दक्षिण भारत Archives - Inditales श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Wed, 13 Mar 2024 05:33:22 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.7.4 मंदिरों के माध्यम से प्राचीन चेन्नई का पुनरावलोकन https://inditales.com/hindi/prachin-chennai-ke-mandir/ https://inditales.com/hindi/prachin-chennai-ke-mandir/#respond Wed, 24 Apr 2024 02:30:49 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3577

मंदिरों के माध्यम से प्राचीन चेन्नई का पुनरावलोकन करा रहे हैं श्री प्रदीप चक्रवर्ती जी, जोThanjavur: A Cultural History नामक पुस्तक के लेखक हैं। श्री प्रदीप चक्रवर्ती द्वारा लिखित अनेक ऐसी पुस्तकें हैं जिनके द्वारा पाठकों को भारतीय इतिहास एवं दर्शन जैसे विषयों पर जीवन का पाठ प्रदान करने का उत्तम प्रयास किया गया है। […]

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मंदिरों के माध्यम से प्राचीन चेन्नई का पुनरावलोकन करा रहे हैं श्री प्रदीप चक्रवर्ती जी, जोThanjavur: A Cultural History नामक पुस्तक के लेखक हैं। श्री प्रदीप चक्रवर्ती द्वारा लिखित अनेक ऐसी पुस्तकें हैं जिनके द्वारा पाठकों को भारतीय इतिहास एवं दर्शन जैसे विषयों पर जीवन का पाठ प्रदान करने का उत्तम प्रयास किया गया है। आज के पॉडकास्ट में प्रदीपजी हमारे समक्ष प्राचीन चेन्नई के इतिहास का पुनरावलोकन कर रहे हैं जिसके माध्यम से वे चेन्नई के मंदिर, किवदंतियाँ एवं लोककथाएं से हमारा परिचय करा रहे हैं जो अद्भुत एवं अविस्मरणीय हैं।

चेन्नई शब्द की व्युत्पत्ति

प्राचीन काल में चेन्नई क्षेत्र चेन्नापटना कहलाता था। तेलुगु भाषा में चेन्नापटना का अर्थ होता है, सुंदर। चेन्नापटना व्यापारियों की भूमि थी। यहाँ स्थित पल्लव कालीन प्राचीन बंदरगाह बड़ी संख्या में तेलुगु भाषी कपास व्यापारियों को अपनी ओर आकर्षित करता था। चेन्नापटना नाम किस प्रकार मद्रास में परिवर्तित हो गया, इसके विषय में यद्यपि अनेक कथाएं प्रचलित हैं, तथापि उनके कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।

ऐसा कहा जाता है कि एक काल में आर्कोट के नवाब को अपने राज्य के वित्तीय भार का निर्वाह करने के लिए आर्थिक सहायता की आवश्यता पड़ी। धन जुटाने के लिए उसने अपनी भूमि के छोटे छोटे भूखंडों को अंग्रेजों को विक्री करना आरंभ कर दिया। शनैः शनैः अंग्रेजों ने सभी गांवों पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया तथा बंदरगाह नगरी चेन्नई अथवा मद्रास का निर्माण किया।

चेन्नई का प्राचीन इतिहास

मानवीय वसाहत के आरंभिक चिन्ह चेन्नई के पल्लावरम क्षेत्र में प्राप्त हुए थे। प्राचीन इतिहास शोधकर्ता रॉबर्ट ब्रूस फूट को २० वीं सदी के आरंभ में इस क्षेत्र में पुरापाषाण युगीन शैल औजार प्राप्त हुए थे। ये औजार लगभग ४००० वर्ष अथवा उससे भी अधिक प्राचीन माने जाते हैं। इसका यह निष्कर्ष निकलता है कि चेन्नई अनवरत रूप से वसाहती क्षेत्र रहा है।

दक्षिण भारत का एक अन्य पुरातात्विक स्थल है, प्राचीन ताम्रपर्णी नदी। पुराणों  तथा रामायण एवं महाभारत जैसे महाकाव्यों में प्राप्त उल्लेखों के अनुसार दक्षिण भारत में किसी देवी की प्राचीनतम कांस्य प्रतिमा इसी नदी के तल से प्राप्त हुई थी।

मध्यकालीन युग

पल्लव एवं चोल वंश के शासन काल में मंदिर राज्य के विविध पारंपरिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र होते थे। मंदिर के अधिष्ठात्र देव को राज्य का सम्राट तथा मंदिर को राजभवन माना जाता था। यह प्रथा गाँव के निवासियों में एक सामुदायिक भावना उत्पन्न करती थी। उदाहरण के लिए, चोल वंश के काल में कोडंबक्कम शिव मंदिर राज्य का जिला मुख्यालय था।

चेन्नई का प्राचीनतम जीवंत मंदिर वेलाचेरी का सप्तमातृका मंदिर है जिसका काल-निर्धारण पाँचवीं सदी माना जाता है।

दुर्भाग्य से मंदिरों के अतिरिक्त ऐसी कोई भी संरचना अब शेष नहीं है जिसका निर्माण पल्लव, चोल अथवा पंड्या वंश के राजाओं ने करवाया था। उस काल के राजा अस्थायी काष्ठ भवनों में निवास करते थे। इसके लिखित प्रमाण के रूप में अनेक शिलालेख उपलब्ध हैं, जैसे मायलापुर मंदिर की भित्तियों पर उपस्थित शिलालेख जिन्हे १००० वर्ष प्राचीन माना जाता है। एक शिलालेख के अनुसार चोल वंश के काल में चेन्नई में व्यापारी समितियाँ एवं सभाएं आयोजित की जाती थीं।

औपनिवेशिक काल

चेन्नई में तीन उपनिवेशवादियों का नियंत्रण रहा है, पुर्तगाली, फ्रांसीसी एवं अंग्रेज।

पुर्तगाली प्रथम उपनिवेशवादी थे जिन्होंने चेन्नई के निकट बंदरगाह का निर्माण किया था। उन्होंने १५ वीं शताब्दी के अंतिम खंड में यह निर्माण कराया था। कालांतर में इस बंदरगाह क्षेत्र पर आधिपत्य स्थापित करने के लिए फ्रांसीसी एवं अंग्रेजों के मध्य संघर्ष हुआ। सन् १७४४-१७६३ में हुए इस संघर्ष में पराजित होने के पश्चात फ्रांसीसी चेन्नई को अंग्रेजों को सुपुर्द करने के लिए बाध्य हो गये।

जब अंग्रेजों ने सर्वप्रथम भारत में उपनिवेश स्थापित किया, तब विश्व के अन्य देशों के संग स्थापित वस्त्र व्यापार पर अपना सर्वस्व नियंत्रण पाने के लिए भारत के पूर्वी तट पर उन्हे एक बंदरगाह की आवश्यकता प्रतीत हुई। वे मुख्यतः कपास एवं नील का व्यापार कर रहे थे। इस व्यापार के लिए चेन्नई सर्वोत्तम क्षेत्र था।

चंद्रगिरी के विजयनगर राजवंश के राजा ने उन्हे इस व्यापार को आरंभ करने के लिए ३०० वर्ग किलोमीटर का छोटा सा भूखंड प्रदान किया। अंग्रेजों ने इस भूखंड पर अपने दुर्ग का निर्माण किया तथा यहाँ से अपना व्यापार आरंभ किया। यह क्षेत्र अब लोकप्रिय मरीना समुद्रतट है।

तमिल साहित्य एवं संगीत

तमिल साहित्यों एवं संगीत में उन सभी गाँवों का विस्तृत उल्लेख प्राप्त होता है जिनसे चेन्नई का सृजन हुआ था। मायलापुर कपालीश्वर स्वामी मंदिर लगभग १००० वर्ष प्राचीन है। इस मंदिर के अप्पर स्वामी ने पुम्बाबाई, समथर के प्रति उनके प्रेम तथा कालांतर में उनकी मृत्यु पर आधारित अनेक कविताओं की रचना की है। तत्पश्चात इन कविताओं के माध्यम से वे पुम्बाबाई को मृत्यु की गोद से उठने का आव्हान करते हैं तथा उन्हे नश्वर प्रेम का त्याग कर शिव के अमर प्रेम में लीन होने के लिए प्रेरित करते हैं। वे उनसे शैव धर्म के आदर्शों को दूर-सुदूर तक पहुँचाने का निवेदन करते हैं।

कपालीश्वर मंदिर - चेन्नई
कपालीश्वर मंदिर – चेन्नई

एक रोचक कविता में मायलापुर क्षेत्र की समृद्ध वनस्पतियों, उत्सवों तथा विविध अवसरों पर बने भिन्न भिन्न व्यंजनों का विवरण है। आज भी ये सभी उत्सव उतने ही उत्साह से मनाए जाते हैं। इससे संबंधित एक रोचक तथ्य यह है कि पुम्बाबाई पार्वती का ही प्राचीन नाम है जिनकी मूर्ति की मंदिर में प्रतिष्ठापना की गयी है।

यात्रा साहित्य

चेन्नई के इतिहास का एक अन्य साहित्यिक स्रोत है, वेंकटाध्वरी कवि की रचना, विश्वगुणादर्शचंपू। १७ वीं सदी में रचित यह रचना चंपू छंद से संबंधित है। चम्पू एक भारतीय साहित्यिक शैली है जिसमें गद्य एवं कविताओं का संगम होता है। चंपू छंद का प्रयोग कर लिखे गये लेख संस्कृत, कन्नड़, तेलुगु तथा अनेक अन्य भारतीय भाषाओं में प्राप्त होते हैं।

इन साहित्यों में क्रिशानु एवं विश्ववासु नामक दो गन्धर्वों की दृष्टि से चेन्नई एवं अन्य भारतीय नगरों का वर्णन किया गया है। इन दोनों गन्धर्वों में एक आशावादी तथा दूसरा निराशावादी है। ये दोनों गंधर्व भारत वर्ष की यात्रा करते हुए दक्षिण क्षेत्र से उत्तर क्षेत्रों की ओर जा रहे हैं। वे भारत पर अंग्रेजों के प्रभाव के विषय में चर्चा कर रहे हैं। वे राजनीति, संस्कृति, इतिहास, आधारभूत संरचनाओं के विकास एवं संभावित भविष्य की भी चर्चा कर रहे हैं। आशावादी क्रिसानु नगर का वर्णन करते हुए सदैव अपनी चर्चा को सकारात्मक आशाजनक अंत प्रदान करता है। इन रचनाओं के माध्यम से हमें १७ वीं शताब्दी तक चेन्नई पर अंग्रेजों के प्रभाव की जानकारी प्राप्त होती है।

चेन्नई एक प्राचीन नगरी है जो अब तक जीवंत है। इसके प्रत्येक कोने में प्राचीन काल के चिन्ह हैं जो प्राचीन विश्व को वर्तमान से जोड़ते हैं। चेन्नई एवं उसके इतिहास के विषय में अधिक शोध अब भी शेष है। प्राचीन चेन्नई के विषय में विस्तृत जानकारी के लिए Podcast by Pradeep Chakravarthy अवश्य सुनें। इस लिखित संस्करण में श्री प्रदीप चक्रवर्ती जी से प्राचीन चेन्नई के विषय में की गयी विस्तृत चर्चा का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया गया है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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बनशंकरी अम्मा मंदिर – बादामी उत्तर कर्णाटक का एक शक्तिपीठ https://inditales.com/hindi/banashankari-amma-mandir-badami-karnataka/ https://inditales.com/hindi/banashankari-amma-mandir-badami-karnataka/#respond Wed, 13 Mar 2024 02:30:02 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3408

श्री बादामी बनशंकरी देवी की पूजा-आराधना स्वर्णिम कर्नाटक के चालुक्य काल से चली आ रही है। कर्णाटक के बागलकोट जिले में बादामी तालुका में स्थित बनशंकरी मंदिर उत्तर कर्णाटक का एक प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। लाखों की संख्या में भक्तगण यहाँ आते हैं तथा बनशंकरी माता को कुलदेवी के रूप में पूजते हैं। राजा जगदेकमल्ल प्रथम […]

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श्री बादामी बनशंकरी देवी की पूजा-आराधना स्वर्णिम कर्नाटक के चालुक्य काल से चली आ रही है। कर्णाटक के बागलकोट जिले में बादामी तालुका में स्थित बनशंकरी मंदिर उत्तर कर्णाटक का एक प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। लाखों की संख्या में भक्तगण यहाँ आते हैं तथा बनशंकरी माता को कुलदेवी के रूप में पूजते हैं।

राजा जगदेकमल्ल प्रथम ने ६०३ ई. में इस मंदिर का निर्माण कराया तथा मंदिर के भीतर बनशंकरी देवी की मूर्ति की स्थापना करवाई थी। बनशंकरी देवी कल्याणी के चालुक्य वंश की कुलदेवी मानी जाती है।

मरारी दंडनायक परुषाराम अगले ने सन् १७५० में इस मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया था। नवरात्रि के उत्सव में विशेष आभूषणों एवं वस्त्रों से देवी बनशंकरी का अलंकरण किया जाता है। नवरात्रि में देवी के नौ अद्भुत रूपों का दर्शन करने के लिए लाखों की संख्या में भक्तगण यहाँ आते हैं।

बादामी बनशंकरी का ऐतिहासिक महत्त्व

बादामी बनशंकरी मंदिर के स्वयं के ऐतिहासिक पदचिन्ह हैं।

स्कन्द पुराण में चालुक्य एवं पड़ोसी राज्यों के राजाओं की संरक्षक देवी के रूप में बादामी बनशंकरी की कथाओं का उल्लेख मिलता है।

बनशंकरी अम्मा मंदिर  बादामी में
बनशंकरी अम्मा मंदिर बादामी में

प्राचीन काल में तिलकारण्य नामक वन में दुर्गमासुर नाम का एक क्रूर राक्षस निवास करता था। वह वन में ध्यानरत साधुओं तथा आसपास के ग्रामीणों को अविरत कष्ट देता था। दुर्गमासुर के अत्याचारों से त्रस्त होकर सभी साधूगण सहायता माँगने देवताओं के पास पहुँचे। उनके अत्याचारों के निदान हेतु आदिशक्ति, जो  देवी पार्वती का रूप है, यज्ञ कुण्ड से अवतरित हुईं तथा उन्होंने दुर्गमासुर का वध किया।

बन का अर्थ है, वन अथवा जंगल। शंकरी का अभिप्राय है, पार्वतीस्वरूपा अथवा भगवान शिव की शक्ति। इसी कारण उनका नाम पड़ा, बनशंकरी।

बनशंकरी अम्मा का एक अन्य नाम शाकम्भरी भी है। इसके पृष्ठभाग में भी एक रोचक कथा है।

एक काल में एक नगर सूखे की चपेट में था। वहाँ के निवासियों के पास उदरनिर्वाह हेतु कुछ भी शेष नहीं था। फलस्वरूप नागरिकों ने देवी माँ से गुहार लगाई। देवी बनशंकरी ने अपने अश्रुओं से धरती माता की तृष्णा शांत की तथा अपने भक्तों को जीवनदान दिया। भक्तों की क्षुधा शांत करने के लिए देवी ने शाक भाजियों की रचना की। मंदिर के आसपास के वनों में नारियल, केला आदि के वृक्षों की उपस्थिति इस ओर संकेत भी करती है। इसी किवदंती के कारण देवी को देवी शाकंभरी भी कहते हैं। शाक का अर्थ है भाजी तथा भृ धातु पोषण करने से संबंधित है।

देवी शाकंभरी का उल्लेख दुर्गा सप्तशती में भी किया गया है जहाँ उन्हें देवी का एक अवतार कहा गया है।

अम्मा के भिन्न भिन्न नाम

भक्तगण देवी बनशंकरी को अनेक नामों से पूजते हैं, जैसे बलव्वा, बनदव्वा, शिरावंती, चौदम्मा, चूडेश्वरी, संकव्वा, वनदुर्गे तथा वनशंकरी। देवी सिंहारूढ़ हैं अर्थात सिंह वाहन पर आरूढ़ रहती हैं।

शाकम्बरी देवी
शाकम्बरी देवी

मंदिर के भीतर काली शिला में गढ़ी उनकी प्रतिमा अत्यंत आकर्षक है। लक्ष्मी एवं सरस्वती के संयुक्त रूप में बनशंकरी देवी को मुख्यतः कर्णाटक, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश तथा तमिल नाडु में पूजा जाता है।

मंदिर की स्थापत्य शैली एवं बनशंकरी अम्मा का विग्रह

बनशंकरी देवी के मंदिर का वर्तमान में जो प्रारूप है, वह विजयनगर स्थापत्य शैली में निर्मित है। मूल मंदिर द्रविड़ स्थापत्य शैली में निर्मित था। मंदिर के चारों ओर ऊँचा प्राकर है।

मंदिर में एक चौकोर मंडप है। मंदिर के समक्ष प्रवेश द्वार के ऊपर उंचा गोपुरम है जिस पर अनेक देवी-देवताओं के शिल्प हैं। साथ ही अनेक पौराणिक पात्र भी उत्कीर्णित हैं। यह मुख्य मंदिर का प्रवेश द्वार है।

मुख्य संरचना के अंतर्गत एक मुख मंडप एवं एक अर्ध मंडप है जो गर्भगृह के समक्ष स्थित है। गर्भगृह के ऊपर शिखर अथवा विमान है। मंदिर परिसर के मध्य में मुक्तांगन है जिसके चारों ओर अनेक स्तंभ युक्त कक्ष हैं। इन कक्षों का प्रयोग विविध अनुष्ठानों एवं उत्सवों में किया जाता है।

गर्भगृह के भीतर बनशंकरी अम्मा का पावन विग्रह है जिसे काली शिला में गढ़ा गया है। देवी अपने वाहन सिंह पर विराजमान हैं तथा अपने चरणों के नीचे राक्षस के शीष रहित धड़ को दबाये हुए हैं। अष्टभुजाधारी बनशंकरी अम्मा के हाथों में त्रिशूल, घंटा, डमरू, तलवार, ढाल तथा असुर का शीष है।

बनशंकरी मंदिर के उत्सव

मंदिर के समक्ष एक चौकोर जलकुंड अथवा कल्याणी है जिसका नाम हरिद्रतीर्थ है।

हरिद्रा तीर्थ
हरिद्रा तीर्थ

इस कल्याणी से सम्बंधित एक अनुपम अनुष्ठान है। नवजात शिशुओं को केले की पत्तियों द्वारा निर्मित पालने में लिटाकर कल्याणी के जल पर स्थित नौका पर रखते हैं। लोगों की मान्यता है कि यह अनुष्ठान शिशुओं के भविष्य के लिए अत्यंत शुभ एवं कल्याणकारी होता है।

शाकम्भरी राहु की प्रिय देवी हैं। इसीलिए भक्तगण राहुकाल में यहाँ नींबू का दीपक जलाते हैं। उनका मानना है कि इस अनुष्ठान के द्वारा राहु दोष से मुक्ति प्राप्त होती है।

इस मंदिर का एक अद्वितीय उत्सव है, पल्लेदा हब्बा अथवा शाकभाजी का उत्सव जिसमें भक्तगण देवी को विविध शाकभाजियों से अलंकृत करते हैं। भिन्न भिन्न प्रकार के व्यंजन बनाकर बनशंकरी देवी को अर्पित किये जाते हैं। इस अनुष्ठान का अनेक दशकों से अनवरत पालन किया जा रहा है। इस उत्सव में विविध शाकभाजियों का प्रयोग कर कुल १०८ प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं तथा देवी को अर्पित किये जाते हैं।

उत्तर कर्णाटक में एक अन्य लोकप्रिय सांस्कृतिक आयोजन किया जाता है, बनशंकरी जत्रा। यह एक वार्षिक मेला जो ३ सप्ताहों तक चलता है। यह जत्रा हिन्दू पंचांग के पौष मास की अष्टमी से आरम्भ होता है तथा  माघ मास की पूर्णिमा के दिन उत्सव मनाया जाता है जो साधारणतः जनवरी/फरवरी में आता है। इस दिन देवी पार्वती की रथयात्रा का शुभारम्भ होता है। ऐसी मान्यता है कि यह काल देवी लक्ष्मी एवं उनके विभिन्न रूपों की आराधना के लिए परम पावन होता है।

दीपस्तंभ - बादामी बनशंकरी
दीपस्तंभ – बादामी बनशंकरी

कर्णाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु तथा आँध्रप्रदेश से असंख्य भक्तगण उत्सव में भाग लेने के लिए बनशंकरी मंदिर आते हैं। वे देवी की पूजा-आराधना करते हैं तथा उनसे आशीष माँगते हैं। उत्सव काल में सम्पूर्ण वातावरण उल्हासपूर्ण, जीवंत तथा रंगों से परिपूर्ण हो जाता है। मंदिर के आसपास भक्तों का ताँता लग जाता है। विक्रेता उन्हें भिन्न भिन्न वस्तुएं, जैसे खाद्य प्रदार्थ, परिधान, खिलौने, मिष्टान, देवी को अर्पण करने की वस्तुएं आदि विक्री करने में व्यस्त हो जाते हैं।

बनशंकरी अम्मा मंदिर में नवरात्रि का पर्व

हिन्दू पंचांग के अनुसार सर्वाधिक महत्वपूर्ण नवरात्रि पर्व अश्विन मास में आता है जो साधारणतः सितम्बर-अक्टूबर मास में पड़ता है। किन्तु कर्णाटक के बादामी में स्थित इस मंदिर में नवरात्रि का उत्सव पौष मास में मनाया जाता है। नौ दिवसों का यह उत्सव देवी बनशंकरी को समर्पित किया जाता है।

बाणदाष्टमी एक अत्यंत पवित्र दिवस माना जाता है। सम्पूर्ण उत्तर कर्णाटक, विशेषतः बनशंकरी मंदिर में विविध उत्सव एवं जत्रायें आयोजित किये जाते हैं।

मंदिर में विशेष उत्तर कर्णाटक भोजन अवश्य ग्रहण करें

स्थानीय स्त्रियाँ अपने घरों में अनेक प्रकार के उत्तर कर्नाटकी व्यंजन बनाते हैं, जैसे मक्के/जवार की रोटियाँ, करगडुबू (पूरण कडबू), कलुपल्ले (अंकुरित दालों का रस), लाल मिर्च की चटनी, पुंडी पल्ले (गोंगुरा भाजी) आदि। वे ये सभी व्यंजन मंदिर में लाते हैं तथा भक्तगणों को देते हैं।

वे एक थाली का मूल्य ३०-५० रुपये तक लेते हैं। आप भी न्यूनतम मूल्य में उपलब्ध इस स्वादिष्ट भोजन का आस्वाद लेकर प्रसन्न हो जायेंगे। इसका स्वाद आपके दैनिन्दिनी स्वाद से अवश्य भिन्न एवं विशेष होगा।

यदि आप बनशंकरी मंदिर में दर्शन के लिए आयें तथा मंदिर के बाहर उपलब्ध इस भोजन का आस्वाद ना लें तो आपकी यात्रा अपूर्ण है!

बनशंकरी मंदिर तक पदयात्रा

भक्तों द्वारा पदयात्रा कर बनशंकरी मंदिर तक पहुँचना, विशेषतः पूर्णिमा के दिवस, यह एक सर्वसामान्य दृश्य होता है। यह परंपरा जनवरी-फरवरी में आयोजित वार्षिक बनशंकरी उत्सव/जत्रा में विशेष रूप से लोकप्रिय है।

भक्तगण अपनी पदयात्रा सामान्यतः अपने निवासों से अथवा निकट के गाँवों एवं नगरों से आरंभ करते हैं। वे लम्बी दूरी की पदयात्रा कर बादामी के बनशंकरी मंदिर पहुँचते हैं। कुछ भक्तगण नंगे पैरों से ही पदयात्रा करते देखे जा सकते हैं। कदाचित भक्ति, कोई विशेष कार्यसिद्धि का हेतु अथवा पश्चाताप की भावना उन्हें ऐसा करने के लिए प्रेरित करती होगी।

बनशंकरी अम्मा का आशीष प्राप्त करने के लिए पदयात्रा करते हुए उन तक पहुँचना, यह एक अत्यंत पावन एवं सुखद अनुभव होता होगा। अनेक भक्तगण अपने परिवारजनों एवं मित्रों के संग यह यात्रा प्रत्येक वर्ष करते हैं। ऐसी मान्यता है कि यह अम्मा के प्रति उनके समर्पण एवं भक्ति में उनका विश्वास दृढ़ करता है।

बादामी के बनशंकरी मंदिर कैसे पहुँचे?

बनशंकरी मंदिर बादामी नगर की बाहरी सीमा में अवश्य स्थित है लेकिन वहाँ पहुँचना कठिन नहीं है। आप सड़क मार्ग से इस मंदिर तक आसानी से पहुँच सकते हैं। आप किसी भी परिवहन सेवा द्वारा बादामी पहुँचें तथा वहाँ से सड़क मार्ग द्वारा बनशंकरी मंदिर पहुँचें जो नगर के केंद्र से लगभग ४ किलोमीटर दूर स्थित है।

यदि आप वायुमार्ग द्वारा पहुँचना चाहते हैं तो बादामी से निकटतम विमानतल हैं, ११० किलोमीटर दूर स्थित हुबली विमानतल तथा १३० किलोमीटर दूर स्थित बेलगावी। यदि आपकी प्राथमिकता रेल मार्ग है तो बनशंकरी मंदिर पहुँचना अधिक सुगम है। बादामी रेल मार्ग द्वारा देश के सभी मुख्य नगरों से जुड़ा हुआ है। बादामी रेल स्थानक बनशंकरी मंदिर से लगभग ९ किलोमीटर दूर है।

बादामी नगर में किसी भी स्थान से बनशंकरी मंदिर पहुँचने के लिए कर्णाटक राज्य परिवहन निगम की सुविधाजनक बस सेवायें नियमित रूप से उपलब्ध रहती हैं। आप बस से ना जाना चाहें तो ऑटो अथवा ताँगे से भी जा सकते हैं जो न्यूनतम शुल्क पर उपलब्ध होती हैं।

बादामी एवं आसपास के अन्य अद्भुत दर्शनीय स्थल

बादामी चालुक्य वंश से संबंधित एक ऐतिहासिक नगर है। बादामी अनेक प्राचीन मंदिरों तथा शैल-कृत गुफाओं व शिल्पों के लिए प्रसिद्ध है। बादामी में बनशंकरी मंदिर में दर्शन के पश्चात आप आसपास के अनेक दर्शनीय स्थलों का आनंद ले सकते हैं। उनमें कुछ हैं,

बादामी गुफाएं – बादामी गुफाएँ वास्तव में गुफा मंदिर हैं। यहाँ कोमल बलुआ शिलाओं को काटकर चार गुफा मंदिर निर्मित किये गए हैं।

ऐहोले –  ऐहोले भी एक ऐतिहासिक नगरी है। बादामी से लगभग ३५ किलोमीटर दूर स्थित ऐहोले चालुक्य वंश की प्रथम राजधानी थी। यहाँ १२० से अधिक शिला एवं गुफा मंदिरों का समूह है।

पत्तदकल/पट्टदकल्लु – बादामी से लगभग २३ किलोमीटर दूर स्थित, यूनेस्को द्वारा घोषित इस विश्व धरोहर स्थल में ९ प्रसिद्ध हिन्दू एवं एक प्रसिद्ध जैन मंदिर हैं।

महाकुटा – बादामी से लगभग १४ किलोमीटर दूर स्थित महाकुटा एक लघु नगरी है जो अनेक प्राचीन मंदिरों एवं उष्ण जल के प्राकृतिक सोते के लिए प्रसिद्ध है। इसे दक्षिण की काशी भी कहा जाता है।

बादामी-ऐहोले-पत्तदकल कर्णाटक का लोकप्रिय पर्यटन परिपथ है।

बादामी के आसपास स्थित ये ऐतिहासिक दर्शनीय स्थल कर्णाटक के संपन्न इतिहास एवं संस्कृति की एक झलक प्रदान करते हैं।

यह एक अतिथि यात्रा संस्करण है जिसे गायत्री आरी ने प्रदान किया है। वे बागलकोट जिले में स्थित इल्कल नगर की स्थानिक हैं जो प्रसिद्ध इल्कल साड़ियों के लिए जग प्रसिद्ध हैं। वे व्यवसाय से गुणवत्ता विशेषज्ञ हैं। उनके जीवन का सर्वाधिक उत्साहवर्धक क्रियाकलाप है, विश्वभर में यात्राएं करना एवं नित-नवीन संस्कृतियों पर शोध करना। एक प्रकृति प्रेमी तथा आध्यात्मिक यात्री के रूप में उन्हें प्राकृतिक सौंदर्य एवं भिन्न भिन्न स्थलों के आध्यात्मिक सार में शान्ति का अनुभव होता है।      

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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ऐरावतेश्वर मंदिर के संगीतमय सोपान – दारासुरम https://inditales.com/hindi/darasuram-airateshwar-mandir-tamil-nadu/ https://inditales.com/hindi/darasuram-airateshwar-mandir-tamil-nadu/#respond Wed, 03 Jan 2024 02:30:47 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3355

एक गोधूलि बेला में कच्चे मार्ग से होते हुए तिपहिया वाहन द्वारा मैं दारासुरम पहुँची। गंतव्य पर अग्रसर होते हुए मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि यह मार्ग मुझे कहीं नहीं पहुँचायेगा। अकस्मात् ही एक विशाल मंदिर मेरे नेत्रों के समक्ष प्रकट हो गया। वह ऐरावतेश्वर मंदिर था। इस मंदिर का एक अन्य लोक-व्यापी […]

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एक गोधूलि बेला में कच्चे मार्ग से होते हुए तिपहिया वाहन द्वारा मैं दारासुरम पहुँची। गंतव्य पर अग्रसर होते हुए मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि यह मार्ग मुझे कहीं नहीं पहुँचायेगा। अकस्मात् ही एक विशाल मंदिर मेरे नेत्रों के समक्ष प्रकट हो गया। वह ऐरावतेश्वर मंदिर था। इस मंदिर का एक अन्य लोक-व्यापी नाम है, दारासुरम मंदिर।

मंदिर पहुँचते ही मेरी प्रथम दृष्टि मंदिर के खंडित गोपुरम एवं उसकी भंजित बाह्य भित्तियों पर पड़ी। तदनंतर मंदिर के प्रवेश द्वार पर मुझे एक छोटा जलमग्न मंदिर दृष्टिगोचर हुआ। मेरी इस यात्रा से कुछ ही दिवस पूर्व नीलम चक्रवात ने इस मंदिर में भेंट दी थी जिसके कारण मंदिर के चारों ओर जल एकत्र हो गया था।

दारासुरम ऐरावतेश्वर मंदिर
दारासुरम ऐरावतेश्वर मंदिर

कुछ क्षणों पश्चात मुझे ज्ञात हुआ कि सामान्यतः वर्षा के पश्चात मंदिर के चारों ओर की भूमि जलमग्न हो ही जाती है। काल के साथ मंदिर के आसपास की भूमि ऊँची हो गयी है जिसके कारण मंदिर का भूतल अपेक्षाकृत नीचे हो गया है। इसके कारण वर्षा का जल चारों ओर से मंदिर की ओर आता है तथा मंदिर को चहुँ ओर से घेर लेता है।

दारासुरम ऐरावतेश्वर मंदिर के आकर्षण

जल के मध्य स्थित मंदिर को देख मन में कुतूहल जन्म ले रहा था। हृदय में सम्मिश्रित भावनाएं उत्पन्न होने लगी थीं। मुझे इस तथ्य का पूर्ण रुप से भान था कि यह एकत्रित जल मंदिर की संरचना के लिए अहितकारी सिद्ध हो सकता है। इस आभास के पश्चात भी मैं जल से घिरे मंदिर की सुन्दरता को देख मंत्रमुग्ध सी हो रही थी। सूर्य की किरणें जल की सतह पर मंदिर के प्रत्येक अवयव का प्रतिबिम्ब चित्रित कर रही थीं। जैसे जैसे सूर्य अस्त की ओर उन्मुख हो रहा था, मंदिर का प्रतिबिम्ब सूर्य की किरणों के संग आँख-मिचौली खेल रहा था।

दारासुरम ऐरावतेश्वर मंदिर के संगीतमय सोपान
दारासुरम ऐरावतेश्वर मंदिर के संगीतमय सोपान

एक गाँववासी ने मुझे कहा कि मंदिर के भीतर जाने के लिए मुझे इस जल का सामना करना पड़ेगा। मैं सोच में पड़ गयी कि किस प्रकार सामना करना पड़ेगा! मुझे विश्वास था कि ऊँची जगती अथवा चबूतरे पर निर्मित स्तंभ युक्त गलियारे से घिरे इस मंदिर तक पहुँचने का कोई मार्ग अवश्य होगा जिसके लिए मुझे जल में प्रवेश नहीं करना पड़ेगा। लेकिन वहाँ ऐसा कोई मार्ग नहीं था। मुझे जल में प्रवेश करना ही पड़ा। किन्तु जैसे ही मैंने जल में प्रवेश किया, मुझमें चारों ओर के जल का कोई आभास शेष नहीं रहा। मुझे जल की उपस्थिति का भी भान नहीं था। मैं व मेरा कैमरा, हम दोनों प्रसन्नता से मंदिर के चारों ओर परिक्रमा करते हुए अपने अपने कार्य में मग्न हो गए थे।

चोल मंदिर की स्थापत्य शैली

ऐरावतेश्वर मंदिर का निर्माण सन् ११६६ में चोल वंश के राजा राजराजा चोल द्वितीय ने करवाया था।

यह एक वर्गाकार संरचना है। अन्य चोल मंदिरों के विपरीत इस मंदिर का परिक्रमा पथ मुख्य मंदिर के भीतर ना होकर मंदिर के बाह्य क्षेत्र में है।

मुख मंडप एवं अर्ध मंडप पार कर हम गर्भगृह पहुँचते हैं। प्रवेश द्वार के दोनों ओर दो विशालकाय द्वारपालों के शिल्प हैं। महामंडप स्तंभों से भरा हुआ है। मंदिर के लिंग की स्थापना महाराज राजराजा ने स्वयं करवाई थी। इसलिए इस लिंग को राज-राजेश्वर उदयनार भी कहते हैं।

मुख्य मंदिर के पार्श्वभाग में स्थित मंडप को अग्र-मंडप कहते हैं। इस मंडप का नामकरण चोल राजा के नाम पर किया गया है। इस मंडप की संरचना एक विशाल रथ के समान है। इसके प्रवेश पर स्थित सोपानों की यह विशेषता बताई जाती है कि ये संगीतमय सोपान हैं। इन पर चढ़ते ही भिन्न भिन्न सोपानों से संगीत के भिन्न भिन्न सुर निकलते हैं। यह जानकारी मुझे हमारे परिदर्शक ने प्रदान की थी। किन्तु मैं इसका अनुभव नहीं ले पायी क्योंकि वह स्थल जलमग्न था।

मंदिर की भित्तियों पर कई शिल्प पट्टिकाएं एवं शिलालेख हैं जिन पर शैव नयनार संतों की कथाएं प्रदर्शित हैं। अनेक पौराणिक गाथाओं का भी चित्रण है।

मंदिर परिसर में कुछ छोटे देवालय भी है। जैसे गणेश मंदिर, यम मंदिर, सप्तमातृका मंदिर आदि।

मंदिर परिसर अत्यंत विस्तृत है। इसे सप्त-वीथी भी कहते हैं। इसका अर्थ है, मंदिर जिसमें सात वीथिकाएँ अथवा गलियारे एवं सात मार्ग हैं। ठीक उसी प्रकार जैसा तिरुचिरापल्ली के श्रीरंगम मंदिर में है। वर्तमान में उन सातों में से केवल एक ही शेष है। मंदिर के गोपुरम एवं स्वयं मंदिर के भंगित अवशेष परिसर में चारों ओर बिखरे हुए हैं।  मेरे अनुमान से १४वीं शताब्दी में इस मंदिर पर आततायियों ने आक्रमण किया था एवं मंदिर को इस स्थिति में पहुँचाया था।

मंदिर से सम्बंधित लोककथा

किवदंतियों एवं मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर का निर्माण उस चरवाहिन की अभिलाषा को पूर्ण करने के लिए किया गया था जिसने तंजावुर के बृहदीश्वर मंदिर के शिखर के लिए शिला का दान किया था। उसकी अभिलाषा थी कि ऐसा ही एक विशाल मंदिर का निर्माण उसके ग्राम में भी किया जाए।

मुझे इस विनिमय ने अचंभित कर दिया। एक सामान्य स्त्री राजा के प्रिय मंदिर के निर्माण के लिए शिला का दान कर रही है। इसके प्रतिफल के रूप में वह स्वयं के लिए किसी भी वस्तु की माँग रख सकती थी। लेकिन उसने क्या माँगा! उसने माँग रखी कि ऐसा ही एक मंदिर उसके ग्राम में भी हो। क्या इससे प्राचीन काल के भारतीयों के नैतिक मूल्यों एवं उनकी प्राथमिकताओं की छवि नहीं प्राप्त होती? उस काल में कला एवं संस्कृति का महत्त्व सर्वोपरि था।

ऐरावतेश्वर मंदिर के गज शिल्प

ऐरावतेश्वर मंदिर का नामकरण इंद्र के गज ऐरावत के नाम पर किया गया है। ऐसी मान्यता है कि इंद्र के गज ऐरावत ने पवित्र कावेरी नदी से पोषित इस मंदिर के जलकुण्ड में स्नान किया था। इसके पश्चात उसकी त्वचा दैदीप्यमान हो गयी थी। यह दंतकथा मंदिर की शिला पर भी उत्कीर्णित है।

सोपानों के दोनों ओर गज प्रतिमाएं उत्कीर्णित हैं। उन्हें देख ऐसा प्रतीत होता है मानो ये गज मंदिर को अपनी पीठ पर उठाये हुए हैं। समीप ही जगती की भित्ति पर दो पैरों पर खड़े दौड़ती हुई मुद्रा में अश्व उत्कीर्णित हैं। उनके पृष्ठ भाग में रथ के चक्र उत्कीर्णित हैं। भित्तियों पर भी रथ के चक्र इस प्रकार उत्कीर्णित हैं कि वे इस मंदिर को एक रथ की छवि प्रदान करते हैं।

ऐसी मान्यता है कि रथ के ये चक्र वास्तव में सौर घड़ियाँ हैं। इनका प्रयोग प्रातःकाल एवं संध्याकाल में समय आंकने के लिए किया जाता है। रथ के आकार के ऐसे मंदिरों को करक्कोइल कहा जाता है। इनकी प्रेरणा मंदिर में देवों की शोभायात्रा में प्रयुक्त विशाल रथों से प्राप्त की गयी है। एक तत्व जो मुझे भ्रामक प्रतीत हुई वह यह कि गज एवं अश्व एक दिशा में ना जाते हुए एक दूसरे से लम्बवत दिशा में जाते दर्शाए गए हैं।

अन्य दो मंदिर जो चक्र युक्त रथ के आकार के प्रतीत होते हैं, वे हैं, ओडिशा का कोणार्क सूर्य मंदिर एवं हम्पी का विट्ठल मंदिर

मुख्य मंदिर के चारों ओर नंदी की अनेक लघु प्रतिमाएं हैं। दो प्रतिमाओं के मध्य कमल पुष्प उत्कीर्णित है। साहित्यों के अनुसार कदाचित ये कम ऊँचाई की भित्तियाँ थीं जिनका उद्देश्य मंदिर के चारों ओर कुण्ड का आभास प्रदान करना था। उसके अनुसार कदाचित यह मेरा सौभाग्य था कि मैंने मंदिर को उसी रूप में देखा जैसा की यह पूर्व में नियोजित था।

भगवान शिव एवं चोल मंदिर

सभी चोल मंदिरों की विशेषता है कि उनके पृष्ठ भाग की बाह्य भित्ति पर शिवलिंग होता है जिसके मध्य से भगवान शिव प्रकट होते दर्शाए जाते हैं। इस मंदिर में भी ऐसा ही एक लिंग है। इसे लिंगोद्भव कहते हैं। इसका अर्थ है, लिंग से शिव का उद्भव। मंदिर के स्तंभों पर विस्तृत उत्कीर्णन हैं। उन पर इतिहास पुराण की कथाएं एवं विभिन्न नृत्य मुद्राएँ उत्कीर्णित हैं। मंदिर स्थापत्य शैली एवं वास्तुकला के विद्यार्थियों के लिए यह मंदिर ज्ञान अर्जन का स्वर्णिम अवसर प्रदान करता है।

लिंगोद्भव मूर्ति
लिंगोद्भव मूर्ति

मुख्य मंदिर से अभिषेक के जल को बाह्य दिशा की ओर संचालित करते व्याल मुखों पर भी विस्तृत उत्कीर्णन है। उन पर सिंह मुख की आकृति बनाई गयी है।

मेरी इस यात्रा में अवलोकित मंदिरों में से यह इकलौता ऐसा मंदिर है जिनके जाली युक्त झरोखों पर विलोम स्वस्तिक आकृतियाँ एवं वर्गाकार आकृतियाँ क्रम से उकेरी गयी हैं। कुछ स्थानों पर लाल एवं हरित रंग पुते हुए हैं। उन्हें देख ऐसा प्रतीत होता है कि कदाचित अनुत्कीर्णित भागों पर रंगाई की गयी थी। मेरी तीव्र अभिलाषा है कि ऐसे मंदिरों को इनके पूर्ववत भव्य अवस्था में लाने का प्रयास किया जाना चाहिए। मंदिरों का नवीनीकरण इसी दिशा में होना चाहिए।

नंदी मंडप

इस मंदिर का नंदी मंडप मुख्य गोपुरम के बाह्य भाग में है। यह एक लघु मंडप है। जिस जगती पर शिवलिंग स्थापित है, उस जगती के तल से यह मंडप कहीं अधिक निचले तल पर है। मुझे बताया गया कि पूर्वकाल में वर्तमान गोपुरम के स्थान पर यहाँ उससे अधिक विशाल गोपुरम था। अब उनके केवल अवशेष ही शेष रह गए हैं।

इस मंदिर का एक अन्य विशेष तत्व है, स्तंभों के आधार याली के आकार में उत्कीर्णित हैं। इस प्रकार के स्तम्भ हमें महाबलीपुरम एवं कांचीपुरम के मंदिरों में भी दृष्टिगोचर होते हैं। याली एक पौराणिक पशु है जिसका शरीर विभिन्न पशुओं का सम्मिश्रित रूप होता है। उसका मुख गज का, धड़ सिंह का, कर्ण सूकर का, सींग बकरी के एवं पूँछ गौमाता का होता है।

देवी मंदिर

मुख्य मंदिर के एक ओर देवी मंदिर है जो ऐरावतेश्वर मंदिर के समकालीन है। यह पेरिया नायकी अम्मा का मंदिर है। दुर्भाग्य से यहाँ जल संचयन मुख्य मंदिर से भी अधिक था जिसके कारण मैं मंदिर के भीतर नहीं जा सकी।

दारासुरम मंदिर के स्तम्भ
दारासुरम मंदिर के स्तम्भ

हो सकता है कि किसी काल में यह मुख्य मंदिर संकुल का अभिन्न अंग रहा होगा किन्तु अब यह मुख्य मंदिर से असंलग्न है।

दारासुरम

दरासुरम, यह नाम कदाचित दारुका-वन, इस शब्द से व्युत्पन्न है। कनकल एवं ऋषि पत्नी के अनेक चित्र हैं जो इस ओर संकेत करते हैं।

यह कोल्लीडम नदी के निकट स्थित है जो कावेरी नदी के मुहाने का भाग है।

उत्सव

यह एक शिव मंदिर होने के नाते यहाँ का प्रमुख उत्सव शिवरात्रि है।

मंदिर का वार्षिक उत्सव माघ मास में आयोजित किया जाता है। अंग्रेजी पंचांग के अनुसार यह काल लगभग जनवरी मास में पड़ता है।

दारासुरम ऐरावतेश्वर मंदिर – यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल

यह मंदिर भारत के दक्षिणी राज्य तमिल नाडु में स्थित है। कुम्भकोणम के निकट दारासुरम नामक नगर में स्थित होने के कारण इस मंदिर को दारासुरम मंदिर भी कहते हैं। इसका निर्माण लगभग १२वीं सदी में चोल वंश के राजा राजराजा चोल द्वितीय ने करवाया था। इस मंदिर में भगवान शिव के ऐरावतेश्वर रूप की आराधना की जाती है।

ऐरावतेश्वर मंदिर यूनेस्को द्वारा घोषित एक विश्व धरोहर स्थल है। सन् २००४ में इस मंदिर को यूनेस्को द्वारा घोषित विश्व धरोहर स्थलों की सूची में सम्मिलित किया गया था। उस सूची में इस मंदिर को महान जीवंत चोल मंदिरों के उप-वर्ग के अंतर्गत सम्मिलित किया गया है।

दारासुरम यात्रा से सम्बंधित कुछ सुझाव

दारासुरम तंजावुर से लगभग ४० किलोमीटर दूर है। आप तंजावुर में अपना पड़ाव रखते हुए बृहदीश्वर का बड़ा मंदिर, गंगईकोंडा चोलपुरम तथा आसपास के अन्य आकर्षणों का अवलोकन कर सकते हैं।

मंदिर नगरी चिदंबरम से तंजावुर की मंदिर नगरी जाते हुए भी आप मध्य में विमार्ग लेते हुए ऐरावतेश्वर मंदिर जा सकते हैं।

सार्वजनिक परिवहन की सुविधाएं आसानी से उपलब्ध हैं।

ऐरावतेश्वर मंदिर पहुँचने के लिए निकटतम विमानतल तिरुचिरापल्ली है जो लगभग ९० किलोमीटर दूर स्थित है। यदि आप तिरुचिरापल्ली की ओर से यहाँ आ रहे हैं तो आप श्रीरंगम के भी दर्शन कर सकते हैं।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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उडुपी का श्री कृष्ण मठ भक्तों का लोकप्रिय मंदिर https://inditales.com/hindi/udupi-shri-krishna-mutt-karnataka/ https://inditales.com/hindi/udupi-shri-krishna-mutt-karnataka/#respond Wed, 30 Nov 2022 02:30:49 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2878

भारत के पश्चिमी तट पर बसी उडुपी मंदिरों की नगरी है जो भक्तों का बड़े उत्साह से स्वागत करती है। यह एक परशुराम क्षेत्र है जिसके मध्य में श्री कृष्ण मठ स्थित है। साथ ही यहाँ चन्द्रमौलेश्वर मंदिर एवं अनंतेश्वर मंदिर नामक प्राचीन मंदिर भी हैं। उडुपी के श्री कृष्ण मठ का इतिहास श्री कृष्ण […]

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भारत के पश्चिमी तट पर बसी उडुपी मंदिरों की नगरी है जो भक्तों का बड़े उत्साह से स्वागत करती है। यह एक परशुराम क्षेत्र है जिसके मध्य में श्री कृष्ण मठ स्थित है। साथ ही यहाँ चन्द्रमौलेश्वर मंदिर एवं अनंतेश्वर मंदिर नामक प्राचीन मंदिर भी हैं।

उडुपी के श्री कृष्ण मठ का इतिहास

श्री कृष्ण मंदिर की स्थापना के पूर्व से ही उडुपी एक पावन भूमि कहलाती थी। यहाँ स्थित प्राचीन चन्द्रमौलेश्वर मंदिर एवं अनंतेश्वर मंदिर वर्षों से अनेक भक्तगणों को अपनी ओर आकर्षित करते रहे थे। उडुपी के दक्षिणी ओर, लगभग १२ किलोमीटर की दूरी पर पजाका नामक गाँव है जिसे द्वैत दार्शनिक श्री माधवाचार्य का जन्मस्थान माना जाता है। १२३८ ई. में पजाका में जन्मे माधवाचार्य जी ने ना केवल द्वैत दर्शन की स्थापना की थी, अपितु उन्होंने श्री कृष्ण मंदिर की नींव भी रखी थी।

श्री कृष्ण मठ उडुपी
श्री कृष्ण मठ उडुपी

किवदंतियों के अनुसार श्री कृष्ण की पत्नी रुक्मिणी ने अपने पति से बालकृष्ण अर्थात् कृष्ण के बाल रूप की प्रतिमा की मांग की थी। श्री कृष्ण ने निर्माण व सृजन के देवता विश्वकर्मा से मूर्ति गढ़ने के लिए कहा। विश्वकर्मा देव ने शालिग्राम शिला द्वारा एक मनमोहक प्रतिमा गढ़ी तथा पूजन हेतु रुक्मिणी को प्रदान की। द्वारका में सैकड़ों भक्तों ने इस प्रतिमा पर चन्दन का लेप लगाकर इसकी आराधना की। प्रतिमा पूर्ण रूप से चन्दन के लेप से आच्छादित हो गयी।

एक भयावह बाढ़ की स्थिति में यह प्रतिमा द्वारका से बहकर दूर चली गयी। जब एक व्यापारी जहाज के मल्लाह ने इसे देखा, वह उसे एक शिला समझ बैठा तथा जहाज को संतुलित करने के लिए उस का प्रयोग कर लिया। जब व्यापारी का जहाज द्वारका से मालाबार जा रहा था तब तुलुब के निकट वह जहाज डूब गया। उसमें गोपीचंदन से ढकी भगवान कृष्ण की वह मूर्ति भी थी। उस समय भगवान ने स्वयं माधवाचार्य जी के स्वप्न में अवतरित होकर उन्हें आज्ञा दी। माधवाचार्य ने मूर्ति को जल से निकाल कर उडुपी में उसकी स्थापना की। इस मूर्ति की स्थापना लगभग ७०० वर्ष पूर्व हुई थी।

श्री कृष्ण मंदिर

इस मंदिर की यह विशेषता है कि इसके आसपास ८ मठ स्थापित हैं जो क्रमशः, चक्रीय क्रम में इस मंदिर का कार्यभार संभालते हैं। पूर्व में यह अवधि दो मास की थी जिसे कालांतर में स्वामी वदिराज ने परिवर्तित कर दो वर्ष कर दिए थे।

श्री कृष्ण मठ उडुपी का आकाशीय दृश्य
श्री कृष्ण मठ उडुपी का आकाशीय दृश्य

कार्यावधि परिवर्तन को पर्याय महोत्सव के रूप में आयोजित किया जाता है जिसमें मंदिर का प्रशासन  एक मठ से दूसरे मठ को स्थानांतरित किया जाता है। संत माधवाचार्य जी द्वारा स्थापित इन आठ मठों के नाम उन गाँवों पर दिए गए हैं जहाँ इनकी स्थापना की गयी है, पालिमारु, अदमरू, कृष्णपुरा, पुत्तिगे, शिरूर, सोढे, कनियूरू, पेजावर। इन मठों के मुख्यालय श्री कृष्ण मंदिर के आसपास ही स्थित हैं।

कनकदास कथा

कृष्ण मठ का मनोहर गोपुरम
कृष्ण मठ का मनोहर गोपुरम

मंदिर में प्रवेश से पूर्व आपकी दृष्टि एक झरोखे पर निर्मित एक अलंकृत गोपुरम पर पड़ेगी। गोपुरम एक विशाल, उत्कीर्णित व अलंकृत अटारी होता है जो दक्षिण भारत के मंदिरों के प्रवेश द्वारों के ऊपर स्थित होता है। यह दक्षिण भारत में बहुप्रचलित द्रविड़ शैली की वास्तुकला का अप्रतिम उदहारण है। श्री कृष्ण मंदिर के इस झरोखे से आप सीधे मंदिर में स्थापित भगवान की प्रतिमा को देख सकते हैं। एक लोककथा के अनुसार कनकदास भगवान कृष्ण का एक परम भक्त था जो भगवान के दर्शन के लिए उडुपी के इस श्री कृष्ण मंदिर में आया था। किन्तु उसे भगवान के दर्शन नहीं प्राप्त हुए। उसने भगवान कृष्ण से प्रार्थना की। भगवान ने प्रसन्न होकर उसकी ओर मुख कर लिया। आज भी यह प्रथा है कि भक्तगण सर्वप्रथम इस झरोखे से भगवान कृष्ण के दर्शन करते हैं जिसके पश्चात ही वे मंदिर में प्रवेश करते हैं। यह बताना आवश्यक है कि इस कथा को ना ही किसी ग्रन्थ में, ना ही किसी साधक द्वारा प्रमाणित किया गया है।

श्री कृष्ण मंदिर में प्रवेश करने से पूर्व, समक्ष स्थित चन्द्रमौलिश्वर मंदिर में दर्शन करने की प्रथा प्रचलित है।

हाल ही में मंदिर के अधिकारियों ने मंदिर में प्रवेश हेतु भक्तों के लिए परिधान संहिता निर्दिष्ट की है जिसके अनुसार स्त्रियों को साड़ी अथवा सलवार-कुर्ता तथा पुरुषों को धोती एवं अंगवस्त्र धारण करना अनिवार्य है।

विष्णु की कथाएं कहते गोपुरम का स्थापत्य
विष्णु की कथाएं कहते गोपुरम का स्थापत्य

मंदिर में प्रवेश करते ही हमें एक भिन्न वातावरण की अनुभूति होती है। एक आकस्मिक निस्तब्धता, एक दिव्य प्रभामंडल हमें अभिभूत कर देती है। चारों ओर का विश्व गतिहीन प्रतीत होने लगता है। काले कडप्पा शिलाओं द्वारा निर्मित इसकी शीतल भूमि उडुपी के उष्ण व आर्द्र वातावरण से छुटकारा दिलाती है। श्री कृष्ण मंदिर का गर्भगृह एक लंबे गलियारे के बाईं ओर स्थित है। भगवान की प्रतिमा अत्यंत मनमोहक है। उनके दर्शन करते ही हृदय प्रसन्न हो जाता है। उत्सवों में गर्भगृह के चारों ओर तेल के दीपक प्रज्ज्वलित किये जाते हैं।

मंदिर मंडप

आगे बढ़ते हुए आप मंदिर के मुख्य मंडप में पहुंचेंगे। यह एक विस्तृत मंडप है जो भक्तों के विभिन्न क्रियाकलापों से गुंजायमान रहता है। एक कोने में पर्याय मठ के वर्तमान गुरु भक्तों के लिए विभिन्न अनुष्ठान आयोजित करते हैं तथा भक्तों के विभिन्न समस्याओं के निवारण का मार्ग भी सुझाते हैं। मंडप के भीतर एक हनुमान मंदिर है तथा एक नवग्रह मंदिर भी है। प्रातः ६ बजे से लेकर रात्रि ९ बजे तक भोजन मंडप में भक्तों के लिए अन्नदान आयोजित किया जाता है। यहाँ परोसे जाने वाला भोजन सरल किन्तु स्वादिष्ट होता है जिसे अत्यंत भक्तिभाव से बनाया व परोसा जाता है।

कृष्ण मठ का रथ
कृष्ण मठ का रथ

मंडप के एक छोर पर गौशाला है। किन्तु उसके भीतर जाने की अनुमति हमें नहीं है। केवल उसके अभिरक्षक ही भीतर जा सकते हैं। दैनिक प्रसाद तथा नैवेद्य प्राप्त करने के लिए एक छोटी दुकान भी है।

मंडप से बाहर जाते ही आपको मंदिर के हाथी, सुभद्रा की गजशाला दिखाई देगी। यद्यपि अब सुभद्रा गज को होन्नाली नगरी में रखा गया है, तथापि विशेष अवसरों व उत्सवों में उसे यहाँ लाया जाता है।

श्री कृष्ण मठ मंदिर संकुल

मंदिर के चारों ओर आठ मठ, अनेक अतिथि गृह एवं जलपान गृह हैं।

माधव सरोवर - श्री कृष्ण मठ उडुपी
माधव सरोवर – श्री कृष्ण मठ उडुपी

एक जलपान गृह ऐसा है जहाँ आपको अवश्य जाना चाहिए। वह है, मित्र समाज। मंदिर के आसपास उनके दो जलपान गृह हैं तथा एक जलपान गृह उडुपी नगरी में है। उनकी गर्म गोली भाजी, बन, फिल्टर कॉफी आदि आपकी सुबह को प्रफुल्लित कर देगी।

गीता भवन
गीता भवन

मंदिर के भोजनालय में स्वादिष्ट भोजन करने के पश्चात मंदिर परिसर में ही कुछ समय व्यतीत करें। मंदिर से कुछ मीटर दूर मुझे अचानक एक पुस्तक की दुकान दिखाई दी जिसका नाम था, नंदिता फ्रेग्रेन्स बुकस्टोर। यद्यपि यह दुकान मंदिर परिसर में स्थित है, तथापि यह आसपास के विभिन्न क्रियाकलापों एवं चहल-पहल से कुछ क्षण के लिए हमें पलायन देती है। इस दुकान में संस्कृत की पुस्तकें, अध्यात्म, ज्योतिषशास्त्र, दर्शन शास्त्र आदि पर पुस्तकें तथा विभिन्न शास्त्रों के अंग्रेजी, हिन्दी व कन्नड़ भाषा में अनुवाद उपलब्ध हैं।

संस्कृत महाविद्यालय

मंदिर के पृष्ठभाग में एक संस्कृत महाविद्यालय है। इस पुस्तक दुकान में वेदों, उपनिषदों, पुराणों आदि के संस्कृत भाषा में ग्रन्थ उपलब्ध हैं। मैंने कवि कालिदास द्वारा रचित कुमारसंभव, अष्टावक्र गीता एवं The Yoga of Kashmir Shaivism नामक पुस्तक का क्रय किया।

इस संस्कृत महाविद्यालय में संस्कृत में स्नातक, स्नातकोत्तर एवं अन्य अल्पावधि पाठ्यक्रम के अध्ययन निशुल्क उपलब्ध कराये जाते हैं। इस महाविद्यालय में विश्व भर से अनेक विद्यार्थी ज्ञान अर्जन के लिए आते हैं। इस महाविद्यालय में सभी प्रकार के संस्कृत ग्रंथों से भरा एक पुस्तकालय है जिसमें कालिदास एवं शुद्रका जैसे महा नाटकों से लेकर दर्शन तक की पुस्तकें उपलब्ध हैं।

समीप ही अनेक दुकानें हैं जहाँ लकड़ी की बिलोनी जैसी अनेक काष्ठी वस्तुएं, चीनी मिट्टी के पात्र, लौह पात्र तथा श्री कृष्ण व अन्य देवी देवताओं की पीतल में निर्मित प्रतिमाएं विक्री के लिए रखी हुई हैं। यदि आप विभिन्न प्रकार के व्यंजनों में रूचि रखते हैं तो यहाँ से अनेक स्थानीय व्यंजन ले सकते हैं जैसे, चुर्मुरी, फरसान, चकली, मुरुक्कू आदि।

यदि आपके पास कुछ अतिरिक्त समय हो आप समीप के अन्य तीर्थ स्थलों का अवलोकन कर सकते हैं जैसे, कोल्लूर मूकाम्बिका, कतील, श्रृंगेरी, मुरुडेश्वर एवं गोकर्ण

मठ के उत्सव

यदि आप जन्माष्टमी एवं पर्याय महोत्सव जैसे उत्सवों में यहाँ आ पायें तो यह सोने पर सुहागा होगा। आपको यहाँ के भव्य उत्सवों के अवलोकन का आनंद प्राप्त होगा।

जन्माष्टमी उत्सव

उत्सव के अवसर पर मंदिर की सजावट
उत्सव के अवसर पर मंदिर की सजावट

श्री कृष्ण मंदिर में जन्माष्टमी का उत्सव विट्टल पिंडी के नाम से जाना जाता है। यह उत्सव बड़ी भव्यता एवं उत्साह से मनाया जाता है। सम्पूर्ण मंदिर को विस्तृत रूप से विभिन्न पुष्पों द्वारा अलंकृत किया जाता है। तेल के अनेक दीप प्रज्ज्वलित किये जाते हैं। भक्त गण दूर-सुदूर स्थलों से आकर यहाँ एकत्र होते हैं तथा श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का उत्सव मनाते हैं। भगवान को एक स्वर्ण रथ पर विराजमान किया जाता है तथा सम्पूर्ण मंदिर परिसर में उनका भ्रमण कराया जाता है।

इस उत्सव की विशेषता यह है, हुली वेष अर्थात बाघ आवरण के परिधान धारण कर नर्तकों के विभिन्न समूह पारंपरिक नृत्य प्रदर्शित करते हैं।

पर्याय महोत्सव

पर्याय महोत्सव का आयोजन तब किया जाता है जब मंदिर का प्रशासन एक मठ से दूसरे मठ के हाथों में सौंपा जाता है। प्रत्येक मठ के हाथों में दो वर्षों के लिए मंदिर के प्रशासन का कार्यभार रहता है।

श्री कनियुरु मठ - उडुपी
श्री कनियुरु मठ – उडुपी

ग्रंथों के अनुसार, यह उत्सव प्रत्येक दो वर्षों में मकर संक्रांति के पश्चात, चौथे दिवस आयोजित किया जाता है। यह दिवस १८ जनवरी के दिन आता है। इस उत्सव में उडुपी के आसपास के सभी घरों को दीयों एवं साज-सज्जा से अलंकृत किया जाता है। उडुपी नगरी के विभिन्न चौकों एवं सार्वजनिक स्थलों पर सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। अन्न संतर्पण आयोजित किये जाते हैं जिनमें बड़े स्तर पर अन्न वितरण किया जाता है। इस वर्ष कृष्णपुर मठ के दैवज्ञ स्वामी विद्यासागर तीर्थ ने अदमरू मठ के दैवज्ञ संत ईशप्रिय तीर्थ स्वामीजी से मंदिर का कार्यभार स्वीकार किया है।

श्री कृष्ण मंदिर दर्शन एवं उडुपी भ्रमण के लिए सर्वोत्तम काल

उडुपी भ्रमण के लिए सर्वोत्तम काल सितम्बर से फरवरी का होता है। यही काल मंदिर अवलोकन के लिए भी सर्वोत्तम है। ग्रीष्म ऋतु में यहाँ की उष्णता एवं आर्द्रता कष्टकर हो सकती है। जून से सितम्बर के मध्य यहाँ भारी वर्षा का अनुमान सदा रहता है। भारी वर्षा की स्थिति में यात्रा में कुछ कष्ट हो सकता है, जैसे सड़कों की परिस्थिति, वर्षा के कारण बाहर ना निकल पाना, स्वास्थ्य आदि। किन्तु जिन्हें वर्षा ऋतु प्रिय है तथा जिन्हें वर्षा ऋतु मार्ग का रोड़ा प्रतीत नहीं होती, उन्हें वर्षा ऋतु में भी उडुपी में आनंद आएगा क्योंकि मानसून में इस क्षेत्र का प्राकृतिक सौंदर्य एवं हरियाली अपनी चरम सीमा पर होती है।

परिवहन एवं आवास

उडुपी पहुँचने के लिए निकटतम विमानतल मंगलुरु है। यह उडुपी से लगभग ५५ किलोमीटर दूर स्थित है। आप मंगलरू से टैक्सी अथवा बस द्वारा उडुपी पहुँच सकते हैं। यदि आपको रेल यात्रा भाती है तो आप रेल द्वारा भी यहाँ पहुँच सकते हैं। उडुपी रेल मार्ग द्वारा देश के सभी भागों से जुड़ा हुआ है। यदि आप बंगलुरु से आ रहे हैं तो आप कारवार एक्सप्रेस अथवा विस्ताडोम द्वारा यात्रा कर सकते हैं। बंगलुरु से उडुपी तक, लगभग ८ घंटों की यात्रा में आपको पश्चिमी घाटों के अप्रतिम प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद उठाने का अवसर प्राप्त होगा। बंगलुरु, मुंबई, पुणे, मंगलुरु जैसे देश के सभी प्रमुख नगरों या शहरों से उडुपी के लिए बस सेवायें भी उपलब्ध हैं।

उडुपी अनेक वर्षों से एक लोकप्रिय तीर्थ स्थल रहा है। इसीलिए यहाँ लघुकालीन आवासों, विश्राम गृहों, होटलों तथा रिसोर्ट की कोई कमी नहीं है। आपके सामर्थ्य के भीतर आपको लघुकालीन आवासों, विश्राम गृहों, होटलों तथा रिसोर्ट के अनेक पर्याय उपलब्ध हो जायेंगे। आपको सभी स्थानों पर स्वादिष्ट शाकाहारी भोजन भी आसानी से प्राप्त हो जाएगा।

यह संस्करण IndiTales Internship Program के अंतर्गत अक्षया विजय ने लिखा है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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होरनाडु, प्रकृति की गोद में स्थित एक मनमोहक व अत्यंत दर्शनीय गाँव है। यह कर्णाटक के चिकमगलुरु जिले के अंतर्गत, मुदिगेरे तालुका के अप्रतिम परिदृश्यों से युक्त पश्चिमी घाट में स्थित है। यह स्थान अपने चित्ताकर्षक निसर्ग व अनेकों आकर्षक मंदिरों के लिए जाना जाता है जिनमें अन्नपूर्णेश्वरी मंदिर प्रमुख है। होरनाडु का अन्नपूर्णेश्वरी मंदिर […]

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होरनाडु, प्रकृति की गोद में स्थित एक मनमोहक व अत्यंत दर्शनीय गाँव है। यह कर्णाटक के चिकमगलुरु जिले के अंतर्गत, मुदिगेरे तालुका के अप्रतिम परिदृश्यों से युक्त पश्चिमी घाट में स्थित है। यह स्थान अपने चित्ताकर्षक निसर्ग व अनेकों आकर्षक मंदिरों के लिए जाना जाता है जिनमें अन्नपूर्णेश्वरी मंदिर प्रमुख है।

होरनाडु का अन्नपूर्णेश्वरी मंदिर

होरनाडू का श्री अन्नपूर्णेश्वरी मंदिर
होरनाडू का श्री अन्नपूर्णेश्वरी मंदिर

होरनाडु स्थित अन्नपूर्णेश्वरी मंदिर को आद्यशक्तिनाथमका श्री अन्नपूर्णेश्वरी अम्मनवरा मंदिर भी कहते हैं। भद्रा नदी के तट पर स्थित यह मंदिर चहुँ ओर से हरियाली भरे वनों, कॉफ़ी व चाय के बागीचों एवं पश्चिमी घाटों से घिरा हुआ है। लगभग ४०० वर्षों पूर्व धर्मकार्थरु पुरोहितों के परिवारजनों ने यहाँ पूजा-अर्चना एवं अन्य अनुष्ठानों का आयोजन आरम्भ किया था। उस काल से धर्मकार्थरु परिवार के सदस्यगण ही मंदिर की सेवाकार्य में रत हैं।

अन्नपूर्णेश्वरी की कथा

किवदंतियों के अनुसार, एक समय भगवान शिव एवं देवी पार्वती चौपड़ खेल रहे थे। क्रीड़ा के समय उन दोनों  के मध्य किसी विषय पर विवाद उत्पन्न हो गया। उस विवाद के मध्य शिव ने कहा कि इस संसार में सब माया है। यहाँ तक कि भोजन भी एक माया है। पार्वतीजी शिव के विचारों से असहमत थीं। अपना मत सिद्ध करने के लिए वे अदृश्य हो गयीं। इसके फलस्वरूप, चारों ओर अकाल पड़ गया। असुरों समेत सभी को भोजन के लाले पड़ गए। सभी भोजन प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करने लगे।

श्री अन्नपूर्णेश्वरी मंदिर
श्री अन्नपूर्णेश्वरी मंदिर

जब भगवान शिव ने सबकी व्यथा देखी, उन्हें अपनी भूल का आभास हुआ। उन्होंने स्वीकार किया कि भोजन माया नहीं है, अपितु वह सभी जीवों की मूलभूत आवश्यकता है। तत्पश्चात देवी पार्वती काशी में अवतरित हुईं तथा उन्होंने सभी को भोजन वितरित किया। ऐसी मान्यता है कि स्वयं भगवान शिव भी एक याचक का रूप धर कर देवी पार्वती के सम्मुख प्रकट हुए तथा देवी ने उन्हें अपनी कडछी से भोजन परोसा। इसीलिए देवी पार्वती को देवी अन्नपूर्णेश्वरी भी कहा जाता है जिसका अर्थ है भोजन प्रदान करने वाली देवी।

उसी दिन से देवी अन्नपूर्णा काशी की अधिष्ठात्री देवी हैं। देवी पार्वती के अन्नपूर्णा स्वरूप में उनके एक हाथ में पात्र एवं दूसरे हाथ में कडछी होती है। आदि शंकराचार्य ने उनकी स्तुति में एक अप्रतिम अन्नपूर्णा स्तोत्र की रचना की है जिसका उच्चारण भोजन ग्रहण करने से पूर्व किया जाना चाहिए।

एक अन्य दंतकथा के अनुसार, किसी काल में भगवान शिव ने ब्रह्मा का शीर्ष विच्छेदन किया था। उसका शीश भगवान शिव के हाथ में चिपक गया। उन्हें श्राप मिला कि जब तक वह मुंड भोजन अथवा धान्य से भर नहीं जाता, वह शिव के हाथ से ऐसे ही चिपका रहेगा। भगवान शिव ने उसे धान्य से भरने का अथक प्रयास किया किन्तु वह मुंडपात्र रिक्त ही रहता था। शिव उस मुंड को भरने के लिए अनेक स्थानों पर गए एवं भोजन की मांग की किन्तु मुंड भरा नहीं। अंततः वे इस मंदिर में आये जहां माँ अन्नपूर्णेश्वरी ने वह मुंड धान्य से भर दिया। उन्होंने भगवान शिव को श्राप से भी मुक्त किया।

इतिहास

ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण सदियों पूर्व महर्षी अगस्त्य ने किया था। वर्तमान में जो मंदिर हम देखते हैं, उसकी पुनःस्थापना पांचवें धर्मकार्थरु ने वस्तु शिल्प एवं ज्तोतिश शास्त्र के अनुसार सन्१९७३ में की थी। अक्षय तृतीया की पवन तिथि में इसकी पुनर्स्थापना हुई थी। श्रृंगेरी शारदापीठम के श्री जगद्गुरु शंकराचार्य ने यहाँ महाकुम्भाभिषेक संपन्न किया था।

स्थापत्य

मंदिर का गोपुरम अत्यंत भव्य एवं समृद्धता से सज्जित है जिस पर विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतिमाएं हैं। कुछ सीढ़ियाँ चढ़कर हम मंदिर के भीतर पहुंचते हैं। मंदिर की तिरछी छत पर लाल रंग के कवेलू हैं जिन्हें हम सामान्यतः मलनाड क्षेत्र में देखते हैं। प्रसादम का मंडपम मंदिर के प्रवेश द्वार के बाईं ओर है। इसके समीप, मंदिर के भीतर जाने वाले भक्तजनों की भीड़ को पंक्ति में संयमित करने के लिए बाड़ लगाई हुई है।

मंदिर की आन्तरिक छत को विभिन्न प्रकार के उत्कीर्णन द्वारा सुन्दरता से अलंकृत किया गया है। सिंहों की दो विशाल प्रतिमाएं प्रवेश द्वार की शोभा में चार चाँद लगाते हैं। गर्भगृह के तीन ओर स्तम्भ युक्त गलियारे हैं। गर्भगृह के भीतर देवी अन्नपूर्णेश्वरी की चतुर्भुज प्रतिमा एक पीठिका पर आसीन है। यह प्रतिमा स्वर्ण में निर्मित है तथा इसे आभूषणों एवं रेशमी वस्त्रों द्वारा अलंकृत किया है। देवी ने अपने ऊपरी दो हाथों में शंख व चक्र धारण किया है, वहीं उनके निचले दो हाथ वर मुद्रा एवं अभय मुद्रा में हैं। निचले हाथों पर श्री चक्र एवं देवी गायत्री के चिन्ह हैं। विग्रह के दोनों ओर दीप प्रज्वलित किये जाते हैं। प्रदक्षिणा के पश्चात, गर्भगृह के दाहिनी ओर निकास द्वार है। निकास के समय भक्तगण खिड़की से प्रसादम प्राप्त कर सकते हैं।

अन्नपूर्णेश्वरी मंदिर के पूजा एवं उत्सव

 मंदिर प्रातः ६:३० बजे से रात्रि ९ बजे तक खुला रहता है।

महामंगल आरती प्रातः ९ बजे, सायं ६ बजे तथा रात्रि ९ बजे की जाती है।

नन्हे शिशुओं के नामकरण उत्सव एवं उनके अक्षराभाष्यं अनुष्ठान भी इस मंदिर में आयोजित किये जाते हैं। मंदिर में विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों की सुविधाएं उपलब्ध हैं। टिकट खिड़की के समीप इन अनुष्ठानों एवं इन सेवाओं के शुल्क की सूची है जिससे आप अपने नियोजन के अनुसार सेवाओं का चुनाव कर सकते हैं।

अक्षय तृतीया एक महत्वपूर्ण उत्सव है जिसे देवी अन्नपूर्णेश्वरी का जन्मदिवस माना जाता है। फरवरी-मार्च मास में चार से पाँच दिवसों के लिए रथोत्सव मनाया जाता है। नौ दिवसों का नवरात्रि भी एक महत्वपूर्ण उत्सव है।

यात्रा सुझाव:

  • यह मंदिर बंगलुरु से लगभग ३०० किलोमीटर एवं मंगलुरु से लगभग १३० किलोमीटर दूर स्थित है।
  • परिधान संबंधी नियमों का कड़ाई और आदर से पालन किया जाता है। मंदिर परिसर के भीतर आप अंगों को ढँक लें, ऐसी अपेक्षा की जाती है।
  • मंदिर संस्थान द्वारा भक्तगणों को दिवस भर में तीन भोजन उपलब्ध कराया जाता है। इसके अतिरिक्त, अनेक जलपानगृह भी हैं जहां शाकाहारी भोजन उपलब्ध हैं।
  • होरनाडु एवं उसके आसपास अनेक होमस्टे हैं। मंदिर में भी ठहरने की व्यवस्था है।

होरनाडु एवं आसपास के अन्य पर्यटन आकर्षण

श्री आंजनेय स्वामी मंदिर

अन्नपूर्णेश्वरी मंदिर के वाहन स्थल के समीप श्री हनुमान जी को समर्पित यह मंदिर स्थित है।

क्यातनमक्की पहाड़ी से परिदृश्य

यह स्थान होरनाडु से लगभग ८-१० किलोमीटर दूर स्थित है। यहाँ से पश्चिमी घाट का ३६० डिग्री दृश्य प्राप्त होता है। प्रकृति प्रेमियों एवं छायाचित्रकारों के लिए यह एक सर्वोत्तम स्थान है। पहाड़ी के ऊपर चारों ओर घनी दूब है जिसके मध्य से अनेक स्थानों पर पौधे झाँकते दृष्टिगोचर होते हैं।

क्यातनमक्की पहाड़ी से परिदृश्य
क्यातनमक्की पहाड़ी से परिदृश्य

घाटी में एक छोटा जलप्रपात है जिसे आप इस पहाड़ी के शीर्ष से देख सकते हैं। यहाँ तक पहुँचने के लिए होरनाडु से जीपों की सुविधाएं उपलब्ध हो जाती हैं। किन्तु वहां तक पहुँचने का मार्ग अत्यंत जर्जर एवं जोखिम भरा है। अतः मेरा सुझाव है कि आप होरनाडु से जीपों की सुविधाएं अवश्य लें। शक्तिशाली दुपहिये वाहनों द्वारा भी चालक पहाड़ी के शीर्ष तक रोमांचक यात्रा करते हैं किन्तु इसके लिए अति दक्षता एवं सुरक्षा आवश्यक है। यहाँ आने का सर्वोत्तम समय वर्षा ऋतु से दिसंबर मास तक माना जाता है क्योंकि उस समय यह पहाड़ी घनी हरियाली से आच्छादित रहती है।

कलसा का कलशेश्वर मंदिर

कलसा का कल्सेश्वर मंदिर
कलसा का कल्सेश्वर मंदिर

कलशेश्वर मंदिर अथवा श्री कलसेश्वरा स्वामी मंदिर चिकमंगलुरु जिले के कलसा नगर में स्थित है। यह होरनाडु से लगभग ८ किलोमीटर दूर स्थित एक शिव मंदिर है। भद्रा नदी के तट के समीप स्थित इस मंदिर का निर्माण महर्षी अगस्त्य द्वारा किया गया है, ऐसी मान्यता है। ऐसी भी मान्यता है कि मंदिर के भीतर स्थित शिवलिंग एक स्वयंभू लिंग है।

कलशेश्वर की लोककथा

एक लोककथा के अनुसार हिमालय में शिव एवं पार्वती के विवाह के समय धरती का संतुलन बाधित हो गया था। विवाह समारोह में उपस्थित देवी-देवताओं के भार के कारण उत्तरी टेक्टोनिक प्लेट तिरछा हो गया था। तब भगवान शिव ने महर्षी अगस्त्य को आज्ञा दी कि वे दक्षिण की ओर यात्रा करें ताकि धरती का संतुलन पुनः स्थापित हो सके। शिव की आज्ञा का पालन करते हुए महर्षी अगस्त्य ने दक्षिण की ओर यात्रा आरम्भ की। जब वे कलसा पहुंचे, धरती का संतुलन पुनः स्थापित हो गया। तब भगवान शिव ने उन्हें वहीं रुक जाने की आज्ञा दी। साथ ही उन्हें वरदान भी दिया कि वे उन के पवित्र विवाह समारोह का प्रत्यक्ष दर्शन वहां से भी कर सकेंगे। महर्षी अगस्त्य की भगवान शिव में इतनी भक्ति व आस्था थी कि उनके जल कलश से एक शिवलिंग प्रकट हुआ जो यहाँ स्थापित है। इसी कारण इस मंदिर का नाम कलशेश्वर मंदिर पड़ा।

स्थापत्य

कुछ सीढ़ियाँ चढ़कर हम इस मंदिर तक पहुंचते हैं। बायीं ओर एक मंडप है जहां उत्सवों के समय विभिन्न आयोजन किये जाते हैं। प्रवेशद्वार के समीप गणेशजी की दो मूर्तियाँ हैं। उन्हें आन गणपति कहा जाता है। उनमें से एक पुरुष रूप तथा दूसरा स्त्री रूप माना जाता है। कुछ और सीढ़ियाँ चढ़ने के पश्चात आप एक प्रांगण में पहुंचेंगे जहां गंगा की आराधना करते भागीरथ की प्रतिमा स्थापित है। सम्पूर्ण संरचना दो तलों की है जिसकी तिरछी छत पर लाल रंग के कवेलू रखे हैं। तिरछी छत पर लाल रंग के कवेलू इस क्षेत्र की इमारतों में सामान्य है।

दाईं ओर एक द्वार है जिसके भीतर से आप एक मुक्तांगण में पहुंचेंगे। यहाँ मुख्य मंदिर स्थित है। मुख्य मंदिर एक एककूट मंदिर है। मुख्य गर्भगृह एक अन्य लघु प्रांगण में स्थित है। चाँदी के मंच पर शिवलिंग स्थापित है। शिवलिंग पर भी चाँदी का मुखौटा चढ़ा हुआ है। मुक्तांगण में आप प्रदक्षिणा कर सकते हैं। प्रांगण के दो कोनों में विश्वेश्वर मंदिर एवं सुब्रमन्य मंदिर है।

मंदिर के बाहर देवी पार्वती का मंदिर है। देवी पार्वती को सर्वांगसुन्दरी कहा जाता है। देवी की प्रतिमा काले पत्थर में बनी है। पुष्पों, आभूषणों एवं वस्त्रों से देवी का अत्यंत मनमोहक अलंकरण किया गया है। मंदिर की बाह्य भित्तियों पर अनेक शिल्प उत्कीर्णित हैं। देवी के मंदिर के समीप क्षेत्रपाल को समर्पित एक लघु मंदिर है। समीप ही कुछ कार्यालय एवं अनेक छोटी दुकानें हैं जहां पूजा सामग्री बिक्री की जाती है।

पूजा एवं उत्सव

मंदिर प्रातः ७:३० बजे से दोपहर १ बजे तक, तदनंतर दोपहर ३:३० बजे से रात्रि ८:३० बजे तक खुला रहता है। महत्वपूर्ण उत्सवों के समय यह मंदिर पूर्ण दिवस व पूर्ण रात्रि खुला रहता है। मंदिर में विभिन्न सेवायें अर्पित की जाती हैं जिसका लाभ भक्तगण ले सकते हैं। इस मंदिर में आयोजित कुछ महत्वपूर्ण उत्सव हैं:

  • गिरिजा कल्याण – कार्तिक मास में भगवान शिव व देवी पार्वती के विवाह का समारोह आयोजित किया जाता है।
  • फरवरी-मार्च में शिवरात्रि मनाई जाती है।
  • माघ मास में रथोत्सव आयोजित किया जाता है।
  • नवरात्रि
  • गोकुलाष्टमी
  • लक्ष दीपोत्सव

अन्य आकर्षण

पंच तीर्थ

कलसा को पंच तीर्थ के नाम से भी जाना जाता है। पंच तीर्थ अर्थात् पाँच पवित्र जल स्त्रोतों का स्थल। वे हैं, वसिष्ठ तीर्थ, नागा तीर्थ, कोटि तीर्थ, रूद्र तीर्थ एवं अम्बा तीर्थ।

वेंकटरमण मंदिर

यह भी एक सुन्दर मंदिर है जो श्री विष्णु को समर्पित है। इसकी संरचना भी अन्य मंदिरों के समान है जिसमें तिरछी छत पर लाल रंग के कवेलू हैं। मुख्य मंदिर एक प्रांगण में है तथा इसके चारों ओर गलियारे हैं। यह मंदिर होरनाडु जाने के मार्ग पर स्थित है। इसके अतिरिक्त भी यहाँ अनेक मंदिर एवं जैन बसदियाँ हैं।

अन्य पर्यटन स्थल

समसे

समसे जैन बसदी
समसे जैन बसदी

कलसा से लगभग १० किलोमीटर दूर स्थित यह एक छोटा गाँव है। यह कुद्रेमुख पर्वत शिखर के पर्वतारोहणपथ का प्रमुख केंद्र है। ठहरने के लिए यहाँ अनेक होमस्टे हैं। यह स्थल अत्यंत दर्शनीय है जहां आप पैदल सैर करते हुए प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद ले सकते हैं। गूमंखन चाय के बागीचे में कुछ जैन बसदियाँ एवं एक सुन्दर गणपति मंदिर है।

कुद्रेमुख राष्ट्रीय उद्यान

कुद्रेमुख राष्ट्रीय उद्यान एक यूनेस्को विश्व विरासत स्थल है। यह प्राकृतिक सौंदर्य, जीवों व वनस्पतियों से भरे ऊंचे पर्वत शिखर, हरी-भरी दूब से आच्छादित मनमोहक रोहणपथ इत्यादि से अलंकृत है। कुद्रेमुख का शब्दशः अर्थ है अश्व का मुख। इस राष्ट्रीय उद्यान के सर्वोच्च पर्वत शिखर को एक दिशा ने निहारने पर यह अश्व मुख सदृश प्रतीत होता है। इस शिखर की ऊंचाई १८९४ मीटर है जो कर्नाटक का दूसरा सर्वोच्च शिखर है।

कुद्रेमुख राष्रीय उद्यान
कुद्रेमुख राष्रीय उद्यान

श्रृंगेरी, करकला एवं मंगलुरु जाने का मार्ग इसी राष्ट्रीय उद्यान के मध्य से जाता है। यह मार्ग अत्यंत दर्शनीय है। मार्ग में आप अनेक झरने एवं हरियाली भरे मैदानी क्षेत्र देखेंगे। आप कुद्रेमुख की भूतिया नगरी भी देख सकते हैं। यदि आप पर्वतारोहण में रूचि रखते हैं तो राष्ट्रीय उद्यान में पर्वतारोहण करने के लिए आपको कुद्रेमुख के राष्ट्रीय उद्यान वन-विभाग से अनुमति-पत्र प्राप्त करना होगा।

करकला

करकला उडुपी जिले का एक तालुका मुख्यालय है। यह पश्चिमी घाट की तलहटी पर स्थित है। होरनाडु से लगभग ८० किलोमीटर दूर स्थित करकला बाहुबली अर्थात् गोमतेश्वर की विशाल अखंड प्रतिमा के लिए प्रसिद्ध है जो श्रवणबेलगोला में स्थित उनकी प्रतिमा के पश्चात दूसरी विशालतम प्रतिमा है। सन् १४३२ में स्थापित इस प्रतिमा की उंचाई ४२ फीट है। प्रत्येक १२ वर्षों के पश्चात इस प्रतिमा का महाकुम्भाभिषेक किया जाता है। पिछला अभिषेक सन् २०१५ में किया गया था। यह प्रतिमा एक पहाड़ी पर स्थित है। वहाँ तक पहुँचने के लिए हमें लगभग ५०० शैल सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं।

और पढ़ें: कर्नाटक के बाहुबली

इनके अतिरिक्त, अनेक जैन बसदियाँ हैं जिनके आप दर्शन कर सकते हैं। उनमें प्रमुख हैं, चतुर्मुख बसदी एवं आदिनाथ बसदी। चतुर्मुख बसदी भी एक छोटी पहाड़ी पर स्थित है। शीर्ष तक पहुँचने के लिए कुछ सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। एक विशाल प्रांगण के मध्य स्थित इस बसदी में ग्रेनाईट के १०८ स्तम्भ हैं। गर्भगृह तक पहुँचने के लिए चार दिशाओं में चार प्रवेशद्वार हैं। इसके गर्भगृह में तीन तीर्थंकरों की प्रतिमाएं हैं।

आदिनाथ बसदी अनेकेरे सरोवर के मध्य स्थित है। इस बसदी को मुख्य मार्ग से जोड़ने के लिए एक जोड़ मार्ग है। बसदी के समीप एक छोटा बगीचा भी है। अनेकेरे सरोवर का निर्माण राजा पंड्यादेवा ने सन् १२६२ में करवाया था। नगर को जल की आपूर्ति कराना इस सरोवर का उद्देश्य था। इनके अतिरिक्त अन्य प्रमुख स्थल हैं, अत्तुर गिरिजाघर, रामसमुद्र सरोवर, वेंकटरमण मंदिर, अनंतशयन मंदिर तथा वेंनुर।

वरंगा जैन बसदी

करकला के निकट स्थित यह छोटा सा गाँव जैन बसदियों के लिए प्रसिद्ध है। प्रमुख बसदियाँ हैं, केरे बसदी एवं नेमिनाथ बसदी। केरे बसदी एक सरोवर के मध्य स्थित है। यह तीन ओर धान के हरे-भरे खेतों एवं नारियल के वृक्षों से घिरा हुआ है, वहीं इसकी चौथी ओर एक पहाड़ी है। इसे पार्श्वनाथ बसदी भी कहा जाता है क्योंकि यह पार्श्वनाथ को समर्पित है। इस बसदी की चार स्तरीय सममित संरचना है। यह बसदी ८५० वर्ष प्राचीन है। बसदी के भीतर देवी पद्मावती की प्रतिमा भी स्थापित है। सरोवर के मध्य स्थित केरे बसदी तक नौका द्वारा पहुंचा जा सकता है। बसदी प्रशासन नाममात्र शुल्क पर नौका सेवायें उपलब्ध करता है।

वारंगा जैन बसदी
वारंगा जैन बसदी

नेमिनाथ की बसदी १२०० वर्ष प्राचीन बसदी है। इसे हीरे बसदी भी कहा जाता है। इसके दो प्रवेशद्वार हैं। ग्रेनाईट में निर्मित मुख्य मंदिर एक प्रांगण के मध्य स्थित है। प्रवेशद्वार के समीप एक विशाल दीपस्तंभ है। इस बसदी में अनेक धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किये जाते हैं।

मूदबिदरी

करकला से १८ किलोमीटर दूर स्थित मूदबिदरी को जैन काशी भी कहा जाता है क्योंकि यहाँ बड़ी संख्या में जैन बसदियाँ हैं। उनमें से प्रमुख हैं, सहस्त्र स्तम्भ मंदिर, गुरु बसदी तथा अम्मनवरा बसदी।

श्रृंगेरी

करकला से ६० किलोमीटर दूर स्थित श्रृंगेरी श्री आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित शारदा पीठ के लिए प्रसिद्ध है।

धर्मस्थल

करकला से लगभग ६० किलोमीटर दूर स्थित धर्मस्थल एक प्राचीन शिव मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ भगवान शिव “श्री मंजुनाथ” के रूप में विराजमान हैं। नवम्बर-दिसंबर मास में आयोजित लक्षदीप इस मंदिर का एक महत्वपूर्ण उत्सव है।

यात्रियों के लिए महत्वपूर्ण सूचनाएं:

  • सभी धार्मिक स्थलों पर परिधान सम्बन्धी नियमों का कड़ाई से पालन किया जाता है। अतः उनका पालन करें।
  • कुद्रेमुख राष्ट्रीय उद्यान के भीतर कुछ निर्दिष्ट स्थानों के अतिरिक्त कहीं भी वाहन खड़ी करने की अनुमति नहीं है। उद्यान के भीतर कूड़ा डालना दंडनीय कृत्य है।

यह संस्करण अतिथि संस्करण है जिसे श्रुति मिश्रा ने इंडिटेल इंटर्नशिप आयोजन के अंतर्गत प्रेषित किया है।


श्रुति मिश्रा व्यावसायिक रूप से बैंक में कार्यरत हैं। उन्हे यात्राएं करना, विभिन्न स्थानों के सम्पन्न विरासतों के विषय में जानकारी एकत्र करना तथा विभिन्न स्थलों के विशेष व्यंजन चखना अत्यंत प्रिय हैं। उन्हे पुस्तकों से अत्यंत लगाव है। उन्हे पाककला में भी विशेष रुचि है। उनकी तीव्र इच्छा है कि वे विरासत के धनी भारत की विस्तृत यात्रा करें तथा अपने अनुभवों पर आधारित एक पुस्तक भी प्रकाशित करें।


अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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होयसल मंदिर – देखिये कर्नाटक के ११ प्राचीन उत्कृष्ट मंदिर https://inditales.com/hindi/karnataka-prachin-hoysala-mandir/ https://inditales.com/hindi/karnataka-prachin-hoysala-mandir/#comments Wed, 27 Apr 2022 02:30:03 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2661

आधुनिक कर्नाटक में ११वी. से १३ वीं. सदी के मध्य होयसल राजवंश का साम्राज्य था। कला, साहित्य एवं धर्म के क्षेत्र में होयसल वंश की सदैव रुचि रही तथा उन्होंने सदा इनका संरक्षण किया। होयसल राज आज भी अप्रतिम मंदिर वास्तु के लिए अत्यंत प्रसिद्ध है। बेलूर, हैलेबिडु तथा सोमनाथपुरा ऐसे महत्वपूर्ण स्थान हैं जहां […]

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आधुनिक कर्नाटक में ११वी. से १३ वीं. सदी के मध्य होयसल राजवंश का साम्राज्य था। कला, साहित्य एवं धर्म के क्षेत्र में होयसल वंश की सदैव रुचि रही तथा उन्होंने सदा इनका संरक्षण किया। होयसल राज आज भी अप्रतिम मंदिर वास्तु के लिए अत्यंत प्रसिद्ध है। बेलूर, हैलेबिडु तथा सोमनाथपुरा ऐसे महत्वपूर्ण स्थान हैं जहां अनुकरणीय उत्कृष्टता से युक्त होयसल मंदिर निर्मित किए गए थे।

बेलूर के चेन्नाकेशव मंदिर के दर्शन करने के पश्चात मैं इतनी प्रसन्न हुई कि मैंने होयसल राज में निर्मित अन्य सभी महत्वपूर्ण मंदिरों के दर्शन करने की ठान ली। कर्नाटक में लगभग ९२ होयसल मंदिर हैं। इनमें से अधिकतर हासन, मैसूर तथा मंड्या जिले में स्थित हैं। हमने हासन को अपना केंद्र बिन्दु नियुक्त किया तथा इन मंदिरों के दर्शन के लिए आगे कूच किया।

होयसल मंदिर – बेंगलुरू से एक दिवसीय दर्शन

प्रमुख होयसल मंदिर जो अविस्मरणीय होते हुए भी अधिक प्रसिद्ध नहीं है:

  • नग्गेहल्ली का लक्ष्मी नरसिंह मंदिर
  • नग्गेहल्ली का सदाशिव मंदिर
  • अरसिकेरे का ईश्वर मंदिर
  • बेलवाडी का वीर नारायण मंदिर
  • किक्केरी का ब्रह्मेश्वर मंदिर
  • गोविंदनहल्ली का पंचलिंगेश्वर मंदिर
  • डोड्डगड्डवल्ली का लक्ष्मी देवी मंदिर
  • जवगल का लक्ष्मी नरसिंह मंदिर
  • शांतिग्राम का भोग नरसिंह मंदिर
  • अनेकेरे का चेन्नाकेशव मंदिर
  • होसहोललु का लक्ष्मीनारायण मंदिर

आइये इन अप्रतिम मंदिरों के दर्शन करते हैं।

नग्गेहल्ली का लक्ष्मी नरसिंह मंदिर

कर्नाटक के हासन जिले में चन्नारायपटना तालुका में एक छोटा सा गाँव है, नग्गेहल्ली। यहाँ दो महत्वपूर्ण होयसल मंदिर हैं।

नग्गेहल्ली का लक्ष्मी नरसिंह मंदिर
नग्गेहल्ली का लक्ष्मी नरसिंह मंदिर

लक्ष्मी नरसिंह मंदिर का निर्माण बोम्मन्ना दंडनायक ने करवाया था जो १२४६ ई. में होयसल सम्राट वीर सोमेश्वर के सेनाध्यक्ष थे। यह एक त्रिकुटा मंदिर है जिसके तीन शिखर हैं। यह एक ऊंचे समतल धरती अर्थात जगती पर स्थित है जो होयसल वास्तुकला की विशेषता है। इस मंदिर में तीन गर्भगृह हैं। पश्चिमी गर्भगृह में चेन्नाकेशव, दक्षिणी गर्भगृह में वेणुमाधव तथा उत्तरी गर्भगृह में लक्ष्मी नरसिहं की प्रतिमाएँ हैं। तीनों गर्भगृह के द्वार एक ही नवरंग मंडप में खुलते हैं। एक ओर जहां चेन्नाकेशव मंदिर में एक सुकनासी है, वहीं अन्य दो सीधे नवरंग मंडम में खुलते हैं। सुकनासी एक प्रकार का बाहरी अलंकरण है जो गर्भगृह के समक्ष स्थित होता है। नवरंग मंडप के मध्य में एक उठा हुआ गोलाकार मंच है जो चार स्तंभों पर टिका हुआ है।

द्रौपदी स्वयंवर का दृश्य - लक्ष्मी नरसिंह होयसल मंदिर
द्रौपदी स्वयंवर का दृश्य

मंदिर के सभी नौ छतें सुंदरता से उत्कीर्णित हैं। नवरंग मंडप मुख मंडप से जुड़ा हुआ है जिसके भीतर अनेक स्तंभ हैं। इसके भीतर दुर्गा तथा सरस्वती की प्रतिमाएं हैं तथा बाईं ओर हरिहर की मूर्ति है।

कदम्ब वृक्ष के नीचे बंसीधर कृष्ण
कदम्ब वृक्ष के नीचे बंसीधर कृष्ण

एक महाद्वार से हम मंदिर में प्रवेश करते हैं। मुख मंडप तथा महाद्वार अपेक्षाकृत नवीन संरचनाएं हैं जिन्हे कालांतर में विजयनगर सम्राटों द्वारा निर्मित गया था। मंदिर की बाहरी भित्तियों को देवी-देवताओं, रामायण व महाभारत की कथाओं तथा भागवत की कथाओं पर आधारित शिल्प द्वारा अलंकृत किया गया है। कई भित्ति-खंडों पर ११ वी. तथा १२ वीं. सदी में प्रचलित सामाजिक ताने-बाने को दर्शाती भी कई छवियाँ उत्कीर्णित हैं। मंदिर की निर्मिती यहीं उपलब्ध शैलखटी द्वारा की गई है।

इस मंदिर का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उत्सव रथोत्सव है जो अप्रैल मास में आयोजित किया जाता है।

नग्गेहल्ली का सदाशिव मंदिर

सदाशिव मंदिर होयसल साम्राज्य का एक अन्य, अत्यंत विशिष्ट वास्तुकला का नमूना है। एक महाद्वार, जिसके दोनों ओर दो द्वारपाल हैं, उसके नीचे से होते हुए हम एक स्तंभों से भरे कक्ष में पहुंचते हैं। ऊंचे जगती तक कुछ सीढ़ियाँ जाती हैं जिसके दोनों ओर दो अत्यंत सुंदर गज के शिल्प हैं। यह एक एककुटा मंदिर है जिसमें एक ही शिखर अर्थात विमान है। गर्भगृह के भीतर एक बड़ा शिवलिंग है। गर्भगृह एक बार फिर सुकनासी तथा नवरंग मंडप से जुड़ा हुआ है। नवरंग मंडप के मध्य में उठा हुआ गोलाकार मंच है जिसे दर्शन मंडप कहा जाता है। नंदी मंडप एक बंद कक्ष है जिसके भीतर आदिशेष की एक मनमोहक प्रतिमा है।

सधाशिव मंदिर - नग्गेहल्ली
सधाशिव मंदिर – नग्गेहल्ली

मंडप में महिषासुरमर्दिनी, गणेश, सुब्रमण्य तथा सूर्यनारायण के विग्रह हैं। द्वार के तोरण पर नंदी पर विराजमान शिव-पार्वती हैं। सभी लेथ स्तंभ गोलाकार हैं जो होयसल शैली में चक्रयन्त्र अर्थात खराद यंत्र द्वारा निर्मित हैं। मुख्य कक्ष में खड़ी हुई पार्वती की एक आदमकद प्रतिमा है। महाद्वार तथा बाहरी कक्ष कालांतर में विजयनगर साम्राज्य द्वारा जोड़ा गया है।

सधाशिव होयसल मंदिर में पार्वती अम्मा
सधाशिव मंदिर में पार्वती अम्मा

मंदिर के शिखर को ज्यामितीय आकृतियों एवं रेखाओं द्वारा सुंदरता से उकेरा गया है। इसके शीर्ष पर एक कलश है। शिखर के ऊपर चारों दिशाओं में नंदी की मनमोहक प्रतिमाएँ हैं। साथ ही होयसल राजवंश का राज चिन्ह, बाघ का वध करते सल, की भी शिल्पकारी की गई है।

इस मंदिर का निर्माण भी बोम्मन्ना दंडनायक ने करवाया था। नग्गेहल्ली एक समृद्धशाली अग्रहार था। विजय सोमनाथपुरा के नाम से भी प्रचलित यह नगर शिक्षा का केंद्र था।

नग्गेहल्ली हासन से ६३ किलोमीटर तथा बंगलुरु से १६३ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

अरसिकेरे का ईश्वर मंदिर

अरसिकेरे कर्नाटक के हासन जिले में स्थित एक लघु नगरी है। यह होयसल काल के ईश्वर मंदिर के लिए अत्यंत प्रसिद्ध है। कन्नड भाषा में अरसिकेरे का शब्दशः अर्थ है रानी का कुंड। अरसी का अर्थ है रानी अथवा राजकुमारी तथा केरे का अर्थ है झील।

अरसिकेरे का ईश्वर मंदिर
अरसिकेरे का ईश्वर मंदिर

भगवान शिव को समर्पित ईश्वर मंदिर एककुटा मंदिर है। इसमें एक शिखर तथा दो मंडप हैं जिनमें एक मंडप खुला तथा दूसरा घिरा हुआ है। मंदिर की भीतरी संरचना में गर्भगृह, सुकनासी, दर्शन मंडप तथा एक नाट्य मंडप सम्मिलित हैं। गोलाकार नाट्य मंडप एक संवृत अथवा बंद संरचना है जो २१ लेथ स्तंभों तथा तारे के आकार के एक अनियमित गुंबद द्वारा मंडित है। मंदिर की भीतरी छत को उलटे कमल के आकार में सूक्ष्मता से उकेरा गया है। बैठने के लिए एक मंच है जिसको आधार देते कई छोटे गजों की आकृतियाँ हैं।

नाट्य मंडप

अरसिकेरे के ईश्वर मंदिर का नाट्य मंडप
अरसिकेरे के ईश्वर मंदिर का नाट्य मंडप

नाट्य मंडप तथा दर्शन मंडप आपस में एक बाड़ द्वारा जुड़े हुए हैं। दर्शन मंडप में अनेक लघु-मंदिर हैं जो वीरभद्र, गणपती, ब्रह्मा, विष्णु तथा अष्ट दिग्पालों को समर्पित हैं। यह एक झरोखा विहीन चौकोन कक्ष है जिस में छः स्तंभ तथा नौ छतें हैं। छतों पर पुष्पों एवं जालीदार आकृतियों को सूक्ष्मता से उकेरा गया है। मंदिर के दाहिनी ओर स्थित एक अन्य कक्ष में २४ स्तंभ हैं। इस कक्ष में वीरेश्वर, बाकेश्वर तथा चामुंडेश्वर को समर्पित तीन छोटे मंदिर हैं।

मंदिर की बाहरी भित्तियाँ देवी-देवता, पुराण तथा महाभारत व रामायण जैसे महाकाव्यों की कथाओं पर आधारित शिल्पों द्वारा अलंकृत हैं। सुकनासी के ऊपर होयसल राजवंश की राजमुद्रा के स्थान पर नंदी बैल की प्रतिमा है। तारे का अनियमित आकार लिए इस मंदिर की संरचना आपको अत्यंत विशेष प्रतीत होगी।

राजा वीर बल्लाल के काल में निर्मित यह मंदिर शैलखटी अथवा सिलखड़ी शिला में है।

इस मंदिर में दो प्रमुख उत्सव आयोजित किए जाते हैं, शिवरात्रि तथा कार्तिक अमावस्या।

अरसिकेरे हासन से ४१ किलोमीटर तथा बैंगलुरु से २०० किलोमीटर दूर स्थित है।

बेलवाडी का वीर नारायण मंदिर

बेलवाडी कर्नाटक के चिकमंगलूर जिले में हालेबिडु के समीप स्थित है। इस स्थान का उल्लेख महाभारत में भी किया गया है। वहाँ इस स्थान को एकचक्रनगर के नाम से दर्शाया गया है। ऐसा माना जाता है कि यहाँ पांडव राजकुमार भीम ने बकासुर का वध किया था। यह स्थान एक होयसल मंदिर, वीर नारायण स्वामी मंदिर के लिए भी प्रसिद्ध है।

बेलवाड़ी का वीर नारायण मंदिर
बेलवाड़ी का वीर नारायण मंदिर

यह एक त्रिकुटा मंदिर है। मध्य में स्थित मंदिर वीर नारायण स्वामी को समर्पित है। इसके बाईं ओर वेणुगोपाल तथा दायीं ओर योगनरसिंह के मंदिर हैं। प्रवेश द्वार के दोनों ओर दो हाथियों के शिल्प हैं। चतुर्भुज वीर नारायण स्वामी की शालिग्राम पर उकेरी हुई ८ फीट ऊंची मूर्ति है जो एक खुले कमल के पुष्प पर खड़ी है। इसके दोनों ओर श्रीदेवी एवं भूदेवी की प्रतिमाएं हैं। ऊपर विष्णु के दस अवतार उत्कीर्णित हैं।

उत्कृष्ट स्तम्भ - होयसल मंदिर के प्रतीक
उत्कृष्ट स्तम्भ – होयसल मंदिर के प्रतीक

इस मंदिर में होयसल मंदिरों की सभी विशेषताएं उपस्थित हैं, जैसे गर्भगृह, सुकनासी, मंडप तथा लेथ मशीन पर निर्मित व आईने के समान चमक लिए गोलाकार स्तंभ।

कल्पवृक्ष के नीचे, बाँसुरी हाथों में लिए वेणुगोपाल की ८ फीट ऊंची अत्यंत मनमोहक विग्रह है। उनके आसपास सनक, सनन्दन, सनातन, संत कुमार, गोपिका, रुक्मिणी तथा सत्यभामा की प्रतिमाएं हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने स्वयं इस मूर्ति को भारत की सर्वाधिक मनमोहक कृष्ण मूर्ति के रूप में सत्यापित किया है। इस मूर्ति पर अत्यंत सूक्ष्मता से की गई नक्काशी हमें उनके दिव्य रूप का आभास कराती हैं।

हाथों में शंख व चक्र धारण किए योगनरसिंह की सात फीट ऊंची, बैठी मुद्रा में एक सुंदर प्रतिमा है जिनके दोनों ओर श्रीदेवी तथा भूदेवी की प्रतिमाएं हैं। ऐसा कहा जाता है कि हिरण्यकश्यप का वध करने के पश्चात क्रोधित नरसिंह अपना क्रोध शांत करने के लिए योग मुद्रा में विराजमान हुए थे।

ये तीनों मूर्तियाँ एकशिला शालिग्राम द्वारा निर्मित की गई हैं।

मंदिर की बाहरी भित्तियाँ ठेठ होयसल वास्तु शैली में उत्कीर्णित हैं। इस मंदिर की अद्वितीय विशेषताएँ हैं इसका त्रिकुटा विमान तथा इसके आश्चर्यचकित कर देने वाली अत्यंत मनभावन मूर्तियाँ। मंदिर एवं मूर्तियों के भीतरी सौन्दर्य को प्राधान्यता दी गई है।

इस मंदिर की एक अत्यंत महत्वपूर्ण विशेषता है इसके निर्माता का अभियांत्रिकी कौशल। ठीक विषुव अर्थात २३ मार्च के दिन सूर्य की प्रथम किरण मंदिर के सात द्वारों को पार कर वीरनारायण की मूर्ति पर पड़ती है। इसे एक अत्यंत महत्वपूर्ण दिवस माना जाता है। इस दिन यहाँ भक्तों की अपार भीड़ उपस्थित रहती है। यहाँ के प्रमुख उत्सवों में चैत्र पूर्णिमा, जन्माष्टमी, रथसप्तमी तथा नरसिंह जयंती सम्मिलित हैं। चैत्र पूर्णिमा के दिन विष्णु, श्रीदेवी तथा भूदेवी की उत्सव मूर्तियों की शोभायात्रा निकाली जाती है।

मंदिर परिसर के भीतर, विशेषतः गर्भगृह एवं मूर्तियों के छायाचित्रिकरण पर पाबंदी है।

जवगल चिकमंगलूर महामार्ग पर स्थित बेलवाडी हालेबिडु से १२ किलोमीटर दूर है।

किक्केरी का ब्रह्मेश्वर मंदिर

किक्केरी गाँव का ब्रहमेश्वर मंदिर
किक्केरी गाँव का ब्रहमेश्वर मंदिर

एक मनमोहक विशाल झील के तीर स्थित ब्रह्मेश्वर मंदिर भी होयसल वास्तुशिल्प की एक अति विशिष्ट कृति है। भगवान शिव को समर्पित यह एककुटा मंदिर इस समय जीर्ण स्थिति में है क्योंकि इसका रखरखाव भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अंतर्गत नहीं आता है। तथापि नवीनीकरण का कुछ कार्य कार्यान्वित होते हमने अवश्य देखा। यहाँ नियमित पूजा अर्चना की जाती है। चूंकि यहाँ भक्तगण अधिक संख्या में नहीं आते, इस मंदिर के पट अधिकतर बंद रहते हैं। स्थानीय निवासियों की सहायता से आप पुजारीजी को बुलावा भेज सकते हैं। हमें पुजारीजी अत्यंत सज्जन तथा भद्र पुरुष प्रतीत हुए। उन्होंने अत्यंत प्रसन्नता से हमें सम्पूर्ण मंदिर का दर्शन कराया।

ब्रहमेश्वर मंदिर के नंदी देव
ब्रहमेश्वर मंदिर के नंदी देव

यह मंदिर धरती के समतल पर स्थापित है जो ऊंचे मंच अर्थात जगती पर स्थापित अन्य होयसल मंदिरों के विपरीत है। गर्भगृह के तोरण पर ब्रह्मा की छवि विराजमान है। ऐसा कहा जाता है कि हम ब्रह्मा की प्रत्यक्ष रूप में आराधना नहीं कर सकते। उनकी आराधना भगवान शिव के माध्यम से ही की जाती है। इस मंदिर में जब हम भगवान शिव की पूजा करते हैं तब हम अपरोक्ष रूप से ब्रह्मा की पूजा अर्चना करते हैं। इसीलिए इस मंदिर को ब्रह्मेश्वर मंदिर कहा जाता है। मंदिर की बाहरी भित्तियों पर देवी-देवताओं, पुराणों व महाकाव्यों की कथाओं पर आधारित छवियाँ उत्कीर्णित हैं। इनमें सर्वाधिक विलक्षण छवियाँ विष्णु के वराह अवतार एवं विघ्नेश्वर की हैं।

महिषासुरमर्दिनी
महिषासुरमर्दिनी

इस मंदिर में भी गर्भगृह, सुकनासी तथा नवरंग मंडप हैं। बाहरी घेरदार संरचना के भीतर एक विशाल एवं अलंकृत नंदी की बैठी मुद्रा में प्रतिमा है। नंदी की प्रतिमा के ऊपर की गई नक्काशी देख आपकी आंखे फटी की फटी रह जायेंगी। भीतरी गर्भगृह की ओर मुख कर खड़े सूर्यनारायण की प्रतिमा नंदी के पृष्ठभाग में है।

एक गोलाकार मंच लेथ-रचित चार स्तंभों पर रखे हैं जिन पर रामायण के दृश्य चित्रित हैं। प्रत्येक स्तंभ के कोष्ठक वास्तव में सुंदर मदानिकाओं की उत्कृष्ट प्रतिमाएँ हैं। इनमें से अधिकतर प्रतिमाओं को मंदिर से चुरा लिया गया है। आप इनमें से कुछ ही यहाँ देख सकते हैं। विगृह की ओर मुख किए हुए एक छोटे नंदी नाट्य मंडप में विराजमान हैं। भीतरी गर्भगृह के दोनों ओर महिषासुरमर्दिनी तथा गणेश के दो छोटे मंदिर हैं।

लावण्यपूर्ण मदनिका
लावण्यपूर्ण मदनिका

उत्तरी तथा दक्षिणी दिशा में दो मंदिर हैं जिनमें एक मंदिर ईश्वर रूप में भगवान शिव तथा दूसरा केशव रूप में भगवान विष्णु को समर्पित है। गणेश के विग्रह के समीप सप्त मातृका का पटल तथा केशव के समीप कालभैरव का विग्रह है। कालभैरव की यह मूर्ति मंदिर के समीप स्थित जलकुंड के भीतर से प्राप्त हुई थी। छत पर अष्टदिग्पालों तथा नवग्रहों की छवियाँ हैं।

प्रांगण में अन्य कई छोटी मंदिर संरचनाएं हैं किन्तु उनमें अधिकतर जीर्ण अवस्था में हैं। केवल पार्वतीअम्मा को समर्पित एक छोटे मंदिर का ही अब तक जीर्णोद्धार किया गया है। यहाँ दैनिक पूजा अर्चना भी की जाती है।

किक्केरी श्रीरंगपटना- चनरायपटना महामार्ग पर स्थित है तथा के आर पेटे से ११ किलोमीटर दूर है।

गोविंदनहल्ली का पंचलिंगेश्वर होयसल मंदिर

पंचलिंगेश्वर एक पंचकुटा मंदिर है जिस पर उत्तर-दक्षिण अक्षांश पर पाँच विमान हैं। ये विमान पूर्व दिशा की ओर एक स्तंभ युक्त बड़े कक्ष में खुलते हैं। प्रत्येक मंदिर के भीतर एक गर्भगृह तथा सुकनासी है जो स्तंभ युक्त कक्ष की ओर मुख किए हुए हैं। सुदृढ़ता से गड़ा एक नंदी भी है जो मंदिर की ओर मुख किए ड्योढ़ी पर बैठा है। आप देखेंगे कि पाँच मंदिरों में से प्रत्येक मंदिर के बाईं ओर एक छोटा गणेश मंदिर तथा दाईं ओर चामुंडेश्वरी को समर्पित एक छोटा मंदिर है।

गोविन्दन्ह्ल्ली का पञ्चलिंगेश्वर मंदिर
गोविन्दन्ह्ल्ली का पञ्चलिंगेश्वर मंदिर

इस मंदिर में ध्यान देने योग्य वैशिष्टताएँ हैं, सुब्रमण्य, आदिशेष, सप्त मातृका, शिव तथा पार्वती। पाँच शिवलिंगों के नाम हैं, इशानेश्वर, तत्पुरुशेश्वर, अघोरेश्वर, वामदेवेश्वर तथा सदज्योतेश्वर। प्रत्येक मंदिर के गर्भगृह के बाह्य क्षेत्र में द्वारपाल, नंदी तथा वृन्गी हैं। गर्भगृह के तोरण पर गजलक्ष्मी की छवि है। लेथ द्वारा निर्मित स्तंभों की चमक एवं नक्काशी विलक्षण है। उन पर थपथपाने से गूँजता हुआ धातुई स्वर सुनाई देता है। मंदिर की बाहरी भित्तियों पर उकेरे विष्णु के दस अवतार, देवी-देवताओं तथा अन्य शिल्प होयसल शैली में हैं।

मंदिर की संरचना ऊंचे मंच अथवा जगती पर नहीं, अपितु पर धरातल पर की गई है।

इसकी स्थापना लगभग १२३७-३८ ई. के आसपास, प्रसिद्ध होयसल शिल्पकार मल्लितम्मा द्वारा किया गया है। मंदिर के बाहरी भित्तियों पर उत्कीर्णित कुछ शिल्पों पर उनका नाम भी उकेरा हुआ है। यह मंदिर किक्केरी से लगभग ५ किलोमीटर दूर, श्रीरंगपटना- चनरायपटना महामार्ग पर स्थित है।

डोड्डगड्डवल्ली का लक्ष्मी देवी मंदिर

डोड्डगड्डवल्ली का लक्ष्मी देवी मंदिर
डोड्डगड्डवल्ली का लक्ष्मी देवी मंदिर

लक्ष्मी देवी को समर्पित यह अत्यंत आकर्षक मंदिर डोड्डगड्डवल्ली गाँव में स्थित है जो हासन-हालेबिडु महामार्ग से २ किलोमीटर की दूरी पर है। झील के किनारे स्थित यह शांत एवं निर्मल मंदिर एक चतुष्कुटा मंदिर है जिस के चार दिशाओं में चार शिखर हैं। यह होयसल वंश के प्राचीनतम जीवित मंदिरों में से एक है। इसका प्रवेश द्वार पूर्व दिशा में है। वायु एवं प्रकाश के आवागमन के लिए इसकी भित्तियाँ जालीदार बनाई गई हैं। इस मंदिर परिसर में काली, लक्ष्मी, शिव एवं विष्णु को समर्पित चार मंदिर चार दिशाओं में स्थित हैं।

काली मंदिर

शांतिस्वरूप काली
शांतिस्वरूप काली

इस मंदिर की अद्वितीय विशेषताएँ यह हैं कि यह मंदिर शांतस्वरूप काली को समर्पित है तथा इसके दोनों ओर शाकिनी एवं डाकिनी हैं। यह अन्य होयसल मंदिरों से भिन्न हैं जो अधिकतर विष्णु अथवा शिव को समर्पित हैं। यहाँ उपस्थित नागकन्या, विषकन्या तथा वेताल के शिल्प भी इसे अन्य होयसल मंदिरों से भिन्न बनाते हैं।

रूद्र वीणा बजाते शिव
रूद्र वीणा बजाते शिव

गर्भगृह की बाहरी भित्तियों पर स्थित तोरण पर छः वेताल नागकन्याओं एवं विषकन्याओं संग नृत्य करते दर्शाये गए हैं। यह तोरण मंडप की ओर खुलता है। इसके दोनों ओर कालिका अंगरक्षकों की दो विशाल शिल्प हैं। इन्हे देख मंदिर की संरचना में तांत्रिक उपासना के प्रभाव का आभास होता है।

महालक्ष्मी

पश्चिमी दिशा में स्थित महालक्ष्मी मंदिर में एक गर्भगृह है जिसकी सुकनासी  नवरंग मंडप में खुलती है। इस मंदिर के गर्भगृह में एक लिंग है जिसके समक्ष शिव का लघु मंदिर तथा दक्षिण में विष्णु का लघु मंदिर है। विष्णु की मूल प्रतिमा नष्ट हो गई है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने नवीन प्रतिमा स्थापित की है जिनकी अब केशव रूप में आराधना की जाती है।

बेताल तोरण
बेताल तोरण

इसकी छत पर सघन उत्कीर्णन है जिस पर भगवान शिव को रुद्र तांडव करते एवं रुद्र वीणा बजाते दर्शाया गया है। अन्य छवियों में संबंधित वाहनों की सवारी करते अग्नि, वरुण, निरुत्त व यम तथा ऐरावत की सवारी करते इन्द्र संमिलित हैं। छत के मध्य में भुवनेश्वरी की छवि थी किन्तु अब वह स्पष्ट दृष्टिगोचर नहीं है।

काली
काली

प्रांगण में एक शिला पर कन्नड भाषा में लिखे कुछ अभिलेख हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने इस मंदिर तथा इसके बाग-बगीचे का रखरखाव अत्यंत कुशलता से किया है। इसका निर्माण सहजा देवी ने करवाया था जो कलहन राहुता की पत्नी थीं। राहुता ११ वीं. सदी में होयसल सम्राट विष्णुवर्धन के दरबार में मंत्री थे।

जवगल का लक्ष्मी नरसिंह मंदिर

यह एक त्रिकुटाचल मंदिर है। इसका प्रवेश द्वार विजयनगर काल का महाद्वार है जिसके दोनों ओर हाथियों के शिल्प हैं। इसके तीन लघु मंदिर एक छोटे नाट्य मंडप द्वारा जुड़े हुए हैं। गरुडस्तंभ पर नतमस्तक होने के पश्चात तथा जय व विजय नामक दो द्वारपालों से भेंट करने के पश्चात आप एक अन्य मंडप से होते हुए इस मंदिर के भीतर पहुंचेंगे।

लक्ष्मी नरसिंह मंदिर जवगल - एक होयसल मंदिर
लक्ष्मी नरसिंह मंदिर

कालांतर में विजयनगर सम्राटों ने इस मंदिर परिसर में दीपस्तंभ, लक्ष्मी मंदिर तथा स्तंभयुक्त कक्ष की संरचनाएँ जोड़ी थीं। पृष्ठभाग में, एक कोने में स्तंभों से भरा एक अन्य कक्ष है जो अब जीर्ण अवस्था में है। राज्य पुरातत्व विभाग ने अब इस मंदिर के रखरखाव का उत्तरदायित्व उठाया है।

कालिया मर्दन - जवगल मंदिर की तोरण पर
कालिया मर्दन – जवगल मंदिर की तोरण पर

इस मंदिर के अधिष्ठात्र देव श्रीधर रूप में वीर नारायण स्वामी हैं। बाईं ओर वेणुगोपाल तथा दाईं ओर पत्नी लक्ष्मी समेत लक्ष्मीनरसिंह विराजमान हैं। देवी-देवताओं को ठीक उसी प्रकार स्थापित किया गया है जैसा आपने बेलवाडी मंदिर में देखा होगा। यहाँ वेणुगोपाल बाल्य अवस्था के कृष्ण हैं। इसीलिए उन पर मुकुट नहीं है। बेलवाडी में कृष्ण किशोर अवस्था में उपस्थित हैं। इस मंदिर में भी आप दशावतार, गोपिकाएं, गौमाताएं, सत्यभामा तथा रुक्मिणी की छवियाँ देख सकते हैं। तोरण पर कालिया मर्दन अर्थात कालिया संहार का दृश्य अंकित है जिसमें कृष्ण को कालिया नाग का वध करते प्रदर्शित किया है।

सभी प्रतिमाएं शालिग्राम शिला में निर्मित हैं।

यहाँ दो-लघु मंदिर हैं, बाईं ओर महागणपती तथा दाईं ओर चामुंडेश्वरी। महागणपति लघु-मंदिर की छत पर गणपति की १०८ छवियाँ उत्कीर्णित हैं। मंदिर की छत पर अष्ट दिग्पाल उत्कीर्णित हैं।

इस मंदिर की निर्मिती १३ वी. सदी में होयसल सम्राट वीर सोमेश्वर के कारवाई थी।

जवगल नगरी हासन से लगभग ५० किलोमीटर की दूरी पर है।

शांतिग्राम का भोग नरसिंह मंदिर

यह एक सादा एवं जीवंत मंदिर है जो श्री लक्ष्मी समेत वरद योग भोग नरसिंह मंदिर के नाम से अत्यंत लोकप्रिय है। एक विशाल, भव्य तथा अनेक रंगों में सजे गोपुरम से होते हुए हम इसके भीतर प्रवेश करते हैं। प्रांगण के भीतर एक छोटा एककुटा मंदिर है जो नरसिंह को समर्पित है। मंदिर के अंत में एक कक्ष है जिसमें अनेक स्तंभ हैं। यह कक्ष तथा एक यज्ञ कुंड कालांतर में जोड़े गए प्रतीत होते हैं।

शंतिग्राम का भोग नरसिंह मंदिर
शंतिग्राम का भोग नरसिंह मंदिर

इस मंदिर को श्वेत रंग में रंगा गया है। इसीलिए इसके स्तंभ तथा बाहरी भित्तियाँ होयसल वास्तुशिल्प प्रतीत नहीं होते। नरसिंह बाईं ओर लक्ष्मी संग बैठे हुए हैं। उनके दायें हाथ में शंख तथा बाएं हाथ में चक्र है। गत १२०० वर्षों से यहाँ अनवरत पूजा अनुष्ठान किए जा रहे हैं जिसकी दिव्य शक्ति से यह मंदिर परिपूर्ण है।

मंदिर के मध्य, छत पर नरसिंह के नौ अवतारों को गोलाकार में उत्कीर्णित किया है। नव नरसिंह के नौ अवतार हैं, उग्र, क्रोध, वीर, विलंब, कोप, योग, अघोर, सुदर्शन तथा लक्ष्मी नरसिंह।

इस मंदिर का निर्माण ११ वीं. सदी में रानी शांतला देवी ने करवाया था जो सम्राट विष्णुवर्धन की पत्नी थीं।

शांतिग्राम हासन से १३ किलोमीटर दूर बंगलुरु हासन महामार्ग पर स्थित है।

अनेकेरे का चेन्नाकेशव मंदिर

श्रीरंगपटना-चनरायपटना महामार्ग पर चनरायपटना तालुका में एक छोटा सा नगर है, अनेकेरे। यहाँ स्थित चेन्नाकेशव मंदिर एक एककुटा मंदिर है जिसके ऊपर एक विशाल कलश है।

सीढ़ियाँ युक्त प्रवेशद्वार से हम इसके भीतर पहुंचते हैं। यह प्रवेशद्वार हमें एक प्रांगण में ले जाता है जिसके मध्य में मंदिर स्थित है। स्तंभों पर आधारित कक्ष सम्पूर्ण प्रांगण के चारों ओर स्थित है। तुलसी का एक अत्यंत प्राचीन वृंदावन है। गर्भगृह के भीतर भूदेवी एवं श्रीदेवी समेत चेन्नाकेशव विराजमान हैं।

अनेकेरे के चेन्नकेशव मंदिर का कन्नड़ शिलालेख
अनेकेरे के चेन्नकेशव मंदिर का कन्नड़ शिलालेख

तोरण पर गज लक्ष्मी उत्कीर्णित हैं। वहीं भित्तियों पर द्वारपाल जय एवं विजय हैं। छत पर विपुलता से की गई नक्काशी आपको होयसल वास्तुकला के इस विशेष तत्व का स्मरण कराएंगी।

शिखर पर ज्यामितीय आकृतियाँ एवं रचनाएं उकेरी गई हैं। मंदिर की बाईं भित्ति पर कन्नड़ भाषा में कुछ अभिलेख हैं। यह एक छोटा सा अत्यंत आकर्षक मंदिर है जो अत्यंत दर्शनीय है।

यहाँ की उत्सव मूर्ति की शोभायात्रा मार्च-अप्रैल में आने वाले उगादि के उत्सव में निकाली जाती है।

होसहोललु का लक्ष्मीनारायण मंदिर

होसहोललु मंड्या जिले में स्थित एक छोटा सा नगर है। यह नगर १२५० ई. में सम्राट वीर सोमेश्वर द्वारा निर्मित होयसल वास्तुशिल्प की इस अद्भुत कलाकृति के लिए अत्यंत प्रसिद्ध है।

होसहोललु का लक्ष्मीनारायण मंदिर
होसहोललु का लक्ष्मीनारायण मंदिर

लक्ष्मीनारायण मंदिर एक त्रिकुटा मंदिर है। पश्चिम दिशा में स्थित इसका मुख्य मंदिर लक्ष्मीनारायण को समर्पित है। इन्हे नम्बीनारायण भी कहा जाता है। इस प्रमुख मंदिर के दोनों ओर दो छोटे मंदिर हैं जो गणेश तथा चामुंडी को समर्पित हैं। उत्तर दिशा में वेणुगोपाल मंदिर तथा दक्षिण दिशा में लक्ष्मीनरसिंह मंदिर हैं।

लक्ष्मीनारायण मंदिर की बाहरी दीवारें
लक्ष्मीनारायण मंदिर की बाहरी दीवारें

मुख्य मंदिर में गर्भगृह तथा सुकनासी हैं जो नाट्य मंडप में खुलते हैं। नाट्य मंडप के पश्चात एक और कक्ष है। अन्य दोनों मंदिरों के गर्भगृह भी नाट्य मंदिर में ही खुलते हैं। मंदिर की भीतरी संरचना अन्य होयसल मंदिरों के समान विपुलता से उत्कीर्णित है। इसमें भी भव्यता से उत्कीर्णित छत तथा गोलाकार लेथ स्तंभ हैं। स्तंभों पर थपथपाने से धातुई स्वर निकलता है। अन्य होयसल मंदिरों के समान जगती मंच पर स्थापित यह मंदिर भी शैलखटी द्वारा निर्मित है। बाहरी भित्तियाँ सर्वोत्कृष्ट हैं जिनकी छः पट्टिकाओं पर गजों, मकरों, हंसों, मोरों तथा मनमोहक पुष्पाकृतियों की उत्कृष्ट शिल्पकारी की गई है। इन पट्टिकाओं के ऊपर देवी-देवताओं तथा पुराण, रामायण व महाभारत की कथाओं को दर्शाते दृश्यों के शिल्प हैं।

गरुडारूड लक्ष्मीनारायण
गरुडारूड लक्ष्मीनारायण

चूंकि इस मंदिर पर आतताईयों ने आक्रमण नहीं किया था, यहाँ प्रतिमाएं एवं मंदिर नष्ट नहीं हुए हैं। पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने इस मंदिर तथा इसके बाग-बगीचे का रखरखाव अत्यंत कुशलता से किया है।

इस मंदिर का प्रमुख उत्सव वैकुंठ एकादशी है।

कर्नाटक के होयसल मंदिर दर्शन के लिए यात्रा सुझाव:

  • कर्नाटक के होयसल मंदिरों के दर्शन करने हेतु आप बंगलुरु, हासन अथवा मैसूर को अपना पड़ाव केंद्र चुन सकते हैं। यहाँ ठहरने की उत्तम व्यवस्थाएँ हैं तथा ये स्थान मंदिरों से अधिक दूर भी नहीं हैं।
  • इन मंदिरों के दर्शन का सर्वोत्तम समय अक्टूबर से मार्च मास के मध्य है।
  • इनमें से अधिकतर मंदिर महामार्ग से दूर, गांवों के निर्मल वातावरण में स्थित हैं। वहाँ कदाचित आपको खाने पीने की इष्टित वस्तुएं प्राप्त ना हों। अतः अपने खाने पीने के पदार्थ साथ ले जाएँ।
  • स्थानीय निवासी अत्यंत विनम्र एवं भद्र हैं। मार्गदर्शन के लिए आप उनसे अवश्य सहायता ले सकते हैं। यहाँ गूगल नक्शा आपको भ्रमित कर सकता है।
  • प्रत्येक मंदिर में परिदर्शक अथवा गाइड कदाचित उपलब्ध ना हो। परंतु जहां भी आपको यह सुविधा मिले, उसका लाभ अवश्य उठायें। कई स्थानीय निवासी भी बिना किसी आशा के आपकी सहायता करने में तत्पर रहेंगे। उन्हे अपनी धरोहर प्रदर्शित करने में अत्यंत गर्व होता है।
  • अधिकतर होयसल मंदिरों में भीड़ नहीं रहती है। आप यहाँ शांति से भरपूर समय बिताते हुए इन मंदिरों के वास्तु कौशल का आनंद उठा सकते हैं।

यह यात्रा संस्करण श्रुति मिश्रा द्वारा Inditales Internship Program के अंतर्गत साझा किया गया है।

श्रुति मिश्रा एक व्यावसायिक बँककर्मी हैं। उन्हे भिन्न भिन्न स्थानों की यात्रा कर वहाँ की समृद्ध धरोहरों को जानने व समझने तथा वहाँ के स्थानीय व्यंजनों का आस्वाद लेने में अत्यंत रुचि है। उन्हे किताबें पढ़ने तथा अपने परिवार के लिए भोजन बनाने में भी अत्यंत आनंद आता है। वे बंगलुरु की निवासी हैं। इनकी अभिलाषा है कि वे सम्पूर्ण भारत की समृद्ध धरोहरों के दर्शन करें तथा उन पर एक पुस्तक प्रकाशित करें।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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अरुणाचलेश्वर अथवा आरुल्मिगु का मंदिर तमिल नाडू के पावन नगर तिरुवन्नमलई में स्थित है। शैवों अर्थात् शिव भक्तों के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण मंदिर है। इसे विश्व के विशालतम शिव मंदिरों में से एक माना जाता है। अरुणाचल पर्वत की तलहटी पर स्थित इस मंदिर की भव्य संरचना तथा अद्भुत वास्तुकला किसी विशाल गढ़ के […]

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अरुणाचलेश्वर अथवा आरुल्मिगु का मंदिर तमिल नाडू के पावन नगर तिरुवन्नमलई में स्थित है। शैवों अर्थात् शिव भक्तों के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण मंदिर है। इसे विश्व के विशालतम शिव मंदिरों में से एक माना जाता है। अरुणाचल पर्वत की तलहटी पर स्थित इस मंदिर की भव्य संरचना तथा अद्भुत वास्तुकला किसी विशाल गढ़ के समान है।

श्री अरुणाचलेश्वर मंदिर भगवान शिव के पंचभूत क्षेत्रों अथवा स्थलों में से एक है। जीवन के पंचभूत तत्व इस प्रकार हैं, , आकाश, वायु, ,अग्नि, जल तथा पृथ्वी । ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव स्वयं अग्नि तत्व के रूप में इस मंदिर में विराजमान हैं। जीवन के अन्य तत्वों से सम्बंधित मंदिर इस प्रकार हैं:

पंचभूत स्थल – जीवन के पंच तत्वों से सम्बंधित मंदिर

जीवन के पंच तत्वों से सम्बंधित भगवान शिव के पांच मंदिर हैं। वे हैं,

  • श्री अरुणाचलेश्वर मंदिर, तिरुवन्नमलई, तमिल नाडू – अग्नि लिंग
  • नटराज मंदिर, चिदंबरम, तमिल नाडू – आकाश लिंग
  • कालाहस्ती मंदिर, कालाहस्ती, आन्ध्र प्रदेश – वायु लिंग
  • जम्बुकेश्वर मंदिर, तिरुवनैकवल, तमिल नाडू – अप्पु लिंग/जम्बु लिंग (जल)
  • एकम्बरेश्वर मंदिर, कांचीपुरम, तमिल नाडू – पृथ्वी लिंग

तिरुवन्नमलई का श्री अरुणाचलेश्वर मंदिर – अग्नि लिंग

इस मंदिर का इतिहास लगभग सहस्त्र वर्ष प्राचीन है। पुराणों में तथा थेवरम एवं थिरुवासगम जैसे तमिल साहित्यों में भी इस मंदिर का गुणगान किया गया है।

तिरुवन्नमलई की इस देवभूमि में आठ दिशाओं में आठ प्रसिद्ध लिंग हैं जिन्हें अष्ट लिंग कहा जाता है। ये लिंग हैं, इन्द्रलिंग, अग्निलिंग, यमलिंग, निरुतिलिंग(नैऋत्य), वरुणलिंग, वायुलिंग, कुबेरलिंग तथा ईशान्यलिंग। ये आठों लिंग पृथ्वी के आठ दिशाओं के द्योतक हैं। ऐसी मान्यता है कि ये आठों शिवलिंग गिरिवलम अथवा गिरिपरिक्रमा कर रहे भक्तों को आशीर्वाद देते हैं। अरुणाचल पर्वत की परिक्रमा को गिरिवलम अथवा गिरिपरिक्रमा कहा जाता है। अनेक भक्तगण यह परिक्रमा करते हैं।

अरुणाचलेश्वर मंदिर की कथा

एक समय सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा तथा सृष्टि के पालनकर्ता विष्णु के मध्य उनकी श्रेष्ठता के विषय पर विवाद उत्पन्न हो गया। इस विवाद पर निष्कर्ष प्राप्त करने के लिए वे भगवान शिव के समक्ष उपस्थित हुए तथा उनसे निर्णय प्रदान करने का निवेदन किया। भगवान शिव ने दोनों की परीक्षा लेने का निर्णय लिया। वे दोनों के मध्य एक विशाल अग्नि स्तम्भ के रूप में प्रकट हो गए जिसके दोनों छोर दृष्टिगोचर नहीं हो रहे थे। उन्होंने ब्रह्मा एवं विष्णु से कहा कि जो उस अग्नि स्तम्भ का छोर सर्वप्रथम खोज निकलेगा, वही सर्वश्रेष्ठ होगा। विष्णु ने वराह का रूप लिया तथा स्तम्भ का छोर ढूँढने के उद्देश्य से धरती के भीतर प्रवेश किया। धरती के भीतर दीर्घ काल तक जाने के पश्चात भी उन्हें उस अग्नि रूपी लिंग का छोर नहीं दिखा। तब भगवान शिव के समक्ष उपस्थित होकर उन्होंने अपनी पराजय स्वीकार कर ली।

अरुणाचलेश्वर मंदिर और अरुणाचलेश्वर पर्वत
अरुणाचलेश्वर मंदिर और अरुणाचलेश्वर पर्वत

वहीं ब्रह्मा ने हंस का रूप धरा तथा स्तम्भ के ऊपरी छोर तक पहुँचने के उद्देश्य से आकाश में ऊपर उड़ गए। दीर्घ काल तक ऊपर की ओर जाने के पश्चात भी उन्हें लिंग का ऊपरी छोर  दृष्टिगोचर नहीं हुआ। वे थक कर चूर हो गए थे किन्तु पराजय स्वीकार करने की मनस्थिति में नहीं थे। तभी अनायास उन्होंने ऊपर से गिरते केतकी पुष्प को देखा। तुरंत उन्होंने उससे स्तम्भ के छोर के विषय में जानना चाहा। केतकी पुष्प ने कहा कि वह चालीस हजार वर्षों से नीचे की ओर गिर रहा है किन्तु उसे स्तम्भ का छोर दिखाई नहीं दिया है। इस पर ब्रह्मा ने केतकी को अपने छल में सम्मिलित करते हुए उसे झूठा साक्षी बनने की आज्ञा दी। ब्रह्मा ने शिव के समक्ष अग्नि लिंग के छोर का दर्शन करने का दावा किया तथा केतकी को साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया। ब्रह्मा के असत्य कथन पर शिव अत्यंत क्रोधित हो गए तथा ब्रह्मा का एक सिर काट दिया। विष्णु के निवेदन पर उन्होंने ब्रह्मा के अन्य सिरों पर प्रहार नहीं किया किन्तु किसी भी मंदिर पर उनकी आराधना पर प्रतिबन्ध लगा दिया। उन्होंने केतकी पुष्प को भी श्राप दिया कि अब शिव आराधना में उसका उपयोग कभी नहीं किया जाएगा। जिस स्थान पर ब्रह्मा व विष्णु के अहंकार को नष्ट करने के लिए यह अग्नि लिंग प्रकट हुआ था, उस स्थान को तिरुवन्नमलई कहते हैं।

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अन्य कथाएं

एक अन्य कथा के अनुसार, देवी पार्वती ने एक क्षण के लिए भगवान शिव के नेत्रों को बंद किया। इससे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में अन्धकार छा गया। अपनी भूल का आभास होते ही वे पश्चात्ताप करने के उद्देश्य से अरुणाचल पर्वत के समीप अपने अनेक भक्तों के साथ बैठकर कठोर तपस्या में लीन हो गयीं। उस समय भगवान शिव पर्वत के ऊपर एक अग्नि स्तम्भ के रूप में प्रकट हुए तथा देवी पार्वती में विलीन हो गए जिससे उनका अर्धनारीश्वर रूप उत्पन्न हुआ। अतः यह पर्वत अत्यंत पावन है तथा इसे भी एक लिंग ही माना जाता है।

इतिहास

इस देवनगरी पर भिन्न भिन्न काल में अनेक राजवंशों का शासन रहा है।  उनमें प्रमुख थे, चोल वंश, होयसल वंश, संगमा वंश, सलवा वंश, तुलु वंश तथा विजयनगर शासन। अधिकाँश शासकों ने इस मंदिर में अनेक प्रकार के चढ़ावे चढ़ाए, जैसे भूदान, धन, गौदान तथा अन्य उपयोगी वस्तुएं। मंदिर में स्थित शिलालेखों पर उन राजवंशों की गौरवगाथाएं आलेखित हैं।

१७वीं सदी में यह मंदिर मुगल शासन के अंतर्गत कर्णाटक के नवाब के आधीन आ गया। अल्प समयावधि के लिए यह टीपू सुलतान के शासन के आधीन भी था। कालांतर में इस पर फ्रांसीसियों तथा उसके कुछ वर्ष उपरान्त अंग्रेजों का अधिपत्य स्थापित हो गया।

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अरुणाचलेश्वर मंदिर की वास्तुकला

यह मंदिर २५ एकड़ के क्षेत्रफल में फैला हुआ है। वर्तमान में जिस विस्तीर्णता व भव्यता से यह मंदिर खड़ा है, वह अनेक सदियों से की जा रही संरचना, विस्तार एवं नवीनीकरण का परिणाम है। अरुणाचल पर्वत की पृष्ठभूमि में स्थित इस मंदिर की संरचना द्रविड़ शैली में की गयी है। मंदिर के सभी भागों में आप हमारे पूर्वजों की अद्भुत कला व कारीगरी प्रत्यक्ष देख सकते हैं।

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अरुणाचलेश्वर मंदिर के प्रमुख तत्व

अरुणाचलेश्वर मंदिर के दर्शन करते समय इन प्रमुख तत्वों को ध्यान में रखें ताकि आप इस मंदिर की अद्भुत वास्तु एवं संरचना की सूक्ष्मता को जान सकें तथा उनका आनंद ले सकें।

गोपुरम

अरुणाचलेश्वर मंदिर का गोपुरम
अरुणाचलेश्वर मंदिर का गोपुरम

मंदिर का मुख पूर्व की ओर है तथा इसके चार प्रमुख दिशाओं में चार गोपुरम हैं। पूर्व दिशा में स्थित गोपुरम सर्वाधिक विशाल है। इसे राज गोपुरम कहते हैं। ग्रेनाईट द्वारा निर्मित इस गोपुरम की ऊँचाई लगभग २१७ फीट है। इसमें ग्यारह तल हैं। अन्य गोपुरमों के नाम हैं, थिरुमंजन गोपुरम ( दक्षिण दिशा), पैगोपुरम(पश्चिम दिशा) तथा अम्मनी अम्मन गोपुरम(उत्तर दिशा)। सभी गोपुरम विभिन्न शिल्पों द्वारा अलंकृत हैं।

प्राकारम

प्राकारम अथवा प्राकार मंदिर के बाहरी क्षेत्र को कहा जाता है जो खुला अथवा ढंका हुआ हो सकता है। यह मंदिर के चारों ओर बनाया जाता है जहां भक्तगण मंदिर की परिक्रमा करते हैं। इस मंदिर में सात प्राकार हैं। उनमें पांच प्राकार मंदिर परिसर के भीतर हैं। मंदिर के परिसर को चारों ओर से घेरती सड़क छठा प्राकार है तथा सम्पूर्ण अरुणाचल पर्वत की परिक्रमा करते पथ को सातवाँ प्राकार माना जाता है।

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मंदिर का जलकुंड

मंदिर परिसर के भीतर दो जलकुंड हैं। राजगोपुरम के निकट शिवगंगई तीर्थम है तथा दक्षिणी गोपुरम की ओर ब्रह्म तीर्थम है।

सहस्त्र स्तम्भ मंडप

मंदिर के मंडप का निर्माण विजयनगर साम्राज्य के राजा कृष्णदेवराया के शासनकाल में किया गया था। इस मंडप में सहस्त्र स्तम्भ हैं। राजगोपुरम से प्रवेश करते समय यह मंडप दायीं दिशा में स्थित है। इन स्तंभों पर भिन्न भिन्न देवी-देवताओं के सुन्दर शिल्प हैं। इस मंडप का प्रयोग विशेष रूप से थिरुमंजनम के समय किया जाता है। थिरुमंजनम के आयोजन में अर्ध-नक्षत्र के अवसर पर भगवान का अभिषेक किया जाता है। इस दिन श्री अरुणाचलेश्वर के अभिषेक के दर्शन हेतु सहस्त्रों भक्तगण इस मंडप में एक साथ बैठते हैं।

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पाथाल लिंगम

पाथाल लिंगम अथवा पाताल लिंग एक भूमिगत कक्ष है। ऐसा कहा जाता है कि रमण महर्षि ने यहाँ ध्यान साधना की थी। रमण महर्षि एक प्रख्यात संत थे जिन्होंने अल्प वय में मृत्यु को पराजित किया था।

कम्बत्तु इल्लैयनार सन्निधि

राजा कृष्णदेवराया द्वारा निर्मित यह सन्निधि अथवा मंदिर सहस्त्र स्तम्भ मंडप के समक्ष स्थित है। इसके भीतर चार कक्ष हैं। सबसे भीतरी कक्ष मूलस्थान है जहां श्री मुरुगन की प्रतिमा स्थापित है। तीसरे कक्ष का प्रयोग पूजा आराधना के लिए किया जाता है। प्रथम एवं द्वितीय कक्ष में ग्रेनाईट पर उत्कृष्ट रूप से उत्कीर्णित संरचनाएं हैं।

शिव गंगा विनायक संनाथी

शिव गंगा सन्निधि
शिव गंगा सन्निधि

विनायक अथवा गणपति को समर्पित यह मंदिर इल्लैयनार संनाथी के पृष्ठभाग में स्थित है। इस मंदिर के ऊपर एक भव्य व विशाल विमान है जिस पर देवी-देवताओं की रंगबिरंगी छवियाँ हैं।

अरुणगिरीनाथर मंडपम

अरुणगिरीनाथर मंडपम अथवा अरुणगिरीनाथ मंडप तमिल संत अरुणगिरीनाथ को समर्पित है। उन्हें सामान्यतः भगवान मुरुगन के समक्ष हाथ जोड़कर नतमस्तक मुद्रा में खड़े हुए दर्शाया जाता है।

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कल्याण सुदर्शन सन्निधि

इस सन्निधि में एक शिवलिंग है। साथ ही देवी पार्वती एवं नंदी के विग्रह भी हैं। इसमें एक विवाह मंडप भी है जहां अनेक भक्तगण विवाह समारोह आयोजित करते हैं।

वल्लला महाराज गोपुरम

इस गोपुरम का निर्माण होयसल राजा वीर वल्लला अथवा वीर बल्लाल ने किया था। इस अटारी में उनकी प्रतिमा भी स्थापित की गयी है। इसी कारण इसका नामकरण वल्लला महाराज गोपुरम हुआ। यहाँ श्री अरुणाचलेश्वर स्वयं वीर वल्लला का श्राद्ध करते हैं क्योंकि राजा की कोई संतान नहीं थी।

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किल्ली गोपुरम

किल्ली गोपुरम का अर्थ है, तोता अटारी। यह गोपुरम श्री अरुणाचलेश्वर की भीतरी गर्भगृह से जुड़ा हुआ है। इस गोपुरम के ऊपर, एक आले के भीतर, गारे में निर्मित तोते का शिल्प है। ऐसी मान्यता है कि संत अरुणगिरीनाथ स्वयं एक तोते के रूप में इस गोपुरम पर विश्राम कर रहे हैं। इस गोपुरम पर राजा राजेन्द्र चोल तथा इस गोपुरम के निर्माता भास्करमूर्ती व उनकी पत्नी की भी प्रतिमाएं हैं। मंदिर में आयोजित शोभायात्राओं के समय सभी उत्सव मूर्तियों को इसी गोपुरम से बाहर लाया जाता है।

कत्ती मंडपम

किल्ली गोपुरम को पार कर सोलह स्तम्भ युक्त एक विस्तृत कक्ष में पहुँचते हैं जिसे कत्ती मंडपम कहते हैं। प्रमुख उत्सवों के समय यहाँ से सभी देवों के दर्शन होते हैं। कार्तिकई दीपम उत्सव पर पावन अरुणाचल पर्वत के शिखर पर दीप स्तम्भ प्रज्ज्वलित किया जाता है। भक्तगण इसी मंडप से उस प्रकाश पुंज के दर्शन करते हैं। इसी मंडप से ध्वज स्तम्भ एवं श्री अरुणाचलेश्वर मंदिर के समक्ष विराजमान एक छोटे नंदी के भी दर्शन होते हैं।

श्री सम्बन्ध विनायक मंदिर

यह मंदिर कत्ती मंडपम के समीप स्थित है। मंदिर के भीतर चटक लाल रंग में भगवान गणेश अथवा विनायक की बैठी मुद्रा में विग्रह है। यह प्रतिमा सम्पूर्ण तमिल नाडू के मंदिरों में स्थापित विशालतम गणेश प्रतिमाओं में से एक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान् गणेश ने एक दानव का वध किया था तथा उसके रक्त से अपने शरीर का लेप किया था। इसी कारण उनकी देह रक्तवर्ण है.

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उन्नमलाई अम्मन मंदिर

इस मंदिर में देवी उन्नमलाईअम्मन के रूप में देवी पार्वती की आराधना की जाती है। यह मंदिर श्री अरुणाचलेश्वर मंदिर संकुल के उत्तर-पश्चिमी कोने में स्थित है। इस मंदिर में नवग्रह मंदिर, कोडेमरा मंडपम, अष्टलक्ष्मी मंडपम तथा गर्भगृह हैं।

श्री अरुणाचलेश्वर मंदिर

श्री अरुणाचलेश्वर मंदिर इस संकुल का सर्वाधिक भीतरी मंदिर है जो पूर्व मुखी है। वे इस मंदिर के प्रमुख देव हैं। इसके गर्भगृह में शिवलिंग है। मंदिर की चारों ओर स्थित भित्तियों पर लिंगोद्भव, नटराज,  दुर्गा तथा अन्य देव-देवताओं के शिल्प हैं। मंदिर के दूसरे प्राकारम में पल्लियारै नामक एक लघु कक्ष है। यह कक्ष शिव-पार्वती का विश्राम कक्ष है। मंदिर में दिवस भर के सभी अनुष्ठानों की समाप्ति के पश्चात, रात्रि के समय देवी पार्वती की प्रतिमा को पालकी में बैठाकर इस कक्ष में लाया जाता है। श्री अरुणाचलेश्वर का प्रतिनिधित्व करती एक प्रतिमा को भी इस कक्ष में लाया जाता है। तत्पश्चात दोनों विग्रहों को एक झूले पर विराजमान किया जाता है। कुछ अतिरिक्त अनुष्ठानों के पश्चात कक्ष को बंद कर दिया जाता है। भगवान् शिव एवं देवी पार्वती प्रातःकाल तक कक्ष में विश्राम करते हैं।

आप यहाँ सुन्देरश्वर, अर्धनारीश्वर तथा अन्य उत्सव मूर्तियों को भी देख सकते हैं जिन्हें विभिन्न उत्सवों में शोभायात्रा के लिए लिया जाता है। दूसरी प्राकारम में ६३ नेयनर तथा शिवलिंग के विभिन्न रूपों के शिल्प हैं। गणपति का एक लघु मंदिर, स्थल विनायक, भी यहाँ स्थित है।

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समयसारिणी

श्री अरुणाचलेश्वर मंदिर के पट प्रातः ५:३० बजे खुलते हैं तथा रात्रि ९:३० बजे बंद होते हैं।

श्री अरुणाचलेश्वर मंदिर के उत्सव

महाशिवरात्रि, नवरात्रि, वैकुण्ठ एकादशी आदि ऐसे उत्सव हैं जो अन्य मंदिरों के समान इस मंदिर में भी मनाये जाते हैं। किन्तु अनेक ऐसे महत्वपूर्ण उत्सव हैं जो विशेष रूप से श्री अरुणाचलेश्वर मंदिर में आयोजित किये जाते हैं। वे हैं:

  • ब्रह्मोत्सवम – यह उत्सव नवम्बर व दिसंबर मास के मध्य, तमिल पंचांग के कार्तिकई मास में मनाया जाता है। इस दस-दिवसीय उत्सव का समापन कार्तिकई दीपम उत्सव से किया जाता है। कार्तिकई दीपम उत्सव पर पावन अरुणाचल पर्वत के शिखर पर दीप स्तम्भ प्रज्ज्वलित किया जाता है। श्री अरुणाचलेश्वर की उत्सव मूर्ति को लकड़ी के रथ पर विराजमान कर अरुणाचल पर्वत की परिक्रमा की जाती है। शिलालेख दर्शाते हैं कि यह उत्सव चोलवंश के काल से मनाया जा रहा है।
  • गिरिवलम – प्रत्येक पूर्णिमा के दिन भक्तगण नंगे पैर अरुणाचल पर्वत की परिक्रमा करते हैं। इस परिक्रमा को गिरिवलम अथवा गिरिपरिक्रमा कहते हैं। यह परिक्रमा में १४ किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। ऐसी मान्यता है कि इस परिक्रमा के द्वारा भक्तगणों के पाप धुल जाते हैं तथा उन्हें जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति प्राप्त होती है। परिक्रमा पथ पर अनेक छोटे-बड़े मंदिर, गुफाएं तथा जलकुंड हैं जहां भक्त भेंट चढ़ाते हैं। परिक्रमा पथ के आठ दिशाओं में अष्टलिंग स्थापित हैं।
  • तिरुवूदल – यह उत्सव तमिल पंचांग के थाई मास में मनाया जाता है जो अंग्रेजी पंचांग के जनवरी मास में आता है। इस दिन नंदी को फलों, भाजियों एवं मिष्ठान से बने पुष्पहार से अलंकृत किया जाता है। मंदिर के विभिन्न उत्सव मूर्तियों की शोभायात्रा निकाली जाती है। भगवान शिव एवं देवी पार्वती के मध्य हुए दिव्य विवाद को अभिनीत किया जाता है। विवाद के पश्चात देवी अकेली ही कक्ष के भीतर जाती हैं तथा कक्ष का द्वार बंद कर देती हैं। भगवान शिव समीप स्थित मुरुगन मंदिर में रात्रि व्यतीत करते हैं।

यात्रा सुझाव

  • श्री अरुणाचलेश्वर मंदिर में पारंपरिक परिधान की अपेक्षा की जाती है। अतः आप इस पर विशेष रूप से ध्यान केन्द्रित करें। छोटे वस्त्रों की अनुमति पुरुष एवं स्त्रियों दोनों को नहीं है।
  • चेन्नई एवं बंगलुरु से यहाँ आसानी से पहुंचा जा सकता है।
  • ठहरने के लिए भरपूर्ण संख्या में उत्तम सुविधाएं उपलब्ध हैं। किन्तु उत्सवों के समय पूर्व नियोजन आवश्यक है।
  • भक्तगण यदि गिरिवलम करना चाहें तो मंदिर संस्थान एवं नगर प्रशासन द्वारा विभिन्न सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।
  • मंदिर संस्थान द्वारा भी मंदिर के विश्राम गृह में नाममात्र शुल्क पर ठहरने की सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।
  • मंदिर परिसर के भीतर सभी सूचनाएं तमिल भाषा में हैं। अतः आप आवश्यक जानकारियाँ एवं सूचनाएं गोपुरम के सुरक्षाकर्मियों से अथवा मंदिर के कार्यालय से प्राप्त कर सकते हैं।
  • उन्नमलाईअम्मन मंदिर के समीप स्थित प्रसाद खिड़की पर मंदिर का प्रसाद उपलब्ध होता है।

अन्य निकटवर्ती पर्यटन स्थल

रमण महर्षि आश्रम

रमण महर्षि आश्रम
रमण महर्षि आश्रम

रमण महर्षि एक महान संत थे जिन्होंने १६ वर्ष की अल्पायु में मृत्यु को चुनौती दी थी। रमण महर्षि का आश्रम गिरिवलम पथ पर स्थित है। आश्रम में उनकी समाधि है। रमण महर्षि द्वारा दी गयी शिक्षा का उनके अनुयायी पूर्ण श्रद्धा से पालन करते हैं। वे उनका आशीष प्राप्त करने के लिए इस आश्रम में आते हैं। आश्रम में विश्राम गृह की सुविधा उपलब्ध है। आश्रम में पुस्तकालय, भोजन कक्ष, गौशाला तथा एक विक्री केंद्र भी हैं। इस आश्रम में मातृभाषेश्वर मंदिर भी है। रमण महर्षी आश्रम अत्यंत रम्य व मनोरम है। यहाँ आप एक दिव्यात्मा की उपस्थिति एवं शान्ति का अनुभव करेंगे।

स्कंदाश्रम

यह आश्रम मंदिर के समक्ष एक पहाड़ी पर स्थित है। रमण महर्षी ने सन् १९१६ से सन् १९२२ तक इस आश्रम में निवास किया था। स्कंदाश्रम जाते समय आप ऊंचाई से श्री अरुणाचलेश्वर मंदिर का भव्य परिदृश्य देख सकते हैं।

विरूपाक्ष गुफा

ऐसी मान्यता है कि यह गुफा ऋषि विरूपाक्ष की समाधि स्थल है। यह गुफा ॐ के आकार की है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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गोकर्ण – कर्नाटक के प्राचीन तीर्थ एवं पर्यटक स्थल https://inditales.com/hindi/gokarna-prachin-tirtha-sthal-paryatak-sthal/ https://inditales.com/hindi/gokarna-prachin-tirtha-sthal-paryatak-sthal/#respond Wed, 06 Oct 2021 02:30:18 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2436

अप्रतिम सौंदर्य से परिपूर्ण, भारत के पश्चिमी तट पर स्थित गोकर्ण एक प्राचीन तीर्थ क्षेत्र है। यह एक ओर समुद्र तथा तीन ओर पर्वतों से घिरा हुआ है। पुराणों में इस स्थान का उल्लेख शतश्रृंगी के नाम से किया गया  है, जिसका अर्थ है, सौ सींगों के समान पहाड़ियों से घिरा स्थान। मैं जब गोकर्ण […]

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अप्रतिम सौंदर्य से परिपूर्ण, भारत के पश्चिमी तट पर स्थित गोकर्ण एक प्राचीन तीर्थ क्षेत्र है। यह एक ओर समुद्र तथा तीन ओर पर्वतों से घिरा हुआ है। पुराणों में इस स्थान का उल्लेख शतश्रृंगी के नाम से किया गया  है, जिसका अर्थ है, सौ सींगों के समान पहाड़ियों से घिरा स्थान। मैं जब गोकर्ण नगरी में प्राचीन मंदिरों एवं तीर्थों की खोज में भ्रमण कर रही थी, मैंने चारों ओर अनेक छोटी छोटी पहाड़ियों को देखा था। गोकर्ण की पावन भूमि दो ओर से गंगावल्ली एवं अघनाशिनी नदियों से तथा तीसरी ओर अरब सागर से घिरी हुई है।   सम्पूर्ण नगरी में अनेक तीर्थ अथवा पवित्र जलकुंड हैं। उनमें विशालतम तीर्थ है कोटि तीर्थ, जो गोकर्ण नगरी का हृदयस्थल है। गोकर्ण में तीर्थयात्रियों एवं पर्यटकों, दोनों के लिए अनेक आकर्षण हैं। आईये गोकर्ण के इन्ही मणियों के विषय में जानते हैं।

गोकर्ण की कथा

महाभारत, गुरुचरित्र, गोकर्ण खंड जैसे अनेक हिन्दू साहित्यों में गोकर्ण का एक पवित्र स्थल के रूप में उल्लेख है। इसका नाम गोकर्ण कैसे पड़ा?

गोकर्ण नाम की व्युत्पत्ति

गोकर्ण से सम्बंधित इस कथा से इसके नाम की व्युत्पत्ति के विषय में ज्ञात होता है। किसी समय पृथ्वी पर सर्वत्र जल ही जल व्याप्त था। भगवान नारायण क्षीरसागर में शेषशैय्या पर योगनिद्रा में लीन थे। उनकी नाभि से उत्पन्न कमल पुष्प से, सम्पूर्ण सृष्टि की रचना के उद्देश्य से, ब्रह्माजी का उद्भव हुआ। उन्होंने सर्वप्रथम अपने क्रोध से रूद्र की रचना की, जिन्हें उन्होंने ब्रह्माण्ड की सृष्टि का आदेश दिया। रूद्र पृथ्वी के गर्भ पाताललोक जाकर ध्यान मग्न हो गए। ब्रह्मा को यह आभास हुआ कि उन्हें ऐसे विश्व की आवश्यकता है जिसमें सत्वगुण, रजोगुण तथा तमोगुण तीनों हों। तब उन्होंने पितृ, पुरुष एवं प्रकृति की रचना की। इससे रूद्र क्रुद्ध हो गए तथा पाताललोक से ब्रह्मलोक की ओर कूच किया।

रूद्र के क्रोध से धरती माता भयभीत हो गयी। उन्होंने रूद्र से निवेदन किया कि वे उनके गर्भ से धीरे से निकलें। रूद्र ने उनके अनुनय को स्वीकार किया तथा अंगूठे का अतिलघु आकार लेकर धरती माता के कर्ण से बाहर आ गए। चूंकि धरती माता का एक नाम ‘गो’ भी है, यह घटना जिस स्थान पर हुई, उसका नाम गोकर्ण पड़ा। गोकर्ण के मुख्य महाबलेश्वर मंदिर के शिवलिंग को आदि-गोकर्ण कहते हैं, जिसे इस कथा का प्रमाण माना जाता है।

रावण एवं गोकर्ण

गोकर्ण की दूसरी कथा लंका के रावण से सम्बंधित है। कठोर तपस्या के उपरान्त रावण भगवान शिव के आत्मलिंग को उठाकर कैलाश पर्वत से लंका ले जा रहा है। भगवान शिव का कड़ा निर्देश था कि वह उस आत्मलिंग को उसी स्थान पर रखे जहां वह उसे स्थापित करना चाहता है। जैसे ही वह गोकर्ण पहुंचा, उसके संध्यावंदन का समय हो चुका था। उसी समय भगवान गणेश उसके समक्ष एक नन्हे बटुक के रूप में प्रकट हुए। संध्यावंदन समाप्ति तक रावण ने गणेश को वह आत्मलिंग सौंप दिया। किन्तु नन्हा बटुक आत्मलिंग का भार अधिक क्षण नहीं उठा पाया तथा उसे धरती पर रख दिया। इससे क्रुद्ध होकर रावण ने गणेश के शीष पर प्रहार किया।

बटुक गणेश को अत्मलिंग थमाते लंकापति रावण
बटुक गणेश को अत्मलिंग थमाते लंकापति रावण

आज भी वह लिंग गोकर्ण के प्रमुख मंदिर, गोकर्ण महाबलेश्वर में स्थापित है। समीप स्थित महागणपति मंदिर में गणेशजी की प्रतिमा के शीष पर उस प्रहार का चिन्ह है।

अयोध्या

तीसरी कथा अयोध्या के महाराज सागर की है जिनके ६०,००० पुत्रों को कपिलमुनि ने अग्नि में भस्म कर दिया था। महाराज सागर के वंशज भागीरथ ही गंगा को धरती पर लाये थे। ऐसी मान्यता है कि किसी काल में अनेक असुर समुद्र के भीतर निवास करते थे। रात्रि के समय वे बाहर आकर मानवों पर नाना प्रकार के अत्याचार करते थे। त्रस्त होकर वे अगस्त्य ऋषि के समक्ष गए तथा उनसे समुद्र का सम्पूर्ण जल ग्रहण करने का आग्रह किया ताकि असुर वहां से चले जाएँ। अगस्त्य ऋषि ने सागर का सम्पूर्ण जल पी लिया जिससे समुद्र तल सूख गया।

समुद्र देवता चिंतित हो गये तथा उन्होंने अगस्त्य ऋषि से सम्पूर्ण जल लौटाने का आग्रह किया। अगस्त्य ऋषि ने असमर्थता जताई क्योंकि वे समूचे जल को पचा चुके थे। तदनंतर समुद्र देव गोकर्ण आये तथा एक शिवलिंग की रचना कर भगवान् शिव की आराधना करने लगे। प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनसे अपनी इच्छा व्यक्त करने के लिए कहा। समुद्र देव ने अपना सम्पूर्ण जल पुनः प्राप्त करने की अभिलाषा की। भगवान शंकर ने कहा कि जब महाराज सागर के वंशज, भागीरथ गंगा को धरती पर लायेंगे, तब उसे भी उसका जल पुनः प्राप्त हो जाएगा। इसी कारण गोकर्ण के जल को गंगा के समान पावन माना जाता है। इस सागरेश्वर शिवलिंग को आप महाबलेश्वर मंदिर के बाहर, एक छोटे से मंदिर के भीतर देख सकते हैं।

परशुराम

गोकर्ण से सम्बंधित चौथी कथा में जमदग्नि एवं रेणुका के पुत्र परशुराम का उल्लेख है जिन्होंने परशु से वार कर समुद्र के जल को पीछे धकेल दिया था, जिसके कारण कोंकण तट अस्तित्व में आया। ऐसी मान्यता है कि परशुराम ने गोकर्ण में खड़े होकर समुद्र की ओर अपना परशु फेंका था। वस्तुतः, यह कथा आप कोंकण तट के लगभग सभी क्षेत्रों में सुनेंगे। महाबलेश्वर मंदिर के भीतर जमदग्निश्वर नामक एक शिवलिंग भी स्थापित है जो आप देख सकते हैं।

पांचवीं कथा के अनुसार दिव्य गौमाता सुरभि ने यहीं तपस्या की थी। उन्होंने जिस शिवलिंग का अभिषेक किया था, उसे सुर्भेश्वर कहते हैं।

गोकर्ण के पवित्र स्थल

गोकर्ण की छोटी सी पावन नगरी में छोटे-बड़े अनेक मंदिर एवं तीर्थ  हैं।

महाबलेश्वर मंदिर परिसर

महाबलेश्वर मंदिर गोकर्ण का मुख्य मंदिर है। इसके भीतर आत्मलिंग स्थापित है। आत्मलिंग को चाँदी के आवरण से ढका है जिसके ऊपर स्थित छिद्र के द्वारा आप लिंग को स्पर्श कर सकते हैं। विशेष समयकाल में आप आवरण विहीन लिंग के भी दर्शन कर सकते हैं।

गोकर्ण महाबलेश्वर मंदिर का अत्मलिंग एवं पालकी दर्शन
गोकर्ण महाबलेश्वर मंदिर का अत्मलिंग एवं पालकी दर्शन

यह गोकर्ण का सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान है। मंदिर के भीतर देवी एवं गणेश के भी विग्रह हैं। मंदिर के समीप मुझे एक वीरगल भी दृष्टिगोचर हुआ। वीरगल का अर्थ है, वीरों की स्मृति में स्थापित शिलास्तंभ। एक ओर स्थित अतिरिक्त प्रवेशद्वार के बाहर भी कुछ वीरगल थे जिस पर नाग शिल्प थे।

मंदिर में प्रवेश करने के लिए पुरुषों को केवल धोती एवं उपवस्त्र धारण करना पड़ता है। स्त्रियाँ कोई भी भारतीय परिधान धारण कर सकती हैं।

आदि-गोकर्ण मंदिर

मुख्य मंदिर से यदि आप दक्षिणावर्त आयें तो सर्वप्रथम मंदिर आदि-गोकर्ण मंदिर है। इसके भीतर एक प्राचीन लिंग है। शिवलिंग तक पहुँचने के लिए कुछ सीढ़ियाँ उतरनी पड़ती हैं। इस शैल मंदिर के चारों ओर लकड़ी के सुन्दर फलक लगाए हुए हैं। कुछ समय पूर्व ही इसका नवीनीकरण किया गया है।

स्कंदेश्वर मंदिर

एक लघु मंदिर के भीतर यह एक प्राचीन शिवलिंग है। इसके तीन ओर स्थित खिड़कियों पर स्वस्तिक बने हुए हैं।

वीरभद्र मंदिर

दक्षिणावर्त ही आगे बढ़ेंगे तो आप उजले पीले रंग का एक वीरभद्र मंदिर देखेंगे। यह भगवान शिव का ही रूप है जिसने दक्ष के यज्ञ को नष्ट किया था।

ताम्र गौरी मंदिर

ताम्र गौरी, वीरभद्र एवं आदि गोकर्ण मंदिर
ताम्र गौरी, वीरभद्र एवं आदि गोकर्ण मंदिर

ताम्र गौरी गोकर्ण की अधिष्ठात्री शक्ति हैं। उनका मंदिर महाबलेश्वर मंदिर के पृष्ठ भाग में है। ऐसी मान्यता है कि शंकरजी के पीछे पीछे गौरी ताम्रंचल पर्वत से यहाँ तक पहुँच गयी थीं। इसीलिए उन्हें ताम्र गौरी कहा जाता है। उनके हाथों में एक तराजू होता है। लोगों की मान्यता है कि वे वाराणसी एवं गोकर्ण के सद्गुणों की तुलना कर रही हैं। उनका गोकर्ण में होना यह दर्शाता है कि गोकर्ण के सद्गुण अधिक हैं।

ताम्र गौरी मंदिर के समीप ताम्र कुण्ड है जिसका उपयोग केवल अस्थिविसर्जन के लिए किया जाता है। महात्मा गाँधी के अस्थियों का एक भाग यहाँ भी विसर्जित किया गया था।

गौतमेश्वर मंदिर

ऐसा माना जाता है कि इस शिवलिंग की स्थापना एवं आराधना गौतम ऋषि द्वारा की गयी थी। यह शिवलिंग केवल एक पीठिका पर स्थापित है।

दत्तात्रय मंदिर

महाबलेश्वर मंदिर की भित्ति पर एक छोटा सा दत्तात्रय मंदिर है। इसके भीतर एक पादुका पीठ है जिस पर दत्त महाराज की पादुकाएं हैं। भीतर दत्तात्रय की एक प्रतिमा भी है।

महागणपति मंदिर

महागणपति मंदिर अथवा द्विभुज गणपति मंदिर गोकर्ण के आत्मलिंग से केवल ४० पग दूर है। यह महाबलेश्वर मंदिर के लगभग बाहर ही स्थित है। अप्रतिम नारगी रंग का यह मंदिर ठेठ कोंकण शैली में निर्मित है।

श्री महागणपति मंदिर - गोकर्ण
श्री महागणपति मंदिर – गोकर्ण

मंदिर के भीतर द्विभुज गणपति की प्रतिमा स्थापित है।

भित्तियों पर कुछ प्राचीन शिल्प हैं जो रामायण के दृश्यों को प्रदर्शित करते हैं।

मंदिर के एक ओर स्थित सड़क कोटि तीर्थ तक जाती है। यहाँ गायत्री तीर्थ नामक एक अन्य तीर्थ भी है।

इन्द्रेश्वर लिंग

महागणपति मंदिर एवं मुख्य मंदिर के अतिरिक्त द्वार के मध्य, यह मंदिर लगभग सड़क पर ही स्थित है।

सगरेश्वर मंदिर

मुख्य मंदिर में प्रवेश करते समय, मुख्य मंदिर के बाहर स्थित इस छोटे से मंदिर पर आपकी दृष्टी अवश्य पड़ेगी। समीप स्थित ब्राह्मण के एक सुन्दर से निवास को देखाना ना भूलें।

सगरेश्वर मंदिर
सगरेश्वर मंदिर

महाबलेश्वर मंदिर परिसर के चारों ओर रंगबिरंगे सुन्दर निवास हैं। उन पर सुन्दर चित्रकारी की हुई है। उन्हें भी अवश्य निहारें।

वाहन मार्ग पर स्थित मंदिर

वाहन मार्ग गोकर्ण का एक मुख्य मार्ग है।

अहिल्या बाई होलकर मंदिर

मुख्य मंदिर के पृष्ठभाग में, जैसे ही आप वाहन मार्ग पर जायेंगे, आप चारों ओर अनेक छोटे-बड़े मंदिर देखेंगे। उनमें से इस मंदिर की सादगी ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। इसके भीतर एक लिंग स्थापित है। समीप ही, हाथों में एक लिंग उठाये, मालवा की महारानी अहिल्या बाई होलकर की प्रतिमा है।

सूर्य नारायण मंदिर

यह सूर्य को समर्पित एक लघु मंदिर है।

वेंकटरमण मंदिर

यह अपेक्षाकृत विशाल मंदिर है जिसके ऊपर कमल के पुष्प के आकार का एक विशेष शिखर है। मंडप के स्तंभों पर विष्णु पुराण से सम्बंधित घटनाएँ उत्कीर्णित हैं।

मुख्य मंदिर के क्षेत्र को कोटि तीर्थ से जोड़ते दो मार्ग हैं। प्रथम मार्ग पर नागा तीर्थ है, वहीं दूसरे मार्ग पर अनेक विशाल व अप्रतिम निवास हैं जिनके भीतर मंदिर हैं। यदि आप यहाँ प्रातःकाल के समय भ्रमण करें तो आपको स्तोत्र पठन एवं घंटानाद से गुंजायमान वातावरण मिलेगा। उस समय सभी पुरोहित पूजा-अर्चना में व्यस्त रहते हैं।

नाग तीर्थ

यह नाग वीथी पर स्थित है जो महाबलेश्वर मंदिर को कोटि तीर्थ  से जोड़ता प्रमुख मार्ग है। यह ब्राह्मणों के निवास से भरा एक संकरा मार्ग है। यहाँ स्थित एक मंदिर में लाखों की संख्या में नागों की छवियाँ हैं। एक वृद्ध वृक्ष के नीचे, मंदिर के भीतर, मंदिर की आतंरिक एवं बाह्य भित्तियों पर, जहाँ दृष्टी जाए वहां नाग उत्कीर्णित हैं। मंदिर के भीतर स्थापित लिंग भी नाग शिल्पों द्वारा अलंकृत है।

दुर्गा, ताम्र एवं नाग तीर्थ
दुर्गा, ताम्र एवं नाग तीर्थ

ऐसी मान्यता है कि पांडवों के वंशज, जन्मजेय के यज्ञ में जो नाग अग्नि में भस्म हुए थे, वे सभी मुक्ति प्राप्त करने यहीं आये थे।

दुर्गा तीर्थ

नाग तीर्थ के निकट एक अन्य लघु व प्राचीन तीर्थ है। इस जलकुंड का नाम दुर्गा तीर्थ है। इसके निकट एक छोटा सा मंदिर भी है। यह किसी स्थानिक के निजी स्वामित्व का भाग है। अतः इसके अवलोकन के लिए उनकी अनुमति प्राप्त करना आवश्यक है।

कोटि तीर्थ

ऐसा कहा जाता है कि शतश्रंगी पर्वतों में लगभग दो लाख तीर्थ अथवा जलस्त्रोत थे। यहां अनेक तपस्वी तप किया करते थे। कालान्तर में उनमें से एक लाख तीर्थों का सागर में विलय हो गया। शेष एक लाख तीर्थ संविलीन होकर कोटि तीर्थ कहलाये। यह एक विशाल जलाशय है जिसके चारों ओर मंदिर एवं निवास हैं। यह तीर्थ पिंड दान के लिए जाना जाता है।

कोटि तीर्थ गोकर्ण
कोटि तीर्थ गोकर्ण

एक अन्य मान्यता के अनुसार, जो यहाँ प्रार्थना करे उसे एक कोटि अर्थात् एक लाख गुना फल प्राप्त होता है।

इस कुंड के मध्य में एक शिवलिंग है जिसे कोटेश्वर कहते हैं। इसके चारों ओर भ्रमण करें तो आप पट्ट विनायक मंदिर, विश्वेश्वर विट्ठल मंदिर, वीर मारुति मंदिर, गोपाल कृष्ण मंदिर, शंकर नारायण मंदिर, हरिहर मंदिर, काली मंदिर तथा भैरव मंदिर देख सकते हैं।

पट्ट विनायक मंदिर गणेश को विशेष सम्मान से विभूषित करने का द्योतक है जब उन्होंने रावण से आत्मलिंग को पुनः प्राप्त करने में देवताओं की सहायता की थी।

काली मंदिर अथवा कालीहृद

यह एक प्राचीन देवी मंदिर है जो गोकर्ण नगर के प्रवेश द्वार पर स्थित है। गोकर्ण नगरी में प्रवेश करते समय आप इसे अवश्य देखेंगे।

भद्रकाली मंदिर, गोकर्ण मठ एवं पट्टविनायक मंदिर
भद्रकाली मंदिर, गोकर्ण मठ एवं पट्टविनायक मंदिर

ऐसी मान्यता है कि शुम्भ, निशुम्भ, रक्तबीज, चंड एवं मुंड इत्यादि दानवों का संहार कर देवी गोकर्ण आयीं थी तथा यहाँ के जल में अपने आयुध स्वच्छ किये थे। तत्पश्चात वे भद्रकाली में ध्यानमग्न हो गयी थीं।

मुख्य मार्ग से जिस प्रवेश द्वार द्वारा हम मंदिर के भीतर पहुंचते हैं, वह वास्तव में मंदिर का पृष्ठभाग है। अतः गोल घूमते हुए हम इस दक्षिण-मुखी मंदिर के प्रवेश द्वार तक पहुँचते हैं। मंदिर के भीतर भद्रकाली की अत्यंत उर्जावान मूर्ति है। शुक्रवार मंदिर का विशेष दिवस होता है।

इस मंदिर के समीप अनेक अन्य लघु देवी मंदिर हैं।

कलकलेश्वर मंदिर

कलकलेश्वर मंदिर एक छोटी चट्टानी पहाड़ी पर स्थित है। कुछ सीढ़ियाँ चढ़कर आप इस छोटे से मंदिर तक पहुँचते हैं। उजाले रंगों में रंगे इस मंदिर के भीतर एक शिवलिंग है।

ऐसी मान्यता है कि जब रावण आत्मलिंग को गोकर्ण की भूमि से पृथक करने में असफल हुआ तब सभी देवताओं ने उसका उपहास किया। यह शिवलिंग उनके उसी उपहास के कलकल का द्योतक है।

राम तीर्थ

राम तीर्थ - मीठे पानी का सोत्र
राम तीर्थ – मीठे पानी का सोत्र

एक पहाड़ी पर स्थित इस मंदिर से तीनों ओर के सागर का दृश्य दिखाई देता है। एक प्राकृतिक जल स्त्रोत द्वारा मंदिर के जलकुंड में सतत जल भरता रहता है। इस जलकुंड को राम कुंड कहते हैं। मंदिर के भीतर एक अप्रतिम राम दरबार है। मंदिर की परिक्रमा करते समय आप अनुभव कर सकते हैं कि कंक्रीट संरचनाओं से पूर्व यहाँ का वायुमंडल कितना उर्जावान रहा होगा।

ऐसी मान्यता है कि भगवान श्री राम जब रावण का वध कर लंका से लौट रहे थे तब उन्होंने ब्राह्मण हत्या के दोष से निवारण हेतु यहीं तप किया था। उसके पश्चात ही उन्होंने अयोध्या की भूमि पर अपने चरण कमल रखे थे।

गो गर्भ तथा कमण्डलु तीर्थ

मुख्य मंदिर के समीप, आप एक प्राकृतिक गुफा देख सकते हैं जिसके भीतर एक लघु मंदिर है। मंदिर सामान्यतः बंद रहता है। किन्तु आप गुफा को भीतर से अवश्य देख सकते हैं। कदाचित प्राचीन काल में ऋषियों ने इस गुफा का उपयोग एकांत में तप करने के लिए किया होगा। गुफा के ऊपर विचरण करते समय तनिक भी आभास नहीं होता कि नीचे एक विशाल गुफा है। गुफा के मुख को देखने के पश्चात ही यह आभास होता है।

भूल भुलैया, जटायु तीर्थ, गो गर्भ एवं कमण्डलु तीर्थ
भूल भुलैया, जटायु तीर्थ, गो गर्भ एवं कमण्डलु तीर्थ

गुफा के ऊपर स्थित एक छिद्र द्वारा सूर्य का प्रकाश भीतर स्थित मंदिर पर पड़ता है। अरकू घाटी में स्थित बोर्रा गुफाओं में भी ऐसी ही व्यवस्था थी।

ऐसा कहा जाता है कि गुफा का आकार गौमाता के गर्भ के समान है। इसीलिए इसे गो गर्भ कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि जब परशुराम ने धरती माता को क्षत्रिय विहीन कर दिया था, तब धरती माता ने यही आकर ध्यान साधना की थी।

कमण्डलु तीर्थ एक छोटा गोलाकार छिद्र है। लोगों की मान्यता है कि ब्रह्माजी ने यहाँ अपना कमण्डलु रख दिया था। इसे देख आश्चर्य होता है कि चारों ओर बंजर चट्टान होने के पश्चात भी इस छोटे से छिद्र में सदा मीठा जल भरा रहता है, जो कदाचित किसी भूमिगत स्त्रोत द्वारा आपूर्त होता रहता है।

जटायु तीर्थ

यह समुद्र के समीप एक छोटी गुफा है जहाँ पहुँचने के लिए सीधी ऊंची पहाड़ी से नीचे उतरना पड़ता है। उतरने के लिए चट्टानों पर उबड़-खाबड़ सीढ़ियाँ हैं जिसे उतरने के लिए अत्यंत सावधानी एवं चपलता की आवश्यकता है। पहाड़ी के ऊपर से समुद्र, सूर्यास्त तथा हरियाली का अप्रतिम दृश्य दिखाई पड़ता है।

भूलभुलैया

जटायु तीर्थ के समीप एक सुन्दर भूलभुलैया है। किन्तु इसकी रचना के विषय में किसी को जानकारी नहीं है।

रूद्रपाद

यह मुख्य नगरी से किंचित दूर, गंगावल्ली नदी के समीप स्थित है। यहाँ तक पहुँचने के लिए खेतों से होकर जाना पड़ता है। कोई स्थानिक ऑटो चालक आपको वहां ले जा सकता है। ऐसा कहा जाता है कि जैसे गया में विष्णु के चरणों को विष्णुपाद के रूप में पूजा जाता है, गोकर्ण में भगवान शिव के चरणों को रूद्रपाद के रूप में पूजा जाता है। यह एक लघु मंदिर है जिसके शिवलिंग पर दो पादों के चिन्ह हैं।

यहाँ स्वर्गारूढ़ आत्मा के लिए पिंडदान का अनुष्ठान किया जाता है।

गोकर्ण के आश्रम

गोकर्ण पहाड़ियों, चट्टानों, एकाकी समुद्र तट एवं अप्रतिम प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण एक शांत स्थल है। इसी कारण यह तपस्वियों एवं संतों का प्रिय स्थल रहा है। अनेक महान ऋषियों ने यहाँ आश्रण बनाकर तपस्या की थी। आज भी आप कुछ आश्रम यहाँ देख सकते हैं। जैसे:

  • मार्कंडेय आश्रम (वाहन मार्ग)
  • विश्वामित्र आश्रम
  • कपिल तीर्थ तथा आश्रम
  • ब्रह्मा आश्रम
  • जह्नु ऋषि आश्रम (गंगावल्ली) – दीपावली की संध्या को महाबलेश्वर की पालकी उनके विवाह के लिए गंगावल्ली तक आती है।
  • गोकर्ण मठ – यह गोकर्ण बस स्थानक के समीप स्थित है। इसके समक्ष एक छोटा सा मंदिर है जो किंचित विचित्र रीति से निर्मित है।

गोकर्ण के पर्यटन स्थल

एक ओर जहाँ गोकर्ण तीर्थयात्रियों एवं भक्तों का प्रसिद्ध गंतव्य है, वहीं गोकर्ण पर्यटकों में भी अत्यंत लोकप्रिय है। गोकर्ण के समुत्र तटों पर चट्टानें हैं जो समुद्र से अठखेलियाँ करते रहते हैं। आप चाहें तो समुद्र तट पर जाकर आनंद ले सकते हैं अथवा ऊंची पहाड़ियों पर बैठकर समुद्र जल में सूर्य को अस्त होते देख सकते हैं। गोकर्ण के कुछ प्रमुख समुद्र तट हैं:

गोकर्ण समुद्रतट

आदि शंकराचार्य, वीरगल एवं नाग मूर्तियाँ
आदि शंकराचार्य, वीरगल एवं नाग मूर्तियाँ

यह समुद्रतट महाबलेश्वर मंदिर के समीप है। मंदिर के मुख्य द्वार से आप पैदल ही यहाँ पहुँच सकते हैं। गोकर्ण समुद्रतट पर खड़े होकर यदि आप बाईं ओर देखेंगे तो आपको एक पहाड़ी पर राम तीर्थ दृष्टिगोचर होगा। पीछे देखेंगे तो एक मंडप के नीचे आदि शंकराचार्य की प्रतिमा है।

समुद्रतट पर चारों ओर आनंद का वातावरण दिखाई देता है। पर्यटक तथा तीर्थयात्री जल में अठखेलियाँ करते अथवा रेत पर सैर करते दिखाई देते हैं। कई लोग ऊँट की सवारी का आनंद उठाते भी दिखते हैं।

कुड्ले समुद्रतट

कुड्ले समुद्र तट
कुड्ले समुद्र तट

यह गोकर्ण समुद्रतट के दक्षिणी ओर स्थित है। इसके दोनों ओर पहाड़ियां हैं। जब आप ॐ समुद्रतट की ओर जाते हैं तब पहाड़ी के ऊपर से यह अर्धगोलाकार समुद्रतट देख सकते हैं। यह तट पर्यटकों में सूर्यास्त तथा सैर के लिए लोकप्रिय है।

ॐ समुद्रतट

ॐ समुद्र तट की झलकियाँ
ॐ समुद्र तट की झलकियाँ

इस समुद्रतट का आकार ॐ के समान है। यह तट जलक्रीड़ा, सूर्यास्त तथा इसके लोकप्रिय नमस्ते कैफ़े के लिए प्रसिद्ध है।

ॐ समुद्रतट से कुड्ले समुद्रतट तक पैदल भ्रमण आयोजित की जाती है। हम इसके द्वारा उमा महेश्वर मंदिर तक गए थे।

समुद्र-पर्यटन – प्रतिदिन तीन नौकाटन आयोजित किये जाते हैं जिसके द्वारा आप जल में भ्रमण का आनंद उठा सकते हैं। पणजी की निवासी होने के कारण समुद्र पर्यटन मेरे लिए नवीन अनुभव नहीं है। इसलिए हम उस ओर नहीं गए। समुद्रतट पर अनेक अन्य पर्यटन क्रियाकलाप हैं जिनका आप आनंद उठा सकते हैं, जैसे कयाकिंग, जेट स्काई, बनाना बोट में सैर इत्यादि। खाने-पीने के लिए अनेक शैक्स हैं। कुल मिलाकर गोकर्ण के सभी समुद्रतट पर्यटकों के आनंद का केंद्र बिंदु हैं।

गोकर्ण की गलियों की चित्रकारी
गोकर्ण की गलियों की चित्रकारी

गोकर्ण की सडकों पर बोहिमियाई अथवा रूढ़िमुक्त जीवनशैली भी यदाकदा दृष्टिगोचर हो जाती है, जैसे कहीं कहीं सड़कों के किनारे स्थित भित्तियों पर सुन्दर चित्रकारियाँ की गयी हैं। कुछ गोकर्ण की कथा कहती हैं तो कुछ इतने विचित्र होते हैं कि अनायास आपके मुख पर हास्य उमड़ पड़ता है।

गोकर्ण के आसपास दर्शनीय स्थल

गोकर्ण में ठहर कर आप अनेक स्थानों पर एक दिवसीय भ्रमण कर सकते हैं। आप विभूति झरना, याना चट्टानें तथा मिर्जन दुर्ग जा सकते हैं। विभूति झरना वर्षा ऋतु की एक अप्रतिम देन है, वहीं याना चट्टानें अद्भुत प्राकृतिक विशाल चट्टानी संरचनाएं हैं। पहाड़ी के ऊपर स्थित मिर्जन दुर्ग एक दर्शनीय दुर्ग है।

गोकर्ण माहात्म्य का विडियो

इंडीटेल के यूट्यूब चैनल पर गोकर्ण माहात्म्य का यह विडियो देखिये, डॉक्टर शकुंतला गावडे से एक चर्चा। गोकर्ण पुराण अथवा गोकर्णखंड ११८ अध्यायों के द्वारा गोकर्ण की कथा कहता है। यह स्कन्द पुराण सनत्कुमारसंहिता गोकर्णखंड का भाग है। यह अनेक आख्यानों एवं उपाख्यानों का सारांश है। एक प्रकार से यह गोकर्ण का महिमागान करता एक स्थल पुराण है।

गोकर्ण दर्शन एवं गोकर्ण के विभिन्न आकर्षणों की खोज के लिए कुछ सुझाव

  • गोकर्ण में हर स्तर के अनेक विश्रामगृह हैं।
  • गोकर्ण की संकरी गलियों में भ्रमण करने के लिए ऑटोरिक्शा सर्वोत्तम परिवहन साधन है।
  • गोकर्ण नगरी के मुख्य क्षेत्र एवं उसके मंदिरों के दर्शन के लिए पैदल ही भ्रमण किया जा सकता है। वाहन की अपेक्षा यहाँ पैदल भ्रमण अधिक सुगम्य है।
  • सादा दक्षिण भारतीय भोजन सभी स्थानों पर उपलब्ध है।
  • समुद्रतटीय क्षेत्र तथा आसपास नदी के मुहाने होने के कारण यहाँ का वातावरण आर्द्र तथा उष्ण है।
  • लंबी दूरी तक पैदल भ्रमण का विचार हो तो पर्याप्त पेयजल साथ रखें।
  • समुद्रतट पर छोटे-बड़े चट्टानों के होने के कारण वहां सावधानी से भ्रमण करें।
  • सूर्य की किरणों से बचने के लिए आवश्यक साधन अपनाएँ।
  • अधिकतर भ्रमण प्रातःकाल अथवा संध्या के समय में करें। दोपहर के समय बाहर भ्रमण से बचें।
  • प्रातःकाल शीघ्र बाहर निकालें तो आप अनेक पक्षियों के दर्शन कर सकते हैं। सड़क से लगे वनों के भीतर अथवा पहाड़ियों के ऊपर स्थित वृक्षों पर हमने मोर-मोरनी(Peafowl), मलाबारी धनेश(Malabar Pied-Hornbill), पिलक(Golden Oriole), कोयल(Asian Koels), चील(Kites) इत्यादि देखे।
  • हम ॐ समुद्रतट पर स्वस्वरा (Swaswara) में ठहरे थे जो एक वेलनेस रिसोर्ट है। यह नगर से किंचित दूर है किन्तु सर्वाधिक लोकप्रिय समुद्रतट के समीप है।
  • गोकर्ण पर अधिक जानकारी के लिए, website, यहाँ संपर्क करें।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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वडक्कन्नाथन मंदिर केरल के त्रिचूरपूरम का उत्कृष्ट शिव मंदिर https://inditales.com/hindi/keral-thrisssur-vadakkumnatha-mandir/ https://inditales.com/hindi/keral-thrisssur-vadakkumnatha-mandir/#respond Wed, 21 Jul 2021 02:30:58 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2354

वडक्कन्नाथन मंदिर केरल के सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं प्राचीनतम मंदिरों में से एक है। यह मंदिर केरल के त्रिचूर में स्थित है जो इस राज्य का एक महत्वपूर्ण धार्मिक नगर है। ऐसी मान्यता है कि यह मंदिर परशुराम द्वारा, प्राचीन केरल में स्थापित १०८ शिव मंदिरों में से एक है। यह मंदिर १००० वर्षों से भी […]

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वडक्कन्नाथन मंदिर केरल के सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं प्राचीनतम मंदिरों में से एक है। यह मंदिर केरल के त्रिचूर में स्थित है जो इस राज्य का एक महत्वपूर्ण धार्मिक नगर है। ऐसी मान्यता है कि यह मंदिर परशुराम द्वारा, प्राचीन केरल में स्थापित १०८ शिव मंदिरों में से एक है। यह मंदिर १००० वर्षों से भी अधिक प्राचीन माना जाता है।

वडक्कन्नाथन मंदिर का उद्भव

श्री वडक्कन्नाथन मंदिर - त्रिचूर केरल
श्री वडक्कन्नाथन मंदिर – त्रिचूर केरल

किवदंतियों एवं लोक कथाओं के अनुसार, इस मंदिर की स्थापना परशुराम ने की थी। ऋषि जमदग्नि एवं रेणुका के पुत्र परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। ऋषि जमदग्नि एवं रेणुका के पास सुरभि नाम की एक गाय थी जो सबकी कामना पूर्ण करती थी। एक समय एक राजा ने ऋषि जमदग्नि से उस गाय की मांग की जिसे ऋषि जमदग्नि ने अस्वीकृत कर दिया। तदनंतर, जब ऋषि जमदग्नि स्नानादि के लिए आश्रम से बाहर गए तब राजा सुरभि गाय को चुरा कर ले गया। इस घटना की जानकारी प्राप्त होते ही क्रोधित परशुराम सुरभि की खोज में निकल पड़े। राजा से युद्ध कर करते हुए, अंततः उसका वध किया तथा सुरभि को आश्रम में वापिस लेकर आये।

जब परशुराम ने अपने पिता ऋषि जमदग्नि को सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनाया तब उनके पिता ने उन्हे अपने इस पाप का प्रायश्चित करने की सलाह दी तथा उन्हे तीर्थयात्रा पर जाने के लिए कहा। तीर्थयात्रा से वापिस लौटने पर परशुराम ने पाया कि प्रतिशोध की भावना से क्षत्रिय राजाओं ने उनके पिता का वध कर दिया था तथा आश्रम को भी तहस-नहस कर दिया था। प्रतिशोध की अग्नि में तपते परशुराम ने अपना परशु उठाया तथा अनेक क्षत्रिय राजाओं का वध कर दिया। ऐसा कहा जाता है कि २१ बार उन्होंने इस धरती पर से क्षत्रियों को समाप्त कर दिया था। उन्होंने अपने पाप का प्रायश्चित करने के लिए एक यज्ञ किया तत्पश्चात अपने परशु को समुद्र में फेंक दिया। ऐसी मान्यता है कि इसी के फलस्वरूप भारत के पश्चिमी तटवर्ती मैदानों की उत्पत्ति हुई जिसे हम कोंकण के नाम से जानते हैं।

स्थानीय किवदंती

श्री वडक्कन्नाथन मंदिर का एक द्वार
श्री वडक्कन्नाथन मंदिर का एक द्वार

केरल राज्य की एक स्थानीय किवदंती के अनुसार, यज्ञ के पश्चात अनेक ऋषि मुनियों ने परशुराम से दक्षिणा में एकांत भूमि की याचना की। तब उन्होंने एक सुरपा अर्थात् सुपा गोकर्ण से दक्षिण की ओर फेंका। इसके फलस्वरूप समुद्र के भीतर से एक विशाल भूखंड प्रकट हुआ। इसे सुर्पारक कहा गया। केरल इसी भूखण्ड का वर्तमान नाम है। तत्पश्चात परशुराम कैलाश गए व शिव एवं पार्वती से अनुरोध किया कि वे इस नवीन भूखंड में वास कर उसे अनुग्रहित करें ।

मान्यता है कि भगवान शिव ने इस अनुरोध को सहर्ष स्वीकारा एवं पार्वती, गणेश व कार्तिकेय समेत परशुराम के साथ उस भूखंड पर पधारे। उन्होंने स्वयं के वास के लिए जिस स्थान का चयन किया वही वर्तमान त्रिशूर है। कुछ काल यहाँ व्यतीत कर भगवान शिव सपरिवार अंतर्धान हो गए। परशुराम ने उस स्थान पर, एक विशाल वट वृक्ष के नीचे एक शिवलिंग देखा जिसके भीतर से उज्ज्वल प्रकाश प्रकट हो रहा था। यह स्थान श्री मूलस्थानम के नाम से जाना जाता है अर्थात् वह स्थान जहाँ भगवान शिव ने स्वयं को विग्रह के रूप में प्रकट किया। यह लिंग वडक्कन्नाथन मंदिर के पश्चिमी गोपुरम के बाह्य भाग में स्थित है।

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वडक्कन्नाथन मंदिर की वास्तुकला

मूल्स्थानम - जहाँ शिवलिंग की प्रथम स्थापन हुई थी
मूल्स्थानम – जहाँ शिवलिंग की प्रथम स्थापन हुई थी

शिवलिंग को अनेक वर्षों तक मूलस्थानम में रखा गया था। कालांतर में कोचीन राज्य के शासकों ने एक मंदिर का निर्माण किया तथा शिवलिंग को उस मंदिर में स्थानांतरित किया। यह मंदिर एक छोटी पहाड़ी पर, एक गोलाकार मैदान के मध्य स्थित है जहां से त्रिचूर नगर दृष्टिगोचर होता है। स्थानीय भाषा में इस मैदान को टेक्किनाडु कहा जाता है जिसका अर्थ है सागौन का वन। ९ एकड़ के क्षेत्र में निर्मित यह मंदिर शिलाओं की विशाल भित्तियों से घिरा हुआ है। मंदिर में ४ भव्य गोपुरम हैं जो चार प्रमुख दिशाओं, पूर्व, पश्चिम, उत्तर व दक्षिण दिशाओं में स्थित हैं। दर्शनार्थियों के लिए मुख्य द्वार पूर्वी एवं पश्चिमी गोपुरम के भीतर से है जबकि उत्तरी व दक्षिणी गोपुरम सामान्यतः बंद रहते हैं। दक्षिणी गोपुरम को केवल ‘त्रिचूर पूरम’ के समय ही खोला जाता है जो अप्रैल मास में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण उत्सव है।

गोपुरम

इस मंदिर के गोपुरम बहु-तलीय संरचनाएँ हैं जिन्हे ग्रेनाइट एवं खपरैलों का प्रयोग कर बनाया गया है। इस मंदिर की वास्तुशैली केरल में प्रचलित अन्य मंदिरों की ठेठ वास्तुशैली से साम्य रखती है जिसमें लकड़ी एवं खपरैलों का प्रयोग कर पगोडा का आकार दिया गया है। अनेक मंदिरों से भरे परिसर के दो भाग हैं, भीतरी परिसर एवं बाह्य परिसर। भीतरी परिसर एक छोटी भित्ति से संरक्षित है जिसके मध्य में मुख्य वडक्कन्नाथन मंदिर स्थित है। साथ ही पार्वती, शंकराचार्य, श्री राम एवं गणेश को समर्पित छोटे मंदिर भी हैं। बाह्य परिसर से भीतरी परिसर में जाने के लिए एक गलियारा है जिसे चुट्टम्बलम कहते हैं। गलियारे में, उत्तरी भित्ति पर वासुकि-शयन का भित्ति चित्र है जिसमें भगवान शिव को नागराज वासुकि के ऊपर शयन करते दर्शाया गया है। यह नंदी एवं नृत्यनाथ के चित्रों के पश्चात है। नृत्यनाथ सोलह हस्तों के शिव की नृत्य में मग्न मुद्रा है। भगवान की प्रतिमा के साथ इन दो छवियों की भी पूजा अर्चना की जाती है।

शिवलिंग

श्री वडक्कन्नाथन का मंदिर गोलाकार है जिसमें अनेक स्तंभ एवं एक छत है। श्री वडक्कन्नाथन के लिंग पर वर्षों की नियमित आराधना के फलस्वरूप घी की इतनी परतें चढ़ी हुई हैं कि मूल लिंग दिखाई नहीं देता है। ऐसा कहा जाता है कि यह घी कभी पिघलता नहीं है। ना ग्रीष्म ऋतु, ना ही गर्भगृह में प्रज्ज्वलित दीपकों की ऊष्मा घी को पिघलाती है। आश्चर्य है कि अनेक वर्षों से अर्पित किए जा रहे घी की कोई दुर्गंध भी नहीं होती है। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार यह घृत भगवान शिव के वास, कैलाश पर्वत का प्रतिनिधित्व करता है।

शिवलिंग स्वर्ण के तेरह अर्धचंद्रों से अलंकृत है। उसके ऊपर नागदेव के तीन फन हैं। देवी पार्वती की प्रतिमा भी इसी मंदिर के भीतर, मंदिर के पृष्ठभाग में स्थित है। शिव एवं पार्वती एक दूसरे के समक्ष नहीं हैं।  पार्वती की प्रतिमा लकड़ी की होने के कारण उनका अभिषेक केवल हल्दी द्वारा ही किया जाता है। उनके विग्रह में तीन नेत्र हैं। पार्वती जी की इस प्रतिमा को रेशमी वस्त्रों व आभूषणों से अलंकृत किया हुआ है।

श्री राम का मंदिर

मंदिर परिसर के भीतर दो तलों पर पश्चिमाभिमुख मंदिर है जो भगवान श्री राम को समर्पित है। मंदिर की भित्तियाँ अप्रतिम भित्तिचित्रों द्वारा अलंकृत हैं। मुख्य मंदिर एवं राम मंदिर के मध्य एक गोलाकार मंदिर है जो श्री शंकरनारायण को समर्पित है। इस मंदिर का मुख भी उसी दिशा में है जिस दिशा में उपरोक्त दो मंदिर हैं। शंकरनारायण का विग्रह भगवान शिव एवं भगवान विष्णु का संयुक्त रूप है। उन्हे हरिहर भी कहा जाता है। विग्रह चतुर्भुज है, दाहिने दो हाथों में त्रिशूल व परशु है तथा बाएं दो हाथों में शंख व गदा है। मंदिर की भित्तियों पर महाभारत के विविध प्रसंगों को प्रदर्शित करते भित्तिचित्र हैं। इन तीनों मंदिरों की वास्तु वृत्ताकार है जिसका आधार गोलाकार एवं छत शंक्वाकार है। इन तीन मंदिरों के समक्ष लकड़ी के तीन मुखमंडप हैं।

महागणपति मंदिर

वडक्कन्नाथन एवं शंकरनारायण मंदिर के मध्य महागणपति को समर्पित एक पूर्व मुखी मंदिर है। यह मुख्य मंदिर के पाकगृह के समीप स्थित है जो शंकरनारायण मंदिर के पृष्ठभाग में है। गणपति का यह विग्रह चतुर्भुज है। मंदिर के उत्तर भाग में एक अन्य विग्रह है जो वेट्टक्योरिमगन देव को समर्पित है। वेट्टक्योरिमगन को भगवान शिव का आखेटक रूप माना जाता है जो इस मंदिर की रक्षा करते हैं। पीतल की एक बलि पीठिका है। भूमि पर चारों ओर दंडवत प्रणाम करते पुरुषों के शिल्प हैं।

भीतरी भित्ति एवं बाह्य भित्ति के मध्य स्थित परिसर में भी अनेक मंदिर हैं। बाह्य प्रकोष्ठ के भीतर पीपल के अनेक वृक्ष हैं। परिसर में एक प्रदक्षिणा पथ भी है। मंदिर के चारों ओर प्रदक्षिणा करते समय पूर्व निर्धारित नियमों का पालन करना आवश्यक है।

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बाह्य प्रकोष्ठ के मंदिर व संरचनाएं

बाह्य प्रकोष्ठ में स्थित विभिन्न मंदिर एवं संरचनाएं हैं:

कूतम्बलम अथवा नाट्यगृह

यह लकड़ी की एक विशाल संरचना है जहाँ कूथु, कोडियेट्टम एवं नंग्यारकूत जैसे केरल के प्राचीन नृत्य एवं कला शैलियों का वार्षिक प्रदर्शन किया जाता है।

गोपालकृष्ण अथवा गोसलकृष्ण

यह मंदिर भगवान कृष्ण के गोपाल अथवा ग्वाल रूप को समर्पित है। ऐसा कहा जाता है कि किसी समय यहाँ एक गोशाला भी थी।

शरा तीर्थम

उत्तरी भाग में एक गहरा कुआँ है। मान्यताओं के अनुसार, महाभारत युद्ध में जयद्रथ का वध करने के पश्चात अर्जुन प्रायश्चित करने यहाँ आए थे। बाण भेद कर उन्होंने इस कुएं की रचना की थी तथा इसमें गंगा नदी का जल भरा था।

वृषभ अथवा नंदिकेश्वर

यह मंदिर भगवान शिव के वाहन, नंदी को समर्पित है। यह मंदिर उत्तर-पश्चिमी भाग में स्थित है। इस मंदिर में नंदी शयनावस्था में स्थित हैं। इसीलिए मंदिर में सर्वप्रथम करतल ध्वनि कर उन्हे निद्रा से जगाया जाता है। यहाँ भक्तगणों द्वारा अपने वस्त्र का एक दोरा उन्हे अर्पित करने की प्रथा है।

परशुराम

उत्तर-पूर्वी छोर पर एक मंच है जो परशुराम को समर्पित है। ऐसी मान्यता है कि परशुराम इसी स्थान से अन्तर्धान हुए थे। उनकी आराधना में यहाँ एक दीपक सदा प्रज्ज्वलित रहता है।

सिंहोदर

सिंहोदर, भगवान शिव के एक गण थे जिन्हे परशुराम के अनुरोध के पश्चात, केरल में शिव के लिए उपयुक्त स्थल की खोज करने का उत्तरदायित्व सौंपा गया था। उपयुक्त स्थल के चयन के पश्चात सिंहोदर यहीं विश्राम करने लगे। भगवान शिव जब यहाँ आए तब उन्होंने अंतरंग परिसर के बाहर उसे स्थान प्रदान किया। ऐसा माना जाता है कि तब से सिंहोदर यहीं विराजमान है तथा मंदिर की रखवाली करते हैं। यहाँ एक प्रथा है जिसमें भक्तगण छोटे छोटे ठींकरों को एक छोटी गोलाकार शिला पर रखते हैं। इस शिला को बलिकल्लु कहा जाता है। यह मंदिर की रखवाली करने के उपलक्ष में सिंहोदर को बली अर्पित करने का प्रतीक है। आंतरिक भित्ति पर एक त्रिकोणीय छिद्र है जिसमें से भक्तगण वडक्कन्नाथन मंदिर को देख सकते हैं।

शास्ता मंदिर

दक्षिण-पूर्वी छोर पर एक छोटा सा मंदिर है जो शास्ता अर्थात् श्री अयप्पा को समर्पित है। मंदिर के पृष्ठभाग में एक स्थान है जो अत्यंत हरा-भरा है। ऐसी मान्यता है कि हनुमान द्वारा संजीवनी पर्वत को श्री लंका लेकर जाते समय, पर्वत से कुछ मिट्टी यहाँ गिर गई थी।

व्यास शिला

पीपल के एक वृक्ष के नीचे, चबूतरे पर व्यास ऋषि का एक लघु मंदिर है। व्यास ऋषि को महाभारत का रचयिता माना जाता है। भक्तगण इस चबूतरे पर अपनी उंगली से ‘ओम श्री महागणपतये नमः’ यह अदृश्य मंत्र लिखते हैं।

आदि शंकराचार्य

आदि शंकराचार्य को समर्पित एक मंदिर है। आदि शंकराचार्य ने यहाँ कुछ दिवस व्यतीत किए थे। इस मंदिर से संबंधित उनके जन्म की कुछ दंतकथाएं भी प्रचलित हैं।

सम्बोदरा

दक्षिण-पूर्वी छोर पर एक चबूतरा है जहाँ खड़े होकर, पूर्व की ओर मुख कर, आप श्री चिदंबरम को प्रणाम कर सकते हैं तथा दक्षिण की ओर मुख कर श्री रामेश्वरम को प्रणाम कर सकते हैं। ऐसा माना जाता है कि चिदंबरम मंदिर के शिव के आनंद तांडव नृत्य का प्रतिबिंब रामेश्वरम में भी पड़ता है। ऐसी भी मान्यता है कि भगवान शिव के आनंद तांडव नृत्य का दर्शन सहस्त्र फनों वाले सर्प अनंतशेष ने यहीं से किया था।

अम्मदरा

इस चबूतरे पर ‘ऊरगत्तम्मा’ की आराधना की जाती है। ऊरगत्तम्मा जिन्हे कामाक्षी का एक स्वरूप माना जाता है, मंदिर से लगभग १० किलोमीटर स्थित ऊरकम में वास करती हैं। श्री राम के भ्राता, भरत, जिन्हे यहाँ श्री कूदलमाणिक्यस्वामी कहा जाता है, उनकी प्रतिमा मंदिर से २० किलोमीटर दक्षिण की ओर स्थित इरिंजलकुडा में स्थापित है। ऐसी मान्यता है कि ऊरकथम्मा एवं श्री कूदलमाणिक्यस्वामी, दोनों इस चबूतरे पर आकर मंदिर के सभी देवी-देवताओं के दर्शन करते हैं।

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श्री वडक्कन्नाथन मंदिर का संध्या दृश्य
श्री वडक्कन्नाथन मंदिर का संध्या दृश्य

मंदिर में अर्चना के नियम

आदि शंकराचार्य ने इस मंदिर में परिक्रमा अथवा प्रदक्षिणा करने के लिए कुछ नियम बांधे थे। भक्तगण पूर्ण श्रद्धा से इन नियमों का पालन करते हैं। बाह्य एवं अंतरंग प्रकोष्ठों में पूजा एवं प्रदक्षिणा के लिए दो प्रकार के नियम हैं।

बाह्य प्रकोष्ठ के प्रदक्षिणा एवं पूजन क्रम

क्रमवार प्रदक्षिणा एवं पूजन के नियम अंग्रेजी एवं मलयालम भाषा में कूतम्बलम के निकट लिखे हुए हैं। उनका क्रम इस प्रकार है:

  • श्री मूलस्थानम: पश्चिमी गोपुरम के बाह्य भाग में स्थित है।
  • गोपालकृष्णन
  • नंदिकेश्वर/वृषभ
  • परशुराम
  • सिंहोदर
  • काशीविश्वनाथ: सम्बोदरा मंदिर से उत्तर की ओर मुख कर वंदना करें।
  • संबुकुम्बलम: भीतरी भित्ति पर स्थित त्रिकोणीय छिद्र से श्री वडक्कन्नाथन मंदिर का कलश दर्शन
  • सम्बोदरा: चिदंबरम एवं रामेश्वरम का वंदन
  • दक्षिणी गोपुरम: दक्षिण की ओर मुख कर कोडुंगल्लूर देवी की वंदना
  • अम्मदरा: ऊरगत्तम्मा देवी एवं श्री कूदलमाणिक्यस्वामी के दर्शन व वंदन
  • शंकरनारायण, श्री राम मंदिर एवं श्री वडक्कन्नाथन मंदिर के कलश दर्शन
  • वेट्टक्योरिमगन: आखेटक शिव
  • व्यासशिला एवं उंगली से ‘ओम श्री महागणपतये नमः’ लिखना
  • अयप्पा अथवा शास्ता
  • मंदिर का पृष्ठभाग जहाँ संजीवनी पर्वत की मिट्टी गिरी थी
  • आदि शंकराचार्य की समाधि

बाह्य प्रकोष्ठ की प्रदक्षिणा के उपरांत भीतरी परिसर में जाने के लिए चुट्टमबलम में प्रवेश किया जाता है। तत्पश्चात चुट्टमबलम के भीतर इनके दर्शन किए जाते हैं:

  • वृषभ
  • वासुकि-शयन भित्तिचित्र। इसे फणीवरशयन भी कहा जाता है। यह एक दुर्लभ भित्तिचित्र है जिसमें भगवान विष्णु के अनंतशयन के समान भगवान शिव को वासुकि-शयन रूप में चित्रित किया गया है।
  • नृत्यनाथ भित्तिचित्र

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अंतरंग प्रकोष्ठ के प्रदक्षिणा एवं पूजन क्रम

भीतरी परिसर में प्रदक्षिणा एवं दर्शन का क्रम इस प्रकार है। कुछ स्थानों पर दर्शन की पुनरावृत्ति इस क्रम का ही भाग है।

  • श्री वडक्कन्नाथन
  • पार्वती
  • श्री गणेश
  • श्री शंकरनारायण
  • श्री राम
  • श्री शंकरनारायण
  • श्री गणेश
  • पार्वती
  • श्री वडक्कन्नाथन
  • श्री गणेश
  • श्री शंकरनारायण
  • श्री राम
  • श्री शंकरनारायण
  • श्री राम
  • श्री शंकरनारायण
  • श्री गणेश
  • पार्वती
  • श्री वडक्कन्नाथन

श्री वडक्कन्नाथन मंदिर

इस मंदिर से संबंधित अनेक किवदंतियाँ प्रचलित हैं। उन किवदंतियों में से एक आदि शंकर के जन्म से संबद्ध है। कलदी के शिवगुरु भट्ट एवं आर्यम्बा को दीर्घ काल तक संतान प्राप्ति नहीं हुई थी। वे त्रिचूर के श्री वडक्कन्नाथन मंदिर गए तथा अपने दिवस पूजा व ध्यान में व्यतीत करने लगे। एक दिवस स्वप्न में भगवान शिव ने उन्हे दर्शन दिए तथा वर प्रदान किया। किन्तु भगवान शिव ने उनके समक्ष एक बंधन भी रखा। उन्हे विद्वान व बुद्धिमान किन्तु अल्पायु पुत्र अथवा दीर्घायु किन्तु सामान्य बुद्धि के पुत्र में से एक का चयन करने का बंधन रखा। उस दम्पत्ति ने विद्वान व बुद्धिमान किन्तु अल्पायु पुत्र का चयन किया। एक वर्ष के भीतर ही उन्हे एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। भगवान शिव के वरदान स्वरूप पुत्र का नामकरण उन्होंने शंकर किया।

मंदिर के बाह्य परिसर में आदि शंकर की समाधि निर्मित की गई है।

नृत्यनाथ का भित्तिचित्र

मंदिर परिसर के भीतर, चुट्टमबलम के निकट स्थित नृत्यनाथ अथवा नटराज के भित्तिचित्र से संबंधित भी एक दंत कथा प्रचलित है। श्री वडक्कन्नाथन का एक भक्त ख्यातिप्राप्त भित्ति-चित्रकार था। उसने तीन मास तक अथक परिश्रम कर नटराज का एक अप्रतिम भित्तिचित्र चित्रित किया था। किन्तु दूसरे ही दिवस एक नंबूदिरी भक्त ने अपने पूजन कमंडल के जल से उस भित्तिचित्र को धो दिया। इस प्रकार नंबूदिरी भक्त ने चित्रकार के तीन प्रयासों को नष्ट किया। तब चित्रकार ने मंदिर के अधिकारियों से शिकायत करने का निश्चय किया।

इसकी सूचना प्राप्त होती ही उस नंबूदिरी भक्त ने चित्रकार को सांत्वना दी तथा कहा कि एक दिवस वह उससे अधिक उत्कृष्ट भित्तिचित्र चित्रित करेगा जिसे देखकर सब दंग रह जाएंगे। उस नंबूदिरी भक्त ने भित्तिचित्र का चित्रण आरंभ किया जिसे देखने भक्तगण एकत्र हो गए। जब नटराज का चित्र पूर्ण हुआ, उस में नटराज जीवंत हो उठे। सबने उन्हे नेत्रों को हिलाते हुए नृत्य करते देखा। एक मिनट के पश्चात उस चित्र में नटराज पुनः जड़ हो गए। उस समय से इस भित्तिचित्र की भी वंदना की जाती है।

भक्तों को आशीर्वाद

श्री वडक्कन्नाथन के विषय में कहा जाता है कि ‘जैसी इच्छा वैसा आशीर्वाद’। इस संबंध में भी अनेक किवदंतियाँ प्रसिद्ध हैं। उनमें से एक किवदंती एक वृद्ध व अशक्त ब्राह्मण के विषय में है जिसे काशी भ्रमण की तीव्र अभिलाषा थी। उसने काशी भ्रमण पर निकले एक नंबूदिरी से अपनी अभिलाषा व्यक्त की। उस समय काशी की यात्रा पैदल चल कर पूर्ण की जाती थी जो अत्यंत कष्टकर होती थी। ब्राह्मण की दैहिक स्थिति देख नंबूदिरी ने उसके निवेदन को अस्वीकृत कर दिया। तब उस वृद्ध ब्राह्मण ने श्री वडक्कन्नाथन की आराधना की तथा उनसे काशी दर्शन की अभिलाषा व्यक्त की। ऐसा माना जाता है कि भगवान ने स्वयं सिंहोदर को आज्ञा दी कि वह ब्राह्मण को काशी लेकर जाए।

सिंहोदर ब्राह्मण को एक सुरंग से काशी लेकर गया। अगले दिन जब ब्राह्मण घाट पर स्नान कर रहा था तब नंबूदिरी की दृष्टि उस पर पड़ी। उसने ब्राह्मण से पूछा कि वह इतने शीघ्र काशी कैसे पहुँच। तब ब्राह्मण ने सम्पूर्ण वृत्तान्त उसे सुनाया कि कैसे श्री वडक्कन्नाथन के आशीर्वाद से वह यहाँ पहुँच पाया है। अब उस सुरंग के मुहाने पर एक शिला रखी गई है जो माना जाता है कि देवी पार्वती की आज्ञा पर सिंहोदर ने रखी थी। इसी परिपाटी के अंतर्गत भक्तगण उस शिला के ऊपर पत्थर रखते हैं।

श्री वडक्कन्नाथन से संबंधित ऐसी अनेक दंतकथाएं प्रचलित हैं।

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श्री वडक्कन्नाथन मंदिर के उत्सव

श्री वडक्कन्नाथन मंदिर में मनाए जाने वाले प्रमुख उत्सव इस प्रकार हैं:

शिवरात्रि

शिवरात्रि श्री वडक्कन्नाथन मंदिर का प्रमुख उत्सव है जिसे फरवरी-मार्च मास में आयोजित किया जाता है। इस उपलक्ष्य में मंदिर परिसर में अनेक सांस्कृतिक एवं संगीतमय कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इस दिन मंदिर के सम्पूर्ण परिसर को प्रकाशमान किया जाता है। मंदिर के द्वार सम्पूर्ण रात्रि खुले रहते हैं। श्रीफल के जल एवं घी से भगवान का अनवरत अभिषेक किया जाता है। किन्तु इस दिन कोई शोभायात्रा आयोजित नहीं की जाती है।

आनाऊट्ट

अन्नऊटू - हाथियों को भोजन कराने के प्रथा
अन्नऊटू – हाथियों को भोजन कराने के प्रथा

यह इस मंदिर के बड़े उत्सवों में से एक है जिसमें हाथियों को भोजन अर्पण किया जाता है। यह उत्सव जुलाई मास में आता है। मलयालम पंचांग के अनुसार यह उत्सव करकिडगम मास के प्रथम दिवस मनाया जाता है। इस दिन महागणपति होम का आयोजन किया जाता है। बड़ी संख्या में भक्तगण मंदिर में गज पूजा के लिए आते हैं तथा यहाँ एकत्रित अनेक हाथियों को भोजन अर्पित करते हैं।

त्रिचूर पूरम

श्री वडक्कन्नाथन मंदिर में त्रिचूर पूरम उत्सव
श्री वडक्कन्नाथन मंदिर में त्रिचूर पूरम उत्सव

आसपास के सभी मंदिरों के विभिन्न विग्रहों को श्री वडक्कन्नाथन मंदिर के प्रांगण में लाकर विशाल सम्मेलन का आयोजन किया जाता है। यह आयोजन प्रतिवर्ष मलयालम पंचांग के मेढम मास में किया जाता है जो अंग्रेजी पंचांग के अप्रैल में आता है। यह केरल राज्य में आयोजित सभी पूरम उत्सवों में से सर्वाधिक भव्य उत्सव है। पूरम उस मलयालम मास का नक्षत्र है जिसमें यह उत्सव मनाया जाता है। इस दिन मध्य केरल के मंदिरों में, संबंधित भगवान की विशेष वंदना का, वार्षिक उत्सव आयोजित किया जाता है। हाथियों को सजा-सवाँरकर, अधिष्ठात्र देवों की उत्सव मूर्तियों को उन पर बिठाकर भव्य शोभायात्रा यात्रा निकाली जाती है। वाद्य यंत्रों का बेजोड़ सामूहिक प्रभाव इस शोभायात्रा को अत्यंत अद्भुत एवं अद्वितीय बना देते हैं। यह उत्सव नवंबर मास से आरंभ होकर मई मास तक चलता है। इस समयावधि में अनेक उत्सव आयोजित होते हैं किन्तु सर्वाधिक महत्वपूर्ण उत्सव त्रिचूर पूरम है।

शक्तन थमपुरण

पूरम २०० वर्ष प्राचीन उत्सव है जिसका आरंभ राजा राम वर्मा ने किया था। राजा राम वर्मा कोचीन के राजा थे तथा शक्तन थमपुरण के नाम से लोकप्रिय थे। उन्होंने श्री वडक्कन्नाथन मंदिर के चारों ओर स्थित सभी दस मंदिरों को एकीकृत किया था तथा इस उत्सव को एक सामूहिक उत्सव बनाने के लिए अनेक कदम उठाए थे। पूरम उत्सव की सम्पूर्ण प्रक्रिया को उन्होंने सूक्ष्मता से नियोजित किया। अब भी बिना किसी परिवर्तन के सम्पूर्ण प्रक्रिया उसी प्रकार पूर्ण की जाती है।

राजा राम वर्मा ने मंदिरों को दो समूहों में बांटा था, पूर्वी समूह तथा पश्चिमी समूह। सभी मंदिरों की शोभायात्रा श्री वडक्कन्नाथन मंदिर तक जाती है तथा वंदना अर्पण करती है। यह सात दिवसों का उत्सव है जिसका आरंभ प्रत्येक मंदिर में ध्वज फहराकर किया जाता है। साथ ही आतिशबाजी का प्रदर्शन कर उत्सव आरंभ होने की घोषणा की जाती है। उत्सव के चौथे एवं पाँचवें दिवस, मंदिरों के दोनों समूह अपने आभूषणों तथा गज अलंकरणों का प्रदर्शन करते हैं। तत्पश्चात पूरम अथवा महासम्मेलन का आयोजन होता है।

नैतिकावु भगवती देवी

पूरम उत्सव से एक दिवस पूर्व, मंदिरों के पश्चिमी समूह से नैथिकव्वु भगवती देवी श्री वडक्कन्नाथन मंदिर पहुँचती हैं तथा भगवान शिव को श्रद्धा सुमन अर्पित करती हैं। तत्पश्चात, दक्षिणी गोपुरम का द्वार खोलती हैं तथा मूलस्थानम जाती हैं। वहाँ कोचीन देवास्वोम मण्डल के प्रतिनिधि उनका स्वागत करते हैं। इसके पश्चात तीन शंखनाद कर पूरम की घोषणा की जाती है।

३६ घंटों के विस्तृत पूरम उत्सव में कार्यक्रम सारणी का कठोरता से पालन किया जाता है। अपने अपने अलंकृत हाथियों पर सवार, सभी देवी-देवता पूर्व निर्धारित पथ द्वारा ही श्री वडक्कन्नाथन को श्रद्धा सुमन अर्पित करने पहुंचते हैं। इस पथ का भी कठोरता से पालन किया जाता है। दिवस का आरंभ, सारणी के अनुसार, प्रत्येक देवी-देवता के पारंपरिक भव्य प्रवेश से होता है। अंततः, आतिशबाजी के प्रदर्शन द्वारा उत्सव का समापन किया जाता है। यह अत्यंत चकाचौंध भरा दृश्य होता है। दूर-सुदूर से भक्तगण एवं पर्यटक इस उत्सव में भाग लेने यहाँ आते हैं। इस आयोजन के भव्य समापन का अनुभव करने वे सम्पूर्ण रात्रि जागरण भी करते हैं।

सन् १९६४ से एक अन्य आकर्षण भी लोगों को यहाँ आकर्षित कर रहा है। वह है, दक्षिण भारत के सर्वाधिक विशाल व्यापार मेलों में से एक व्यापार मेले का आयोजन। यहाँ केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार, दोनों अपने खेमे लगाकर अपने विभिन्न उत्पादों की प्रदर्शनी लगाते हैं।

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यात्रा सुझाव

  • इस मंदिर में भक्तों को परिधान के विशेष नियमों का पालन करना पड़ता है। पुरुषों को केवल धोती धारण करना पड़ता है। इसके अतिरिक्त देह पर कोई वस्त्र नहीं होता है। स्त्रियाँ साड़ी, केरल का लंबा लहंगा अथवा सलवार-कुर्ता पहन सकती हैं।
  • वडक्कन्नाथन मंदिर में दर्शन का समय प्रातः ४ बजे से १० बजे तक तथा सायं ४:३० बजे से रात्रि ८:३० बजे तक का होता है।
  • वडक्कन्नाथन मंदिर परिसर के भीतर किसी भी प्रकार का छायाचित्रिकरण प्रतिबंधित है।
  • इस मंदिर के दर्शन का सर्वोत्तम समय पूरम उत्सव है। अपने ठहरने की सुविधाएं पूर्व निर्धारित एवं नियोजित कर लें। अन्यथा उत्सव काल में यहाँ पर्यटकों की संख्या अत्यधिक रहती है।
  • मंदिर के आसपास अनेक विश्रामगृह तथा अतिथिगृह हैं। अतः ठहरने की कोई समस्या नहीं है।
  • राज्य के अनेक भागों से तथा कुछ अंतरराज्यीय स्थलों से केरल राज्य सड़क परिवहन निगम की बसों की सुविधाएं नियमित रूप से उपलब्ध हैं।
  • त्रिचूर रेल स्थानक सभी महत्वपूर्ण नगरों से जुड़ा हुआ है।
  • निकटतम विमानतल कोची एवं कालीकट हैं।
  • भ्रमण के लिए आसपास के अन्य महत्वपूर्ण स्थल हैं, कलदी, गुरुवायुर, इत्यादि।

यह संस्करण एक अतिथि संस्करण है जिसे श्रुति मिश्रा ने इंडिटेल इंटर्नशिप आयोजन के अंतर्गत प्रेषित किया है। यदि विशेष उल्लेख ना हो तो सभी छायाचित्र भी उन्ही की देन हैं।


श्रुति मिश्रा व्यावसायिक रूप से बैंक में कार्यरत हैं। उन्हे यात्राएं करना, विभिन्न स्थानों के सम्पन्न विरासतों के विषय में जानकारी एकत्र करना तथा विभिन्न स्थलों के विशेष व्यंजन चखना अत्यंत प्रिय हैं। उन्हे पुस्तकों से भी अत्यंत लगाव है। उन्हे पाककला में भी विशेष रुचि है। वर्तमान में वे बंगलुरु में निवास करती हैं। उनकी तीव्र इच्छा है कि वे विरासत के धनी भारत की विस्तृत यात्रा करें तथा अपने अनुभवों पर आधारित एक पुस्तक भी प्रकाशित करें।


अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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होयसलेश्वर मन्दिर – हैलेबिडु कर्नाटक स्थित अद्भुत होयसल धरोहर https://inditales.com/hindi/hoysalweshwar-mandir-halebidu-karnataka/ https://inditales.com/hindi/hoysalweshwar-mandir-halebidu-karnataka/#respond Wed, 14 Apr 2021 02:30:29 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2265

कर्नाटक के बंगलुरु से लगभग २०० किलोमीटर दूर स्थित एक महत्वपूर्ण मंदिर नगरी है, हैलेबिडु। कला एवं साहित्य के संरक्षक माने जाते होयसल राजवंश की यह राजधानी थी। ‘हैलेबिडु’ का कन्नड़ भाषा में शब्दशः अर्थ है, प्राचीन शिविर। समीप स्थित एक विशाल जल स्त्रोत के कारण इसे ‘द्वारसमुद्र’ भी कहते हैं। यह विध्वंसित नगरी होयसलेश्वर […]

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कर्नाटक के बंगलुरु से लगभग २०० किलोमीटर दूर स्थित एक महत्वपूर्ण मंदिर नगरी है, हैलेबिडु। कला एवं साहित्य के संरक्षक माने जाते होयसल राजवंश की यह राजधानी थी। ‘हैलेबिडु’ का कन्नड़ भाषा में शब्दशः अर्थ है, प्राचीन शिविर। समीप स्थित एक विशाल जल स्त्रोत के कारण इसे ‘द्वारसमुद्र’ भी कहते हैं। यह विध्वंसित नगरी होयसलेश्वर मन्दिर, जैन बसदी एवं अन्य कई ऐतिहासिक मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है जो इस नगरी के गौरवशाली अतीत के जीवंत उदाहरण हैं।

हलेबिडू स्थित होयसलेश्वर मंदिर
हलेबिडू स्थित होयसलेश्वर मन्दिर

होयसल वंश

होयसल वंश मूलतः पश्चिमी घाट में स्थित मालेनाडु नामक क्षेत्र से संबंधित थे। उन्हे युद्ध कौशल में विशेष रूप से निपुण माना जाता था। उन्होंने चालुक्य राजवंशियों एवं कलचुरि राजवंशियों के मध्य जारी आंतरिक युद्ध का लाभ उठाते हुए वर्तमान कर्नाटक के अंतर्गत आते क्षेत्रों को अधिगृहीत कर लिया था। १३वी. सदी तक उन्होंने कर्नाटक के अधिकतर क्षेत्रों, तमिल नाडु के कुछ क्षेत्रों तथा आंध्र प्रदेश व तेलंगाना के कई क्षेत्रों तक साम्राज्य स्थापित कर लिया था।

स्वर्णिम युग

होयसल काल को इस क्षेत्र का स्वर्णिम युग कहा जाता है। दक्षिण भारत में कला, वास्तुशिल्प, साहित्य, धर्म तथा विकास के क्षेत्र में होयसल राजवश का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रहा है। आरंभ में उन्होंने अपनी राजधानी बेलूर से शासन का कार्यभार संभाला था। कालांतर में वे हैलेबिडु स्थानांतरित हो गए। आज होयसल राजवंश को विशेष रूप से उत्कृष्ट होयसल वास्तुकला के लिए स्मरण किया जाता है।

वर्तमान में, इस क्षेत्र में होयसल वास्तुकला से सुशोभित लगभग ९२ मंदिर उपस्थित हैं जिनमें से लगभग ३५ मंदिर हासन जिले में हैं। उनमें से अधिक प्रसिद्ध मंदिर हैं, बेलूर में चेन्नाकेशव मंदिर, हैलेबिडु में होयसलेश्वर मन्दिर तथा सोमनाथपुरा का चेन्नाकेशव मंदिर। नग्गेहल्ली में लक्ष्मी नरसिंह मंदिर, बेलवाड़ी का वीर नारायण मंदिर, अरसिकेरे का ईश्वर मंदिर, कोरवंगला में बूचेश्वर मंदिर, जैन बसदियाँ, किक्केरी का ब्रहमेश्वर मंदिर इत्यादि भी होयसल वास्तुकला की अन्य विशिष्ट धरोहर हैं।

कन्नड़ लोक-साहित्य

कन्नड़ लोकसाहित्यों के अनुसार सल नामक एक नवयुवक था जिसने एक बाघ पर तलवार से वार कर अपने गुरु के प्राणों की रक्षा की थी। प्राचीन कन्नड़ भाषा में वार करने को होय कहा जाता था। यहीं से होयसल शब्द की व्युत्पत्ति हुई थी।

राजा वीर बल्लाल के शासनकाल में हैलेबिडु का गौरव अपनी चरमसीमा पर था। उसकी संपन्नता ने दिल्ली सल्तनत के राजाओं का ध्यान आकर्षित किया। सन् १३११ में मलिक काफुर ने दो बार हैलेबिडु पर आक्रमण किया। पुनः सन् १३२६ में मुहम्मद बिन तुगलक ने इस पर आक्रमण किया। आक्रान्ताओं के आक्रमणों से त्रस्त हैलेबिडु पर अंतिम प्रहार तब हुआ जब सन् १३४२ में मदुरै के सुल्तान से युद्ध के समय राजा बल्लाल तृतीय को वीरगति प्राप्त हुई। इसके पश्चात हैलेबिडु के गौरवशाली साम्राज्य का अंत हो गया। होयसल राजवंश को अपनी इस सुंदर राजधानी को त्यागने के लिए विवश किया गया। हैलेबिडु का गौरवशाली साम्राज्य अब इतिहास के पन्नों में एक स्मृति बन कर रह गया है।

हैलेबिडु का होयसलेश्वर मंदिर

हैलेबिडु नगर का सर्वाधिक महत्वपूर्ण मंदिर भगवान शिव को समर्पित होयसलेश्वर मंदिर है। इसका निर्माण राजा विष्णुवर्धन के एक अधिकारी केतुमल्ला सेट्टी ने किया था। केतुमल्ला सेट्टी ने यह मंदिर राजा विष्णुवर्धन एवं उनकी प्रिय रानी शांतला देवी के सम्मान में बनवाया था। यह मंदिर भगवान शिव के दो स्वरूपों को समर्पित है, होयसलेश्वर एवं शांतलेश्वर।

भव्य नंदी प्रतिमा - होयसलेश्वर मंदिर
भव्य नंदी प्रतिमा – होयसलेश्वर मंदिर

इस मंदिर का निर्माण सन् ११२१ में आरंभ हुआ था। ऐसा कहा जाता है कि इसका निर्माण कार्य एक सदी तक जारी था। कुछ इतिहासकारों का कथन है कि इस का निर्माण कार्य अब भी अपूर्ण है क्योंकि मदिर में शिखर नहीं है। मंदिर के कुछ भाग ऐसे हैं जो अब भी पूर्ण नहीं हैं। किन्तु कुछ लोगों की राय है कि शिखर को ध्वस्त किया गया है।

इस मंदिर की संरचना में स्थानीय शैलखटी का प्रयोग किया गया है जो क्लोराइट शिस्ट के नाम से जाना जाता है। यह तारे के आकार का मंदिर है जिसमें प्रवेश के लिए चार ड्योढ़ियाँ हैं। उत्तर एवं दक्षिण दिशा में एक एक तथा पूर्व दिशा में दो। वर्तमान में भक्तों के प्रवेश के लिए उत्तरी द्वार नियत किया गया है। अन्य किसी भी होयसल मंदिर के समान यह मंदिर भी एक ऊंचे मंच के ऊपर बनाया गया है जिसे जगती कहा जाता है। यह लगभग १५ फुट चौड़ा है तथा सम्पूर्ण मंदिर को उठाए हुए है। मंदिर की प्रदक्षिणा भी इस मंच के ऊपर ही की जाती है। जगती पर चढ़ने के लिए पत्थर की सीढ़ियाँ हैं। सम्पूर्ण जगती पर अनेक छोटे मंदिर हैं जो विभिन्न देवी-देवताओं को समर्पित हैं तथा मुख्यतः प्रत्येक प्रवेश द्वार पर स्थित पत्थर की सीढ़ियों के समीप स्थित हैं।

होयसलेश्वर मंदिर की उत्कीर्णित चित्र वल्लरी

मंदिर की सम्पूर्ण भित्ति भव्य उत्कीर्णित चित्र वल्लरी द्वारा अलंकृत है। मंदिर के निचले भाग से आरंभ होकर ऊपर तक, इस अनुक्रम में चित्र वल्लरी उत्कीर्णित हैं:

बाहरी भित्तियों पे शिल्प
बाहरी भित्तियों पे शिल्प
  • गज – गज अथवा हाथी शक्ति का प्रतीक है। इसी कारण उन्हे मंदिर के सर्वाधिक निचले भाग में उत्कीर्णित किया जाता है। मंदिर के चारों ओर सम्पूर्ण भित्तियों पर भिन्न भिन्न शैलियों में कुल १२४८ हाथी उत्कीर्णित हैं।
  • सिंह – सिंह साहस का प्रतीक है।
  • पुष्पों की बेल सौन्दर्य का प्रतिरूपण है।
  • घोड़े गति को दर्शाते हैं।
  • पुनः सुंदरता को दर्शाते पुष्प बेल हैं।
  • इस स्तर पर महाकाव्यों के दृश्य प्रदर्शित हैं।
  • पौराणिक काल्पनिक पशु मकर
  • हंस
  • संगीतज्ञ
  • पौराणिक पात्र
  • क्षेत्रपाल नामक पौराणिक पात्र
  • नैतिक कथाओं, सामाजिक जीवन एवं कामुक मुद्राओं से संबंधित दृश्य
  • देवी-देवताओं के विशाल शिल्प एवं महाकाव्यों से संबंधित कथाएं
होयसल शिल्प की प्रसिद्द छिद्र युक्त गवाक्ष
होयसल शिल्प की प्रसिद्द छिद्र युक्त गवाक्ष

भित्तियों के ऊपरी भागों पर अप्रतिम छिद्रित पटल हैं जो मंदिर के भीतरी भाग को प्रकाशमान करते हैं तथा वायु-संचार में भी सहायक होते हैं। मेरे गाइड के अनुसार, आरंभ में वहाँ छिद्रित पटल उपस्थित नहीं थे। मंदिर के भीतर खुला मंडप था। इन छिद्रित पटलों को कालांतर में राजा नरसिंह प्रथम के शासनकाल में जोड़ा गया था। हम जब मंदिर के चारों ओर अवलोकन करें तो हमें वास्तुशिल्प कला के कुछ भव्य एवं अद्भुत अचंभे दृष्टिगोचर होंगे।

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होयसलेश्वर मंदिर की ३५,००० मूर्तियाँ

ऐसा कहा जाता है कि यहाँ लगभग ३५००० उत्कृष्टता से उत्कीर्णित शिल्प हैं। बेलूर अथवा सोमनाथपुर के होयसल मंदिरों में स्थित शिल्पों की तुलना में, होयसलेश्वर मंदिर के शिल्प अपेक्षाकृत विशाल हैं तथा उनकी संख्या व गुणवत्ता भी अपेक्षाकृत श्रेष्ट है। इन शिल्पों में प्रमुख हैं:

गोवर्धनधारी श्री कृष्ण
गोवर्धनधारी श्री कृष्ण
  • गोवर्धन पर्वत उठाए कृष्ण
  • महाभारत में अर्जुन व कर्ण के मध्य युद्ध का दृश्य
  • गजेन्द्र मोक्ष
  • कैलाश पर्वत उठाता हुआ रावण
  • समुद्र मंथन
  • लंका युद्ध के समय सेतु निर्माण में सहायता करती वानर सेना
  • कृष्ण जन्म, पूतना वध जैसी घटनाओं से संबंधित भागवत की कथाएं
  • महिषासुरमर्दिनी
कैलाश पर्वत उठाये रावण
कैलाश पर्वत उठाये रावण

इस मंदिर में दो गर्भगृह हैं। उत्तर दिशा में शांतलेश्वर तथा दक्षिण दिशा में होयसलेश्वर, जिनके भीतर दो पूर्वमुखी शिवलिंग हैं। दोनों ही मंदिर उत्तर-दक्षिण रेखा पर निर्मित हैं जिनके लिए प्रवेश द्वार पूर्व दिशा में है। दोनों मंदिरों के सभा मंडप एक गलियारे द्वारा जुड़े हुए हैं। पूर्व दिशा में स्थित दो नंदी मंडपों के भीतर दो विशालकाय नंदी स्थापित हैं जो भगवान शिव के वाहन हैं। दोनों नंदी भव्य रूप से अलंकृत हैं। होयसलेश्वर मंदिर की ओर स्थित नंदी मंडप के पृष्ठभाग में सात घोड़ों एवं सारथी अरुणदेव समेत सूर्यदेव की विशाल प्रतिमा है।

लक्ष्मी नारायण को लिए गरुड़
लक्ष्मी नारायण को लिए गरुड़

मंदिर का प्रवेश द्वार

मंदिर के पूर्वी भाग में दो प्रवेश द्वार हैं। एक होयसलेश्वर के लिए तथा दूसरा शांतलेश्वर के लिए। दोनों प्रवेशद्वारों का रक्षण करते द्वारपालों की प्रतिमाएं हैं। द्वारों के ऊपर उत्कृष्ट तोरण हैं। मंदिर का भीतरी भाग चौड़ा एवं प्रशस्त है। मंदिर की भीतरी भित्तियाँ बाहरी भित्तियों की तुलना में अपेक्षाकृत सादी हैं। मंदिर के भीतर विभिन्न देवी-देवताओं को समर्पित अनेक लघु मंदिर हैं किन्तु उनमें से अधिकांश मंदिर भंगित हैं। अनेक समृद्ध भव्य नक्काशी युक्त गोलाकार लेथ स्तंभ मंदिर की भीतरी सुंदरता को चार चाँद लगाते हैं। ये स्तम्भ होयसल वास्तुकला की अद्वितीय शैली के प्रतीक हैं।

मंदिर का भीतरी भाग

होयसलेश्वर मंदिर का दक्षिण द्वार
होयसलेश्वर मंदिर का दक्षिण द्वार

मंदिर का भीतरी भाग मूलतः द्विकुटा विमान परिकल्पना के आधार पर निर्मित है जिसमें दो समरूप मंदिर हैं। प्रत्येक मंदिर में एक गर्भगृह, एक सुकनासी एवं एक दर्शन मंडप अर्थात् नवरंग मंडप हैं। गर्भगृह सुंदर मकर तोरण द्वारा अलंकृत है। तोरण के ऊपर विष्णु के विभिन्न अवतार उत्कीर्णित हैं। मंदिर के समक्ष दो छोटे नंदी विराजमान हैं जो शिवलिंग की ओर मुख किए हुए हैं। मध्यवर्ती गलियारा दोनों मंदिरों के मंडपों को जोड़ता है। इस गलियारे में अनेक स्तंभों की पंक्ति है जो उत्तर-दक्षिण रेखा की सीध पर स्थित हैं। प्रत्येक नवरंग मंडप के भीतर उत्कृष्ट रूप से उत्कीर्णित चार स्तम्भ तथा एक ऊंची छत है।

मंदिर के भीतर सुशोभित गोल स्तम्भ
मंदिर के भीतर सुशोभित गोल स्तम्भ

इन स्तंभों के ऊपरी भागों पर उत्कृष्ट रूप से उत्कीर्णित आकर्षक स्त्रियों के शिल्प हैं जिन्हे मदानिकाएं कहा जाता है। मंदिर की छत भी सूक्ष्मता से उत्कीर्णित है जिस पर विभिन्न देवी-देवता देखे जा सकते हैं। अधिकतर स्तंभों पर उत्कीर्णित मदानिकाओं में से अनेक पूर्णतः अथवा आंशिक रूप से भंगित हैं।

फिलग्री कलाशैली

दक्षिणी द्वार पर फिलग्री कलाशैली में महीनता से उत्कृष्ट उत्कीर्णन किया गया है जो बेजोड़ है। इसे एक अति उत्कृष्ट कलाकृति माना जाता है। इसके मध्य में नटराज मुद्रा में भगवान शिव हैं जो नंदी एवं एक संगीतज्ञ के साथ हैं। द्वार के दोनों ओर छः फुट के विशालकाय द्वारपाल हैं जिन पर उत्तम आभूषण गढ़े गए हैं। दोनों प्रतिमाएं भंगित होने के बाद भी अत्यंत मनमोहक हैं।

भगवान् शिव की प्रतिमा पर फिलग्री का सा काम - होयसलेश्वर मन्दिर
भगवान् शिव की प्रतिमा पर फिलग्री का सा काम – होयसलेश्वर मन्दिर

दक्षिण की ओर एक गरुड़ स्तम्भ है जिसे राजपरिवार के रक्षक ‘गरुड़’ की स्मृति में बनाया गया था। दक्षिणी प्रवेश द्वार पर आठ फुट ऊंची गणेश की एक प्रतिमा भी है।

नंदी पर सवार शिव और पार्वती
नंदी पर सवार शिव और पार्वती

मंदिर संकुल में उत्तम बगीचे हैं जिनमें अनेक प्रकार के पुष्पों के पौधे हैं। यहाँ बैठने की भी सुविधाएं हैं। संकुल के भीतर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग का संग्रहालय है। यहां अनेक ऐसे होयसल शिल्प संग्रहीत कर रखे गए हैं जिन्हे राज्य भर में स्थित विभिन्न होयसल मंदिरों के खंडहरों से प्राप्त किया गया है।

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हैलेबिडु के अन्य महत्वपूर्ण पुण्यस्थल

केदारेश्वर मंदिर

केदारेश्वर मंदिर - हलेबिडू
केदारेश्वर मंदिर – हलेबिडू

होयसलेश्वर मंदिर से दक्षिण-पश्चिम दिशा में एक अन्य उत्कृष्ट होयसल रचना है, केदारेश्वर मंदिर। तारे के आकार के इस त्रिकुटा मंदिर संकुल में तीन मंदिर हैं जो भगवान शिव को समर्पित हैं। अन्य होयसल मंदिरों के समान इस मंदिर संकुल के तीनों मंदिर भी एक ऊंचे मंच पर स्थापित हैं जिसे जगती कहा जाता है। इसका निर्माण राजा वीर बल्लाल द्वितीय एवं उनकी रानी अभिनवी केतला देवी ने करवाया था।

एक मनमोहक बाग के भीतर स्थित इस मंदिर संकुल में दर्शनार्थियों की संख्या अत्यंत कम रहती है। यह स्थान सदा शांत रहता है तथा दैवी उपस्थिति का आभास प्रदान करता है। मैं जब यहाँ पहुंची, तब यह मंदिर संकुल बंद हो चुका था। एक स्थानीय गाइड ने मुझे बताया कि संकुल के भीतर एक मुख्य मंदिर तथा उसके दोनों ओर दो अन्य मंदिर हैं। तीनों मंदिर एक केन्द्रीय महा मंडप द्वारा जुड़े हुए हैं। प्रत्येक मंदिर में उसका एक गर्भगृह है एवं एक सुकनासी है जो महा मंडप से जुड़ा हुआ है। मंदिर की भित्तियों के निचले भागों पर विस्तृत रूप से उत्कीर्णित चित्र वल्लरी हैं जिसमें, होयसलेश्वर मंदिर के ही समान, गज, सिंह, मकर, हंस इत्यादि की अनेक आकृतियाँ हैं। भित्तियों के ऊपरी भागों पर अन्य देवी-देवताओं एवं पुराणों, रामायण व महाभारत इत्यादि की कथाओं के विभिन्न पात्रों के लगभग १८० उत्कृष्ट शिल्प हैं।

हैलेबिडु की जैन बसदियाँ

यद्यपि होयसल वंश के शासन-काल में जैन धर्म का भी विकास हुआ था, तथापि १२ वी. सदी के पश्चात जैनियों को दिए गए संरक्षण में भारी मात्रा में कटौती हो गई थी। हैलेबिडु में तीन जैन बसदियाँ हैं जो जैन धर्म के तीन प्रमुख तीर्थंकरों को समर्पित हैं। तीनों बसदियाँ होयसलेश्वर मंदिर के समीप ही स्थित हैं।

पार्श्वनाथ बसदी

जैन धर्म के २३ वें. तीर्थंकर को समर्पित यह बसदी तीनों जैन बसदियों में से सर्वाधिक महत्वपूर्ण बसदी है। ऐसा माना जाता है कि इसका निर्माण सन् ११३३ में राजा विष्णुवर्धन के एक मंत्री के पुत्र, बोपन्ना ने करवाया था। यह बसदी भव्य प्रतिमाओं एवं विस्तृत नक्काशी से अलंकृत है। केन्द्रीय कक्ष के भीतर आईने के समान चमकदार १२ स्तम्भ हैं। छत पर भी अति उत्कृष्ट उत्कीर्णन हैं। गर्भगृह के भीतर श्री पार्श्वनाथ स्वामी की काले ग्रेनाइट पत्थर में बनी १८ फुट ऊंची प्रतिमा है।

शांतिनाथ बसदी

पार्श्वनाथ बसदी से किंचित छोटी, यह बसदी जैन धर्म के १६ वें. तीर्थंकर श्री शांतिनाथ स्वामी को समर्पित है। इसका निर्माण सन् ११९२ में राजा वीर बल्लाल द्वितीय के शासनकाल में हुआ था। यह तीर्थस्थल भी अप्रतिम प्रतिमाओं एवं आईने के समान चमकदार स्तंभों से अलंकृत है। गर्भगृह के भीतर श्री शांतिनाथ स्वामी की काले ग्रेनाइट पत्थर में बनी १८ फुट ऊंची प्रतिमा है।

आदिनाथ बसदी

आदिनाथ जैन बसदी
आदिनाथ जैन बसदी

श्री आदिनाथ स्वामी को समर्पित यह एक छोटी बसदी है। श्री आदिनाथ स्वामी जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर थे। इस बसदी का निर्माण १२ वीं. सदी में हुआ था। इस के भीतर श्री आदिनाथ की प्रतिमा के साथ देवी सरस्वती की भी छवि है जिन्हे हिन्दू धर्म में ज्ञान व विद्वता की देवी माना जाता है।

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जैन बसदी की छत
जैन बसदी की छत

रूद्रेश्वर  मंदिर

कर्नाटक राज्य परिवहन विकास निगम के अतिथिगृह के समीप स्थित यह रूद्रेश्वर मंदिर भी होयसल काल से संबंध रखता है किन्तु इस पर उत्कीर्णन नाममात्र की है। यह भी एक त्रिकुटा मंदिर है जो तीन मंदिरों से बना हुआ है। उनमें से दो मंदिरों के भीतर शिवलिंग हैं तथा तीसरे में वीरभद्र की प्रतिमा है। मंदिर परिसर के भीतर एक महाद्वार से प्रवेश किया जाता है।

नागेश्वर मंदिर

रूद्रेश्वर मंदिर संकुल के समीप स्थित नागेश्वर मंदिर अब खंडहर रूप में है। इस स्थान के प्राप्त अनेक प्रकार के शिल्प अब संग्रहालय की शोभा बढ़ा रहे हैं।

रंगनाथ मंदिर

होयसलेश्वर मंदिर से उत्तर दिशा की ओर स्थित यह रंगनाथ मंदिर सिंडीकेट बैंक के समीप स्थित है। मूलतः होयसल काल में निर्मित यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित था। कालांतर में इसका विस्तारीकरण किया गया तथा श्री रंगनाथ के रूप में भगवान विष्णु को समर्पित किया गया।

रंगनाथ मंदिर के समीप अन्य अनेक तीर्थस्थल हैं जो होयसल काल से ही संबंध रखते हैं। जैसे, कुंबलेश्वर, गुंडलेश्वर तथा वीरभद्र इत्यादि।

उत्सव

इन मंदिरों में देवताओं का पूजन नहीं होता है। इसी कारण इन मंदिरों में कोई उत्सव भी नहीं मनाया जाता है। ना ही कोई अनुष्ठान किया जाता है। ये मंदिर अपनी उत्कृष्ट वास्तुकला के लिए अत्यंत प्रसिद्ध हैं।

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यात्रा सुझाव

होयसलेश्वर मंदिर की बाहरी दीवार
होयसलेश्वर मंदिर की बाहरी दीवार
  • हैलेबिडु बंगलुरु से २०० किमी की दूरी पर है। बंगलुरु से इसकी एक दिवसीय यात्रा की जा सकती है। सर्वाधिक समीप स्थित नगर हासन है जहां से बेलूर एक घंटे में गाड़ी से चलकर पहुंचा जा सकता है।
  • मेरा सुझाव है कि आप हासन में अपना पड़ाव डालें ताकि बेलूर के साथ साथ आप हैलेबिडु भी उसी दिन देख सकते हैं। हैलेबिडु भी बेलूर के समान होयसल शिल्पकला का उत्कृष्ट नमूना है।
  • हासन कर्नाटक के अन्य महत्वपूर्ण नगरों एवं शहरों से सड़क एवं रेल मार्ग द्वारा सुगमता से जुड़ा हुआ है। कर्नाटक राज्य परिवहन की बसें नियमित रूप से बेलूर एवं अन्य महत्वपूर्ण नगरों के मध्य दौड़ती हैं।
  • हासन में अच्छे अतिथिगृह उपलब्ध हैं। अतः यहाँ ठहरना उत्तम होगा।
  • यद्यपि आप इस मंदिर के दर्शन वर्ष भर में कभी भी कर सकते हैं, तथापि इसके दर्शन की सर्वोत्तम समयावधि अक्टूबर से मार्च के मध्य की है जब यहाँ का वातावरण शीतल रहता है।
  • मंदिरों के दर्शन का सर्वोत्तम समय प्रातःकाल शीघ्र तथा दोपहर के अंतिम प्रहर का है।
  • भोजन तथा जलपान के लिए मंदिर के समीप अनेक अच्छे जलपानगृह तथा भोजनालय उपलब्ध हैं।
  • मेरा सुझाव है कि आप गाइड की सुविधाएं अवश्य लें। गाइड संघों ने उनके शुल्क निर्देशित कर दिए हैं जो ३०० रुपये हैं।
  • मंदिर में प्रवेश के लिए शुल्क नहीं है।
  • मंदिर में दर्शन का समय प्रातः ६:३० बजे से रात्रि ९ बजे तक है।
  • संग्रहालय दर्शन का समय – सोमवार से शुक्रवार – प्रातः ९ बजे से संध्या ५ बजे तक।

यह संस्करण अतिथि संस्करण है जिसे श्रुति मिश्रा ने इंडिटेल इंटर्नशिप आयोजन के अंतर्गत प्रेषित किया है।

श्रुति मिश्रा व्यावसायिक रूप से बैंक में कार्यरत हैं। उन्हे यात्राएं करना, विभिन्न स्थानों के सम्पन्न विरासतों के विषय में जानकारी एकत्र करना तथा विभिन्न स्थलों के विशेष व्यंजन चखना अत्यंत प्रिय हैं। उन्हे पुस्तकों से भी अत्यंत लगाव है। उन्हे पाककला में भी विशेष रुचि है। वर्तमान में वे बंगलुरु में निवास करती हैं। उनकी तीव्र इच्छा है कि वे विरासत के धनी भारत की विस्तृत यात्रा करें तथा अपने अनुभवों पर आधारित एक पुस्तक भी प्रकाशित करें।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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