ब्रज यात्रा Archives - Inditales श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Thu, 21 Apr 2022 05:10:24 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.7.5 बसंत पंचमी कैसे मनाई जाती है ब्रज में! https://inditales.com/hindi/braj-basant-panchami-utsav/ https://inditales.com/hindi/braj-basant-panchami-utsav/#respond Wed, 03 Aug 2022 02:30:27 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2748

ब्रज में बंसंत पंचमी सदा बसंत रहत वृंदावन पुलिन पवित्र सुभग यमुना तट।। जटित क्रीट मकराकृत कुंडल मुखारविंद भँवर मानौं लट। ब्रज में यूं तो ऋतुओं की भरमार है किंतु एक ऋतु ऐसी है जो ब्रज में अपने उन्माद को लिए हुए नित्य विराजमान है और वह है वसंत ऋतु। वृंदावन के रसिक आचार्य ने […]

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ब्रज में बंसंत पंचमी

सदा बसंत रहत वृंदावन पुलिन पवित्र सुभग यमुना तट।।
जटित क्रीट मकराकृत कुंडल मुखारविंद भँवर मानौं लट।

ब्रज में यूं तो ऋतुओं की भरमार है किंतु एक ऋतु ऐसी है जो ब्रज में अपने उन्माद को लिए हुए नित्य विराजमान है और वह है वसंत ऋतु। वृंदावन के रसिक आचार्य ने तो यहां तक कहा है की ब्रज से वसंत कभी भी एक क्षण के लिए बाहर नही जाता अपितु वह तो सदा सर्वदा यही श्री राधा कृष्ण की सेवा में रत रहता है। बसंत पंचमी का उत्सव इसी के अंतर्गत मनाया जाता है।

ज्योतिष एवं आयुर्वेद के अनुसार चैत्र तथा वैशाख मास को वसंत ऋतु माना गया है। शल्य चिकित्सा के प्रवर्तक सुश्रुत ने तो वसंत के लिए कहा है कि “मधुमाधवौ वसन्तः” अर्थात मधु(चैत्र) और माधव(वैशाख) ही वसंत है। तैत्तिरीय संहिता में भी कहा गया है कि “मधुश्व माधवश्व वासन्तिकावृत” अर्थात् मधु और माधव मास ही वसन्त ऋतु। तैत्तिरीय ब्राह्मण में ऋतुओं का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि “तस्य ते वसन्तः शिरः” अर्थात् वर्ष का सिर (शीर्ष) ही वसन्त ऋतु है। कालिदास ने वसंत ऋतु के वर्णन में अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ऋतुसंहार में कहा है “सर्वप्रिये चारूतरं वसन्ते” अर्थात वसंत ऋतु में सब कुछ मनोहर ही मालूम पड़ता है। इसके साथ ही गीत गोविंद में श्री जयदेव गोस्वामी लिखते है “विहरति हरिरिह सरस वसंते” अर्थात वसंत के वियोग से सभी दिशाएं प्रसन्न हो रही है। किंतु वर्तमान लोकांचल यानी उत्तर एवं पूर्वी भारत में मुख्यतः वसंत का आगमन माघ शुक्ल पंचमी अर्थात वसंत पंचमी के दिन ही माना जाता है।

सरसों के खेत
सरसों के खेत (साभार- निशांत शर्मा)

वसंत ऋतु के आगमन की बात करें तो माघ मास में भगवान भास्कर के मकर राशि में प्रवेश के उपरांत शीत ऋतु का प्रकोप कम होने लगता है। माघ शुक्ल पक्ष की पंचमी को ऋतुराज वसंत का आगमन पृथ्वी पर एक उत्सव के रूप में होता है। बसंत के स्वागत में वसुधा अपने रूप को सँवार कर बसंत का स्वागत करती है। बसंत के आगमन पर संपूर्ण सृष्टि में मादकता सी छा जाती है साथ ही पेड़ों के नवीन पात, वन उपवन में फूलों से लदी डाली, आम के बौर, कोयल की कूक एवं सरसों के रूप में पीली चुनर ओढ़े धरती यह सब सूचना देती हैं कि बसंत अब आ चुका है।

ब्रज में यह उत्सव अत्यंत ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। जहां प्राय भारत में अन्य जगह इस उत्सव पर लोग पीले वस्त्र धारण कर वाग्देवी श्री सरस्वती मां का पूजन अर्चन करते है वही दूसरी और ब्रज में यह उत्सव कुछ अलग ही ढंग से मनाया जाता है। वसंत पंचमी के दिन से ब्रज के सुप्रसिद्ध ४५ दिवसीय होलीकोत्सव का प्रारंभ हो जाता है। वसंत पंचमी को ब्रज में होली का प्रथम दिन माना जाता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने ऋतुओं में स्वयं को वसंत ऋतु बताया है :-

बृहत्साम तथा साम्नांगायत्री छन्दसामहम।

मासानां मार्गशीर्षोहमृतूनां कुसमाकरः।।

गायी जानेवाली श्रुतियों में बृहत्साम हूँ, वैदिक छन्दों में गायत्री छन्द हूँ, बारह महीनों में मार्गशीर्ष हूँ तथा छः ऋतुओं में, मैं ही वसन्त हूँ।

ब्रज के गांवों, नगरों एवं मंदिरों में वसंत उत्सव मनाने की परंपरा अनवरत रूप से आज भी जारी है। बसंत पंचमी से ब्रज में बसंत उत्सव का श्रीगणेश हो जाता है। इस दिन ठाकुरजी नवीन पीले वस्त्र धारण करते है। मंदिरों की सजावट भी पीले साज, वस्त्रों एवं फूलों से की जाती है। यहां तक कि पुजारी भी पीले वस्त्र पहन कर ही मंदिरों में सेवा करने हेतु पधारते है। नए सरसों के फूल ठाकुरजी को वसंत आगमन के उपलक्ष्य में निवेदित किए जाते है। साथ ही साथ कई जगह तो विशेष पीले रंग के भोग निवेदित किए जाते है। अपने इष्ट के मनमोहक स्वरूप को देखकर बृजवासी प्रेम के वशीभूत होकर सहज ही गा उठते हैं-

“श्यामा श्याम बसंती सलोनी सूरत को श्रंगार बसंती है”

श्री राधा कृष्ण की जो छटा है वह भी वसंती है (नित्य नवीन) तथा उनका श्रृंगार भी वसंती है।

बसंत पंचमी के दिन होली का डांढ़ा (खूंटा) गढ़ जाता है। होली का डांढ़ा वास्तव में वह खम्बा होता है जिसके ऊपर होलिका दहन हेतु लकड़ियाँ लगाई जाती है। आज से ही वृंदावन में होली का प्रारंभ भी हो जाता है। सभी देवालयों में होलिकाष्टक( होली से आठ दिन पहले) तक राजभोग पर यानि दोपहर समय अबीर गुलाल उड़ाया जाता है। विश्वविख्यात ठाकुर बांके बिहारी मंदिर में प्रसाद स्वरूप अबीर -गुलाल भक्तों और दर्शनार्थियों के ऊपर बहुत ही अधिक मात्रा में उड़ाया जाता है।

इसी के साथ वृंदावन में स्थित शाह बिहारी मंदिर में बसंत पंचमी के दिन बसंती कमरा 3 दिनों के लिए खुलता है। रंग- बिरंगी रोशनी से सराबोर बसंती कमरे में विराजमान ठाकुर राधा रमण लाल की अलौकिक छटा होती है। यह कमरा वर्ष में बहुत ही कम दिनों के लिए खुलता है। इस कमरे में बेल्जियन कांच के बने झाड़ फ़ानूस लगे हुए है जिससे इसकी शोभा और बढ़ जाती है। होली का छेता निकलने के साथ ही वृंदावन के प्रमुख मंदिर श्री राधावल्लभ मंदिर, श्री राधारमण मंदिर, श्री राजबिहारी कुंज बिहारी मंदिर, श्री राधा दमोदर मंदिर आदि अन्य मंदिरों में भी बसंत उत्सव का प्रारंभ हो जाता है।

बांके बिहारी मंदिर में अबीर गुलाल - बसंत पंचमी
श्रीबांकेबिहारी मंदिर में वसंतोत्सव पर अबीर गुलाल का खेल (साभार-श्रीकृष्णचंद्र गोस्वामी जी)
वसंतोत्सव पर श्रीराधारमणलालजी - बंसंत पंचमी श्रृंगार
वसंतोत्सव पर श्रीराधारमणलालजी (साभार- निशांत शर्मा)
वसंतोत्सव पर श्री कृष्ण बलराम,नंदगांव
वसंतोत्सव पर श्री कृष्ण बलराम,नंदगांव (साभार- अंजलि स्याल)

कुहू कुहू कोकिला सुनाई। सुनि सुनि नारि परम हरषाई।।
बार बार सो हरिहि सुनावति। ऋतु बसंत आयौ समुझावति।।
फाग-चरित-रस साध हमारै। खेलहिं सब मिलि संग तुम्हारै।।
सुनि सुनि ‘सूर’ स्याम मुसुकाने। ऋतु बसंत आयौ हरषाने।।

कोयल की कुहू कुहू सुनकर सभी सखियाँ हर्ष से फूली नहीं समा रही है और वह श्री कृष्ण को नित्य विहार हेतु यह कह कर मना रही है कि सुनो प्रिय वसंत ऋतु का आगमन हो चूका है। अतः अंत में सखियों के मनाने से श्रीकृष्ण मंद-मंद मुस्काने लग जाते है और सखियों के संग वसंत उत्सव मानने चले जाते है।

वसंतोत्सव पर बसंती कमरा, शाहजी मंदिर, वृन्दावन
वसंतोत्सव पर बसंती कमरा, शाहजी मंदिर, वृन्दावन (साभार- श्री प्रशांत शाह)

वृंदावन के मंदिरों में बसंत की समाज भी अद्भुत होती है। वाणी साहित्य में श्यामा- श्याम के बसंत खेल का वर्णन प्रचुर मात्रा में किया गया है। इन पदों का गायन ठाकुर जी के समक्ष पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ किया जाता है। ब्रज में बसंत गायन की एक सुदीर्घ परंपरा रही है। रसिक उपासना का केंद्र रहे वृंदावन में बसंत लीला को निकुंज लीला से जोड़कर भी देखा जाता है। हरित्रयी के नाम से विख्यात रसिक संत स्वामी श्री हरिदास जी, श्री हरिराम व्यास जी एवं श्री हित हरिवंश जी ने अपने रचित पदों में बसंत का भरपूर गान किया है। वृंदावन की मंदिर परंपरा में आज भी बसंत के इन पदों का गान किया जाता है। ब्रज में बसन्त पूजन की परंपरा अत्यंत प्राचीन है।

बसंत पंचमी पूजन विधि

महावाणी’ नामक ग्रंथ में बसंत पूजन विधि का विशद वर्णन किया गया है जिसे गोलोक वृन्दावन (नित्य वृन्दावन जहां केवल राधा कृष्ण एवं सखियाँ होती है) में सखियाँ मिल कर सम्पादित करती है। इसमें मुख्य रूप से सखियों द्वारा पुष्प समर्पण और संगीत द्वारा सेवा निवेदित कर श्री राधा कृष्ण की वसंत सेवा को बड़ी ही सुंदरता के साथ बताया गया है। चूंकि भौम वृंदावन उस गोलोक वृंदावन का ही प्रतिबिंब है इसलिए ठीक उसी प्रकार वृंदावन एवं ब्रज में वसंत पंचमी पर उत्सव आदि किए जाते है। हरिभक्तिविलास के अनुसार वसंत पंचमी पर मंदिरों में नव पत्र, पुष्प एवं अनुलेपन द्वारा मंदिरों में पूजा संपादित की जाती है। श्री राधा कृष्ण की वसंत के नए पीले सरसों के फूल चढ़ाए जाते है। इसके साथ ही संगीत सेवा जो कि वृंदावन की सेवा परिपाटी का अभिन्न अंग है वो भी वसंत पंचमी पर विशेष महत्व रखती है। वसंत राग का प्रारंभ इसी दिन से शुरू हो जाता है व समाज गायन ने वसंत राग से भरे पदावलियों का गायन किया जाता है।

और राग सब बने बराती दुल्हो राग बसंत,

मदन महोत्सव आज सखी री विदा भयो हेमंत।

रसिक शिरोमणि स्वामी हरिदास वृंदावन की रस निकुंज में जहाँ कुंजबिहारी अपना वसंतोत्सव मना रहे हैं, इस दिव्य रस उत्सव का दर्शन कराते हुए गान करते हैं-

कुंजबिहारी कौ बसन्त सखि, चलहु न देखन जाँहि।

नव-बन नव निकुंज नव पल्लव नव जुबतिन मिलि माँहि।

बंसी सरस मधुर धुनि सुनियत फूली अंग न माँहि।

सुनि हरिदास” प्रेम सों प्रेमहि छिरकत छैल छुवाँहि।।

श्रीराधारमण मंदिर में समाज गायन बसंत पंचमी पर
श्रीराधारमण मंदिर में समाज गायन (साभार- निशांत शर्मा)

सखी कह रही है की चलो नव पल्लवों से युक्त वसंत से ओत प्रोत उस कुञ्ज की ओर चले जहां श्याम वंसी बजा रहे है। उस कुञ्ज में सभी आनंद से फुले हुए है और प्रेम रूपी अबीर ही सब पर डाला जा रहा है।

भारतेंदु बाबू द्वारा रचित ‘मधु मुकुल’ की पंक्तियां वृंदावन के बसंत का वर्णन कुछ इस प्रकार करती हैं-

एहि विधि खेल होत नित ही नित, वृन्दावन छवि छायो।

सदा बसन्त रहत जँह हाजिर,कुसुमित फलित सुहायो।।

वृन्दावन की दिव्य लीलास्थली पर नित प्रति वसंत का खेल होता ही रहता है। यहां वसंत सदा सर्वदा पुष्पित पल्लवित होकर विराजमान है।

वृंदावन और बसंत का संबंध अभिन्न है। इस संबंध के विषय में जितना कहा जाए उतना ही कम प्रतीत होता है। श्रीकृष्ण का पूरा जीवन हर्ष का प्रतीक है ,उल्लास का प्रतीक है, नवीनता का प्रतीक है और ऐसे में वसंत से सुन्दर और कौन सी ऋतु होगी जिसमे स्वयं भगवान प्रफुल्लित न हो। इस ऋतु के आगमन से चहुँ और वनस्पति की छटा पुनः हरी भरी होनी शुरू हो जाती है। सर्दी के आलस्य को त्याग प्रकर्ति दोबारा पुष्पित पल्लवित नव कलेवर में जाने को तत्पर रहती है। वातावरण में एक विचित्र ऊर्जा विद्यमान रहती है तथा सरसो से लहलहाते हुए खेत मानव ह्रदय को एक अलग ही भाव से भर देते है। वास्तव में वसंत और कुछ नहीं भगवान कृष्ण द्वारा दिया हुआ समस्त मानव जाति को एक छुपा हुआ सन्देश है जिसमे वह आवाहन कर रहे है कि हम सब अपने जीवन के उल्लास को सभी व्याधि और कष्टों से हटकर पुनः जीवित करे ताकि आनंद सदा सर्वदा बना रहे। क्योंकि जब तक आनंद है तब तक रस है और जब तक रस है केवल तब तक ही नवीनता है क्योंकि रस का आनंद तभी तक है जब तक वो नवीन रहता है अर्थात ताज़ा रहता है जैसे ही वह बासी हुआ वैसे ही अधोगति प्रारम्भ। अपने जीवन को सदा वृन्दावन बनाये ताकि नवीनता सदा बनी रहे और स्वयं रसमूर्ति श्रीकृष्ण आपके ह्रदय रूपी रसशाला में विहार करते रहे।

नवल वसंत, नवल वृंदावन, नवल ही फूले फूल,
नवल ही कान्हा, नवल सब गोपी, नृत्यत एक ही तूल।
नवल ही साख, जवाह, कुमकुमा, नवल ही वसन अमूल,
नवल ही छींट बनी केसर की, भेंटत मनमथ शूल।
नवल गुलाल उड़े रंग बांका, नवल पवन के झूल,
नवल ही बाजे बाजैं, “श्री भट” कालिंदी के कूल।
नव किशोर, नव नगरी, नव सब सोंज अरू साज,
नव वृंदावन, नव कुसुम, नव वसंत ऋतुराज ।


यह श्री सुशांत भारती द्वारा प्रदत्त एक अतिथि संस्करण है। श्री सुशांत भारती एक संरक्षक वास्तुविद हैं। उन्होंने नई दिल्ली के स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर तथा वास्तुकला अकादमी कॉलेज ऑफ आर्किटेक्चर से वास्तुकला में क्रमशः स्नातकोत्तर एवं स्नातक की उपाधियाँ प्राप्त की हैं। भारत के विभिन्न सांस्कृतिक आयामों में उनकी विशेष रुचि है। वास्तुकला की विविधता उनके अध्ययन का मुख्य विषय है। ‘ब्रज की सांस्कृतिक धरोहर’ एवं ‘भारतीय मंदिरों की वास्तुकला’ उनके शोध के प्रमुख क्षेत्र हैं। वर्तमान में वे जनपथ, नई दिल्ली में स्थित, भारतीय संग्रहालय के भारतीय संग्रहालय संस्थान में अनुसंधान सहायक के पद पर कार्यरत हैं।

सुशांत द्वारा लिखे ये अन्य संस्करण पढ़ें:

सांझी कला –ब्रज वृंदावन की पारंपरिक अलंकरण कला

ब्रज की फूल बंगला परंपरा

रसिकप्रिया – बुंदेलखंड का गीत गोविंद

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मानवी चेतना के आरंभ से मनुष्य प्रकृति के विभिन्न रूपों की आराधना करता आ रहा है। मनुष्य ने अपनी कल्पना में प्रकृति के अनेक दैवी रूपों को प्रकट किया है। देव सदृश प्रकृति की ओर अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने में वह सदैव आनंद का अनुभव करता आया है। जैसे जैसे समय व्यतीत हुआ, उसकी प्रथाओं […]

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मानवी चेतना के आरंभ से मनुष्य प्रकृति के विभिन्न रूपों की आराधना करता आ रहा है। मनुष्य ने अपनी कल्पना में प्रकृति के अनेक दैवी रूपों को प्रकट किया है। देव सदृश प्रकृति की ओर अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने में वह सदैव आनंद का अनुभव करता आया है। जैसे जैसे समय व्यतीत हुआ, उसकी प्रथाओं में परिवर्तन होते गए। अब मनुष्य प्रकृति से प्राप्त विभिन्न पदार्थों का अर्पण कर भगवान के दिव्य रूप की आराधना करने लगा है। यह प्रथा परोक्ष अथवा अपरोक्ष रूप से अब भी वनस्पति एवं जीव-जंतुओं से संबंध रखती है। फूल बंगला ऐसी ही एक प्रथा है जिसमें प्रकृति का उत्सव मनाया जाता है।

भारत में प्रकृति से प्राप्त लगभग सभी पदार्थों को भगवान को अर्पित करने के लिए सर्वाधिक पवित्र माना जाता है। उनमें पुष्पों को सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं विशेष चढ़ावा जाना जाता है। श्रीमद् भगवत गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं:

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः।।9.26।।

हे अर्जुन! जो भी भक्त मेरे लिए पत्र, पुष्प, फल, जल आदि भक्ति से अर्पण करता है, उस शुद्ध मन के भक्त द्वारा वह भक्तिपूर्वक अर्पण की गई भेंट मैं प्रेम से स्वीकार करता हूँ।

वेदों, उपनिषदों, पुराणों जैसे सभी प्राचीन ग्रंथों ने प्रकृति एवं उसके विभिन्न रूपों की आराधना की परम महत्ता को विस्तृत रूप से उजागर किया है। इस परिप्रेक्ष्य में ब्रज का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। सम्पूर्ण कृष्ण लीला किसी ना किसी रूप में प्रकृति के चारों ओर ही केंद्रित थी। गोवर्धन, यमुना, वृंदा, गऊ इत्यादि प्रकृति के वे प्रतिनिधि हैं जिन्होंने भगवान कृष्ण के जीवन में विशेष भूमिकाएं निभायी हैं।

फूल बंगला प्रथा का इतिहास

फूल बंगला के लिए फूल
फूल बंगला के लिए फूल

१६ वीं. सदी में भारत में भक्ति आंदोलन का समय था जब सम्पूर्ण भारत से अनेक साधू-महात्मा ब्रजभूमि आए थे। उस समय विद्यमान राजनैतिक एवं सामाजिक परिस्थिति में कृष्ण भाव पुनः स्थापित करने में ब्रज का अविस्मरणीय योगदान रहा है। इन साधु-महात्माओं ने ब्रज में विद्यमान वृक्ष वाटिकाओं एवं उपवनों में प्रकृति की प्रचुरता को मुक्त हृदय से स्वीकार किया था। उन्होंने चारों ओर स्थित प्रकृति को अपने दैनिक अनुष्ठानों एवं सेवाओं का अभिन्न अंग बना लिया था।

धर्म गुरुओं द्वारा आरंभ किये गए अनेक पंथों ने किसी ना किसी रूप में प्रकृति को अपनी रीति से भगवान की आराधना का अभिन्न अंग बनाया है। इस प्रथा के चलते ब्रज की पावन भूमि में अनेक मंदिरों का निर्माण हुआ। इसके साथ ही ब्रज में अनेक पारंपरिक एवं सांस्कृतिक कला शैलियाँ विकसित एवं पोषित हुईं जिनके द्वारा भगवान को सेवा अर्पित की जाती थी। इस प्रकार की गई भगवान की सेवा ने अनेक सांस्कृतिक शिल्पों एवं कला शैलियों को विकसित होने का अवसर प्रदान किया। रथयात्रा में प्रयुक्त भव्य रथ, झूला यात्रा में प्रयोग किया गया झूला इत्यादि इसके कुछ उदाहरण हैं। इस संस्करण में हम भगवान की जिस सेवा का उल्लेख कर रहे हैं वह है वृंदावन व ब्रज के मंदिरों में पुष्प सज्जा, जिसे फूल बंगला  भी कहा जाता है।

धन्यं वृन्दावनं तेन भक्तिर्नृत्यति यत्र च॥

– पद्म पुराण, भागवत माहात्म्य (1.61)

धन्य है वृंदावन की पावन भूमि, जहाँ भक्ति सम्पूर्ण परमानन्द में नृत्य करती हैं।

वृंदावन का भक्ति नृत्य सर्वोच्च परमानन्द का प्रतीक है। यह विविध पूजा अनुष्ठानों का परिणाम है जिन्हे उस काल के विभिन्न आध्यात्मिक महानुभावों ने आरंभ किया था। इसी की स्पष्ट झलक हमें ब्रज भूमि के अनेक सांस्कृतिक कलाओं में आज भी दृष्टिगोचर होती हैं।

वृंदावन का फूल बंगला

वृंदावन की वर्तमान फूल बंगला परंपरा प्राचीन अनुष्ठानिक परंपरा की ही निरन्तरता है। यद्यपि यह फूल बंगला सम्पूर्ण ब्रज में बनाया जाता है एवं इसका उत्सव मनाया जाता है, तथापि परंपरा में विविधता के कारण वृंदावन में इसे विशेष सम्मान प्रदान किया जाता है।

१६ वीं. सदी के साहित्यों में फूल महल, फूल कुंज, फूल भवन तथा फूल बैठक जैसे शब्दों का उल्लेख है। फूल बंगला, यह शब्द १७ वीं. सदी के साहित्यों में देखा गया है। हरिभक्तिविलास, केलीमाल, हित चौरासी तथा सुरसागर जैसे मध्यकालीन ग्रंथ भी फूल बंगला अनुष्ठान की, भगवान को अर्पित सेवा के रूप में, विस्तृत चर्चा करते हैं।

हमारे प्राचीन ग्रंथों के अनुसार पुष्प सज्जा उन ६४ कलाओं में से एक है जिसे मनुष्य आत्मसात कर सकता है। मानवी भावनाओं एवं धार्मिक संस्कारों का यह अद्भुत संगम ब्रज को एक अप्रतिम आभा प्रदान करता है। ग्रीष्म ऋतु की चिलचिलाती उष्णता में ब्रज के दैवी वनों के प्राकृतिक परिदृश्यों को पुनर्सृजन करने का यह प्रयास, वास्तव में मंदिर की प्रतिमाओं को सुवासित पुष्पों की शीतलता द्वारा सुख प्रदान करने की एक चेष्टा है। मंदिरों में किये जाने वाली इस पुष्प सज्जा का मूल सिद्धांत भी यही है।

फूल बंगला कब मनाया जाता है?

यह उत्सव चैत्र शुक्ल एकादशी अर्थात् अक्षय तृतीया से आरंभ होकर हरियाली तीज से एक दिवस पूर्व समाप्त होता है। अर्थात् यह उत्सव वैशाख, ज्येष्ठ तथा आषाढ़, ये तीन मास की अवधि तक मनाया जाता है। अंग्रेजी पंचांग के अनुसार यह अवधि अप्रैल के मध्य से जुलाई के मध्य तक होती है।

इस पुष्पोत्सव के दर्शन करने का एवं इसका आनंद उठाने का सर्वोत्तम समय ग्रीष्मऋतु है क्योंकि इस समय प्रचुर मात्रा में पुष्प उपलब्ध होते हैं। जैसे ही वर्षा ऋतु आरंभ होती है, पुष्प सजावट का आकार छोटा होने लगता है। वर्षा ऋतु में पुष्पों की आवक घट जाती है जिससे फूल बंगले की सज्जा में प्रयुक्त पुष्पों की प्रचुर मात्रा की आपूर्ति नहीं हो पाती।

बेला, गेंदा और पाटाल के फूल
बेला, गेंदा और पाटाल के फूल

इस पुष्प सज्जा में विशेषतः बेला अथवा चमेली पुष्प का सर्वाधिक प्रयोग होता है। गुलाब एवं गेंदे के पुष्प तथा अशोक वृक्ष की पत्तियों का भी प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया जाता है। केले के तने की छाल को उत्कीर्णित कर भी इस सज्जा में प्रयोग किया जाता है। वृंदावन के विभिन्न धार्मिक समुदायों के अभिलेखों व ग्रंथों में विविध प्रकार के पुष्पों का उल्लेख किया गया है जो १६ वीं. सदी से अब तक इस पुष्प सजा की कला को प्रभावित करते आए हैं। वृंदावन के लगभग सभी मंदिर इस परंपरा का पालन करते हैं। उनमें से कुछ लोकप्रिय मंदिर हैं, बाँके बिहारी जी, राधावल्लभ जी, राधारमण जी, राधादामोदर जी, रंग जी, राधाश्याम सुंदर जी, भट्ट जी इत्यादि।

फूल बंगला कैसा दिखता है?

लकड़ी के भिन्न भिन्न आकार के चौखटों को व्यवस्थित रीति से लगा कर एक अस्थायी संरचना निर्मित की जाती है। इसे स्थानीय भाषा में थाट कहते हैं। तत्पश्चात विभिन्न पुष्पों द्वारा अलंकृत कर इस अस्थायी संरचना को एक मंदिर का रूप दिया जाता है। संध्या के समय भगवान के विग्रह अथवा मूर्ति को पुष्प के मंदिर के भीतर बिठाया जाता है। रात्रि तक मूर्ति इस पुष्प मंदिर में ही विराजमान रहती है।

बेला के फूलों से थाट की सज्जा
बेला के फूलों से थाट की सज्जा

फूल बंगले की चौखटों को विभिन्न नामों से पहचाना जाता है, जैसे छज्जा, पिछवाई, हाथी, बगली इत्यादि। इनके नामों से आप भी इन्हे पहचान गए होंगे। रूपरेखा के अनुसार इन चौखटों को अपने अपने स्थानों पर बिठाया जाता है। इन चौखटों की किनारियों पर आवश्यकतानुसार कीलें गढ़ी होती हैं। कलाकार इन कीलों की सहायता से एवं रूपरेखा के अनुसार चौखटों पर बेला पुष्प की लंबी लंबी लड़ियाँ सजाते हैं। चौखटों की व्यवस्था जगमोहन की आकृति एवं माप के अनुसार की जाती है जो गर्भगृह के ठीक बाहर का क्षेत्र होता है।

बेला के फूलों से सजा थाट
बेला के फूलों से सजा थाट
फूल बंगला बनते हुए
फूल बंगला बनते हुए

केले के तने की छाल द्वारा अलंकरण

केले की छाल से सज्जा
केले की छाल से सज्जा

केले के तने की छाल से अलंकरण करने के लिए तने के सबसे भीतरी भाग को सावधानी पूर्वक निकाला जाता है। इन्हे विभिन्न आकृतियों में काटकर चौखटों पर लगाया जाता है। एक बड़ा फूल बंगला बनाने के लिए ६ से १० लोगों को लगभग ४ से ६ घंटों का समय लग जाता है। वर्तमान में वृंदावन तथा वृंदावन के बाहर स्थित ब्रज के अन्य मंदिरों में कलाकारों के ६ से ७ ऐसे समूह हैं जिन्होंने यह पारंपरिक पुष्प सज्जा बनाने का प्रशिक्षण प्राप्त किया है।

१८ वीं. शताब्दी में श्री प्रेमदास जी द्वारा ब्रज भाषा में रचित यह प्रसिद्ध दोहा इस परंपरा की सुंदरता का बखान करता है:

मोतिया की जाली में गुलाब ही के फूल खांचे, बंगला में रचे सोनजूही के से द्वार है

कंज के कमल राजे माधवी के छज्जा छान्जे, पीत चमेली के लटकन अति चारु है

फूल के सिंघासन पे फूल रहे श्यामा श्याम, फूलन के अभिराम शोभित शृंगार है

प्रेमदास हित वारी फूली अति फुलवारी, कुंज केली फूली भारी फूले रतिमार है

उत्सव क्षेत्र

वृन्दावन के श्री राधारमण मंदिर में अक्षय तृतीया पर फूल बंगला
वृन्दावन के श्री राधारमण मंदिर में अक्षय तृतीया पर फूल बंगला

वृंदावन उत्सवों की धरती है। वृंदावन में कदाचित एक भी ऐसा दिवस नहीं होगा जब किसी उत्सव अथवा अनुष्ठान का आयोजन नहीं किया जा रहा हो। ब्रज की भक्ति परंपरा में कहावत है, भाव ग्राही जनार्दन। इसका अर्थ है कि भाव से अर्पित सभी पदार्थ भगवान कृष्ण सहर्ष स्वीकार करते हैं। वृंदावन भक्ति का प्रतीक है। इस प्रथा का आनुष्ठानिक दृष्टिकोण मुख्यतः उष्ण वातावरण में भगवान को सुख एवं समाधान प्रदान करने की भावना है जो एक भक्त के हृदय को तृप्त करता है।

अन्याभिलाषिता-शून्यम ज्ञान-कर्मध्यानवृतम,

अनुकुल्येन् कृष्णानुसील नम् भक्ति-उत्तम।

— श्री भक्ति-रसामृत-सिंधु (१.१.११)

संक्षेप में इसका अर्थ है, जब कृष्ण की सुख-सुविधा के लिए कोई सेवा अर्पित की जाती है तो वह सेवा भक्ति की चरम सीमा मानी जाती है।

वृंदावन सदा से सेवभाव की भूमि रही है। वृंदावन के कोने कोने में वर्षों से यह सेवा भाव देखा जा रहा है। सेवा वृंदावन के आनुष्ठानिक स्वरूप का अखंड भाग है। वृंदावन के मंदिरों को विभिन्न सांस्कृतिक कार्यकलापों से जोड़ने में यही सेवा भाव उत्प्रेरक है। यह भगवान एवं एक भक्त के मध्य के सुमधुर संबंध का परम प्रतीक है।

इस संस्करण में प्रयुक्त अधिकांश छायाचित्र निशांत शर्मा फोटोग्राफी के सौजन्य से प्राप्त किये गए हैं। उन अप्रतिम छायाचित्रों के लिए उनका विशेष आभार!!!

राधे-राधे !!!

यह सुशांत भारती द्वारा अभिदत्त एक अतिथि संस्करण है।

सुशांत भारती एक संरक्षण वास्तुकार हैं। उन्होंने वास्तुकला अकादमी कॉलेज ऑफ आर्किटेक्चर से वास्तुशास्त्र में स्नातक के उपाधि तथा नई दिल्ली के स्कूल ऑफ प्लैनिंग एण्ड आर्किटेक्चर से स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की है। भारत के विभिन्न सांस्कृतिक आयामों के शोध में उनकी विशेष रुचि है। वास्तु विविधता के साथ साथ उनके शोध के मूल विषय हैं, ‘ब्रज की सांस्कृतिक धरोहर’ एवं ‘भारतीय मंदिर वास्तुकला’। वर्तमान में वे नई दिल्ली के जनपथ पर स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय के राष्ट्रीय संग्रहालय संस्थान में रिसर्च असिस्टन्ट के पद पर कार्यरत हैं।

सुशांत भारती द्वारा लिखा यह संस्करण अवश्य पढ़ें – RasikPriya – The Geet Govind of Bundelkhand

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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सांझी कला – ब्रज वृंदावन की पारंपरिक अलंकरण कला https://inditales.com/hindi/braj-vrindavan-ki-sanjhi-kala/ https://inditales.com/hindi/braj-vrindavan-ki-sanjhi-kala/#comments Wed, 10 Feb 2021 02:30:25 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2195

सांझी कला सांस्कृतिक रूप से धनी, ब्रज में प्रचलित अनेक कला क्षेत्रों में से एक है। भगवान कृष्ण से संबंधित सांस्कृतिक पृष्ठभूमि होने के फलस्वरूप ब्रज प्राचीन काल से ही विभिन्न लोक शैलियों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। हस्तकला, संगीत, वास्तुकला, शिल्पकला इत्यादि उनमें प्रमुख हैं। लोकनायक भगवान कृष्ण का नाम कर्णों में गूँजते ही […]

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सांझी कला सांस्कृतिक रूप से धनी, ब्रज में प्रचलित अनेक कला क्षेत्रों में से एक है।

भगवान कृष्ण से संबंधित सांस्कृतिक पृष्ठभूमि होने के फलस्वरूप ब्रज प्राचीन काल से ही विभिन्न लोक शैलियों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। हस्तकला, संगीत, वास्तुकला, शिल्पकला इत्यादि उनमें प्रमुख हैं। लोकनायक भगवान कृष्ण का नाम कर्णों में गूँजते ही लताओं से भरे उद्यान, यमुना नदी, नदी के तीर पर उनका क्रीड़ास्थल, ब्रज की पावन भूमि, सभी दृश्य नैनों के समक्ष प्रकट होने लगते हैं। ब्रज के सांस्कृतिक एवं कलात्मक आभूषणों के धागे-डोरे इसी पावन क्रीड़ास्थल से निकल कर आते हैं जहाँ भगवान का सर्व-व्यापी रूप अनंतकाल तक के लिए हमारे लिए प्रेरणा का स्त्रोत बन गया है।

वृन्दावन की अष्टभुजा सांझी
वृन्दावन की अष्टभुजा सांझी

ब्रज में भिन्न भिन्न शैलियों के संगीत, नृत्य, साहित्य, दृश्य-कला इत्यादि कला के विभिन्न घटकों का पृथक अस्तित्व ना होते हुए एक अतिसुन्दर संयोजन है। यह सम्मिश्रण समरूप संश्लेषण के रूप में जीवंत प्रतीत होता है। १६वीं सदी में व्याप्त भक्ति आंदोलन के काल में इन कला क्षेत्रों में तीव्र गति से प्रगति हुई थी। इसका प्रमुख कारण था कि भारत के विभिन्न क्षेत्रों से भिन्न भिन्न कला में निपुण कला प्रेमी ब्रज में एकत्र होते थे। कृष्ण के प्रेम एवं भक्ति के परमानन्द में सराबोर भक्तों का यह प्रमुख केंद्र बन गया था। कृष्ण के प्रति भक्तों का स्नेह अपनी चरमसीमा में होता था। १६वीं सदी में ही ब्रज विभिन्न कला शैलियों एवं सांस्कृतिक परंपराओं का गढ़ बन गया था। ऐसी ही एक कला शैली है सांझी। यह कला शैली मूलतः राधा-कृष्ण से संबंधित पवित्र ग्रंथों से संबंध रखती है।

सांझी क्या है?

सांझी शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत शब्द ‘संध्या’ से हुई है। संध्या, गोधूलि की वह बेला जब गायें गोशालाओं में लौटती हैं। भारतीय धर्म ग्रन्थों में किसी भी अनुष्ठान के लिए इसे अत्यंत पवित्र समय माना जाता है।। श्रीमद्भागवत के अनुसार, राधारानी ने स्वयं सांझी की परंपरा का आरंभ किया था जब गोपियों के संग उन्होंने सांझी की अप्रतिम आकृतियों की रचना की थी। रूठे कृष्ण को मनाने के लिए उन्होंने वन जाकर रंगबिरंगे पुष्प एकत्र किये थे तथा भूमि पर उन पुष्पों से उनके लिए सुंदर आकृतियाँ बनायी थीं।

बरसाना गाँव में गोबर से बनी सांझी
बरसाना गाँव में गोबर से बनी सांझी

यह इस परंपरा का धार्मिक दृष्टिकोण है। रूठे कृष्ण को मनाना सांझी की प्रमुख अभिव्यक्ति है। यह राधा-कृष्ण की रास लीलाओं में निहित कोमल भावनात्मक स्थिति का चित्रण है। दूसरे शब्दों में, यह ब्रज के रोम रोम में बसी एक प्राचीन लोक परंपरा है जिसमें एक धार्मिक विषयवस्तु का सुंदर चित्रण किया जाता है।

कुमारियों का उत्सव

प्रारंभ में ब्रज की अविवाहित कन्याएँ गाय के गोबर एवं पुष्पों द्वारा भित्तियों पर सांझी की सुंदर कलाकृतियाँ बनाती थीं। तत्पश्चात इस सांझी को देवी का स्वरूप मानकर सुयोग्य वर की कामना से उनकी वंदना करती थीं। गाय के गोबर एवं पुष्पों द्वारा सांझी की रचना करने की प्रथा ब्रज में प्राचीन काल से चली आ रही है। सांझी कला ब्रज की कला एवं संस्कृति का अविभाज्य घटक है। इसका मूल अस्तित्व ब्रज की लोक परंपरा में समाया हुआ है।

गोबर एवं पुष्पों द्वारा भित्तियों पर सांझी की कलाकृतियाँ रचती चरवाहा कन्याओं का, स्वामी हरीदास ने इन शब्दों में बखान किया है,

“कामधेनु के गोबर सो रचि साँझी फूलन चिति”
इसका अर्थ है, पुष्पों द्वारा सजाकर, गाय के गोबर से सांझी की रचना की गई है।

ब्रज के अतिरिक्त, वृंदावन में भी यह कला प्रचलित है। लोक कला के घटकों को धार्मिक परम्पराओं में सम्मिलित कर उसे नवीन ऊँचाइयाँ प्रदान करने का यह सर्वोत्तम उदाहरण है। इन आकृतियों के रूपांकन, रचना एवं वंदना करने की ग्रामीण प्रथा को वृंदावन के वैष्णव मंदिरों ने अपनाया। तत्पश्चात इस असाधारण सौन्दर्य युक्त रचना को अत्यंत उत्कृष्ट कला शैली में विकसित किया गया।

ब्रज की धार्मिक परंपराओं में सांझी

मंदिरों में १५ दिवसों के शरद उत्सव के अवसर पर सांझी का चित्रण किया जाता है जो भाद्रपद की पूर्णिमा से अश्विन मास की अमावस्या तक मनाया जाता है। अंग्रेजी पंचांग के अनुसार यह समयावधि सितंबर से अक्टूबर के मध्य स्थित है। सांझी कला शैली को मंदिर की परंपराओं में सम्मिलित करने के शुभकार्य में वृंदावन के पुष्टिमार्ग, गौड़ीय एवं राधावल्लभी जैसे वैष्णव समुदायों का महत्वपूर्ण योगदान है। यह योगदान उन्होंने अपने स्वतंत्र संप्रदाय भाव के अंतर्गत प्रदान किया है।

सांझी के लिए मिट्टी का मंच
सांझी के लिए मिट्टी का मंच

एक समय था जब आश्विन मास में वृंदावन के सभी मंदिरों में सांझी कलाकृति रची जाती थी। किन्तु अब वृंदावन के केवल तीन मंदिर ही ५०० वर्ष प्राचीन इस परंपरा पालन करते हैं। ये मंदिर हैं, राधारमण मंदिर, भट्टाजी मंदिर तथा शाहजहाँपुर मंदिर।

वृंदावन के मंदिरों में सांझी कलाकृति की रचना

सांझी कलाकृति में प्रशिक्षण प्राप्त ब्राह्मण पुरोहित ही वृंदावन के मंदिरों में सांझी कलाकृति की रचना करते हैं। मिट्टी के एक अष्टभुजाकार मंच पर सूखे रंगों का प्रयोग कर ये आकृतियाँ बनाई जाती हैं। अष्टभुजाकार मंच आठ पंखुड़ियों के कमल का प्रतिरूपण करता है।

भट्ट जी मंदिर में कृष्णा भट्ट जी सांझी बनाने में संलग्न
भट्ट जी मंदिर में कृष्णा भट्ट जी सांझी बनाने में संलग्न

मंदिर की वास्तुकला की रूपरेखा के समान ही सांझी के मध्य भाग में एक गर्भगृह होता है। इसमें रासलीला में रमें राधा एवं कृष्ण का दिव्य युगल सन्निहित होता है। भीतरी पावन स्थल के चारों ओर कलात्मक रूप से गुँथी अलंकृत आकृतियों की अनेक परतें होती हैं। ये आकृतियाँ आठों दिशाओं में दिव्य प्रकाश के प्रसारण की ओर संकेत करती हैं।

कागज़ के सांचे
कागज़ के सांचे

सांझी की जटिल रूपरेखा बनाने के लिए कागज के स्टेन्सिल की अनेक परतें एक के ऊपर एक रखी जाती हैं। ये निकृंत अर्थात् स्टेन्सिल अत्यन्त प्रतिभाशाली कागज काटने वाले कलाकारों द्वारा बनाए जाते हैं जिन्हे सजावटी आकृतियों के साथ राधा-कृष्ण की छवियों की भी भलीभाँति समझ होती है। अर्थात् जिनके हाथों में कला तथा हृदय में राधा-कृष्ण बसते हों। एक समय था जब कारीगर के मनोभाव के अनुसार उसी समय स्टेन्सिल काटे जाते थे।

उत्सव का समय

उत्सव का समय वही है जब गाँव की कन्याएँ सांझी वंदना करती हैं। यह समय एक अन्य वार्षिक अनुष्ठान से भी मेल खाता है, वह है पितृ पक्ष। अर्थात् अपने स्वर्गवासी पूर्वजों के लिए श्राद्ध एवं तर्पण करने का पक्ष। हिंदु मान्यताओं के अनुसार इस पक्ष में कोई भी शुभ कार्य आरंभ नहीं किया जाता। यह समय किसी भी धार्मिक अनुष्ठान अथवा उत्सव के लिए अशुभ माना जाता है।

श्री राधारमण मंदिर की पारंपरिक सांझी
श्री राधारमण मंदिर की पारंपरिक सांझी

किन्तु, सांझी को सांसारिक शुभ-अशुभ तर्कों के परे माना जाता है। प्रेम का यह उत्सव सभी सांसारिक मान्यताओं से कहीं ऊंचा है। इसमें पारलौकिक दोषहीनता सन्निहित है जो हर प्रकार के सांसारिक बंधनों से परे है। यद्यपि पुराणों तथा पौराणिक साहित्यों में इस उत्सव का कोई ठोस प्रमाण प्राप्त नहीं होता है, तथापि वैष्णव धर्मशास्त्रों में इस लोक परंपरा को प्रासंगिक रूप से समाहित किया गया है। वैष्णव धर्मग्रंथों में सांझी इस प्रकार सम्मिलित है कि लोक-पौरणिकी एवं ग्रंथ शास्त्रों में भेद करना कठिन हो जाता है।

विभिन्न शैलियाँ

सांझी की सूक्ष्म एवं जटिल रूपरेखा कलाकार का अत्यधिक समय एवं भरपूर परिश्रम की मांग करती है। किन्तु केवल समय एवं परिश्रम पर्याप्त नहीं है। इसके साथ कलाकार में उच्चतम स्तर की कुशलता अतिआवश्यक है। सर्वथा साधारण प्रकार की सांझी में रंगीन चूर्णों का प्रयोग किया जाता है। विशेष प्रकार की सांझी कलाकृतियाँ जल सतह तथा जल के तल पर की जाती है। सांझी में पुष्पों का प्रयोग भी प्रचलन में है।

जल के ऊपर तैरती सांझी
जल के ऊपर तैरती सांझी

जिस प्रकार भगवान के स्नान एवं अलंकरण के समय द्वार बंद किये जाते हैं, ठीक उसी प्रकार सांझी कलाकृति भी सम्पूर्ण दिवस बंद द्वारों के उस पार बनाई जाती है। सम्पूर्ण उत्सव समयावधि में, प्रत्येक दिवस एक नवीन कलाकृति की रचना की जाती है। पूर्ण दिवस व्यतीत कर वे इस उत्कृष्ट कलाकृति की रचना करते हैं जिसे संध्या की पूजा अर्चना के समय जनता के दर्शन के लिए प्रदर्शित किया जाता है।

सांझी के गीत

वैष्णव मंदिरों के धार्मिक अनुष्ठान यथोचित भक्ति गीतों के बिना सर्वथा अधूरे हैं। सांझी कलाकृतियों के प्रदर्शन के समय भी गीत-संगीत का प्रदर्शन होता है। प्रत्येक उत्सव से संबंधित गीतों की लंबी सूची है। इन गीतों के बोल उस उत्सव से संबंधित भावना, उपासना एवं ठेठ प्रथाओं का बखान करते हैं। सर्वाधिक सुव्यक्त वैष्णव मान्यता के अनुसार राधा एवं गोपिकाएं पुष्प एकत्र कर, उनसे अप्रतिम कलाकृतियों की रचना करती हैं तथा देवी संध्या की वंदना करती हैं।

जल के नीचे बनी सांझी
जल के नीचे बनी सांझी

राधारमण मंदिर के श्री गल्लू जी गोस्वामी ने सांझी एवं इस उत्सव के लिए इस भक्ति गीत की रचना की थी:

श्रीराधारमणलाल प्यारी की निजकर सांझी चितत।

सखि भेष धरि रसिक शिरोमणि बिलसत है सुख की तत।

अन्य गीत इस उत्सव के पृष्ठभागीय निश्छल प्रेम की भावना पर आधारित होते हैं जो मूलतः इस उत्सव की प्रेरणा है। कुल मिलाकर, प्रत्येक कलाशैली में दिव्य प्रेम की अभिव्यक्ति परिलक्षित होती है। सांझी की अप्रतिम रचना में कलात्मकता का एक उत्कृष्ट प्रतिरूप परिलक्षित होता है जो कलाकार की रचनात्मक बुद्धि एवं समझ की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति होती है। अतः, भक्तिगीतों का दूसरा चरण उस दिवस की सांझी के मूल विषय पर आधारित होता है।

सांझी के मध्य में दिव्य क्रीडा के जो भी भाव तथा मुद्रा प्रदर्शित किये जाते हैं, उसका दृश्य गायकों को प्रेरणा प्रदान करता है तथा वे उस लीला पर आधारित गीतों का गायन करते हैं। सांझी के मूल भक्ति गीतों के संग इन गीतों का मेल करते हुए वे ऐसा संगीतमय वातावरण उत्पन्न करते हैं कि उत्सव की शोभा में चौगुनी वृद्धि हो जाती है। सम्पूर्ण वातावरण भक्तों में ऊर्जा का संचार करने लगता है। दैवी अस्तित्व की दृश्य अभिव्यक्ति से दर्शकों में उमड़ते प्रेम एवं भक्ति को यह संगीतमय वातावरण चरम सीमा तक पहुंचा देता है।

भोग अर्पण

सांझी की आकृति पूर्ण होते ही उसे पारंपरिक भोग अर्पित किया जाता है। जिस प्रकार वैष्णव देवों को भोग अर्पित किया जाता है, ठीक उसी प्रकार सांझी को भी भोग चढ़ाया जाता है। सामान्यतः सांझी आकृति गर्भगृह के समक्ष बनाई जाती है ताकि दर्शनार्थियों को दो मायनों में भगवान से जुड़ने का अवसर प्राप्त हो, एक उनके मूर्तिरूप से तथा दूसरे उनकी कलात्मक अभिव्यक्ति से। सांझी कलाकृति के दर्शन संध्याकाल से आरंभ हो जाते हैं। रात्रि होते ही इनके दर्शन बंद कर दिए जाते हैं। दूसरे दिवस प्रातः काल पुनः सांझी की आरती की जाती है। तत्पश्चात, सांझी आकृति में प्रयुक्त दिव्य रंगों को एकत्र कर उन्हे यमुना को अर्पित कर दिया जाता है। यह सब सूर्य उदय होने से पूर्व किया जाता है। सूर्योदय होते ही नवीन दिवस आरंभ हो जाता है। इसके साथ ही सांझी की नवीन आकृति की योजना भी आरंभ हो जाती है।

भजन संध्या
भजन संध्या

सांझी कला भक्ति भाव के विभिन्न प्रदर्शनों का अप्रतिम सम्मिश्रण है। इस कला शैली में राधा-कृष्ण के दिव्य जोड़े की रासलीला को जटिल आकृतियों द्वारा कलात्मकता से प्रदर्शित किया जाता है। यह केवल एक कला शैली नहीं है, अपितु यह वृंदावन की चिरकालीन परंपरा की मनमोहक अभिव्यक्ति है। यहाँ कृष्ण से संबंधित लोक परंपराएँ मंदिर की दैनंदिनी अनुष्ठानों में महत्वपूर्ण स्थान पाते हैं। मंदिरों के पुरोहित यह कला गुरु-शिष्य परंपरा के अंतर्गत अपने पूर्वजों से सीखते हैं। मंदिर के पुरोहितों ने इसी प्रकार इस कला आगे बढ़ाते हुए, इसे अब तक जीवित रखा है। आशा है आने वाली पीढ़ियाँ भी अनंतकाल तक इस कला शैली को इसी प्रकार सहेज कर रखेंगी।

अतिथि संस्करण

यह सुशांत भारती द्वारा प्रदत्त एक अतिथि संस्करण है।


सुशांत भारती एक संरक्षक वास्तुविद हैं। उन्होंने नई दिल्ली के स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर तथा वास्तुकला अकादमी कॉलेज ऑफ आर्किटेक्चर से वास्तुकला में क्रमशः स्नातकोत्तर एवं स्नातक की उपाधियाँ प्राप्त की हैं। भारत के विभिन्न सांस्कृतिक आयामों में उनकी विशेष रुचि है। वास्तुकला की विविधता उनके अध्ययन का मुख्य विषय है। ‘ब्रज की सांस्कृतिक धरोहर’ एवं ‘भारतीय मंदिरों की वास्तुकला’ उनके शोध के प्रमुख क्षेत्र हैं। वर्तमान में वे जनपथ, नई दिल्ली में स्थित, भारतीय संग्रहालय के भारतीय संग्रहालय संस्थान में अनुसंधान सहायक के पद पर कार्यरत हैं।

सुशांत के ये अन्य संस्करण पढ़ें:
ब्रज की फूल बंगला परंपरा
रसिकप्रिया – बुंदेलखंड का गीत गोविंद


अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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वृन्दावन के दर्शनीय स्थल – मंदिर, घाट व संग्रहालय https://inditales.com/hindi/vrindavan-ke-mukhya-mandir-ghat-van-sangrahalay/ https://inditales.com/hindi/vrindavan-ke-mukhya-mandir-ghat-van-sangrahalay/#respond Wed, 01 Jul 2020 02:30:58 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1878

एक समय वृन्दावन केवल एक वन मात्र था। हिन्दू शास्त्रों के अनुसार ब्रज भूमि में कुल १२ वन थे। वृन्दावन उनमें से एक है। यमुना नदी के तीर स्थित इस वन में श्री कृष्ण ने गोपिकाओं के संग अनेक बाल लीलाएं रचाई हैं। यहीं चीर घाट पर स्नान के लिए आयी गोपियों के वस्त्र चुराकर […]

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एक समय वृन्दावन केवल एक वन मात्र था। हिन्दू शास्त्रों के अनुसार ब्रज भूमि में कुल १२ वन थे। वृन्दावन उनमें से एक है। यमुना नदी के तीर स्थित इस वन में श्री कृष्ण ने गोपिकाओं के संग अनेक बाल लीलाएं रचाई हैं। यहीं चीर घाट पर स्नान के लिए आयी गोपियों के वस्त्र चुराकर वे वृक्ष पर चढ़ गए थे। यहीं समीप ही उन्होंने कालिया नाग का वध भी किया था।

वृन्दावन की दीवार पर राधा कृष्ण
वृन्दावन की दीवार पर राधा कृष्ण

इसी वन में उन्होंने रास लीला रचाई थी। आपको विश्वास नहीं होगा किन्तु ऐसा माना जाता है की कृष्ण अब भी प्रत्येक रात्रि एक अन्य छोटे वन में गोपियों संग रास रचाते हैं।

वृन्दावन का संक्षिप्त इतिहास

वृन्दावन का शब्दशः अर्थ है पवित्र तुलसी का वन। किवदंतियों के अनुसार श्री कृष्ण की एक गोपिका सखी का नाम वृंदा था।

यह क्षेत्र वास्तव में विस्मृति में लुप्त एक वन था। चैतन्य महाप्रभु १६ वी. सदी में श्री कृष्ण से संबंधित स्थलों की खोज करते यहाँ आए थे। जैसे जैसे शास्त्रों में उल्लेख किया गया था, वैसे वैसे वे स्थलों से तादाम्य स्थापित कर रहे थे। उसी समय वृन्दावन नगरी की उत्पत्ति हुई थी। आज यह छोटे-बड़े मंदिरों तथा वानरों से भरी एक देवनगरी है। इसके वर्तमान स्वरूप को देख इसे वन मानने के लिए आपकी अपार कल्पना शक्ति की आवश्यकता पड़ेगी।

मेड़ता एवं मेवाढ की १६ वीं. सदी की भक्ति कवियित्री मीराबाई ने भी इस स्थान में पर्याप्त समय व्यतीत किया था। उनकी स्मृति में यहाँ एक मंदिर भी है जो उन्हे समर्पित है। यद्यपि भूलोक में उन्होंने अंतिम श्वास गुजरात में द्वारका के समीप बेट द्वारका में लिया था जब चिरकाल के लिए अपने परम प्रिय श्री कृष्ण से उनका मिलन हो गया था।

औरंगजेब के शासनकाल में इन क्षेत्र के मंदिरों पर आतताईयों ने भरपूर आक्रमण किया था। कल्पना कीजिए, दिल्ली एवं आगरा जैसी मुगलों की राजधानियाँ एवं उनके मध्य स्थित मंदिरों से भरा यह क्षेत्र। यहाँ के अनेक मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया था। देवी-देवताओं की अनेक मूर्तियों को यहाँ से अन्यत्र स्थानांतरित करना पड़ा था।

वृन्दावन के महत्वपूर्ण मंदिर

वृन्दावन का पावन क्षेत्र मंदिरों से भरा हुआ है। इन सब के दर्शन करना तभी संभव है जब आप यहाँ निवास कर रहे हों। अधिकतर तीर्थयात्री उन्ही मंदिरों के दर्शन करते हैं जिनसे वे अथवा उनके गुरु संबंधित हों। इन के साथ वे कुछ लोकप्रिय अथवा प्रसिद्ध मंदिरों के दर्शन करते हैं।

सर्वाधिक प्रसिद्ध मंदिर – श्री बाँके बिहारी मंदिर

श्री बांके बिहारी मंदिर - वृन्दावन
श्री बांके बिहारी मंदिर – वृन्दावन

श्री बाँके बिहारी मंदिर इस पावन नगरी का सर्वाधिक लोकप्रिय तथा इसी कारण सर्वाधिक भीड़भाड़ भरा मंदिर है। आप यहाँ किसी भी समय आयें, मंदिर में भक्तों व दर्शनार्थियों का तांता लगा रहता है। मंदिर में स्थित बाँके बिहारी जी की मूर्ति स्वामी हरीदास को समीप स्थित निधिवन में प्राप्त हुई थी। १८ वीं. सदी में इसी मूर्ति के चारों ओर मंदिर की संरचना की गई। मंदिर के बाहर स्थित मार्ग पर स्वामीजी का स्वयं का मंदिर भी है।

श्री बांके बिहारी मंदिर के पुजारी
श्री बांके बिहारी मंदिर के पुजारी

ऐसी मान्यता है कि इस मूर्ति के भीतर राधा एवं कृष्ण दोनों बसते हैं। इस मंदिर की एक अनोखी विशेषता है कि यह पूर्वान्ह ९ बजे के पश्चात ही खुलता है। यहाँ किसी भी सामान्य मंदिर के समान प्रातःकाल की मंगल सेवा नहीं होती।

इस मंदिर की वास्तुकला एक हवेली के समरूप है। मध्य में एक खुला प्रांगण है जहां खड़े होकर आप भगवान के दर्शन करते हैं। एक स्तंभ पर पीतल में निर्मित कामधेनु एवं उसके शावक की अप्रतिम प्रतिमा है।

श्री बांके बिहारी मंदिर की कामधेनु
श्री बांके बिहारी मंदिर की कामधेनु

आप इस मंदिर का माखन मिश्री प्रसाद खाना ना भूलें। यह अत्यंत ही स्वादिष्ट होता है। इस प्रकार का प्रसाद इस मंदिर के अतिरिक्त केवल द्वारका के द्वारकाधीश मंदिर में ही दिया जाता है।

स्वामी हरिदास जी का पुराना मंदिर - वृन्दावन
स्वामी हरिदास जी का पुराना मंदिर – वृन्दावन

यूँ तो वृन्दावन, मथुरा एवं ब्रज के सभी मंदिरों में होली मनाई जाती है, तथापि यह मंदिर होली का उत्सव मनाने के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। अधिक जानकारी के लिए मंदिर का वेबस्थल देखें।

गोविंद देव मंदिर

वृन्दावन का गोविन्द देव मंदिर
वृन्दावन का गोविन्द देव मंदिर

१६ वीं. सदी में जयपुर के राजा मान सिंह द्वारा निर्मित यह मंदिर कभी एक भव्य मंदिर रहा होगा। लाल बलुआ पत्थर द्वारा निर्मित यह मंदिर एक समय सात तलों का मंदिर था। इसके ऊपरी ३ से ४ तलों को औरंगजेब ने ध्वस्त कर दिया था। वर्तमान में यह मंदिर शिखर रहित है। शिखर के बिना भी यह मंदिर अत्यंत विशाल प्रतीत होता है। अपने स्वर्णिम काल में यह अखंडित मंदिर कितना भव्य रहा होगा, आज हम केवल कल्पना ही कर सकते हैं। गलियों में भ्रमण करते समय अपने लाल रंग के साथ यह मंदिर आसपास की दुकानों के समूह  में पृथक छवि प्रस्तुत करता है।

१८ वीं. सदी में जब इस मंदिर पर आक्रमण किया गया था तब भगवान की प्रतिमा को जयपुर स्थानांतरित किया गया था। उसी विग्रह अर्थात प्रतिमा की अब जयपुर के गोविंद देव जी मंदिर में प्रतिदिन ७ बार पूजा-अर्चना की जाती है।

श्री रंगनाथजी मंदिर – एक दक्षिण भारतीय मंदिर

दक्षिण भारतीय शैली में श्री रंगनाथ जी मंदिर
दक्षिण भारतीय शैली में श्री रंगनाथ जी मंदिर

१९ वीं. सदी के मध्य काल में निर्मित यह मंदिर भारत भर के कृष्ण भक्तों के संगम का द्योतक है। चटक रंगों का ऊंचा गोपुरम आपको तुरंत तमिल नाडु का स्मरण करा देगा। यद्यपि गोपुरम पर स्थित झरोखे एवं अलंकृत मुंडेर स्थानीय वास्तुशिल्प की झलक दिखाते हैं तथापि मंदिर परिसर का अंतरंग आपको वस्तुतः दक्षिण भारत पहुँचा देता है।

इस मंदिर में भी दक्षिण भारत के मंदिरों के समान रथ जात्रा का उत्सव मनाया जाता है। इस मंदिर के पुजारी भी तमिल नाडु के मंदिरों के पुजारियों के समान रूखा व्यवहार करते हैं।

इस मंदिर का निर्माण मथुरा के तीन प्रतिष्ठित सेठों ने करवाया था। वे हैं, लक्ष्मीचंद सेठ, राधाकृष्ण सेठ तथा गोविंददास सेठ।

श्री राधा वल्लभ मंदिर

श्री राधा वल्लभ मंदिर - वृन्दावन
श्री राधा वल्लभ मंदिर – वृन्दावन

इस मंदिर का निर्माण श्री राधावल्लभ संप्रदाय के संस्थापक गोस्वामी हरिवंश महाप्रभू ने करवाया था जिन्हे भगवान कृष्ण की बाँसुरी का अवतार माना जाता है। यह मंदिर मेरे अब तक के देखे सबसे जीवंत मंदिरों में से एक है। कुछ लोग संगीत वाद्य बजा रहे थे जिसकी तान पर भक्तगण नाच रहे थे तथा होली खेल रहे थे।

गर्भगृह के भीतर मुरली बजाते कृष्ण की प्रतिमा है जबकि राधा की उपस्थति केवल उनके मुकुट द्वारा दर्शाई गई है। है ना यह मंदिर की अनोखी विशेषता?

इस मंदिर का दैनिक श्रृंगार आप इस फेसबुक पन्ने पर देख सकते हैं।

श्री मदन मोहन मंदिर

श्री मदन मोहन मंदिर
श्री मदन मोहन मंदिर

इस क्षेत्र के अनेक मध्यकालीन मंदिरों की भांति यह मंदिर लाल बलुआ पत्थर द्वारा निर्मित है। यह ऊंचा मंदिर कलिदाह घाट के समीप द्वादशादित्य टीला नामक पहाड़ी पर स्थित है। इस मंदिर तक पहुँचने के लिए आपको कुछ सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ेंगी। इस मंदिर का निर्माण मुल्तान के एक सेठ ने करवाया था। इस मंदिर की मूल प्रतिमा को राजस्थान के एक सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित किया गया था। अब उसी प्रतिमा के प्रतिरूप की यहाँ आराधना की जाती है।

मुख्य मंदिर ऊंचा एवं संकरा है। इसके एक ओर एक छोटा मंदिर है। मंदिर से लगा हुआ, लाल बलुआ पत्थर में ही निर्मित एक मंडप भी है जो मंदिर से जुड़ा हुआ नहीं है।

श्री राधा रमण मंदिर

राधारमण मंदिर वृन्दावन
राधारमण मंदिर वृन्दावन

गोपाल भट्ट गोस्वामी द्वारा निर्मित १६वीं. सदी का यह मंदिर अत्यंत मनभावन है। वे ७ शिलाओं अथवा शालिग्रामों के साथ यहाँ आए थे। शालिग्राम नेपाल के गण्डकी नदी में पाया जाने वाला एक पत्थर है जिसे विष्णु का स्वरूप माना जाता है। गोस्वामीजी उनकी नित्य पूजा अर्चना करते थे तथा रात्री के समय उन्हे सींक की टोकरी से ढँक देते थे। एक दिन प्रातः जब उन्होंने टोकरी उठाई, एक शालिग्राम पत्थर कृष्ण की मूर्ति में परिवर्तित हो गई थी। इस मंदिर में कृष्ण की उसी मूर्ति की पूजा की जाती है। चूंकि यह मूर्ति स्वयं प्रकट हुई थी, इसे जीवंत अथवा जाग्रत मूर्ति माना जाता है।

राधा रमण का शाब्दिक अर्थ है राधा को रमने वाला अर्थात राधा का मन मोहने वाला, जो कोई और नहीं, अपितु कृष्ण हैं। मंदिर के विषय में अधिक जानकारी आपको मंदिर के वेबस्थल पर प्राप्त हो सकती है।

राधा दामोदर मंदिर

राधा दामोदर मंदिर वृन्दावन
राधा दामोदर मंदिर वृन्दावन

यह भी १६वीं. सदी में निर्मित मंदिर है जिसे गोस्वामी श्रीला जीवा ने बनवाया था। मंदिर की मूर्तियाँ उन्हे अपने काका श्रीला रूप गोस्वामी से प्राप्त हुई थी। यह मंदिर भी यहाँ से जयपुर स्थानांतरित किया गया था। १८वीं. सदी में यह मंदिर जयपुर से वापिस यहाँ लाया गया। यह उन कुछ मंदिरों में से एक है जिसे अपना मूल स्थान पुनः प्राप्त हुआ है।

यह मंदिर गिरिराज चरण शिला के लिए प्रसिद्ध है। यह शिलाखंड, जिस पर श्री कृष्णजी के पदचिन्हों की छाप है, गिरिराज पर्वत से लाया गया है। इस पर गौमाता के पदचिन्हों की भी छाप है। इस मंदिर के विषय में अधिक जानकारी आप मंदिर के वेबस्थल से प्राप्त कर सकते हैं।

गरुड़ गोविंद मंदिर

गरुड़ गोविन्द मूर्ति - वृन्दावन
गरुड़ गोविन्द मूर्ति – वृन्दावन

यह मंदिर छटीकरा में गरुड़ गोविंद कुंड के समीप स्थित है। इस मंदिर की विशेषता है कि इस मंदिर के प्रमुख देव को गरुड़ की सवारी करते दर्शाया गया है। गरुड़ की सवारी करते भगवान विष्णु को आप सामान्यतः किसी मंदिर में नहीं देखेंगे। विग्रह अर्थात प्रतिमा को देखने के लिए आपको पुजारीजी से निवेदन करना पड़ेगा, अन्यथा उनका मूल रूप भव्य शृंगार से ढँका रहता है।

प्राचीन गरुड़ मूर्ति
प्राचीन गरुड़ मूर्ति

परिसर में एक अन्य छोटे से मंदिर के भीतर गरुड़ की पत्थर की मूर्ति है जिसमें वे हाथ जोड़कर बैठे हुए हैं। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ की यह मूर्ति सम्भवतः किसी स्तंभ के ऊपर स्थापित थी। किन्तु इसके विषय में विस्तृत जानकारी देने के लिए वहाँ कोई जानकार उपलब्ध नहीं था।

बनखंडी महादेव मंदिर

बनखंडी महादेव मंदिर
बनखंडी महादेव मंदिर

यह प्राचीन शिव मंदिर नगर के प्रमुख बाजार की एक गली में स्थित है। ऐसा माना जाता है कि यह वही स्थान है जहां श्रीला सनातन गोस्वामी को शिव का वरदान प्राप्त हुआ था। मंदिर के भीतर काली की एक विशाल मूर्ति है। राधा कृष्ण तो इस पावन नगरी के प्रत्येक मंदिर में उपस्थित होते हैं।

वंशीवट तथा गोपेश्वर महादेव मंदिर

वंशीवट वह स्थान है जहां श्री कृष्ण शरद पूर्णिमा के दिन बंसी बजाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि बंसी की तान सुनते ही राधाजी एवं अन्य गोपिकाएं अपने सभी कार्य वहीं छोड़कर इस स्थान की ओर दौड़ पड़ती थीं। वे कृष्ण की रासलीला का भाग बन जाती थीं तथा घर वापिस जाने के लिए कतई इच्छुक नहीं रहती थीं।

इसी परिसर में एक छोटा शिव मंदिर भी है जो शिव के गोपेश्वर महादेव स्वरूप को समर्पित है। ऐसा माना जाता है कि कृष्ण की रासलीला में सम्मिलित होने के लिए महादेव ने स्वयं एक गोपिका का रूप धरा था। जैसे ही कृष्ण की दृष्टि उन पर पड़ी, उन्होंने उन्हे उनके नाम योगेश्वर के स्थान पर गोपेश्वर कहकर पुकारा था।

कात्यायनी देवी मंदिर

वृन्दावन का कात्यायनी देवी मंदिर
वृन्दावन का कात्यायनी देवी मंदिर

यह मंदिर देवी के कात्यायनी रूप को समर्पित है। मुझे बताया गया कि यहाँ नवरात्रि का उत्सव अत्यंत धूमधाम से मनाया जाता है। इस मंदिर में देवी की अष्टधातु में निर्मित मूर्ति स्थापित है। मुझे स्मरण है, अत्यधिक तादात में उपस्थित वानर मुझे भयभीत कर रहे थे तथा मैं देवी का छायाचित्र भी नहीं ले पा रही थी। तब पुजारीजी वानरों को डराने के लिए एक लकड़ी ले कर आए तथा मुझे निर्भय होकर चित्र लेने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि, मैं साथ हूँ, तुम बिना भय के चित्र ले लो। एक आनंदित स्थल पर रहने की निडरता!

इस्कॉन वृन्दावन – कृष्ण बलराम मंदिर

इस्कॉन मंदिर सभी हिन्दू मंदिरों में सर्वाधिक उत्तम रखरखाव युक्त मंदिर है। यद्यपि इसके अनुयायी अधिकतर गैर-भारतीय हैं। १९७५ में निर्मित यह मंदिर इस माटी के दोनों भ्राताओं का उत्सव मनाता है, अर्थात कृष्ण एवं बलराम।

इस्कॉन का इस नगरी में एक अक्षय पात्र इकाई भी है जिसमें तीर्थ यात्रियों के ठहरने की भी व्यवस्था है। अपनी पिछली यात्रा के समय मैंने यहाँ का रसोईघर देखा था जहां हजारों शालेय विद्यार्थियों के लिए मध्यान्ह आहार बनाया जाता है। किस प्रकार वे भाप एवं स्वचालित मशीनीकरण द्वारा पोषक एवं स्वास्थ्यवर्धक भोजन बनाते हैं, यह देखना अत्यंत मनोरंजक होता है।

वृन्दावन प्रेम मंदिर

वृन्दावन का प्रेम मंदिर
वृन्दावन का प्रेम मंदिर

यह इस नगरी का नवीनतम तथा अत्यंत लोकप्रिय मंदिर है। मैंने जब कुछ वर्षों पूर्व इसके दर्शन किए थे, तब संगमरमर द्वारा निर्मित यह मंदिर निर्माणाधीन था। कृपालु महाराज द्वारा बनाये गए इस मंदिर में दो गर्भगृह हैं। एक गर्भगृह राधा कृष्ण को तथा दूसरा गर्भगृह राम सीता को समर्पित है। यह एक विशाल मंदिर है जिसमें श्वेत संगमरमर पर राधा कृष्ण की रंगबिरंगी छवियाँ रची हुई हैं। यह मंदिर वैष्णव समाज के अनेक संतों को भी सम्मानित करता है।

वैष्णो देवी मंदिर

यह अपेक्षाकृत नवीन मंदिर है जिसमें अपने सिंह की पीठ पर विराजमान दुर्गा माँ की विशाल प्रतिमा है। उनके नीचे एक गुफा के भीतर देवी के नौ रूपों के विग्रह हैं।

वृन्दावन के अन्य दर्शनीय स्थल

वृन्दावन की पावन नगरी में मंदिरों के अतिरिक्त भी अनेक दर्शनीय स्थल हैं जहां आप जा सकते हैं।

निधि वन

निधि वन
निधि वन

एक पवित्र वन जहां आप पैदल सैर कर सकते हैं तथा राधा को समर्पित मंदिर के दर्शन कर सकते हैं। यह मंदिर चूड़ियों एवं श्रंगार की अन्य वस्तुओं से भरा हुआ है। ऐसा माना जाता है कि आज भी यहाँ प्रत्येक रात्रि राधा एवं कृष्ण का मिलन होता है। संध्या के समय पुजारीजी रंग महल के भीतर उनका बिछौना सजाते हैं तत्पश्चात वहाँ से दूर चले जाते हैं। अंधकार होते ही भीतर किसी को भी ठहरने की अनुमति नहीं है। प्रचलित किवदंतियों के अनुसार जिसने भी इस नियम का पालन नहीं किया तथा जानबूझकर वहीं ठहर गए, वे प्रातः मृत पाए गए।

निधि वन के परिसर में कवि एवं संगीतज्ञ स्वामी हरिदासजी की समाधि है। उन्हे ललिता सखी का अवतार माना जाता है। वे यहीं अपनी साधना करते थे। अकबर के दरबार के एक सदस्य, सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ तानसेन यहीं स्वामी हरिदासजी से भेंट करने आए थे। उनकी कुछ रचनाएं यहाँ शिलाओं पर भी उत्कीर्णित हैं।

निधि वन के पेड़
निधि वन के पेड़

श्री बाँके बिहारी मंदिर के भीतर स्थापित मूर्ति, जिसका मैंने उपरोक्त उल्लेख किया था, यहीं प्राप्त हुई थी।

आप जब आसपास घूमेंगे, तब आपको कुंज बिहारी को समर्पित एक मंदिर दिखायी देगा। निधि वन में ललित कुंड नामक एक बावड़ी भी है। यहाँ कई वृक्षों को सिंदूर अर्पण करने की प्रथा है। उन्हे देख ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वे लाल विवाह-वस्त्रों में सजी वधुएं हैं।

कालियादेह

यह एक अत्यंत मनोहारी मंदिर है जो आपको श्री कृष्ण द्वारा कालिया नाग के वध की कथा का स्मरण कराएगा। यह मंदिर यमुना के कलियादेह घाट के समीप है। लाल बलुआ पत्थर में निर्मित यह एक छोटा सा पुराना मंदिर है जो कालिया वध की कथा का आधुनिक प्रस्तुतीकरण करता है।

कालियादेह
कालियादेह

इसके एक ओर कदंब का वृक्ष है। ऐसा बताया जाता है कि जब कालिया के जहर से यमुना का सम्पूर्ण जल विषैला हो गया था तब यही एक वृक्ष था जो सकुशल जीवित बचा था। आज इसकी इच्छापूर्ति वरदायिनी वृक्ष के रूप में पूजा की जाती है।

सेवा कुंज

निधि वन के समान यह भी कदाचित निकुंज नामक एक वनीय क्षेत्र था। यह वही स्थल है जिसे रासलीला के स्थान के रूप में जाना जाता है।

वृन्दावन शोध संस्थान संग्रहालय

वृन्दावन की काष्ठकला
वृन्दावन की काष्ठकला

वृन्दावन शोध संस्थान के परिसर में स्थित यह एक सुंदर संग्रहालय है। आप यहाँ स्थानीय कलाकृतियाँ, राधा कृष्ण का विभिन्न माध्यमों द्वारा प्रदर्शन तथा अनेक पांडुलिपियाँ देख सकते हैं। यहाँ अनेक मनमोहक चित्रकलाएँ, सचित्र पांडुलिपियाँ तथा अनेक कलाकृतियाँ प्रदर्शित किए गए हैं, जैसे बाँके बिहारी मंदिर से लाई गई प्राचीन बाँसुरी तथा ब्रज के विभिन्न उत्सवों का विस्तृत वर्णन इत्यादि।

श्री बांके बिहारी मंदिर की पिचकारी
श्री बांके बिहारी मंदिर की पिचकारी

मेरा सुझाव है कि आप इस संग्रहालय में पर्याप्त समय बिताएं ताकि आप कला के माध्यम से वृन्दावन नगरी को भली भांति समझ पाएंगे। संग्रहालय की दुकान से आप शोध पुस्तकें खरीद भी सकते हैं।

खण्डेलवाल ग्रंथालय

खंडेलवाल ग्रंथालय
खंडेलवाल ग्रंथालय

यह पुस्तक की दुकान ब्रज पर लिखी अनेक पुस्तकों का भंडार है जिसमें ब्रज का इतिहास तथा ब्रज के मंदिरों में गायी जाने वाली होली गीतों का संकलन प्रमुख हैं। वैसे भी मुझे स्थानीय पुस्तकों की दुकानों में जाना अत्यंत भाता है। ऐसी दुकानें बहुधा अब भी अपनी पुरानी पद्धति से चलती हैं जो मुझे बीते दिनों का स्मरण कराती हैं। इन दुकानों के मालिक एवं कर्मचारियों से पुस्तकों के विषय में चर्चा करना मुझे विशेष भाता है। उन्हे अपनी दुकान की प्रत्येक पुस्तक के विषय में सम्पूर्ण जानकारी होती है। वे केवल आप से आपकी इच्छित पुस्तक अथवा  विषय पूछते हैं, तत्पश्चात उस विषय में सर्वोत्तम पुस्तक आपके समक्ष लाकर रख देते हैं। यदि उनके पास उस विषय में पुस्तक ना हो तो वे आपको अन्य दुकानों के सुझाव देने में भी पीछे नहीं हटते।

यमुना नदी में नौका विहार

आप यहाँ कुछ समय यमुना के घाट पर व्यतीत कर सकते हैं। यदि वातावरण सुहाना हो तो नौका सवारी का भी आनंद उठा सकते हैं।

और पढ़ें: मथुरा की यमुना नदी में नौका विहार

वृन्दावन परिक्रमा

वृन्दावन के चारों ओर एक पंचक्रोशी (पाँच कोस की ) परिक्रमा आयोजित की जाती है। यह यात्रा लगभग १० की.मी. लंबी है जिसे लगभग तीन घंटों में आसानी से पूर्ण किया जा सकता है। परिक्रमा पथ की सम्पूर्ण जानकारी आप इस वेबस्थल से प्राप्त कर सकते हैं।

यह परिक्रमा आप किसी भी दिन, किसी भी समय कर सकते हैं। यह परिक्रमा आप किसी भी स्थान से आरंभ कर सकते हैं, किन्तु इसका समापन उसी स्थान पर होना चाहिए जहां से आपने आरंभ किया था। कई भक्तगण यह परिक्रमा एकादशी के पावन दिवस पर करते हैं। परिक्रमा करते समय आप किसी मंत्र का उच्चारण करते रहें तो उत्तम होगा। यह आपका ध्यान अपने लक्ष पर केंद्रित रखने में सहायक होगा। कुछ भक्त परिक्रमा के लिए उपवास भी रखते हैं। उपवास रखना आपका निजी विकल्प व निर्णय होगा। यह आवश्यक नियम नहीं है।

परिक्रमा में पैदल चलना कठिन कदापि नहीं है। आप बिना जूते-चप्पलों के भी आसानी से चल सकते हैं, जैसा कि सामान्यतः किया जाता है।

वृन्दावन के मंदिरों में आयोजित विभिन्न उत्सव

  • वृन्दावन के विषय में प्रचलित कहावत है, ७ वार, ९ त्यौहार। अर्थात ब्रज में एक सप्ताह में सात वार एवं ९ त्यौहार होते हैं। जो स्थल कृष्ण के बालपन में उनका क्रीड़ास्थल था, वहाँ प्रत्येक दिवस एक उत्सव के समान है।
  • होली यहाँ का सर्वाधिक लोकप्रिय उत्सव तथा पर्व है जिसे देखने दूर-सुदूर से पर्यटक ब्रजभूमि आते हैं। ‘मथुरा के वृन्दावन में होली’ मेरा यह संस्मरण आपको इस होली की विस्तृत जानकारी देगा एवं प्रत्यक्ष ब्रज की होली के दर्शन कराएगा।
  • कृष्ण जन्माष्टमी अर्थात कृष्ण का जन्मदिवस इस नगरी का सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं विशालतम उत्सव है। इसके १५ दिवस पश्चात राधाष्टमी अर्थात राधा के जन्म का उत्सव मनाया जाता है।
  • प्रत्येक एकादशी के दिन मंदिरों में उत्सव का आयोजन किया जाता है।
  • कुछ उत्सव अत्यंत स्थानीय हैं, जैसे कृष्ण द्वारा कसं के वध का उत्सव अथवा कसं वध मेला। अन्य उत्सवों में लट्ठे का मेला, रथ का मेला इत्यादि सम्मिलित हैं।
  • कवि सम्मेलन ब्रज का अत्यंत प्रचलित आयोजन है। यदि आप ब्रज बोली समझ सकते हैं तो यह कवि सम्मेलन अत्यंत मनोरंजक व रोचक होता है।
  • वृन्दावन परिक्रमा वर्ष भर आयोजित की जाती है।

वृन्दावन के स्वादिष्ट व्यंजन अवश्य चखें

मथुरा के पेड़े मथुरा वृन्दावन के मंदिरों का विशेष एवं प्रिय चढ़ावा है। आप इन्हे अवश्य चखें। मथुरा में ये पेड़े कैसे बनाए जाते हैं इस पर मैंने एक संस्करण लिखा है। इसे भी अवश्य पढ़ें।

ब्रज भूमि में मेरा प्रिय व्यंजन है कचोड़ी, तत्पश्चात बेड़मी पूरी जो केवल सुबह के समय ही उपलब्ध होती है।

यहाँ की लस्सी भी अत्यंत स्वादिष्ट होती है। गर्मियों में जलजीरा भी अत्यंत प्रचलित है। आप जब भी वृन्दावन आयें मौसम के अनुसार वहाँ के प्रत्येक व्यंजन का आस्वाद लें। भले ही ये वस्तुएं आपके नगरों में भी मिलती हों किन्तु प्रत्येक स्थान का अपना एक विशेष स्वाद होता है।

वानरों का उत्पात

आपकी वृन्दावन यात्रा में वानर अवश्य खलल डाल सकते हैं। ये वानर आपको प्रत्येक मंदिर, प्रत्येक गली तथा प्रत्येक घाट पर मिलेंगे। ये आप पर किसी भी वस्तु के लिए हमला कर सकते हैं। उनकी प्रिय वस्तुएं हैं, मोबाईल फोन, कैमरा, चश्मे तथा हाथ में पकड़े अथवा लटके पर्स। बाँके बिहारी मंदिर की गलियों में मैंने स्वयं उन्हे मार्ग पर चश्मा पहनकर चलते लोगों के ऊपर छलांग लगाते, चश्मा छीनते तथा उन्हे तोड़कर मजा करते देखा है। यदि आपके पास खाने-पीने की कुछ वस्तु हो तो उनसे बचकर यहाँ से जाना लगभग असंभव है।

कुछ वानरों की विशेष रुचि होती है जैसे फ्रूटी। यदि उन्होंने आपकी कोई वस्तु छीन ली हो तो उन्हे फ्रूटी खरीदकर दे दें। वे आपकी वस्तु वापिस कर देंगे। वहाँ के स्थानीय लोगों अथवा पुजारी को उनकी प्रिय वस्तु की जानकारी अवश्य होती है।

मुझ पर भी वानरों ने राधा वल्लभ मंदिर में हमला किया था। एक वानर मेरा कैमरा छीन कर ले गया तो दूसरा मेरे गले में लटका मेरा पर्स छीनने लगा था। उसने लगभग मेरा दम घोंट दिया था। यूँ तो आपको ब्रज भूमि में लगभग सभी स्थानों पर वानरों का अस्तित्व दृष्टिगोचर होगा, वह चाहे मथुरा हो या गोवर्धन, बरसाना हो अथवा गोकुल, किन्तु वृन्दावन में पाए जाने वाले वानरों से अधिक उपद्रवी कदाचित ही कहीं होंगे।

अतः नगर में कहीं भी जाते समय इस तथ्य के प्रति जागरूक रहें।

वृन्दावन कैसे पहुँचें?

वृन्दावन मथुरा से १० किलोमीटर उत्तर में, आगरा से ५० किलोमीटर तथा दिल्ली से लगभग १५० किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यदि आप दिल्ली से सड़क मार्ग द्वारा पहुंचना चाहते हैं तो आप प्रथम वृन्दावन पहुंचेंगे, तत्पश्चात मथुरा। वर्तमान में ये दोनों लगभग जुड़वा नगरों में परिवर्तित हो चुके हैं।

वृन्दावन सड़क तथा रेल मार्ग द्वारा भारत के सभी प्रमुख स्थलों से जुड़ा हुआ है। निकटतम विमानतल नई दिल्ली है।

वृन्दावन में भ्रमण करने के लिए ई-रिक्शा सर्वोत्तम साधन है। आप उपरोक्त उल्लेखित तीर्थ मार्ग पर पैदल भी भ्रमण कर सकते हैं।

नगर में ठहरने के लिए सभी श्रेणी के अतिथिगृह उपलब्ध हैं। कई यात्री यहाँ उपलब्ध आश्रमों में भी ठहर सकते हैं जैसे इस्कॉन मंदिर का आश्रम।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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होली का पर्व भारत का सर्वाधिक उल्हासपूर्ण पर्व है। इसी होली के आनंददायक पर्व का यदि आप कहीं पारंपरिक रूप से अनुभव लेना चाहते हैं तो वह स्थान है, ब्रज भूमि अथवा मथुरा वृन्दावन जो। ब्रज की होली का अपना ही आनंद है। रंगों का उत्सव – होली रंगों का पर्व होली भारत के कई […]

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होली का पर्व भारत का सर्वाधिक उल्हासपूर्ण पर्व है। इसी होली के आनंददायक पर्व का यदि आप कहीं पारंपरिक रूप से अनुभव लेना चाहते हैं तो वह स्थान है, ब्रज भूमि अथवा मथुरा वृन्दावन जो। ब्रज की होली का अपना ही आनंद है।

रंगों का उत्सव – होली

मथुरा वृन्दावन में ब्रज की होली
मथुरा वृन्दावन में ब्रज की होली

रंगों का पर्व होली भारत के कई महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह सम्पूर्ण भारत का सर्वाधिक आनंददायी उत्सव है। लोग एक दूसरे को अबीर गुलाल लगाकर उन्हें रंगों में सराबोर करते हैं। भिन्न भिन्न प्रकार के मिष्ठान बनाकर मित्रों एवं परिवारजनों में बाँटते हैं। यह पर्व जिस समय मनाया जाता है, उस समय भारत में फसल की कटाई होती है तथा उसकी बिक्री कर किसान के हाथों में धन आता है। मौसम भी अत्यंत सुहावना रहता है जब वह शीत ऋतु की चौखट के बाहर आ चुका होता है तथा ग्रीष्म ऋतु उसकी प्रतीक्षा में कुछ दूर खड़ी रहती है।

यद्यपि होली का उत्सव भारत के अधिकतर स्थानों में मनाया जाता है, तथापि रंगों का यह उत्सव उत्तर भारत में अधिक लोकप्रिय है।

होली के रंग

गुलाल और गेंदा
गुलाल और गेंदा

होली के रंगों में गुलाबी गुलाल सबका प्रिय रंग है। गुलाबी के साथ लोग लाल, हरे, नीले, पीले, जामुनी इत्यादि रंगों से भी होली खेलते हैं। प्राचीन काल में लोग प्राकृतिक वस्तुओं से होली के रंग प्राप्त करते थे जैसे, हल्दी, मेहंदी, केसर, सिन्दूर, रेत इत्यादि। ये आरोग्य को हानि नहीं पहुंचाते। कालान्तर में प्राकृतिक रंगों का स्थान रासायनिक रंगों ने ले लिया जिनमें कुछ हानिकारक भी हो सकते हैं। इसलिए अब यह प्रयत्न किये जा रहे हैं कि लोग अधिक से अधिक प्राकृतिक रंगों का प्रयोग करें।

श्री बांके बिहारी मंदिर की एक पुरानी पिचकारी
श्री बांके बिहारी मंदिर की एक पुरानी पिचकारी

होली में सूखे एवं जल मिश्रित, दोनों रंगों का प्रयोग होता है। मेरा अनुभव कहता है कि लोग रंगीन जल की होली का अधिक आनंद उठाते हैं। बच्चे प्रातः से ही गुब्बारों में रंगीन जल भरना आरम्भ कर देते हैं। तत्पश्चात एक दूसरे पर ये गुब्बारों मारते हैं। सड़क पर आतेजाते बेसुध लोगों पर गुब्बारे मारना उन्हें अधिक भाता है। पिचकारी में भी रंगीन जल भरकर लोगों पर दूर से वार करते हैं। पिचकारी से स्मरण हुआ कि मैंने वृन्दावन के ब्रज संग्रहालय में बांके बिहारी मंदिर की एक पुरानी किन्तु सुन्दर पिचकारी देखी थी।

रंगों से खेलने के पश्चात अनेक प्रकार के स्वादिष्ट मिष्ठान खाए एवं खिलाये जाते हैं। इनमें गुझिया सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। ठंडाई भी होली का सर्वप्रिय पेय है। इसमें कहीं कहीं भांग मिलाने की भी रीत है।

होली पर्व कब मनाते हैं?

यमुना किनारे होली के रंग
यमुना किनारे होली के रंग

हिन्दू पंचांग के अनुसार ब्रज में होली वसंत पंचमी से आरम्भ होकर फाल्गुन पूर्णिमा तक खेली जाती है। इस समयावधि के अंतिम चरण अर्थात् फाल्गुन पूर्णिमा के दिन होली सम्पूर्ण भारत में मनाई जाती है। जूलियन कैलेंडर के अनुसार यह लगभग मार्च के महीने में आती है। आप होली की सही तिथि के विषय में जानकारी किसी भी पञ्चांग अथवा इन्टरनेट से प्राप्त कर सकते हैं।

मथुरा वृन्दावन में होली का उत्सव लगभग ४० दिनों तक मनाया जाता है। आप चौंक गए ना! वास्तव में होली का पर्व फरवरी मास की बसंत पंचमी से आरम्भ होकर फाल्गुन में अपनी चरम सीमा पर पहुंचता है।

२०१९ में होली की तिथियाँ

१. लड्डू होली – १४ मार्च २०१९
२. लठमार होली – बरसाना में १५ मार्च २०१९ एवं नंदगाँव में १६ मार्च २०१९
३. श्री कृष्ण जन्मभूमि होली – मथुरा में १७ मार्च २०१९
४. बांके बिहारी मंदिर होली – वृन्दावन में १७ – २० मार्च २०१९
५. छड़ीमार होली – गोकुल में १८ मार्च २०१९
६. होलिका दहन – फालेन में २० मार्च २०१९
७. चतुर्वेदी समाज का डोला – मथुरा में २० – २१ मार्च २०१९
८. दाउजी का हुरंगा – बलदेव में २२ मार्च २०१९
९. मुखराय नृत्य – २२ मार्च २०१९

ब्रज की होली से सम्बंधित किवदंतियां

होली का पर्व ब्रजभूमि में मनाये जाने वाले दो सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं बड़े उत्सवों में से एक है। ब्रजभूमि का दूसरा बड़ा उत्सव है कृष्ण जन्माष्टमी। ८४ कोस अर्थात् लगभग ३०० किलोमीटर के क्षेत्र में फैली ब्रजभूमि की दो प्रमुख नगर हैं, मथुरा एवं वृन्दावन। आज के परिप्रेक्ष्य में, उत्तर प्रदेश एवं राजस्थान राज्यों के मध्य पसरा हुआ यह क्षेत्र श्रीकृष्ण की भूमि है। यहीं उन्होंने बाललीला एवं रासलीला रचाई थी। होली का पर्व उन उत्सवों में से है जो उनकी गाथाओं एवं किवदंतियों का मंगलगान करता है।

मथुरा वृन्दावन में ब्रज की होली के विभिन्न स्वरूप

जहां भारत के अन्य भागों में होली का त्यौहार रंगों एवं गीत-संगीत द्वारा मनाया जाता है, वहीं मथुरा वृन्दावन में कई भिन्न प्रकारों से होली मनाई जाती है। प्रत्येक होली की अपनी तिथी एवं अपना स्थान है। प्रत्येक वर्ष मनाई जाने वाली होली के इन भिन्न प्रकारों के विषय में कालानुक्रमिक रूप से यहाँ उल्लेख करना चाहती हूँ।

बरसाना की लड्डू होली

राधा एवं उनके पिता वृषभानु का गाँव है यह बरसाना। बरसाना में ब्रह्मगिरी पर्वत के शिखर पर राधा का एक सुन्दर मंदिर भी है।

बरसाना में होली के उत्सव का औपचारिक आरम्भ होता है जब नंदगाँव के निवासी बरसाना के निवासियों को होली का उत्सव मनाने के लिए आमंत्रित करते हैं। इसे फाग आमंत्रण उत्सव कहते हैं। इसी दिन बरसाना में लड्डू होली मनाई जाती है। दूसरे दिन बरसाना में तथा तीसरे दिन नंदगाँव में लठमार होली मनाई जाती है।

आप सोच रहे होंगे कि यह लड्डू होली वास्तव में क्या है! यह होली मन्दिर में मनाई जाती है जहां लोग एक दूसरे के ऊपर पीले पीले स्वादिष्ट लड्डू फेंकते हैं। इससे मुझे अपने विद्यालय में स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस के समारोह का स्मरण होता है। उन दिनों में हम भी दिए गए लड्डुओं से इसी प्रकार खेलते थे। लड्डू होली के समय सम्पूर्ण मंदिर पीतवर्ण हो जाता है जो कृष्ण का प्रिय रंग भी है। आप को स्मरण होगा, कृष्ण को पीताम्बर भी कहते हैं, जिसका अर्थ है पीतवस्त्र धारण करने वाला।

समय – फाल्गुन मास की शुक्ल अष्टमी

बरसाना व नंदगांव की लठमार होली

लट्ठमार होली - बरसना
लट्ठमार होली – बरसना

गोकुल में बचपन बीतने के पश्चात कृष्ण के पिता नन्द, कृष्ण एवं गोप-ग्वालों को लेकर सपरिवार नंदगांव में निवास करने लगे। नवयुवक कृष्ण नंदगांव एवं बरसाना में राधा एवं अन्य गोपिकाओं के संग होली खेलते थे। यहीं विश्व प्रसिद्ध लठमार होली मनाई जाती है। गाँव की स्त्रियाँ रंग में सराबोर पुरुषों को बड़ी लाठियों से पीटती हैं तथा गालियाँ सुनाती हैं। यदि आप इस प्रकार की अनोखी होली देखना चाहते हैं तो नंदगांव एवं बरसाना अवश्य जाएँ।

आपको अचरज होता होगा कि अंततः इस प्रकार की होली की रीत कहाँ से आयी? इस होली का सम्बन्ध कृष्ण एवं राधा से है। कृष्ण नंदगांव में रहते थे एवं राधा बरसाना गाँव की थी। इन दोनों गाँव के मध्य सम्बन्ध भी राधा एवं कृष्ण के सम्बन्ध से व्युत्पन्न है। कृष्ण के नंदगांव से पुरुष राधा के बरसना गाँव की स्त्रियों से होली खेलते हैं।

नंदगाँव की लट्ठमार होली
नंदगाँव की लट्ठमार होली

बरसाना की स्त्रियाँ नंदगांव के पुरुषों को लाठियों से मारती हैं। ढाल द्वारा पुरुष स्वयं को बचाने का प्रयत्न करते हैं। दोनों दल एक दूसरे को चुन चुन कर गालियाँ भी देते हैं। चारों ओर सम्पूर्ण वातावरण अबीर गुलाल से भर जाता है।

बरसाना नंदगाँव की लट्ठमार होली
बरसाना नंदगाँव की लट्ठमार होली

यदि आप इस समय यहाँ आना चाहें तो रंगों में सराबोर होने के लिए तत्पर रहिये। आप चाहकर भी रंगों से अछूते नहीं रह सकते। उसी प्रकार कुछ गालियाँ एवं मीठी छेड़खानी के लिए भी सजग रहिये, विशेषतः यदि आप स्त्री हैं। क्योंकि सम्पूर्ण वातावरण रंगों के साथ साथ ऊर्जा से भी ओतप्रोत हो जाता है।

समय – बरसना में फाल्गुन शुक्ल नवमी एवं नंदगांव में फाल्गुन शुक्ल दशमी

गोकुल की छड़ीमार होली

आप सब जानते हैं, बचपन में कृष्ण, यमुना नदी के बाएं तट पर स्थित गाँव, गोकुल में निवास करते थे। कृष्ण के जन्म के पश्चात उन्हें कंस से बचाने के लिए, उनके पिता वसुदेव ने तूफानी रात में उफनती यमुना नदी पार की तथा उन्हें गोकुल ले आये। कृष्ण ने अपना बालपन गोकुल में ही बिताया। इसलिए गोकुल में उनके बाल स्वरूप को पूजा जाता है।

गोकुल के अधिकाँश मंदिरों में आप नन्हे बालकृष्ण को झूले में विराजमान देखेंगे। मंदिरों में दर्शनार्थ आये भक्तगण इन्हें झूला झुलाते हैं।

गोकुल में छड़ीमार होली मनाई जाती है। इसके लिए एक छोटी नाजुक छड़ी का प्रयोग होता है। ये होली बरसाना एवं नंदगांव की लठमार होली का मृदु रूप है।

मथुरा की कृष्णजन्म भूमि का होली उत्सव

मथुरा के कृष्ण जन्मभूमि संकुल में एक विशाल प्रांगण है जहां होली मनाई जाती है। मुझे बताया गया कि यहाँ रंगों को फव्वारों द्वारा हवा में फेंका जाता है। प्रांगण में उपस्थित कोई भी इससे नहीं बच सकता। अंततः होली के उत्सव में कोई रंगों से क्यों बचना चाहेगा? रंगों में रंगे सब एकरूप हो जाते हैं। जात-पात, धर्म, धन एवं व्यक्तिमत्व की भिन्नता भूलकर सब प्रसन्नता से होली का उत्सव मनाते हैं।

समय – रंगभरी एकादशी अथवा फाल्गुन शुक्ल एकादशी

वृन्दावन में बाँके बिहारी के मंदिर की होली

श्री बांके बिहारी मंदिर की होली
श्री बांके बिहारी मंदिर की होली

वृन्दावन में सर्वाधिक आनंददायी स्थल है बाँके बिहारी का मंदिर। ४ दिवसों तक यहाँ होली का उत्सव जारी रहता है। यह फाल्गुन की एकादशी को आरम्भ होकर पूर्णिमा तक मनाया जाता है।

लोगों पर रंग उड़ाते पुजारियों की कई छवियाँ आपने भी देखी होंगी। उनमें से अधिकतर छवि इसी मंदिर की होंगी। यह एक प्रसिद्ध एवं भीड़भाड़ वाला मंदिर है।

समय – रंगभरी एकादशी अथवा फाल्गुन शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक

मथुरा के द्वारकाधीश मंदिर की होली

मथुरा के द्वारकाधीश मंदिर की होली
मथुरा के द्वारकाधीश मंदिर की होली

मथुरा वृन्दावन के अन्य मंदिरों के समान, विश्राम घाट के समीप स्थित रंगीन द्वारकाधीश मंदिर के परिसर में भी होली का उत्सव धूमधाम से मनाया जाता है।

मैंने द्वारकाधीश मंदिर के दर्शन होली से एक सप्ताह पूर्व किये थे। तब मैंने मंदिर परिसर के मंच पर स्त्रियों के समूहों को पारंपरिक गीत गाते देखा था। होली डोला एक प्रसिद्ध सांस्कृतिक शोभायात्रा है जो द्वारकाधीश मंदिर से आरम्भ होती है।

और पढ़ें: द्वारका का द्वारकाधीश मंदिर

मथुरा के चतुर्वेदी समाज का डोला

मथुरा का होली डोला
मथुरा का होली डोला

होली के अवसर पर चतुर्वेदी समाज द्वारा एक विशाल शोभायात्रा निकाली जाती है। यह विश्राम घाट के समीप स्थित द्वारकाधीश मंदिर से आरम्भ होती है तथा छत्ता बाजार, होली द्वार, कोतवाली द्वार, घिया मंडी तथा स्वामी द्वार होते हुए वापिस विश्राम घाट पहुंचती है।

जैसे जैसे शोभायात्रा आगे बढ़ती है, लोग एक दूसरे पर रंग, इत्र तथा पुष्प छिड़कते हैं। वादकों द्वारा बजाते संगीत के सुरों पर उत्सव गीत गाते हैं। पारंपरिक रूप से भांग का भी सेवन करते हैं।

होली डोला साधारणतः दोपहर २ बजे से आरम्भ होता है।

फगुआ

फगुआ एक ऐसी परंपरा है जहां देवर भाभी या जीजा साली से भेंट करते हैं तथा उन्हें उपहार देते हैं। अधिकांशतः उपहार के रूप में मिठाई के डिब्बे देते हैं। तथापि भेंट क्या हो, यह उपहार देने एवं लेने वालों पर निर्भर है।

स्त्रियाँ विवाह के पश्चात प्रथम होली का पर्व अपने मायके में मनाती हैं। तब उनके पतिदेव उपहार लेकर उनसे मिलने अपने ससुराल अर्थात पत्नी के मायके जाते हैं।

मेरे अनुमान से यह होली के उत्सव के औपचारिक समापन हेतु उत्तम रीत है, विशेषतः जब अज्ञानवश किसी के द्वारा किसी का अपमान हुआ हो। अतः, यदि आप एक स्त्री हैं तथा पुरुष वर्ग आपसे होली खेलने की इच्छा व्यक्त करता हो तो आप अधिकारपूर्वक उनसे फगुआ की मांग कर सकते हैं।

समय – चैत्र कृष्ण प्रथम – २० मार्च २०१९

फूलवाली होली अर्थात् पुष्पों की होली

मथुरा वृन्दावन में एक भिन्न प्रकार की मनभावन होली भी खेली जाती है। पुष्पों की होली! यह अपेक्षाकृत नवीन प्रथा प्रतीत होती है। यहाँ आयोजित अनेक समारोहों के एक भाग के रूप में यह एक अनोखा चलन बन गया है। कहीं लोग एक दूसरे पर पुष्पों की वर्षा करते हैं तो कहीं वे एक दूसरे पर पुष्पों की पंखुड़ियां फेंकते हैं।

इस प्रकार की होली के आयोजन को पारंपरिक रूप से अब तक मथुरा वृन्दावन के किसी भी मंदिर से सम्बंधित नहीं किया गया है। कौन जाने, भविष्य में होली मनाने की यह एक प्रमुख परंपरा बन जाये। क्यों ना हो, चारों ओर पुष्पों से घिरा रहना किसे नहीं भायेगा? वैसे भी, इस समय अनेक प्रकार व रंग के पुष्प इस क्षेत्र में उपलब्ध होते हैं।

मथुरा में निवास करती विधवाओं द्वारा खेली जाने वाली होली का मैं यहाँ विशेष उल्लेख करना चाहती हूँ। मेरे लिए वे भी ब्रज तथा भारत के उतने ही नागरिक हैं जितने हम। वे भी हमारे ही सामान होली का पर्व मनाते हैं।

मथुरा वृन्दावन के मंदिरों में होली उत्सव

मथुरा वृन्दावन अथवा ब्रज मंडल के लगभग प्रत्येक मंदिर में होली के मौसम में प्रत्येक दिवस होली खेली जाती है। पत्ते के एक दोने में गुलाबी रंग के गुलाल के साथ गेंदे के कुछ पुष्प भगवान् को अर्पित करते हैं। आप भगवान् के ऊपर गुलाल एवं पुष्प उछाल सकते हैं तथा स्वयं व आसपास के लोगों को गुलाल लगा भी सकते हैं।

वृन्दावन के एक मंदिर में होली के रंग
वृन्दावन के एक मंदिर में होली के रंग

मंदिर में मैंने अधिकतर परिवारों के सदस्यों को देखा जो रंगों से खेलते हुए होली के गीत गा रहे थे। उनमें एक था, ‘ आज बिरज में होली है रे रसिया’। मैंने कुछ लोगों को विश्राम घाट पर यमुना के साथ होली खेलते देखा। आप सोच रहे होंगे कि वे यमुना के संग कैसे होली खेल रहे थे? वे होली के गीत गाते हुए यमुना को सांकेतिक रूप से रंग लगाते थे। तत्पश्चात आपस में एक दूसरे को रंग लगाते थे।

होलिका दहन

होली के पर्व से राधा कृष्ण की कई गाथाएँ एवं रासलीलाएं जुड़ी हुई हैं। इसके साथ होली से एक अन्य किवदंती भी सम्बन्ध रखती है। जी हाँ! होलिका दहन की कथा।

होलिका दहन की कथा

एक समय हिरण्यकश्यप नामक एक शक्तिशाली दानव राज था जिसने सम्पूर्ण धरती पर अपना अधिपत्य स्थापित कर लिया था। उसने अपनी प्रजा को आदेश दिया कि वे भगवान् की पूजा अर्चना त्याग कर उसकी ही आराधना करें। संयोग देखिये, स्वयं उसके पुत्र प्रहलाद ने उसकी आराधना करना अस्वीकार किया। प्रहलाद भगवान् विष्णु का परम भक्त था। यह तथ्य हिरण्यकश्यप की सहनशक्ति से परे था।

कुंठित हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र की निष्ठा परिवर्तित करने के अनेक प्रयत्न किये। उसका ह्रदय परिवर्तन करने में असमर्थ होने पर उसकी हत्या करने के भी अनेक प्रयास किये। हिरण्यकश्यप अपने प्रत्येक प्रयास में असफल हुआ। अंततः उसने अपनी भगिनी होलिका से निवेदन किया कि वह प्रहलाद को गोद में लेकर अग्नि में प्रवेश करे। होलिका को वरदान प्राप्त था कि अग्नि उसे किसी भी प्रकार की हानि नहीं पहुंचा सकती।

विधि का विधान देखिये, भगवान् विष्णु के नाम का जप करते प्रहलाद को साथ लेकर जब होलिका ने अग्नि में प्रवेश किया, वरदान प्राप्त होलिका अग्नि में भस्म हो गयी किन्तु भक्त प्रहलाद सुरक्षित बच गए। यह अच्छाई की बुराई पर विजय का प्रतीक है।

इसी कथा के आधार पर, आज भी इस दिन, अर्थात् फाल्गुन पूर्णिमा के दिन, होलिका दहन करते हैं। लोग कंडे एवं लकड़ी का ढेर खडा कर उसे अग्नि को समर्पित करते हैं। भारत के अन्य भागों के समान मथुरा वृन्दावन में भी यह प्रथा निभाई जाती है। एक गाँव है, कोसी, जहां होलिका दहन किंचित भिन्न रीत से किया जाता है।

फलेन कोसी में जलती होली से पण्डे का निकलना

कोसी के समीप स्थित फलेन गाँव में भी, भक्त प्रहलाद की विजय के प्रतीक स्वरूप, होलिका दहन किया जाता है। एक पुजारी, जिसे यहाँ पंडा भी कहते हैं, गाँव के प्रहलाद मंदिर में पूजा अर्चना करते हैं। तत्पश्चात वे प्रहलाद कुण्ड में डुबकी लगाते हैं। इसके पश्चात वे सैकड़ों लोगों के समक्ष विशाल अग्नि के बीच से चलते हैं।

३० फीट दूर चलना कोई कठिन कार्य नहीं, किन्तु यदि जलती लकड़ियों के ऊपर चलना हो तो यह लगभग असंभव है। अग्नि के दूसरे छोर पर लोग गीले वस्त्र हाथों में लिए पण्डे की प्रतीक्षा करते हैं तथा उसके अंगों को शीतलता प्रदान करते हैं। इस सम्पूर्ण अग्नि यात्रा में कुछ क्षणों का ही समय लगता है जिसके अंत में पंडा सुरक्षित निकल आते हैं। तत्पश्चात वे अग्नि की परिक्रमा कर घर की ओर प्रस्थान करते हैं।

लोगों की मान्यता है कि यह प्रथा ब्रज के कृष्ण काल से चली आ रही है। ऐसा भी माना जाता है कि फलेन भक्त प्रहलाद का गाँव था। कहते हैं कि अग्नि में चलने से पूर्व, पंडा अर्थात् पुजारीजी सम्पूर्ण दिवस प्रहलाद के नाम का जप करते हैं।

यह भी ब्रज को होली का अनूठा रूप है।

समय – फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा

बलदेव के दाउजी मंदिर में दाऊ जी का हुरंगा

श्रीकृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता बलराम को प्रेम से दाऊ अथवा दाउजी भी कहा जाता था। यमुना के दूसरे छोर पर, मथुरा से लगभग ३० किलोमीटर दूर, ब्रज के एक क्षेत्र बलदेव में बलराम को समर्पित एक विशाल मंदिर है। एक समय यह ब्रज के १२ वनों में से एक, खदिर वन का एक भाग था।

ब्रज की होली
ब्रज की होली

दाउजी का मंदिर ऐसा स्थान है जहां मथुरा वृन्दावन की होली अपनी चरम सीमा पर होती है। होली को यहाँ दाउजी का हुरंगा कहा जाता है। हुरंगा का अर्थ है हुड़दंग या दंगा।

अधिकतर ब्रजवासी होली के उत्सव का समापन दाउजी के हुरंगे से करते हैं।

समय – चैत्र कृष्ण द्वितीया

मुखराई का मुखराई चरकुला नृत्य

मुखराई राधा की नानी का गाँव है। इस गाँव को उनकी नानी का ही नाम दिया गया है। कहा जाता है कि जब राधा रानी का जन्म हुआ था तब उनकी नानी मुखरा ने बैलगाड़ी के पहिये पर दीपक जलाकर नृत्य किया था।

तभी से यह नृत्य चरकुला के नाम से ख्याति प्राप्त कर परंपरा का रूप ले चुका है। ऐसा माना जाता है कि चरकुला शब्द चक्र से व्युत्पन्न है। चक्र अर्थात् पहिया अथवा गोलाकार आकार। इस दिन मुखराई गाँव में यह नृत्य गाँव की स्त्रियों द्वारा किया जाता है।

गोलाकार चरकुला लगभग ४० से ५० किलो वजन का होता है। इसमें १०८ दीपक होते हैं जिन्हें ४ से ५ तलों में रखा जाता है। स्त्रियाँ इन्हें सिर पर रखकर नृत्य करती हैं। अचरज होता है, राधा व कृष्ण जिन गाँवों से सम्बन्ध रखते थे उन सब गाँवों में अब भी वे वहाँ की परम्पराओं, किवदंतियों अथवा गाथाओं में जीवित है।

समय – चैत्र कृष्ण द्वितीया

होली के गीत

होली हर्षोल्हास का पर्व है। ऐसा पर्व संगीत के बिना अधूरा है। यद्यपि मथुरा वृन्दावन के सभी मंदिरों में प्रत्येक संध्या के समय पारंपरिक गीत गाये जाते हैं, तथापि विभिन्न युगों के अधिकतर भक्ति कवियों तथा वैष्णव कवियों ने फागुन उत्सव तथा होली पर अनेक गीत लिखे हैं। बोलचाल की भाषा में ये होरी के नाम से प्रचलित हैं।

बरसाना के राधा रानी मंदिर में समाज गायन
बरसाना के राधा रानी मंदिर में समाज गायन

मंदिर में गायक-वादकों के समूह भगवान् के समक्ष बैठते हैं तथा गीत प्रस्तुत करते हैं। गाँवों के मध्य गायन की स्पर्धाएं भी होती हैं, विशेषतः बरसना तथा नंदगाँव के मध्य। बरसना के मंदिर में ऐसे ही गायन के अभ्यास सत्र का आनंद लेने का अवसर मुझे प्राप्त हुआ। वह अत्यंत ही आनंदमय अनुभव था।

यदि आप भी इन गीतों को गाना चाहते हैं तो इन गीतों की एक पुस्तक, श्रृंगार रस सागर, मथुरा वृन्दावन में पुस्तक की दुकानों में उपलब्ध है।

भारतीय शास्त्रीय संगीत के कुछ दिग्गज संगीतज्ञों द्वारा गाई गयी रचनाएँ आप यहाँ सुन सकते हैं।

होरी ठुमरी – रंगों में सराबोर करते होली के चंचल गीत

मैंने यहाँ होरी गीतों को मंदिरों में, यमुना किनारे, सडकों पर या कहूं मथुरा वृन्दावन में सर्वत्र सुना।

क्या ब्रज के होली उत्सव में भाग लेना सुरक्षा की दृष्टी से उपयुक्त है?

ब्रज की होली के रंग

  • मथुरा वृन्दावन के उत्सवों के सम्बन्ध में बहुधा यह प्रश्न किया जाता रहा है। इस विषय में मैं अपने विचार आपके समक्ष रखना चाहती हूँ।
  • यदि आपको भीड़ से भय है तो आप कुछ दूरी पर अपना स्थान चुन सकते हैं।
  • आप ऐसे कल्पना भी ना करें कि आप पिचकारियों से आती रंगों अथवा जल की धार से बच पायेंगे! यहाँ तक कि होली पर्व से पहले ही मुझ पर जल के गुब्बारे गिरे थे जब मैं रिक्शे में बैठ कर जा रही थी। यूँ तो मंदिरों में लोग अनुमति प्राप्त करने के पश्चात ही रंग लगाते हैं। किन्तु हो सकता है ऐसी औपचारिकता होली के दिन अथवा सड़कों पर उतनी श्रद्धा से ना निभाई जाये।
  • होली एक ऐसा उत्सव है जहां किंचित स्वच्छंदता की अनुमति रहती है। स्त्री पुरुष जो अन्यथा एक दूसरे से भले ही ना बतियाएं, पर होली के दिन आप उन्हें एक दूसरे पर रंग लगाते देख सकते हैं। यदि आप होली खेलने के स्थान पर उपस्थित हैं, तो आप की उपस्थिति ही आपकी अनुमति मानी जाती है।
  • यदि भीड़ में आपको कोई पहचानता नहीं अथवा आपका मुखड़ा रंग के पीछे छुप गया हो तो कुछ उपद्रवी तत्व इसका लाभ उठा सकते हैं। अतः भीड़ का सूक्ष्म अवलोकन करें तथा सहज हों तभी भीड़ में सम्मिलित होयें। यदि कोई अप्रिय स्थिति उत्पन्न होने की आशंका हो तो उत्तर प्रदेश पर्यटन पुलिस अधिकारियों को खोजें। वे आसपास ही होंगे तथा आपकी सहायता करेंगे।
  • यदि आप इस ब्रज की होली का मृदु रूप देखना चाहते हैं तो आप उत्सव की चरम बिंदु से कुछ दिवस पूर्व मथुरा वृन्दावन की यात्रा पर आयें। आपको होली के उत्सव की झलक मिल जायेगी। आप शान्ति से बैठकर संगीत एवं अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आनंद उठायें जो इस समय आयोजित किये जाते हैं। हाँ, इस सौदे में आप रंग भरे वातावरण की रंगीन छायाचित्र लेने से चूक जायेंगे। कहते हैं ना, कुछ सुविधाएं प्राप्त करने के लिए कुछ समझौते करने पड़ते हैं! मैंने भी होली से कुछ दिवस पूर्व यात्रा करना सुविधाजनक जाना।

यात्रा के सुझाव

मथुरा के लिए निकटतम विमानतल दिल्ली है। तत्पश्चात, दिल्ली से मथुरा तक सड़क मार्ग द्वारा जाना अत्यंत सुविधाजनक तथा सर्वोत्तम विकल्प है। सड़क मार्ग द्वारा दिल्ली से मथुरा पहुँचने में मात्र २ घंटों का समय लगता है। आप रेल द्वारा भी मथुरा आसानी से पहुंच सकते हैं।

मथुरा मे मैंने ठहरने के लिए ‘ब्रजवासी लैंड्स इन’ नामक अतिथिगृह का चुनाव किया था। मुझे यह मथुरा नगरी के मध्य स्थित एक सुविधाजनक अतिथिगृह प्रतीत हुआ। मथुरा में इसी प्रबंधन के दो अन्य अतिथिगृह भी हैं। यद्यपि वृन्दावन एवं गोवर्धन की सीमावर्ती क्षेत्रों में अनेक रिसॉर्ट्स भी उपलब्ध हैं, तथापि सही मायने में होली उत्सव का आनंद उठाने के लिए नगर के भीतर ठहरना उचित होगा।

नगर के भीतर घूमने के लिए जन-परिवहन के साधन आसानी से उपलब्ध हैं। संकरी गलियों में जाने के लिए ई-रिक्शा सर्वोत्तम साधन है।

आपको सावधान कर दूं, वृन्दावन में वानरों का आतंक है। आप अपने मोबाइल फोन, कैमरे तथा अन्य मूल्यवान वस्तुओं का ध्यान रखें।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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गोवर्धन परिक्रमा – वह पर्वत जिसे कृष्ण ने अपनी कनिष्ठिका पे उठाया था https://inditales.com/hindi/govardhan-parikrama-braj-bhumi/ https://inditales.com/hindi/govardhan-parikrama-braj-bhumi/#comments Wed, 16 Oct 2019 02:30:11 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1532

गोवर्धन पर्वत, यमुना एवं ब्रज भूमि – केवल यही तीन मूल धरोहर कृष्ण के समय से अब तक अस्तित्व में हैं। कम से कम उस नाविक की दृष्टि में तो यही सनातन सत्य है जो मुझे मथुरा में यमुना नदी पर नौका की सवारी करा रहा था। इसके पश्चात ब्रज भूमि में जिस भी पुजारी […]

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गोवर्धन पर्वत, यमुना एवं ब्रज भूमि – केवल यही तीन मूल धरोहर कृष्ण के समय से अब तक अस्तित्व में हैं। कम से कम उस नाविक की दृष्टि में तो यही सनातन सत्य है जो मुझे मथुरा में यमुना नदी पर नौका की सवारी करा रहा था। इसके पश्चात ब्रज भूमि में जिस भी पुजारी से मैंने विचार विमर्श किया, जिस भी सुशिक्षित व्यक्ति से मैंने चर्चा की, सबने यही तथ्य दोहराया। इन तीन धरोहरों को छोड़कर अन्य जो भी आप देखेंगे, सब राधा-कृष्ण के भक्तों का है। ब्रज में तो कहते हैं भक्त भी पूजनीय हैं।

गोवर्धन पर्वत शिला
गोवर्धन पर्वत शिला

गोवर्धन पर्वत एवं इस पर्वत का प्रत्येक पत्थर पवित्र है। यहाँ आपको चारों ओर इन पत्थरों की पूजा होती दिखाई देगी। कहीं इन पत्थरों को सजाया गया है, आँखें एवं अन्य श्रृंगार देकर इन्हें देवता का प्रतिरूप दिया गया है तो कहीं इन पत्थरों को अपने मूल रूप में ही पूजा जा रहा है। यहां के पुजारी आपको इन पत्थरों पर चरणों के चिन्ह, गौमाता अथवा राधा-कृष्ण की छवि दिखा देंगे। उनका विश्वास है कि ये पत्थर राधा-कृष्ण की लीलाओं के साक्षी हैं। उनके अनुसार इन पत्थरों पर राधा-कृष्ण के पदचिन्हों की छाप है। ब्रज में प्रत्येक पत्थर को राधा एवं कृष्ण का रूप माना जाता है।

ब्रजवासियों का मानना है कि इन पत्थरों को ब्रज भूमि से कभी पृथक नहीं किया जाना चाहिए। आपको यहाँ कई ऐसे लोगों की कथाएं सुनायी जायेंगी जो इन पत्थरों को ब्रज भूमि से चोरी छुपे बाहर ले गए तथा वे महाविपदाओं की बलि चढ़ गए। इन कथाओं को सुनकर मुझे प्रतीत हुआ, कदाचित परम्पराओं एवं संस्कारों द्वारा पर्यावरण का संरक्षण सर्वोत्तम पद्धति से किया जा सकता है।

गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा भक्तों में अत्यंत प्रचलित है। गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करने के लिए भक्तों का वर्ष भर यहाँ तांता लगा रहता है। मेरी इस ब्रज भूमि की यात्रा के समय मैंने भी गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करने का निश्चय किया। यद्यपि मैंने यह परिक्रमा इ-रिक्शा में बैठकर पूर्ण की थी। अपनी इस परिक्रमा के समय जो तथ्य मुझे सर्वप्रथम ज्ञात हुआ, वह था विभिन्न प्रकार की परिक्रमाएं जो आप कर सकते हैं।

गोवर्धन पर्वत परिक्रमा के विभिन्न प्रकार

१०८ दंडवत गोवर्धन पर्वत परिक्रमा
१०८ दंडवत गोवर्धन पर्वत परिक्रमा

१. पद-परिक्रमा – पदचाप करते हुए गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करना सर्वाधिक प्रचलित एवं कदाचित सर्वाधिक सरल पद्धति है। आप किसी भी बिंदु से यह परिक्रमा आरम्भ कर सकते हैं। गोवर्धन पर्वत को अपनी दायीं ओर रखते हुए एवं घड़ी की दिशा में दक्षिणावर्त चलते हुए लौट कर आरम्भ बिंदु पर पहुँचने पर परिक्रमा पूर्ण होती है। अविरत आप यह परिक्रमा ६-८ घंटों में पूर्ण कर सकते हैं। विश्राम हेतु लिए गए पड़ाव तथा पद-भ्रमण की गति इस समयावधि में परिवर्तन कर सकते हैं।

२. दुग्ध परिक्रमा – इस परिक्रमा में भक्त अपने हाथों में दूध का घड़ा लिए हुए पैदल अथवा गाड़ी द्वारा गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करते हैं। मार्ग में वे सतत दुग्ध अर्पण करते रहते हैं। अधिकांशतः लोग अपने घड़े में एक छोटा छिद्र बना देते हैं तथा घड़े को दुग्ध से भर देते हैं। जैसे जैसे वे परिक्रमा करते हुए आगे बढ़ते हैं, दुग्ध की महीन धार बहती रहती है। आप परिक्रमा पथ पर ऐसी कई धारायें देख सकते हैं।

३. सोहनी सेवा परिक्रमा – इस परिक्रमा में भक्त अपने हाथ में झाडू ले कर चलते हैं तथा परिक्रमा के साथ सफाई कार्य भी करते हैं। इस परिक्रमा का नाम में ही इसका अर्थ छुपा है। अर्थात् ऐसे परिक्रमा जो स्थल को स्वच्छ एवं सुन्दर बना दे। कितनी सुन्दर परंपरा है। दर्शन एवं आराधना के साथ साथ सम्पूर्ण स्थल भी स्वच्छ हो जाता है।

४. दंडवत परिक्रमा – दंडवत परिक्रमा का अर्थ है सम्पूर्ण देह द्वारा परिक्रमा। भक्तगण साष्टांग (स+अष्ट+अंग ) प्रणाम की मुद्रा में धरती पर लेट जाते हैं। उनके दोनों हाथ, दोनों पैर, दोनों घुटने, छाती तथा माथा ( अर्थात अष्ट अंग ) धरती का स्पर्श करते हैं। जहां उनके हाथों का अग्रभाग धरती का स्पर्श करता है, उस बिंदु को वे छोटे पत्थर से चिन्हित करते हैं। तत्पश्चात चिन्हित बिंदु पर खड़े होकर अगले साष्टांग प्रणाम की मुद्रा में धरती पर लेट जाते हैं। इस प्रकार वे अपनी परिक्रमा पूर्ण करते हैं। यह एक कठिन परिक्रमा है। जो भक्तगण इस प्रकार की परिक्रमा करते है उन्हें परिक्रमा पूर्ण करने में ८-१० दिनों का समय लगता है। साधारणतः भक्त प्रत्येक दिवस परिक्रमा का एक भाग पूर्ण करते हैं।

५. पति-पत्नी दंडवत प्रणाम – कई विवाहित जोड़े एक दूसरे के साथ दंडवत परिक्रमा करते हैं। पति पत्नी बारी बारी से साष्टांग प्रणाम करते हैं। इस प्रकार प्रत्येक का श्रम आधा हो जाता है। मैंने स्वयं देखा कि जहां पति के हाथ धरती को स्पर्श करते हैं, वहां से पत्नी साष्टांग प्रणाम आरम्भ करती है तथा जहां पत्नी के हाथ धरती को स्पर्श करते हैं, वहां से पति साष्टांग प्रणाम आरम्भ करता है। इस परिक्रमा को देख कर अर्धनारीश्वर का साक्षात् आभास होता है।

६. १०८ दंडवत परिक्रमा – यह परिक्रमा आपको अचरज में डाल देगी। इस परिक्रमा में भक्त १०८ पत्थर साथ लेकर चलता है। परिक्रमा आरम्भ करने से पूर्व वह एक ही स्थान पर १०८ दंडवत प्रणाम करता है, तत्पश्चात वह उस स्थान पर खडा होता है जहां उसके हाथों ने धरती का स्पर्श किया। वहां वह एक बार फिर १०८ दंडवत प्रणाम करता है। इस प्रकार वह अपनी परिक्रमा पूर्ण करता है। यह अत्यंत ही कठिन परिक्रमा है। इस परिक्रमा में भक्तगण ५-१० मीटर प्रतिदिन से अधिक नहीं जा सकते। एक परिक्रमा सम्पूर्ण करने में वर्षों लग जाते हैं। इसका अर्थ है, भक्त अपना अधिकतम जीवन परिक्रमा को समर्पित कर देता है। आपको सहसा विश्वास नहीं हो रहा होगा। प्रत्यक्ष देखने पर ही आप इसकी कठिनता का अनुमान लगा सकते हैं। सम्पूर्ण परिक्रमा पथ पर आपको ऐसे छोटे छोटे पत्थरों के कई ढेर दिख जायेंगे। इससे आप अनुमान लगा सकते हैं कि कई भक्तगण ऐसी परिक्रमा करते है। मैंने कई साधुओं को गोवर्धन पर्वत पर इस प्रकार की परिक्रमा करते देखा। कहाँ देखने मिलेगी ऐसी भक्ती एवं समर्पण!

गोवर्धन परिक्रमा कितनी लम्बी है?

कई मंदिरों, कुंडों तथा वृक्षवाटिकाओं के समीप से जाते गोवर्धन परिक्रमा पथ की पूर्ण लम्बाई लगभग २१ की.मी. है।

गोवर्धन पर्वत की हर शिला पूजनीय है
गोवर्धन पर्वत की हर शिला पूजनीय है

परिक्रमा पथ का अधिकाँश भाग कच्ची मिट्टी का है जिस पर चलना आसान है। चप्पल-जूतों के बिना चलना भी कष्टकारक नहीं है। सम्पूर्ण परिक्रमा पथ स्वच्छ है। परिक्रमा पथ का अधिकतर भाग चौड़ा है। केवल गाँवों के भीतर इस पथ का डामरीकरण किया गया है।

मेरे अनुभव से मैं कह सकती हूँ कि गोवर्धन परिक्रमा आपकी कल्पना से अपेक्षाकृत कही अधिक सरल है। यह उतार-चढ़ाव से रहित एक सपाट पथ है। पथ के कई भागों में आपके समक्ष यह विकल्प प्रकट हो जाता है कि आप पथ पर चलें अथवा समीप स्थित वृक्षों के झुरमुट के मध्य से जाएँ।

गोवर्धन परिक्रमा पथ

यह गोवर्धन पर्वत को घेरता एक गोलाकार पथ है। आप अपने संकल्प के अनुसार इस परिक्रमा का आरम्भ एवं समापन, पथ के किसी भी बिंदु से कर सकते है। मैंने यह परिक्रमा कैसे पूर्ण की, आपको अवश्य बताउँगी।

दानघाटी मंदिर

मथुरा से आये अधिकतर भक्त दानघाटी मंदिर से परिक्रमा आरम्भ करते हैं। मंदिर के अग्रभाग पर गोवर्धन पर्वत को छोटी उंगली, कनिष्ठिका पर उठाकर गांववासियों की प्राण रक्षा करते कृष्ण का अप्रतिम दृश्य प्रदर्शित है। मंदिर का यह भाग अपेक्षाकृत नवीन है।

ब्रज भूमि के गोवर्धन का दान घाटी मंदिर
ब्रज भूमि के गोवर्धन का दान घाटी मंदिर

दानघाटी मंदिर के नाम की व्युत्पति दान शब्द से हुई है जो बालक कृष्ण उन सब गोपिकाओं से एकत्र करते थे जिन्हें गोवर्धन पर्वत पूजने की इच्छा रहती थी। एक बार गोपिकाओं ने राधा को ही दान स्वरूप कृष्ण को सौंप दिया था।

दानघाटी मंदिर वास्तव में कई छोटे मंदिरों का एक संकुल है। एक गोवर्धन पत्थर को इस प्रकार अलंकृत किया जाता है कि वह जागृत एवं मानवी प्रतीत होता है। गोवर्धन में चहुँ ओर ऐसे ही पत्थरों की आराधना की जाती है।

लक्ष्मी नारायण मंदिर

लक्ष्मी नारायण मंदिर - गोवर्धन
लक्ष्मी नारायण मंदिर – गोवर्धन

दानघाट मंदिर के समक्ष एक अप्रतिम पाषाणी मंदिर है- लक्ष्मीनारायण मंदिर,जिसे १९०३ ई. में हाथरस के एक धनसंपन्न परिवार ने निर्मित करवाया था। पुलिस स्थानक के समीप एक छोटे से क्षेत्र को गोवर्धन पूजा के लिए निहित किया गया है जहां प्रत्येक प्रातः एवं संध्या को पूजा अर्चना की जाती है। यह अपेक्षाकृत आधुनिक वास्तु प्रतीत होती है।

मानसी गंगा

गोवर्धन गाँव के मध्य स्थित मानसी गंगा एक पवित्र जलाशय है। ऐसा कहा जाता है कि एक समय श्री कृष्ण के पालक माता पिता नन्द एवं यशोदा गंगा दर्शन के इच्छुक थे। गंगा की ओर जाते समय एक रात्रि उन्होंने गोवर्धन में पड़ाव किया। प्रातः होने से पूर्व ही कृष्ण मानसिक इच्छाशक्ति द्वारा गंगा को यहाँ ले आये थे। उसी समय से इस जलाशय का नाम मानसी गंगा पड़ा।

मानसी गंगा - गोवर्धन
मानसी गंगा – गोवर्धन

मैंने जलाशय के चारों ओर भ्रमण कर वहां के घरों एवं मंदिरों को निहारना आरम्भ किया। मानसी गंगा के चारों ओर कई छोटे बड़े मंदिर थे। कुछ मंदिरों के वृत्ताकार तोरणों के नीचे सूक्ष्म चित्रकारियाँ की हुई थीं। मानसी गंगा के चारों ओर स्थित गलियों में छोटे छोटे सुन्दर घर थे जो मुझे प्राचीन काल में ले गए थे। मैंने देखा, प्रत्येक घर, प्रत्येक मंदिर तथा प्रत्येक वृक्ष के नीचे गोवर्धन पत्थरों की पूजा अर्चना हो रही थी। जलाशय के चारों ओर स्थित सुन्दर मंदिरों ने मुझे मोहित कर लिया था।

उन में से कुछ मंदिरों का उल्लेख यहाँ कर रही हूँ:

ठाकुर हरिदेव जी महाराज मंदिर - गोवर्धन
ठाकुर हरिदेव जी महाराज मंदिर – गोवर्धन

ठाकुर हरि देव जी मंदिर – एक संकरी सी गली मुझे ठाकुर हरी देव जी के मंदिर तक ले गयी। लाल बलुआ पत्थर में निर्मित इस मंदिर के विषय में मान्यता है कि इसी स्थान पर श्री कृष्ण अपनी कनिष्का पर गोवर्धन पर्वत को उठाये खड़े थे।
ब्रह्मा कुण्ड – मानसी गंगा के किनारे एक छोटा जल कुण्ड था। इसे देख ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कुछ दिन पूर्व ही इसका पुनरुद्धार किया गया था, तदनंतर इसे उपेक्षित छोड़ दिया था।

गोवर्धन के भवनों में चित्रकारी
गोवर्धन के भवनों में चित्रकारी

चक्रेश्वर महादेव मंदिर – यह मंदिर मेरी सम्पूर्ण गोवर्धन पर्वत परिक्रमा का सर्वाधिक अविस्मरणीय एवं अविश्वसनीय मंदिर था। यह एक शिव मंदिर है। इसके भीतर चक्र के आकार में ५ शिवलिंग स्थापित हैं। इसके पृष्ठ भाग में एक उत्कीर्णित शिला पर कृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा पर उठाने की कथा प्रदर्शित है। इस कथा के अनुसार भारी वर्षा से गाँववासियों की रक्षा करने के लिए कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा पर उठा लिया था। सभी गाँववासियों ने पर्वत के नीचे शरण ली। किन्तु कुछ क्षण पश्चात, पर्वत को उठाने से बने गड्ढे में वर्षा का जल भरने लगा। तब भगवान् शिव चक्र के रूप में अवतरित हुए तथा सम्पूर्ण जल को बाहर निकाल दिया। यह मंदिर उसी घटना का कीर्तिगान करता है।

चक्रेश्वर महादेव मंदिर के पांच शिवलिंग
चक्रेश्वर महादेव मंदिर के पांच शिवलिंग

मुझे ५ प्राचीन शिवलिंगों द्वारा बना चक्र अत्यंत अद्भुत जान पड़ा। उसी प्रकार पृष्ठभागीय उत्कीर्णित शिला भी उतनी ही अनोखी प्रतीत हुई। शिला पर बनी छवि को मैं पूर्णतः समझ नहीं पायी, किन्तु मुझे ९ डिबियों का यन्त्र, ब्रम्हा की छवि तथा उपरी भाग में गोवर्धन पर्वत की घटना के चित्रण का स्मरण है। इनके साथ एक शंख तथा हनुमान सदृश आकृति भी थीं।

चक्रेश्वर महादेव मंदिर की शिला
चक्रेश्वर महादेव मंदिर की शिला

काले पत्थर में बनी नंदी की प्रतिमा अपने वय की व्यथा कह रही थी। चक्रेश्वर महादेव के चारों ओर देवी की पीतल में बनी प्रतिमाएं हैं।

गोवर्धन पर्वत के चारों ओर निर्मित जलकुंड

ब्रज भमि के अन्य स्थलों के समान, गोवर्धन में भी कई कुण्ड हैं। कुण्ड का अर्थ है छोटे मानव-निर्मित जलाशय। ऐसा कहा जाता है कि सम्पूर्ण ब्रज भूमि में २५० से अधिक कुण्ड हैं। इनमें से कई आप इस गोवर्धन परिक्रमा के समय देख सकते हैं। प्रत्येक कुण्ड की अपनी एक कथा है जो किसी न किसी प्रकार से कृष्ण से सम्बंध रखती है। आईये इनमें से कुछ कुण्डों की कथा मैं आपके समक्ष प्रस्तुत करती हूँ।

संकर्षण कुंड - गोवर्धन परिक्रमा पथ
संकर्षण कुंड

१. संकर्षण कुण्ड – कृष्ण के बड़े भ्राता दाऊ बलराम को संकर्षण नाम से भी पुकारा जाता है। इस कुण्ड के एक छोर पर बलराम की एक सुन्दर प्रतिमा है। प्रवेश द्वार के दोनों ओर द्वारपाल की सुन्दर प्रतिमा है। बलुआ पत्थर द्वारा निर्मित सूचना फलकों पर इस कुण्ड की कथा दर्शाई गयी है। इसके अनुसार, इस कुण्ड का सम्बन्ध पाताल लोक एवं शेष नाग से है। कुण्ड के समीप बलराम का एक छोटा सा मंदिर भी है।
२. गौरी कुण्ड – मन में कृष्ण मिलन की आस लिए, गोपिका चन्द्रावली यहाँ आकर कुण्ड की पूजा अर्चना करती थी।
३. नीप कुण्ड – यहाँ कृष्ण एवं उनके सखा दही भक्षण के लिए पलाश के पत्तों द्वारा दोने तैयार करते थे।
४. गोविन्द कुण्ड – कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा पर उठाकर इंद्र के प्रकोप से गांववासियों की रक्षा की तथा इंद्र का अभिमान नष्ट किया था। जब इंद्र को आत्मग्लानि हुई, उन्होंने कामधेनु गऊ के दूध एवं आकाशगंगा के जल से यहीं भगवान् कृष्ण का अभिषेक किया था तथा उन्हें गोविन्द नाम प्रदान किया था।
५. गन्धर्व कुण्ड – जब कृष्ण का अभिषेक किया जा रहा था, तब दिव्य गन्धर्व यहाँ उनकी स्तुति गान कर रहे थे।
६. अप्सरा कुण्ड – यहाँ दिव्य सुंदरियां एवं अप्सराएं स्नान करती थीं।

ऐरावत कुंड - गोवर्धन परिक्रमा पथ
ऐरावत कुंड – गोवर्धन परिक्रमा पथ

७. नवल कुण्ड – प्राचीनकाल में इसका नाम, पूंछरी गाँव के नाम पर पूंछ कुण्ड था। भरतपुर की रानी द्वारा इसके पुनरुद्धार के पश्चात इनका नवीन नामकरण नवल कुण्ड किया गया।
८. सुरभि कुण्ड – इंद्र द्वारा कृष्ण के अभिषेक हेतु दिव्य गऊ कामधेनु अर्थात् सुरभि ने यहाँ आकर इंद्र को दूध दिया।
९. इंद्र कुण्ड – यहाँ इंद्र ने कृष्ण की आराधना की थी।
१०. ऐरावत कुण्ड – यहीं इंद्र के वाहन ऐरावत ने, कृष्ण के अभिषेक हेतु, आकाशगंगा का जल लाया था।

रूद्र कुंड - गोवर्धन पर्वत परिक्रमा पथ
रूद्र कुंड – गोवर्धन पर्वत परिक्रमा पथ

११. रूद्र कुण्ड – यहाँ रूद्र रुपी शिव ने कृष्ण के दर्शन हेतु उनसे प्रार्थना की थी।
१२. माड़ कुण्ड अथवा उदर कुण्ड – यह माड़ समुदाय का कुण्ड है।
१३. सूरज अथवा सूखता कुण्ड
१४. बिछलुकुंड – यहाँ राधा एवं कृष्ण लुका-छुपी का खेल खेलते थे।
१५. उद्धव कुण्ड – मैंने सीधे ही मान लिया कि यह कुण्ड कृष्ण के चचेरे भाई एवं सखा उद्धव का है।
१६. ललिता कुण्ड – राधा कुण्ड के समीप स्थित इस कुण्ड का नाम राधा की कई सखियों में से एक सखी, ललिता के नाम पर रखा गया है। शाक्त समुदाय की मान्यताओं के अनुसार, ललिता सर्वशक्तिमान देवी हैं। इस कुण्ड के समीप उन्हें समर्पित एक मंदिर भी है।
१७. राधा कुण्ड एवं श्याम कुण्ड – राधा कुण्ड सर्वाधिक महत्वपूर्ण कुण्ड है क्योंकि राधा ब्रज की अधिष्ठात्री देवी हैं। राधा-श्याम कुण्ड जुड़वा कुण्ड हैं जिनके बीच एक पथ है। इस पथ के दोनों ओर पौडियां अर्थात् सीड़ियाँ बनी हुई हैं। इस पथ के नीचे श्याम कुण्ड द्वारा राधा कुण्ड का पोषण होता है।

राधा कुंड एवं श्याम कुंड
राधा कुंड एवं श्याम कुंड

ऐसा कहा जाता है कि राधा ने स्वयं अपने कंगन द्वारा राधा कुण्ड की खुदाई की थी। किन्तु कुण्ड में जल प्राप्त नहीं हुआ। जबकि कृष्ण कुण्ड में सभी पवित्र नदियों एवं सागरों का जल था। तब कृष्ण कुण्ड का यही जल राधा कुण्ड में भी भरने लगा। इन सबके पृष्ठभाग में एक सुन्दर प्रेमकथा है। इस कथा को सुनने का निर्मल आनंद राधा कुण्ड एवं कृष्ण कुण्ड के बीच स्थित संकरे पथ पर खड़े होकर ही आता है।

१८. कुसुम सरोवर – कुसुम सरोवर गोवर्धन का सर्वाधिक सुन्दर एवं सर्वोत्तम रखरखाव का जलाशय है। कुण्ड के दूसरे छोर पर छत्रियां हैं जिनकी परछाई कुण्ड के शांत जल पर पड़ती हैं तथा मनोरम व आनंददायक दृश्य उत्पन्न करती हैं। इस कुण्ड का एक राजसी एवं विनम्र आयाम भी है। मैं यहाँ दोपहर के समय थी। सूर्य देवता मेरे शीश के ठीक ऊपर, अपने पूर्ण तेज से चमक रहे थे। जल पर पड़ती किरणें कुण्ड को अप्रतिम रूप प्रदान कर रही थी।

कुसुम सरोवर
कुसुम सरोवर

राजस्थान के राजसी परिवार ने सरोवर के समक्ष एक शिवलिंग की स्थापना करवाई थी।

इन सब के बाद भी एक प्रश्न अनुत्तरित था। अंततः कुसुम नामक इस कुण्ड का किसी कुसुम अथवा पुष्प से क्या सम्बन्ध था? यह जानना अभी शेष है।

१९. चन्द्र सरोवर – यह कुण्ड मुख्य परिक्रमा मार्ग से किंचित दूरी पर है। ऐसा माना जाता है कि श्री कृष्ण की लीलाओं को निहारने के लिए चन्द्र यहीं रूक गए थे। यह स्थान दर्शन हेतु इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह १६वी. सदी के संत व कवि भक्त सूरदास का स्थान है।

कवि सूरदास की समाधि - चन्द्र सरोवर के पास
कवि सूरदास की समाधि – चन्द्र सरोवर के पास

यहाँ संत कवि सूरदास की समाधि एक छोटे मंदिर के रूप में है। आपको यहाँ आज भी उनकी रचनाएँ गाते विद्यार्थियों के स्वर सुनायी देंगे। सूरदास के इस स्थान के दर्शन कर मेरे मन मष्तिष्क में उनकी स्मृतियाँ उभर आयीं। मुझे उनकी कई रचनाएँ स्मरण हो आयीं। उनमें एक प्रसिद्ध रचना थी – मैय्या मोरी मैं नहीं माखन खायों!

गोवर्धन परिक्रमा मार्ग पर स्थित गाँव

गोवर्धन पर्वत पथ पर परिक्रमा करते समय आप कई गाँवों के मध्य से जायेंगे। प्रत्येक गाँव की अपनी एक कृष्ण कथा है। इनमें से कुछ कथाएँ इस प्रकार हैं-

आन्योर – यह नाथद्वार के श्रीनाथजी का मूल गाँव था। उनका मूल मंदिर एवं प्रतिमा यहाँ गोवर्धन पर्वत पर ही था। मुगल आक्रमण के समय इस मूर्ति को यहाँ से आगरा, तत्पश्चात वहाँ से उदयपुर के निकट नाथद्वार स्थानांतरित कर दिया गया था। नाथद्वार में एक लघु ब्रज सदृश स्थान है जहां श्रीनाथजी अब भी बसते हैं।

आन्योर शब्द आन + और को संयुक्त कर बना है।

श्री कृष्णजी ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा पर ७ दिवसों तक उठाये रखा था। इसके पश्चात उन्हें बहुत भूख लगी। ब्रज के निवासियों ने उनके लिए ५६ भोग बनाए। ५६ भोग की संकल्पना इन ७ दिनों से सम्बन्ध रखती है। भारतीय पञ्चांग के अनुसार एक दिवस में ८ प्रहर होते हैं। अतः श्रीकृष्ण जी ८ x ७ = ५६ प्रहर भूखे रहकर पर्वत को उठाये रखे। इसलिए ब्रज के निवासियों ने उनके लिए ५६ प्रकार के व्यंजन बनाए, एक व्यंजन प्रत्येक प्रहर के लिए। किन्तु इससे भी उनकी क्षुधा शांत नहीं हुई। वे और भोजन की मांग करते रहे। अर्थात् ब्रज भाषा में आन और। ये है आन्योर गाँव की कथा।

पूंछरी – आन्योर से ३कि.मी. की दूरी पर एक गाँव है पूंछरी। यह गाँव पूंछरी के लौठा जी के मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। इस नाम ने आपको भी असमंजस में डाल दिया होगा। अंततः यह लौठाजी कौन है?

पूंछरी का लौठा मंदिर - पूंछरी गाँव
पूंछरी का लौठा मंदिर – पूंछरी गाँव

लौठाजी श्री कृष्णजी के मित्र थे। बालपन में वे एक साथ कुश्ती का अभ्यास करते थे।

जब कृष्ण को ब्रज भूमि छोड़कर द्वारका जाना पड़ा, तब उन्होंने लौठाजी को भी साथ चलने का आमंत्रण दिया था। किन्तु कृष्ण के मोह में विव्हल लौठाजी ब्रज भूमि भी छोड़ना नहीं चाहते थे। उन्होंने कहा कि वे कृष्ण के द्वारका लौटकर आते तक बिना अन्न व जल के जीवन व्यतीत करेंगे। कृष्ण ने उन्हें वरदान दिया कि बिना अन्न व जल के भी वे एक स्वस्थ जीवन व्यतीत करेंगे।

हम सब जानते हैं कि मथुरा छोड़ने के पश्चात कृष्ण कभी वापिस लौट नहीं पाए थे। लोगों का विश्वास है कि वह दिवस अवश्य आएगा जब कृष्ण अपने लौठा के लिए ब्रज वापिस आयेंगे। कृष्ण के भक्तगण लौठाजी को भी पूजते हैं। पूंछरी गाँव में उनका एक मंदिर है।

लौठाजी का मंदिर छोटा अवश्य है किन्तु यह एक अत्यंत जीवंत मंदिर है। दूर सुदूर से भक्त यहाँ आकर इच्छापूर्ति का वरदान माँगते हैं। लौठाजी की प्रतिमा एक पहलवान की प्रतिमा प्रतीत होती है जिनकी बड़ी बड़ी मूंछें हैं।

जतीपुरा – मुखारविंद – छोटा सा यह गाँव मुखारविंद मंदिर के कारण ही प्रसिद्ध है। यह एक खुला मंदिर है जहां भक्तगण एक विशाल शिला की दुग्ध अभिषेक द्वारा पूजन करते हैं। दिन के विभिन्न समय पर इस शिला का भिन्न भिन्न रूप से श्रृंगार किया जाता है। इस मंदिर की ओर जाती संकरी गली इन दुग्ध विक्रेताओं से भरी हुई है। इस शिला के ऊपर, एक मंच पर गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा करते कृष्ण का दृश्य उत्कीर्णित है।

जतीपुरा मुखारविंद मंदिर
जतीपुरा मुखारविंद मंदिर

जतीपुरा को यह नाम ५६ भोग का भक्षण कर रहे श्रीनाथजी की ज्योति से प्राप्त हुआ था।

मुखारविंद मंदिर के समीप, पहाडी के शिखर पर, गोपालजी मंदिर है जहां मूलतः श्रीनाथजी की मूर्ति स्थापित थी। गोवर्धन के निवासियों की मान्यता है कि नाथद्वारा की संध्या आरती के पश्चात श्रीनाथजी अब भी रात्रि में यहाँ आकर निद्रा में लीन होते हैं। इसका अर्थ है कि जतीपुरा, पहाडी के उस पार, आन्योर गाँव के दूसरे छोर पर स्थित है।

कुछ दूरी पर श्री गिरिराज दंडवती शिला है। गिरिराज पर्वत का भाग होते हुए यह अत्यंत विशेष है। इसके चारों ओर ७ परिक्रमा लगाना गोवर्धन की एक परिक्रमा के सामान माना जाता है। अतः, यदि आप २१ की.मी. की गोवर्धन परिक्रमा करने में स्वयं को किंचित असमर्थ मानते हैं तो आप गिरिराज दंडवत शिला की ७ परिक्रमा पूर्ण कर सकते हैं।

सखीतडा – यह चन्द्रावली गाँव है तथा श्री कृष्ण की सखी भी है।

गोवर्धन पर्वत का आकार

गोवर्धन के निवासी गोवर्धन पर्वत को गौमाता के आकार का बताते हैं। परिक्रमा के विभिन्न भागों को वे गौमाता के विभिन्न भागों से जोड़ कर देखते हैं। जैसे वे पूंछरी गाँव को गौमाता की पूंछ कहते हैं। कुछ इसे खड़ी गौमाता के समान बताते हैं तो कुछ के अनुसार यह पर्वत बैठी हुई गौमाता के सामान है। उसी अनुसार स्थान निरूपण में परिवर्तन कर देते हैं।

गोवर्धन पर्वत
गोवर्धन पर्वत

आप गोवर्धन पर्वत को चाहें जिस भी आकार का मानें, आप जानते हैं कि गोवर्धन पूजा अंततः गौमाता का पूजन है। कृष्ण तथा गौमाता को पृथक नहीं किया जा सकता।

मैंने कभी एक पुस्तक में पढ़ा था कि गोवर्धन पर्वत नृत्य करते हुए मोर के सामान है। जहां तक मोर का प्रश्न है, कृष्ण का सम्बन्ध उससे भी है।

गोवर्धन परिक्रमा के समय, मंदिरों एवं कुण्ड अर्थात जलाशयों के मध्य परिक्रमा पथ छोटे वनों से भी जाता है। मार्च के महीने में इन वनों के अधिकाँश वृक्ष सूख गए थे। मार्च महीने में तो स्वयं गोवर्धन पर्वत भी बड़ी बड़ी शिलाओं के ढेर के सामान प्रतीत होता है। यहाँ वहां छोटी छोटी शिलाएं एक दूसरे पर टिके दिखाई देते हैं। यह दृश्य आप अनेक पहाड़ी क्षेत्रों में बहुतायत में देखेंगे।

गिरिराज पर्वत की कथा

कृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत को कनिष्ठा में उठाने की कथा हम सब जानते हैं। इंद्र का गर्व तोड़ने के लिए एक समय कृष्ण ने ब्रजवासियों को उन की आराधना करने से मना कर दिया था। इस पर क्रुद्ध इंद्र ने ब्रजवासियों पर वर्षा का कहर बरपा दिया। ब्रजवासी घबराकर कृष्ण के पास सहायता माँगने पहुंचे। ब्रजवासियों को वर्षा से बचाने एवं आश्रय देने के लिए कृष्ण ने अपनी कनिष्ठा पर गोवर्धन पर्वत को उठा लिया। ७ दिवसों तक बिना अन्न जल ग्रहण किये नन्हे कृष्ण ने पर्वत को उठाये रखा। इसे देख इंद्र का गर्व चूर चूर हो गया। उन्होंने कृष्ण की महिमा को स्वीकार किया। सम्पूर्ण ब्रज इस घटना का उत्सव ऐसे मनाता है जैसे यह कल की ही घटना हो।

हनुमान का ब्रज से सम्बन्ध

गोवर्धन पर्वत को त्रेता युग अर्थात् श्री राम के काल से जोड़ती भी एक कथा प्रचलित है। वानर सेवा को सागर पार कराने के लिए जब रामेश्वरम में राम सेतु का निर्माण कार्य आरम्भ था, तब वानर छोटे-बड़े पर्वतों को उठाकर सेतु का निर्माण कर रहे थे। हनुमान भी हिमालय से एक पर्वत उठा लाये थे।

जैसे ही सेतु निर्माण का कार्य सम्पूर्ण हुआ, सेतु के वास्तुविद नल व नील ने घोषणा की कि जिसके हाथों में जो पर्वत हो वह उसे वहीं धर दे। आपने सही समझा! हनुमान के हाथों में गोवर्धन पर्वत था तथा वे ब्रज भूमि पर खड़े थे। हनुमान ने गोवर्धन पर्वत को वहीं ब्रज भूमि पर रख दिया तथा श्री लंका की ओर प्रस्थान किया।

यह कथा गोवर्धन पर्वत को विष्णु के ७वें. तथा ८वें. अवतार, राम एवं कृष्ण से जोड़ती है। यह गोवर्धन पर्वत को और अधिक महान एवं पवित्र बनाती है क्योंकि यह विष्णु के एक नहीं बल्कि दो अवतारों से सम्बंधित करती है।

गोवर्धन परिक्रमा के नियम

• गोवर्धन पर्वत के ऊपर चढ़ने की चेष्टा ना करें।
• पदयात्रा के समय ध्यान रखें कि पर्वत आपके दाहिने ओर हो। गोवर्धन पर्वत एक पवित्र स्थल है। अतः इसे पीठ ना दिखाएँ, ना ही इससे अपने चरण स्पर्श करें।
• किसी भी जलकुंड में चरण ना धोएं। यद्यपि इन जलकुण्डों में पवित्र स्नान की अनुमति है।
• परिक्रमा के समय शांतता बनाए रखें। अनर्गल वार्तालाप में ना उलझें। स्पष्टतः परिक्रमा के समय अपने अंतर्मन पर लक्ष्य केन्द्रित करें।
• परिक्रमा का आरम्भ मंदिर में पूजा अर्चना से करें। परिक्रमा के समापन पर भी मंदिर में पूजा करें।

परिक्रमा के लिए कोमल जूते
परिक्रमा के लिए कोमल जूते

गोवर्धन पर्वत परिक्रमा के लिए कुछ यात्रा सुझाव:

• यदि आप पदयात्रा द्वारा सामान्य गोवर्धन परिक्रमा कर रहें हैं तो सुझाव है कि आप एक दिन में ही परिक्रमा समाप्त करें।
• जो भक्तगण किसी कारणवश एक ही दिन में २१ की.मी. की परिक्रमा पूर्ण नहीं कर सकते वे इसे २ अथवा ३ दिनों में बाँट देते हैं। यदि आपके पास समय तथा ऊर्जा ना हो तो आप इ-रिक्शा की सहायता ले सकते हैं। वे सम्पूर्ण परिक्रमा एक घंटे में पूर्ण करा देते हैं। साथ ही आपको सभी मंदिरों एवं अन्य महत्वपूर्ण स्थलों के भी दर्शन करा देते हैं।
• आदर्श रूप से ये परिक्रमा नंगे पाँव की जाती है। यदि आप ऐसा नहीं कर सकते तो दुकानों में ५०/- रुपयों के सस्ते दाम पर मुलायम चप्पलें उपलब्ध हैं। आप इन्हें पहनकर परिक्रमा कर सकते हैं।
• सम्पूर्ण परिक्रमा पथ पर पेयजल, फलों का रस तथा खाद्य पदार्थ आसानी से उपलब्ध हैं। अतः भारी सामान उठाकर ना चलें। अपना सर ढंककर चलें क्योंकि दिन के समय सूर्य की किरणें आपकी ऊर्जा नष्ट कर सकती हैं।
• परिक्रमा का आरम्भ प्रातः करें। इस प्रकार आप अधिकतर समय तपती धूप से बच सकते हैं।
• गोवर्धन पर्वत को अत्यंत पवित्र स्थान माना जाता है। अतः उस पर ना चढ़ें।
• वर्तमान में गोवर्धन के आसपास कई आधुनिक अतिथिगृहों का निर्माण हो रहा है। इसलिए यदि आप गोवर्धन परिक्रमा की योजना बना रहे हैं तो गोवर्धन में ही ठहरना सुविधाजनक होगा। मथुरा यहाँ से लगभग २५कि.मी. की दूरी पर है। वृन्दावन भी यहाँ से इतनी ही दूरी पर है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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