विष्णु मंदिर Archives - Inditales श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Wed, 27 Mar 2024 05:05:06 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.7.4 छतिया बट मंदिर सत्य युग का अग्रदूत https://inditales.com/hindi/chhatia-bata-mandir-odisha/ https://inditales.com/hindi/chhatia-bata-mandir-odisha/#respond Wed, 27 Mar 2024 02:30:09 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3418

छतिया बट मंदिर स्वयं में एक अनूठा मंदिर है जो उत्कल (ओडिशा) प्रदेश के जाजपुर एवं कटक के मध्य स्थित छतिया ग्राम में स्थित है। सतही रूप से देखा जाए तो यह जगन्नाथ, बलभद्र एवं सुभद्रा को समर्पित एक सामान्य मंदिर है। हमें ज्ञात है कि ऐसे मंदिर ओडिशा में चहुँ ओर स्थित हैं। जगन्नाथ, […]

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छतिया बट मंदिर स्वयं में एक अनूठा मंदिर है जो उत्कल (ओडिशा) प्रदेश के जाजपुर एवं कटक के मध्य स्थित छतिया ग्राम में स्थित है।

सतही रूप से देखा जाए तो यह जगन्नाथ, बलभद्र एवं सुभद्रा को समर्पित एक सामान्य मंदिर है। हमें ज्ञात है कि ऐसे मंदिर ओडिशा में चहुँ ओर स्थित हैं। जगन्नाथ, बलभद्र एवं सुभद्रा को समर्पित ऐसे मंदिर देश के अन्य स्थानों पर भी देखे जाते हैं जहाँ ओड़िया भाषी नागरिकों की बहुलता हो।

छतिया बट मंदिर
छतिया बट मंदिर

इस मंदिर में अनूठा क्या है? जगन्नाथ, बलभद्र एवं सुभद्रा के विग्रहों को स्थापित करने का क्रम। पुरी के जगन्नाथ मंदिर में देवी सुभद्रा को उनके दोनों भ्राताओं, जगन्नाथ एवं बलभद्र के मध्य स्थापित किया है। इनके लगभग सभी मंदिरों में इसी क्रम का पालन किया जाता है। किन्तु छतिया बट मंदिर में इन तीनों विग्रहों को स्थापित करने का क्रम है, बाएं से दाहिनी ओर जाते हुए जगन्नाथ, बलभद्र, तत्पश्चात सुभद्रा। क्या आपने कभी ध्यान दिया कि जब हम इन तीनों के नाम लेते हैं तो किस क्रम में लेते हैं? जी हाँ, इसी क्रम में लेते हैं। तो यह कहा जा सकता है कि यह मंदिर श्रुति परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। अर्थात् हम जैसे इन तीनों भाई-भगिनी को संबोधित करते हैं, यह मंदिर शब्दशः उसी संबोधन को आकार प्रदान करता है। आधुनिक बोलचाल पद्धति के अनुसार कह सकते हैं, जो आप कहते हैं, वही आप देखते हैं!

दार्शनिक रूप से कहें तो यह नई विश्व व्यवस्था को दर्शाता है।

कल्कि अवतार

छतिया बट मंदिर को एक भविष्यवादी मंदिर भी कह सकते हैं  क्योंकि यह मंदिर भगवान विष्णु के कल्कि अवतार को समर्पित है। हमें ज्ञात है कि भगवान विष्णु के दसवें अवतार, कल्कि का अवतरित होना अभी शेष है। भारत में जहाँ कालचक्र को आधार माना जाता है, ऐसे मंदिर उसी मान्यता के द्योतक हैं।

छतिया बट मंदिर से जुड़ी दंतकथाएं

संत अच्युतानंद जी ने लिखा, जीबा जगता होइबा लीना – बैसी पहाचे खेलिबा मीना। कुछ का मानना है कि ये संत हाड़ीदास जी ने लिखा है। इसका अर्थ है, एक दिवस पुरी के जगन्नाथ मंदिर की २२ सीढ़ियों पर जगत के सभी जीव समाप्त हो जायेंगे, केवल जल में मीन तैरेगी

यह प्रलय की स्थिति की ओर संकेत करता है जो सृष्टि के प्रत्येक चक्र के अंत में उपस्थित होता है तथा सभी जीवित एवं निर्जीव तत्वों को निगल जाता है। यह पंक्ति आगे कहती है कि केवल छतिया ही वह स्थान है जो जल में समाहित नहीं होगा, अपितु जल के ऊपर रहेगा।

जब संसार में अन्याय असहनीय स्तर को पार कर जायेगा तब भगवान विष्णु कल्कि अवतार ग्रहण कर धरती पर अवतरित होंगे। अश्वारूढ़ कल्कि अवतार के हाथों में नंदक या नंदकी नामक एक लम्बी तलवार होगी। वे इस विश्व में न्याय व्यवस्था लायेंगे तथा सत्य युग को पुनः स्थापित करेंगे।

मान्यता यह है कि इस सत्य युग का आरंभ छतिया बट मंदिर से ही होगा।

बट एवं संत हाड़ीदास

बट या वट बरगद अथवा बड़ के वृक्ष को कहते हैं। भारत में बड़ के वृक्ष को पवित्र माना जाता है। जी हाँ, इस मंदिर को छतिया बट मंदिर इसलिए कहते हैं क्योंकि इसके परिसर में एक प्राचीन वट वृक्ष है। यह वृक्ष इस मंदिर का अभिन्न अंग है।

इस मंदिर को महापुरुष हाड़ीदास का सिद्ध पीठ भी कहा जाता है। संत हाड़ीदास का जीवनकाल सन् १७७२ से सन् १८३० तक का माना जाता है। वे इसी मंदिर में अपनी साधना करते थे। यहीं उनकी समाधि पीठ भी स्थित है। ऐसी मान्यता है कि अपनी नश्वर देह का त्याग करने के पश्चात भी वे यहीं निवास करते हैं। उन्हें संत अच्युतानंद का बारहवाँ अवतार माना जाता है।

उन्होंने अपने जीवनकाल में अनेक भजन, कई मालिकायें एवं अनेक धर्म ग्रन्थ लिखे हैं। उनमें शंखनावी, अनंत गुप्त गीता, हनुमान गीता, नील महादेव गीता, भाबाननबाड़ा, अनंतगोई आदि रचनाएँ सम्मिलित हैं। एक स्थानिक शिक्षा शास्त्री, प्रा. आर. साहू ने अपने शोध ग्रन्थ ‘हाड़ीदास रचनावली’ में संत हाड़ीदस की साहित्यिक उपलब्धियों एवं धार्मिक व साहित्यिक ग्रंथों के प्रति उनके योगदान का सविस्तार वर्णन किया है।

मंदिर दर्शन

कुछ सीढ़ियाँ चढ़कर हम मंदिर के भीतर प्रवेश करते हैं। ऊँची अभेद्य भित्तियों से घिरा हुआ मंदिर का सम्पूर्ण परिसर किसी विशाल दुर्ग का स्मरण कराता है। परिसर के बाहर से मंदिर का लगभग लेश मात्र ही दिखाई देता है। अश्व पर आरूढ़ कल्कि अवतार का विग्रह ही भित्तियों के ऊपर दृष्टिगोचर होता है। प्रवेश द्वार के ऊपर देवी की एक विशाल प्रतिमा है। उनके दोनों ओर अनेक देवी-देवताओं एवं असुरों के विग्रह हैं।

छतिया बट मंदिर का प्रवेश द्वार
छतिया बट मंदिर का प्रवेश द्वार

ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण १२वीं सदी में अनंतवर्मन देव के शासनकाल में किया गया था।

परिसर के भीतर अनेक छोटे-बड़े मंदिर हैं। उनमें कुछ हैं, माँ काली का मंदिर, यम का एक मंदिर जो सामान्यतः दृष्टिगोचर नहीं होते, गणेश का मंदिर आदि। मंदिर की भित्तियों पर रंगबिरंगी चित्रकारी की गयी थी।

जगन्नाथ मंदिर

परिसर में स्थित मुख्य मंदिर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र एवं सुभद्रा का है। इसे ओडिशा का द्वितीय श्री क्षेत्र भी कहते हैं। इस मंदिर में वे सभी दैनिक पूजा-अनुष्ठान किया जाते हैं जो पुरी के जगन्नाथ मंदिर में किये जाते हैं। जी हाँ, उसका अर्थ है कि इस मंदिर में भी आपको महाप्रसाद प्राप्त हो सकता है।

इस मंदिर के अतिरिक्त इन तीनों के भिन्न भिन्न एकल मंदिर भी हैं। उनके भीतर उनकी विशाल प्रतिमाएं हैं। इन मंदिरों की एक विशेषता यह है कि इन तीनों मंदिरों में विग्रहों के मुख द्वारों के सम्मुख नहीं हैं अपितु एक ओर हैं। उनके सम्मुख दर्शन मंदिर के एक बाजू से ही होते हैं। बलभद्र की मूर्ति के सामने एक दर्पण रखा गया है जिससे आप उनके पीछे खड़े होकर भी उनके मुख का दर्शन कर सकते हैं।

बलभद्र एक श्वेत अश्व पर आरूढ़ हैं तो जगन्नाथ एक श्याम वर्ण अश्व पर सवार हैं। उनके हाथों में तलवारें हैं जो भविष्य में प्रकट होने वाले कल्कि अवतार की ओर संकेत करते हैं। ऐसी मान्यता है कि काल के साथ उनकी तलवारों की लम्बाई भी बढ़ रही है।

इस मंदिर में वार्षिक रथ यात्रा निकाली जाती है जिसके दर्शन के लिए दूर दूर से भक्तगण यहाँ आते हैं।

छतिया का  पेडा

भारत देश में पेडा लगभग सर्वसामान्य राष्ट्रीय मिष्टान्न माने जाते हैं। मंदिर के प्रसाद के रूप में उनका प्रयोग बहुतायत में किया जाता है। धारवाड़ पेडा , मथुरा पेडा आदि के समान ओडिशा के छतिया पेडा अत्यंत लोकप्रिय हैं।

छतिया पेडा
छतिया पेडा

छतिया पेडा खाना चाहें तो छतिया बट मंदिर के बाहर स्थित दुकानों से उत्तम स्थान अन्य नहीं है। मंदिर के बाहर विक्रेता अपनी दुकानों, गुमटियों यहाँ तक कि दुपहिया सायकलों पर भी पेडा विक्री करते हैं। उन स्वादिष्ट पेडा पर विक्रेताओं की मुद्राएँ भी अंकित रहती हैं।

छतिया बट मंदिर के दर्शन के लिए कुछ यात्रा सुझाव:

छतिया बट मंदिर जाजपुर एवं भुवनेश्वर दोनों से लगभग ५० किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। आप दोनों ओर से यहाँ पहुँच सकते हैं।

आप अपने ठहरने की व्यवस्था जाजपुर, चंडीखोल, कटक अथवा भुवनेश्वर में कर सकते हैं।

मंदिर के भीतर छायाचित्रीकरण करना निषिद्ध है तथा इस नियम का कठोरता से पालन किया जाता है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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उडुपी का श्री कृष्ण मठ भक्तों का लोकप्रिय मंदिर https://inditales.com/hindi/udupi-shri-krishna-mutt-karnataka/ https://inditales.com/hindi/udupi-shri-krishna-mutt-karnataka/#respond Wed, 30 Nov 2022 02:30:49 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2878

भारत के पश्चिमी तट पर बसी उडुपी मंदिरों की नगरी है जो भक्तों का बड़े उत्साह से स्वागत करती है। यह एक परशुराम क्षेत्र है जिसके मध्य में श्री कृष्ण मठ स्थित है। साथ ही यहाँ चन्द्रमौलेश्वर मंदिर एवं अनंतेश्वर मंदिर नामक प्राचीन मंदिर भी हैं। उडुपी के श्री कृष्ण मठ का इतिहास श्री कृष्ण […]

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भारत के पश्चिमी तट पर बसी उडुपी मंदिरों की नगरी है जो भक्तों का बड़े उत्साह से स्वागत करती है। यह एक परशुराम क्षेत्र है जिसके मध्य में श्री कृष्ण मठ स्थित है। साथ ही यहाँ चन्द्रमौलेश्वर मंदिर एवं अनंतेश्वर मंदिर नामक प्राचीन मंदिर भी हैं।

उडुपी के श्री कृष्ण मठ का इतिहास

श्री कृष्ण मंदिर की स्थापना के पूर्व से ही उडुपी एक पावन भूमि कहलाती थी। यहाँ स्थित प्राचीन चन्द्रमौलेश्वर मंदिर एवं अनंतेश्वर मंदिर वर्षों से अनेक भक्तगणों को अपनी ओर आकर्षित करते रहे थे। उडुपी के दक्षिणी ओर, लगभग १२ किलोमीटर की दूरी पर पजाका नामक गाँव है जिसे द्वैत दार्शनिक श्री माधवाचार्य का जन्मस्थान माना जाता है। १२३८ ई. में पजाका में जन्मे माधवाचार्य जी ने ना केवल द्वैत दर्शन की स्थापना की थी, अपितु उन्होंने श्री कृष्ण मंदिर की नींव भी रखी थी।

श्री कृष्ण मठ उडुपी
श्री कृष्ण मठ उडुपी

किवदंतियों के अनुसार श्री कृष्ण की पत्नी रुक्मिणी ने अपने पति से बालकृष्ण अर्थात् कृष्ण के बाल रूप की प्रतिमा की मांग की थी। श्री कृष्ण ने निर्माण व सृजन के देवता विश्वकर्मा से मूर्ति गढ़ने के लिए कहा। विश्वकर्मा देव ने शालिग्राम शिला द्वारा एक मनमोहक प्रतिमा गढ़ी तथा पूजन हेतु रुक्मिणी को प्रदान की। द्वारका में सैकड़ों भक्तों ने इस प्रतिमा पर चन्दन का लेप लगाकर इसकी आराधना की। प्रतिमा पूर्ण रूप से चन्दन के लेप से आच्छादित हो गयी।

एक भयावह बाढ़ की स्थिति में यह प्रतिमा द्वारका से बहकर दूर चली गयी। जब एक व्यापारी जहाज के मल्लाह ने इसे देखा, वह उसे एक शिला समझ बैठा तथा जहाज को संतुलित करने के लिए उस का प्रयोग कर लिया। जब व्यापारी का जहाज द्वारका से मालाबार जा रहा था तब तुलुब के निकट वह जहाज डूब गया। उसमें गोपीचंदन से ढकी भगवान कृष्ण की वह मूर्ति भी थी। उस समय भगवान ने स्वयं माधवाचार्य जी के स्वप्न में अवतरित होकर उन्हें आज्ञा दी। माधवाचार्य ने मूर्ति को जल से निकाल कर उडुपी में उसकी स्थापना की। इस मूर्ति की स्थापना लगभग ७०० वर्ष पूर्व हुई थी।

श्री कृष्ण मंदिर

इस मंदिर की यह विशेषता है कि इसके आसपास ८ मठ स्थापित हैं जो क्रमशः, चक्रीय क्रम में इस मंदिर का कार्यभार संभालते हैं। पूर्व में यह अवधि दो मास की थी जिसे कालांतर में स्वामी वदिराज ने परिवर्तित कर दो वर्ष कर दिए थे।

श्री कृष्ण मठ उडुपी का आकाशीय दृश्य
श्री कृष्ण मठ उडुपी का आकाशीय दृश्य

कार्यावधि परिवर्तन को पर्याय महोत्सव के रूप में आयोजित किया जाता है जिसमें मंदिर का प्रशासन  एक मठ से दूसरे मठ को स्थानांतरित किया जाता है। संत माधवाचार्य जी द्वारा स्थापित इन आठ मठों के नाम उन गाँवों पर दिए गए हैं जहाँ इनकी स्थापना की गयी है, पालिमारु, अदमरू, कृष्णपुरा, पुत्तिगे, शिरूर, सोढे, कनियूरू, पेजावर। इन मठों के मुख्यालय श्री कृष्ण मंदिर के आसपास ही स्थित हैं।

कनकदास कथा

कृष्ण मठ का मनोहर गोपुरम
कृष्ण मठ का मनोहर गोपुरम

मंदिर में प्रवेश से पूर्व आपकी दृष्टि एक झरोखे पर निर्मित एक अलंकृत गोपुरम पर पड़ेगी। गोपुरम एक विशाल, उत्कीर्णित व अलंकृत अटारी होता है जो दक्षिण भारत के मंदिरों के प्रवेश द्वारों के ऊपर स्थित होता है। यह दक्षिण भारत में बहुप्रचलित द्रविड़ शैली की वास्तुकला का अप्रतिम उदहारण है। श्री कृष्ण मंदिर के इस झरोखे से आप सीधे मंदिर में स्थापित भगवान की प्रतिमा को देख सकते हैं। एक लोककथा के अनुसार कनकदास भगवान कृष्ण का एक परम भक्त था जो भगवान के दर्शन के लिए उडुपी के इस श्री कृष्ण मंदिर में आया था। किन्तु उसे भगवान के दर्शन नहीं प्राप्त हुए। उसने भगवान कृष्ण से प्रार्थना की। भगवान ने प्रसन्न होकर उसकी ओर मुख कर लिया। आज भी यह प्रथा है कि भक्तगण सर्वप्रथम इस झरोखे से भगवान कृष्ण के दर्शन करते हैं जिसके पश्चात ही वे मंदिर में प्रवेश करते हैं। यह बताना आवश्यक है कि इस कथा को ना ही किसी ग्रन्थ में, ना ही किसी साधक द्वारा प्रमाणित किया गया है।

श्री कृष्ण मंदिर में प्रवेश करने से पूर्व, समक्ष स्थित चन्द्रमौलिश्वर मंदिर में दर्शन करने की प्रथा प्रचलित है।

हाल ही में मंदिर के अधिकारियों ने मंदिर में प्रवेश हेतु भक्तों के लिए परिधान संहिता निर्दिष्ट की है जिसके अनुसार स्त्रियों को साड़ी अथवा सलवार-कुर्ता तथा पुरुषों को धोती एवं अंगवस्त्र धारण करना अनिवार्य है।

विष्णु की कथाएं कहते गोपुरम का स्थापत्य
विष्णु की कथाएं कहते गोपुरम का स्थापत्य

मंदिर में प्रवेश करते ही हमें एक भिन्न वातावरण की अनुभूति होती है। एक आकस्मिक निस्तब्धता, एक दिव्य प्रभामंडल हमें अभिभूत कर देती है। चारों ओर का विश्व गतिहीन प्रतीत होने लगता है। काले कडप्पा शिलाओं द्वारा निर्मित इसकी शीतल भूमि उडुपी के उष्ण व आर्द्र वातावरण से छुटकारा दिलाती है। श्री कृष्ण मंदिर का गर्भगृह एक लंबे गलियारे के बाईं ओर स्थित है। भगवान की प्रतिमा अत्यंत मनमोहक है। उनके दर्शन करते ही हृदय प्रसन्न हो जाता है। उत्सवों में गर्भगृह के चारों ओर तेल के दीपक प्रज्ज्वलित किये जाते हैं।

मंदिर मंडप

आगे बढ़ते हुए आप मंदिर के मुख्य मंडप में पहुंचेंगे। यह एक विस्तृत मंडप है जो भक्तों के विभिन्न क्रियाकलापों से गुंजायमान रहता है। एक कोने में पर्याय मठ के वर्तमान गुरु भक्तों के लिए विभिन्न अनुष्ठान आयोजित करते हैं तथा भक्तों के विभिन्न समस्याओं के निवारण का मार्ग भी सुझाते हैं। मंडप के भीतर एक हनुमान मंदिर है तथा एक नवग्रह मंदिर भी है। प्रातः ६ बजे से लेकर रात्रि ९ बजे तक भोजन मंडप में भक्तों के लिए अन्नदान आयोजित किया जाता है। यहाँ परोसे जाने वाला भोजन सरल किन्तु स्वादिष्ट होता है जिसे अत्यंत भक्तिभाव से बनाया व परोसा जाता है।

कृष्ण मठ का रथ
कृष्ण मठ का रथ

मंडप के एक छोर पर गौशाला है। किन्तु उसके भीतर जाने की अनुमति हमें नहीं है। केवल उसके अभिरक्षक ही भीतर जा सकते हैं। दैनिक प्रसाद तथा नैवेद्य प्राप्त करने के लिए एक छोटी दुकान भी है।

मंडप से बाहर जाते ही आपको मंदिर के हाथी, सुभद्रा की गजशाला दिखाई देगी। यद्यपि अब सुभद्रा गज को होन्नाली नगरी में रखा गया है, तथापि विशेष अवसरों व उत्सवों में उसे यहाँ लाया जाता है।

श्री कृष्ण मठ मंदिर संकुल

मंदिर के चारों ओर आठ मठ, अनेक अतिथि गृह एवं जलपान गृह हैं।

माधव सरोवर - श्री कृष्ण मठ उडुपी
माधव सरोवर – श्री कृष्ण मठ उडुपी

एक जलपान गृह ऐसा है जहाँ आपको अवश्य जाना चाहिए। वह है, मित्र समाज। मंदिर के आसपास उनके दो जलपान गृह हैं तथा एक जलपान गृह उडुपी नगरी में है। उनकी गर्म गोली भाजी, बन, फिल्टर कॉफी आदि आपकी सुबह को प्रफुल्लित कर देगी।

गीता भवन
गीता भवन

मंदिर के भोजनालय में स्वादिष्ट भोजन करने के पश्चात मंदिर परिसर में ही कुछ समय व्यतीत करें। मंदिर से कुछ मीटर दूर मुझे अचानक एक पुस्तक की दुकान दिखाई दी जिसका नाम था, नंदिता फ्रेग्रेन्स बुकस्टोर। यद्यपि यह दुकान मंदिर परिसर में स्थित है, तथापि यह आसपास के विभिन्न क्रियाकलापों एवं चहल-पहल से कुछ क्षण के लिए हमें पलायन देती है। इस दुकान में संस्कृत की पुस्तकें, अध्यात्म, ज्योतिषशास्त्र, दर्शन शास्त्र आदि पर पुस्तकें तथा विभिन्न शास्त्रों के अंग्रेजी, हिन्दी व कन्नड़ भाषा में अनुवाद उपलब्ध हैं।

संस्कृत महाविद्यालय

मंदिर के पृष्ठभाग में एक संस्कृत महाविद्यालय है। इस पुस्तक दुकान में वेदों, उपनिषदों, पुराणों आदि के संस्कृत भाषा में ग्रन्थ उपलब्ध हैं। मैंने कवि कालिदास द्वारा रचित कुमारसंभव, अष्टावक्र गीता एवं The Yoga of Kashmir Shaivism नामक पुस्तक का क्रय किया।

इस संस्कृत महाविद्यालय में संस्कृत में स्नातक, स्नातकोत्तर एवं अन्य अल्पावधि पाठ्यक्रम के अध्ययन निशुल्क उपलब्ध कराये जाते हैं। इस महाविद्यालय में विश्व भर से अनेक विद्यार्थी ज्ञान अर्जन के लिए आते हैं। इस महाविद्यालय में सभी प्रकार के संस्कृत ग्रंथों से भरा एक पुस्तकालय है जिसमें कालिदास एवं शुद्रका जैसे महा नाटकों से लेकर दर्शन तक की पुस्तकें उपलब्ध हैं।

समीप ही अनेक दुकानें हैं जहाँ लकड़ी की बिलोनी जैसी अनेक काष्ठी वस्तुएं, चीनी मिट्टी के पात्र, लौह पात्र तथा श्री कृष्ण व अन्य देवी देवताओं की पीतल में निर्मित प्रतिमाएं विक्री के लिए रखी हुई हैं। यदि आप विभिन्न प्रकार के व्यंजनों में रूचि रखते हैं तो यहाँ से अनेक स्थानीय व्यंजन ले सकते हैं जैसे, चुर्मुरी, फरसान, चकली, मुरुक्कू आदि।

यदि आपके पास कुछ अतिरिक्त समय हो आप समीप के अन्य तीर्थ स्थलों का अवलोकन कर सकते हैं जैसे, कोल्लूर मूकाम्बिका, कतील, श्रृंगेरी, मुरुडेश्वर एवं गोकर्ण

मठ के उत्सव

यदि आप जन्माष्टमी एवं पर्याय महोत्सव जैसे उत्सवों में यहाँ आ पायें तो यह सोने पर सुहागा होगा। आपको यहाँ के भव्य उत्सवों के अवलोकन का आनंद प्राप्त होगा।

जन्माष्टमी उत्सव

उत्सव के अवसर पर मंदिर की सजावट
उत्सव के अवसर पर मंदिर की सजावट

श्री कृष्ण मंदिर में जन्माष्टमी का उत्सव विट्टल पिंडी के नाम से जाना जाता है। यह उत्सव बड़ी भव्यता एवं उत्साह से मनाया जाता है। सम्पूर्ण मंदिर को विस्तृत रूप से विभिन्न पुष्पों द्वारा अलंकृत किया जाता है। तेल के अनेक दीप प्रज्ज्वलित किये जाते हैं। भक्त गण दूर-सुदूर स्थलों से आकर यहाँ एकत्र होते हैं तथा श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का उत्सव मनाते हैं। भगवान को एक स्वर्ण रथ पर विराजमान किया जाता है तथा सम्पूर्ण मंदिर परिसर में उनका भ्रमण कराया जाता है।

इस उत्सव की विशेषता यह है, हुली वेष अर्थात बाघ आवरण के परिधान धारण कर नर्तकों के विभिन्न समूह पारंपरिक नृत्य प्रदर्शित करते हैं।

पर्याय महोत्सव

पर्याय महोत्सव का आयोजन तब किया जाता है जब मंदिर का प्रशासन एक मठ से दूसरे मठ के हाथों में सौंपा जाता है। प्रत्येक मठ के हाथों में दो वर्षों के लिए मंदिर के प्रशासन का कार्यभार रहता है।

श्री कनियुरु मठ - उडुपी
श्री कनियुरु मठ – उडुपी

ग्रंथों के अनुसार, यह उत्सव प्रत्येक दो वर्षों में मकर संक्रांति के पश्चात, चौथे दिवस आयोजित किया जाता है। यह दिवस १८ जनवरी के दिन आता है। इस उत्सव में उडुपी के आसपास के सभी घरों को दीयों एवं साज-सज्जा से अलंकृत किया जाता है। उडुपी नगरी के विभिन्न चौकों एवं सार्वजनिक स्थलों पर सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। अन्न संतर्पण आयोजित किये जाते हैं जिनमें बड़े स्तर पर अन्न वितरण किया जाता है। इस वर्ष कृष्णपुर मठ के दैवज्ञ स्वामी विद्यासागर तीर्थ ने अदमरू मठ के दैवज्ञ संत ईशप्रिय तीर्थ स्वामीजी से मंदिर का कार्यभार स्वीकार किया है।

श्री कृष्ण मंदिर दर्शन एवं उडुपी भ्रमण के लिए सर्वोत्तम काल

उडुपी भ्रमण के लिए सर्वोत्तम काल सितम्बर से फरवरी का होता है। यही काल मंदिर अवलोकन के लिए भी सर्वोत्तम है। ग्रीष्म ऋतु में यहाँ की उष्णता एवं आर्द्रता कष्टकर हो सकती है। जून से सितम्बर के मध्य यहाँ भारी वर्षा का अनुमान सदा रहता है। भारी वर्षा की स्थिति में यात्रा में कुछ कष्ट हो सकता है, जैसे सड़कों की परिस्थिति, वर्षा के कारण बाहर ना निकल पाना, स्वास्थ्य आदि। किन्तु जिन्हें वर्षा ऋतु प्रिय है तथा जिन्हें वर्षा ऋतु मार्ग का रोड़ा प्रतीत नहीं होती, उन्हें वर्षा ऋतु में भी उडुपी में आनंद आएगा क्योंकि मानसून में इस क्षेत्र का प्राकृतिक सौंदर्य एवं हरियाली अपनी चरम सीमा पर होती है।

परिवहन एवं आवास

उडुपी पहुँचने के लिए निकटतम विमानतल मंगलुरु है। यह उडुपी से लगभग ५५ किलोमीटर दूर स्थित है। आप मंगलरू से टैक्सी अथवा बस द्वारा उडुपी पहुँच सकते हैं। यदि आपको रेल यात्रा भाती है तो आप रेल द्वारा भी यहाँ पहुँच सकते हैं। उडुपी रेल मार्ग द्वारा देश के सभी भागों से जुड़ा हुआ है। यदि आप बंगलुरु से आ रहे हैं तो आप कारवार एक्सप्रेस अथवा विस्ताडोम द्वारा यात्रा कर सकते हैं। बंगलुरु से उडुपी तक, लगभग ८ घंटों की यात्रा में आपको पश्चिमी घाटों के अप्रतिम प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद उठाने का अवसर प्राप्त होगा। बंगलुरु, मुंबई, पुणे, मंगलुरु जैसे देश के सभी प्रमुख नगरों या शहरों से उडुपी के लिए बस सेवायें भी उपलब्ध हैं।

उडुपी अनेक वर्षों से एक लोकप्रिय तीर्थ स्थल रहा है। इसीलिए यहाँ लघुकालीन आवासों, विश्राम गृहों, होटलों तथा रिसोर्ट की कोई कमी नहीं है। आपके सामर्थ्य के भीतर आपको लघुकालीन आवासों, विश्राम गृहों, होटलों तथा रिसोर्ट के अनेक पर्याय उपलब्ध हो जायेंगे। आपको सभी स्थानों पर स्वादिष्ट शाकाहारी भोजन भी आसानी से प्राप्त हो जाएगा।

यह संस्करण IndiTales Internship Program के अंतर्गत अक्षया विजय ने लिखा है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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नृसिंह जयंती कैसे मनाई जाती हैं ब्रज भूमि में https://inditales.com/hindi/narsimha-jayanti-leela-utsav-braj/ https://inditales.com/hindi/narsimha-jayanti-leela-utsav-braj/#comments Wed, 19 Oct 2022 02:30:33 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2827

वैष्णव संप्रदाय के अंतर्गत चार मुख्य जयंती व्रत एवं उत्सवों को अत्यधिक मान्यता दी गई है। यह चार जयंती व्रत क्रमशः है जन्माष्टमी, वामन जयंती, राम नवमी और नृसिंह जयंती। वैष्णव संप्रदाय के सिद्धांत अनुसार जगत का कल्याण करने के लिए भगवान अवतार ग्रहण करते हैं और अवतार लेकर ही वह अपने भक्तों के अभीष्ट […]

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वैष्णव संप्रदाय के अंतर्गत चार मुख्य जयंती व्रत एवं उत्सवों को अत्यधिक मान्यता दी गई है। यह चार जयंती व्रत क्रमशः है जन्माष्टमी, वामन जयंती, राम नवमी और नृसिंह जयंती। वैष्णव संप्रदाय के सिद्धांत अनुसार जगत का कल्याण करने के लिए भगवान अवतार ग्रहण करते हैं और अवतार लेकर ही वह अपने भक्तों के अभीष्ट को सिद्ध करते हैं। श्रीमद् भागवत पुराण के अनुसार बाल भक्त प्रहलाद की भक्ति को सिद्ध करने एवं हिरण्यकश्यपु का वध करने के लिए ही श्री विष्णु नृसिंह रूप में प्रगट हुए। वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को अवतार लेकर प्रभु ने इस लीला को सम्पादित किया इसलिए इस तिथि को नृसिंह चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है। इस लीला को ब्रज में त्योहार के रूप में बड़ी ही धूम धाम से मनाया।

सत्यं विधातुं निज-भृत्य भाषितं
व्याप्तिं च भूतेष्वखिलेषु चात्मनः |
अदृश्यतात्यद्भुत रूपं उद्वहन्
स्तम्भे सभायां न मृगं न मानुषं ||

अपने भक्तो की वाणी को सत्य करने के लिए भगवन सदैव तत्पर रहते है इसीलिए भक्त प्रह्लाद की बात को सत्य करने के लिए भगवान नृसिंह खम्बा फाड़कर प्रकट हुए जो न तो पूरे सिंह थे और न ही पूरे मनुष्य।

प्राचीन नृसिंह मंदिर, केशी घाट, वृन्दावन
प्राचीन नृसिंह मंदिर, केशी घाट, वृन्दावन (आभार- लक्ष्मी नारायण तिवारी जी)

ब्रज की नृसिंह जयंती

ब्रज में विशेषतः मथुरा एवं वृंदावन में यह उत्सव अत्यंत ही उत्साह पूर्वक मनाया जाता है। देवालयों से पृथक लोक संस्कृति में नृसिंह उत्सव की अपनी एक विशिष्ट पहचान है। वृंदावन में स्थित नृसिंह मंदिरों में यह उत्सव विधि विधान के साथ मनाया जाता है। कथा अनुसार हिरण्यकशिपु को दिए हुए वर के कारण भगवान नृसिंह संध्या समय प्रगट हुए थे क्योंकि वर अनुसार न उसको दिन में मारा जा सकता था न ही रात में। इसी परंपरा के कारण श्री नृसिंह जी का अभिषेक मंदिरों में सांय काल विभिन्न अनुष्ठान के अंतर्गत संपादित किया जाते हैं। इस उत्सव में किन्ही किन्ही मंदिरों में भगवान को नृसिंह वेश भी धारण कराया जाता है। श्री राधादामोदार मंदिर एवं श्री राधा श्यामसुंदर मंदिर में इस दिन विशेष नृसिंह झांकी में भगवान दर्शन देते है।

राधा श्यामसुंदर नृसिंह वेश में
राधा श्यामसुंदर नृसिंह वेश में (आभार- लक्ष्मी नारायण तिवारी जी)

भगवान का नृसिंह स्वरूप चूंकि उग्र था इसलिए भगवान को शीतलता देने के लिए विभन्न प्रकार के पेय पदार्थ भोग रूप में दिए जाते है। आमरस और सत्तू इसमें अत्यंत विशेष माना जाता है। ठाकुर जी को खीरा, ककड़ी, खरबूजा, मिष्ठान आदि का भोग अर्पित कर प्रसाद भक्तजनों में वितरित किया जाता है। परंतु इस उत्सव का सबसे मुख्य आकर्षण है इस कथा पर की जाने वाली नृसिंह लीला।

नृसिंह लील के मुखौटे
नृसिंह लील के मुखौटे (आभार- लक्ष्मी नारायण तिवारी जी)

नृसिंह जयंती पर नृसिंह लीला

नृसिंह लीला में वास्तव में नृसिंह कथा का मुखौटा पहन कर नृत्यात्मक मंचन होता है जिसमे भागवत पुराण में वर्णित हिरण्यकश्यप वध को दिखाया जाता है। नृसिंह लीला में नृसिंह बनने वाले प्रमुख पात्र ब्राह्मण होते है, क्योंकि यह देव लीला है और भावुक जनता अपने आप को लीला के साथ आत्मसात कर नृसिंह बने पात्र को साक्षात भगवान का स्वरूप मानकर उसका पूजन व चरण स्पर्श करती है। प्रातः काल नृसिंह मंदिरों में नृसिंह, वराह, हनुमान, मकरध्वज, गणेश आदि मुखोटों की भाव वत पूजा अर्चना की जाती है।

नृसिंह लील के मुखौटो को धारण करते हुए
नृसिंह लील के मुखौटो को धारण करते हुए  (आभार- लक्ष्मी नारायण तिवारी जी)

लीला के मंचन के पहले इन मुखौटो के बनने की विधा भी अत्यंत रोचक है। मुखौटों का निर्माण कागज की लुगदी और चिकनी मुलतानी मिट्टी के मिश्रण से किया जाता है। सब से पहले पुराने अखबार या साफ सुथरे कागजों को पानी में एक बड़ी मिट्टी की नांद में डालकर तीन चार दिनों के लिए भिगोने के लिए छोड़ दिया जाता है। वृन्दावन के शुकदेव शर्मा जो काफी लंबे अर्से से इन मुखौटों का निर्माण करते आ रहे है उन्होंने हमे बताय कि पहले हम लुगदी को बनाने के लिए कागज को भिगोते थे कई बार एक एक सप्ताह तक कागज भिगोने के बाद भी कागज की आवश्यकतानुसार ‘मुलायम ‘ लुगदी नहीं बन पाती थी इसलिए एक बार हमारे घर की ही एक छोटी बिटिया ने जादुई परामर्श दिया कि क्यों न कागज को पानी में उबाल लिया जाए। हमने प्रयोग किया तो पाया की परिणाम अच्छा है और समय बीच बचा।

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कागज की लुगदी और उसमें सही अनुपात में मुलतानी मिट्टी का मिश्रण मिलाने से पहले ‘सांचा ‘ बनाना पड़ता है और यह भी मिट्टी से ही बनता है। इसमें मुखौटे के सारे अवयवों के उभार उठान,गहराई आदि का ध्यान रखकर चाकू, कील और अन्य लकड़ी-लोहे की नुकीली चपटी चीजों से ‘सांचा ‘ बनाना पड़ता है। सांचा बनाने में भी काफी समय लगता है और फिर इसे कड़ी धूप में सुखाना पड़ता है।  सूख जाने के बाद रेगमाल आदि से रगड़ कर उसे चिकना किया जाता है ताकि मुखौटा ठीक से आकार ले सकें। इसके बाद मुखौटा बनाने से पहले एक साफ स्वच्छ और पतले कागज से सांचे को अच्छी तरह मढ़ दिया जाता है जिससे लुगदी और मिट्टी के मिश्रण का लेप चढ़ाने के बाद सूखने पर वह सांचे से चिपक न जाए और आसानी से सूख जाने पर निकल आए।

इसके बाद अत्यंत कौशल से साथ मुखौटे के ‘आकार’ को ध्यान में रखकर आधा इंच से एक इंच मोटी तक लुगदी तथा मुल्तानी मिट्टी के मिश्रण का लेप पूरे सांचे पर इस तरह चढ़ाया जाता है कि सारे अंग प्रत्यंग के अवयव स्पष्ट उभर आएं । इस लेपन में भी खासी मेहनत और कौशल की जरूरत रहती है तथा इसके बाद मुखौटे को पुनः सुखाया जाता है। अच्छी तरह सूख जाने पर इस सांचे से पुनः बड़ी बारीकी और कुशलता से अलग किया जाता है और एक बार पुनः संपूर्ण मुखौटे की रेगमाल आदि से घिसाई करके उसे ‘चिकना’ किया जाता है। मुखौटे को सांचे से अलग करते समय कई बार कुछ चीजें टूट या चटक भी  जाती है ऐसे में उनकी तत्काल रिपेयरिंग भी करनी पड़ती है, जैसे खास तौर पर नृसिंह और वराह के दांतों पर तो दोबारा मेहनत करना ही पड़ती है।

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नेत्र खोखले बनाए जाते हैं और उन्हें भी ठीक करना होता है । घिसाई के बाद असली काम होता है  और वह है मुखौटे का श्रृंगार यानी उसको ‘रंग प्रदान करना । यह श्रम साध्य तो है ही साथ ही बेहद कलात्मक कार्य भी है जिसमे चित्रकला का ज्ञान होना भी बहुत जरूरी है। पहली बार सफेद रंग से पहली परत प्रदान की जाती है। किसी जमाने में मिट्टी के रंगों को घोलकर चेहरे को चित्रित किया जाता था परन्तु अब तो ‘ ऑयल पेंट का ही प्रयोग  होता है और मुखौटों की भाव भंगिमा आदि पर रंग भरा जाता है। रंग को सूखने 3-4 दिन लग जाते हैं और सूख जाने के बाद भी आवश्यकतानुसार दोबारा रंग करना पड़ जाता है । भौहें तथा आंखें सबसे बाद में रंग भरा जाता है और इस तरह मुखौटा बन कर तैयार हो जाता है।

नृसिंह लीला का मंचन

नृसिंह का स्वरूप धारण करने वाला व्यक्ति उस दिन व्रत रखता है तथा अन्य धार्मिक अनुष्ठानों को संपादित करता है। नृसिंह लीला का कथानक उनके बाल भक्त प्रह्लाद एवं उसके पिता हिरण्यकशिपु के साथ संबंध रखता है। प्रह्लाद को उसकी भक्ति निष्ठा का वरदान देने तथा हिरण्यकश्यपु के अत्याचारों से पृथ्वी को मुक्त कराने के लिए भगवान विष्णु का आविर्भाव नृसिंह के रूप में खम्भ फाड़कर हुआ था सो ठीक उसी प्रकार से लीला को संपादित किया जाता है।

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सांय काल गोधूलि बेला के समय नृसिंह लीला का आयोजन होता है। इससे पूर्व नृसिंह भगवान के आगमन से पहले वराह, हनुमान, मकरध्वज, गणेश आदि के स्वरूप नगर में भ्रमण कर भगवान के आगमन की शुभ सूचना देते हैं। नगर के प्रमुख स्थलों पर नृसिंह लीला का भावपूर्ण नृत्य करके मंचन किया जाता है। इस मंचन में अलग अलग पात्र अलग अलग मुद्रा व नृत्य करके इस लीला में आनंद लेते है।अंत में घंटों की घनघोर विशिष्ट ध्वनि के मध्य भगवान नृसिंह आवेश रूप में खम्भ फाड़ कर अवतरित होते हैं। कुछ देर हिरण्यकश्यपु से युद्ध करने के बाद उसे अपनी जँघाओं पर लिटा कर नाखूनों से उसका सीना चीर कर वध करते हैं।

नृसिंह लील के पात्र नृसिंह आगमन की सूचना करते हुए 
नृसिंह लील के पात्र नृसिंह आगमन की सूचना करते हुए  (आभार- लक्ष्मी नारायण तिवारी जी)

प्रह्लाद की स्तुति से उनका क्रोध शांत होता है तथा वह प्रह्लाद को गोद में बिठाकर उस पर अपना वात्सल्य लुटाते हैं। लीला का मंचन देख कर धर्म प्राण जनता प्रभु की जय जय कार करती है। इसके उपरांत नृसिंह भगवान की आरती की जाती है फिर विजय घंटे की ध्वनि के मध्य नृसिंह भगवान नगर में भ्रमण करने जाते हैं, जगह जगह उनका पूजन किया जाता है।

नृसिंह लील का मंचन
नृसिंह लील का मंचन (आभार- लक्ष्मी नारायण तिवारी जी)

लोक में मान्यता है कि भगवान नृसिंह का गृहस्थों के घर में आगमन कल्याणकारी होता है, इसलिए गृहस्थ लोग नृसिंह भगवान को अपने घर में बुलाते हैं एवं यथाशक्ति उनका पूजन कर अपने को धन्य मानते हैं। नृसिंह नृत्य परंपरा युद्धक नृत्य से अभिप्रेत है। नृसिंह भगवान का मुखौटा बहुत भारी होता है, अतः नृसिंह बनने वाले व्यक्ति का शरीर शारीरिक रूप से सुडौल होना चाहिए। श्रीधाम वृंदावन में यह उत्सव ठखम्भा, केशी घाट, शाह जी मंदिर, बनखंडी, अनाज मंडी आदि क्षेत्रों में मनाया जाता है। नगर के सभी विद्वत जन, वृद्ध, नर एवं नारी इस उत्सव का भरपूर उत्साह पूर्वक आनंद लेते हैं।

अतिथि संस्करण

नृसिंह जयंती उत्सव सुशांत भारती द्वारा प्रदत्त एक अतिथि संस्करण है।

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श्री जगन्नाथ पुरी मंदिर की उत्कृष्ट विशेषताएं एवं दर्शनीय स्थल https://inditales.com/hindi/jagannath-puri-mandir-paryatak-sthal/ https://inditales.com/hindi/jagannath-puri-mandir-paryatak-sthal/#comments Wed, 20 Jan 2021 02:30:12 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2124

जगन्नाथ पुरी भारत के सर्वाधिक महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों में से एक है। भारत के पूर्वी तट पर स्थित यह धाम भगवान विष्णु के अखिल ब्रम्हांड नायक स्वरूप को समर्पित है। उन्हे भगवान विष्णु का वह स्वरूप माना जाता है जो वर्तमान में व्याप्त कलयुग के लिए उत्तरदायी हैं। यह तथ्य इस तीर्थ को वर्तमान समय में […]

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जगन्नाथ पुरी भारत के सर्वाधिक महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों में से एक है। भारत के पूर्वी तट पर स्थित यह धाम भगवान विष्णु के अखिल ब्रम्हांड नायक स्वरूप को समर्पित है। उन्हे भगवान विष्णु का वह स्वरूप माना जाता है जो वर्तमान में व्याप्त कलयुग के लिए उत्तरदायी हैं। यह तथ्य इस तीर्थ को वर्तमान समय में और अधिक महत्वपूर्ण बनाता है। आदि शंकराचार्यजी ने भी पूर्वी गोवर्धन मठ की स्थापना करने के उद्देश्य से इसी स्थान का चयन किया था। पूर्वी गोवर्धन मठ उन ४ मठों में से एक है जिनकी स्थापना आदि शंकराचार्यजी ने भारत के चार दिशाओं में की थी।

रथ यात्रा के समय जगन्नाथ पुरी  मंदिर
रथ यात्रा के समय जगन्नाथ पुरी मंदिर

अनेक मापदंडों के अनुसार जगन्नाथ पुरी भारत के विशालतम जीवंत मंदिरों में से एक है। कलिंग वास्तु शैली का यह सबसे बड़ा मंदिर है। आकार में कोणार्क का सूर्य मंदिर भले ही इससे स्पर्धा करता हो किन्तु आध्यात्मिक दृष्टि से वह मंदिर हम खो चुके हैं। जगन्नाथ पुरी मंदिर का रसोईघर सम्पूर्ण विश्व में किसी भी मंदिर परिसर में स्थित रसोईघर से अधिक विशाल है। जगन्नाथ जी का अन्न क्षेत्र, इसका यह नाम सही मायने में इसे शोभता है तथा अपने वाच्यार्थ का सत्य स्वरूप है।

अनंतकाल से पुरी नगरी का जीवन जगन्नाथ मंदिर के चारों ओर ही केंद्रित है। यूँ तो इस मंदिर में वर्ष भर भक्तों का तांता लगा रहता है, किन्तु आषाढ़ मास में यहाँ भक्तगणों की संख्या चरम सीमा पर रहती है जब जगन्नाथ जी की जगप्रसिद्ध रथयात्रा निकाली जाती है। इस मंदिर नगरी में जब मैंने कुछ दिवस व्यतीत किए थे तब मैंने दो बार मंदिर के दर्शन किए थे तथा पुरी नगरी के अन्य दर्शनीय स्थलों का भी भ्रमण किया था। इस यात्रा संस्मरण में मैं मुख्यतः मंदिर के विषय पर ही केंद्रित रहना चाहती हूँ। पुरी नगरी के अन्य दर्शनीय स्थलों के विषय में भिन्न संस्करण प्रस्तुत करूंगी।

जगन्नाथ मंदिर का संक्षिप्त इतिहास

ऐसी मान्यता है कि जगन्नाथ के मूल मंदिर का निर्माण सतयुग में राजा इंद्रद्युम्न ने करवाया था। सतयुग काल के प्रमाण खोजना व्यर्थ है। किन्तु इंद्रद्युम्न सरोवर नामक एक सरोवर अब भी पुरी नगरी में स्थित है।

श्री जगन्नाथ पुरी मंदिर
श्री जगन्नाथ पुरी मंदिर

जगन्नाथ मंदिर से संबंधित कथा सर्वविदित एवं सर्वस्वीकृत है। इस कथा के अनुसार भगवान विष्णु इस क्षेत्र के वनों में मूलतः नील माधव के नाम से पूजे जाते थे। इंद्रद्युम्न मालवा के राजा थे। उन्होंने विद्यापति नामक एक ब्राह्मण को नील माधव को खोजने की आज्ञा दी। ब्राह्मण ने उस क्षेत्र के मुखिया की पुत्री से विवाह कर उस स्थान की जानकारी प्राप्त कर ली जहां नील माधव थे। किन्तु भगवान की लीला निराली है। उन्हे यह स्वीकार्य नहीं था कि ब्राह्मण उन्हे खोजे।

अंततः भगवान विष्णु की आज्ञा पाकर राजा इंद्रद्युम्न यहाँ आए तथा उनका बताया हुआ लकड़ी का लठ्ठा प्राप्त किया। इस लठ्ठे से जगन्नाथ, बलराम एवं सुभद्रा की प्रतिमाएं बनायी गईं। एक सुदर्शन चक्र भी उत्कीर्णित किया गया। तत्पश्चात राजा ने पहाड़ी के ऊपर मंदिर की स्थापना की।

एक अन्य किवदंती के अनुसार देवलोक के शिल्पकार विश्वकर्मा ने मूर्ति गढ़ने की स्वीकृति दी किन्तु उस समयावधि में कार्यशाला में किसी के भी प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि किसी भी बाधा की स्थिति में मूर्तियाँ अपूर्ण रह जाएंगी। किन्तु अधीर राजा ने भीतर झाँककर विश्वकर्मा के कार्य में विघ्न उत्पन्न किया जिससे मूर्तियाँ अपूर्ण रह गईं। विश्वकर्मा ने तब तक विग्रहों के बाहु नहीं बनाए थे।

प्राप्त अभिलेखों के अनुसार कम से कम १२वीं शताब्दी से मंदिर अस्तित्व में था। उत्कल क्षेत्र के सभी राजवंशों ने अपने अपने शासनकाल में इसकी देखरेख एवं अनुरक्षण किया।

इस मंदिर पर विभिन्न आक्रमणकारियों ने बारम्बार आक्रमण किये। औरंगजेब के आदेशानुसार यह मंदिर १५ वर्ष बंद रखा गया था। उसकी मृत्यु के उपरांत ही यह मंदिर पुनः खुल पाया था।

जगन्नाथ पुरी मंदिर की वास्तुकला

जगन्नाथ पुरी मंदिर कलिंग वास्तुकला की देउल शैली पर आधारित है। जगमोहन तथा गर्भगृह के ऊपर एक ऊंचा शिखर इसका प्रमाण है। जब आप गर्भगृह से बाहर आकर मंदिर परिसर में प्रवेश करेंगे तो शिखर का विशाल आकार सहसा आपको अचंभित कर देगा।

अन्य प्राचीन मंदिरों के समान जगन्नाथ मंदिर भी अद्वितीय कलाकृतियों का अप्रतिम संग्रह है जिसके दर्शन कर आप अत्यंत आनंदित हो जाएंगे। इस अद्भुत संग्रह में से कुछ अतुलनीय रत्नों से आपको अवगत कराना चाहती हूँ ताकि जब भी आप इस मनमोहक व नयनाभिराम मंदिर के दर्शन करें तब इन कलाकृतियों के दर्शन करना ना भूलें।

सिंहद्वार का अरुण स्तंभ

यदि आप सिंहद्वार से मंदिर के अन्तः भाग में प्रवेश करेंगे तब आप प्रवेश द्वार के समक्ष एक ऊंचा स्तंभ देखेंगे। यह अरुण स्तंभ है जो मूलतः कोणार्क के सूर्य मंदिर में स्थापित था। कोणार्क मंदिर नष्ट होने के पश्चात इस स्तंभ को यहाँ लाकर पुनः स्थापित किया गया था। भूमि पर खड़े होकर आप देख नहीं पाएंगे किन्तु इस स्तंभ के शीर्ष पर सूर्य देव के सारथी, अरुण की एक प्रतिमा है। ऐसा प्रतीत होता है मानो अरुण भगवान जगन्नाथ से प्रार्थना कर रहे हैं कि वे उत्कल की धरती पर सूर्य देव की प्रतिष्ठा एवं गौरव को पुनः स्थापित करें।

जगन्नाथ पूरी मंदिर के सिंह द्वार पर अरुण स्तम्भ
जगन्नाथ पूरी मंदिर के सिंह द्वार पर अरुण स्तम्भ

सिंह द्वार मंदिर का पूर्वी प्रवेश द्वार है जो बड़ा डंडा अर्थात् ग्रांड मार्ग पर स्थित है। इसी मार्ग पर प्रत्येक वर्ष रथ यात्रा निकाली जाती है। इसे सिंह द्वार कहने का कारण है, द्वार पर सज्ज दो सिंह। साथ ही द्वार के दोनों ओर भगवान विष्णु के द्वारपाल, जय एवं विजय खड़े हैं। पतित पावन की मूर्ति इस प्रवेश द्वार के दाहिनी ओर देखी जा सकती है। यही तथ्य इस द्वार को अन्य तीन द्वारों से अधिक महत्वपूर्ण बनाता है। जिन्हे मंदिर में प्रवेश प्राप्त नहीं होता वे इस द्वार से पतित पावन के दर्शन करते हैं।

अश्व द्वार
अश्व द्वार

मंदिर की ओर अग्रसर, प्रसिद्ध २२ सीढ़ियाँ इस द्वार से अपेक्षाकृत अधिक निकट है। ये सीढ़ियाँ भक्तों को मुख्य मंदिर तक ले जाती हैं। इसीलिए भक्तों के हृदय में इन सीढ़ियों के प्रति अत्यंत श्रद्धा का भाव रहता है। रथ यात्रा का आरंभ एवं समापन भी सिंहद्वार पर ही होता है। अतः यह द्वार मंदिर के विभिन्न अनुष्ठानों का प्रवेश द्वार माना जाता है। अन्य तीन प्रवेश द्वार हैं, अश्व द्वार, गज द्वार एवं व्याघ्र द्वार।

जगन्नाथ, बलराम व सुभद्रा

यह तथ्य सर्वविदित है कि हम जगन्नाथ पुरी मंदिर इन तीन बंधु-भगिनी के दर्शन करने ही जाते हैं। किन्तु उन तीनों के विषय में उल्लेखनीय तथ्य यह है कि उनकी विशाल प्रतिमाएं नीम की लकड़ी का प्रयोग कर बनाई गयी हैं। आप जब भी इनकी प्रतिमा देखें तो यह तथ्य अवश्य ध्यान में रखें। यदि आप प्रत्येक वर्ष जगन्नाथ मंदिर नहीं जाते हैं तो संभव है आपकी प्रत्येक पुरी यात्रा में आप तीनों की भिन्न प्रतिमाएं देखेंगे। हो सकता है आप प्राचीन एवं नवीन प्रतिमाओं में अंतर ना कर पाएं क्योंकि नवीन प्रतिमाएं भी ठीक उसी प्रकार उत्कीर्णित की जाती हैं।

जगन्नाथ सुभद्रा एवं बलभद्र
जगन्नाथ सुभद्रा एवं बलभद्र

आप में से अनेक पाठकों को यह ज्ञात होगा कि जगन्नाथ मंदिर में प्रत्येक १२ – १९ वर्षों में तीनों प्राचीन मूर्तियों के स्थान पर उसी प्रकार की नवीन मूर्तियाँ स्थापित की जाती हैं। यह उस वर्ष किया जाता है जिस में अधिक मास अथवा पुरुषोत्तम मास पड़ता है। पुरुषोत्तम मास प्रत्येक १२ से १९ वर्षों के मध्य अधिक मास के रूप में आषाढ़ मास में आता है। नवीन मूर्तियों को एक विस्तृत अनुष्ठान द्वारा स्थापित किया जाता है जिसे नबकलेबर या नवकलेवर कहा जाता है।

मूर्तियों को देखते ही सर्वप्रथम आपकी दृष्टि उनके बड़े बड़े गोलाकार नेत्रों पर पड़ती है। यूँ तो इनकी प्रतिकृतियाँ आपको पुरी नगरी में सर्वत्र दृष्टिगोचर होंगी किन्तु दूर से ही सही, गर्भगृह में प्रत्यक्ष विग्रहों के दर्शन करना किसी दैवी अनुभव से कम नहीं होता। अतः उनकी छवियों को अपने नेत्रों एवं हृदय में अमर कर लें।

गर्भगृह में तीनों भगवानों को जिस पीठिका पर स्थापित किया गया है उसे रत्नवेदी कहते हैं। रत्नवेदी का अर्थ है रत्नों का सिंहासन। रत्नवेदी पर सुदर्शन चक्र, श्री देवी, भू देवी तथा मदन मोहन की मूर्तियाँ भी स्थापित हैं।

मंगल आरती

प्रातः काल भगवान जगन्नाथ की जो प्रथम आरती की जाती है वह मंगल आरती है। तीनों बंधु-भगिनी को प्रातः निद्रा से उठाने का यह एक विस्तृत अनुष्ठान है। मंदिर के पट खोलने से पूर्व गीत गाकर उन्हे निद्रा से जगाया जाता है। भगवान के प्रथम दर्शन पाने के लिए प्रातःकाल से ही मंदिर में भक्तों की भीड़ लग जाती है। जैसे ही गर्भगृह के पट खुलते हैं, भक्तगण द्वार के समक्ष झुंड लगा देते हैं। भगवान के दर्शन के पश्चात ही वे अपने दिवस का आरंभ करते हैं।

रथ यात्रा के समय जगन्नाथ
रथ यात्रा के समय जगन्नाथ

प्रातःकालीन मंगल आरती में भाग लें अथवा नहीं, यह मेरे जैसे दर्शनार्थियों के लिए अत्यंत कठिन चयन था। अंततः मैंने मंगल आरती में सम्मिलित होने का निर्णय लिया जिसके लिए ब्रह्म मुहूर्त में, प्रातः ४ बजे उठकर मैं अपने अतिथिगृह से सिंहद्वार की ओर चल पड़ी। प्रवेश द्वार पर अपना फोन जमा कर मैंने भीतर प्रवेश किया। मेरी सहायता करने के लिए एक पुरोहित जी आए जो मुझे मुख्य मंडप तक ले गए तथा प्रथम पंक्ति में मुझे खड़ा कर दिया। उषाकाल की उस बेला में भी मंदिर में भक्तों का विशाल समूह उपस्थित था। उस समय मुझे रत्ती भर भी आभास नहीं था कि मंदिर के पट खुलते ही उमड़ते जनसमूह के मध्य खड़ा रहना दूभर होने वाला था।

उषाकाल में मंदिर में उपस्थित दर्शनार्थियों में अधिकतर स्थानीय दर्शनार्थी होते हैं जो यहाँ नियमित रूप से आते हैं, कदाचित प्रत्येक दिवस। उन्हे उमड़ते जनसमूह से आगे जाकर भगवान के दर्शन कैसे पाना है, उसका उत्तम अभ्यास होता है। किन्तु हमारे जैसे अनभिज्ञ दर्शनार्थियों का दम घुटने अथवा कुचले जाने का अंदेशा सदा बना रहता है। बाहर आने का भी कोई मार्ग नहीं रहता। प्रथम पंक्ति में खड़ी होने के कारण मेरी भी यही स्थिति हो गई थी। मंदिर के पट खुलते ही भक्तगणों की भीड़ ऐसी उमड़ी कि कुछ क्षण मेरी बुद्धि निष्क्रिय हो गयी। कुछ क्षणों पश्चात मैने स्वयं को नियंत्रित किया। अतः, यदि आप मंगल आरती में सम्मिलित होना चाहते हैं तो सावधान रहिए तथा सुरक्षित दूरी पर खड़े होइए।

मंदिर के अन्नक्षेत्र में महाप्रसाद

चारों धामों में से पुरी को भगवान का अन्न क्षेत्र कहा जाता है जहां भोजन करना उन्हे अत्यंत भाता है। बद्रीनाथ धाम में भगवान ध्यान करते हैं, रामेश्वरम में वे स्नान करते हैं तथा द्वारका में वे निद्रामग्न होते हैं। इसमें आश्चर्य नहीं है कि सम्पूर्ण विश्व में भगवान के लिए विशालतम रसोईघर जगन्नाथ पुरी मंदिर में ही है। आप यह रसोईघर देख सकते हैं किन्तु लंगर के विपरीत, यहाँ आप सेवा नहीं कर सकते। रसोईघर के दर्शन करने के लिए नाममात्र का प्रवेश शुल्क देना पड़ता है।

पुरी का प्रसिद्द खाजा
पुरी का प्रसिद्द खाजा

रसोईघर के दर्शन का सर्वोत्तम समय प्रातःकाल है जब मिट्टी के पात्रों में अन्न पकाया जाता है। धोती धारण कर अनेक पुरोहित भाजियों को काटते हैं तथा पंक्तियों में बने पारंपरिक चूल्हों में पक्वान्न बनाते हैं। भगवान के लिए ५६ प्रकार के विभिन्न भोजन पकाये जाते हैं जो बिना प्याज एवं लहसुन के सर्व-शुद्ध सात्विक भोजन होता है। रसोईघर में प्रयोग के लिए जल दो कुओं से लाया जाता है जिनके नाम गंगा एवं यमुना रखे गए हैं। विश्व के किसी भी मंदिर के सबसे बड़े रसोईघर में विभिन्न कार्यकलापों के दर्शन का आनंद उठाना एक अद्वितीय अनुभव है।

प्रातः से रात्रि के मध्य, दिवस भर में छः बार भगवान को भोग चढ़ाया जाता है। जगन्नाथ मंदिर के महाप्रसाद के विषय में अधिक जानकारी यहाँ से प्राप्त करें।

पुरी के जगन्नाथ मंदिर के महाप्रसाद से भरे घड़े सम्पूर्ण दिवस नगर में भिन्न भिन्न स्थानों में ले जाए जाते हैं। यदि आप पुरी नगरी के वासी हैं तो किसी भी पारिवारिक आयोजन के लिए आप मंदिर से भोजन मँगवा सकते हैं। वह चाहे विवाह का उत्सव हो या जन्मदिवस का आशीर्वाद समारोह हो अथवा घर आए किसी अतिथि के लिए भोजन की आवश्यकता हो। मेरा अनुमान है कि महत्वपूर्ण आयोजनों के समय भगवान जगन्नाथ के आशीर्वाद को अपने निवासस्थान में तथा अपने जीवन में आमंत्रित करने की यह पुरी नगरी की रीत हो।

आनंद बाजार

आनंद बाजार वह स्थान है जहां मंदिर की रसोईघर में बना प्रसाद बिक्री के लिए रखा जाता है। यहाँ आने का सर्वोत्तम समय दोपहर है। मेरा विश्वास है कि इससे पूर्व आपने इतनी मात्रा में भोजन अपनी आँखों के सामने सम्पूर्ण विश्व में कहीं नहीं व कभी नहीं देखा होगा। लोग प्रसाद क्रय कर सीधे उस मिट्टी के पात्र से ही खाते हैं जिसमें वह पकाया गया है। यहाँ आप हर प्रकार के मिष्ठान देख सकते हैं। यह एक भीड़भाड़ भरा, कोलाहलपूर्ण एवं अव्यवस्थित बाजार होता है। यह अपने आप में एक निराला बाजार है।

आनंद बाजार के अंतिम छोर पर पहुँचने पर, वहाँ से आप जगन्नाथ पुरी मंदिर का विहंगम रूप देख सकते हैं। उसकी सम्पूर्ण वास्तुकला निहार सकते हैं।

नील चक्र अथवा श्री चक्र

जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर नील चक्र
जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर नील चक्र

मंदिर के शिखर के ऊपर अष्टधातु में बना एक विशाल चक्र है जिसे नील चक्र अथवा श्री चक्र कहते हैं। यह चक्र उतना ही श्रद्धेय है जितना कि गर्भगृह में स्थापित स्वयं भगवान। चक्र के ऊपर फहराते ध्वज को पतित पावन कहते हैं। प्राचीन काल में पुरी की यात्रा के लिए निकले श्रद्धालुओं को सर्वप्रथम इस ध्वज के ही दर्शन होते थे। इस ध्वज की एक झलक उन्हे यह जानकारी देती थी कि वे पुरुषोत्तम क्षेत्र में पहुँच गए हैं तथा उनका गंतव्य तीर्थ स्थल अब निकट ही है। इस क्षेत्र में अनेक यात्रा गीत प्रचलित हैं जिनमें इस ध्वज के प्रथम दर्शन प्राप्त करते ही तीर्थयात्रियों का उमड़ता आनंद स्पष्ट झलकता है।

नव ध्वज आरोहण

मंदिर के शिखर पर फहराता पतित पावन ध्वज एक दिन में अनेक बार बदला जाता है। उस समय सभी दर्शक गर्दन ऊंची कर टकटकी लगाए नवीन ध्वज फहराने के अनुष्ठान को देखते हैं। हम मंदिर में एकादशी के दिवस उपस्थित थे। हमने इसी नवीन ध्वज फहराने के अनुष्ठान को सहस्त्रों भक्तों के संग में देखा था। जगन्नाथ मंदिर का यह भी एक अविस्मरणीय अनुभव है। अतः इसका दर्शन अवश्य कीजिए।

देखें: द्वारका के द्वारकाधीश मंदिर में नव ध्वज आरोहण

इस ध्वज की एक आश्चर्यजनक विशेषता है कि यह ध्वज वायु के प्रवाह के विपरीत दिशा में फहरता है। यह कैसे संभव होता है कोई नहीं जानता।

जगन्नाथ पुरी संकुल के अन्य मंदिर

जगन्नाथ मंदिर परिसर में अनेक छोटे छोटे मंदिर हैं। लोगों का मानना है कि इनकी संख्या १०८ है। ऐसी मान्यता है कि भारत के सभी तीर्थों के लघु रूप इस परिसर में उपस्थित हैं।

विमला देवी मंदिर – विमला देवी मंदिर इस क्षेत्र का शक्ति पीठ है। उनका मंदिर जगन्नाथ मंदिर के निकट स्थित है। यहाँ स्त्रियाँ देवी को कुमकुम व चूड़ियाँ अर्पित करती हैं। आपके पुरी यात्रा के समय इस मंदिर के दर्शन अवश्य करें। देवी का एक नवीन मंदिर समुद्र तट के समीप स्थित पुरी शंकराचार्य मठ के भीतर भी है।

दैनिक अनुष्ठान के अंतर्गत मंदिर रसोईघर में बना भोग जगन्नाथ के साथ विमला देवी को भी अर्पित किया जाता है। इस भोग को तब तक महाप्रसाद नहीं माना जाता जब तक देवी उस भोग को आशीष ना दे।

महालक्ष्मी मंदिर – ऐसी मान्यता है कि जगन्नाथ मंदिर के रसोईघर में महालक्ष्मी ही भोजन बनाने की प्रक्रिया की निगरानी करती हैं। इस परिसर में उनका अत्यंत सुंदर मंदिर है। विमला देवी के समान ही महालक्ष्मी को भी चूड़ियाँ एवं कुमकुम अर्पित किया जाता है।

मंदिर परिसर के कुछ अन्य मंदिर हैं, कांची गणेश, काशी विश्वनाथ, सूर्य मंदिर, सरस्वती मंदिर, विष्णु के विभिन्न अवतारों को समर्पित मंदिर, हनुमान मंदिर इत्यादि।

मंदिर परिसर में स्तंभों पर आधारित अनेक खुले मंडप हैं। उनमें से मुक्ति मंडप सर्वाधिक लोकप्रिय है। मेरे अनुमान से इनका प्रयोग भक्तों द्वारा विभिन्न अनुष्ठान करने एवं विश्राम करने के लिए किया जाता है। अत्यंत सुंदर तोरण युक्त एक डोला मंडप है जिसका प्रयोग डोला यात्रा के लिए किया जाता है। स्नान वेदी का प्रयोग वार्षिक स्नान उत्सव के समय स्नान यात्रा के लिए किया जाता है।

जगन्नाथ पुरी मंदिर के उत्सव

मंदिर में अनेक विस्तृत दैनिक अनुष्ठान किए जाते हैं जो मंदिर एवं यहाँ के पुरोहितों को सम्पूर्ण दिवस व्यस्त रखते हैं। अनेक उत्सव वार्षिक स्तर पर भी आयोजित किये जाते हैं जिसके लिए विश्व भर से दर्शनार्थी यहाँ आते हैं। उस समय यहाँ का हर्षोल्हास अपनी चरम सीमा पर होता है।

रथ यात्रा के लिए रथ का निर्माण
रथ यात्रा के लिए रथ का निर्माण

रथ यात्रा – पुरी का सर्वाधिक लोकप्रिय उत्सव रथ यात्रा है। अनेक लोग पुरी नगरी को जगन्नाथ मंदिर एवं इस रथ यात्रा से ही जानते हैं जिसमें सैकड़ों भक्तगण तीन अतिविशाल रथों को खींचते हैं। यह उत्सव आषाढ़ मास में आयोजित किया जाता है जो अंग्रेजी पांचाग के जुलाई मास में पड़ता है। प्रत्येक वर्ष इन तीन रथों को नवीन रूप से बनाया जाता है जो स्वयं में एक महत्वपूर्ण व विस्तृत उत्सव है। अनेक प्रकार के कारीगर इसमें भाग लेने के लिए आते हैं। यह यात्रा ९ दिवसों तक चलती है जब तीनों बंधु-भगिनी ३ किलोमीटर की दूरी पर गुंडिचा उत्सव में अपना वार्षिक अवकाश मनाते हैं।

रथ यात्रा के अंतिम दिवस को नीलाद्री बिजे कहते हैं। इस दिन महालक्ष्मी जगन्नाथ को तब तक मंदिर में प्रवेश नहीं करने देती जब तक वे उन्हे एक रसगुल्ला ना खिला दें।

चंदन यात्रा – यह उत्सव अक्षय तृतीया के दिन आयोजित किया जाता है। इस दिन का एक महत्व यह भी है कि इस दिन से तीन रथों की निर्मिती का कार्य भी आरंभ किया जाता है।

स्नान यात्रा एवं अनसरा – वार्षिक स्नान उत्सव ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन आयोजित की जाती है। स्नान के पश्चात तीनों बंधु-भगिनी की मूर्तियों को १५ दिवसों के लिए अनसरा घाट ले जाया जाता है। उस समय जगन्नाथ मंदिर के भीतर, रत्नवेदी पर उनके स्थान पर उनके पट्टचित्र रखे जाते हैं तथा उनकी पूजा अर्चना की जाती है।

और पढ़ें: रघुराजपुर के पट्टचित्र

डोला यात्रा – यह यात्रा होली के पर्व के आसपास आयोजित की जाती है।

पंचका – इस उत्सव में तीनों देवों को भिन्न वेश एवं रूप दिया जाता है।

गुप्त गुंडिचा – विमला देवी का यह १६ दिवसीय उत्सव है जो आश्विन नवरात्रि के आसपास पड़ता है।

जगन्नाथ मंदिर के पुजारियों या पुरोहितों को सेवायत कहते हैं। वे ओडिशा के रंगबिरंगे मनभावन इक्कत के उत्तरीय धारण करते हैं।

जगन्नाथ पुरी के यात्रा सुझाव

केवल हिंदुओं को ही मंदिर के भीतर प्रवेश करने की अनुमति है। इनमें बौद्ध धर्म, जैन धर्म एवं सिख धर्म का पालन करने वाले भक्त भी सम्मिलित हैं। अन्य पतित पावन मूर्ति के दर्शन कर सकते हैं जिसे मंदिर के बाहर से देखा जा सकता है।
मंदिर प्रातः ५ बजे से मध्य रात्रि तक खुला रहता है।

आप मंदिर एवं यहाँ की विभिन्न गतिविधियों के दर्शन करते हुए एक सम्पूर्ण दिवस व्यतीत कर सकते हैं। समय के अभाव में इसे १ से २ घंटों में भी देखा जा सकता है।

आप मंदिर के भीतर फोन जैसे किसी भी प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक उपकरण नहीं ले जा सकते। मंदिर के भीतर प्रवेश करने से पूर्व अपना फोन एवं जूते-चप्पल जमा करना पड़ता है। आप केवल अपना बटुआ ले जा सकते हैं। इन वस्तुओं को जमा करने के लिए एक अधिकारिक खिड़की है। यदि आप आसपास स्थित किसी दुकान से कुछ क्रय करें तो वह भी आपकी जमावस्तु रखने के लिए तत्पर हो जाएगा।

जूते-चप्पल जमा करने की खिड़की के निकट पुस्तकों की एक दुकान है जहां से आप मंदिर एवं पुरी पर आधारित कुछ पुस्तकें क्रय कर सकते हैं।

अधिक जानकारी के लिए मंदिर का यह वेबस्थल देखें।

जगन्नाथ मंदिर में पंडित हरेकृष्ण महापात्रा जी ने मेरा मार्गदर्शन किया था। यदि आप भी उनकी सहायता चाहते हैं तो ९८६११ १०९०५ पर उनसे संपर्क करें।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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गुरुवायुर मंदिर – देवों के देस केरल में भगवान कृष्ण का वास https://inditales.com/hindi/https-www-inditales-com-guruvayur-mandir-thrissur-kerala/ https://inditales.com/hindi/https-www-inditales-com-guruvayur-mandir-thrissur-kerala/#comments Wed, 09 Dec 2020 02:30:45 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2085

श्री विष्णु के अवतार, गुरुवायुरप्पन को समर्पित यह मंदिर दक्षिणी राज्य केरल के गुरुवायुर नगरी में स्थित है। इस नगरी के अत्यंत लोकप्रिय मंदिरों में से एक, इस मंदिर का नाम भी नगरी के नाम पर ही है। इस मंदिर में गुरुवायुरप्पन को बाल कृष्ण के रूप में पूजा जाता है। गुरुवायुर को बहुधा भूलोक […]

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श्री विष्णु के अवतार, गुरुवायुरप्पन को समर्पित यह मंदिर दक्षिणी राज्य केरल के गुरुवायुर नगरी में स्थित है। इस नगरी के अत्यंत लोकप्रिय मंदिरों में से एक, इस मंदिर का नाम भी नगरी के नाम पर ही है। इस मंदिर में गुरुवायुरप्पन को बाल कृष्ण के रूप में पूजा जाता है। गुरुवायुर को बहुधा भूलोक वैकुंठ भी कहा जाता है जिसका अर्थ है धरती पर विष्णु का पवित्र निवास। मंदिर का कार्यभार गुरुवायुर देवासम के ऊपर है जो मंदिर के सर्व कार्यकलापों का निर्देशन करती है। गुरुवायुर केरल के त्रिशूर जिले की एक सम्पन्न वसाहत है। यह त्रिशूर नगर से लगभग २९ किलोमीटर दूर उत्तर-पश्चिम दिशा में स्थित है।

भगवान कृष्ण के निवास गुरुवायुर मंदिर की दंत कथाएं

तीन शब्दों के संयोजन से गुरुवायुर शब्द की व्युत्पत्ति हुई है। गुरु बृहस्पति के लिए गुरु, वायु देव से वायु तथा ऊर जिसका मलयालम भाषा में अर्थ होता है स्थान। ऐसा माना जाता है कि कलयुग के आरंभ में भगवान कृष्ण ने इस मूर्ति की स्थापना द्वारका में की थी। कालांतर में एक भयंकर बाढ़ में यह मूर्ति बह गई थी जिसे वायु की सहायता से बृहस्पति ने बचा लिया था। पुनः स्थापना हेतु स्थल खोजते वे केरल पहुंचे जहाँ भगवान शिव एवं माता पार्वती ने उन्हे उसी स्थान पर स्थापना की आज्ञा दी। गुरु बृहस्पति एवं वायु देव ने मूर्ति का अभिषेक कर उसका देवत्वारोपण किया। भगवान ने वरदान दिया कि गुरु बृहस्पति एवं वायु देव द्वारा स्थापना होने के कारण वह स्थान गुरुवायुर कहलाएगा।

गुरुवायुर मंदिर - केरल
गुरुवायुर मंदिर – केरल

नारद पुराण में उल्लेख किया गया है कि अर्जुन के पड़पोते जनमेजय के पिता परिक्षित को श्राप था कि उनकी मृत्यु सर्प दंश के कारण होगी। अंततः उनकी मृत्यु तक्षक नामक सर्पराज के दंश से ही हुई थी। प्रतिशोध स्वरूप जनमेजय ने विश्व के सभी सर्पों को मारने के लिए नागदाह यज्ञ करवाया जिसमें उसने मंत्रों द्वारा सैकड़ों नागों का आवाहन कर उन्हे अग्नि में समर्पित कर दिया था। किन्तु नागराज वासुकि की प्रेरणा एवं ब्राह्मण आस्तीक की तपस्या के कारण तक्षक एवं अन्य सर्प जीवित बच पाए थे। चूंकि जनमेजय ने सर्पों की हत्या की थी, वह कुष्ट रोग से ग्रसित हो गया था। गुरुवायुर मंदिर में पूजा-अनुष्ठान करने के पश्चात उसे अपने कुष्ठ रोग से मुक्ति मिली थी।

तमिल साहित्य कोकसन्देसम् में भी इस स्थान का क्षणिक उल्लेख किया गया है। उसमें इस स्थान पर श्री विष्णु के नौवें अवतार श्री कृष्ण के रूप में पूजे जाने का उल्लेख है। यहाँ श्री कृष्ण को गुरुवायुरप्पन कहा गया है जो वास्तव में कृष्ण का बाल रूप है।

गुरुवायुर मंदिर का इतिहास

श्री गुरुवायुरप्पन
श्री गुरुवायुरप्पन

सन् १७१६ में डच लोगों ने मंदिर पर आक्रमण कर इसे अग्नि में भस्म कर दिया था। सन् १७४७ में इसका पुनर्निर्माण किया गया। हैदर अली ने भी कालीकट एवं गुरुवायुर पर आक्रमण किया था किन्तु उसने मंदिर को हानि नहीं पहुंचाई थी। किन्तु उसके पुत्र टीपू सुल्तान ने इस मंदिर को लूटा एवं निर्ममता से पूरे परिसर को अग्नि में झोंक दिया। किन्तु यथासमय पर आयी वर्षा ने मंदिर का बचाव किया। मंदिर की मूल प्रतिमा को भक्तों ने सही समय पर भूमि के भीतर छुपा दिया था। इस प्रकार प्रतिमा को बचा लिया गया था। कालांतर में मंदिर का पुनः निर्माण एवं नवीनीकरण किया गया। २० वीं. सदी तक मंदिर प्रशासन ने अनेक सुधार कार्य भी प्रतिपादित किए।

श्री गुरुवायुरप्पन की दैनिक पूजा-अनुष्ठान

आदि शंकर द्वारा नियोजित मंदिर के सभी दैनिक अनुष्ठानों का पूर्ण श्रद्धा से पालन किया जाता है। सभी वैदिक संस्कारों का अत्यंत शुद्धता से पालन किया जाता है तथा मंदिर की पवित्रता बनाए रखी जाती है। भक्तों के लिए मंदिर के पट प्रातः ३ बजे खुलते हैं तथा संध्या पूजन के पश्चात रात्रि १० बजे पट बंद कर दिए जाते हैं। मंदिर में तीन प्रमुख पूजा-अर्चनाएँ की जाती है जिन्हे प्रातः पूजन, दोपहर पूजन एवं संध्या पूजन कहा जाता है।

शेषशायी विष्णु - मंदिर की भित्तियों पे
शेषशायी विष्णु – मंदिर की भित्तियों पे

प्रातः पूजन(उषा पूजन)

निर्माल्यम्

प्रातः ३ बजे जब मंदिर के पट खुलते हैं, निर्माल्यम् द्वारा प्रातः पूजन का आरंभ होता है। भगवान के प्रथम दर्शन को निर्माल्य दर्शन कहते हैं। पिछली रात्रि की प्रगाड़ निद्रा के पश्चात जब भगवान को उठाया जाता है तब उनके निर्माल्य दर्शन का सौभाग्य भक्तों को भी प्राप्त होता है। उनके ऊपर पिछले दिवस के सर्व अलंकार होते हैं। इस दर्शन को सर्वाधिक पवित्र दर्शन माना जाता है क्योंकि ऐसी मान्यता है कि इस समय भगवान सर्वाधिक शक्तिशाली होते हैं।

वाकचारथ

निर्माल्य दर्शन के पश्चात तिल के तेल द्वारा भगवान को स्नान कराया जाता है। भगवान की प्रतिमा शिला द्वारा बनायी गई है जिसमें औषधिक गुण हैं। इसीलिए जिस तेल द्वारा भगवान को स्नान कराया जाता है, उसे प्रसाद माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि यह प्रसाद रूपी तेल पक्षाघात सहित अनेक असाध्य रोगों का समाधान करने में सक्षम है। मंदिर की विक्रय खिड़की में यह तेल उपलब्ध है। आप चाहें तो क्रय कर सकते हैं। स्नान के पश्चात भगवान की पूर्ति पर जड़ी-बूटियों के मिश्रण का लेप लगाया जाता है। इस मिश्रण को वाक कहा जाता है।

मालेर नैवेद्यम

लेप के पश्चात भगवान को जल स्नान कराया जाता है। इसके लिए मंदिर के जलकुंड से पुजारीजी तीर्थ जल लाते हैं। ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव(रुद्र) ने परिवार सहित इस स्थान पर भगवान विष्णु की आराधना की थी। यही कारण है कि इस जलकुंड को रुद्रतीर्थम कहा जाता है। शंख द्वारा यह जल भगवान की मूर्ति पर अर्पित जाता है। अभिषेक के पश्चात मूर्ति को वस्त्रों एवं अलंकरणों से सजाते हैं। चंदन का लेप लगाते हैं तथा आभूषणों से अलंकृत करते हैं। सम्पूर्ण अलंकरण बाल कृष्ण के स्वरूप का होता है। लाल धोती धारण किए तथा हाथों में बाँसुरी एवं माखन लिए हुए बाल कृष्ण। मालेर नामक नैवेद्यम या प्रसाद भगवान को अर्पित किया जाता है जो मुरमुरे के समान दिखता है।

उषा नैवेद्यम तथा एथिरेत्तु पूजा

मालेर नैवेद्यम के पश्चात गर्भगृह के पट उषा पूजा हेतु बंद किए जाते हैं। भगवान को माखन, नेई पायसम, केले का एक विशेष प्रकार, गुड़, एक विशेष प्रकार की शक्कर, कई मिठाइयां इत्यादि अनेक प्रकार के नैवेद्यम अर्पित किए जाते हैं। यह पूजा सूर्य उदय होने के पूर्व ही आरंभ हो जाती है। जब तक सूर्य की प्रथम किरण पूर्व-मुखी भगवान के चरणों पर ना पड़े, यह पूजा अनवरत जारी रहती है। इसी समय गणपती होम तथा अन्य भगवानों की पूजा अर्चना भी समानांतर रूप से की जाती है।

शीवेली

प्रातः पूजन के पश्चात भगवान की सोने एवं चांदी में गढी प्रतिमाओं को मंदिर के गज की पीठ पर बैठाकर मंदिर परिसर मे उनकी शोभायात्रा निकाली जाती है। इस शोभायात्रा को शीवेली कहा जाता है। यह शोभायात्रा प्रतिदिन तीन बार निकली जाती है। मंदिर के स्वामित्व में ६९-८० गज इस अनुष्ठान के लिए उपलब्ध हैं। स्थान की कमी के रहते उन्हे मंदिर से ३ किलोमीटर दूर एक विशेष आश्रय में रखा गया है। उनकी देखरेख मंदिर प्रशासन ही करता है। शीवेली के समय चयनित गज को यहाँ लाया जाता है। आप यदि उन्हे देखना चाहें तो यहाँ से औटोरिक्षा लेकर जा सकते हैं। नाममात्र शुल्क पर आप इन्हे देख सकते हैं।

सामान्यतः स्वर्ण प्रतिमा की शोभायात्रा होती है। किन्तु विशेष अवसरों पर चांदी की प्रतिमा भी निकाली जाती है। इस आयोजन का प्रमुख उद्देश्य यह है कि भगवान अपने रक्षकों, अष्टदिग्पालों, सप्तमातृकाओं, वीरभद्र एवं गणपती को अर्पित किए गए भोजन का निरीक्षण करते हैं।

पालभिषेकम् तथा नवभिषेकम्

शीवेली के पश्चात, मूर्ति को मंदिर के कुएं से लाए गए जल से पुनः स्नान कराया जाता है। इसके पश्चात अभिषेकम् किया जाता है जिसमें मूर्ति को दूध, नारियल पानी तथा गुलाब जल में डुबाया जाता है। तदनंतर मूर्ति को पीत वस्त्र धारण करवा कर किशोर वय के कृष्ण का स्वरूप दिया जाता है।

पंद्रयान्डी पूजा

यह पूजा कुछ पारंपरिक पुरोहित करते हैं। पंद्रयान्डी का अर्थ है १२ फीट। सूर्य की किरणें जब मूर्ति पर पड़ती हैं तब उसके द्वारा बनी छाया की लंबाई से इस नाम का संबंध है। इस पूजा के पश्चात मंदिर के पट दर्शन के लिए खोल दिए जाते हैं। अगले अनुष्ठान तक मंदिर के पट भक्तों के लिए खुले रहते हैं।

दोपहर का पूजन अर्थात् उच्च पूजा

गुरुवायुर मंदिर का दीपस्तंभ
गुरुवायुर मंदिर का दीपस्तंभ

उचा पूजा दोपहर ११:३० बजे के पश्चात की जाती है। इस समय मंदिर भक्तों के लिए बंद होता है। यह पूजा द्वार बंद कर की जाती है। पूजा के समय भगवान को पायसम अथवा खीर का विशेष पूजा प्रसाद अर्पित किया जाता है। मंदिर के गायक जयदेव के गीत गोविंद की पंक्तियाँ गाते हैं। इसके पश्चात १२:३० बजे मंदिर के पट बंद हो जाते हैं। संध्या पूजन एवं दर्शन हेतु संध्या ४:३० बजे पुनः पट खोले जाते हैं।

संध्या पूजन

संध्या पूजा का आरंभ दीप आराधना से होता है। सूर्यास्त के पश्चात, मंत्रोच्चारण के मध्य दीपों को प्रज्ज्वलित कर मंदिर को जगमगाया जाता है। कपूर आरती के लिए गर्भगृह पुनः खुलता है।

दिन की अंतिम पूजा के लिए रात्रि ७:३० बजे मंदिर बंद होता है। भगवान को विभिन्न पक्वान्न अर्पित किए जाते हैं। नैवेद्यम् में अप्पम, अड़ा, पालपायसम, पान तथा सुपारी प्रस्तुत किए जाते हैं। पूजा के पश्चात भगवान को पुनः शीवेली अनुष्ठान के लिए गज की पीठ पर बिठाकर उनकी शोभायात्रा निकाली जाती है। रात्रि में जगमगाती यह शीवेली अत्यंत दर्शनीय होती है।

यहाँ का एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है थ्रीपक्क जिसमें गर्भगृह को एक विशेष चूर्ण के ताजे धुएं से भरते हैं। ऐसी मान्यता है कि यह चूर्ण श्वास रोगों के निवारण हेतु अत्यंत उपयोगी है।

एक चौखट पर भक्तगण अनेक दीप प्रज्वलित करते हैं जिसे विलक्कुमाथम कहते हैं। मंदिर के चारों ओर प्रज्वलित असंख्य दीपों का दृश्य अभूतपूर्ण प्रतीत होता है।

ऐसे ही धार्मिक अनुष्ठान नाथद्वारा के श्रीनाथजी के लिए भी किए जाते हैं।

अन्य प्रतिमाएं

मंदिर परिसर में कई छोटे मंदिर भी हैं जो शास्ता , दुर्गा, सुब्रमन्य, अनंत तथा गणपती को समर्पित हैं।

गर्भगृह के चारों ओर अनेक छोटी शिलाएं हैं जिन्हे बलिकल्लु कहा जाता है। ये अष्टदिग्पालिकाओं अर्थात् आठ दिशाओं के देवों तथा सप्तमातृकाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।

गुरुवायुर मंदिर की संरचना

केरल की चित्रकला शैली
केरल की चित्रकला शैली

गुरुवायुर मंदिर केरल के मंदिरों की विशेष वास्तुशैली के सर्वोत्तम उदाहरणों में से एक है। दो गोपुरों के मध्य से आप मंदिर के भीतर प्रवेश कर सकते हैं। एक पूर्व दिशा में है तथा दूसरा पश्चिम दिशा में स्थित है। दोनों गोपुरों के दो दीप स्तंभ हैं। गोपुरम के भीतर से आप एक प्रांगण में पहुंचते हैं जिसके मधोमध मुख्य मंदिर स्थित है। मंदिर की शुंडाकार छत पर खपरैल की टाइलें बिठायी हुई हैं। प्रांगण के भीतर अन्य कई मंदिर भी हैं जो विभिन्न देवी-देवताओं को समर्पित हैं। अधिकतर मंदिर केवल एकल कक्ष हैं जिस के भीतर भगवान स्थापित हैं। सब के छतों पर खपरैल की टाइलें बिठायी हुई हैं।

और पढ़ें: द्वारका का द्वारकाधीश मंदिर

प्रांगण के मध्य में स्तंभों वाला विशाल कक्ष है जिसके समक्ष एक ध्वजस्तंभ है। पूर्वी गोपुरम की ओर एक दीपस्तंभ है। स्तंभों वाला यह विशाल कक्ष हमें श्रीकोविल अर्थात् मुख्य मंदिर की ओर ले जाता है। इस श्रीकोविल का सबसे भीतरी कक्ष गर्भगृह कहलाता है जहाँ भगवान की मूर्ति प्रतिष्ठापित है। गर्भगृह के समक्ष मुखमंडप है। मुखमंडप के बाहर नमस्कार मंडप है।

गणेश मंदिर

मंदिर के दक्षिणी ओर गणेश भगवान का मंदिर है। श्रीकोविल को घेरता एक कक्ष है जिसमें श्री कृष्ण की जीवनी का प्रदर्शन करते अनेक शिल्प हैं। निद्रामग्न विष्णु की शेषशय्या स्वरूप में एक विशाल छवि है जिसमें भूदेवी एवं श्रीदेवी उनके दोनों ओर स्थित हैं। इसे थिरुवनंतपुरम के पद्मनाभस्वामी मंदिर के समान बताया जाता है।

उत्तर दिशा में स्थित निकास द्वार से आप एक कक्ष सदृश संरचना के भीतर पहुंचते हैं जहाँ भक्तगण प्रसाद ग्रहण कर सकते हैं। उत्तर-पूर्वी दिशा में देवी को समर्पित एक मंदिर है। मुख्य मंदिर के दक्षिणी ओर शास्ता या श्री एयप्पा को समर्पित एक मंदिर है। दक्षिणी ओर स्थित कक्ष के भीतर प्रसाद पकाने के लिए कई विशाल पात्र रखे हुए हैं। उत्तरी दिशा में मंदिर का जलकुंड तथा कुआं हैं। भीतरी गर्भगृह की बाहरी भित्तियों पर कृष्णलीला को सजीव करते अनेक भित्तिचित्र हैं।
भगवान की मूल प्रतिमा पातालँजना शिला नामक पवित्र शिला द्वारा बनाई गई है।

परिधान-संहिता

मंदिर के भीतर परिधान संहिता का कठोरता से पालन किया जाता है। पुरुषों को कुर्ता अथवा शर्ट के बिना, केवल धोती पहननी पड़ती है। स्त्रियाँ केवल साड़ी, कुर्ते के साथ लंबा केरल लहंगा अथवा सलवार-कुर्ता पहन सकती हैं।

गुरुवायुर मंदिर के उत्सव

उल्सवम् – यह उत्सव फरवरी-मार्च में मनाया जाता है। दस दिवसों का यह उत्सव ध्वजस्तंभ पर ध्वज फहराकर आरंभ किया जाता है।

विषु –मलयाली नव-वर्ष का यह उत्सव इस मंदिर का प्रमुख आयोजन होता है।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी – यूँ तो श्री कृष्ण जन्माष्टमी अर्थात् श्री कृष्ण के जन्म का उत्सव अगस्त-सितंबर मास में सम्पूर्ण भारत में धूमधाम से मनाया जाता है। यह उत्सव यहाँ भी अत्यंत लोकप्रिय है।

माम्मियुर श्री महादेव मंदिर

माम्मियुर श्री महादेव मंदिर
माम्मियुर श्री महादेव मंदिर

समीप ही एक लोकप्रिय महादेव मंदिर स्थित है। प्रमुख अधिष्ठात्र देव भगवान शिव हैं। इसका निर्माण शिवालय शैली में किया गया है। परिसर में स्थित अन्य छोटे मंदिर गणपती, विष्णु, सुब्रमन्य, अयप्पा तथा काली को समर्पित हैं। यहाँ के दो प्रमुख उत्सव शिवरात्रि तथा अष्टमी रोहिणी हैं। ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर के दर्शन के उपरांत ही इस नगरी की यात्रा सम्पूर्ण होती है।

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यात्रा सुझाव

• मंदिर के समीप अनेक अतिथिगृह हैं। पर्यटकों एवं तीर्थयात्रियों के रहने के लिए पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध हैं।
• कर्नाटक राज्य सड़क परिवहन निगम की बसें राज्य के अनेक भागों से तथा अनेक अंतर-राज्यीय बसें भी यहाँ तक पहुँचती हैं।
• दोपहर १२:३० बजे से संध्या ४:३० बजे तक मंदिर के पट बंद रहते हैं।
• मंदिर के भीतर परिधान-संहिता का कड़ाई से पालन किया जाता है। अतः उपयुक्त परिधान धारण करें।
• मंदिर के भीतर मोबाईल यंत्र ले जाना पूर्णतः निषिद्ध है। अमानती सामानघर की सुविधाएँ उपलब्ध हैं जहाँ आप जूते, मोबाईल तथा अन्य व्यक्तिगत सामान रख सकते हैं।
• यहाँ की दुकान से आप प्रसादम् तथा अभिषेक का तेल क्रय कर सकते हैं।
• यहाँ अनेक दुकानें हैं जहाँ केरल दीप जैसी वस्तुएं तथा पूजा से संबंधित अन्य सामग्रियों की विक्री की जाती है। इन वस्तुओं का मूल्य बहुधा अधिक बताया जाता है। अतः आप अपनी समझ के अनुसार मोल-भाव करके ही इन्हे क्रय करें। केरल के स्मृति चिन्ह के रूप में आप क्या क्रय कर सकते हैं, उनके अनेक पर्याय इन संस्करण में देखें।
• यहाँ का रेल स्थानक मंगलुरु-मद्रास रेलमार्ग से त्रिशूर में जुड़ता है।
• कोची एवं कोजिकोड (कालीकट), दो निकटतम विमानतल हैं।

यह यात्रा संस्करण श्रुति मिश्रा द्वारा Inditales Internship Program के अंतर्गत साझा किया गया है।


श्रुति मिश्रा एक व्यावसायिक बँककर्मी हैं। उन्हे भिन्न भिन्न स्थानों की यात्रा कर वहाँ की समृद्ध धरोहरों को जानने व समझने तथा वहाँ के स्थानीय व्यंजनों का आस्वाद लेने में अत्यंत रुचि है। उन्हे किताबें पढ़ने तथा अपने परिवार के लिए भोजन बनाने में भी अत्यंत आनंद आता है। वे बंगलुरु की निवासी हैं। इनकी अभिलाषा है कि वे सम्पूर्ण भारत की समृद्ध धरोहरों के दर्शन करें तथा उन पर एक पुस्तक प्रकाशित करें।


अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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चेन्नाकेशव मंदिर- कर्नाटक के बेलूर की अमूल्य धरोहर https://inditales.com/hindi/chennakesava-mandir-belur-karnataka/ https://inditales.com/hindi/chennakesava-mandir-belur-karnataka/#comments Wed, 16 Sep 2020 02:30:15 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1872

बेलूर कर्नाटक के हासन जनपद में स्थित एक छोटा सा नगर है। यागाची नदी के तीर स्थित यह नगर चारों ओर से हरियाली से घिरा हुआ है। वेलापुरा के नाम से भी जाना जाने वाला यह एक प्राचीन एवं महत्वपूर्ण नगर है। यह 10 वी. से 14 वीं. सदी के मध्य कर्नाटक में राज्य करते […]

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बेलूर कर्नाटक के हासन जनपद में स्थित एक छोटा सा नगर है। यागाची नदी के तीर स्थित यह नगर चारों ओर से हरियाली से घिरा हुआ है। वेलापुरा के नाम से भी जाना जाने वाला यह एक प्राचीन एवं महत्वपूर्ण नगर है। यह 10 वी. से 14 वीं. सदी के मध्य कर्नाटक में राज्य करते होयसल साम्राज्य की राजधानी है। होयसल साम्राज्य अप्रतिम मंदिर वास्तुकला के लिए अत्यंत प्रसिद्ध है। वे कला, साहित्य तथा धर्म के महान संरक्षक थे। इसका एक जीत जागता उदाहरण है चेन्नाकेशव मंदिर।

बेलूर का होयसल राजवंश

चेन्नाकेशव मंदिर - बेलूर
चेन्नाकेशव मंदिर – बेलूर

होयसल राजवंशी मूलतः पश्चिमी घाट के मलनाडू नामक क्षेत्र के थे। इन्हे युद्ध कौशल में विशेष रूप से निपुण माना जाता है। इन्होंने चालुक्य एवं कलचुरी वंशों के मध्य चल रहे आंतरिक युद्ध का लाभ उठाते हुए कर्नाटक के कई क्षेत्रों पर आधिपत्य स्थापित किया था। 13 वी. सदी तक उन्होंने कर्नाटक के अधिकतर क्षेत्रों, तमिल नाडु के कुछ क्षेत्रों तथा आंध्र प्रदेश व तेलंगाना के कई क्षेत्रों तक साम्राज्य स्थापित कर लिया था।

होयसल वास्तुकला

होयसल काल को इस क्षेत्र का स्वर्णिम काल माना जाता है। दक्षिण भारत में कला, वास्तुशिल्प, साहित्य, धर्म तथा विकास के क्षेत्र में होयसल राजवश का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रहा है। आरंभ में बेलूर नगरी उनकी राजधानी थी। कालांतर में उन्होंने हैलेबिडु में स्थानांतरण किया जिसे द्वारसमुद्र भी कहते हैं। आज होयसल राजवंश को विशेष रूप से उत्कृष्ट होयसल वास्तुकला के लिए स्मरण किया जाता है।

चेन्नाकेशव मंदिर - होयसल राज चिन्ह
चेन्नाकेशव मंदिर – होयसल राज चिन्ह

वर्तमान में होयसल वास्तुकला से सुशोभित लगभग ९२ मंदिर हैं जिनमें ३५ मंदिर हासन जिले में स्थित हैं। इनमें प्रमुख मंदिर हैं, बेलूर का चेन्नाकेशव मंदिर, हैलेबिडु में होयसलेश्वर मंदिर तथा सोमनाथपुरा का चेन्नाकेशव मंदिर। इनके अतिरिक्त नग्गेहल्ली का लक्ष्मी नरसिंह मंदिर, बेलवाड़ी में वीर नारायण मंदिर, अरसिकेरे में ईश्वर मंदिर, कोरवंगला का बूचेश्वर मंदिर, हैलेबिडु में जैन बसदी, किक्केरी में ब्रहमेश्वर मंदिर अन्य कई मंदिरों में से हैं जो होयसल वास्तुशिल्प के लिए प्रसिद्ध हैं।

होयसल नाम की व्युत्पत्ति

कन्नड़ लोकसाहित्यों के अनुसार सल नामक एक नवयुवक था जिसने तलवार से वार कर एक बाघ से अपने गुरु के प्राणों की रक्षा की थी। प्राचीन कन्नड़ भाषा में वार करने को होय कहा जाता था। यहीं से होयसल शब्द की व्युत्पत्ति हुई थी।

बेलूर का चेन्नाकेशव मंदिर संकुल

चेन्नाकेशव मंदिर होयसल वास्तुकला के चित्ताकर्षक नमूनों में से एक है। असाधारण नक्काशी एवं उत्कृष्ट शिल्पकला के लिए इस मंदिर को स्थानीय रूप से कलासागर कहा जाता है। इसकी सुंदरता इतनी अभिव्यंजक है कि ये सभी निर्जीव पत्थर की कलाकृतियाँ अत्यंत सजीव प्रतीत होती हैं।

चेन्नाकेशव मंदिर का इतिहास

बेलूर के चेन्नाकेशव मंदिर का निर्माण १११७ ई. में विष्णुवर्धन ने करवाया था। वास्तुकला की इस उत्कृष्ट कलाकृति के निर्माण में राजवंश की तीन पीढ़ियों को १०३ वर्ष लग गए। ऐसा कहा जाता है कि पत्थर द्वारा इस वास्तुकला के निर्माण में १००० से भी अधिक कारीगरों का योगदान था।

यह मंदिर भगवान विष्णु के चेन्नाकेशव रूप को समर्पित है जिसका अर्थ है सुंदर (चेन्ना) विष्णु (केशव)।

यह मंदिर राजा विष्णुवर्धन द्वारा चोलवंश पर अर्जित की गई महत्वपूर्ण सैन्य विजय की स्मृति में निर्मित किया गया था। एक अन्य स्थानीय मान्यता के अनुसार इस मंदिर का निर्माण राजा विष्णुवर्धन द्वारा जैन धर्म त्याग कर वैष्णव धर्म अपनाने के उपलक्ष्य में की गई थी। जब राजा विष्णुवर्धन जैन धर्म का पालन कर रहे थे तब उन्हे बिट्टीदेव कहा जाता था। अपने गुरु रामानुजचार्य के प्रभाव में उन्होंने हिन्दू धर्म अपनाया था। उनकी रानी शांतला देवी कला, संगीत तथा नृत्य की महान प्रशंसक थीं। वे स्वयं भी भरतनाट्यम नृत्य में निपुण थीं। उन्हे नृत्यसाम्राज्ञी भी कहा जाता था।

चेन्नाकेशव मंदिर का गोपुरम

यह विशाल मंदिर चारों ओर से भित्तियों से घिरा हुआ है। मंदिर के भीतर जाने के लिए दो प्रवेश द्वार हैं। पूर्वी प्रवेश द्वार पर पाँच तलों का विशाल गोपुरम है। दिल्ली सल्तनत के आक्रमणकारियों ने मुख्य द्वार को नष्ट कर दिया था। विजयनगर साम्राज्य के काल में इसका पुनर्निर्माण किया गया था।

चेन्नाकेशव मंदिर का गोपुरम
चेन्नाकेशव मंदिर का गोपुरम

गोपुरम का निचला भाग कठोर पत्थर द्वारा निर्मित है, वहीं इसका ऊपरी भाग ईंट एवं गारे द्वारा बनाया गया है। इसे देव-देवियों की प्रतिमा द्वारा सुशोभित किया गया है। इसके दो सर्वोच्च कोनों पर गौमाता की सींग के आकार की दो संरचनाएं हैं। इसीलिए इसे गोपुरम कहा जाता है। दो सींगों के मध्य पाँच सुनहरे कलश हैं।

मुख्य मंदिर

मंदिर का अनोखा मुख्य भाग तारे के आकार का है जो एक मंच पर स्थापित है। इस मंच को जगती कहा जाता है। मंदिर में एक गर्भगृह, सुकनासी अर्थात ड्योढ़ी तथा एक नवरंग मंडप है। यहाँ एक विमान अर्थात ईंट व गारे से निर्मित तथा सोने का पानी चढ़े हुए तांबे की चादरों से ढँकी लकड़ी से संरक्षित संरचना थी। भीतरी गर्भगृह के रक्षण हेतु १९ वीं. शताब्दी में इसे खंडित कर दिया गया था।

गजासुर संहार
गजासुर संहार

नवरंग मंडम में प्रवेश करने के लिए पूर्व, उत्तर एवं दक्षिण दिशा में तीन द्वार हैं। मंदिर का निर्माण शैलखटी अर्थात सिलखड़ी पत्थर द्वारा किया गया है जिसकी सम्पूर्ण संरचना पर आप सूक्ष्म नक्काशी देख सकते हैं।

मकर तोरण
मकर तोरण

पूर्व दिशा का द्वार मकर तोरण द्वारा सज्जित है। मुख्य द्वार के ऊपर स्थित पट्टिका पर विष्णु के दसों अवतारों को चित्रित किया गया है। द्वार के दोनों ओर सल द्वारा बाघ के वध का दृश्य दो विशाल संरचनाओं द्वारा दर्शित किया गया है। यह होयसल राजवंश का राज प्रतीक भी है। इस प्रतीक के दोनों ओर आप दो छोटे मंदिर देखेंगे जो भगवान विष्णु को समर्पित हैं। पूर्वी द्वार के दोनों ओर की भित्तियों पर मनमोहक उत्कीर्णन द्वारा राजदरबार का दृश्य दर्शाया गया है जिसमें बायीं ओर राजा विष्णुवर्धन तथा दाहिनी ओर उनके पोते वीर बल्लाल हैं।

गरुड़ स्तम्भ
गरुड़ स्तम्भ

मंदिर के द्वार भी उत्कृष्ट रूप से सुंदर फिलग्री नक्काशी द्वारा उत्कीर्णित हैं। पूर्वी द्वार के समक्ष, गोपुरम की ओर सुनहरा ध्वजस्तम्भ है। इसके समक्ष सुंदर रीति से उत्कीर्णित गरुड़ है जिसका मुख मंदिर की ओर है तथा जो भगवान विष्णु का वाहन है।

नवरंग मंडप

नवरंग मंडप
नवरंग मंडप

विशाल नवरंग मंडप ४८ अत्यंत चमकीले एवं समृद्ध रूप से उत्कीर्णित स्तंभों से सुसज्जित है। प्रत्येक स्तंभ का आकार एवं उसकी शैली भिन्न हैं। इन स्तंभों में से मध्य स्थित चार स्तंभ सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं।

इन चार स्तंभों में से भी सर्वाधिक विलक्षण स्तंभ हैं, दक्षिण-पश्चिम दिशा में मोहिनी स्तंभ तथा दक्षिण-पूर्व दिशा में नरसिंह स्तंभ। तारे के आकार के मोहिनी स्तंभ पर १६ लंबी धारीदार नक्काशी है। उस पर आप मोहिनी रूप में भगवान विष्णु की विशाल प्रतिमा देखेंगे। नरसिंह स्तंभ पर उभरी हुई उत्कृष्ट नक्काशी एवं संरचनाएं हैं। ऐसा बताया जाता है कि किसी समय नरसिंह स्तंभ अपनी ही धुरी पर पत्थर की कीलों द्वारा गोल घूम सकता था किन्तु विमान के खंडन के पश्चात यह स्तंभ भी स्थिर हो गया है।

नवरंग मंडप के स्तम्भ
नवरंग मंडप के स्तम्भ

मध्य स्थित चार स्तंभों के ऊपरी कोने चार कोष्ठक प्रतिमाओं द्वारा अलंकृत हैं। ये प्रतिमाएं होयसल शिल्प कौशल के उत्कृष्ट नमूने हैं। ये प्रतिमाएं हैं:

• शुक भाषिणी – अपने पालतू तोते से वार्तालाप करती एक नारी
• रानी शांतलादेवी
• गंधर्व नृत्य
• केश शृंगार – स्नान के पश्चात अपने केशों से जल निचोड़ती एक नारी

नवरंग मंडप की कोष्ठक प्रतिमाएं
नवरंग मंडप की कोष्ठक प्रतिमाएं

गंधर्व नर्तकी एवं शांतलादेवी की प्रतिमाएं विशेषतः ध्यान देने योग्य हैं क्योंकि उनके उपर सज्जा-साधन अपने स्थान से हिल सकते हैं। कहा जाता है कि दक्षिण-पश्चिम दिशा में स्थित स्तंभ पर उत्कीर्णित रानी की केशसज्जा पर अलंकृत एक छोटा चक्र तथा उत्तर-पश्चिम दिशा में स्थित स्तंभ पर उत्कीर्णित नर्तकी की कलाई पर सज्जित कंगन घूम सकते हैं।

श्रृंगार करती मदनिका
श्रृंगार करती मदनिका

भीतरी छत

मंडप के मध्य, भीतरी छत वास्तव में पत्थर पर एक अत्यंत आकर्षक उत्कीर्णन है। छत का आकार दो संकेंद्रित वर्ग के मध्य उलटे कमल जैसा है। वर्ग का मध्य भाग उलटे शिवलिंग के समान है। आधार पर नरसिंह तथा मध्य में ब्रह्मा का प्रतीक कमल का पुष्प है। त्रिमूर्ति को पत्थर की एक शिला पर सांकेतिक रूप से प्रदर्शित किया गया है। इसे त्रिमूर्ति संगम भुवनेश्वरी कहा जाता है।

बेलूर के भीतर एवं आसपास स्थित अधिकतर होयसल मंदिर भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार को समर्पित हैं। उन्हे होयसल के वंशज पारिवारिक देव मानते हैं। मंडप के अग्रभाग पर छिद्रयुक्त गवाक्ष हैं जिन पर प्रकाश एवं वायु के आदान-प्रदान के लिए चौकोर छिद्र बने हुए हैं। यह चालुक्य अथवा होयसल वास्तुकला का प्रतीकात्मक चिन्ह है।

गर्भगृह

विष्णु केशव अभिषेक मूर्ति
विष्णु केशव अभिषेक मूर्ति

मंडप का पश्चिमी भाग गर्भगृह की ओर ले जाता है। गर्भगृह के भीतर आप चतुर्भुज मुद्रा में भगवान विष्णु की ६ फुट ऊंची तथा नाना प्रकार से अलंकृत अत्यंत नयनाभिराम प्रतिमा देख सकते हैं। मनमोहक प्रभामंडल युक्त यह प्रतिमा एक ३ फुट ऊंची पीठिका पर स्थापित है। भगवान विष्णु ने अपने ऊपरी दोनों हाथों में शंख एवं चक्र धारण किया हुआ है तथा निचले दोनों हाथों में कमल तथा गदा धारण किया है। उनके प्रभामंडल पर भगवान विष्णु के दस अवतारों की चक्रीय उत्कीर्णन की गई है।

चेन्ना केशव मंदिर के द्वारपाल
चेन्ना केशव मंदिर के द्वारपाल

भगवान विष्णु की प्रतिमा दोनों ओर से उनकी शक्तियों की प्रतिमाओं से घिरी हुई है। वे हैं श्रीदेवी तथा भूदेवी। भीतरी गर्भगृह का प्रवेशद्वार मकर तोरण तथा फिलग्री कलाकृतियों द्वारा सुसज्जित है। प्रवेशद्वार के ऊपर भगवान विष्णु तथा देवी लक्ष्मी की मूर्तियाँ हैं। द्वार के दोनों ओर दो द्वारपालों की अत्यंत अलंकृत तथा सूक्ष्मता से उत्कीर्णित भव्य प्रतिमाएं हैं। इनके नाम हैं जय तथा विजय।

नवरंग मंडप के उत्तरी द्वार के समीप स्थित प्राचीन कन्नड़ भाषा में लिखित एक शिलालेख के अनुसार भगवान को विजयनारायण भी कहा जाता है।

चेन्नाकेशव मंदिर की बाहरी भित्तियाँ

मुख्य मंदिर की बाहरी भित्तियों पर मानवों, पशुओं, देवी तथा देवताओं की प्रतिमाएँ भव्यता से उत्कीर्णित हैं।

नवरंग मंडप की भित्तियाँ सामाजिक ताने-बाने अर्थात जीवात्मा को दर्शाती हैं, वहीं गर्भगृह की भित्तियाँ पुराणों में दर्शित आध्यात्मिक जीवन व कथाओं का अर्थात परमात्मा का चित्रण करती हैं।

मंदिर की बाहरी भित्तियों का प्रत्येक भाग व प्रत्येक कोना सूक्ष्मता से उत्कीर्णित तथा भव्यता से अलंकृत है। भित्ति के निचले भाग पर आड़ी पट्टियों में हाथी, सिंह तथा लघु प्रतिमाएं हैं जिन पर भव्य अलंकरण हैं। इन आड़ी प्रतिमाओं की पंक्तियों को तोड़ती सी मध्य में विशाल खड़ी प्रतिमाएं हैं। ये प्रतिमाएं एकल शिला पर गढ़ी तथा शिलाओं के अन्तर्गठन पद्धति द्वारा भित्तियों से गूँथी हुई हैं। इसी प्रकार का शिलाओं का अन्तर्गठन आप मंदिर की भित्तियों के चारों ओर, छत से लटकती कँगनी में भी देख सकते हैं।

गज उत्कीर्णन

यहाँ की एक अत्यंत विशेष कलाकृति ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। यहाँ हाथियों के विभिन्न मुद्राओं के लगभग ६५० शिल्प थे जिनमें प्रत्येक छवि दूसरी छवि से भिन्न थी। बाहरी भित्ति एवं नवरंग मंडप व गर्भगृह के चारों ओर लटकते कँगनी के मध्य ३८ कोष्ठक शिल्प हैं। ये शिल्प फिलग्री शैली में रचित हैं तथा मदानिकाओं द्वारा सुशोभित हैं। इन मदानिकाओं की विभिन्न नृत्य मुद्राएँ एवं कार्यकलाप इस प्रकार हैं

• दर्पण में स्वयं को निहारती एक स्त्री
• एक स्त्री की साड़ी खींचता एक बंदर
• स्नान के पश्चात केश सँवारती एक स्त्री
• धनुष पर बाण का लक्ष्य साधती एक स्त्री
• त्रिभंगी मुद्रा में खड़ी एक स्त्री जिसकी देह तीन स्थानों पर तिरछी की हुई है।
• रुद्र वीणा बजाती एक स्त्री
• कटहल के फल पर बैठी मक्षिका की ओर जीभ लपलपाती छिपकली को देखती हुई एक स्त्री

चेन्ना केशव मंदिर की नर्तिकी
चेन्ना केशव मंदिर की नर्तिकी

ऐसी अनेक अलौकिक सुंदरियाँ शिलाओं पर उत्कीर्णित आप देख सकते हैं। गर्भगृह की भित्तियों पर अनेक पौराणिक दृश्य सुंदरता से उत्कीर्णित हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार है:

• हिरण्यकश्यप का वध करते नरसिंह
• महिषासुरमर्दिनी
• कैलाश पर्वत उठाए रावण
• सूर्य देवता
• अंधकासुर का वध करते शिव
• रामायण एवं महाभारत की कथाएं

नरसिंह
नरसिंह

उत्तर दिशा में एक मंच पर एक विशाल पदचिन्ह है। यह भगवान विष्णु का पदचिन्ह माना जाता है। यदि किसी कारणवश आपको भगवान के दर्शन प्राप्त नहीं हो पाते तो आप विष्णु के इन पदचिन्हों के दर्शन कर सकते हैं।

शिलालेख

मंदिर के उत्तरी द्वार की पूर्वी भित्तियों पर प्राचीन कन्नड़ भाषा में अनेक शिलालेख हैं जो मंदिर की संरचना, इतिहास एवं दान-दक्षिणा की विस्तृत जानकारी प्रदान करते हैं। नवरंग मंडप की ओर जाते उत्तरी तथा दक्षिणी द्वारों के दोनों ओर भगवान विष्णु के छोटे मंदिर हैं।

मुख्य मंदिर के अतिरिक्त इस संकुल में अनेक अप्रतिम छोटे-बड़े मंदिर हैं। जैसे कप्पे चेन्निगरय मंदिर, वीर नारायण मंदिर, सौम्यानकि मंदिर, आँडाल मंदिर, कल्याण मंडप अथवा विवाह प्रांगण, दीपस्तंभ, पाकगृह, जलकुंड इत्यादि।

चेन्नाकेशव मंदिर संकुल के अन्य मंदिर एवं तत्व

दीपस्तंभ

दीपस्तंभ - चेन्ना केशव मंदिर - बेलूर
दीपस्तंभ – चेन्ना केशव मंदिर – बेलूर

मंदिर परिसर के भीतर, गोपुरम के बायीं ओर, दक्षिण दिशा में ४२ फुट ऊंचा विशाल दीपस्तंभ है जिसे एकल शिला में उकेरा गया है।

इसे गुरुत्वाकर्षण विरोधी स्तंभ भी कहा जाता है। एक ऊंची पीठिका पर यह स्तंभ बिना संबल अपने ही भार पर खड़ा है। उत्तरी दिशा में इस स्तंभ का आधार कुछ उठा हुआ है जिसके फलस्वरूप पीठिका एवं स्तंभ के मध्य अंतर है। इस अंतर में से कागज का टुकड़ा आसानी से पार हो सकता है। इसे देख मैंने दांतों तले उंगली दबा ली। कुशल और अद्भुत शिल्प कौशल का यह एक जीवंत उदाहरण है।

मेरे स्थानीय गाइड के अनुसार एक समय इस स्तंभ के चारों ओर सीढ़ियाँ थीं जिसकी सहायता से दीपस्तंभ के दीप जलाए जाते थे। वर्तमान में स्तंभ के समीप जाने एवं पीठिका पर चढ़ने की अनुमति नहीं है।

कप्पे चेन्निगरय मंदिर

दक्षिण दिशा में स्थित यह मंदिर मुख्य मंदिर का प्रतिरूप माना जाता है। इसका निर्माण राजा विष्णुवर्धन की रानी शांतला देवी ने करवाया था। इस मंदिर के भीतर भगवान विष्णु के चेन्निगरय रूप की अत्यंत मनमोहक प्रतिमा है। इस प्रतिमा की स्थापना ठीक उसी समय हुई थी जब मुख्य मंदिर में केशव के प्रतिमा की स्थापना की जा रही थी। इस मंदिर में दो गर्भगृह हैं। एक गर्भगृह कप्पे चेन्निगरय के लिए तथा दूसरा गर्भगृह वेणुगोपाल के लिए है। गर्भगृह के भीतर अन्य देवताओं की भी प्रतिमाएं थीं, जैसे गणेश, दुर्गा तथा लक्ष्मी नारायण।

गर्भगृह के भीतर की मूर्ति के विषय में एक किवदंती प्रसिद्ध है। ऐसा कहा जाता है कि जकनचारी नामक एक प्रसिद्ध शिल्पकार था जो कैदल अथवा कृदपुरा गाँव का निवासी था। उसे इस मंदिर की शिल्पकारी का उत्तरदायित्व दिया गया था। उसका पुत्र धनकांचारी पिता की खोज में बेलूर आया था क्योंकि उसने कई वर्षों से पिता को देखा नहीं था।

मुख्य प्रतिमा की शिल्पकारी

जैसे ही उसने अपने पिता को मुख्य प्रतिमा को गढ़ते देखा, उसने तुरंत पिता से कहा कि वह जिस शिला द्वारा प्रतिमा का गढ़न कर रहा है उसमें खोट है। कई वर्षों पश्चात देखने के कारण वह अपने पुत्र को पहचान नहीं पाया तथा उसकी धृष्टता पर क्रुद्ध हो गया। उसने प्रतिज्ञा की कि यदि शिला में किसी भी प्रकार का खोट पाया गया तो वह अपने हाथ काट लेगा। धनकांचारी ने शिला पर चंदन का लेप लगाया तथा उसे सूखने के लिए छोड़ दिया। दूसरे दिन देखा गया कि मूर्ति की नाभि स्थल के समीप एक भाग अब भी नम था। छेनी द्वारा ताड़ित करने पर वहाँ से जल की कुछ मात्रा बाहर आयी तथा साथ में एक मेंढक भी बाहर आया। मेंढक को कन्नड़ भाषा में कप्पे कहा जाता है।

पुत्र ने अपना परिचय दिया किन्तु वह अपने पिता को अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करने से रोक नहीं पाया। पिता शिल्पकार ने अपने वचनों का पालन करते हुए अपने हाथ काट लिए। ऐसा माना जाता है कि उसी दिन से मुख्य मंदिर के देव को कप्पे चेन्निगरय कहा जाता है। यह कथा आगे कहती है कि भगवान विष्णु ने जकनचारी को आज्ञा दी कि वह अपने मूल गाँव में विष्णु को समर्पित एक और मंदिर बनाए। जकनचारी ने भगवान विष्णु की आज्ञा का पालन किया। मंदिर बनाते ही जकनचारी के हाथ वापिस आ गए। तभी से उसके गाँव का नाम कैदल पड़ गया जिसका अर्थ है वापिस आया हाथ। यह मंदिर अब भी टुमकुर जिले के कैदल गाँव में स्थित है।

वीर नारायण मंदिर

यह एक छोटा तथापि अत्यंत सुंदर मंदिर है जो पश्चिम दिशा में स्थित है। यह मंदिर वीर नारायण अथवा लक्ष्मी नारायण को समर्पित है। इस मंदिर की बाहरी भित्तियाँ ब्रह्मा, शिव, पार्वती, सरस्वती, भैरव तथा महिषासुरमर्दिनी की सुंदर प्रतिमाओं से सुशोभित है। अन्य समकालीन होयसल मंदिरों की संरचनाओं के समान यह मंदिर भी एक उठे हुए मंच पर स्थापित है। इसमें एक गर्भगृह, सुकनासी तथा एक नवरंग मंडप है।

सौम्यानकी मंदिर

केशव मंदिर के दक्षिण-पश्चिम दिशा में देवी श्रीदेवी को समर्पित यह एक महत्वपूर्ण मंदिर है। इसमें एक गर्भगृह, सुकनासी तथा एक मंडप है। मंदिर एक विमान अथवा शिखर से अलंकृत है जिसके विषय में कहा जाता है कि यह केशव मंदिर के उस मूल विमान अथवा शिखर के समान है जिसे कालांतर में गिरा दिया गया था। बाहरी भित्तियाँ अनेक शिल्पों से सुसज्जित हैं।

रंगनायकी मंदिर (आँडाल मंदिर)

केशव मंदिर के उत्तर-पश्चिम दिशा में स्थित आँडाल मंदिर एक संत कवियित्री को समर्पित है जिन्हे महालक्ष्मी का अवतार माना जाता है। दक्षिण भारत के १२ वैष्णव अलवर संतों में वे इकलौती स्त्री हैं। मंदिर की भित्तियों पर कई देवी-देवताओं की छवियाँ उत्कीर्णित हैं। मुख्य देवी-देवताओं में लक्ष्मी, मोहिनी, वेणुगोपाल तथा लक्ष्मीनारायण सम्मिलित हैं। मंदिर में एक गर्भगृह, सुकनासी तथा एक मंडप है। शिखर पर सुनहरा कलश है।

अंडाल अथवा रंगनायकी मंदिर
अंडाल अथवा रंगनायकी मंदिर

मुख्य मंदिर परिसर में स्थित अन्य मंदिर रामानुजाचार्य, कृष्ण, नरसिंह, आंजनेय तथा रामचन्द्र को समर्पित हैं। वीर नारायण मंदिर के समीप वाहन मंडप है जहां पारंपरिक रूप से शोभायात्रा में उपयोग किए गए रथ जैसे वाहनों को रखा जाता था। परिसर के दक्षिण-पूर्वी कोने में एक कल्याण मंडप भी है जहाँ विवाहोत्सव जैसे शुभ आयोजन किए जाते हैं। परिसर के उत्तर-पश्चिम कोने में धान्य संचयन के लिए भंडार तथा सामूहिक पाकशाला स्थित है।

वासुदेव सरोवर

परिसर के उत्तर-पूर्व कोने में, गोपुरम के दाहिने ओर एक छोटी कल्याणी अर्थात सीढ़ी युक्त जलकुंड अथवा बावड़ी है। जलकुंड के समीप स्थित शिलालेख के अनुसार इसे वासुदेव सरोवर भी कहा जाता है। जलकुंड के दूसरी ओर दो हाथियों की शिला प्रतिमाएं हैं। कुंड के समीप आप दो छोटे मंदिर भी देखेंगे। कुंड की ओर जाने वाला द्वार उस समय बंद था।

बेलूर चेन्नाकेशव मंदिर के मंदिर उत्सव

वार्षिक रथोत्सव बेलूर का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उत्सव है। यह उत्सव मार्च-अप्रैल मास में, उगादि अर्थात कन्नड़ नूतन वर्ष के १२ दिवसों पश्चात आयोजित किया जाता है। यह उत्सव दो दिवसों तक मनाया जाता है जब एक विशाल काष्ठी रथ पर उत्सव मूर्ति की शोभायात्रा निकली जाती है। प्रथम दिवस मंदिर के पूर्वी दिशा के भागों में तथा दूसरे दिवस मंदिर के अन्य भागों में शोभायात्रा निकली जाती है। इस वार्षिक उत्सव के उपलक्ष्य में एक जात्रा का भी आयोजन किया जाता है जो १० दिवसों तक चलता है।

यात्रा सुझाव

नवरंग मंडप की छत
नवरंग मंडप की छत

• बेलूर बंगलुरु से २०० किमी की दूरी पर है। बंगलुरु से इसकी एक दिवसीय यात्रा की जा सकती है। सर्वाधिक समीप स्थित नगर हासन है जहां से बेलूर एक घंटे गाड़ी चलकर पहुंचा जा सकता है।
• मेरा सुझाव है कि आप हासन में अपना पड़ाव डालें ताकि बेलूर के साथ साथ आप हैलेबिडु भी उसी दिन देख सकते हैं। हैलेबिडु भी बेलूर के समान होयसल शिल्पकला का उत्कृष्ट नमूना है।
• हासन कर्नाटक के अन्य महत्वपूर्ण नगरों एवं शहरों से सड़क एवं रेल मार्ग द्वारा सुगमता से जुड़ा हुआ है। कर्नाटक राज्य परिवहन की बसें नियमित रूप से बेलूर एवं अन्य महत्वपूर्ण नगरों के मध्य दौड़ती हैं।
• हासन में अच्छे अतिथिगृह उपलब्ध हैं। अतः यहाँ ठहरना उत्तम होगा।
• बेलूर दर्शन का सर्वोत्तम काल अक्टूबर से मार्च मास के मध्य का समय है।
• मंदिरों के दर्शन का सर्वोत्तम समय प्रातःकाल शीघ्र तथा दोपहर के अंतिम प्रहर का है।
• भोजन तथा जलपान के लिए मंदिर के समीप अनेक अच्छे जलपानगृह तथा भोजनालय उपलब्ध हैं।
• मंदिर के समीप स्थित दुकानों में शिला द्वारा निर्मित अनेक आकर्षक कलाकृतियाँ उपलब्ध हैं जिन्हे आप इस स्थान की स्मारिका के रूप में ले जा सकते हैं।
• मेरा सुझाव है कि आप गाइड की सुविधाएं अवश्य लें। गाइड संघों ने उनके शुल्क निर्देशित कर दिए हैं जो ३०० रुपये हैं।

यह संस्करण अतिथि संस्करण है जिसे श्रुति मिश्रा ने इंडिटेल इंटर्नशिप आयोजन के अंतर्गत प्रेषित किया है।


श्रुति मिश्रा व्यावसायिक रूप से बैंक में कार्यरत हैं। उन्हे यात्राएं करना, विभिन्न स्थानों के सम्पन्न विरासतों के विषय में जानकारी एकत्र करना तथा विभिन्न स्थलों के विशेष व्यंजन चखना अत्यंत प्रिय हैं। उन्हे पुस्तकों से भी अत्यंत लगाव है। उन्हे पाककला में भी विशेष रुचि है। वर्तमान में वे बंगलुरु में निवास करती हैं। उनकी तीव्र इच्छा है कि वे विरासत के धनी भारत की विस्तृत यात्रा करें तथा अपने अनुभवों पर आधारित एक पुस्तक भी प्रकाशित करें।


अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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वृन्दावन के दर्शनीय स्थल – मंदिर, घाट व संग्रहालय https://inditales.com/hindi/vrindavan-ke-mukhya-mandir-ghat-van-sangrahalay/ https://inditales.com/hindi/vrindavan-ke-mukhya-mandir-ghat-van-sangrahalay/#respond Wed, 01 Jul 2020 02:30:58 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1878

एक समय वृन्दावन केवल एक वन मात्र था। हिन्दू शास्त्रों के अनुसार ब्रज भूमि में कुल १२ वन थे। वृन्दावन उनमें से एक है। यमुना नदी के तीर स्थित इस वन में श्री कृष्ण ने गोपिकाओं के संग अनेक बाल लीलाएं रचाई हैं। यहीं चीर घाट पर स्नान के लिए आयी गोपियों के वस्त्र चुराकर […]

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एक समय वृन्दावन केवल एक वन मात्र था। हिन्दू शास्त्रों के अनुसार ब्रज भूमि में कुल १२ वन थे। वृन्दावन उनमें से एक है। यमुना नदी के तीर स्थित इस वन में श्री कृष्ण ने गोपिकाओं के संग अनेक बाल लीलाएं रचाई हैं। यहीं चीर घाट पर स्नान के लिए आयी गोपियों के वस्त्र चुराकर वे वृक्ष पर चढ़ गए थे। यहीं समीप ही उन्होंने कालिया नाग का वध भी किया था।

वृन्दावन की दीवार पर राधा कृष्ण
वृन्दावन की दीवार पर राधा कृष्ण

इसी वन में उन्होंने रास लीला रचाई थी। आपको विश्वास नहीं होगा किन्तु ऐसा माना जाता है की कृष्ण अब भी प्रत्येक रात्रि एक अन्य छोटे वन में गोपियों संग रास रचाते हैं।

वृन्दावन का संक्षिप्त इतिहास

वृन्दावन का शब्दशः अर्थ है पवित्र तुलसी का वन। किवदंतियों के अनुसार श्री कृष्ण की एक गोपिका सखी का नाम वृंदा था।

यह क्षेत्र वास्तव में विस्मृति में लुप्त एक वन था। चैतन्य महाप्रभु १६ वी. सदी में श्री कृष्ण से संबंधित स्थलों की खोज करते यहाँ आए थे। जैसे जैसे शास्त्रों में उल्लेख किया गया था, वैसे वैसे वे स्थलों से तादाम्य स्थापित कर रहे थे। उसी समय वृन्दावन नगरी की उत्पत्ति हुई थी। आज यह छोटे-बड़े मंदिरों तथा वानरों से भरी एक देवनगरी है। इसके वर्तमान स्वरूप को देख इसे वन मानने के लिए आपकी अपार कल्पना शक्ति की आवश्यकता पड़ेगी।

मेड़ता एवं मेवाढ की १६ वीं. सदी की भक्ति कवियित्री मीराबाई ने भी इस स्थान में पर्याप्त समय व्यतीत किया था। उनकी स्मृति में यहाँ एक मंदिर भी है जो उन्हे समर्पित है। यद्यपि भूलोक में उन्होंने अंतिम श्वास गुजरात में द्वारका के समीप बेट द्वारका में लिया था जब चिरकाल के लिए अपने परम प्रिय श्री कृष्ण से उनका मिलन हो गया था।

औरंगजेब के शासनकाल में इन क्षेत्र के मंदिरों पर आतताईयों ने भरपूर आक्रमण किया था। कल्पना कीजिए, दिल्ली एवं आगरा जैसी मुगलों की राजधानियाँ एवं उनके मध्य स्थित मंदिरों से भरा यह क्षेत्र। यहाँ के अनेक मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया था। देवी-देवताओं की अनेक मूर्तियों को यहाँ से अन्यत्र स्थानांतरित करना पड़ा था।

वृन्दावन के महत्वपूर्ण मंदिर

वृन्दावन का पावन क्षेत्र मंदिरों से भरा हुआ है। इन सब के दर्शन करना तभी संभव है जब आप यहाँ निवास कर रहे हों। अधिकतर तीर्थयात्री उन्ही मंदिरों के दर्शन करते हैं जिनसे वे अथवा उनके गुरु संबंधित हों। इन के साथ वे कुछ लोकप्रिय अथवा प्रसिद्ध मंदिरों के दर्शन करते हैं।

सर्वाधिक प्रसिद्ध मंदिर – श्री बाँके बिहारी मंदिर

श्री बांके बिहारी मंदिर - वृन्दावन
श्री बांके बिहारी मंदिर – वृन्दावन

श्री बाँके बिहारी मंदिर इस पावन नगरी का सर्वाधिक लोकप्रिय तथा इसी कारण सर्वाधिक भीड़भाड़ भरा मंदिर है। आप यहाँ किसी भी समय आयें, मंदिर में भक्तों व दर्शनार्थियों का तांता लगा रहता है। मंदिर में स्थित बाँके बिहारी जी की मूर्ति स्वामी हरीदास को समीप स्थित निधिवन में प्राप्त हुई थी। १८ वीं. सदी में इसी मूर्ति के चारों ओर मंदिर की संरचना की गई। मंदिर के बाहर स्थित मार्ग पर स्वामीजी का स्वयं का मंदिर भी है।

श्री बांके बिहारी मंदिर के पुजारी
श्री बांके बिहारी मंदिर के पुजारी

ऐसी मान्यता है कि इस मूर्ति के भीतर राधा एवं कृष्ण दोनों बसते हैं। इस मंदिर की एक अनोखी विशेषता है कि यह पूर्वान्ह ९ बजे के पश्चात ही खुलता है। यहाँ किसी भी सामान्य मंदिर के समान प्रातःकाल की मंगल सेवा नहीं होती।

इस मंदिर की वास्तुकला एक हवेली के समरूप है। मध्य में एक खुला प्रांगण है जहां खड़े होकर आप भगवान के दर्शन करते हैं। एक स्तंभ पर पीतल में निर्मित कामधेनु एवं उसके शावक की अप्रतिम प्रतिमा है।

श्री बांके बिहारी मंदिर की कामधेनु
श्री बांके बिहारी मंदिर की कामधेनु

आप इस मंदिर का माखन मिश्री प्रसाद खाना ना भूलें। यह अत्यंत ही स्वादिष्ट होता है। इस प्रकार का प्रसाद इस मंदिर के अतिरिक्त केवल द्वारका के द्वारकाधीश मंदिर में ही दिया जाता है।

स्वामी हरिदास जी का पुराना मंदिर - वृन्दावन
स्वामी हरिदास जी का पुराना मंदिर – वृन्दावन

यूँ तो वृन्दावन, मथुरा एवं ब्रज के सभी मंदिरों में होली मनाई जाती है, तथापि यह मंदिर होली का उत्सव मनाने के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। अधिक जानकारी के लिए मंदिर का वेबस्थल देखें।

गोविंद देव मंदिर

वृन्दावन का गोविन्द देव मंदिर
वृन्दावन का गोविन्द देव मंदिर

१६ वीं. सदी में जयपुर के राजा मान सिंह द्वारा निर्मित यह मंदिर कभी एक भव्य मंदिर रहा होगा। लाल बलुआ पत्थर द्वारा निर्मित यह मंदिर एक समय सात तलों का मंदिर था। इसके ऊपरी ३ से ४ तलों को औरंगजेब ने ध्वस्त कर दिया था। वर्तमान में यह मंदिर शिखर रहित है। शिखर के बिना भी यह मंदिर अत्यंत विशाल प्रतीत होता है। अपने स्वर्णिम काल में यह अखंडित मंदिर कितना भव्य रहा होगा, आज हम केवल कल्पना ही कर सकते हैं। गलियों में भ्रमण करते समय अपने लाल रंग के साथ यह मंदिर आसपास की दुकानों के समूह  में पृथक छवि प्रस्तुत करता है।

१८ वीं. सदी में जब इस मंदिर पर आक्रमण किया गया था तब भगवान की प्रतिमा को जयपुर स्थानांतरित किया गया था। उसी विग्रह अर्थात प्रतिमा की अब जयपुर के गोविंद देव जी मंदिर में प्रतिदिन ७ बार पूजा-अर्चना की जाती है।

श्री रंगनाथजी मंदिर – एक दक्षिण भारतीय मंदिर

दक्षिण भारतीय शैली में श्री रंगनाथ जी मंदिर
दक्षिण भारतीय शैली में श्री रंगनाथ जी मंदिर

१९ वीं. सदी के मध्य काल में निर्मित यह मंदिर भारत भर के कृष्ण भक्तों के संगम का द्योतक है। चटक रंगों का ऊंचा गोपुरम आपको तुरंत तमिल नाडु का स्मरण करा देगा। यद्यपि गोपुरम पर स्थित झरोखे एवं अलंकृत मुंडेर स्थानीय वास्तुशिल्प की झलक दिखाते हैं तथापि मंदिर परिसर का अंतरंग आपको वस्तुतः दक्षिण भारत पहुँचा देता है।

इस मंदिर में भी दक्षिण भारत के मंदिरों के समान रथ जात्रा का उत्सव मनाया जाता है। इस मंदिर के पुजारी भी तमिल नाडु के मंदिरों के पुजारियों के समान रूखा व्यवहार करते हैं।

इस मंदिर का निर्माण मथुरा के तीन प्रतिष्ठित सेठों ने करवाया था। वे हैं, लक्ष्मीचंद सेठ, राधाकृष्ण सेठ तथा गोविंददास सेठ।

श्री राधा वल्लभ मंदिर

श्री राधा वल्लभ मंदिर - वृन्दावन
श्री राधा वल्लभ मंदिर – वृन्दावन

इस मंदिर का निर्माण श्री राधावल्लभ संप्रदाय के संस्थापक गोस्वामी हरिवंश महाप्रभू ने करवाया था जिन्हे भगवान कृष्ण की बाँसुरी का अवतार माना जाता है। यह मंदिर मेरे अब तक के देखे सबसे जीवंत मंदिरों में से एक है। कुछ लोग संगीत वाद्य बजा रहे थे जिसकी तान पर भक्तगण नाच रहे थे तथा होली खेल रहे थे।

गर्भगृह के भीतर मुरली बजाते कृष्ण की प्रतिमा है जबकि राधा की उपस्थति केवल उनके मुकुट द्वारा दर्शाई गई है। है ना यह मंदिर की अनोखी विशेषता?

इस मंदिर का दैनिक श्रृंगार आप इस फेसबुक पन्ने पर देख सकते हैं।

श्री मदन मोहन मंदिर

श्री मदन मोहन मंदिर
श्री मदन मोहन मंदिर

इस क्षेत्र के अनेक मध्यकालीन मंदिरों की भांति यह मंदिर लाल बलुआ पत्थर द्वारा निर्मित है। यह ऊंचा मंदिर कलिदाह घाट के समीप द्वादशादित्य टीला नामक पहाड़ी पर स्थित है। इस मंदिर तक पहुँचने के लिए आपको कुछ सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ेंगी। इस मंदिर का निर्माण मुल्तान के एक सेठ ने करवाया था। इस मंदिर की मूल प्रतिमा को राजस्थान के एक सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित किया गया था। अब उसी प्रतिमा के प्रतिरूप की यहाँ आराधना की जाती है।

मुख्य मंदिर ऊंचा एवं संकरा है। इसके एक ओर एक छोटा मंदिर है। मंदिर से लगा हुआ, लाल बलुआ पत्थर में ही निर्मित एक मंडप भी है जो मंदिर से जुड़ा हुआ नहीं है।

श्री राधा रमण मंदिर

राधारमण मंदिर वृन्दावन
राधारमण मंदिर वृन्दावन

गोपाल भट्ट गोस्वामी द्वारा निर्मित १६वीं. सदी का यह मंदिर अत्यंत मनभावन है। वे ७ शिलाओं अथवा शालिग्रामों के साथ यहाँ आए थे। शालिग्राम नेपाल के गण्डकी नदी में पाया जाने वाला एक पत्थर है जिसे विष्णु का स्वरूप माना जाता है। गोस्वामीजी उनकी नित्य पूजा अर्चना करते थे तथा रात्री के समय उन्हे सींक की टोकरी से ढँक देते थे। एक दिन प्रातः जब उन्होंने टोकरी उठाई, एक शालिग्राम पत्थर कृष्ण की मूर्ति में परिवर्तित हो गई थी। इस मंदिर में कृष्ण की उसी मूर्ति की पूजा की जाती है। चूंकि यह मूर्ति स्वयं प्रकट हुई थी, इसे जीवंत अथवा जाग्रत मूर्ति माना जाता है।

राधा रमण का शाब्दिक अर्थ है राधा को रमने वाला अर्थात राधा का मन मोहने वाला, जो कोई और नहीं, अपितु कृष्ण हैं। मंदिर के विषय में अधिक जानकारी आपको मंदिर के वेबस्थल पर प्राप्त हो सकती है।

राधा दामोदर मंदिर

राधा दामोदर मंदिर वृन्दावन
राधा दामोदर मंदिर वृन्दावन

यह भी १६वीं. सदी में निर्मित मंदिर है जिसे गोस्वामी श्रीला जीवा ने बनवाया था। मंदिर की मूर्तियाँ उन्हे अपने काका श्रीला रूप गोस्वामी से प्राप्त हुई थी। यह मंदिर भी यहाँ से जयपुर स्थानांतरित किया गया था। १८वीं. सदी में यह मंदिर जयपुर से वापिस यहाँ लाया गया। यह उन कुछ मंदिरों में से एक है जिसे अपना मूल स्थान पुनः प्राप्त हुआ है।

यह मंदिर गिरिराज चरण शिला के लिए प्रसिद्ध है। यह शिलाखंड, जिस पर श्री कृष्णजी के पदचिन्हों की छाप है, गिरिराज पर्वत से लाया गया है। इस पर गौमाता के पदचिन्हों की भी छाप है। इस मंदिर के विषय में अधिक जानकारी आप मंदिर के वेबस्थल से प्राप्त कर सकते हैं।

गरुड़ गोविंद मंदिर

गरुड़ गोविन्द मूर्ति - वृन्दावन
गरुड़ गोविन्द मूर्ति – वृन्दावन

यह मंदिर छटीकरा में गरुड़ गोविंद कुंड के समीप स्थित है। इस मंदिर की विशेषता है कि इस मंदिर के प्रमुख देव को गरुड़ की सवारी करते दर्शाया गया है। गरुड़ की सवारी करते भगवान विष्णु को आप सामान्यतः किसी मंदिर में नहीं देखेंगे। विग्रह अर्थात प्रतिमा को देखने के लिए आपको पुजारीजी से निवेदन करना पड़ेगा, अन्यथा उनका मूल रूप भव्य शृंगार से ढँका रहता है।

प्राचीन गरुड़ मूर्ति
प्राचीन गरुड़ मूर्ति

परिसर में एक अन्य छोटे से मंदिर के भीतर गरुड़ की पत्थर की मूर्ति है जिसमें वे हाथ जोड़कर बैठे हुए हैं। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ की यह मूर्ति सम्भवतः किसी स्तंभ के ऊपर स्थापित थी। किन्तु इसके विषय में विस्तृत जानकारी देने के लिए वहाँ कोई जानकार उपलब्ध नहीं था।

बनखंडी महादेव मंदिर

बनखंडी महादेव मंदिर
बनखंडी महादेव मंदिर

यह प्राचीन शिव मंदिर नगर के प्रमुख बाजार की एक गली में स्थित है। ऐसा माना जाता है कि यह वही स्थान है जहां श्रीला सनातन गोस्वामी को शिव का वरदान प्राप्त हुआ था। मंदिर के भीतर काली की एक विशाल मूर्ति है। राधा कृष्ण तो इस पावन नगरी के प्रत्येक मंदिर में उपस्थित होते हैं।

वंशीवट तथा गोपेश्वर महादेव मंदिर

वंशीवट वह स्थान है जहां श्री कृष्ण शरद पूर्णिमा के दिन बंसी बजाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि बंसी की तान सुनते ही राधाजी एवं अन्य गोपिकाएं अपने सभी कार्य वहीं छोड़कर इस स्थान की ओर दौड़ पड़ती थीं। वे कृष्ण की रासलीला का भाग बन जाती थीं तथा घर वापिस जाने के लिए कतई इच्छुक नहीं रहती थीं।

इसी परिसर में एक छोटा शिव मंदिर भी है जो शिव के गोपेश्वर महादेव स्वरूप को समर्पित है। ऐसा माना जाता है कि कृष्ण की रासलीला में सम्मिलित होने के लिए महादेव ने स्वयं एक गोपिका का रूप धरा था। जैसे ही कृष्ण की दृष्टि उन पर पड़ी, उन्होंने उन्हे उनके नाम योगेश्वर के स्थान पर गोपेश्वर कहकर पुकारा था।

कात्यायनी देवी मंदिर

वृन्दावन का कात्यायनी देवी मंदिर
वृन्दावन का कात्यायनी देवी मंदिर

यह मंदिर देवी के कात्यायनी रूप को समर्पित है। मुझे बताया गया कि यहाँ नवरात्रि का उत्सव अत्यंत धूमधाम से मनाया जाता है। इस मंदिर में देवी की अष्टधातु में निर्मित मूर्ति स्थापित है। मुझे स्मरण है, अत्यधिक तादात में उपस्थित वानर मुझे भयभीत कर रहे थे तथा मैं देवी का छायाचित्र भी नहीं ले पा रही थी। तब पुजारीजी वानरों को डराने के लिए एक लकड़ी ले कर आए तथा मुझे निर्भय होकर चित्र लेने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि, मैं साथ हूँ, तुम बिना भय के चित्र ले लो। एक आनंदित स्थल पर रहने की निडरता!

इस्कॉन वृन्दावन – कृष्ण बलराम मंदिर

इस्कॉन मंदिर सभी हिन्दू मंदिरों में सर्वाधिक उत्तम रखरखाव युक्त मंदिर है। यद्यपि इसके अनुयायी अधिकतर गैर-भारतीय हैं। १९७५ में निर्मित यह मंदिर इस माटी के दोनों भ्राताओं का उत्सव मनाता है, अर्थात कृष्ण एवं बलराम।

इस्कॉन का इस नगरी में एक अक्षय पात्र इकाई भी है जिसमें तीर्थ यात्रियों के ठहरने की भी व्यवस्था है। अपनी पिछली यात्रा के समय मैंने यहाँ का रसोईघर देखा था जहां हजारों शालेय विद्यार्थियों के लिए मध्यान्ह आहार बनाया जाता है। किस प्रकार वे भाप एवं स्वचालित मशीनीकरण द्वारा पोषक एवं स्वास्थ्यवर्धक भोजन बनाते हैं, यह देखना अत्यंत मनोरंजक होता है।

वृन्दावन प्रेम मंदिर

वृन्दावन का प्रेम मंदिर
वृन्दावन का प्रेम मंदिर

यह इस नगरी का नवीनतम तथा अत्यंत लोकप्रिय मंदिर है। मैंने जब कुछ वर्षों पूर्व इसके दर्शन किए थे, तब संगमरमर द्वारा निर्मित यह मंदिर निर्माणाधीन था। कृपालु महाराज द्वारा बनाये गए इस मंदिर में दो गर्भगृह हैं। एक गर्भगृह राधा कृष्ण को तथा दूसरा गर्भगृह राम सीता को समर्पित है। यह एक विशाल मंदिर है जिसमें श्वेत संगमरमर पर राधा कृष्ण की रंगबिरंगी छवियाँ रची हुई हैं। यह मंदिर वैष्णव समाज के अनेक संतों को भी सम्मानित करता है।

वैष्णो देवी मंदिर

यह अपेक्षाकृत नवीन मंदिर है जिसमें अपने सिंह की पीठ पर विराजमान दुर्गा माँ की विशाल प्रतिमा है। उनके नीचे एक गुफा के भीतर देवी के नौ रूपों के विग्रह हैं।

वृन्दावन के अन्य दर्शनीय स्थल

वृन्दावन की पावन नगरी में मंदिरों के अतिरिक्त भी अनेक दर्शनीय स्थल हैं जहां आप जा सकते हैं।

निधि वन

निधि वन
निधि वन

एक पवित्र वन जहां आप पैदल सैर कर सकते हैं तथा राधा को समर्पित मंदिर के दर्शन कर सकते हैं। यह मंदिर चूड़ियों एवं श्रंगार की अन्य वस्तुओं से भरा हुआ है। ऐसा माना जाता है कि आज भी यहाँ प्रत्येक रात्रि राधा एवं कृष्ण का मिलन होता है। संध्या के समय पुजारीजी रंग महल के भीतर उनका बिछौना सजाते हैं तत्पश्चात वहाँ से दूर चले जाते हैं। अंधकार होते ही भीतर किसी को भी ठहरने की अनुमति नहीं है। प्रचलित किवदंतियों के अनुसार जिसने भी इस नियम का पालन नहीं किया तथा जानबूझकर वहीं ठहर गए, वे प्रातः मृत पाए गए।

निधि वन के परिसर में कवि एवं संगीतज्ञ स्वामी हरिदासजी की समाधि है। उन्हे ललिता सखी का अवतार माना जाता है। वे यहीं अपनी साधना करते थे। अकबर के दरबार के एक सदस्य, सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ तानसेन यहीं स्वामी हरिदासजी से भेंट करने आए थे। उनकी कुछ रचनाएं यहाँ शिलाओं पर भी उत्कीर्णित हैं।

निधि वन के पेड़
निधि वन के पेड़

श्री बाँके बिहारी मंदिर के भीतर स्थापित मूर्ति, जिसका मैंने उपरोक्त उल्लेख किया था, यहीं प्राप्त हुई थी।

आप जब आसपास घूमेंगे, तब आपको कुंज बिहारी को समर्पित एक मंदिर दिखायी देगा। निधि वन में ललित कुंड नामक एक बावड़ी भी है। यहाँ कई वृक्षों को सिंदूर अर्पण करने की प्रथा है। उन्हे देख ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वे लाल विवाह-वस्त्रों में सजी वधुएं हैं।

कालियादेह

यह एक अत्यंत मनोहारी मंदिर है जो आपको श्री कृष्ण द्वारा कालिया नाग के वध की कथा का स्मरण कराएगा। यह मंदिर यमुना के कलियादेह घाट के समीप है। लाल बलुआ पत्थर में निर्मित यह एक छोटा सा पुराना मंदिर है जो कालिया वध की कथा का आधुनिक प्रस्तुतीकरण करता है।

कालियादेह
कालियादेह

इसके एक ओर कदंब का वृक्ष है। ऐसा बताया जाता है कि जब कालिया के जहर से यमुना का सम्पूर्ण जल विषैला हो गया था तब यही एक वृक्ष था जो सकुशल जीवित बचा था। आज इसकी इच्छापूर्ति वरदायिनी वृक्ष के रूप में पूजा की जाती है।

सेवा कुंज

निधि वन के समान यह भी कदाचित निकुंज नामक एक वनीय क्षेत्र था। यह वही स्थल है जिसे रासलीला के स्थान के रूप में जाना जाता है।

वृन्दावन शोध संस्थान संग्रहालय

वृन्दावन की काष्ठकला
वृन्दावन की काष्ठकला

वृन्दावन शोध संस्थान के परिसर में स्थित यह एक सुंदर संग्रहालय है। आप यहाँ स्थानीय कलाकृतियाँ, राधा कृष्ण का विभिन्न माध्यमों द्वारा प्रदर्शन तथा अनेक पांडुलिपियाँ देख सकते हैं। यहाँ अनेक मनमोहक चित्रकलाएँ, सचित्र पांडुलिपियाँ तथा अनेक कलाकृतियाँ प्रदर्शित किए गए हैं, जैसे बाँके बिहारी मंदिर से लाई गई प्राचीन बाँसुरी तथा ब्रज के विभिन्न उत्सवों का विस्तृत वर्णन इत्यादि।

श्री बांके बिहारी मंदिर की पिचकारी
श्री बांके बिहारी मंदिर की पिचकारी

मेरा सुझाव है कि आप इस संग्रहालय में पर्याप्त समय बिताएं ताकि आप कला के माध्यम से वृन्दावन नगरी को भली भांति समझ पाएंगे। संग्रहालय की दुकान से आप शोध पुस्तकें खरीद भी सकते हैं।

खण्डेलवाल ग्रंथालय

खंडेलवाल ग्रंथालय
खंडेलवाल ग्रंथालय

यह पुस्तक की दुकान ब्रज पर लिखी अनेक पुस्तकों का भंडार है जिसमें ब्रज का इतिहास तथा ब्रज के मंदिरों में गायी जाने वाली होली गीतों का संकलन प्रमुख हैं। वैसे भी मुझे स्थानीय पुस्तकों की दुकानों में जाना अत्यंत भाता है। ऐसी दुकानें बहुधा अब भी अपनी पुरानी पद्धति से चलती हैं जो मुझे बीते दिनों का स्मरण कराती हैं। इन दुकानों के मालिक एवं कर्मचारियों से पुस्तकों के विषय में चर्चा करना मुझे विशेष भाता है। उन्हे अपनी दुकान की प्रत्येक पुस्तक के विषय में सम्पूर्ण जानकारी होती है। वे केवल आप से आपकी इच्छित पुस्तक अथवा  विषय पूछते हैं, तत्पश्चात उस विषय में सर्वोत्तम पुस्तक आपके समक्ष लाकर रख देते हैं। यदि उनके पास उस विषय में पुस्तक ना हो तो वे आपको अन्य दुकानों के सुझाव देने में भी पीछे नहीं हटते।

यमुना नदी में नौका विहार

आप यहाँ कुछ समय यमुना के घाट पर व्यतीत कर सकते हैं। यदि वातावरण सुहाना हो तो नौका सवारी का भी आनंद उठा सकते हैं।

और पढ़ें: मथुरा की यमुना नदी में नौका विहार

वृन्दावन परिक्रमा

वृन्दावन के चारों ओर एक पंचक्रोशी (पाँच कोस की ) परिक्रमा आयोजित की जाती है। यह यात्रा लगभग १० की.मी. लंबी है जिसे लगभग तीन घंटों में आसानी से पूर्ण किया जा सकता है। परिक्रमा पथ की सम्पूर्ण जानकारी आप इस वेबस्थल से प्राप्त कर सकते हैं।

यह परिक्रमा आप किसी भी दिन, किसी भी समय कर सकते हैं। यह परिक्रमा आप किसी भी स्थान से आरंभ कर सकते हैं, किन्तु इसका समापन उसी स्थान पर होना चाहिए जहां से आपने आरंभ किया था। कई भक्तगण यह परिक्रमा एकादशी के पावन दिवस पर करते हैं। परिक्रमा करते समय आप किसी मंत्र का उच्चारण करते रहें तो उत्तम होगा। यह आपका ध्यान अपने लक्ष पर केंद्रित रखने में सहायक होगा। कुछ भक्त परिक्रमा के लिए उपवास भी रखते हैं। उपवास रखना आपका निजी विकल्प व निर्णय होगा। यह आवश्यक नियम नहीं है।

परिक्रमा में पैदल चलना कठिन कदापि नहीं है। आप बिना जूते-चप्पलों के भी आसानी से चल सकते हैं, जैसा कि सामान्यतः किया जाता है।

वृन्दावन के मंदिरों में आयोजित विभिन्न उत्सव

  • वृन्दावन के विषय में प्रचलित कहावत है, ७ वार, ९ त्यौहार। अर्थात ब्रज में एक सप्ताह में सात वार एवं ९ त्यौहार होते हैं। जो स्थल कृष्ण के बालपन में उनका क्रीड़ास्थल था, वहाँ प्रत्येक दिवस एक उत्सव के समान है।
  • होली यहाँ का सर्वाधिक लोकप्रिय उत्सव तथा पर्व है जिसे देखने दूर-सुदूर से पर्यटक ब्रजभूमि आते हैं। ‘मथुरा के वृन्दावन में होली’ मेरा यह संस्मरण आपको इस होली की विस्तृत जानकारी देगा एवं प्रत्यक्ष ब्रज की होली के दर्शन कराएगा।
  • कृष्ण जन्माष्टमी अर्थात कृष्ण का जन्मदिवस इस नगरी का सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं विशालतम उत्सव है। इसके १५ दिवस पश्चात राधाष्टमी अर्थात राधा के जन्म का उत्सव मनाया जाता है।
  • प्रत्येक एकादशी के दिन मंदिरों में उत्सव का आयोजन किया जाता है।
  • कुछ उत्सव अत्यंत स्थानीय हैं, जैसे कृष्ण द्वारा कसं के वध का उत्सव अथवा कसं वध मेला। अन्य उत्सवों में लट्ठे का मेला, रथ का मेला इत्यादि सम्मिलित हैं।
  • कवि सम्मेलन ब्रज का अत्यंत प्रचलित आयोजन है। यदि आप ब्रज बोली समझ सकते हैं तो यह कवि सम्मेलन अत्यंत मनोरंजक व रोचक होता है।
  • वृन्दावन परिक्रमा वर्ष भर आयोजित की जाती है।

वृन्दावन के स्वादिष्ट व्यंजन अवश्य चखें

मथुरा के पेड़े मथुरा वृन्दावन के मंदिरों का विशेष एवं प्रिय चढ़ावा है। आप इन्हे अवश्य चखें। मथुरा में ये पेड़े कैसे बनाए जाते हैं इस पर मैंने एक संस्करण लिखा है। इसे भी अवश्य पढ़ें।

ब्रज भूमि में मेरा प्रिय व्यंजन है कचोड़ी, तत्पश्चात बेड़मी पूरी जो केवल सुबह के समय ही उपलब्ध होती है।

यहाँ की लस्सी भी अत्यंत स्वादिष्ट होती है। गर्मियों में जलजीरा भी अत्यंत प्रचलित है। आप जब भी वृन्दावन आयें मौसम के अनुसार वहाँ के प्रत्येक व्यंजन का आस्वाद लें। भले ही ये वस्तुएं आपके नगरों में भी मिलती हों किन्तु प्रत्येक स्थान का अपना एक विशेष स्वाद होता है।

वानरों का उत्पात

आपकी वृन्दावन यात्रा में वानर अवश्य खलल डाल सकते हैं। ये वानर आपको प्रत्येक मंदिर, प्रत्येक गली तथा प्रत्येक घाट पर मिलेंगे। ये आप पर किसी भी वस्तु के लिए हमला कर सकते हैं। उनकी प्रिय वस्तुएं हैं, मोबाईल फोन, कैमरा, चश्मे तथा हाथ में पकड़े अथवा लटके पर्स। बाँके बिहारी मंदिर की गलियों में मैंने स्वयं उन्हे मार्ग पर चश्मा पहनकर चलते लोगों के ऊपर छलांग लगाते, चश्मा छीनते तथा उन्हे तोड़कर मजा करते देखा है। यदि आपके पास खाने-पीने की कुछ वस्तु हो तो उनसे बचकर यहाँ से जाना लगभग असंभव है।

कुछ वानरों की विशेष रुचि होती है जैसे फ्रूटी। यदि उन्होंने आपकी कोई वस्तु छीन ली हो तो उन्हे फ्रूटी खरीदकर दे दें। वे आपकी वस्तु वापिस कर देंगे। वहाँ के स्थानीय लोगों अथवा पुजारी को उनकी प्रिय वस्तु की जानकारी अवश्य होती है।

मुझ पर भी वानरों ने राधा वल्लभ मंदिर में हमला किया था। एक वानर मेरा कैमरा छीन कर ले गया तो दूसरा मेरे गले में लटका मेरा पर्स छीनने लगा था। उसने लगभग मेरा दम घोंट दिया था। यूँ तो आपको ब्रज भूमि में लगभग सभी स्थानों पर वानरों का अस्तित्व दृष्टिगोचर होगा, वह चाहे मथुरा हो या गोवर्धन, बरसाना हो अथवा गोकुल, किन्तु वृन्दावन में पाए जाने वाले वानरों से अधिक उपद्रवी कदाचित ही कहीं होंगे।

अतः नगर में कहीं भी जाते समय इस तथ्य के प्रति जागरूक रहें।

वृन्दावन कैसे पहुँचें?

वृन्दावन मथुरा से १० किलोमीटर उत्तर में, आगरा से ५० किलोमीटर तथा दिल्ली से लगभग १५० किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यदि आप दिल्ली से सड़क मार्ग द्वारा पहुंचना चाहते हैं तो आप प्रथम वृन्दावन पहुंचेंगे, तत्पश्चात मथुरा। वर्तमान में ये दोनों लगभग जुड़वा नगरों में परिवर्तित हो चुके हैं।

वृन्दावन सड़क तथा रेल मार्ग द्वारा भारत के सभी प्रमुख स्थलों से जुड़ा हुआ है। निकटतम विमानतल नई दिल्ली है।

वृन्दावन में भ्रमण करने के लिए ई-रिक्शा सर्वोत्तम साधन है। आप उपरोक्त उल्लेखित तीर्थ मार्ग पर पैदल भी भ्रमण कर सकते हैं।

नगर में ठहरने के लिए सभी श्रेणी के अतिथिगृह उपलब्ध हैं। कई यात्री यहाँ उपलब्ध आश्रमों में भी ठहर सकते हैं जैसे इस्कॉन मंदिर का आश्रम।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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हैदराबाद के चिलकुर बालाजी मंदिर – वीसा दिलवाने वाले भगवान https://inditales.com/hindi/visa-devta-chilkur-balaji-hyderabad/ https://inditales.com/hindi/visa-devta-chilkur-balaji-hyderabad/#comments Wed, 10 Jun 2020 02:30:20 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1995

चिलकुर बालाजी का शाब्दिक अर्थ है छोटे बालाजी। चिलकुर बालाजी मंदिर हैदराबाद तथा उसके आसपास के क्षेत्रों का सर्वाधिक प्रसिद्ध मंदिर है। यह इच्छा-पूर्ति मंदिर के नाम से भी प्रसिद्ध है। यहाँ के भक्तों की इच्छाओं में सर्वोपरि इच्छा  विदेश जाने के लिए वीसा पाने की होती है। इस मंदिर के भगवान को वीसा का […]

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चिलकुर बालाजी का शाब्दिक अर्थ है छोटे बालाजी। चिलकुर बालाजी मंदिर हैदराबाद तथा उसके आसपास के क्षेत्रों का सर्वाधिक प्रसिद्ध मंदिर है। यह इच्छा-पूर्ति मंदिर के नाम से भी प्रसिद्ध है। यहाँ के भक्तों की इच्छाओं में सर्वोपरि इच्छा  विदेश जाने के लिए वीसा पाने की होती है। इस मंदिर के भगवान को वीसा का भगवान माना जाता है, अर्थात वह भगवान जो विशेषतः भक्तों के पासपोर्ट में वीसा अंकित करवाने की इच्छा पूर्ण करते है।

वीसा देवता चिलकुर बालाजी का मंदिर
वीसा देवता चिलकुर बालाजी का मंदिर

मुझे जब इस मंदिर के विषय में ज्ञात हुआ, मुझमें इसके दर्शन करने की एवं इसके विषय में अधिक जानकारी एकत्र करने की इच्छा जागृत हुई। यही इच्छा एक दिन मुझे इस मंदिर तक ले आई। प्रारंभ में मैंने यहाँ सप्ताह के अंत में आने का निश्चय किया था किन्तु मंदिर के एक नियमित भक्त ने मुझे आगाह किया कि सप्ताहांत में यहाँ भक्तों की अत्यधिक भीड़ हो जाती है। अतः हमने एक सोमवार के दिन यहाँ आने की योजना बनाई। उस दिन भी भीड़ थी किन्तु उनकी संख्या अधिक नहीं थी।

मंदिर की ओर जाने वाला मार्ग खेतों, किसानों के घरों तथा मृगवनी राष्ट्रीय उद्यान के प्रवेश द्वार के समीप से होकर जाता है। यह मंदिर उस्मान सागर झील के समीप स्थित है। हैदराबाद शहर के भीड़भाड़ भरे मार्गों से जब हम मंदिर पहुंचे, हमारा चित्त शांत व प्रसन्न हो गया।

हैदराबाद का चिलकुर बालाजी मंदिर

चिलकुर बालाजी हैदराबाद के प्राचीनतम मंदिरों में से एक है। इसका निर्माण १७ वीं. शताब्दी में अक्कना एवं मदन्ना के शासनकाल में किया गया था। अक्कना एवं मदन्ना भक्त रामदास के काका हैं। भक्त रामदास कर्नाटक शैली के शास्त्रीय संगीत के विद्वान थे तथा भगवान राम के परम भक्त थे।

मंदिर की ओर जाते मार्ग पर एक सम्पन्न बाजार है। अन्य मंदिरों के बाहर जो आम वस्तुओं की विक्री की जाती है, उन वस्तुओं के साथ यहाँ श्वेत एवं हरित संगमरमर में बनी छोटी कलाकृतियों की भी विक्री की जाती है। सम्पूर्ण हैदराबाद में केवल इसी स्थान पर मैंने ऐसा सम्मिश्रण देखा।

१०८ परिक्रमा

१०८ परिक्रमा गणक पत्र
१०८ परिक्रमा गणक पत्र

एक विचित्र वस्तु की विक्री ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। एक पेन के साथ एक पुट्ठे का पत्रक जिस पर १ से १०८ तक की संख्या लिखी हुई थी। यह कैसा पत्रक है? इसका क्या उपयोग है? प्रथम दृष्टि यह तंबोला खेल के पत्रक के समान प्रतीत हो रहा था। ऐसा सोचते हुए मुझे खेद भी हो रहा था किन्तु मैं तंबोला खेल का मंदिर से कोई संबंध ढूंढ नहीं पा रही थी। कैसे ढूंढ पाती? ना तो यह तंबोला का पत्रक था, ना ही इस मंदिर का उस खेल से कोई संबंध। फिर किसी ने मुझे जानकारी दी कि इच्छा पूर्ति के पश्चात भक्तगण मंदिर की १०८ प्रदक्षिणा अर्थात परिक्रमा करते हैं। किन्तु १०८ प्रदक्षिणा करते समय कभी कभी गणना चूक जाती है। ऐसे समय यह पत्रक अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता है। प्रत्येक प्रदक्षिणा के पश्चात संबंधित संख्या को चिन्हित किया जा सकता है। मंदिर के भीतर हम उपयोग किये गए ऐसे अनेक रंगबिरंगे पत्रक सर्वत्र देखने वाले थे।

चिलकुर बालाजी मंदिर एक छोटा सा मंदिर है, यह जानकारी मुझे पूर्व से ही थी। किन्तु प्रत्यक्ष देखने पर यह मेरी कल्पना से भी अधिक लघु प्रतीत हुआ। मंदिर की सादी श्वेत भित्तियों की पृष्ठभूमि पर एक छोटा किन्तु रंगबिरंगा चमकता हुआ गोपुरम है जिसके ऊपर सुनहरा ध्वजस्तम्भ है। भक्तगणों की भीड़ को संयमित पंक्तियों में सीमित करने के लिए चारों ओर बाड़ लगी हुई थीं। चूंकि उस दिन अधिक भीड़ नहीं थी, हम सीधे चिलकुर बालाजी मंदिर के परिसर पहुंच गए। यहाँ भक्तगण मंत्रोच्चारण के साथ मंदिर की प्रदक्षिणा कर रहे थे।

इच्छा पूर्ति के लिए ११ परिक्रमा

चिलकुर बालाजी मंदिर में परिक्रमा लगते भक्तगण
चिलकुर बालाजी मंदिर में परिक्रमा लगते भक्तगण

मेरे साथियों ने ११ प्रदक्षिणा करने का निश्चय किया जो किसी भी इच्छा की मांग करने के लिए आवश्यक है। मैं भी उनके साथ हो ली। परिसर में एक सूचना पट्टिका पर लिखा था, ‘भगवान पर ध्यान केंद्रित करें, परिक्रमा की संख्या पर नहीं’। प्रदक्षिणा करते भक्तगण “गोविंदा, गोविंदा” का नाद कर रहे थे जबकि ध्वनि-विस्तारक के माइक पर एक भक्त किसी दूसरे मंत्र का उच्चारण कर रहा था। कुछ किशोर वय के बालक यहाँ-वहाँ घूमकर जल की बोतल की विक्री कर रहे थे।

११ परिक्रमा के पश्चात हमने मंदिर में प्रवेश किया जहाँ एक फलक सूचना दे रहा था कि दर्शन के समय अपनी आँखें बंद ना करें। मुख्य द्वार का चौखट चांदी का था जिसके ऊपरी भाग पर वैष्णवी देवी की छवि उत्कीर्णित थी। मंदिर के भीतर राजस्थानी कलाशैली में उत्कीर्णित एक और तोरण था। मंदिर के भीतर भगवान की प्रतिमा पर वस्त्रों एवं अलंकारणों की इतनी परतें थीं कि इन परतों के अतिरिक्त कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं था। भगवान की छवि की केवल कल्पना ही कर सकते हैं।

इस मंदिर में कहीं भी दान पेटी अथवा हुंडी नहीं है। मंदिर में किसी भी प्रकार का दान भी स्वीकार नहीं किया जाता।

मंदिर की कथा

मंदिर में पूजा हेतु सामग्री
मंदिर में पूजा हेतु सामग्री

दर्शन के पश्चात हम मंदिर के पृष्ठभाग में गए जहाँ हमें मंदिर के मुख्य पुरोहित श्री चिलकुर मदभूषी गोपालकृष्णन से भेंट करना था। उनका परिवार गत ४०० वर्षों से मंदिर की देखरेख कर रहा है। उन्होंने हमें मंदिर से संबंधित अनेक कथाएँ तथा किवदंतियाँ सुनाईं।

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एक प्राचीन किवदंती हमें बताती है कि किस प्रकार इस मंदिर का निर्माण किया गया था। ऐसा कहा जाता है कि एक भक्त प्रत्येक वर्ष तिरुपति बालाजी के मंदिर जाता था। एक वर्ष अस्वस्थता के कारण वह बालाजी के दर्शनार्थ नहीं जा पाया था। बालाजी ने उसके स्वप्न में आकर उससे चिंता छोड़ने के लिए कहा। स्वप्न में बालाजी ने कहा कि वे उसके समीप स्थित एक जंगल में हैं तथा उन्होंने उन तक पहुँचने का मार्ग भी बताया। बालाजी के बताए स्थान पर जब भक्त पहुँचा तब उसे उस स्थान पर छुछूँदर की बाँबी दिखी। उस बाँबी से  श्रीदेवी एवं भूदेवी सहित बालाजी की मूर्ति प्राप्त हुई। कालांतर में इन मूर्तियों के लिए एक मंदिर का निर्माण किया गया जिसे चिलकुर बालाजी मंदिर अर्थात छोटे बालाजी मंदिर के नाम से जाना गया। वे भक्त जो बालाजी के मुख्य मंदिर में नहीं जा पाए, वे समीप स्थित इस मंदिर में बालाजी के दर्शन कर सकते हैं।

मंदिर के वेबस्थल में एक अन्य दंतकथा का उल्लेख है –

सन् १९६३में, अर्थात चीनी आक्रमण के एक वर्ष पश्चात अम्मवरु की प्रतिमा की स्थापना की गई थी। जब आक्रमणकारी स्वेच्छा से पीछे हटे तब उस घटना का उत्सव मनाने के लिए अम्मवरू का नामकरण राज्य लक्ष्मी किया गया। इस प्रतिमा की विशेषता यह है कि उनके तीन हाथों में कमल के पुष्प हैं तथा चौथा हाथ कमलचरण की ओर संकेत करता है जो शरणागति के सिद्धांत को दर्शाता है।

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जो कथाएं मुझे पुरोहितजी ने सुनाईं उनकी रचना उनके जीवनकाल में हुई थीं। जैसे वीसा की इच्छा भगवान के समक्ष रखना तथा उन इच्छाओं की पूर्ति होना। उन्होंने बताया कि इन मान्यताओं का आरंभ सन् १९८० से हुआ था। उन्होंने कहा कि मंदिर में एक कुएं की खुदाई के समय वे मंदिर की परिक्रमा कर रहे थे। जैसे ही उन्होंने ११ परिक्रमा सम्पूर्ण की तभी कुएं से जल बाहर आया। अपनी क्रतज्ञता व्यक्त करने के लिए उन्होंने मंदिर की १०८ प्रदक्षिणा की। तभी से यह परंपरा आरंभ हो गई। भक्तगण भगवान के समक्ष अपनी इच्छा व्यक्त करते समय मंदिर की ११ परिक्रमा करते हैं। जब उनकी इच्छा पूर्ण हो जाती है तो वे पुनः यहाँ आकर मंदिर की १०८ परिक्रमा अर्थात प्रदक्षिणा लगाते हैं।

आप सबको यह स्मरण होगा कि सन् १९८० से सन् १९९० के मध्य नवयुवक-नवयुवतियों में विदेश जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त करने की इच्छा अपनी चरम सीमा पर थी। इसके लिए उन्हे वीसा प्राप्त करना अत्यंत आवश्यक था। यही इच्छा लिए अनेक नवयुवक-नवयुवतियाँ तथा उनके माता-पिता चिलकुर बालाजी मंदिर आने लगे। तभी से चिलकुर बालाजी का नवीन नाम हो गया, वीसा के देवता। इनमें से अनेकों की इच्छा-पूर्ति भी हुई होगी। विद्यार्थियों एवं उनके पालकों की सहायता करने के लिए किसी ने यह अनोखा पत्रक तैयार किया होगा। अब मुझे समझ आया कि क्यों मंदिर में इतने लोग गणना पत्रक पकड़ कर मंत्रों का उच्चारण करते हुए परिक्रमा लगा रहे थे।

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अंत में स्मित हास्य झलकाते हुए गोपालकृष्णन जी ने कहा कि यह युवाओं का मंदिर है।

अधिकतर मंदिरों में माता-पिता अपने बच्चों को ले कर जाते हैं। किन्तु इस मंदिर में बच्चे अपने माता-पिता को ले कर जाते हैं। जो इच्छाएं अधिकतर व्यक्त की जाती हैं वे हैं, प्रवेश परीक्षा में सफलता प्राप्ति, इच्छित व्यक्ति से विवाह, नौकरी प्राप्ति इत्यादि के साथ मुख्यतः वीसा की प्राप्ति जो आज के युवाओं की प्रमुख मांग बनती जा रही है।

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यहाँ आकर कितने लोगों की इच्छा पूर्ण होती है इसका मुझे अनुमान नहीं है। किन्तु परिक्रमा करते इन भक्तों के मुख पर छाई असीम श्रद्धा एवं संपूर्ण समर्पण की छटा मैंने स्वयं देखी एवं अनुभव की है। ऐसा कहते हैं ना, श्रद्धा एवं विश्वास बड़े बड़े पर्वतों को हिला सकते हैं, कदाचित यह भी उसी का एक प्रकार हो।

चिलकुर बालाजी मंदिर की यात्रा से संबंधित कुछ जानकारियाँ

यह मंदिर हैदराबाद शहर से लगभग ३३ किलोमीटर की दूरी पर, उस्मान सागर झील के समीप स्थित है।

आंध्र प्रदेश पर्यटन विकास निगम (APTDC) का हरिथ अतिथिगृह मंदिर से केवल १०० मीटर दूर स्थित है। मंदिर के समीप ठहरने एवं भोजन करने के लिए यह एक उत्तम स्थान है।

सप्ताहांत, विशेषतः शुक्रवार एवं शनिवार के दिनों में प्रतिदिन लगभग एक लाख से भी अधिक भक्तगण मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं। अतः आप अपनी यात्रा नियोजित करते समय इसका विशेष ध्यान रखें।

मंदिर प्रातः ५ बजे से रात्रि ८ बजे तक खुला रहता है।

मंदिर के भीतर छायाचित्रीकरण की अनुमति नहीं है।

अधिक जानकारी के लिए मंदिर का यह वेबस्थल देखें।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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नाथद्वारा में श्रीनाथजी जी अथवा ठाकुर जी की हवेली https://inditales.com/hindi/shrinathji-thakur-ji-ki-haveli-nathdwara/ https://inditales.com/hindi/shrinathji-thakur-ji-ki-haveli-nathdwara/#respond Wed, 27 Nov 2019 02:30:59 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1594

नाथद्वारा है राजस्थान में उदयपुर के उत्तर-पूर्व में स्थित श्रीनाथजी की एक छोटी सी नगरी! बनास नदी के तट पर स्थित एक ऐसी नगरी जहाँ नाथद्वारा एवं श्रीनाथजी समानार्थी हो जाते हैं। सम्पूर्ण नगरी ‘ठाकुर जी की हवेली’ के चारों ओर बसती है। ‘ठाकुर जी की हवेली’! जी हाँ, नाथद्वारा मंदिर को भक्तगण इसी नाम […]

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नाथद्वारा है राजस्थान में उदयपुर के उत्तर-पूर्व में स्थित श्रीनाथजी की एक छोटी सी नगरी! बनास नदी के तट पर स्थित एक ऐसी नगरी जहाँ नाथद्वारा एवं श्रीनाथजी समानार्थी हो जाते हैं। सम्पूर्ण नगरी ‘ठाकुर जी की हवेली’ के चारों ओर बसती है।

नाथद्वारा के श्रीनाथजी की पिछवई
नाथद्वारा के श्रीनाथजी की पिछवई

‘ठाकुर जी की हवेली’! जी हाँ, नाथद्वारा मंदिर को भक्तगण इसी नाम से पुकारते हैं। यह मंदिर विष्णु के कृष्ण अवतार के श्रीनाथजी स्वरुप को समर्पित है। नाथद्वारा एक प्रकार से ब्रज भूमि का इस नगरी में अवतरण है। जी हाँ, कृष्ण एवं कृष्णलीला की भूमि, ब्रज भूमि का छोटा प्रतिरूप है नाथद्वारा।

कृष्ण का श्रीनाथजी अवतार

नाथद्वारा की गलियों में श्रीनाथ जी के चित्र
नाथद्वारा की गलियों में श्रीनाथ जी के चित्र

श्रीनाथजी की प्रतिमाओं तथा चित्रों में उन्हें सदैव गोवर्धन पर्वत को अपने बाएं हाथ की कनिष्ठा से उठाये तथा दायाँ हाथ कटि पर जमाये दिखाया जाता है। यह चित्रण उस घटना की स्मृति में है जब कृष्ण ने इंद्र का गर्व चूर करने के लिए गोवर्धन पर्वत को बाएं हाथ की कनिष्ठा पर उठाया था तथा अतिवृष्टि के प्रकोप से बचाने के लिये ब्रजवासियों को उसके नीचे शरण दी थी। इसी घटना के कारण कृष्ण को गोवर्धन गिरिधारी भी कहा जाता है। गोवर्धन गिरिधारी अर्थात् गोवर्धन पर्वत को धारण करने वाले!

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नाथद्वारा में कृष्ण को बाल रूप में पूजा जाता है। ठाकुरजी की हवेली के सर्व क्रियाकलाप एक ७ वर्षीय बालक के चारों ओर केन्द्रित रहते हैं। उनसे ठीक वैसा ही व्यवहार किया जाता है जैसे एक माता अपने बालक से करती है। जैसे माता अपने बालक का श्रृंगार करती है, उसे भोजन कराती है। नगरवासियों के लिए यह एक मंदिर नहीं, अपितु श्रीनाथजी का निवास स्थान है। इसीलिए वे इसे मंदिर नहीं, अपितु ठाकुरजी की हवेली कहते हैं।

हवेली के शीर्ष पर स्थित कलश एवं चक्र, यह दो ही ऐसे चिन्ह हैं जिन्हें देख इसे मंदिर कहा जा सकता है।

नाथद्वारा के श्रीनाथजी मंदिर का इतिहास

कहा जाता है कि १७ वी. शताब्दी के अंत में औरंगजेब सभी हिंदू मंदिरों को नष्ट करने के अभियान पर था। इससे बचाने के लिए, श्रीनाथजी की प्रतिमा को रथ पर बिठाकर मथुरा के समीप स्थित गोवर्धन से स्थानांतरित कर आगरा के जाया गया था। तत्पश्चात उनके रथ को दक्षिण दिशा में आगे बढ़ाया गया। कहा जाता है कि नाथद्वारा पहुंचते ही रथ के पहिये रुक गए। भक्तों ने इसे संकेत जाना कि भगवान् कृष्ण अर्थात् भगवान् श्रीनाथजी ने यहाँ बसने का निश्चय किया है। उनके लिए हवेली का निर्माण किया गया। इसके भीतर उनकी प्रतिमा स्थापित की गयी। सन् १६७२ से वे यहीं निवास करते आ रहे हैं। मेवाड़ के महाराणाओं ने मंदिर को संरक्षण प्रदान किया था।

ठाकुर जी की हवेली का एक द्वार
ठाकुर जी की हवेली का एक द्वार

जिस रथ पर सवार वे नाथद्वारा आये थे, वह रथ आप अब भी मंदिर परिसर के भीतर देख सकते हैं। श्रीनाथजी की प्रतिमा काले संगमरमर की एकल शिलाखंड पर तराशी गयी है।

भक्तों की आस्था है कि जैसे ही उनके लिए उपयुक्त मंदिर की रचना हो जायेगी, श्रीनाथजी अपनी ब्रजभूमि अथवा गोवर्धन अवश्य लौटेंगे।

नाथद्वारा मंदिर एवं उसके अनुष्ठान

ठाकुर जी की हवेली को रंगते हुए कलाकार
ठाकुर जी की हवेली को रंगते हुए कलाकार

मंदिर के पुजारियों में से एक, हर्ष पांडे जी ने मुझे मंदिर दिखने की कृपा की। उन्होंने मुझे मंदिर के सभी भाग दिखाए तथा मंदिर में किये जाने वाले दैनिक अनुष्ठानों के विषय में भी जानकारी दी। मंदिर के दैनन्दिनी कार्यकलापों को पूर्ण करते अधिकारियों से भी मैंने भेंट की।

पण्डे जी ने मुझे भक्ति का पुष्टिमार्ग समझाया तथा वल्लभाचार्य के कुल की जानकारी दी जो इस मंदिर की देखरेख करते हैं।

उन्होंने मुझे मंदिर के विभिन्न कक्ष भी दिखाए जो इस प्रकार हैं:
• दूधघर – दूध संचय कक्ष
• पानघर – पान के पत्तों का संचय कक्ष
• मिश्रीघर – मिश्री का संचय कक्ष
• पेडाघर – पेडे का संचय कक्ष
• फूलघर – पुष्प संचय कक्ष
• रसोईघर – पाक कक्ष
• गहनाघर – गहनों का कक्ष
• अश्वशाला – घुड़साल
• बैठक – बैठने का कक्ष
• चक्की – सोना एवं चांदी द्वारा निर्मित चक्की जिसका अब भी मंदिर का भोजन बनाने में प्रयोग किया जाता है।

श्रीनाथजी के दिन भर के प्रसाद
श्रीनाथजी के दिन भर के प्रसाद

श्रीनाथजी के दर्शन

भक्तगण मंदिर में श्रीनाथजी के ८ विभिन्न दर्शन प्राप्त सकते हैं। ये ८ दर्शन बालक श्रीनाथजी के एक दिवस के ८ विभिन्न क्रियाकलापों तथा उन्हें अर्पित ८ भोजन से साम्य रखता है। कृष्ण को यहाँ एक प्रतिमा नहीं, अपितु एक जीता-जागता बालक माना जाता है। एक बालक के सामान उन्हें प्रातः उठाया जाता है, खिलाया जाता है तथा स्नान, श्रृंगार, क्रीड़ा एवं निद्रा जैसी दैनिक क्रियाएं कराई जाती हैं। श्रीनाथजी के ये ८ दर्शन जो भक्तगण प्राप्त कर सकते हैं, इस प्रकार हैं:

मंगल दर्शन

ये दिवस का प्रथम दर्शन है। इस दर्शन के लिए मंदिर के मुख्य द्वार नहीं खोले जाते क्योंकि बालक कृष्ण अभी अभी निद्रा से जागे हैं। इस समय आवश्यकता है कि बालक श्रीनाथजी का ध्यान ना भटके तथा उनका मन बाहर खेलने जाने के लिए ना मचले। इसी प्रकार बाहर एकत्र भक्तों के जमावड़े से वे विचलित भी ना हों। ऋतु के अनुसार उन्हें वस्त्र पहनाये जाते हैं, ग्रीष्म ऋतु में हलके सूती वस्त्र तथा शीत ऋतु में गर्म ऊनी वस्त्र। तत्पश्चात, रात्रि के अन्धकार की दुष्ट आत्माओं को दूर करने के लिए आरती की जाती है।

श्रृंगार दर्शन

मंगल दर्शन के एक घंटे के उपरांत श्रीनाथजी का श्रृंगार किया जाता है। उन्हें सुन्दर वस्त्र एवं आभूषणों द्वारा अलंकृत किया जाता है। अलंकार के समय उन्हें दर्पण दिखाया जाता है ताकि वे स्वयं को निहार सकें। उन्हें सूखे मेवे तथा मिष्टान्न अर्पित किये जाते हैं। इन सबके पश्चात ही उन्हें उनकी प्रिय बांसुरी दी जाती है।

ग्वाल दर्शन

इस समय भगवान् श्रीनाथजी को सूचना दी जाती है कि उनके गौशाला की सर्व गायें स्वस्थ हैं। श्रीनाथजी को माखन मिश्री तथा अन्य दुग्ध-जन्य खाद्य पदार्थ चढ़ाए जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस समय वे अपने सखाओं के संग क्रीड़ा करते हैं।

राजभोग दर्शन

यह सम्पूर्ण दिवस की सर्वाधिक विस्तृत आरती है जब बाल गोपाल को दिवस का प्रमुख भोज अर्पित किया जाता है। मेरा सौभाग्य था कि मैं राजभोग दर्शन के समय इस मंदिर में उपस्थित थी। सर्वत्र इत्र एवं सुगन्धित पदार्थों का छिड़काव करते हुए छत से इस दर्शन की घोषणा की जाती है। इस दर्शन के उपरांत आगामी तीन घंटे मंदिर बंद रखा जाता है ताकि भगवान् तनिक विश्राम कर सकें।

उत्थापन दर्शन

दोपहर के समय, बाल श्रीनाथजी को, निद्रा उपरांत, शंख ध्वनि द्वारा जगाया जाता है। यह दर्शन संकेत है कि ग्वालों एवं गौओं के वापिस घर लौटने का समय हो चुका है।

भोग दर्शन

इस दर्शन के समय स्वामिनीजी को हल्का भोजन अर्पित किया जाता है। चौंक गए ना? यहाँ स्वामिनीजी राधाजी हैं या कदाचित यमुनाजी हैं। उन्हें यहाँ श्रीनाथजी के संग दर्शाया जाता है। पुष्टि मार्ग के अनुयायी यमुना जी को ही श्रीनाथ जी की पटरानी मानते हैं।

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आरती

यह दर्शन संध्या के समय प्राप्त होते हैं जब भगवान् ग्वाले के रूप में जंगल में गाएं चराकर घर वापिस लौटते हैं। तब माता उन पर पड़ी किसी भी दुष्ट आत्मा की परछाई दूर करने हेतु उनकी आरती करती है। उन्हें हल्का भोजन अर्पित किया जाता है। उन्हें उनकी बांसुरी दी जाती है जिससे वे स्वयं एवं वहां उपस्थित लोगों का मनोरंजन करते हैं।

शयन

अब निद्रा का समय हो चला है। इसकी घोषणा रसोइये को अगले दिवस शीघ्र आने की सूचना द्वारा की जाती है। भोजन के साथ पान-बीड़ा अर्पण किया जाता है। ये दर्शन वर्ष में केवल छः मास ही की जाती है। ऐसा मान्यता है कि वर्ष के शेष छः मास श्रीनाथजी ब्रजवासियों को दर्शन देने ब्रज चले जाते हैं।

सर्व दर्शनों के समय दिवस के समयानुसार उपयुक्त राग-रागिनी गाई एवं बजायी जाती है। प्रत्येक दर्शन हेतु सम्बंधित भक्ति कवि हैं। इनके विषय में आप मंदिर के वेबस्थल से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

मुझे रसोईघर के भीतर झांकने का भी अवसर मिला। मैंने देखा भक्तगण ढेर सारी तरकारियाँ स्वच्छ कर उन्हें काट रहे थे। पाण्डे जी ने मुझे बताया कि मंदिर में भगवान् को अर्पण करने हेतु केवल स्थानीय मौसमी भाजी-तरकारियाँ ही पकाई जाती हैं। यह भोजन श्रीनाथजी की सेवा करने वाले पुजारियों एवं उनके परिवारजनों को भी परोसा जाता है।

पिछवाई चित्रकला एवं अन्य कलात्मक क्रियाकलाप

काष्ठ पर श्रीनाथ जी की प्रतिमूर्ति
काष्ठ पर श्रीनाथ जी की प्रतिमूर्ति

श्रीनाथजी की काली प्रतिमा ने एक नवीन चित्रकला की शैली को जन्म दिया जिसे पिछवाई के नाम से जाना जाता है। पिछवाई चित्रकला का अक्षरशः अर्थ है पीछे लटकाना। इन्हें नाथद्वारा चित्रकारी भी कहा जाता है क्योंकि इस प्रकार की चित्रकला का सम्बन्ध नाथद्वारा से जोड़ा जाता है।

पिछवाई चित्र बड़े आकार के चित्र होते हैं जिन्हें प्राकृतिक रंगों का प्रयोग कर सूती कपड़ों पर किया जाता है। कृष्ण लीलाओं को चित्रित करते इन चित्रों को भगवान् श्रीनाथ जी की प्रतिमा के पीछे लटकाया जाता है। जब आप यहाँ की सड़कों में घूमेंगे तब आपको यहाँ कई चित्रकार कागज, लकड़ी अथवा कपड़े पर चित्रकारी में मग्न दृष्टिगोचर होंगे। इन चित्रों की विषय-वस्तु सदैव श्रीनाथजी ही होते हैं। पिछवाई चित्रकारी की शैली को मेवाड़ के सूक्ष्म चित्रकारी शैली की ही एक शाखा माना जाता है। अंतर केवल चित्रकारी का माध्यम है जो पिछवाई चित्रकला में कपड़ा है।

इस चित्रकला में मुख्यतः काले एवं सुनहरे रंगों का प्रयोग किया जाता है।

कहा जाता है कि मुगल साम्राज्य के समय मूर्तिपूजा पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था। भक्तगण श्रीनाथजी की छवि को रंगों द्वारा कपड़ों पर उतारते थे एवं उनकी पूजा करते थे। कालान्तर में यह चित्रकला शैली एक महत्वपूर्ण कला शैली में परिवर्तित हो गयी।

मंदिर की भित्तियों पर चित्रकारी

मंदिर की भित्तियों पर चित्रकारी
मंदिर की भित्तियों पर चित्रकारी

मंदिर की भित्तियों पर बने रंगबिरंगे चित्रों ने भी मुझे मोहित कर दिया। इनमें से कुछ चित्र आप मंदिर के बाहर स्थित मार्ग की भित्तियों पर भी देख सकते हैं। मैने नाथद्वारा का भ्रमण दीपावली से तुरंत पूर्व किया था। इस समय मंदिर की सर्व भित्तियों को रंगने का कार्य किया जाता है। मैंने यहाँ कई चित्रकारों को कई तलों पर बैठकर मंदिर की भित्तियों पर नवीन चित्रकारी करते देखा। वे भित्तियों की नवीन श्वेत सतह पर रंगबिरंगे चित्र बना रहे थे।

यह वार्षिक नियम दर्शाता है कि यह एक जीवंत मंदिर है जिसका नियमपूर्वक वार्षिक रखरखाव किया जाता है। मैंने एक अधिकारी से पुराने चित्रों के विषय में जानना चाहा तो वे अट्टहास करने लगे। उन्होंने कहा कि जब हमारे चित्रकार प्रत्येक वर्ष नवीन चित्रकारियाँ करते हैं तो उन्हें पुराने चित्र संजोकर रखने की क्या आवश्यकता है? उनके उत्तर ने मुझे सोच में डाल दिया। क्या अद्भुत सोच थी उनकी। मंदिर की इस चित्र कला शैली एवं इसमें निपुण चित्रकारों के संरक्षण का क्या यह सर्वोत्तम मार्ग नहीं है? चित्रकारों को जीविका सदैव प्राप्त होती रहेगी तथा भित्तियों पर चित्र भी सदैव नवीन होंगे।

मंदिर के बाहर मैं एक चित्रकार से मिली जो लकड़ी पर श्रीनाथजी की ३-आयामी छवि बना रहा था।

चावल के दाने पे लिखा मेरा नाम
चावल के दाने पे लिखा मेरा नाम

मार्ग में मैं उन कलाकारों से भी मिली जो चावल के दाने पर आपका नाम लिख सकते हैं। मेरा अनुमान था कि यह एक कठिन कार्य है, किन्तु उस कलाकार ने दो ही मिनटों में मेरा नाम एक दाने पर लिख दिया। हाँ, उस दाने का सही छायाचित्र कैमरा में लेने के लिए मुझे अवश्य कई मिनट लग गए।

नाथद्वारा की पुदीना चाय

नाथद्वारा की प्रसिद्द पुदीना चाय
नाथद्वारा की प्रसिद्द पुदीना चाय

ठाकुरजी की हवेली के चारों ओर, घुमावदार गलियों में आप कई ठेले देखेंगे जो पुदीना चाय बिक्री करते हैं। वे पुदीना चाय अनोखे आकार के कुल्हड़ों में पिलाते हैं। यह एक साधारण चाय है जिसे ताजे पुदीने के पत्तों से स्वादिष्ट बनाया जाता है। इससे अधिक तरोताजगी भरी चाय मैंने आज तक नहीं पी थी। पुदीने की ताजी पत्तियाँ आपकी जिव्हा पर स्वाद जा जादू कर देती हैं। सम्पूर्ण थकान एवं निद्रा अदृश्य हो जाती है। मुझे ज्ञात नहीं कि वे किसी विशेष पुदीने की पत्तियों का प्रयोग करते हैं, किन्तु उनकी चाय अवश्य विशेष है।

आप जब भी यहाँ आयें, पुदीना चाय अवश्य पियें।

नाथद्वारा के होटल एवं अतिथिगृह

नाथद्वारा के बाज़ार
नाथद्वारा के बाज़ार

नाथद्वारा भ्रमण के समय मैं एक नवीन निर्मित जस्टा होटल में ठहरी थी। यह मंदिर के समीप, पैदल दूरी पर स्थित है। बनास नदी के समक्ष, एक पहाड़ी पर ठेठ मेवाड़ी वास्तुशैली में निर्मित यह अतिथिगृह समृद्ध यात्रियों को सर्व सुख-सुविधा प्रदान करने में सक्षम है। जस्टा होटल की एक विशेषता जिसने मुझे अत्यंत प्रभावित किया, वह था इसका जलपान गृह जहां केवल शाकाहारी भोजन परोसा जाता है। मेरे जैसे शाकाहारी यात्रियों के लिए यह एक वरदान से कम नहीं जब हमें मेनु में गोते लगा लगा कर शाकाहारी भोजन ढूँढना ना पड़े।

एक तीर्थ नगरी होने के कारण यहाँ अतिथिगृहों की कमी नहीं है। सस्ते अतिथिगृहों से लेकर जस्टा होटल जैसे समृद्ध होटलों तक कई विकल्प यहाँ उपलब्ध हैं।

नाथद्वारा यात्रा के लिए सुझाव :

• आप उदयपुर में ठहरकर नाथद्वारा की एक-दिवसीय यात्रा कर सकते हैं अथवा नाथद्वारा में भी ठहर सकते हैं। यदि आप मंदिर के सम्पूर्ण दिवस का अनुष्ठान देखना चाहते हैं तो नाथद्वारा में ही कम से कम २ दिनों तक ठहरना उत्तम होगा।
• नाथद्वारा में ठहरकर आप हल्दी घाटी एवं एकलिंगी के भी दर्शन कर सकते हैं। यहाँ तक कि चित्तोड़गढ़ एवं बूंदी भी यहाँ से दूर नहीं हैं।
• यह एक देवनगरी है। यहाँ के निवासियों की भावनाओं का आदर करें जो हृदय से इस मंदिर से जुड़े हुए हैं तथा जिनका जीवनचक्र मंदिर के चारों ओर ही घूमता रहता है। यहाँ के कुछ रीति-रिवाज आपके लिए मायने ना रखते हों, किन्तु उन पर श्रद्धा रखने वालों के लिए वे अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
• मंदिर परिसर में छायाचित्रण प्रतिबंधित है। मंदिर के भीतर कैमरा अथवा मोबाइल ना ले जाएँ।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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कांचीपुरम का वैकुण्ठ पेरूमल मंदिर- पल्लव काल की उत्कृष्ट कृति https://inditales.com/hindi/vaikunth-perumal-mandir-kanchipuram/ https://inditales.com/hindi/vaikunth-perumal-mandir-kanchipuram/#comments Wed, 20 Nov 2019 02:30:24 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1580

वैकुण्ठ पेरूमल मंदिर, शिव कांची का सर्वाधिक विशिष्ठ विष्णु मंदिर! कैलाशनाथ मंदिर की भान्ति यह मंदिर भी इतिहास, कला तथा मंदिर-वास्तुकला में रूचि रखने वाले विद्वानों एवं विद्यार्थियों में अत्यंत लोकप्रिय है। मैंने भी अपनी कांचीपुरम यात्रा से पूर्व इस मंदिर के विषय में एक सम्पूर्ण पुस्तक पढ़ डाली थी। पुस्तक में मंदिर की जानकारी […]

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वैकुण्ठ पेरूमल मंदिर, शिव कांची का सर्वाधिक विशिष्ठ विष्णु मंदिर! कैलाशनाथ मंदिर की भान्ति यह मंदिर भी इतिहास, कला तथा मंदिर-वास्तुकला में रूचि रखने वाले विद्वानों एवं विद्यार्थियों में अत्यंत लोकप्रिय है। मैंने भी अपनी कांचीपुरम यात्रा से पूर्व इस मंदिर के विषय में एक सम्पूर्ण पुस्तक पढ़ डाली थी।

वैकुण्ठ पेरूमल मंदिर - कांचीपुरम
वैकुण्ठ पेरूमल मंदिर – कांचीपुरम

पुस्तक में मंदिर की जानकारी इतनी विस्तृत है कि मैंने एक विशाल मंदिर की कल्पना कर ली थी। जो भित्तियाँ इतनी कथाएं कहती हैं, वह अवश्य ही अत्यंत लंबी-चौड़ी होंगी। वहां पहुँच कर मुझे आभास हुआ कि यह मेरी कल्पना से अपेक्षाकृत छोटा मंदिर है। मंदिर परिसर विशाल है किन्तु मंदिर छोटा, सुगठित व तेजस्वी है। विपुलता से उत्कीर्णित भित्तियों के समक्ष स्थित सिंह की आकृतियों के स्तंभ मंत्रमुग्ध कर देते हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो ये सिंह वास्तव में देवों एवं राजाओं की इन कथाओं का रक्षण कर रहे हों।

विष्णु की कथाएं और सिंह स्तम्भ - वैकुण्ठ पेरूमल मंदिर
विष्णु की कथाएं और सिंह स्तम्भ

प्रातः ही मैं मंदिर के दर्शन के लिए चल पड़ी। एक ओर मंदिर का जलकुंड था जो अब सूख गया था। उसमें घास उग आयी थी। तत्पश्चात सामने एक छोटा गोपुरम दृष्टिगोचर हुआ। कांचीपुरम के अन्य मंदिरों की तुलना में इसके गोपुरम का शिखर अपेक्षाकृत छोटा था। प्रवेश स्थल पर नीले रंग के कई प्रवेश द्वार थे। मंडपम को पार कर मैं मंदिर पहुँची। जैसे ही मंदिर को देखा, मेरे श्वास एक क्षण को रुक गये। यूँ तो इस मंदिर के कई चित्र मैंने पुस्तकों में देखे थे, किन्तु प्रत्यक्ष इसकी अद्भुत सुन्दरता देख मेरी आँखे फटी की फटी रह गयीं।

वैकुण्ठ पेरूमल मंदिर की सर्वोत्कृष्ट वास्तुकला

इस मंदिर की संरचना में वास्तुशास्त्र के कुछ ऐसे तत्त्व हैं जो इसे अत्यंत असाधारण एवं न्यारा बनाते हैं।

इस मंदिर की वास्तुकला के कुछ विशेष तत्व आपके समक्ष प्रस्तुत करना चाहती हूँ:

३ तलों का गर्भगृह

वैकुण्ठ पेरूमल मंदिर के भीतर, तीन तलों में तीन गर्भगृह हैं। जी हाँ! आपने सही पढ़ा! अधिकतर मंदिरों में स्थित एकल गर्भगृह के विपरीत इस मंदिर में एक के ऊपर एक तीन गर्भगृह हैं। तीनों गर्भगृहों में विष्णु की प्रतिमाओं की मुद्राएँ एवं भाव-भंगिमाएं भिन्न हैं।

भूतल

विष्णु प्रतिमा - वैकुण्ठनाथ
विष्णु प्रतिमा – वैकुण्ठनाथ

भूतल पर स्थित गर्भगृह के भीतर विष्णु आसीन स्थिति में विराजमान हैं अर्थात् आसन पर बैठे हैं। विष्णु की प्रतिमा का विशाल आकार हमें लगभग पूर्णतः अभिभूत कर देता है। ऐसा माना जाता है कि भगवान् विष्णु इस पीठासीन मुद्रा में राजा को सलाह देते आचार्य के रूप में उपस्थित हैं। मूर्ति के समक्ष एक छोटा मंडप है जिसे सिंहों पर खड़े स्तंभ आधार देते हैं।

प्रथम तल

विष्णु नरसिंह अवतार में
विष्णु नरसिंह अवतार में

प्रथम तल पर स्थापित विष्णु, क्षीरसागर पर निद्रामग्न, शेषशायी विष्णु के रूप में विराजमान हैं। यह गर्भगृह अपेक्षाकृत छोटा है तथा इसकी भित्तियाँ भी सादी हैं। इस मुद्रा में राजा भगवान् विष्णु की ऐसे सेवा कर रहे हैं जैसे एक शिष्य अपने गुरु की सेवा करता है।

विष्णु त्रिविक्रम अवतार में
विष्णु त्रिविक्रम अवतार में

इस मध्यम तल पर पहुँचने के लिए आपको मंदिर के चारों ओर चढ़ती सीड़ियों की सहायता लेनी पड़ती है। यहाँ एक समस्या है। यह तल केवल एकादशी के दिन ही खोला जाता है। अर्थात् हिन्दू पञ्चांग के अनुसार प्रत्येक पक्ष के ग्यारहवें दिन इस तल के भीतर प्रवेश पाया जा सकता है। मैं यहाँ द्वादशी के दिन उपस्थित थी। मुझे मध्यम तल में प्रवेश पाने की तीव्र इच्छा थी। मैंने पुजारीजी से मिन्नतें की, उनसे द्वार खोलने का अनुरोध किया। चूंकि द्वार खोलने की अनुमति नहीं थी, पहले तो उन्होंने मुझसे ३ घंटे प्रतीक्षा करवाई। तत्पश्चात क्षण भर के लिए ही उन्होंने दूसरे तल के पट खोले, वह भी मुझसे वचन लेने के पश्चात कि मैं कोई छायाचित्र नहीं लूंगी। पलक झपकते ही उन्होंने द्वार बंद भी कर दिया।

द्वितीय तल

विष्णु का वराह अवतार
विष्णु का वराह अवतार

दूसरे तल पर किसी समय भगवान् विष्णु की खड़ी प्रतिमा स्थापित थी। कुछ का मानना है कि प्रतिमा भगवान् कृष्ण की थी। तथ्य सत्यापित करने का कोई मार्ग नहीं है क्योंकि इस प्रतिमा की चोरी हो चुकी है। अब वह कहाँ है, यह किसी को भी ज्ञात नहीं है। अतः यह तल अब निषिद्ध है। इसके भीतर पहुँचना संभव नहीं है। विष्णु की खड़ी प्रतिमा की पृष्ठभागीय मान्यता है कि इस मुद्रा में भगवान् विष्णु ने राजा को १८ विभिन्न कला क्षेत्रों में शिक्षा प्रदान की थी।

विष्णु की कथाएं भित्तियों पर
विष्णु की कथाएं भित्तियों पर

मंदिर के तीन तलों की संरचना ऐसी है कि इसके प्रत्येक तल पर पहुंचते हुए आप वास्तव में मंदिर की एक परिक्रमा करते हैं। अनोखा तथ्य यह है कि सीड़ियाँ मंदिर परिसर के किसी भी भाग से दृष्टिगोचर नहीं है।

३ तल, विष्णु की ३ भिन्न मुद्राओं में ३ मूर्तियाँ – आसीन, शेषशायी व खड़ी मुद्रा। यदि इस क्रम का कुछ महत्व हो तो इसके विषय में मैं अनभिज्ञ हूँ। किन्तु इसकी वास्तु एवं संरचना मुझे अत्यंत अद्वितीय व अनूठी प्रतीत हुई।

भूतल पर स्थित गर्भगृह के पृष्ठभाग से जाती सीड़ियाँ आसीन विष्णु की एक विशाल प्रतिमा के समक्ष खुलती हैं। मेरे अनुमान से यह इस मंदिर परिसर की सर्वाधिक रखरखाव युक्त सर्वोत्कृष्ट प्रतिमा है।

वैकुण्ठ पेरूमल मंदिर के चारों ओर निर्मित खंदक

गर्भ गृह के गिर्द खंदक
गर्भ गृह के गिर्द खंदक

मंदिर के भीतर प्रवेश करते ही गलियारा है जो मंदिर के चारों ओर स्थित है। मध्य में एक चबूतरे पर गर्भगृह स्थित है। गर्भगृह के चबूतरे की भू-सतह गलियारे की भू-सतह से नीची है। गलियारा एवं गर्भगृह के मध्य एक खंदक है जो गर्भगृह के चारों ओर स्थित है।

आप अवश्य कल्पना कर रहे होंगे कि वर्षा ऋतु में यह मंदिर अद्वितीय प्रतीत होता होगा। मैंने जब यहाँ के दर्शन किये थे, वर्षा ऋतु नहीं थी। किन्तु मेरे मानसपटल में दारासुरम के ऐरावतेश्वर मंदिर की स्मृति अब भी ताजा थी। उस समय ऐरावतेश्वर मंदिर में जल भरा हुआ था। जल सतह पर मंदिर का प्रतिबिम्ब अत्यंत मनोहारी दृश्य प्रस्तुत कर रहा था। यद्यपि, इस मंदिर के भीतर, सीमित स्थान के कारण मंदिर का पूर्ण प्रतिबिम्ब जल सतह पर देख पाना संभव नहीं है।

मंदिर के परिसर एवं गर्भगृह के मध्य निर्मित यह खंदक अत्यंत ही अनूठा है। इससे पूर्व मैंने ऐसी संरचना कहीं नहीं देखी थी। गर्भगृह के चारों ओर खंदक निर्मिती का क्या प्रयोजन हो सकता है, यह मैं अब तक ज्ञात नहीं कर पायी हूँ।

कथाएं कहती भित्तियाँ

कथा कहती भित्तियां - वैकुण्ठ पेरूमल मंदिर
कथा कहती भित्तियां – वैकुण्ठ पेरूमल मंदिर

गर्भगृह के चारों ओर स्थित गलियारे की भित्तियाँ कथाओं से परिपूर्ण हैं। यूँ तो भारत के अधिकतर मंदिरों के चारों ओर उत्कीर्णित भित्तियाँ हैं। तो इस मंदिर में क्या विशेष है? आईये आपको इससे अवगत कराती हूँ। बाईं ओर स्थित भित्तियों पर विष्णु की कथाएं उत्कीर्णित हैं जो इस मंदिर के पीठासीन देव हैं। वहीं दूसरी ओर की भित्तियों पर इस मंदिर के निर्माता, राजा नन्दिवर्मन की समकालीन कथाएं प्रदर्शित हैं।

विष्णु और पल्लव वंश की कथाएं
विष्णु और पल्लव वंश की कथाएं

भगवान् विष्णु एवं राजा नन्दिवर्मन के मध्य तुलनात्मक समानता ही इन मूर्तियों को अनोखा एवं विशेष बनाती है।

मंदिरों की प्रतिमुर्तियाँ
मंदिरों की प्रतिमुर्तियाँ

२४ उत्कीर्णित फलकों पर कृष्ण कथाएं प्रदर्शित हैं। भित्तियों पर गंगा एवं यमुना भी उत्कीर्णित हैं। भित्तियों पर देवालय वास्तुकला का समागम, स्वर्णिम काल में दूर-सुदूर से आये व्यापारियों का कांचीपुरम से व्यापार संबंध इत्यादि की रोचक पूर्ण कथाएं भी प्रदर्शित हैं।

चीनी व्यवसायी - वैकुण्ठ पेरूमल मंदिर की भित्तियों पर
चीनी व्यवसायी – वैकुण्ठ पेरूमल मंदिर की भित्तियों पर

सभी शिल्पों की स्थिति उत्तम नहीं है। यद्यपि इन शिल्पों के साथ किसी ने बर्बरता का व्यवहार नहीं किया है, तथापि समय के साथ इन पत्थरों का क्षरण हो रहा है। आशा है कि इन पत्थरों एवं शिल्पकारियों के क्षरण को रोकने के लिए समय रहते ठोस प्रयास किये जाएँगे।

पल्लव-काल के सिंह स्तंभ

शंकु के आकार के ये स्तंभ, जिनके आधार आसीन सिंहों के समान उत्कीर्णित हैं, तमिल नाडू के पल्लव वास्तु कला का जीवंत उदाहरण है। आप ऐसी वास्तुशिल्प कांचीपुरम में सर्वत्र देख सकते हैं। स्पष्टतः कांचीपुरम लंबे समय तक पल्लवों की राजधानी रही है।

पल्लव वंश के चिन्ह - सिंह स्तम्भ
पल्लव वंश के चिन्ह – सिंह स्तम्भ

वैकुण्ठ पेरूमल मंदिर में ये स्तंभ स्पष्ट सुव्यवस्थित पंक्तियों में स्थित हैं। जैसा कि मैंने पूर्व में भी लिखा है, ये सिंह फलकों पर उत्कीर्णित कथाओं का रक्षण करते प्रतीत होते हैं। सामने से यह दृश्य अत्यंत मनमोहक व चित्ताकर्षक है। चूंकि इस मंदिर में दर्शनार्थियों की भीड़ नहीं रहती, आप बिना किसी अड़चन के यह दृश्य अनवरत देख सकते हैं।

काले पत्थर के स्तम्भ - विजयनगर काल के
काले पत्थर के स्तम्भ – विजयनगर काल के

आप इन स्तंभों पर रंगों की विविधता स्पष्ट देख सकते हैं। हकले रंग के बलुआ पत्थर से गहरे रंग के ग्रेनाइट तक रंगों की विविधता देख सकते हैं। इन स्तंभों में रंग एवं मूल तत्व के साथ नक्काशी की रीत भी भिन्न है। इसका कारण है, विजयनगर साम्राज्य द्वारा इन स्तंभों का समय समय पर पुनरुद्धार किया जाना। आप जानते ही हैं कि कांचीपुरम पर एक समय विजयनगर साम्राज्य ने शासन किया था। इन्हें देख आप मंदिर के पुनरुद्धार के इतिहास का तथा पुनरुद्धार कार्य में प्रत्येक वंश के योगदान का अनुमान लगा सकते हैं।

१०८ दिव्य देसम मंदिर

१०८ दिव्य देसम वास्तव में १०८ विष्णु मंदिरों का समूह है। वैकुण्ठ पेरूमल मंदिर इस १०८ दिव्य देसम में से एक मंदिर है। विष्णु भक्त अपने जीवनकाल में प्रायः इन सभी १०८ मंदिरों के दर्शन करते हैं। इन १०८ मंदिरों में से १४ मंदिर कांचीपुरम में ही स्थित हैं।

वैकुण्ठ पेरूमल मंदिर का इतिहास

वैकुण्ठ पेरूमल मंदिर का गोपुर
वैकुण्ठ पेरूमल मंदिर का गोपुर

कैलाशनाथ मंदिर के पश्चात वैकुण्ठ पेरूमल मंदिर कांचीपुरम का दूसरा प्राचीनतम मंदिर है। इसका निर्माण पल्लव राजा नन्दिवर्मन द्वितीय ने ७वी. शताब्दी के अंत में अथवा ८वी. शब्दी के आरम्भ में करवाया था। तत्पश्चात इसकी देखरेख वहां राज्य करते चोल वंशी एवम विजयनगर राजाओं ने की थी। यह तथ्य इस मंदिर को द्रविड़ वास्तुकला में संरचित सर्वाधिक प्राचीन पाषाणी मंदिरों में से एक बनाता है। इस मंदिर ने अवश्य आगामी मंदिरों के निर्माण को प्रभावित किया होगा।

नन्दिवर्मन द्वितीय के शासनकाल में इस मंदिर को सम्राट के मूल नाम पर परमेश्वर विष्णुगृहम कहा जाता था। तत्पश्चात इसका नाम वैकुण्ठ पेरूमल मंदिर हो गया। तमिल भाषी नगरों में विष्णु को पेरूमल कहा जाता है।

यहाँ भगवान् विष्णु को वैकुंठनाथन के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ भगवान् विष्णु अपनी पत्नी वैकुण्ठवल्ली के साथ निवास करते हैं।

मंदिर के जलकुंड को ऐरम्मद तीर्थं कहा जाता है।

मंदिर से जुडी किवदंतियां

मंदिर को मन भर कर निहारने के पश्चात एक विचार मन में कौंधा कि कांचीपुरम में विशाल विष्णु कांची होने के बाद भी यह विष्णु मंदिर शिव कांची में क्यों निर्मित किया गया। इसके पृष्ठ भाग में एक किवदंती है।

वैकुण्ठ पेरूमल मंदिर की भित्तोयों पर विष्णु प्रतिमाएं
मंदिर की भित्तोयों पर विष्णु प्रतिमाएं

इस कथा के अनुसार यहाँ का शासक राजा विरोच निःसंतान था। संतान प्राप्ति के लिए उसने भगवान् शिव की आराधना की थी। भगवान् शिव ने राजा को वरदान दिया कि भगवान् विष्णु के द्वारपाल उनके पुत्र के रूप में जन्म लेंगे। समय आने पर राजा को दो पुत्ररत्नों की प्राप्ति हुई। दोनों पुत्र बड़े होकर भगवान् विष्णु के परम भक्त बने। तभी से भगवान् विष्णु भी यहाँ वैकुण्ठनाथ के रूप में विराजे। आप जानते ही हैं कि विष्णु के धाम को वैकुण्ठ कहा जाता है।

मेरे विचार से यह दंतकथा हिन्दू धर्म के दो पंथों, शैव एवं वैष्णव पंथ को साथ लाती है ताकि इन दो पंथों के अनुगामी एक दूसरे का सम्मान कर सकें तथा शान्ति से साथ रह सकें।

वैकुण्ठ पेरूमल मंदिर के उत्सव

हिन्दू पञ्चांग के अनुसार प्रत्येक एकादशी के दिन, जिसका सम्बन्ध भगवान् विष्णु से है, वैकुण्ठ पेरूमल मंदिर में उत्सव मनाया जाता है। राम नवमी एवं जन्माष्टमी के साथ साथ वैकुण्ठ एकादशी भी यहाँ का एक प्रमुख उत्सव है।

डी डेनिस हडसन द्वारा वैकुण्ठ पेरूमल मंदिर पर लिखी पुस्तक के अनुसार, मंदिर के मध्य तल पर स्थापित विष्णु मूर्ति उनके १२ भिन्न रूपों में पूजी जाती है। वे १२ रूप इस प्रकार हैं:

१. केशव
२. नारायण
३. माधव
४. गोविन्द
५. विष्णु
६. मधुसुदन
७. त्रिविक्रम
८. वामन
९. श्रीधर
१०. ऋषिकेश
११. पद्मनाभ
१२. दामोदर

विष्णु के ये १२ रूपों में से प्रत्येक रूप की, हिन्दू पंचांग के एक मास तक आराधना की जाती है। इसका आरम्भ अंग्रेजी कैलेंडर की १०वीं. तिथि से होता है।

विष्णु कांची के वरदराज पेरूमल मंदिर से विपरीत, इस मंदिर के दर्शन के लिए कुछ ही भक्त आते हैं। एक ओर कम लोगों की उपस्थिति हमें मंदिर की सूक्ष्मता को निहारने का भरपूर अवसर प्रदान करती है, वहीं दूसरी ओर, भक्तों द्वारा की जाती पूजा अर्चना से प्राप्त उर्जा एवं कोलाहल की अनुपस्थिति खलती भी है।

यात्रा सुझाव

  • वरदराज पेरूमल मंदिर कांचीपुरम में, प्रसिद्ध कांची कामाक्षी मंदिर के समीप स्थित है।
  • यह मंदिर प्रातः ७:३० बजे से दोपहर १२ बजे तक, तत्पश्चात सायं ४:३० बजे से ७:३०बजे तक खुला रहता है।
  • मंदिर में प्रतिदिन ६ पूजा अर्चना की जाती है।
  • वर्तमान में यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के आधीन है। यहाँ उनका एक पहरेदार उपलब्ध रहता है। मंदिर के विषय में जानकारी प्राप्त करने के लिए आप उनसे सहायता मांग सकते हैं।
  • गर्भगृह के सिवाय, अन्य सभी स्थानों में छायाचित्रिकरण की अनुमति है।
  • कांचीपुरम की प्रसिद्ध साड़ियों की दुकानों के विषय में यहाँ से जानिये।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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