रखी गयी है। जाहिरा तौर पर अहोम के राजाओं को दफनाया गया था और उनके शव पर मिट्टी डालकर उस जगह को टीले का रूप दिया गया था। ये टीले बाद में मैदानों के रूप में प्रसिद्ध हुए। इस क्षेत्र में आपको ऐसे कई मैदान मिलेंगे। जैसे कि जोरहाट का मैदान, यद्यपि वहां देखने लायक कुछ भी नहीं है।

रंग घर, शिवसागर

सुंदर रंग घर
सुंदर रंग घर

रंग घर एक अकेला खड़ा स्मारक है, जो शिवसागर से ज्यादा दूर नहीं है। यह दो मंज़िला ढांचा मुगलों की बरादरी के जैसा दिखता है। कहा जाता है कि इस जगह से राजा, भैंसों की लड़ाई जैसे खेल और बीहू जैसे उत्सव देखा करते थे, जो घर के आस-पास आयोजित किए जाते थे। एक प्रकार से यह उनका मनोरंजन का मंडप था। 18वी सदी का यह सुंदर ढांचा फीके से गुलाबी रंग का है, जिसकी दीवारें अनेकों रूपांकनों से सुसज्जित हैं। इनमें से अधिकतर फूल पट्टी की बनावट है, जो मुगल के रूपांकनों से प्ररित है। ऊपरी मंज़िल के वृत्त खंड इस भवन को बरादरी रूप देते हैं, लेकिन उसकी छत उसे एक भिन्न पहचान प्रदान करती है। वह उलटी नाव जैसी है, जिसके दोनों सिरों पर मगरमच्छ की खुदाई की गयी है जो उसे चीनी स्वरूप देता है।

यह भवन छोटे-छोटे ईंटों से बनाया गया है जो उस युग की अधिकतर इमारतों में पाये जाते हैं। इस भवन को चूने से लीपा गया है। मुझे लगता है कि, यहाँ की उष्णता से भवन को ठंडा रखने के लिए उसपर चूना लगाया गया है।

तलातल घर

तलातल महल - शिवसागर - असम
तलातल महल

रंग घर से थोड़ी दूर अहोम राजाओं का पुराने जमाने का सात मंज़िला महल है जिसे तलातल कहा जाता है। इस महल की विशिष्ट बात यह है कि, उसकी सात में से तीन मंज़िलें भूमिगत हैं। यहां पर गुप्त सुरंग भी है, जो महल से बाहर जाती है। लेकिन मेरे खयाल से यह ज़्यादातर राजसी आवासों का अभिन्न अंग है। लेकिन अब यहां पर कुछ ही मंज़िले बाकी हैं, जहां कक्ष, गलियारे और दीवारों कि खुदाई के कुछ अवशेष बचे हैं। जैसे-जैसे आप इस खंडहर से गुजरते हैं, नक्काशीयों के कुछ हिस्से यहां-वहां झलकते हैं। अनेक प्रवेश द्वारों के पास अलंकृत खंबों के अवशेष दिखाई पड़ते हैं। एक शिव मंदिर जो आज भी सक्रिय है, एक छोटे से जल स्त्रोत के पास अपना स्थान ग्रहण किए हुए है। इस महल से थोड़ा दूर गोला घर है जहां पर गोलाबारूद रखा जाता था।

उत्तरन संग्रहालय

उत्तरं संग्रहालय
उत्तरं संग्रहालय

शिवसागर में सबसे अचरज की बात जो हमें मिली वो थी व्यक्तिगत संग्रहालय जो उत्तरन के नाम से जाना जाता है। यह एक व्यक्ति द्वारा इस क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर को एकत्रित कर उसे प्रदर्शित करने का प्रयास है। यह संग्रह बहुत ही प्रभावशाली और उस व्यक्ति का प्रयास प्रशंसनीय है। यह दो मंज़िला भवन कलाकृतियों से भरा हुआ है। इसका और एक हिस्सा स्वयं वहां के अध्यक्ष या मालिक द्वारा व्यक्तिगत रूप से बनाया जा रहा है। हमने उनसे बात भी की। उनका सपना है कि वे अपने खुद के पैसों से एक विशाल संग्रहालय बनाए, जिसे सुनकर हमे बहुत खुशी हुई।

मैं दिल से ऐसे व्यक्तियों कि प्रशंसा करती हूँ, जो खुद के दम पर अपने सपने पूरे करना चाहते हैं। बजाय उन व्यक्तियों के जो सोचते हैं कि सपने पूरे करने का एक ही तरीका है, दूसरों की सहायता लेना। हमने यह संग्रहालय इत्तिफ़ाक से देखा, जब हम वहां से गुजर रहे थे। अन्यथा, कहीं पर भी किसी यात्रा गाइड या इन्टरनेट पर इस संग्रहालय का उल्लेख नहीं है।

शिवसागर की खोज

तलातल महल का हिस्सा
तलातल महल का हिस्सा

जिस समय मैं इस यात्रा के बारे में जानकारी हासिल कर रही थी, तब किसी ने भी मुझे सिबसागर या शिवसागर के बारे में नहीं बताया। जब मैंने उत्तर-पूर्व की यात्राएं आयोजित करने वाले कई यात्रा प्रबंधकों से पूछा तो वे असम की इस जगह से बिलकुल अनभिज्ञ थे। शिवसागर पहुँचने से पहले रास्ते पर मिलने वाले लोगों ने भी हमे बताया कि वहां पर देखने लायक ज्यादा कुछ नहीं है, आप निराश होंगे। लेकिन वहां पर एक पूरा दिन बिताने के बाद मैं सोच में पड़ गयी कि क्यों लोगों को इस जगह के बारे में ज्यादा पता नहीं है और क्यों उन्हें लगता है कि वह देश के बाकी ऐतिहासिक स्थानों जितना महत्वपूर्ण नहीं है। हमे यह जगह बहुत पसंद आयी और हमने इस जगह का बहुत आनंद लिया।

मेरी यह इच्छा है और मैं आशा करती हूँ कि लोग जाकर इस जगह को जरूर देखेंगे, जहां से देश में दीर्घ काल तक शासन करने वाले शासक वंशजों ने अपना शासन चलाया।

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पंचक्रोशी यात्रा – काशी खंड का प्राचीन तीर्थ मार्ग https://inditales.com/hindi/panchkroshi-yatra-kashi-khand-varanasi/ https://inditales.com/hindi/panchkroshi-yatra-kashi-khand-varanasi/#comments Tue, 03 Jan 2017 01:31:21 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=54

चार साल पहले वाराणसी के दौरे के समय मुझे पहले-पहल पंचक्रोशी यात्रा के बारे में पता चला। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के भारत कला भवन की दीवारों पे मैंने एक अनुपम नक्शा देखा था। इसके एक साल पहले ही मैंने मथुरा-वृन्दावन क्षेत्र में ब्रज की 84 कोस यात्रा पूरी की थी। पंचक्रोशी तीर्थ यात्रा के प्राचीन […]

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चार साल पहले वाराणसी के दौरे के समय मुझे पहले-पहल पंचक्रोशी यात्रा के बारे में पता चला। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के भारत कला भवन की दीवारों पे मैंने एक अनुपम नक्शा देखा था। इसके एक साल पहले ही मैंने मथुरा-वृन्दावन क्षेत्र में ब्रज की 84 कोस यात्रा पूरी की थी। पंचक्रोशी तीर्थ यात्रा के प्राचीन मार्ग के बारे में जानने के लिए मैं बहुत उत्सुक थी। इन्टरनेट या लोगों से मुझे, इस यात्रा से संबंधित बहुत जानकारी तो नहीं मिली, सिवाय इसके कि यह यात्रा शिवरात्री के दिन पैदल की जाती है। मैं पंचक्रोशी यात्रा पर जाने का मन बनाकर वाराणसी से वापस लौटी।

कशी के घाट - पंचक्रोशी यात्रा
कशी के घाट

मुझे प्रसन्नता है कि मैं यह यात्रा इस वर्ष संपन्न कर सकी। इसके लिए मैंने बहुत शोधकार्य किए और आस-पास से बहुत सारी जानकारी भी प्राप्त करने की कोशिश की थी, जो आखिर सफल हो ही गयी। पंचक्रोशी यात्रा संपन्न करना एक स्वप्न संपन्न होने जैसा है. इस यात्रा के सन्दर्भ में मिली जानकारी आपके साथ साँझा कर रही हूँ।

पंचक्रोशी यात्रा कब करनी चाहिए?

लक्ष्मी नारायण मंदिर - पंचक्रोशी यात्रा यात्रा पथ पे
लक्ष्मी नारायण मंदिर – पंचक्रोशी यात्रा पथ पे

पंचक्रोशी यात्रा अधिकतर शिवरात्री के दिन की जाती है. पूरी यात्रा के दौरान आपको अधिकतर शिवमंदिरों के ही दर्शन होते हैं। यात्री इस यात्रा का प्रारंभ या तो मणिकर्णिका कुंड से संध्या के समय करते हैं, या फिर अस्सी घाट से मध्यरात्री के आस-पास यात्रा का प्रारंभ करते हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी चलने की क्षमता के अनुसार यह यात्रा 1, 3 या 5 दिनों में पूरी करता है।

यह यात्रा पुरुषोत्तम मास में भी की जा सकती है। जिसे हिन्दू तिथिपत्र या पंचांग के अनुसार मलमास या अधिक मास भी कहा जाता है, जो हर 2-3 सालों में आता है। मेरा तर्क कहता है, क्योंकि, यह अधिक मास है तो इस यात्रा के लिए यह शुभ काल भी हो सकता है।

हिन्दू तिथिपत्र के फालगुन, वैशाख और चैत्र महीनों में भी यह यात्रा की जा सकती है।

मेरा मानना है कि, अगर आप स्वयं तैयार है तो आप कोई भी तीर्थ यात्रा कभी भी कर सकते हैं।

पंचक्रोशी यात्रा पर जाने का मार्ग

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पंचक्रोशी यात्रा का आरंभ मणिकर्णिका कुंड से होता है। यह एक छोटा सा जलाशय है जो प्रसिद्ध मणिकर्णिका घाट के पास स्थित है। कहा जाता है कि यह कुंड वाराणसी में बहनेवाली गंगा से भी प्राचीन है। उपाख्यानों ने इस कुंड को शिव, शक्ति और विष्णु से जोड़ते हुए हिन्दू धर्म के तीनों संप्रदायों के लिए इसे महत्वपूर्ण बताया गया है। भक्त इस कुंड में डुबकी लगाकर अपनी अंजुली में पानी लेकर यात्रा करने का संकल्प करते हैं। यह एक प्रकार से यात्रा पूरी करने का वचन है। अगर आप के मन कोई इच्छा हो तो उसकी पूर्णता की कामना करने का यही अच्छा समय है। और आपकी इच्छा पूर्ण होने के बाद आपको फिर से यहां पर माथा टेकने आना होता है।

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मणिकर्णिका कुंद में संकल्प ले भक्तगण नाव से अस्सी घाट की ओर बढ़ते हैं, जो वाराणसी में गंगा के दक्षिणी क्षेत्र की ओर स्थित है। यहीं से यात्रा का वास्तविक आरंभ होता है। इसके बाद आपको रास्ते में 5 पड़ावों से गुजरते हुए जाना है, जो 50 मील या करीब-करीब 80 की.मी. के मार्ग पर स्थित है। पंचक्रोशी यात्रा का यह मार्ग, तीर्थ यात्रा का बहुत ही प्राचीन मार्ग है। इस मार्ग पर आपको अनेकों सूचना पट्ट दिखेंगे जो इस पूरी यात्रा में आपका मार्गदर्शन करेंगे और आपको इन पड़ावों के बारे में सूचित भी करेंगे।

प्रत्येक पड़ाव के बीच की दूरी

मणिकर्णिका से कर्दमेश्वर – 3 कोस
कर्दमेश्वर से भीम चंडी – 5 कोस यानि कुल 8 कोस
भीम चंडी से रामेश्वर – 7 कोस यानि कुल 15 कोस
रामेश्वर से शिवपुर – 4 कोस यानि कुल 19 कोस
शिवपुर से कपिलधारा – 3 कोस यानि कुल 22 कोस
कपिलधारा से मणिकर्णिका – 3 कोस यानि कुल 25 कोस

1 कोस = 3.2 की.मी.

इस यात्रा के दौरान आपको अपने दाहिने और बहुत सारे छोटे-छोटे मंदिर दिखाई d, जिनमें से अधिकतर लाल रंग के हैं। ये मंदिर जो विभिन्न रंगों और आकारों के हैं, समय के अलग-अलग मोड पर सुधारणिकरण और सुशोभिकरण से गुजर चुके हैं। रास्ते में मिलने वाले सूचना पट्टों को गौर से पढ़ने पर आपको इन मंदिरों के नाम और उनके क्रमांक का उल्लेख मिलेगा।

पंचक्रोशी यात्रा के 5 पड़ाव

पंचक्रोशी यात्रा पथ के सूचना चिन्ह
यात्रा पथ के सूचना चिन्ह

ये 5 पड़ाव असल में 5 मंदिर हैं, जो इस यात्रा के महत्वपूर्ण स्थल हैं। यहां पर धर्मशालाओं की भी व्यवस्था है, जहां पर यात्री विश्राम करने के लिए ठहर सकते हैं। ये धर्मशालाएँ लगभग 25,000 लोगों को अपनी छत्रछाया प्रदान करने में सक्षम है। ये स्थान तीर्थ यात्रियों के लिए मुफ्त में उपलब्ध है। आपको सिर्फ अपने खाने का बंदोबस्त करना पड़ता है। पारंपारिक रूप से भारत में होटल या रेस्टोरांत की कोई धारणा नहीं थी इसलिए यात्री अपना खाना खुद बनाकर खाते थे। मेरी दादी से मैंने सुना है कि जब वे ऐसी यात्राओं पे जाते थे तो अपनी जरूरत की सारी चीजें साथ ले जाते थे और जब रात में विश्राम करने के लिए रुकते थे तब अपना खाना खुद पकाकर खाते थे।

नियमित अंतराल पर स्थित ये 5 पड़ाव यात्रियों को ठहरने, विश्राम करने और भगवान की आराधना करने के लिए ही बनाया गया होगा। इन पाँचों मंदिरों के पास एक बड़ा सा जलकुंड है, जो बड़ी संख्या में दर्शन के लिए आए श्रद्धालुओं की आवश्यकताओं का भार उठा सकते हैं।

इन पांचों पड़ावों पर अर्पित करने के लिए तीर्थ यात्री अपने साथ पान-सुपारी ले जाते हैं।

राह में मिलने वाले प्रत्येक मंदिर में अक्षत या भगवान को चढ़ाने योग्य कच्चे चावल अर्पित किए जाते हैं।
पंचक्रोशी यात्रा के मार्ग पर मिलने वाले प्रत्येक मंदिर को क्रमांकित किया गया है, जिसके आधार पर आप आसानी से आगे बढ़ सकते हैं।

पंचक्रोशी यात्रा या परिक्रमा से संबंधित कहानियाँ

मणिकर्णिका कुण्ड - पंचक्रोशी यात्रा
मणिकर्णिका कुण्ड

कहा जाता है कि त्रेता युग में भगवान राम ने अपने तीनों भाइयों और पत्नी सीता के साथ पंचक्रोशी यात्रा की थी। इनके द्वारा स्थापित किए गए शिवलिंग रामेश्वर मंदिर में पाये जाते हैं। भगवान राम ने यह यात्रा अपने पिताजी दशरथ को श्रवण कुमार के मता-पिता के श्राप से मुक्ति दिलाने के लिए की थी।

द्वापर युग में पांडवों ने यह यात्रा द्रौपदी के साथ की थी। इनके द्वारा स्थापित किए गए शिवलिंग शिवपुरी के पांडव मंदिर में पाये जाते हैं। इस मंदिर के पास में ही एक जलकुंड है, जिसे द्रौपदी कुंड के नाम से जाना जाता है। पांडवों ने यह यात्रा अपने निर्वासन काल या अज्ञात वास के दौरान की थी।

अस्सी घाट के पास स्थित लोलार्क कुण्ड - पंचक्रोशी यात्रा
अस्सी घाट के पास स्थित लोलार्क कुण्ड

पंचक्रोशी यात्रा दक्षिणावर्त तरीके से परिक्रमा के रूप में की जाती है। यह परिक्रमा करते समय आपको सारे मंदिर आपके दाहिने तरफ और सारी धर्मशालाएं आपके बाईं तरफ ही मिलेंगी। इस यात्रा के मार्ग से सीमित क्षेत्र पवित्र माना जाता है। इस क्षेत्र के अंतर्गत शौचालयों पर पाबंदी है। लेकिन यहां पर रहने वाले लोगों के अपने घरों में शौचालय जरूर हैं।

गेंदे के फूलों के खेत
गेंदे के फूलों के खेत

भीम चंडी मंदिर के एक पुजारी ने हमे बताया कि काशी खंड, यानि यात्रा के मार्ग से सीमित क्षेत्र में विभिन्न हिन्दू देवी-देवताओं की 3,65,000 से अधिक मूर्तियाँ थी। इन में से कुछ मूर्तियाँ दिखाई देती हैं, तो कुछ अदृश्य सी रूप में हैं। पहले तो मैं इस संख्या को मानने के लिए तैयार नहीं थी, पर यात्रा पूरी करने के बाद मेरे पास इस संख्या पर शंका करने का कोई भी कारण नहीं बचा। गाड़ी से की गयी एक दिन की इस लंबी यात्रा के दौरान मैंने पूरे रास्ते में हजारों लिंग देखे जो मूर्तियों की संख्या से समान थे।

मेरी पंचक्रोशी यात्रा

अस्सी घाट - काशी, पंचक्रोशी यात्रा
अस्सी घाट – काशी

मणिकर्णिका घाट तक जाने वाली पतली गलियों से निकलते हुए में मणिकर्णिका घाट पहुंची। कुंड का पानी सूखा होने के कारण मैंने मौन प्रार्थना की और अस्सी घाट पर जाने के लिए वापस अपनी गाड़ी की ओर लौटी।

अस्सी घाट पर जाने से पहले मैं लोलार्क कुंद पर थोडा ठहरी, जो सूर्य कुंड के नाम से भी जाना जाता है। संतान प्राप्ति की इच्छा पूर्ति के लिए इस कुंड की बहुत मान्यता है और इसी कारण वह प्रसिद्ध भी है।

घाट पर मैंने चहल कदमी करते हुए थोडा समय व्यतीत किया। डॉ. काशीनाथ सिंह की पुस्तक ‘काशी का अस्सी’ में चित्रित काशी काशी का पूरा दृश्य मेरे सामने जीवंत हो उठा। सुबह की आरती के लिए खास बनाया गया नया मंच भी मैंने देखा। मुझे लगा जैसे यह घाट विदेशियों और पर्यटकों के लिए ही बनाया गया है। सही मायनों में पंचक्रोशी यात्रा का आरंभ यहीं से होता है।

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अस्सी घाट से हमने अपने पहले पड़ाव की ओर जाना शुरू किया। रास्ते में मैंने पहली बार अस्सी नदी देखी। हाँ, यह नदी छोटी जरूर है पर यह नाला नहीं है, जैसा कि अक्सर सुनने में आता है।

वाराणसी शहर की सीमाओं को पार करते ही गाँव और खेतों के बीच में पाया। यहाँ वहां मिटटी के छोटे बड़े हर थे। यहां पर व्यवसायिकरण ने अभी तक दस्तक नहीं दी थी। इन नज़ारों को देखकर मुझे लगा कि मैं पहली बार काशी आयी हूँ।

कर्दमेश्वर मंदिर पड़ाव

कर्दमेश्वर शिव मंदिर, पंचक्रोशी यात्रा
कर्दमेश्वर शिव मंदिर

हमारे गाइड ने ड्राईवर को अचानक से गाड़ी रोकने के लिए कहा। यह देखकर मैंने प्रश्न भरी दृष्टि से उनकी ओर देखा। उन्होंने एक छोटे पर सुंदर से मंदिर की ओर इशारा करा हुए बताया कि यही कर्दमेश्वर मंदिर है।हम गाड़ी से उतरकर मंदिर की ओर बढ़े। वहां पहुँचते ही एक बहुत बड़ा जलकुंड दृष्टिगोचर हुआ, जिसमें कई युवक डुबकियाँ लगा रहे थे और बच्चे तैर रहे थे। कुंड के उस पार हमने कुछ पक्की इमारतें देखी। पूछ-ताछ करने पा पता चला कि ये तीर्थ यात्रियों को ठहरे के लिए धर्मशालाएँ हैं।

कर्दमेश्वर प्रवेश द्वार एवं शिवलिंग
कर्दमेश्वर प्रवेश द्वार एवं शिवलिंग

मैंने इस छोटे लेकिन ऊंचे से मंदिर में प्रवेश किया जो 10-11 वी सदी में बनवाया गया था। ये वाराणसी के उस काल के मंदिरों में से एक है जिनमें से कुछ आज तक बचे हुए हैं। बाकी के बचे अधिकतर मंदिर अपने मूल स्वरूप का आधुनिक परिवर्तित रूप है। इस मंदिर का प्रवेश द्वार अनेकों घंटियों से घिरा हुआ है। शिवलिंग को प्रणाम करने के बाद मैंने वहां के पुजारी से कुछ बातें की । उन्होंने मुझे कर्दमेश्वर मंदिर से जुड़े उपाख्यान के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि इस मंदिर के शिवलिंग की स्थापना ऋषि कर्दम ने की थी। इस मंदिर के पास स्थित जलकुंड को बिन्दु सरोवर के नाम से जाना जाता है। ऐसी मान्यता है की यह सरोवर स्वयं शिवजी के आंसू से निर्मित हुआ है।

कर्दमेश्वर मंदिर का पृष्ठ भाग
कर्दमेश्वर मंदिर का पृष्ठ भाग

पंचक्रोशी यात्रा में कर्दमेश्वर मंदिर का क्रमांक 33वा है। मैंने पहली बार इस क्रमांक पर गौर किया। यानि इस मार्ग के पहले 32 मंदिर हमसे छूट गए। उसी समय मैंने ठान लिया कि अगली बार मैं 0 या 1 से ही शुरू करते हुए आगे बढूंगी। तब तक मैं पंचक्रोशी से संबंधित पुस्तकें पढ़ रही हूँ ताकि इन मंदिरों की और जानकारी प्राप्त कर सकू।

मंदिर के आस-पास की संरचनाओं पर सफ़ेद संगमरमर के सूचकों पर काली स्याही से रुद्रष्टकम और शिव तांडव स्त्रोत लिखे हुए हैं। यह जगह कंडवा नाम से भी प्रसिद्ध है। यह बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से ज्यादा दूर नहीं है।

भीम चंडी मंदिर पड़ाव

चंदिकेश्वर महादेव मंदिर - काशी
चंदिकेश्वर महादेव मंदिर – काशी

भीम चंडी के मंदिर जाते समय हम रास्ते में गेंदे के फूलों के बागों में गए। फूलों का वह प्रफुल्लित पीला और केसरी रंग, धरती के हरे रंग और आकाश के नीले रंग पर खिला हुआ, जीवंत लग रहा था। अब मुझे पता चला कि वाराणसी के मंदिरों के फूल कहां से आते हैं।

चंदिकेश्वर मंदिर के मुख्य द्वार
चंदिकेश्वर मंदिर के मुख्य द्वार

भीम चंडी पड़ाव पर स्थित शिव मंदिर चंडीकेश्वर महादेव मंदिर के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर कर्दमेश्वर मंदिर से काफी मिलता-झूलता है। चंडीकेश्वर महादेव मंदिर भी संकीर्ण और ऊंचा मंदिर है, जिसका शिखर पत्थर खुदाई से बनाया गया है। यह मंदिर बहुत छोटा है, पर इसके पास स्थित जलकुंड बहुत बड़ा है। इस कुंड को गंधर्व सागर कुंड या गंधेश्वर के नाम से भी जाना जाता है।

चंडीकेश्वर मंदिर में स्थित शिवलिंगों के पास पांडवों की छोटी-छोटी मूर्तियाँ हैं।

गन्धर्व सागर कुण्ड
गन्धर्व सागर कुण्ड

यह बहुत ही दुख की बात है कि मंदिर के इस पवित्र कुंड में भी लोग अपने कपड़े धोते हैं, जिसके कारण कुंड का पानी प्रदूषित हो रहा है। गौर से देखने पर आपको इस कुंड की दीवारों में जलमार्ग दिखेंगे जो इस क्षेत्र में हो रहे बारिश के पानी के संचयन की ओर इशारा करते हैं।

इस पड़ाव का नामकरण पास में स्थित देवी भीम चंडी के मंदिर के आधार पर किया गया है। इस मंदिर के परिसर में बहुत सारे छोटे-बड़े मंदिर हैं। पंचक्रोशी यात्रा के मार्ग पर इस मंदिर का क्रमांक 60 है।

रामेश्वर मंदिर पड़ाव

भगवान् राम द्वारा स्थापित रामेश्वरम मंदिर
भगवान् राम द्वारा स्थापित रामेश्वरम मंदिर

रामेश्वर मंदिर वर्णा नदी के किनारे स्थित है। वर्णा उन दोनों नदियों में से एक है जिनके नाम के मेल से वाराणसी शहर को अपना नाम मिला है। दूसरी नदी का नाम है अस्सी नदी जिसका वर्णन हम पहले ही कर चुके हैं। इस मंदिर के शिवलिंग स्वयं भगवान राम ने अपनी पंचक्रोशी यात्रा के दौरान स्थापित किए थे, जिसके कारण यह मंदिर रामेश्वर के नाम से जाना जाता है।

वरुणा नदी
वरुणा नदी

रामेश्वर मंदिर के पास ही लक्षिमणेश्वर मंदिर, भरतेश्वर मंदिर और शत्रुघ्नेश्वर मंदिर स्थित है जो राम के छोटे भाइयों से संबंधित है। यह बहुत कम देखने को मिलता है कि भगवान राम के साथ उनके भाइयों के भी मंदिर हैं।

तुलजा भवानी मूर्ति - रामेश्वरम मंदिर परिसर में
तुलजा भवानी मूर्ति – रामेश्वरम मंदिर परिसर में

यहां पर एक और मंदिर है जो देवी तुलजा भवानी को समर्पित है। यह देवी का ही एक रूप है जो पश्चिम भारत में पूजा जाता है। यह महाराष्ट्र के शिवाजी महाराज की कुल देवी है और शिवाजी से जुड़ी हर जगह पर उनके मंदिर पाये जाते हैं। रामेश्वर में तुलजा भवानी की मूर्तियां बहुत बड़ी और सुंदर हैं। अगर आप इन मूर्तियों को ध्यान से देखेंगे तो आपके भीतर एक स्वभाभिक सा श्रद्धा भाव उत्पन्न होगा।

रामेश्वर मंदिर के पुजारी ने मुझे बताया कि औरंगजेब की सेना इस मंदिर तक कभी पहुँच नहीं पायी क्योंकि, तुलजा भवानी इस मंदिर की रक्षा करती है। पुजारी जी के अनुसार जब जब औरंगज़ेब की सेना ने मंदिर की ओर बढ़ने का प्रयास किया तब बिच्छू, सांप और मधुमक्खियाँ उनपर तब तब आक्रमण करती थी और उन्हें रास्ते में ही रोक दिया जाता था। इस मंदिर में आपको हर जगह शिवलिंग ही शिवलिंग दिखेंगे।

रामलीला खेलने को तत्पर बच्चे
रामलीला खेलने को तत्पर बच्चे

यहाँ मुझे बच्चों की एक टोली मिली जो रामलीला की तैयारी में मगन थे। राम, सीता, लक्ष्मण और साधारण मनुष्यों की पोशाख पहने ये बच्चे रामलीला की शुरुवात होने की राह देख रहे थे। आज पहली बार मैंने काशी की प्रसिद्ध रामलीला इतने नजदीक से देखा।

शिवपुर मंदिर पड़ाव

पांडव और द्रौपदी - शिवपुर पड़ाव मंदिर में
पांडव और द्रौपदी – शिवपुर पड़ाव मंदिर में

शिवपुर में स्थित मंदिर बहुत ही साधारण है। यहां पर अवरोही क्रम में 5 विभिन्न आकारों के 5 शिवलिंग हैं, जो पांडवों द्वारा स्थापित किए गए थे। इसी मंदिर के पास स्थित जलकुंड को द्रौपदी कुंड के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर शहर की सीमाओं के भीतर स्थित होने के कारण, आप यहां से पूरे शहर का दृश्य देख सकते हैं।

कपिल धारा मंदिर पड़ाव

कपिल मुनि द्वारा स्थापित महादेव मंदिर - कपिल धारा - काशी
कपिल मुनि द्वारा स्थापित महादेव मंदिर – कपिल धारा – काशी

वाराणसी के उत्तरी छोर की ओर स्थित यह मंदिर बहुत ही सुंदर है और यहाँ से आप नीचे स्थित बड़े से जलकुंड को देख सकते हैं। हम सीढ़िया चढ़कर मंदिर तक गए और प्रार्थना करने के बाद मंदिर के पुजारी से बातचीत करने लगे। वे हमे मुख्य मंदिर के पास ही स्थित एक छोटे से मंदिर के पास ले गए जहां पर कपिल मुनि की मूर्ति स्थापित है। माना जाता है कि इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग उन्हीं के द्वारा प्रतिष्ठित किया गया था।

जौं गणेश मंदिर और आदि केशव घाट

अदि घाट पे स्थित जौ गणेश मंदिर
अदि घाट पे स्थित जौ गणेश मंदिर

पंचक्रोशी यात्रा का आखिरी पड़ाव है जौं गणेश मंदिर जो छोटा सा है पर बहुत सुंदर है। इसमें गणेशजी की बहुत  ही सुंदर मूर्ति स्थापित है। यहां से आप गंगा और वर्णा नदी के संगम को देख सकते हैं। यह मंदिर आदि केशव घाट, जो वाराणसी के उत्तरी भाग में बसा हुआ है, के पास ही स्थित है। लोग इस मंदिर से जौं के छोटे-छोटे पौधे ले जाकर गंगा में लगाते हैं। कहा जाता है कि गंगा में जौं लगाना यानि बहुत बड़ा कार्य पूरा करना है। स्थानीय बोली में कहे तो ‘गंगा जी में जौं बो दिये’ यानि आपने बहुत बड़ी चीज प्राप्त कर ली है।

यहां से आपको फिर से नाव लेकर मणिकर्णिका घाट तक जाना होता है, जिससे कि आपकी यात्रा पूरी हो। मैंने यह पथ फिर अपनी गाड़ी में ही संपन्न किया।

जब से मैंने वाराणसी की यात्रा की थी तब से मेरे मन में पंचक्रोशी यात्रा करने की बहुत इच्छा थी। यात्रा पूरी करते ही मुझे एक पूर्णता का आभास हुआ । अब मैं कह सकती हूँ कि, मैंने गंगाजी में जौं बो दिये।

पंचक्रोशी परिक्रमा के लिए कुछ सुझाव

चना समोसा - पञ्च क्रोशि का प्रिय भोजन
चना समोसा – पञ्च क्रोशि का प्रिय भोजन

समोसा चना इस क्षेत्र का मुख्य आहार हैं। आपको इसके अलावा यहां पर ज्यादा कुछ खाना नहीं मिलेगा इसलिए आपने साथ खाना जरूर ले जाइए।

पानी के संबंध में भी अगर आप विशेष ध्यान रखते हैं तो अपने साथ पानी भी ले जाना अच्छा होगा।

क्योंकि मैंने नाव से सवारी नहीं की थी तो मुझे गाड़ी से परिक्रमा करने के लिए लगभग 12 घंटे लगे। इसलिए आपने वाहन के चुनाव के अनुसार आपने समय का भी ध्यान रखिए।

राह में मिलने वाले प्रत्येक मंदिर में चढ़ाने के लिए कुछ छुट्टे अपने पास जरूर रखिए। वहाँ के पुजारी आपसे विभिन्न रूपों में पैसों की माँग करेंगे, तो आप पहले से ही सोच लीजिये कि आपको क्या दान देना है और उस पर डटे रहिए।

वहां के पुजारियों से बातचीत कीजिये, उनके पास बताने के लिए बहुत सी कथाएँ होती है, जिसे सुनकर आपको आश्चर्य होगा।

पंचक्रोशी की पूरी यात्रा 25 कोस या लगभग 80 की.मी. की है। बीच-बीच में भीड़ भरे रास्तों से गुजरते हुए इस यात्रा का आरंभ और अंत वाराणसी के सीमाओं के भीतर ही होता है।

काशी को मेरा धन्यवाद

इस यात्रा को सफल बनाने में बहुत से लोगों ने मेरी सहायता की है। सबसे पहले अशोक भैया का धन्यवाद, कि उन्होंने मेरे लिए अपनी गाड़ी भेजी। प्रदीप जी का भी धन्यवाद, कि उन्होंने मुझे पूरे दिन बिना किसी हिचकिचाहट के चेहरे पर बड़ी सी हंसी के साथ काशी घुमाया। दिलीप कुमार गुप्ता जी, उत्तर प्रदेश के पर्यटन पुलिस,का भी धन्यवाद, कि उन्होंने काशी से संबंधित अपना ज्ञान मुझसे बांटा तथा मेरी सुरक्षा का दायित्व भी निभाया। आप मेरे गुरु हुए जो प्रत्येक समय काशी और पंचक्रोशी यात्रा से संबंधित कोई भी जानकारी हमे देते रहे। और आखिर में विकास सिंह का धन्यवाद, जिन्होंने पहले भी यह यात्रा की थी और हमारे साथ उन्होंने यह यात्रा फिर से की।

मैं खुश हूँ कि हमारे साथ आकर आपको इस यात्रा से संबंधित कुछ नयी बातें जानने का मौका मिला। मैं आशा करती हूँ कि आप आगे भी ऐसे ही जिज्ञासु यात्रियों को आपने साथ यात्रा पर ले जाएंगे।

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