सड़क यात्रा Archives - Inditales श्रेष्ठ यात्रा ब्लॉग Wed, 08 May 2024 07:24:32 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.7.5 भारत की सर्वाधिक रमणीय सड़क यात्राएं https://inditales.com/hindi/bharat-ki-sadak-yatrayen/ https://inditales.com/hindi/bharat-ki-sadak-yatrayen/#respond Wed, 21 Aug 2024 02:30:19 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=3667

भारत में सड़क मार्ग द्वारा भ्रमण करना मेरा सर्वाधिक प्रिय यात्रा माध्यम है। सड़क मार्ग पर यात्राएं करते हुए आप भौगोलिक स्थानांतरण में निरंतर होते प्राकृतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तनों को निकट से अनुभव कर सकते हैं। क्षेत्र परिवर्तित होते ही वहाँ की भौगोलिक अवस्थिति, जल सम्पदा, संस्कृति आदि में सूक्ष्म ही सही, परिवर्तन अवश्य […]

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भारत में सड़क मार्ग द्वारा भ्रमण करना मेरा सर्वाधिक प्रिय यात्रा माध्यम है। सड़क मार्ग पर यात्राएं करते हुए आप भौगोलिक स्थानांतरण में निरंतर होते प्राकृतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तनों को निकट से अनुभव कर सकते हैं। क्षेत्र परिवर्तित होते ही वहाँ की भौगोलिक अवस्थिति, जल सम्पदा, संस्कृति आदि में सूक्ष्म ही सही, परिवर्तन अवश्य होते हैं।

भारत की सड़क यात्रायें
भारत की सड़क यात्रायें

निजी वाहन हो अथवा किराए की टैक्सी, सड़क यात्रायें आपको अपनी गति से भ्रमण करने की स्वतंत्रता प्रदान करती हैं। आप थक जाएँ अथवा परिदृश्यों को कुछ क्षण अधिक निहारने की अभिलाषा उत्पन्न हो जाए या चाय-पकोड़ा, इडली-वडा, पोहा-जलेबी, लाल चा अथवा कुछ अन्य खाद्य पदार्थ खाने पीने की इच्छा हो जाए तो आप स्वेच्छा से अल्पविराम ले सकते हैं।

यद्यपि मेरे लिये सभी सड़क यात्राएं आनंददायी होती हैं, तथापि कुछ सड़क यात्राएं इतनी नयनाभिराम होती हैं कि गंतव्य पहुँचने के आनंद की तुलना में यात्रा का आनंद सर्वोपरि हो जाता है।

भारत की सर्वाधिक रमणीय सड़क यात्राएं

भारत की कुछ रमणीय सड़क यात्राएं जिनका आनंद मैंने प्राप्त किया है तथा वो जो भविष्य में प्राप्त करने के लिए मेरी इच्छा सूची में सम्मिलित हैं, आईये उनकी कुछ छटा आपको दिखाती हूँ।

शिमला से किन्नौर, स्पीति व लाहौल होते हुए मनाली तक

भारत के हिमाचल प्रदेश में विरली जनसँख्या के इस क्षेत्र में भ्रमण करना मेरी सर्वाधिक प्रिय यात्रा रही है। यात्रा का आरम्भ होता है, हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से। राजधानी होने के कारण यह अनेक गतिविधियों से परिपूर्ण नगर है। सेबों के क्षेत्रों से होते हुए हम किन्नौर पहुँचते हैं जहाँ की विशेषता है, हरे रंग की हिमाचली टोपी। चारों ओर आपको हरे रंग की विशेष टोपियों से सजे हिमाचली पुरुष दृष्टिगोचर होंगे।

रमणीय स्पिति घाटी
रमणीय स्पिति घाटी

वहाँ से आगे बढ़ते हुए स्पीति घाटी में पहुँचते हैं जहाँ की शीतलतम मरुभूमि अपनी नीरवता एवं चित्ताकर्षक परिदृश्यों से आपको स्तब्ध कर देगी। लाहौल से जाते हुए कुंजुम दर्रे एवं रोहतांग दर्रे के मध्य स्थित चंद्रताल सरोवर की लुभावनी सुन्दरता को अपने नैनो द्वारा अपने स्मृति में अमर कर लीजिये। अंततः मनाली में अपनी यात्रा का अंत करते हुए इस अनुभूति से प्रसन्न होईये कि आप पुनः अपनी चिरपरिचित सभ्यता में वापस आ गए हैं।

इस सड़क यात्रा के लिए जुलाई-अगस्त की कालावधि सर्वोत्तम है। इस कालावधि में कुंजुम दर्रा खुला रहता है।

मानसून में कोंकण क्षेत्र में सड़क यात्रा

कोंकण एवं मानसून एक प्रकार से एक दूसरे के पूरक कहलाते हैं। कोंकण क्षेत्रों में लगभग ६ मास वर्षा होती रहती है जिससे सम्पूर्ण क्षेत्र हरियाली के आवरण से ढँक जाता है। गोवा से सड़क मार्ग द्वारा रत्नागिरी एवं आसपास के क्षेत्रों तक की यात्रा आपको इस हरियाली का प्रत्यक्ष दर्शन करायेगी।

कोंकण का सावदाव जल प्रपात
कोंकण का सावदाव जल प्रपात

चारों ओर दृष्टि दौड़ाने पर धूसर रंग की संकरी सड़क के अतिरिक्त सम्पूर्ण परिदृश्य हरे रंग की भिन्न भिन्न छटाओं से आवरित दृष्टिगोचर होता है। क्षण क्षण में मार्ग के दोनों ओर झरने दिखाई पड़ जाते हैं। इस मार्ग पर स्थित अम्बोली घाट तो दूर-सुदूर से बड़ी संख्या में पर्यटकों, पर्वतारोहकों व रोमांचक पदभ्रमणकारियों को आकर्षित करता है। सावडाव एवं मार्लेश्वर झरने भी अत्यंत लोकप्रिय हैं।

कोंकण क्षेत्रों के चित्ताकर्षक परिदृश्यों का आनंद आप रेल मार्ग द्वारा भी उठा सकते हैं। कोंकण रेलवे भी कोंकण क्षेत्रों के हरेभरे परिदृश्यों, घाटों एवं झरनों के अवलोकन का उत्तम अवसर प्रदान करती है।

अप्रतिम सौंदर्य से परिपूर्ण कोंकण क्षेत्र में सड़क यात्रा का आनंद उठाने का सर्वोत्तम समय मानसून काल है।

श्रीनगर से लेह तक सड़क यात्रा

डल सरोवर के चारों ओर बसा एक सुन्दर नगर, श्रीनगर। तैरती नौकाओं से भरा मनमोहक डल सरोवर इस सुन्दर पर्वतीय पर्यटन नगर को अद्वितीय आयाम प्रदान करता है। अनेक हिन्दी चलचित्रपटों में इन परिदृश्यों की पृष्ठभूमि में अविस्मरणीय प्रणय दृश्यों को चित्रित किया है। उस काल में प्रणय एवं श्रीनगर का एक अटूट सम्बन्ध सा बन गया था। श्रीनगर के राजनैतिक एवं सामाजिक परिवेशों में सकारात्मक परिवर्तन के साथ यह पुनः एक लोकप्रिय पर्यटन क्षेत्र बन रहा है।

अमरनाथ यात्रियों का बालताल शिविर
अमरनाथ यात्रियों का बालताल शिविर

सड़क मार्ग द्वारा लेह की ओर जाते हुए आप पहलगाम के मनोरम दृश्यों को देखेंगे। आकर्षक पर्वतीय परिवेश में घोड़ों पर भ्रमण करते अनगिनत प्रसन्न पर्यटक, यह एक सामान्य दृश्य होता है। यदि अमरनाथ तीर्थयात्रा का समय हो तो आप बालताल में अनेक विशाल शिविर देख सकते हैं जहाँ तीर्थयात्रियों की सुविधा के सभी प्रबन्ध किये जाते हैं। आकाश में उड़ान भरते कई हेलीकॉप्टर भी दिखेंगे जो तीर्थयात्रियों को पर्वतशिखर तक पहुँचते हैं।

जोजिला दर्रा एक नवीन परिदृश्य प्रस्तुत करता है। हरियाली एवं विविध रंगों से परिपूर्ण परिदृश्य अब लद्दाख के बीहड़ पर्वतों में परिवर्तित होने लगते हैं। मार्ग में द्रास युद्ध स्मारक एवं कारगिल में अवश्य भ्रमण करें। लामायुरू मठ के चन्द्रमा सदृश परिवेशों को अपनी स्मृति में अमर करें। अलची मठ में प्राचीन चित्रों का अवलोकन भी अवश्य करें।

लेह पहुँचते ही कुछ काल विश्राम अवश्य करें। ऊँचाई परिवर्तन एवं वायु की विरलता के लिए स्वयं को अभ्यस्त करना आवश्यक होता है।

इस सड़क यात्रा के लिए सर्वोत्तम अवधि ग्रीष्म काल है। मैंने ग्रीष्मकाल में इन क्षेत्रों का भ्रमण अवश्य किया है किन्तु मैंने शीत ऋतु के असहनीय वातावरण में भी लेह का भ्रमण किया है। वह भ्रमण भी अत्यंत रोमांचक था।

अरुणाचल के बोमडिला से होते हुए तवांग तक की सड़क यात्रा  

यह सड़क यात्रा असम-अरुणांचल सीमा पर स्थित तेजपुर से आरम्भ की जा सकती है। यदि रोमांचक यात्रा का विचार हो तो अरुणांचल के भालुकपोंग से यात्रा आरम्भ की जा सकती है। आर्किड अभयारण्य में अवश्य विचरण करें किन्तु सड़क यात्रा करते हुए भी सड़क के दोनों ओर निहारना ना भूलें। चारों ओर आपको वनीय आर्किड दृष्टिगोचर होंगे। वृक्षों के तनों-शाखाओं पर चढ़े आर्किड बेलों से लटकते हुए अथवा झाड़ियों से झांकते हुए ये आपके रोम रोम को प्रफुल्लित कर देंगे।

तेंगा घाटी में हिमालय की लहरें
तेंगा घाटी में हिमालय की लहरें

अरुणांचल में हरियाली के आवरण से ढंके अनेक पर्वत एवं घाटियाँ हैं। टेंगा घाटी उन सब में सर्वाधिक आकर्षक घाटी है। यहाँ किवी के अनेक उद्यान हैं। अरुणांचल की सड़क यात्रा में बोमडिला का पड़ाव आवश्यक है।

प्रतिकूल जलवायु के कारण मैं तवांग तक नहीं जा पायी थी। मुझे बताया गया कि तवांग तक की सड़क यात्रा अत्यंत चित्ताकर्षक है।

यद्यपि इन पर्वतीय क्षेत्रों में जलवायु सदा ही अतिशीतल रहता है, तथापि इस सड़क यात्रा के लिए ग्रीष्म ऋतु सर्वोत्तम समयावधि है।

जोधपुर से जैसलमेर की सड़क यात्रा

राजस्थान भारत का सर्वाधिक पर्यटन-अनुकूल राज्य है। राजस्थान में आप अनेक सुन्दर सड़क भ्रमण कर सकते हैं। मैंने ‘जयपुर के आसपास के स्थल- १० सर्वोत्कृष्ट एक-दिवसीय भ्रमण’, इस संस्करण में उनके विषय में विस्तार से उल्लेख किया है। उन सब में मेरी सर्वाधिक प्रिय यात्रा है, जोधपुर से जैसलमेर तक सड़क यात्रा। विस्तृत विशाल थार मरुस्थल को चीरती सीधी सड़क पर यात्रा करना स्वयं में एक अविस्मरणीय अनुभव है। चारों ओर स्वर्णिम बालू, यदा-कदा बालू के टापू, सूखे खेजड़ी के वृक्ष व अन्य झाड़ियाँ एक विलक्षण परिदृश्य प्रस्तुत करते हैं।

विशाल थार मरुस्थल
विशाल थार मरुस्थल

बालू के विस्तृत क्षेत्रों में रंगबिरंगे आवरणों एवं आभूषणों से अलंकृत ऊंट परिदृश्यों में रंग भर देते हैं। इस मार्ग पर परिवहन विरल रहता है। सम्पूर्ण परिवेश ऐसा प्रतीत होता है मानो आप अनंत की ओर यात्रा कर रहे हैं। महानगरों एवं नगरों में हमारी दृष्टि सदा बाधित होती रहती है। किन्तु इस परिदृश्य में हमारी अबाधित दृष्टि दूर दूर तक देख सकती है। जैसलमेर की मंत्रमुग्ध कर देने वाली सुन्दरता में ओतप्रोत हो जाईये। अथवा कुलधरा के रहस्यमयी गाँव में रोमांचित होईये। लोद्रवा के जैन मंदिरों की सुन्दरता को निहारिये।

इस सड़क यात्रा के लिए सर्वोत्तम समयावधि शीत ऋतु है।

तमिलनाडु के चोल मंदिरों के दर्शन – एक सड़क यात्रा

तमिलनाडु में स्थित पूर्वी तटीय मार्ग आपको चेन्नई से पोंडिचेरी ले जाती है। यह एक अप्रतिम सड़क यात्रा है। आप प्राचीन नगरी महाबलीपुरम में रूककर प्राचीन भव्य मंदिरों के दर्शन कर सकते हैं। महाबलीपुरम अप्रतिम स्थापत्य शैली के मंदिरों एवं मनमोहक समुद्रतटों के लिए प्रसिद्ध है। आगे जाकर आप चिदंबरम का वैभवशाली नटराज मंदिर देख सकते हैं।

गंगैकोंदाचोलापुराम का चोल मंदिर
चोल मंदिर

कुम्भकोणम की ओर एक लघु विमार्ग ले सकते हैं। आगे तमिलनाडु की सांस्कृतिक राजधानी तंजावुर जा सकते हैं। तंजावुर का बड़ा बृहदीश्वर मंदिर, गंगईकोंड चोलपुरम का बृहदीश्वर मंदिर, दारासुरम का ऐरावतेश्वर मंदिर जैसे वैभवशाली विशाल प्राचीन मंदिरों के दर्शन अवश्य करें।

कुछ दूर आगे आप तिरुचिरापल्ली जा सकते हैं। श्रीरंगम नामक द्वीप नगरी के दर्शन कर सकते हैं जो धार्मिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण व पवित्र स्थल है।

यह सम्पूर्ण सड़क मार्ग हमें ऐतिहासिक चोल मंदिरों से अवगत कराता है।

यद्यपि यह यात्रा वर्ष भर में कभी भी की जा सकती है, तथापि ग्रीष्म ऋतु किंचित कष्टकारक हो सकती है। यहाँ शीत ऋतु अत्यंत सुखकारक है।

सड़क यात्रा द्वारा मध्यप्रदेश की प्रसिद्ध रानियों से भेंट 

भ्रमण की दृष्टि से मध्य प्रदेश मेरे सर्वाधिक प्रिय राज्यों में से एक है। इस राज्य में अनेक सड़क यात्राएं आयोजित की जाती हैं। उनमें से एक प्रसिद्ध यात्रा है, नर्मदा परिक्रमा। मैं आपको जिस सड़क यात्रा के विषय में बताना चाहती हूँ, वह अपेक्षाकृत छोटी यात्रा है किन्तु अत्यंत अनोखी है। यह सड़क यात्रा उन नगरों में ले जाती है जो अपनी रानियों की कीर्ति से जाने जाते हैं। आप इंदौर से अपनी सड़क यात्रा आरम्भ कर मांडू तक जा सकते हैं।

नर्मदा के तट पर महेश्वर
नर्मदा के तट पर महेश्वर

मांडू का नाम लेते ही रानी रूपमती एवं उनकी लोकप्रिय कथाएं स्मृति पटल पर उभर कर आ जाती हैं। पहाड़ी पर बसे मांडू नगर में आप कहीं भी जाएँ, आपको रानी रूपमती की कथाएं सुनाई जायेंगी। मुझे रानी रूपमती के महल अत्यंत भाया जहाँ से वो नर्मदा नदी के दर्शन करती थीं। मांडू के प्राचीन महलों का अवलोकन करते समय आप उस काल के उत्कृष्ट जल प्रबंधन प्रणाली की प्रशंसा करने से स्वयं को रोक नहीं पायेंगे।

यहाँ से आगे जाते हुए आप महेश्वर पहुंचेंगे। महेश्वर की रचना मेरी सर्वप्रिय रानी अहिल्या बाई होलकर ने की थी। महेश्वर उनकी राजधानी भी थी। आज भारत में हम अनेक मंदिर देखते हैं जो अहिल्या बाई की ही देन हैं। महेश्वर में नर्मदा नदी के तट पर उनका सुन्दर महल है। इस तट पर एक सुन्दर घाट है। नर्मदा के तट पर स्थित यह सर्वाधिक सुन्दर घाट है। यहाँ आयोजित की गयी लिंगार्चना मेरी स्मृतियों में अब भी स्पष्ट है। इस अर्चना में एक लाख से भी अधिक शिवलिंगों की अर्चना की जाती है। आज भी यह अनुष्ठान अनवरत रूप से किया जाता है। महेश्वर में सुप्रसिद्ध माहेश्वरी साड़ियाँ क्रय करें। नर्मदा नदी में नौकायन का भी आनंद उठायें।

वाहन चलाते हुए यहाँ से आगे आप बुरहानपुर जाएँ। आपने मुमताज महल का नाम सुना होगा, जिनकी स्मृति में शाहजहाँ ने ताजमहल का निर्माण कराया था। मुमताज महल का देहांत बुरहानपुर में हुआ था। कुछ काल के लिए उन्हें बुरहानपुर में ही दफनाया गया था। यह एक प्राचीन नगर है जो उससे भी प्राचीन ताप्ति नदी के तट पर बसा है। मार्ग में आप ओंकारेश्वर रुक कर मंदिर में शिवलिंग के दर्शन कर सकते हैं जो एक ज्योतिर्लिंग है। महान संन्यासी आदि शंकराचार्य जी की अपने गुरु से प्रथम भेंट ओंकारेश्वर में ही हुई थी। यहीं पर उन्होंने अध्ययन व साधना की थी।

पटना-नालंदा-गया – बिहार की लोकप्रिय सड़क यात्रा

बिहार राज्य की यह लोकप्रिय सड़क यात्रा वैश्विक धरोहर नालंदा तथा नालंदा जिले में स्थित राजगीर से होकर जाती है। यह आपको गया, बोधगया तथा बराबर गुफाओं का भी भ्रमण कराती है। सड़क मार्ग द्वारा बिहार का भ्रमण करते हुए आप बिहार के स्वादिष्ट व्यंजनों का भी आस्वाद ले सकते हैं, जैसे खाजा तथा लाइ।

प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय
प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय

यदि आप चाहें तो आप इस चक्र में वैशाली को भी सम्मिलित कर सकते हैं। मैंने इस सड़क यात्रा का सुझाव आपके समक्ष इसलिए रखा क्योंकि इस सड़क यात्रा के माध्यम से आप यहाँ के ग्रामीण क्षेत्रों के सादगी पूर्ण जीवन को निकट से अनुभव कर सकते हैं। आप प्राचीन कालीन बिहार के परिवेश को जान व समझ सकते हैं। मैंने यहाँ के स्वच्छ गाँव एवं सरल निवासियों से परिपूर्ण कुछ अप्रतिम परिदृश्य देखे जो अति-औद्योगीकरण की मलिनता से अछूते हैं।

गुवाहाटी से शिलांग

मेघालय भ्रमण के लिए आये लगभग सभी यात्रियों का यही मार्ग होता है जब वे इसकी राजधानी शिलांग तक जाना चाहते हैं। सम्पूर्ण मार्ग मनोरम परिदृश्यों से परिपूर्ण है। विशेषतः उमियम सरोवर की स्मृतियाँ मेरे मन को अब भी आनंदित कर देती हैं। पहाड़ियों एवं पर्वतों से घिरे इस सरोवर पर जब मेघों की परछाई पड़ती है तो ऐसा प्रतीत होता है मानो इस सरोवर ने मेघों को अपने अंक में समाहित कर लिया है।

चाय के उद्यानों से जाती सड़कों पर भ्रमण

भारत में उत्तर से लेकर दक्षिण तक अनेक चाय के उद्यान हैं। उनमें मेरे सर्वाधिक प्रिय दो उद्यान भारत के दो छोरों पर हैं। एक है टेमी चाय उद्यान में भ्रमण जिसे आप सिक्किम में गंगटोक यात्रा के समय कर सकते हैं। हिमालय पर्वत श्रंखलाओं में भ्रमण करते हुए आप पहाड़ियों की ढलानों पर चाय के हरे-भरे उद्यान देख सकते हैं।

टेमी चाय बागन - सिक्किम
टेमी चाय बागन – सिक्किम

दूसरा है, मुन्नार सड़क भ्रमण। मुन्नार में भ्रमण करते हुए आप अक्षरशः चाय के उद्यानों के मध्य से जाते हैं। टाटा चाय संग्रहालय ने मेरे मानस पटल पर अमिट छाप छोड़ी है। उस अनुभव को मैं भूल नहीं सकती।

असम के चाय उद्यान भी सुन्दर हैं किन्तु अधिकाँश उद्यान समतल क्षेत्रों पर हैं।

भारत में मेरी भावी सड़क यात्राएं – एक इच्छा सूची

इस इच्छा सूची में प्रथम नाम है, कश्मीर से कन्याकुमारी तक सड़क यात्रा। इस सड़क यात्रा के लिए शक्ति, अभ्यास एवं धीरज की आवश्यकता होती है। मेरी अभिलाषा है कि मैं एक ना एक दिवस यह यात्रा अवश्य करूँ।

दूसरी इच्छा है, नर्मदा परिक्रमा। सड़क मार्ग द्वारा इस परिक्रमा को पूर्ण करने के लिए लगभग १५ दिवस आवश्यक हैं। वस्तुतः, यह यात्रा मेरे लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भावी यात्रा है।

मैं प्राचीन व्यापार मार्गों पर भी जाना चाहती हूँ। इनमें एक है, उत्तरपथ जिसके कुछ भाग भारत में हैं। दूसरा है, दक्षिणपथ जो पूर्णतः भारत में है।

मैंने अभी तक भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों की सड़कें भी नापी नहीं हैं। यह कार्य भी मैं शीघ्र पूर्ण करना चाहती हूँ।

सड़क यात्राओं के लिए कुछ सुझाव

  • सड़क यात्रा की अवधि आपकी समय सारिणी, आपकी रूचि तथा अवलोकन की गहराई पर निर्भर करती है। अतः सड़क यात्राओं का नियोजन करते समय इन बिन्दुओं को ध्यान में रख कर यात्रा का नियोजन करें।
  • यद्यपि खाने-पीने की सामग्री सदा साथ रखने का सुझाव दे रही हूँ, तथापि यह भी आग्रह कर रही हूँ कि जहाँ जहाँ भी संभव हो, स्थानीय व्यंजनों का आस्वाद अवश्य लें। विशेषतः महामार्गों पर स्थित ढाबों एवं जलपानगृहों में अवश्य भेंट दें।
  • मार्ग में जहाँ जहाँ से भी उत्तम परिदृश्यों का अवलोकन संभव हो, आप वहाँ अवश्य रुकें। अंततः, सड़क मार्ग द्वारा भ्रमण का यही तो सर्वाधिक लाभदायक तत्व है। मार्ग में स्थित स्थानीय हाटों में भी जाएँ। स्थानीय लोगों से भेंट करें। स्मृति चिन्ह क्रय करें।
  • अपने वाहन के रखरखाव पर विशेष ध्यान दें। स्थानीय वाहन चालकों की सहायता लें जिन्हें उस स्थान एवं वहाँ उपलब्ध सुविधाओं की पूर्ण जानकारी होती है।
  • जहाँ तक संभव हो, सूर्यास्त तक ही वाहन चलायें। प्रातःकालीन शीतल वातावरण सड़क मार्ग द्वारा भ्रमण के लिए सर्वोपयुक्त होता है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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हिमाचल एवं स्पीति घाटी – १५ दिवसीय रोमांचक सड़क यात्रा https://inditales.com/hindi/himachal-shimla-spiti-ghati-manali-yatra/ https://inditales.com/hindi/himachal-shimla-spiti-ghati-manali-yatra/#comments Wed, 13 Jul 2022 02:30:53 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=2734

भारत के इस हिमालयी राज्य की घाटियों की अद्भुत सुन्दरता को निहारने के लिए हिमाचल एवं स्पीति घाटी की एक लम्बी सड़क यात्रा से बेहतर उपाय अन्य नहीं हो सकता। धरती के सर्वाधिक जोखिम भरे मार्गों के अतिरिक्त, यहाँ तक पहुँचने के लिए परिवहन का कोई अन्य साधन भी नहीं है। आपको संकरी, ऊबड़-खाबड़ व […]

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भारत के इस हिमालयी राज्य की घाटियों की अद्भुत सुन्दरता को निहारने के लिए हिमाचल एवं स्पीति घाटी की एक लम्बी सड़क यात्रा से बेहतर उपाय अन्य नहीं हो सकता। धरती के सर्वाधिक जोखिम भरे मार्गों के अतिरिक्त, यहाँ तक पहुँचने के लिए परिवहन का कोई अन्य साधन भी नहीं है। आपको संकरी, ऊबड़-खाबड़ व बलखाती सडकों से होकर ही जाना पड़ता है जिन्हें कहीं दृढ़ तो कहीं भुरभुरे पर्वतों को काटकर बनाया गया है। कहीं आप सतलुज जैसी शक्तिशाली नदी के साथ साथ चलते हैं तो कहीं आपको स्पीति जैसी कोमल नदी का साथ प्राप्त होता रहता है। हिमाचल एवं स्पीति घाटी की इस सड़क यात्रा में तो कभी कभी कई किलोमीटर दूर तक आप के अतिरिक्त आपको कोई अन्य जीव भी दृष्टिगोचर नहीं होगा।

हिमाचल की १५ दिवसीय सड़क यात्रा

हिमाचल स्पिति घाटी सड़क यात्रा
हिमाचल स्पिति घाटी सड़क यात्रा

हिमाचल की सड़क यात्रा के विषय में अधिकतर यात्रा विवरण रोमांच से परिपूर्ण होते हैं किन्तु हमारी यात्रा अपेक्षाकृत सुगम थी। जुलाई मास होने के कारण हम भू-स्खलन की कुछ घटनाओं के लिए मानसिक रूप से तैयार थे। भू-स्खलन की परिस्थिति में, शान्ति से सड़क के किनारे गाड़ी खड़ी कर, मार्ग सुगम होने की प्रतीक्षा करने के लिए, हम दाना-पानी समेत पूर्ण रूप से सज्ज थे। सौभाग्य से यात्रा के देव हम पर प्रसन्न थे। उनकी कृपा से, सम्पूर्ण १७ दिवस, हमें मार्ग में किसी भी प्रकार के कष्ट अथवा   संकट का सामना नहीं करना पड़ा।

पहाड़ काट कर बनाई सड़कें
पहाड़ काट कर बनाई सड़कें

हिमाचल प्रदेश एक पहाड़ी प्रदेश होने के कारण इसके अधिकाँश क्षेत्रों में सड़क यात्रा एक धीमी गति की यात्रा होती है। ऊंचे पर्वतों की ढलानों पर बनी इसकी बल खाती संकरी सड़कें आपको बाध्य कर देती हैं कि आप पूर्णतः सचेत रहें। एक ओर गहरी खाई तथा दूसरी ओर ऊंचे पर्वतों के मध्य से जाती वक्रीय मार्गों को देख आप कभी अचंभित हो जायेंगे तो कभी उनकी प्रशंसा करेंगे, कभी रोमांचित होंगे तो कभी उनसे भयभीत होंगे। निरंतर परिवर्तित होते अप्रतिम परिदृश्य आपको भावविभोर कर देंगे। एक ओर किन्नौर जैसे, सेबों एवं अन्य हिमाचली फलों से लदे वृक्षों से भरा हराभरा क्षेत्र है तो दूसरी ओर सांगला घाटी के ऊबड़-खाबड़ पहाड़ तथा स्पीति के वीरान बीहड़ पर्वत। धर्म की चर्चा करें तो जैसे जैसे हम पर्वतों पर ऊंचे चढ़ते जाते हैं, आस्था भी हिन्दू धर्म से बौद्ध धर्म की ओर झुकती चली जाती है। घाटियों की हरीभरी हरियाली भी पर्वतों पर ऊंचे चढ़ते चढ़ते वीरान बीहड़ पर्वतों पर लटकते रंगबिरंगे बौद्ध पताकाओं में परिवर्तित होने लगते हैं। हिमाचल सड़क यात्रा में जल एक ऐसा तत्व है जो सदा आपके साथ रहता है, वह चाहे नदी हो अथवा झील। जल की प्रत्येक अभिव्यक्ति यहाँ अत्यंत पावन मानी जाती है।

स्पीति घाटी की सड़क यात्रा

हमने हिमाचल एवं स्पीति घाटी की १५ दिवसों की सड़क यात्रा की थी। यहाँ मैं आपको हमारे दिन-प्रतिदिन के अप्रतिम यात्रा अनुभवों एवं नियोजनों के विषय में बताने जा रही हूँ। प्रत्येक स्थान पर दर्शन किये गए विभिन्न दर्शनीय स्थलों के विषय में मैं पृथक पृथक संस्करण भी विस्तृत रूप से प्रकाशित करूंगी।

दिवस १- शिमला

भारतीय अद्यतन शिक्षा संस्थान शिमलाहमारी हिमाचल एवं स्पीति घाटी सड़क यात्रा का आरम्भ हमने शिमला से किया। मैं एवं मेरी सहयात्री अलका ने दिल्ली से हिमाचल प्रदेश परिवहन विकास निगम की बस की रात्रि सेवा ली। अलका से यह मेरी प्रथम भेंट थी। शिमला पहुंचकर हमारी भेंट हमारे गाड़ी चालक रवि से हुई जो हमारे हिमाचल व स्पीति घाटी सड़क यात्रा में हमारा सर्वाधिक मूल्यवान साथी होने जा रहा था। यहाँ मैं यह कहना चाहूंगी कि एक कुशल गाड़ी चालक का साथ होना स्वयं में एक वरदान के समान है। हमने सोच-समझकर, शिमला से गाड़ी भाड़े पर ली क्योंकि पहाड़ों के गाड़ी चालकों को पर्वतीय मार्गों पर कुशलता के गाड़ी चलाने का अनुभव होता है। साथ ही, स्थानीय टैक्सी चालक संघ से सामंजस्य भी रहता है।

शिमला में हमने भूतपूर्व वाइसरीगल लॉज (Viceregal Lodge) अर्थात राष्ट्रपति निवास का अवलोकन किया जो कभी ब्रिटिश वाइसराय का सरकारी ग्रीष्मकालीन आवास हुआ करता था। इसी निवास से ब्रिटिश वाइसराय द्वारा अनेक दशकों तक भारत पर शासन किया गया था। हमने इस वाइसरीगल लॉज के मार्गदर्शित पर्यटन का भरपूर आनंद उठाया तथा भवन के सुन्दर बगीचे में सैर भी की। हमने प्रा. चन्द्रमोहन परशीरा से भेंट की जिन्होंने हमें इस यात्रा में संभव अनेक अपारंपरिक दर्शनीय स्थलों के विषय में अवगत कराया। उनका मार्गदर्शन अत्यंत मूल्यवान सिद्ध हुआ।

दिवस २ – थानेदार

हाटू माता मंदिर
हाटू माता मंदिर

शिमला से थानेदार लगभग ७० किलोमीटर दूर स्थित है। सेबों के बागों से होते हुए, अप्रतिम प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद उठाते हुए हम थानेदार पहुंचे। यहाँ हमने हिमाचली सेबों के विषय में जाना। बागों में सेबों को पकने में एवं भक्षण योग्य होने में किंचित समय शेष था। हमारा आगामी रात्रि का पड़ाव थानेदार में ही था।

थानेदार से हमने हाटु चोटी एवं नरकंडा की एक-दिवसीय यात्रा की। इस एक-दिवसीय यात्रा की मेरी सर्वोत्तम स्मृतियाँ हैं, प्रातः एवं संध्या के समय की गयी पैदल सैर, स्थानीय महिलाओं से भेंट, वृक्षों से गिरे फलों को चुनना, नदी किनारे बैठकर उसके कलरव का आनंद उठाना एवं लोक कथाएं सुनना। यहाँ हमने अपने आगामी यात्रा के विषय में जानकारी भी एकत्र की।

दिवस ३ – रामपुर बुशहर एवं सराहन

रामपुर बुशहर का पद्म महल
रामपुर बुशहर का पद्म महल

थानेदार से सांगला केवल १५० किलोमीटर दूर स्थित होते हुए भी समयानुसार यह एक लम्बी यात्रा थी। हमने प्रातः शीघ्र ही यात्रा आरम्भ की तथा सीधे रामपुर बुशहर में रुके। वहां हमें पदम महल अत्यंत भा गया। उग्र सतलज नदी के तट पर हमने एक नरसिम्हा मंदिर भी ढूँढा।

वहां से एक लघु उपमार्ग लेते हुए हम भीमाकाली मंदिर के दर्शन हेतु सराहन गए। शिला एवं काष्ठ का प्रयोग कर बनाया गया भीमाकाली का मंदिर अत्यंत सुन्दर है।

सड़क के किनारे एक ढाबे में खाए राजमा-चावल मुझे अब भी स्मरण है। साथ ही यहाँ के लोगों द्वारा उनके घर में ठहराने की व्यवस्था करने की तत्परता एवं उनके निमंत्रण की स्मृति अब भी हृदय में मिठास उत्पन्न कर देती है।

सांगला में बासपा नदी के तट पर बने बंजारा कैंप में हमारा रात्रि का पड़ाव था। वहां पहुंचते पहुंचते अन्धकार हो चुका था। रात्र भर हमें बासपा नदी की गर्जना सुनाई देती रही। उसे प्रत्यक्ष देखने की अभिलाषा तीव्र हो रही थी। प्रातः की प्रथम किरण के साथ मैं भी उठी तथा पूर्ण वेग से बहती बासपा नदी के दर्शन किये।

दिवस ४ – सांगला

हमने सम्पूर्ण दिवस चिटकुल, रक्छाम, सांगला एवं बस्तेरी गाँवों के दर्शन करते हुए व्यतीत किया। चितकुल से सांगला घाटी का अप्रतिम दृश्य दृष्टिगोचर होता है। बस्तेरी में हमने बद्री नारायण को समर्पित एक काष्ठ मंदिर का निर्माण कार्य भी देखा।

बासपा नदी के तट पर व्यतीत किये दो रात्रों के अनुभव मेरे हृदय में सदा के लिए बस गए हैं।

दिवस ५ – रिकांग पिओ एवं कल्पा

सांगला से ४० किलोमीटर दूर स्थित कल्पा तक की यात्रा अधिक लम्बी नहीं थी। सांगला घाटी से २ किलोमीटर दूर, मार्ग में रूककर हमने कमरू दुर्ग तक की छोटी सी चढ़ाई भी की। सांगला घाटी में, कमरू गाँव में स्थित, लकड़ी का यह एक प्राचीन दुर्ग है। इस दुर्ग में कामाख्या देवी का मंदिर है।

किन्नर कैलाश पर्वत
किन्नर कैलाश पर्वत

सड़क के एक ओर, पूर्ण वेग से बहती सतलुज नदी मुझे अब भी स्मरण है। हमने रिकांग पिओ गाँव का अवलोकन करते कुछ समय व्यतीत किया। यहाँ अधिकाँश लोगों ने सर पर ठेठ हरी टोपी पहनी हुई थी। इसके कारण चारों ओर हरी छटा बिखरी हुई थी। उस दिन सूर्य देवता अपनी पूरी आभा से दमक थे। बाजार विभिन्न क्रियाकलापों में पूर्णतः व्यस्त था। हमने भी बाजार में चिलगोजे खोजे किन्तु वह चिल्गोजों का मौसम नहीं था।

वहां से हम आगे कल्पा पहुंचे। किन्नर कैलाश पर्वत श्रंखला के समक्ष ही हमारा पड़ाव था। क्षितिज में मेघ पर्वत की चोटी से आँख-मिचौली का खेल खेल रहे थे। उनके इस खेल के मध्य हम पर्वत की चोटियों को पहचानने की चेष्टा कर रहे थे। उस दिन अलका का स्वास्थ्य ठीक नहीं था। इसलिए मैं अकेले ही कल्पा की बस्तियों में सैर करने तथा लकड़ी के घर व मंदिरों निहारने चली गयी। वहां से चारों ओर का परिदृश्य अप्रतिम था। सीधी चढ़ाई की पहाड़ियों के ऊपर बसे छोटे छोटे गाँव अत्यंत मनमोहक प्रतीत होते हैं।

दिवस ६ – नाको

कल्पा से नाको लगभग १०० किलोमीटर दूर स्थित है। यात्रा के इस भाग में मैंने सर्वप्रथम शीत मरुभूमि की प्रथम झलक पायी। जब हम नाको पहुँच रहे थे, हमारी दृष्टि बंजर पहाड़ों के समूह पर पड़ी। बालू के विशाल टीलों के समान प्रतीत होते उन पहाड़ों ने हमें सम्मोहित सा कर दिया था। उन्हें देख ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो उंगली के कोमल स्पर्श से भी वे सभी भुरभुरा कर गिर पड़ेंगे। आकाश इतना स्वच्छ, निर्मल व नीला था जो इससे पूर्व मैंने कभी नहीं देखा था।

नाको गाँव - स्पीती घाटी
नाको गाँव – स्पीती घाटी

नाको में मैंने ग्रामीण स्तर का सर्वोत्तम पर्यटन प्रबंधन संगठन, नाको यूथ क्लब को ढूंढा। उनका कार्य अत्यंत प्रेरणादायी था। नाको यूथ क्लब के उत्साही नवयुवकों ने मात्र ५० रुपयों के अल्प शुल्क पर हमें नाको का दर्शन कराया। उनकी सहायता से हमने गाँव में तथा पावन झील के किनारे पैदल सैर की। एक प्राचीन बौद्ध मठ में भित्तिचित्रों का अवलोकन किया। क्लब के सदस्य गाँव को स्वच्छ रखने में सहायता करते हैं। उन्होंने विभिन्न स्थानों पर सौर उर्जा की पट्टिकाएं लगाई हैं तथा गाँव की सुन्दरता की ओर भी उन्होंने विशेष ध्यान दिया है। उस समय से आज तक यह गाँव मेरे लिए एक आदर्श गाँव रहा है।

अगले दिवस, ताबो की ओर यात्रा करते हुए, मार्ग में हम गिउ गाँव जहां एक लामा का, बैठी अवस्थिति में परिरक्षित शव रखा हुआ है।

दिवस ७ – ताबो मठ स्पीति घाटी

ताबो तक की हमारी ६० किलोमीटर की यात्रा अत्यंत मनमोहक परिदृश्यों से परिपूर्ण थी। स्पीति नदी के तट पर बसा ताबो एक छोटा सा गाँव है जो मिट्टी से निर्मित प्राचीन बौद्ध मठ के लिए प्रसिद्ध है। हम इस मठ के दर्शन करने के पश्चात आगामी पड़ाव काजा निकल जाना चाहते थे किन्तु ताबो की सुन्दरता ने हमें रोक लिया। हमने वहीं ताबो में ही रात्र व्यतीत की।

ताबो मठ
ताबो मठ

मठ में एक लामा ने हमें अप्रतिम भित्तिचित्रों के दर्शन कराये। हमने वहां प्राचीन गुफाएं भी देखीं। वहां स्थित प्राचीन शैलचित्र हमारे लिए आश्चर्यजनक खोज थे।

दिवस ८ – धनकर, स्पीति घाटी

धनकर मठ से दिखती पिन नदी
धनकर मठ से दिखती पिन नदी

लगभग ५० किलोमीटर की सड़क यात्रा कर हम काज़ा पहुंचे। मेरे लिए काज़ा दर्शन इस यात्रा के आनंद की चरमसीमा होने वाली थी। एक छोटा सा उपमार्ग लेते हुए हम धनकर पहुंचे जहां हमने अत्यंत भंगुर धनकर मठ देखा। इस मठ में एक समय में अधिक लोगों को प्रवेश करने की अनुमति नहीं होती क्योंकि किसी भी समय इसके भुरभुरा कर ढहने की आशंका रहती है। सीधी चट्टान के किनारे, ऊँचाई पर बने इन मठों में भिक्षुक कैसे रहते थे, यह तथ्य हमारी सोच से भी परे है। धनकर की मेरी सर्वोत्तम स्मृति है, मठ के झरोखे से नीचे बहती पिन नदी का अप्रतिम दृश्य। धनकर मठ की ओर आती वीरान, संकरी, नुकीले मोड़ युक्त सड़कें ऐसे प्रतीत हो रही थीं मानो उन्हें केवल हमारे लिए ही बिछाया गया हो।

दिवस ९, १० – काज़ा, स्पीति घाटी

लांग्ज़ा गाँव
लांग्ज़ा गाँव

हमारी हिमाचल सड़क यात्रा में काज़ा एक प्रमुख पड़ाव था। इस क्षेत्र का सर्वाधिक विशाल नगर काज़ा , पर्यावरणीय पर्यटन एवं विश्व के सर्वोच्च खुदरा पट्रोल पम्प के लिए जाना जाता है। यहाँ हम २ से ३ दिवस व्यतीत करने वाले थे जिसमें हम काजा के आसपास अनेक छोटे गाँवों को देखना चाहते थे। हमने अनेक बौद्ध मठ देखे जिनमें की मठ भी एक है, जहां से घाटी का अप्रतिम दृश्य दृष्टिगोचर होता है। हमने लान्ग्जा व रंग्रिक जैसे गाँवों का अवलोकन किया। हम कोमिक एवं हिक्किम गाँवों तक नहीं जा पाए क्योंकि अकस्मात् ही वर्षा होने लगी जो इस क्षेत्र में अत्यंत असामान्य है। पहाड़ों में वर्षा होने पर सड़कें अत्यंत संकटमय हो जाती हैं। प्रसन्नता यह हुई कि इस क्षेत्र में क्वचित होती वर्षा का भी हम आनंद उठा पाए।

काज़ा की मेरी अमिट स्मृति है, किंचित हरियाली की छटा लिये इसके वीरान विस्तृत परिदृश्य।

दिवस १० – कुंजुम दर्रा अथवा कुंजुम ला

हिमाच्छादित चोटियाँ और कोमल फूल - कुंजुम दर्रा
हिमाच्छादित चोटियाँ और कोमल फूल – कुंजुम दर्रा

कुंजुम दर्रा ही वह कारण है जिसके लिए हमने जुलाई में यह यात्रा करने का नियोजन किया। यह दर्रा अत्यंत कम समयावधि के लिए ही खुलता है। यह दर्रा कुल्लू घाटी और लाहौल स्पीति घाटी को जोड़ता है। जब हम उस दर्रे पर, कुंजुम के मील के पत्थर के समीप खड़े थे तथा अपने संग ले जाने का तीव्रता से प्रयास करती वायु से जूझ रहे थे, हमारे मुख पर सफलता की चमक थी। कुंजुम के रंगबिरंगे परिदृश्य, हरेभरे मैदानों में भेड़ों को चराते चरवाहे, इत्यादि दृश्य मेरी स्मृति में अनंतकाल के लिए बस गए हैं।

आप कुंजुम दर्रे पर अधिक समय व्यतीत नहीं कर सकते। हम चंद्रताल झील की ओर जाते समय यहाँ कुछ क्षण ही रुके थे।

दिवस ११ – चंद्रताल सरोवर

नीलाम्बरा चंद्रताल सरोवर
नीलाम्बरा चंद्रताल सरोवर

स्पीति घाटी यात्रा में चंद्रताल मेरे लिए सर्वाधिक रोमांचकारी स्थान था। हम चंद्रताल तम्बू में लगभग दोपहर के भोजन के समय पहुंचे थे। पहुंचते ही हम चंद्रताल की ओर निकल पड़े। यहाँ पहुँचने से पूर्व हम यह चर्चा कर रहे थे कि १५००० फीट से भी अधिक ऊँचाई पर स्थित इस चंद्रताल झील की ५ किलोमीटर लम्बी परिक्रमा करना हमारे लिए कठिन होगा। किन्तु जैसे ही हम यहाँ पहुंचे, हमने चंद्रताल की परिक्रमा करने का निश्चय किया। यह परिक्रमा हमने, बिना किसी कष्ट के, इतनी सहजता से पूर्ण की कि आज भी हमारे लिए यह किसी जादुई घटना से कम नहीं है।

चंद्रताल सरोवर के समीप हम तंबू में रुके थे। चारों ओर बर्फ से आच्छादित पर्वत श्रंखलायें, गिर पड़ने को तत्पर तारों से भरा आकाश, इनके मध्य हमारा तम्बुओं में रहना, अत्यंत स्वप्निल एवं अवास्तविक था।

दिवस १२ – रोहतांग दर्रा

पिघलता हुआ हिमनद
पिघलता हुआ हिमनद

चंद्रताल से मनाली तक की सड़क यात्रा लम्बी तथा कठिनाई भरी थी। हमें अनेक छोटी-बड़ी नदियों को पार करना पड़ा जो बड़ी बड़ी चट्टानों से भरी हुई थीं। हमारी गाड़ी एक स्थान पर अटक भी गयी थी। सड़क से जाते अन्य गाड़ी चालकों की सहायता से उसे बाहर निकला गया। मनाली पहुंचते पहुंचते चारों ओर के परिदृश्य पुनः हरेभरे होने लगे जिन्होंने हमें मनोवांछित दिलासा प्रदान की। गत कुछ दिवसों में जिन वीरान बीहड़ पर्वतीय परिदृश्यों में हमें एक अद्भुत शान्ति का अनुभव हो रहा था, उसके ठीक विपरीत इस हरियाली भरे दृश्यों ने हमें पुनः जीवित होने का आभास प्रदान किया।

रोहतांग में सिका हुआ भुट्टा खाते समय हमें आभास हुआ कि हम पुनः सभ्यता में वापिस आ गए हैं। हमने निश्चय किया कि अंततः अपनी दैनन्दिनी जीवन में आने से पूर्व मनाली में मनचाहा भोजन करेंगे, आसपास आसान सैर करेंगे तथा थकान मिटाने के लिए अपने अंग शिथिल करेंगे। एक स्वप्निल यात्रा को सफलता पूर्वक पूर्ण करने के उपलक्ष्य में उत्सव मनाना पूर्णतः न्यायोचित भी है।

दिवस १३ – नग्गर

काष्ठ का बना नग्गर दुर्ग
काष्ठ का बना नग्गर दुर्ग

हमने नग्गर में एक पूर्ण दिवस व्यतीत किया जिसमें हमने कुल्लू राजाओं की काष्ठ वास्तुशैली, उनकी स्मारक शिलाओं, कला दीर्घाओं तथा हिमाचल की अन्य विरासतों के विषय में जाना। साथ ही अनेक सुन्दर मंदिरों के दर्शन भी किये।

दिवस १४ – मनाली

हमने मनाली की सड़कों पर पैदल सैर की। हिडिम्बा देवी एवं वशिष्ठ के मंदिरों के दर्शन किये। माल रोड में सैर करते अन्य पर्यटकों में घुलमिलकर चहल-पहल का आनंद उठाया। शान्ति से बैठकर कॉफ़ी का सेवन किया। संध्या के समय जल से परिपूर्ण ब्यास नदी के किनारे बैठकर प्रकृति का आनंद उठाया।

वापिस आते समय हमने एक सपेरे को बीन पर एक सुन्दर तान बजाते देखा। एक लम्बे अंतराल के पश्चात मैंने बीन पर एक सुमधुर संगीत सुना।

दिवस १५ – मणिकरण

मणिकरण के गरम झरने
मणिकरण के गरम झरने

मणिकरण में हमने उष्ण जल के स्त्रोत देखे जो आश्चर्यजनक रूप से बर्फीले जल से भरी पार्वती नदी से सटे हुए थे। यह स्थान प्रसिद्ध मणिकरण साहिब गुरुद्वारा के समीप है।

कुल्लू पहुंचते ही हमने हमारे गाड़ी चालक रवि से विदा ली तथा दिल्ली आने के लिए बस में सवार हो गए।

इस संस्करण में नीले रंग में दर्शाए गए सक्रिय वेबलिंक पर क्लिक करने पर आप हमारी यात्रा के उस भाग के विषय में विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

हिमाचल एवं स्पीति घाटी की हमारी १५ दिवसीय सड़क यात्रा को तीन वर्ष बीत चुके हैं किन्तु उसकी मधुर स्मृतियाँ हृदय में अब भी नूतन हैं। यह घाटी भारत का सर्वाधिक सुन्दर भाग है।

स्पीति घाटी सड़क यात्रा नियोजित करने से पूर्व आवश्यक सूचनाएं:

स्पीती घाटी के नग्न वीरान पहाड़
स्पीती घाटी के नग्न वीरान पहाड़
  • हमने स्पीति घाटी सड़क यात्रा जुलाई मास के प्रथम अर्द्धांश में नियोजित की थी क्योंकि हम कुंजुम एवं रोहतांग दर्रा, दोनों स्थानों पर जाना चाहते थे। स्पीति एक ग्रीष्मकालीन पर्यटन स्थल है। शीत ऋतु में यह स्थान सामान्य जनजीवन से लगभग कट जाता है।
  • हिमाचल एवं विशेषतः स्पीति घाटी ऊँचाई पर स्थित है तथा वहां जाने के मार्ग संकरे, उबड़-खाबड़ एवं जोखिम भरे होते हैं। धीमी गति से जाएँ ताकि सुरक्षित रहते हुए आप अपनी देह को ऊँचाई के वातावरण से अभ्यस्त होने के लिए भरपूर समय दे सकें।
  • शिमला अथवा मनाली से स्थानीय टैक्सी की सेवायें ही लें क्योंकि पहाड़ों के गाड़ी चालकों को वहां के मार्गों की पूर्ण जानकारी होती है, वे पहाड़ों के जोखिमभरे मार्गों पर गाड़ी चलने में अभ्यस्त होते हैं तथा उनकी अन्य चालकों से घनिष्टता होती है जो अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि मार्ग में आपकी गाड़ी कहीं अटक गयी अथवा मार्ग में अन्य कोई बाधा आ गयी तो संकट के समय शीघ्र सहायता प्राप्त करने में आसानी हो सकती है।
  • सभी मार्गों पर हिमाचल प्रदेश परिवहन विकास निगम की बसें चलती हैं किन्तु वे अत्यंत अल्प संख्या में हैं।

शाकाहारी भोजन

  • अलका व मैं, हम दोनों ही शाकाहारी हैं। इसलिए हमने काज़ा पहुँचने तक, प्रतिदिन शब्दशः राजमा-चावल अथवा दाल-चावल ही खाया। काजा में हमने शाकाहारी थुपका का आनंद उठाया। इस क्षेत्र में अत्यंत साधारण किन्तु ताजा भोजन प्राप्त हो जाता है। लम्बी दूरी की यात्रा में स्वतः के भरण-पोषण के लिए हमने साथ में सूखे मेवे रखे थे। जहां भी स्थानीय फल उपलब्ध होते थे, हम उन्हें खरीद लेते थे।
  • ट्रैकिंग के लिए स्पीति एकोस्फीयर जैसे स्थानिक क्लबों एवं संस्थाओं की सेवायें लें। वे अपने कार्य में निपुण तो होते ही हैं, साथ ही आपके द्वारा उनके स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र की सहायता भी हो जायेगी। वे पारिस्थितिकी संबंधिक अनेक महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं।
  • हमारी गाड़ी प्रतिदिन औसतन ५० किलोमीटर की दूरी तय कर रही थी। इसका अर्थ है कि आपको संलग्न ३ से ४ घंटे गाड़ी में व्यतीत करने पड़ेंगे। इस क्षेत्र में धीमी गति अत्यावश्यक है।

औषधियां

कितने शक्तिशाली या कितने कोमल हैं यह स्पीति घाटी के पहाड़?
कितने शक्तिशाली या कितने कोमल हैं यह स्पीति घाटी के पहाड़?
  • आप आवश्यकता के अनुसार सभी संभव औषधियां साथ रखें। आप भले ही स्वस्थ एवं हृष्ट-पुष्ठ हों, अपने साथ सर्व सामान्य औषधियां अवश्य रखे क्योंकि सम्पूर्ण मार्ग में आपको विभिन्न तापमानों, वातावरणों एवं ऊँचाई सम्बंधित कष्टों का सामना करना पड़ेगा।
  • शीत जलवायु से स्वयं की रक्षा हेतु अपने साथ आवश्यक ऊनी वस्त्र एवं जैकेट रखें। अन्यथा भी आप स्वयं को पूर्णतः ढँक कर रखे क्योंकि स्वच्छ निर्मल वातावरण में सूर्य की किरणें कष्टकर होती हैं।
  • मार्ग के अधिकतर भाग में भारत संचार निगम के सिम कार्ड ही कार्य करते हैं। अन्य फोन केवल कैमरे का ही कार्य कर सकते हैं!!!
  • ATM की सुविधाएं केवल सीमित स्थानों पर ही उपलब्ध हैं, जिनमें नकद भी सीमित होता है। अतः अपने साथ पर्याप्त नकद रखें। पेट्रोल पम्प की सुविधाएं भी सीमित स्थानों पर ही उपलब्ध हैं। हमें केवल रिकांग पिओ एवं काजा में ही पेट्रोल उपलब्ध हुआ। तत्पश्चात मनाली में हमने पेट्रोल भरवाया।

बंजारा कैंप

इस मार्ग के अधिकतर स्थानों पर बंजारा कैंप में ठहरने की सुविधाएं प्राप्त हो जाती हैं। अधिकांशतः, इस क्षेत्र में ठहरने के लिए इससे उत्तम सुविधाएं उपलब्ध भी नहीं हैं। इनके अतिरिक्त सम्पूर्ण हिमाचल में अनेक होमस्टे भी उपलब्ध हैं।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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जयपुर के आसपास के स्थल- १० सर्वोत्कृष्ट एक-दिवसीय भ्रमण https://inditales.com/hindi/jaipur-ke-aas-paas-paryatak-sthal/ https://inditales.com/hindi/jaipur-ke-aas-paas-paryatak-sthal/#comments Wed, 23 Oct 2019 02:30:10 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1542

जब जयपुर में ही इतना कुछ दर्शनीय है तो जयपुर के आसपास के दर्शनीय स्थलों की खोज हम क्यों करें? यही सोच रहे हैं न आप? आपका संशय तर्कसंगत अवश्य प्रतीत होता है। किन्तु तनिक प्रतीक्षा कीजिये। मुझे उन स्थलों के विषय में उल्लेख करने दीजिये जिनकी उत्कृष्टता भले ही जयपुर से अधिक ना हो, […]

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जब जयपुर में ही इतना कुछ दर्शनीय है तो जयपुर के आसपास के दर्शनीय स्थलों की खोज हम क्यों करें? यही सोच रहे हैं न आप? आपका संशय तर्कसंगत अवश्य प्रतीत होता है। किन्तु तनिक प्रतीक्षा कीजिये। मुझे उन स्थलों के विषय में उल्लेख करने दीजिये जिनकी उत्कृष्टता भले ही जयपुर से अधिक ना हो, किन्तु उससे न्यून भी नहीं है। इन्हें आप जयपुर से दिवसीय यात्रा के रूप में पूर्ण कर जयपुर वापिस आ सकते हैं।

जयपुर के आस पास पर्यटन स्थल सोने पर सुहागा यह कि ऐसी यात्रायें महानगरों की भीड़भाड़ से दूर, राजस्थान के ग्रामीण एवं प्राकृतिक सौंदर्य से हमारा परिचय कराती हैं। जब आप सूर्यमुखी के चटक पीले रंग के खेतों के मध्य से जाती सड़कों से जायेंगे, आप सोच में पड़ जायेंगे कि क्या राजस्थान में ऐसे भी स्थल होंगे जहां रंगों की रागिनी ना छिड़ी हो?

जयपुर के आसपास दर्शनीय स्थल – जयपुर से दिवसीय भ्रमण

जयपुर के निकट स्थित ऐसे दर्शनीय स्थलों की सूची यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ जिन्हें आप, जयपुर में पड़ाव डालकर, दिन में ही देखकर वापिस आ सकते हैं। आईये आप भी जयपुर आने की योजना बनाईये!

आभानेरी की चाँद बावडी – जयपुर से एक-दिवसीय यात्रा

आभानेरी की मनमोहक चाँद बावड़ी
आभानेरी की मनमोहक चाँद बावड़ी

जयपुर से आगरा की ओर, लगभग ९० की.मी. की दूरी पर यह अद्भुत नगरी आभानेरी स्थित है। अतः यदि आप दिल्ली-आगरा-जयपुर की स्वर्णिम त्रिकोणीय यात्रा पर हैं तो एक छोटा सा विमार्ग लेकर आप आभानेरी जा सकते हैं। यूँ तो आपने भारत की कई बावड़ियाँ देखी होंगी, किन्तु मेरा पूर्ण विश्वास है कि उनमें से कोई भी इतना छायाचित्रण योग्य नहीं होगा जितना कि यहाँ स्थित चाँद बावडी! यह एक अत्यंत सुगठित एवं गहरी बावड़ी है। इसके तीन ओर अत्यंत आकर्षक ज्यामितीय सीड़ियाँ बनी हुई हैं तथा चौथी सतह पर एक उत्कीर्णित मंडप है।

हर्षद माँ को समर्पित एक मंदिर तथा सम्पूर्ण परिसर में फैली हुई शिल्पकारियों को भी देखना ना भूलें।

और पढ़ें: चाँद बावड़ी आभानेरी की विलक्षण बावड़ी

जयपुर से चाँद बावड़ी के दर्शन करने के लिए लगभग ६-७ घंटों का समय लग सकता है। जयपुर से आने व जाने में लगभग २ घंटे तथा बावड़ी देखने के लिए कुछ घंटे पर्याप्त हैं। खेतों में से जाते हुए इन लहलहाते खेतों एवं उनमें खेती कार्य करते, चटक रंग बिरंगे वस्त्र धारण किये स्त्री-पुरुषों को भी देखना ना भूलें।

भानगढ़ दुर्ग

जयपुर के आप पास - भानगढ़ दुर्ग
भानगढ़ दुर्ग

जब आप इन्टरनेट पर विश्व के सर्वाधिक भुतहा स्थान की खोज करें तो भानगढ़ दुर्ग का नाम सर्वप्रथम उभर कर आता है। चूंकि दिन के समय यह स्थान स्थानीय, देशी एवं विदेशी पर्यटकों से भरा रहता है, अतः भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। संध्या उपरांत यहाँ भ्रमण की अनुमति नहीं है। कई जीवंत मंदिरों एवं जल स्त्रोतों से भरा हुआ यह स्थान अत्यंत आकर्षक है। यद्यपि अधिकतर संरचनाएं खँडहर में परिवर्तित हो गए हैं, तथापि इन संरचनाओं का सम्पूर्ण प्रलेखन उपलब्ध है। इन्हें पढ़कर आप कल्पना कर सकते हैं कि अपने जीवंत काल में यह गढ़ कितना संपन्न रहा होगा।

भानगढ़ जयपुर से लगभग ८० की.मी. की दूरी पर है। आगरा राजमार्ग द्वारा दौसा पहुँचने के पश्चात भानगढ़ की ओर जाते विमार्ग पर जाएँ। राजमार्ग के पश्चात मार्ग अतिउत्तम भले ही ना हो, किन्तु यह बुरा भी नहीं है।

यदि भुतहा स्थल अधिकतर लोगों के समान आपको भी रोमांचित करते हैं, तो भानगढ़ को अपने जयपुर यात्रा की कार्यक्रम सूची में अवश्य सम्मिलित करें।

यदि आपकी भानगढ़ का सूक्ष्मता से अवलोकन करने की इच्छा है, पहाड़ी चढ़ने एवं उतरने की इच्छा है अथवा इसके मन्दिरों का आनंद उठाने की इच्छा है तो ३-४ घंटे का समय आवश्यक है। इसमें छायाचित्रण का समय भी सम्मिलित है।
मेरा सुझाव है कि आप प्रातःकाल जलपान ग्रहण कर एवं दोपहर का भोजन साथ ले कर जयपुर से निकलें। भानगढ़ का दर्शन करें, तत्पश्चात संध्या जलपान के समय तक वापिस जयपुर लौट आयें।

और पढ़ें: भानगढ़ – सर्वाधिक भुतहा दुर्ग

सुझाव – यदि आप प्रातः शीघ्र ही जयपुर की ओर प्रस्थान करें तो भानगढ़ के साथ चाँद बावडी भी देख सकते हैं।

सामोद महल

समोद महल का दरबार
समोद महल का दरबार

राजस्थान के सर्वाधिक उत्कृष्ट स्थलों में से एक है यह सामोद महल। अत्यंत उत्तम रीति से इसका रखरखाव किया जाता है। एक निर्देशित भ्रमण हमें सम्पूर्ण महल की यात्रा कराता है। एक कक्ष से दूसरे कक्ष में जाते, रंगबिरंगी भित्तियों एवं उन पर की गयी सूक्ष्म चित्रकारियों को देख आपकी आँखे फटी कि फटी रह जायेंगीं। प्रत्येक भित्ति की नामूनेदार पृष्ठभूमि पर कुछ कांच का कार्य तथा कुछ चित्रकारियाँ हैं। इन भित्तियों की सुन्दरता आपको मंत्रमुग्ध कर देंगीं। इन चित्रकारियों में पौराणिक कथाओं एवं दैनन्दिनी जीवन के चित्रण के साथ राजसी परिवारों के चित्र प्रमुखता से हैं। प्रत्येक कक्ष का अपना एक रंग है, एक में लाल तो दूसरे में नीला।

इस महल की सुन्दरता को देख आप इन रंगों एवं इसकी समृद्धी में सराबोर हो जायेंगे। मैं जब भी किसी महल अथवा दुर्ग के खँडहर देखती हूँ, मेरे मष्तिष्क में एक सवाल सदैव कौंधता है। अपने जीवंत दिवसों में ये महल अथवा दुर्ग कितने समृद्ध एवं सुन्दर दिखाई देते होंगे। मुझे मेरे इस प्रश्न का उत्तर सामोद महल में प्राप्त हुआ। यदि कुछ सदियों पूर्व हमारा भारत ऐसा दिखता था तो मैं अवश्य यह आशा करूंगी कि भारत की खोयी हुई समृद्धि एवं सौंदर्य शीघ्र पुनः प्राप्त हो।

महल पहुँचने से पूर्व आपको कई रंगबिरंगी हवेलियाँ दृष्टिगोचर होंगीं। आगे जाकर आप एक ड्योढ़ी पर पहुंचेंगे जहां कई विंटेज कारें रखी हुई हैं। वहां से राजस्थानी वेशभूषा पहने, रौबदार मूंछों वाले एक सज्जन आपको सीड़ियों से ऊपर ले जायेंगे। वे आपको सम्पूर्ण महल दिखाएँगे तथा इसके विषय में जानकारी देंगे। तत्पश्चात यहाँ के जलपानगृह में आप भोजन करेंगे।

सामोद गाँव में स्थित यह एक निजी महल है जो जयपुर से लगभग ४५ की.मी. की दूरी पर है। यह संस्मरण लिखते समय तक इसका प्रवेश शुल्क १०००/- रुपये था जिसमें भोजन का खर्च सम्मिलित था।

सीकर जिले के खाटू गाँव का खाटू श्याम

खाटू का श्याम कुंड - जयपुर के आसपास
खाटू का श्याम कुंड

खाटू एक छोटी देवनगरी है जो खाटू श्याम जी के मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। सीकर जिले में स्थित यह नगरी जयपुर से उत्तर-पश्चिम दिशा में लगभग ८० की.मी. दूर है। यदि आप महाभारत एवं उनके चरित्रों में रूचि रखते हैं तो यह एक अद्वितीय मंदिर है जिसके दर्शन आपने अवश्य करने चाहिए। यह बर्बरीक को समर्पित मंदिर है। यह नाम यदि आपके लिए नवीन है तो आपको जानकारी दे दूं कि बर्बरीक पांडू पुत्र भीम का पोता एवं घटोत्कच का पुत्र है।

यूँ तो यह एक अनूठा मंदिर है, इससे सम्बंधित ऐतिहासिक मान्यताएं एवं किवदंतियां इसे अद्वितीय बनाती हैं। बर्बरीक को ‘हारे का सहारा’ अथवा हारे हुए लोगों का देवता माना जाता है। माँ आदिशक्ति की घोर तपस्या कर उन्होंने तीन अभेद बाण एवं ईशापुर्तिक वाल्मीकि को प्रसन्न कर उनसे धनुष प्राप्त किया था। वर्तमान में इस धनुष एवं त्रिबाण के सांकेतिक प्रतिरूप नगरी में सर्वत्र दृष्टिगोचर होते हैं।

और पढ़ें: खाटू श्याम – हारे का सहारा

यदि आप प्रातः शीघ्र प्रस्थान करें तथा सर्वप्रथम खाटू श्याम मंदिर के दर्शन करें तो आप खाटू श्याम एवं समोद महल के दर्शन एक ही दिवस पूर्ण कर सकते हैं। दोपहर के पश्चात जब मंदिर बंद हो जाता है, तब आप समोद महल देख सकते हैं।

सांभर झील

सांभर झील में नमक की खेती
सांभर झील में नमक की खेती

सांभर झील अथवा शाकम्भरी झील भारत की विशालतम नमकीन जल की झील है। इस झील से प्राप्त नमक भारत के विशालतम राज्य, राजस्थान में नमक की सम्पूर्ण आवश्यकता की पूर्ति करता है। झील के आसपास पक्षियों एवं कीटों की कई प्रजातियाँ पायी जाती हैं। मानसून के समय यहाँ फ्लेमिंगो अर्थात् राजहंस भी दिख जाते हैं।

मेरे लिए इस झील का एक अन्य महत्व यह भी है कि इस स्थल का उल्लेख महाभारत जैसे महाकाव्य में भी पाया जाता है। इसी स्थान में शाकम्भरी देवी का मंदिर भी है। शाकम्भरी देवी राजस्थान के राजपूतों के चौहान वंश की अधिष्ठात्री देवी है।

पुरातात्विक दृष्टि से भी इसका अत्यंत महत्व है क्योंकि इस स्थान पर नालियासर नामक प्राचीन स्थल है। आप तो जानते ही हैं कि प्राचीन स्थल मुझे अत्यंत आकर्षित करते हैं। किन्तु सांभर झील पर मुझे कुछ ही क्षण व्यतीत करने का अवसर प्राप्त हुआ था। अतः इस प्राचीन स्थल का विस्तृत अवलोकन अभी शेष है।

सांभर झील जयपुर के दक्षिण पश्चिम दिशा में लगभग ९५ की.मी. की दूरी पर स्थित है। मेरे अनुमान से प्रातः मुँह अँधेरे जयपुर से निकल सर्वप्रथम झील के आसपास पक्षियों को खोजें। तत्पश्चात झील एवं विरासती धरोहर का अवलोकन करें। यदि आप शान्ति से, बिना हड़बड़ी के भी इन्हें देखें तो सांभर झील एवं इसकी धरोहर को निहारने में एक सम्पूर्ण दिवस पर्याप्त है।

सांगानेर – वस्त्र उद्योग की नगरी

जयपुर के आसपास दो वस्त्र-उद्योग नगरी हैं, सांगानेर एवं बगरू। सांगानेर जयपुर से लगभग १५-२० की.मी. दूर है।

सांगानेर और बगरू में कपडे छपाई का काम
सांगानेर और बगरू में कपडे छपाई का काम

यदि आप भारतीय वस्त्रों, विशेषतः राजस्थानी ठप्पा छपाई के वस्त्रों में रूचि रखते हैं तो आपने सांगानेर एवं बगरू, इन दो ठप्पा छपाई के प्रकारों के विषय में अवश्य सुना होगा। जैसे आन्ध्र प्रदेश के कुचिपुड़ी गाँव से कुचिपुड़ी नृत्य के नाम की व्युत्पत्ति हुई है, ठीक वैसे ही सांगानेर नगरी के नाम पर सांगानेरी छपाई का नाम पड़ा। अब इसे जीआई टैग अर्थात् भौगोलिक संकेत भी प्राप्त हो गया है। सांगानेर हस्तनिर्मित कागज उद्योग के लिए भी प्रसिद्ध है।

सांगानेर जैन धर्म के अनुयायियों का तीर्थ स्थल है। यहां कई प्राचीन जैन मंदिर हैं। राजस्थान के रणकपुर एवं दिलवाड़ा मंदिर जैसे जैन मंदिर अपने सूक्ष्म शिल्पकारियों के लिए अत्यंत प्रसिद्ध हैं। सांगानेर में मंदिर लाल बलुआ पत्थर से बने हैं।

सांगानेर की ठप्पा छपाई अपने उत्कृष्ट नमूनों एवं रूपरेखा के लिए प्रसिद्ध है। कई वर्षों पूर्व मैंने सांगानेर का भ्रमण किया था। उस समय मैंने वहां से ठप्पा छपाई से सजी चादरें खरीदी थीं जिसका उपयोग मैं आज भी करती हूँ। यदि आपको ठप्पा छपाई से अलंकृत चादरें अथवा कपड़े पसंद हैं तो इनकी खरीदी हेतु सर्वोत्तम स्थल सांगानेर ही है जहां आप खरीदी के साथ साथ छपाई का कार्य भी प्रत्यक्ष देख सकते हैं।

बगरू – वस्त्र एवं चमड़ा उद्योग नगरी

चमड़े की रंगीन चप्पलें
चमड़े की रंगीन चप्पलें

बगरू भी सांगानेर के सामान हस्त छपाई के कार्य के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन उनमें एक विशेष अंतर है। वह अंतर है उनकी रूपरेखा व आकृतियों में जो सांगानेर से भिन्न हैं। यहाँ नील के रंग एवं पुष्पाकृतियों का प्रयोग बहुतायत में किया जाता है। बगरू चमड़े के लघु उद्योग के लिए भी जाना जाता है। अतः चमड़े से बनी वे रंगबिरंगी जुत्तियाँ एवं थैलियाँ जिन्हें आप जयपुर स्मारिकाओं के रूप में खरीदते हैं, कदाचित वे बगरू में ही निर्मित की गयी हों।

यदि आप इन वस्त्र एवं चमड़ा उद्योग में कार्यरत कारीगरों से भेंट करना चाहते हों तो बगरू से उत्तम स्थान कोई नहीं।
अन्य प्राचीन नगरियों के सामान बगरू में भी एक दुर्ग है, किन्तु यह एक निजी दुर्ग है। केवल कुछ त्योहारों में ही इसे जनता के किये खोला जाता है।

बगरू जयपुर से ३२ की.मी दूर है। यहाँ आप कितना समय व्यतीत करते हैं, यह आपके ऊपर निर्भर है।

सुझाव – जयपुर से एक-दिवसीय यात्रा के रूप में आप सांगानेर एवं बगरू के दर्शन एक ही दिवस में पूर्ण कर सकते हैं।

आमेर दुर्ग एवं नगरी

आमेर दुर्ग का गणेश पोल
आमेर दुर्ग का गणेश पोल

जो भी यात्री जयपुर के आसपास भ्रमण के लिए आते हैं, उनमें अधिकतर यात्री आमेर दुर्ग के दर्शन भी अवश्य करते हैं। इस दुर्ग के विषय में कई कथाएं एवं मान्यताएं प्रसिद्ध हैं। प्रशिक्षित गाइड आपको कई कथाएं सुनाएगा। किन्तु मुझे इन कथाओं का अधिक आनंद प्राप्त हुआ संध्याकाल में आयोजित प्रकाश एवं ध्वनी कार्यक्रम में जिसका आयोजन दुर्ग के भीतर किया जाता है। अन्धकार में प्रकाश का अद्भुत प्रयोग कर,लोक संगीत से ओतप्रोत ये कथाएं आमेर दुर्ग स्वयं आपको सुनाती है।

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जब आप आमेर दुर्ग की प्राचीर से नीचे देखेंगे, आपको कई मंदिरों के ऊंचे ऊंचे शिखरों से भरा आमेर नगर दृष्टिगोचर होगा। गाइड ने हमें बताया कि आमेर में ३६५ मंदिर हैं, वर्ष के प्रत्येक दिवस हेतु एक मंदिर। कहने का अर्थ है मंदिरों से भरा यह एक प्राचीन नगर है।

आमेर की सड़कों पर चलकर आप चँवर पालखीवालों की हवेली पहुंचेंगे। वर्तमान में इस हवेली का जीर्णोद्धार किया गया है। इस हवेली में ‘अनोखी संग्रहालय’ है जहां भारत के कई भागों के, मुख्यतः राजस्थान के वस्त्र उद्योग एवं उनकी परंपराओं का प्रदर्शन किया गया है। इन वस्त्रों से आप इनको धारण करने वाली स्त्रियों के विषय में जान सकते हैं। जैसे यह स्त्री विवाहित, अविवाहित अथवा विधवा है। इस धरोहरी विरासत का किस प्रकार पुनर्नवीनीकरण किया गया, इस सम्पूर्ण प्रक्रिया का भी उत्कृष्ट प्रकार से प्रदर्शन किया गया है। इसकी वर्तमान संरचना एवं नवीनीकरण के विभिन्न चरणों को समझना अत्यंत आनंददायी है। यद्यपि यहाँ की सीड़ियाँ अब भी उतनी ही ऊंची हैं जैसी की पूर्व में थीं।

अजमेर

अजमेर का जैन लाल मंदिर
अजमेर का जैन लाल मंदिर

अजमेर जयपुर से सड़क मार्ग द्वारा लगभग १२० की.मी. दूर है। यहाँ पहुँचने में लगभग २ घंटों का समय लगता है। यद्यपि आप जयपुर में रहते हुए अजमेर की एक-दिवसीय यात्रा कर सकते हैं, तथापि इसके विस्तृत अवलोकन के लिए मेरा सुझाव यही होगा कि आप अजमेर अथवा पुष्कर में ठहरें।

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अधिकतर पर्यटकों की अजमेर यात्रा केवल दरगाह तक ही सीमित होती है, किन्तु मैंने अजमेर में देखने एवं अनुभव करने हेतु कई अन्य स्थल खोज निकाले। इनमें दो सुन्दर झीलें तथा एक अद्भुत सौन्दर्ययुक्त जैन मंदिर, सोनीजी की नसिया, सम्मिलित हैं। इस जैन मंदिर में ब्रम्हांड के प्रतिरूप की रचना भी की गयी है।

पुष्कर – पवित्र झील की नगरी

प्रसिद्द एवं प्राचीन पुष्कर झील
प्रसिद्द एवं प्राचीन पुष्कर झील

अनेक मंदिरों एवं प्रसिद्ध पुष्कर झील की नगरी, पुष्कर भी आपके एक दिवस का अधिकारी अवश्य है। यद्यपि आप अजमेर एवं पुष्कर दोनों को एक साथ, एक-दिवसीय यात्रा के रूप में कर सकते हैं, तथापि न्यायसंगत पुष्कर यात्रा करने के लिए इसे अकेले ही, जयपुर से एक-दिवसीय यात्रा के रूप में भ्रमण कर, देख सकते हैं।

और पढ़ें: पुष्कर झील का रहस्य

इन स्थलों के अतिरिक्त आप अलवर एवं रणथंबौर का भी जयपुर से एक-दिवसीय यात्रा के रूप में भ्रमण कर सकते हैं। यद्यपि मैं इन दोनों स्थलों के दर्शन दो भिन्न दिवसीय यात्रा के रूप में पूर्ण करना चाहूंगी।

क्या आप जयपुर के आसपास इनके अतिरिक्त किसी अन्य एक-दिवसीय भ्रमण के विषय में जानते हैं?

यदि आप जयपुर के आसपास किसी अन्य पर्यटन स्थल के विषय में जानते हैं जिसे जयपुर में ठहर कर एक-दिवसीय यात्रा के रूप में पूर्ण किया जा सकता है? मैं उनके विषय में जानने हेतु अतिउत्सुक हूँ।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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दिल्ली श्रीनगर लेह सड़क यात्रा – जहां मार्ग ही लक्ष्य बन जाता है! https://inditales.com/hindi/dilli-srinagar-leh-sadak-yatra/ https://inditales.com/hindi/dilli-srinagar-leh-sadak-yatra/#comments Wed, 22 May 2019 02:30:09 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=1482

सम्पूर्ण विश्व में ऐसे पर्यटकों की संख्या बहुत अधिक है जिन्हें सड़क यात्रा द्वारा पर्यटन के रोमांच का अनुभव करना अत्यधिक प्रिय है। ऐसे यात्रियों की संख्या अब भारत में भी तेजी से बढ़ रही है। फिर चाहे वह दुपहिया वाहन द्वारा हो या चौपहिया वाहन द्वारा। उन सब यात्रियों के लिए सड़क मार्ग द्वारा […]

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सम्पूर्ण विश्व में ऐसे पर्यटकों की संख्या बहुत अधिक है जिन्हें सड़क यात्रा द्वारा पर्यटन के रोमांच का अनुभव करना अत्यधिक प्रिय है। ऐसे यात्रियों की संख्या अब भारत में भी तेजी से बढ़ रही है। फिर चाहे वह दुपहिया वाहन द्वारा हो या चौपहिया वाहन द्वारा।

दिल्ली श्रीनगर लेह सड़क यात्रा उन सब यात्रियों के लिए सड़क मार्ग द्वारा दिल्ली श्रीनगर लेह सड़क यात्रा करना किसी स्वप्न के पूर्ण होने से कम नहीं। इस क्रम में यदि लेह – मनाली मार्ग भी जुड़ जाए तो सोने पर सुहागा। इस मार्ग में दृष्ट परिदृश्य सुन्दरता की पराकाष्ठा है। इसे सुन्दरता की परिभाषा भी कहा जाय तो कदाचित अतिशयोक्ति नहीं होगी। सम्पूर्ण मार्ग में परिदृश्यों का जादुई परिवर्तन मंत्रमुग्ध कर देता है।

कहीं पंजाब के हरे-भरे खेत तो कहीं कश्मीर की नदियों से सिंचे घास के विस्तृत मैदान। और अचानक सम्पूर्ण हरियाली लद्दाख के शीत मरुस्थल में परिवर्तित हो कर विशाल सपाट पर्वतों पर विभिन्न रंगों के उतार चढ़ाव में हमें तल्लीन कर देती है।

झेलम नदी पे पुल
राहें हैं तो पुल भी होंगे

कहीं जीभ के चटोरेपन को शांत करते सड़क किनारे उपस्थित ढाबे तो कहीं मन को शान्ति प्रदान करते बौद्ध मठ अर्थात् गोम्पा। इन्ही सब का आनंद उठाने की मेरी भी अभिलाषा थी। मेरा स्वप्न पूर्ण हुआ जब लद्दाख के खरदुंगला में सर्वोच्च स्थल पर संस्मरण लेखकों के एक अधिवेशन में भाग लेने का मुझे निमंत्रण मिला।

एक ब्लॉग्गिंग पर्यटन के अंतर्गत दिल्ली से श्रीनगर एवं लेह होते हुए लद्दाख के खरदुंगला दर्रे तक सड़क मार्ग से पहुँचना था। परन्तु मार्ग में ही स्वास्थ्य बुरी तरह बिगड़ने के कारण मैं अपनी यात्रा पूर्ण नहीं कर पाई एवं लेह से ही मुझे वापिस लौटना पड़ा। अर्थात् मेरा स्वप्न केवल अर्धसत्य हुआ है। शेष स्वप्न भविष्य में पूर्ण करने की तीव्र इच्छा मन में लिए भारी मन से घर लौटना पड़ा था। तथापि दिल्ली से लेह तक की सड़क यात्रा भी मेरे लिए एक बड़ी उपलब्धि थी जिसका अनुभव मैं आपके साथ बांटना चाहती हूँ।

दिल्ली श्रीनगर लेह सड़क यात्रा

इस यात्रा का आरम्भ करने हेतु जैसे ही मैं दिल्ली पहुंची, सड़क के एक ओर खड़े कुछ काँवड़ियों पर मेरी दृष्टी जा टिकी। अचानक इस तथ्य से साक्षात्कार हुआ कि श्रावण मास आरम्भ हो चुका है। अर्थात् यह सड़क यात्रा वास्तव में मानसून सड़क यात्रा सिद्ध होने वाली है। ठीक उसी तरह, जिस तरह पिछले वर्ष मैंने कोंकण समुद्रतट की सड़क यात्रा की थी।

सड़क यात्रा का दिल्ली–जम्मू भाग

दिल्ली से हमारी टोली ज्यों ही निकली, हमारी मोटर दिल्ली के सडकों के यातायात संकुलन में फंस गयी। इसकी पूर्व कल्पना टोली के किसी भी सदस्य ने नहीं की थी। इसीलिए इससे बाहर निकलने हेतु सदस्यों में सामंजस्य भी स्थापित नहीं था। जितने लोग, उतनी सलाहें! इस यातायाय संकुल से बाहर निकलना इस दिन की सबसे बड़ी चुनौती सिद्ध हुई।

ढाबे के परांठे माखन के साथ
ढाबे के परांठे माखन के साथ

हमने अपने कान पकड़ लिए और निश्चय किया कि भविष्य में दिल्ली व इसकी तरह के अन्य महानगरों की सडकों पर समय एवं ऊर्जा की बचत करने हेतु मंडली के सदस्यों में पूर्व सामंजस्य स्थापित किया जाएगा। एक बार दिल्ली से बाहर निकल गए कि आप आवश्यकता अनुसार किसी ढाबे में अल्पविराम ले सकते हैं।

इस सड़क पर नियमित यात्रा करने वाले कई पर्यटकों की यह सलाह रहती है कि भोजन हेतु मुरथल के प्रसिद्द ढाबों में ही रुकें। किन्तु आप सड़क किनारे उन छोटे ढाबों में भी रुक सकते है जहां ट्रक चालक सदा रुकते हैं। यहाँ आपको ताजा एवं स्वादिष्ट भोजन उपलब्ध होगा, साथ ही समय की भी बचत होगी। रही बात स्वच्छता की तो वह आप स्वयं जांच सकते हैं, क्योंकि छोटे ढाबे आपके समक्ष ही भोजन तैयार करते हैं।

रास्ते में पानीपत पहुंचते ही इतिहास में पढ़े उन सभी युद्धों का स्मरण हो आया। परन्तु यहाँ मुझे केवल बड़े बड़े विज्ञापन-पट दृष्टिगोचर हुए जो पचरंगा आचार एवं कई तरह की पाचक गोलियों का विज्ञापन कर रहे थे।

चाय पीने की इच्छा हुई तो निश्चय किया कि अम्बाला में रुक कर चाय पियेंगे। हमने जैसे ही सतलुज नदी को पार किया, मेरा मन अपने जन्मस्थल अंबाला के समीप पहुँचने के विचार से पुलकित हो उठा था। सोचा चाय भी पियेंगे एवं कुछ छायाचित्र भी खींचेंगे। परन्तु यह क्या हुआ? हमें कुछ समझ आये, इसके पूर्व ही एक हवाई मार्ग हमें अम्बाला में प्रवेश पूर्व ही उसके ऊपर से होते हुए दूर ले गया।

इसी तरह लुधियाना, जालंधर एवं फगवाड़ा में भी हमारी यही स्थिति रही। तत्पश्चात हमारी भूख हमारी सहनशक्ति के परे हो गयी और हम राजमार्ग के किनारे स्थित एक ढाबे में भोजन हेतु रुक गए। भोजन स्वादिष्ट तो था ही, साथ ही एक अरसे के पश्चात पंजाबी में वार्तालाप कर अत्यंत आनंद प्राप्त हुआ। हमारी टोली में भी कई पंजाबी भाषी प्रकट हो गए। पंजाब में पंजाबी बोलने के पश्चात लगा कि मैं सच में पंजाब वापिस पहुंची हूँ।

जम्मू की ओर कूच

पेट पूजा निपटाकर हम जम्मू की ओर कूच करने निकल पड़े। जैसा कि आप सब जानते हैं, पंजाब राज्य का नामकरण उसकी पांच नदियाँ- सतलुज, व्यास, रावी, चिनाब एवं झेलम नदियों पर आधारित है। श्रीनगर पहुँचने तक मुझे इन पाँचों नदियों को पार करने की प्रतीक्षा थी। जम्मू पहुँचने से पूर्व, इनमें से दो नदियाँ, व्यास नदी एवं रावी नदी को हमने पार कर लिया था। अर्थात् अम्बाला से श्रीनगर तक हम पंजाब के कई भागों से गुजरने वाले थे।

राह में हमने कई देसी खाद्य पदार्थों का आस्वाद लिया। गर्म रेत पर भुने भुट्टे अथवा छल्ली, मुरुंडा अर्थात् मुरमुरे से बनी बर्फी एवं ताजे तोड़े जामुन खा कर पुराने दिनों का स्मरण हो आया।

जब तक जम्मू पहुंचते, अँधेरा छाने लगा था। अगले दिन, प्रातः सूर्योदय से पूर्व हमें जम्मू से विदा होना था।

इतने कम अवकाश में भी मैं यहाँ एक पुराने मित्र से भेंट कर सकी। मैंने उन्हें आश्वासन दिया कि अगली बार पर्याप्त समय के साथ जम्मू भ्रमण हेतु अवश्य आऊँगी।

जम्मू से श्रीनगर यात्रा

जम्मू से हम प्रातः शीघ्र प्रस्थान कर गए ताकि समय रहते हम सोनमर्ग पहुँच जाएँ। निरंतर बरसती वर्षा एवं कुछ दिनों पूर्व ही इस मार्ग पर अमरनाथ यात्रियों पर हुए आतंकी हमले ने हमें कुछ चिंतित कर दिया था। साथ ही जम्मू कश्मीर मार्ग पर निर्मित प्रसिद्ध सुरंगी मार्गों से जाने का उत्साह भी कुछ कम नहीं था। विशेषतः ९.२८ की.मी. लम्बाई युक्त, विश्व की सर्वाधिक लंबी एवं कुछ दिनों पूर्व ही खुली, चेनानी-नाशरी सुरंग या पटनी टॉप सुरंग को पार करने हेतु हम सब प्रतीक्षारत थे। यह सुरंगी मार्ग उधमपुर जिले के चेनानी को रामबन जिले के नाशरी से जोड़ती है।

उधमपुर पहुंचने से पूर्व हम सड़क के किनारे स्थित ढाबे में परांठे खाने रुके। तेल में तले एवं ढेर सारे शुद्ध मक्खन के साथ परोसे गए परांठों ने पहले तो हमें भयभीत किया। परन्तु जैसे ही इन्हें खाना आरम्भ किया, अभूतपूर्व स्वाद का आनंद रोके नहीं रुक रहा था। मन को समझाया कि कभी कभी इस तरह के गरिष्ठ खाने का स्वाद लेना इतना हानिकारक तो नहीं होगा।

अंततः हमारी प्रतीक्षा का अंत हुआ और हम चेनानी-नाशरी सुरंग पर पहुंचे। सम्पूर्ण सुरंग हमने हाथों में कैमरे लिए, चित्र खींचते पार की। तत्पश्चात वर्ष ऋतू में मटमैली हुई चिनाब नदी के किनारे किनारे गाडी चलाते हम रामबन पहुंचे। यहाँ हमारे उत्साह को जैसे ग्रहण लग गया। भूस्खलन के कारण आगे रास्ता बंद था। कुछ क्षण प्रतीक्षा करने के उपरांत रामबन में ही रात बिताने का निश्चय किया।

अनपेक्षित रुकावट

रामबन में चेनाब नदी
रामबन में चेनाब नदी

भूस्खलन द्वारा बंद रास्तों के कारण रामबन रेजीडेंसी होटल में रुकना तय हुआ। होटल साधारण था। तथापि होटल से चिनाब नदी का दृश्य अद्भुत था। पहाड़ों के पीछे मुड़ती चिनाब नदी मुझे आकर्षित करने लगी। मैंने नदी के किनारे कुछ समय पदभ्रमण किया। कई चित्र भी खींचे। रामबन के स्वच्छ वातावरण को आत्मसात किया।

रामबन में आये अप्रत्याशित रुकावट के कारण हमारी सम्पूर्ण योजना अस्त-व्यस्त हो सकती थी। अतः हमने प्रातः बड़ी जल्दी अपनी राह पकड़ ली। आज के गंतव्य को सोनमर्ग से परिवर्तित कर कारगिल तय किया। अर्थात् हमारा आज का दिन अत्यधिक लम्बा होने वाला था। क्यों ना हो! समय को जीतने का लक्ष्य जो था।

अनंतनाग के आस पास कश्मीर घाटी
अनंतनाग के आस पास कश्मीर घाटी

बनिहाल पार करते से ही रास्ते के दोनों ओर क्रिकेट के बल्ले बनाने के कारखाने दिखे। सम्पूर्ण परिदृश्य अत्यंत मनोहारी एवं सम्मोहक था। परन्तु समयाभाव के रहते,वहां रुक कर उसका आनंद लेना संभव नहीं था। अंततः अनंतनाग पहुँच कर ही हमने एक अल्पविराम लिया। टायटेनिक प्रेक्षण स्थल से चारों ओर फैले परिदृश्य का आनंद उठाया। यह स्थान वसंत ऋतु में दृष्ट परिदृश्यों के लिए अति प्रसिद्ध है। कदाचित उसका आनंद उठाने किसी वसंत ऋतु में मुझे पुनः अनंतनाग के दर्शन करने का अवसर प्राप्त हो।

श्रीनगर की डल झील में शिकारा
श्रीनगर की डल झील में शिकारा

श्रीनगर पहुंचते ही वातावरण में एक अनदेखे तनाव का आभास हुआ। अधिकतर संस्थान बंद थे एवं बाहर लोगों की उपस्थिति भी बहुत कम थी। डल झील के किनारे थोड़ी देर रुक कर उसकी सुन्दरता को निहारते रहे। यहाँ भी कोई अन्य पर्यटक उपस्थित नहीं था। झील में तैरते इक्के दुक्के शिकारे परिदृश्य को और भी उदास एवं रहस्यमय बना रहे थे।

श्रीनगर–कारगिल भाग – दिल्ली श्रीनगर लेह सड़क यात्रा

सोनमर्ग के पास सिंद नदी पे पुल
सोनमर्ग के पास सिंद नदी पे पुल

श्रीनगर से हम गांदेरबल जिले की ओर बढ़े। इस जिले का मुख्य आकर्षण है, लोकप्रिय पर्वतीय पर्यटन स्थल सोनमर्ग। श्रीनगर से सोनमर्ग तक का सड़क मार्ग इस यात्रा का सर्वाधिक सुरम्य स्थल था। झेलम नदी की मुख्य सहायक नदी, सिन्धु नदी, श्रीनगर की ओर बढ़ रही थी। हम इसके ठीक विपरीत दिशा में जा रहे थे। क्षितिज पर हिमनद प्रकट होने आरंभ हो गए थे।

हिमनदों का शनैः शनैः पिघलकर नदी में मिलन, जल की निरंतर यात्रा का बखान कर रहा था। त्रिकोणीय आकार के हिमनद किस तरह बूँद बूँद जल नदियों में भरते हैं, यह अत्यंत कुतुहलपूर्ण लुभावना दृश्य था। प्रत्येक क्षण अपने आप को खो कर किसी का अस्तित्व निर्माण करना, यही गाथा है जल की!

दिल्ली श्रीनगर लेह सड़क यात्रा पर हिमनद
दिल्ली श्रीनगर लेह सड़क यात्रा पर हिमनद

हरे भरे व्यापक घास के मैदानों के समक्ष स्थित जलपानगृह में हमने भोजन किया। मैदान में कई खच्चर अपने मालिकों समेत हम जैसे पर्यटकों की प्रतीक्षा में खड़े हुए थे। उन में से कुछ ने हमें समझाने का प्रयत्न किया की कश्मीर पर्यटन के लिए अत्यंत सुरक्षित स्थान है। यहाँ बिना किसी भय के भ्रमण किया जा सकता है। हम आपको अपने रमणीय स्थलों के दर्शन करवाएंगे। उनके शब्दों में भय एवं भरोसा दोनों का मिला जुला अर्क था। आशा करती हूँ उनके शब्द शीघ्र ही सत्य सिद्ध हों।

बालताल में अमरनाथ यात्रा शिविर

सोनमर्ग की बस्तियां पार करते ही जैसे ही हमारी दृष्टी घाटी की ओर गयी, हमारी आँखे फटी की फटी रह गयी। सिन्धु नदी के मोड़ पर अमरनाथ यात्रियों के लिए अतिविशाल शिविर लगाया गया था। वह ऐसा दृश्य था कि रुक कर उसे मनभर निहारने की आवश्यकता थी।

बालताल में अमरनाथ यात्रियों के शिविर
बालताल में अमरनाथ यात्रियों के शिविर

पहाड़ पर से वह शिविर किसी शिशु के सामने रखे खिलौने से प्रतीत हो रहे थे। चारों ओर रंगबिरंगे तम्बू लगे हुए थे। हेलिकॉप्टर निरंतर यात्रियों को लेकर आवाजाही कर रहे थे। हालांकि यह सुविधा उन्ही यात्रियों हेतु उपलब्ध थी जो चढ़ने में असमर्थ थे या चढ़ना नहीं चाहते थे। इस दृश्य को आत्मसात करने हेतु मुझे कुछ क्षण लगे।

जम्मू से लेकर राजमार्ग ४४ तक एवं इससे कई अधिक बनिहाल के पश्चात मैने कई भंडारे देखे थे। परन्तु बालताल शिविर की विशालता एवं उससे कहीं अधिक यात्रियों की संख्या ने मुझे अचंभा कर दिया था। मैंने स्वप्न में भी इसकी कल्पना नहीं की थी।

खराब मौसम और निरंतर बने आतंकी हमले के खतरे के पश्चात भी इस श्रद्धालुओं की भक्ति टस से मस नहीं हुई। यह देख इन्हें शत शत नमन करने की इच्छा हुई। आज भी जब मुझ उस दृश्य का स्मरण होता है, मुझे सब अवास्तविक सा प्रतीत होता है।

बालताल का यह शिविर उन अमरनाथ यात्रियों हेतु बनाया गया था जो सोनमर्ग की ओर से अमरनाथ तक की यात्रा करना चाहते थे। मुझे पूर्ण विश्वास है कि ऐसा ही अतिविशाल शिविर चन्दनबाड़ी की ओर भी लगाया गया होगा।अमरनाथ यात्रा मेरे लिए सदैव सुदूरवर्ती यात्रा प्रतीत होती थी। उस समय वहां खड़े ऐसा आभास हो रहा था जैसे मैं इस यात्रा का भाग ना होते हुए भी इसका एक भाग थी।

मेरा मन मुझे उसी क्षण इस यात्रा के लिए प्रेरित करने लगा एवं उस शिवलिंग के दर्शन हेतु आतुर होने लगा जो हिन्दू पंचांग के केवल श्रावण माह में ही प्रकट होते हैं। किन्तु मेरे मष्तिष्क ने मुझे आभास कराया कि इस क्षण मैं किसी और यात्रा का भाग हूँ। इस यात्रा की ओर मेरा कुछ उत्तरदायित्व है। भारी ह्रदय से अपने आप को संभालते हुए मन ही मन शिवजी की आराधना की एवं अन्य सदस्यों के साथ सोनमर्ग से आगे बढ़ गए। हमारा अगला लक्ष्य था जोजिला दर्रा।

जोजिला दर्रा

जोजिला दर्रा - दिल्ली श्रीनगर लेह सड़क यात्रा
जोजिला दर्रा

जोजिला दर्रा विश्व के सर्वोच्च दर्रों में से एक है। किन्तु आज भी मुझे इसका स्मरण हलके धूसर रंग के दलदली मार्ग के रूप में होता है, जो चारों ओर स्थित धूसर पर्वतों में विलीन होता प्रतीत हो रहा था। हम हिमनद की दीवारों के बीच से होते हुए आगे बढे थे किन्तु उस पर धुल मिट्टी जमी होने के कारण उसका रंग भी शेष परिदृश्य से मेल खा रहा था।

हिमनद की दीवारें
हिमनद की दीवारें

इस परिदृश्य को शांति से निहारने हेतु हमने एक स्थान पर गाड़ी रोकी। वहीं समीप कुछ परिचालक पर्यटकों को बर्फ की गाडी पर बिठाकर फिसलने का आनंद दिला रहे थे। चारों ओर से बर्फीली हवाओं का तेज झोंका आ कर हमें अन्दर तक कंपा रहा था। अचानक मुझे अतिशीत वातावरण की अनुभूति होने लगी। ठिठुरन से बचने हेतु हमने गर्म गर्म चाय का आस्वाद लिया। समुद्रतल से अत्यंत ऊंचाई पर आ जाने के कारण वायु अत्यंत हलकी एवं विरल हो चुकी थी। और यहीं से आरम्भ हुआ मेरी दिल्ली-श्रीनगर-लेह सड़क यात्रा का अंत।

महत्त्वपूर्ण जानकारी – विशाल जोजिला दर्रा चढ़ने से पूर्व सोनमर्ग में एक रात्री विश्राम कर तन को अत्यधिक ऊंचाई से अभ्यस्त होने का पर्याप्त समय दें।

जोजिला दर्रे से उतर कर हम कारगिल की ओर बढ़े जहां हमारा रात्रि विश्राम निश्चित था। राह में ‘टाइगर’ पर्वत से समीप द्रास युद्ध स्मारक के दर्शनार्थ एक लघु विश्राम लिया।

द्रास युद्ध स्मारक पर मेरा सविस्तार संस्मरण पढ़ें।

द्रास नदी किनारे स्थित कारगिल

द्रास नदी के किनारे बसा कारगिल शहर
द्रास नदी के किनारे बसा कारगिल शहर

द्रास नदी के किनारे स्थित कारगिल मेरी पूर्वकल्पना से कहीं अधिक विशाल नगर था। विश्रामगृह में एक फलक पर दर्शाए, कारगिल में करने लायक ४० गतिविधियों की सूची पर मेरी दृष्टी पड़ी। परन्तु इनका आनंद लेने हेतु ना तो हमारे पास समय था ना ही वह हमारी योजना का हिस्सा था। अन्यथा मैंने इन्हें इस संस्मरण का भाग अवश्य बनाया होता।

कारगिल में यात्रियों के पद चिन्ह
कारगिल में यात्रियों के पद चिन्ह

दुपहिया वाहन द्वारा सड़क यात्रा करने वाले पर्यटकों का दिल्ली-श्रीनगर-लेह मार्ग प्रिय सड़क यात्रा है। अतः विश्रामगृह में अनेक फलकों पर विभिन्न दुपहिया वाहन पर्यटकों के समूहों की चिप्पियाँ लगी हुई थीं। लेह को छोड़कर, केवल कारगिल में ही पर्यटन का सक्रियता से प्रचार हो रहा था। मैंने निश्चय किया कि मैं पर्याप्त समय लेकर कारगिल का भ्रमण करने अवश्य आऊँगी।

कारगिल से लेह

लद्दाख का ठंडा मरुस्थल
लद्दाख का ठंडा मरुस्थल

कारगिल में रात्री विश्राम के पश्चात, दूसरे दिवस हमने लेह की ओर कूच किया। अच्छी धूप खिली हुई थी। चारों ओर प्रसन्नचित्त वातावरण था। इधर उधर बलखाती सड़क पर हमारी गाड़ी दौड़ रही थी। रास्ते के प्रत्येक वक्र के पश्चात एक नवीन परिदृश्य हमारे सम्मुख प्रस्तुत हो जाता था।

कभी चारों ओर हरियाली दृष्टिगोचर होती थी तो अचानक एक मोड़ के पश्चात उजाले रंग के सपाट पत्थर के पर्वत से सामना हो जाता था। कहीं कहीं पत्थरों के पीछे से झांकती हरियाली हमारा ध्यान खींचने का प्रयत्न कर रही थी। इस परिवेश में ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो हम स्वर्ग के विभिन्न आयामों के दर्शन कर रहे थे।

मुलबेख गोम्पा

मुल्बेक मठ में मैत्रयी बुद्ध की प्रतिमा
मुल्बेक मठ में मैत्रयी बुद्ध की प्रतिमा

हमारी यात्रा का यह पहला ऐसा पड़ाव था जो विशेषतः छायाचित्रिकरण हेतु लिया गया था। एक सीधी चट्टान के ऊपर निर्मित यह एक सुन्दर किन्तु छोटा सा गोम्पा था। वहां की विशेषता थी आगामी बुद्ध अर्थात् मैत्रेयी बुद्ध की प्रतिमा जो चट्टान को उत्कीर्णित कर बनायी गयी थी। इसके चारों ओर बना मंदिर अपेक्षाकृत नवीन था। गोम्पा की दीवारों पर प्राचीनकाल के अभिलेख छपे थे जो इस मार्ग को प्राचीनता की सुषमा प्रदान कर रहे थे। यह प्रमाणित कर रहे थे कि प्राचीनकाल से यात्री इस मार्ग से प्रवास करते आ रहे हैं।

मुल्बेक मठ की दीवार
मुल्बेक मठ की दीवार

अन्य मठों की तरह यह गोम्पा भी रंगबिरंगी पताकाओं एवं दीवारों से सुसज्जित था। बाहरी दीवारों पर इस गोम्पा के दानकर्ताओं के नाम खुदे हुए थे। लद्दाख के नीरस परिप्रेक्ष्य को अनगिनत प्रार्थना पताकाएं, रंगों से सजा रही थीं।

नामिका ला एवं फोतू ला दर्रा

इन दो पहाड़ी दर्रों पर भी छायाचित्रिकरण हेतु अवकाश लेना तय था। परन्तु अब तक मेरा स्वास्थ्य अधिक बिगड़ चुका था। अतः मैंने गाड़ी में ही बैठे रहना उचित समझा। इन दोनों दर्रों के विषय में मेरी स्मृति में केवल तेज पवन के झोंके अंकित हैं जिसमें वहां उपस्थित प्रत्येक वस्तु फड़फड़ा रही थी।

नामिका ला दर्रा - लद्धाख
नामिका ला दर्रा – लद्धाख

इसके पश्चात हम लामायुरु होते हुए जांस्कर नदी एवं सिन्धु नदी के संगम पर पहुंचे। चूंकि मेरी शीत ऋतू में की गयी लद्दाख यात्रा के समय मैं इस भाग का भ्रमण कर चुकी थी, इस यात्रा के इस भाग को मैंने अधिकतर गाड़ी में विश्राम करते व्यतीत किया। शीत ऋतू की यात्रा के समय मेरी स्मृति पटल पर अंकित जांस्कर नदी के स्वच्छ चटक नीले रंगों को वर्षा ऋतू की इस मटमैली नदी में परिवर्तित नहीं करना चाहती थी।

और पढ़ें – लेह लद्धाख – कडकडाती सर्दियों में  

फाटू ला दर्रा - लद्धाख
फाटू ला दर्रा – लद्धाख

लेह, जिसने जनवरी के शीत मास में मुझे शान्ति एवं सुरम्य वातावरण प्रदान किया था, अब जून के महीने में मछली बाजार सदृश प्रतीत हो रहा था। रास्ते गाड़ियों से अटे पड़े थे। चारों ओर इतनी संख्या में पर्यटक थे, एक क्षण मझे प्रतीत हुआ कि मैं वापिस दिल्ली पहुँच गयी हूँ।

लामयुरु मठ - लद्धाख
लामयुरु मठ – लद्धाख

हमारी दिल्ली श्रीनगर लेह सड़क यात्रा में लेह हमारा मध्यभागी पड़ाव निश्चित था। इसके पश्चात हमें खरदुन्गला दर्रा, नुब्रा घाटी, लद्दाख की नदियाँ, तत्पश्चात मनाली होते हुए दिल्ली वापिस लौटना था। किन्तु बिगड़े स्वास्थ्य के कारण मुझे यात्रा बीच में त्यागकर, लेह से ही वापिस लौटना पड़ा। ह्रुदय से आशा करती हूँ कि लद्दाख के इन भागों के दर्शन हेतु मुझे यहाँ पुनः आने का अवसर मिले।

मुझे इस यात्रा के जितने भी भागों का आनंद प्राप्त हुआ, मैं पूर्णतया तृप्त हूँ। अतः मैं अपनी इस यात्रा को एक सफल यात्रा मानती हूँ। समयाभाव हो तो आप भी केवल कारगिल तक की यात्रा का आनंद ले सकते हैं। केवल यह निश्चित कर लें कि यहाँ की राजनैतिक एवं सुरक्षा की स्थिति अनुकूल है।

अनुवाद: मधुमिता ताम्हणे

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बोमडिला से वापसी की उत्साह पूर्ण यात्रा – अरुणाचल प्रदेश https://inditales.com/hindi/bomdila-arunachal-pradesh-things-to-do/ https://inditales.com/hindi/bomdila-arunachal-pradesh-things-to-do/#respond Wed, 20 Mar 2019 02:30:03 +0000 https://inditales.com/hindi/?p=524

अरुणाचल प्रदेश की यात्रा के दौरान हम बोमडिला और टेंगा घाटी का दौरा कर चुके थे। मेरी पूरी उत्तर पूर्वीय यात्रा की सबसे अप्रतिम बात अगर कोई है तो वह है अरुणाचल प्रदेश की अद्वितीय खूबसूरती तथा वहां के लोगों की सादगी, जो अन्यत्र दुर्लभ है। बोमडिला की सड़क यात्रा – अरुणाचल प्रदेश  बोमडिला शहर   […]

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अरुणाचल प्रदेश का कला संग्रहालय
अरुणाचल प्रदेश का कला संग्रहालय

अरुणाचल प्रदेश की यात्रा के दौरान हम बोमडिला और टेंगा घाटी का दौरा कर चुके थे। मेरी पूरी उत्तर पूर्वीय यात्रा की सबसे अप्रतिम बात अगर कोई है तो वह है अरुणाचल प्रदेश की अद्वितीय खूबसूरती तथा वहां के लोगों की सादगी, जो अन्यत्र दुर्लभ है।

बोमडिला की सड़क यात्रा – अरुणाचल प्रदेश 

बोमडिला शहर     

बोमडिला एक छोटा सा पहाड़ी शहर है, जिसकी प्रसिद्धि का प्रमुख कारण यह है कि यह सुविख्यात तवांग विहार तक जानेवाले रास्ते में पड़ता है। तवांग जानेवाले अधिकतर पर्यटकों को रात के समय या तो बोमडिला में रुकना पड़ता है या फिर दिरांग में, जो बोमडिला से कुछ ही समय की दूरी पर बसा हुआ है। यही बात बोमडिला को एक उत्तम पर्यटन स्थल बनाती है। यहाँ के बाज़ार हमेशा भीड़ से भरे होते हैं और इसके साथ साथ  यहाँ पर देखने योग्य बहुत सी जगहें हैं। रहने के लिए अच्छे होटल भी आपको यहीं मिलेंगे।

बोमडिला के बाज़ार
बोमडिला के बाज़ार

काफी ऊंचाई पर स्थित होने के कारण यह शहर आपको आस-पास की विविध घाटियों के सुंदर नज़ारे प्रदान करता है जिनकी प्रशंसा करते आप नहीं थकते। एक सच्चे पर्यटक की तरह यहां की सड़कों पर चलते समय आपको दोनों तरफ फल और सब्जीवालों के साथ-साथ सूखी मछली बेचनेवाले भी दिखाई देते हैं। इसके अलावा यहां पर छोटी-छोटी दुकाने भी हैं जिनमें प्लास्टिक के रंगबिरंगी जूते बेचे जाते हैं जो बर्फ में चलने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। यहां की महिलाएं झाँसी की रानी की तरह कपड़े से अपने बच्चों को अपनी पीठ से बांधकर अपना दिन भर का काम करती रहती हैं। तथा बुजुर्ग महिलाएं अपनी पारंपरिक वेश-भूषा में एक-दूसरे से गपशप करती हुई नज़र आती हैं।

बोमडिला के विहार    

बोमडिला का बौद्ध विहार
बोमडिला का बौद्ध विहार

बोमडिला में दो विहार हैं, जिनमें से एक हाल ही में बनवाया गया है और दूसरा विहार काफी पुराना है, जो शायद 300 – 400 साल पुराना होगा। यह प्राचीन विहार बोमडिला के मुख्य मार्ग के अंतिम छोर पर बसा हुआ है, जिसे ढूंढ निकालना मुश्किल नहीं है। यह एक छोटा सा विहार है जिसमें आज भी पुरातन काल की सुगंध महकती है। यहां के स्थानीय लोग इस विहार में भगवान की पूजा करने और उनके आश्रय में कुछ शांतिमय समय गुजारने आते हैं। यहां की वास्तुकला किसी भी उत्तम बौद्ध विहार की वास्तुकला के समान है।

सरकारी हस्तकला केंद्र 

बोमडिला में एक सरकारी हस्तकला केंद्र है, जहां पर शिल्पकार परंपरागत तौर-तरीकों के आधार पर स्थानीय कलाकृतियों को आकार देते हुए नज़र आते हैं। इन कलाकृतियों का उत्पादन और बिक्री इसी केंद्र में होती है। यहां पर मुखौटे, घरेलू साज-सज्जा की वस्तुएं, धातु की कलाकृतियाँ जैसी अनेक वस्तुएं बनाई जाती हैं, तथा कपड़ों की बुनाई और कढ़ाई का काम भी किया जाता है। इन सभी वस्तुओं की उत्पादन प्रक्रिया आप स्वयं अपनी आँखों से देख सकते हैं और अगर इनमें से कोई भी कलाकृती आपको पसंद आए तो आप उसे वहीं पर खरीद भी सकते हैं।

सरकारी हस्त-कला केंद्र - बोमडिला, अरुणाचल प्रदेश
सरकारी हस्त-कला केंद्र – बोमडिला, अरुणाचल प्रदेश

यहाँ हमे बताया गया कि इन शिल्पकारों को कलाकृतियों के संबंध में राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान (NIFT) द्वारा काफी सहायता मिलती है। इस संस्थान ने इन शिल्पकारों की पारंपरिक कृतियों और बुनाई के लिए उन्हें बौद्धिक संपदा संरक्षण दिलाने में भी बहुत सहायता की है। इस केंद्र के प्रवेश द्वार पर कुछ पुराने थंगका चित्र हैं, जो आज भी काफी नए से लगते हैं।

बोमडिला का संग्रहालय 

आपको जान कर आश्चर्य होगा की बोमडिला में एक संग्रहालय भी है। यह इस शहर के एकमात्र विद्यालय के पास एक सरकारी पाठशाला में स्थित है। आश्चर्य की बात तो यह है कि इस शहर में किसी को भी इस संग्रहालय के बारे में पता नहीं है। यहां तक कि पास में स्थित विद्यालय के छात्रों को भी इसकी कोई खबर नहीं है। हम जैसे-तैसे कर के आखिर उस संग्रहालय तक पहुँच गए। वहां पर हमारी मुलाकात दो युवतियों से हुई जो इस संग्रहालय का प्रबंधन कार्य देख रही थीं।

ऊंचे पर्वतों से बहती केमांग नदी - अरुणाचल प्रदेश
ऊंचे पर्वतों से बहती केमांग नदी – अरुणाचल प्रदेश

हमे वहां देखकर उन दोनों ने कुछ अचम्बित से स्वर में पूछा कि हम वहां क्या देखना चाहते हैं? इस पर हमने जवाब दिया कि यहां पर जो भी प्रदर्शित है हम वह सब कुछ देखना चाहते हैं। वे शायद हमारी बात नहीं समझे और थोड़ी हिचकिचाहट के साथ उन्होंने हमे संग्रहालय के दर्शन करने की इजाज़त दे दी, लेकिन हमे वहां पर प्रदर्शित वस्तुओं की तस्वीरें खींचने से मना किया। हमने पूरे संग्रहालय की सैर तो कर ली लेकिन वहां के अधिकतर प्रदर्शन कक्ष बंद थे। जब हमने उन युवतियों से इन कक्षों के बारे में पूछा और उनसे इन कक्षों को खोलने का अनुरोध किया तो उन्होंने बताया कि जिस आदमी के पास इन कमरों की चाबियाँ हैं वे बाहर गए हुए है और अगर हमे उन कमरों के दर्शन करने हैं, तो हमे एक घंटे तक इंतज़ार करना पड़ेगा।

और पढ़िए – अरुणाचल की टेंगा घाटी की सैर

थोड़ी देर बाद हमे वहां पर एक पुस्तक विक्रयपटल दिखा जहां से हमने कुछ किताबें खरीदी। इससे शायद उन युवतियों को लगा होगा कि हमे सच में इस संग्रहालय के प्रती दिलचस्पी है और उन्होंने हमारे लिए संग्रहालय के सभी कक्ष खोल दिये। उनमें से एक युवती हमारे साथ आयी और उसने हमे बहुत सी वस्तुओं के विस्तृत विवरण दिये। पर वास्तव में वह समझ नहीं पा रही थी कि इन वस्तुओं में ऐसी क्या खास बात है कि कोई उन्हें देखने के लिए समय भी निकाल सकता है।

मैंने उसे समझाया कि ये सारी चीजें हमारे लिए नयी हैं, क्योंकि, हमारे यहां ऐसी वस्तुओं का प्रयोग नहीं किया जाता। इसीलिए हम स्थानीय संस्कृति को समझने के लिए इन वस्तुओं के बारे में जानना चाहते हैं। उसके हाव-भाव से लग रहा था जैसे उसे हमारी बातों पर विश्वास नहीं है। लेकिन बाद में उसने हमे बहुत सी वस्तुओं के बारे में विस्तार से समझाया और यह भी बताया कि ये वस्तुएं किस जनजाति की हैं और उनकी जाति में इन अनुष्ठानिक वस्तुओं का क्या महत्व है। इस छोटी सी बातचीत से मुझे बहुत मजा आया। इससे हम दोनों एक दूसरे को थोड़ा बहुत तो जान पाये थे।

नाग मंदिर 

बोमडिला से वापसी के समय हम रास्ते में मिलने वाले नाग मंदिर, जो बोमडिला और भालुकपोंग के बीच में बसा हुआ है, के दर्शन करने के लिए रुके। इस क्षेत्र में वैसे तो बहुत सारे नाग मंदिर हैं, जो यहां पर रहनेवाले नाग पंथियों की ओर संकेत करते हैं। लेकिन यह नाग मंदिर मुख्य सड़क पर बसा होने के कारण हमने इसी के दर्शन करना उचित समझा। इस मंदिर के पास से एक नदी भी बहती है। अरुणाचल की अन्य सभी बातों की तरह यह मंदिर भी बहुत ही साधारण सा है। इस मंदिर तक पहुँचने के लिए आपको सीढ़ियों से जाना पड़ता है। काफी ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर की खिड़कियों से आपको पहाड़ियों से घिरी इस घाटी का सुंदर नज़ारा देखने को मिलता है, जिसके बीच में से बहती हुई नदी इसे और भी आकर्षक बनाती है।

नाग मंदिर - बोमडिला के रास्ते पे - अरुंचल प्रदेश
नाग मंदिर – बोमडिला के रास्ते पे – अरुंचल प्रदेश

इस नाग मंदिर के ठीक सामनेवाली पहाड़ी पर मधुमक्खियों का शहर बसा हुआ है। वहां पर मधुमक्खियों के हजारों छत्ते बने हुए हैं। उस पहाड़ी पर जितनी भी खुली जगहें हैं, उन सभी भागों में सिर्फ इन मधुमक्खियों के छत्ते ही नज़र आते हैं। अगर किसी व्यक्ति ने हमे इसके बारे न बताया होता और यहां पर रुककर उस सुंदर से दृश्य को देखने के लिए नहीं कहा होता, तो शायद हम यह अप्रतिम नज़ारा कभी नहीं देख पाते। मैं अभी भी इसी सोच में हूँ कि न जाने ये लोग इतनी ऊंची और लगभग सीधी खड़ी पहाड़ी पर बसे उन छत्तों से सारा का सारा शहद कैसे इकट्ठा करते होंगे।

रास्ते पर छाया हुआ घना कोहरा और बादल    

नाग मंदिर और भालुकपोंग के बीच एक जगह है जो वहां पर छाए घने कोहरे के लिए काफी प्रसिद्ध है। ये पहाड़ हमेशा बादलों की फौज से घिरे रहते हैं जिसके कारण रास्ते भर आपकी मुलाकात इन बादलों से होती रहती है। कभी-कभी ये बादल इतने घने होते हैं कि आपके लिए आगे आनेवाले मोड या फिर गाडियाँ ठीक से देख पाना बहुत मुश्किल हो जाता है। इस घने कोहरे से गुजरते हुए जाना उत्तेजकपूर्ण तो था ही लेकिन साथ में बहुत डरावना भी था।

अरुणाचल की छोटी छोटी दुकानें
अरुणाचल की छोटी छोटी दुकानें

अरुणाचल की यात्राएं ऐसी ही हैं, जो असुविधाजनक तो होती हैं लेकिन साथ ही साथ बहुत खूबसूरत और रोमांचक भी होती हैं। यहां पर पूरे रास्ते में आपको छोटी-छोटी दुकाने मिलती हैं, जो लकड़ी की दीवारों में बने छोटे-छोटे छेदों की तरह लगती हैं। और इनमें चित्रात्मक ढंग से बैठे हुए दुकानदार इनकी शोभा और भी बढ़ाते हैं।

यह पूरी यात्रा हमारे लिए एक बहुत ही उत्साहपूर्ण अनुभव था। हमने प्यारी-प्यारी यादों और यहां पर वापस आकर बाकी बचे स्थानों की यात्रा करने की आशा के साथ अरुणाचल से विदा ली।

अरुणाचल प्रदेश के बारे में कोई भी जानकारी प्राप्त करने के लिए, उससे संबंधित आधिकारिक वेबपेज को जरूर पढिए।

मैं सांग की बहुत आभारी हूँ, जिन्होंने हमारी अरुणाचल की इस यात्रा को इतना यादगार बनाया।

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