मुझे पक्षियों को देखना, उनकी चहचहाहट सुनना सदा से प्रिय था। मेरे जीवन में एक काल ऐसा था जब मैं पक्षियों की विविध प्रजातियों से अनभिज्ञ थी। अपने आसपास के पक्षियों को देखकर प्रसन्न हो जाती थी। जैसे जैसे मैंने विविध नभचरों को जानना एवं पहचानना आरंभ किया, मेरे आनंद में कई गुना वृद्धि हो गयी। वनीय प्रदेशों में जाकर उन्हे ढूँढना, उनकी विविध चंचल चालों का आनंद उठाना, उनकी छवियों को अपने कैमरा में उतारना, मुझे लुभाने लगा है। वनीय क्षेत्रों की मेरी गत कुछ यात्राओं में मैंने अपने खग मित्रों के विषय में बहुत कुछ सीखा। वनों में पदभ्रमण करते हुए मैंने इन लुभावने प्राणियों के दुर्लभ दर्शन किये, कुछ दुर्लभ छायाचित्र लिए।
नेपाल के चितवन राष्ट्रीय उद्यान में भी मैंने इन पक्षियों के दर्शन करने के उद्देश्य से पदभ्रमण किया था। वहाँ मैंने विविध मनमोहक पक्षियों के दर्शन किए। अनेक पक्षियों ने मुझे उनके चित्र लेने के अवसर भी प्रदान किए जो सहसा दुर्लभ होते हैं। आईये, उन्ही चित्रों के माध्यम से, नेपाल के चितवन राष्ट्रीय उद्यान के इन चंचल प्राणियों से आपकी भेंट कराती हूँ।
चितवन राष्ट्रीय उद्यान के लुभावने पक्षी
नेपाल के तराई क्षेत्र में स्थित चितवन राष्ट्रीय उद्यान के भ्रमण के लिए मैं वहाँ के बरही वन विश्राम गृह (Barahi Jungle Lodge) में ठहरी थी। मेरा पक्षी दर्शन वहीं से आरंभ हो गया था। हमने विश्राम गृह में हमारे कक्ष के बाहर अनेक सुंदर पक्षियों को विचरण करते देखा जिन्होंने हमारी यात्रा की सम्पूर्ण थकान मिटा दी थी। राप्ती नदी के तट पर सुस्ताते मगरमच्छों एवं घड़ियालों के मध्य विविध पक्षी यत्र-तत्र फुदक रहे थे। अपनी नौका सफारी में भी हमने अनेक पक्षी देखे। उनमें से अनेक पक्षी गेंडों की पीठ पर बैठे भ्रमण का आनंद ले रहे थे। हाथी की सवारी के लिए जाते हुए भी हमने कई पक्षियों के दर्शन किए। वन में पदभ्रमण करते हुए हमें उनके सर्वोत्तम दर्शन उपलब्ध हुए।
चहचहाते पक्षी
जब हम चितवन पहुँचे, संध्या हो चुकी थी। अतः हमारे इन नभचर मित्रों से हमारी प्रथम भेंट प्रातः ही हो सकी। वो हमारे लिए अद्वितीय क्षण थे जब पक्षियों की चहचहाहट से हमारी प्रातःकाल आरंभ हुई। पक्षियों के कलरव ने हमें प्रातः शीघ्र ही उठा दिया था। बरही विश्राम गृह के निकट स्थित नदी सघन कोहरे से ढँकी हुई थी। जब हम हाथी की पीठ पर चढ़कर भ्रमण करने निकले, कोहरा शनैः शनैः छँटने लगा था। नदी के तट पर विचरण करते राजबक अथवा सारस जैसे बड़े पक्षी दृष्टिगोचर होने लगे थे। किन्तु हमारे कान अनेक पक्षियों की चहचहाहट से गूंज रहे थे जो अब भी हमारी आँखों से ओझल थे।
जिस पक्षी के हमने सर्वप्रथम स्पष्ट दर्शन किए, वह था, सेमल के वृक्ष के ऊपर बैठा घोंघिल अथवा Asian openbill Stork जिसे एशियाई चोंचखुला भी कहते हैं। सेमल का यह वृक्ष नारंगी पुष्पों से भरा हुआ था। उस पर एक भी पत्ती नहीं थी। वृक्ष की एक सूखी शाखा पर बैठे इस पक्षी ने मेरे कॅमेरे को प्रसन्न कर दिया था। बिना किसी अवधान के उसने इस पक्षी के अनेक चित्र लिए।
हमने कुछ सारसों को राप्ती नदी के तट पर भी कलोल करते देखा।
प्रातः जलपान के पश्चात हमने राप्ती नदी पार की। जीप पर सवार होकर चितवन राष्ट्रीय उद्यान में जीप सफारी के लिए चल दिए। मार्ग में हमने सर्वप्रथम जंगल मैना तथा बुलबुल जैसे कुछ सामान्य पक्षी देखे।
रिऊ नदी के तट
मार्ग में हम रिऊ नदी के तट पर पहुँचे। यह एक संकरी नदी है। इसके चट्टानी तल पर एक छोटा सा पक्षी टहल रहा था। हमने उससे भी भेंट की।
कुछ काल पश्चात हमें एनहिंगा अथवा Darter पक्षी दृष्टिगोचर हुआ। ये मछलियाँ खाते हैं। लंबी ग्रीवा के कारण इसे Snake Bird भी कहते हैं।
संध्या होते होते सभी लजीले पक्षियों ने वृक्ष की सूखी शाखाओं पर प्रकट होना आरंभ कर दिया। हमें अनेक पक्षियों के दर्शन हुए, जैसे:
मधुया (Grey-headed Fish Eagle)
पुंडरीकाक्ष अथवा White-eyed Buzzard
शिकरा पक्षी
हमने लाल छाती का एक टुइयाँ तोता (Red-breasted Parakeet) देखा जो सेमल के नारंगी पुष्प के साथ खेल रहा था।
सम्पूर्ण मार्ग में हमने अनेक मोर देखे। कुछ ठाठ से वृक्षों की शाखाओं पर विराजमान थे तो कुछ धरती पर विचरण कर रहे थे। वहीं कुछ मोर अपने मनमोहक नृत्य से मोरनियों को मोह रहे थे।
ऊँचे हाथी घास पर स्वयं को संभालता श्वेत पूंछ का एक गोजा देखा जिसे White-tailed Stonechat भी कहते हैं।
पदभ्रमण सफारी
दूसरे दिवस हम पदभ्रमण करते हुए वन की सफारी करने निकले। हमने एक नीलकंठ को देखा जो नदी के जल के ऊपर लटकती एक शाखा पर बैठकर, नीचे जल के भीतर तैरती मछलियों को पकड़ने की तैयारी कर रहा था।
वन में यूँ तो अनेक पक्षी दृष्टिगोचर होते हैं लेकिन कॅमेरे में उनके चित्र ले पाना लगभग असंभव होता है। पक्षियों के छायाचित्र लेने के लिए मार्ग के दोनों ओर के वृक्ष सर्वोत्तम स्थल होते हैं। इसके अतिरिक्त, मैदानी क्षेत्रों में स्थित वृक्षों की सूखी शाखाएं भी चित्रीकरण के लिए उत्तम स्थल होते हैं।
हमें एक वृक्ष के तने पर बैठा धूसर नीले रंग का एक सुंदर पक्षी दिखा जिसकी चोंच नारंगी रंग की थी। मैं अपने कॅमेरे से उसका एक छायाचित्र ही ले पायी थी कि वह वन में कहीं लुप्त हो गया। वही चित्र अब मेरे लिए अमूल्य हो गया है।
अकस्मात ही, ना जाने कहाँ से, एक स्वर्गपक्षी हमारे समक्ष प्रकट हो गया तथा हम उसकी ओर अपने कॅमेरे घुमाएं, उससे पूर्व ही वह अकस्मात कहीं लुप्त भी हो गया।
संध्याकालीन नौका सफारी
संध्याकालीन नौका सफारी में अंततः हमें बतखों (Rhodesian Ducks) को देखने का सुअवसर प्राप्त हो ही गया। जब से हम चितवन राष्ट्रीय उद्यान आए थे, इनका किटकिटाना अनवरत सुन रहे थे किन्तु उन्हे अब तक देख नहीं पाये थे। ये प्रवासी नभचर हैं जो प्रत्येक वर्ष हिमालयीन क्षेत्रों से यहाँ आते हैं।
अन्य प्रजातियों की बतखें भी ऊँचे स्वर में किटकिटाते हुए यहाँ-वहाँ विचरण कर रही थीं। उन्हे देख मुझे एक कहावत का स्मरण हुआ, मछली बाजार। मुझे साधित हुआ कि नदी ही तो उनका मछली बाजार है। कुछ क्षणों पश्चात मैंने कुछ स्थानीय नेपालियों को देखा जो छोटे छोटे जालों में मछलियों को पकड़ने का प्रयास कर रहे थे।
चितवन राष्ट्रीय उद्यान के बहुरंगी पक्षी
मैंने बरही वन विश्राम गृह के समीप ही अनेक बहुरंगी पक्षियों को देखा। जैसे:
पीले रंग की एक छोटी सी पक्षी, जिसकी पीठ पर धारियाँ थीं। वह सोबिगा पक्षी था जिसे अंग्रेजी में Common Lora कहते हैं। एक वृक्ष पर कुछ क्षण शांत बैठकर उसने मुझे उसका सुंदर छायाचित्र लेने का पूर्ण अवसर प्रदान किया।
हरे हरे पत्तों के मध्य बैठा एक हरे रंग का पक्षी मुझे इतना भ्रमित कर गया कि मैं उसका छायाचित्र लगभग मिटाने ही वाली थी, यह सोचकर कि यहाँ कोई पक्षी नहीं है। समय रहते मुझे आभास हो गया कि यह तो वृक्ष की एक शाखा में आनंद से बैठा बसंत (Lineated Barbet) है।
हमें एक छोटा सा गोलाकार पक्षी दिखाई दिया जिसे गवैया अथवा फुदकी (warbler) कहते हैं। उसकी क्रीड़ाओं को देख आपको यह आभास हो जाएगा कि ‘फुदकना’, यह शब्द कहाँ से आया होगा!
चितवन राष्ट्रीय उद्यान अवलोकन के अंतिम चरण में हम अपना भ्रमण समाप्त करने ही वाले थे कि हमारे समक्ष कुछ गिद्ध प्रकट हो गए। मानो हमें यह आभास करा रहे हों कि यहाँ हम भी हैं! सही भी था! इन ३-४ दिवसों में हमने उन्हे देखा ही नहीं था!
इस भ्रमण में अंतिम दर्शन हुए, राप्ती नदी के ऊपर उड़ते बगुलों के।
वनाग्नि एवं चितवन राष्ट्रीय उद्यान के पक्षी
हमने जब जब भी वन्य जीवन दर्शन के लिए यात्राएँ की हैं, इन नभचरों से भेंट अवश्य हुई है। किन्तु यह यात्रा विशेष है क्योंकि हमें इन खगों के विचित्र हावभावों को देखने का सौभाग्य मिला। वन के एक भाग में ऊँचे हाथी घास को जलाया जा रहा था ताकि उनके स्थान पर नवीन कोंपलें जन्म लें जो गेंडों का प्रिय भोजन है।
उस अग्नि के चारों ओर बुलबुल एवं ड्रोन्गो जैसे अनेक छोटे पक्षी एकत्र हो रहे थे. वहाँ उनके लिए भोजन स्थल जो बन गया था। अग्नि की उष्णता से बचने के लिए सभी कीड़े-मकोड़े भूमि से बाहर आ रहे थे तथा इन पक्षियों का भोजन बन रहे थे।
विशेष दृश्य था। जिन्होंने वनाग्नि देखी है, उनके लिए भले ही यह एक सामान्य घटना होगी किन्तु मेरे लिए वह एक विशेष घटना थी। इससे पूर्व मैंने ऐसा अद्वितीय दृश्य नहीं देखा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे भूल से पक्षी अग्नि के भीतर आकर्षित हो रहे हों। किन्तु सभी पक्षी एक साथ एक ही भूल कैसे कर सकते हैं? हमारे लिए यह एक अनोखा क्षण था जब हमें इतने सारे पक्षियों को एक साथ देखने का सुअवसर प्राप्त हुआ।
चितवन में पक्षी दर्शन
चितवन में हम जहाँ भी गए, हमें विविध पक्षियों के दर्शन हुए। यहाँ तक कि बरही वन विश्राम गृह, जहाँ हम ठहरे थे, वहाँ के परिसर में भी हमें अनेक सुंदर पक्षियों के दर्शन हुए। एक के पश्चात एक पक्षी हमें ऐसे दर्शन दे रहा था मानो हमें स्मरण कर रहा था कि मुझे विस्मृत नहीं करना!
मैं उन्हे कभी नहीं भूल सकती!
मैंने अपने जीवन में अनेक पक्षी दर्शन यात्राएँ की हैं। उनमें से कुछ के संस्करण आपके लिए प्रस्तुत कर रही हूँ। वे इस प्रकार हैं:
नवाबगंज पक्षी अभयारण्य- लखनऊ कानपुर महामार्ग पर
ओडिशा की मंगलाजोड़ी आद्रभूमि: जलपक्षियों के स्वर्ग में नौकाविहार
Birds of Pench National Park, Madhya Pradesh
Bird Photography at Satpura National Park
अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे